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‘मक्का में मंदिर बनाएँगे’: अब्दुल ने किया फर्जी फेसबुक पोस्ट, ईशनिंदा में सऊदी में गिरफ्तार हुए हरीश; 2 साल बाद लौटेंगे घर

ईशनिंदा के आरोप में दिसंबर 2019 से सऊदी अरब की जेल में बंद कर्नाटक के निवासी हरीश बांगेरा आखिरकार आजाद होकर वापस अपने घर आने वाले हैं। मंगलुरु एसोसिएशन सऊदी अरेबिया (MASA) के अध्यक्ष सतीश कुमार बाजल ने इसकी जानकारी दी। बांगेरा को सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और इस्लामिक तीर्थस्थल मक्का को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी करने का गलत आरोप लगाकर गिरफ्तार किया गया था।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, मूदाबिदरी के रहने वाले दो भाइयों अब्दुल हुएज और अब्दुल थुएज ने हरीश बांगेरा के नाम से फेसबुक पर फर्जी एकाउंट बनाया था और उससे सऊदी अरब के प्रिंस और मुस्लिमों के तीर्थ मक्का के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियाँ की। इसके बाद हरीश को दिसंबर 2019 में पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। हालाँकि, बाद में अक्टूबर 2020 में अब्दुल भाइयों को भी गिरफ्तार कर लिया गया था।

हरीश बांगेरा कर्नाटक के कुंदापुर के रहने वाले हैं जो सऊदी अरब में एसी मकैनिक का काम करते थे। 21 दिसंबर 2019 को हरीश के नाम से चलाए जाने वाले एकाउंट से इस्लाम और सऊदी अरब के प्रिंस के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी की गई थी। ऐसी ही एक पोस्ट में मक्का की तस्वीर पोस्ट की गई और साथ में कैप्शन दिया गया, “अगला राम मंदिर मक्का में होगा। लड़ाई के लिए तैयार हो जाओ।” इसके अलावा भी फोटो पोस्ट की गई थी।

हरीश के नाम से बने फेक फेसबुक एकाउंट से किया गया पोस्ट
हरीश के नाम से बने फेक फेसबुक एकाउंट से किया गया पोस्ट

जैसे ही यह पोस्ट वायरल हुई, तुरंत कार्रवाई करते हुए हरीश के खिलाफ मामला दर्ज किया गया और सऊदी अरब पुलिस ने कुछ घंटों के अंदर ही हरीश को गिरफ्तार कर लिया। इसके अलावा, हरीश को नौकरी से भी निकाल दिया गया। इधर हरीश की पत्नी ने भी उडुपी पुलिस स्टेशन में हरीश के निर्दोष होने और उनके खिलाफ की गई साजिश की आशंका के चलते शिकायत दर्ज कराई।

बाद में इस मामले में जाँच करने पर यह पता चला कि अब्दुल हुएज और अब्दुल थुएज ने 19 दिसंबर 2019 को फेसबुक में हरीश के नाम से फर्जी एकाउंट बनाया और दो दिन बाद उस एकाउंट से आपत्तिजनक पोस्ट कर दिए। पुलिस ने वह मोबाईल फोन को भी ट्रेस कर लिया, जिसका इस्तेमाल फर्जी एकाउंट बनाने के लिए किया गया था। फोन अब्दुल थुएज के नाम पर रजिस्टर्ड था। पुलिस ने दोनों भाइयों को गिरफ्तार कर लिया।

पुलिस ने अब हरीश के नाम पर फर्जी फेसबुक एकाउंट बनाने के लिए दोनों आरोपितों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है। पुलिस ने हरीश की रिहाई का आदेश प्राप्त करने के लिए सऊदी अधिकारियों के समक्ष विदेश मामलों के मंत्रालय और भारतीय दूतावास के माध्यम से चार्जशीट प्रस्तुत की है।

‘ताशकंद से लौट तिब्बत की निर्वासित सरकार को मान्यता देने वाले थे लाल बहादुर शास्त्री’: दलाई लामा की जीवनी से बड़ा खुलासा

क्या भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ताशकंद से नई दिल्ली लौटने के बाद दलाई लामा के समूह को ‘निर्वासित तिब्बत सरकार’ की मान्यता देने वाले थे? एक किताब से ये खुलासा हुआ है। वहीं ‘Dalai Lama, An Illustrated Biography‘ में 30 वर्षों तक दलाई लामा के प्राइवेट सेकेट्री रहे तेंजिन गेयचे तेथोंग ने लिखा है कि लाल बहादुर शास्त्री के ताशकंद से लौटने के बाद बड़ा फैसला होने वाला था।

‘Organiser’ की एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में बताया गया है कि पुस्तक के अनुसार, नई दिल्ली में दलाई लामा के प्रतिनिधि WD शाकाब्पा ने उन्हें लिखा था कि भारत सरकार ने तिब्बत की निर्वासित सरकार को मान्यता देने के लिए योजना तैयार कर ली है और प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के ताशकंद से लौटने के बाद इस पर घोषणा होगी। बता दें कि दलाई लामा खुद को लाल बहादुर शास्त्री का बड़ा प्रशंसक मानते हैं। उनकी शास्त्री के साथ मुलाकात भी हुई थी।

जवाहर लाल नेहरू के समय कैसे ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ का नारा दिया गया था और चीन ने पीठ में छुरा घोंपा था, ये सभी को याद है। तिब्बत पर संयुक्त राष्ट्र में हुई वोटिंग के दौरान भी भारत ने तब चीन का ही पक्ष लिया था। तेंजिन गेयचे तेथोंग (Tenzin Geyche Tethong) द्वारा दलाई लामा की जीवनी के रूप में लिखी गई पुस्तक ‘His Holiness the Fourteenth Dalai Lama – I am a son of India‘ में भी कुछ इसी तरह का दावा किया गया था।

इस पुस्तक में लिखा है कि तिब्बतियों को उम्मीद थी कि भारत सरकार दलाई लामा की सकरार को ‘तिब्बत की निर्वासित सरकार’ के रूप में मान्यता देगी, लेकिन जनवरी 1966 में रूस के ताशकंद में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के निधन के साथ ही ये उम्मीद भी नहीं रही। लेखक के अनुसार, इसके अगले कुछ वर्षों तक भारत लगातार इस कोशिश में लगा रहा कि चीन से कोई दुश्मनी न मोल ली जाए।

साथ ही उस समय की भारत सरकार नहीं चाहती थी कि निर्वासन में रह रहे तिब्बती नेता ऐसी किसी भी राजनीतिक गतिविधि में हिस्सा लें, जिससे चीन के नाराज़ होने की आशंका हो। साथ ही भारत सरकार ने दलाई लामा को भी ये कह दिया कि वो चीन के ‘कल्चरल रेवोलुशन’ (चीन के तत्कालीन प्रशासक माओ जेडोंग द्वारा चलाया जा रहा हिंसक अभियान) के विरुद्ध कुछ न कहें। इसके बाद दलाई लामा ने तब के केंद्रीय विदेश मंत्री स्वर्ण सिंह को पत्र लिखा।

17 सितंबर, 1966 को लिखे गए पत्र में उन्होंने अब तक मिले समर्थन के लिए भारत का आभार तो जताया, लेकिन साथ ही ये भी लिखा कि हमने अब तक ऐसी किसी भी गतिविधि में हिस्सा नहीं लिया है, जिससे सरकार को परेशानी या असुविधा हो। लेकिन, साथ ही उन्होंने पूछा था कि क्या वो अपनी इच्छा के अनुसार बयान भी नहीं दे सकते? उन्होंने याद दिलाया कि किस कदर तिब्बत के लोग भारत व यहाँ के नागरिकों पर निर्भर हैं।

1972 में स्वर्ण सिंह ने बयान दिया कि तिब्बत की संप्रभुता या आधिपत्य के मुद्दे पर चीन ही निर्णय लेगा। विदेश मंत्रालय के अधिकारी दलाई लामा से मिलने धर्मशाला तक आ पहुँचे, ताकि उन्हें 10 मार्च को वार्षिक बयान देने से रोका जाए। दलाई लामा ने कहा कि वो 1959 से हर साल बयान देते आ रहे हैं और अबकी न देने का अर्थ होगा चीन के सामने झुकना। लेकिन, 1977 में जनता पार्टी की सरकार आते सब कुछ बदल गया और इसके कई नेता तिब्बत से सहानुभूति रखते थे।

जुलाई 1977 में दलाई लामा और तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की मुलाकात काफी अच्छी रही। दलाई लामा ने उन्हें बताया कि कैसे तिब्बत व भारत की संस्कृतियाँ एक ही पेड़ की दो शाखाएँ हैं। उस सरकार के पितामह जयप्रकाश नारायण तिब्बत के समर्थक थे। अटल बिहारी वाजपेयी, राज नारायण और जॉर्ज फर्नांडिस जैसे नेता भी चीन के सामने झुकने वालों में न थे। पुस्तक में लिखा है कि केंद्रीय रक्षा मंत्री के रूप में भी जॉर्ज फर्नांडिस तिब्बत के बड़े समर्थक रहे।

दलाई लामा ने बताया था, “1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में उन्होंने बहादुरी से देश का नेतृत्व किया। उसी समय, वो दूसरी समस्याओं के समाधान के प्रति भी गंभीर थे। मैं निश्चित हूँ अगर वो ज़िंदा रहते तो भारत के विकास में बड़ा योगदान देते। वो सचमुच भारत की परंपरा के प्रतिनिधि थे। वो एक प्रतिबद्ध इंसान थे, महान थे। जब मैं उनसे मिला तो मैंने पाया कि उनके शरीर व दिमाग के बीच एक बड़ा अंतर है। वो एक ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने प्रतिष्ठा एवं सम्मान के साथ नेतृत्व करना सिखाया।”

लाल बहादुर शास्त्री पर पुस्तक लिख चुके अनुज धर ने इस खुलासे पर टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल सोवियत और भारत को ही पता था कि लाल बहादुर शास्त्री की मौत कैसे हुई। उन्होंने कहा कि ये मौत प्राकृतिक नहीं थी, सबूत ऐसा कहते हैं। उन्होंने कहा कि सोवियत की ख़ुफ़िया एजेंसी KGB को शक था कि उन्हें ज़हर दिया गया है, ऐसा उस समय की फाइलों में है। उन्होंने अंदेशा जताया कि शास्त्री की मौत का राज़ नेताजी सुभाष चंद्र बोस तक भी जा सकता है, लेकिन भारत के लोग ही इसे भूल गए।

IRS अधिकारी ने अरेंज मैरिज की वैधता पर उठाए सवाल, लोगों के दमदार जवाब से ट्वीट डिलीट, अकाउंट डिएक्टिवेट कर भागे

अरेंज मैरिज भारतीय संस्कृति का एक अहम हिस्सा है, जो समाज में आज भी ससम्मान प्रचलित है। अधिकतर युवा आज भी अपने माता-पिता की पसंद से ही अपना जीवनसाथी चुनना पसंद करते हैं। वहीं, भारतीय राजस्व सेवा के अधिकारी पीयूष थोराट ने हाल ही में ट्विटर पर अरेंज मैरिज की वैधता पर सवाल उठाया। इसको लेकर नेटिजन्स ने उन्हें करारा जवाब दिया है। इसके बाद खबर लिखे जाने तक उनका ट्विटर अकाउंट डिएक्टिव दिख रहा था।

लोगों की कड़वी प्रतिक्रिया के बाद पीयूष थोराट ने अपना ट्वीट डिलीट कर दिया। इसके बाद उनका ट्विटर अकाउंट भी निष्क्रिय दिखा रहा है। हटाए गए ट्वीट में थोराट ने सवाल किया था कि अरेंज मैरिज अभी भी कानूनी क्यों है?

पीयूष थोराट का डिलीट किया गया ट्वीट

पीयूष थोराट ने उन्हें ‘रि​ग्रेसिव’ कहते हुए आश्चर्य जताया कि ‘अरेंज मैरिज’ की व्यवस्था इतनी मजबूत कैसे बनी हुई है। जब किसी ने उन्हें बताया कि हर कोई इतना भाग्यशाली नहीं होता है कि उसे प्यार मिल सके तो थोराट ने कहा कि अगर प्यार नहीं मिल रहा है तो शादी क्यों करें?

हालाँकि, बाद में उन्होंने स्पष्ट किया कि यह एक अतिश्योक्ति के सिवा और कुछ नहीं था। उनका कहने का वह मतलब नहीं था, जो लगाया जा रहा है। वहीं, अरेंज मैरिज को लेकर उनके ये ट्​वीट नेटिजन्स को पसंद नहीं आए। इस पर नेटिजन्स ने उन्हें करारा जवाब दिया है। उन्होंने कहा कि अरेंज मैरिज करना, जहाँ माता-पिता की पसंद से हमारे लिए जीवनसाथी चुने जाते हैं, यह भी एक व्यक्तिगत पसंद हो सकती है।

ट्विटर यूजर @Dishasatra ने कहा कि वह एक अरेंज मैरिज पार्टनर की तलाश में हैं और इसे पिछड़ापन (regressive) बिल्कुल भी नहीं मानती हैं। कई लोगों ने यह भी कहा कि विवाह में सफलता का कोई निश्चित सूत्र नहीं है और इस तरह के विचारों को दूसरों पर थोपना भी उत्पीड़न के समान है।

नौकरशाह के इस ट्वीट के लिए भोपाल निवासी मिस्टर मिथुन ने भी सभी की ओर से माफी माँगी।

कुछ लोगों ने यह भी कहा कि नौकरशाहों में इस तरह की सोच अच्छे संकेत नहीं हैं।

2015 बैच के आईआरएस अधिकारी थोराट का मानना है कि समझदार लोग वही होते हैं, जो ‘नारीवादी, जाति-विरोधी, कम्युनिस्ट और लिबरल’ होते हैं।

थोराट शायद उन लोगों की पसंद को सही नहीं मानते हैं, जो अरेंज मैरिज का विकल्प चुनते हैं। वह चाहते हैं कि वे इसकी बजाय शादी ही न करें। ऐसे लोगों को जो अरेंज मैरिज के पक्ष में होते हैं, उन्हें वह लिबरल खेमे का नहीं मानते हैं।

टोक्यो ओलंपिक में ‘एंटी-सेक्स बेड’, जानिए क्या है खासियत: खिलाड़ियों को Covid से बचाने के लिए जारी हुआ ‘प्लेबुक’

जापान की राजधानी टोक्यो में 23 जुलाई 2021 से शुरू होने वाले ओलंपिक गेम्स में पूरी दुनिया से पहुँच रहे खिलाड़ियों और उनके साथ आने वाले कर्मचारियों (कोच एवं दूसरे स्टाफ) को Covid-19 के संक्रमण से बचाने के लिए आयोजक लगातार प्रयत्न कर रहे हैं। इसके लिए हाल ही में ‘प्लेबुक‘ जारी की गई है जिसमें ओलंपिक के लिए टोक्यो पहुँच रहे मेहमानों के लिए कई नियम-कायदे बताए गए हैं। साथ ही ओलंपिक आयोजकों ने खिलाड़ियों के बीच शारीरिक संबंधों को रोकने के लिए एक अनोखा तरीका भी अपनाया है। यह तरीका है, ‘एंटी-सेक्स बेड’।

23 जुलाई से टोक्यो में शुरू होने वाले समर ओलंपिक गेम्स में दुनिया भर से 90,500 मेहमान टोक्यो पहुँचेंगे जिसमें से 11,500 खिलाड़ी हैं और 79,000 कोच, सपोर्ट स्टाफ और अन्य कर्मचारी। आयोजकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है इन सभी को Covid-19 के संक्रमण से बचाने की। ऐसे में युवा खिलाड़ियों के शारीरिक संबंधों को रोकने की चुनौती भी आयोजकों के लिए महत्वपूर्ण है। इसके लिए ओलंपिक गेम्स के आयोजकों ने खेल गाँव में खिलाड़ियों के लिए ‘एंटी-सेक्स बेड‘ बनाए हैं। कार्डबोर्ड से बनाए गए इन बेड्स की खासियत है कि ये सिर्फ एक ही व्यक्ति का भार सह सकते हैं और किसी भी तरह की बड़ी हलचल होने पर टूट सकते हैं।

2016 ओलंपिक के पदक विजेता और अमेरिकी खिलाड़ी पॉल केलिमो ने इन ‘एंटी-सेक्स बेड’ की तस्वीरें अपने ट्विटर एकाउंट पर शेयर की और लिखा कि टोक्यो ओलंपिक खेल गाँव में खेल के अलावा ‘दूसरी परिस्थितियों’ को रोकने के लिए ये बेड लगाए गए हैं।

इसके पहले ओलंपिक आयोजकों द्वारा खेलों में भाग लेने वाले खिलाड़ियों को 160,000 से अधिक मुफ्त कंडोम दिए गए थे। यानी ओलंपिक में शामिल होने वाले 10,500 खिलाड़ियों में से प्रत्येक को लगभग 14 कंडोम देने की व्यवस्था की गई थी। हालाँकि यह परंपरा दुनिया भर में कोरोना वायरस फैलने से पहले के ओलंपिक गेम्स में अपनाई जाती रही है लेकिन आयोजकों ने पहले ही खिलाड़ियों को खेल गाँव में कंडोम के इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी। समिति ने घोषणा की थी कि खिलाड़ी इन कंडोम को याद के तौर पर अपने घर ले जा सकते हैं। उन्हें अपने देश में कदम रखने के बाद ही कंडोम का इस्तेमाल करना होगा।

इसके अलावा भी ओलंपिक गेम्स के लिए जारी की गई प्लेबुक में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने से लेकर रोज Covid-19 टेस्ट कराने की बात भी कही गई है। खिलाड़ियों और उनके साथ आने वाले लोगों को यह सलाह दी गई है कि उन्हें मास्क का इस्तेमाल करना होगा और साथ ही एक-दूसरे से किसी भी प्रकार का शारीरिक संपर्क रखने से बचना होगा। ओलंपिक गेम्स के इतिहास में पहली बार भाग लेने वालों को स्मार्टफोन रखना होगा जिसमें दो एप्लीकेशन इंस्टाल किए जाएँगे। एक एप्लीकेशन हेल्थ चेक करने वाला होगा और दूसरा एप्लीकेशन खिलाड़ियों को ट्रैक और ट्रेस करने के लिए। खिलाड़ियों को नियमित तौर पर अपना हेल्थ डाटा इन एप्लीकेशन के माध्यम से देना अनिवार्य है।

ओलंपिक आयोजकों के द्वारा जारी की गई इस प्लेबुक में बताए गए नियम-कायदों का उल्लंघन करने पर खिलाड़ियों समेत उनके स्टाफ कर्मचारियों के लिए कड़े जुर्माने का प्रावधान भी किया गया है। नियमों का उल्लंघन किए जाने पर खिलाड़ियों के लिए जुर्माने के साथ अयोग्य घोषित कर देने (disqualification) की बात भी कही गई है। हालाँकि टोक्यो ओलंपिक में इस बार दर्शकों को प्रतिबंधित किया गया है। पहले विदेशी दर्शकों को छोड़कर स्थानीय दर्शकों को कुछ छूटों के साथ अनुमति प्रदान की गई थी लेकिन बाद में यह निर्णय लिया गया कि इस बार ओलंपिक गेम्स बिना दर्शकों के ही आयोजित कराए जाएंगे।

हालाँकि आयोजकों के इन सब प्रयासों के बाद भी खिलाड़ियों के संक्रमित होने की खबर आई। ओलंपिक आयोजकों ने खेल गाँव में रह रहे दो खिलाड़ियों के Covid-19 से संक्रमित होने की पुष्टि की। इसके अलावा होटल में ठहरे हुए एक अन्य खिलाड़ी और ओलंपिक में भाग लेने आए एक अधिकारी के Covid-19 से संक्रमित होने की भी खबर आई। आयोजक समिति के रिकॉर्ड के अनुसार खेलों से जुड़े Covid-19 संक्रमण मामलों की संख्या बढ़कर 55 हो गई है।

दानिश सिद्दीकी पर लिबरल पाखंड को मिला ट्विटर का साथ, विरोधियों के ट्वीट को अपमानजनक’ और ‘उत्पीड़न’ बता, कर रहा है सेंसर

ट्विटर अब राजनीतिक राय (political opinion) को सेंसर करने के नए तरीके खोज रहा है। पक्षपातपूर्ण सेंसरशिप को प्लेटफॉर्म का सामान्य मानक बनाने के बाद, ट्विटर ने उन ट्वीट्स को सेंसर करने का फैसला किया है जो लिबरल पाखंड को उजागर करते हैं। ताजा उदाहरण मृत रॉयटर्स फोटो जर्नलिस्ट दानिश सिद्दीकी की तस्वीर को लेकर है।

16 जुलाई को ट्विटर यूजर योशा (यूजरनेम  @BlackDrug) ने अपने अकाउंट पर एक बातचीत का स्क्रीनशॉट शेयर किया, जिसमें उन्होंने ‘लिबरल बुद्धिजीवियों’ के पाखंड की ओर इशारा किया। उन्होंने द इंडिपेंडेंट के पत्रकार स्तुति मिश्रा के ट्वीट का इस्तेमाल यह बताने के लिए किया कि कैसे लिबरलों ने दावा किया कि सिद्दीकी की लाश की तस्वीर भावनाओं को आहत करेगी, लेकिन राजनीतिक लाभ हासिल करने के लिए अंतिम संस्कार की तस्वीरों का उपयोग करने से पहले सोचने की जरूरत नहीं है।

योशा ने अपने ट्वीट में इन दो स्क्रीनशॉट का इस्तेमाल किया था:

Twitter engages in censorship over Danish Siddiqui
स्तुति मिश्रा ने अपने ट्वीट में चिताओं की तस्वीरों को शेयर किया था
Twitter engages in censorship over Danish Siddiqui
स्तुति मिश्रा का कहना है कि दानिश सिद्दीकी की तस्वीर अपमानजनक है

शुरुआत में, स्क्रीनशॉट को ‘संवेदनशील मीडिया’ का लेबल दिया गया था।

Twitter engages in censorship over Danish Siddiqui
सेंसर किया गया ट्वीट

लेकिन 18 जुलाई को योशा को ट्विटर की तरफ से सूचित किया गया कि उनके ट्वीट ने ‘दुर्व्यवहार और उत्पीड़न’ नियमों का उल्लंघन किया है। ट्विटर के अनुसार, योशा ‘लक्षित उत्पीड़न’ (targeted harassment) में शामिल थीं। नतीजतन, उसका अकाउंट 12 घंटे के लिए लॉक कर दिया गया।

योशा का अकाउंट 12 घंटे के लिए लॉक कर दिया गया है

प्लेटफॉर्म लोगों को उन ट्वीट्स को हटाने के लिए मजबूर कर रहा है जिनमें उन्होंने योशा द्वारा किए गए उपरोक्त ट्वीट को उद्धृत किया था। इसके लिए 18 जुलाई को पत्रकार के अकाउंट को लॉक कर दिया गया।

जैसा कि देखा जा सकता है, ट्वीट में कोई तस्वीर नहीं थी और इसमें केवल चार शब्द थे। ट्विटर ने दावा किया कि एक ट्वीट जिसमें कोई तस्वीर नहीं थी, ‘किसी व्यक्ति की मृत्यु के क्षण को दर्शाने वाले मीडिया पोस्ट करने के खिलाफ नियमों’ का उल्लंघन करता है। हो सकता है कि उसने यह ट्वीट योशा द्वारा ट्वीट किए गए तस्वीरों को लेकर किया हो लेकिन यह उनके ट्वीट को ‘दुर्व्यवहार और उत्पीड़न’ नियमों का उल्लंघन बता कर अकाउंट को लॉक किया गया था, न कि मृत शरीर की तस्वीरों से संबंधित नियमों को लेकर।

इस पत्रकार के अकाउंट पर जिन नियमों का उल्लंघन करने का दावा किया गया था, वे विचित्र हैं और 2019 से मौजूद हैं। नियमों के अनुसार, प्लेटफॉर्म उस मीडिया को हटा सकता जो ‘मृतक की पीड़ा का आनंद लेता है’, हँसता है या मृतक का मजाक उड़ाता है’।

साभार: Twitter

लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि एक ट्वीट जिसमें कोई तस्वीर नहीं है, वह विशेष रूप से तस्वीर वाले ट्वीट्स के नियम का उल्लंघन कैसे करेगा। यह उदाहरण ट्विटर सेंसरशिप में बड़े प्रसार का प्रतीक है। प्लेटफॉर्म ने मूल रूप से लिबरल पाखंड को उजागर करने वाले ट्वीट्स को सेंसर करने का फैसला किया है। अब, प्लेटफॉर्म न केवल लिबरलों को उनके प्रोपेगेंडा के लिए व्यापक पहुँच हासिल करने में सहायता करता है, बल्कि वे उन लोगों को चुप भी करा देता है जो उनके एजेंडे को उजागर करता है। यह राजनीतिक सेंसरशिप है।

उल्लेखनीय है कि दानिश सिद्दीकी को तालिबान ने अफगानिस्तान के साथ संघर्ष के दौरान मार गिराया था। उनकी मृत्यु के बाद उनके शव की एक तस्वीर सोशल मीडिया पर प्रसारित होने लगी। पत्रकार चाहते थे कि तस्वीर को प्रसारित न करें, क्योंकि यह स्पष्ट रूप से अपमानजनक था।

ये वही लोग थे जिन्होंने राजनीतिक रोटियाँ सेंकने के लिए चिताओं की तस्वीरों को शेयर किया था। ऐसा प्रतीत होता है कि ट्विटर ने उनके पाखंड को उजागर करने वालों को सेंसर करके उनके हितों का ध्यान रखा है। यह इस तथ्य को और भी स्पष्ट करता है कि उनके यहाँ नियम नाम की कोई चीज नहीं है, क्योंकि वे व्यक्ति की राजनीतिक प्राथमिकताओं के आधार पर चुनिंदा रूप से लागू होते हैं। यह एक खतरनाक परिपाटी है।

AIMIM का ट्विटर हैंडल हैक, ओवैसी की जगह एलोन मस्क की तस्वीर: कई कोशिशों के बावजूद नहीं बदल पा रहे

हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी की राजनीतिक पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल मुस्लिमीन (AIMIM) का ट्विटर हैंडल हैक हो गया है। साथ ही असदुद्दीन ओवैसी की जगह एलोन मस्क की तस्वीर लगा दी गई है। खबर लिखे जाने तक ट्विटर हैंडल हैक ही था और अमेरिकी कारोबारी एलोन मस्क की तस्वीर लगी ही हुई थी। साथ ही इस हैंडल का नाम बदल कर भी ‘Ꭼꮮꮻɴ Ꮇꮜꮪꮶ’ कर दिया गया है।

AIMIM का ट्विटर हैंडल हुआ हैक

लोगों ने सोशल मीडिया में ये देख कर मजे भी लिए। एक यूजर ने लिखा कि कहीं AIMIM इसीलिए तो एलोन मस्क नहीं बन गया है, ताकि वो देख सके कि धरती गोल है या फिर चपटी। इस ट्विटर हैंडल से AIMIM का चुनाव चिह्न और नाम भी डिलीट कर दिया गया है। कार्यकर्ता कुछ समझ नहीं पा रहे हैं कि ऐसा कैसे हुआ। इस हैंडल के प्रबंधकों का कहना है कि कई कोशिशों के बावजूद अब वो इसे बदल नहीं पा रहे हैं।

पार्टी की ओर ने अब ट्विटर को अकाउंट हैक होने की सूचना दे दी गई है और इसे वापस पाने के लिए मदद माँगी गई है। बता दें कि स्पेक्सएक्स और टेस्ला जैसी कंपनियों के मालिक एलोन मस्क दुनिया के शीर्ष अरबपतियों की सूची में आते हैं। AIMIM का ट्विटर हैंडल रविवार (18 जुलाई, 2021) को हैक हुआ। हालाँकि, इस हैंडल का यूजरनेम अब भी ‘@aimim_official’ ही है। ट्विटर पर इस हैंडल के 6.78 लाख फॉलोवर्स हैं।

राजस्थान में नाबालिग से गैंगरेप: पुलिस रिपोर्ट से जिन 3 का नाम ‘गायब’, उन लोगों ने फिर से किया रेप… सगाई टूटी

राजस्थान में दुष्कर्म का मामला थम नहीं रहा है। अब प्रदेश के सिरोही से शर्मसार करने वाला मामला सामने आया है। सिरोही जिले के माउंट आबू थाना क्षेत्र में नाबालिग के साथ सामूहिक दुष्कर्म की घटना दु:खद और हैवानियत की हदें पार करने वाली है। पीड़िता के साथ दुष्कर्म होने के बावजूद भी पुलिस द्वारा लापरवाही बरती गई और रिपोर्ट दर्ज नहीं की गई, जिसके कारण दरिंदों के हौसले और बुलंद हो गए और उन्होंने घटना के 9 दिन बाद वापस 4 दिन तक पीड़िता के साथ दुष्कर्म किया

घटना 6 जून 2021 की है। 17 साल की एक बच्ची को नशा करवा कर उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया। घटना वाले दिन पीड़िता टॉयलेट के लिए घर से निकली थी। इसी समय कुछ लड़कों ने स्कूटी पर बैठा कर उसका अपहरण कर लिया और फिर पावरहाउस ले जाकर वहाँ पर अन्य लड़कों के साथ मिलकर गैंगरेप किया। इसके बाद आरोपित उसे घर के पास छोड़ गए और धमकी दी कि अगर उसने किसी के सामने मुँह खोला तो उसके परिवार के साथ अच्छा नहीं होगा। जब आरोपितों ने दोबारा उसे धमकी देकर बुलाया तो उसने हिम्मत करके अपने माता-पिता को सारी बात बताई।

इसके बाद पीड़िता के पिता पुलिस में रिपोर्ट लिखवाने गए, मगर पुलिस ने उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया, रिपोर्ट लिखने से मना कर दिया। जब पीड़िता के पिता ने गुहार लगाई तो पुलिस ने आरोपितों का नाम कम करने के लिए कहा। जब पीड़िता के पिता ने सात की जगह चार नाम लिख कर दिया, तब कहीं जाकर रिपोर्ट दर्ज की गई… वो भी बस औपचारिकता के लिए, क्योंकि उस पर कार्रवाई नहीं की गई

पुलिस के ढीले रवैये से आरोपितों को हौसला बढ़ गया और उसने घटना के 9 दिन बाद ही 15 जून को फिर से पीड़िता को उसके घर के हैंडपंप के पास से उठा ले गए, जहाँ वह पानी भरने के लिए गई थी। उस दिन पीड़िता को जंगल में ले जाकर 4 दिन तक रेप किया गया। उसके साथ मारपीट की गई और अश्लील फोटो और वीडिया भी बनाए गए। 

अब इसी फोटो और वीडियो को वायरल करने की धमकी देकर पीड़िता के परिवार को डराया जा रहा है। पुलिस ने कार्रवाई के नाम पर 21 जून को मुख्य आरोपित मयूर, बंटी चौहान, कपिल और मुकेश को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया, जहाँ से उन्हें जेल भेजा गया। हालाँकि पुलिस अभी तक उस अश्लील फोटो और वीडियो को बरामद नहीं कर सकी है। पुलिस ने चार आरोपितों को गिरफ्तार किया, लेकिन धमकाने वाले तीन नामजद आरोपितों को अभी तक नहीं पकड़ा है। आरोपित धमकी दे रहे हैं – “पैसे लेकर समझौता कर लो, तुम किसको मारोगे, तुम एक हो, हम बीस-पच्चीस हैं।”

साभार: दैनिक भास्कर

माउंट आबू के एसएचओ सरोज बैरवा ने मामले पर कहा, “लड़की नशे की आदी है, खुद ही घर छोड़ कर बार-बार बाहर निकल जाती है। माँ बाप को भी पता नहीं होता। हम उस समय राज्यपाल की ड्यूटी में थे और किसी मीडिया वाले ने हम से इस संबंध में कुछ नहीं पूछा, ना हमने जानबूझकर आगे होकर बताना जरूरी समझा। क्योंकि मामला नाबालिग से जुड़ा था।” इसके साथ ही उन्होंने पीड़िता के पिता द्वारा आरोपितों से 15 लाख रुपए माँगे जाने वाली बात भी बताई।

इस पूरे मामले पर केंद्रीय जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने शनिवार (जुलाई 17, 2021) को राजस्थान की कानून-व्यवस्था को लेकर सरकार को निशाने पर लिया। केंद्रीय मंत्री ने तंज कसते हुए कहा कि राजस्थान के चारों तरफ एक अदृश्य दीवार है, जिसके कारण राजस्थान में हो रही घटनाओं को न राहुल गाँधी देख पा रहे हैं और न ही प्रियंका वाड्रा कुछ सुन पा रही हैं। 

हर दिन बहन-बेटियों की अस्मिता से खिलवाड़ के मामलों के प्रति गहलोत सरकार का उदासीन रवैया अब पुलिस कार्रवाइयों में भी साफ झलकने लगा है। करीब एक महीने तक मामले को दबाकर रखने वाली पुलिस अब पीड़िता और उसके परिवार पर दोषारोपण कर रही है। सरकार और पुलिस की शिथिलता अपराधियों के काम आ रही है, आरोपित पीड़ित परिवार को धमका रहे हैं। 

शेखावत ने कहा कि पीड़ित को प्रताड़ित करना गहलोत सरकार में आम बात हो चुकी है। ऐसी दयनीय सामाजिक और प्रशासनिक परिस्थितियों में राज्य की बेटियाँ सुरक्षित कैसे रह सकती हैं? इससे दुख की बात क्या हो सकती है कि जिस पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष और महासचिव महिलाएँ हैं, उसी के शासन में राजस्थान में नारी अस्मिता को तार-तार किया जा रहा है।

बता दें कि समाज ने पीड़िता को दोषी ठहराकर परिवार को बहिष्कृत कर दिया। उसकी सगाई भी टूट गई। उसके परिजन अभी भी डर के साये में जी रहे हैं, लेकिन प्रदेश की पुलिस राज्यपाल के दौरे में व्यस्त है।

‘मुनव्वर राना को खोज लेना चाहिए मकान, 2022 में योगी की वापसी तय’: शायर की ‘गीदड़भभकी’ पर BJP का जवाब

भाजपा ने मशहूर शायर मुनव्वर राना के यूपी में योगी की वापसी पर प्रदेश छोड़ने वाले बयान पर करारा जवाब दिया है। भाजपा प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने रविवार (18 जुलाई) को कहा, ”मुनव्वर राना को इस देश ने, प्रदेश ने बड़ा मान-सम्मान दिया। सिर-माथे पर बिठाया, लेकिन अब वो लगातार सियासी टिप्पणियाँ करने का काम कर रहे हैं और सियासत में भी मजहबी रंग बोलने का काम कर रहे हैं।”

त्रिपाठी ने कहा, ”उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के दोबारा चुने जाने पर मुनव्वर राना जिस तरह से प्रदेश छोड़ने की बात कर रहे हैं। तो अब उन्हें दूसरे राज्य में मकान खोज लेना चाहिए, क्योंकि 2022 में योगी की वापसी होने जा रही है।” उन्होंने कहा कि ऐसे में अगर मुनव्वर राना को कहीं दूसरा शहर पसंद आता है, तो निश्चित तौर पर वह देश में कहीं पर भी रहने के लिए आजाद हैं। भारत के संविधान ने यह आजादी दी है, लेकिन यह तय है कि उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ फिर वापस आ रहे हैं।

वहीं, उत्तर प्रदेश सरकार में पंचायत राज मंत्री चौधरी भूपेंद्र सिंह ने कहा कि मुनव्वर राना का यह बयान राजनीतिक बयान है और वह राजनीति से प्रेरित होकर यह बयान दे रहे हैं। उत्तर प्रदेश पूरी तरह से सुरक्षित है और अपराधियों खिलाफ यहाँ पर सख्त कार्रवाई की जा रही है।

दरअसल, मुनव्वर राना ने शनिवार (17 जुलाई 2021) को कहा, ”अगर औवेसी की मदद से यूपी में योगी आदित्यनाथ दोबारा मुख्यमंत्री बने तो मैं प्रदेश छोड़कर चला जाऊँगा। ये भी मान लूँगा कि ये राज्य मुसलमानों के रहने लायक नहीं है।”

गौरतलब है कि शायर ने इससे पहले मीडिया में कहा था कि बीजेपी और ओवैसी दोनों ऐसे पहलवान हैं जो सिर्फ जनता को और अन्य सियासी दलों को दिखाने के लिए लड़ रहे हैं, लेकिन मामला कुछ और ही है। उन्होंने कहा कि ये दोनों इसलिए लड़ रहे हैं ताकि वोटों का ध्रुवीकरण हो और मुस्लिम वोट ओवैसी खींच लें, ताकि अन्य सियासी दलों को इसका फायदा ना मिले और बीजेपी आसानी से चुनाव जीत ले जाए। अक्सर अपने विवादित बयानों को लेकर सुर्खियों में रहने वाले मुनव्वर राना का ताजा बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिससे यूजर्स खासा नाराज हैं।

बेटा है मोदी सरकार में मंत्री, माँ-बाप करते हैं खेतों में मजदूरी: मंत्री मुरुगन के पिताजी ने कहा- ‘स्वतंत्र जिंदगी पसंद’

कड़ी धूप में 59 साल की एल वरुदम्‍मल एक खेत से खर-पतवार निकाल रही हैं। लाल साड़ी, चोली के ऊपर सफेद शर्ट पहने और सिर पर लाल गमछा लपेटे वरुदम्‍मल गाँव में रहने वाली किसी आम महिला जैसी ही हैं। पास के ही एक दूसरे खेत में उनके पति 68 वर्षीय लोगनाथन जमीन समतल करने में लगे हैं। दोनों को देखकर यह अंदाजा बिल्‍कुल नहीं लगाया जा सकता कि वे एक केंद्रीय मंत्री के माता-पिता हैं। 

वरुदम्मल और लोगोनाथन का बेटा एल मुरुगन इसी महीने केंद्र में राज्‍यमंत्री बने हैं, ले ये दोनों अब भी खेतों में पसीना बहा रहे हैं। दोनों को अपने बेटे से अलग जिंदगी पसंद है। इन्हें अपना पसीना बहाकर कमाई रोटी खाना अच्‍छा लगता है।

जब शनिवार (जुलाई 17, 2021) को टाइम्‍स ऑफ इंडिया उनके गाँव पहुँचा तो भूस्वामी ने दोनों से बातचीत की इजाजत दे दी। वरुदम्‍मल हिचकते हुए आईं और बोलीं, “मैं क्‍या करूँ, अगर मेरा बेटा केंद्रीय मंत्री बन गया है तो?” अपने बेटे के नरेंद्र मोदी सरकार की कैबिनेट का हिस्‍सा होने पर उन्‍हें गर्व तो है, मगर वो इसका श्रेय नहीं लेना चाहतीं। उन्‍होंने कहा, “हमने उसके (करिअर ग्रोथ) लिए कुछ नहीं किया।”

खबर मिलने के बाद भी खेतों में डटे रहे

दलित वर्ग के अरुणथथियार समुदाय से आने वाले ये दंपत्ति नमक्‍कल के पास एजबेस्‍टस की छत वाली झोपड़ी में रहते हैं। ये कभी कुली का काम करते हैं तो कभी खेतों में, कुल मिलाकर रोज कमाई करने वालों में से हैं। बेटा केंद्रीय मंत्री है, इस बात से इतनी जिंदगी में कोई फर्क नहीं है। जब उन्‍हें पड़ोसियों से इस खबर का पता चला कि उनका बेटा केंद्रीय मंत्री बन गया है, तब भी खेतों में काम कर रहे थे।

बेटे पर नाज मगर खुद्दारी बरकरार

मार्च 2000 में जब मुरुगन को तमिलनाडु बीजेपी का प्रमुख बनाया गया था, तब वे अपने माता-पिता से मिलने कोनूर आए थे। मुरुगन के साथ समर्थकों का जत्‍था और पुलिस सुरक्षा थी मगर माता-पिता ने बिना किसी शोर-शराबे के बड़ी शांति से बेटे का स्‍वागत क‍िया। वे अपने बेटे की कामयाबियों पर नाज करते हैं मगर स्‍वतंत्र रहने की उनकी अपनी जिद है। पाँच साल पहले उनके छोटे बेटे की मौत हो गई थी, तब से वे बहू और पोतों की जिम्‍मेदारी सँभाल रहे हैं।

‘बेटे की लाइफस्‍टाइल में फिट नहीं हो पाए’

पिता के अनुसार, मुरुगन एक मेधावी छात्र थे। सरकारी स्कूल से स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद चेन्‍नई के अंबेडकर लॉ कॉलेज में बेटे की पढ़ाई के लिए लोगनाथन को दोस्‍तों से रुपए उधार लेने पड़े थे। मुरुगन बार-बार उनसे कहते कि चेन्‍नई आकर उनके साथ रहें। वरुदम्‍मल ने बताया, “हम कभी-कभार जाते और वहाँ चार दिन तक उसके साथ रहते। हम उसकी व्‍यस्‍त लाइफस्‍टाइल में फिट नहीं हो पाए और कोनूर लौटना ज्‍यादा सही लेगा।” मुरुगन ने केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होने के बाद माँ-बाप से फोन पर बात की।

उनके पास नहीं है अपनी जमीन, दूसरों के खेतों में करते हैं काम

भू-स्वामी ने बताया कि बेटे के केंद्रीय मंत्री बन जाने के बावजूद दोनों के बर्ताव में कोई बदलाव नहीं आया है। गाँव में ही रहने वाले वासु श्रीनिवासन ने कहा कि जब राज्‍य सरकार कोविड के समय राशन बाँट रही थी तो लोगनाथन लाइन में लगे थे। उन्‍होंने बताया, “हमने उससे कहा कि लाइन तोड़कर चले जाओ मगर वो नहीं माने।” श्रीनिवासन के मुताबिक, दोनों अपनी सादगी के लिए जाने जाते हैं। उनके पास जमीन का एक छोटा टुकड़ा भी नहीं है।

लोगनाथन और वरुदम्मल ने कहा कि वे अंतिम साँस तक अपने पैरों पर खड़े रहना चाहते हैं। उन्होंने कहा, “हमारा बेटा एक उच्च पद पर पहुँच गया है। माता-पिता के रूप में यही हमारे लिए काफी है।”

‘5 साल के पोते के सामने TMC के उस्मान ने किया रेप’: 60 साल की विधवा घर से दूर रह रहीं, मिल रही धमकियाँ

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद से ही हिंसा का जो दौर शुरू हुआ, वो अब भी शायद ही थमा है। इसी तरह की एक पीड़ित हैं कोलकाता की एक 60 वर्षीय महिला। वो महीने भर से भी अधिक समय से एक गेस्ट हाउस की पहली मंजिल पर एक कमरे में रह रही हैं, अकेले। मात्र एक बार बस वो मजिस्ट्रेट को बयान देने के लिए निकली थीं। हिंसा के दौरान उनका बलात्कार हुआ था।

अपने साथ हुई क्रूरता को याद कर के वो पूर्वी मेदिनीपुर स्थित अपने घर जाने से भी डरती हैं, जो 130 किलोमीटर दूर है। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने पीड़िता द्वारा सुप्रीम कोर्ट में डाली गई अपनी याचिका और पुलिस में दर्ज कराई गई शिकायत के हवाले से अपनी एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में जानकारी दी है कि 4-5 मई, 2021 की रात उनके साथ रेप हुआ था। आरोप है कि तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के गुंडे उनके घर में घुस गए थे।

पीड़िता का कहना है कि TMC के उन्हीं गुंडों में से एक ने उनके साथ बलात्कार किया, जबकि उनका 5 साल का पोता पास ही खड़े होकर सब कुछ देख रहा था। इतना ही नहीं, उन गुंडों ने उन्हें एक प्रकार का ज़हर खाने को भी मजबूर कर दिया था, जिसके बाद उन्हें एक महीने से भी अधिक समय अस्पताल में गुजारना पड़ा था। परिवार को अब भी धमकी मिल रही है कि वो रेप केस वापस ले लें, वरना ठीक नहीं होगा।

परिजनों का कहना है कि वो अपनी डेढ़ बीघा जमीन पर खेती करने के लिए जाने से भी डरते हैं, घर से बाहर तक नहीं निकलते। उनका कहना है कि सभी आरोपित TMC कार्यकर्ता हैं, जिनमें से 3 के साथ उनका जमीन का झगड़ा भी चल रहा है। पीड़िता का परिवार भाजपा समर्थक रहा है। भाजपा नेताओं ने भी इस मामले को उठाया है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की जाँच टीम पहले ही कह चुकी है कि बनर्जी की सरकार ने हिंसा होने दिया।

जबकि पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी का कहना है कि पीड़िता का दिमाग ठीक नहीं है और उन्हें जानबूझ कर भाजपा ने छिपा कर रखा है, ताकि आरोप लगाए जा सकें। परिजनों का कहना है कि घटना के 12 दिन बाद पीड़िता का मेडिकल टेस्ट हुआ था, जब वो ज़हर खिलाए जाने के कारण अस्पताल में इलाजरत थीं। इसके बाद भाजपा की मदद दे जून के दूसरे सप्ताह में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाली।

भाजपा सांसद स्वप्न दासगुप्ता और पश्चिम बंगाल में नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी ने भी इस मामले में न्याय की माँग की थी। इस मामले में मुहम्मद उस्मान और सुब्रत कुमार नाम के आरोपितों को गिरफ्तार किया गया था। पुलिस ने महिला को स्थानीय कोर्ट ले जाकर बयान दर्ज करवाया। गौतम दास और सुकांता दास नामक आरोपित अब भी फरार हैं। पीड़िता के दामाद का कहना है कि राज्य में अन्य जगहों की तरह यहाँ भी TMC की जीत के बाद पार्टी के गुंडे देशी बम व हथियार लेकर आ धमके थे।

उन्होंने आरोप लगाया कि उन गुंडों में से मुहम्मद उस्मान ने खटिये से बाँध कर उनकी सास का रेप किया। परिवार चुनाव परिणाम आने के बाद गुंडों के डर से घर छोड़ चला गया था, लेकिन जब लौटा तो उसके बाद गुंडे फिर आ गए और तब ये घटना हुई। 5 साल का बच्चा गुंडों से बेचने के लिए बिस्तर के नीचे छिपा हुआ था। अगस्त 2016 में पीड़िता के पति का देहांत हो गया था। परिवार का कहना है कि अधिकतर आरोपित उनके संबधी ही हैं।

पीड़िता को कुछ पड़ोसियों ने बेहोश पाया था, जिसके बाद सुबह के 5 बजे उन्हें अस्पताल ले जाया गया। प्राइमरी हेल्थ केयर ने हाथ खड़े कर दिए तो उन्हें जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया। बाद में भाजपा की मदद से एक प्राइवेट नर्सिंग होम और फिर कोलकाता में उनका इलाज हुआ। दामाद का आरोप है कि पुलिस FIR तक दर्ज करने से हिचक रही थी और मेडिकल टेस्ट में सहयोग नहीं किया गया।

कोलकाता के अस्पताल की मेडिकल रिपोर्ट कहती है कि महिला के प्राइवेट पार्ट्स में चोटें थीं और घुटना भी जख्मी हो गया था। आरोप वाले सेक्शन में लिखा है कि महिला का यौन शोषण हुआ और मुँह के माध्यम से उन्हें जबरन Organophosphates (केमिकल स्ट्रक्चर ‘O=P(OR)3‘) नामक ज़हर दिया गया। पीड़िता का कहना है कि वो अपने घर जाना चाहती हैं, लेकिन आशंका है कि उन पर फिर हमला होगा।

उनके कमरे की व्यवस्था भाजपा ने ही की है। पीड़िता ने कहा कि वो भाजपा की आभारी हैं, लेकिन भला कब तक इस तरह घर-परिवार से दूर रह सकती हैं। उन्होंने बताया कि 2016 के विधानसभा चुनाव के दौरान भी उनके व उनके पति को पीटा गया था। उनके पति कई दिनों तक घर से दूर रहे थे। पुलिस का कहना है कि उसकी वजह से मेडिकल टेस्ट में देरी नहीं हुई क्योंकि पीड़िता अस्पताल में थीं और डिस्चार्ज होकर अपने ओरिजिनल पते पर नहीं आईं।

पुलिस का कहना है कि पीड़िता नंदीग्राम चली गई थीं, जहाँ से बुला कर बयान दर्ज किया गया। पुलिस ने उन तीनों अस्पतालों से मेडिकल सैम्पल्स इकट्ठे किए, जहाँ महिला का इलाज हुआ था। पीड़िता का दामाद मजदूरी का काम करते हैं। उन्होंने बताया कि सुरक्षा की गुहार के बावजूद पुलिस शांत है। स्थानीय TMC नेता पार्थ प्रतीम ये मानते हैं कि सभी आरोपित उनकी पार्टी के हैं, लेकिन साथ ही कहते हैं कि आरोपितों में से एक की उम्र 70 साल है। उन्होंने पूछा कि इस उम्र का व्यक्ति यौन शोषण कैसे कर सकता है?