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फोन से ‘खेला’ फिर भी नहीं बचा राज कुंद्रा, कानपुर का खाता भी फ्रीज: शर्लिन चोपड़ा-पूनम पांडे को हाईकोर्ट से राहत

बॉलीवुड अभिनेत्री राज कुंद्रा के पति और अरबपति कारोबारी राज कुंद्रा को मुंबई पुलिस ने पोर्न फ़िल्में शूट कर के एप के माध्यम से ऑनलाइन बेचने के आरोप में गिरफ्तार किया था। अब इस मामले में मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच ने पहली चार्जशीट के डिटेल्स सामने आए हैं। सबूत के रूप में एक प्रेजेंटेशन को भी इस चार्जशीट का हिस्सा बनाया गया है, जिसमें पोर्न कारोबार से 146 करोड़ रुपए का राजस्व और 30.42 करोड़ रुपए का लाभ कमाने का अनुमान लगाया गया है।

ये प्रेजेंटेशन ‘बॉलीफेम मीडिया प्राइवेट लिमिटेड’ का है। साल 2023-24 के लिए इतनी कमाई का अनुमान लगाया गया था। इस कंपनी को राज कुंद्रा ने ‘प्लान बी’ के रूप में विकसित किया था, ताकि ‘हॉटशॉट्स’ एप के शक के घेरे में आने के बाद सारी चीजें यहाँ ट्रांसफर की जा सकें। हॉटशॉट्स को लंदन की कंपनी ‘क्रेमलिन लिमिटेड’ चलाती है। गूगल और एप्पल के स्टोर ने इसे नीतियों के उल्लंघन का आरोप लगा कर हटा दिया था।

व्हाट्सएप्प चैट्स में भी राज कुंद्रा और उनके सहयोगी उमेश कामत इस पर राहत जताते हुए दिख रहे हैं कि उनके पास बॉलीफेम नामक कंपनी भी है। चार्जशीट में डाले गए प्रेजेंटेशन में 2020-21, 2021-22 एयर 2023-24 की कमाई के आँकड़े व अनुमान हैं। 2021-22 में 36.5 करोड़ रुपए का राजस्व और 4.76 करोड़ रुपए के शुद्ध लाभ का आँकड़ा दिया गया है। अगले वर्ष राजस्व 73 करोड़ रुपए होता है, लेकिन शुद्ध लाभ उतना ही रहता है।

वहीं 2023-24 में ये आँकड़े काफी बढ़ जाते हैं। इसी मामले में राज कुंद्रा की गिरफ़्तारी हुई है। जब ये चार्जशीट दायर हुई थी, तब राज कुंद्रा गिरफ्तार नहीं हुए थे। उक्त प्रेजेंटेशन को उमेश कामत के यहाँ से बरामद किया गया था। सप्लीमेंट्री चार्जशीट में और डिटेल्स डाले जाएँगे। हॉटशॉट्स के कंटेंट का एक बड़ा हिंसा बॉलीफेम में डाल दिया गया था। अभिनेत्री शर्लिन चोपड़ा से भी पूछताछ होनी है।

उन्होंने वीडियो जारी कर कहा है कि जाँच शुरू होने पर साइबर सेल के पास पहुँचने वाले वो पहली व्यक्ति थीं। उन्होंने बताया कि सेलेब्स के लिए एप बनाने वाली कंपनी ‘Armsprime Media’ के बारे में उन्होंने पुलिस को जानकारी दी थी, जिसके राज कुंद्रा डायरेक्टर थे। राज कुंद्रा जाँच में भी सहयोग नहीं कर रहे हैं। इस साल फरवरी में जब पोर्न रैकेट का खुलासा हुआ था, तब राज कुंद्रा ने बचने के लिए तुरंत अपने फोन का डेटा उड़ा दिया था।

उन्होंने अपने मोबाइल फोन भी बदल लिया था। उन्होंने जाँच के लिए पुलिस को जो मोबाइल फोन दिया है, वो उन्होंने मार्च में खरीदा था। उनके पुराने फोन न मिलने के कारण चैट्स के कई डेटा पुलिस को नहीं मिल पाएँगे। डिजिटल फॉरेंसिक एक्सपर्ट्स की मदद ली जा रही है, ताकि सर्वर से डेटा निकाला जा सके। कानपुर में भी राज कुंद्रा के दो बैंक खातों को सीज किया गया है, जिनमें करोड़ों रुपए डाले गए थे।

उधर इस मामले के सामने आने के बाद से ही शिल्पा शेट्टी ने ‘सुपर डांस चैप्टर 4’ रियलिटी शो की शूटिंग नहीं की है। रितेश देखमुख और उनकी पत्नी जेनेलिया डिसूजा को बतौर गेस्ट जज लेन की तैयारी हो रही है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने शर्लिन चोपड़ा और पूनम पांडेय को एंटीसिपेटरी बेल देते हुए 20 सितंबर, 2021 तक उनके खिलाफ कोई कड़ी कार्रवाई न करने का आदेश दिया है। आज राज कुंद्रा की कस्टडी बढ़ाने के लिए उन्हें कोर्ट में पेश किया जाएगा। वाराणसी में उनके एक बिजनेस पार्टनर से भी पूछताछ हो रही है।

रेप की सजा से बचने के लिए शादी, फिर घुमाने के नाम पर नैनीताल ले गया; गुफा में सेक्स करने के बाद कर दी हत्या

दिल्ली पुलिस ने 26 साल के राजेश को गिरफ्तार कर उसकी 26 वर्षीय पत्नी के गायब होने के मामले की गुत्थी सुलझा ली है। राजेश ने रेप की सजा से बचने के लिए दिसंबर 2020 में बबीता से शादी की थी। कुछ समय बाद बबीता गायब हो गई। अब पता चला है कि घुमाने के बहाने राजेश उसे नैनीताल ले गया था। वहाँ एक गुफा में सेक्स करने के बाद उसने उसकी हत्या कर दी थी।

रिपोर्टों के मुताबिक राजेश मूल रूप से उत्तराखंड का ही रहने वाला है। बीते साल जून में बबीता ने उस पर शादी का झाँसा देकर रेप करने का आरोप लगाया था। इसके बाद से गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल भेज दिया गया। बाद में उसने हलफनामा दायर कर कहा कि वह बबीता से शादी करना चाहता है। इसके बाद उसकी रिहाई हुई और दोनों ने शादी कर ली।

अचानक से इस साल जून में बबीता के परिजनों ने उसके गायब होने की शिकायत दिल्ली के द्वारका थाने में दर्ज कराई है। अब बबीता की हत्या किए जाने का खुलासा हुआ है। घटना करीब डेढ़ महीने पहले 12 जून 2021 की है। राजेश अपनी पत्नी को नैनीताल घुमाने के बहाने ले गया औऱ उसकी हत्या कर दी।

वारदात के 45 दिन बीतने के बाद दिल्ली पुलिस ने नैनीताल पुलिस की सहायता से राजेश को गिरफ्तार कर लिया है। साथ ही उसकी निशानदेही पर बबीता का कंकाल कलमठ से बरामद किया है। नैनीताल में दिल्ली पुलिस की टीम का नेतृत्व करने वाले सब इंस्पेक्टर नारेंद्र सिंह ने बताया, “मृतक महिला बबीता ने आरोपित (पति) राजेश पर रेप का आऱोप लगाया था। इस मामले में उसे जेल भी हुई थी। हालाँकि, बाद में राजेश ने एक हलफनामा दिया कि वह बबीता से शादी करेगा जिसके बाद उसे जेल से छोड़ दिया गया था। दोनों ने दिसंबर 2020 में शादी कर ली थी।”

लेकिन, पिछले महीने बबीता के परिजनों ने उसके गायब होने की रिपोर्ट दर्ज कराई। नैनीताल जिले के तलीताल पुलिस स्टेशन के इंचार्ज विजय मेहता ने कहा, “वह बीते 11 जून 2021 को गायब हुई थी और 15 जून 2021 को उसके परिजनों ने शिकायत दर्ज कराई।” उन्होंने आगे कहा, “जब हमने मृतक की गतिविधियों का पता लगाने के लिए उसके फोन रिकॉर्ड्स की जाँच की तो उसका नैनीताल कनेक्शन सामने आया। 12 जून 2021 को उसकी आखिरी लोकेशन नैनीताल के हनुमानगढ़ मंदिर के पास पाई गई थी।”

मेहता के मुताबिक, उस दिन राजेश के फोन की भी लोकेशन यहीं मिली। पूछताछ के दौरान उसने अपना अपराध कबूल किया है। उसने बताया कि वह बबीता और उसकी माँ से परेशान था। इसी कारण उसने हत्या करने का फैसला किया। दिल्ली पुलिस की जाँच का हवाला देते हुए मेहता ने कहा, “12 जून को नैनीताल से निकलने के बाद उसने बबीता का फोन बंद कर दिया था। शहर से करीब 13 किमी दूर आने के बाद उसने किसी एकांत जगह पर सेक्स करने की इच्छा जताई। वह उसे एक गुफा में ले गया, जहाँ सेक्स करने के गला घोंट कर उसकी हत्या कर दी।”

6 साल के जुड़वा भाई, अगवा कर ₹20 लाख फिरौती ली; फिर भी हाथ-पैर बाँध यमुना में फेंका: ढाई साल बाद इंसाफ

मध्य प्रदेश स्थित सतना जिले के चित्रकूट में दो जुड़वा भाइयों के अपहरण और हत्या के मामले में 5 दोषियों को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई है। दोनों भाइयों की जब हत्या की गई थी, तब उनकी उम्र महज 6 साल थी। इस हत्याकांड के लगभग ढाई वर्षों बाद अदालत का फैसला आया है। मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि अगर पुलिस से चूक नहीं होती तो अपहरण के दिन ही अपराधी पकड़े जा सकते थे।

12 फरवरी, 2019 को इन दोनों मासूमों का अपहरण किया गया था। बाइक पर जा रहे बदमाशों की एक दूसरे बाइक सवार के साथ टक्कर भी हो गई थी। दोनों में झगड़ा भी हुआ था और पुलिस को सूचना दी गई थी, लेकिन तब पुलिस से चूक हो गई। रजौला के बाद बच्चों को लेकर भागते अपराधी मनोज मिश्रा नामक व्यक्ति से टकराए थे। दोनों पक्षों में बहस हुई, जिसके बाद आरोपित भागने लगे तो मनोज को शक हुआ।

उन्होंने बाइक सवारों का पीछा किया। हनुमान बाग़ आश्रम की तरफ मुड़ कर अपराधी गायब हो गए। ये दोनों भाई चित्रकूट स्थित सद्गुरु पब्लिक स्कूल में पढ़ाई करते थे। अपहरण वाले दिन वो दोपहर 1 बजे छुट्टी के बाद घर लौट रहे थे। स्कूल परिसर में ही बाइक से आए दो नकाबपोशों ने उन्हें पिस्तौल के दम पर किडनैप कर लिया था। सीसीटीवी फुटेज में भी ये देखा गया था। अगले दिन फोन कर के 2 करोड़ रुपए की फिरौती माँगी गई, जो मोल-मोलाई होते-होते 20 लाख तक पहुँची।

फिरौती माँगने के लिए अपहरणकर्ताओं ने अपने नंबर की बजाए किसी राहगीर के नंबर का उपयोग किया था। इसके लगभग एक हफ्ते बाद 20 फरवरी को एक व्यक्ति को अपहरणकर्ताओं ने फोन किया। बच्चों के पिता बृजेश रावत यूपी पुलिस के एक जवान के साथ जरिए बंदौसा के पास चौसर नामक स्थान पर फिरौती देने गए। उन्हें वहीं बुलाया गया था। वहाँ स्थित एक पुल पर उन्हें 20 लाख रुपए रख देने को कहा गया था।

फिरौती देकर लौटने के बाद अपराधियों ने भरतकूप के पास बच्चों को छोड़ने की बात कही। लेकिन, अगले दिन शाम होने तक जब बच्चे वापस नहीं आए तो परिजनों व पुलिस का शक बढ़ गया। 22 फरवरी को मध्य प्रदेश पुलिस एक अपराधी तक पहुँचने में कामयाब रही और अगले दिन शाम तक सभी 6 अपराधी धर-दबोचे गए। खुलासा हुआ कि गुनहगारों ने बच्चों के हाथ-पाँव बाँध कर उन्हें उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले में यमुना नदी में फेंक दिया था।

आरोपितों के कब्जे से 4 बाइक और एक बोलेरो गाड़ी बरामद हुई थी। आरोपित बार-बार बाइक बदलते रहते थे, ताकि उन पर किसी का शक न जाए। अपहरण के लिए ग्लैमर बाइक का प्रयोग किया गया था। बच्चों को बाँदा के ही अरतरा में रखा गया था। अपाचे बाइक से बदनाम फिरौती वसूलने पहुँचे थे। आरोपितों में से एक ने जेल में ही आत्महत्या कर ली थी। इसीलिए, बचे 5 को सज़ा सुनाई गई है।

तब इस मामले को राजनीतिक रंग देते हुए मध्य प्रदेश के तत्कालीन कमलनाथ सरकार में जनसंपर्क मंत्री पीसी शर्मा ने इस अपराध के लिए उलटे उत्तर प्रदेश की पूरी सरकार का इस्तीफा माँगा
था। बच्चों की तलाश में उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश पुलिस का संयुक्त अभियान चल रहा था। कई जगहों पर सरकार की इस नाकामी के ख़िलाफ़ प्रदर्शन हुए थे। पुलिस के 1500 जवान चित्रकूट में तैनात किए गए थे।

‘अपनी मौत के लिए दानिश सिद्दीकी खुद जिम्मेदार, नहीं माँगेंगे माफ़ी, वो दुश्मन की टैंक पर था’: ‘दैनिक भास्कर’ से बोला तालिबान

अफगानिस्तान के एक बड़े हिस्से पर कब्ज़ा जमा चुके तालिबान ने कहा है कि वो भारत के आंतरिक मामले में दखल नहीं देगा और अफगानिस्तान में चल रहे उन निवेश कार्यों की रक्षा करेगा, जो राष्ट्र-निर्माण के लिए किए जा रहे हैं। तालिबान ने कहा कि भारत की सरकार को वहाँ की जनता ने चुना है। ‘दैनिक भास्कर’ को एक्सक्लूसिव इंटरव्यू देते हुए तालिबान के प्रवक्ता जबीउल्लाह मुजाहिद ने भारतीय फोटोजर्नलिस्ट दानिश सिद्दीकी की मौत पर भी बात की।

तालिबान ने कहा कि दानिश सिद्दीकी युद्ध में मारे गए और किसकी गोली से उनकी मौत हुई, ये साफ़ नहीं है। साथ ही आतंकी संगठन ने दानिश सिद्दीकी के शव के साथ बेरहमी किए जाने की बात को भी नकार दिया। बता दें कि दानिश सिद्दीकी को भारतीय जान कर हत्या के बाद उनके सिर को गाड़ी से कुचले जाने की बात सामने आई थी। तालिबान ने दानिश सिद्दीकी को उनकी मौत के लिए खुद जिम्मेदार बताते हुए कहा कि वो ‘दुश्मन’ के टैंक में सवार थे।

साथ ही इस बात पर भी आपत्ति जताई कि उन्होंने युद्धक्षेत्र में आने से पहले तालिबान की अनुमति नहीं ली थी। जबीउल्लाह मुजाहिद ने कहा कि वो दानिश सिद्दीकी की तस्वीर दिखा कर साबित कर सकता है कि उनके शव के साथ कुछ गलत नहीं हुआ और जलाया नहीं गया। उसने बताया कि शव युद्ध वाले इलाके में पड़ा था, जिसकी बाद में पहचान हुई तो रेडक्रॉस के हवाले कर दिया गया। साथ ही तालिबान ने दानिश सिद्दीकी की मौत के लिए माफ़ी माँगने से भी इनकार कर दिया।

‘दैनिक भास्कर’ के साथ बातचीत में जबीउल्लाह मुजाहिद ने कहा कि भारत या भारतीय संस्थाओं के साथ उसकी किसी भी माध्यम से बातचीत नहीं चल रही है। साथ ही भारत को चेताया कि वो अफगानिस्तान की सेना की कोई मदद न करे। उसने दावा किया कि भारत द्वारा दिए गए वॉर प्लेन्स का इस्तेमाल तालिबान के खिलाफ किया जा रहा है। कश्मीर के मुद्दे के शांतिपूर्ण समाधान की बात करते हुए तालिबान के प्रवक्ता ने कहा कि कश्मीरियों के अधिकारी नहीं रौदे जाने चाहिए।

उसने कहा कि तालिबान भी वही चाहता है, जो कश्मीरी चाहते हैं। उसने भारत से अपील की कि वो अफगानिस्तान में सैन्य मदद की बजाए आर्थिक व मानवीय मदद भेजे, ताकि यहाँ के लोगों की मदद हो सके। पाकिस्तान के साथ अच्छे संबंधों की बात करते हुए उसने कहा कि लाखों अफगानी शरणार्थी वहाँ रहते हैं। उसने कहा कि महिलाओं को वही अधिकार दिए जाएँगे, जो इस्लाम में दिया गया है।

बता दें कि पुलित्जर अवॉर्ड विजेता फोटोग्राफर दानिश सिद्दीकी के बारे में अफगानिस्तान के कमांडर बिलाल अहमद ने खुलासा किया था कि उनके शव के साथ भी बर्बरता की गई थी। उन्होंने इसका कारण बताते हुए कहा था कि चूँकि दानिश सिद्दीकी भारतीय थे और तालिबानी भारत से नफरत करते हैं, इसीलिए उनके शव के साथ भी बर्बरता की गई थी। 16 जुलाई को हुई इस वारदात के बारे में भारतीय वामपंथी मीडिया ने ‘गोलीबारी में मारे जाने’ की बात कही थी।

कभी ₹1200 की नौकरी करता था अजमत अली, योगी राज में ₹2542402951 की संपत्ति जब्त: सपा सरकार में मंत्री रहे बेटे के साथ चला रहा था गिरोह

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार अपराध औऱ अपराधियों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की पॉलिसी पर काम कर रही है। इसी कड़ी में लखनऊ पुलिस ने शातिर अपराधी अजमत अली और उसके बेटे मोहम्मद इकबाल के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई की है। अजमत अली की 250 करोड़ रुपए से ज्यादा की संपत्ति कुर्क की गई है। इसी तरह उसके बेटे इकबाल की भी 77 लाख से ज्यादा की संपत्ति सीज की गई है।

अजमत अली कभी 1200 रुपए प्रतिमाह की नौकरी करता था। उसका बेटा सपा की सरकार में राज्यमंत्री रहा है। पुलिस की ओर से जारी बयान के मुताबिक बाप-बेटे आपराधिक गिरोह चला रहे थे, जिसका सरगना अजमत अली है।

रिपोर्ट के मुताबिक, जब्त की गई संपत्ति में अजमत अली की 2,54,24,02,951 रुपए और मोहम्मद की 77,35,530 रुपए की संपत्ति शामिल है। पुलिस ने ये कार्रवाई एंटी-सोशल एक्टिविटीज (प्रिवेंसन) एक्ट 1986 के तहत की है। जब्त संपत्तियों में कैरिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइसेंस एंड हॉस्पिटल, हॉस्टल, स्नातकोत्तर संस्थान, निर्माणाधीन भवन, जमीनें शामिल हैं। इसके अलावा क्वालिस कार, इनोवा, फार्च्यूनर, ऑडी समेत कई गाड़ियाँ भी शामिल हैं।

पुलिस आयुक्त डीके ठाकुर के मुताबिक, मणियाँव थाने में आरोपित बाप-बेटे के खिलाफ 11 केस दर्ज हैं। अकेले अजमत अली के खिलाफ 2015 से 2021 के दौरान 8 केस दर्ज हुए हैं। इसमें धोखाधड़ी, मारपीट, एससी-एसटी समेत कई मामले शामिल हैं। वहीं मोहम्मद इकबाल पर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने, मारपीट, बलवा से जुड़े तीन केस दर्ज हैं।

अलीगंज के एसीपी अखिलेश सिंह के मुताबिक, अजमत अली ने 1995 में कैरियर कॉन्वेंट एजुकेशनल ट्रस्ट बनाया था। इसी के जरिए उसने सरकारी जमीनों, रास्तों व चकरोडों पर कब्जा कर अवैध संपत्ति खड़ी कर ली। उसने गैरकानूनी कमाई के दम पर 1998 से 2000 के दौरान कैरियर कॉन्वेंट कॉलेज का निर्माण किया और साल 2007 में कैरियर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड हॉस्पिटल को नेशनल हाइवे से सटाकर बनवाया।

पुलिस का कहना है कि मणियाँव क्षेत्र के घैला गाँव का रहने वाला अजमत अली कभी 1200 रुपए महीने के हिसाब से काम करता था। बड़ा बनने की चाह में उसने अपने बेटे मोहम्मद इकबाल के साथ मिलकर गैंग बनाया औऱ अपराध करने लगा।

विवाद की जड़ में अंग्रेज, हिंसा के पीछे बांग्लादेशी घुसपैठिए? असम-मिजोरम के बीच झड़प के बारे में जानें सब कुछ

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने बयान दिया कि मिजोरम के साथ उनके राज्य के चल रहे सीमा विवाद में असम के 6 पुलिसकर्मी बलिदान हो गए हैं। ये कई लोगों के लिए आश्चर्य भरा था, क्योंकि इस तरह से भारत के दो राज्यों की लड़ाई की खबर पूर्व में बहुत ही कम आई है। संवेदनशील उत्तर-पूर्व में ये सब तब हो रहा है, जब दोनों राज्यों में राजग की सरकार है और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह हाल ही में उत्तर-पूर्व के दौरे से लौटे हैं।

असम और मिजोरम के बीच संघर्ष व हिंसा

इससे पहले अक्टूबर 2020 में भी मिजोरम और असम के लोगों के बीच संघर्ष की घटनाएँ सामने आई थीं। उस दौरान भी 8 लोग घायल हो गए थे और कई घरों, झोंपड़ियों व दुकानों को जला डाला गया था। असल में असम से ही कभी मिजोरम अलग हुआ था। तभी से दोनों राज्यों के बीच सीमा-विवाद चल रहा है। आइए, इस विवाद को समझते हैं। असम के कछार जिले में स्थित है लैलापुर गाँव। इसी से सटा हुआ है कि मिजोरम के कोलासिब जिले का वैरेंगते गाँव।

अक्टूबर में इन्हीं दोनों गाँवों के लोग आपस में भिड़ गए थे। इसके अलावा असम का करीमगंज और मिजोरम का ममित जिले भी आपस में सटा हुआ है। इस घटना से कुछ दिन पहले इन दोनों जिलों के लोगों के बीच भी झड़प व हिंसा हुई थी। 9 अक्टूबर को एक मिजोरम के किसान की सुपारी की खेती और झोंपड़ी जला दी गई थी। वहीं कछार जिले के लोगों ने मिजोरम के पुलिसकर्मियों पर पत्थरबाजी की थी।

कोलासिब पुलिस का कहना था कि इस घटना के विरोध में मिजोरम के लोग आक्रोशित हो गए और उन्होंने असम के इन लोगों को खदेड़ना शुरू कर दिया। अब समझते हैं कि इस हिंसा का कारण क्या था? असम और मिजोरम की सरकारों के बीच कुछ वर्षों पहले एक करार हुआ था। इसमें इस पर सहमति बनी थी कि मिजोरम और असम के बीच की भूमि पर यथास्थिति बनाई रखी जाए। लैलापुर के लोगों पर आरोप है कि उन्होंने इस यथास्थिति का उल्लंघन करते हुए ‘नो मेंस लैंड’ में कुछ निर्माण कार्य कर लिए।

उन्होंने कुछ झोंपड़ियों का निर्माण कर दिया। हालाँकि, वो अस्थायी ही थे। इससे मिजोरम के लोग आक्रोशित हो गए और उन्होंने वहाँ जाकर आगजनी शुरू कर दी। वहीं इस बारे में असम का कुछ और ही दावा है। कछार प्रशासन ने कहा था कि ये भूमि असम की है। इसके लिए स्टेट रिकॉर्ड्स का हवाला दिया जा रहा है। लेकिन, मिजोरम का कहना है कि असम जिस भूमि पर दावा कर रहा है, वहाँ वर्षों से मिजोरम के लोग खेती करते आ रहे हैं।

सीमा-विवाद के पीछे बांग्लादेश के घुसपैठिए?

करीमगंज प्रशासन भी मानता है कि उस भूमि पर इतिहास में मिजोरम के लोग खेती करते आ रहे थे, लेकिन साथ ही उसका ये भी कहना है कि कागज़ पर ये सिंगला फॉरेस्ट रिजर्व का हिस्सा है, जो करीमगंज जिले का हिस्सा है। असम की बराक घाटी की सीमा मिजोरम से लगती है। इन दोनों ही राज्यों की सीमाएँ बांग्लादेश से लगती हैं। मिजोरम की सिविल सोसाइटी के लोग इस विवाद के लिए बांग्लादेश के अवैध घुसपैठियों को जिम्मेदार ठहराते हैं।

उनका कहना है कि असम में बसे बांग्लादेश के घुसपैठिए ही सारी समस्या की जड़ हैं। उनका कहना है कि ये घुसपैठिए उनके क्षेत्र में घुस कर उनकी झोंपड़ियों को तोड़ डालते हैं, खेती बर्बाद कर देते हैं और उन्होंने ही पुलिसकर्मियों पर पत्थरबाजी की थी। मिजोरम के छात्र संघ ‘मिज़ो जीरलाई पॉल’ का यही मानना है। ये भी ध्यान देने वाली बात है कि उत्तर-पूर्व में सभी राज्यों की सीमाएँ जटिल हैं।

अंग्रेजों के काल तक जाती है असम-मिजोरम सीमा विवाद की जड़ें

हालाँकि, असम और नागालैंड के बीच भी सीमा-विवाद चल रहा है और वहाँ इस तरह की घटनाएँ मिजोरम की सीमा से ज्यादा ही होती रही है। असम और मिजोरम के बीच 165 किलोमीटर की सीमा है। इस विवाद की जड़ें अंग्रेजों के काल में हैं। उस समय मिजोरम को लुशाई की पहाड़ियों के नाम से जाना जाता था, जो असम का ही एक जिला हुआ करता था। 1875 में एक अधिसूचना जारी कर के इसे कछार के मैदानों से अलग हिस्सा घोषित किया गया।

इसके बाद 1933 में एक और अधिसूचना जारी हुई, जिसमें लुशाई हिल्स और मणिपुर के बीच सीमा का बँटवारा किया गया। मिजोरम का कहना है कि 1875 के आदेश के हिसाब से सीमा विवाद सुलझाया जाना चाहिए, जबकि जो 1873 के ‘बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेगुलेशन (BEFR)’ से निकल कर सामने आया था। मिजोरम का कहना है कि 1933 में उससे कोई विचार-विमर्श नहीं किया गया था, इसीलिए वो आदेश सही नहीं था।

मिजोरम का कहना है कि असम सरकार 1933 के बँटवारे के आदेश के हिसाब से चल रही है और यही सारे विवाद की जड़ है। जुलाई 2021 और अक्टूबर 2020 से पहले गरवारी 2018 में भी इसी तरह की हिंसा देखने को मिली थी। तब असम के पुलिस व फॉरेस्ट अधिकारियों पर मिजोरम द्वारा खेती के लिए बनाई गई एक संरचना को ध्वस्त करने के आरोप लगे थे। उस समय मिजोरम के एक पत्रकार की पिटाई हुई थी और असम पुलिस पर हमला हुआ था।

खजराना मंदिर की स्वयंभू गणेश प्रतिमा: औरंगजेब के हमले में भी सुरक्षित, जानिए श्रद्धालु आज भी क्यों बनाते हैं उल्टा स्वास्तिक

ऑपइंडिया की मंदिर श्रृंखला में हमने आपको पुडुचेरी में स्थित मनाकुला विनायगर मंदिर के बारे में बताया था जहाँ विराजमान गणेश जी प्रतिमा को पुर्तगालियों ने कई बार समुद्र में डुबोने का प्रयास किया था, लेकिन हर बार प्रतिमा अपने स्थान पर वापस आ जाती थी। अब हम आपको मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में स्थित खजराना गणेश मंदिर के बारे में बता रहे जहाँ भगवान गणेश की स्वयंभू मूर्ति है, जिसे औरंगजेब के हमले से बचाने के लिए एक कुएँ में छिपा दिया गया था। बाद में गणेश जी ने स्वयं ही बाहर आने का प्रबंध किया था।

इतिहास

इस्लामिक आक्रांता और मुगल शासक औरंगजेब अपनी कट्टर प्रवृत्ति के चलते हिन्दू मंदिरों को नष्ट करने का प्रण ले चुका था। इसी क्रम में जब वह अपनी सेना के साथ इंदौर क्षेत्र में पहुँचा तब भगवान गणेश की प्रतिमा को उससे बचाने के लिए एक कुएँ में छिपा दिया गया था। खजराना गणेश मंदिर में स्थापित भगवान गणेश की प्रतिमा कहाँ से उत्पन्न हुई और किसने स्थापित की इसका कोई प्रामाणिक साक्ष्य मौजूद नहीं है। मान्यता है कि यह प्रतिमा स्वयंभू है जो उसी स्थान पर स्थापित हुई थी, जहाँ आज वर्तमान मंदिर स्थित है।

भगवान गणेश की यह प्रतिमा कई सालों तक कुएँ में ही रही। फिर इंदौर में देवी अहिल्याबाई होल्कर का शासन प्रारंभ हुआ। माता अहिल्याबाई अपनी ईश्वर भक्ति के लिए पूरे देश में जानी जाती थीं। उन्होंने देश के कई प्रसिद्ध मंदिरों का जीर्णोद्धार करवाया था। उन्हीं के शासनकाल के दौरान एक बार पंडित मंगल भट्ट को स्वप्न हुआ और उसे कुएँ में भगवान गणेश के होने का पता चला। उसने यह बात माता अहिल्याबाई तक पहुँचाई। उन्होंने न केवल कुएँ से भगवान गणेश की उस दिव्य प्रतिमा को निकाला, बल्कि उस स्थान पर एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया। उसी मंदिर को आज हम खजराना गणेश मंदिर के नाम से जानते हैं।

मान्यताएँ

भगवान गणेश सुख और समृद्धि का प्रतीक माने जाते हैं। उनका ही आशीर्वाद है कि इंदौर आज मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी बना हुआ है और देश के प्रमुख आर्थिक शहरों में से प्रमुख है। इंदौर में स्थित खजराना गणेश मंदिर में लोगों की आस्था बहुत पुरानी है। भक्त अक्सर ही इस मंदिर को सोना, चाँदी और बहुमूल्य रत्न दान में देते रहते हैं। भगवान गणेश की दोनों आँखे हीरे की हैं जो इंदौर के ही स्थानीय व्यापारी द्वारा दान में दी गई थीं। गर्भगृह की दीवारें और छत चाँदी से मढ़ी हुई हैं। खजराना गणेश मंदिर के महत्व का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इंदौर के निवासियों द्वारा कोई भी शुभ कार्य किए जाने से पहले इस मंदिर में भगवान गणेश से ही आशीर्वाद लिया जाता है और यह परंपरा सालों पुरानी है।

खजराना गणेश मंदिर एक चमत्कारी मंदिर है। ऐसा माना जाता है कि यहाँ भक्तों द्वारा माँगी गई हर इच्छा पूरी होती है। इससे जुड़ी हुई मंदिर की एक अनूठी प्रथा है। भगवान गणेश जी की पीठ की ओर बनी दीवार पर बाहरी तरफ उल्टा स्वास्तिक चिन्ह बनाया जाता है। भक्त अपनी इच्छा की पूर्ति का आशीर्वाद माँगते समय ऐसा करते हैं। जब उनकी इच्छा की पूर्ति हो जाती है तब उनके द्वारा मंदिर में आकर सीधा स्वास्तिक बनाया जाता है। इसके अलावा मंदिर में तीन बार परिक्रमा करके धागा बाँधकर इच्छा पूर्ति का आशीर्वाद प्राप्त करने की प्राचीन परंपरा भी है। मंदिर में तुलादान की प्रथा भी है। यहाँ अक्सर नवजात शिशुओं के वजन के बराबर लड्डू भगवान गणेश को चढ़ाया जाता है।

गणेश चतुर्थी यहाँ का प्रमुख त्योहार। इस दिन मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिलती है। इसके अलावा दीपावली पर मंदिर प्रांगण में स्थित कई फुट ऊँची दीपमालिका में सैकड़ों की संख्या में दीप प्रज्ज्वलित किए जाते हैं, साथ ही मंदिर को भी हजारों की संख्या में दीपों से सजाया जाता है।

कैसे पहुँचे?

इंदौर में ही देवी अहिल्याबाई होल्कर हवाईअड्डा स्थित है जो मंदिर से लगभग 20 किमी की दूरी पर स्थित है। देश के महानगरों में शुमार इंदौर में के लिए देश के कई हिस्से से ट्रेनें चलती हैं। इंदौर जंक्शन से खजराना गणेश मंदिर की दूरी लगभग 5.4 किमी है। इसके अलावा इंदौर में सड़कों का जाल है। देश के कई राजमार्ग इंदौर से होकर गुजरते हैं।

बंगाल में राजनीतिक प्रतिशोध की बलि चढ़ा एक और BJP कार्यकर्ता, भाजपा ने कहा- TMC के गुंडों ने की उसकी हत्या

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के परिणामों की घोषणा के साथ शुरू हुई राजनीतिक हिंसा का दौर अभी भी जारी है। राज्य में एक और भाजपा कार्यकर्ता की कथित तौर पर हत्या कर दी गई है। काकद्वीप विधानसभा क्षेत्र में माधवनगर के सक्रिय भाजपा पदाधिकारी 36 वर्षीय समरेश पाल सोमवार (26 जुलाई 2021) को मृत पाए गए।

भाजपा ने दावा किया कि पाल की हत्या सत्तारूढ़ तृणमूल कॉन्ग्रेस पार्टी के गुंडों ने की है। भाजपा ने ट्वीट कर कहा कि इस घटना से साबित होता है कि राज्य में कोई कानून-व्यवस्था नहीं है।

सत्तारूढ़ सरकार पर विपक्षी कार्यकर्ताओं की राजनीतिक सफाई का आरोप लगाते हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि पाल को लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रयोग करने में विश्वास करने के कारण अपने जीवन का बलिदान देना पड़ा। उन्होंने इस हत्या के पीछे टीएमसी गुंडों का हाथ बताया।

पश्चिम बंगाल में चुनाव के बाद हुई हिंसा

अपने राजनीतिक विरोधियों पर काबू करने के लिए हिंसा को एक साधन के रूप में इस्तेमाल करना पश्चिम बंगाल में टीएमसी शासन की विशेषता बन गई है। जब से ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी पार्टी राज्य में सत्ता पर काबिज है, तब से असंतुष्टों और विपक्षी कार्यकर्ताओं का उत्पीड़न तेज हुआ है।

चुनाव के बाद राज्य से राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ बड़ी संख्या में हिंसा की खबर सामने आ रही हैं। ऐसी घटनाओं में बड़ी संख्या में पीड़ित भाजपा समर्थक और कार्यकर्ता हैं, जबकि आरोपित टीएमसी पार्टी के समर्थक बताए गए हैं। विधानसभा चुनावों में टीएमसी पार्टी की जीत के बाद चुनाव में हुई हिंसा में एक दर्जन से अधिक भाजपा कार्यकर्ता अपनी जान गँवा चुके हैं।

राज्य में जारी राजनीतिक हिंसा ने भाजपा पार्टी के सैकड़ों कार्यकर्ताओं और समर्थकों को परिवारों के साथ अपने गाँवों से पलायन करने के लिए मजबूर कर दिया। वे असम चले गए, जहाँ उन्हें मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की देखरेख में अस्थायी आश्रय प्रदान किया गया। सिर्फ भाजपा ही नहीं, बल्कि माकपा ने भी टीएमसी पर अपने कार्यकर्ताओं की हत्या का आरोप लगाया है। मीडिया में BSF जवानों पर हमले की खबरें भी सामने आई हैं।

विजय माल्या को लंदन हाईकोर्ट ने घोषित किया दिवालिया, भारतीय बैंकों की हुई जीत: प्रत्यर्पण की राह आसान

सरकारी बैंकों को हजारों करोड़ का चूना लगाने वाले भगौड़े विजय माल्या को लंदन हाईकोर्ट ने सोमवार (26 जुलाई 2021) को दिवालिया घोषित कर दिया। लंदन हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद भारतीय बैंक माल्या की संपत्तियों पर आसानी से कब्जा कर सकेंगे।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, माल्या के खिलाफ भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के नेतृत्व में भारतीय बैंकों के एक संघ ने ब्रिटिश कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। इस याचिका में किंगफिशर एयरलाइंस को दिए गए ऋण की वसूली के लिए माल्या को दिवालिया घोषित करने की माँग की गई थी।

लंदन हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील करने के लिए माल्या के पास अभी एक मौका बाकी है। बताया जा रहा है कि माल्या का वकील जल्द ही इस फैसले को चुनौती देने के लिए याचिका दाखिल कर सकता है।

विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला ने शनिवार (24 जुलाई) को कहा था कि माल्या के खिलाफ भारत ने एक मजबूत मामला बनाया है और ब्रिटेन के अधिकारियों ने उसके प्रत्यर्पण के संबंध में सर्वोत्तम आश्वासन दिया है।

विदेश सचिव ने विजय माल्या के प्रत्यर्पण में देरी से जुड़े सवाल पर कहा था, ”हमें बताया गया है कि इस मामले पर प्रक्रिया जारी है और ब्रिटिश पक्ष उसके (माल्या) के प्रत्यर्पण को लेकर कार्य कर रहा है।” उन्होंने कहा था कि भारत में आर्थिक अपराधों में वांछित माल्या के पास देश का काफी धन है, जिसे उसे लौटाना होगा।

बता दें कि जुलाई में ही विजय माल्या को कर्ज देने वाले बैंकों ने उसके शेयर बेचकर 792.12 करोड़ रुपए हासिल किए थे। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) की अगुवाई वाले बैंकों के कंसोर्शियम की तरफ से डेट रिकवरी ट्राइब्यूनल ने माल्या के शेयर बेचे गए थे। ईडी ने तीनों भगोड़ों के शेयर जब्त कर एसबीआई के नेतृत्‍व वाले कंसोर्टियम को हैंडओवर किए थे। इससे बैंकों का हजारों करोड़ रुपए लेकर विदेश फरार होने वाले विजय माल्या को तगड़ा झटका लगा है।

‘कारगिल कमेटी’ पर कॉन्ग्रेस की कुण्डली: लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा राजनीतिक दृष्टिकोण का न हो मोहताज

आज कारगिल विजय दिवस है। पाकिस्तान के विरुद्ध सीमा पर हमारे पिछले परोक्ष युद्ध को आज बाईस वर्ष पूरे हुए। अभी तक के सारे युद्धों की भाँति यह युद्ध भी हमारे जवानों की वीरता के लिए जाना जाता है। सैनिकों के पराक्रम और बलिदान ने न केवल हमारी सीमाओं की रक्षा की बल्कि हमें राष्ट्र यात्रा में वीरता का महत्व भी समझाया। हमें यह बताया कि सीमाएँ एक राष्ट्र के लिए महत्वपूर्ण क्यों हैं! यह बताया कि शांतिकाल में भी हमें अपने स्मृति पटल पर युद्ध को क्यों रखना चाहिए।

कारगिल युद्ध व्यक्तिगत पराक्रम की गाथाओं का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। कैप्टन मनोज पांडेय, कैप्टन विक्रम बत्रा या कैप्टन सौरभ कालिया सैकड़ों अफसरों के बीच वो नाम हैं जो आनेवाली पीढ़ियों को साल दर साल बताता रहेगा कि एक राष्ट्र के लिए नायक आवश्यक क्यों हैं, वे कैसे हों और हमें इन नायकों के प्रति कृतज्ञ क्यों रहना चाहिए?

कारगिल युद्ध के पीछे जो भी कारण रहे, अब तक लगभग पूरी तरह से सार्वजनिक हो चुके हैं। इन कारणों पर बहस होती रही है और आगे भी होगी। इस विषय पर हर बहस के अपने-अपने केंद्रबिंदु हैं। पाकिस्तान की ओर से उसके तत्कालीन राजनीतिक शासक जिम्मेदार थे या सैनिक शासक, यह बहस पाकिस्तान के लिए महत्वपूर्ण है, हमारे लिए नहीं। हमारे लिए मात्र यह महत्वपूर्ण है कि हम पर यह युद्ध पाकिस्तान द्वारा थोपा गया था और हमने उसका उचित जवाब दिया।

यह बात इतिहास के पन्नों का हिस्सा है कि कैसे भारत ने मित्रता का हाथ बढ़ाया और पाकिस्तान ने उसका जवाब घुसपैठ से शुरू करके एक संपूर्ण युद्ध के रूप में दिया। कारगिल युद्ध विश्व इतिहास का ऐसा अध्याय है जो बताता है कि कैसे जिहाद के नाम पर पाकिस्तान ने एक बार फिर हम पर एक संपूर्ण युद्ध थोपा। यह बात भी अब तक विश्व समुदाय पर जाहिर हो चुकी है कि जिहाद की इसी संस्कृति ने आगे चलकर विश्व को कैसे-कैसे घाव दिए।

ऑपरेशन विजय को हमारी थल सेना और वायुसेना ने कैसे एकजुट होकर सफल बनाया, यह बात केवल हमारी सेनाओं के लिए ही नहीं, आम नागरिक के लिए भी महत्वपूर्ण है। यह हमसब के लिए गर्व का विषय है कि कारगिल युद्ध पहाड़ों पर लड़े गए सर्वश्रेष्ठ युद्धों में से एक है। इस युद्ध में वायुसेना के पराक्रम और उसकी भूमिका को हमेशा याद किया जाएगा। वायुसेना का ऑपरेशन सफ़ेद सागर पहाड़ों पर युद्ध, उसके तरीकों और सफलता की शानदार गाथा है। इससे पहले इतनी ऊंचाई पर किसी भी वायुसेना ने इतना वृहद ऑपरेशन नहीं किया था।

हम हर वर्ष कारगिल विजय दिवस पर युद्ध और शहीदों को याद करते हैं पर इस युद्ध का एक राजनीतिक पहलू भी है जिस पर चर्चा नहीं होती। कारगिल युद्ध हमारी सैन्य क्षमता के साथ ही हमारे राजनीतिक नेतृत्व का भी इम्तिहान था। इसमें हमारा प्रदर्शन कैसा था इसका फैसला इतिहास करेगा। किसी युद्ध में एक लोकतांत्रिक राष्ट्र के सैन्य या राजनीतिक नेतृत्व ने कैसा प्रदर्शन किया यह हमेशा बहस का विषय रहेगा पर जिस बात से इनकार नहीं किया जा सकता वह है तत्कालीन सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति।

विजय प्राप्ति के बाद भी अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार ने कारगिल कमेटी का गठन किया ताकि हमारी सैन्य शक्ति, युद्ध सम्बंधित उसकी तैयारियाँ और राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्नों पर उचित चिंतन हो सके। साथ ही राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ करने की दिशा में महत्वपूर्ण आवश्यक कदम उठाए जा सके। तत्कालीन सरकार का यह कदम सुरक्षा सम्बन्धी प्रशासन में सुधारों के प्रति सरकार की गंभीरता और उसकी वचनबद्धता को दर्शाता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि कमेटी लगभग समय से अपनी रिपोर्ट दी। यह बात अलग है कि कमेटी द्वारा दिए गए कुछ सुझावों के प्रति भविष्य में आने वाली सरकारें गंभीर नहीं दिखीं।

यह क्या संयोग मात्र है कि कमेटी द्वारा हमारी सैन्य शक्ति को सुदृढ़ बनाने के लिए जो सुझाव दिए गए थे उनपर समयानुसार काम नहीं हुआ? फाइटर जेट की खरीद हो, तकनीकी रूप से उच्च श्रेणी के अन्य सैन्य उपकरण खरीदने की बात हो या फिर वायुसेना में स्क्वाड्रन बढ़ाने का सुझाव हो, आनेवाली यूपीए सरकारों ने किसी न किसी वजह से इसपर समय रहते काम नहीं किया। उन सुझावों पर अधिकतर काम 2014 में सरकार बदलने के बाद शुरू हुआ। यह बात केवल फाइटर जेट की खरीद तक सीमित नहीं है जिसे लेकर यूपीए सरकारों की लापरवाही पहले से ही देर से शुरू हुई खरीद की प्रक्रिया का धीमी गति से चलने से लेकर पैसे की कमी तक चली गई। सैन्य शक्ति को तकनीकी रूप से सुदृढ़ करने की प्रक्रिया में तेजी नरेंद्र मोदी सरकार आने के बाद ही शुरू हुई।

एक और बात जो महत्वपूर्ण थी, वह थी युद्ध के दौरान और उसके पश्चात राष्ट्रीय सुरक्षा सम्बन्धी कई विषयों पर देश की अंदरूनी राजनीति हावी होना। तत्कालीन सरकार के प्रयासों को सार्वजनिक तौर पर न केवल कम करके आँका गया बल्कि युद्ध के पश्चात बनी कारगिल कमेटी द्वारा दिए गए कुछ सुझावों का क्रियान्वयन या तो देर से हुआ या फिर हुआ ही नहीं। युद्ध के दौरान तत्कालीन विपक्ष ने सुरक्षा उपकरणों की खरीद को लेकर किए गए सरकारी प्रयासों का राजनीतिकरण किया।

यहाँ तक कि एक तथाकथित कॉफिन स्कैम की बात उछाली गई जो बाद में उच्चतम न्यायालय में झूठी साबित हुई। ऐसे में पिछले वर्ष चीन की सेना और भारतीय सेना का जब आमना-सामना हुआ तब विपक्ष की जो भूमिका दिखाई दी थी, उसने कारगिल युद्ध के समय तत्कालीन विपक्ष की भूमिका की याद दिला दी। यह मात्र संयोग नहीं है कि दो अलग-अलग काल खंडों में एक विपक्षी दल का आचरण दो दशकों में नहीं बदला।

कोई नहीं कह सकता कि कारगिल युद्ध पाकिस्तान के विरुद्ध हमारा आखिरी युद्ध था। इतिहास की ओर देखें तो यही सन्देश मिलता है। कोई यह भी नहीं कह सकता कि चीन के साथ दशकों से चल रहा हमारा सीमा विवाद भविष्य में क्या रुख लेगा। जो बात तय है वो यह है कि आधुनिक सामरिक विश्व एक खतरनाक जगह है जिसमें कोई भी राष्ट्र तभी तक सुरक्षित है जबतक वह अपनी सुरक्षा का घेरा लगातार सुदृढ़ करता रहेगा। ऐसे में सैन्य शक्ति को सुदृढ़ बनाने का हमारा प्रयास लगातार जारी रहना चाहिए। हमें ध्यान में रखना होगा कि जिस लोकतंत्र पर हम गर्व करते हैं उसकी सुरक्षा तभी तक संभव है जबतक राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय किसी राजनीतिक दृष्टिकोण का मोहताज नहीं है।