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‘मोहसिन सर आए… दबाने लगे सीना-जाँघ…’: निशानेबाजी सिखाने के बहाने इंदौर में लड़कियों का कर रहा था शिकार, हिंदू संगठन बोले- 100+ का किया यौन शोषण

इंदौर में शूटिंग सिखाने के नाम पर मोहसिन खान लड़कियों को निशाना बना रहा था। उसके खिलाफ तीन लड़कियों ने यौन शोषण का मामला दर्ज करवाया है। गिरफ्तारी के बाद उसके फोन से कई लड़कियों के साथ अश्लील हरकतें करते हुए वीडियो बरामद हुए हैं। इनमें किसी को वह किस कर रहा है तो किसी के शरीर को गलत तरीके से छू रहा है।

यह पूरा मामला एक पीड़िता की FIR के बाद खुला था। पुलिस ने इस मामले में कोच मोहसिन खान को गिरफ्तार कर लिया है। अब उसके फोन की जाँच की जा रही है। दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस की जाँच में पता चला है कि आरोपित के मोबाइल में 100 से ज्यादा अश्लील वीडियो हैं।

एडिशनल पुलिस कमिश्नर अमित सिंह ने बताया कि आरोपित का मोबाइल जब्त कर लिया गया है और डिलीट की गई फोटोज व वीडियो को फॉरेंसिक टीम की मदद से रिकवर किया जा रहा है। वही पुलिस इस एंगल से भी जाँच कर रही है कि कहीं यह किसी बड़े गिरोह का हिस्सा तो नहीं है। मामले में गुरुवार (22 मई, 2025) को 2 और पीड़िताओं ने FIR करवाई है।

वहीं बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने कहा है कि मोहसिन खान ने 100 से अधिक युवतियों को अपना शिकार बनाया है और इस मामले में अन्य लोग भी शामिल हो सकते हैं। पुलिस ने आश्वासन दिया है कि यदि और पीड़िताएँ सामने आती हैं तो जाँच का दायरा बढ़ाया जाएगा।

मोहसिन की रिकॉर्ड की हुई कुछ वीडियो भी सामने आई हैं। एक वीडियो में वह एक लड़की को अश्लील तरीके से उठाते हुए दिखता है। दूसरे में वह एक कमरे में लड़की को छूते हुए दिखता है। एक और वीडियो में भी वह लड़की के साथ अश्लील हरकत करते देखा जा सकता है।

पीड़िता की आपबीती

मोहसिन के खिलाफ इससे पहले एक नाबालिग ने रिपोर्ट दर्ज करवाई थी। छात्रा ने बताया कि वह साल 2021 से नवंबर 2023 तक मोहसिन की एकेडमी में शूटिंग प्रैक्टिस करती थी। एक दिन मोहसिन कोचने राइफल पकड़ने के बहाने उसके शरीर को गलत तरीके से छुआ और जांघ को दबाया।

पीड़िता ने बताया कि उसने जब विरोध किया तो मोहसिन ने करियर बर्बाद करने की धमकी दी। पीड़िता ने घटना के बाद एकेडमी जाना बंद कर दिया और कुछ समय बाद परिजनों को जानकारी दी। पीड़िता को हाल ही में और भी हिन्दू लड़कियों के साथ ऐसी ही घटनाओं की जानकारी मिली।

इसके बाद छात्रा ने अपने परिवार और हिंदू संगठनों की मदद से थाने में शिकायत दर्ज कराई।

पुलिस की कार्रवाई

बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने बताया है कि मोहसिन खान ने 100 से अधिक युवतियों को अपना शिकार बनाया है और इस मामले में अन्य लोग भी शामिल हो सकते हैं। पुलिस को जाँच के दौरान मोहसिन के भाई के बारे में भी पता चाल, जो एक और स्कूल में शूटिंग कोच है। पुलिस फिलहाल सभी पहलुओं पर गंभीरता से जाँच कर रही है।

कितनी सरकारें आईं, गईं, अबूझमाड़ में खत्म नहीं कर सकी नक्सली हुकूमत… पर मोदी सरकार ने यह भी कर दिखाया: जानिए कैसे 4000 वर्ग किमी क्षेत्र हुआ वामपंथी आतंक से मुक्त

छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ के जंगलों में बुधवार (21 मई 2025) को हुई मुठभेड़ में सुरक्षा बलों ने वामपंथी उग्रवाद के खिलाफ एक बड़ी सफलता हासिल की है। इस मुठभेड़ में नक्सल आतंकवाद के सरगना नंबाला केशव राव उर्फ बसवराजू मारा गया। बसवराजू भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) का महासचिव था और भारत के सबसे प्रमुख माओवादी नेताओं में शामिल था।

70 वर्षीय बसवराजू के सिर पर ₹1.5 करोड़ का इनाम था। वह 2010 में छत्तीसगढ़ के चिंतलनार में CRPF के 76 जवानों की हत्या और 2013 में झीरम घाटी हमले का मास्टरमाइंड था, जिसमें कई कॉन्ग्रेस नेता मारे गए थे। बसवराजू उन 26 नक्सल आतंकवादियों में शामिल था, जिन्हें सुरक्षा बलों ने इस मुठभेड़ में ढेर किया।

छत्तीसगढ़-तेलंगाना सीमा पर नक्सलियों की कमर तोड़ने के लिए सुरक्षा बलों ने 21 अप्रैल से 11 मई 2025 तक ‘ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट’ चलाया था। इस 21 दिवसीय अभियान को केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) और राज्य पुलिस के संयुक्त बलों ने कर्रेगुट्टालु हिल के पास अंजाम दिया।

इस ऑपरेशन में कुल ₹1.72 करोड़ रुपये के इनामी 31 नक्सली मारे गए थे। इसके साथ ही 214 नक्सली ठिकाने और बंकर नष्ट किए गए। तलाशी अभियान के दौरान सुरक्षा बलों ने 450 आईईडी, 818 बीजीएल गोले, 899 बंडल कोडेक्स वायर, बड़ी मात्रा में डेटोनेटर और अन्य विस्फोटक सामग्री बरामद की। इसके अलावा करीब 12,000 किलोग्राम खाद्य आपूर्ति भी जब्त की गई।

इसके कुछ ही दिनों बाद 21 मई को अबूझमाड़ के जंगलों में हुई मुठभेड़ में शीर्ष माओवादी नेता नंबाला केशव राव उर्फ बसवराजू को मार गिराया गया। गृह मंत्री अमित शाह ने छत्तीसगढ़ के नारायणपुर में 21 मई को हुए मुठभेड़ ऑपरेशन को नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई में ‘ऐतिहासिक उपलब्धि’ बताया है।

उन्होंने कहा, “आज हमारे सुरक्षा बलों ने नारायणपुर में एक बड़े ऑपरेशन के तहत 27 खूंखार माओवादियों को मार गिराया है, जिनमें सीपीआई (माओवादी) के महासचिव और नक्सल आंदोलन की रीढ़ माने जाने वाले नंबाला केशव राव उर्फ बसवराजू भी शामिल हैं।”

उन्होंने यह भी कहा कि भारत की नक्सलवाद के खिलाफ तीन दशकों की लड़ाई में यह पहली बार है कि सुरक्षा बलों ने महासचिव स्तर के माओवादी नेता को ढेर किया है। शाह ने इस सफलता के लिए सुरक्षा बलों और एजेंसियों की सराहना की।

इसके साथ ही गृह मंत्री ने हाल ही में समाप्त हुए ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट की भी प्रशंसा की। उन्होंने दोहराया कि मोदी सरकार 31 मार्च 2026 से पहले भारत से नक्सलवाद का पूरी तरह सफाया करने के लिए प्रतिबद्ध है।

गृह मंत्री शाह ने कहा, “मुझे यह बताते हुए भी खुशी हो रही है कि ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट के पूरा होने के बाद छत्तीसगढ़, तेलंगाना और महाराष्ट्र में 54 नक्सलियों को गिरफ्तार किया गया है और 84 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है। मोदी सरकार 31 मार्च 2026 से पहले नक्सलवाद को खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध है।”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी माओवादी आतंकी नंबाला केशव राव उर्फ बसवराजू को मार गिराने पर सुरक्षा बलों की सराहना की है। प्रधानमंत्री ने कहा कि यह कार्रवाई नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है और उनकी सरकार देश से नक्सली खतरे को खत्म करने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है।

अब नक्सलवाद का ‘लाल किला’ अबूझमाड़ ढह चुका है, इसलिए दशकों से माओवादी आतंक से ग्रस्त इस क्षेत्र के रक्तरंजित इतिहास को भी जानना जरूरी है।

अबूझमाड़: आखिरी नक्सल किला और 40 साल बाद उसका पतन

अबूझमाड़’ नाम दो शब्दों से मिलकर बना है ‘अबूझ’ यानी जिसे समझा न जा सके, और ‘माड़’ यानी पहाड़ी। यह भारत का एकमात्र ऐसा भू-भाग है जिसका आज तक कोई राजस्व मानचित्र नहीं बनाया गया है। यहाँ के ग्रामीणों के पास अपनी जमीन का कोई स्वामित्व प्रमाण (पट्टा) नहीं है, जबकि यह क्षेत्र लगभग 4,000 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है।

नक्सलवाद के कारण दशकों तक यहाँ सरकार का दखल दशकों तक शून्य रहा है। अबूझमाड़ मुख्य रूप से नारायणपुर जिले के ओरछा ब्लॉक के हिस्सों में फैला है। इस क्षेत्र की आबादी करीब 40 से 45 हज़ार है, जिनमें अधिकांश अबूझमाड़िया जनजाति से संबंध रखते हैं।

अबूझमाड़िया समुदाय छत्तीसगढ़ के विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूहों (PVTGs) में से एक है। इन्हें सरकार द्वारा लुप्तप्राय जनजातीय समूहों के लिए निर्धारित विशेष अधिकारों और लाभों का हकदार माना गया है।

यह क्षेत्र न केवल भौगोलिक रूप से कठिन है, बल्कि सामाजिक और प्रशासनिक रूप से भी बेहद संवेदनशील रहा है, और नक्सलवाद ने इसके विकास को लंबे समय तक बाधित किया। अबूझमाड़ केवल नारायणपुर और ओरछा ब्लॉक तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका विस्तार छत्तीसगढ़ केदंतेवाड़ा और बीजापुर जिलों के कुछ हिस्सों तक भी होता है।

इसके अलावा, महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले के कुछ इलाके भी अबूझमाड़ क्षेत्र में शामिल हैं। यह पूरा क्षेत्र घने जंगलों, दुर्गम पहाड़ियों और सीमित प्रशासनिक पहुँच के कारण लंबे समय से नक्सल प्रभावित और रणनीतिक रूप से संवेदनशील माना जाता है।

अबूझमाड़ क्षेत्र में आज तक सड़कें, अस्पताल और अन्य बुनियादी सुविधाएँ नहीं पहुँच पाई हैं। इसका प्रमुख कारण यह है कि माओवादियों ने इस क्षेत्र को मुख्यधारा से जुड़ने नहीं दिया और हर प्रकार के विकास कार्य का विरोध किया।

स्थानीय लोगों के अनुसार, नक्सली गाँवों तक पहुँचने वाली बसों को आग लगा देते थे और बाहरी लोगों या सरकारी कर्मचारियों के प्रवेश को हिंसा करके रोक देते थे। माओवादियों ने यह सुनिश्चित किया कि यहाँ कोई गाड़ी चलने लायक सड़क तक ना बने। उन्होंने किसी ग्रामीण को पट्टा भी नहीं मिलने दिया।

आज़ादी के बाद 1947 में छत्तीसगढ़ के ओरछा और नारायणपुर जैसे इलाकों में कुछ हद तक विकास हुआ और 1980 के दशक तक गाड़ी चलने लायक सड़कें भी बन गईं। लेकिन अबूझमाड़ के पहाड़ी क्षेत्र जानबूझकर लोगों की पहुँच से दूर रखा गया, जिससे यहाँ की जनजातीय संस्कृति और परंपराएँ कमजोर होती गईं।

स्थिति तब और बिगड़ गई जब 1990  के दशक में माओवादियों ने इस अनजाने और जनजातीय बहुल क्षेत्र की ओर रुख किया। 2000 के दशक तक उन्होंने अबूझमाड़ को अपना गढ़ बना लिया। इसके बाद माओवादियों ने न केवल सड़कों को नष्ट किया, बल्कि 50 से ज्यादा स्कूल जला दिए, जिससे यह क्षेत्र मुख्यधारा से पूरी तरह कट गया।

माओवादियों ने यहाँ ‘जनता सरकार’ की स्थापना कर ली और अबूझमाड़ को अपने वैकल्पिक शासन का केंद्र बना लिया। उन्होंने मुरुमवाड़ा और बोटोर जैसे इलाकों में अपने स्कूल शुरू किए, यहाँ पर माओवादी पाठ्यक्रम पढ़ाया जाता था, यह सिलसिला हाल के वर्षों तक जारी रहा।

विकास को रोकने के लिए माओवादी हिंसा के साथ-साथ दुष्प्रचार का भी इस्तेमाल करते हैं। उनका मकसद यह रहा है कि अबूझमाड़ के पहाड़ी गाँव पूरी तरह अलग-थलग और उनके प्रभाव में बने रहें। अबूझमाड़, छत्तीसगढ़ के नारायणपुर विधानसभा क्षेत्र  का हिस्सा है, लेकिन इसका लगभग 90% क्षेत्र आज भी राजस्व सर्वेक्षण से वंचित है।

अप्रैल 2017 में IIT रुड़की की मदद से अकाबेड़ा और कुछ अन्य गाँवों में सर्वेक्षण शुरू किया गया था, परंतु सुरक्षा चिंताओं और बुनियादी ढाँचे की कमी के चलते इसमें कोई खास प्रगति नहीं हो सकी। 2023 में अबूझमाड़ को पहली बार एक ऑपरेशन थियेटर और दो मोबाइल टावर मिल पाए थे। हालाँकि, अब भी बड़े इलाके में मोबाइल नेटवर्क नहीं आते।

चुनाव आयोग अबूझमाड़ को चुनावी प्रक्रिया से जोड़ने के प्रयास कर रहा है। 2018 से यहाँ की मतदाता सूची में 300 से अधिक नाम जोड़े गए हैं, इससे पता चलता है कि यह इलाका कितना अलग-थलग रहा है।

हालाँकि, माओवादी आज भी इस क्षेत्र में लोकतांत्रिक और प्रशासनिक प्रयासों को चुनौती देते है। दिसंबर 2024 में कोहकामेटा में एक मुठभेड़ के दौरान माओवादियों ने डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड (DRG) के एक हेड कांस्टेबल की हत्या कर दी थी। माओवादी अपने प्रभाव वाले इलाकों में पूर्व सरपंचों और नेताओं को भी निशाना बना रहे हैं।

2023 में, अबूझमाड़ के ज़ारा गाँव में पूर्व सरपंच रामजी डोडी और उनके दो भतीजों को माओवादियों ने अगवा कर लिया था। इसके बाद उन्हें जंगल ले जाकर उनकी गला घोंटकर हत्या कर दी थी। उन पर पुलिस का मुखबिर होने का आरोप लगाया गया था।

इसके अलावा, बीजापुर(दक्षिण बस्तर) में एक भाजपा पदाधिकारी और दो पूर्व सरपंचों की भी माओवादियों ने हत्या कर दी थी। यह सिलसिला बताता है कि माओवादी अब भी स्थानीय लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कुचलने का प्रयास कर रहे हैं।

इन चुनौतियों के बावजूद, सुरक्षा बलों और सरकार ने अबूझमाड़ सहित पूरे दंडकारण्य क्षेत्र में नक्सली गतिविधियों को खत्म करने के लिए लगातार अभियान चला रखे हैं। फरवरी 2025 में, एक पूर्व माओवादी गिरिधर ने टाइम्सऑफ इंडिया को बताया कि माओवादियों का कभी अजेय गढ़ माना जाने वाला अबूझमाड़ अब गिर चुका है।

गिरिधर पहले PLGA (पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी) का कमांडर था और 2024 में आत्मसमर्पण कर चुका है। गिरिधर ने बताया, “अबूझमाड़ अब अभेद्य नक्सली किला नहीं रहा… कमांडो दंडकारण्य के जंगलों के हर इंच पर कब्जा कर रहे हैं। माओवादी कादर का आधार खत्म हो गया है।”

यह बयान दर्शाता है कि सुरक्षा बलों के अभियान अब निर्णायक मोड़ पर पहुँच चुके हैं और अबूझमाड़, जो कभी माओवादियों का सबसे मजबूत गढ़ था, अब तेजी से उनकी पकड़ से बाहर हो रहा है।

पूर्व माओवादी गिरिधर ने 2009 में राजनांदगाँव के एसपी विनोद चौबे की हत्या की साजिश रची थी। उन्होंने कहा, “हमारा कैडर बेस तेजी से कम हो रहा था। पुलिस अब अपने नागरिक कार्यों, मुफ्त सुविधाओं, नौकरियों और बेहतर जीवन के वादे के साथ लोगों में प्रभाव छोड़ रही थी।”

गिरिधर ने यह भी बताया कि शिक्षा, बेहतर जीवन और शहरी चकाचौंध के आकर्षण ने युवाओं को माओवादी रास्ते से दूर कर दिया है। उन्होंने बताया कि कोई भी युवा माओवादियों के साथ जुड़ना नहीं चाहता।

इस बयान से साफ है कि सरकार की जनकल्याणकारी योजनाएँ, शिक्षा और रोजगार के अवसर, और सहायता वाले दृष्टिकोण ने नक्सलवाद की जड़ें कमजोर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

नक्सलवाद के खिलाफ जारी है लड़ाई

इस महीने की शुरुआत में छत्तीसगढ़ तेलंगाना सीमा पर कर्रेगुट्टा पहाड़ी पर सुरक्षा बलों ने नक्सलवाद के खिलाफ अब तक का सबसे बड़ा अभियान चलाया। इस ऑपरेशन में 31 इनामी नक्सलियों को मार गिराया गया था। इस कार्रवाई में सुरक्षाबलों ने कर्रेगुट्टा पहाड़ी का 1200 स्क्वायर किलोमीटर का इलाका खाली करवाया था।

इस ऐतिहासिक ऑपरेशन की सफलता के लिए बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों, आधुनिक उपकरणों और अन्य जरूरी रसद को काफी मेहनत से इकट्ठा किया गया था। ऑपरेशन की शुरुआत से पहले एक संयुक्त ब्रीफिंग में बलों को कर्रेगुट्टा पहाड़ी (केजीएच) के कठिन और चुनौतीपूर्ण भू भाग के बारे में विस्तार से चेतावनी दी गई थी।

इसमें सैकड़ों गुफाओं, एम्बुश के बिंदुओं और IED जैसे खतरों की विशेष जानकारी शामिल थी। नक्सल विरोधी अभियान के तहत, सुरक्षा बलों ने नक्सलियों के 4 कारखानों को भी नष्ट कर दिया। यहाँ बीजीएल गोले, घरेलू हथियार, आईईडी और अन्य घातक हथियार बनाए जा रहे थे।

2024 में नक्सल विरोधी अभियानों की बड़ी सफलताओं के बाद, 2025 में भी सुरक्षा बलों ने नक्सलवाद के खिलाफ अपना अभियान तेज़ी से जारी रखा है। पिछले चार महीनों में ही 197 कट्टर नक्सलियों को ढेर किया गया है, जो इस संघर्ष की तीव्रता और प्रभावशीलता को दर्शाता है।

नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की संख्या में भी ऐतिहासिक गिरावट देखी गई है। 2014 में जहाँ 35 जिले गंभीर रूप से नक्सल प्रभावित थे, वहीं 2025 तक यह संख्या घटकर सिर्फ 6 रह जाएगी। इसी तरह, इसी तरह कुल नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या 126 से घटकर अब केवल 18 रह गई है।

नक्सली हिंसा की घटनाओं में भी बड़ा अंतर आया है। 2014 में 76 जिलों के 330 थानों में 1080 नक्सली घटनाएँ दर्ज की गई थीं, जबकि 2024 में यह संख्या घटकर 42 जिले तक सिमट गई। यहाँ के 151 थानों में इस दौरान 374 घटनाएँ ही हुई है। इसी अवधि में सुरक्षा बलों के नुकसान की संख्या 88 से घटकर 19 हो गई है।

साथ ही, मुठभेड़ों में मारे गए नक्सलियों की संख्या 2014 के 63 से बढ़कर अब 2089 हो चुकी है, जो इस अभियान की आक्रामकता और सफलता को दर्शाता है। आत्मसमर्पण की दर में भी बड़ी वृद्धि देखी गई है, 2024 में 928 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, जबकि 2025 के पहले चार महीनों में ही 718 नक्सली हथियार छोड़ चुके हैं।

2019 से 2025 के बीच, केंद्रीय बलों और राज्य पुलिस ने नक्सल प्रभावित राज्यों में 320 सुरक्षा कैंप स्थापित किए, जिनमें 68 नाइट लैंडिंग हेलीपैड शामिल हैं। फोर्टिफाइड (सुरक्षित) पुलिस स्टेशनों की संख्या भी 2014 में 66 से बढ़कर अब 555 हो गई है।

ये आँकड़े स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि सरकार और सुरक्षा बलों के संयुक्त प्रयासों से नक्सलवाद की कमर टूट चुकी है, और अब यह समस्या अपने अंत के कगार पर है।

नक्सलियों के खिलाफ चलाए जा रहे व्यापक अभियानों का बड़ा असर अब साफ़ नजर आने लगा हैं। बड़ी और सशस्त्र नक्सली इकाइयों का विभाजन हो गया है और वो छोटे-छोटे दलों में बंट गए हैं। सुरक्षा बलों की नक्सली क्षेत्रों पर पकड़ अब कहीं अधिक मजबूत हो गई है। बीजापुर और नारायणपुर में धीमे-धीमे नक्सली एक-एक इंच से भगाए जा रहे हैं।

ऑपरेशन ‘कगार’  के तहत नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में CRPF, DRG और पुलिस सहित लगभग  एक लाख अर्धसैनिक बलों को तैनात किया गया है। इन सुरक्षाकर्मियों को सूचना एकत्र करने के लिए ड्रोन, खुफिया विश्लेषण के लिए एआई, और सैटेलाइट इमेजरी  जैसी आधुनिक तकनीकों से लैस किया गया है।

कर्रेगुएटा के बाद अबूझमाड़ के पतन के साथ, भारत वामपंथी उग्रवाद और नक्सलवाद को समाप्त करने और इन विचारधाराओं से प्रभावित क्षेत्रों को शांति, समृद्धि, शिक्षा और विकास की मुख्यधारा में शामिल करने की दिशा में प्रगति कर रहा है।

ऑपइंडिया ने इससे पहले बताया था कि वामपंथी समूहों ने एक खुले पत्र के माध्यम से माओवादी आतंकवादियों का समर्थन किया और सरकार से नक्सल विरोधी अभियान को बंद करने की अपील की थी। हालाँकि, सरकार ने इस पर ध्यान दिए बिना यह लड़ाई जारी रखी थी।

यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में श्रद्धा पाण्डेय ने लिखी है। इसका हिंदी में अनुवाद विवेकानंद मिश्रा ने किया है।

कहाँ हैं बांग्लादेश के 2 ‘चिकन नेक’, इनके कटते ही कैसे बदल जाएगा नक्शा: असम CM ने क्यों की इसकी चर्चा, जानिए सब कुछ

बांग्लादेश के अंतरिम सरकार के मुखिया मुहम्मद युनुस ने चीन यात्रा के दौरान भारत के सिलिगुड़ी चिकन नेक पर बयान दिया। उन्होंने कहा कि भारत के साथ पूर्वोत्तर राज्य लैंडलॉक्ड यानी जमीन से घिरे हैं ऐसे में चीन को बांग्लादेश में अपना आर्थिक प्रभाव अधिक बढ़ाना चाहिए।

इसके बाद क तुर्की इस्लामिक समूह ‘सल्तनत-ए-बांग्ला’ ने ‘ग्रेटर बांग्लादेश’ नाम से एक नक्शा जारी किया। इसमें भारत के पूर्वोत्तर और पूर्वी हिस्सों को शामिल किया गया है।

बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के इस बयान और तथाकथित नक्शे से गुस्साए असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने बांग्लादेश को चेतावनी दी है। डेरगांव में प्रेस ब्रीफिंग में सीएम सरमा ने कहा कि हमारे पास एक चिकन एक है लेकिन बांग्लादेश के पास दो चिकन नेक्स हैं। अगर बांग्लादेश हमारे चिकन नेक पर हमला करता है तो हम बांग्लादेश के दोनों चिकन नेक्स पर हमला करेंगे।

सरमा ने आगे कहा कि बांग्लादेश का चिकन नेक मेघालय से सटा है और बांग्लादेश की चटगाँव बंदरगाह को जोड़ता है। यह भारत के चिकन नेक से भी पतला है और बस पत्थर फेंकने की दूरी पर स्थित है।

इस बीच एक रिपोर्ट ये भी आई कि चीन बांग्लादेश को सिलीगुड़ी के पास भारतीय सीमा के करीब लालमुनिरहाट में दूसरे विश्व युद्ध के दौरान बनाए गए एयरबेस को फिर से तैयार करने में मदद कर रहा है। वर्तमान में इस बंद पड़े एयरबेस पर बांग्लादेश की वायु सेना का नियंत्रण है। हालाँकि यह दशकों से बेकार पड़ा हुआ है।

14 बार जन्म ले तब बांग्लादेश कर पाएगा हमला

मुख्यमंत्री सरमा ने कहा, “कोई भी देश यह भ्रम न पाले कि वह भारत का चिकन नेक छीन सकता है। ऑपरेशन सिंदूर से भारत ने यह पहले ही साबित कर दिया है कि वह कितना मजबूती से खड़ा है। बांग्लादेश को भारत पर हमला करने से पहले 14 बार जन्म लेना होगा।”

इसके बाद बांग्लादेश में जारी किए गए तथाकथित ग्रेटर बांग्लादेश वाले मानचित्र पर सीएम हिमंत सरमा ने कहा कि बांग्लादेश एक ‘छोटा सा देश’ है। उसे पर इतना ध्यान देने की जरूरत नहीं है। लोग ऐसा नक्शा बना सकते हैं और छाप सकते हैं। हम भी बांग्लादेश को असम का हिस्सा दिखाने वाला नक्शा बना सकते हैं, लेकिन किसी के नक्शा बना देने भर से असलियत नहीं बदलती।

कौन से हैं बांग्लादेश के दो चिकन नेक

भारत के सिलीगुड़ी गलियारा को चिकन नेक नाम से भी जाना जाता है। लगभग 22 किलोमीटर चौड़ा और 60 किलोमीटर लंबा ये वह रास्ता है जो पूरे पूर्वोत्तर को भारत से जोड़ता है। इसी तरह बांग्लादेश के पास भी दो चिकन नेक्स है।

बांग्लादेश का पहला चिकन नेक चटगाँव बंदरगाह से बांग्लादेश के अन्य हिस्सों को जोड़ता है। त्रिपुरा के पास स्थित यह चिकन नेक मिरसराय उपजिले में लगभग 40 किलोमीटर की भूमि है।

बांग्लादेश का दूसरा चिकन नेक रंगपुर डिवीजन के दक्षिणी कॉरिडोर है जो मेघालय के पास है। यह चिकन नेक दक्षिण पश्चिम गौराहिल्स से पश्चिम बंगाल में दक्षिण दिनाजपुर तक रंगपुर को बाकी हिस्सों से जोड़ता है और यह लगभग 90 किलोमीटर लंबा है।

बांग्लादेश को कैसे नुकसान पहुँचा सकती है उसी की चिकन नेक

दक्षिण त्रिपुरा के पास वाला बांग्लादेश का चिकन नेक काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि अगर इसे बंद कर दिया जाए तो बांग्लादेश का लगभग 20% हिस्सा देश से कट जाएगा। दूसरा महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि चटगाँव बांग्लादेश का सबसे महत्वपूर्ण बंदरगाह है।

बांग्लादेश के दो चिकन नेक्स (फोटो साभार- इंडिया टुडे)

चटगाँव शहर भी बांग्लादेश के लिए काफी जरूरी शहर है। हालाँकि जंगल और नदियों से भरा यह इलाका भारत के लिए एक मुसीबत ही है क्योंकि म्यांमार के घुसपैठियों, अवैध बांग्लादेशियों समेत अन्य उग्रवादियों के लिए बहुत ही उपयुक्त जगह रही है।

अब बात करते हैं बांग्लादेश के दूसरे चिकन नेक की। दूसरा चिकन नेक बांग्लादेश के रंगपुर डिवीजन में है। असल में यह बांग्लादेश का पूरा उत्तरी भू-भाग है जो लगभग 16,000 वर्ग किलोमीटर से भी ज्यादा में फैला है। बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था के लिए रंगपुर काफी अहम है। रंगपुर में ही जूट, चीनी, चावल और तंबाकू की मिल और बड़ी-बड़ी कंपनियां मौजूद हैं।

अगर बांग्लादेश के इन दोनों चिकन नेक बांग्लादेश के साथ से निकल जाता है तो बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी और उसका असल नक्शा ही पलट सकता है।

नेपाल बॉर्डर से भारत में घुसना चाहते हैं 37 आतंकी, पाकिस्तान-बांग्लादेश से पहुँचे खुली सीमा पर: SSB ने तैनात किए 1500+ जवान, पुलिस बोली- 24 घंटे कर रहे पेट्रोलिंग

भारत ने जब से आतंकवादियों के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर को अंजाम दिया है तब से पाकिस्तान बौखला गया है। हर रोज भारत के खिलाफ एक नई चाल चलने की पाकिस्तान नाकाम कोशिशें कर रहा है।

इसके तहत सुरक्षा एजेंसियों के हवाले से सूचना मिली है कि करीब 37 पाकिस्तानी और बांग्लादेशी आतंकी इस समय नेपाल में मौजूद हैं और भारत में घुसपैठ करने की ताक में हैं। सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए बहराइच से बलरामपुर तक की नेपाल सीमा पर एसएसबी के 1500 अतिरिक्त जवानों को तैनात किया गया है। एसएसबी 42वीं वाहिनी ने सीमा क्षेत्र में दोहरी गश्त भी शुरू कर दी है। सुरक्षा के मद्देनजर वन क्षेत्र में अतिरिक्त चौकी भी बनाई गई है। 

बलरामपुर के एएसपी योगेश कुमार का कहना है कि एसएसबी और पुलिस की संयुक्त टीम सीमा पर 24 घंटे नजर रख रही है। इसके अलावा ग्राम सुरक्षा समितियों को भी सक्रिय किया गया है। 42 वीं बटालियन के कमांडेंट गंगा सिंह उदावत का कहना है कि जिन 37 लोगों के बारे में सूचना मिली है, वो सभी बांग्लादेश से नेपाल पहुँच चुके हैं और सभी भारत और नेपाल की खुली सीमा का फायदा उठाते हुए भारत मे घुसने की कोशिश कर सकते हैं। इसलिए सीमा पर कड़े इंतजाम के साथ लगातार निगरानी रखी जा रही है।

37 लोगों में 10 बांग्लादेशी और 27 पाकिस्तानी बताए जा रहे हैं। सूचना के बाद सीमा पर 24 घंटे पेट्रोलिंग चल रही है ताकि कोई अवांछित नागरिक भारत में प्रवेश न कर सके। सभी के परिचय पत्र की भी चेकिंग की जा रही है। नेपाल से लगते उत्तर प्रदेश के महराजगंज, सिद्धार्थनगर, बलरामपुर, बहराइच, श्रावस्ती, पीलीभीत व लखीमपुर खीरी में अलर्ट भी जारी कर दिया गया है।

इन लोगों के भारत में दाखिल होने की कोशिश करने का मकसद साफ है कि पाकिस्तान कोई बड़ी साजिश रच रहा है और फिर किसी नापाक हरकत को अंजाम देने की फिराक में है। 

कतर में कैब चलाने वाला नेपाल का अंसारुल अंसारी बना ISI एजेंट, पाकिस्तान में ट्रेनिंग के बाद मिला भारत की जासूसी का टास्क: स्पेशल ऑपरेशन में गिरफ्तार

दिल्ली पुलिस और भारतीय जाँच एजेंसियों ने एक बड़े ऑपरेशन को अंजाम देते हुए पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के दो जासूसों को गिरफ्तार किया है। इनमें से एक नेपाली मूल का अंसारुल मिया अंसारी है, जिसे दिल्ली के एक होटल से पकड़ा गया। यह ऑपरेशन जनवरी से मार्च 2025 तक चला, जिसमें खुफिया जानकारी के आधार पर अंसारुल को 15 फरवरी 2025 को हिरासत में लिया गया। उसके पास से भारतीय सशस्त्र बलों से जुड़े कई गोपनीय दस्तावेज बरामद हुए, जो वह पाकिस्तान भेजने की फिराक में था।

रिपोर्ट्स के अनुसार, अंसारुल 2008 से कतर में कैब ड्राइवर के रूप में काम कर रहा था। वहाँ उसकी मुलाकात एक ISI हैंडलर से हुई, जिसने उसे लालच और वैचारिक उकसावे के जरिए अपने जाल में फँसाया। जून 2024 में अंसारुल को पाकिस्तान के रावलपिंडी ले जाया गया, जहां ISI के वरिष्ठ अधिकारियों ने उसे जासूसी की ट्रेनिंग दी। उसे खास तौर पर भारतीय सेना से जुड़े गोपनीय दस्तावेज, तस्वीरें और जियोलोकेशन डेटा इकट्ठा करने का काम सौंपा गया। इसके बाद उसे नेपाल के रास्ते भारत भेजा गया, ताकि वह दिल्ली में आतंकी हमले की साजिश को अंजाम दे सके।

जाँच एजेंसियों को जनवरी 2025 में खुफिया सूचना मिली थी कि एक ISI जासूस नेपाल के रास्ते दिल्ली में घुसने वाला है। इसके आधार पर दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल और केंद्रीय एजेंसियों ने मिलकर एक सीक्रेट ऑपरेशन शुरू किया। सूत्रों के मुताबिक, यह जासूसी कला का एक शानदार नमूना था, जिसमें भारतीय एजेंसियाँ हर कदम पर अंसारुल से आगे रहीं। जाँच में यह भी सामने आया कि दिल्ली में एक बड़े आतंकी हमले की साजिश रची जा रही थी, जिसमें सैन्य ठिकानों की गोपनीय जानकारी का इस्तेमाल होना था।

अंसारुल को भारत में मदद करने वाला राँची का रहने वाला अखलाक अजाम था, जिसे मार्च 2025 में गिरफ्तार किया गया। अखलाक ने अंसारुल को लॉजिस्टिक सपोर्ट और दस्तावेज इकट्ठा करने में मदद की। दोनों के मोबाइल फोन की जाँच में पाकिस्तानी हैंडलरों के साथ संदिग्ध बातचीत के सबूत मिले, जो एक बड़े षड्यंत्र की ओर इशारा करते हैं। दिल्ली पुलिस ने दोनों के खिलाफ आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम (Official Secrets Act) के तहत मामला दर्ज किया और मई 2025 में कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की।

अंसारुल और अखलाक को दिल्ली की तिहाड़ जेल के हाई-सिक्योरिटी वार्ड में रखा गया है। अधिकारियों ने उनकी गतिविधियों पर कड़ी नजर रखी है, ताकि वे जेल में अन्य कैदियों को प्रभावित न कर सकें। जाँच एजेंसियां अब इस नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की तलाश में जुटी हैं।

कपिल सिब्बल, राजीव धवन, अभिषेक मनु सिंघवी, हुजेफा अहमदी… वक्फ कानून नहीं कबूल: सुप्रीम कोर्ट में 3 दिन चली बहस, जानिए विरोध-पक्ष में क्या-क्या दी दलीलें?

सुप्रीम कोर्ट में 20 मई 2025 से वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई हो रही है। यह कानून 1995 के वक्फ अधिनियम में बदलाव करता है, जो वक्फ संपत्तियों (इस्लामिक कानून के तहत धार्मिक या धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए समर्पित संपत्तियों) के प्रबंधन से संबंधित है।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह कानून मुस्लिम समुदाय के खिलाफ भेदभाव करता है और उनकी धार्मिक स्वतंत्रता में दखल देता है। दूसरी ओर केंद्र सरकार का दावा है कि यह संशोधन वक्फ प्रावधानों के दुरुपयोग को रोकने और निजी व सरकारी संपत्तियों पर अतिक्रमण को खत्म करने के लिए लाया गया है। सुनवाई में मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) बी.आर. गवई और जस्टिस ए.जी. मसीह की बेंच ने याचिकाकर्ताओं, केंद्र सरकार और अन्य पक्षों के तर्क सुने।

सुनवाई के पहले दिन याचिकाकर्ताओं की ओर से दी गई दलील

सुप्रीम कोर्ट में मामले में पहले दिन की सुनवाई 20 मई 2025 को सुबह 11:41 बजे शुरू हुई। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल (एसजी) तुषार मेहता ने दलीलें दीं, जबकि याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल, राजीव धवन, ए.एम. सिंघवी, सी.यू. सिंह और हुजेफा अहमदी ने तर्क रखे। कोर्ट ने पहले तीन मुद्दों पर सुनवाई तय की थी, लेकिन याचिकाकर्ताओं ने कई अन्य बिंदु भी उठाए।

कपिल सिब्बल ने दी ये दलीलें

  • कपिल सिब्बल ने कहा, “यह कानून वक्फ की सुरक्षा के लिए लाया गया है, लेकिन इसका असली मकसद वक्फ संपत्तियों को हड़पना है। यह कानून इस तरह बनाया गया है कि बिना किसी प्रक्रिया के वक्फ संपत्ति छीनी जा सकती है। कोई सरकारी अधिकारी फैसला करता है और संपत्ति तुरंत वक्फ नहीं रह जाती। कोई भी विवाद खड़ा कर सकता है।”
  • वक्फ-बाय-यूजर (लंबे समय तक उपयोग से बनी वक्फ संपत्ति) को खत्म करने पर उन्होंने कहा, “वक्फ-बाय-यूजर की अवधारणा को खत्म कर दिया गया है, जिसे बाबरी मस्जिद केस में मान्यता मिली थी। 1925 के कानून में पंजीकरण का प्रावधान था, लेकिन अगर पंजीकरण नहीं हुआ तो संपत्ति वक्फ नहीं रह जाती, यह नया है।”
  • प्राचीन स्मारकों पर सिब्बल ने तर्क दिया, “अगर कोई संपत्ति प्राचीन स्मारक घोषित हो जाती है, तो वह वक्फ नहीं रहती। इससे धार्मिक अधिकार छिन जाते हैं। यह संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लंघन है।”
  • धारा 3(सी) पर उन्होंने कहा, “धारा 3(सी) के तहत बिना जाँच के संपत्ति वक्फ नहीं रह जाती। कोई ज्यूडिशियल प्रक्रिया नहीं है। वक्फ बनाने वाले को कोर्ट जाना पड़ता है और तब तक संपत्ति का दर्जा बदल जाता है। यह अनुच्छेद 25, 26 और 27 का उल्लंघन है।”
  • 5 साल तक इस्लाम का अभ्यास करने की शर्त पर सिब्बल ने तंज कसते हुए कहा, “मुझे यह साबित करना होगा कि मैं 5 साल से मुस्लिम हूँ। कौन तय करेगा कि मैं मुस्लिम हूँ? अगर मैं मरने से पहले वक्फ बनाना चाहूँ, तो क्या मुझे 5 साल इंतजार करना होगा? यह अपने आप में असंवैधानिक है।”
  • गैर-मुस्लिमों को वक्फ बोर्ड में शामिल करने पर सिब्बल ने कहा, “पहले वक्फ बोर्ड में सभी मुस्लिम थे, अब 12 में से 7 गैर-मुस्लिम हो सकते हैं। यह धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप है और अनुच्छेद 25 और 26 का उल्लंघन करता है।” सिब्बल ने धारा 3(डी) और 3(ई) पर सवाल उठाया, “ये धाराएँ मूल बिल में नहीं थीं और जेपीसी में इन पर चर्चा नहीं हुई। यह प्रक्रियात्मक रूप से गलत है।”

राजीव धवन की दलीलें

राजीव धवन ने कहा, “यह कानून धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ है। ब्रिटिश काल में भी वक्फ की परिभाषा नहीं बदली गई। इस बड़े पैमाने पर वक्फ की अवधारणा को खत्म करने की क्या जरूरत थी? यह हर धर्म के लिए खतरा है।” उन्होंने जोड़ा, “यह कानून अनुच्छेद 25, 26 और 29 का उल्लंघन करता है। अनुच्छेद 29 संस्कृति संरक्षण का अधिकार देता है। इसे छीनने से धर्मनिरपेक्ष ढाँचा खत्म हो जाएगा।”

अभिषेक मनु सिंघवी की दलीलें

  • सुप्रीम कोर्ट में अपनी दलील पेश करते हुए अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा, “यह कानून मुस्लिमों को बार-बार दफ्तरों के चक्कर लगाने के लिए मजबूर करता है। यह आतंक पैदा करने की रेसिपी है।”
  • वक्फ-बाय-यूजर पर उन्होंने कहा, “वक्फ-बाय-यूजर ज्यादातर गैर-पंजीकृत होते हैं। इसे खत्म करना और 5 साल तक इस्लाम का अभ्यास साबित करने की शर्त केवल मुस्लिमों के लिए है। यह अनुच्छेद 15 का उल्लंघन है।”
  • धारा 3(डी) पर सिंघवी ने तर्क दिया, “यह धारा प्राचीन स्मारक अधिनियम को वक्फ कानून पर हावी करती है, जिससे 1991 के पूजा स्थल अधिनियम के तहत संरक्षित स्मारकों पर भी असर पड़ता है।”
  • सरकार के दावे का खंडन करते हुए उन्होंने कहा, “सरकार कहती है कि 2013 के बाद वक्फ संपत्तियों में 116% की वृद्धि हुई। यह वृद्धि नहीं, बल्कि डिजिटाइजेशन का नतीजा है।”

इस मामले में वकील चंदर उदय सिंह ने अपनी दलील में कहा, “पहले गैर-पंजीकरण की सजा सिर्फ मुतवल्ली पर जुर्माना था। अब 2025 के कानून में पूरी वक्फ संपत्ति ही खत्म हो जाती है।”

सीनियर एडवोकेट हुजेफा अहमदी की दलीलें

  • अहमदी ने कहा, “धारा 3(डी) का प्रभाव बहुत गंभीर है। यह पुरानी मस्जिदों को भी प्रभावित करता है। इसे तुरंत रोकना चाहिए।”
  • 5 साल की शर्त पर उन्होंने पूछा, “क्या कोई मुझसे पूछेगा कि मैं 5 बार नमाज पढ़ता हूँ या शराब पीता हूँ? प्रैक्टिसिंग इस्लाम का कोई स्पष्ट सिद्धांत नहीं है।”
  • धारा 107 और 108 पर अहमदी ने कहा, “ये धाराएँ पुरानी वक्फ संपत्तियों को रेट्रोस्पेक्टिव रूप से खत्म करती हैं। यह अनुच्छेद 15 का उल्लंघन है।”

केंद्र सरकार की तरह से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने रखा पक्ष

  • तुषार मेहता ने कहा, “कोर्ट ने तीन मुद्दों पर सुनवाई तय की थी, लेकिन याचिकाकर्ता कई अन्य बिंदु उठा रहे हैं। मैं अनुरोध करता हूँ कि सुनवाई इन्हीं तीन मुद्दों तक सीमित रहे।”
  • उन्होंने जोड़ा, “यह कानून वक्फ संपत्तियों के दुरुपयोग को रोकने और निजी व सरकारी संपत्तियों पर अतिक्रमण को खत्म करने के लिए है।” साथ ही उन्होंने जोड़ा कि वक्फ इस्लाम के पालन की आवश्यक शर्त नहीं है।
  • मेहता ने कहा, “17 अप्रैल को सरकार ने आश्वासन दिया था कि कुछ प्रमुख प्रावधान लागू नहीं किए जाएँगे। इसलिए कानून पर पूरी तरह रोक की जरूरत नहीं है।”

सुप्रीम कोर्ट ने की ये टिप्पणियाँ

सीजेआई गवई ने कहा, “किसी कानून को असंवैधानिक मानने के लिए बहुत मजबूत आधार चाहिए। कानून की संवैधानिकता की धारणा होती है।”

सिब्बल से पूछा, “पुराने कानून में पंजीकरण अनिवार्य था या स्वैच्छिक?” सिब्बल ने जवाब दिया, “1923 के कानून में ‘शैल’ शब्द था, लेकिन गैर-पंजीकरण की कोई सजा नहीं थी, सिवाय मुतवल्ली को हटाने के।”

प्राचीन स्मारकों पर सीजेआई ने कहा, “खजुराहो मंदिर में लोग प्रार्थना करते हैं, भले ही वह प्राचीन स्मारक है। क्या इससे प्रार्थना का अधिकार छिनता है?”

सुनवाई के दूसरे दिन केंद्र सरकार ने अपनी दलीलें विस्तार से रखीं

सुप्रीम कोर्ट में वक्फ मामले की दूसरे दिन बुधवार (21 मई 2025) को सुनवाई सुबह 12:15 बजे शुरू हुई। इस दिन केंद्र सरकार ने अपनी दलीलें विस्तार से रखीं। जिसमें केंद्र सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलीलें पेश की।

  • मेहता ने कहा, “यह कानून 1923 से चली आ रही वक्फ संपत्तियों के दुरुपयोग की समस्या को खत्म करने के लिए है। जेपीसी ने 36 बैठकों में 96 लाख प्रतिनिधित्वों को सुना और व्यापक चर्चा के बाद यह कानून पारित हुआ।”
  • धारा 3(सी) पर उन्होंने कहा, “धारा 3(सी) के तहत राजस्व अधिकारी केवल राजस्व रिकॉर्ड ठीक करते हैं। यह अंतिम निर्णय नहीं है। वक्फकर्ता ट्रिब्यूनल, हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकता है।”
  • मेहता ने जोड़ा, “धारा 3(सी) का फैसला सिर्फ पेपर एंट्री है। सरकार को स्वामित्व लेने के लिए टाइटल सूट दायर करना होगा।”
  • वक्फ-बाय-यूजर पर मेहता ने कहा, “वक्फ-बाय-यूजर को खत्म करने का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि बिना पंजीकरण के कोई संपत्ति वक्फ न बने। इससे निजी और सरकारी संपत्तियों पर अतिक्रमण रुकेगा।”
  • मजहबी अधिकारों पर मेहता ने तर्क दिया, “वक्फ इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं है। दान हर धर्म में होता है, लेकिन इसे अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं माना गया।”
  • गैर-मुस्लिमों को बोर्ड में शामिल करने का बचाव करते हुए उन्होंने कहा, “यह समावेशिता के लिए है। वक्फ संपत्ति, जैसे स्कूल या अनाथालय, गैर-मुस्लिमों के लिए भी हो सकती है।”
  • 5 साल की शर्त पर मेहता ने कहा, “शरिया कानून में निकाह, तलाक या वसीयत के लिए भी खुद को मुस्लिम साबित करना होता है। इस कानून में बस 5 साल की समय सीमा तय की गई है।”
  • पंजीकरण पर मेहता ने सिब्बल की दलील का खंडन किया, “यह कहना गलत है कि 1923 में पंजीकरण नहीं था। बंगाल वक्फ अधिनियम में भी वक्फ-बाय-यूजर था और पंजीकरण जरूरी था।”

याचिकाकर्ताओं की दलीलें

  • एक याचिकाकर्ता के वकील ने कहा, “वक्फ-बाय-यूजर को खत्म करना और गैर-पंजीकृत वक्फ को अमान्य करना धार्मिक और संपत्ति के अधिकारों का हनन है।”
  • सिब्बल ने दोहराया, “धारा 3(डी) और 3(ई) को बिना जेपीसी चर्चा के शामिल किया गया, जो प्रक्रियात्मक रूप से गलत है।”

कोर्ट की अहम टिप्पणियाँ

  • सीजेआई ने मेहता से पूछा, “क्या धारा 3(सी) के तहत सरकार अपने ही दावे का फैसला करेगी?” मेहता ने जवाब दिया, “राजस्व अधिकारी केवल रिकॉर्ड ठीक करते हैं, टाइटल का फैसला नहीं।”
  • कोर्ट ने कहा, “धारा 3(सी) के तहत संपत्ति का कब्जा तब तक नहीं लिया जा सकता, जब तक धारा 83 की प्रक्रिया पूरी न हो।”
  • सिब्बल की दलील पर सीजेआई ने कहा, “मेहता तकनीकी रूप से सही हैं कि 1923 में भी पंजीकरण का प्रावधान था।”

सुनवाई के तीसरे दिन की अहम दलीलें

वक्फ कानून को लेकर सुनवाई तीसरे दिन भी चली। गुरुवार (22 मई 2025) को सुनवाई सुबह 12:06 बजे शुरू हुई। इस दिन केंद्र सरकार और अन्य पक्षों ने अपनी दलीलें पूरी कीं, और कोर्ट ने कुछ अहम टिप्पणियाँ कीं।

केंद्र सरकार का पक्ष सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने रखा

  • मेहता ने अपनी दलील शुरू करते हुए कहा, “1923 के बाद से वक्फ संपत्तियों के दुरुपयोग की शिकायतें थीं। 1954 में एक और कानून आया। 1995 में नया वक्फ अधिनियम बना। लेकिन 2013 में धारा 40 ने वक्फ बोर्ड को असीमित अधिकार दे दिए, जिसके कारण निजी और सरकारी संपत्तियों पर अतिक्रमण बढ़ा।”
  • उन्होंने कहा, “लाखों की संख्या में शिकायतें थीं कि गांव के गांव वक्फ संपत्ति घोषित हो रहे हैं। निजी संपत्तियों को वक्फ बोर्ड हड़प रहा है। यह कानून उस दुरुपयोग को रोकने के लिए है।”
  • धारा 3(सी) पर मेहता ने दोहराया, “यह केवल राजस्व रिकॉर्ड को ठीक करने की प्रक्रिया है। अगर कोई विवाद है, तो कलेक्टर जांच करता है। यह अंतिम फैसला नहीं है। वक्फकर्ता ट्रिब्यूनल या कोर्ट जा सकता है।”
  • वक्फ-बाय-यूजर पर उन्होंने कहा, “वक्फ-बाय-यूजर की अवधारणा पुराने कानून में भी थी, लेकिन इसे और सख्त करना जरूरी था ताकि बिना दस्तावेज के संपत्तियां वक्फ न बनें।”
  • गैर-मुस्लिमों को बोर्ड में शामिल करने पर मेहता ने कहा, “वक्फ बोर्ड का काम धार्मिक नहीं, बल्कि धर्मनिरपेक्ष है। स्कूल, अस्पताल जैसी वक्फ संपत्तियां सभी के लिए होती हैं। गैर-मुस्लिमों को शामिल करना समावेशिता के लिए है।”
  • 5 साल की शर्त का बचाव करते हुए उन्होंने कहा, “यह शरिया कानून के हिसाब से है। वक्फ बनाने के लिए व्यक्ति को मुस्लिम होना चाहिए, और यह सुनिश्चित करने के लिए 5 साल की शर्त रखी गई है।”
  • मेहता ने जोड़ा, “यह कानून जेपीसी की 36 बैठकों और 96 लाख प्रतिनिधित्वों के बाद बनाया गया है। यह एक सोचा-समझा कदम है।”

अन्य पक्षों की दलीलें-

वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे (1995 के वक्फ अधिनियम को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ता की ओर से) कहा, “1995 के वक्फ अधिनियम के कई प्रावधान 2025 के संशोधन में भी हैं। सुप्रीम कोर्ट को दोनों कानूनों पर एक साथ विचार करना चाहिए। हाई कोर्ट की याचिकाओं को यहाँ लाने की जरूरत नहीं है।” उन्होंने जोड़ा, “अगर 100 साल पुरानी वक्फ संपत्तियाँ अब वक्फ नहीं रहेंगी, तो यह गंभीर समस्या है।”

के. परमेश्वर (याचिकाकर्ता की ओर से) ने कहा, “लिखित दलीलें पूरी याचिका की तरह हैं। हमें सभी मुद्दों पर बहस करने की इजाजत दी जानी चाहिए।” उन्होंने धारा 3(सी) पर कहा, “यह धारा संपत्ति का दर्जा बदल देती है बिना किसी ज्यूडिशियल प्रक्रिया के। यह गलत है।”

डॉ. जी. मोहन गोपाल (श्री नारायण मानव धर्मम ट्रस्ट की ओर से) ने कहा, “सभी पाँच मुख्य याचिकाएँ मुस्लिम पक्षों की हैं। इससे यह धारणा बनती है कि मामला ध्रुवीकृत है। गैर-मुस्लिम पक्षों को भी सुनना चाहिए।” उन्होंने जोड़ा, “यह कानून केवल मुस्लिमों के खिलाफ नहीं, बल्कि सभी धर्मों के लिए खतरा है।”

वरिष्ठ अधिवक्ता गुरु कृष्णकुमार (वक्फ बोर्ड) ने कहा, “धारा 32 कहती है, ‘वक्फ बोर्ड वक्फकर्ता (Waqif) की इच्छाओं के अनुसार काम करता है।’ धारा 96 और 97 भी इस पर चर्चा करती हैं, जो राज्य वक्फ बोर्ड और केंद्र सरकार के निर्देशों से जुड़ी हैं।”

वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायण ने कहा, “280 एएसआई (ASI) स्मारकों पर वक्फ दावा किया गया है। धारा 25(2)(ए) राज्यों को आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर कानून बनाने की अनुमति देती है।” उन्होंने कहा, “न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) पर एक नौ-सदस्यीय पीठ (Nine-Judge Bench) विचार कर रही है। श्रीर मठ (Shrur Mutt) मामला अंतरिम आदेश (Interim Order) पर प्रासंगिक है।”

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, “CEO (Chief Executive Officer) पहले मुस्लिम होना चाहिए था, लेकिन अब यह ‘Enabling Provision’ (सक्षम करने वाला प्रावधान) है। धारा 38 कहती है, ‘Executive Officer (Executive Officer) मुस्लिम होना चाहिए।'” उन्होंने कहा, “वक्फ बोर्ड संविधान के अनुच्छेद 12 (Article 12) के तहत ‘State’ (राज्य) है। इसमें ‘Community Restriction’ (समुदाय पाबंदी) नहीं है।”

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ

सीजेआई गवई ने कहा, “हमने पहले कहा था कि 1995 के वक्फ अधिनियम को चुनौती देने वाली याचिकाओं को इस मामले में नहीं सुना जाएगा। हम केवल 2025 के संशोधन पर ध्यान देंगे।”

  • धारा 3(सी) पर सीजेआई ने पूछा, “क्या कलेक्टर अपने ही दावे का फैसला करेगा?” मेहता ने जवाब दिया, “यह भ्रामक और गलत तर्क है। कलेक्टर केवल रिकॉर्ड ठीक करता है, स्वामित्व का फैसला नहीं।”
  • वक्फ-बाय-यूजर पर कोर्ट ने कहा, “अगर जामा मस्जिद जैसे स्मारक को वक्फ-बाय-यूजर के तहत मान्यता मिली है, तो उसे कैसे खत्म किया जा सकता है?”
  • गैर-मुस्लिमों को बोर्ड में शामिल करने पर कोर्ट ने पूछा, “क्या हिंदू धार्मिक ट्रस्ट में मुस्लिमों को शामिल किया जा सकता है?” मेहता ने जवाब दिया, “यह समावेशिता का सवाल है। वक्फ बोर्ड का काम धर्मनिरपेक्ष है।”
  • सिब्बल की दलील पर सीजेआई ने टोका, “आप कहते हैं कि मस्जिदों में चढ़ावा नहीं चढ़ता। मैं दरगाह गया हूँ और मैंने देखा है कि वहाँ भी चढ़ावा चढ़ाया जाता है।”

तीनों दिनों की सुनवाई में याचिकाकर्ताओं ने धार्मिक स्वतंत्रता और संपत्ति अधिकारों पर हमले की बात कही, जबकि सरकार ने इसे वक्फ मैनेजमेंट सुधारने का कदम बताया। कोर्ट ने अभी तक कोई अंतरिम आदेश नहीं दिया है और अगली सुनवाई 5 जून 2025 को होगी। यह मामला धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक पहलुओं से जुड़ा है, इसलिए सभी पक्षों की चिंताओं को संतुलित करना जरूरी है।

साउथ अफ्रीका के राष्ट्रपति को ट्रम्प ने किया जलील, व्हाइट हाउस में फोटो-वीडियो दिखा उठाया ‘श्वेत नरसंहार’ का मुद्दा:मौत-मौत चिल्लाए, रामाफोसा बोले- जाँच करवाऊँगा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति रामफोसा पर श्वेत नरसंहार का आरोप लगाया है। व्हाइट हाउस में ट्रंप और रामफोसा के बीच नोंकझोंक भी हुई। दक्षिण अफ्रीकी राष्ट्रपति का अमेरिका दौरा संबंधो को सुधारने के लिए किया गया था।

शुरुआत में तो दोनों राष्ट्रपति काफी दोस्ताना माहौल में बातचीत करते दिखे। लेकिन, खत्म होते-होते दोनों के बीच तनाव पैदा हो गया। अमेरिकी राष्ट्रपति ने अचानक श्वेत नरसंहार का मुद्दा उठाते हुए दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति पर आरोप लगाना शुरू कर दिया।

राष्ट्रपति ट्रंप ने वीडियो दिखाते हुए दावा किया कि दक्षिण अफ्रीका में श्वेत किसानों को मारा जा रहा है। शुरुआत में राष्ट्रपति रामफोसा शांत रहे लेकिन फिर वीडियो की प्रामाणिकता पर सवाल किया। उन्होने कहा कि वो इसकी जाँच करेंगे। लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप शांत नहीं हुए उन्होने कई रिपोर्ट की प्रतियाँ दिखाई। इनमें श्वेत नागरिकों की हत्या का जिक्र था। इस पर ट्रंप जोर- जोर से कहने लगे “मौत..मौत..” और फिर पेज पलटते हुए मारे गए श्वेत किसानों के फोटो की ओर इशारा करते हुए कहा- “ये दफन स्थल है।”

वीडियो में सफ़ेद क्रॉस दिखाए गए, जिसके बारे में ट्रम्प ने दावा किया कि ये श्वेत लोगों की कब्रें हैं। ट्रंप ने अफ्रीकी राष्ट्रपति से कहा कि विपक्षी नेता भड़काऊ भाषण दे रहे हैं। उन्होंने विपक्षी नेता जूलियस मालेमा को गिरफ़्तार किए जाने की माँग भी की।

यह वीडियो सितंबर 2020 में एक विरोध प्रदर्शन के दौरान बनाया गया था, जब एक हफ़्ते पहले उनके खेत पर दो लोगों की हत्या कर दी गई थी। क्रॉस वास्तविक कब्रों को चिह्नित नहीं करते थे। लेकिन दक्षिण अफ़्रीका सरकार के विरोधियों ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि वे उन किसानों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिन्हें वर्षों से मारा गया है।

श्वेत किसानों का जिक्र करते हुए ट्रंप ने फिर कहा, “हमारे पास ऐसे कई लोग हैं जिन्हें लगता है कि उन्हें सताया जा रहा है, और वे संयुक्त राज्य अमेरिका आ रहे हैं।”

उन्होंने कहा, “लोग अपनी सुरक्षा के लिए दक्षिण अफ्रीका से भाग रहे हैं। उनकी ज़मीन जब्त की जा रही है और कई केस ऐसे भी हैं जब उन्हें मार दिया गया है,”
ट्रंप के बगल में कुर्सी पर बैठे और संयमित रहते हुए रामफोसा ने उनके दावों का खंडन किया। उन्होंने कहा, “अगर अफ़्रीकनेर किसानों का नरसंहार हुआ होता, तो मैं शर्त लगा सकता हूँ कि ये तीनों सज्जन यहाँ नहीं होते,” रामफोसा ने गोल्फ़र एर्नी एल्स और रीटिफ़ गूसेन और अरबपति जोहान रूपर्ट का ज़िक्र करते हुए कहा, जो सभी श्वेत थे और जो कमरे में मौजूद थे। इससे ट्रम्प संतुष्ट नहीं हुए।

1994 में रंगभेद खत्म होने के बाद दक्षिण अफ्रीका और अमेरिका के रिश्तों में लगातार दुराव होता गया है। अभी दोनों देशों के रिश्ते काफी निचले स्तर पर हैं।

मंदिर ट्रस्टों के पास प्रॉपर्टी पर दावा करने का अधिकार नहीं, ना ही चलाते हैं अपनी ‘अदालत’, फिर भी वक्फ बोर्ड से हो रही तुलना: जानिए दोनों में क्या हैं अंतर, सुप्रीम कोर्ट में केन्द्र सरकार ने क्या बताया?

वक्फ कानून की संवैधानिकता को लेकर सुप्रीम कोर्ट में वर्तमान में सुनवाई चल रही है। इसी कड़ी में केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि वक्फ बोर्ड और हिन्दू धार्मिक न्यास (ट्रस्ट) अलग-अलग तरह की संस्थाएँ हैं और दोनों का काम भी भिन्न है। केन्द्र सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि दोनों की तुलना नहीं की जा सकती।

बुधवार (21 मई, 2025) को सुप्रीम कोर्ट में वक्फ कानून के संबंध में हुई सुनवाई के दौरान केन्द्र सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने यह दलीलें दी हैं। CJI बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच के सामने उन्होंने कहा कि वक्फ बोर्ड एक धर्मनिरपेक्ष संस्था है लेकिन मंदिरों के धार्मिक ट्रस्ट धार्मिक संस्थाएँ हैं।

वक्फ बोर्ड सेक्युलर – केन्द्र सरकार

SG तुषार मेहता ने कहा कि दान सभी धर्म के लोग करते हैं। उन्होंने कहा कि जैसे हिन्दू धर्म में दान है वैसे ही इस्लाम में वक्फ का जिक्र भी है। उन्होंने इसके बाद कहा कि लेकिन वक्फ इस्लाम का जरूरी हिस्सा नहीं है। उन्होंने इसके बाद वक्फ बोर्ड के कामों को गिनाते हुए इसे एक सेक्युलर (धर्मनिरपेक्ष) संस्था बताया।

उन्होंने कहा, “वक्फ बोर्ड के कामों पर एक बार नजर डालें। इसके काम वक्फ संपत्तियों का प्रबंधन, इनका ऑडिट और इनका लेखा जोखा रखना है ये पूरी तरह से सेक्युलर काम हैं।” उन्होंने इसके बाद वक्फ बोर्ड के नए क़ानून में दो गैर मुस्लिम सदस्यों की न्युक्ति को इस आधार पर सही बताया।

उन्होंने कहा, “अधिकतम दो गैर-मुस्लिम सदस्य होने से – क्या इससे कोई चरित्र बदल जाएगा? वक्फ बोर्ड किसी भी वक्फ की किसी भी धार्मिक गतिविधि को नहीं छू रहा है।” गौरतलब है कि वक्फ के नए कानून का विरोध करने वाले इसकी तुलना हिन्दू मंदिरों के लिए बनने वाले धार्मिक ट्रस्ट से कर रहे हैं।

इसको लेकर SG मेहता ने कहा, “हिंदू ट्रस्ट केवल धार्मिक गतिविधियों से संबंधित है जबकि वक्फ धर्मनिरपेक्ष गतिविधियों से संबंधित है। हिंदू ट्रस्ट के काम कई सारे हैं… हिंदू ट्रस्ट के आयुक्त मंदिर के अंदर जा सकते हैं। यहाँ पुजारी का फैसला राज्य सरकार करती है जबकि वक्फ बोर्ड धार्मिक गतिविधियों को बिल्कुल भी नहीं छूता।”

SG मेहता ने स्पष्ट किया कि हिंदू ट्रस्ट पूरी तरह से धार्मिक हैं। उन्होंने बताया कि यह ट्रस्ट जहाँ धार्मिक संपत्तियों के लिए ही बनते हैं तो वहीं वक्फ सम्पत्ति कोई मस्जिद, दरगाह, अनाथालय, स्कूल हो सकती है।

जानिए क्यों मंदिर बोर्ड और वक्फ में है अंतर

नए वक्फ कानून में मोदी सरकार ने प्रावधान किया है कि वक्फ बोर्ड में दो गैर-मुस्लिम सदस्य भी शामिल किए जा सकते हैं। इस कानून का विरोध करने वाले दलील देते हैं कि वक्फ सम्पत्तियाँ पूरी तौर से मुस्लिमों का निजी मसला हैं, इसलिए इन पर किसी फैसले और प्रबन्धन को लेकर गैर मुस्लिम कैसे दखल दे सकते हैं।

उन्होंने यह भी दलील सुप्रीम कोर्ट में दी है कि जहाँ वक्फ बोर्ड में दो गैर-मुस्लिम सदस्य शामिल करने की बात कही गई है वहीं मंदिरों का प्रबन्धन करने वाले बोर्ड या हिन्दू न्यासों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। उन्होंने इसे पक्षपात करार दिया है। हालाँकि, इस दलील में कई खामियाँ हैं।

गौरतलब है कि मंदिरों के प्रबन्धन के लिए बनाए जाने वाले बोर्ड का गठन सरकार करती है। इन बोर्ड में सरकारी अधिकारी और कुछ और व्यक्ति नियुक्त किए जाते हैं। यह मंदिर के कामकाज को देखते हैं। इनका अधिकार क्षेत्र मंदिर के कामकाज तक ही होता है।

मंदिर ट्रस्ट, वक्फ बोर्ड की तुलना में ना किसी सम्पत्ति पर अपनी तरफ से दावा ठोंक सकते हैं और उनके पास अपना कोई ट्रिब्यूनल होता है। वक्फ बोर्ड के पास अब तक यह शक्तियाँ भी थीं। यहाँ तक कि वह किसी सम्पत्ति को अपना बता कर सरकारी एजेंसियों से उस पर कब्जा दिलाने को कह सकता था।

वक्फ बोर्ड के खिलाफ यदि कोई व्यक्ति अपील करता तो उसे वक्फ ट्रिब्यूनल में जाना पड़ता। इसके उलट मंदिर बोर्ड ना ऐसा कोई दावा ठोंक सकते थे, ना वह सरकारी एजेंसियों को इससे सम्बन्धित कोई आदेश दे सकते थे। उनका अपना कोई ट्रिब्यूनल भी नहीं होता था।

इसके अलावा आर्थिक मामलों में भी मंदिर बोर्ड को उतने अधिकार नहीं होते हैं। मंदिरों में आने वाला सारा दान का पैसा इन ट्रस्ट के जरिए सरकार के पास जाता है। वक्फ बोर्ड के जरिए इन संपत्तियों से आने वाला पैसा वापस मुस्लिमों के हित के लिए लगाया जाता है। इसके लेखाजोखा में भी गड़बड़ रहती है।

ऐसे में इन दोनों की तुलना एकदम ठीक नहीं है। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि शायद ही ऐसा कोई मामला सामने आया हो जहाँ किसी मंदिर बोर्ड ने किसी गाँव की पूरी जमीन पर दावा ठोंक दिया हो। लेकिन वक्फ बोर्ड यह भी कर चुका है। मंदिर बोर्डों के कभी गैर हिन्दुओं को परेशान करने के मामले भी सामने नहीं आए।

ऐसे में यह दलील देने वाले लोग मात्र धार्मिक सिरा खोज कर वक्फ कानून में कमियाँ ढूंढ रहे हैं। हालाँकि केन्द्र सरकार लगातार इस मामले में सुप्रीम कोर्ट सभी बातों का जवाब दे रही है।

लव जिहाद को झुठलाने वाले ‘द वायर’ का पत्रकार निकला ‘लव जिहादी’, सालों से कर रहा था रेप-बीफ खाने को किया मजबूर: हिंदू पाटर्नर ने उतार दिया उमर राशिद का ‘सेकुलर’ नकाब

प्रोपेगेंडा चलने वाला पोर्टल ‘द वायर’ हमेशा से यह कहता आया है कि ‘लव जिहाद’ जैसे कोई बात दुनिया में है ही नहीं। अब उसी के एक पत्रकार उमर रशीद पर एक हिंदू महिला ने रेप, मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना और बीफ खिलाने समेत कई गंभीर आरोप लगाए हैं।

तथाकथित प्रोग्रेसिव और लिबरल पत्रकार उमर रशीद द वायर में पॉलिटिकल जर्नलिस्ट है। उसे लेकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर हिंदू महिला ने अपने दर्द को शब्दों में बयां किया है। इस पोस्ट को पढ़कर उमर रशीद के मानसिक स्तर और जाहिलियत का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।

पोस्ट में महिला ने बताया कि दिल्ली में कुछ लिबरल मीडिया सर्कल्स से जुड़ाव और अनुभवी पत्रकार के तौर पर वह उमर राशिद के जाल में फँस गई। शुरुआत में राशिद ने ‘प्रोग्रेसिव पॉलिटिक्स’ और ‘लोधी गार्डन’ में टहलने के बहाने उसे अपने जाल में फँसाया।

महिला ने लिखा कि उमर राशिद ने इसी तरकीब के जरिए कई महिलाओं को अपने जाल में फँसाया है। इस दौरान वह अपनी उस झूठी छवि को महिलाओं के सामने लेकर आता है जिसमें वह ऐसा मुस्लिम है जिसे पालतू जानवर पस्द हैं, भोजन पसंद है, जो प्रोग्रेसिव लिबरल है और जिसने अपनी माँ को खो दिया है।

महिला ने उमर रशीद को एक ‘सीरियल एब्यूजर’ और ‘बालात्कारी’ का तमगा देते हुए लिखा है कि उसे बुरी तरह पीटा जाता था। उमर राशिद ने उसे लात, घूँसे, थप्पड़ मारे हैं और कई बार बर्बरतापूर्वक बलात्कार किया है।

अपने रिलेशनशिप के दौरान उसे उसे हद से ज्यादा यौन उत्पीड़न, दुर्व्यवहार, मारपीट और बर्बर्तापूर्ण बलात्कार का सामना करना पड़ा। इसके कारण जिससे उसका खून बहा और चोटें आईं।

पीड़ित हिंदू महिला ने यह भी कहा की उमर राशिद ने कभी भी सुरक्षित सेक्स नहीं किया। रशीद के कई अनजान लोगों से भी शारीरिक संबंध थे। इस वजह से महिला को कई बार स्त्री रोग विशेषज्ञ के पास जाकर अबॉर्शन करवाने पड़े और सेक्शुअली ट्रांसमिटेड इनफेक्शन (STI) का इलाज करवाना पड़ा।

महिला ने आगे लिखा कि राशिद को पता था कि महिला आर्थिक तौर पर मजबूत नहीं है और संघर्ष कर रही है। इसके बावजूद उसने महिला की सारी चीजों को तोड़ दिया। इनमें से कई चीजें उसके घर से मिली निशानियाँ भी थी जिसे वह कभी भी खोना नहीं चाहती थी।

वह उसे बुरी तरीके से बेइज्जत करता था और उसे पाँव पड़कर माफी माँगने पर मजबूर कर देता था। इस दौरान वह उसकी माँ के साथ भी किस तरह रेप करेगा इसके बारे में बोलता था।

महिला ने लिखा कि उसके बीमार होने, असुरक्षित सेक्स के लिए ‘न’ कहने के बावजूद उमर ने कई बार उसका बर्बर्तापूर्वक रेप किया। यहाँ तक कि खुद को बचाने के लिए वह बाथरूम में छिपती थी।

महिला ने आगे लिखा कि उमर राशिद ने उसे कई बार बीफ खाने के लिए मजबूर किया जबकि वह नहीं खाती थी। हर बार जब वह उसे जबरदस्ती बीफ खिलाता था तो उसे उल्टी हो जाती थी। राशिद खुद को कश्मीरी मुस्लिम होने और उसे ‘गैर-मुस्लिम’ होने पर उलाहना देता था।

महिला ने अपनी पोस्ट को साप्रदायिक रंग न देने की अपील की है। उसने लिखा कि वह नहीं चाहती कि उसके साथ हुई घटना को ‘सांप्रदायिक रंग’ दिया जाए, बल्कि इसे उन अनगिनत कहानियों में से एक के तौर पर देखा जाना चाहिए, जिसमें महिलाएँ कार्यस्थल पर संपर्क में आने वाले अधिक उम्र के और ताकतवर पुरुषों के दुर्व्यवहार और उत्पीड़न का शिकार होती हैं।

द वायर ने अपने पत्रकार के खिलाफ आरोपों को स्वीकारा

प्रोपेगेंडा वेबसाइट ‘द वायर’ ने अपने पत्रकार उमर राशिद पर लगे गंभीर आरोपों को स्वीकार किया है। द वायर द्वारा साझा किए गए नोट में लिखा है, “उमर राशिद पिछले कुछ वर्षों से स्वतंत्र पत्रकार के रूप में द वायर में योगदान दे रहे हैं। उन पर लगे आरोपों को संस्थान ने गंभीरता से लिया है। इस मामले में लागू प्रासंगिक कानूनों और प्रक्रियाओं के अनुसार हम जाँच करेंगे और तय करेंगे कि पोस्ट पर लगाए गए आरोपों पर आगे क्या कार्रवाई की जा सकती है।”

गौरतलब है कि कई वर्षों से ‘द वायर’ और इसी तरह के अन्य वामपंथी प्रोपेगेंडा पोर्टल ‘लव जिहाद’ के उन मामलों को सिरे से नकार देते हैं, जहाँ मुस्लिम पुरुष एक झूठी पहचान के साथ हिंदू या ईसाई महिलाओं को अपना निशाना बनाते हैं और बाद में उन्हें शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न, अपमान, बलात्कार और हिंसा का शिकार बनाते हैं।

इस मानसिकता के पीछे वह इस्लामी सोच है जिसके मुताबिक गैर मुस्लिम महिलाएं यानी काफिर सेक्स स्लेव बनाने के योग्य हैं। ऐसी सोच वाले मानते हैं कि काफिर महुलाओं का यौन शोषण करना मुस्लिम मर्दों का दायित्व है और इससे सवाब मिलता है।

भारत सहित पूरी दुनिया में हजारों की तादाद में महिलाएँ इस सोच की शिकार रही हैं। ब्रिटेन में ग्रूमिंग गैंग इस मामले में खास कुख्यात रहा। यहाँ यजीदी महिलाओं को यौन दासी बनाने का मामला भी खासा चर्चित रहा है।

भारत में भी अजमेर गैंगरेप और ब्लैकमेल मामले काफी लंबे समय तक सुर्खियाँ में रहे। केरल में तो यह एक संगठित रूप से चलाई जाने वाला अभियान है जिसमें हिंदू और ईसाई महिलाओं को इसका निशाना बनाया जाता है।

अफसोस की बात है कि आज की आधुनिक माने जाने वाली दुनिया में भी इस तरह की मध्यकालीन पार्श्विक मानसिकता घर किए हुए हैं और द वायर जैसे वामपंथी संगठन ऐसी मानसिकता को खारिज करना तो दूर उलटे उसे बढ़ावा देने में आगे रहते हैं।

‘मक़सूद खान जिम में मिला, मेरी पत्नी को फँसा कर ले गया’: इंदौर के दिनेश ने सुसाइड नोट लिख कर खाया जहर, फिर बनाई वीडियो

इंदौर के एरोड्रम इलाके में पत्नी के धोखा देने और जिम जाने के बहाने मकसूद खान से मिलने के दुखी पति दिनेश मिश्रा ने जहर खाकर अपनी जान देने की कोशिश की। पति दिनेश मिश्रा को नजदीक के अस्पताल में भर्ती कराया गया है जहाँ उसकी हालत गंभीर है। दिनेश ने जहर खाने से पहले सुसाइड नोट लिखा और फिर रोते हुए वीडियो में अपनी हालत की जानकारी दी।

अपने सुसाइड नोट में दिनेश ने लिखा है कि उसकी पत्नी जब जिम जाती थी तो वहीं पर मुस्लिम युवक मकसूद खान ने उसे ‘लव जिहाद’ में फँसा लिया। पत्नी उससे रोज मिलती थी और जरूरत पड़ने पर पैसे भी देती थी। दिनेश ने कहा है कि इसके सबूत उसके पास मौजूद हैं क्योंकि कई बार ऑनलाइन पेमेंट किया गया है।

दिनेश ने सुसाइड नोट में लिखा है कि जब वो काम के सिलसिले में घर से बाहर जाता था तो देर रात भी उसकी पत्नी निकल जाती थी। उसने वीडियो फुटेज के रूप में सबूत के होने की बात भी कही है। दिनेश के मुताबिक वह घर पर रहता था तो पत्नी कमरे से उसे निकाल कर मकसूद खान से बात करती थी।

तंग आकर उसने पुलिस से मदद लेनी चाही, लेकिन उसे मदद नहीं मिली। वह थाने में गया और अपनी पूरी कहानी सुनाई लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। अंत में खुद ही पत्नी की छानबीन करने लगा और शहर के 100 से ज्यादा सीसीटीवी फुटेज खंगाले। इस दौरान उसे मकबूल खान का पता चला।

दिनेश ने ये भी दावा किया है कि 10 साल तक वो काफी सहन करता रहा है। शादी के बाद जब बच्चा छोटा था तो पत्नी मायके गई थी और देर रात तक किसी से फोन पर बात करती रहती थी। पति दिनेश ने जब उसकी फोन डीटेल निकाली तब इसका पता चला। उस वक्त भी वह पत्नी को छोड़ना चाहता था लेकिन बच्चे के छोटा होने की वजह से कमजोर पड़ गया।