Home Blog Page 39

हिमंता की पत्नी पर 3 पासपोर्ट का आरोप लगाने का दाँव पड़ेगा पवन खेड़ा पर भारी, 48 घंटों में होगा केस: रिनिकी बोलीं- ये तस्वीरें AI और फोटोशॉप से बनी

कॉन्ग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर असम सीएम हिमंता बिस्वा सरमा की पत्नी पर तीन देशों के पासपोर्ट रखने का आरोप लगाया है। इसे एआई का कमाल बताते हुए हिमंता बिस्वा सरमा की पत्नी रिनिकी भुइयाँ सरमा ने जमकर लताड़ लगाई है। वहीं सीएम हिमंता ने कोर्ट में जाने की धमकी दी है।

AI और फोटोशॉप का कमाल- रिनिकी

सोशल मीडिया एक्स पर रिनिकी भुइयाँ सरमा ने कहा, “आपकी सिर्फ तपस्या में ही नहीं, AI जेनरेशन और फोटोशॉपिंग में भी कमी रह गई।”

उन्होंने आगे कहा कि मुझे उम्मीद थी कि एक नेशनल पार्टी का स्पोक्सपर्सन बेसिक ड्यू डिलिजेंस करेगा, न कि मनगढ़ंत पासपोर्ट और डॉक्यूमेंट्स की खराब इमेज सर्कुलेट करेगा। अब मैं कानून को अपना काम करने दूँगी। क्रिमिनल चार्ज लगाए जा रहे हैं। हम इसे कोर्ट में ले जाएँगे।

कथित पासपोर्ट की गड़बड़ियों को सीएम सरमा ने बतलाया

सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने एक्स पर पवन खेड़ा द्वारा किए गए दावों पर सवाल उठाते हुए सिलसिलेवार तरीके से कई गड़बड़ियों का जिक्र किया है।

उन्होंने लिखा है कि कॉन्ग्रेस का प्रोपेगैंडा का भंडाफोड़ हो गया है। जो डॉक्यूमेंट्स शेयर हो रहे हैं, उनमें कई गड़बड़ियाँ साफ दिख रही हैं। ये डिजिटल मैनिपुलेशन की एक घटिया कोशिश है।

उन्होंने कहा कि सबसे पहले सरनेम में गड़बड़ी है। ऑफिशियल ‘SHARMA’ की जगह ‘SARMA’ इस्तेमाल किया गया है।

फोटोग्राफ में गड़बड़ी है। यह एक पब्लिक इमेज लगती है, स्टैंडर्ड बायोमेट्रिक कैप्चर नहीं लग रहा है।

पवन खेड़ा ने एक पासपोर्ट UAE का बताया था। उसकी आईडी में गड़बड़ियाँ हैं। ID सीक्वेंस जन्म के साल के पैटर्न से अलग है। इसके अलावा नेशनैलिटी में गड़बड़ी है। इजिप्ट के तौर पर लिस्टेड है, जबकि MRZ एक अलग कंट्री कोड दिखाता है।

पवन खेडा ने दूसरा पासपोर्ट एंटीगुआ और बारबुडा का बताया था। इस पर सीएम हिमंता का कहना है कि प्रिंटेड फील्ड और MRZ के बीच एक्सपायरी डेट में गड़बड़ी है।

तीसरा पासपोर्ट इजिप्ट का बताया गया था। इसमें भी कई गड़बड़ियाँ हैं। प्रिंटेड फील्ड और MRZ के बीच पासपोर्ट नंबर में गड़बड़ी है। इसके अलावा स्पेलिंग में गलतियाँ हैं जैसे ‘इजिप्टियन’ लिखा गया है और गलत अरबी रेफरेंस दिया गया है।

इसके अलावा टाइटल डीड QR कोड इनवैलिड लगता है और किसी भी ऑथेंटिक रिकॉर्ड से मेल नहीं खाता है। इन गड़बड़ियों को बताते हुए सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा कि ये मनगढ़ंत या डिजिटल मैनिपुलेशन हो सकता है।आखिरकार पवन खेड़ा जेल जाएँगे। सच की जीत होगी। गलत जानकारी फैलाने वालों को जिम्मेदार ठहराया जाएगा।

सीएम ने कहा कि वह और उनकी पत्नी अगले 48 घंटों में पवन खेड़ा के खिलाफ क्रिमिनल और सिविल दोनों तरह के मानहानि के केस करेंगे। उन्हें बदनाम करने की कोशिश की गई है।

न्यायपालिका पर भरोसा जताते हुए असम सीएम ने कहा कि जब अदालत में सच्चाई सामने आ जाएगी, तो पवन खेड़ा को अपने कामों का नतीजा भुगतना होगा।

असम के लोग ऐसे प्रोपेगैंडा से गुमराह नहीं होंगे। हम लोगों से 100 से ज्यादा सीटों का निर्णायक जनादेश हासिल करने को लेकर पूरी तरह फोकस हैं।

क्या कहा था पवन खेड़ा ने

कॉन्ग्रेस नेता पवन खेड़ा ने असम सीएम सरमा की पत्नी पर आरोप लगाया था कि उनके पास तीन लिविंग पासपोर्ट हैं। एक ही वक्त में तीनों एक्टिव है। गोल्डन कार्ड यूएई का है जो 2027 तक एक्टिव है। दूसरा पासपोर्ट एंटीगुआ बारबोडा का है, जो 2031 को खत्म होगा। तीसरा इजिप्ट का है। उन्होंने कहा कि कोई और राजनेता नहीं होगा, जिसके पास तीन-तीन देशों के पासपोर्ट हों। क्या आप क्रिमिनल हैं, जो आपको तीन-तीन पासपोर्ट की जरूरत पड़ रही है।

उन्होंने ये भी आरोप लगाया कि सीएम सरमा की पत्नी भारत की नागरिक नहीं हैं और वह अवैध हैं। अगर वह भारत की नागरिक हैं, तो वह गैरकानूनी है क्योंकि अगर यह पासपोर्ट सही नहीं है, तो गृहमंत्री अमित शाह को बताया चाहिए और जाँच बिठानी चाहिए। कॉन्ग्रेस नेता ने यहाँ तक आरोप लगाया कि सरमा परिवार चुनाव हारने के बाद देश छोड़ने की तैयारी कर रहे हैं।

अब सवाल यह उठता है कि ये तीनों पासपोर्ट सही है या इसे फर्जी तरीके से बना कर जनता को बरगलाने का प्रयास है। सीएम हिमंता एक के बाद एक ट्वीट कर साफ कर चुके हैं कि सरमा दंपति कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी कर रहे हैं। क्या ये कॉन्ग्रेस की चुनाव से पहले की घबराहट है, जो एआई और फोटोशॉप का इस्तेमाल कर जनता को कुछ दिनों के लिए बरगला कर येन केन प्रकारेण चुनाव में जीत हासिल करने की कोशिश में है या कॉन्ग्रेस इतनी हताश हो गई है कि हिमंता सरमा के खिलाफ साजिश रच रही है।

जिस सनातन को ‘डेंगू-मलेरिया’ कह करना चाहते थे खत्म, अब उसके दर पर सिर झुका रहे उदयनिधि स्टालिन: वोट के लिए आस्था की नौटंकी कर रही DMK?

चुनाव नजदीक आते ही राजनीतिक दलों की पैंतरे बाजी शुरू हो जाती है। तमिलनाडु चुनाव से पहले अब तमिलनाडु के डिप्टी सीएम और एमके स्टालिन के बेटे उदयनिधि स्टालिन को मंदिर की याद आने लगी है। वह मंदिरों की खाक छानते घूम रहे हैं। ये वही स्टालिन हैं, जिन्होंने सनातन धर्म को खत्म करने की बात कही थी और इसकी की तुलना डेंगू-मलेरिया से की थी।

उदयनिधि स्टालिन पहुंचे मंदिर

करुणानिधि के पोते उदयनिधि स्टालिन कई बार कह चुके हैं कि वह पूजा-पाठ नहीं करते। वह अपने निर्वाचन क्षेत्र के सेंजेनियमन मंदिर में पूजा करते दिखे गए। उनके साथ सांसद दयानिधि मारण भी मौजूद थे।

पार्टी के उम्मीदवार और पूर्व सांसद डॉक्टर सेंथिल कुमार भी पारंपरिक पूजा-अर्चना के विरोध में बोलते रहे हैं। वह सड़क परियोजना के दौरान सबसे पहले होने वाले भूमि पूजन कार्यक्रम और पूजा-पाठ का विरोध किया था। वह भी अब मंदिरों के दर पर शीश झुकाते नजर आ रहे हैं। मंदिर-मंदिर अपनी ‘जीत’ ढूँढ रहे हैं। दरअसल डीएमके इस चुनाव में हिन्दुत्व के प्रति ‘सॉफ्ट रणनीति’ अपना कर बहुसंख्यक हिन्दुओं को खुश करने की कोशिश में जुट गई है।

यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि बीजेपी तमिलनाडु में अन्नामलाई के नेतृत्व में अपनी पैठ बढ़ा चुकी है। एआईएडीएएमके और छोटी-छोटी पार्टियों के साथ मिल कर एनडीए चुनाव में डीएमके-कॉन्ग्रेस गठबंधन को पटखनी देने के लिए बेताब है। इसलिए, डीएमके को अपने वोट बैंक को सुरक्षित रखने के लिए ‘धार्मिक संतुलन’ बनाना पड़ रहा है।

तमिलनाडु में जाति विभाजन की जड़ें भी काफी गहरी है। इसलिए राज्य के मंत्री थंगम थेनारासु का दलित नेता इमैनुएल सेकरन के स्मारक पर जाना भी चर्चा का विषय बन गया है। आमतौर पर नेता दलित नेताओं के स्मारक पर तभी आते हैं जब जयंती या डेथ एनिवर्सरी होती है। मंत्री थेनारासु दरअसल यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि चुनाव में दलित और पिछड़ों का वोट उनसे न छिटके। इससे पता चलता है कि डीएमके चुनाव में हर वह साम दाम दंड भेद अपना रही है, जिससे चुनाव जीता जा सकता है।

उदयनिधि स्टालिन का कोई ह्रदय परिवर्तन नहीं हुआ है। अगर ऐसा होता तो पहले अपने विवादित बयानों की माफी माँगते, सनातन धर्म में आस्था जताते हुए मंदिर जाते। लेकिन मंदिर जाकर फोटो खिंचा कर जनता में प्रचारित करना कि वह पूजा-पाठ में विश्वास करते हैं, सिर्फ चुनावी स्टंट हैं, इससे ज्यादा कुछ नहीं।

अब सत्ता ऐसी चीज ही है, जिसे पाने के लिए राजनेता अपना सबकुछ न्यौछावर करने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं।

डीएमके नेता उदयनिधि स्टालिन इसका ताजा उदाहरण हैं। वे कई बार अपने इंटरव्यू में साफ कर चुके हैं कि वे पूजा-पाठ नहीं करते। वो सनातन धर्म को खत्म करना चाहते हैं। उन्होंने डेंगू-मलेरिया भी सनातन को कह दिया था। ये बयान देशभर में चर्चा का विषय बना था।

उदयनिधि का सनातन धर्म को लेकर विवादित बयान

उदयनिधि मारने ने 2 सितंबर 2023 को कहा था कि सनातन धर्म मलेरिया और डेंगू की तरह है और इसलिए इसे खत्म किया जाना चाहिए, न कि केवल इसका विरोध किया जाना चाहिए। वह सनातन धर्म को मिटाने के लिए आयोजित एक सम्मेलन में ये बातें कही थी।

इतना ही नहीं उन्होंने भाषण का क्लिप एक्स पर साझा करते हुए कहा था, “सनातन धर्म को खत्म करने के लिए इस सम्मेलन में मुझे बोलने का मौका देने के लिए मैं आयोजकों को धन्यवाद देता हूँ। मैं सम्मेलन को ‘सनातन धर्म का विरोध’ करने के बजाय ‘सनातन धर्म को मिटाओ‘ कहने के लिए आयोजकों को बधाई देता हूँ।”

उदयनिधि स्टालिन ने कहा, “कुछ चीजें हैं जिनका हमें उन्मूलन करना है और हम केवल विरोध नहीं कर सकते। मच्छर, डेंगू बुखार, मलेरिया, कोरोना, ये सभी चीजें हैं जिनका हम विरोध नहीं कर सकते, हमें इन्हें मिटाना है। सनातन ​​भी ऐसा ही है। विरोध करने की जगह सनातन ​​को ख़त्म करना हमारा पहला काम होना चाहिए।”

उन्होंने सवालिया लहजे में पूछा कि “सनातन ​​क्या है? सनातन ​​नाम संस्कृत से आया है। सनातन ​​समानता और सामाजिक न्याय के खिलाफ है। सनातन ​​का अर्थ ‘स्थायित्व’ के अलावा और कुछ नहीं है, जिसे बदला नहीं जा सकता। कोई भी सवाल नहीं उठा सकता। सनातन ​​का यही अर्थ है।”

अब उसी सनातन के शरण में हैं उदयनिधि। इतना ही नहीं कई रैलियों में मुस्लिम उम्मीदवारों के माथे पर विभूति भी देखे गए। वहीं शिवकाशी उम्मीदवार कीर्तना मस्जिदों में जाकर प्रचार किया। ये सब कुछ चुनाव के रंग हैं। द्रविड़ विचार के प्रबल समर्थक उदयनिधि स्टालिन हमेशा से सनातन धर्म और पारंपराओं से दूरी बनाए रखने पर जोर देते रहे हैं।

उन्होंने कई बार कहा है कि धार्मिक अनुष्ठानों में उनका विश्वास नहीं है। वे सनातन धर्म को पानी पी पीकर कोसने वालों में रहे हैं। डेंगू- मलेरिया से सनातन धर्म की तुलना भी कर दी थी। सनातन धर्म को खत्म करने का बीड़ा भी उठा लिया था, लेकिन चुनाव से पहले मंदिर दर्शन-पूजन के लिए पहुँचे उदयनिधि के वीडियो और तस्वीरें अब उन पर ही सवाल कर रही हैं। क्या सत्ता परिवर्तन की आहट ने उन्हें ‘ह्रदय परिवर्तन’ के लिए मजबूर कर दिया या डीएमके की ये सियासत तमिलनाडु के लिए ‘नया अध्याय’ है। इसे बदलते माहौल में छवि बदलने की कोशिश कहा जा सकता है।

गैस की कमी से बंद हुआ रेस्टोरेंट, काम नहीं मिला तो गुजरात में नेपाली युवक ने दी जान: आज तक की रिपोर्ट के आधार पर कॉन्ग्रेस ने किया फर्जी दावा, जानें सच्चाई

गुजरात के राजकोट में हाल ही में हुई एक आत्महत्या की घटना को आधार बनाकर कॉन्ग्रेस ने गुजरात और केंद्र सरकार को निशाना बनाने की कोशिश की है। दो दिन पहले एक नेपाली युवक ने आत्महत्या कर ली थी, जिसके आधार पर ‘आज तक’ ने अधूरी जानकारी के साथ रिपोर्ट प्रकाशित की और उसके आधार पर कॉन्ग्रेस ने यह दिखाने की कोशिश की कि गैस की कमी के कारण रेस्टोरेंट बंद हो गए, जिससे युवक को काम नहीं मिला और तनाव में आकर उसने आत्महत्या कर ली।

हालाँकि जब ऑपइंडिया ने मौके पर जाकर जाँच की और होटल मालिक के साथ-साथ पुलिस से बात की, तो पूरी तरह से अलग सच्चाई सामने आई। शुक्रवार (3 अप्रैल 2026) को किए गए एक ट्वीट में कॉन्ग्रेस ने ‘आज तक’ की एक रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए लिखा, “जगदीश रामदूतप्रसाद जोशी जी गुजरात में रसोइए के तौर पर काम करते थे। गैस की कमी के कारण रेस्टोरेंट बंद हो गया और वे बेरोजगार हो गए। बहुत कोशिश की, लेकिन कोई काम न मिला।”

आगे लिखा, “इस आर्थिक तंगी ने उन्हें तोड़ दिया और आखिरकार परेशान होकर वे ट्रक के आगे कूद गए और अपनी जान दे दी। लेकिन नरेंद्र मोदी को क्या- उनके लिए तो ‘सब चंगा सी’ है। आज तक की जिस रिपोर्ट को कॉन्ग्रेस ने शेयर किया, उसकी हेडलाइन थी, ‘गुजरात: गैस किल्लत के चलते बंद हुए कई रेस्टोरेंट, नहीं मिला काम तो नेपाली शेफ ने दी जान।’

रिपोर्ट में आज तक ने दावा किया कि नेपाल का रहने वाला युवक जगदीश वडोदरा से राजकोट आया था और शहर में करीब पाँच दिन तक अलग-अलग रेस्टोरेंट में काम के लिए कोशिश करता रहा, लेकिन गैस की कमी के कारण कई रेस्टोरेंट बंद थे और कुछ मुश्किल से चल रहे थे। इसी वजह से उसे काम नहीं मिला और मंदी के चलते उसे नौकरी नहीं मिल सकी।

आगे युवक के एक दोस्त के हवाले से लिखा गया कि आर्थिक परेशानी के कारण जगदीश की मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी और सड़क पार करते समय उसने अचानक ट्रक के नीचे कूदकर अपनी जान दे दी।

क्या थी घटना?

यह घटना 1 अप्रैल 2026 को दोपहर के समय राजकोट-मोरबी हाईवे पर हडाला गाँव के पास हुई थी। नेपाली युवक ने ट्रक के नीचे कूदकर आत्महत्या कर ली थी। ट्रक चालक ने वाहन को काबू करने की कोशिश की, लेकिन युवक के अचानक कूदने के कारण ट्रक उसके ऊपर चढ़ गई। इस घटना के CCTV फुटेज भी सामने आए हैं।

घटना के बाद युवक को अस्पताल ले जाया गया, जहाँ इलाज के बाद उसकी मौत हो गई। इसके बाद पुलिस को सूचना दी गई। पुलिस ने शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भेजकर आगे की कार्रवाई शुरू की। अस्पताल में युवक ने यह भी कहा था कि इसमें ट्रक चालक या किसी और की कोई गलती नहीं है और उसने जानबूझकर यह कदम उठाया, ताकि किसी के खिलाफ मामला दर्ज न हो।

होटल मालिक ने क्या बताया?

इस मामले में होटल मालिक से संपर्क किया गया। महबूबभाई नाम के होटल मालिक ने बताया कि युवक उनके पास काम माँगने आया था और उन्होंने उसे काम देने की बात भी कही थी। दरअसल होटल करीब 15 दिन पहले ही शुरू हुआ था और उन्हें कर्मचारियों की जरूरत थी।

होटल मालिक के अनुसार, युवक करीब तीन दिन तक उनके यहाँ रहा, लेकिन वह खुद तय नहीं कर पा रहा था कि इस गाँव के इलाके में काम करे या नहीं। आखिरकार वह मानसिक तनाव में आकर यह कदम उठा बैठा। मालिक का कहना है कि युवक शुरू से ही मानसिक तनाव में लग रहा था और मानसिक रूप से भी ठीक नहीं था।

इसके अलावा उसकी अपनी पत्नी से भी किसी बात को लेकर कहासुनी हुई थी। होटल मालिक ने यह भी साफ किया कि न तो गैस की कोई बड़ी कमी है और न ही उसके कारण रेस्टोरेंट बंद हुए हैं। होटल अभी भी नियमित रूप से चल रहा है। उन्होंने बताया कि थोड़ी बहुत दिक्कत होती है, लेकिन एजेंसियों से गैस की सप्लाई मिलती रहती है और फिलहाल कोई बड़ी समस्या नहीं है।

पुलिस ने क्या कहा?

इस मामले में कुवाडवा पुलिस से संपर्क किया गया, जहाँ पुलिस ने भी होटल मालिक की बातों की पुष्टि की। पुलिस अधिकारी ने बताया कि युवक को होटल में काम देने की बात कही गई थी, लेकिन वह खुद निर्णय नहीं ले पा रहा था और मानसिक रूप से परेशान था।

पुलिस ने यह भी साफ किया कि गैस की कमी या उसके कारण रेस्टोरेंट बंद होने जैसी बात सही नहीं है। फिलहाल पुलिस इस मामले में आगे जाँच कर रही है।

(यह रिपोर्ट मूल रुप से गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

ट्रंप की ‘पाषाण युग’ की चेतावनी के पीछे ‘JASSM-ER’, ईरान के पास बढ़ी ‘सबसे घातक’ मिसाइलों की तैनाती: जानें- इसकी ताकत और US के सामने क्या है चुनौती?

अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा संघर्ष अब एक बेहद निर्णायक और खतरनाक मोड़ पर पहुँच चुका है। यह सैन्य टकराव अब आधुनिक तकनीक, लंबी दूरी के हथियारों और रणनीतिक दबाव का हाई-टेक युद्ध बन चुका है। अमेरिका और ईरान के सैन्य टकराव के बीच तकनीक, रणनीति और संसाधनों की असली परीक्षा भी हो रही है।

इसी कड़ी में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का वह बयान, जिसमें उन्होंने ईरान को ‘पाषाण युग’ में भेजने की बात कही है, इस बात का संकेत है कि अमेरिका अब युद्ध के सबसे आक्रामक चरण में प्रवेश करने की तैयारी कर रहा है। वहीं इन सब के केंद्र में है अमेरिका की अत्याधुनिक JASSM-ER मिसाइल, जिसे युद्ध में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा रहा है।

क्या है JASSM-ER मिसाइल: तकनीक और ताकत का घातक मेल

JASSM-ER (Joint Air-to-Surface Standoff Missile-Extended Range) एक एयर-टू-सरफेस क्रूज मिसाइल है। इसे लड़ाकू विमान या बमवर्षक विमान से लॉन्च किया जाता है और यह जमीन पर मौजूद टारगेट को बेहद सटीक तरीके से नष्ट करती है। इसकी खास बात यह है कि इसे दागने के लिए विमान को दुश्मन के एयरस्पेस में घुसने की जरूरत नहीं होती। यह दूर से लॉन्च होकर अपने लक्ष्य तक खुद रास्ता तय करती है।

इसमें आधुनिक गाइडेंस सिस्टम लगे होते हैं, जैसे GPS और इन्फ्रारेड ट्रैकिंग, जिसकी मदद से यह रास्ते में आने वाली बाधाओं को पार करते हुए सीधे अपने टारगेट तक पहुँचती है। इसे खास तौर पर उन ठिकानों को नष्ट करने के लिए डिजाइन किया गया है जो बेहद सुरक्षित होते हैं, जैसे बंकर, एयरबेस, कमांड सेंटर और हथियार निर्माण इकाइयाँ।

असली ताकत: मारक क्षमता, स्टेल्थ और सटीक हमला

JASSM-ER को खतरनाक बनाने वाली सबसे बड़ी चीज इसकी लंबी मारक क्षमता है। यह करीब 600 मील यानी लगभग 965 किलोमीटर से ज्यादा दूरी तक हमला कर सकती है, जिससे अमेरिकी विमान सुरक्षित दूरी पर रहते हुए भी दुश्मन को निशाना बना सकते हैं। इसके साथ ही इसका स्टेल्थ डिजाइन इसे रडार से बचने में मदद करता है।

यानी दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को अक्सर यह मिसाइल तब तक दिखाई नहीं देती, जब तक बहुत देर न हो जाए। तीसरी अहम बात इसकी सटीकता है। यह मिसाइल अपने टारगेट को बहुत कम त्रुटि के साथ हिट करती है, जिससे कम संख्या में भी बड़े और प्रभावी हमले किए जा सकते हैं।

यही वजह है कि इसे खास तौर पर हाई-वैल्यू और हाई-सिक्योरिटी टारगेट्स के खिलाफ इस्तेमाल किया जाता है।

अमेरिका की रणनीति: ‘स्टैंडऑफ वॉरफेयर’ का खेल

ईरान के खिलाफ अमेरिका ने जो रणनीति अपनाई है, वह सीधे टकराव से अलग है। अमेरिका अपने विमान और पायलटों को खतरे में डालने के बजाय दूरी से लगातार हमले कर रहा है। इसे ‘स्टैंडऑफ वॉरफेयर’ कहा जाता है। इस रणनीति के तहत अमेरिका ने अपने वैश्विक हथियार भंडार को भी फिर से व्यवस्थित किया है।

पैसिफिक क्षेत्र, जहाँ चीन के खिलाफ तैयारी रहती है, वहाँ से भी मिसाइलें हटाकर मिडिल ईस्ट में भेजी गई हैं। ब्रिटेन के एयरबेस तक को इस ऑपरेशन में शामिल किया गया है। B-52 और B-1B जैसे बमवर्षक विमानों से लगातार JASSM-ER मिसाइलें दागी जा रही हैं, ताकि ईरान के एयर डिफेंस सिस्टम को कमजोर किया जा सके और उसके अहम सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया जा सके।

तेजी से घटता भंडार अमेरिका के लिए बन रहा चुनौती

इस युद्ध का सबसे बड़ा असर अमेरिका के हथियार भंडार पर दिख रहा है। युद्ध शुरू होने से पहले उसके पास करीब 2,300 JASSM-ER मिसाइलें थीं, लेकिन कुछ ही हफ्तों में 1,000 से ज्यादा का इस्तेमाल हो चुका है। बाकी बची मिसाइलों में भी कई तकनीकी रूप से खराब हैं और इस्तेमाल के लायक नहीं हैं।

यह अमेरिका के लिए एक बड़ा रणनीतिक जोखिम बन गया है, क्योंकि इतनी तेज खपत के बाद भविष्य में चीन जैसे बड़े प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ उसकी तैयारी कमजोर हो सकती है। मिसाइल बनाने वाली कंपनी लॉकहीड मार्टिन (Lockheed Martin) उत्पादन बढ़ाने की कोशिश कर रही है लेकिन जितनी तेजी से मिसाइलें खर्च हो रही हैं, उतनी तेजी से उनका उत्पादन नहीं हो पा रहा।

ईरान भी अभी भी पूरी तरह कमजोर नहीं

अमेरिका और उसके सहयोगियों का दावा है कि उन्होंने ईरान के एयर डिफेंस सिस्टम को काफी हद तक नष्ट कर दिया है। लेकिन हाल के घटनाक्रम बताते हैं कि स्थिति पूरी तरह एकतरफा नहीं है। ईरान ने अमेरिकी F-15E और A-10 जैसे लड़ाकू विमानों को मार गिराया है, साथ ही कई MQ-9 ड्रोन और रेस्क्यू हेलीकॉप्टर भी निशाना बने हैं।

इससे यह साफ होता है कि ईरान अभी भी जवाब देने की क्षमता रखता है और उसका एयर डिफेंस पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। ईरान लगातार जवाबी कार्रवाई कर रहा है। अब तक वह 1,600 से ज्यादा बैलिस्टिक मिसाइलें और करीब 4,000 ड्रोन दाग चुका है। इन हमलों को रोकने के लिए अमेरिका को भारी मात्रा में इंटरसेप्टर मिसाइलों का इस्तेमाल करना पड़ रहा है।

Patriot और THAAD जैसे डिफेंस सिस्टम लगातार सक्रिय हैं, लेकिन इनकी भी सीमाएँ हैं। अगर यह युद्ध लंबा चलता है, तो अमेरिका के लिए सिर्फ हमला करना ही नहीं, बल्कि अपने डिफेंस सिस्टम को बनाए रखना भी एक बड़ी चुनौती बन सकता है।

ट्रंप ने दी थी ‘स्टोन एज’ में भेजने की चेतावनी

गौरतलब है कि ट्रम्प ने अपने एक हालिया भाषण में कहा था, “अगले दो से तीन हफ्तों में, हम उन्हें वापस ‘स्टोन एज’ (पाषाण युग) में ले जाएँगे जहाँ वे होने चाहिए।” हालाँकि उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि इसका मतलब ईरान के नागरिकों, सेना या सरकार के लिए क्या है। 

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयान के बाद यह माना जा रहा है कि अमेरिका अब ईरान के सबसे अहम आर्थिक और रणनीतिक ठिकानों को निशाना बना सकता है। खासतौर पर तेल टर्मिनल, ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर और सैन्य उत्पादन केंद्र अमेरिका के संभावित टारगेट हो सकते हैं। खर्ग द्वीप जैसे स्थान, जो ईरान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, खास फोकस में हो सकते हैं।

इसके अलावा अमेरिकी नौसेना, मरीन और पैराट्रूपर्स की बढ़ती तैनाती यह संकेत देती है कि जरूरत पड़ने पर जमीनी ऑपरेशन भी शुरू किया जा सकता है। JASSM-ER मिसाइलें अमेरिका को इस युद्ध में बड़ी तकनीकी बढ़त देती हैं। अब आने वाले हफ्ते ही तय करेंगे कि ट्रंप की ‘पाषाण युग’ वाली चेतावनी असल में किस दिशा में जाती है।

हिंदुओं को बाँटने के लिए गढ़े मुर्दे उखाड़ रहा ‘द गार्जियन’, BAPS मंदिर पर लगे दलित श्रमिकों के शोषण के फर्जी दावों को कुरेदा: जानें कैसे US कोर्ट ने झूठ का किया था पर्दाफाश

ब्रिटेन के अखबार ‘द गार्जियन’ ने एक रिपोर्ट छापी, जिसमें न्यू जर्सी में बने BAPS स्वामीनारायण अक्षरधाम मंदिर के निर्माण को लेकर पुराने आरोपों को दोबारा उठाया गया। इस रिपोर्ट के सामने आते ही फिर से बहस शुरू हो गई है, जबकि अमेरिका की अदालत ने इस पूरे मामले की सितंबर 2025 में ही गहराई से जाँच कर ली थी और उसमें किसी भी तरह की गड़बड़ी नहीं पाई गई थी।

द गार्जियन ने अपनी रिपोर्ट मे दावा किया कि मंदिर के निर्माण के दौरान मजदूरों के साथ गलत व्यवहार हुआ और चिकित्सा पहुँचाने में लापरवाही भी बरती गई। लेकिन सच यह है कि ये वही आरोप हैं, जिनकी जाँच अमेरिकी एजेंसियाँ पहले ही कर चुकी हैं और उन्हें खारिज भी कर चुकी हैं।

‘द गार्जियन’ की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट

दुनिया भर के स्वयंसेवकों ने बनाया एक भव्य मंदिर

न्यू जर्सी के रॉबिन्सविल में बना BAPS स्वामीनारायण अक्षरधाम मंदिर दुनिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर माना जाता है। साल 2023 में बना यह भव्य मंदिर सिर्फ पूजा-अर्चना की जगह नहीं है, बल्कि दुनियाभर के हिंदू श्रद्धालुओं की आस्था और गर्व का प्रतीक भी है।

इस मंदिर की सबसे खास बात है कि इसके निर्माण में लोगों की बड़े स्तर पर भागीदारी। करीब 12 साल में उत्तर अमेरिका और दूसरे देशों से आए 12,500 से ज्यादा स्वयंसेवकों ने मिलकर इसे बनाया। दिलचस्प बात यह है कि इनमें से कई लोगों का निर्माण कार्य से कोई प्रोफेशनल अनुभव भी नहीं था। लेकिन मंदिर प्रशासन हमेशा से यह कहता आया है कि यह काम उन्होंने ‘सेवा’ यानी श्रद्धा और भक्ति के भाव से किया।

मंदिर की खूबसूरत नक्काशी, हाथ से तराशे गए पत्थर और इसका विशार परिसर इसे खास बनाते हैं। खुलने के बाद से ही यह जगह न सिर्फ धार्मिक बल्कि पर्यटन के लिहाज से भी लोगों के लिए बड़ा आकर्षण बन गई है।

द गार्जियन के दोबारा मढ़े गए आरोप

अपनी रिपोर्ट में द गार्जियन ने दावा किया कि इस भव्य मंदिर की चमक-दमक के पीछे एक ‘अँधेरी कहानी’ भी छिपी हुई है, जिसमें मजदूरों के शोषण जैसे आरोप शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2015 से 2023 के बीच मंदिर निर्माण के दौरान मजदूरों को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा, जैसे कि उनके साथ ‘गलत व्यवहार, वीजा से जुड़े गड़बड़झाले और इलाज में लापरवाही।’

रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि कुछ मजदूरों का मानना है कि कम से कम दो मजदूर रमेश मीणा और देवी लाल की मौत सिलिकोसिस नाम की फेफडो़ं की बीमारी से हुई। यह बीमारी पत्थर की नक्काशी के दौरान उठने वाली बारीक धूल को साँस के जरिए भीतर लेने से होती है। इसके अलावा रिपोर्ट में यह भी जिक्र है कि कई मजदूर टीबी और क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस जैसी साँस से जुड़ी बीमारियों से जूझ रहे थे।

कुछ गुमनाम मजदूरों के हवाले से रिपोर्ट में काम करने की कठिन परिस्थितियों का भी जिक्र किया गया है। दावा किया गया है कि उनसे हफ्ते में 90 घंटे तक काम करवाया जाता था और उन्हें करीब 1.20 डॉलर प्रति घंटे यानी लगभग ₹112 के हिसाब से बेहद कम मजदूरी दी जाती थी। इतनी ही नहीं, यह भी कहा गया कि मजदूरों के पासपोर्ट अपने पास रख लिए जाते थे और उन्हें अपने परिवार से संपर्क करने की भी ज्यादा आजादी नहीं दी जाती थी।

रिपोर्ट में सुरक्षा इंतजामों को लेकर भी कई आरोप लगाए गए हैं, जिनमें कहा गया है कि मजदूरों को सही सेफ्टी इक्विपमेंट नहीं दिए गए। इसमें यह दावा भी किया गया कि धूल भरे माहौल में काम करते समय कुछ मजदूर N95 मास्क की जगह सिर्फ कपड़े या साधारण सर्जिकल मास्क का इस्तेमाल कर रहे थे। इसके अलावा रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि मेडिकल सुविधाएँ ठीक नहीं थीं और मजदूरों को बाहर जाकर इलाज कराने से हतोत्साहित किया जाता था।

आर्टिकल में एक और बड़ा दावा यह किया गया कि करीब 200 दलित मजदूरों को राजस्थान से न्यू जर्सी मंदिर निर्माण के लिए लाया गया था, जो भारत की सामाजिक व्यवस्था में सबसे निचले पायदान पर माने जाते हैं। दलित समुदाय ऐतिहासिक रूप से सामाजिक और आर्थिक तौर पर काफी हाशिए पर रहा है और अक्सर उन्हें सबसे जोखिम भरे और कम वेतन वाले काम करने पड़ते हैं। रिपोर्ट में आगे यह भी आरोप लगाया गया कि इन दलित मजदूरों को उनकी नीची जाति की वजह से मंदिर में पूजा करने की अनुमति भी नहीं नहीं दी जाती।

हालाँकि, मंदिर प्रबंधन ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उनका कहना है कि उन्होंने हर काम कानून और धार्मिक परंपराओं के मुताबिक ही किया है। साथ ही उन्होंने अमेरिका के एक कानूनी प्रावधान ‘मिनिस्ट्रियल एक्सेप्शन’ का भी हवाला दिया, जिसके तहत धार्मिक संस्थाओं को अपने धार्मिक कामकाज और भूमिकाओं में बाहरी दखल से सुरक्षा मिलती है।

BAPS संस्था ने शुरू से ही इन आरोपों को गलत बताया है। उनका कहना है कि जो लोग मंदिर के निर्माण में लगे थे, वे मजदूर नहीं बल्कि स्वयंसेवक थे, जो ‘सेवा’ यानी धार्मिक भावना से काम कर रहे थे। संस्था के नेताओं का कहना है कि कारीगरों ने यह काम अपनी आस्था और परंपरा से प्रेरित होकर किया, न कि किसी दबाव या मजबूरी में। उन्होंने यह भी बताया कि केस में शामिल कुछ लोगों ने बाद में खुद ही मुकदमा छोड़ दिया था और कहा था कि उन्हें इसमें शामिल होने के लिए गुमराह किया गया था।

इन सब सफाईयों के बावजूद द गार्जियन की इस नई रिपोर्ट ने एक बार फिर उन्हीं पुराने आरोपों को हवा दे दी है, जो पहले ही लंबे समय तक कानूनी और मीडिया बहस का हिस्सा रह चुके हैं।

अमेरिकी एजेंसियाँ पहले ही बंद कर चुकी हैं मामला

यह नया विवाद ऐसे समय में सामने आया है, जब अमेरिकी एजेंसियाँ इस पूरे मामले की पहली ही विस्तार से जाँच कर चुकी हैं और केस को बंद भी कर चुकी हैं। पिछले साल 18 सितंबर 2025 को अमेरिका के जस्टिस डिपार्टमेंट (DOJ) और न्यू जर्सी के US अटॉर्नी ऑफिस में ने मंदिर निर्माण से जुड़ी जाँच को आधिकारिक तौर पर खत्म कर दिया था।

DOJ ने इस मामले की जाँच कई पूर्व मजदूरों के आरोपों के आधार पर की थी। उनका कहना था कि उन्हें भारत से धार्मिक वीजा पर लाया गया, उनसे मंदिर निर्माण में लंबे समय तक काम कराया गया और उन्हें सिर्फ करीब ₹112 प्रति घंटे की बेहद कम मजदूरी दी गई।

इस सिविल केस में शामिल कई लोग भारत के दलित समुदाय से थे, जिन्हें सामाजिक रूप से पिछड़ा माना जाता है। इन लोगों ने मई 2021 में शिकायत दर्ज कराई थी, उसी दिन जब फेडरल एजेंसियों ने रॉबिन्सविल स्थित मंदिर परिसर पर छापा मारा था।

उस समय जारी बयानों के मुताबिक, यह जाँच करीब 4 साल तक चली और आखिर में बिना किसी आरोप तय किए ही इसे बंद कर दिया गया। इसे मंदिर बनाने वाली संस्थान, बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था (BAPS) के लिए एक बड़ी राहत के तौर पर देखा गया।

इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए अबु धाबी में BAPS हिंदू मंदिर के प्रमुख स्वामी ब्रह्माविहारिदास ने इन आरोपों को सख्ती से खारिज किया और केस बंद होने का स्वागत किया था। उन्होंने कहा, ” सत्यमेव जयते! हम प्यार, आस्था, भक्ति और सेवा की भावना से मंदिर बनाते हैं… कुछ लोग अपने छोटे-छोटे स्वार्थ के लिए मंदिर निर्माण और कारीगरी को लेकर झूठे आरोप लगाते हैं।”

उन्होंने आगे कहा, “अमेरिकी सरकार ने 4 साल तक मंदिर की जाँच की और आखिर में इसे बंद कर दिया, यह कहते हुए कि कोई आरोप साबित नहीं हुआ और न ही कोई आरोप सही पाया गया। इससे न्याय व्यवस्था पर भरोसा और मजबूत होता है।”

अपने आधिकारिक बयान में BAPS ने यह भी कहा कि अमेरिकी सरकार का यह फैसला उनके लंबे समय से रखे गए रुख का ‘साफ और मजबूत संदेश’ देता है। संस्था ने मंदिर को ‘शांति, सेवा और भक्ति का स्थान’ बताया, जिसे हजारों स्वयंसेवकों की मेहनत और समर्पण से बनाया गया है। संस्था ने अपनी आध्यात्मिक सोच पर जोर देते हुए कहा कि मुश्किल हालात में भी वह ‘आस्था, सहयोग, विनम्रता और सच्चाई के प्रति प्रतिबद्धता’ बनाए रखती है।

विदेशी मीडिया में आरोपों का सिलसिला, हिंदुओं को बाँटने की कोशिश?

यह पहली बार नहीं है जब विदेशी मीडिया ने इस मंदिर को लेकर सवाल उठाए हैं। इससे पहले भी ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ जैसे बडे़ विदेशी अखबारों में ऐसी खबरें छप चुकी हैं, जिनमें जबरन मजदूरी, जातिगत भेदभाव और खराब कामकाजी हालात जैसे आरोप लगाए गए थे।

साल 2023 में छपी एक रिपोर्ट में ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स‘ ने दावा किया था कि साल 2021 में कुछ मजदूरों की शिकायतों के बाद फेडरल एजेंसियों ने मंदिर निर्माण स्थल पर छापा मारा था। हालाँकि, बाद में कई लोगों ने यह भी बताया कि छापे और लंबी जाँच के बावजूद इस मामले में कोई आरोप साबित नहीं हुआ और न ही किसी के खिलाफ केस दर्ज किया गया।

इन रिपोर्ट्स के समय को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। द न्यूयॉर्क टाइम्स का एक आर्टिकल अक्टूबर 2023 में मंदिर के भव्य उद्घाटन के कुछ ही दिनों बाद आया था। उस समय दुनियाभर में हिंदू समुदाय इस मंदिर के बनकर तैयार होने की खुशी मना रहा था।

मई 2021 में अमेरिका में काम कर रहे कुछ भारतीय कारीगरों ने एक मुकदमा दायर किया था, जिसमें उन्होंने मानव तस्करी और जबरन मजदूरी के आरोप लगाए थे। उनका दावा था कि उन्हें न्यू जर्सी के रॉबिन्सविल में बन रहे स्वामीनारायण मंदिर के निर्माण में बंद रखकर काम कराया गया और उन्हें सिर्फ 1 डॉलर प्रति घंटे तक की बेहद कम मजदूरी दी गई। BAPS पर यह भी आरोप लगा था कि उसने भारत से मजदूरों को लालच देकर अमेरिका बुलाया और उनसे न्यू जर्सी के अलावा अटलांटा, शिकागो, ह्यूस्टन और लॉस एंजेलिस जैसे शहरों में मंदिर निर्माण के काम करवाए, जहाँ उन्हें सिर्फ 450 डॉलर महीने दिए जाते थे।

उस समय BAPS ने इन सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा था कि ‘सेवा’ के जरिए पूजा करना उनके धर्म में भक्ति का अहम हिस्सा है और दुनियाभर से स्वयंसेवक इसमें योगदान देते हैं। संस्था ने यह भी कहा था कि मंदिर निर्माण में शामिल ये स्वयंसेवक वहाँ आने वाले लोगों से लगातार मिलते-जुलते रहते हैं और अपने परिवार वालों से भई नियमित संपर्क में रहते हैं।

यह भी याद रखने वाली बात है कि न्यू जर्सी के इस BAPS मंदिर को द न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे वामपंथी झुकाव वाले अखबार ने भी निशाना बनाया था। अक्टूबर 2023 में छपे एक लेख में NYT ने दावा किया था, “फेडरल एजेंसियों ने 2021 में मंदिर निर्माण स्थल पर छापा मारा था, जब कुछ मजदूरों ने आरोप लगाया कि मंदिर बनाने वाली एक प्रमुख हिंदू संस्था, जिसका भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी से संबंध बताया गया, मजदूरों से जबरन काम करा रही है, कम वेतन दे रही है और काम की स्थितियाँ खराब हैं।”

आर्टिकल में आगे यह भी कहा गया था, “उनके वकीलों का कहना है कि दलित समुदाय से आने वाले मजदूरों को खास तौर पर निशाना बनाया गया। इस मामले में फेडरल स्तर पर आपराधिक जाँच चल रही है और वेतन को लेकर भी एक मुकदमा जारी है।”

हालाँकि, यह सब उस समय कहा जा रहा था, जब साल 2021 में अक्षरधाम महामंदिर के निर्माण स्थल पर पड़े छापे को दो साल बीत चुके थे और तब तक कोई भी आरोप साबित नहीं हो पाया था। जुलाई 2023 में, न्यू जर्सी के BAPS मंदिर के खिलाफ दायर केस में शामिल एक दर्जन से ज्यादा कारीगरों ने अपने नाम वापस ले लिए थे। उस समय राजस्थान हाई कोर्ट के वकील आदित्य एसबी सोनी ने भारतीय मजदूर संघ और पत्थर गढ़ाई संघ की ओर से एक प्रेस रिलीज जारी कर कहा था कि कारीगरों पर दबाव बनाया गया था कि वे इस गहरी साजिश का हिस्सा बनें, जिसका मकसद इस भव्य हिंदू मंदिर के निर्माण को रोकना था।

छवि और नैरेटिव को लेकर बड़ी बहस

बार-बार सामने आ रहे इन आरोपों और उनकी कवरेज ने एक बड़ी बहस छेड़ दी है कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया में हिंदू संस्थाओं को किस तरह दिखाया जाता है। ऐसे कई रिपोर्ट्स पर यह सवाल उठता है कि वे सिर्फ विवादों पर ही ध्यान देती हैं और गलत या अधूरी जानकारी फैलाती हैं, जबकि अक्षरधाम जैसे प्रोजेक्ट्स में लाखों लोगों की सेवा भावना और उसकी सांस्कृतिक अहमियत को नजरअंदाज कर दिया जाता है।

द गार्जियन की ताजा रिपोर्ट ने एक बार फिर न्यू जर्सी के BAPS स्वामीनारायण अक्षरधाम मंदिर को सुर्खियों में ला दिया है। हालाँकि, इसमें जिन आरोपों का जिक्र किया गया है, वे नए नहीं हैं। इनकी पहले ही अमेरिकी एजेंसियों द्वारा कई सालों तक जाँच की जा चुकी है, जो आखिर में बिना किसी आरोप तय हुए खत्म हो गई थी।

जैसे-जैसे यह बहस आगे बढ़ रही है, यह मामला कुछ अहम सवाल भी खड़े करता है। खासतौर पर इस बात को लेकर कि जब किसी मुद्दे पर आधिकारिक जाँच हो चुकी हो, तब उसे किस तरह से दोबारा पेश किया जाता है और रिपोर्ट किया जाता है। कई लोगों के लिए यह मंदिर आज भी आस्था, एकता और सामूहिक मेहनत का प्रतीक है। वहीं कुछ लोगों के लिए यह अब भी सवालों और चर्चा का विषय बना हुआ है।

(मूलरूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

‘फैक्ट चेकर’ AltNews ने प्रकाशित की भ्रामक रिपोर्ट: किया दावा- वोटर लिस्ट से जुड़े EC पोर्टल के फीचर पश्चिम बंगाल में अलग, पूरे देश में अलग; जानें क्या है हकीकत

ऑल्टन्यूज ने शुक्रवार (3 April 2026) को एक लेख प्रकाशित किया जिसका टाइटल था ‘Bengal SIR: The wall ECI built around electoral data and how we broke through it’। इसमें उसने दावा किया कि चुनाव आयोग ऑफ इंडिया (ईसीआई) ने जानबूझकर पश्चिम बंगाल की वोटर लिस्ट को लोगों की पहुँच से दूर कर दिया है।

लेख खासतौर पर 2025-26 के लिए पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) के ड्राफ्ट वोटर लिस्ट पर केंद्रित है। इसमें आरोप लगाया गया है कि सिर्फ पश्चिम बंगाल के लिए जानबूझकर बाधाएँ डाली गई हैं, जैसे हर बार सिर्फ 10 पोलिंग बूथ की लिस्ट डाउनलोड करने की सीमा, हर डाउनलोड पर कैप्चा लगाना, और लिस्ट को सिर्फ ‘स्कैन किए गए पीडीएफ इमेज’ के रूप में देना जो सर्च नहीं की जा सकती और ठीक से विश्लेषण भी नहीं किया जा सकता।

ऑल्टन्यूज का कहना है कि ये उपाय पब्लिक डेटा के चारों ओर ‘बाधा’ और ‘दीवार’ खड़ी करते हैं। उसने दावा किया कि यह फॉर्मेट ‘कोई टेक्नोलॉजी की कमी नहीं’ है और आधार या यूपीआई जैसे सिस्टम से तुलना करते हुए कहा कि टेक्स्ट फाइल देना ‘बहुत आसान’ होता। ऑल्टन्यूज ने ये संकेत दिए कि ये बाधाएँ सिर्फ पश्चिम बंगाल के लिए हैं, जिससे ये धारणा बनती है कि ऐसी व्यवस्था दूसरे राज्यों की वोटर लिस्ट पर लागू नहीं है।

लेख में कहा गया कि कोलकाता के दो विधानसभा क्षेत्रों की एसआईआर फाइनल रोल 2026 पर काम करते समय उन्हें ये दिक्कतें आईं। संगठन ने दावा किया कि उसने कोलकाता के दो क्षेत्रों (भवानीपुर और बालीगंज) को डिजिटाइज कर लिया और इसके लिए लगभग ₹11,800 खर्च किए।

ऑल्टन्यूज के ये सारे दावे पूरी तरह गलत और भ्रामक हैं। जिन एक्सेस रिस्ट्रिक्शन्स और फाइल फॉर्मेट को उसने ‘पश्चिम बंगाल के लिए बाधाएँ’ बताया है, वे दरअसल पूरे देश में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों पर एक समान लागू होने वाली स्टैंडर्ड ईसीआई पॉलिसी हैं, न कि सिर्फ बंगाल के लिए बनी कोई खास योजना।

चुनाव आयोग लंबे समय से इमेज बेस्ड नॉन-एडिटेबल पीडीएफ और हर डाउनलोड पर कैप्चा की व्यवस्था को अनिवार्य करता आया है ताकि वोटर लिस्ट की अखंडता बनी रहे। वोटर लिस्ट सेंट्रल ईआरओनेट सिस्टम से डिजिटली तैयार की जाती हैं और सुरक्षित, नॉन-मैनिपुलेटेबल फॉर्मेट में एक्सपोर्ट की जाती हैं। ऑल्टन्यूज जो कमियाँ बता रहे हैं, वे दरअसल जानबूझकर की गई डिजाइन हैं और उनके पीछे वैध कारण हैं।

नीचे प्वॉइंट-बाय-प्वॉइंट समझें पूरी बात

10 एरिया की लिमिट और कैप्चा की जरूरत पूरे देश में डिफॉल्ट व्यवस्था

ईसीआई का वोटर्स सर्विस पोर्टल और सभी चीफ इलेक्टोरल ऑफिसर्स (सीईओ) की वेबसाइट एक समान टेक्निकल सुरक्षा के साथ चलती हैं। यूजर्स वोटर लिस्ट, जिसमें एसआईआर ड्राफ्ट भी शामिल है, सिर्फ सीमित बैच में डाउनलोड कर सकते हैं, आमतौर पर हर बार 10 पोलिंग स्टेशन की। इसके अलावा हर कोशिश पर कैप्चा चैलेंज दिया जाता है जिसमें अक्षर, अंक और स्पेशल कैरेक्टर होते हैं। यह ईसीआई के सभी सीईओ को दिए गए निर्देशों में स्पष्ट रूप से जरूरी बताया गया है।

इसे आसानी से वेरिफाई किया जा सकता है- वोटर्स सर्विस पोर्टल पर जाकर किसी भी राज्य को चुनकर डाउनलोड इलेक्टर रोल ऑप्शन देख लें। ये कंट्रोल हर राज्य/केंद्र शासित प्रदेश पर हैं, सिर्फ पश्चिम बंगाल पर नहीं जैसा ऑल्टन्यूज दावा कर रहा है। इसके अलावा ये कोई नई सुविधा नहीं है, बल्कि ईसीआई पोर्टल पर लंबे समय से चली आ रही है। उदाहरण के लिए, August 2025 में लाइवमिंट का एक लेख बिहार में एसआईआर के बाद वोटर लिस्ट चेक करने का तरीका बताते हुए स्टेप 4 में लिखता है: “अपना जिला, विधानसभा क्षेत्र चुनें, भाषा चुनें, ‘रोल टाइप [एसआईआर ड्राफ्ट रोल] और ‘पार्ट नंबर और पार्ट नाम’; अंत में कैप्चा डालें और आगे बढ़ें।”

ये उपाय इसलिए लागू किए गए हैं ताकि ऑटोमेटेड बल्क स्क्रैपिंग से ईसीआई सर्वर ओवरलोड न हों, डिस्ट्रीब्यूटेड डिनायल ऑफ सर्विस जैसी अटैक न हो सकें, या व्यक्तिगत डेटा की अनधिकृत बड़े पैमाने पर हार्वेस्टिंग न हो। ऑल्टन्यूज ने इन रिस्ट्रिक्शन्स को सिर्फ बंगाल के खिलाफ इरादे का सबूत बताकर गलत तरीके से पेश किया है।

पूरे भारत में वोटर लिस्ट ‘इमेज पीडीएफ’ के रूप में, SC ने भी किया समर्थन

ऑल्टन्यूज का दावा है कि वोटर लिस्ट नॉन-टेक्स्ट इमेज फाइल में दी जाती हैं जो एक और बाधा है और टेक्स्ट फाइल जैसे सीएसवी देना आसान होना चाहिए। जबकि यह सच है कि आयोग अपने डेटा से आसानी से टेक्स्ट वोटर डेटा एक्सपोर्ट कर सकता है, लेकिन उसने जानबूझकर ऐसा नहीं किया।

अगर ऑल्टन्यूज ने लेख प्रकाशित करने से पहले रिसर्च की होती तो उन्हें पता होता कि ईसीआई के निर्देश साफ कहते हैं कि “चुनावी रोल की सिर्फ इमेज पीडीएफ (नॉन-एडिटेबल) ही सीईओ की वेबसाइट पर होस्ट की जाएगी जिसमें सिर्फ डिटेल्स होंगे और इलेक्टर्स की फोटो नहीं होगी” और “ऐसी इमेज पीडीएफ देखने का एक्सेस सख्ती से कैप्चा के जरिए ही दिया जाएगा।”

ईसीआई की साफ नीति है कि मशीन-रीडेबल वोटर लिस्ट पब्लिक डाउनलोड के लिए नहीं दी जाएँगी और यह ‘बाधा’ जानबूझकर डिजाइन की गई है। मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टियों को दी जाने वाली सॉफ्ट कॉपी भी उसी इमेज-पीडीएफ नियम का पालन करती है।

ईसीआई ने बार-बार समझाया है कि टेक्स्ट बेस्ड या मशीन-रीडेबल फॉर्मेट जैसे सर्चेबल पीडीएफ या सीएसवी पब्लिक डाउनलोड के लिए क्यों नहीं दिए जाते। टेक्स्ट फाइल आसानी से एडिट की जा सकती है, जिससे दुर्भावनापूर्ण लोग एंट्री डाल, हटा या बदल सकते हैं और फिर ‘मैनिपुलेशन का सबूत’ फैला सकते हैं, जिससे वोटर लिस्ट पर जनता का भरोसा कम हो जाएगा।

पीडीएफ विद टेक्स्ट को एडोबी एक्रोबेट जैसी सॉफ्टवेयर से आसानी से एडिट किया जा सकता है, जिससे विवाद खड़े करने के लिए मैलिशियस चेंज संभव हैं। वहीं इमेज-पीडीएफ को सिर्फ ग्राफिक्स सॉफ्टवेयर जैसे एडोबी फोटोशॉप से एडिट किया जा सकता है और उसमें भी फॉन्ट, कलर, टेक्स्चर मैच करना बहुत मुश्किल होता है, जिससे कोई मैनिपुलेशन बहुत कठिन हो जाता है।

साल 2018 में कॉन्ग्रेस नेता कमल नाथ ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी कि ईसीआई वोटर लिस्ट को एमएस-वर्ड जैसी टेक्स्ट फॉर्मेट में प्रकाशित करे। पूर्व मध्य प्रदेश सीएम और अन्य कॉन्ग्रेस नेताओं ने ईसीआई से भी यह माँग की थी और दावा किया था कि टेक्स्ट बेस्ड वोटर लिस्ट से डुप्लिकेट, रिपीट, मल्टीपल, अवैध, इनवैलिड और फर्जी एंट्री आसानी से पहचानी जा सकेगी।

हालाँकि ईसीआई ने इस माँग को खारिज कर दिया और कहा कि सुरक्षा और प्राइवेसी की चिंताओं को देखते हुए उसके निर्देश सिर्फ इमेज-ओनली फाइल प्रकाशित करने के हैं। चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि अगर वोटर लिस्ट टेक्स्ट फॉर्म में दी गई तो बड़े पैमाने पर डेटा माइनिंग संभव हो जाएगी, जिससे डेटाबेस की अखंडता को खतरा पैदा हो सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में ईसीआई के अधिकार को बरकरार रखा और सर्चेबल वर्जन की माँग खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि ईसीआई को पारदर्शिता और दुरुपयोग रोकने के बीच संतुलन बनाना चाहिए। कोर्ट ने माना कि ईसीआई ने टेक्स्ट फाइल न देने के लिए वैध कारण दिए हैं।

पिछले साल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने दोहराया था कि वोटर लिस्ट को मशीन-रीडेबल फॉर्मेट में नहीं प्रकाशित किया जा सकता क्योंकि इसे एडिट किया जा सकता है और इसका दुरुपयोग हो सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि चुनाव आयोग को टेक्स्ट फाइल देना जरूरी नहीं है और याचिकाकर्ता से कहा कि अगर वे चाहें तो इमेज-पीडीएफ को अपने प्रयास से टेक्स्ट डेटा में बदल सकते हैं।

इसलिए ऑल्टन्यूज का दावा कि उसने कोलकाता की वोटर लिस्ट को पैसे खर्च करके कन्वर्ट किया, वह दरअसल सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक ही है।

पीडीएफ ‘स्कैन किए गए’ फोटो नहीं हैं, वे डिजिटली जनरेटेड हैं

ऑल्टन्यूज ने लेख में बार-बार दावा किया कि वोटर लिस्ट फाइलें ‘स्कैन की गई पीडीएफ इमेज हैं- यानी प्रिंटेड पेजों की फोटो’, लेकिन यह गलत है। रोल ईसीआई के ईआरओनेट एप्लिकेशन से सेंट्रली तैयार किए जाते हैं। ईआरओनेट राष्ट्रीय स्तर का स्टैंडर्डाइज्ड सिस्टम है जो सभी फॉर्म प्रोसेस करता है, इलेक्टर डेटा मैनेज करता है, यूनिक ईपीआईसी नंबर जनरेट करता है और अंतिम वोटर रोल तैयार करता है।

पीडीएफ इस डेटाबेस से प्रोग्रामेटिकली बनाए जाते हैं, आमतौर पर आईटेक्स्ट कोर जैसी लाइब्रेरी का इस्तेमाल करके, और सीधे रास्टराइज्ड इमेज-बेस्ड फॉर्मेट में एक्सपोर्ट किए जाते हैं। इसे आसानी से वेरिफाई किया जा सकता है, जिसमें पीडीएफ फाइल को एडोबी रीडर में खोलकर डॉक्यूमेंट प्रॉपर्टीज के डिस्क्रिप्शन टैब में देख लें। इससे सुनिश्चित होता है कि फाइल नॉन-एडिटेबल और टैंपर-प्रूफ हैं बिना किसी फिजिकल प्रिंटिंग और स्कैनिंग के।

उदाहरण के लिए, ऑल्टन्यूज के लेख में बताए गए भवनिपुर विधानसभा क्षेत्र के एक बूथ की वोटर लिस्ट पीडीएफ की प्रॉपर्टीज स्क्रीन नीचे दी गई है। इसमें साफ लिखा है कि फाइल आईटेक्स्ट कोर 8.0.1 द्वारा बनाई गई है, यानी यह पीडीएफ डेटाबेस से सीधे बनाई गई है, स्कैन नहीं की गई, भले ही इसमें सिर्फ इमेज ही हों।

ऑल्टन्यूज ने जो बड़े फाइल साइज बताए, लगभग प्लेन-टेक्स्ट के मुकाबले 228 गुना बड़े, वे इसी जानबूझकर की गई डिजाइन का नतीजा हैं, हर पेज को इमेज लेयर के रूप में रेंडर किया गया है ताकि टेक्स्ट एक्सट्रैक्शन या एडिटिंग रोकी जा सके।

वॉटरमार्क छिपाते हैं नाम

ऑल्टन्यूज ने कहा कि बड़ी संख्या में वोटर एंट्री पर डायगोनल ‘अंडर डेज्यूडिकेशन’ वॉटरमार्क लगा है, जो ओसीआर सॉफ्टवेयर से ऑटोमेटेड डेटा एक्सट्रैक्शन में बाधा डालता है और कभी-कभी मैनुअल पढ़ने में भी मुश्किल होती है।

ध्यान दें कि ‘अंडर एडजुडिकेशन’ और ‘डिलीटेड’ जैसे वॉटरमार्क सिस्टम-जनरेटेड ओवरले हैं जो प्रोसेस के दौरान जरूरत पड़ने पर लगाए जाते हैं, ये कोई फिजिकल इंक स्टैंप नहीं हैं। ये ईआरओनेट आउटपुट की स्टैंडर्ड फीचर हैं, जो हर राज्य के सीईओ द्वारा प्रकाशित रोल में दिखती हैं।

पश्चिम बंगाल में नाम छुपाने के लिए स्टैंप लगाने का दावा गलत और भ्रामक है। ऐसे स्टैंप सभी राज्यों की वोटर लिस्ट में दिखते हैं। जबकि ‘अंडर एडजुडिकेशन’ स्टैंप एसआईआर के लिए स्पेसिफिक है, ‘डिलीटेड’ जैसे अन्य स्टैंप सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की सभी वोटर लिस्ट में आते हैं, ये किसी नाम को छुपाने के लिए नहीं लगाए गए।

तीसरे पक्ष और सॉफ्टवेयर को कुछ नाम स्टैंप की वजह से नजर नहीं आ सकते, लेकिन संबंधित वोटर, परिवार और पड़ोसी आसानी से नाम पढ़ सकते हैं। इसके अलावा लिस्ट में वोटर आईडी नंबर भी होता है जिससे आगे वैलिडेशन किया जा सकता है।

इसलिए ‘स्टैंप से नाम छुपाना’ सिर्फ तीसरे पक्ष और उन टूल्स को प्रभावित करता है जो वोटर लिस्ट से बड़े पैमाने पर डेटा एनालिसिस या डेटा हार्वेस्टिंग करने की कोशिश करते हैं, जो प्रकाशित लिस्ट का मकसद नहीं है। वोटर लिस्ट के असल इंटेंडेड यूजर्स यानी वोटर खुद इन स्टैंप से प्रभावित नहीं होते।

वोटर लिस्ट वोटरों के लिए हैं, तीसरे पक्ष के ऑटोमेशन के लिए फ्री रॉ डेटा नहीं

ईसीआई की आधिकारिक स्थिति, जो कई रोल-रिवीजन चक्रों में दोहराई गई है, यह है कि वोटर लिस्ट पब्लिक रिकॉर्ड हैं जिनका मकसद व्यक्तिगत नागरिकों को अपनी एंट्री वेरिफाई करने देना है, न कि थर्ड पार्टी को बड़े पैमाने पर ऑटोमेटेड एनालिसिस करने के लिए बल्क डेटासेट देना। मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टियों को पहले से ही स्क्रूटनी के लिए फ्री सॉफ्ट कॉपी मिलती है और बूथ-लेवल पार्टी वर्कर्स को सिर्फ अपने अधिकार क्षेत्र के एक या कुछ बूथ की लिस्ट के साथ काम करना चाहिए।

वोटर लिस्ट रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट, 1950 के तहत रखी जाती हैं, मुख्य रूप से नागरिकों को अपना चुनावी स्टेटस वेरिफाई करने और मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टियों को नियंत्रित शर्तों के तहत रोल की जाँच करने के लिए। ईसीआई ने कोर्ट और मीडिया दोनों में स्पष्ट रूप से कहा है कि अनरेस्ट्रिक्टेड मशीन-रीडेबल फॉर्मेट बड़े पैमाने पर डेटा माइनिंग और दुरुपयोग को बढ़ावा देंगे, इसलिए इमेज-बेस्ड पीडीएफ और एक्सेस कंट्रोल ही मानक बने हुए हैं। कमल नाथ मामले में ईसीआई ने जैसा समझाया, ऐसे रिस्ट्रिक्शन्स वोटर डेटा के बल्क एक्सप्लॉइटेशन को रोकते हुए वैध उद्देश्यों के लिए पारदर्शिता बनाए रखते हैं।

पोर्टल को एनजीओ, पॉलिटिकल कंसल्टेंसी फर्म या मीडिया संगठनों के लिए फ्री एपीआई या डेटा डंप के रूप में नहीं बनाया गया है ताकि वे बड़े पैमाने पर ऑटोमेटेड स्क्रिप्ट चला सकें। चुनावी रोल वोटरों के लिए हैं, न कि थर्ड पार्टी या अन्य संगठनों के लिए कि वे डेमोग्राफिक एनालिसिस करके अपनी राजनीतिक रणनीति तैयार करें। अगर ऐसे संगठन वोटर लिस्ट पर ऑटोमेटेड एनालिसिस करना चाहते हैं तो उन्हें सुप्रीम कोर्ट के सुझाव के मुताबिक खुद डेटा को मशीन-रीडेबल फॉर्मेट में बदलना होगा।

ईसीआई कई वैध स्क्रूटनी के रास्ते उपलब्ध कराता है, जिनमें नेशनल वोटर्स सर्विस पोर्टल (एनवीएसपी) पर वोटर आईडी नंबर से इंडिविजुअल सर्च, पोर्टल से पोलिंग स्टेशन-वाइज वोटर लिस्ट डाउनलोड, मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टियों को फ्री हार्ड और सॉफ्ट कॉपी, और इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर के ऑफिस में फिजिकल इंस्पेक्शन शामिल हैं। चुनाव से पहले राजनीतिक पार्टियां ऐसी लिस्ट प्रिंट करवाकर अपने बूथ-लेवल वर्कर्स को बांटती हैं ताकि वोटरों को मोबिलाइज किया जा सके और उन्हें अपना पोलिंग स्टेशन, सीरियल नंबर आदि की जानकारी दी जा सके।

किसी भी इकाई द्वारा बल्क ऑटोमेटेड एक्सट्रैक्शन को जानबूझकर डिजाइन द्वारा सीमित रखा गया है ताकि सर्वर स्थिरता बनी रहे और ऑफिशियल रिकॉर्ड की अखंडता सुरक्षित रहे। ईसीआई ने लगातार तर्क दिया है कि अनरेस्ट्रिक्टेड मशीन-रीडेबल डेटा का हथियार बनाकर डुप्लिकेट या फर्जी वोटर क्लेम बनाए जा सकते हैं, जिससे चुनावी प्रक्रिया पर भरोसा कम हो जाएगा।

आखिर में…

ऑल्टन्यूज की रिपोर्ट ने ईसीआई की रूटीन, पूरे देश में लागू होने वाली टेक्निकल और प्रोसीजरल सुरक्षा को राजनीतिक रूप से प्रेरित ‘दीवार’ बताकर पेश किया है जो सिर्फ पश्चिम बंगाल के चुनावी डेटा के चारों ओर खड़ी की गई है। हकीकत यह है कि 10 एरिया डाउनलोड लिमिट, कैप्चा प्रोटेक्शन और इमेज-पीडीएफ-ओनली फॉर्मेट सभी चीफ इलेक्टोरल ऑफिसर्स को दिए गए आधिकारिक निर्देशों में दर्ज स्टैंडर्ड ईसीआई पॉलिसी हैं और सुप्रीम कोर्ट ने भी इन्हें समर्थन दिया है। ये उपाय बॉट्स से सर्वर ओवरलोड रोकने, वोटर डेटा की आसान मैनिपुलेशन रोकने और रोल को एडिटेबल डेटासेट के बजाय अथॉरिटेटिव पब्लिक रिकॉर्ड बनाए रखने के लिए हैं।

हालाँकि ये रिस्ट्रिक्शन्स रिसर्चर, पत्रकार और एनालिस्ट के लिए बड़े पैमाने या ऑटोमेटेड एक्सेस चाहने वालों के लिए निश्चित रूप से निराशाजनक हो सकते हैं, लेकिन ये जानबूझकर डिजाइन किए गए हैं और ईसीआई के पास इन्हें लागू करने के वैध कारण हैं। असल में ये फीचर्स हैं, बग नहीं।

ईसीआई का तरीका भारत के सबसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक उपकरणों में से एक की पारदर्शिता और सुरक्षा के बीच जानबूझकर बनाया गया संतुलन दर्शाता है। वोटर लिस्ट थर्ड-पार्टी एनालिसिस के लिए फ्री, मशीन-रीडेबल फीडर नहीं हैं, वे नागरिकों के लिए अपने चुनावी स्टेटस की पुष्टि करने का टूल हैं।

ऑल्टन्यूज का लेख दरअसल ईसीआई के टेक्स्ट वोटर लिस्ट के खिलाफ तर्क का जिक्र करता है और मानता है कि इमेज फाइल सिर्फ उपयोगिता रोकती है, जानकारी नहीं। यही चुनाव आयोग भी कह रहा है।

सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों पर लागू होने वाले इन नियमों का जिक्र छोड़कर और ये सिर्फ पश्चिम बंगाल की वोटर लिस्ट पर लागू हैं ऐसा संकेत देकर, इस तथाकथित फैक्ट चेकर ने आखिरकार फेक न्यूज फैला दी। साफ है कि ऑल्टन्यूज ने चुनिंदा और गलत नैरेटिव पेश किया। यह किसी बंगाल-विशेष साजिश का सबूत नहीं है, बल्कि पूरे देश में समान रूप से लागू होने वाली स्टैंडर्ड चुनावी प्रशासन व्यवस्था है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

मालदा बंधक विवाद के बीच ताजी हुई 2016 के दंगों की याद, इस्लामी भीड़ ने फूँका था पुलिस थाना: जानें- कैसे कमलेश तिवारी विवाद की आड़ में हिंदुओं और मंदिरों पर हुए थे हमले

पश्चिम बंगाल के कालियाचक में पैदा हुआ तनाव उस जगह की पुरानी हिंसक घटनाओं की याद दिला रहा है। यही वह इलाका है जहाँ कुछ दिन पहले एक भीड़ द्वारा न्यायिक अधिकारियों को बंधक बना लिया गया था। इस नई घटना ने 2016 में हुए कुख्यात मालदा दंगे की याद को फिर से ताजा कर दी हैं।

जनवरी 2016 में यहाँ बड़ी संख्या में मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा किया गया विरोध प्रदर्शन अचानक हिंसक हो गया था। देखते ही देखते स्थिति बेकाबू हो गई, जिसमें बड़े पैमाने पर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाया गया, कई पुलिसकर्मी घायल हुए और पूरा इलाका तनाव की चपेट में आ गया। यह घटना पश्चिम बंगाल की सबसे हिंसक घटनाओं में से एक मानी जाती है, जिसने पूरे क्षेत्र में डर और अस्थिरता का माहौल पैदा कर दिया था।

कैसे एक विरोध प्रदर्शन हिंसक दंगे में बदल गया

पश्चिम बंगाल के कालियाचक (मालदा जिला) में 3 जनवरी 2016 को हजारों लोग इकट्ठा हुए थे। यह भीड़ एक राजनीतिक व्यक्ति कमलेश तिवारी द्वारा की गई विवादित टिप्पणी के विरोध में जुटी थी। इस रैली को अनुमति मिली हुई थी और इसे मुस्लिम संगठनों द्वारा आयोजित किया गया था, जो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की माँग कर रहे थे।

शुरुआत में यह एक सामान्य विरोध प्रदर्शन था, लेकिन जल्द ही स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई। भीड़ का एक हिस्सा आक्रामक हो गया, बैरिकेड तोड़ दिए गए और पुलिस व सुरक्षा बलों के साथ झड़प शुरू हो गई। कुछ ही समय में यह विरोध प्रदर्शन पूरी तरह दंगे में बदल गया।

उग्र मुस्लिम भीड़ ने कालियाचक थाने पर हमला कर दिया, दफ्तरों में तोड़फोड़ की और वाहनों को आग के हवाले कर दिया। ब्लॉक विकास कार्यालय को भी निशाना बनाया गया और वहाँ जमकर नुकसान किया गया। सरकारी रिकॉर्ड, कंप्यूटर और फाइलें नष्ट कर दी गईं।

हालात ऐसे हो गए कि पुलिसकर्मियों को वहाँ से भागना पड़ा और भीड़ ने पूरे इलाके पर कब्जा कर लिया। इन झड़पों में 30 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हो गए थे। साथ ही सीमा सुरक्षा बल और नॉर्थ बंगाल स्टेट ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन के कई वाहनों को भी आग के हवाले कर दिया गया।

रेलवे नाकाबंदी और व्यापक व्यवधान

हिंसा केवल सरकारी इमारतों तक सीमित नहीं रही। प्रदर्शनकारी आगे बढ़ते हुए खाल्टिपुर रेलवे स्टेशन पहुँच गए और कई घंटों तक रेलवे ट्रैक को जाम कर दिया, जिससे ट्रेन सेवाएँ पूरी तरह ठप हो गईं।

नेशनल हाईवे 34 भी इस हिंसा से प्रभावित हुआ, जब एक NBSTC बस को आग के हवाले कर दिया गया और सड़क पर चल रहे वाहन वहीं फंस गए। हालात इतने बिगड़ गए कि यात्रियों को अपनी जान बचाने के लिए वाहन छोड़कर भागना पड़ा, क्योंकि भीड़ लगातार उग्र होती जा रही थी।

इस दौरान दुकानों के शटर गिर गए, सड़कों पर आवाजाही रुक गई और आम जनजीवन पूरी तरह ठहर गया। आसपास के इलाकों में डर का माहौल फैल गया, लोग अपने घरों में ही रहने को मजबूर हो गए।

हिंदू प्रॉपर्टी पर टारगेटेड हमलों की रिपोर्ट

उस समय सामने आई कई रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया कि हिंसा ने सांप्रदायिक रूप ले लिया था। आसपास के इलाकों, खासकर बेलियाडांगा में स्थित मंदिरों, जैसे शनि मंदिर और दुर्गा मंदिर, पर भी हमले किए गए। इसके अलावा हिंदू समुदाय से जुड़े करीब 25 घरों और दुकानों में तोड़फोड़ की गई।

इन घटनाओं ने इलाके में तनाव और बढ़ा दिया। कई लोगों का कहना था कि शुरुआती विरोध प्रदर्शन के साथ-साथ इस दंगे में हिंदू विरोधी हिंसा के तत्व भी शामिल हो गए थे, जिससे माहौल और ज्यादा संवेदनशील बन गया।

विरोध प्रदर्शन की शुरुआत कैसे हुई?

इस विरोध प्रदर्शन की जड़ दिसंबर 2015 में कमलेश तिवारी द्वारा दिए गए बयान में थी। पैगंबर मोहम्मद को लेकर की गई उनकी टिप्पणी के बाद देशभर में मुस्लिम संगठनों में भारी नाराजगी फैल गई थी।

यह विवाद खुद उस समय और बढ़ गया था, जब आजम खान ने समलैंगिकता कानून पर चल रही बहस के दौरान RSS सदस्यों को लेकर बयान दिया था। उस समय यह बहस भारतीय दंड संहिता की धारा 377 से जुड़ी हुई थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में फिर से लागू कर दिया था, जबकि इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने इसे रद्द कर दिया था।

कमलेश तिवारी के बयान के बाद देशभर में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए थे। कई संगठनों ने उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई, यहाँ तक कि मौत की सजा तक की माँग की थी। बाद में उन्हें लखनऊ में गिरफ्तार कर लिया गया था, जहाँ उन पर धार्मिक भावनाएँ आहत करने और आपसी वैमनस्य फैलाने से जुड़ी धाराओं में केस दर्ज किया गया था।

भारी भीड़ और अचानक तनाव बढ़ना

मालदा में हुई इस रैली में कथित तौर पर हजारों से लेकर दो लाख से ज्यादा लोगों की भागीदारी बताई गई थी। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, स्थिति तब बिगड़नी शुरू हुई जब इलाके से गुजर रही भीड़ का सामना पुलिस और सुरक्षा बलों से हुआ और उन्हें आगे बढ़ने से रोका गया।

बताया जाता है कि एक बस और सुरक्षा कर्मियों के बीच हुई झड़प ने भी हालात को और भड़काने का काम किया। देखते ही देखते विरोध प्रदर्शन बेकाबू हो गया और हिंसा में बदल गया।

भीड़ को काबू में करने के लिए पुलिस को करीब 40 राउंड हवाई फायरिंग करनी पड़ी। हालात संभालने के लिए रैपिड एक्शन फोर्स को तैनात किया गया, जिसके बाद जाकर स्थिति धीरे-धीरे नियंत्रण में लाई जा सकी।

पुलिस कार्रवाई और प्रतिबंध

हिंसा के बाद हालात को काबू में करने के लिए प्रशासन ने धारा 144 लागू कर दी, ताकि किसी भी तरह की भीड़ इकट्ठा न हो सके। इलाके में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया और सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए फ्लैग मार्च भी निकाले गए।

राजनीतिक दौरों पर भी रोक लगा दी गई। भारतीय जनता पार्टी के नेताओं, जिनमें समीक भट्टाचार्य और एस एस अहलूवालिया शामिल थे।  उनके एक प्रतिनिधिमंडल को इलाके में प्रवेश करने से रोक दिया गया। अधिकारियों का कहना था कि उनके आने से स्थिति और बिगड़ सकती है।

दंगे के बाद के दिनों में कई लोगों को गिरफ्तार किया गया और इसमें शामिल लोगों की पहचान करने के लिए जाँच शुरू की गई।

क्या हिंसा के पीछे कोई और मकसद था?

हालाँकि इस पूरे मामले की शुरुआत कमलेश तिवारी के बयान के विरोध से हुई थी, लेकिन बाद की जाँच में यह संकेत मिले कि हिंसा पूरी तरह अचानक नहीं थी। पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों का मानना था कि कुछ आपराधिक तत्वों ने इस विरोध प्रदर्शन का इस्तेमाल अपने मकसद के लिए किया। एक अहम पहलू यह भी था कि थाने के अंदर मौजूद रिकॉर्ड को खास तौर पर निशाना बनाकर नष्ट किया गया।

कालियाचक और इसके आसपास के इलाके पहले से ही नकली नोटों के कारोबार, ड्रग तस्करी और अवैध पोस्ता खेती जैसी गतिविधियों को लेकर जाँच के दायरे में रहे थे। अधिकारियों के अनुसार, दंगे से पहले इन नेटवर्क्स के खिलाफ कार्रवाई की गई थी, जिसमें बड़े पैमाने पर पोस्ता की फसलों को नष्ट किया गया था। माना जाता है कि इस कार्रवाई से स्थानीय आपराधिक समूह नाराज थे और उसी का असर इस हिंसा में देखने को मिला।

पोस्ता माफिया और अवैध व्यापार

मालदा क्षेत्र, खासकर बांग्लादेश की अंतरराष्ट्रीय सीमा के पास के इलाके, लंबे समय से अवैध गतिविधियों के लिए जाने जाते रहे हैं। इनमें तस्करी, नकली नोटों का कारोबार और मादक पदार्थों का उत्पादन शामिल है।

पोस्ता की खेती, जिसका इस्तेमाल अफीम और हेरोइन बनाने में होता है, यहाँ बड़े पैमाने पर की जाती थी। दंगों से ठीक कुछ दिन पहले ही प्रशासन ने इन फसलों को नष्ट करने के लिए बड़ा अभियान शुरू किया था।

कुछ रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया कि भीड़ द्वारा थाने पर किया गया हमला इन अवैध गतिविधियों से जुड़े सबूतों को खत्म करने के मकसद से हो सकता है। इस आशंका को इस बात से भी बल मिला कि थाने के अंदर मौजूद रिकॉर्ड, फाइलें और कंप्यूटर को खास तौर पर निशाना बनाकर नष्ट किया गया था।

भूगोल और जनसांख्यिकीय संदर्भ

मालदा जिला हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों की मिश्रित आबादी वाला क्षेत्र है, जहाँ कालियाचक जैसे कुछ इलाकों में मुस्लिम आबादी अधिक है। 2011 की जनगणना के अनुसार, जिले में दोनों समुदायों की अच्छी-खासी मौजूदगी है।

इस जिले की स्थिति बिहार, झारखंड और बांग्लादेश की सीमा के पास होने के कारण इसे रणनीतिक रूप से संवेदनशील बनाती है। सीमा से लगे इलाकों का इस्तेमाल अक्सर अवैध व्यापार के लिए रास्ते के तौर पर किया जाता रहा है। इसी जनसंख्या की विविधता और आपराधिक नेटवर्क के मेल ने इस क्षेत्र को अचानक भड़कने वाली हिंसा के लिए संवेदनशील बना दिया है।

नागरिक समाज और अलग-अलग विचार

हर कोई इस बात से सहमत नहीं था कि यह हिंसा पूरी तरह सांप्रदायिक थी। एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स (APDR) नाम के एक नागरिक अधिकार संगठन ने कहा कि इस घटना को केवल सांप्रदायिक नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए।

संगठन के प्रतिनिधियों का तर्क था कि यह हिंसा ज्यादा कानून व्यवस्था की कमजोरी और उपद्रवियों की भूमिका को दिखाती है, न कि किसी सोची-समझी सांप्रदायिक साजिश को।

हालाँकि, राजनीतिक दलों और स्थानीय रिपोर्ट्स में इस दंगे की प्रकृति को लेकर बहस जारी रही। कुछ लोगों ने इसे सांप्रदायिक गुस्से से प्रेरित सुनियोजित हमला बताया, जबकि अन्य ने इसके पीछे आपराधिक कारणों को जिम्मेदार ठहराया।

आज भी स्थायी प्रभाव और प्रासंगिकता

2016 के मालदा दंगे 2016 ने पूरे क्षेत्र पर गहरा असर छोड़ा था। इस घटना ने कानून-व्यवस्था की कमजोरियों, अवैध नेटवर्क के प्रभाव और समुदायों के बीच संतुलन की नाजुक स्थिति को उजागर कर दिया था।

अब जब उसी कालियाचक इलाके में न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाए जाने की खबरें सामने आ रही हैं, तो 2016 की घटनाएँ और ज्यादा प्रासंगिक हो जाती हैं।

एक ही जगह पर बार-बार भीड़ की ऐसी घटनाएं होना शासन, कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। साथ ही यह भी सवाल उठता है कि क्या उन मूल समस्याओं को कभी पूरी तरह हल किया गया था, जिनकी वजह से पहले इतनी बड़ी हिंसा हुई थी।

तनाव का एक पैटर्न

2016 की घटनाओं ने यह दिखाया कि जब धार्मिक भावनाएँ, राजनीतिक तनाव और आपराधिक हित एक साथ जुड़ जाते हैं, तो कोई भी विरोध प्रदर्शन कितनी जल्दी बड़े स्तर की हिंसा में बदल सकता है। हाल ही में सामने आई बंधक बनाए जाने की घटना यह संकेत देती है कि कालियाचक आज भी एक संवेदनशील और अस्थिर इलाका बना हुआ है।

जब प्रशासन मौजूदा हालात से निपटने में लगा है, तब 2016 के दंगों से मिले सबक यह याद दिलाते हैं कि ऐसे क्षेत्रों में शांति कितनी नाजुक होती है। साथ ही यह भी जरूरी है कि केवल तात्कालिक कारणों ही नहीं, बल्कि गहरे स्तर की समस्याओं को भी समझकर उनका समाधान किया जाए।


(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

जंगलराज से भी भयावह: मालदा, भय और पश्चिम बंगाल में निष्पक्ष चुनाव की चुनौती

जंगलराज। यह शब्द सुनते ही हमारी स्मृतियों में बिहार का नाम कौंधता है। दुर्भाग्य से पश्चिम बंगाल को परिभाषित करता ऐसा कोई शब्द नहीं गढ़ा गया है, जबकि वहाँ की स्थिति ‘जंगलराज’ से भी भयावह है। मालदा में न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाने की घटना इसी भयावहता का विस्तार है।

यह ऐसा संकेत है जो बताता है कि अब भय केवल राजनीतिक हिंसा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संस्थाओं की स्वायत्तता को भी भयाक्रांत करने को आतुर है। इस स्थिति में अपनी चौखट तक लपटें देखकर न्यायपालिका की सक्रियता उम्मीद तो बाँधती है, पर यह भी बताती है कि चुनाव आयोग (ECI) ने आचार संहिता लागू होने के बाद भले थोक के भाव में प्रशासनिक स्तर पर बदलाव किए है, लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था को राजनीतिक भय से मुक्त नहीं कर पाई है।

स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मालदा में जो संकट दिन के करीब 3:30 बजे पैदा हुआ, उसमें रात के 8:30 बजे तक स्पष्ट तौर पर प्रशासनिक निष्क्रियता देखने को मिली। राज्य के मुख्य सचिव संपर्क से बाहर थे। शीर्ष अदालत ने पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव, गृह सचिव, पुलिस महानिदेशक, कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक सहित अन्य वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों के आचरण को ‘अत्यंत निंदनीय’ बताया है। यह निष्क्रियता तब थी, जब मालदा जिले के कालियाचक इलाके के प्रखंड विकास अधिकारी (BDO) कार्यालय में 1 अप्रैल 2026 को जिन सात न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाया गया था, उनमें तीन महिला थीं।

जिन शीर्ष अधिकारियों की सक्रियता प्रश्नों के घेरे में है, वह सत्ताधारी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की सरकार द्वारा नियुक्त नहीं किए गए हैं। भारत निर्वाचन आयोग ने 16 मार्च 2026 को ही पश्चिम बंगाल के शीर्ष अधिकारी बदल दिए थे। इनमें मुख्य सचिव और गृह सचिव भी शामिल थे। बाद में DGP भी बदले गए और फिर करीब 500 अधिकारी और बदले गए। मालदा की घटना से पहले ही कलकत्ता हाई कोर्ट ने वह याचिका खारिज भी कर दी थी, जिसमें इन बदलावों को चुनौती दी गई थी।

फिर प्रश्न उठता है कि इसके बाद भी प्रशासनिक अधिकारियों ने वह सक्रियता क्यों नहीं दिखाई जो अपेक्षित था? जवाब सीधा और सरल है। भय। यह भय कि यदि चुनावों के बाद फिर से ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) ही सत्ता में लौटी तो शायद प्रताड़ना झेलनी पड़े। शायद परिवार के सदस्यों और रिश्तेदारों को प्रताड़ित किया जाए।

पश्चिम बंगाल में यह भय एक दिन में नहीं बना है। पहले जनता के भीतर भय पैदा किया गया। फिर उद्योगपतियों-कारोबारियों को आतंकित किया गया। धीरे-धीरे इस भय का विस्तार पूरी व्यवस्था में किया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि बंगाल बर्बाद होता गया और भय की राजनीति आबाद।

पश्चिम बंगाल में भय की इस राजनीति की शुरुआत वामपंथियों ने 1970 में बर्दवान में सेन भाइयों की हत्या कर उनके खून से सने चावल खाने के लिए उनकी माँ को मजबूर कर किया था। इससे भय का जो विस्तार हुआ उसने 1977 में वामपंथियों को बंगाल की सत्ता में स्थापित कर दिया और यह 2011 तक लगातार चलता रहा। इस दौरान जितने नरसंहार बंगाल में हुए, उतने शायद ही देश के किसी दूसरे राज्य में हुए हों।

कभी भय की इस संस्कृति की पीड़ित रहीं ममता बनर्जी ने भी वामपंथियों से सत्ता छीनने के बाद इसे पुरजोर तरीके से आगे बढ़ाया। इसका ही परिणाम था कि 2021 में विधानसभा चुनाव के नतीजे आते ही सिलसिलेवार तरीके से भारतीय जनता पार्टी के समर्थकों को प्रताड़ित किया गया। इससे मतदाताओं को यह संदेश दिया गया कि यदि अपनी मर्जी से मत डालोगे तो उसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।

5 साल बाद भी आम मतदाताओं के मन से यह भय मिटा नहीं है। केवल अधिकारी बदलने से यह भय मिट भी नहीं सकता। चुनाव आयोग द्वारा लाए गए अधिकारी भी जानते हैं कि चुनाव के बाद उन्हें फिर से उसी बंगाल में काम करना है। उनके परिवार के सदस्य और रिश्तेदार उसी बंगाल में रहते हैं। ऐसे में यदि फिर 4 मई 2026 को तृणमूल कॉन्ग्रेस ही लौट आई तो क्या होगा?

पश्चिम बंगाल की जो स्थिति है उसे देखते हुए राष्ट्रपति शासन लगाने की माँग कई बार उठी है। लेकिन अब चुनावों के समय इसे दोहरा देना बेतुका है। ऐसे में चुनाव आयोग का दायित्व सबसे अधिक हो जाता है।

लोकतंत्र का मतलब केवल चुनाव कराना नहीं है। उसे निष्पक्ष और भय मुक्त रखना भी है। यह सत्य है कि नई सरकार के गठन के बाद 2021 जैसी कोई स्थिति उत्पन्न होने पर सुरक्षा उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की नहीं होगी। लेकिन आज वह ऐसा वातावरण अवश्य बना सकती है, जिसमें मतदाताओं के पास अपने मन के हिसाब से मत देने की और अधिकारियों को बिना किसी आशंका के कानून सम्मत फैसले लेने की स्वतंत्रता हो।

पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में निष्पक्ष चुनाव के लिए केवल संवैधानिक प्रावधान पर्याप्त नहीं हैं। सख्त और विशेष प्रशासनिक हस्तक्षेप भी आवश्यक हैं। चुनाव से पहले अधिकारियों को बदल देना या पर्याप्त अर्धसैनिक बल राज्य में भेज देना इसकी कड़ी मात्र हैं। पूरी समस्या का समाधान नहीं।

समाधान के लिए चुनाव आयोग को उस मॉडल की तरफ देखना होगा, जिसके जरिए उसने बिहार में 90 के दशक में चरम पर पहुँच गए चुनावी हिंसा और बूथ कैप्चरिंग को समाप्त कर मन मुताबिक मत देने का मौका जनता को प्रदान किया था। उस समय बिहार में केजे राव जैसे अधिकारियों को आयोग ने विशेष रूप से तैनात किया था।

राव ने स्थानीय प्रशासन से स्वतंत्र निर्णय लिए थे। सुरक्षा बलों की रणनीतिक तैनाती की थी। संवेदनशील बूथों की पहचान कर उनकी कड़ी निगरानी सुनिश्चित की थी। साथ ही ​हर राजनीतिक दबाव को नजरअंदाज किया था।

किसी भी प्रशासनिक अधिकारी के लिए राव के ये निर्णय सामान्य से लग सकते हैं। पर इनका प्रभाव व्यापक था। इन निर्णयों ने न केवल बिहार में चुनावी हिंसा को समाप्त किया, बल्कि वहाँ की चुनावी प्रक्रिया को अधिक विश्वसनीय भी बना दिया।

सामान्य से लगने वाले ये कदम भी कोई अधिकारी तभी उठा सकता है, जब वह भय मुक्त हो। यदि उसका या उसके परिवार का भविष्य 4 मई के चुनाव परिणाम पर निर्भर होगा तो वह कभी भी ऐसे निर्णय नहीं ले पाएगा।

वैसे भी पश्चिम बंगाल में राजनीतिक ध्रुवीकरण इतना हिंसक हो चुका है कि अब हिंसा की घटनाएँ सामान्य सी लगती हैं। सत्तारूढ़ तंत्र के नियंत्रण में स्थानीय प्रशासन का होना साधारण सी बात लगती है।

इस स्थिति में बाहरी, निष्पक्ष और सख्त अधिकारियों की तैनाती जरूरी है। ठीक वैसे ही जैसे बिहार में हुआ था। चुनाव आयोग को सुनिश्चित करना होगा कि;

  • संवेदनशील क्षेत्रों में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की मौजूदगी अधिक हो।
  • राज्य से बाहर के वरिष्ठ अधिकारी चुनाव पर्यवेक्षक के तौर पर तैनात रहें।
  • हर संवेदनशील बूथ पर CCTV और वेबकास्टिंग अनिवार्य रहे।
  • आचार संहिता के उल्लंघन पर त्वरित और कड़े एक्शन हों।
  • लोगों को यह विश्वास दिलाया जाए कि उनका वोट सुरक्षित और गुप्त है।

ध्यान रहे यदि मतदाता डर के माहौल में वोट डालते हैं तो परिणाम वास्तविक जनमत को प्रतिबिंबित नहीं करते। ऐसे में आवश्यक है कि 23 और 29 अप्रैल को जब बंगाल के लोग मतदान करने के लिए अपने घरों से निकलें तो यह दिखना चाहिए कि लोकतंत्र केवल कागजों पर ही नहीं, जमीन पर भी जीवित और मजबूत है।

क्या चुनाव आयोग ऐसा कर पाएगा?

S-400 के आधे दाम में भारत ने बनाया खुद का एयर डिफेंस सिस्टम, प्रोजेक्ट कुशा की 5 यूनिट्स का ऑर्डर भी दिया: जानें क्यों है ये सबसे खास, जिसे देख दुनिया हैरान

भारत अपने एयर डिफेंस को मजबूत बनाने के लिए स्वदेशी लंबी दूरी का एयर डिफेंस सिस्टम प्रोजेक्ट कुशा तेजी से आगे बढ़ा रहा है। DRDO द्वारा विकसित इस सिस्टम के 5 स्क्वाड्रन खरीदने को भारतीय वायु सेना ने मंजूरी दे दी है, जिसकी कुल लागत करीब 21700 करोड़ रुपए बताई जा रही है।

इसका मुख्य उद्देश्य भारत को विदेशी सिस्टम पर निर्भरता से मुक्त करना और अपनी जरूरतों के हिसाब से एक मजबूत एयर शील्ड तैयार करना है। यह सिस्टम ड्रोन, फाइटर जेट, क्रूज मिसाइल और बड़े हवाई प्लेटफॉर्म तक को निशाना बना सकता है।

खास बात यह है कि इसकी टेस्टिंग और प्रोडक्शन साथ-साथ चल रहे हैं, जिससे साफ है कि इसे तेजी से तैनात करने की योजना है और इसकी जरूरत तत्काल महसूस की जा रही है।

क्षमता और अभेद्य एयर डिफेंस: कैसे करेगा काम?

प्रोजेक्ट कुशा को तीन लेयर में डिजाइन किया गया है ताकि हर तरह के हवाई खतरे को अलग-अलग स्तर पर रोका जा सके। इसमें M1 मिसाइल (150 किमी) ड्रोन, फाइटर जेट और क्रूज मिसाइल जैसे टारगेट के लिए है, M2 (250 किमी) स्टेल्थ एयरक्राफ्ट और तेज खतरों के लिए बनाई जा रही है।

जबकि M3 (350-400 किमी) AWACS और बड़े एयरबोर्न टारगेट को मार गिराने के लिए होगी। इसकी सिंगल शॉट किल क्षमता 80% से ज्यादा बताई जा रही है, यानी एक ही मिसाइल से लक्ष्य खत्म करने की संभावना काफी अधिक है।

M1 इंटरसेप्टर में डुअल-पल्स सॉलिड रॉकेट मोटर का इस्तेमाल किया गया है, जिससे यह अंतिम चरण में तेज और सटीक हमला कर सकता है। इसके साथ मल्टी-फंक्शन कंट्रोल रडार और बैटल मैनेजमेंट सिस्टम मिलकर इसे एक स्मार्ट नेटवर्क आधारित एयर डिफेंस बनाते हैं, जो ड्रोन स्वॉर्म, स्टेल्थ टेक्नोलॉजी और एक साथ कई मिसाइल हमलों जैसे आधुनिक खतरों से निपटने में सक्षम है।

S-400 से कितना अलग और बेहतर?

रूस का S-400 दुनिया के सबसे एडवांस एयर डिफेंस सिस्टम में गिना जाता है, लेकिन प्रोजेक्ट कुशा कई मामलों में उससे अलग और किफायती विकल्प बनकर उभर रहा है। सबसे बड़ा फर्क इसकी लागत में है।

जहाँ S-400 के 5 स्क्वाड्रन की कीमत करीब 45000 करोड़ रुपए रही, वहीं कुशा के 5 स्क्वाड्रन सिर्फ 21700 करोड़ रुपए में तैयार हो रहे हैं। यानी यह लगभग आधी लागत में उपलब्ध होगा।

मिसाइल की कीमत में भी बड़ा अंतर है। जहाँ S-400 की एक मिसाइल करीब 100 करोड़ रुपए की होती है, जबकि कुशा की मिसाइल 40-50 करोड़ रुपए में तैयार हो रही है। इसके अलावा कुशा पूरी तरह भारतीय जरूरतों के हिसाब से डिजाइन किया गया है, जबकि S-400 एक जनरल सिस्टम है।

ऑपरेशनल आजादी और सॉफ्टवेयर कंट्रोल

प्रोजेक्ट कुशा की सबसे बड़ी ताकत इसकी ऑपरेशनल आजादी है। विदेशी सिस्टम जैसे S-400 में सॉफ्टवेयर और सोर्स कोड पर पूरा नियंत्रण नहीं होता, जिससे कई बार अपडेट या बदलाव के लिए सप्लायर पर निर्भर रहना पड़ता है।

लेकिन कुशा पूरी तरह स्वदेशी है, जिसमें एयरफोर्स को मिशन एल्गोरिदम और कोर सॉफ्टवेयर पर पूरा नियंत्रण मिलेगा। इससे किसी भी तरह के किल स्विच का खतरा नहीं रहेगा और युद्ध के समय किसी बाहरी देश पर निर्भरता खत्म हो जाएगी।

अगर दुश्मन नई स्टेल्थ तकनीक या इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर का इस्तेमाल करता है, तो भारत तुरंत अपने रडार और ट्रैकिंग सिस्टम को अपडेट कर सकता है, जिससे प्रतिक्रिया और भी तेज और प्रभावी हो जाती है।

इंटीग्रेशन, मेंटेनेंस और लंबी अवधि का फायदा

प्रोजेक्ट कुशा को भारत के IACCS नेटवर्क के साथ आसानी से जोड़ा जाएगा, जिससे यह AWACS, तेजस Mk-2 जैसे फाइटर जेट और ग्राउंड रडार के साथ रियल टाइम डेटा शेयर कर सकेगा।

इसका मतलब है कि किसी भी खतरे पर तेजी से फैसला लेकर तुरंत कार्रवाई की जा सकेगी। मेंटेनेंस के मामले में भी यह सिस्टम बड़ा फायदा देता है, क्योंकि इसके सभी स्पेयर पार्ट्स और सर्विस भारत में ही उपलब्ध होंगे।

इससे विदेशी सप्लाई चेन पर निर्भरता खत्म होगी और सिस्टम के बंद पड़ने की संभावना बेहद कम हो जाएगी। चूँकि ऐसे एयर डिफेंस सिस्टम 25-30 साल तक चलते हैं, इसलिए लंबे समय में कुशा की लागत काफी कम साबित होगी, जबकि विदेशी सिस्टम में मेंटेनेंस और अपग्रेड पर भारी खर्च आता है।

इस्लामिक देश ईरान में नहीं मिटी हिंदू आस्था, पढ़ें- बंदर अब्बास के 134 साल पुराने भगवान विष्णु के मंदिर की दास्ताँ

एक इस्लामिक राष्ट्र ईरान के बंदर अब्बास में समुद्र किनारे हिंदुओं की जीवंत संस्कृति विरासत 130 से भी ज्यादा वर्षों से खड़ी है। बंदर अब्बास का यह अनोखा हिंदू मंदिर सिर्फ पत्थरों की संरचना नहीं बल्कि उन भारतीय व्यापारियों की जीवटता की कहानी है जिन्होंने समुद्र पार जाकर भी अपनी संस्कृति को मिटने नहीं दिया। यह मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि प्रवास, व्यापार, आस्था और सांस्कृतिक मेल-जोल का जीवंत प्रतीक है जो यह दिखाता है कि किस तरह हिंदू अपनी जड़ों से जुड़े रहते हैं, चाहे वे दुनिया के किसी भी कोने में क्यों न बस जाएँ।

समुद्री व्यापार से जन्मी आस्था की कहानी

बंदर अब्बास ऐतिहासिक रूप से एक महत्वपूर्ण समुद्री बंदरगाह रहा है, जो फारस की खाड़ी के व्यापारिक नेटवर्क का प्रमुख केंद्र था। पुराने समय में भारत और ईरान के बीच समुद्री व्यापार काफी विकसित था और इसी वजह से भारतीय व्यापारी बड़ी संख्या में यहाँ आते-जाते थे।

खासतौर पर गुजरात, कच्छ और सिंध के व्यापारी इस इलाके में सक्रिय थे। व्यापार के सिलसिले में उनका यहाँ लंबे समय तक ठहराव होने लगा और धीरे-धीरे कई लोग यहीं बस गए। विदेशी जमीन पर रहने के बावजूद उन्होंने अपनी संस्कृति, भाषा और धार्मिक परंपराओं को जीवित रखा। इसी जरूरत ने उन्हें एक ऐसे स्थान के निर्माण के लिए प्रेरित किया, जहाँ वे पूजा-पाठ कर सकें और अपने सामुदायिक जीवन को बनाए रख सकें।

130 साल पुराना इतिहास आज भी जिंदा

इस मंदिर का निर्माण 19वीं सदी के अंतिम वर्षों में लगभग 1892 के आसपास हुआ था जो उस समय के हिसाब से एक बड़ा सांस्कृतिक कदम था। यह वह दौर था जब बंदर अब्बास व्यापारिक गतिविधियों के कारण तेजी से विकसित हो रहा था और भारतीय समुदाय भी यहाँ मजबूत स्थिति में था।

(फोटो साभार: sindhrenaissance)

लगभग 130 से 134 साल पुराना यह मंदिर आज भी अपनी मूल संरचना के साथ खड़ा है और उस समय की सामाजिक और धार्मिक जीवनशैली की झलक दिखाता है। इसके निर्माण में उस दौर के स्थानीय शासक मोहम्मद हसन खान साद-ओल-मलेक के शासनकाल का भी जिक्र मिलता है, जो इस क्षेत्र के प्रशासनिक प्रमुख थे।

भारतीय व्यापारियों की आस्था और सामूहिक प्रयास

इस मंदिर के निर्माण के पीछे भारतीय व्यापारियों की सामूहिक आस्था और एकजुटता की कहानी छिपी है। उस समय भारत से आए व्यापारी आर्थिक रूप से संपन्न थे और उन्होंने मिलकर चंदा इकट्ठा कर इस मंदिर का निर्माण कराया। माना जाता है कि यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित था, जो हिंदू धर्म में पालनकर्ता और रक्षक के रूप में पूजे जाते हैं।

इस मंदिर ने वहाँ बसे भारतीयों को एक आध्यात्मिक आधार दिया, जहाँ वे अपने धार्मिक अनुष्ठान कर सकते थे और अपने त्योहार मना सकते थे। यह स्थान उनके लिए घर से दूर एक ‘छोटा भारत’ बन गया था।

वास्तुकला में भारत-ईरान का अद्भुत संगम

इस मंदिर की संरचना इसे विशेष बनाती है। इसका मुख्य कक्ष चौकोर आकार में है, जिसके ऊपर एक बड़ा और आकर्षक गुंबद बना हुआ है। यह गुंबद पारंपरिक भारतीय मंदिरों से अलग है और इसमें फारसी एवं इस्लामी स्थापत्य शैली का प्रभाव दिखाई देता है, जो इसे एक अनोखा रूप देता है।

निर्माण में मूंगा पत्थर, मिट्टी, गारा और चूने का इस्तेमाल किया गया, जो स्थानीय संसाधनों को दर्शाता है। मंदिर के गुंबद पर छोटे-छोटे अलंकरण और मीनारनुमा संरचनाएँ भी बताई जाती हैं, जो भारतीय शैली की याद दिलाती हैं। अंदर की दीवारों पर कभी रंगीन चित्रकारी और धार्मिक प्रतीकों की सजावट हुआ करती थी।

मरम्मत के दौरान यहाँ भगवान कृष्ण की एक चित्रकारी भी सामने आई, जो इस बात का प्रमाण है कि यहाँ केवल पूजा ही नहीं, बल्कि धार्मिक कला और परंपराओं को भी संजोया गया था।

पूजा से विरासत बनने तक का सफर

एक समय यह मंदिर धार्मिक गतिविधियों का केंद्र हुआ करता था। यहाँ नियमित रूप से पूजा, आरती और धार्मिक अनुष्ठान होते थे। जन्माष्टमी, दीवाली जैसे त्योहारों पर भारतीय समुदाय बड़ी संख्या में यहाँ इकट्ठा होता था और मंदिर का वातावरण पूरी तरह उत्सवमय हो जाता था।

इसके अलावा यह स्थान सामाजिक मेल-जोल का भी केंद्र था, जहाँ लोग एक-दूसरे से मिलते, अपनी समस्याएँ साझा करते और सामुदायिक जीवन को मजबूत बनाते थे। लेकिन 20वीं सदी के मध्य में परिस्थितियाँ बदलने लगीं। व्यापार के स्वरूप में बदलाव आया और कई भारतीय व्यापारी वापस अपने देश लौट गए।

इसके बाद मंदिर की गतिविधियाँ धीरे-धीरे कम होती गईं और अंततः यह एक शांत ऐतिहासिक स्थल बनकर रह गया। आज यह मंदिर सक्रिय पूजा स्थल नहीं है लेकिन इसे ईरान की सांस्कृतिक धरोहर के रूप में संरक्षित किया गया है और राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा भी मिला हुआ है। अब यह पर्यटकों और इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए एक महत्वपूर्ण आकर्षण है।

ईरान में हिंदू समुदाय की मौजूदगी

ईरान की कुल आबादी लगभग 9 करोड़ के आसपास मानी जाती है, जिसमें करीब 99.40 प्रतिशत लोग इस्लामी मजहब का पालन करते हैं। इनमें लगभग 89.46 प्रतिशत शिया और करीब 9.94 प्रतिशत सुन्नी मुस्लिम शामिल हैं। ईसाई, यहूदी और अन्य छोटे समुदायों के साथ-साथ हिंदू समुदाय भी यहाँ रहता है।

Pew Research Center की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2010 में ईरान में करीब 20 हजार हिंदू रहते थे और 2020 तक भी यह संख्या लगभग स्थिर बनी रही। इनमें अधिकतर भारतीय मूल के व्यापारी, कामगार और उनके परिवार शामिल हैं। भले ही संख्या कम हो लेकिन इनकी सांस्कृतिक उपस्थिति ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण रही है, जिसका प्रमाण बंदर अब्बास का यह मंदिर है।

बंदर अब्बास का यह हिंदू मंदिर यह बताता है कि धर्म और संस्कृति की कोई सीमाएँ नहीं होतीं और हिंदू जहाँ भी जाते हैं वो अपनी पहचान को साथ लेकर चलते हैं।