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BJP से विधायक बने, बिना इस्तीफा दिए TMC में चले गए: मुकुल रॉय के खिलाफ दल-बदल कानून के तहत कार्रवाई की माँग

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव में जीत के बाद पाला बदलकर बीजेपी से टीएमसी में घर वापसी करने वाले मुकुल रॉय की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। बीजेपी के दिग्गज और पश्चिम बंगाल में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने विधानसभा अध्यक्ष को एक याचिका सौंपकर उन्हें अयोग्य घोषित करने की माँग की है। इसमें अधिकारी ने कहा है कि TMC नेता मुकुल रॉय, 83-कृष्णनगर उत्तर विधानसभा क्षेत्र के से भाजपा की टिकट पर जीते थे। टीएमसी शामिल होते वक्त उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए था, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।

अधिकारी ने रॉय के टीएमसी में शामिल होने के बाद दलबदल विरोधी कानून का हवाला देते हुए इस कार्रवाई की माँग की है।

शुभेंदु अधिकारी ने गुरुवार (जून 17, 2021) को कहा था कि भाजपा की माँग का समर्थन करने के लिए सभी कागजी कार्रवाई पूरी हो चुकी है, लेकिन रिसीव सेक्शन बंद होने के कारण जमा नहीं किया जा सका। इससे पहले उन्होंने मुकुल रॉय पर निशाना साधते हुए कहा था कि अगर वह अपना इस्तीफा नहीं देते हैं तो उनके खिलाफ दलबदल विरोधी कानून लागू करने की माँग को लेकर पश्चिम बंगाल अध्यक्ष से संपर्क किया जाएगा।

शुभेंदु ने कहा, “कृष्णनगर उत्तर के एक विधायक ने पार्टी बदल दी है, और हमें उम्मीद है कि वह विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे देंगे। अगर वह कल तक इस्तीफा नहीं देते हैं तो हम अध्यक्ष को पत्र लिखकर दलबदल विरोधी कानून लागू करने की माँग करेंगे।”

इस मामले में बीजेपी की आईटी सेल के प्रमुख अमित अमित मालवीय ने कहा कि तृणमूल कॉन्ग्रेस में शामिल होने के बाद ही मुकुल रॉय को खुद ही विधानसभा से इस्तीफा दे देना चाहिए था, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया है। उनको अयोग्य घोषित करने के लिए एक याचिका पश्चिम बंगाल के विधानसभा अध्यक्ष को सौंपी गई है।

एक ट्वीट में मालवीय ने कहा, “ममता बनर्जी की मौजूदगी में टीएमसी में शामिल होने के बाद, मुकुल रॉय को बंगाल विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे देना चाहिए था, एक सीट (कृष्णनगर उत्तर) जो उन्होंने भाजपा के टिकट पर जीती थी। अब, पश्चिम बंगाल में बीजेपी के नेता शुभेंदु अधिकारी ने उनकी अयोग्यता के लिए अध्यक्ष के पास चले गए हैं।”

राज्यपाल धनखड़ को पत्र लिखकर मुकुल रॉय के खिलाफ कार्रवाई की मांग

शुभेंदु अधिकारी और मुकुल रॉय के राजनीतिक झगड़ा शुरू हो गया था, जब बाद में वह अपने बेटे के साथ भाजपा छोड़कर टीएमसी में शामिल हो गए थे। अधिकारी ने रॉय के इस्तीफे की माँग की थी। जिसके जवाब में रॉय ने अपना पद छोड़ने से इनकार कर दिया था।

मुकुल रॉय के खिलाफ दलबदल विरोधी कानून के प्रावधानों के तहत कार्रवाई की माँग को लेकर भाजपा ने राज्यपाल करने से संपर्क किया था। पार्टी ने कहा था, “तोड़ना-जोड़ना टीएमसी की गंदी राजनीति का हिस्सा है। वे पिछले 10 साल से ऐसा कर रहे हैं और किसी ने इसका विरोध नहीं किया। लेकिन अब इसका विरोध किया जा रहा है और दलबदल विरोधी कानून के तहत कार्रवाई की जाएगी।”

पश्चिम बंगाल भाजपा के विधायकों ने विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा नेताओं के तृणमूल कॉन्ग्रेस में शामिल होने को लेकर राज्यपाल धनखड़ को पत्र लिखा था। इसके जवाब में धनखड़ ने कहा, “राज्य का संवैधानिक प्रमुख होने के नाते, मैं यह स्पष्ट कर दूँ कि बंगाल में दलबदल विरोधी कानून पूरी तरह से लागू है। यह देश के अन्य हिस्सों की तरह यहाँ भी उतना ही लागू है।”

गंगा में बहती 21 दिन की नवजात को बचाया था, योगी सरकार से नाविक को मिला खास तोहफा, घर तक पक्की सड़क भी

उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में पिछले दिनों गंगा नदी में एक नाविक ने लकड़ी के डिब्बे में बहकर जा रही एक 21 दिन की नवजात बच्ची को बचाया था। बाद में योगी सरकार ने नाविक को आभार व्यक्त करते हुए ऐलान किया था कि सरकार उनकी योग्यता के हिसाब से उन्हें हर सरकारी योजना का लाभ देगी। अब खबर है कि, सरकार ने अपना वादा पूरा करने के क्रम में नाविक को नाव तोहफे में देने का फैसला किया है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बुधवार (जून 16, 2021) को इस संबंध में अपने ट्वीट के जरिए जानकारी दी थी कि यूपी सरकार बच्ची की परवरिश का सारा खर्चा उठाएगी। साथ ही बच्ची को बचाने वाले गुल्लू चौधरी को सरकारी योजनाओं का लाभ दिया जाएगा। इस ऐलान के बाद गुरुवार (जून 17, 2021) को ही गाजीपुर के जिलाधिकारी एम पी सिंह गुल्लू के घर उनसे जुड़ी जानकारी लेने पहुँचे, ताकि सुविधाएँ देने में देर न हो।

डिविजनल कमीशनर दीपक अग्रवाल ने कहा, “जिलाधिकारी गाजीपुर ने स्वयं चौधरी की आर्थिक स्थिति की जानकारी ली। पता चला है कि उनके पास एक घर है। इसलिए वह आवास योजना के लाभ हेतु पात्र नहीं पाए गए हैं। लेकिन पूछताछ में यह पता चला कि आजीविका कमाने के लिए कुछ अन्य व्यक्तियों की नाव को चलाते थे। ऐसे में प्रशासन ने सिफारिश करने का निर्णय लिया है कि उन्हें एक नाव दी जाए।”

इसके अलावा चौधरी ने अपने घर के बाहर पक्की सड़क बनाने की माँग की है। अधिकारियों ने आश्वासन दिया कि इस मामले में जल्द सुनवाई की जाएगी। बता दें कि जिस रोड को लेकर गुल्लू ने माँग की है वह बेहद जर्जर अवस्था में है। अधिकारियों को इसके चलते चौधरी को दादरी घाट के पास बने मंदिर परिसर में बुलाना पड़ा।

उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में मंगलवार (15 जून 2021) को गंगा में तैरता हुआ एक लकड़ी का बॉक्स दिखाई दिया। नदी किनारे रह रहे एक नाविक ने जब बॉक्स खोलकर देखा, तो उसमें एक नवजात बच्ची मिली। बॉक्स में माँ दुर्गा की फोटो के साथ कई देवी-देवताओं के फोटो लगे थे। इसमें बच्ची की जन्म कुंडली भी मिली। बच्ची को पुलिस आशा ज्योति केंद्र ले गई। जहाँ बच्ची को पूरी तरह स्वस्थ बताया गया।

नाविक गुल्लू चौधरी ने घटना के संबंध में पुलिस को बताया कि मंगलवार शाम उन्हें नदी के किनारे लकड़ी का बॉक्स मिला। उसमें से रोने की आवाज आ रही थी। मल्लाह को देख घाट पर मौजूद कुछ और लोग भी आ गए। लोगों ने बॉक्स खोला तो दंग रह गए। इसमें बच्ची चुनरी में लिपटी हुई रो रही थी। बॉक्स में माँ दुर्गा की फोटो के साथ एक पत्र भी लिखा हुआ था। पत्र में लिखा था माँ गंगा आपको कन्यादान कर रही हूँ। पत्र में ऊपर ‘ओम’ और नीचे ‘जय दुर्गा माँ’ लिखा हुआ था। नीचे बच्ची का नाम गंगा और जन्मदिन 21 मई 2021 लिखा हुआ था। साथ ही उसकी रा​शि, नक्षत्र, राशि का नाम व मन्नत का जिक्र किया हुआ ​था।।

‘बाबा का ढाबा’ वाले कांता प्रसाद ने की आत्महत्या की कोशिश, शराब के साथ ली नींद की गोलियाँ: ICU में भर्ती

दिल्ली के मालवीय नगर स्थित ‘बाबा का ढाबा‘ के संचालक कांता प्रसाद ने अल्कोहल के साथ नींद की गोलियाँ खाकर आत्महत्या करने की कोशिश की है। राजधानी के सफदरजंग अस्पताल के ICU में उनका इलाज किया जा रहा है। यहाँ उन्हें गुरुवार (जून 17, 2021) की रात को लाया गया था।

दिल्ली पुलिस ने बताया कि गुरुवार की रात 11:15 पर उन्हें सफदरजंग अस्पताल से 81 वर्षीय कांता प्रसाद को भर्ती किए जाने की खबर मिली थी।

अस्पताल ने अपनी जाँच रिपोर्ट में बताया है कि कांता प्रसाद ने अल्कोहल के साथ नींद की गोली खा ली थी और वो अचेत अवस्था में पाए गए थे। इस मामले में एक बयान में कांता प्रसाद के बेटे करन ने कहा है कि उसके पिता ने शराब के साथ नींद की गोली खा ली थी। डीसीपी साउथ ने भी यही जानकारी दी है।

रिपोर्ट के मुताबिक, कांता प्रसाद की पत्नी बादामा देवी ने पुलिस को बताया है कि उनके पति पिछले कुछ दिनों से काफी तनाव में थे। बताया जा रहा है कि अस्पताल में उनकी हालत नाजुक बनी हुई है।

एक वीडियो की वजह से रातों रात फेमस हुए थे कांता प्रसाद

‘बाबा का ढाबा’ संचालक कांता प्रसाद का आर्थिक तंगी के कारण रोता हुआ वीडियो पिछले साल 2020 में इंटरनेट पर वायरल हुआ था। यूट्यूबर गौरव वासन द्वारा शेयर किए गए वीडियो में वह असहाय दिख रहे थे। इस वीडियो के वायरल होने के बाद उनका ढाबा चल निकला।

दिसंबर 2020 में कांता प्रसाद ने बाबा का ढाबा छोड़कर दिल्ली के ही मालवीय नगर में एक शानदार रेस्टोरेंट खोला था। उस दौरान उन्होंने अपनी खुशी व्यक्त करते हुए लोगों से उनके रेस्टोरेंट पर आने की अपील भी की थी। हालाँकि फिलहाल उनका ये रेस्टोरेंट बंद हो चुका है और वो फिर से अपने ढाबे पर शिफ्ट हो गए हैं।

कांता प्रसाद ने यूट्यूबर गौरव वासन से माँगी थी माफी

यूट्यूबर गौरव वासन पर फंड चोरी का आरोप लगाने के बाद हाल ही में बाबा का ढाबा संचालक कांता प्रसाद ने उनसे माफी माँगी थी। रिपोर्ट के मुताबिक, हाल ही में गौरव वासन उनके ढाबे पर उनसे मिलने के लिए गए थे। उस दौरान कांता प्रसाद गौरव के पैर पकड़कर खूब रोए थे। उन्होंने कहा था कि गौरव वासन के कारण ही दुनिया उन्हें जानती है और वो उनके लिए जान भी दे सकते हैं।

गंगा किनारे शवों को दफनाने के खिलाफ दर्ज PIL रद्द, HC ने कहा – ‘लोगों के रीति-रिवाजों पर रिसर्च कीजिए, फिर आइए’

प्रयागराज और उसके आसपास के इलाकों में स्थित गंगा नदी के घाटों पर शवों को दफनाने के मामले में दर्ज PIL को इलाहबाद हाईकोर्ट ने ख़ारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ने गंगा नदी के आसपास रहने वाले लोगों के रीति-रिवाजों को लेकर कोई अध्ययन नहीं किया है। याचिकाकर्ता से कहा गया है कि वो इस मामले की रिसर्च कर के फिर से याचिका दायर कर सकते हैं। मौजूदा याचिका रद्द कर दी गई।

इलाहबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश संजय यादव की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले को सुना। याचिकाकर्ता से उन्होंने पूछा कि आपने जनहित में ये याचिका लगाई तो, तो आप बताइए कि आज तक आपने कितने शवों को चिह्नित कर उनका सही तरीके से अंतिम संस्कार किया है। जनहित में आपका योगदान क्या है? अधिवक्ता प्रणवेश ने कहा कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से इन इलाकों का दौरा किया है और स्थिति काफी बदतर है।

कोर्ट ने पूछा, “आप हमें बताइए कि जनहित में आपका योगदान क्या है? आपने जिस मुद्दे को उठाया है, उसके हिसाब से आपने जमीन खोद कर कितने शवों को निकाला और उनका अंतिम संस्कार किया?” हाईकोर्ट ने याद दिलाया कि गंगा किनारे रहने वाले अलग-अलग समुदाय के लोगों के विभिन्न रीति-रिवाज और परम्पराएँ हैं। अपने योगदान के बारे में प्रणवेश ने सिर्फ इतना ही बताया कि वो लोगों को ‘इलेक्ट्रिक क्रिमेशन’ के लिए जागरूक कर रहे हैं।

इस पर हाईकोर्ट ने पूछा कि उनके प्रयासों का नतीजा क्या निकला और कितने लोगों की उन्होंने मदद की? इस पर अधिवक्ता ने कहा कि उनके पास ऐसा कोई आँकड़ा नहीं है लेकिन साथ ही दोहराया कि स्थिति बिलकुल ही तबाही वाली है। हाईकोर्ट ने कहा कि आप कुछ रिसर्च कर के आइए, हम ऐसी याचिका पर आगे नहीं बढ़ सकते। कोर्ट ने इसे ‘पब्लिसिटी इंटरेस्ट लिटिगेशन’ करार देते हुए कहा कि बड़े-बड़े शब्दों और विशेषणों से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है, जब तक जमीनी हकीकत का भान न हो।

हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ने ही बताया है कि मानवाधिकार आयोग ने इस सम्बन्ध में एक्शन लिया है, तो फिर वो वहीं क्यों नहीं जाते? साथ ही सलाह दी कि इस तरह के निर्देशों के लिए अदालत का दरवाजा न खटखटाएँ। वकील प्रणवेश ने अंतिम संस्कार को सरकार की जिम्मेदारी बताया। इस पर हाईकोर्ट ने पूछा कि किसी के परिवार में कोई मृत्यु होती है तो ये सरकार की जिम्मेदारी है? साथ ही याद दिलाया कि अलग-अलग समुदायों की अलग-अलग पद्धतियाँ होती हैं।

बता दें कि कई समुदायों में जल-समाधि और भू-समाधि के साथ-साथ शवों को दफनाने की भी प्रक्रिया अपनाई जाती है। इसीलिए, कानपुर जैसे इलाकों में हिन्दुओं के भी कई कब्रिस्तान होते हैं। ये परंपरा सैकड़ों वर्ष पुरानी है। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि ने कहा था कि गंगा के घाट के पास पार्थ‍िव शरीर हमेशा दफनाए जाते हैं, उस पर प्रश्न उठाना गलत है। छत्तीसगढ़ में भी अधिकतर आदिवासी यही प्रक्रिया अपनाते हैं।

‘रेप और हत्या करती है भारतीय सेना, भारत ने जबरन कब्जाया कश्मीर’: TISS की थीसिस में आतंकियों को बताया ‘स्वतंत्रता सेनानी’

‘टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS)’ हैदराबाद की एक थीसिस में जम्मू कश्मीर में हिन्दुओं पर हुए अत्याचार पर चुप्पी साध ली गई है और पाकिस्तान का प्रोपेगंडा फैलाया गया है। इस थीसिस को TISS से ‘वीमेंस स्टडीज’ में MA करने वाली अनन्या कुंडू ने तैयार किया है। वहीं ‘स्कूल और जेंडर स्टडीज’ की अस्सिस्टेंट प्रोफेसर डॉक्टर नीलांजना रे ने इसे तैयार करने में उनका मार्गदर्शन किया है।

इस रिसर्च के कुछ पहलुओं के बारे में जानना ज़रूरी है। इस रिसर्च में ‘भारत के कब्जे वाले जम्मू कश्मीर में सैन्यीकरण, संघर्ष और लॉकडाउन के दौरान घरेलू हिंसा’ पर बातें की गई हैं। इसमें भारत पर भी कश्मीरियों की आवाज़ दबाने का आरोप लगाया गया है। कश्मीरी महिलाओं को ‘पितृसत्तात्मक स्टेट और सोसाइटी’ से पीड़ित बताया गया है। साथ ही लिखा है कि आज़ादी के समय बड़ी संख्या में कश्मीरी पाकिस्तान में जाना चाहते थे।

इस थीसिस के अनुसार, जम्मू कश्मीर को भारतीय सोच ने ‘नेशनलिस्ट प्राइड’ और गर्मी की छुट्टियों का पर्यटन स्थल का विषय बना दिया है। 2019 में अनुच्छेद-370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने के दौरान लगे कर्फ्यू की बात करते हुए इसके असर पर बात करने का दावा किया गया है। थीसिस के अनुसार, उस समय जम्मू कश्मीर में अब तक का सबसे बड़ा ‘कम्युनिकेशन ब्लैकआउट’ हुआ था। लेकिन, गौर करने वाली बात ये है कि कश्मीर के इतिहास की बात करते समय वहाँ के हिन्दुओं को एकदम से भुला दिया गया है।

सिख और डोगरा राजाओं को भी विदेशी ही बताया गया है। डोगरा राजाओं पर कश्मीरियों की चिंता न करते हुए जनता से ज्यादा टैक्स लेने के आरोप लगाए गए हैं। राजा हरि सिंह को निरंकुश बताते हुए अनन्या कुंडू ने पाकिस्तान की मदद से जम्मू कश्मीर को भारत से अलग करने की कोशिश करने वालों को ‘स्वतंत्रता सेनानी’ बताया है। POK को पाकिस्तान द्वारा किए गए नाम ‘आज़ाद कश्मीर’ को अनन्या कुंडू ने ‘विदेशी सत्ता के खिलाफ जनता की लड़ाई का प्रतीक’ करार दिया है।

जरा भाषा पर गौर कीजिए, “एक ऐसे राजा ने, जो खुद हार कर भाग रहा था, उसने एक पूरे क्षेत्र और वहाँ की जनता का विलय एक ऐसे देश में कर दिया जिसका उस पर कोई अधिकार ही नहीं था। भारतीय सेना ने पाकिस्तानी फौज और स्वतंत्रता सेनानियों के साथ युद्ध कर के एक बड़े क्षेत्र लिया पर कब्ज़ा कर लिया। जम्मू कश्मीर की स्वायत्तता को सुरक्षित रखने का भारत का कोई इरादा ही नहीं था, क्योंकि इसने जनमत संग्रह का वादा पूरा नहीं किया।”

जम्मू कश्मीर के इतिहास के नाम पर परोसा गया प्रोपेगंडा

यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि जनमत संग्रह से भारत नहीं, पाकिस्तान भागा था। भारत को कश्मीर का ‘कॉलोनाइजर’ बताया गया है। यानी, ब्रिटिश आक्रांताओं से भारत की तुलना की गई है। थीसिस में लिखा है, “भारत ने चुनाव परिणाम में गड़बड़ी की, क्रूर हिंसा का प्रयोग किया और क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए विरोधी आवाज़ों को दबा दिया। 1986 के बाद से इस आंदोलन को समर्थन मिलने लगा। 1987 में कॉन्ग्रेस ने चुनाव में गड़बड़ी की, जिससे कश्मीरी नाराज़ हुए।”

जम्मू कश्मीर में हजारों लोगों का खून बहाने वाला पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद अनन्या कुंडू के लिए एक ‘हथियारों से विद्रोह’ भर है। वहाँ नागरिकों की हत्या, रेप, शोषण और अवैध गिरफ़्तारी की बात करते हुए भारतीय सेना पर इन सबका आरोप मढ़ा गया। मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगाए गए हैं। भारतीय सेना पर कुछ तत्वों को प्रशिक्षण देकर उनसे कश्मीरियों पर अत्याचार कराने का आरोप लगाया गया है।

प्रदेश में लोगों की सुरक्षा के साथ-साथ जन-कल्याणकारी अभियान चलाने वाली भारतीय सेना के खिलाफ ऐसे शब्दों का प्रयोग किया गया है, जो शायद पाकिस्तान भी न करता हो। लिखा है कि न्यायपालिका के अभाव में ऐसे वारदात छिपे रह गए। भारत के नागरिकों तक को नहीं बख्शा गया है और उन पर कश्मीरियों के खिलाफ ‘मानवाधिकार हनन’ पर चुप्पी साधने का जिम्मेदार ठहराया गया है। थीसिस में लिखा है,

“भारत ने कश्मीर पर कब्जा करने के लिए यहाँ के आवाजों को दबाया और नैरेटिव को नियंत्रित किया। कश्मीर की कहानी कश्मीर नहीं, भारत ने लिखी। आज जिस कश्मीर को हम जानते हैं, वो भारतीय सोच के हिसाब से ही। महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा हुई। पितृसत्तात्मक भारतीय सेना कश्मीरी समाज को तोड़ने के लिए महिलाओं के शरीर को निशाना बनाती है। ये सैन्यीकरण और युद्ध का परिणाम ही है कि महिलाओं के खिलाफ यौन और शारीरिक हिंसा आम हो गई। भारत ने अगस्त 2019 में अनुच्छेद-370 हटा कर उसका विशेष राज्य का दर्ज छीन लिया। फिर लंबा कम्यूनिकेशन ब्लैकआउट हुआ। फिर कोरोना आपदा आई और वहाँ की महिलाओं के हालात और भी बदतर हो गए।”

भारतीय सेना पर लगाया गया महिलाओं के यौन शोषण का आरोप

थीसिस मे भारतीय सेना पर ‘आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पॉवर्स ऐक्ट ऑफ 1958’ का उल्लंघन करने का आरोप लगाते हुए लिखा है कि जिसने भी भारत के खिलाफ बोलने की कोशिश की, उसके यहाँ अवैध सैन्य छापेमारी हुई, यौन हिंसा हुई, गिरफ़्तारी हुई, हत्या हुई और उन्हें प्रताड़ित किया गया। वहाँ आतंकियों के खिलाफ सुरक्षा बलों को मिले विशेषाधिकार का भी विरोध किया गया है। लॉकडाउन के दौरान घरेलू हिंसा बढ़ने की बात करते हुए इसे भी भारत सरकार के मत्थे ही मढ़ दिया गया है।

कुल मिला कर बात करें तो इस रिसर्च को महिलाओं की दुर्दशा और उनके साथ होने वाली घरेलू हिंसा के नाम पर तैयार किया गया है, लेकिन इसमें वो सब कुछ है जो पाकिस्तानी कश्मीर और भारतीय सेना के बारे में सोचता है। जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल अरुंधती रॉय जैसे ‘टुकड़े-टुकड़े’ गैंग के लोग करते हैं, इसमें उसी का दस्तावेजी रूप परोसा गया है। लोगों के मन में भारत विरोधी भवन बैठाने की कोशिश की जा रही है।

TISS के बारे में बता दें कि इसका मुख्य कैम्पस मुंबई में है। इसकी स्थापना 1936 में ‘सर दोराबजी टाटा स्कूल ऑफ सोशल वर्क’ के रूप में हुई थी। इसे 1964 में भारत सरकार ने ‘डीम्ड यूनिवर्सिटी’ का दर्जा दिया। सामाजिक कार्य के लिए स्थापित ये भारत का पहला प्रीमियर शैक्षिक संस्थान है। हाल ही में इसके मुंबई कैम्पस में CAA और NRC विरोधी आंदोलन के दौरान जम कर प्रोपेगंडा फैलाया गया था।

मो. सूफियान के नाम पर आए पार्सल में दरभंगा रेलवे स्टेशन पर विस्फोट: सिकंदराबाद से हुई थी बुकिंग

बिहार के दरभंगा जिले के दरभंगा जंक्शन रेलवे स्टेशन पर गुरुवार (17 जून 2021) को धमाका हुआ। सिकंदराबाद से आए एक रजिस्टर्ड पार्सल में दोपहर करीब 3.25 पर विस्फोट हो गया। धमाके बाद वहाँ अफरा-तफरी मच गई। मोहम्मद सुफियान नामक व्यक्ति के लिए दरभंगा के लिए पार्सल बुक कराया था।

रिपोर्ट के अनुसार, विस्फोट प्लेटफॉर्म नंबर 1 पर सरकारी रेलवे पुलिस (जीआरपी) स्टेशन के एस्केलेटर के पास हुआ। पार्सल में तुरंत आग लग गई, जिससे दहशत और भय की स्थिति पैदा हो गई। धमाके की आवाज सुनते ही जीआरपी थाना प्रभारी हारुन राशिद और रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) के इंस्पेक्टर ब्रजेश कुमार के नेतृत्व में एक टीम मौके पर पहुँची। पुलिस ने आग पर काबू पाने के बाद मामले की जाँच शुरू कर दी है।

शुरुआती जाँच में पता चला है कि पार्सल में कपड़े और एक बोतल थी। माना जा रहा है कि उसमें विस्फोटक सामग्री थी। इसके साथ ही यह भी पता चला कि 15 जून 2021 को मोहम्मद सूफियान के नाम पर एक पार्सल बुक किया गया था। पुलिस अधीक्षक (दरभंगा रेलवे) को भी मामले की जानकारी दी गई थी। इस बीच राजकीय रेलवे पुलिस के डीएसपी नवीन कुमार विस्फोट स्थल पर पहुँच गए। अब मामले की जाँच के लिए एक टीम गठित की जाएगी।

अच्छी बात यह रही कि विस्फोट में किसी के भी हताहत होने या संपत्ति के नुकसान की सूचना नहीं है। इस बीच, फॉरेंसिक टीम ने विस्फोट के कारणों का पता लगाने के लिए काम करना शुरू कर दिया है। न्यूज 18 ने बताया कि पार्सल में भेजने वाले का नाम और विवरण या रिसीवर मोहम्मद सूफियान का पता नहीं था। चूँकि सूफियान अपना पार्सल लेने के लिए नहीं आया था। ऐसे में पुलिस उसे ही संदिग्ध मानकर चल रही है।

पिछले साल दरभंगा में नज़ीर के घर में भी हुआ था बड़ा धमाका

पिछले साल 5 जून, 2020 को बिहार के दरभंगा के आजमनगर दुर्गा मंदिर इलाके में स्थित मोहम्मद नज़ीर नाम के 50 वर्षीय व्यक्ति के घर में धमाका हुआ था। विश्वविद्यालय थाने के अधिकार क्षेत्र में आने वाले इस इलाके में हुए धमाके की गूँज 1 किलोमीटर दूर तक सुनी जा सकती थी। धमाका इतना जोरदार था कि नजीर के घर की दीवारें और छत पूरी तरह ढह गई थी।

परिवार के कई सदस्य घायल हो गए थे। हालाँकि शुरुआती रिपोर्टों में दावा किया गया था कि विस्फोट पटाखों के कारण हुआ था, स्थानीय लोगों ने कहा था कि यह अवैध बम निर्माण के कारण हुआ था।

चुनाव के बाद हिंसा, पलायन की जाँच राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग करे: कोलकाता हाई कोर्ट का आदेश

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बाद हुई हिंसा में मारे गए लोगों को लेकर कोलकाता हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने इस मामले की जाँच करने का आदेश राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को दिया है। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को हिंसा के कारण लोगों के पलायन की जाँच के लिए कहा है।

इससे पहले पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बाद हुई विभिन्न प्रकार की हिंसा की घटनाओं की जाँच के लिए केंद्र सरकार की ओर से कमिटी बनाई गई थी। इस चार सदस्यीय कमिटी ने शनिवार (मई 29, 2021) को अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंप दी थी।

सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता मोनिका अरोड़ा के नेतृत्व वाले बुद्धिजीवियों और शिक्षकों के एक प्रतिनिधिमंडल ने तथ्यों को उजागर करने वाली रिपोर्ट ‘2021 में बंगाल में खेला’ नामक शीर्षक की अपनी रिपोर्ट को केंद्रीय गृह राज्य मंत्री को सौंपी थी।

600 शिक्षाविदों ने भी लिखा था पत्र

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों के बाद राज्य में हो रही हिंसा पर देश के 600 शिक्षाविदों ने पत्र लिखा है। शिक्षाविदों ने ममता बनर्जी सरकार को आगाह किया था कि सरकार राजनैतिक विद्रोहियों के खिलाफ हिंसा का माहौल बनाकर संवैधानिक मूल्यों के साथ खिलवाड़ न करे। पत्र लिखने वालों में प्रोफेसर, वाइस चांसलर, डायरेक्टर, डीन और पूर्व वाइस चांसलर शामिल थे।

इतना ही नहीं शिक्षाविदों ने टीएमसी सरकार से राज्य में बदले की राजनीति बंद करने की माँग की थी। पत्र में कहा गया था कि टीएमसी से जुड़े आपराधिक किस्म के लोग उसकी विपरीत विचारधारा वाले लोगों पर हमले कर रहे हैं। पत्र में यह भी कहा गया था कि हजारों लोगों की संपत्ति को नुकसान पहुँचाने के साथ ही उनके साथ लूट-पाट भी की गई थी।

5 मई (2021) को ऑप इंडिया ने रिपोर्ट प्रकाशित की थी। इसमें हमने बताया था कि TMC के गुंडों की हिंसा के कारण भाजपा कार्यकर्ताओं का बंगाल से पलायन कर असम चले गए थे। असम के सीएम और भाजपा नेता हिमंता बिस्वा सरमा ने ट्वीट करके जानकारी दी थी कि बंगाल छोड़कर असम आने वाले कई लोगों को राहत शिविरों में रखा गया है और उन्हें सहायता उपलब्ध कराई जा रही है।

उन्होंने कहा था कि बंगाल में भय के वातावरण के कारण जारी पलायन के बीच असम पहुँचे 450 से अधिक लोगों को धुबरी में दो राहत शिविरों में रखा गया है और उन्हें आवश्यक सुविधाएँ मुहैया कराई जा रही हैं।

पति को पेड़ से बाँध आदिवासी महिला की पिटाई, कपड़े उतार पूरे गाँव में परेड: पश्चिम बंगाल में 7 गिरफ्तार

पश्चिम बंगाल में मानवता को शर्मसार करने वाली एक घटना सामने आई है। जलपाईगुड़ी में विवाहेतर संबंध रखने के आरोप में एक आदिवासी महिला की पिटाई की गई। पीटने के बाद महिला के कपड़े उतारे गए और फिर पूरे गाँव में परेड कराई गई। घटना का एक वीडियो वायरल हो गया। जिसके बाद पुलिस ने 7 आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है।

सूत्रों के अनुसार, स्थानीय निवासियों ने उसे ‘अवैध संबंध’ होने के संदेह में प्रताड़ित किया। आरोपितों ने उसके पति को भी पेड़ से बाँध दिया था। पुलिस को इस मामले की जानकारी तब मिली, जब कथित घटना का एक वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आया।

पुलिस सूत्रों ने कहा कि कुछ ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि महिला का एक स्थानीय युवक के साथ विवाहेतर संबंध था। उन्होंने (ग्रामीणों) इस मामले पर चर्चा करने के लिए एक बैठक की। कथित घटना उस समय हुई जब महिला बैठक में शामिल होकर अपने पति के साथ घर लौट रही थी।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ स्थानीय निवासियों ने दंपति को घेर लिया। उन्होंने पति को पेड़ से बाँध दिया और महिला की पिटाई कर दी। स्थानीय मीडिया ने बताया कि उन्होंने कथित तौर पर उसे ‘सबक सिखाने’ के लिए उसके बाल भी काट दिए।

जलपाईगुड़ी के पुलिस अधीक्षक देवर्षि दत्ता ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “जैसे ही हमें शिकायत मिली, प्राथमिकी दर्ज की गई। सात लोगों को गिरफ्तार किया गया है।” जानकारी के मुताबिक आरोपित व्यक्तियों पर मारपीट और छेड़छाड़ सहित अन्य संबंधित आरोपों के तहत मामला दर्ज किया गया है।

गौरतलब है कि हाल ही में अलीपुरद्वार के कुमारग्रामद्वार के एक गाँव में विवाहेतर संबंध रखने के आरोप में एक आदिवासी महिला की पिटाई की गई थी। पीटने के बाद महिला के कपड़े उतारे गए और फिर पूरे गाँव में परेड कराई गई। घटना का वीडियो वायरल हो गया। जिसके बाद पुलिस ने 6 आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है।

CM ममता के भतीजे को जिसने मारा था थप्पड़, उसकी रहस्यमयी मौत: TMC नेता ने की थी इंदिरा गाँधी हत्या से तुलना

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कॉन्ग्रेस की लगातार जीत और ममता बनर्जी के तीसरी बार मुख्यमंत्री बनते ही राजनीतिक हत्याओं का सिलसिला तीव्र हो गया। ममता बनर्जी के राज में जितनी राजनीतिक हत्याएँ प्रतिशोध की भावना के तहत हो रही हैं, कहा जाता है कि वामपंथी सरकार के शासन काल में भी पश्चिम बंगाल में नहीं हुई थी।

हालिया मामला बेहद हाई प्रोफाइल व्यक्ति के जुड़ा है और वह व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि मुख्यमंत्री के भतीजे और उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी कहे जाने वाले अभिषेक बनर्जी से जुड़ा है।

टीएमसी सांसद और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी को साल 2015 में मंच पर चढ़कर थप्पड़ मारने वाले देवाशीष आचार्य की पश्चिम बंगाल में रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो गई है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कुछ अज्ञात लोग उन्हें हॉस्पिटल ले गए, जहाँ डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। देवाशीष वर्ष 2020 में भाजपा में शामिल हुए थे।

बताया जा रहा है कि गुरुवार की सुबह देवाशीष को बेहद गंभीर हालत में मिदनापुर के तमलुक जिला अस्पताल में लाया गया था। अस्पताल के रिकॉर्ड से पता चलता है कि उन्हें सुबह 4.10 बजे भर्ती कराया गया था। जिन लोगों ने उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया था, वे तुरंत वापस चले गए थे। देवाशीष की दोपहर में अस्पताल में मौत हो गई।

सूचना मिलने के बाद देवाशीष का परिवार अस्पताल पहुँचा। अस्पताल पहुँचने पर परिवार को इस रहस्यमय मौत का पता चला। इसके बाद परिवार ने आरोप लगाया है कि देवाशीष की हत्या की गई है। वहीं, भाजपा ने भी मौत की परिस्थितियों पर सवाल उठाया है।

मंच पर चढ़ता देवाशीष, (तस्वीर: वनइंडिया हिंदी)

शुरुआती जाँच में पता चला कि देवाशीष आचार्य 16 जून की शाम अपने दो दोस्तों के साथ बाहर गए थे। सोनापेट्या टोल प्लाजा के पास एक चाय की दुकान पर तीनों रुके। तभी देवाशीष को एक फोन आया और वह अपने दोस्तों को चाय की दुकान पर छोड़ चले गए। पुलिस अब इस बात की जाँच कर रही है कि चाय की दुकान से निकलने के बाद क्या हुआ?

साल 2015 में देवाशीष आचार्य उस समय सुर्खियों में आए थे, जब उन्होंने मंच पर अभिषेक बनर्जी को थप्पड़ मारा था। इसके तुरंत बाद टीएमसी समर्थकों ने उन्हें बेरहमी से मारा था। बाद में अभिषेक बनर्जी के रोकने के बाद कार्यकर्ता रुके। पुलिस ने देवाशीष को गिरफ्तार कर लिया था। उस समय परिवार के सदस्यों ने कहा था कि देवाशीष की मानसिक स्थिति ठीक नहीं है।

उस वक्त अभिषेक बनर्जी ने कहा था कि उन्होंने अपने हमला करने वाले देवाशीष को “माफ” कर दिया है। वहीं, कुछ टीएमसी नेताओं ने इस मामले को लेकर बेहद सख्त टिप्पणी की थी। पश्चिम बंगाल के मंत्री और टीएमसी के वरिष्ठ नेता सुब्रत मुखर्जी ने 2015 की थप्पड़ की घटना और 1984 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या को एक बराबर बताने की कोशिश की थी। तब सुब्रत मुखर्जी ने कहा था

“जब इंदिरा गाँधी की हत्या हुई थी तो इतने लोग मारे गए थे। यहाँ ऐसा कुछ नहीं हुआ, युवक जीवित है।”

सुब्रत मुखर्जी ने देवाशीष आचार्य की पिटाई का बचाव करते हुए कहा था, “यह पिटाई निंदनीय घटना [थप्पड़] की प्रतिक्रिया थी और इससे भी बदतर हो सकती थी। हर कोई भारत सेवाश्रम संघ या रामकृष्ण मिशन से राजनीति में नहीं आता है। कुछ बड़ा नहीं हुआ और लड़का जिंदा है। जो हुआ, वह कुछ नहीं है।”

पश्चिम बंगाल पुलिस ने देवाशीष आचार्य के खिलाफ हत्या के प्रयास सहित चार आरोपों में मामला दर्ज किया था। उन पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराएँ- 307 (हत्या का प्रयास), 447 (आपराधिक अतिचार), 323 (स्वेच्छा से चोट पहुँचाना) और 506 (आपराधिक धमकी) लगाई गई थी।

देवाशीष आचार्य की पिटाई करने वाले टीएमसी कार्यकर्ताओं पर भी पुलिस ने मामला दर्ज किया था। उन पर गैर-इरादतन हत्या करने के प्रयास (आईपीसी की धारा 308 के तहत) के आरोप लगाए गए थे। यह धारा, धारा 307 की तुलना में एक हल्का अपराध माना जाता है।

1 लाख कोरोना वॉरियर्स की तैयारी: ट्रेनिंग शुरू, 26 राज्यों के 111 केंद्रों में एक साथ PM मोदी ने किया लॉन्च

कोरोना संकट के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार (18 जून 2021) को देश भर में कोविड-19 फ्रंटलाइन वर्कर्स के लिए एक क्रैश कोर्स लॉन्च किया है। पीएम मोदी ने 26 राज्यों के 111 प्रशिक्षण केंद्रों में ट्रेनिंग कार्यक्रम का वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए शुभारंभ किया। इस दौरान पीएम ने महामारी के दौरान सभी को एकजुट रहने का संदेश देते हुए कहा कि क्रैश कोर्स के जरिए 1 लाख वॉरियर्स को तैयार किया जाएगा।

भविष्य के इन फ्रंटलाइन वर्कर्स को शुभकामनाएँ देते हुए प्रधानमंत्री ने उम्मीद जताई की वे जल्द ही हेल्थकेयर वर्करों के सहयोग के लिए तैयार होंगे। यह क्रैश कोर्स प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना 3.0 के तहत देश भर में कराया जाएगा। इसकी लॉन्चिंग के मौके पर स्किल डेवलपमेंट एंड एंटरप्रेन्योरशिप के केंद्रीय मंत्री भी मौजूद रहे।

कार्यक्रम के दौरान पीएम मोदी ने कहा कि आज देश में करीब एक लाख कोरोना वॉरियर्स को रेडी करने का महाअभियान शुरू हुआ है। हम सभी ने देखा कि यह वायरस किस तरह से बार-बार अपना रुप बदलकर नई चुनौतियाँ लेकर सामने आ रहा है। इसके अभी भी म्यूटेट होने की संभावना है।

2-3 महीने का होगा कोर्स

पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा कि कोरोना वायरस के संक्रमण ने दुनिया के हर देश, संस्था, परिवार और हर इंसान के सामर्थ्य को परखा है। इसने विज्ञान, सरकार, समाज, संस्था के तौर पर हम सभी को अपनी क्षमताओं का विकास करने के लिए सचेत किया है। प्रधानमंत्री ने कहा कि एक लाख वर्कर्स को तैयार करने का यह कोर्स 2-3 से तीन महीने का होगा।

फ्रंटलाइन वर्कर्स को मिलेगा स्टाइपेंड

फ्रंटलाइन वर्करों के इस विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत, उम्मीदवारों को निःशुल्क ट्रेनिंग, स्किल इंडिया का सर्टिफिकेट, खाने और रहने की सुविधा के साथ स्टाइपेंड भी मिलेगा। इसके अलावा रजिस्टर्ड उम्मीदवारों को 2 लाख रुपए का दुर्घटना बीमा प्राप्त होगा। ये कर्मी सीएचसी, पीएचसी और हॉस्पिटल्स में काम कर सकेंगे।

ट्रेनिंग के लिए 276 करोड़ रुपए का आवंटन

इस ट्रेनिंग प्रोग्राम को मौजूदा और भविष्य के हालात को देखते हुए तैयार किया गया। इसका मुख्य मकसद नॉन मेडिकल हेल्थकेयर वर्कर्स के स्किल को डेवलप करना है। इसके लिए 276 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया है।