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औरतों का चीरहरण, तोड़फोड़, किडनैपिंग, हत्या: बंगाल हिंसा पर NHRC की रिपोर्ट से निकली एक और भयावह कहानी

पश्चिम बंगाल में चुनावी नतीजों की घोषणा के बाद हुई हिंसा पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने 14 जुलाई को कलकत्ता हाईकोर्ट में अपनी रिपोर्ट दी। आयोग ने इस रिपोर्ट में उन सैंकड़ों घटनाओं का जिक्र किया जो राज्य में 2 मई के बाद घटित हुईं। इसी रिपोर्ट में 30 वर्षीय अरूप दास के साथ हुई बर्बरता का भी जिक्र है, जिनकी बांकुरा जिले के नररा (Narrah) गाँव में कथिततौर पर हत्या की गई। वह 5 मई 2021 को पेड़ से लटके मिले थे।

5 मई को पेड़ से लटका मिला था अरूप दास का शव

रिपोर्ट के मुताबिक, अरूप दास के पिता बताते हैं कि 4 मई 2021 को उनके घर में तृणमूल कॉन्ग्रेस के गुंडे घुसे और सबको बेरहमी से पीटने लगे। इस दौरान उनके भाई के परिवार को भी नहीं छोड़ा गया जो उनके साथ रहते थे। अरूप के पिता कहते हैं कि घटना वाले दिन न केवल उनकी संपत्ति को क्षतिग्रस्त किया गया, बल्कि वहाँ मौजूद महिलाओं को भी प्रताड़ित किया गया। गुडों ने महिलाओं के ब्लाउज फाड़े और साड़ी खोल कर उसी से उनका गला घोंटा और फिर अरूप को किडनैप करके चले गए। घटना के अगले दिन अरूप का शव पेड़ के फंदे से लटका मिला।

पुलिस की लापरवाही

अरूप दास के पिता ने अपने बयान में आयोग को बताया कि उन्होंने इस संबंध में पुलिस शिकायत की थी। लेकिन पुलिस ने जाँच में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई और एफआईआर भी तब जाकर हुई जब कलकत्ता हाईकोर्ट ने पुलिस को फटकार लगाई। NHRC ने कागजात के अवलोकन के बाद, इस मामले में पाया कि अरूप दास के पिता ने 5 मई को पुलिस स्टेशन खंडघोष में शिकायत दर्ज करवाई थी। लेकिन पुलिस ने एक माह के बाद 10 जून को इस मामले में एफआईआर दर्ज की। NHRC का यह भी कहना है कि कोर्ट द्वारा कार्रवाई के निर्देश जारी करने के बाद ही मामले में प्राथमिकी दर्ज की गई थी। NHRC ने बताया कि इस मामले में 21 लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया गया है, हालाँकि अभी तक किसी को गिरफ्तार नहीं किया गया है।

NHRC का अवलोकन

इस केस की डिटेलिंग में NHRC ने पाया कि 5 मई को अपनी शिकायत में अरूप दास के पिता ने कहा था कि उनके बेटे ने रोजगार न मिलने के कारण सुसाइड की। हालाँकि, NHRC से बात करते हुए उन्होंने इसका जिक्र नहीं किया। इसलिए टीम को शक है कि अरूप के पिता ये तक नहीं जानते कि उनकी शिकायत में क्या बात लिखी गई है।

इस बिंदु पर कई कयास लगाए जा रहे हैं। हो सकता है कि अरूप दास के पिता को गुमराह किया गया हो। इसके अलावा ये भी हो सकता है कि उन्हें डर से घबराकर अपना बयान दिया हो, क्योंकि अभी हाल में ऑपइंडिया ने एक महिला से बात की थी जिसने पहले शिकायत दी कि उसका गैंगरेप हुआ है। हालाँकि बाद में उसे ये कहने को राजी कर लिया गया कि उसके साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ। उसने अपनी ही जैसी तमाम महिलाओं का जिक्र किया था जिनका गैंगरेप हुआ, लेकिन वह चाहकर भी नहीं कह पाईं। या संभव है कि अरूप दास के केस में NHRC टीम के सामने जो खुलकर कहा गया वही सच है। जैसे कि महिला ने ये सब कहा था सिर्फ आयोग के सामने और पुलिस के सामने वह चुप रही थी।

आयोग की टीम ने इस विषय पर गाँव के कई अन्य लोगों से भी बात की। सबने वही दोहराया जोकि अरूप के पिता कह रहे थे। हालाँकि जब बयान दर्ज कराने की बात सामने आई तो उन्होंने सामने आने से मना कर दिया। उनको भी डर है कि टीएमसी के गुंडे वही करेंगे जो अरूप दास के साथ हुआ। शुरुआत में मामले की जाँच “अप्राकृतिक मौत” के मामले के रूप में की गई थी और अदालत के हस्तक्षेप के बाद ही पुलिस द्वारा प्राथमिकी दर्ज की गई थी। इस मामले में अब तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है।

NHRC की रिपोर्ट

उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों NHRC की 7 सदस्यीय टीम ने 20 दिन में 311 से अधिक जगहों का मुआयना करने के बाद राज्य में चुनाव के बाद हुई हिंसा पर अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। रिपोर्ट में हिंसा की जाँच सीबीआई से कराने की सिफारिश की गई थी। इसके अलावा, यह भी कहा गया कि मामलों की सुनवाई राज्य के बाहर फास्ट ट्रैक अदालत गठित कर हो। रिपोर्ट में पीड़ितों की आर्थिक सहायता के साथ पुनर्वास, सुरक्षा और आजीविका की व्यवस्था करने को कहा गया था।

आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि राज्य में ‘कानून का शासन’ नहीं बल्कि ‘शासक का कानून’ है। करीब 50 पेज की NHRC की इस रिपोर्ट में राज्य प्रशासन की कड़ी आलोचना की गई थी और कहा गया था कि राज्य प्रशासन ने जनता में अपना विश्वास खो दिया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, जाँच के दौरान टीम को राज्य के 23 जिलों से 1979 शिकायतें मिलीं। इनमें ढेर सारे मामले गंभीर अपराध से संबंधित थे। इनमें से अधिकांश शिकायतें कूच बिहार, बीरभूम, बर्धमान, उत्तरी 24 परगना और कलकत्ता से मिलीं, जिनमें ज्यादातर मामले दुष्कर्म, छेड़खानी व आगजनी के हैं। रिपोर्ट में कहा गया था कि उसे महिलाओं पर हुए अत्याचार की 57 शिकायतें राष्ट्रीय महिला आयोग से भी मिलीं।

तमिलनाडु के अस्पताल से नर्स ने चुराई कोरोना वैक्सीन, रिश्तेदारों-पड़ोसियों को लगाई कोविशील्ड

तमिलनाडु के करूर में एक नर्स को कोरोना वैक्सीन की चोरी के आरोप में सस्पेंड कर दिया गया है। कोविशील्ड की चोरी कर उसे रिश्तेदारों और पड़ोसियों को देने का उस पर आरोप है। 58 वर्षीय आरोपित नर्स करूर के शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (यूपीएचसी) में कार्यरत थी।

आरोपित नर्स पी धनलक्ष्मी डिंडीगुल के वेदसंदूर की रहने वाली है। वैक्सीन चोरी के मामले का खुलासा उस वक्त हुआ जब वेदसंदूर ब्लॉक के डॉक्टर माहेश्वरी को सूचना मिली की एक नर्स अपने घर में रिश्तेदारों और आस-पास के लोगों को कोरोना की वैक्सीन लगा रही है। वैक्सीन के इस तरीके के इस्तेमाल का मामला सामने आते ही रविवार (25 जुलाई 2021) को स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने आरोपित नर्स के घर पर छापा मारा। इस दौरान अधिकारियों को वहाँ से कोविशील्ड वैक्सीन की कई डोज मिली। इसके तुरंत बाद ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर ने जन स्वास्थ्य विभाग के उप निदेशक को इसके बारे में सूचित किया।

सोमवार (26 जुलाई 2021) को करूर म्युनिसिपैलिटी ने इस मामले में त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपित नर्स को सस्पेंड कर दिया। इंडियन एक्सप्रेस को करूर म्युनिसिपैलिटी के आयुक्त ने बताया कि आरोपित नर्स के घर से वैक्सीन की 8 बॉयल बरामद की गई हैं।

अधिकारी ने कहा, “शुरुआती रिपोर्ट के आधार पर हमने उसे निलंबित कर दिया है। अब इस बात की जाँच की जा रही है कि आरोपित नर्स ने वैक्सीन को कैसे हासिल किया? क्या इस काम में किसी और ने भी उसकी मदद की थी? इन सभी सवालों के जवाब तलाशे जा रहे हैं। जल्द ही मामले का खुलासा किया जाएगा।”

जन स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी के मुताबिक, आरोपित महिला के खिलाफ पुलिस में शिकायत की गई है और अब विभागीय जाँच की कार्रवाई की जाएगी। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में आरोपित नर्स धनलक्ष्मी बीते 10 सालों से कार्यरत थी।

विधानसभा से मंत्री का ही वॉकआउट: छत्तीसगढ़ कॉन्ग्रेस की लड़ाई में नया मोड़, MLA ने कहा था- मेरी हत्या करा बनना चाहते हैं CM

पंजाब और राजस्थान के बाद कॉन्ग्रेस का कलह अब छत्तीसगढ़ पहुँच गया है, जहाँ वो बड़े बहुमत के साथ सत्ता में है। हाल ही में पंजाब में नवजोत सिंह सिद्धू मुख्यमंत्री उम्मीदवार का दावेदार बन कर उभरे। कुछ यही हाल नवंबर 2019 में था, जब राजस्थान में सचिन पायलट, छत्तीसगढ़ में TS सिंह देव और मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया को किनारे किया गया था। लेकिन, अब छत्तीसगढ़ में कलह बढ़ता जा रहा है।

ताज़ा खबर ये है कि अपनी ही सरकार के रवैये से आहत होकर छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री TS सिंह देव सदन से वॉकआउट कर गए। रामानुजगंज के कॉन्ग्रेस के विधायक बृहस्पति सिंह ने उन पर जानलेवा हमला कराने का आरोप लगाया था। उनका कहना था कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की तारीफ करने पर TS सिंह देव उनसे नाराज़ हो गए थे। इन आरोपों के बाद कुछ अन्य विधायकों द्वारा राज्य के स्वास्थ्य मंत्री के खिलाफ लॉबी बनाने की बात सामने आई।

छत्तीसगढ़ में रह-रह कर ये बात सामने आती रही है कि सिंह देव और बघेल के बीच ढाई-ढाई वर्ष के लिए मुख्यमंत्री बनने का फॉर्मूला तय हुआ था। लेकिन, भूपेश बघेल असम सहित कई राज्यों की विधानसभा चुनाव में सक्रियता दिखा कर गाँधी परिवार के करीबी बनने में कामयाब हो गए, जिसके बाद TS सिंह देव की राह मुश्किल हो गई। अब अपनी ही पार्टी के एक विधायक द्वारा इस तरह के आरोप लगाने से उनकी छवि को नुकसान पहुँचा है।

बता दें कि डॉक्टर रमन सिंह के अंतिम कार्यकाल में नेता प्रतिपक्ष के रूप में 5 साल सबसे ज्यादा मुखर सिंह देव ही रहे थे। भूपेश बघेल भी तब राज्य भर में यात्रा कर के भाजपा के खिलाफ माहौल बनाने में लगे थे। अब टीएस सिंह देव ने अपनी ही सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए आर-पार का मूड बना लिया है। सुरगुजा राजपरिवार से सम्बन्ध रखने वाले टीएस सिंह देव को राज्य में लोग ‘बाबा’ कहते हैं।

500 करोड़ रुपए से भी अधिक संपत्ति के साथ वो राज्य में सबसे अमीर विधायक भी हैं। सुरगुजा जिले के मुख्यालय अंबिकापुर उनकी कर्मभूमि रही है और यहीं से उन्होंने विधानसभा में हैट्रिक भी लगाई है। इसी अंबिकापुर में विधायक बृहस्पति सिंह पर हमला हुआ, जिसमें उनकी गाड़ी के शीशे टूट गए। उनका कहना है कि इसके बाद हमलावर भाग खड़े हुए। अब इस आरोप के अगले ही दिन सिंह देव सदन की कार्यवाही छोड़ बाहर निकल गए।

उन्होंने कहा, “मैं केवल ये कहने के लिए खड़ा हुआ हूँ कि जब तक मेरे विषय में सदन में शासन का स्पष्ट वक्तव्य नहीं आ जाता, तब तक मैं खुद को सदन की कार्यवाही में सम्मिलित होने के योग्य नहीं समझता हूँ।” इसके बाद वो अपने आवास के लिए निकल गए। इसके बाद न सिर्फ रायपुर, बल्कि दिल्ली में बैठे कॉन्ग्रेस आलाकमान की भी बेचैनी बढ़ गई है। जल्द ही टीएस सिंह देव गाँधी परिवार से मुलाकात करने दिल्ली निकल सकते हैं।

इससे पहले अपने ऊपर लगे आरोपों पर उन्होंने कहा था कि MLA बृहस्पति सिंह ने भावनाओं में बह कर ऐसा कहा होगा। लेकिन, सोमवार (26 जुलाई, 2021) को इसे लेकर प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया रायपुर में सक्रिय रहे और उन्होंने कई नेताओं के साथ बैठकें की। इससे टीएस सिंह देव आहत हुए हैं। उनकी ही सरकार ने अपनी मंत्री का बचाव करते हुए कोई बयान जारी नहीं किया, जिससे उन्हें और चोट पहुँची।

आरोप लगाने वाले विधायक भूपेश बघेल के समर्थक हैं, ऐसे में लोगों के बीच तमाम तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। पीएल पुनिया ने सदन में भी सिंह देव से मुलाकात की थी और विधायक बृहस्पति सिंह से भी मिले थे। फिर उन्होंने कोई विवाद न होने का दावा किया था। अब राज्य की कॉन्ग्रेस सरकार के बयान पर सब कुछ निर्भर करता है। जहाँ सिंह देव क्षत्रिय समुदाय से आते हैं, उन पर आरोप लगाने वाले विधायक आदिवासी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं।

कॉन्ग्रेस विधायक ने अपनी जान को खतरा बताते हुए आरोप लगाया था कि ‘महाराज’ उनकी हत्या करवा सकते हैं। उन्होंने कहा था, “अगर मुझे मारकर सिंहदेव मुख्यमंत्री बन सकते हैं तो उन्हें इस पद से नवाजा जाना चाहिए। वो कॉन्ग्रेस के दूसरे विधायकों का अपमान करते ही रहते हैं। इस मुद्दे को कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी के सामने उठाऊँगा औऱ विधायक दल की बैठक में भी इस बात को रखूँगा। छत्तीसगढ़ क़ॉन्ग्रेस के प्रभारी पीएल पुनिया, विधानसभा अध्यक्ष, उपाध्यक्ष से शिकायत कर मामले में कार्रवाई की माँग करूँगा।”

IMA प्रमुख जयलाल को दिल्ली हाईकोर्ट ने लगाई फटकार, कहा- किसी धर्म को संस्थान के मंच से बढ़ावा नहीं दे सकते

दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार (27 जुलाई) को इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) प्रमुख जेए जयलाल की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने किसी भी धर्म को बढ़ावा देने के लिए संस्थान के मंच का इस्तेमाल नहीं करने के निचली अदालत के आदेश को चुनौती दी थी।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जस्टिस आशा मेनन की एकल पीठ ने याचिका को खारिज कर दिया है। जस्टिस ने आईएमए प्रमुख से भारत के संविधान में निहित सिद्धांतों के विपरीत किसी भी गतिविधि में शामिल नहीं होने और अपने पद की गरिमा बनाए रखने को कहा है। इससे पहले द्वारका कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि जयलाल अपने पद की गरिमा को बनाए रखें। अदालत ने साथ ही ये भी कहा था कि IMA जैसी संस्था का इस्तेमाल किसी धर्म को बढ़ावा देने की बजाए अपना ध्यान मेडिकल क्षेत्र की उन्नति और इससे जुड़े लोगों की भलाई में लगाएँ। ट्रायल कोर्ट ने इस साल की शुरुआत में कहा था, ”ईसाई धर्म और एलोपैथी एक समान हैं और यह पश्चिमी दुनिया का एक उपहार है, सबसे गलत दावा है।”

दरअसल, ट्रायल कोर्ट ने रोहित झा नाम के एक व्यक्ति द्वारा दायर मुकदमे के संबंध में मामले की सुनवाई की, जिसने अपनी याचिका में आरोप लगाया था कि जयलाल ने ईसाई धर्म को बढ़ावा देकर हिंदू धर्म के खिलाफ एक दुष्प्रचार अभियान शुरू किया था।

रोहित झा द्वारा मुकदमा दायर किया गया था, जिसने आरोप लगाया था कि जयलाल ने कोरोना से संबंधित जटिलताओं के इलाज में आयुर्वेदिक दवाओं पर एलोपैथिक दवाओं की श्रेष्ठता साबित करने के बहाने ईसाई धर्म को बढ़ावा देकर हिंदू धर्म के खिलाफ दुष्प्रचार करने लिए अभियान शुरू किया था। झा ने 30 मार्च, 2021 को प्रकाशित एक समाचार लेख के साथ नेशन वर्ल्ड न्यूज में जयलाल और बाबा रामदेव की एक बहस क्लिप के साथ साक्ष्य प्रस्तुत किया था।

यह दूसरी बार है जब दिल्ली हाईकोर्ट ने ईसाई धर्म के प्रचार के लिए अपने मंच का दुरुपयोग करने के लिए डॉ. जयलाल को फटकार लगाई है। इससे पहले जून में द्वारका कोर्ट ने आईएमए प्रमुख के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए कहा था कि वह किसी विशेष धर्म के प्रसार में अपने पद और संगठन का इस्तेमाल न करें।

हिंदुओं को ईसाई बनाने के लिए अस्पतालों का करें इस्तेमाल: जयलाल

जयलाल ने इस साल की शुरुआत में अपने एक इंटरव्यू में दावा किया था कि ईसाई डॉक्टरों को समग्र उपचार प्रदान करने की विशेष दक्षता प्राप्त है, जिसमें आध्यात्मिक, मानसिक और सामाजिक उपचार शामिल हैं। उन्होंने कहा था कि वह हिंदुओं को ईसाई धर्म में परिवर्तित करने के लिए अस्पतालों का इस्तेमाल करना चाहते थे।

डॉ. जयलाल ने कहा था कि वे चाहते हैं कि IMA ‘जीसस क्राइस्ट के प्यार’ को साझा करे और सभी को भरोसा दिलाए कि जीसस ही व्यक्तिगत रूप से रक्षा करने वाले हैं। उन्होंने कहा था कि चर्चों और ईसाई दयाभाव के कारण ही विश्व में पिछली कई महामारियों और रोगों का इलाज आया।

गौरतलब है कि उन्होंने ईसाई संस्थाओं में भी गॉस्पेल (ईसाई सन्देश) को साझा करने की जरूरत पर बल दिया था। उन्होंने IMA में अपने अध्यक्षीय भाषण में भी कहा था कि आज जो भी हैं वह ‘सर्वशक्तिमान ईश्वर जीसस क्राइस्ट’ का गिफ्ट है और कल जो होंगे, वे भी उनका ही गिफ्ट होगा। उन्होंने इस दौरान मदर टेरेसा का जिक्र किया था, जिन पर पहले से ही ईसाई धर्मांतरण के आरोप लगते रहे हैं। ‘क्रिस्चियन टुडे’ के इंटरव्यू में भी उन्होंने बताया कि कैसे महामारी के बावजूद ईसाई मजहब आगे बढ़ रहा है।

इसके अलावा, डॉक्टर JA जयलाल यहीं पीछे नहीं रहते। उन्होंने आरोप लगाया था कि मोदी सरकार इसलिए आयुर्वेद में विश्वास करती है, क्योंकि उसके सांस्कृतिक मूल्य और पारंपरिक आस्था हिंदुत्व में है। उन्होंने दावा किया था कि पिछले 3-4 वर्षों से आधुनिक मेडिसिन की जगह आयुर्वेद को लाने की कोशिश हो रही है। उन्होंने कहा कि आयुर्वेद, यूनानी, होमियोपैथी और योग इत्यादि की जड़ें संस्कृत में हैं, जो हिंदुत्व की भाषा है।

‘बैंकों के ₹6200 करोड़, सीज ₹14 हजार करोड़ की संपत्ति’: भगोड़ा विजय माल्या ‘दिवालिया’ हो ट्विटर पर रोया

लंदन हाईकोर्ट से सोमवार (जुलाई 26, 2021) को दिवालिया घोषित होने के बाद अब भगोड़े विजय माल्या ने ट्वीट कर अपना गुस्सा जाहिर किया है। अपने ट्वीट में उसने बैंकों पर गंभीर इल्जाम लगाते हुए कहा कि प्रवर्तन निदेशालय ने सरकारी बैंकों के कहने पर ₹6200 करोड़ के लोन के बदले उसकी ₹14 हजार करोड़ की संपत्ति कुर्क कर ली है और अब पैसे वापिस न करने पड़ें, इसके लिए उनको दिवालिया घोषित करवा दिया है।

मंगलवार (जुलाई 27, 2021) को किए गए ट्वीट में विजय माल्या ने कहा, “एनफोर्समेंट डायरेक्टोरेट ने बैंकों की तरफ से मेरी 14,000 करोड़ रुपए की संपत्ति कुर्क कर ली है, जबकि कर्ज 6,200 करोड़ रुपए का ही था। ईडी ने 9 हजार करोड़ रुपए की नकद राश‍ि और 5 हजार करोड़ रुपए की प्रतिभूतियाँ बैंकों को सौंप दी है। बैंकों ने इसीलिए कोर्ट से मुझे दिवालिया घोष‍ित करने को कहा, क्योंकि उन्हें ईडी को बाकी पैसे वापस करने पड़ते।”

उल्लेखनीय है कि सरकारी बैंकों को हजारों करोड़ का चूना लगाने वाले भगोड़े विजय माल्या को लंदन हाईकोर्ट ने सोमवार (26 जुलाई 2021) को दिवालिया घोषित किया था। लंदन हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद भारतीय बैंक माल्या की संपत्तियों पर आसानी से कब्जा कर सकेंगे। माल्या के खिलाफ भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के नेतृत्व में भारतीय बैंकों के एक संघ ने ब्रिटिश कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। इस याचिका में किंगफिशर एयरलाइंस को दिए गए ऋण की वसूली के लिए माल्या को दिवालिया घोषित करने की माँग की गई थी।

लंदन हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील करने के लिए माल्या के पास अभी एक मौका बाकी है। बताया जा रहा है कि माल्या का वकील जल्द ही इस फैसले को चुनौती देने के लिए याचिका दाखिल कर सकता है। विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला ने शनिवार (24 जुलाई) को कहा था कि माल्या के खिलाफ भारत ने एक मजबूत मामला बनाया है और ब्रिटेन के अधिकारियों ने उसके प्रत्यर्पण के संबंध में सर्वोत्तम आश्वासन दिया है।

बता दें कि विजय माल्या भारत प्रत्यर्पण को लेकर सभी कोर्ट बैटल मई 2020 में ही हार चुका है। एक साल से ज्यादा का वक्त गुजर चुका है, लेकिन वे अभी तक भारत नहीं लौटा है। लंदन कोर्ट द्वारा दिवालिया घोषित किए जाने के बाद अब उसे अपनी सारी संपत्ति, क्रेडिट कार्ड्स, बैंक अकाउंट बैंक्रप्सी ट्रस्टी को सौंपना होगा। यह ट्रस्टी अब फैसला करेगा कि उसके पास कितना असेट है और उसकी लाएबिलिटी यानी देनदारी कितनी है।

इसके अलावा यह बात भी मालूम हो कि विजय माल्या के सारे अकॉउंट्स फ्रीज किए जा चुके हैं। वो अब न ही किसी कंपनी का डायरेक्टर बन सकता है और न ही कंपनी का गठन कर सकता है। उसे इन सब कामों के लिए कोर्ट की परमिशन की जरूरत होगी। अगर वह 50 हजार का भी लोन लेना चाहता है तो इसके लिए उसे बताना होगा कि वह दिवालिया घोषित हो चुका है।

जो खबर साबित हो चुकी है फेक, उसके सहारे सपा प्रवक्ता ने की योगी सरकार को बदनाम करने की कोशिश

समाजवादी पार्टी के नेता और प्रवक्ता आईपी सिंह द्वारा फेक न्यूज को बढ़ावा देने का मामला सामने आय़ा है। सोमवार (26 जुलाई 2021) को सपा नेता ने एक ट्वीट कर उत्तर प्रदेश पुलिस पर एक निहत्थी महिला की पिटाई करने का आरोप लगाया है। उन्होंने एक तस्वीर भी पोस्ट की, जिसमें एक पुलिसकर्मी को महिला के ऊपर बैठे देखा जा सकता है। ये वही तस्वीर है, जिसे कुछ दिन पहले सपा प्रमुख और यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव ने 17 जुलाई को ट्वीट किया था। बाद में वह फेक निकली थी।

सपा नेता आईपी सिंह द्वारा किया गया फर्जी ट्वीट (साभार: ट्विटर)

अपने ट्वीट में आईपी सिंह ने कहा, “योगी की पुलिस का गुंडा एक महिला के ऊपर बैठकर उसे पीट रहा है। आईपीसी या सीआरपीसी के तहत कौन सा कानून पुलिस को महिला को पीटने का अधिकार देता है? सीएम योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश को पुलिस स्टेट बना दिया है। यूपी में बहनें और महिलाएँ सुरक्षित नहीं हैं। मानवाधिकार आयोग खामोश है। यह एक अघोषित आपातकाल है।” उनके इस ट्वीट के बाद कानपुर देहात पुलिस ने एक बार फिर से दावों को खारिज कर दिया। खबर प्रकाशित होने तक आईपी सिंह ने अपने फर्जी ट्वीट को हटाया नहीं था।

पिछले सप्ताह ही 18 जुलाई 2021 को ऑपइंडिया ने पूर्व सीएम अखिलेश यादव द्वारा साझा की गई फर्जी खबरों को खारिज करते हुए एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की। रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया था कि कानपुर देहात पुलिस ने अखिलेश यादव ने के ट्वीट को खारिज करते हुए एक लिखित और वीडियो बयान जारी किया था।

पुलिस के मुताबिक भोगनीपुर थाना प्रभारी महेंद्र पटेल पंचायत चुनाव में एक प्रत्याशी को कथित रूप से धमकाने वाले शिवम यादव को गिरफ्तार करने दुर्गादासपुर गाँव गए थे। आरोपित की पत्नी और माँ उसे गिरफ्तारी से बचाने के लिए बीच में आ गईं।

आरोपित की पत्नी आरती यादव ने महेंद्र पटेल को कॉलर से जमीन पर खींच लिया। कानपुर देहात पुलिस ने भी उस घटना का पूरा वीडियो जारी किया था। घटना के उस लंबे वीडियो में महिला पुलिस अधिकारी को छेड़छाड़ के झूठे आरोप में फँसाने के लिए अपना ब्लाउज उतारने की कोशिश कर रही थी। एक शख्स को पुलिस वाले को उकसाते हुए भी देखा गया। वीडियो से यह स्पष्ट था कि पुलिस अधिकारी पीड़ित था। बावजूद इसके कथित तौर पर, हिंदुस्तान टाइम्स और एनडीटीवी जैसी मुख्यधारा की मीडिया एजेंसियों ने फर्जी खबरों को फैलाना जारी रखा।

बावजूद इसके कथित तौर पर, हिंदुस्तान टाइम्स और एनडीटीवी जैसी मुख्यधारा की मीडिया एजेंसियों ने फर्जी खबरों को फैलाना जारी रखा।

2020 में नक्सली हमलों की 665 घटनाएँ, 183 को उतार दिया मौत के घाट: वामपंथी आतंकवाद पर केंद्र ने जारी किए आँकड़े

केंद्र सरकार ने 2020 में हुई नक्सली घटनाओं को लेकर आँकड़े जारी किए हैं। 2020 में वामपंथी आतंकवाद की कई घटनाएँ हुईं। संसद में केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा दिए गए आँकड़ों के अनुसार, 2020 में वामपंथी कट्टरपंथियों द्वारा हमले की 665 घटनाएँ सामने आईं। 2019 में ये आँकड़ा 670 रहा था। ऐसे में 2020 में इससे पिछले साल के मुकाबले वामपंथी आतंकियों के हमले की 5 कम घटनाएँ सामने आईं।

2020 में माओवादियों ने 183 लोगों की जान ली, वहीं 2019 में इन वामपंथी आतंकियों ने 202 लोगों को मौत के घाट उतार दिया था। वहीं 2018 की बात करें तो उस साल ये संख्या कहीं अधिक थी। 2018 में माओवादी हमले की 833 घटनाएँ सामने आईं और 240 लोगों की जान चली गई। वहीं 2020 में नक्सलियों द्वारा सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने की 47 घटनाएँ सामने आईं।

2019 में 64 बार और 2018 में 60 बार नक्सलियों ने सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाया। 2021 में, अर्थात इस वर्ष 30 जून तक नक्सलियों ने 24 बार आर्थिक संरचनाओं को निशाना बनाया है। याद दिला दें कि इस साल अप्रैल में छत्तीसगढ़ के सुकमा-बीजापुर में हुए नक्सली हमले में 22 जवान बलिदान हो गए थे। CRPF के जवानों पर घात लगा कर धोखे से हमला किया गया था। 5 नक्सली भी मारे गए थे।

परमाणु बम जैसा खतरनाक है ‘Deepfake’, आपके जीवन में ला सकता है भूचाल: जानिए इससे जुड़ी हर बात

अक्सर व्हाट्सऐप या इंस्टाग्राम पर आपको कई ऐसे वीडियो मिले होंगे जिसमें डोनाल्ड ट्रम्प, नरेंद्र मोदी अथवा कोई अन्य राजनेता गाना गाते हुए दिखाई देते हैं या फेसबुक के संस्थापक मार्क जकरबर्ग और अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा कुछ ऐसी बातें कह रहे होते हैं, जो आपको आश्चर्य में डाल दें। ऐसे वीडियो आपको देखने में सामान्य लग सकते हैं और हो सकता है कि कभी-कभार आपको ये वीडियो फेक भी लगें, लेकिन यह एक ऐसी तकनीक है जिसके बारे में अभी हम बहुत कम जानते हैं। ऐसे वीडियो डीपफेक (Deepfake) तकनीकी की सहायता से बनाए जाते हैं और यकीन मानिए कि यह तकनीकी फेक न्यूज से भी अधिक घातक है। विशेषज्ञ इसे परमाणु बम की तरह ही खतरनाक मानते हैं, क्योंकि Deepfake की सहायता से किसी भी देश की राजनीति में भूचाल लाया जा सकता है। इस तकनीक का उपयोग करके पोर्न आदि के माध्यम से किसी के भी जीवन को बर्बाद किया जा सकता है।

क्या है Deepfake?

सबसे पहले इसका पता 2017 में चला था, जब Deepfake नाम के ही रेडिट एकाउंट में कुछ पोर्न क्लिप्स अपलोड कर दिए गए थे। इन क्लिप्स में जो वास्तविक लोग थे, उनके चेहरों को हॉलीवुड की गल गैडोट, टेलर स्विफ्ट और स्कारलेट जॉनसन जैसी अभिनेत्रियों के चेहरों से बदल दिया गया था।

डीपफेक के जरिए किसी की तस्वीर को पोर्न फोटो या वीडियो में बदला जा सकता है।

दरअसल डीपफेक (Deepfake)- ‘डीप लर्निंग’ (Deep Learning) और ‘फेक’ (Fake) से मिलकर बना एक शब्द है। डीपफेक, फोटोशॉप के जरिए फेक न्यूज फैलाने का सबसे आधुनिक माध्यम है और झूठे बयानों अथवा वीडियो क्लिप्स बनाने के लिए 21वीं सदी में सबसे अधिक उपयोग में आने वाला है।

याद होगा आपको इस वीडियो में भी डीपफेक तकनीक का उपयोग हुआ था

यह तकनीक मशीन लर्निंग (Machine Learning) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence) के मिश्रण पर आधारित है। इसके अंतर्गत पावरफुल ग्राफिक्स वाले कंप्यूटरों की सहायता से उपलब्ध डाटा का ऐसा सम्मिश्रण किया जाता है कि आसानी से फेक वीडियो, फोटो अथवा ऑडियो तैयार किया जा सके। सीधी भाषा में कहें तो हाई क्वालिटी AI की सहायता से झूठे कंटेन्ट वाले वीडियो या दूसरे मटेरियल को तैयार करना ही डीपफेक (Deepfake) है। इसे डिटेक्ट करना अर्थात इसकी पहचान करना किसी भी आम इंसान के लिए बहुत मुश्किल है। नीचे एक ट्वीट एम्बेड किया जा रहा है जिसमें चीन के राष्ट्रपति का गाना गाते हुए एक वीडियो है। इससे डीपफेक की अवधारणा को समझने में आसानी होगी।

Deepfake को कैसे बनाया जाता है?

हालाँकि, आजकल कई ऐसे मोबाइल एप्लिकेशन (उदाहरण के लिए फेसऐप) उपलब्ध हैं, जो डीपफेक जैसी तकनीक पर काम करने का दावा करते हैं, लेकिन यह बिल्कुल वैसा है जैसे ‘टिप ऑफ अ आइसबर्ग’। डीपफेक के जरिए वीडियो बनाना कुछ जीबी रैम वाले मोबाइल फोन या लैपटॉप से संभव नहीं है। डीपफेक नवीनतम तकनीक, हाई क्वालिटी AI टूल्स से युक्त और बेहतरीन ग्राफिक कार्ड वाले डेस्कटॉप कंप्यूटर्स के जरिए ही बनाए जा सकते हैं। अगर चेहरे बदलने वाले वीडियो की बात करें (जो Deepfake से जुड़ी सबसे बड़ी चिंता का विषय है) तो इन्हें बनाने में दो तरह की विशेष प्रक्रियाओं का उपयोग किया जाता है।

पहली प्रक्रिया में सबसे पहले इनकोडर (Incoder) कहे जाने वाले AI एल्गोरिदम में हजारों फेस शॉट्स (चेहरे की गतिविधियों) को रन कराया जाता है। इनकोडर इन फेस शॉट्स में उन चुनिंदा शॉट्स का चयन करता है, जहाँ वह चेहरों को आपस में बदलने में सफल हो सके। इस प्रक्रिया के दौरान इनकोडर एक तरह के फ्रेम या फेस शॉट्स को कंप्रेस कर देता है। इसके बाद दूसरे AI एल्गोरिदम की जरूरत होती है, जिसे डिकोडर (Decoder) कहा जाता है। डिकोडर कंप्रेस किए गए फेस शॉट्स या फ्रेम में से चेहरों को सामने लाता है। इस प्रक्रिया में दो डिकोडर उपयोग में आते हैं। पहला डिकोडर पहले व्यक्ति की कंप्रेस किए गए फेस शॉट पर काम करता है और दूसरा डिकोडर दूसरे व्यक्ति के। अब चेहरों को बदलने की प्रक्रिया के आखिरी चरण में इनकोडर के द्वारा कंप्रेस किए गए दूसरे व्यक्ति के फेस शॉट्स को गलत डिकोडर में भेज दिया जाता है। इससे दो अलग-अलग व्यक्तियों के चेहरे बदल जाते हैं और यह काम डिकोडर करता है।

Deepfake से जुड़ी एक और तकनीकी है, जिसे Generative Adversarial Network (GAN) कहा जाता है। GAN के अंतर्गत दो AI एल्गोरिदम काम करते हैं, जनरेटर और डिसक्रिमिनेटर। जनरेटर में एक साधारण व्यक्ति के फेस शॉट या इमेज को रखा जाता है और डिसक्रिमिनेटर में उस सेलिब्रिटी को जिसके चेहरे को बदलना है। अब ये दोनों AI एल्गोरिदम उस प्रक्रिया को कुछ सेकंडों के अंदर हजारों बार अंजाम देते हैं, जिसमें साधारण व्यक्ति की इमेज को सेलिब्रिटी की इमेज या फेस शॉट से बदला जाता है। हजारों बार होने वाली इस प्रक्रिया में दोनों AI एल्गोरिदम को बेहतर होने का फीडबैक दिया जाता है। अब चूँकि इस तकनीकी में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की भूमिका है ऐसे में दोनों एल्गोरिदम उस स्तर पर पहुँच जाते हैं जहाँ वो परफेक्ट कहे जा सकें। इस प्रक्रिया के पूरा होने पर जनरेटर ऐसी इमेज या वीडियो बना देता है, जो बिल्कुल असली मालूम होते हैं।

कौन बनाते हैं Deepfake?

वैसे तो हम सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स में ऐसे वीडियो देखते हैं जो मनोरंजन के उद्देश्य से बनाए जाते हैं लेकिन यह उससे भी बढ़कर कुछ और है। द गार्जियन की रिपोर्ट के मुताबिक, AI फर्म डीपट्रेस ने सितंबर 2019 में लगभग 15,000 डीपफेक वीडियो की पहचान की थी जिनमें से लगभग 96% वीडियो पोर्नोग्राफिक थे। इन पोर्न वीडियो में 99% ऐसे डीपफेक वीडियो थे, जहाँ हॉलीवुड सेलिब्रिटी या पॉप स्टार के चेहरों का उपयोग किया गया था।

विशेषज्ञों का यह मानना है कि डीपफेक का उपयोग करके अधिकांश वीडियो महिलाओं से संबंधित बनाए जा रहे हैं जहाँ या तो उनका स्पूफ बनाया जा रहा है अथवा उनसे किसी बात का बदला लेने के लिए पोर्न वीडियो में उनके चेहरे का उपयोग किया जा रहा है।

पोर्न के अलावा शिक्षाविद, औद्योगिक फर्म, विजुअल इफेक्ट स्टूडियो और राजनीतिक प्रतिद्वंदी डीपफेक तकनीकी का उपयोग करते रहते हैं। डीपफेक का उपयोग करके कई ऐसे वीडियो बनाए जा सकते हैं, जो राजनीति में विभिन्न राजनेताओं और पार्टियों की दिशा को बदल सकते हैं। ये वीडियो इतने खतरनाक हैं कि इनके माध्यम से किसी भी व्यक्ति से मनचाहा बयान दिलवाया जा सकता है और एक्सपर्ट के अलावा एक आम इंसान इन बयानों के झाँसे में आ सकता है। यही कारण है कि इन डीपफेक वीडियो को परमाणु शक्ति के बराबर घातक माना जा रहा है।

यहाँ दो वीडियो दिए जा रहे हैं जिनके माध्यम से राजनीति में Deepfake के खतरों के बारे में बताया गया है।

Deepfake को पहचानना कितना मुश्किल, क्या कहता है कानून?

डीपफेक वीडियो को आम इंसान तो नहीं पहचान सकता है। इन मैनिपुलेटेड वीडियो की वास्तविकता को जानने के लिए भी उन विशेषज्ञों की आवश्यकता होती है, जो इन वीडियो को बनाने की प्रक्रिया में उपयोग होने वाली तकनीकी जरूरतों को पूरा करते हैं। हालाँकि, सामान्य फोन में उपलब्ध ऐसे कई एप्लीकेशन हैं जिनकी सहायता से बनाए गए वीडियो को पहचाना जा सकता है। जब बात उन वीडियो की आती है जिन्हें तकनीक का ज्ञान रखने वालों द्वारा और जो बड़े-बड़े राजनीतिक एवं कूटनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं तो ऐसे वीडियो को पहचानने के लिए किसी तकनीकी विशेषज्ञ की पारखी नजर ही चाहिए।

डीपफेक की पहचान के लिए तकनीक का इस्तेमाल

अब प्रश्न उठता है कि क्या डीपफेक पर कानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती है? डीपफेक ऐसे तो दुनिया भर में बैन नहीं है और न ही इसके संबंध में कोई कानून है, लेकिन इसकी सहायता से किसी व्यक्ति के सम्मान को ठेस पहुँचाने के लिए किया गया कार्य विभिन्न देशों के कानूनों के मुताबिक अपराध ही माना जाएगा। उदाहरण के लिए भारत की बात करते हैं तो यहाँ फेक न्यूज फैलाने और पोर्नोग्राफी जैसे अपराध के लिए सूचना एवं प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम- 2002, बच्चों से संबंधित अश्लील वीडियो या इमेज बनाने अथवा उसे शेयर करने के लिए POCSO ऐक्ट और भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत कार्रवाई की जाती है। अब भले ही Deepfake पर कोई कानून नहीं है, लेकिन अगर इसकी सहायता से कोई ऐसा कार्य किया जाता है जो किसी व्यक्ति की निजता का उल्लंघन करता है, उसके सम्मान को ठेस पहुँचाता, देश में सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने या गलत बयानी से जुड़ा है तो उस पर भारत के इन्हीं कानूनों के अंतर्गत ही कार्रवाई की जाएगी।

हालाँकि, ट्विटर और फेसबुक जैसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने डीपफेक वीडियो प्रतिबंधित किए हुए हैं। ये प्लेटफॉर्म्स दावा करते हैं कि डीपफेक वीडियो अपलोड किए जाने के बाद अगर उन्हें पता चलता है कि यह वीडियो डीपफेक है तो उसे हटा लिया जाता है, फिर भी सोशल मीडिया मंचों पर इन वीडियो का खतरा बना हुआ है। ऐसे वीडियो से बचने का एक ही उपाय है कि यदि कभी भी कोई ऐसा वीडियो या फोटो सामने आए, जिसमें कोई विवादित बात कही गई हो या ऐसा कुछ लिखा गया हो, जो दो वर्गों के बीच संघर्ष की स्थिति उत्पन्न करे तो उन्हें शेयर करने से बचना चाहिए और पहले उनकी जाँच कर लेनी चाहिए।

‘परिवार को बदनाम कर दिया, कई डील हाथ से निकले’: राज कुंद्रा को देख भड़की थीं शिल्पा, पुलिस के सामने ही 4 बार रोईं

हाल ही में पुलिस ने पोर्न फ़िल्में बना कर एप के जरिए बेचने के आरोप में फँसे राज कुंद्रा और उनकी अभिनेत्री पत्नी शिल्पा शेट्टी को आमने-सामने बिठा कर पूछताछ की। पुलिस राज कुंद्रा को लेकर उनके बँगले पर छापेमारी करने गई थी। राज कुंद्रा जहाँ इस मामले में मुख्य साजिशकर्ता हैं, शिल्पा शेट्टी को लेकर पुलिस ने कुछ नहीं कहा है। पता चला है कि उस दिन 6 घंटे की पूछताछ में शिल्पा शेट्टी 4 बार रो पड़ी थीं।

बताया जा रहा है कि पूछताछ के दौरान शिल्पा शेट्टी और उनके पति राज कुंद्रा के बीच तीखी बहस भी हुई। इसके बाद पुलिसकर्मियों के सामने ही शिल्पा शेट्टी रो पड़ी थीं। पुलिस ने ‘Viaan Enterprises’ को लेकर सवाल पूछे थे, जिसके डायरेक्टर के रूप में शिल्पा शेट्टी का नाम सामने आया था। शिल्पा शेट्टी ने कहा था कि उन्हें हॉटशॉट्स एप के कंटेंट्स के बारे में कुछ भी पता नहीं है और वो इससे नहीं जुड़ी हुई हैं।

इस दौरान अभिनेत्री ने राज कुंद्रा के बहनोई प्रदीप बख्शी का नाम लेते हुए कहा था कि हॉटशॉट्स एप उसका ही है और वही इसे चलाता है। उनके पति द्वारा पोर्न फ़िल्में शूट करने के आरोपों को लेकर जब शिल्पा शेट्टी से सवाल पूछा गया तो उन्होंने दावा किया कि वो इरॉटिका है, न कि पोर्न। इस दौरान कई सवालों का जवाब देते हुए उनके आँख से आँसू गिरने लगे। ये पूछताछ शुक्रवार (23 जुलाई, 2021) को हुआ था।’

पूछताछ के दौरान रो पड़ी थीं शिल्पा शेट्टी (वीडियो साभार: ज़ी न्यूज़)

इस दौरान उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें अपने पति के कामकाज के बारे में पता है? वो ‘Viaan Enterprises’ का डायरेक्टर रहने के बाद कंपनी से अलग क्यों हो गई थीं? शिल्पा शेट्टी ने इस दौरान अपने पति को बताया कि इस प्रकरण से उनकी छवि को बहुत नुकसान पहुँचा है और कई कॉन्ट्रैक्ट व ब्रांड्स उनके हाथ से फिसल गए हैं। इस दौरान शिल्पा शेट्टी से अलग से पूछताछ भी हुई थी। 3 बार दोनों को साथ बिठा कर पूछताछ हुई।

इस पूछताछ के दौरान राज कुंद्रा ने भी अपनी पत्नी को दिलासा दिया कि वो निर्दोष हैं और ये मामला कोर्ट में नहीं टिकेगा। ‘दैनिक भास्कर’ की खबर के अनुसार, राज कुंद्रा के पुलिसकर्मी जब उनके घर पहुँचे तो पति राज कुंद्रा को देखते ही शिल्पा शेट्टी भड़क गईं और चिल्लाने लगी थीं। उन्होंने चिल्लाते हुए कहा कि तुमने परिवार को बदनाम कर दिया है, कई बिजनेस डील्स व विज्ञापन इस कारण हाथ से निकल गए हैं।

ताज़ा खबर ये है कि राज कुंद्रा को कोर्ट ने 14 दिनों के लिए पुलिस कस्टडी में भेज दिया है।

एकतरफा प्यार में निकाह के लिए आसिफ ने कई बार डाला दबाव, नहीं मानी तो घर में घुस माँ-बेटी पर चाकू से ताबड़तोड़ वार

राजस्थान के टोंक जिले में एकतरफा प्यार में आसिफ ने माँ-बेटी पर चाकू से ताबड़तोड़ हमला कर दिया। घटना टोंक कोतवाली क्षेत्र की है। आसिफ एक साल से लड़की के पीछे पड़ा पड़ा था। उसने कई बार लड़की पर निकाह का दवाब बनाया, लेकिन जब उसने साफ-साफ इनकार कर दिया तो आगबूबला होकर हमला कर दिया।

पीड़िता जिला मुख्यालय स्थित मेंहदी बाग के कारीगरों वाली गली की रहने वाली है। वहीं आरोपित पुराना टोंक के बाबरों का चौक का रहने वाला है। कोतवाली पुलिस स्टेशन के एसएचओ जीतेंद्र सिंह ने बताया, “सोमवार (26 जुलाई 2021) की दोपहर आरोपित आसिफ (24) जहाँ पीड़िता किराए से रह रही थी वहाँ पहुँच गया। वहाँ पहुँचते ही उसने पीड़िता लुबना (22) पर चाकू से हमला कर दिया। इस दौरान उसे बचाने के लिए आगे आई उसकी उसकी अम्मी जरीना (50) के ऊपर भी आरोपित ने चाकू से ताबड़तोड़ हमल कर दोनों को घायल कर दिया। दोनों को बुरी तरह से घायल करने के बाद वो वहाँ से फरार हो गया। माँ-बेटी को कई घाव लगे हैं।”

इसके बाद पास में ही रहने वाले परिजनों ने दोनों को घायल हालत में सआदत अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती कराया। हालत गंभीर होने के कारण दूसरी अस्पताल के लिए रेफर कर दिया गया। मामले में कोतवाली पुलिस ने केस दर्ज जाँच शुरू कर दी है। वहीं एएसपी सुभाष मिश्रा, डीएसपी चंद्र सिंह रावत ने भी मौका ए वारदात का दौरा कर छानबीन की। आरोपित को गिरफ्तार कर लिया गया है।

डीएसपी चंद्र सिंह रावत ने बताया है कि आसिफ ने पूछताछ के दौरान अपना जुर्म कबूल कर लिया है। वो युवती से पिछले एक साल से एकतरफा प्रेम करता था औऱ उससे निकाह करना चाहता था। जब उसने मना कर दिया तो बदले की भावना से उसने ऐसा किया।