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राजस्थान के SDM भूपेंद्र यादव ने किसान को मारी लात, पुलिस ने दौड़ा-दौड़ा कर पीटा: देखें वायरल वीडियो

राजस्थान के जालोर जिले में एसडीएम द्वारा किसान को लात मारे जाने का वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है। SDM भूपेंद्र यादव ने नरसिंह राम चौधरी नाम के एक किसान को लात मार दी। इसके बाद घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। वायरल वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि किस तरह से एसडीएम अपनी लात से किसान को मार रहा है (जानबूझ कर “रहे हैं” नहीं लिखा गया है क्योंकि इससे सम्मान बढ़ता है और SDM भूपेंद्र यादव कम से कम इस घटना की रिपोर्ट में सम्मान के लायक नहीं)। इस घटना के बाद गुस्साए किसानों और पुलिस के बीच झड़प हो गई।

दोनों के बीच विवाद इतना बढ़ गया कि हाथापाई की नौबत आ गई। काफी कोशिशों के बाद पुलिस ने गुस्साए गाँव वालों को शांत कराया। दरअसल किसान भारत माला प्रोजेक्ट (Bharat Mala Project) के तहत मुआवजे की माँग कर रहे थे। अमृतसर से जामनगर की तरफ बनने वाले एक्सप्रेस-वे का काम गुरुवार (जुलाई 15, 2021) को ही शुरू हुआ था। इसी दौरान ग्रामीणों ने वहाँ पहुँच कर काम को रुकवा दिया।

जब एसडीएम भूपेंद्र यादव इसका मुआयना करने पहुँचा, तो एक किसान जेसीबी के आगे बैठ गया। इसी बीच एसडीएम एक अन्य किसान को उँगली दिखाते हुए उसकी ओर बढ़ गया। तभी एक ग्रामीण ने पुलिसकर्मी के हाथ से लाठी छुड़ाने की कोशिश की, तो एसडीएम ने उसे लात मार दी। इसके बाद वहाँ माहौल तनावपूर्ण हो गया।

SDM भूपेंद्र यादव लगा रहा ग्रामीणों पर हमले का आरोप

SDM का आरोप है कि ग्रामीण उस पर लाठी से हमला करने वाले थे, इसीलिए बचाव में उसने लात मारी। सांचौर पुलिस थाने में राजकीय कार्य में बाधा डालने को लेकर किसानों पर मामला दर्ज किया गया है। लात मारे जाने के बाद गुस्साए किसानों ने रात को ही गाँव में पंचायत की।  

SDM भूपेंद्र यादव ने वायरल वीडियो पर सफाई देते हुए कहा, “किसानों ने कार्य रुकवा दिया था, जिसको लेकर मौके पर पहुँचा। समझाइश कर रहे थे कि एक किसान ने मेरी तरफ लकड़ी उठा दी, बचाव में लात मारी। हाईकोर्ट का कोई स्टे तो आया हुआ नहीं है। पुलिस थाने में रिपोर्ट भी दी है।” वहीं कुछ मीडिया रिपोर्ट में बताया जा रहा है कि SDM भूपेंद्र कुमार यादव का राज्य सरकार ने देर रात तबादला कर दिया है।

क्यों प्रदर्शन के लिए उतरे हैं किसान?

गौरतलब है कि इलाके की एक्सप्रेस-वे बनाने के लिए जिस जमीन का अधिग्रहण किया जा रहा है, वहाँ बाजार दर करीब 10 लाख रुपए प्रति बीघा है। लेकिन इस जमीन के लिए डीएलसी दर- 45000 रुपए प्रति बीघा की दर से मुआवजा दिया जा रहा है। इसे लेकर किसान दो साल पहले हाईकोर्ट गए थे। तब यह मामला दो जजों की बेंच को ट्रांसफर किया गया था, लेकिन कोरोना के चलते अब तक सुनवाई आगे नहीं बढ़ पाई।

बताया गया है कि 90 फीसदी किसानों ने अभी तक मुआवजा लिया भी नहीं है। उधर एक्सप्रेस-वे का निर्माण करने जा रही कंपनी कोर्ट के फैसले तक नहीं रुकना चाहती। यह मामला बड़सम से गुजरात बॉर्डर तक 10 किमी के बीच का है। फैसले तक काम रोकने के लिए कंपनी नहीं मान रही है।

वीडियो सामने आने के बाद एसडीएम को ट्रोल किया जा रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया ने इस पर आपत्ति जताते हुए ट्वीट किया है और लिखा कि अन्नदाता के साथ ये कैसा व्यवहार हो रहा है? नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल ने भी एसडीएम की ओर से किसानों को लात मारने की इस घटना को निंदनीय बताया है।

रवीश ने दानिश सिद्दीकी को बताया ‘शहीद’, हत्यारों पर डाला पर्दा: तालिबान का जिक्र तक नहीं, ‘बंदूक से निकली गोली’ दोषी

अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी रॉयटर्स के फोटोजर्नलिस्ट दानिश सिद्दीकी की तालिबान ने हत्या कर दी। लेकिन, सोशल मीडिया का गिरोह विशेष इसके लिए तालिबान की आलोचना की बजाए भारत के दक्षिणपंथियों और ‘संघियों’ को गाली देने में लगा है। ऐसा प्रतीत कराया जा रहा है, जैसे उनकी हत्या भारत में हुई हो, वो भी हिन्दुओं द्वारा। NDTV के पत्रकार रवीश कुमार ने भी दानिश सिद्दीकी की हत्या पर तालिबान का नाम तक नहीं लिया।

दरअसल, रवीश कुमार ने दानिश सिद्दीकी की हत्या के बाद शोक जताते हुए एक फेसबुक पोस्ट किया। इसमें उन्होंने दानिश सिद्दीकी को सलाम करते हुए उन्हें भारतीय पत्रकारिता को साहसिक मुकाम पर ले जाने वाला करार दिया। साथ ही उन्हें ‘शहीद’ बताते हुए लिखा कि उन्होंने हमेशा मुश्किल मोर्चा ही चुना। किसी के लिए शोक-संतप्त होना ठीक है, लेकिन ऐसे ही किसी को शहीद बता देने का क्या औचित्य है?

दानिश सिद्दीकी एक प्राइवेट संस्थान के कर्मचारी थे, जिनकी फोटोज हजारों में बिकती थीं। अब भी हिन्दुओं की जलती चिताओं की तस्वीरें बिक रही हैं। वो एक प्राइवेट कंपनी के लिए काम करते हुए अफगानिस्तान गए थे। उन्हें भारत ने मोर्चे पर नहीं लगाया था। वो भारतीय सशस्त्र बल में नहीं थे। वो कोई सरकारी कर्मचारी नहीं थे जो ड्यूटी के दौरान मारे गए। इसकी कोई ज़रूरत नहीं थी कि वो गोलीबारी के बीच जाकर फोटो खींचें।

रवीश कुमार जैसे लोग वही हैं, जो पुलवामा हमले में साजिश खोजते हैं। आतंकियों की नहीं, किसकी वो सबको पता है। जब सचमुच भारतीय जवान बलिदान होते हैं तो उनके लिए ये शोक नहीं जताते। तब ये ‘शहीद’ जैसे शब्दों का प्रयोग नहीं करते। लेकिन, अगर इनके गिरोह का कोई व्यक्ति रुपए के लिए काम करता हुआ कहीं जाकर मारा जाए तो वो ‘शहीद’ हो जाता है। हर एक मृत्यु दुःखद है और टाली जानी चाहिए, लेकिन सड़क दुर्घटना से लेकर फोटो खींचते हुए मारे जाने वाले लोगों तक, सभी को ‘शहीद’ नहीं कहा जा सकता।

रवीश कुमार ने लिखा, “बंदूक से निकली उस गोली को हज़ार लानतें भेज रहा हूँ जिसने एक बहादुर की ज़िंदगी ले ली।” आपको गुरमेहर कौर याद है? उनके पिता की हत्या पाकिस्तानी फौज ने की थी। वो भारतीय सेना में थे। गुरमेहर कौर ने सोशल मीडिया पर लिखा था कि उनके पिता को युद्ध ने मारा, पाकिस्तान ने नहीं। हालाँकि, इसके बाद कई बलिदानी सैनिकों के परिजनों ने उनका विरोध करते हुए कहा कि इसके लिए पाकिस्तान ही जिम्मेदार है।

दानिश सिद्दीकी की हत्या के बाद रवीश कुमार का फेसबुक पोस्ट

यही हाल रवीश कुमार का है। वो ‘बंदूक से निकली गोली’ को दोष दे रहे हैं, जो एक निर्जीव वस्तु है। बंदूक तब तक नहीं चलती, जब तक कोई उसका ट्रिगर नहीं दबाता। गोली तब तक नहीं निकलती जब तक उसे किसी ने बंदूक में डाली नहीं हो। बंदूक और गोली किसी के पास अपने-आप चल कर नहीं आते, जब तक वो उसे लेकर न आया हो। हमेशा ऐसी गोलियों के बीचे एक बंदूकधारी होता है।

रवीश कुमार यहाँ बंदूक और गोली को इसलिए दोष दे रहे हैं, क्योंकि वो तालिबान का नाम नहीं लेना चाहते। उन्होंने ये जिक्र कर दिया कि दानिश सिद्दीकी ने जामिया मिल्लिया यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की थी, लेकिन उनकी हत्या करने वाले तालिबान का नाम तक न लिया। तालिबान का नाम लेने से इस्लामी आतंकवाद की बात होगी, इसीलिए शायद उन्होंने अपने ही गिरोह के व्यक्ति के हत्यारों के ऊपर पर्दा डालने की कोशिश की।

सोशल मीडिया पर लोग शेयर कर रहे ये तस्वीर

सोशल मीडिया में कुछ लोग इस तरह की तस्वीरें भी शेयर कर रहे हैं, जिसमें रवीश कुमार हाथ में एक प्लाकार्ड लेकर खड़े हैं। इस पर अंग्रेजी में लिखा हुआ है, “दानिश सिद्दीकी को तालिबान ने नहीं, बंदूक ने मारा।” हालाँकि, हमने पाया कि ये तस्वीरें फर्जी हैं क्योंकि रवीश कुमार ने इतने लंबे-लंबे बाल नहीं रखे हुए हैं और उनके हाथ वैसे नहीं हैं, जैसा इस चित्र में दिख रहा। साथ ही वो इस तरह के कपड़े भी नहीं पहनते।

सूत्रों के हवाले से ताज़ा खबर ये चलाई जा रही है कि तालिबान ने दानिश सिद्दीकी के शव को रेड क्रॉस को सौंप दिया है। हैरानी की बात नहीं होगी, अगर गिरोह विशेष इसे तालिबान की दरियादिली बता कर पेश करे। अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी से लेकर भारत के विदेश सचिव हर्ष शृंगला तक ने उनकी हत्या की निंदा की है। काबुल में भारतीय दूतावास उनके शव को वापस लाने के लिए प्रयत्न कर रहा है।

माता त्रिपुर सुंदरी मंदिर: युद्ध में माँ की मूर्ति होती थी त्रिपुरा के राजा के साथ, पवित्र शक्तिपीठों और 10 महाविद्याओं में से एक

सनातन हिन्दू धर्म में भारत के पूर्वोत्तर भाग को महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया गया है। इसे भगवान सूर्य का स्थान माना जाता है क्योंकि इस दिव्य भारत भूमि में सबसे पहला सूर्योदय यही पूर्वोत्तर भाग ही देखता है। हालाँकि पूर्वोत्तर भारत अपने प्राकृतिक सौन्दर्य और स्थानीय जनजातीय संस्कृति के कारण अधिक प्रसिद्ध है लेकिन यहाँ कई ऐसे धार्मिक स्थान भी हैं, जिनका इतिहास पौराणिक घटनाओं से जुड़ा हुआ है। त्रिपुरा का त्रिपुर सुंदरी मंदिर भी उन्हीं सनातन क्षेत्रों में से एक है, जिनका वर्णन हिंदुओं के प्राचीनतम ग्रंथों में किया गया है।

मंदिर का इतिहास एवं संरचना

त्रिपुरा के गोमती जिले के प्राचीन उदयपुर शहर में स्थित त्रिपुर सुंदरी मंदिर हिंदुओं के 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है और इसे पूर्वोत्तर भारत के महत्वपूर्ण स्थानों में गिना जाता है। हिन्दू ग्रंथों में इस स्थान का वर्णन एक ऐसे क्षेत्र के रूप में किया गया है, जहाँ माता सती का दाहिना पैर गिरा था। इस क्षेत्र को माताबाड़ी क्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है और यह एक पहाड़ी के ऊपर स्थित है। यहाँ माँ भगवती को त्रिपुर सुंदरी और उनके साथ विराजमान भैरव को त्रिपुरेश के नाम से जाना जाता है।

त्रिपुरा में 15वीं शताब्दी के उत्तरार्ध के दौरान राजा धन्य माणिक्य का शासन था। यह माना जाता है कि एक रात राजा को स्वप्न में माता त्रिपुर सुंदरी ने तत्कालीन राजधानी उदयपुर में एक पहाड़ी के ऊपर अपनी उपस्थिति के बारे में बताया और उन्हें यह आज्ञा दी कि उस स्थान पर एक मंदिर का निर्माण कराया जाए। इसक बाद राजा माणिक्य ने सन् 1501 के दौरान इस मंदिर का निर्माण कराया। इस मंदिर का निर्माण बंगाली वास्तुशैली एकरत्न के हिसाब से कराया गया है। चूँकि जिस पहाड़ी पर यह मंदिर स्थित है उसका आकार कछुए की पीठ के समान है, अतः इस स्थान को ‘कूर्म पीठ‘ भी कहा जाता है।

मंदिर के गर्भगृह में काले ग्रेनाइट पत्थर से निर्मित दो प्रतिमाएँ स्थापित हैं। लगभग 5 फुट ऊँचाई की मुख्य प्रतिमा माता त्रिपुर सुंदरी की है जबकि 2 फुट की एक अन्य प्रतिमा, जिसे ‘छोटो माँ’ कहा जाता है, माता चंडी की है। ऐसा माना जाता है कि जब भी त्रिपुरा के राजा किसी युद्ध में जाते थे तब माता चंडी की छोटी प्रतिमा अपने साथ लेकर जाते थे। मंदिर के नजदीक ही कल्याण सागर नाम का एक बड़ा तालाब स्थित है, जहाँ बहुत बड़ी मात्रा में कछुए पाए जाते हैं। यहाँ कछुओं को भोजन कराना मंदिर की परंपरा का ही एक हिस्सा है।

मंदिर का प्रमुख त्यौहार

वैसे तो साल में दो बार आने वाली नवरात्रि को भारत भर में मौजूद देवी मंदिरों का प्रमुख त्यौहार माना जाता है लेकिन माता त्रिपुर सुंदरी के इस मंदिर का प्रमुख त्यौहार दीपावली है। त्रिपुरा में स्थित इस प्राचीन मंदिर में दीवाली का त्यौहार बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। इसके अलावा महाशिवरात्रि और श्रावण महीने में भी मंदिर में श्रद्धालुओं की अच्छी-खासी भीड़ उमड़ती है। यह मंदिर हिंदुओं के वैष्णव और शाक्त संप्रदाय का एक प्रमुख केंद्र माना जाता है। मंदिर के प्रसादम के रूप में ‘पेड़ा’ श्रद्धालुओं को दिया जाता है।

राधाकिशोर गाँव में स्थित इस मंदिर को तंत्र विद्या का केंद्र माना जाता है। इस मंदिर में तांत्रिक साधना का इतिहास काफी पुराना माना जाता है। असम में स्थित कामाख्या शक्तिपीठ की तरह इस स्थान पर भी आस-पास के इलाकों में तांत्रिकों के होने और तंत्र साधन करने के प्रमाण मिलते हैं। कारण यह है कि माता त्रिपुर सुंदरी को 10 महाविद्याओं में से एक माना जाता है।

कैसे पहुँचें?

उदयपुर का नजदीकी हवाईअड्डा अगरतला में स्थित महाराजा बीर बिक्रम एयरपोर्ट है, जो यहाँ से मात्र 59 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसके अलावा उदयपुर में रेलवे स्टेशन भी है, जो लमडिंग रेलवे डिवीजन के अंतर्गत आता है। यहाँ से असम और त्रिपुरा के प्रमुख शहरों के लिए रेलमार्ग की सुविधा उपलब्ध है।

इसके अलावा सड़क मार्ग से भी उदयपुर, त्रिपुरा और असम के कई शहरों से जुड़ा हुआ है। राष्ट्रीय राजमार्ग 8 पर स्थित उदयपुर से बाकी शहरों के लिए बेहतर रोड कनेक्टिविटी है।

अयोध्या: 2023 के अंत से राम मंदिर में दर्शन कर सकेंगे भक्त, 2025 तक पूरा हो जाएगा 70 एकड़ का परिसर

अयोध्या का बहुप्रतीक्षित श्रीराम मंदिर साल 2023 के अंत तक भक्तों के लिए खोल दिया जाएगा। इस बात की जानकारी श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने दी है। रिपोर्ट्स के अनुसार, ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने कहा कि साल 2023 के अंत से श्रीराम मंदिर में भक्तगण रामलला की पूजा और दर्शन कर सकेंगे।

दरअसल, श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के प्रमुख नृपेंद्र मिश्रा की अध्यक्षता में मंदिर निर्माण से संबंधित दो दिवसीय समीक्षा बैठक की गई थी। इस बैठक में अभियंताओं और वास्तुकारों के साथ ट्रस्ट के 15 सदस्यों ने हिस्सा लिया था। इस बैठक में विचार-विमर्श के चंपत राय ने इसकी घोषणा की।

हालाँकि, श्रीराम मंदिर के पूरे क्षेत्र का निर्माण कार्य पूरा होने में थोड़ा और समय लगेगा। श्रीराम मंदिर निर्माण की देख-रेख कर रहे ट्रस्ट के पदाधिकारियों ने बताया कि 70 एकड़ के पूरे मंदिर परिसर का निर्माण कार्य साल 2025 के अंत तक पूरा कर लिया जाएगा।

इस साल जनवरी में प्रस्तावित मंदिर स्थल के निर्माण कार्य के दौरान नींव में इंजीनियरों को पानी मिला था। इसके बाद निर्माण कार्य को अस्थायी रूप से रोक दिया गया था। हालाँकि, अब इस पर निर्माण कार्य सुचारु रूप से चल रहा है और मंदिर की नींव पर इंजीनियर काम कर रहे हैं। उम्मीद जताई जा रही है कि 15 सितंबर तक नींव का काम पूरा हो जाएगा।

बताया जा रहा है कि इंजीनियर मंदिर निर्माण के लिए उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर और राजस्थान के जोधपुर से बलुआ पत्थर का प्रयोग कर रहे हैं। वहीं, राजस्थान के मकराना का संगमरमर और राजस्थान के बंसी पहाड़पुर का गुलाबी पत्थर का मंदिर निर्माण में उपयोग किया जा रहा है। मंदिर निर्माण के दूसरे चरण का काम इस साल नवंबर में दिवाली के बाद शुरू होने की संभावना है।

गौरतलब है कि 5 अगस्त 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ऐतिहासिक समारोह में इस मंदिर की नींव रखी थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने श्रीराम मंदिर के लिए भूमि पूजन किया था, जिसके बाद दुनिया भर के हिंदुओं का 500 साल का इंतजार खत्म हो गया था।

विकिपीडिया के वामपंथी कैरेक्टर की सह संस्थापक लैरी सेंगर ने खोल दी पोल; कहा- न करें भरोसा, चल रहा है एजेंडा

“निष्पक्ष जानकारी के लिए कभी भी विकिपीडिया पर किसी को विश्वास नहीं करना चाहिए, ये अपने वास्तविक उद्देश्य से भटक गया है।”

यह कहना है विकिपीडिया के सह-संस्थापक लैरी सैंगर का। उन्होंने साल 2001 में जिमी वेल्स के साथ मिलकर इसकी शुरुआत की थी। लेकिन अब उनका कहना है कि इस पर डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थकों और वामपंथियों ने कब्जा कर लिया है। उनके अनुसार साइट पर वामपंथी एडिटर विकिपीडिया यूजर्स को पेज एडिट तक नहीं करने देते और उस हर जानकारी को डिलीट कर देते हैं जो उनके एजेंडे पर फिट नहीं बैठती।

अनहर्ड को दिए इंटरव्यू में 52 वर्षीय सैंगर ने अपनी बात को साबित करने के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता और वर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति ‘जो बायडेन’ से संबंधित जानकारी का उदाहरण दिया। उनका कहना है कि साइट पर न तो उनसे जुड़े स्कैंडल्स का उल्लेख किया गया है और न ही उनके बेटे हंटर बायडेन के लैपटॉप संबंधी कोई सूचना है जिसमें अश्लील सामग्री पाई गई थी।

इंटरव्यू में जब सैंगर से पूछा गया कि क्या इस साइट पर सच जानने के लिए भरोसा किया जा सकता है? उन्होंने कहा कि ये डिपेंड करता है कि आप सच के बारे में क्या सोचते हैं। उन्होंने ध्यान दिलाया कि किस तरह साइट पर जो बायडेन को लेकर एकतरफा जानकारी दी गई है।

उन्होंने कहा कि बायडेन के आर्टिकल को देखें तो उसमें ये बात बहुत कम देखने को मिलेगी कि रिपब्लिकन पार्टी के समर्थक उनके बारे में क्या सोचते हैं। इसलिए यदि कोई चाहता है कि रिपब्लिकन पार्टी वालों का पक्ष उनके बारे में जानें तो उन्हें वो सब विकिपीडिया के आर्टिकल में नहीं मिलेगा। यदि आप यूक्रेन स्कैंडल के बारे में जानना चाहते हैं तो उस पर आपको बहुत कम जानकारी मिलेगी और उसमें भी आप पक्षपात एकदम साफ देख पाएँगे।

विकिपीडिया पर जो बायडेन पर लिखे गए आर्टिकल में देख सकते हैं कि वहाँ केवल एक ऐसा पक्ष है जिसमें सारी बातें बायडेन के पाले में झुकी हुई हैं और रिपब्लिकन पार्टी को नेगेटिव शेड में प्रस्तुत कर रही है। उदाहरण के लिए भाषा देखें कि विकिपीडिया के आर्टिकल में क्या है। इसमें एक जगह लिखा है, “सितंबर 2019 में ट्रंप ने यूक्रेनियन राष्ट्रपति को बायडेन के हर काले चिट्ठे और उनके बेटे के कारनामों पर जाँच करने को कहा था, लेकिन इन सभी आरोपों के बावजूद कोई सबूत नहीं मिला।”

इसी प्रकार एक पैराग्राफ में लिखा है कि ट्रंप ने 2019 की शुरुआत में बायडेन पर झूठे आरोप मढ़े थे कि उन्होंने यूक्रेनियन अधिवक्ता विक्टर शोकिन को फायर करवा दिया था जो उस बर्मा होल्डिंग्स की जाँच कर रहे थे जिसने हंटर बायडेन को नियुक्त किया था। बायडेन पर इस प्रयास में यूक्रेन से 1 बिलियन डॉलर की सहायता रोकने का आरोप लगाया गया था।

सैंगर इन सभी बातों पर बोलते हैं कि लेख में कहीं भी इस बात का उल्लेख नहीं है कि हंटर बायडेन को 2014 से 2019 तक में एक यूक्रेनी ऊर्जा फर्म से, काम करने के लिए प्रति वर्ष $ 600,000 (4,47,66,150रुपए ) मिले, जबकि बायडेन को उर्जा सेक्टर में काम करने का कोई अनुभव तक नहीं था। इसके अलावा उनके बेटे हंटर के लैपटॉप की जानकारी भी कहीं नहीं है, जिसमें कई तरह की आपत्तिजनक सामग्री बरामद हुई थी।

मालूम हो कि साल 2020 में चुनाव के समय हंटर बायडेन के लैपटॉप को लेकर ट्रंप के वकील रूडी गुलियानी ने सवाल उठाए थे। गुलियानी ने आरोप लगाया था कि उनके लैपटॉप में नाबालिग लड़कियों की नग्न तस्वीरें और कुछ संदेश थे। उसी लैपटॉप को लेकर ब्रिटिश रिपोर्ट्स ने दावा किया था कि लैपटॉप की हार्डड्राइव से 2000 फोटो, 1 लाख 54 हजार ईमेल, 1,03,000 संदेश बरामद हुए हैं। फॉरेंसिक टीम ने भी इनकी पुष्टि की थी। उनका कहना था कि हंटर के लैपटॉप के हार्ड ड्राइव की कॉपी मिली थी, जिसके बाद मैरीमैन एंड एसोसिएट्स नाम की फर्म से साइबर एक्सपर्ट्स को इकट्ठा करके उसकी प्रमाणिकता की जाँच करवाई गई। जाँच में यही सामने आया कि लैपटॉप में मौजूद अप्रैल 2019 से पहले का डेटा हंटर बायडेन का है, जिस पर लगे टाइम स्टैम्प को देख लगता है कि उसके साथ कोई छेड़छाड़ नहीं हुई है।

विकिपीडिया के पक्षपाती रवैए पर सैंगर कहते हैं कि ऐसे कई लोग हैं जो ऐसे आर्टिकल्स को न्यूट्रल बना सकते हैं, लेकिन उन्हें लिखने नहीं दिया जाएगा। वह कहते हैं कि विकिपीडिया अन्य मीडिया इकाइयों जैसी है जिसमें किसी भी विवादित प्रश्न के लिए बचाव के रूप में एक तरह का सच है। उनके मुताबिक विकिपीडिया अब पहले जैसा नहीं रह गया। उसने अपने न्यूट्रल नेचर को 2009 में खो दिया था। उससे पहले हर विचारधारा के लोग वहाँ एडिटर थे। सैंगर ने बताया कि कैसे साइट ने डेली मेल और फॉक्स न्यूज को ब्लैकलिस्ट किया है ताकि उनकी सामग्री विकिपीडिया पर न छप सके।

उन्होंने जानकारी दी कि अब विकी पीआर जैसी बड़ी कंपनियाँ हैं, जो लोगों को विकिपीडिया पर लिखने के लिए नियुक्त करती हैं, लेकिन ऐसे लेखक और संपादक यह नहीं बताते कि वे ऐसी कंपनियों से जुड़े हैं। उन्होंने कहा कि लोग विकिपीडिया लेखों में बदलाव करने के लिए पैसे खर्च कर रहे हैं क्योंकि एक बहुत बड़ा, बुरा, जटिल खेल पर्दे के पीछे खेला जा रहा है ताकि लेख वह कह सके कि जो कोई उनसे कहलवाना चाहता है।

बता दें कि लैरी सैंगर ने वेबसाइट चलाने के तरीके को लेकर सह-संस्थापक जिमी वेल्स के साथ पैदा हुए मतभेदों के कारण विकिपीडिया छोड़ दिया था। तब से वह इसके वामपंथी झुकाव की वजह से इसके कट्टर आलोचक बन गए हैं। इससे पहले उन्होंने कहा था कि विकिपीडिया एक बहुत बड़ा नैतिक खतरा बन गया है।

एक खानदानी-दूसरा पाकिस्तानी, दोनों नकारा नाव के सवार: RSS पर फिर एक जैसी राहुल गाँधी और इमरान खान की जुबान

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते बेहतर नहीं बनने देने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को जिम्मेदार ठहराया है। इमरान खान के इस आरोप के बाद कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गाँधी ने भी हमेशा की तरह पाकिस्तान का अनुसरण किया। उन्होंने पार्टी की बैठक में आरएसएस को जमकर कोसा और पाकिस्तान की तर्ज पर हिंदूवादी संगठन की छवि को धूमिल करने की पूरी कोशिश की।

इमरान खान ने कूटनीति में जो आरोप आरएसएस पर लगाए, वही आरोप राहुल गाँधी ने घरेलू राजनीति में इस राष्ट्रवादी संगठन पर लगाया। हालाँकि, यह पहली बार नहीं है कि राहुल ने पाकिस्तान के हाँ में हाँ मिलाया है। जब-जब पाकिस्तान ने हिंदू और हिंदुत्व के साथ-साथ हिंदूवादी संगठनों पर दोष मढ़ा है, तब-तब राहुल गाँधी ने शब्दों में हेरफेर कर और कभी-कभी पूरी तरह उसका समर्थन किया है।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान मध्य-दक्षिण एशिया सम्मेलन में भाग लेने के लिए ताशकंद गए हुए थे। इसी दौरान एएनआई के पत्रकार ने उनसे पूछा, “क्या बात और आतंकवाद दोनों साथ चल सकता है?” इस पर इमरान खान ने कहा, “हम कब से इंतजार कर रहे हैं कि भारत के साथ सिविलाइज्ड हमसाए बनकर रहें, लेकिन करें क्या ये आरएसएस की आइडियोलॉजी रास्ते में आ गई है।”

यह पहली बार नहीं है कि पाकिस्तान ने आतंकवाद को बढ़ावा देने वाली अपनी गतिविधि को ढँकने के लिए आरएसएस का इस्तेमाल किया हो। पाकिस्तान ने हर बात के लिए भारत के हिंदूवादी संगठन और आरएसएस को जिम्मेदार ठहराकर इससे जुड़े सेवा भारती, भारतीय जनता पार्टी और हिंदू समुदाय को बदनाम करने की कोशिश की है। दिल्ली में हुए सीएए विरोधी प्रदर्शनों के बाद हुए दंगों के लिए भी पाकिस्तान ने कुछ ऐसा ही आरोप लगाया था।

खान ने दोनों देशों के बीच खटास के लिए हमेशा की तरह इसका दोष भारत के सिर पर मढ़ा है। उन्होंने भारत में आतंकी घटनाओं को अंजाम देने वाले इस्लामिक आतंकियों को प्रश्रय देने और पाकिस्तान सरकार द्वारा उन्हें उन्मुक्त भाव से समर्थन देने की बात को सिरे से दरकिनार कर दिया, जो दोनों के बीच बातचीत के रास्ते में बाधा बनकर खड़ा हो जाता है। हालाँकि, जब रिपोर्टर ने अफगानिस्तान के कुख्यात आतंकी संगठन तालिबान के साथ पाकिस्तान के मधुर संबंधों को लेकर सवाल दागे तो इमरान खान वहाँ से आगे बढ़ गए। उन्होंने इस्लामिक आतंकवादियों के बीच की इस संधि पर एक शब्द भी बोलना उचित नहीं समझा, जो सिर्फ दक्षिण एशिया ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को खतरनाक मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है।

इमरान अपनी दामन पर लगे दाग को छिपाकर दूसरे को दागदार बताने का कितना भी जतन करें, लेकिन सत्य यही है कि भारत सरकार ने पाकिस्तान को बातचीत की मेज पर साथ बैठाने से इसलिए इनकार कर दिया है, क्योंकि पाकिस्तान इस्लामिक आतंकियों का हमदर्द और उनका आका बना बैठा है। भारत की नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि पाकिस्तान के साथ तब तक द्विपक्षीय वार्ता नहीं होगी, जब तक पाकिस्तान भारत में आतंकी गतिविधियों को प्रायोजित करता रहेगा और आतंकियों को भारत के खिलाफ गतिविधियों में संसाधन और समर्थन उपलब्ध कराता रहेगा।

राहुल गाँधी ने इमरान खान के साथ इस बार भी कदमताल मिलाने की कोशिश की। उन्होंने शुक्रवार (16 जुलाई 2021) को पार्टी की एक बैठक में सदस्यों को संबोधित करते हुए ‘आरएसएस विचारधारा’ को खारिज करने वाले निडर लोगों को पार्टी में शामिल करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने भाजपा के पूर्व नेताओं को पार्टी में शामिल करने का संकेत देते हुए कहा, “ऐसे बहुत से निडर लोग हैं जो कॉन्ग्रेस में नहीं हैं, उन्हें पार्टी में लाने की आवश्यकता है और कॉन्ग्रेस के जो नेता भाजपा से डर रहे हैं उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया जाना चाहिए। हमें उन लोगों की आवश्यकता नहीं जो आरएसएस की विचारधारा में विश्वास करते हैं। हमें निडर लोगों की जरूरत हैं।”

भारत को निशाना बनाने के लिए पाकिस्तान ने कई बार राहुल गाँधी के बयानों का सहारा लिया है। इन बयानों में राहुल गाँधी ने मोदी सरकार के खिलाफ ऐसी बातें कही हैं, जो पाकिस्तान की नीति और प्रोपेंगेंडा के प्राय: अनुकूल होती हैं। यही कारण है कि पाकिस्तान की सरकार और वहाँ की सरकारी एजेंसियाँ राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस के राजनीतिक बयानों का बार-बार इस्तेमाल करती हैं और भारत को अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर नीचा दिखाने की कोशिश करती है।

अगर हम 2019 में बालाकोट पर मोदी सरकार द्वारा किए गए सर्जिकल स्ट्राइक के बाद राहुल गाँधी के बयान को याद करें तो बात आसानी से समझ में आ जाएगी। पाकिस्तान के राष्ट्रीय रेडियो ने भारत के खिलाफ झूठ फैलाने के लिए बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक पर राहुल गाँधी और अन्य विपक्षी नेताओं के बयानों का इस्तेमाल किया था। कॉन्ग्रेस और विपक्षी दलों ने मोदी सरकार पर राष्ट्रीय सुरक्षा का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाया था।

पाकिस्तान के बयानों के साथ राहुल गाँधी के बयानों की समानता कोई संयोग नहीं है, यह एक पूर्व-नियोजित प्रयोग है। साल 2019 में UNHRC में पाकिस्तान ने भारत के विरोध में एक डोजियर दिया था, जिसमें कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी और दूसरे विपक्षी नेताओं के बयानों का जिक्र किया गया था। डोजियर में राहुल गाँधी के उस बयान का हवाला दिया गया था, जिसमें उन्होंने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के भारत के फैसले की आलोचना करते हुए भारत सरकार की नीयत पर संदेह जताया था।

एक और घटना दोनों के बीच समानता की इशारा करती है। इमरान ने दिल्ली में हुए सीएए विरोधी दंगों के लिए आरएसएस और भाजपा की विचारधारा को दोषी ठहराया था। दिल्ली दंगों को मुद्दा बनाकर उन्होंने देश में अल्पसंख्यकों की ‘बुरी’ स्थिति बताकर भारत को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बदनाम करने की नाकाम कोशिश की थी। इमरान के तुरंत बाद राहुल गाँधी ने संघ के खिलाफ बयान दिया था। राहुल ने संघ के बहाने हमेशा राष्ट्रवाद और हिंदुत्व पर निशाना साधा है।

हालाँकि, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने साल 2020 में संघ की आलोचना करने वाले लोगों को लेकर कहा था कि वे संघ पर तब हमला करते हैं, जब उनका निगेटिव कैंपेन सफल नहीं होता। उन्होंने कहा था, “यहाँ तक कि अब इमरान खान ने भी इस मंत्र को सीख लिया है।”

ऐसा लगता है कि इमरान खान और उनकी पार्टी ‘पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी’ और राहुल गाँधी और उनकी पार्टी ‘भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस’ एक-दूसरे से आइडिया लेकर एक-दूसरे के बयानों को दोहराती रहती है। हमने ऑपइंडिया में उन उदाहरणों की एक सूची भी तैयार की थी, जहाँ उन्होंने एक-दूसरे के बयानों को दोहराया है।

मोदी सरकार का सबसे बड़ा ऑर्डर: ₹14505 करोड़ में 66 करोड़ वैक्सीन, दिसंबर तक 94.4 करोड़ का टीकाकरण

केंद्र सरकार ने शुक्रवार (जुलाई 16, 2021) को कोविड वैक्सीन खरीदने के लिए अब तक का सबसे बड़ा ऑर्डर दिया है। इस ऑर्डर के मुताबिक सरकार 14, 505 करोड़ रुपए में 66 करोड़ वैक्सीन की डोज खरीदेगी। इसमें कोविशील्ड और कोवैक्सीन खरीदी जाएँगी। सरकार का उद्देश्य दिसंबर महीने तक 94.4 करोड़ लोगों को वैक्सीनेट करना है।

राज्य सरकारों और स्वास्थ्य प्रशासन द्वारा वैक्सीन शॉर्टेज पर चिंता जाहिर करने के बाद केंद्र सरकार का यह कदम सामने आया है। इस संबंध में रॉयटर्स ने बताया है कि मोदी सरकार ने दिसंबर तक 94.4 करोड़ लोगों को वैक्सीन की दोनों डोज लगाने का लक्ष्य रखा है लेकिन इस बीच वैक्सीन सेंटर बंद हो गए। अब सरकार ने कोविशील्ड की 37.5 करोड़ डोज और कोवैक्सीन की 28.5 करोड़ डोज के लिए ऑर्डर दिया है।

ये आदेश सरकार के उसी वादे के क्रम में है जो उन्होंने 26 जून 2021 को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष हलफनामा दायर करते हुए किया था कि वह अगस्त से दिसंबर के बीच में 135 करोड़ वैक्सीन उपलब्ध करवाएँगे। इस ऑर्डर के अलावा सूत्रों ने बताया है कि सरकार ने हैदराबाद आधारित बॉयोलॉजिकल-ई की Corbevax की 30 करोड़ डोज के लिए भी भुगतान कर दिया है।

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल सरकार के हलफनामे के मुताबिक दिसंबर तक जाइडस कैडिला की वैक्सीन की 5 करोड़ डोज और स्पुतनिक वी की 10 करोड़ डोज भी उपलब्ध हो जाएँगी। इस बीच कोविशील्ड की कुल 50 करोड़ खुराक और कोवैक्सिन की 40 करोड़ खुराक भी उपलब्ध होने की उम्मीद है।

माँग पूरी करने के लिए वैक्सीन निर्माताओं ने अपने मासिक उत्पादन में वृद्धि कर दी है। कथित तौर पर, सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (SII) अब हर महीने 100 मिलियन कोविशील्ड खुराक (10 करोड़) का उत्पादन कर रहा है। वहीं, भारत बायोटेक ने अप्रैल में 1 करोड़ कोवैक्सिन डोज/माह से उत्पादन बढ़ाकर जुलाई/अगस्त में 7 करोड़ डोज किया है। Covaxin के मासिक उत्पादन को हर महीने 100 करोड़ तक बढ़ाने की योजना है।

इस मामले पर एक अर्थशास्त्री व केरल के कोच्चि में राजागिरी कॉलेज ऑफ सोशल साइंसेज में प्रोफेसर रिजो जॉन कहते हैं, “मेरा मानना है कि टीके की कमी अभी जारी रहेगी और प्लान की गई वैक्सीन सप्लाई के अनुसार, ऐसा प्रतीत होता है कि पूरे जुलाई में दैनिक औसत 4 मिलियन (40 लाख) से नीचे रहेगा।” जबकि, शुक्रवार को करीब 38.78 लाख कोरोना वायरस वैक्सीन की डोज दी गई हैं, इसके बाद वैक्सीन लेने वाले कुल लोगों की संख्या 39.53 करोड़ हो गई है। पिछले महीने 21 जून को, भारत ने 91 लाख लोगों को टीका लगाया, जो एक दिन में सबसे अधिक है।

भारत में शुरू होगा रूसी वैक्सीन का निर्माण

मालूम हो कि मंगलवार (13 जुलाई) को, पुणे स्थित SII ने घोषणा की थी कि वह रूस के COVID-19 वैक्सीन, स्पुतनिक वी का उत्पादन शुरू करने जा रहा है। यह घोषणा स्वयं रशियन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट फंड (RDIF) के सीईओ किरिल दिमित्रीव ने भी की थी। उन्होंने कहा था कि स्पुतनिक वी का निर्माण इस साल सितंबर से एसआईआई द्वारा किया जाएगा।

विश्व स्तर पर वैक्सीन को बढ़ावा देने वाले रशियन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट फंड, ने कहा कि योजना भारत में प्रति वर्ष वैक्सीन की 300 मिलियन से अधिक खुराक का निर्माण करने की थी, जिससे यह स्पुतनिक वी के लिए प्रमुख उत्पादन केंद्रों में से एक बन गया। अपने बयान में RDIF ने कहा कि उनका इरादा भारत में प्रति वर्ष 300 मिलियन से अधिक उत्पादन करने का है जिसका पहला बैच सितंबर 2021 में आ जाएगा।

पाकिस्तान के लिए जासूसी करने वाला कॉन्स्टेबल गिरफ्तार, सेना से रिटायर होने के बाद पुलिस में हुआ था भर्ती

पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआईए (ISI) के लिए जासूसी करने के आरोप में हबीब खान की गिरफ्तारी के बाद अब हरियाणा की पलवल पुलिस ने एक कॉन्स्टेबल को आईएसआई के लिए जासूसी के आरोप में गिरफ्तार किया है। आरोपित पहले सेना में ही था और 2018 में रिटायर होने के बाद एक्स सर्विसमैन कोटे से हरियाणा पुलिस में भर्ती हुआ था।

आरोपित कॉन्स्टेबल की पहचान अंबाला जिले के सुरेंद्र के रूप में हुई है। वह बोह गाँव का रहने वाला है और जिला पुलिस कार्यालय में गार्ड की ड्यूटी पर तैनात था। पुलिस ने उसके पास से दो मोबाइल फोन जब्त किया है। वह व्हाट्सएप के जरिए भारतीय सेना से संबंधित खुफिया सूचनाएँ पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई को देता था।

बताया जाता है कि आरोपित सुरेंद्र फेसबुक के जरिए पाकिस्तान की किसी लड़की के संपर्क में था। रिपोर्ट के मुताबिक, पूछताछ में पता चला है कि आरोपित सुरेंद्र 2018 से ही सेना के सीक्रेट्स को दुश्मन देश को बेच रहा था। इसके एवज में आईएसआई ने उसे अब तक 70,000 रुपए दिए हैं। फिलहाल, पुलिस ने आरोपित कॉन्स्टेबल के जब्त किए गए फोन को साइबर टीम के पास भेज दिया है, ताकि पाकिस्तानी महिला के साथ की गई बातचीत का पता लगाया जा सके और अन्य डेटा को रिकवर किया जा सके।

इस मामले में पलवल जिले के एसपी दीपक गहलावत ने कहा है कि मामले की गहनता से जाँच की जा रही है। उन्होंने बताया कि पूछताछ के बाद ये पता चलेगा कि आरोपी ने अभी तक कितनी और किस तरह सूचनाएँ पाकिस्तान को दे चुका है और भविष्य की क्या योजनाएँ थीं?

एसपी गहलावत ने बताया कि आरोपी सुरेंद्र को भारतीय सेना के हवाले करने संबंधी उन्हें अभी तक कोई आदेश नहीं मिला है और अगर भविष्य में इस तरह का आदेश मिलता है तो उसका पालन किया जाएगा।

गौरतलब है कि इससे पहले बीते मंगलवार (13 जुलाई 2021) को दिल्ली पुलिस ने हबीब खान नाम के जासूस को राजस्थान के पोखरण से गिरफ्तार किया था। आरोपित हबीब सेना को कई वर्षों से सब्जी की सप्लाई करता था और इसी की आड़ में वो गोपनीय दस्तावेजों को हासिल कर उन्हें पाकिस्तान भेज देता था। पूछताछ के दौरान उसने ये कबूल किया था कि आगरा कैंट में तैनात जवान परमजीत कौर से उसे सेना की खुफिया जानकारियाँ मिलती थीं।

चिताओं की फोटो पर लिबरल थे निहाल, ‘आखिरी’ फोटो पर जले-भुने: तालिबान ने दानिश को मारा, अब मौत पर पाखंड

अफगानिस्तान के कंधार के स्पिन बोल्डक जिले में तालिबानियों ने रॉयटर्स के फोटो जर्नलिस्ट दानिश सिद्दकी को मार डाला। दानिश अंतरराष्ट्रीय स्तर के पत्रकार थे जिन्हें साल 2018 में पुलित्जर पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उनकी हत्या के बाद उनकी ‘आखिरी’ फोटो बताकर एक तस्वीर सोशल मीडिया पर शेयर हो रही है, जिसे देख कई अन्य लिबरल पत्रकारों ने इसे प्रसारित न करने की अपील की है। हालाँकि, यूजर्स ने अपील मानने की जगह पूछा है कि जब दानिश मृतकों के दाह संस्कार की तस्वीरें शेयर कर रहे थे तब ऐसा क्यों नहीं कहा गया।

दरअसल, दानिश की मौत की खबर के बाद ‘द इंडिपेंडेंट की पत्रकार स्तुति मिश्रा’ ने उनके द्वारा क्लिक की गई कुछ चयनित तस्वीरों को ट्विटर पर शेयर किया। इसके बाद एक यूजर ने फोटो जर्नलिस्ट की आखिरी फोटो वहाँ साझा कर दी। इसे देख स्तुति ने उस ट्वीट पर अपील की कि इस तरह की तस्वीर न शेयर की जाए। उन्होंने लिखा कि वह तस्वीर को लेकर स्पष्ट नहीं है, मगर किसी भी मृतक की तस्वीर कइयों को ट्रिगर कर सकती है और ये मृतक के लिए अपमानजनक होता है।

स्तुति मिश्रा की अपील

इसी प्रकार द न्यू यॉर्क टाइम्स के पत्रकार मुजीब मशाल ने लिखा कि किसी के घरवालों को पता चलने से पहले या उसके बाद भी किसी की मौत की तस्वीर न शेयर करें।

द न्यू यॉर्क टाइम्स के पत्रकार मुजीब मशाल की अपील

इस तरह अपीलों को देखने के बाद कई यूजर मीडिया पत्रकारों के पाखंड पर भड़क गए। लोगों ने तमाम फोटोज शेयर करते हुए कहा कि दानिश ने कोविड से मरने वालों की तस्वीरें बेची थीं। इसके बावजूद कुछ पाखंडी थे जो सिद्दकी की हरकत के लिए उनकी सराहना कर रहे थे और आज जब उनकी आखिरी तस्वीर लोग शेयर कर रहे हैं तो इन्हें परेशानी है।

लोगों ने तर्क दिया कि दानिश सिद्दकी ने मृतकों के दाह संस्कार की तस्वीरें सोशल मीडिया पर डाली थी वो भी बिना पीड़ित परिवारों की मर्जी जाने। ऐसे में अगर उनको खुद पता चलेगा कि उनकी तस्वीर से उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर की ख्याति मिल रही है तो शायद उन्हें आपत्ति न हो।

यूजर्स ने स्तुति को उनके पाखंड का भी आइना दिखाया। स्तुति मिश्रा जिन्होंने दानिश की आखिरी तस्वीर शेयर न करने के लिए लोगों से अपील की थी। उन्हीं स्तुति ने दानिश के बेहतरीन क्लिक्स में से दाह संस्कार की तस्वीर शेयर की थी। लोगों ने पूछा क्या ऐसा करना मृतकों के लिए अपमानजनक नहीं है।

इस पूरे बवाल के बीच व लोगों की उलटी प्रतिक्रिया देखकर पत्रकार अपनी गलती मानने की बजाय बाकी यूजर्स को भला बुरा बोलने लगीं। उन्होंने यूजर्स को बेवकूफ करार देते हुए कहा, “मेरी टाइमलाइन पर कुछ बेवकूफों को फोटो जर्नलिस्ट की ड्यूटी और उनके द्वारा शेयर की जा रही तस्वीर में फर्क तक नहीं पता। मैं उनसे कुछ जानने की उम्मीद नहीं करती। लेकिन सच ये है कि किसी की मौत पर इन राक्षसों द्वारा घोला जा रहा जहरीलापना मुझे अब भी हैरान कर रहा है।

स्तुति का ट्वीट

स्तुति के इस ट्वीट के बावजूद अब भी दानिश के कामों पर बहस जारी है। लोगों का कहना है कि सिद्दकी एक अवसरवादी थे और लोगों के हालातों को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करते थे। इसलिए उनकी तस्वीर शेयर करने में कुछ गलत नहीं।

3 भगोड़े: माल्या-नीरव-मेहुल, SBI की अगुआई में बैंकों ने वसूले ₹792 करोड़; अब तक 13100 करोड़ की रिकवरी

भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की अगुवाई में बैंकों के कंसोर्टियम ने शुक्रवार (जुलाई 16, 2021) को भगोड़े विजय माल्या, नीरव मोदी और मेहुल चोकसी के जब्त शेयरों की बिक्री कर 792.11 करोड़ रुपए वसूल किए। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने इसकी जानकारी दी है। ईडी ने तीनों भगोड़ों के शेयर जब्त कर एसबीआई के नेतृत्‍व वाले कंसोर्टियम को हैंडओवर किए थे।

इससे बैंकों का हजारों करोड़ रुपए लेकर विदेश फरार होने वाले विजय माल्या, नीरव मोदी और मेहुल चोकसी को तगड़ा झटका लगा है। इसके साथ ही इन तीनों से कुल रिकवरी 13,109.17 करोड़ रुपए हो गई है।

जाँच एजेंसी ने कहा कि माल्या और भगोड़े हीरा व्यापारी नीरव मोदी और मेहुल चोकसी, जो पीएनबी घोटाले में शामिल थे, ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को उनकी कंपनियों के जरिए धन की हेराफेरी करके धोखा दिया। इसके चलते बैंकों को कुल 22,585.83 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ।

इससे पहले प्रवर्तन निदेशालय ने बताया था कि भगोड़ा कारोबारी नीरव मोदी की बहन पूर्वी मोदी ने 1 जुलाई को ब्रिटेन के बैंक खाते से 17 करोड़ से अधिक रुपए भारत सरकार को भेजे। भारत सरकार ने पूर्वी मोदी से कहा था कि अगर वह PNB Sacm की जाँच में सहयोग करेगी तो उसके खिलाफ क्रिमिनल कार्रवाई नहीं होगी।

ईडी ने एक बयान में कहा था, ‘‘24 जून को, पूर्वी मोदी ने प्रवर्तन निदेशालय को सूचित किया कि उन्हें लंदन, ब्रिटेन में उनके नाम पर एक बैंक खाते का पता चला जो उनके भाई नीरव मोदी के कहने पर खोला गया था और यह धन उनका नहीं था।’’

बयान में कहा गया था, “चूँकि पूर्वी मोदी को पूरा और सही खुलासा करने की शर्तों पर माफी की अनुमति दी गई थी, इसलिए उन्होंने ब्रिटेन के बैंक खाते से 23,16,889.03 अमरीकी डॉलर की राशि भारत सरकार, प्रवर्तन निदेशालय के बैंक खाते में भेज दी है।”

गौरतलब है कि हाल ही में ईडी ने बताया था कि देश छोड़ भागे विजय माल्या, नीरव मोदी और मेहुल चोकसी की 18,170.02 करोड़ रुपए की संपत्ति जब्त की जा चुकी है। यह इनके द्वारा की गई लूट का करीब 80 फीसदी हिस्सा है। जब्त की गई संपत्तियों में से 9,371.17 करोड़ रुपए के एसेट्स बैंकों और केंद्र सरकार को ईडी ने ट्रांसफर भी कर दिए गए हैं।

प्रवर्तन निदेशालाय ने अपने बयान में कहा था, “प्रोटेक्शन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) कानून के तहत एजेंसी ने विजय माल्या, नीरव मोदी और मेहुल चोकसी के मामले में 18,170.02 करोड़ रुपए की संपत्ति को जब्त किया है। यह राशि बैंकों को हुए कुल नुकसान का लगभग 80.45 फीसदी है। प्रवर्तन निदेशालय ने 9,371.17 करोड़ रुपए की कुर्क/जब्त की संपत्ति पीएसबी और केंद्र सरकार को ट्रांसफर भी कर दिया है।”