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भारत के 7 पड़ोसी देश: मुस्लिम दिन दूने रात चौगुने, कट्टरपंथ का बोलबाला; हिंदुओं की हालत दिनोंदिन बदतर

एक संस्था है। नाम है सेंटर फॉर डेमोक्रेसी प्लूरेलिज़्म एंड ह्यूमन राइट्स। अंग्रेजी में CENTER FOR DEMOCRACY PLURALISM AND HUMAN RIGHTS यानी CDPHR। संस्था ने भारत के 7 पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यकों की स्थिति और मानवाधिकार को लेकर रिपोर्ट जारी की है।

ये देश हैं: पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, श्रीलंका, तिब्बत, मलेशिया और इंडोनेशिया। यह रिपोर्ट वकील, जज, पत्रकारों, शोधकर्ताओं और शिक्षाविदों की टीम ने तैयार की है। नागरिक समानता, गरिमा, न्याय और लोकतंत्र की स्थिति के आधार पर इसे तैयार किया गया है।

रिपोर्ट में भारत के पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यकों की वर्तमान स्थिति का विस्तृत वर्णन किया गया है। इसके मुताबिक अल्पसंख्यकों की सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक हालत एकदम खस्ता है। इन देशों में अल्पसंख्यक की महिलाओं के साथ रेप, मर्डर जैसी घटनाएँ आए दिन सामने आती रहती हैं।

एक-एक कर जानते हैं कि किस देश में अल्पसंख्यकों की स्थिति कैसी है।

बांग्लादेश

भारत का पड़ोसी देश बांग्लादेश जब 1971 में बना था, तब ये एक सेक्युलर राष्ट्र था। लेकिन, 1975 में वहाँ की सरकार ने संविधान से धर्मनिपेक्ष शब्द को हटाकर उसमें कुरान की आयतों को शामिल कर दिया। इसी के साथ ये एक मुस्लिम देश बन गया। यहाँ इस्लामिस्ट अतिवादी हर दिन धार्मिक अल्पसंख्यकों पर अत्याचार करते हैं।

ढाका विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अबुल बरकत की रिपोर्ट के मुताबिक, बीते 4 दशकों में 2,30,612 लोगों ने यहाँ से पलायन किया है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पलायन की अगर यही स्थिति रही तो अगले 30 साल में यहाँ कोई भी हिंदू बचेगा ही नहीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया बांग्लादेश की यात्रा के बाद वहाँ हिफाजत-ए-इस्लाम ने मंदिरों को निशाना बनाया था।

बांग्लादेश में गठन के समय 1971 में बड़े पैमाने पर नरसंहार हुआ था। आधिकारिक रिपोर्ट के मुताबिक, वह मानवीय इतिहास का सबसे डरावना समय था। करीब 30 लाख लोगों का नरसंहार हुआ था और 2 लाख महिलाओं के साथ रेप किया था। लेकिन, इस पर पाकिस्तान ने कभी खुलकर बात नहीं की। जस्टिस हुमुदूर रहमान के नेतृत्व में 1972 में एक फैक्ट फाइडिंग कमेटी बनाई गई थी। इसकी एक कॉपी पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को सौंपी गई थी, जिसे तुरंत ही नष्ट कर दिया गया था। 21 अगस्त 2000 को इंडिया टुडे में यह रिपोर्ट छपी थी।

इस नरसंहार के बाद बांग्लादेश में सेक्युलरिज्म का उदय हुआ। लेकिन, कट्टरपंथियों के राजनीति में पैठ बनाने के बाद 1977 में संविधान से सेक्युलरिज्म को हटाकर उसमें इस्लाम को प्राथमिकता दी गई। 1988 में इस्लाम बांग्लादेश का मुख्य धर्म बन गया।

आर्थिक सेक्टर में भी यहाँ अल्पसंख्यकों को कोई सुविधा नहीं है। देश में 11 बैंक काम कर रहे हैं, जिनमें 100 फीसदी शरिया है। चिटगोंग हिल ट्रैक्ट एकमात्र ऐसा क्षेत्र है, जहाँ 1951 में 90 फासदी बुद्धिस्ट आबादी थी। हिंदू अल्पसंख्यक लंबे समय से पीड़ित रहे हैं। यहाँ बंगालियों की संख्या ज्यादा है। चिटगोंग क्षेत्र में भी करीब 55 फीसदी इस्लामिक आबादी है। स्टडीज के मुताबिक 1951 में हिंदुओं की आबादी 23% थी, जो 2017 में घटकर 9 फीसदी रह गई थी।

रिपोर्ट के मुताबिक 1951 में बांग्लादेश में मुस्लिम आबादी 76.85% थी, जो बढ़कर 2011 में 90.39% हो गई है। दूसरी ओर हिंदू, बुद्धिस्ट, सिख और जैन धर्म की जनसंख्या उसी पीरियड में 22.89% से घटकर 9.30% हो गई है। CDPHR मुताबिक, “यही वो समय है जब अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार जैसी वैश्विक एजेंसी को इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए।”

इसमें बताया गया है 2003 में अल्पसंख्यक महिलाओं और बच्चों के उत्पीड़न को रोकने के लिए लाए गए एक्ट को सही तरीके से लागू नहीं किया गया है। बांग्लादेश यूएन के शांति स्थापना मिशन में सबसे ज्यादा 6731 सैनिकों का योगदान देता है, ताकि दुनिया में शांति स्थापित की जा सके। लेकिन, उसके अपने देश में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार हो रहे हैं। 1946 में यहाँ पहला हिंदू विरोधी दंगा हुआ था। इसके बाद 1971 में नरसंहार हुआ था। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि आवामी लीग की सरकार आर्थिक मोर्चे इस्लामिक बैंकिग के जरिए कट्टरता फैला रही है।

वहाँ दो तरह के कुआमी और आलिया मदरसा चलते हैं, जिनका मकसद इस्लामिक शिक्षा को आगे बढ़ाना है। कुआमी में कुरान, हदीस, इस्लामिक लॉ, इस्लामिक संस्कृति आदि के बारे में पढ़ाया जाता है, जबकि आलिया मदरसा में दूसरे विषय भी पढ़ाए जाते हैं। 1950 में यहाँ 4430 मदरसा थे, जिनकी संख्या बढ़कर 54,130 हो गई है। बांग्लादेश शैक्षिक सूचना और सांख्यिकी-2008 के डाटा के अनुसार, 39,612 कुआमी मदरसों में 52,47,600 विद्यार्थी रजिस्टर्ड थे। वहीं 14,152 आलिया मदरसों में 4,58,0082 छात्र थे। बांग्लादेशी इस्लामिक आंतकी संगठन JMB देश में सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सिनेमा घरों का विरोध करता है। “लज्जा” उपन्यास की लेखिका तसलीमा नसरीन के खिलाफ 1992 में फतवा जारी किया गया था।

पाकिस्तान

पाकिस्तान मुस्लिम राष्ट्र है, लेकिन वहाँ खुद मुसलमान ही सुरक्षित नहीं हैं। पाकिस्तान में शिया और अहमदिया मुसलमानों के कुरान पढ़ने पर भी रोक है। यहाँ सुन्नी मुसलमानों की अधिकता है। वहाँ धार्मिक अल्पसंख्यकों हिंदू, सिख और ईसाइयों की हालत बहुत ही खराब है। अल्पसंख्यक युवतियों के साथ बलात्कार, अपहरण और मारपीट की घटनाएँ तो आम हैं। अल्पसंख्यकों को डरा-धमकाकर जबरन धर्मांतरण कराया जाता है।

रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान में हिंदुओं पर एट्रोसिटी एक्ट लगाकर उन्हें जबरन जेलों में ठूँस दिया जाता है। वहाँ के धार्मिक अल्पसंख्यक सुन्नी मुसलमानों की असहिष्णुता के सताए हैं। पाकिस्तान में आज भी 1950 जैसै हालात हैं। आजादी के वक़्त पाकिस्तान में हिंदुओं के सबसे बड़े नेता रहे जोगेंद्रनाथ मंडल ने हिंदुओं के खिलाफ एट्रोसिटी के बारे पाकिस्तान की सरकार और वहाँ के प्रधानमंत्री को सूचित किया था।

उन्होंने इस बात का खुलासा किया था कि पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान में हिंदुओं पर अत्याचार बढ़ रहा है। ढाका में 10 फरवरी 1950 को 10,000 हिंदुओं का कत्लेआम किया गया था। मंडल ने एक पत्र में खुलासा किया था कि पाकिस्तान के सिंध और कराची में दलित हिंदू बहुत ही बुरी स्थिति में हैं। सुन्नी मुसलमानों ने 363 हिंदू मंदिरों और गुरुद्वारों को बूचड़खाने में बदल दिया था।

एक अन्य व्यक्ति जो पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों को सामने लाए वो फरहनाज इसपहानी हैं, जिन्होंने पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों से ज्यादती को उजागर किया था। 1977-1980 के दौरान पाकिस्तान के तीसरे मिलिट्री जनरल रहे जिया-उल-हक ने पाकिस्तान के इस्लामीकरण की नीति को लागू किया था। 1998 की जनगणना के मुताबिक पाकिस्तान में हिंदू केवल 1.6 फीसदी और ईसाई 1.59 प्रतिशत थे। एशियन ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट के मुताबिक, “पाकिस्तान के सिंधु प्रांत में हर महीने 20-25 अपहरण होते हैं और हिंदू लड़कियों का धर्म परिवर्तन कराया जाता है।”

पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की रहने वाली आसिया बीबी पहली अल्पसंख्यक क्रिश्चियन महिला थी, जिसे देश द्रोह के केस में फाँसी की सजा हुई थी। 2010 में इस्लामी चरमपंथी भीड़ ने देशद्रोह का आरोप लगाकर पंजाब प्रांत में 7 ईसाइयों को जिंदा जला दिया था। इस हमले में 18 लोग घायल हुए थे और 50 घरों को आग लगा दी गई थी। लाहौर में 2013 में पुलिस के सामने 40 ईसाई घरों को जला दिया गया था। वहाँ शियाओं पर हमले बढ़े हैं, लेकिन मीडिया उसे क्षेत्रवाद की लड़ाई बता रहा है।

पाकिस्तान नेशनल असेंबली की मेंबर फरहनाज इसाफानी का कहना है कि भारत-पाकिस्तान बँटवारे के साथ ही अल्पसंख्यकों पर अत्याचार शुरू हो गया था। अल्पसंख्यकों पर हमला करने वालों के तालिबान और कट्टरपंथियों के साथ सीधे संबंध हैं। शिया और अहमदिया मुसलमान, जिन्हें आधिकारिक तौर पर मुसलमान मानने से इंकार किया गया है। इन सभी को सुसाइड बॉम्ब के जरिए टार्गेट किया जा रहा है।

अमेरिका की ;पाकिस्तान में धार्मिक आजादी’ 2010 की रिपोर्ट के मुताबिक, “धार्मिक अल्पसंख्यकों पर प्रति हिंसा में प्रशासनिक असफलता सबसे बड़ा कारण रहा है। धार्मिक हमलों में हमलावर ऊपरी दवाबों के कारण जल्दी ही छूट जाया करते थे।”

अफगानिस्तान

CDPHR की रिपोर्ट के मुताबिक भारत के पड़ोसी देश अफगानिस्तान में मानवाधिकार की हालत भी बहुत खराब है। यहाँ अल्पसंख्यकों के साथ दोहरा व्यवहार किया जाता है। यह इस बात की गवाही है कि 1970 की जनसंख्या के मुताबिक अफगानिस्तान में हिंदू और सिखों की संख्या करीब 7 लाख थी। अब केवल 200 हिंदू और सिख परिवार रह गए हैं। यहाँ के संविधान में ही लिखा है कि केवल मुस्लिम व्यक्ति ही देश का राष्ट्रपति अथवा प्रधानमंत्री बन सकता है। इसके अलावा अधिकारियों को केवल इस्लामिक सिद्धांतों को ही मानना पड़ेगा।

CDPHR की अध्यक्ष डॉ. प्रेरणा मल्होत्रा के मुताबिक, “अफगानिस्तान में सामाजिक और राजनीतिक कट्टरता बढ़ी है। संवैधानिक दृष्टि से इस देश में केवल मुसलमानों को ही जगह दी गई है, जबकि गैर मुस्लिमों से ऐसे पेश आया जाता है कि जैसे वो उस देश का नागरिक ही न हो।”

90 के दशक में तालिबान का फैलाव अफगानिस्तान में हुआ। इसके बाद देश में बड़े पैमाने पर अल्पसंख्यकों के खिलाफ अत्याचार बढ़ा और लोगों ने पलायन करना शुरू कर दिया। 2016 में वहाँ हिंदुओं और सिखों की संख्या करीब 3000 थी। यह 2020 में घटकर करीब 900 रह गई है।

अफगानिस्तान की कोर्ट में भी अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव किया जाता है। न्याय करने से पहले यह देखा जाता है कि अभियुक्त का धर्म कौन सा है। ‘धार्मिक स्वतंत्रता की आजादी’ पर अमेरिकी आयोग की 2017 की रिपोर्ट में लिखा है, “एक गैर मुस्लिम को कोर्ट कानूनी सहायता तक उपलब्ध नहीं कराता है।”

तिब्बत

तिब्बत के बारे में समूची दुनिया जानती है कि चीन तिब्बतियों के मानवाधिकार को बलपूर्वक किस प्रकार से कुचल रहा है। वह तिब्बती बौद्धों की सामाजिक, आर्थिक, भाषाई और सांस्कृतिक पहचान को खत्म करने की कोशिश कर रहा है। हालाँकि उसने ये कभी स्वीकार नहीं किया। चीन ने चांबो के युद्ध में 1951 में तिब्बत पर कब्जा कर लिया था।

इतिहासकारों के मुताबिक माओजेडॉंग ने सत्ता में आने के लिए तिब्बत पर हमला करने की योजना तैयार की थी। 13वें दलाई लामा ने अपनी कैबिनेट में ये घोषणा की थी कि तिब्बत एक स्वतंत्र राष्ट्र है। 1959 में तिब्बत के लोगों ने चीन के खिलाफ प्रदर्शन किया। जिसके बाद चीन में नरसंहार करते हुए वहाँ हजारों लोगों को मार दिया। इसके बाद 80 हजार तिब्बतियों के साथ दलाई लामा इंडिया चले आए। केंद्रीय योजना आयोग की तिब्बतियन प्रशासन पर 2009 की रिपोर्ट के मुताबिक, “भारत में 94,203 तिब्बती रहते हैं।”

मलेशिया

मलेशिया में भूमिपुत्रों की आबादी कुल जनसंख्या की 69 फीसदी है। इनमें से 51 प्रतिशत मलय समुदाय से हैं। इसके अलावा बोर्नियन और भारतवंशियों की आबादी 17 फीसदी है। 2018 के मलेशिया सांख्यिकी विभाग के मुताबिक, मलेशियन चाइनीज 23 और मलेशियन हिंदू वहाँ केवल 7 फीसदी हैं। मलय मुस्लिमों के समर्थन से बीते कुछ सालों में मलेशिया कट्टर इस्लामीकरण की ओर बढ़ा है। बीते 3 दशक में अब्दुल्ला बडावी के शासनकाल से नजीब रज्जाक और महातिर मुहम्मद (2018-2020) के दौरान मलेशिया में इस्लामिक चरमपंथ बढ़ा है।

यहाँ की स्टेट पॉलिसी के मुताबिक मलेशिया ‘भूमिपुत्र’ की नीति का अनुसरण करता है। इसे वहाँ के दूसरे प्रधानमंत्री अब्दुल रज्जाक हुसैन ने 1970 में लागू किया था। 8 अगस्त 2019 में विवादित इस्लामिक वक्ता जाकिर नाइक ने मलेशिया में अल्पसंख्यक चीनी और भारतीय मलेशियन को ‘मेहमान’ कहा था।

मलेशिया के कोटाबारू में एक सभा में उसने कहा था, “लोग मुझे मेहमान कहते हैं, लेकिन मुझसे पहले तो चीनी मेहमान हैं। वो यहाँ पैदा नहीं हुए। अगर आप चाहते हैं कि नया मेहमान वापस जाए तो पहले पुराने को यहाँ से निकालिए। इसके बाद ही मलेशिया पूरी तरह से इस्लामिक राष्ट्र होगा।”

जाकिर नाइक ने आगे कहा था कि मलेशिया के अल्पसंख्यक हिंदुस्तान के अल्पसंख्यकों से 100 गुना ज्यादा स्वतंत्र हैं। CDPHR की रिपोर्ट के मुताबिक, “नाइक ने अकेले ही मलेशिया के अल्पसंख्यकों का उतना नुकसान कर दिया, जितना कोई अन्य नहीं कर सका।”

1954-2018 तक मलेशियन इंडियन कॉन्ग्रेस सत्ता में रही, लेकिन इसने अपने वादे नहीं पूरे किए। उल्टे भारतीय समुदाय पर भ्रष्टाचार परिवारवाद, दो समुदायों को लड़ाकर राजनीति करने के आरोप इस पर लगे।

श्रीलंका

श्रीलंका में तमिलों की स्थिति किसी से छुपी नहीं है। CDPHR की रिपोर्ट के मुताबिक वहाँ मानवाधिकार और धार्मिक अल्पसंख्यकों की हालत खराब है। 26 साल तक चले गृह युद्ध के कारण वहाँ एक लाख लोग मारे गए थे, जबकि 20,000 तमिल गायब हो गए हैं।

इसकी शुरुआत 1956 से हुई। जब श्रीलंकाई तमिलों के खिलाफ पहला दंगा हुआ। इसके बाद क्रमश: 1958, 1971,1977, 1981 और 1983 में बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक दंगे हुए। 1983 का दंगा बहुत बड़ा अंतरराष्ट्रीय मुद्दा भी बन गया था, क्योंकि उसमें बड़े पैमाने पर हिंसा और मानवाधिकारों का उल्लंघन हुआ था।

इंडोनेशिया

दुनिया के सबसे बड़े मुस्लिम देश इंडोनेशिया में बीते कुछ वर्षों में धार्मिक कट्टरता का स्वरूप भयावह हुआ है। यहाँ पर इस्लामी चरमपंथियों का आतंक बढ़ा है। यहाँ 88% मुस्लिम ही हैं, जो कि पूरी दुनिया की मुस्लिम आबादी का 12.5 फीसदी हैं। 2010 की जनगणना के मुताबिक, इंडोनेशिया में 6 प्रतिशत प्रोटेस्टेंट, 3 फीसदी रोमन कैथोलिक, 2 फीसदी हिंदू, 1 फीसदी बौद्ध, 1 प्रतिशत कंफ्यूशियस और एक फीसदी अन्य हैं।

1945 में स्वतंत्र होने के बाद इंडोनेशिया में मसयूमी पार्टी सत्ता में आई, जो देश की सबसे बड़ी इस्लामिक पार्टी थी। इसने कम्युनिस्टों का देश से सफाया करने के नाम पर 1965-1966 तक बाली और जावा में चीनी और हिंदुओं का जमकर नरसंहार किया। यह नरसंहार कोई तात्कालिक तौर पर होने वाली घटना नहीं, बल्कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए की साजिश के तहत लंबे समय में इसे अंजाम दिया गया। इस्लाम के नाम पर यहाँ देशद्रोह का कानून लाया गया। इसके तहत गैर मुस्लिम समुदाय को टारगेट किया जाता है।

73 फीसदी की तेजी से बढ़ रहा इस्लाम

अमेरिका की शोध संस्था प्यू रिसर्च के एक शोध के मुताबिक दुनिया में जहाँ हिंदू-ईसाइयों की जनसंख्या 34-35 फीसदी की तेजी से बढ़ रही है और बौद्ध मतावलंबियों की संख्या 0.3 प्रतिशत की तेजी से घट रही है। वहीं इस्लाम तेजी से अपने पाँव पसार रहा है। मुस्लिमों की आबादी 73 प्रतिशत की तेजी से बढ़ रही है। यह दुनिया की जरूरत से 150 फीसदी अधिक है।

संस्था के मुताबिक, “अगले 30 सालों में दुनिया की आबादी बढ़कर 930 करोड़ के करीब हो जाएगी। मुस्लिमों की आबादी 3.1 फीसदी की दर से बढ़ रही है, जबकि समाज शास्त्रियों के मुताबिक फर्टिलिटी रेट 2.1 होना चाहिए। ताकि होने वाले 2 बच्चे मां-बाप की मृत्यु के पश्चात उनका स्थान ले लें। इससे धरती पर अतिरिक्त बोझ भी नहीं पड़ेगा। मुसलमानों का फर्टिलिटी रेट 3.1 है, जो दुनिया की आवश्यकता से 150 फीसदी ज्यादा है।”

‘कुछ निर्देशकों ने मेरे साथ सेक्स करने की कोशिश की’: सलमान की Ex-GF ने बॉलीवुड के चाल-चलन पर से उठाया पर्दा

पाकिस्तान फिल्म एक्ट्रेस और सलमान खान की गर्लफ्रेंड रह चुकीं सोमी अली ने एक इंटरव्यू में बॉलीवुड को लेकर चौंकाने वाले दावे किए हैं। उन्होंने बताया कि बॉलीवुड में कई निर्देशकों ने उनका शोषण करने का प्रयास किया, क्योंकि वे जानते थे कि वह बुरे दौर से गुजर रही हैं।

जूम के साथ बॉलीवु़ड पर बातचीत करते हुए सोमी ने कहा, “कुछ निर्देशकों ने मेरे साथ सेक्स करने की कोशिश की। यहाँ मैं एक अपमानजनक रिश्ते में रही। तो हाँ, यह कुल मिलाकर मेरे लिए बुरा था।”

मालूम हो कि 90 के दशक में बॉलीवुड में सोमी अली, सलमान खान से शादी करने के इरादे से आई थीं। यहाँ उन्होंने सलमान को 8 साल डेट भी किया। अली ने कहा कि जब वह सलमान खान के साथ रिश्ते में थी तब उन्होंने उनसे कुछ भी नहीं सीखा और पिछले 5 वर्षों में वह उनके संपर्क में नहीं हैं। लेकिन वह उनकी माँ (सलमा) से बातचीत करती रहती हैं।

सोमी अली ने इससे पहले कहा था कि उनका रिश्ता सलमान खान के धोखा देने के कारण टूट गया था। वह ऐश्वर्या राय के लिए उन्हें धोखा दे रहे थे।

गौरतलब है कि पाकिस्तान के कराची में जन्मी सोमी अली फ़िलहाल अमेरिका में ‘नो मोर टीयर्स’ नामक NGO का संचालन करती हैं। उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया कि 16 वर्ष की उम्र में उनके मुंबई आने का एक ही कारण था– सलमान खान से शादी।

‘बॉम्बे टाइम्स’ को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, “वो 1991 का वर्ष था और मैं मात्र 16 साल की थी। मैंने ‘मैंने प्यार किया’ फिल्म देखी और सोचा कि मुझे इस व्यक्ति से शादी करनी है। मैंने अपनी माँ से कह दिया कि मैं कल ही भारत जा रही हूँ। उन्होंने मुझे मेरे कमरे में भेज दिया, लेकिन मैं विनती करती रही कि मुझे सलमान खान के साथ शादी करने के लिए भारत जाने दो।”

अपने इंटरव्यू में सोमी ने ये भी कहा था कि बॉलीवुड में उनके कारण कुछ रिलेशनशिप भी बर्बाद हुए थे, क्योंकि उन्हें कोई गलत सलाह दे रहा था– जिसकी वो हर बात मानती थीं। सोमी ने बताया कि उनका रिलेशनशिप भी फेल हो गया, जिसके बाद वो 1999 में मियामी लौट गईं। उन्होंने नौवीं कक्षा में पढ़ाई छोड़ दी थी, लेकिन वापस आकर साइकोलॉजी में डिग्री ली।

‘बनारस में तिलक-चोटी वाले खूब मिलेंगे, हर-हर महादेव भी सुनने को मिलेगा’: PM मोदी ने पूछा- फिर क्या करेंगी दीदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार (3 अप्रैल 2021) को पश्चिम बंगाल के हगुली और सोनारपुर में चुनावी रैलियों को संबोधित किया। सोनारपुर में उन्होंने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को निशाने पर लेते हुए कहा कि वह बंगाल में जय श्री राम से चिढ़ती हैं, जबकि बनारस से चुनाव लड़ने पर उन्हें तिलक और चोटी वाले लोग खूब मिलेंगे।

प्रधानमंत्री ने यह तंज टीएमसी सांसद के उस बयान को लेकर कसा में जिसमें उन्होंने कहा था कि ममता अगला चुनाव बनारस से लड़ेंगी। टीएमसी सांसद ने यह बात पीएम मोदी द्वारा ममता के विधानसभा चुनाव में नंदीग्राम के अलावा किसी पर सीट से चुनाव लड़ने को लेकर पूछे गए सवाल के जवाब में कही थी।

पीएम मोदी ने कहा कि दीदी की पार्टी कह रही है कि वो बनारस से चुनाव लड़ेंगी। ऐसे में दो बातें पूरी तरह से साफ हो गई हैं। एक तो यह कि ममता दीदी ने बंगाल में अपनी हार स्वीकार कर ली है और दूसरी कि अब वो बंगाल से बाहर कोई स्थान तलाश रही हैं।

उन्होंने कहा, “बनारस के लोग बड़े ही दयालु हैं। लेकिन दीदी को वहाँ ‘चोटी’ और ‘तिलक’ वाले कई लोगों से मिलना पड़ेगा। ‘जय श्री राम’ का नारा उन्हें परेशान कर देता है लेकिन बनारस में उन्हें हर दो मिनट में ‘हर हर महादेव’ भी सुनना पड़ेगा, तब दीदी क्या करेंगी?”

पीएम मोदी ने यह भी कहा कि संभव है कि उनकी सरकार ने हल्दिया से वाराणसी का जो जलमार्ग बनवाया है उसे देखकर ममता दीदी का मन बनारस की तरफ मुड़ गया हो। ममता बनर्जी के ‘बाहरी लोगों’ के बयान का जवाब देते हुए पीएम मोदी ने यह भी कहा कि उत्तर प्रदेश और बनारस के लोग उन्हें बाहरी भी नहीं कहेंगे। दरअसल कई बार ममता बनर्जी भाजपा के नेताओं को बंगाल में बाहरी कहती आई हैं।

वहीं रायदिघी में रैली को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि हैदराबाद (असदुद्दीन ओवैसी) और फुरफुरा शरीफ (अब्बास सिद्दीकी) को हिन्दू-मुस्लिम वोट बाँटने के लिए भाजपा ने पैसे दिए हैं। यदि आप एनआरसी नहीं चाहते हैं तो इन्हें वोट मत दीजिए, क्योंकि इन्हें वोट देने का मतलब है भाजपा को वोट देना।

ममता ने यह भी कहा कि हिन्दू-मुस्लिम साथ बैठकर चाय पीते हैं और दुर्गा पूजा एवं काली पूजा में भी साथ भाग लेते हैं। यह हमारी संस्कृति है। यदि हमारे गाँव में कोई अस्थिरता होगी तो इसका फायदा भाजपा को ही होगा।

आपको बात दें कि पश्चिम बंगाल में 6 अप्रैल को तीसरे चरण के लिए वोट डाले जाएँगे।  इस चरण में 31 सीटों के लिए मतदान होगा। राज्य में 8 चरणों में मतदान होना है।

हिमाचल प्रदेश: लिफ्ट नहीं दी तो निहंग सिख ने कृपाण से काट दी उँगलियाँ, दूसरे के सिर पर वार

हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले के मांड्याली गाँव में एक निहंग सिख ने छोटी सी बात पर दो स्थानीय लोगों पर जानलेवा हमला बोल दिया। घटना में एक पीड़ित की 4 उँगलियाँ कट गईं तो दूसरे के सिर पर गहरे जख्म आए। 

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, तेज सिंह नामक निहंग सिख ने बुधवार (मार्च 31, 2021) की शाम बलवीर नाम के एक बाइक सवार से श्रीआनंदपुर साहिब जाने के लिए लिफ्ट माँगी। लेकिन बाइक सवार के गाँव से जगह दूर होने के कारण उसने लिफ्ट देने से मना कर दिया। इतनी सी बात पर नाराज होकर तेज सिंह ने अपनी कृपाण निकाली और 40 साल के बलवीर की 4 उँगलियाँ काट दीं। धनीराम ने जब बीच-बचाव किया तो उसके सिर पर भी बुरी तरह हमला किया।

हमले के बाद तेज सिंह जंगलों में भाग गया। मगर, मौके पर मौजूद स्थानीयों ने उसका पीछा किया। उसे पकड़कर मारा, फिर पुलिस के हवाले कर दिया। बिलासपुर पुलिस ने तेज सिंह के ख़िलाफ़ धारा 307 में मुकदमा दर्ज कर केस की जाँच शुरू कर दी है।

वहीं, बलवीर और धनीराम को नैना देवी सिविल अस्पातल में भर्ती करवाकर उन्हें उपचार दिलवाया गया। फिर फर्स्ट एड के बाद उन्हें आनंदपुर साहिब रेफर कर दिया गया। इसके बाद गुरुवार को उन्हें वहाँ से घर भेज दिया गया। बलवीर की कटी हुई उँगलियाँ स्टिच लगाकर जोड़ दी गई, जबकि धनीराम के सिर पर भी टाँके लगे हैं।

भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक घटना वाले दिन की सारी बात बताते हुए बलवीर ने कहा,

“बुधवार शाम की बात है। बाइक में पेट्रोल डलवाने के बाद मैं घर के लिए रवाना हुआ। इसी दौरान एक निहंग ने मुझे रोका। रुकते ही वह बिना पूछे बाइक पर बैठ गया और श्री आनंदपुर साहिब जाने को कहा। मैंने कहा कि मुझे मांड्याली तक ही जाना है। यह सुनकर निहंग गुस्से में आ गया और बाइक से उतरकर डंडे से हमला किया। मैं कुछ समझ पाता, निहंग ने कृपाण से वार कर दिया। जान बचाने के प्रयास में तलवार के वार से मेरे बाएँ हाथ की चार उँगलियाँ कट गईं। साथ लगते एक घर में धार्मिक कार्यक्रम के चलते कुछ लोग पास ही मौजूद थे। लोगों के वहाँ पहुँचने से पहले ही निहंग जंगल की ओर भाग गया।”

बलवीर पर हमले के बाद जंगल की तरफ भाग रहे निहंग सिख ने धनीराम पर हमला किया। धनीराम उसे पकड़ने की कोशिश कर रहे थे। निहंग सिख ने धनीराम के सिर पर कृपाण से मारा। दोनों को चोट पहुँचाने के बाद वह जंगल में चला गया। बाद में स्थानीयों ने पकड़कर उसे पुलिस के हवाले किया।

बता दें कि हाल ही में पंजाब में निहंग सिखों के हमले में कई पुलिसकर्मी घायल हुए थे। वहाँ निहंग सिखों ने अचानक से हमला कर थाना प्रभारी की कलाई काट दी थी और उनकी दूसरी कलाई पर भी गंभीर जख्म आए थे। 

‘शरीयत होता तो सरेआम गर्दन-जुबान काट लटका दिया जाता’: AAP के अमानतुल्लाह ने डासना मंदिर के महंत के खिलाफ की शिकायत

आम आदमी पार्टी (AAP) के विधायक अमानतुल्लाह खान ने पैगंबर मोहम्मद पर कथित आलोचनात्मक टिप्पणियों के लिए डासना देवी मंदिर के प्रमुख महंत यति नरसिंहानंद सरस्वती के खिलाफ दिल्ली के जामिया नगर थाने में शिकायत दर्ज कराई है। इससे पहले AAP नेता ने महंत की जुबान और गर्दन काटने की माँग की थी।

अमानतुल्लाह खान ने ट्विटर पर वीडियो शेयर कर बताया कि नरसिंहानंद की गुस्ताखी के लिए उनके ख़िलाफ़ जामिया नगर में लिखित शिकायत दर्ज कराई गई है। उसने कहा है,

“यति नरसिंहानंद ने जो पैगंबर मोहम्मद की शान में गुस्ताखी की है, उसके लिए हुक्म है कि उसका सिर कलम कर दिया जाए या उसकी जुबान काट ली जाए। लेकिन संविधान पर हमें भरोसा है। उम्मीद है कि उसके ऊपर कार्रवाई करके उसे जेल भेजा जाएगा। हम सारे धर्म के गुरुओं- श्रीराम, श्रीकृष्ण सभी का सम्मान करते हैं। इसलिए हम नहीं चाहते हैं किसी भी धर्म को मानने वाला हमारे धर्म गुरु… की शान में गुस्ताखी करे। शरीयत अगर यहाँ होता तो इस शख्स को सरेआम गर्दन काट कर, जुबान काटकर लटका दिया जाता। पर हम कानून का सम्मान करते हैं और वो इसकी इजाजत नहीं देता, इसलिए मैं यहाँ आया हूँ। आला अधिकारी से अपील करता हूँ कि इस शख्स ने मुल्क के माहौल को बिगाड़ने की कोशिश की है। मुसलमानों के दिल को ठेस पहुँची है, तकलीफ हुई है क्योंकि हम किसी भी हाल में ये गुस्ताखी बर्दाश्त नहीं कर सकते।”

यति नरसिंहानंद पर कार्रवाई को लेकर एक तरफ जहाँ अमानतुल्लाह खान आला अधिकारियों से मिल रहे हैं। वहीं भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने कहा है, “स्वामी यति नरसिंहानंद को हाथ भी लगाने की गलती मत करना। ये देश किसी किताब से नहीं, केवल संविधान से चलेगा।”

बता दें कि एफआईआर कराने से पहले आज सुबह अमानतुल्लाह खान ने ट्विटर पर लिखा, “हमारे नबी की शान में गुस्ताखी हमें बिल्कुल बर्दाश्त नहीं, इस नफ़रती कीड़े की ज़ुबान और गर्दन दोनों काट कर इसे सख़्त से सख़्त सजा देनी चाहिए। लेकिन हिंदुस्तान का कानून हमें इसकी इजाज़त नहीं देता, हमें देश के संविधान पर भरोसा है और मैं चाहता हूँ कि दिल्ली पुलिस इसका संज्ञान ले।” 

आप नेता का यह कट्टर बयान यति नरसिंहानंद सरस्वती की एक वीडियो पर आया। इसमें वह प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित एक कार्यक्रम में बोल रहे थे। यहाँ उन्होंने पैगंबर मोहम्मद की असलियत को उजागर करने के लिए हिंदुओं से निडर होने का आग्रह किया। यति नरसिंहानंद सरस्वती ने कहा:

“अगर इस्लाम की असलियत, जिसके लिए मौलाना कहते हैं कि अगर मोहम्मद के बारे बोला तो सिर काट देंगे… हिंदू ये भय अपने दिमाग से निकाल दें। हम हिंदू हैं। हम राम के चरित्र की मीमांसा कर सकते हैं, हम परशुराम के चरित्र की मीमांसा कर सकते हैं, तो हमारे लिए मोहम्मद क्या चीज है? हम मोहम्मद की मीमांसा क्यों नहीं करेंगे और क्यों सच नहीं बोलेंगे?”

उन्होंने आगे कहा,

“अगर आज मोहम्मद का सच दुनिया के मुसलमान को चल जाए तो उसे अपने मुसलमान होने पर शर्म आएगी। क्योंकि भगवान हर इंसान के अंदर एक अंतरात्मा देता है, जिसे पता होता है कि क्या अच्छा है, क्या बुरा है और जब किसी इंसान को पता चलेगा कि वो केवल एक चोर, लुटेरे, बलात्कारी को, औरतों की सौदागरी करने वाले को फॉलो कर रहा था, तो उसे शर्म आएगी। ये तो हिंदुस्तान के घटिया नेता और नकली धर्मगुरु हैं, जिन्होंने इस्लाम जैसी गंदगी का महिमामंडन कर दिया। अगर इस्लाम के बारे में खुल कर बोला जाता तो आज हम मुसलमान को अपने मुसलमान होने पर शर्म आती। उसे शर्म आती कि वो हिंदुओं के खाने में थूक रहा है, उसे शर्म आती कि उसने अपने भाई जैस दोस्त की पत्नी और बेटी पर गंदी निगाह डाली।”

इसरो जासूसी केस में रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के हवाले: 27 साल पहले तबाह कर दी थी वैज्ञानिक नाम्बी नारायणन की जिंदगी

27 साल पुराने चर्चित इसरो जासूसी केस (ISRO Espionage Case) में उच्च स्तरीय समिति ने अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंप दी है। तीन सदस्यीय समिति का गठन शीर्ष अदालत ने ही 14 सितंबर 2018 को किया था। पूर्व जज डीके जैन की अगुवाई वाली समिति को वैज्ञानिक नम्बी नारायणन (Nambi Narayanan) के खिलाफ साजिशों में केरल के पुलिस अधिकारियों की भूमिका की पड़ताल का जिम्मा सौंपा गया था।

मीडिया रिपोर्टों में सूत्रों के हवाले से सुप्रीम कोर्ट को रिपोर्ट सौंपे जाने की जानकारी दी गई है। सुप्रीम कोर्ट ने इस समिति का गठन करने के साथ-साथ केरल सरकार को नारायणन को अपमानित करने और असहनीय पीड़ा देने के लिए 50 लाख रुपए का मुआवजा देने के भी निर्देश दिए थे।

नम्बी नारायणन की गिरफ्तारी 1994 में केरल में कॉन्ग्रेस शासन के दौरान हुई थी। अब इसी मामले में ढाई साल की जाँच के बाद समिति ने सीलबंद लिफाफे में उच्चतम न्यायालय को अपनी रिपोर्ट दी है। इसमें गिरफ्तारी के समय की परिस्थितियों की जाँच की गई है।

इससे पहले सीबीआई ने नारायणन की गैरकानूनी गिरफ्तारी के लिए केरल में तत्कालीन शीर्ष पुलिस अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया था। वहीं इस केस के बाद कुछ लोगों ने तत्कालीन मुख्यमंत्री के करुणाकरण पर निशाना साधा था, जिसकी वजह से उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था।

ISRO जासूसी केस

घटना 30 नवंबर 1994 की है। कुछ पुलिस वाले नम्बी नारायणन के घर पर आ धमके। उन्होंने कहा कि DIG आपसे बात करना चाहते हैं। जब नारायणन ने पूछा कि क्या उन्हें गिरफ्तार किया जा रहा है तो पुलिसकर्मियों ने ना में जवाब दिया। उन्हें पुलिस की गाड़ी में आगे बिठा कर ले जाया गया (अपराधियों को अक्सर पीछे बिठाया जाता है)। असल में उससे पहले 20 अक्टूबर को मरियम रशीदा नामक मालदीव की एक महिला को गिरफ्तार किया गया था।

बताया गया था कि वो एक जासूस है और ISRO में कुछ संपर्कों के जरिए वो पाकिस्तान को भारतीय रॉकेट तकनीक की बारीकियाँ सप्लाई कर रही है। 13 नवंबर को उसी साल फौजिया हुसैन नामक मालदीव की एक और महिला को गिरफ्तार किया गया, जो मरियम की दोस्त थी। नम्बी नारायणन तब क्रायोजेनिक इंजन प्रोजेक्ट के मुखिया और लिक्विड प्रोपल्शन सिस्टम्स के डायरेक्टर इन चार्ज हुआ करते थे।

उस समय नारायणन के साथ दो अन्य वैज्ञानिकों डी शशिकुमारन और के चंद्रशेखर को भी गिरफ्तार किया गया था। इन तीन वैज्ञानिकों के अलावा रूसी स्पेस एजेंसी का एक भारतीय प्रतिनिधि एसके शर्मा, एक लेबर कॉन्ट्रैक्टर और फौजिया हसन नामक एक व्यक्ति की भी गिरफ्तारी हुई थी। इन सभी पर पाकिस्तान को इसरो के रॉकेट इंजन की सीक्रेट जानकारी देने के आरोप लगाए गए थे।

पूरे मामले की जाँच के दौरान नम्बी नारायणन को 50 दिनों तक हिरासत में रखा गया था और काफी यातनाएँ दी गई थीं। लेकिन पूरी कहानी में ट्विस्ट आया 1996 में। सीबीआई ने अप्रैल 1996 में चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट को बताया कि यह पूरा मामला फर्जी है। जो भी आरोप लगाए गए हैं उसके कोई सबूत नहीं हैं।

इसके बाद कोर्ट ने इसरो जासूसी केस में गिरफ्तार किए गए सभी आरोपितों को रिहा कर दिया था। लेकिन नम्बी नारायणन को रिहाई से संतुष्टि नहीं थी। वो अपने ऊपर लगा गद्दारी का दाग धोना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने लंबी कानूनी लड़ाई की ओर जाने का फैसला किया। उनकी यह लड़ाई चली भी सच में बहुत लंबी– 24 साल और सुप्रीम कोर्ट तक। देश की सर्वोच्च न्यायालय ने 14 सितंबर 2018 को कहा कि नारायणन को केरल पुलिस ने बेवजह गिरफ्तार किया और उन्हें मानसिक प्रताड़ना दी।

इस मामले में साल 2019 में पूर्व रॉ अधिकारी ने भारत के उप-राष्ट्रपति रहे हामिद अंसारी पर भी कई गंभीर आरोप लगाए थे। पत्रकार चिरंजीवी भट ने पूर्व रॉ अधिकारी एनके सूद से बातचीत की थी, जिसमें उन्होंने हामिद अंसारी के क़रीबी द्वारा वैज्ञानिक नाम्बी नारायणन को बदनाम करने और उनका करियर तबाह करने की बात का खुलासा किया। (आप पूरे इंटरव्यू को हूबहू यहाँ पढ़ सकते हैं) पूर्व रॉ अधिकारी ने पत्रकार चिरंजीवी भट से बात करते हुए कहा:

“रतन सहगल नामक व्यक्ति हामिद अंसारी का सहयोगी रहा है। आपने नम्बी नारायणन का नाम ज़रूर सुना होगा। उन पर जासूसी का आरोप लगा था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनके ख़िलाफ़ लगे सारे आरोपों को निराधार पाया था। वे निर्दोष बरी हुए। लेकिन, किसी को नहीं पता है कि उनके ख़िलाफ़ साज़िश किसने रची? ये सब रतन सहगल ने किया। उसने ही नम्बी नारायणन को फँसाने के लिए जासूसी के आरोपों का जाल बिछाया। ऐसा उसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि बिगाड़ने के लिए किया। रतन जब आईबी में था तब उसे अमेरिकन एजेंसी सीआईए के लिए जासूसी करते हुए धरा जा चुका था। अब वह सुखपूर्वक अमेरिका में जीवन गुजार रहा है। वह पूर्व-राष्ट्रपति अंसारी का क़रीबी है और हमें डराया करता था। वह हमें निर्देश दिया करता था।”

फिलहाल नारायणन अपनी जिंदगी पर बनी फिल्म को लेकर भी चर्चा में है। बॉलीवुड और तमिल फिल्मों में भिनय का लोहा मनवा चुके रंगनाथन माधवन ने बतौर निर्देशक अपनी पारी शुरू की फिल्म ‘रॉकेट्री – द नम्बी इफ़ेक्ट’ से। इसका ट्रेलर आ गया है और इसे सोशल मीडिया पर अच्छी प्रतिक्रिया भी मिल रही है। यह फिल्म पद्म भूषण से सम्मानित नारायणन की बायोपिक है।

दिल्ली में कोई भी नया अस्‍पताल, फ्लाईओवर नहीं बनवाया: AAP की खुली पोल, 2015-19 के बीच RTI से बड़ा खुलासा

दिल्ली की सत्ता पर काबिज आम आदमी पार्टी एक बार फिर से सवालों के घेरे में है। केजरीवाल सरकार पर आरोप है कि उन्होंने 2015 से 2019 के बीच कई समस्‍याओं के बावजूद दिल्ली में कोई भी नया अस्‍पताल और फ्लाईओवर नहीं बनाया है। दिल्ली सरकार के विकास के चौतरफा झूठे दावों का खुलासा आरटीआई (RTI) में हुआ है।

सत्ता में आने से पहले ‘आप’ ने दिल्ली की जनता से कई लोक लुभावन वायदे किए थे, जो अब तक धरातल पर नजर नहीं आए। वहीं, सीएम केजरीवाल ने दावा किया है कि पिछले साढ़े चार साल में उनकी सरकार ने 23 फ्लाईओवर बनाए हैं, लेकिन वास्तविकता इसके उलट है कि दिल्ली में AAP सरकार ने वर्षों से केवल विज्ञापन ही दिया है।

तेजपाल सिंह ने आरटीआई याचिका में इस संबंध में सवाल पूछे थे। जब संबंधित विभागों ने अपने-अपने जवाब भेज दिए तो यह पक्का हो गया कि AAP सरकार द्वारा लगातार किए गए लोक लुभावन दावों के विपरीत ना तो कोई अस्पताल बनाया गया और ना ही 2015 से 2019 के बीच दिल्ली में किसी फ्लाईओवर का निर्माण किया गया।

दिल्ली सरकार द्वारा पिछले 5 वर्षों में स्वास्थ्य सुविधाओं को सुदृढ़ करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं, इसकी जानकारी लेने के लिए साल 2019 में यह आरटीआई दायर की गई थी। नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई) की दिल्ली इकाई के अध्यक्ष अक्षय लाकड़ा ने आरटीआई द्वारा 3 जुलाई 2019 को पूछे गए सवालों के जवाबों की प्रति को शुक्रवार (2 अप्रैल, 2021) को ट्वीट किया है।

उन्होंने लिखा है, ”RTI से खुलासा हुआ कि 1 अप्रैल 2015 से लेकर 31 मार्च 2019 के बीच दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार ने ना ही किसी हॉस्पिटल को अनुदान दिया और न ही किसी नए फ्लाईओवर का निर्माण करवाया। बस झूठे विज्ञापन दे-दे कर जनता को मूर्ख बना लिया और जनता भी इसकी बातों में आ गई।”

गौरतलब है कि ‘आप’ ने चुनावी वायदे करते हुए जनता को कई मुफ्त योजनाओं का प्रलोभन दिया था। बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएँ मुहैया कराने को प्राथमिकता बताते हुए उन्होंने इसे चुनावी अभियान के रूप में इस्तेमाल किया। साल 2015 में चुनावी घोषणापत्र में ‘आप’ ने राजधानी के अस्पतालों में कुल बिस्तरों की संख्याा 40,000 तक बढ़ाने का वादा किया था।

मिलिए येल के प्रोफेसर मुबारक से, बांग्लादेश में मंदिरों पर इस्लामी कट्टरपंथियों के हमले का दोष मोदी के मत्थे डाला

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बांग्लादेश दौरे के विरोध में इस्लामी कट्टरपंथियों ने न केवल हिंसक प्रदर्शन किए थे, बल्कि मंदिरों को भी निशाना बनाया था। इसमें हिफाजत-ए-इस्लामी नामक संगठन की खास भूमिका थी। पाकिस्तानी इशारों पर काम करने वाला यह कट्टरपंथी संगठन बांग्लादेश में इस्लामिक हुकूमत की वकालत करता है।

अब इस हिंसा को जायज ठहराने की कोशिश येल यूनिवर्सिटी में इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर अहमद मुशफिक मुबारक ने की एक सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए की है। पोस्ट में उन्होंने हिफाजत की हिंसा का बचाव करते हुए इसके लिए मोदी के दौरे को जिम्मेदार ठहराया है।

मुबारक के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

मुबारक ने 29 मार्च को किए गए ट्वीट में लिखा है कि बांग्लादेश मोदी के बुने हुए जाल में फँस गया। मोदी ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में वोट करने वाले कुछ बंगालियों के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले मंदिर की यात्रा की। उनकी इस यात्रा से बांग्लादेश में सांप्रदायिक दंगे प्रारंभ हो गए। मुबारक यहीं नहीं रुका। उसने कहा कि मोदी पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश सीमा के दोनों ओर सांप्रदायिक माहौल बनाने में सफल रहे। क्यों हम हिन्दू-मुस्लिम के बीच विभाजनकारी राजनीति का हिस्सा बन रहे हैं? येल के इस प्रोफेसर ने कहा कि बांग्लादेश में हुई हिन्दू-विरोधी हिंसाओं के जिम्मेदार पीएम मोदी ही हैं।

बांग्लादेश में हिफाजत-ए-इस्लाम के द्वारा हिंदुओं के विरुद्ध की गई हिंसा की रिपोर्ट्स मीडिया में आने के बाद मुबारक ‘सेक्युलर’ बन गया और भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान में सुधार की बाते करने लगा। उसने हिन्दू मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर हुए इस्लामी हमले को नजरअंदाज करते हुए कहा कि बेहतर होगा यदि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों को सुरक्षित रखने में मुसलमान आगे आएँ और भारत में अल्पसंख्यकों के साथ हो रहे व्यवहार के विरुद्ध हिन्दू अपनी आवाज उठाएँ। उसने आगे कहा कि यदि अल्पसंख्यकों के लिए मजबूती से आवाज उठाई जाए तो बांग्लादेश का हिफाजत-ए-इस्लाम, भारत में मोदी और पाकिस्तान के मुल्ला हमें कभी भी बाँट नहीं पाएँगे।

मुबारक के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

मुबारक की इस गैर-तार्किक और मुस्लिमों के संतुलन के लिए की गई तुलना पर उसकी आलोचना भी हुई। कई सोशल मीडिया यूजर्स ने उसे आइना दिखाया।

प्रदीप नाम के एक ट्विटर यूजर ने लिखा कि म्यांमार में रोहिंग्या, हिंदुओं को मार रहे हैं लेकिन वे ही विक्टिम हैं। प्रदीप ने मुबारक को कहा कि यदि वह मुसलमानों को विक्टिम मानने की मानसिकता को छोड़ दे तो उसे पता चलेगा कि मुस्लिम सबसे सुरक्षित भारत में ही हैं।   

ट्वीट का स्क्रीनशॉट

एक यूजर ने लिखा कि भारत में मुस्लिम नेता जामा मस्जिद या अजमेर शरीफ जाते हैं, तब तो कोई हिन्दू इस पर प्रश्न नहीं करता और न ही सांप्रदायिक होता है। यूजर ने मुबारक से कहा कि या तो वह अज्ञानी है अथवा हिन्दूफोबिक।

ट्वीट का स्क्रीनशॉट

सैंडी नाम के एक यूजर ने मुबारक का जवाब देते हुए लिखा कि भारत की तुलना अन्य देशों से करने से पहले वह भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की स्थिति को सन 1947 में और वर्तमान में देखे। उसे समझ आ जाएगा कि पाकिस्तान और बांग्लादेश में अल्पसंख्यक मुट्ठी भर हैं, जबकि भारत में उनकी संख्या दुगुनी हो चुकी है।

ट्वीट का स्क्रीनशॉट

हिन्दू श्मशान और मंदिर पर इस्लामिक हमला :

पीएम मोदी की दो दिवसीय बांग्लादेश की यात्रा के दौरान इस्लामिक संगठन द्वारा उनके विरोध में हिन्दू मंदिरों पर हमला किया गया। यात्रा समाप्त होने के बाद भी हमले जारी रहे। मगुरा जिले के मोहम्मदपुर में 400 वर्ष पुराने अष्टग्राम महा श्मशान और राधगोबिंद आश्रम में तोड़ फोड़ की गई और उनके कई हिस्सों को आग के हवाले कर दिया गया। इस घटना में रथ और भगवान की मूर्तियाँ भी जल कर रख हो गईं थी। इस हिन्दू विरोधी हिंसा के पीछे हिफाजत-ए-इस्लाम का हाथ था जो हिंदुओं के प्रति अपनी घृणा के लिए जाना जाता रहा है।

‘वोट न बँटने दें’: थर्ड फेज से पहले ‘गोत्र’ वाली ममता ने बदली चाल, मुस्लिम ‘भाई-बहनों’ को किया याद

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के तीसरे चरण की सीटों पर 6 अप्रैल को वोट पड़ेंगे। उससे पहले ममता बनर्जी ने ‘मुस्लिम भाई-बहनों’ को याद किया है। उनसे अपना वोट नहीं बँटने देने की अपील की है।

वैसे मुस्लिम तुष्टिकरण ममता बनर्जी की राजनीति का अहम पहलू रहा है। लेकिन ‘जय श्रीराम’ के नारे से बिदकने वाली बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पहले दो चरण के चुनावों में अपने हिंदू होने की दुहाई देते नजर आईं थी। न केवल वे मंदिर जाते, चंडी पाठ करते दिखीं बल्कि मतदाताओं को यह भी बताया कि वे किस गोत्र से ताल्लकुक रखती हैं।

अब सारी स्थिति देखते हुए वह एक बार फिर अपने पुराने एजेंडे पर लौट आईं हैं। समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार नॉर्थ परगना की एक चुनाव रैली में उन्होंने कहा, “मैं सभी अल्पसंख्यक भाइयों और बहनों से अनुरोध करती हूँ कि वे अपना वोट न बॅंटने दें।”

बता दें कि ममता बनर्जी ने पूरे चुनाव में भाजपा पर लगातार ‘जय श्रीराम’ नारे के कारण विभाजनकारी राजनीति करने का आरोप लगाया है। लेकिन अब सवाल है कि वह खुद अलग से मुस्लिम वोटरों से अपील करके कौन सी धर्मनिरपेक्षता की नई परिभाषा गढ़ रही हैं। शायद ममता बनर्जी को पता लगने लगा है कि इन चुनावों के बाद सत्ता उनके हाथ से निकल जाएँगी, इसलिए उन्हें तीसरे चरण से पहले अपने मुस्लिम भाई-बहनों की याद आ गई।

उल्लेखनीय है कि बंगाल विधानसभा चुनाव का मुख्या मुकाबला तृणमूल कॉन्ग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच होता नजर आ रहा है। लेकिन दो अन्य गुट भी हैं जो राज्य में मुस्लिमों से वोट पाने की आस लगाए बैठे हैं। पहली असुद्दीन ओवैसी की AIMIM है, जिसके कारण ममता बनर्जी को डर है कि उनके वोट ओवैसी की पार्टी ले जाएगी। दूसरा गुट CPIM, कॉन्ग्रेस और अब्बास सिद्दिकी का गठबंधन है। कहा जा रहा है कि बंगाल में अब्बास सिद्दकी की 30-35 सीटों पर अच्छी पकड़ है।

इन्हीं दो गुटों के कारण ममता बनर्जी को अपना मुस्लिम वोट बैंक बँट जाने का डर है। यही वजह है कि उन्होंने राज्य में भाजपा के बढ़ते प्रभाव को देख खुलेआम अपने भाई-बहनों को याद किया है।

मालूम हो कि कुछ समय पहले बंगाल की मुख्यमंत्री ने स्वयं स्वीकारा था कि वह राज्य में भाजपा को अकेले नहीं हरा पाएँगी, इसलिए उन्हें विपक्षी पार्टियों का साथ चाहिए। उन्होंने इस संबंध में बड़ी विपक्षी पार्टियों को खत लिखकर समर्थन माँगा था। ये पत्र पहले चरण के बाद लिखा गया था।

ममता ने यह खत 15 गैर भाजपा नेताओं को भेजा था। इसमें कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी, एनसीपी प्रमुख शरद पवार, डीएमके चीफ एमके स्टालिन, झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, ओडिशा के सीएम नवीन पटनायक, आँध्र प्रदेश के सीएम जगन मोहन रेड्डी, राजद प्रमुख तेजस्वी यादव, सपा प्रमुख अखिलेश यादव और नेशनल कॉन्फ्रेंस के फारूक अब्दुल्ला के साथ पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती भी शामिल थीं।

महाराष्ट्र के बाद अब छत्तीसगढ़ में भी बेकाबू हुआ कोरोना: दुर्ग जिले में नहीं मिल रही शवों के अंतिम संस्कार के लिए जगह

भारत में कोरोना की चौथी लहर ने कई राज्यों की स्थिति चिंताजनक बना दी है। सिर्फ़ पिछले 24 घंटों की बात करें तो यहाँ कुल 89,129 मामले रिपोर्ट किए गए। वहीं 714 लोगों को इस संक्रमण के कारण जान गँवानी पड़ी। 

स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, देश में इस हफ्ते की शुरुआत में कोरोना वायरस संक्रमण के कुल 1 करोड़ 20 लाख 39 हजार 644 मामले थे। लेकिन सिर्फ 5 दिनों के अंदर ही देश में कोरोना के 3,52,616 नए मामले रिपोर्ट हुए। इन 5 दिनों में ही कोरोना की वजह से 2,267 मौतें भी हुईं।

हाल में कैबिनेट सचिव राजीव गौबा के साथ स्वास्थ्य सचिव राजेश भूषण ने देश में कोरोना के मौजूदा हालातों पर विस्तृत रिपोर्ट पेश करके 11 राज्य में स्थिति को चिंताजनक बताया था।

इन 11 राज्यों में महाराष्ट्र, पंजाब, कर्नाटक, केरल, छत्तीसगढ़, चंडीगढ़, गुजरात, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, दिल्ली और हरियाणा शामिल हैं। केंद्र सरकार ने राज्य प्रशासन से अपने अपने प्रदेश में टीकाकरण में तेजी लाने को कहा है। 31 मार्च तक इन राज्यों की कोविड मामलों में 90 फीसदी और बीमारी के चलते होने वाली मौतों में 90.5 फीसदी की भागीदारी रही है।

स्वास्थ्य सचिव राजेश भूषण ने बताया कि मार्च में कोरोना संक्रमण में बढ़ोतरी की दर 6.8 फीसद तक पहुँच गई है, जो पिछले साल के जून में सबसे अधिक वृद्धि दर 5.5 फीसद से भी अधिक है। इसी तरह से कोरोना के कारण होने वाली मौतों में भी 5.5 फीसद की बढ़ोतरी देखी गई है।

11 राज्यों में कोरोना की स्थिति

महाराष्ट्र में कोरोना की स्थिति दिन पर दिन हाथ से निकल रही है। शुक्रवार को अकेले महाराष्ट्र से 47,827 केस आए जबकि पूरे अमेरिका में 69,986 केस दर्ज किए गए। यानी महाराष्ट्र से कवेल कुछ हजार ज्यादा केस।

इस समय महाराष्ट्र कुल मौतों के मामले में भी वैश्विक स्तर पर 14वें स्थान पर पहुँच गया है। वहाँ मरने वालों की संख्या 55,379 हो गई है और कुल संक्रमितों की संख्या में 29 लाख 4 हजार 76 है। कोरोना मरीजों के मामले में महाराष्ट्र 10 वें नंबर है। इससे ऊपर सूची में सिर्फ़ अमेरिका, ब्राजील, फ्रांस, रूस और ब्रिटेन हैं।

महाराष्ट्र के बाद कोरोना वायरस के कारण छत्तीसगढ़ सबसे ज्यादा प्रभावित प्रदेश होता जा रहा है। शुक्रवार को छत्तीसगढ़ में कोरोना वायरस के 4 हजार 174 नए मामले रिपोर्ट किए गए। जिसके बाद कुल कोरोना संक्रमितों की संख्या वहाँ 3 लाख 57 हजार 978 तक पहुँच गई।

यहाँ के दुर्ग जिले का ऐसा हाल है कि कोरोना से मौतों का आँकड़ा बेकाबू हो रहा है। दुर्ग जिले में 964 मामले आए हैं। स्थिति ऐसी हो चुकी है कि वहाँ अंतिम संस्कार के लिए श्मशान घाट और कब्रिस्तानों में जगह नहीं मिल पा रही। प्रशासन ने यहाँ 6 अप्रैल से 14 अप्रैल तक के लिए लॉकडाउन लगा दिया है

समाचार एजेंसी एएनआई को दुर्ग जिला कलेक्टर ने बताया, “इससे पहले अंतिम संस्कार दो जगहों पर हो रहे थे। बीते दो दिनों में कोरोना से मौतों का आँकड़ा बढ़ गया है और बहुत से शवों को श्मशान घाट लाया जा रहा है। हम अंतिम संस्कार के लिए 2-3 और जगहों का प्रबंध कर रहे हैं।”

दिल्ली में कोरोना के मामलों में बहुत तेजी से बढ़ोतरी हुई है। शुक्रवार को दिल्ली में कोरोना के 3,594 नए केस आए, जो कि इस साल सबसे ज्यादा हैं। इससे पहले आखिरी बार 4 दिसंबर को दिल्ली में सबसे ज्यादा 4 हजार 67 मामले दर्ज किए गए थे।

कर्नाटक में कोविड 19 से जुड़ी नई गाइडलाइन जारी कर दी गई है। राज्य में सिनेमा हॉल, पब, बार, क्लब और रेस्ट्रॉन्ट आदि को 50 प्रतिशत क्षमता के साथ संचालित किए जाने के निर्देश दिए गए हैं। वहीं, जिम और स्विमिंग पूलों को पूरी तरह से बंद करने का आदेश दिया गया है। शुक्रवार को वहाँ 4,991 मामले सामने आए और 6 लोगों की मौत हो गई।

इसी तरह शुक्रवार को गुजरात में 2,640 मामले दर्ज किए गए। पंजाब में ये संख्या 2,903 रही तमिलनाडु में भी शुक्रवार को कोरोना संक्रमितों का आँकड़ा 3 हजार पार गया। इसी प्रकार मध्य प्रदेश में 2,777 मामले सामने आए

हरियाणा में वैक्सीन का काम तेजी से चलने के बावजूद वहाँ शुक्रवार को 1861 केस सामने आए हैं। हालाँकि राज्य में 17 लोगों को वैक्सीन डोज लगाई जा चुकी है। केरल में आज 2506 कोरोना के नए मामले सामने आए हैं। वहाँ कुल 26,407 एक्टिव केस हैं। चंडीगढ़ में भी कोरोना संक्रमितों की संख्या 3 हजार पार कर गई है।