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IS आतंकी फातिमा की माँ को PM मोदी से उम्मीद, कहा- वो बहुत दयालु हैं, मेरी बेटी को माफ कर भारत वापस लाएँगे

अफगानिस्तान की जेल में बंद केरल की निमिशा उर्फ फातिमा की माँ को उम्मीद है कि मोदी सरकार उनकी बेटी को माफ कर देगी और उसे वापस भारत लाएगी। फातिमा का शौहर इस्लामिक स्टेट (आईएस) का आतंकी था। वह एक हमले में मारा गया था, जिसके बाद से फातिमा अफगानिस्तान की जेल में बंद है।

फातिमा की माँ बिंदू संपत ने कहा, ”मैंने सुना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बहुत दयालु इंसान हैं। मुझे उन पर पूरा भरोसा है।” उन्होंने यह प्रतिक्रिया मीडिया में आई उन खबरों पर दी है, जिसमें कहा गया है कि केंद्र की मोदी सरकार उनकी बेटी और तीन अन्य आईएस आतंकियों की भारतीय मूल की विधवाओं को भारत लाने की इच्छुक नहीं है। ये चारों महिलाएँ अभी काबुल की जेल में बंद हैं।

संपत ने कहा कि इस मामले पर सरकार की ओर से उन्हें कोई जानकारी नहीं दी गई है। सरकार का इस मुद्दे में रुचि न दिखाना केंद्र की एक राय भी हो सकती है, लेकिन मैं बहुत आशावादी हूँ। सरकार के अंदर अन्य विचार भी हो सकते हैं और मैं उस तरफ देख रही हूँ।

उन्होंने कहा कि मुझे भगवान पर पूरा विश्वास है। वो उनकी बेटी की वापसी के लिए कोई न कोई स्थिति जरूर बनाएँगे। फाातिमा की माँ ने कहा कि वह प्रधानमंत्री मोदी से मिलकर उन्हें इस संबंध में ज्ञापन सौंपना चाहती हैं, लेकिन इसमें कोई उनकी मदद नहीं कर रहा है।

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को भी किया ईमेल

संपत ने कहा कि इस साल सितंबर में अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद उसकी बेटी के तालिबान के कब्जे में जाने का डर है। मैंने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को भी इस बारे ईमेल किया, लेकिन कुछ नहीं हुआ।

कानून की मदद लेने की बात कही

संपत ने कहा कि अगर मेरी बेटी की वापसी के लिए सरकार से मदद माँगने की सभी कोशिशें नाकाम हो जाएँगी, तो मैं कानून का सहारा लूँगी। मैंने सुप्रीम कोर्ट के कुछ वकीलों से मुलाकात की है। उन्होंने कहा है कि उनके पास कानूनी विकल्प है।

हिंदू से मुस्लिम बनी थी निमिशा

निमिशा संपत पहले हिंदू थी, लेकिन बाद में उसने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया और अपना बदलकर फातिमा रख लिया था। उसने इस्लामिक स्टेट (ISIS) के केरल के कथित आतंकी से निकाह कर लिया था। दोनों 19 अन्य लोगों के साथ जून, 2016 में फरार हो गए थे और अफगानिस्तान में आईएस के कब्जे वाले इलाके में पहुँच गए थे। यहाँ फातिमा ने एक बच्चे को जन्म भी दिया था।

शौहर के मरने के बाद 2019 में किया था आत्मसमर्पण

फातिमा और तीन अन्य केरल की महिलाओं ने अपने शौहर के एक हमले में मरने के बाद दिसंबर 2019 में आत्मसमर्पण कर दिया था। उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान की सरकार ने कहा था कि वे आईएस से संबंधित मामलों में जेल में बंद लोगों को रिहा करेंगे, लेकिन भारत की मोदी सरकार ने कोई जवाब नहीं दिया। उन्हें अपनी बेटी के अफगानिस्तान की जेल में होने की जानकारी करीब डेढ़ साल पहले मिली थी, लेकिन अभी तक उसकी वापसी को लेकर कुछ भी नहीं हो पाया।

बता दें कि 15 मार्च 2020 को दिल्ली की एक वेबसाइट ने एक वीडियो जारी किया था। इसमें केरल की चारों महिलाओं की पहचान सोनिया सेबस्टियन उर्फ आयशा, मैरिन जैकब उर्फ मरियम, निमिशा उर्फ फातिमा ईसा और रफीला के रूप में हुई थी। इन्होंने वीडियो में भारत वापस लौटने की इच्छा जताई थी।

हाल ही में हिंदू ने अपनी रिपोर्ट में खुलासा​ किया था, ”अफगानिस्तान में आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (आईएस) में शामिल हुई केरल की चार महिलाओं के भारत वापस आने की संभावना नहीं है।” एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने इसकी पुष्टि की थी कि केरल की ये चार महिलाएँ अफगानिस्तान की जेल में बंद हैं। ये अफगानिस्तान के खुरासान प्रांत में अपने पतियों के साथ इस्लामिक स्टेट में शामिल होने के लिए गई थीं।

चारों महिलाएँ 2016-18 में अफगानिस्तान के नंगरहार पहुँची थीं। इस दौरान उनके शौहर अफगानिस्तान में अलग-अलग हमलों में मारे गए थे। ये महिलाएँ इस्लामिक स्टेट के उन हजारों लड़ाकों में शामिल थीं, जिन्होंने आत्मसमर्पण किया था।

अल्लाह-अल्लाह के नाम पर मस्जिद में गाना गाया फिर भी भोपाल में कट्टरपंथियों ने गिरफ्तार करवा दिया ट्रांसजेंडर को

मध्य प्रदेश में एक किन्नर (Transgender) के खिलाफ शिकायत दर्ज करा कर उसे सिर्फ इसीलिए गिरफ्तार करवा दिया, क्योंकि उसने मस्जिद में वीडियो शूट किया था और उसमें गाना लगा कर सोशल मीडिया पर शेयर कर दिया था। शिकायतकर्ताओं का कहना था कि इससे मुस्लिम समाज की भावनाएँ आहत हुई हैं। ये घटना भोपाल के मोती महल मस्जिद की है, जहाँ 24 वर्षीय किन्नर नानू विश्वास ने वीडियो शूट किया था।

नानू विश्वास पर मस्जिद परिसर में नृत्य करने और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। हालाँकि, जिन धाराओं के तहत FIR दर्ज की गई थी उसमें 7 साल से कम की सज़ा का प्रावधान है, इसीलिए गिरफ़्तारी वाले दिन ही उन्हें जमानत भी मिल गई। तलैया थाने के इंस्पेक्टर डी पी सिंह ने रविवार (जून 13, 2021) को बताया कि नानू को IPC की धारा 295A (किसी उपासना के स्थान को या व्यक्तियों के किसी वर्ग द्वारा पवित्र मानी गई किसी वस्तु को नष्ट, नुकसानग्रस्त या अपवित्र करना) के तहत गिरफ्तार किया गया था।

उन पर जानबूझ कर और दुर्भावनापूर्ण इरादे से धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने का आरोप लगा। ये शिकायत मोती मस्जिद के प्रबंधन ने ही दर्ज कराई है। शिकायत में कहा गया है कि ‘डांस’ का ये वीडियो सोशल मीडिया में वायरल होने के कारण मस्जिद का अपमान हुआ है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर किन्नर नानू विश्वास के 1 लाख से भी अधिक फॉलोवर्स हैं, ऐसे में वीडियो अपलोड होते ही वायरल होने लगा था।

नानू ने जिस गाने पर डांस किया था, वो 2009 में आई फिल्म ‘कुर्बान’ का गाना ‘शुक्रान अल्लाह’ है, जिसमें सैफ अली खान और करीना कपूर नजर आए थे। इस गाने को दिल्ली के ईस्ट निजामुद्दीन स्थित हुमायूँ के मकबरे में शूट किया गया था। यहाँ कई अन्य गानों की शूटिंग हो चुकी है। इस गाने में सैफ मस्जिद में नमाज पढ़ते दिखते हैं और करीना सीढ़ियों पर बैठी होती हैं। संगीतकार द्वय सलीम-सुलेमान ने ये गाना बनाया था और सोनू निगम व श्रेया घोषाल इसके गायक थे।

रविवार की शाम उन्हें गिरफ्तार किया गया, लेकिन कुछ ही घंटों बाद जमानत भी दे दी गई। बता दें कि इस्लामी कट्टरवादी कहते हैं कि शरीयत के हिसाब से संगीत और सिनेमा मुस्लिमों के लिए हराम है। ज़ाकिर नाइक ने कहा था कि सारे म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट इस्लाम में हराम हैं, क्योंकि ये व्यक्ति को खुदा से दूर लेकर जाता है। ज़ाकिर नाइक ने कहा था कि गानों में चाँद-सितारे तोड़ने की बात होती है, जो संभव नहीं है।

ज़ाकिर नाइक का इस्लाम में संगीत को लेकर विचार

साथ ही उसने ‘एक, दो तीन…’ जैसे गानों के बारे में कहा था कि ये मुस्लिमों को खुदा से दूर करता है। इसी तरह वेस्ट बैंक में जॉर्डन वैली में स्थित जेरिको के एक मस्जिद में डांस कार्यक्रम का आयोजन करने के आरोप में फिलिस्तीन की महिला DJ समा अब्दुलहादी को गिरफ्तार कर लिया गया था। इस डांस कार्यक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर भी वायरल हुआ था, जिसमें महिला-पुरुष साथ में डांस करते देखे जा सकते थे। 

चीन के BRI समझौते पर इटली ने रखी पुनर्विचार की माँग, जानिए क्या है G-7 देशों की B3W पहल

ब्रिटेन में जी-7 समिट के दौरान रविवार (13 जून) इटली के प्रधानमंत्री मारियो द्रागी ने कहा है कि चीन के विस्तारवादी ‘बेल्ट एण्ड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई)’ पर सावधानीपूर्वक पुनर्विचार किया जाएगा। हालाँकि 2019 में इटली ने चीन की इस महत्वाकांक्षी योजना का समर्थन किया था।

चीन के बारे में बात करते हुए द्रागी ने कहा कि विश्व के बहुपक्षीय नियम-कायदों और लोकतान्त्रिक मूल्यों के विरोध में रहने वाली व्यवस्था निरंकुशता ही कही जाएगी। उन्होंने कहा कि हम आपस में सहयोग तो करना चाहते हैं लेकिन कई चीजों के बारे में हमें स्पष्ट होना पड़ेगा। द्रागी ने यह भी कहा कि भले ही जी-7 की बैठक में चीन की इस योजना में इटली की सहभागिता का मुद्दा न उठाया गया हो लेकिन बीआरआई एग्रीमेंट पर निश्चित तौर पर विचार किया जाएगा। समिट के दौरान जी-7 देशों ने चीन के बेल्ट एण्ड रोड इनीशिएटिव से निपटने के लिए विकासशील देशों की सहायता का वादा किया। मारियो द्रागी के प्रधानमंत्री बनने से पहले इटली चीन की नीति का समर्थक था।   

जी-7 देशों के साथ अमेरिका ने चीन के बीआरआई के जवाब में एक नए ग्लोबल इंफ्रास्ट्रक्चर इनीशिएटिव ‘बिल्ड बैक बेटर वर्ल्ड (B3W) का विचार रखा है। एक अमेरिकी अधिकारी ने बताया, “यह केवल चीन को घेरने से संबंधित नहीं है लेकिन असल में अभी तक हमने कोई ऐसा विकल्प उपलब्ध ही नहीं कराया जो हमारे साझा मूल्यों, स्टैन्डर्ड और बिजनेस करने के तरीके को दर्शाता हो।“

जी-7 देशों की समिट के दौरान चीन का भी बयान आया। लंदन में चीनी दूतावास के प्रवक्ता ने कहा कि वो दिन चले गए जब वैश्विक फैसले देशों के छोटे समूह के द्वारा लिए जाते थे। प्रवक्ता ने यह भी कहा कि विश्व का चाहे छोटा देश हो या बड़ा, अमीर हो या गरीब, सब बराबर हैं और वैश्विक मामलों में फैसले लेते समय सभी देशों की सहभागिता आवश्यक है। जी-7 के देश ब्रिटेन में इकट्ठा हुए हैं जहाँ उनका उद्देश्य है, विश्व को चीन के बढ़ते प्रभाव के बदले एक विकल्प मुहैया कराना।

इटली के अलावा भी कई देश चीन की इस महत्वाकांक्षी परियोजना पर पुनर्विचार कर रहे हैं या रद्द कर रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया ने भी कुछ दिनों पहले चीन के साथ बेल्ट एण्ड रोड इनिशिएटिव (BRI) के अंतर्गत किए गए समझौतों को रद्द कर दिया था। ऑस्ट्रेलिया ने कहा था कि चीन के साथ किए गए ये समझौते उसकी विदेश नीति के हित में नहीं हैं। वैसा ही रुख ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप में स्थित समोआ ने दिखाया था। मात्र 2,831 वर्ग किमी में फैले और लगभग 2,00,000 की जनसंख्या वाले समोआ ने भी 100 मिलियन डॉलर (लगभग 729 करोड़ रुपए) का चीन का पोर्ट प्रोजेक्ट रद्द कर दिया था।

चीन की बेल्ट एण्ड रोड इनीशिएटिव :

2013 में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के द्वारा अस्तित्व में लाई गई बेल्ट एण्ड रोड इनिशिएटिव अथवा वन बेल्ट-वन रोड चीन की एक महत्वाकांक्षी परियोजना है। इस परियोजना के माध्यम से चीन अपने देश को एशिया, अफ्रीका और यूरोप के कई देशों से रोड और रेलवे लाइन के माध्यम से जोड़ना चाहता है। उसकी यह परियोजना प्राचीन सिल्क रूट का ही आधुनिक संस्करण है। हालाँकि चीन इसे व्यापार सुगमता और वैश्विक व्यापार के अवसरों की वृद्धि की एक पहल के रूप में प्रचारित करता है, किन्तु भारत समेत कई देश इसे चीन की एक गहरी साजिश बताते हैं। एक ऐसी साजिश जिसके तहत चीन अल्पविकसित और विकासशील देशों में विकास के नाम पर उन्हें भारी कर्ज में लाद देता है।

2022 में गुजरात की सभी 182 सीटों पर लड़ेगी AAP, 2017 में कई सीटों पर 100 वोट लाने में भी छूट गए थे पसीने

गुजरात में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। आम आदमी पार्टी (AAP) राज्य की सभी 182 विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी। इसका ऐलान गुजरात के दौरे पर पहुॅंचे पार्टी सुप्रीमो और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सोमवार (14 जून 2021) को की।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार आप की नजर हार्दिक पटेल पर है जो कॉन्ग्रेस में उपेक्षा से नाराज बताए जा रहे हैं। केजरीवाल ने 2022 के चुनावों को ध्यान में रखते हुए दिल्ली की तर्ज पर गुजरात के लोगों को भी फ्री बिजली का लॉलीपॉप दिखाते हुए कहा कि यहाँ के लोग सोचते हैं कि अगर दिल्ली में बिजली फ्री हो सकती है तो यहाँ क्यों नहीं? उन्होंने दावा किया कि बीते 70 साल से गुजरात के अस्पतालों की हालत पूरी तरह से बदहाल है। लेकिन, अब इसकी सूरत बदलने वाली है।

केजरीवाल ने कहा कि पिछले 27 साल से प्रदेश में एक ही पार्टी की सरकार है और ये बीजेपी और कॉन्ग्रेस के बीच दोस्ती की कहानी है। आम आदमी पार्टी के नेता ने कॉन्ग्रेस को बीजेपी की जेब में बताया और कहा कि जब बीजेपी को जरूरत होती है तो कॉन्ग्रेस उसे सप्लाई करती है। केजरीवाल ने कहा कि वो दिल्ली की तरह ही गुजरात का एक अलग मॉडल विकसित करेंगे, जहाँ AAP गुजरात के लोगों के मुद्दों को लेकर राजनीति करेगी।

केजरीवाल देश की आजादी में गुजरातियों के योगदान को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि आजादी दिलाने में ने यहाँ के लोगों का बड़ा योगदान रहा है। AAP नेता ने सरदार बल्लभ भाई पटेल के योगदान का जिक्र किया और कहा कि सरदार ने 500 रियासतों का एकीकरण करके भारत को एकजुट किया। उनके बिना भारत संभव नहीं होता।

2022 के चुनावों को लेकर अभी से भले आप बड़े बड़े दावे कर रही हो, लेकिन 2017 के विधानसभा चुनावों में गुजरात की जनता ने उसे भाव नहीं दिया था। पार्टी ने उस चुनाव में 30 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे इनमें से किसी की जमानत नहीं बची थी। कई तो नोटा से भी पिछड़ गए थे।

उन चुनावों में छोटा उदयपुर से उम्मीदवार रहे अर्जुन भाई वरसिंहभाई को 4500 वोट मिले थे। यह गुजरात में पार्टी का सबसे अच्छा परफॉर्मेंस था। इसके बाद वाँकानेर विधानसभा सीट से पार्टी उम्मीदवार शेरसिया उस्मानगनी हुसैन पटेल 3000 वोट मिल थे। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, कई सीटों पर आप उम्मीदवार 100 वोट का आँकड़ा पार करने में भी कामयाब नहीं रहे थे।

गौरतलब है कि अपनी स्थापना के बाद से ही आप कई राज्यों में जोर-शोर से चुनाव लड़ती रही है। लेकिन दिल्ली के अलावा केवल पंजाब में ही उसे अब तक सफलता मिल पाई है। इसके अलावा आम चुनावों के साथ साथ विधानसभा चुनावों में भी पार्टी की दुर्गति ही हुई है।

हिंसा से भी खौफनाक बंगाल का सिस्टम: पीड़ितों का अब सुप्रीम कोर्ट ही सहारा

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के नतीजे आए करीब डेढ़ महीने ही चुके हैं। सबको आशा थी कि लोग अब चुनाव, चुनाव प्रचार और चुनावी राजनीति से आगे देखेंगे। चुनाव उपरांत शुरू हुई हिंसा धीरे-धीरे रुक जाएगी या कहें तो होने नहीं दिया जाएगा। वैसे तो चुनावों में किसी भी हिंसा का उद्देश्य सरकार बनवाना या विरोधी दल को सत्ता में न आने देना होता है पर पश्चिम बंगाल में शायद इसका उद्देश्य कुछ और ही है।

सरकार बनने के लगभग डेढ़ महीने के बाद हिंसा न केवल जारी है, बल्कि पीड़ितों की एक-एक कर खौफनाक आपबीती सामने आ रही है। एक तरफ से राज्य सरकार और सत्ताधारी दल का कहना है कि कोई हिंसा नहीं हो रही और दूसरी तरह करीब-करीब रोज हिंसा की वारदातों की नई-नई कहानियाँ बाहर आ रही हैं। जिस सरकार का नेतृत्व सार्वजनिक तौर पर अपने राज्य में किसी भी तरह की हिंसा को सीधे नकार दे, वहाँ की पुलिस हिंसा की किसी वारदात को स्वीकार कर उसके विरुद्ध कार्रवाई कैसे कर सकती है? 

ऐसे में हिंसा पीड़ित नागरिकों की बात कौन सुनेगा? उनके विरुद्ध हुई हिंसा को रिपोर्ट करने के लिए राज्य सरकार की कौन सी संवैधानिक संस्था उपयुक्त हो सकती है? इस प्रश्न का उत्तर न मिलने की स्थिति में ही शायद कई पीड़ित महिलाओं को सुप्रीम कोर्ट की शरण लेनी पड़ी है। रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं ने हिंसा, सामूहिक बलात्कार और पुलिस द्वारा अपराध की उचित जाँच न करने की वजह से सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई है

एक साठ वर्षीय महिला ने बताया कि कैसे चुनाव नतीजे आने के बाद तृणमूल कॉन्ग्रेस के समर्थकों ने उसके घर पर धावा बोल दिया और पोते के सामने उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया। यह घटना चुनाव नतीजों के आने के दो दिन बाद 4-5 मई की रात को हुई। साथ ही सत्ताधारी दल के समर्थकों ने महिला के घर में लूटपाट भी की। 

घटना की विस्तृत जानकारी देते हुए महिला ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि खेजुरी में भाजपा की जीत के बावजूद तृणमूल कॉन्ग्रेस के लगभग दो सौ कार्यकर्ताओं ने उसके घर का घेराव किया और उसे बम से उड़ा देने की धमकी दी। इसके दूसरे दिन उसकी बहू अपनी जान बचाने के लिए डर कर घर छोड़ गई। इसके एक दिन बाद फिर TMC के लोग उसके घर में घुसे और उसके साथ बलात्कार किया। इसके पश्चात उसके पड़ोसियों ने महिला को बेहोशी की हालत में पाया और जब उसके दामाद ने एफआईआर करवाने की कोशिश की तो पुलिस ने दर्ज करने से मना कर दिया। महिला का कहना है कि सत्ताधारी दल के कार्यकर्ता बलात्कार को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हैं। महिला ने इस घटना की सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में एसआईटी जाँच की माँग की है।

पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा का इतिहास पुराना होगा पर क्या राजनीतिक दल, मीडिया, बुद्धिजीवी, संवैधानिक संस्थाओं वगैरह के लिए यह कह देना ही काफी है? इससे कौन मना कर सकता है कि प्रदेश में राजनीतिक हिंसा का इतिहास पुराना है, पर हम इस लाइन को कहकर या लिखकर कब तक जिम्मेदारियों से मुँह मोड़ते रहेंगे? जब किसी हिंसा के विरुद्ध कुछ न कर सकेंगे तो क्या उसे उचित ठहराने का प्रयास करने लगेंगे? क्या यह कह कर आँख बंद करते रहेंगे कि यह तो राजनीतिक जीवन का अभिन्न अंग बन गया है? जब चुनावी राजनीति की अन्य विसंगतियों को रोकने के प्रयास काफी हद तक सफल हुए हैं तो फिर इस विसंगति में ऐसा क्या है जिसे नहीं रोका जा सकता?

एक समय बूथ लूटना राजनीति का अभिन्न अंग था। उसे लगातार चलने क्यों नहीं दिया गया? यह कहकर हम, राजनीतिक दल या संवैधानिक संस्थाएँ अपनी जिम्मेदारियों से हाथ धोते रहती कि बूथ लूटना तो राजनीति का अभिन्न अंग बन गया है। काफी समय तक दोहराए जाने के बाद उसे भी ऐसा ही मान लिया जाता तो वो भी अभी तक अभिन्न अंग बनकर चिपका रहता। पर हमारी, लोकतांत्रिक व्यवस्था और संवैधानिक संस्थाओं की इच्छाशक्ति और सामूहिक प्रयास से उसे रोका गया, क्योंकि उसे रोकने से ही लोकतांत्रिक प्रक्रिया की रक्षा हो सकती थी। तो प्रश्न यह है कि यदि बूथ लूटने को राजनीति का अभिन्न अंग बनने से हम चिंतित थे तो इतनी भीषण राजनीतिक हिंसा को अभिन्न अंग बने कैसे देखना चाहते हैं? कितना कठिन है सरकारों के लिए इस हिंसा को रोक पाना?

जब राजनीतिक हिंसा का एक स्वर में विरोध होना चाहिए, तब राजनीतिक और वैचारिक समर्थकों की ओर से उस पर चुप्पी साधी जा रही है या फिर यह कहकर उसे एक मोड़ दिया जा रहा है कि पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा का चरित्र कभी भी सांप्रदायिक नहीं रहा है। यह कैसा तर्क है कि हिंसा यदि सांप्रदायिक न हो तो उसे होते रहना चाहिए? 2021 में हिंसा सांप्रदायिक क्या केवल इसलिए नहीं हो सकती क्योंकि पहले नहीं हुई है? यह ऐसा ही तर्क है जैसे कोई कहे कि कॉन्ग्रेस पार्टी और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के बीच इसलिए कोई MOU नहीं हो सकता क्योंकि जब पंडित नेहरू प्रधानमंत्री थे तब चीन ने भारत पर आक्रमण किया था!

कालांतर में राजनीतिक हिंसा का स्वरूप क्यों नहीं बदल सकता? पिछले दो विधानसभा चुनावों में तृणमूल कॉन्ग्रेस को चुनौती तथाकथित सेक्युलर दलों से मिली थी शायद इसलिए तब राजनीतिक हिंसा का स्वरूप सांप्रदायिक नहीं था। इस बार सत्ताधारी दल को चुनौती भाजपा से मिली है तो हो सकता है कि इसलिए हिंसा का स्वरूप सांप्रदायिक हो गया हो। पर बिना किसी जाँच के लोग किसी निर्णय पर कैसे पहुँच जा रहे हैं, यह समझ से परे है। 

सामूहिक बलात्कार की जो पीड़िता सुप्रीम कोर्ट गई है उनकी इस माँग से किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि बलात्कार और हिंसा की इन घटनाओं की जाँच कोर्ट की देखरेख में एसआईटी से करवाई जाए। कानून की अपनी परिभाषाएँ और दांव-पेंच होते होंगे, पर मानवाधिकार की दृष्टि से देखा जाए तो एक पीड़ित नागरिक की सुनवाई यदि राज्य की पुलिस या कानून-व्यवस्था की मशीनरी न करे तो उसके पास क्या चारा बचता है?

खासकर तब जब राज्य के उन नागरिकों में भय व्याप्त है जिन्होंने तृणमूल को अपना वोट या समर्थन नहीं दिया। नागरिकों में भय का माहौल कैसे न होगा जब सत्ताधारी के दल के सांसद कैमरे पर अपने दल के लोगों से कहते हैं कि वर्तमान राज्यपाल के विरुद्ध राज्य के हर पुलिस स्टेशन में मुकदमा किया जाना चाहिए क्योंकि आज उनके खिलाफ भले ही कुछ न किया जा सके पर जिस दिन वे अपने पद पर नहीं रहेंगे तब गिरफ्तार करके उसी जेल में डाला जाएगा जिसमें तृणमूल के मंत्री बंद थे। इस तरह की भाषा और धमकी यदि राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को दी जा सकती है तो फिर इस राज्य में जाँच और मुक़दमे की सुनवाई सही ढंग से होगी, इस बात पर किसे भरोसा होगा?

पिछले एक महीने में यह माँग उठती रही है कि सुप्रीम कोर्ट पश्चिम बंगाल में होने वाली हिंसा, लूटमार, बलात्कार वगैरह की घटनाओं का स्वतः संज्ञान ले। कोर्ट के पास ऐसा न करने के अपने कारण होंगे जो संविधान और न्याय सम्मत भी होंगे पर कोर्ट उन मामलों की सुनवाई तो कर ही सकता है जिन्हें लेकर उसकी शरण में एक आम पीड़ित नागरिक पहुँचा है।

चाचा ने ही कर डाला चिराग तले अंधेरा: कार चलाना, आधे घंटे हॉर्न बजाना और मॉं की दुहाई भी काम न आई

बिहार के राजनीतिक दल ‘लोक जनशक्ति पार्टी (LJP)’ में बड़ा घमासान मचा हुआ है, जहाँ चाचा पशुपति कुमार पारस ने चिराग पासवान का पत्ता काट के खुद सारे निर्णय लेना शुरू कर दिया है। पार्टी के लोकसभा में फ़िलहाल 6 सांसद हैं, जिनमें अध्यक्ष चिराग पासवान के अलावा बाकी सभी सांसद एकजुट हैं। साथ ही पशुपति कुमार पारस को लोकसभा में पार्टी का नेता भी नियुक्त कर दिया गया है।

उधर चिराग पासवान अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए खुद चाचा के घर पहुँचे, जहाँ उनके लिए दरवाजा तक नहीं खोला जा रहा था। वो खुद कार चला कर चाचा के बंगले पर पहुँचे थे। आधे घंटे तक लगातार हॉर्न बजाने के बाद दरवाजा खुला। पारस बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को एक अच्छा नेता और ‘विकास पुरुष’ बता चुके हैं, जबकि चिराग पासवान उनके धुर-विरोधी रहे हैं। उनका कहना है कि उन्होंने पार्टी तोड़ी नहीं है, बल्कि बचाई है।

NBT की खबर के अनुसार, चिराग पासवान ने डैमेज कंट्रोल की उम्मीद में चाचा पशुपति कुमार पारस के समक्ष अंतिम प्रस्ताव ये रखा कि पार्टी के संस्थापक रामविलास पासवान के निधन के बाद उनकी पत्नी, अर्थात चिराग की माँ रीना पासवान सबसे वरिष्ठ हैं और उन्हें ही अध्यक्ष का पद दिया जाए। इस पर पारस खेमे से कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं आई है। चिराग पासवान अपने मित्र राजू तिवारी के साथ चाचा के बंगले पर डेढ़ घंटे रुके, लेकिन मुलाकात नहीं हो पाई।

सीधी मुलाकात न होने पर चिराग ने चाचा के समक्ष अपना प्रस्ताव भिजवाया। इससे साफ़ है कि पशुपति कुमार पारस ने घर और पार्टी का दरवाजा चिराग के लिए बंद कर दिया है और वो उनसे किसी प्रकार के समझौते के मूड में नहीं हैं। राजद नेता भाई वीरेंद्र ने चिराग को अपनी पार्टी में शामिल होकर इज्जत बचाने का ऑफर किया है। उन्होंने कहा कि तेजस्वी व चिराग युवा हैं, तेजस्वी बिहार में और चिराग केंद्र में मिल कर राजनीति कर सकते हैं।

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सांसदों का समर्थन पत्र भी सौंप दिया गया है। पाँचों बागी सांसदों ने पशुपति कुमार पारस को अपना नया नेता चुनने की बात कही है। वहीं महबूस अली कैंसर को लोकसभा में पार्टी का उपनेता बनाया गया है। सूरजभान सिंह के भाई नवादा से सांसद चंदन सिंह को पार्टी का मुख्य सचेतक नियुक्त किया गया है। पद बाँटने में जिस तरह से जातिगत समीकरणों का ख्याल रखा गया है, उससे स्पष्ट है कि तैयारी पहले से चल रही थी। पारस को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष भी घोषित कर दिया गया है।

उन्होंने दलित+मुस्लिम+भूमिहार का समीकरण बना कर पार्टी में बगावत की है। इससे पहले मीडिया को बयान देते हुए पारस ने दावा किया था कि लोजपा के 99% कार्यकर्ता चिराग पासवान के नेतृत्व में बिहार 2020 विधानसभा चुनाव में JDU के खिलाफ पार्टी के लड़ने और असफल रहने से काफी नाराज़ हैं। उन्होंने NDA के हिस्सा बने रहने की बात करते हुए कहा कि चिराग भी संगठन में बने रह सकते हैं।

मटिहानी सीट से जीतने वाले पार्टी के एकमात्र विधायक राजकुमार सिंह पहले ही JDU में जा चुके हैं। रामविलास पासवान के एक अन्य दिवंगत भाई रामचंद्र पासवान के बेटे प्रिंस राज ने भी बगावती खेमे का ही रुख किया है। इससे साफ़ है कि रामविलास पासवान की विरासत को लेकर पारिवारिक लड़ाई पहले से चल रही थी। पारस जदयू नेता ललन सिंह और पासवान के रिश्तेदार महेश्वर हजारी से संपर्क में थे, जो जदयू में ही हैं।

लोजपा ने 2020 के विधानसभा चुनाव में जदयू उम्मीदवारों की सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए थे। चिराग ने भाजपा का कभी विरोध नहीं किया था और NDA में बने हुए थे। मंत्रिमंडल विस्तार की अटकलों के बीच पशुपति कुमार पारस को भी इसमें जगह मिलेगी या नहीं, ये चर्चा अब तेज़ है। सूरज भान सिंह भी दिल्ली में बैठ कर बगावत की रणनीति बनाते रहे। असंतुष्टों को मनाने में असफल रहने और एकतरफा फैसले लेने को चिराग की विफलता मानी जा रही है।

एक्ट्रेस पोरी मोनी ने बिजनेसमैन नासिर महमूद पर लगाया रेप और हत्या की कोशिश का आरोप: माँगा पीएम हसीना से इंसाफ

पोरी मोनी के नाम से मशहूर बांग्लादेशी एक्ट्रेस शमसुन्नहर स्मृति ने एक फेसबुक पोस्ट कर प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजेद से न्याय की गुहार लगाई है। 28 वर्षीय अभिनेत्री ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में ढाका बोट क्लब के मनोरंजन और कल्चरल मामलों के सचिव और बिजनेसमैन नासिर यू महमूद पर रेप और हत्या की कोशिश करने का आरोप लगाया है। इस मामले में एक्ट्रेस ने सावर पुलिस स्टेशन में केस दर्ज कराया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, अभिनेत्री ने आरोप लगाया कि नासिर ने चार दिन पहले ढाका के उत्तरा क्लब में उनके साथ मारपीट की। उन्होंने पीएम हसीना को माँ कहकर संबोधित करते हुए कहा कि उसने इस मामले में कानूनी एजेंसियों से शिकायत की थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।

एक्ट्रेस पोरी मोनी द्वारा किए गए फेसबुक पोस्ट का स्क्रीनशॉट

बांग्ला में लिखी पोस्ट में अभिनेत्री ने कहा, “मैं न्याय के लिए कहाँ जाऊँ? पिछले चार दिनों में भी इसे नहीं ढूँढ सकी हूँ। हर कोई विस्तार से सुनता है, लेकिन कोई इस पर कुछ नहीं करता। मैं एक लड़की हूँ, एक अभिनेत्री हूँ, लेकिन उससे पहले मैं एक इंसान हूँ। मैं चुप नहीं रह सकती।”

एक्ट्रेस ने कुल 6 लोगों के खिलाफ दर्ज कराया केस

एक्ट्रेस पोरी मोनी ने व्यवसायी और उत्तरा क्लब लिमिटेड के पूर्व अध्यक्ष, नासिर यू महमूद के अलावा पाँच अन्य के खिलाफ सावर पुलिस स्टेशन में केस दर्ज कराया है। इस बात की जानकारी सावर पुलिस स्टेशन के ऑफिसर इनचार्ज काजी मैनुल इस्लाम ने दी है।

ढाका ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक, अभिनेत्री ने रविवार (13 जून 2021) की देर रात अपने आवास पर मीडिया ब्रीफिंग करने के बाद सोमवार ( 14 जून 2021) को केस दर्ज कराया। इससे पहले अपने फेसबुक पोस्ट में उन्होंने किसी की नाम नहीं लिया था।

पुलिस अधिकारी मैनुल ने कहा है कि इस मामले को लेकर ढाका के मीरपुर के रूपनगर पुलिस स्टेशन में एक लिखित शिकायत दर्ज की गई थी। लेकिन, चूँकि घटना सावर इलाके में हुई थी, इसलिए शिकायत को सावर पुलिस स्टेशन में स्थानांतरित कर दिया गया है।

2015 से पोरी मोनी ने पाई प्रसिद्धि

2015 में फिल्म इंडस्ट्री ज्वाइन करने के बाद पोरी मोनी की प्रसिद्धि में तेजी से उछाल आया है। उन्होंने दो दर्जन बांग्लादेशी फिल्मों में मुख्य महिला भूमिका निभाई है। फोर्ब्स पत्रिका ने पिछले साल उन्हें एशिया के 100 डिजिटल स्टार में से एक के रूप में सेलेक्ट किया था।

बीजेपी समर्थन का ‘सबक’: गैंगरेप के बाद दलित नाबालिग को मरने के लिए जंगल में छोड़ दिया, SC को सुनाई प्रताड़ना

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे 2 मई 2021 को आए थे। सत्ताधारी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की जीत सुनिश्चित होते ही राज्य में राजनीतिक हिंसा का दौर शुरू हो गया था। विपक्ष खासकर बीजेपी समर्थकों, उनके घरों, पार्टी दफ्तरों को निशाना बनाने के आरोप टीएमसी के गुंडों पर लगे थे। इन मामलों में बंगाल पुलिस की उदासीनता से निराश लोग अब न्याय की आस में सुप्रीम कोर्ट पहुँच रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में गैंगरेप की पीड़िताओं ने जो आपबीती सुनाई है वह सिहराने वाली है।

एक 17 वर्षीय दलित नाबालिग ने शीर्ष अदालत में याचिका दाखिल करते हुए खुद के साथ जंगल में रेप करने का आरोप टीएमसी के गुंडों पर लगाया है। उसने कहा है कि भाजपा का समर्थन करने पर ‘सबक’ सिखाने के लिए चार टीएमसी कार्यकर्ताओं ने उसके साथ एक घंटे से अधिक समय तक बलात्कार किया। यह घटना नौ मई को हुई थी जब पीड़िता अपने दोस्तों के साथ घर लौट रही थी।

नाबालिग के अनुसार गैंगरेप के बाद उसे मरने के लिए जंगल में छोड़ दिया गया था। घटना के अगले दिन कथित तौर पर टीएमसी का एक नेता एसके बहादुर उसके घर पहुँचा। उसने शिकायत दर्ज कराने पर उसके परिजनों को धमकी दी। साथ ही घर जला देने की भी चेतावनी दी। नाबालिग ने मामले की एसआईटी जाँच और सुनवाई को पश्चिम बंगाल से बाहर स्थानांतरित करने की गुहार लगाई है।

इससे पहले बंगाल के दो दिवसीय दौरे के बाद राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (एनसीएससी) के चेयरमैन विजय सांपला ने टीएमसी पर गंभीर आरोप लगाए थे। उन्होंने कहा था, “दो मई के बाद यहाँ जिस तरह की घटनाएँ हुई हैं, वह चिंताजनक है। 1947 के बाद पहली बार बलात्कार, हत्याएँ बिना किसी राज्य संरक्षण के हो रही हैं। इसमें सबसे ज्यादा प्रभावित अनुसूचित जाति के लोग हुए हैं।” सांपला ने बताया था कि बंगाल में दलितों के खिलाफ हिंसा के 1627 मामले सामने आए। इनमें से करीब 10-12 मामले रेप से संबंधित थे। इसके अलावा 15 से 20 लोगों की हत्या के मामले भी सामने आए हैं।

वहीं एक 60 वर्षीय बुजुर्ग महिला ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि उनका गैंगरेप उनके 6 साल के पोते के सामने किया गया। इतना ही नहीं जब उनके दामाद शिकायत दर्ज कराने थाने पहुँचे तो पुलिस ने एफआईआर दर्ज करने से इनकार कर दिया था। इस म​हिला का कोलकाता के अपोलो अस्पताल में उपचार किया गया जहाँ जाँच में रेप की पुष्टि हुई। महिला ने अपनी याचिका में कहा है, “इतिहास भीषण उदाहरणों से भरा हुआ है जब विरोधियों को आतंकित और हतोत्साहित करने के लिए बलात्कार को रणनीति के रूप में इस्तेमाल किया गया। लेकिन कभी भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भागीदारी पर महिला के साथ इस तरह के क्रूर अपराध नहीं किए गए थे।”

इससे पहले हिंसा में मारे गए बीजेपी कार्यकर्ता अभिजीत सरकार और हारन अधिकारी के परिजनों ने भी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हिंसा की सीबीआई या SIT जाँच की अपील की थी। अभिजीत सरकार की पत्नी जो उनकी हत्या की चश्मदीद भी हैं ने बताया था, “भीड़ ने उनके पति के गले में सीसीटीवी कैमरे का तार बाँध दिया। गला दबाया। ईंट और डंडों से पीटा। सिर फाड़ दिया और माँ के सामने उनकी बेरहमी से हत्या कर दी। आँखों के सामने बेटे की हत्या होते देख उनकी माँ बेहोश होकर मौके पर ही गिर गईं।”

रोहिंग्या को आधार कार्ड, वोटर कार्ड, पैसा सब कुछ: यूपी के गाँव-गाँव में बसाने की साजिश, चुनाव और PFI से भी कनेक्शन

उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। उससे पहले रोहिंग्या मुसलमानों को राज्य में बसाने को लेकर एक बड़ी साजिश का पर्दाफाश हुआ है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक सोची-समझी साजिश के तहत इन्हें बसाया जा रहा है। इनके फर्जी आधार कार्ड, वोटर कार्ड सहित अन्य दस्तावेज तैयार करवाए जा रहे हैं ताकि वे वोट डाल सकें। इन्हें आर्थिक मदद भी मुहैया कराई जा रही।

प्रदेश की एटीएस ने पिछले सप्ताह गाजियाबाद में रहने वाले नूर आलम और आमिर हुसैन नाम के दो रोहिंग्या को जाली कागजात के साथ गिरफ्तार किया था। इसके बाद दोनों को पाँच दिन की रिमांड पर लखनऊ भेजा गया। पूछताछ के दौरान दोनों ने कई हैरान कर देने वाले खुलासे किए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, एजेंसियों को पता चला है कि दिल्ली के खजूरी खास इलाके के एक वेंडर ने रोहिंग्याओं को उत्तर प्रदेश में बसाया था।

यूपी एडीजी (लॉ एंड ऑर्डर) प्रशांत कुमार ने खुलासा किया है कि रोहिंग्या मुस्लिम फर्जी राशन कार्ड, पैन कार्ड और वोटर आईडी कार्ड के साथ प्रदेश के विभिन्न स्थानों में बसने लगे हैं। आज तक की रिपोर्ट में कहा गया है कि इन रोहिंग्याओं को वोट बैंक के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके लिए उन्हें आर्थिक मदद भी दी जा रही है।

आईपीएस अधिकारी ने बताया है कि रोहिंग्या मुस्लिम प्रदेश के हर विधानसभा क्षेत्रों में बस गए हैं। आधार कार्ड और वोटर कार्ड समेत दूसरे पहचान प्रमाण-पत्र होने के कारण उनकी पहचान कर पाना काफी मुश्किल काम है।

नूर आलम और हुसैन की गिरफ्तारी का ऑपरेशन चलाने वाले प्रदेश एटीएस के आईजी जीके गोस्वामी ने बताया है कि आरोपितों के पास से 70,000 रुपए नकद, पैन, आधार और यूएनएचसीआर कार्ड मिला है। जाँच एजेंसी को पता चला है कि ये दोनों अलग-अलग माध्यम से रोहिंग्या मुस्लिमों को भारत में घुसाने के रैकेट में भी शामिल हैं।

टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए एक स्टेटमेंट में आईजी ने बताया, “शुरुआती पूछताछ में पता चला कि नूर आलम और आमिर हुसैन रोहिंग्या को भारत लाने का काम कर रहे थे। यहाँ उन्हें नौकरी दिलाने और दस्तावेज बनवाने में मदद करने के बहाने उनसे पैसे वसूल करते थे। रोहिंग्याओं को बांग्लादेश के रास्ते अवैध तरीके से भारत लाया जा रहा था।”

2021 में पकड़े गए रोहिंग्या

इसी साल जनवरी (2021) के महीने में संत कबीर नगर में गिरफ्तार किए अजीज उल हक, गाजियाबाद से गिरफ्तार नूर आलम का जीजा था। अजीज फर्जी दस्तावेजों के सहारे बीते 20 साल से भारत में रह रहा था। वहीं 28 फरवरी 2021 को मोहम्मद फारूक और हसन को अलीगढ़ से गिरफ्तार करने के बाद फारूक के भाई को भी 1 मार्च को उन्नाव से गिरफ्तार किया गया था। शाहिद को फर्जी इंडियन आईडेंटिटी डॉक्युमेंट्स और 5 लाख रुपए के साथ पकड़ा गया था।

एटीएस की इस पूछताछ में जिस बात का खुलासा हुआ है वो ये है कि अपने सगे संबंधियों की सहायता से रोहिंग्या मुस्लिम पूरे प्रदेश में बस चुके हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक ज्यादातर रोहिंग्या अलीगढ़, आगरा और उन्नाव के बूचड़खानों में काम करते हैं।

पीएफआई के नेता दे रहे शरण

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, विधानसभा चुनाव से पहले बांग्लादेशी घुसपैठियों और रोहिंग्याओं ने यूपी में बसना शुरू कर दिया है। प्रतिबंधित सिमी समर्थित पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) के नेता इन घुसपैठियों को संरक्षण दे रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार बंग्लादेशी घुसपैठियों को स्थानीय भाषा आती है। लिहाजा वे शहरी इलाकों में ठिकाना बना रहे हैं। वहीं उनकी मदद से रोहिंग्या यूपी के ग्रामीण इलाकों में बसाए जा रहे हैं।

‘हिंदुओं को 1 सेकेंड के लिए भी खुश नहीं देख सकता’: वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप से पहले घृणा की बैटिंग

इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल (ICC) द्वारा आयोजित ‘वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप (WTC)’ टूर्नामेंट का आयोजन किया जा रहा है। इसका अंतिम और फाइनल मैच भारत-न्यूजीलैंड के बीच इंग्लैंड के ऐतिहासिक लॉर्ड्स मैदान में होना है। इस बीच ऑस्ट्रेलिया के लेखक सीजे वर्लमैन (CJ Werlman) ने इस मैच से पहले भारत और हिंदुओं को लेकर घृणित बयान दिया है। इसके बाद सोशल मीडिया पर उनकी थू-थू हो रही है।

सीजे वर्लमैन ने लिखा, “मैं ICC वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप के फाइनल मैच में न्यूजीलैंड का समर्थन कर रहा हूँ। ऐसा इसीलिए, क्योंकि 50 करोड़ हिंदुत्व कट्टरपंथियों को मैं एक सेकेंड के लिए भी खुश नहीं देख सकता। उनके खुश होने से मैं असहज महसूस करता हूँ।” इस पर उन्हें जवाब देते हुए भारत के पूर्व तेज़ गेंदबाज वेंकटेश प्रसाद ने कहा कि जीते कोई भी, लेकिन ये ट्वीट ये बताता है कि इस व्यक्ति की सोच कितनी तुच्छ और घृणास्पद है।

फ़िलहाल केनरा बैंक के डिप्टी जनरल मैनेजर (DGM) का पद संभाल रहे वेंकटेश प्रसाद ने कहा, “इस व्यक्ति को लिखने के लिए कई प्रकाशन संस्थानों द्वारा मौका दिया जाता है, ये उन संस्थानों में भी दिखता है। जल्दी ठीक हो जाओ।”

बता दें कि सीजे वर्लमैन ‘द ट्रिब्यून’, ‘बाइलाइन टाइम्स’ और ‘इनसाइड अरबिया’ में लेख लिखते हैं। साथ ही उन्होंने ‘Koran Curious’ और ‘God Hates You, Hate Him Back: Making Sense of the Bible’ जैसी पुस्तकें भी लिखी हैं।

वेंकटेश प्रसाद ने सीजे वर्लमैन के ट्वीट का दिया जवाब

47 वर्षीय सीजे वर्लमैन खुद को ‘इस्लामोफोबिया विरोधी एक्टिविस्ट’ भी बताते हैं। इससे पहले उन्होंने ‘मोदी नेक्स्ट’ ट्वीट के साथ जैक से पीएम मोदी का हैंडल सस्पेंड करने की माँग की थी। वो जम्मू कश्मीर में कश्मीरी पंडितों के नरसंहार को भी एक ‘Myth’ बताते हैं और कहते हैं कि इस ‘झूठ’ का परिणाम आज भी कश्मीरी मुस्लिम भुगत रहे हैं।

हिन्दू घृणा के लिए जाने जाने वाले सीजे ने अब क्रिकेट को भी इसमें घसीट लिया है। ​अक्सर हिंदू घृणा से सने ट्वीट करने वाले और इस्लामी समर्थक सीजे वेरलेमैन के ऊपर शेखर गुप्ता की वेबसाइट ने प्रोफाइल किया, उसे एक पत्रकार के रूप में घोषित किया।

उधर लॉर्ड्स में मैच से पहले भारत-न्यूजीलैंड की टीमें प्रैक्टिस में लगी हुई हैं। ये मैच शुक्रवार (जून 18, 2021) से शुरू हो रहा है। पिछले 2 साल से चल रहे इस टूर्नामेंट में कई बड़े मैच देखने को मिले। कोरोना के कारण शेड्यूल इधर-उधर भी हुआ। रैंकिंग में न्यूजीलैंड नंबर-1 और भारतीय टीम नंबर-2 पर आई। भारत ने ऑस्ट्रेलिया को 2-1 और इंग्लैंड को 3-1 से हरा कर टूर्नामेंट के फाइनल के लिए क्वालिफाय किया।