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‘एक दिन में मात्र 86 लाख लोगों को वैक्सीन, बेहद खराब!’: रवीश कुमार के लिए पानी पर चलने वाले कुत्ते की कहानी

भारत में कोरोना का टीकाकरण पूरी रफ़्तार के साथ चल रहा है और जब से केंद्र सरकार ने राज्यों के हाथ से जिम्मेदारी ली है, तब से निर्बाध रूप से कार्य हो रहा है। इसी तरह अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के दिन सोमवार (जून 21, 2021) को कोरोना टीकाकरण का 157वाँ दिन था और इस दिन 86,16,373 लोगों को कोरोना वैक्सीन दी गई। वैक्सीनेशन का अभी जो चरण चल रहा है, इसकी घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 7 जून को की थी।

जहाँ मई 2021 में 7.9 करोड़ कोरोना वैक्सीन पूरे देश के लिए उपलब्ध था, जून में ये आँकड़ा 11 करोड़ हो गया है। राज्यों को पहले ही बता दिया गया था कि उन्हें कितनी वैक्सीन दी जानी है, जिससे उन्हें तैयारी करने में आसानी हुई। कल 15.42 लाख वैक्सीन डोज देने के साथ मध्य प्रदेश अव्वल रहा। कर्नाटक में 10.67 लाख और गुजरात में 5.02 लाख लोगों का 1 दिन में मुफ्त टीकाकरण हुआ

गौर करने वाली बात ये है कि इन तीनों ही राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं। हालाँकि, रवीश कुमार ने 1 दिन में करीब 86 लाख लोगों के वैक्सीनेशन में भी नकारात्मकता खोज ली। रवीश कुमार ने इसकी तुलना फरवरी 2012 के एक दिन से की, जब 5 वर्ष से कम उम्र के 17 करोड़ बच्चों को एक दिन में पोलियो की वैक्सीन दी गई थी। इस अभियान को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल और स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आज़ाद ने लॉन्च किया था।

दिल्ली मेट्रो से लेकर हर जगह विज्ञापन दिए गए थे। टीवी-रेडियो पर विभिन्न सेलेब्स के जरिए पोलियो टीकाकरण अभियान को लेकर पहले से ही विज्ञापनों का दौर चालू था। उस समय तक भारत सरकार पाल्स पोलियो कार्यक्रम और 12,000 करोड़ रुपए खर्च किए थे। खास बात ये है कि जनवरी 2011 के बाद से ही भारत में पोलियो का कोई केस नहीं आया था, जिसके एक साल बाद ये 17 करोड़ वाला रिकॉर्ड बना।

रवीश कुमार ने अपने फेसबुक पोस्ट में लिखा, “दस साल बाद गोदी मीडिया के प्रोपेगंडा और करोड़ों रुपए के विज्ञापन के सहारे सरकार पूरा ज़ोर लगाती है और एक दिन में 86 लाख टीके ही लगा पाती है। हो सकता है यह संख्या कुछ और बढ़ कर एक करोड़ तक पहुँच जाए, तो भी यह संख्या कितनी मामूली है। पोलियो अभियान की आलोचना करने वाले इसके चरण की धूल भी नहीं छू सके। वो भी तब जब छह महीने से ढिंढोरा पीटा जा रहा है कि दुनिया का सबसे बड़ा टीका अभियान चल रहा है।”

रवीश कुमार ने न सिर्फ इस अभियान को फ्लॉप बता दिया, बल्कि ये भी कहा कि भारत जैसे देश में एक दिन में टीकाकरण का ये बेहद ही खराब आँकड़ा है। साथ ही उन्होंने इस बात से भी आपत्ति जताई कि टीकाकरण के मामले में न्यूजीलैंड से तुलना हो रही है। न्यूजीलैंड से तुलना सरकार के समर्थक नहीं, जून 2020 में सबसे पहले रवीश कुमार ने ही की थी। अब जब उसकी जनसंख्या से डेढ़ गुना ज्यादा लोगों को 1 दिन में भारत में टीका लगा, तो बताने में क्या बुराई है?

कोरोना वैक्सीनेशन को लेकर रवीश कुमार का प्रोपेगंडा

2 मई को 5 चुनावी राज्यों के नतीजे न कवर करने की बात कह कर भी अपने चैनल पर सुबह से चुनाव परिणाम चलाने वाले रवीश कुमार को तथ्यों से जवाब पाने से पहले ईसाई प्रचारक रॉबर्ट जॉनसन की एक कहानी सुननी चाहिए। चूँकि कहानी ईसाई प्रचारक की है, ‘मैग्सेसे अवॉर्ड’ विजेता को ये पसंद आएगी। संक्षेप में कहानी कुछ यूँ है कि एक दिन एक व्यक्ति अपने कुत्ते को लेकर शिकार पर गया। वहाँ झील के किनारे उसने चिड़ियों का शिकार शुरू किया। उसने जब एक चिड़िया को मार गिराया तो वो झील में गिर गई।

उसका कुत्ता दौड़ कर गया और झील से चिड़िया को उठा कर ले आया। जहाँ भी चिड़िया गिरती, कुत्ता झील में पानी पर चलते हुए जाता और उसे उठा लाता। दूसरे दिन वो व्यक्ति कुत्ते को लेकर फिर शिकार पर गया, लेकिन इस बार अपने पड़ोसी को भी साथ ले गया। उस दिन भी कुत्ते ने वही करामात दिखाई। जितनी भी चिड़िया गोली लगने के बाद गिरती, वो पालतू कुत्ता आराम से झील में पानी पर चलते हुए जाता और उसे उठा लाता।

शिकार ख़त्म होने के बाद जब सब लौटने लगे तो उस व्यक्ति ने अपने पड़ोसी से पूछा, “क्या तुम्हें मेरे कुत्ते में कुछ खास लगा?” पड़ोसी ने कुछ देर सोचने के बाद बड़े गंभीर ढंग से जवाब दिया, “हाँ, तुम्हारे कुत्ते को तो तैरना ही नहीं आता है।” यही हाल रवीश कुमार का है। अगर कोई पानी पर चलने की कला में सिद्धहस्त हो जाए, तो रवीश उसकी आलोचना करने के लिए ये कहेंगे कि उसे तैरना ही नहीं आता है।

अब जरा तथ्यों पर आते हैं। भारत में पोलियो के विरुद्ध टीकाकरण 1985 में शुरू हुआ था। रवीश कुमार इसके 27 वर्ष बाद बने रिकॉर्ड की बात कर रहे हैं। 1999 तक 60% नवजात शिशुओं को पोलियो अभियान के अंतर्गत लाया जा सका था, 14 वर्षों में। इस अभियान में WHO, रोटरी इंटरनेशनल, UNISEF और अमेरिका के डिजीज कंट्रोल विभाग सहित कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भारत के साथ मिल कर काम किया था।

एक और बात, रवीश कुमार किस तरह भ्रम फैला रहे हैं इसे देखिए। जनवरी 2021 में मोदी सरकार ने ‘पोलियो रविवार’ मनाया था और इस दौरान 3 दिन में 11 करोड़ बच्चों को पोलियो की वैक्सीन दी गई थी। ‘पोलियो रविवार’ के दिन 9.1 करोड़ बच्चों को वैक्सीन लगी। ये इस दशक का पहला ही पोलियो अभियान था। 7 लाख बूथ पर वैक्सीनेशन हुआ। कोरोना के बीच इस तरह का अभियान एक बहुत बड़ी सफलता है।

क्या आपने रवीश कुमार को मोदी सरकार की पीठ थपथपाते हुए सुना कि उसने एक दिन में 9.1 करोड़ बच्चों को पोलियो की वैक्सीन लगा दी? नहीं। भारत ने बहुत कम समय में कोरोना जैसी महामारी के खिलाफ तैयारी की, खुद की टेस्टिंग व्यवस्था विकसित की, दुनिया भर को वैक्सीन दी और अपने देश 28 करोड़ से अधिक लोगों का टीकाकरण कर दिया। क्या इसे रवीश कुमार उपलब्धि नहीं मानते?

जहाँ तक पोलियो की बात है, 1950 में ही पोलिश वायरोलॉजिस्ट हिलेरी कोप्रोव्स्की ने पहली पोलियो वैक्सीन का सफल प्रयोग किया था। अमेरिका में इसे अनुमति नहीं मिली, लेकिन कई देशों ने इसका प्रयोग किया। अमेरिका के मेडिकल रिसर्चर जॉन साल्क 1955 और पोलिश-अमेरिकन मेडिकल रिसर्चर जॉन सेबिन 1961 में वैक्सीन लेकर आए। भारत में पोलियो के खिलाफ टीकाकरण 1985 में शुरू हुआ, जॉन सेबिन की वैक्सीन के भी 24 वर्ष बाद।

कोरोना की वैक्सीन आने 24 महीने भी नहीं लगे। कोरोना वायरस के खिलाफ भारत में पहली वैक्सीन जनवरी 2021 में ही एक स्वास्थ्यकर्मी को लगी। जनवरी 2020 में भारत में कोरोना का पहला मामला केरल में आया था। इस तरह रवीश कुमार ने ये छिपा लिया कि पोलियो की वैक्सीन आने के 6 दशक बाद जो रिकॉर्ड बना और कोरोना वैक्सीन आने के 6 महीने बाद जो रिकॉर्ड बना, उसमें अंतर है। दूसरी बात, एक दिन में 9.1 करोड़ पोलियो वैक्सीन मोदी सरकार ने भी लगा दी।

ॐ को योग से तोड़ना और अल्लाह को योग से जोड़ने का कॉन्ग्रेसी प्रोपेगेंडा, कुछ और नहीं हिन्दू विरोध का पुराना पैंतरा

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर अपनी विशेषज्ञता रजिस्टर करते हुए कान्ग्रेस नेता और वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने लिखा; ॐ के उच्चारण से न तो योग ज्यादा शक्तिशाली हो जाएगा और ना अल्लाह कहने से योग की शक्ति कम होगी। 

यह योग पर किसी वकील की नहीं बल्कि एक कॉन्ग्रेसी की निपुणता का बयान है। किसी वकील का बयान होता तो सिंघवी शायद यह कहकर रुक जाते कि; किसी कानून में नहीं लिखा है कि केवल हिन्दू ही योग कर सकते हैं या फिर यह कि; किसी कानून में नहीं लिखा है कि योग करते हुए ॐ का उच्चारण अनिवार्य है। पर खुद को वकील से पहले कॉन्ग्रेसी मानने वाले सिंघवी ने ऐसा बयान चुना जो हिन्दुओं को चिढ़ा सके। उनका बयान यह साबित करता है कि एक कॉन्ग्रेसी इतना प्रतिभावान हो सकता है कि वह योग ही नहीं, अयोग, वियोग, संयोग वगैरह को भी हिन्दू-मुस्लिम एंगल से देख सकता है। वह जब चाहे योग को ॐ से तोड़ कर अल्लाह से जोड़ सकता है। वह कॉन्ग्रेसी के दशकों पुराने दर्शन का प्रयोग करके साबित कर सकता है कि योग दरअसल अल्लाह की देन है।
 
कॉन्ग्रेसी यहाँ से भी आगे जा सकते हैं। जैसे योग यदि किसी सरकारी योजना से पैदा होने वाला संसाधन होता तो सिंघवी यह कह कर भी निकल सकते थे कि योग पर पहला अधिकार अल्पसंख्यकों का …नहीं-नहीं, योग पर पहला अधिकार मुसलमानों का है। वे यह भी कह सकते थे कि हमारी सरकार आएगी तो अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर सरकार की भूमिका पर पुनर्विचार करेगी। योग मूलतः सनातन धर्म की देन है इसलिए कॉन्ग्रेसी उसके साथ अल्लाह को जोड़कर रुक जाते हैं। वे जो चाहें कह सकते हैं क्योंकि पिछले दो दशकों से कॉन्ग्रेस के राजनीतिक दर्शन में अब सत्य के लिए न तो स्थान रहा और न ही पगडंडी। ऐसे में सिंघवी यदि अल्लाह-हू-अकबर कहकर अपना योगाभ्यास आरंभ करें तो भी किसी को फर्क नहीं पड़ेगा।  

जब से अंतरराष्ट्रीय योग दिवस को संयुक्त राष्ट्र संघ ने मान्यता दी है, भारत में योग के विरोधियों की संख्या बढ़ गई है। हर वर्ष किसी न किसी बहाने आजके दिन योग को लेकर तरह-तरह की बातें बनाने का प्रयत्न किया जाता है। कभी लोकतंत्र की तथाकथित कमी या उसके गुणवत्ता को आगे रखकर तो कभी बेरोजगारी के आँकड़े आगे रख कर, कभी सरकार की तथाकथित देश विरोधी नीतियों का ढोल पीट कर तो कभी प्रधानमंत्री मोदी के मन की बात को आगे रखकर। जैसे इस वर्ष विरोध के टेम्पलेटानुसार अस्सी करोड़ भारतीयों के गरीब होने और पैंतीस करोड़ भारतीय महिलाओं के कुपोषित होने जैसे आँकड़ो का प्रयोग करके योग को कलंकित करने का प्रयास किया जा रहा है। सोशल मीडिया पर ट्वीट विमर्श देखकर लग रहा है जैसे सबको एक ही मेसेज मिला है और सारे उसे फैलाने में लगे हैं। प्रश्न यह है कि इन विषयों को योग से जोड़ने का क्या औचित्य है? इस प्रश्न का शायद यह उत्तर है कि कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम केवल योग दिवस पर ही नहीं बल्कि यह कह कर भी प्रश्न उठाता है कि; देश में इतनी समस्याएँ हैं और हम मंगलयान भेजने में लगे हैं।   

देश में समस्याएँ हैं, इस बात से कौन इनकार कर सकता है, पर उन समस्याओं से सम्बंधित कुछ भी आँकड़ों के बहाने योग को अपमानित करने की राजनीति के बारे में क्या कहा जाए? हर योग दिवस पर यह बात क्यों उठाई जाती है कि मुसलमान योग नहीं करेंगे? करोड़ों हिन्दू हैं जो योग दिवस पर योग नहीं करते पर वे तो विरोध नहीं करते। मुसलमानों द्वारा योग के विरोध की बात शायद तब समझ में आती जब सरकार ने योग सबके लिए अनिवार्य कर दिया होता पर जब तक ऐसी कोई स्थिति नहीं आती तब तक मुसलमानों द्वारा योग का विरोध करने की बात खड़ी ही क्यों की जाती है? यदि किसी को योग नहीं करना है तो न करे पर इसे अल्लाह से जोड़ने की कोशिश क्यों? इसके पीछे का उद्देश्य क्या है? योग शरीर के अलावा चित्त को भी स्वस्थ रखता है। ऐसे में कुछ लोगों को यह भय तो नहीं है कि; कहीं योगाभ्यास के कारण उनका चित्त परिष्कृत हो जाएगा तब क्या होगा? यह भय तो नहीं कि चित्त परिष्कृत हुआ तो उनके जीवन में भूचाल आ जाएगा क्योंकि जीवन में बनाई गई उनकी योजनाएँ और उद्देश्य नष्ट हो जाएँगे? कि मन के विकार नष्ट हुए तो जीवन में कुछ बचेगा ही नहीं?  

योग के वर्तमान शिक्षक या संत खुद भी कई बार सार्वजनिक तौर पर कह चुके हैं कि अधिक से अधिक लोगों को योग का लाभ उठाना चाहिए क्योंकि योग का किसी धर्म से लेना-देना नहीं है। योग के शिक्षक यदि ऐसा कहते हैं तो यह उनके अपने विचार हैं। वे यदि योग के स्रोत और उसकी उत्पत्ति निजी कारणों से नकारना चाहते हैं तो यह उनके अपने विचार हैं जो आवश्यक नहीं कि सच ही हों। इस विषय पर एक आम हिन्दू के भी अपने विचार हो सकते हैं जो शायद इन शिक्षकों के विचारों से भिन्न हों पर इस असहमति के बावजूद सार्वजनिक तौर पर कभी हिन्दू समाज ने शिक्षकों के इन विचारों का विरोध नहीं किया। ऐसे में बार-बार यह कहना क्यों आवश्यक है कि योग का हिन्दुत्व या सनातन धर्म से लेना-देना नहीं है? शायद इसका उत्तर इस बात में है कि योग करें या न करें पर उसे अपमानित करने का कोई भी मौका न जाने दें।      

ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनपर विमर्श और उनका उत्तर खोजने का प्रयास होना चाहिए। दुष्प्रचार को समय के हिसाब से उसे चलाने वाले कब कहाँ पहुँचा दें, इसका अनुमान लगाना शायद हर बार संभव न हो सके। हम अपने घुटे हुए इतिहासकारों से अच्छी तरह से परिचित हैं। आज एक कॉन्ग्रेसी योगाभ्यास से ॐ तो तोड़कर अल्लाह को जोड़ रहा है, ऐसे में क्या इस संभावना से इनकार किया जा सकता है कि हमारे घुटे हुए इतिहासकार किसी दिन यह परिकल्पना देना शुरू न कर देंगे कि चूँकि योगाभ्यास के समय लोग अल्लाह अल्लाह करते हैं इसलिए यह साबित होता है कि फलाने पैगम्बर ने दुनियाँ को योग दिया था? 

पॉलिटिकल करेक्टनेस किसे कहाँ तक ले जाता है वह देखने वाली बात होगी पर फिलहाल तो सरकार के विरोध के उद्देश्य से आरंभ हुई एक प्रक्रिया योग विरोध पर पहुँची और वहाँ से एक और छलांग लगाकर हिन्दू विरोध पर जा खड़ी हुई है।

‘धनखड़ जहाँ भी जाता है उसे हर समय कुत्ते की तरह काले झंडे ही क्यों दिखाए जाते हैं?’- TMC नेता मदन मित्रा

नारदा स्टिंग केस में गिरफ्तार किए गए टीएमसी विधायक मदन मित्रा ने ​पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ को लेकर विवादित बयान दिया है। समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक, टीएमसी के विधायक ने सोमवार (21 जून 2021) को कहा, ”जगदीप धनखड़ (राज्यपाल) जहाँ भी जाता है, वहाँ उसे काले झंडे दिखाए जाते हैं। अगर यह एक फिल्म का सीन होता, तो एक भौंकने वाला काला कुत्ता दिखाया जाता।”

मित्रा ने आगे कहा, ”मैं लोगों से अनुरोध करता हूँ कि वो धनखड़ को कभी-कभी पीले, लाल और सुनहरे रंग के झंडे जरूर दिखाएँ। धनखड़ जहाँ भी जाता है उसे हर समय कुत्ते की तरह काले झंडे ही क्यों दिखाए जाते हैं?”

जुबानी जंग हो या फिर फिसलती जुबान मदन मित्रा का यह पहला बयान नहीं है। इससे पहले भी वह कई बार बदजुबानी करते हुए नजर आए हैं। इस साल पश्चिम बंगाल विधानसभा की चुनाव रैली में उन्हें बीजेपी नेताओं को लेकर अभद्र भाषा का प्रयोग करते हुए देखा गया।

मित्रा ने कहा था, ”जो भी बीजेपी से हैं सुनें दूध माँगो तो खीर देंगे, बंगाल माँगो तो चीर देंगे।” टीएमसी नेता के इस बयान को लेकर सोशल मीडिया पर उनकी काफी आलोचना हुई थी। उनके इस बयान को हिंसक बयान के तौर पर देखा गया था।

इससे पहले फरवरी 2021 में ममता बनर्जी की पार्टी के इस नेता ने राज्यपाल धनखड़ को लेकर अपमानजनक टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था कि राज्यपाल को राज्य से वापस भेज देना चाहिए। उस वक्त मित्रा ने कहा था कि पश्चिम बंगाल चुनाव में टीएमसी 294 सीटों में से 250 से अधिक सीटों पर जीत हासिल करेगी। हमारी पार्टी बंगाल में और ताकतवर बनकर उभरेगी और प्रचंड बहुमत से सरकार बनाएगी।

बता दें कि पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद से शुरू हुई सियासी हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है। पश्चिम बंगाल में जारी हिंसा को लेकर सोशल मीडिया पर कई तस्वीरें और वीडियो आए दिन वायरल होती रहती हैं। टीएमसी के जीत के बाद से राज्य में कई राजनीतिक दलों, खासकर भाजपा के कार्यकर्ताओं को हिंसा का शिकार होना पड़ा है।

भाजपा के सैकड़ों कार्यकर्ताओं और समर्थकों को परिवारों समेत अपने गाँवों से पलायन करने के लिए मजबूर कर दिया गया है। वे असम चले गए, जहाँ मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने उनकी मदद की। उन्होंने सभी भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए रहने और भोजन की व्यवस्था की है। गौरतलब है कि सिर्फ भाजपा ही नहीं, बल्कि माकपा ने भी टीएमसी पर अपने कार्यकर्ताओं की हत्या का आरोप लगाया है। मीडिया में बीएसएफ जवानों पर भी हमले की खबरें भी सामने आई हैं।

हिंदू से धर्मान्तरण कर बना मोहम्मद उमर गौतम, चला रहा था दिल्ली के जामिया से मुस्लिम बनाने का रैकेट: कई बड़े खुलासे

उत्तर प्रदेश के नोएडा में ए़टीएस की टीम पुलिस ने धर्मान्तरण कराने वाले दो मौलानाओं को गिरफ्तार किया है। इसमें से एक उमर गौतम पहले हिंदू ही था। वह करीब 30 साल पहले धर्मान्तरण कर मुस्लिम बन गया था। इसके बाद से ही वो दिल्ली के जामिया नगर इलाके में इस्लामिक दावा सेंटर चला रहा था। यहीं से धर्मान्तरण का सारा खेल खेला जाता है।

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले का रहना वाले उमर गौतम का असली नाम श्याम प्रताप सिंह था, जिसका जन्म 1964 में परिवार में हुआ था। उमर गौतम के 6 भाई थे, जिनमें से वो चौथे नंबर का है।

आज तक की रिपोर्ट के मुताबिक, गाँव में प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद गौतम इलाहाबाद (प्रयागराज) चला गया और वहाँ से बीएससी एग्रीकल्चर करने के लिए नैनीताल चला गया। यहीं पर हॉस्टल में रहते हुए एक दिन गौतम बहुत बीमार हो गया और उसकी सेवा पड़ोस में रहने वाला नासिर करने लगा। नासिर अपनी साइकिल पर बैठाकर उसे डॉक्टर के पास ले जाता था, जिससे दोनों के बीच दोस्ती बढ़ी।

इस बीच नासिर श्याम को लगातार इस्लामिक किताबें पढ़ने के लिए देता रहा। करीब डेढ़ साल तक चले इस सिलसिले के बाद श्याम इस्लाम से इतना प्रभावित हुआ कि उसने हिंदू धर्म त्यागकर इस्लाम अपना लिया और नाम बदलकर मोहम्मद उमर गौतम रख लिया। उसने जामिया मिलिया इस्लामिया से इस्लामिक स्टडीज में एमए भी किया है।

विदेशों में इस्लाम का प्रचार करता है उमर गौतम

इस्लाम में शामिल होने के बाद सबसे पहले उमर गौतम उर्फ श्याम प्रताम सिंह ने दिल्ली के जामिया इलाके में इस्लामिक दावा सेंटर खोला। इसके बाद वह विदेशों में इस्लाम का प्रचार करता था। वह लोगों को इस्लाम धर्म अपनाने के लिए तैयार करता था।

आईओसी से चलता था धर्मान्तरण का सारा खेल

उमर गौतम द्वारा स्थापित इस्लामिक दावा सेंटर में ही गैर मुस्लिमों का धर्मान्तरण कराया जाता था। मोहम्मद उमर अपने चार मंजिला घर को ही ऑफिस बना रखा था, जिसे एटीएस ने सील कर दिया है। पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर के मुताबिक, आरोपित दावा सेंटर में लोगों का धर्मान्तरण कराने के बाद उनका निकाह कराते थे। धर्मान्तरण और निकाह का प्रमाण पत्र बनवाने के बाद उसे अवैध तरीके से कानूनी मान्यता दिलावाया जाता था। ये दोनों अब तक 1,000 से अधिक लोगों का धर्मान्तरण करा चुके हैं।

सिस्टर लूसी को वेटिकन ने कविता लिखने व कार चलाने पर चर्च से किया बर्खास्त: एक नन की संघर्ष की कहानी

फ्रांसिस्कन क्राइस्ट कॉन्ग्रेगेशन (FCC) द्वारा सिस्टर लूसी कलापुरा को बर्खास्त करने के कुछ दिनों के बाद ही वेटिकन ने उन्हें बहुत ही तुच्छ आरोप लगाकर चर्च से निष्कासित कर दिया है। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में इसकी जानकारी दी गई। सिस्टर लूसी उस पांच ननों में से एक थीं, जो बिशप फ्रेंको मुलक्कल पर रेप का आरोप लगाने वाली नन के साथ खड़ी थीं।

पूर्व नन लूसी 17 साल की कमसिन उम्र में एफसीसी में शामिल हुई थीं। हालाँकि, चर्च का आरोप है कि इतने दिनों में उन्होंने बहुत-से ‘अपराध’ किए हैं, जिनमें कार खरीदना और बिना अनुमति के कविताएँ प्रकाशित करना शामिल हैं। कथित तौर पर अपना ‘प्रतिज्ञा’ तोड़ने के लिए सम्मन दिए जाने के बावजूद सिस्टर लूसी अपने फैसले पर अडिग रहीं। उन्होंने आज्ञा का उल्लंघन करते हुए सलवार कुर्ता के लिए अपनी नन की आदत को भी त्याग दिया। कैथोलिक चर्च के पाखंड की ओर इशारा करते हुए लूसी कहती हैं कि नन के विपरीत पादरियों को सामान्य पोशाकों को पहनने की अनुमति थी।

Screengrab of the report by The Times of India

लूसी ने चर्च के पादरियों की ओर यौन शोषण का इशारा करते हुए एक संस्मरण लिखा था, जिससे वेटिकन भी नाराज था। जहाँ तक कार खरीदने के अपराध के आरोप हैं, सिस्टर लूसी ने कार खरीदने की अनुमति माँगी थी, लेकिन उसे ठुकरा दिया गया था। हालाँकि, वह एक सफेद ऑल्टो खरीदकर लाईँ और ड्राइविंग स्कूल चलाने वाली एक महिला से ड्राइविंग भी सीखी। सिस्टर लूसी ने तर्क दिया था, “किराए की कारों में सिस्टर्स दिन-रात पुरुष चालकों के साथ यात्रा करती हैं। क्या यह अधिक सुरक्षित नहीं होगा कि नन ही गाड़ी चलाए?” 

उन्होंने बताया कि कोरोना वायरस महामारी के दौरान आपातकालीन सेवाएँ प्रदान करने और लॉकडाउन के प्रबंधन में पुलिस की सहायता करने के लिए कार का रखना लाभदायक सिद्ध हुआ। हालाँकि, कार रखने का औचित्य फ्रांसिस्कन क्राइस्ट कॉन्ग्रिगेशन (FCC) को संतुष्ट नहीं कर सका। इसका परिणाम यह हुआ कि चर्च ने उन्हें बर्खास्त कर दिया और पिछले सप्ताह वेटिकन ने भी अपील को ठुकरा दिया।

लेकिन, एक दृढ़ निश्चयी सिस्टर चर्च की जबरदस्ती वाली इस रणनीति के आगे झुकने को तैयार नहीं है। लूसी ने कहा, “मेरे कमरे के अलावा, उन्होंने मुझे कॉन्वेंट के अन्य दूसरी जगहों पर जाने से मना कर दिया है। वे मुझसे बात नहीं करते। फिर भी, मैं अपनी लड़ाई जारी रखूँगी और मैं इस कॉन्वेंट को नहीं छोड़ूँगी।” इस पूर्व नन ने अफसोस जताया कि उसे अपने साथी ननों द्वारा ‘अत्यधिक अलगाव’ का सामना करना पड़ता है। हालाँकि, सिस्टर लूसी को ‘Save our Sisters’ फोरम के संयुक्त-संयोजक रिज्जू कंज्जूकरन का समर्थन मिला है। 

सिस्टर लूसी को कार्यकर्ताओं और चर्च सुधारकों का समर्थन मिला

ऐक्टिविस्ट का कहना है, “आज्ञाकारिता की प्रतिज्ञा’ का यह मतलब नहीं है कि किसी को कुछ भी और सब कुछ मानना ​​चाहिए। आज्ञाकारिता और दासता के बीच अंतर है।” उनके खिलाफ कार्रवाई नन के प्रोटेस्ट में भाग लेने के बाद तेज हो गई थी। विडंबना यह है कि बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार किए गए फ्रेंको मुलक्कल और सीनियर सेफी और फादर थॉमस कोट्टूर, जिन्हें अभया हत्याकांड में सीबीआई अदालत ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी, सभी अभी भी क्रमशः बिशप, नन और प्रीस्ट हैं।

रिज्जू कंज्जूकरन बताते हैं कि सिस्टर लूसी को आम लोगों का जबरदस्त समर्थन प्राप्त है। चर्च ‘सुधारक’ इंदुलेखा जोसेफ ने कहा कि सिस्टर लूसी की तरह ननों में भीतर की व्यवस्था से लड़ने का साहस नहीं है। पूर्व नन के लिए आने वाली चुनौतियों के बारे में बोलते हुए जोसेफ ने कहा, “यदि कोई नन कॉन्वेंट लाइफ से बाहर आने का फैसला करती है या उसे निष्कासित कर दिया जाता है तो वह वर्षों तक की अपनी सेवा के किसी भी लाभ का पात्र नहीं होगी।” 

सिस्टर लूसी को कॉन्वेंट छोड़ना ही होगा: चर्च कार्यकर्ता

फ्रांसिस्कन क्राइस्ट कॉन्ग्रिगेशन (FCC) से सिस्टर लूसी को बर्खास्त किए जाने के बाद कई लोगों ने कॉन्वेंट परिसर में उनके रहने पर आपत्ति जताई है। कैनेडी कार्तम्बिंकलायटल नाम की एक कार्यकर्ता ने आरोप लगाया कि पूर्व नन ने ‘निराधार आरोपों’ के आधार पर अपने संस्मरण में कई पादरियों और ननों के नाम पर धब्बा लगाया है। उन्होंने दावा किया कि वह अपनी अनुशासनहीनता को फ्रेंको मुद्दे से जोड़कर उसका राजनीतिकरण कर रही हैं।

कैसे सिस्टर लूसी बनी बदनाम करने के अभियान का निशाना?

ध्यान देने की बात है कि बलात्कार के आरोपी बिशप फ्रेंको मुलक्कल के खिलाफ प्रदर्शन को समर्थन देने के कारण चर्च ने सिस्टर लूसी को बदनाम करने का एक अभियान छेड़ रखा है। सिस्टर लूसी को अगस्त 2019 में अनुशासनहीनता और ‘नियमों के उल्लंघन में’ अपनी जीवन शैली के लिए एक संतोषजनक स्पष्टीकरण देने में विफल रहने के आधार पर फ्रांसिस्कन क्लैरिस्ट कांग्रेगेशन (FCC) से निष्कासित कर दिया गया था। कुछ दिनों के बाद सिस्टर लूसी ने केरल के वेल्लामुंडा पुलिस में वायनाड जिले के मनंतवाडी में कराक्कमाला में एक कॉन्वेंट के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई।

उन्होंने कॉन्वेंट पर अवैध रूप से बंधक बनाने का आरोप लगाया था। सिस्टर लूसी ने अपनी शिकायत में कहा था कि अवैध बंधन के कारण वह पास के एक चर्च में पवित्र सभा में शामिल नहीं हो पा रही थीं। उसने पाया कि कॉन्वेंट के गेट बाहर से बंद थे जिसके बाद उन्होंने पुलिस को फोन किया, जिसने गेट खोलने में मदद की। कॉन्वेंट ने बाद में उन्हें इसके खिलाफ दायर दो मामलों को वापस लेने और अगर वह वहाँ रहना चाहती थीं तो बिना शर्त माफी माँगने के लिए के लिए मजबूर किया था।

केंद्र ने बंगाल के पूर्व मुख्य सचिव अलपन बंदोपाध्याय के खिलाफ शुरू की अनुशासनात्मक कार्रवाई, लग सकता है बड़ा जुर्माना

केंद्र सरकार ने कथित कदाचार और दुर्व्यवहार को लेकर पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्य सचिव अलपन बंदोपाध्याय के खिलाफ बड़ी दंडात्मक कार्यवाही शुरू की है। साथ ही उन पर बड़ा जुर्माना लगाया जा सकता है। अधिकारियों ने सोमवार (21 जून 2021) को यह जानकारी दी।

अधिकारियों ने बताया कि अब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सलाहकार की भूमिका निभा रहे बंदोपाध्याय से कार्मिक एवं प्रशिक्षण मंत्रालय (डीओपीटी) द्वारा आरोपों का उल्लेख करते हुए भेजे गए ज्ञापन का 30 दिनों के अंदर जवाब भेजने को कहा गया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 1987-कैडर के आईएएस अधिकारी को बड़ी जुर्माना और कार्रवाई की चेतावनी दी गई है। इसके तहत पूर्व मुख्य सचिव की केंद्र सरकार पेंशन या ग्रैच्यूटी अथवा दोनों पूरी तरह से या उसका कुछ हिस्सा रोक सकती है।

बता दें कि केंद्र ने बंदोपाध्याय को दिल्ली बुलाने का आदेश चक्रवाती तूफान यास पर पीएम मोदी के साथ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की बैठक में देर से पहुँचने के कुछ घंटों के बाद दिया था। 31 मई को ही बंदोपाध्याय मुख्य सचिव पद से रिटायर्ड हो रहे थे, लेकिन 24 मई को ही राज्य में कोविड-19 महामारी से निपटने में मदद के लिए बंदोपाध्याय का कार्यकाल तीन महीने के लिए बढ़ाने का आदेश जारी किया गया था।

केंद्र ने 28 मई 2021 को पश्चिम बंगाल सरकार को पत्र लिखकर अलपन बंदोपाध्याय को मुक्त करने का अनुरोध किया था। वहीं, इसके बाद ममता ने पीएम मोदी को पत्र लिखकर केंद्र के इस फैसले को वापस लेने, पुनर्विचार करने और आदेश को रद्द करने को कहा था।

केरल में 14 साल की लापता बच्ची 2 साल बाद तमिलनाडु में 4 महीने के बच्चे के साथ मिली, पुलिस को रहमान की तलाश

केरल के पलक्कड़ जिले से दो साल पहले लापता हुई 14 साल की एक बच्ची पुलिस को तमिलनाडु के मदुरै में शुक्रवार (18 जून 2021) को मिली। उस बच्ची के साथ चार महीने का एक बच्चा भी था। पुलिस ने बताया कि 16 वर्षीय माँ 22 साल के व्यक्ति के साथ रह रही थी, जिसका अभी तक पता नहीं चल पाया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, साल 2019 में वे दोनों कथित तौर पर भाग गए थे। लड़की के साथ भागने वाला व्यक्ति पहले लड़की की माँ के साथ पलक्कड़ में केटरिंग का काम करता था। पुलिस का कहना है कि उसे नहीं पता कि परिवार को दोनों के एक साथ रहने की जानकारी है या नहीं।

लड़की पलक्कड़ के कोझिंजम्पारा की रहने वाली है, जो तमिलनाडु की सीमा पर स्थित है। बेटी के लापता होने के बारे में उसके माता-पिता ने पुलिस को सूचित किया था। इसके बाद कोझिंजम्पारा पुलिस ने गुमशुदगी का मामला दर्ज किया था। ​हालाँकि, काफी खोजबीन के बाद भी लड़की का पता नहीं लग पाया था।

दो साल के बाद पुलिस को सूचना मिली कि वह मदुरै में है। पलक्कड़ जिले के पुलिस उपाधीक्षक जॉन सी ने बताया, “वह मदुरै के एक व्यक्ति के घर पर मिली थी, जो उसकी माँ के साथ काम करता था। उसके अन्य रिश्तेदार भी उसके घर के नजदीक रहते हैं और लड़की को उसकी पत्नी बताया जा रहा है। उन्होंने कहा कि लगता है कि उन लोगों को लड़की की उम्र के बारे में जानकारी है। वह अब चार महीने के बच्चे की माँ है।”

डीएनए सैंपल लिए जाएँगे

पुलिस ने कहा कि लड़की और उसके बच्चे को केरल वापस लाया गया है, लेकिन वह व्यक्ति फरार है। उसकी तलाश की जा रही है। इस मामले में व्यक्ति के खिलाफ प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्शुअल ऑफेंस (पॉक्सो) एक्ट की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है। मामले में आगे की जाँच के लिए लड़की और उसके बच्चे के डीएनए सैंपल भी लिए जाएँगे।

बता दें कि हाल ही में केरल के पलक्कड़ जिले के अयालुर गाँव से 11 साल पहले एक लड़की अचानक लापता हो गई थी। उसके घर वालों ने उसे तमाम जगहों पर खोजा, लेकिन वह कहीं नहीं मिली। एक दिन पता चला कि 18 साल की जो लड़की 11 वर्ष पहले लापता हो गई थी, वह अपने माता-पिता के घर से महज 500 मीटर की दूरी पर रह रही है। गायब युवती पिछले एक दशक से उस आदमी के साथ एक कमरे में रह रही है, जिससे वह प्यार करती थी।

रहमान कई बार काम पर भी नहीं जाता था, अपना भोजन कमरे में ही करता था और अंदर ही बैठा रहता था। सजीथा भी सिर्फ रात को निकल कर स्नान वगैरह करती थी, जब बाकी लोग सो रहे होते थे। रात को ही वो बाहर निकल कर बैठती भी थी। लुकाछिपी का ये खेल एक दशक से भी अधिक समय से चल रहा था।

4 दिनों के इंतजार के बाद भी राहुल और सोनिया गाँधी से नहीं मिल सके झारखंड के CM हेमंत सोरेन

राजस्थान, पंजाब और महाराष्ट्र में बढ़ते संकट के साथ पूर्वी राज्य झारखंड में कॉन्ग्रेस पार्टी के लिए परेशानी बढ़ती जा रही है। चार दिनों से दिल्ली में डेरा डालकर बैठे झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की ना ही कॉन्ग्रेस प्रमुख सोनिया गाँधी से मुलाकात हो पा रही है और ना ही पार्टी वरिष्ठ नेता राहुल गाँधी से।

दिलचस्प बात यह है कि जब सोरेन मीटिंग की प्रतीक्षा कर रहे थे, तब सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी तमिलनाडु के नए मुख्यमंत्री एमके स्टालिन से मिलने चले गए, जो तमिलनाडु में कॉन्ग्रेस की सहयोगी पार्टी डीएमके के प्रमुख भी हैं। The Daily Pioneer के हवाले से सूत्रों ने दावा किया कि यह दौरा झामुमो प्रमुख के लिए अच्छा नहीं रहा।

The Daily Pioneer की रिपोर्ट में कहा गया, “हेमंत शनिवार को राँची लौटे। वह बार-बार सोनिया और राहुल को फोन करने की कोशिश कर रहे थे लेकिन नाकाम रहे। अभी झामुमो से नाराजगी दूर नहीं हुई। इसके अलावा, स्टालिन के साथ उनकी मुलाकात ने घाव पर नमक छिड़का है।”

हेमंत सोरेन झामुमो के प्रमुख हैं, जो एक क्षेत्रीय पार्टी है। यह झारखंड में कॉन्ग्रेस पार्टी के साथ गठबंधन में सत्ता में है। हेमंत ने गाँधी परिवार के सदस्यों के साथ एक मुलाकात की माँग की थी। बताया जा रहा है कि उन्होंने कैबिनेट पद पर नियुक्ति और मंत्रिपरिषद में संभावित फेरबदल, निगमों में नियुक्तियों जैसे मुद्दों पर चर्चा करने के लिए मुलाकात का समय माँगा था।

झारखंड के मुख्यमंत्री के अलावा, झारखंड कॉन्ग्रेस के प्रमुख और हेमंत सरकार में वित्त मंत्री रामेश्वर उरांव भी गाँधी परिवार के साथ पार्टी मामलों पर ‘चर्चा’ करने के साथ-साथ निगमों और आयोगों आदि में नियुक्तियों पर विचार-विमर्श करने के लिए दिल्ली में थे। यह ध्यान देने योग्य है कि दोनों झामुमो और कॉन्ग्रेस की राज्य इकाई ने झारखंड में हेमंत की सरकार में खाली 12वीं कैबिनेट पद पर दावा पेश किया है।

सीएम के साथ, झामुमो के पास पाँच मंत्री हैं, जबकि कॉन्ग्रेस के पास चार और दूसरे सहयोगी राजद के पास एक मंत्री पद है। माना जाता है कि हेमंत और उरांव ने सभी लंबित मुद्दों पर मतभेदों को दूर करने के लिए शीर्ष कॉन्ग्रेस नेतृत्व के साथ बैठक में भाग लिया था।

सूत्रों का दावा है कि हेमंत सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी से मिलने के लिए समय नहीं देने से दुखी हैं। यहाँ जिक्र करना उल्लेखनीय है कि वह अकेले नहीं हैं, जिन्हें माँ-बेटे की जोड़ी ने अपमानित किया है। इससे पहले भी ऐसे कई कॉन्ग्रेसी नेता रहे हैं, जिन्हें गाँधी परिवार के सदस्यों ने मुलाकात करने से मना करके उन्हें पार्टी छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया था।

असम में कॉन्ग्रेस विधायक रूपज्योति कुर्मी ने कॉन्ग्रेस छोड़ी, राहुल गाँधी को बताया जाने का कारण

इससे पहले कल, असम के मरियानी निर्वाचन क्षेत्र से 4 बार के कॉन्ग्रेस विधायक रूपज्योति कुर्मी ने कॉन्ग्रेस नेतृत्व से असंतोष व्यक्त किया। गाँधी परिवार पर तीखा हमला करते हुए कुर्मी ने कहा कि राहुल गाँधी को गूँगे लोगों और उनके कुत्ते का साथ पसंद है। 18 जून को कुर्मी ने यह कहते हुए कॉन्ग्रेस पार्टी से इस्तीफा दे दिया कि वह राहुल गाँधी के नेतृत्व से ‘निराश और मोहभंग’ हैं।

कुर्मी बाद में असम के सीएम हिमंत बिस्वा सरमा की उपस्थिति में भाजपा में शामिल हो गए, जिन्होंने इसी तरह की परिस्थितियों में 2015 में खुद कॉन्ग्रेस से इस्तीफा दे दिया था। सरमा ने ट्वीट किया कि कुर्मी असम में चाय-जनजाति समुदाय के एक प्रमुख नेता हैं और भाजपा में उनका स्वागत किया जाएगा।

गाँधी परिवार द्वारा दरकिनार किए जाने के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कॉन्ग्रेस से इस्तीफा दे दिया

मार्च 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया को सोनिया गाँधी को अपना इस्तीफा ट्वीट करने के कुछ ही मिनटों बाद कॉन्ग्रेस पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था। सिंधिया ने अपने द्वारा उठाई गई माँगों के लिए कॉन्ग्रेस नेतृत्व की निष्क्रियता से थक जाने के बाद अपना इस्तीफा देने की बात कही थी। सिंधिया ने सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी को लिखा था कि पार्टी अन्य बातों के अलावा मध्य प्रदेश में चुनावी घोषणा पत्र के अनुसार अपने वादों से मुकर रही है। हालाँकि, गाँधी परिवार के लिए मुद्दों को हरी झंडी दिखाने के बावजूद, कॉन्ग्रेस पार्टी नेतृत्व ने कथित तौर पर अपने पैर खींच लिए।

इसके लिए एक अन्य कारक यह था कि कॉन्ग्रेस के शीर्ष नेता मध्य प्रदेश में नेतृत्व की भूमिका के लिए सिंधिया की लगातार निंदा कर रहे थे। सिंधिया को कथित तौर पर राज्यसभा सीट के लिए कॉन्ग्रेस नेतृत्व द्वारा वादा किया गया था, लेकिन यह अमल में नहीं लाया गया। उनकी माँगों को दरकिनार कर दिया गया और उनके साथ बुरा व्यवहार किया गया, सिंधिया ने आखिरकार पार्टी से इस्तीफा दे दिया और भाजपा में शामिल हो गए। 

राहुल गाँधी के व्यवहार के कारण हिमंत बिस्वा सरमा ने छोड़ी कॉन्ग्रेस

कॉन्ग्रेस के पूर्व दिग्गज हिमंत बिस्वा सरमा, जो अब भाजपा सरकार में असम के मुख्यमंत्री हैं, ने कॉन्ग्रेस में प्रचलित वंशवादी संस्कृति का हवाला देते हुए पार्टी से इस्तीफा दे दिया था। सितंबर 2015 में जब उन्होंने कॉन्ग्रेस पार्टी से नाता तोड़ लिया तो सरमा ने कहा कि ‘परिवार-केंद्रित’ राजनीति और कॉन्ग्रेस में ‘लोकतंत्र की कमी’ ने उन्हें पद छोड़ने के लिए मजबूर किया।

दो साल बाद जब राहुल गाँधी ने ट्विटर पर अपने पालतू कुत्ते का एक वीडियो साझा किया तो हिमंत बिस्वा सरमा ने खुलासा किया कि कैसे गाँधी परिवार अपने पालतू जानवरों को बिस्कुट खिलाने में व्यस्त था, जबकि वह और असम के अन्य लोग महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा करना चाहते थे।

वहीं, भ्रमित कॉन्ग्रेस समर्थकों का मानना है कि गाँधी परिवार का पार्टी पर लाभकारी प्रभाव पड़ता है। अधिकांश असंतुष्ट कॉन्ग्रेसी नेताओं, विशेष रूप से जिन्होंने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है, ने गाँधी परिवार को उस परिस्थिति के लिए जिम्मेदार ठहराया है जिसमें आज कॉन्ग्रेस है। ऐसा लगता है कि कॉन्ग्रेस गर्त में गोते लगा रही है क्योंकि यह पंजाब, राजस्थान, महाराष्ट्र में संकट का सामना कर रही है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, झारखंड में कॉन्ग्रेस के पास एक और असंतुष्ट गठबंधन सहयोगी भी हो सकता है।

सीएम योगी का ऐलान: यूपी में अब साप्‍ताहिक बंदी में भी खुलेंगे धार्मिक स्‍थल, एक समय में 5 लोगों को मिलेगा प्रवेश

उत्तर प्रदेश में कोरोना के मामलों में लगातार कमी दर्ज की जा रही है। इसी बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने धार्मिक स्थलों को खोलने का आदेश दे दिया है। यूपी के सीएम ने सोमवार (21 जून 2021) को साप्‍ताहिक बंदी की समीक्षा के दौरान यह ऐलान किया साथ ही कई और निर्देश भी दिए।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सीएम ने आज टीम 9 के साथ हुई बैठक के दौरान कोरोना के नए मामलों और एक्टिव केस में आ रही कमी को देखते हुए धार्मिक स्थलों को खोलने का आदेश दे दिया है। मुख्यमंत्री के आदेश के मुताबिक, अब साप्ताहिक बंदी के बीच धार्मिक स्थलों में कोरोना नियमों का पालन करते हुए एक समय में 5 श्रद्धालु प्रवेश कर सकेंगे। बताया जा रहा है कि कोरोना के कारण लंबे समय से धार्मिक स्‍थलों के बंद रहने के कारण लोग अपने आराध्‍य के दर्शन और पूजन के लिए परेशान थे।

वहीं, सीएम ने प्रदेश में लागू साप्ताहिक बंदी के दौरान श्रामिकों और कार्मिकों को आने-जाने में छूट भी दी है। इसके साथ ही साप्ताहिक बंदी का कड़ाई से पालन करा रहे राज्य के पुलिसकर्मियों को ड्यूटी के दौरान आम लोगों के साथ संवेदनशीलता से पेश आने को भी कहा है।। सीएम ने कहा कि संक्रमण को देखते हुए कहीं भीड़-भाड़ न हो, इसके लिए पुलिस प्रशासन संवेदनशीलता का भाव रखते हुए लोगों से कोरोना प्रोटोकॉल का कड़ाई से पालन कराए।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, यूपी में रोजाना जारी हो रहे कोरोना संक्रमितों के आँकड़ों में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। सोमवार को जारी आँकड़ों में राज्य में बीते 24 घंटे में 213 नए कोरोना के मामले सामने आए। वहीं, 478 लोगों को डिस्चार्ज किया गया है। प्रदेश में अब कोरोना से एक्टिव मामलों का ग्राफ कम होकर 4163 तक पहुँच गया। बात करें यूपी में कोरोना के रिकवरी रेट की तो यह 98.5 तक पहुँच गया है।

बता दें कि कोरोना की रफ्तार पर काबू पाने के लिए योगी सरकार हर संभव कोशिश कर रही है। इसी क्रम में सोमवार को प्रदेश में बाजार, रेस्‍टोरेंट और शॉपिंग माल रात 9 बजे तक के लिए खोल दिए गए हैं। साप्‍ताहिक बंदी प्रदेश में फिलहाल लागू रहेगी। इस दौरान बाजारों, रिहायशी इलाकों और दफ्तरों को सैनिटाइज किया जाएगा।

केंद्र सरकार के महावैक्सीनेशन अभियान के पहले दिन लगे 70 लाख डोज, MP ने 1 ही दिन में पूरा कर लिया 10 लाख का लक्ष्य

देश में कोरोना वायरस की रोकथाम के लिए आज (21 जून 2021) से वैक्सीनेशन का महाअभियान शुरू हुआ और पहले ही दिन देश भर में 70 लाख से ज्यादा डोज नागरिकों को लगा दी गईं। इस महाअभियान के क्रम में मध्यप्रदेश ने नया रिकॉर्ड कायम किया। अकेले वहाँ केंद्र सरकार के इस अभियान के तहत 10 लाख वैक्सीन लगाई गई।

गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने फ्री वैक्सीन देने के संबंध में 7 जून को ऐलान किया था। ऐलान के मुताबिक आज से मोदी सरकार 18 साल से ऊपर सभी लोगों को मुफ्त में वैक्सीन मुहैया करवाएगी। सरकार ने कहा था कि राज्य को अब टीका बनाने वाली कंपनियों से वैक्सीन नहीं खरीदनी होगी। 75% वैक्सीन केंद्र खरीदेगा और इसे राज्यों को मुफ्त में वितरित करेगा। 

बता दें कि बाकी बचे 25 फीसद वैक्सीन की खरीदारी निजी अस्पताल सीधे टीका निर्माता कंपनी से कर सकते हैं। लेकिन ये आँकड़ा राज्य और केंद्र शासित प्रदेश निजी अस्पतालों की माँग को अपने रिकॉर्ड में रखेंगे, ताकि राज्य के सभी अस्पतालों को समान हिस्सा मिल सके।

इस ऐलान के बाद शुरू हुआ महावैक्सीनेशन अभियान हर राज्य में आज शाम 5 बजे तक तेजी से चलता रहा। नतीजन 70 लाख डोज पहले ही दिन नागरिकों को लगा दी गईं। वहीं मध्य प्रदेश के सीएम शिवराज सिंह चौहान ने जानकारी दी कि शाम के 5 बजे तक उनके राज्य में 12 लाख लोगों को कोरोना वैक्सीन लगाई जा चुकी है।

सीएम शिवराज ने ट्वीट करते हुए लिखा, ”अगर मेरा मध्यप्रदेश ठान लें, तो दुनिया के किसी भी लक्ष्य को हम प्राप्त कर सकते हैं। मुझे बहुत खुशी हो रही है कि आज का हमारा 10 लाख कोविड वैक्सीन के डोज लगाने का लक्ष्य, इसे हम पार कर चुके है। शाम 5 बजे तक 12,12,439 डोज़ेज़ मध्यप्रदेश वैक्सीनेशन महा अभियान के अंतर्गत लगाए जा चुके हैं।”

उन्होंने आगे लिखा, “यह सिर्फ शुरुआत है, हमारा लक्ष्य प्रदेश के सभी वयस्कों को टीका लगाना है!  हमारे यशश्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में एवं मध्यप्रदेश की जनता जनार्दन के उत्साह से हमने यह सफलता प्राप्त की है! मध्यप्रदेश वैक्सीनेशन महा अभियान।”

बता दें कि 21 जून से शुरू हुए इस चरण में Cowin.gov.in पर पहले रजिस्ट्रेशन कराना भी जरूरी नहीं है। सभी सरकारी और निजी टीकाकरण केंद्रों पर ही यह सुविधा लोगों को मुहैया कराई जा रही है। केंद्र सरकार द्वारा शुरू किया गया ये अगला चरण भले ही सभी 18 साल के ऊपर के लोगों को वैक्सीन मुफ्त में मुहैया करवाएगा। लेकिन यदि किसी स्वास्थ्य कार्यकर्ता, फ्रंट लाइन वर्कर, 45 वर्ष की आयु वाले नागरिक और फिर वे नागरिक जिनकी दूसरी खुराक बाकी है तो उन्हें वैक्सीन का शॉट देना पहली प्राथमिकता होगी। इसके बाद 18 वर्ष और उससे अधिक के नागरिकों को टीकाकरण में प्राथमिकता दी जाएगी।