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बनारस की अड़भंगी चिता-भस्म होली: 11 तस्वीरों और 5 वीडियो से समझिए काशी की परंपरा, जहाँ मृत्यु भी है उत्सव

बनारस की होली भी बनारस के मिजाज के अनुसार ही अड़भंगी और निराली है। यह दुनिया का इकलौता शहर जहाँ अबीर, गुलाल के अलावा धधकती चिताओं के बीच चिता-भस्म से होली खेली जाती है। घाट से लेकर गलियों तक आती-जाती चिताओं के साथ मृत्यु को भी उत्सव का स्वरुप मानते हुए होली के हुड़दंग का हर रंग मनमोहक होता है।

महादेव की नगरी काशी की होली भी अड़भंगी शिव की तरह ही निराली है। काशी में रंगभरी एकादशी के दूसरे दिन महाश्मशान में होली खेली जाती है। यह दुनिया की सबसे अनूठी होली है। महादेव के भक्त, अनुयाई, शैव, शाक्त, अवघड़ सब भूतभावन भगवान के साथ इस होली में शामिल होते हैं।

फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को रंगभरी एकादशी कहा जाता है। इस वर्ष रंगभरी एकादशी बुधवार (मार्च 24, 2021) थी और महाश्मशान की होली गुरुवार (मार्च 25, 2021) को महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर मनाई जा रही है।

ऐसी मान्यता है कि जब भगवान शिव रंगभरी एकादशी के दिन माता पार्वती और पुत्र गणेश के साथ गौना कराकर काशी लौटते हैं तो उनका स्वागत सभी लोकों के लोग करते हैं लेकिन उसमें शिव के भूत-पिशाच भक्त गण और दृश्य-अदृश्य आत्माएँ मौजूद नहीं होतीं।

इसलिए, रंगभरी एकादशी के दूसरे दिन महाश्मशान में महादेव अपने भक्तों के साथ भस्म से होली खेलते हैं। यह भस्म कोई साधारण भस्म नहीं होती, बल्कि इंसान के शव जलने के बाद पैदा होने वाली राख होती है।

बनारस में कहा जाता है कि महादेव कितनी भी मस्ती में क्यों न हों लेकिन अपने दृश्य-अदृश्य उन गणों को उत्सव में बिसरा दें यह हो नहीं सकता। वे गण जो थोड़े डरावने हैं।

वही जो बिना बुलाए जब शिव बारात में सब चलें गए तो द्वारचार में माँ गौरा की माँ ऐसी बारात और बारातियों को देखकर बेहोश हो गई थीं। उनके साथ शिव आज उत्सव मनाते हैं।

इसलिए, कहा जाता है कि गौना में ऐसे भूत-पिचास, अदृश्य आत्माएँ थोड़ी दूरी बना लेती हैं ताकि सब सकुशल संपन्न हो जाए। आज महाश्मशान मणिकर्णिका में ऐसे ही गणों का उत्सव है।

अब अपने उन्हीं गणों के लिए भूतभावन भगवान महादेव गौना के अगले दिन यानी रंगभरी एकादशी के एक दिन बाद महाश्मशान मणिकर्णिका पर स्वयं अपने दृश्य-अदृश्य गणों के साथ उत्सव मनाने अर्थात होली खेलने आते हैं।

भारतीय सनातन संस्कृति की इसी परंपरा पर बात करते हुए पद्म विभूषण से सम्मानित पंडित छन्नूलाल मिश्र बताते हैं कि बनारस की होली भी बनारस के मिजाज के अनुसार ही अड़भंगी है। 

वह कुछ याद करते हुए गुनगुनाने लगते हैं कि खेले मसाने में होरी दिगंबर, खेले मसाने में होरी, भूत पिशाच बटोरी दिगंबर खेले मसाने में होरी…। वह कहते हैं कि लखि सुंदर फागुनी छटा के, मन से रंग-गुलाल हटा के चिता भस्म भर झोरी… दिगंबर खेले मसाने में होरी….।

आखिर ऐसा दृश्य कहाँ देखने को मिलेगा कि भगवान शिव के गण अपने झोली में चिता भस्म की राख भरकर मन भर होली खेलकर तृप्त हो जाते हैं। उनका कहना है कि काशी की होली में राग और विराग दोनों नजर आते हैं।

पंडित छन्नूलाल मिश्र ठहरकर कुछ समझाते हुए आगे गुनगुनाते लगते हैं कि गोप न गोपी श्याम न राधा, ना कोई रोक ना कवनो बाधा, ना साजन ना गोरी दिगंबर खेले मसाने में होरी…।

भावविभोर हो वह कह उठते हैं कि शिव की नगरी काशी की होली की बात ही निराली है। जब महादेव महाश्मशान में उतरते हैं तो भूतनाथ की मंगल-होरी, देखि सिहाएं बिरिज के गोरी, धन-धन नाथ अघोरी… दिगंबर खेलैं मसाने में होरी।

काशी मोक्ष की नगरी है और मान्यता है कि यहाँ भगवान शिव स्वयं तारक मंत्र देते हैं।

लिहाजा यहाँ पर मृत्यु भी उत्सव है और आज चिता की भस्म को उनके गण अबीर और गुलाल की भाँति एक दूसरे पर फेंककर सुख-समृद्धि-वैभव संग शिव की कृपा पाने का मनोरथ करते हैं।

(तस्वीर और वीडियो साभार: डॉ. मुनीश कुमार मिश्रा)

‘मापदंड मनमाने और तर्कहीन’: सेना में महिलाओं को स्थायी कमीशन पर सुप्रीम कोर्ट ने दिए 2 महीने

सेना में महिला अफसरों को स्थायी कमीशन देने की प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट ने भेदभावपूर्ण माना है। शॉर्ट सर्विस कमीशन की करीब 650 महिला अधिकारियों की याचिका पर शीर्ष अदालत ने गुरुवार (25 मार्च 2021) को सुनवाई की। अदालत ने कहा कि स्थायी कमीशन के लिए अपनाए गए मूल्यांकन मापदंड ‘मनमाने और तर्कहीन’ हैं।

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने सेना को इस पर दो महीने के भीतर पुनर्विचार करने के निर्देश दिए। सेना की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (एसीआर) की मूल्यांकन प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि इसमें कई खामी है। इसे पुरुषों द्वारा पुरुषों के लिए तैयार की गई प्रक्रिया बताया।

महिला अधिकारियों ने स्थायी आयोग और संबंधित लाभ को लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाया था। याचिका में कहा गया था कि बबीता पुनिया के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद मेडिकल फिटनेस की मनमानी सीमा लगाई गई। इसने 5 या 10 साल की सेवा से परे उनकी योग्यता की अनदेखी हुई। अदालत ने इसे मानते हुए कहा कि इसकी वजह से कई बेहतरीन महिला अधिकारी सेना से बाहर हो गई।

गौरतलब है कि फरवरी 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को तीन महीने के भीतर महिलाओं के लिए सेना में स्‍थायी कमीशन का गठन करने के निर्देश दिए थे। उस समय अदालत ने कहा था कि महिलाओं के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता। यह फैसला केन्द्र सरकार की उस याचिका पर आया था जिसमें इस संबंध में दिल्ली हाई कोर्ट के मार्च 2010 के फैसले को चुनौती दी गई थी।

केंद्र का तर्क था कि सेना में ‘कमांड पोस्ट’ की जिम्‍मेवारी महिलाओं को नहीं दी जा सकती, क्‍योंकि उनकी शारीरिक क्षमता इसके लायक नहीं और उनपर घरेलू जिम्‍मेदारियाँ भी होती हैं। इन कारणों के साथ केंद्र ने कहा था कि इस पद की चुनौतियों का सामना महिलाएँ नहीं कर सकेंगी। इस पर कोर्ट ने कहा कि कमांड पोस्‍ट पर महिलाओं को आने से रोकना समानता के विरुद्ध है।

‘बंद हो सड़क पर नमाज और माइक से अजान’: झारखंड हाई कोर्ट में PIL, गोवा लगा चुका है बैन

झारखंड हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर कर सड़क पर नमाज पढ़ने और माइक से अजान देने पर रोक लगाने की माँग की गई है। याचिकाकर्ता बीजेपी नेता अनुरंजन अशोक हैं। उन्होंने कहा है कि इस याचिका का किसी मजहब से लेना-देना नहीं है, बल्कि ध्वनि प्रदूषण जैसी समस्या से लड़ने के लिए यह जरूरी है।

अशोक ने कहा है कि लाउडस्पीकर की आवाज 10 डेसीबल की सीमा के भीतर ही रहनी चाहिए। लेकिन मस्जिदों से इसका लगातार उल्लंघन हो रहा है। उन्होंने पिछले वर्ष नवंबर में झारखंड सरकार से इस दिशा में कारवाई की माँग की थी। सरकार की उदासीनता के बाद अब कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

याचिका में सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर नमाज पढ़ने पर भी रोक लगाने की माँग की गई है। याचिकाकर्ता ने है कहा कि एक कानून होना चाहिए जिसके तहत नमाज सिर्फ मस्जिद में पढ़ी जाए। हाल ही में झारखंड के हजारीबाग में सड़क पर बच्चों के नमाज पढ़ने की तस्वीरें वायरल हुईं थी।

गौरतलब है कि हाल ही में गोवा में लाउडस्पीकर पर अजान देने पर प्रतिबंध लगाया गया है। यह प्रतिबंध भी एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर की याचिका पर सुनवाई के बाद लगाया गया। वहीं कर्नाटक में राज्य वक्फ बोर्ड ने रात 10 बजे से सुबह 5 बजे के बीच मस्जिदों और दरगाहों पर लाउडस्पीकर के उपयोग पर प्रतिबंध लगाया है। कुछ महीने पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि अजान इस्लाम का अभिन्न अंग हो सकता है, किन्तु लाउडस्पीकर अथवा किसी तेज ध्वनि वाले यंत्र से अजान पढ़ना मजहब का अभिन्न अंग नहीं माना जा सकता है।

हाल ही में इलाहाबाद विश्वविद्यालय की वाइस चांसलर संगीता श्रीवास्तव द्वारा इस संबंध में शिकायत की थी। इस पर संज्ञान लेते हुए प्रयागराज रेंज के आईजी केपी सिंह ने चार जिलों के कलेक्टरों और पुलिस प्रमुखों को यह उच्च न्यायालय का आदेश लागू करने को कहा था। इसके बाद उत्तरप्रदेश सरकार के मंत्री आनंद स्वरूप शुक्ला ने बलिया जिला न्यायाधीश को पत्र लिखकर मस्जिदों के लाउडस्पीकर की आवाज को कोर्ट के आदेशानुसार नियंत्रित करने की माँग की थी।

‘मुझे विभिन्न लोगों को लाखों रुपए देने को कहा, जेल भेजने की धमकी दी’: मुंबई के बिल्डर ने सचिन वाजे के खिलाफ की शिकायत

मुंबई के एक बिल्डर ने सचिन वाजे के खिलाफ रंगदारी का मामला दर्ज कराया है। वाजे और उसके साथियों पर डरा-धमका कर रुपए वसूलने की कोशिश करने का आरोप लगाया है। इस संबंध में मुंबई पुलिस कमिश्नर और महाराष्ट्र के DGP को भी शिकायत पत्र भेजा है।

बिल्डर ने अपने पत्र में महाराष्ट्र सरकार के नेताओं और दलालों के बीच ट्रांसफर-पोस्टिंग के लिए चल रहे नेटवर्क को लेकर भी सवाल उठाया है। बिल्डर ने कहा है कि जब सचिन वाजे को सस्पेंड कर दिया गया है तो उसके द्वारा चलाए जा रहे रंगदारी और भ्रष्टाचार के रैकेट की जाँच होनी चाहिए। उसने बताया है कि वाजे और उसके साथियों ने उसे बार-बार धमकाया और रुपए न देने पर केस करने की धमकी दी।

बिल्डर ने बताया है कि उससे विभिन्न लोगों को लाखों रुपए देने को कहा गया और ऐसा न करने पर विभिन्न मामलों में फँसा कर जेल भेजने की धमकी दी गई। बिल्डर ने बताया कि वो ‘क्राइम इंटेलिजेंस यूनिट (CIU)’ में सचिन वाजे से व्यक्तिगत रूप से मिलने भी गया था। लेकिन उसे नहीं मिलने दिया गया। उससे 5 लाख रुपए की डिमांड की गई। पैसा नहीं देने पर जेल भेजने की धमकी दी गई।

उसने वाजे के कई साथियों पर भी आरोप लगाए गए हैं। बिल्डर ने यह भी दावा किया है कि उसके पास वाजे के सहयोगियों के कॉल रिकॉर्डस भी हैं, जिन्होंने कथित तौर पर उसे पैसे की डिमांड पूरी नहीं होने पर धमकाया था।

सचिन वाजे के खिलाफ बिल्डर ने की शिकायत

इससे पहले यह बात सामने आई थी कि मुंबई के एक स्वर्ण व्यवसायी के कहने पर मुंबई के 5 स्टार होटल ‘ट्राइडेंट’ में वाजे के लिए 100 दिनों के लिए कमरा बुक कराया गया था। इस कमरे का मात्र 1 दिन का किराया 10,000 रुपए था। इस कमरे का नंबर 1964 है जो 19वीं मंजिल पर स्थित है। एक ट्रेवल एजेंट ने ये कमरा बुक करवाया था। ‘सुशांत सदाशिव खामकार’ नाम से फर्जी आधार कार्ड बनवाकर कमरा बुक किया गया था।

गौरतलब है कि एंटीलिया के बाहर विस्फोटक लदी कार रखने के मामले में वाजे एनआईए की हिरासत में है। इस कार के मालिक मनसुख हिरेन की हत्या में भी उसकी संलिप्तता सामने आई है। वहीं, मुंबई के पुलिस कमिश्नर रहे परमबीर सिंह ने आरोप लगाया था कि महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख ने वाजे को 100 करोड़ रुपए की वसूली का टारगेट दे रखा था।

निकिता तोमर का परिवार झूठा, न लव जिहाद-न धर्मांतरण का दबाव: तौसीफ-रेहान के लिए उमड़ा ‘The Quint’ का प्रेम

प्रोपेगेंडा वेबसाइट ‘The Quint’ ने फरीदाबाद में निकिता तोमर की दिनदहाड़े हुई हत्या के दोषियों के पक्ष में बल्लेबाजी शुरू कर दी है। बुधवार (मार्च 24, 2021) को 5 महीने पहले हुए इस हत्याकांड के आरोपितों तौसीफ और रेहान को फास्टट्रैक कोर्ट ने दोषी पाया था। इन्हें 26 मार्च को सजा सुनाई जाएगी। एक अन्य आरोपित अजरुद्दीन को कोर्ट ने बरी कर दिया था। उस पर हथियार सप्लाई करने का आरोप था।

निकिता तोमर के परिवार ने कई बार कहा है कि उस पर इस्लाम अपनाने के लिए दबाव बनाया जा रहा था। परिवार ने फाँसी की माँग भी की है। लेकिन, ‘The Quint’ जैसे वेबसाइटों ने इस पर प्रोपेगेंडा शुरू कर दिया है। मुस्लिमों द्वारा किए गए अपराध को ढकने के लिए कुख्यात पोर्टल का कहना है कि चूँकि आरोपित मुस्लिम थे, इसलिए निकिता के परिवार ने इसे ‘लव जिहाद’ बताया। साथ ही दक्षिणपंथी वेबसाइटों को भी दोषी ठहराया है।

याद कीजिए जब दिल्ली में एक किसान प्रदर्शनकारी ट्रैक्टर पर स्टंट करते हुए मरा था और राजदीप के पीछे ‘हुआँ-हुआँ’ करते हुए तमाम मीडिया पोर्टलों ने इसके लिए दिल्ली पुलिस को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि वो पुलिस की गोली से मरा। सब कुछ साफ़-साफ़ वीडियो में दिख रहा था, फिर भी उसके दूर के रिश्तेदारों के बयान के आधार पर झूठे दावे किए गए।

अब यही पोर्टल निकिता तोमर के परिवार पर सवाल खड़े कर रहे हैं, जो कई महीनों से आरोपितों के अत्याचार को झेल रहे थे और एक बार अपहरण के मामले में आरोपितों के परिजनों के आग्रह पर समझौता भी हुआ था। ‘The Quint’ का कहना है कि तौसीफ निकिता के पीछा पड़ा था और स्कूल के समय से ही उसके प्रति आकर्षित था, इसलिए निकिता ने जब उसका प्रस्ताव ठुकराया तो उसने हत्या कर दी।

निकिता तोमर को लेकर ‘The Quint’ का प्रोपेगेंडा

आखिर ‘लव जिहाद’ ये नहीं है तो फिर क्या है? ऐसे मामलों में मुस्लिमों द्वारा इस्लामी धर्मांतरण के लिए दबाव बनाया जाता है, ये डिफ़ॉल्ट है। ये अंडरस्टूड होता है। क्या वामपंथी पोर्टल को पुलिस और मृतक के परिजनों से ज्यादा पता है? इस खबर में आरोप लगाया गया है कि करणी सेना और देव सेना जैसे संगठनों द्वारा इसे ‘लव जिहाद’ का मुद्दा बनाए जाने के बाद परिवार ने भी ऐसा कहना शुरू कर दिया।

साथ ही अपनी ही अक्टूबर 2020 की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि निकिता तोमर के घर के बाहर दक्षिणपंथी इसे कम्यूनल एंगल दे रहे थे। उसके कहना का अर्थ है कि तौसीफ ने भले ही निकिता को धर्मांतरण की धमकी दी हो, लेकिन ये कम्यूनल नहीं है। हाँ, अगर कोई इस चीज का जिक्र करते हुए इसके खिलाफ आवाज उठाता है तो वो कम्यूनल है। आरोपित स्थानीय कॉन्ग्रेस नेताओं के प्रभावशाली परिवार से आता है।

‘The Quint’ सब कुछ मान सकता है कि हत्याएँ होती हैं, अपहरण होते हैं और प्यार में ठुकराने पर बदला लिया जाता है, लेकिन एक अपराध ऐसा है जिसका उसके लिए इस धरती पर कोई अस्तित्व ही नहीं है। जबरन इस्लामी धर्मांतरण नाम की कोई चीज उसके लिए है ही नहीं। निकिता तोमर के पिता ने स्पष्ट कहा था कि अगर ‘लव जिहाद’ के विरुद्ध क़ानून होता तो शायद उनकी बेटी की जान नहीं जाती।

वहीं निकिता तोमर के भाई ने कहा था कि अगर हिन्दू की बेटी है तो क्या कोई कुछ भी करेगा, अगर वही मुस्लिम की बेटी होती तो सारा प्रशासन यहाँ इकट्ठा हो जाता। साथ ही सवाल दागा था कि इससे पहले पुलिस ने कार्रवाई नहीं की, क्या वो उनकी बहन के मरने का इंतजार कर रहे थे? आरोप है कि तौसीफ ने बार-बार निकिता को यही कहा, ‘मुस्लिम बन जा हम निकाह कर लेंगे’, लेकिन लड़की के न झुकने पर उसने हत्या कर दी।

आखिर क्यों ‘The Quint’ हत्या और अपहरण को छोड़ कर अवैध धर्मांतरण वाले आरोप के पीछे ही पड़ा हुआ है? ऐसे ही मेवात में उसके पत्रकारों ने घूम कर पाया कि वहाँ ‘लव जिहाद’ का कोई केस नहीं है और सब कुछ शांत है। वहाँ उसके पत्रकार पेड़ की छाँव में खड़े हुए, सड़क पर चहलकदमी की, आसमान निहारा और चाय-नाश्ता कर के पाया कि ‘लव जिहाद’ पीड़ित कहीं दिख ही नहीं रहे हैं। ये है इनके रिपोर्टिंग का तरीका।

तौसीफ और रेहान का बचाव करना तो बहुत छोटी बात है। उन्होंने हजारों निर्दोषों की जान लेने वाले आतंकी संगठन अल-कायदा के संस्थापक ओसामा बिन लादेन तक के ‘मानवीय पक्ष’ को दुनिया के सामने लाने की कोशिश की थी। ‘The Quint’ के लिए लादेन एक ‘अच्छा पति और अच्छा पिता’ था। हो सकता है इसके लिए ‘The Quint’ वालों ने ओसामा की पाँचों पत्नियों से बात की हो। आतंकियों का महिमामंडन करने वालों के लिए तौसीफ तो एक अपराधी भर है।

इसी तरह हैदरबाद में एक महिला डॉक्टर के रेप और हत्या के आरोपितों के महिमामंडन का प्रयास भी ‘The Quint’ ने किया था। उसने आरोपितों के परिजनों के इंटरव्यू लेकर तरह-तरह के आरोप लगाए थे। आज यही मीडिया संस्थान निकिता के परिजनों की बात को गलत बता रहा। ‘The Quint’ ने एक बलात्कार और हत्या के आरोपित के परिजनों से बात कर के जाना कि वो अपराध करने के बाद कितना ‘चिंतित और डरा हुआ’ था।

सीधी बात ये है कि ‘The Quint’ जैसे संस्थान ये पचा ही नहीं पाते कि मुस्लिम अपराध कर सकते हैं, इस्लामी आक्रांता कभी हुआ करते थे या फिर मजहब के नाम पर खून बहाया जाता है। उनकी पहली कोशिश होती है मुस्लिम अपराधी/आतंकी को बचाना। ऐसा न हो पाया तो उसका ‘मानवीय पक्ष’ निकाल कर लाना। ये भी न हो पाया तो अंत में ये साबित करते हैं कि इसका मजहब, इस्लाम या धर्मांतरण से कोई लेना-देना नहीं।

ढाका यूनिवर्सिटी में हिंसक हुआ मोदी विरोधी प्रदर्शन, वामपंथी बोले- हमें दौड़ा-दौड़ा कर पीटा: PM मोदी के स्वागत में बांग्लादेश तैयार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार (मार्च 26, 2021) को बांग्लादेश में होंगे। बांग्लादेश की स्वतंत्रता के गोल्डन जुबली समारोह में उन्हें ‘गेस्ट ऑफ ऑनर’ के रूप में आमंत्रित किया गया है। ये कार्यक्रम राजधानी ढाका में होगा। बांग्लादेश मार्च 26, 1971 को स्वतंत्र हुआ था। एक तरफ जहाँ बांग्लादेश पीएम मोदी के स्वागत को तैयार है, वहीं वहाँ पाकिस्तान का समर्थन करने वाले व कट्टर इस्लामी समूहों ने विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिया है।

बांग्लादेश की सुरक्षा एजेंसियाँ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सुरक्षा के लिए कड़े इंतजाम कर रही है, क्योंकि पाकिस्तान समर्थित इस्लामी कट्टरवादी समूह ‘हिफाज़त’ ने धमकी दी है कि वो पीएम मोदी के रास्ते को ब्लॉक करेंगे। एयरपोर्ट से उन्हें सड़क मार्ग से ही यात्रा करनी है। मुल्क की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने ऐसे किसी भी प्रयास पर कड़ी कार्रवाई का आदेश दिया है। ये दौरा इसीलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि वर्ल्ड बैंक ने कहा है कि भारत-बांग्लादेश का ट्रांसपोर्ट सुचारु हो जाए तो दोनों देश की आय 10% से भी अधिक बढ़ जाएगी।

उधर पीएम मोदी के दौरे को लेकर छात्रों के दो गुट में झड़प भी हुई। ‘प्रगतिशील छात्र जोट’ ने प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के खिलाफ ढाका यूनिवर्सिटी के ‘टीचर्स स्टूडेंट सेंटर (TCS)’ के सामने विरोध-प्रदर्शन का आयोजन किया था। तभी ‘छात्र लीग’ ने हमला बोल दिया और विरोधियों को पकड़-पकड़ कर पीटा। 20 छात्र नेता घायल हो गए। इनमें ‘समाजतांत्रिक छात्र फ्रंट’ के अध्यक्ष मसूद राणा को भी गहरी चोटें आई। घायलों को इलाज के लिए ढाका मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया है।

ये घटना मंगलवार (मार्च 23, 2021) को शाम साढ़े 5 बजे हुई। उससे कुछ दिन पहले बांग्लादेश छात्र लीग (BCL) के नेता और संगठन की ढाका यूनिवर्सिटी यूनिट के अध्यक्ष संजीत चंद्रा दास ने एक रैली की थी, जिसमें उन्होंने मोदी-विरोधी प्रदर्शनकारियों को चेताते हुए कहा था कि अगर किसी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरे के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन किया तो उसकी चमड़ी उधेड़ दी जाएगी।

ढाका यूनिवर्सिटी कैम्पस में मारपीट

‘प्रोग्रेसिव स्टूडेंट्स अलायन्स’ के संयोजक अल कादरी जॉय ने बताया कि उनलोगों का विरोध-प्रदर्शन पहले से ही प्लांड था और पीएम मोदी का पुतला भी जलाया जाना था। उन्होंने बताया कि कार्यक्रम के दौरान ही छात्र लीग के नेताओं ने ईंट-पत्थर और पेड़ की टहनियाँ हाथ में लेकर हमला बोल दिया। उन्होंने बताया कि पहले हमले के बाद जब वहाँ से कोई नहीं गया तो दूसरी बार हमला किया गया।

वहीं छात्र लीग के महासचिव लेखक भट्टाचार्जी ने आरोप लगाया कि यूनिवर्सिटी कैम्पस के दो वामपंथी छात्र गुटों ने आपस में ही लड़ाई की और हमारे छात्र बीच में फँस गए। उन्होंने कहा कि उनके संगठन का इस हमले से कोई लेना-देना नहीं। वामपंथी समूहों का कहना है कि उन्हें दौड़ा-दौड़ा कर पीटा गया। एक पत्रकार के कैमरे पर हेलमेट से वार किया गया। घायलों में दोनों तरफ के छात्र शामिल हैं।

वहीं कई पाकिस्तानियों ने ‘हिफाज़त-ए-इस्लाम’ संगठन के उस घोषणा का स्वागत किया है, जिसमें उसने पीएम मोदी को ढाका में न घुसने देने की धमकी दी है। वहीं ग्लादेश लिबरेशन समर्थक गुट का कहना है कि भारत ने मुल्क की स्वतंत्रता में साथ दिया था, इसीलिए ISI मतभेद पैदा कर रहा है। बदले में कई बांग्लादेशियों ने भी पाकिस्तान को खरी-खोटी सुनाते हुए पूछा कि विकास के मामले में वो इतना पीछे क्यों है?

कुछ ही दिनों पहले जुमा की नमाज के बाद 500 मुस्लिमों ने बांग्लादेश के बैतुल मोकर्रम मस्जिद के बाहर मार्च किया था। बड़ी तादाद में इस्लामी टोपी पहने और बड़ी-बड़ी दाढ़ी रखे लोगों ने सड़कों पर भारत और भारत के प्रधानमंत्री के विरुद्ध नारेबाजी की थी। इन सभी के हाथ में चप्पल थी और ये माँग कर रहे थे कि प्रधानमंत्री मोदी के ढाका दौरे को निरस्त किया जाए। प्रदर्शनकारियों ने कहा था, “अगर नरेंद्र मोदी को बांग्लादेश आने को कहा गया तो हम आतंकी बन जाएँगे। बंगाल बनेगा अफगानिस्तान और हम बनेंगे तालिबान।”

J&K में आतंकी घटना में भारी कमी, कानून-व्यवस्था बिगड़ने पर किसी नागरिक की मौत नहीं: गृह मंत्रालय ने बताया 370 हटने का असर

जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाए जाने के बाद किसी भी नागरिक की मौत कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने की वजह से नहीं हुई है। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी ने बुधवार 24 मार्च 2021 को संसद में यह जानकारी दी। लिखित जवाब में उन्होंने बताया कि बताया कि आतंकी घटनाओं अथवा क्रॉस फायरिंग में मारे गए नागरिकों के परिजनों को एक लाख रुपए का मुआवजा दिया गया है।

आर्टिकल 370 हटाए जाने के बाद से आतंकी घटनाओं में आई भारी कमी के बारे में भी उन्होंने बताया। उन्होंने कहा, “जम्मू-कश्मीर में 2019, 2020 और 2021 (15 मार्च की स्थिति) में क्रमशः 549, 244 और 21 आतंकी घटनाएँ हुईं।”

5 अगस्त 2019 को केंद्र की मोदी सरकार ने ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए अनुच्छेद 370 को समाप्त कर दिया था। राज्य को विभाजित कर दो केंद्र शासित प्रदेश बनाए गए, लद्दाख एवं जम्मू-कश्मीर।

इसके अलावा रेड्डी ने आईपीसी सूचित अपराधों में आई कमी की ओर भी ध्यान आकर्षित कराया। दिल्ली पुलिस की रिपोर्ट के अनुसार आईपीसी सूचित अपराधों में 2019 की तुलना में 2020 में 16.86% की कमी देखने को मिली। इसके अतिरिक्त 2021 के पहले दो महीनों में दर्ज आईपीसी सूचित अपराधों की संख्या में 2020 के पहले दो महीनों की तुलना में 12.82% की कमी आई है। इन आँकड़ों के साथ भारतीय जेलों में बंद कैदियों की संख्या के 4,78,600 बताई गई। इन 4.78 लाख कैदियों में 3,30,487 ट्रायल की प्रक्रिया में हैं।

गौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर में 2019 की तुलना में 2020 में पत्थरबाजी की घटनाओं में भी 87.13% की कमी दर्ज की गई है। यह आँकड़े जम्मू और कश्मीर के डीजीपी दिलबाग सिंह द्वारा दिए गए थे। दिलबाग सिंह ने बताया था कि 2020 में 255 छोटी-बड़ी पत्थरबाजी की घटना हुई जो 2019 की तुलना में लगभग 87% कम हैं।

5 स्टार होटल में 100 दिनों के लिए कमरा, 5 ब्लैक बैग और 1 मिस्ट्री महिला: सचिन वाजे क्यों बना था ‘सुशांत’?

मुंबई में मुकेश अंबानी की बहुमंजिला इमारत एंटीलिया के बाहर विस्फोटक लदी स्कॉर्पियो मिलने के कुछ दिनों बाद ही इस कार के मालिक मनसुख हिरेन का शव मिला। आरोपों की सूई विवादित पुलिस अधिकारी सचिन वाजे की तरफ मुड़ी। उसे गिरफ्तार किया गया। इसके बाद मुंबई के पूर्व पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह ने राज्य के गृह मंत्री अनिल देशमुख पर वाजे के माध्यम से प्रतिमाह 100 करोड़ रुपए की उगाही का आरोप लगाया।

अब खुलासा हुआ है कि सचिन वाजे के लिए मुंबई के एक स्वर्ण व्यवसायी के कहने पर 25 लाख रुपए खर्च कर मुंबई के 5 स्टार होटल ‘ट्राइडेंट’ में 100 दिनों के लिए कमरा बुक कराया गया था। इस कमरे का मात्र 1 दिन का किराया 10,000 रुपए था। केंद्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने होटल का दौरा किया और कमरे की जाँच की, जिसके बाद कई सबूत हाथ लगे। CCTV फुटेज खँगाली गई, बुकिंग रिकार्ड्स जाँचे गए और होटल कर्मचारियों के बयान दर्ज हुए।

इस कमरे का नंबर 1964 है जो 19वीं मंजिल पर स्थित है। एक ट्रेवल एजेंट ने ये कमरा बुक करवाया था। ‘सुशांत सदाशिव खामकार’ नाम से फर्जी आधार कार्ड बनवा कर कमरा बुक किया गया था। जिस स्वर्ण व्यवसायी के कहने पर कमरा बुक करवाया गया था, उससे भी NIA ने पूछताछ की है। कारोबारी ने बताया कि उसके खिलाफ मुंबई के एलटी नगर और कांजुरमार्ग पुलिस स्टेशन में 2 पेंडिंग केस पड़े हुए हैं। वाजे ने उसे फँसाने की धमकी दी थी।

वाजे ने उसे लालच दिया था कि अगर वो कमरा बुक करवाता है तो उसे दोनों केस से निकाल दिया जाएगा। 25 लाख रुपए में से 13 लाख कैश ट्रेवल एजेंट ने होटल को दिए थे। बताया जा रहा है कि सचिन वाजे को पहले से आशंका थी कि उसे छिपना पड़ सकता है, इसीलिए उसने पहले ही इसकी व्यवस्था कर ली थी। 4 दिन वाजे वहाँ रुका था और कई लोग उससे मिलने आए थे। NIA को 35 कैमरा फुटेज मिले हैं।

स्वर्ण कारोबारी को वाजे ने 3 बड़े होटलों का विकल्प दिया था- ताज, ट्राइडेंट और ओबेरॉय। तीनों ही उसके दफ्तर के करीब थे। फरवरी 16-20 तक वाजे उस होटल में रुका था और उसके साथ एक महिला को भी देखा गया। इस महिला की पहचान अब तक बाहर नहीं आई है, लेकिन NIA ने उसे चिह्नित कर समन भेजने की तैयारी कर ली है।

कहा जा रहा है कि ‘क्राइम इंटेलिजेंस यूनिट (CIU)’ हेड रहते किसी मामले में पूछताछ के लिए वाजे ने उस महिला को बुलाया था। वाजे होटल में 5 काला रंग का बैग लेकर घुसा था। बैग में क्या था और वो अभी कहाँ हैं, इस पर जाँच हो रही है। फर्जी आधार में जन्मतिथि जून 15, 1972 लिखा था, जबकि वाजे की जन्मतिथि फरवरी 22, 1972 है।

वाजे का करीबी रियाजुद्दीन काजी ही उसके खिलाफ अप्रूवर बनने के लिए तैयार हो गया है। काजी को सचिन वाजे की आवासीय सोसाइटी के CCTV सबूतों को नष्ट करने के आरोप में पकड़ा गया था। काजी भी मुंबई पुलिस का अधिकारी है। वाजे ने कई लक्जरी कारों का प्रयोग किया था, जिनमें से कई जब्त की जा चुकी हैं। अब मनसुख हिरेन मामले की जाँच भी ATS की जगह NIA करेगी।

उधर महाराष्ट्र के गृह मंत्री और NCP नेता अनिल देशमुख ने अपने खिलाफ लगाए के आरोपों की जाँच की माँग की है। उन्होंने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को इसके लिए पत्र भी लिखा है। देशमुख ने कहा, “परमबीर सिंह द्वारा मुझ पर लगाए गए आरापों की जाँच करवा कर ‘दूध का दूध, पानी का पानी’ करने कि माँग मैंने माननीय मुख्यमंत्री महोदय से की थी। अगर वो जाँच के आदेश देते हैं तो मैं उसका स्वागत करूँगा।” इससे पहले पूर्व पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह इस मामले की CBI जाँच के लिए सुप्रीम कोर्ट गए थे, जहाँ इन आरोपों को गंभीर बताते हुए उन्हें बॉम्बे हाईकोर्ट जाने को कहा।

महाराष्ट्र में रोज बदलते घटनाक्रम के बीच ये भी खबर आई है कि संजय राउत ने अपने दिल्ली स्थित आवास पर एक रात्रिभोज का आयोजन किया था, जिसके लिए कई भाजपा सांसदों को भी निमंत्रण भेजा गया था। संजय राउत ने सभी दावों को खारिज कर दिया और आरोप लगाया कि ट्रांसफर रैकेट मामले के बारे में कुछ भी गंभीर नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि महागठबंधन सरकार को भाजपा अस्थिर करने का प्रयास कर रही है।

राजस्थान की घूसखोर बिटिया ने हर किमी के लिए मॉंगे ₹1 लाख, किसान भड़के इसलिए 6 महीने अटकाया मुआवजा: 4000 पन्नों की चार्जशीट

राजस्थान के बांदीकुई की SDM रहीं पिंकी मीणा हाल ही में राजस्थान के जज नरेंद्र कुमार से शादी के कारण चर्चा में आई थी, जिसके लिए उसे जमानत भी मिली थी। अब उसके खिलाफ 4000 पन्नों की चार्जशीट दायर की गई है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार चार्जशीट में बताया गया है कि हाइवे बनाने वाली कंपनियों से प्रति किलोमीटर 1 लाख रुपए की घूस पिंकी मीणा ने माँगी थी। पहली क़िस्त में उसने 6 लाख रुपए रिश्वत माँगी थी, जिसे बाद में बढ़ाकर 10 लाख रुपए कर दिया।

दरअसल, पिंकी मीणा को पता चला था कि पड़ोस में ही स्थित दौसा सेक्शन के SDM पुष्कर मित्तल ने 10 लाख रुपए माँगे थे, इसीलिए उसने भी रकम बढ़ा दी। चार्जशीट ACB कोर्ट में दायर की गई है। कंपनियों पर घूस के लिए दबाव बनाने के लिए पिंकी ने किसानों का मुआवजा भी अटका रखा था। नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) के भारतमाला प्रोजेक्ट के लिए भूमि अधिग्रहण का जिम्मा उसे ही मिला था।

प्रशासन को किसानों को मुआवजा देने के लिए धनराशि भी दी गई थी। भूमि-अधिग्रहण होने के बाद उसे कंपनियों को सौंपना था और किसानों को मुआवजा दिलाना था। दोनों प्रक्रिया पिंकी मीणा के कारण अटकी रही। किसानों को भड़काने के लिए उसने मुआवजा नहीं दिया गया, ताकि कंपनियों का काम शुरू नहीं हो। इसी के लिए 1 लाख प्रति किमी की रिश्वत माँगी गई। काम बार-बार अटकने के कारण ही कंपनी ने शिकायत की।

इसमें पिंकी मीणा के अलावा IPS मनीष अग्रवाल और SDM पुष्कर का भी नाम लिया गया। पिंकी हाई कोर्ट से जमानत लेने में कामयाब रही हैं। पुष्कर अभी जेल में ही है। मनीष बहन की शादी के लिए अंतरिम जमानत पर बाहर है। पिंकी इतनी चालाक थी कि रिश्वत की रकम भी खुद न लेकर कंपनी को अमित नाम के कर्मचारी को सौंपने को कहा था। ACB (भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो) ने सबूत के रूप में डिजिटल टेप रिकॉर्डर के कंटेंट पेश किया है।

हाइवे कंपनी शिकायत का मन बना चुकी थी, इसीलिए उसने रुपए दिए ही नहीं। अमित और पूर्व SDM को आमने-सामने बिठा कर पूछताछ की गई, जिसमें ये राज़ खुला। पिंकी मीणा की तीन ऐसी बातचीत टेप की गई है, जिसमें उसने रिश्वत माँगी है। जयपुर चिथवाड़ी की रहने वाली पिंकी मीणा ने 2016 में प्रशासनिक आयोग की परीक्षा पास की थी।

एक पत्रकार जिसे धारदार हथियारों से काट डाला गया… आज अपराधियों की मजहबी पहचान छिपाने पर करते सवाल

इतिहास लिखने वालों के अपने स्वार्थ होते हैं। वे अपने हित के हिसाब से ड्राफ्ट बनाते हैं और उस पर अतीत की कहानियों को छाप देते हैं। इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करने वाले बहुत हैं। ये कोई भी हो सकते हैं। लेखक, इतिहासकार, कहानीकार एवं कलाकार… कोई भी। ये कुंठा से ग्रसित होकर बदनाम करेंगे। तथ्यों की हत्या कर देंगे। सत्य को लेखनी की मशाल से जलाकर निष्पक्ष होने का ढोंग करेंगे। इनके लिए निष्पक्ष होना कठिन नहीं, क्योंकि ये निष्पक्षता की एक ही सीधी गली में चलते हैं जो मजहबी दुकानों के सामने से गुजरती है।

आज 25 मार्च है। भारत के एक ऐसे पत्रकार की पुण्यतिथि जिसके जीवन की व्याख्या अपने नैरेटिव के हिसाब से सबने की। हिन्दी पत्रकारिता हो या अंग्रेजी, स्वार्थ और तुष्टिकरण के अँधेरे में सभी अपने हितों की खोज करते रहे। गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’, एक ऐसा नाम जो आज लिया तो जाता है किन्तु किस परिप्रेक्ष्य में, यह किसी को ज्ञात नहीं। वर्तमान समय के स्वघोषित निष्पक्ष पत्रकार आज कलम उठाएँगे और उसी बने-बनाए ड्राफ्ट पर अपनी कहानी छापेंगे।

धर्मनिरपेक्षता, निष्पक्षता और प्रश्न करने का अभिनय करने वाले पत्रकार गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ का नाम लेकर उन्हें उलाहना देंगे जो उनकी तरह नहीं हैं। जिस गणेश शंकर ने समाज के हित के लिए कलम उठाई और तत्कालीन समय में उत्पीड़न एवं अन्याय के विरोध में खड़े रहे, उनका नाम लेकर आज वो पत्रकार भी पत्रकारिता पर ज्ञान बाँटते हैं जो पीड़ित के नाम, उसकी मजहबी पहचान और उसकी कुछ विशेष निशानियों के आधार पर अपराध की इन्टेन्सिटी को तौलते हैं।

गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ वास्तविकता में निष्पक्ष थे। गाँधीवादी विचारों एवं क्रांतिकारी व्यक्तित्व का सम्मिश्रण थे वे। उन्होंने कभी नहीं देखा कि जिसकी आलोचना वे कर रहे हैं, वह किस धर्म का है, किस वर्ग का है। अमीर है अथवा गरीब। जमींदार है या पूँजीपति। उनके लिए तो बस अन्याय, अन्याय था और अन्याय करने वाला दोषी। यही होती है निष्पक्षता।

आज मात्र निष्पक्षता शब्द लिखने योग्य ही कौन है? वो जिनके लिए सेना के गरीब जवान के जीवन का कोई मूल्य नहीं और आतंकवादी, हेडमास्टर का बेटा, क्रिकेट फैन और गणित-भूगोल का शानदार विद्यार्थी हो जाता है। या फिर वो जो आपसी रंजिश में मरे मुसलमान की मौत को लेकर असहिष्णुता का नंगा नाच करते हैं और दिल्ली में मरने वाले अंकित शर्मा, रतनलाल, दिलबर नेगी को एक लाश मानकर दूर से ही निकल जाते हैं। डासना में ‘थप्पड़’ पर तो पत्रकारों की कलमें हिलने लगती हैं, स्याही समुद्री लहरों की भाँति आसमान छूने लगती है, लेकिन कमलेश तिवारी के गले को रेत दिए जाने पर इन्हीं पत्रकारों की आँखों के सामने इनकी कलमों की स्याही सूख जाती है। आजकल डिजिटल माध्यमों का जमाना है। स्याही की आवश्यकता भी नहीं, किन्तु कीबोर्ड पर उँगलियाँ भी नहीं चल पाती हैं। 

कौन निष्पक्ष, कौन धर्मनिरपेक्ष   

जो वन वे वाली धर्मनिरपेक्षता की आदर्श व्यवस्था की कल्पना करते हैं, मजहबी जिहाद पर आँखों को मूँदकर रखते हैं और जो झुंड बनाकर राष्ट्रवाद की पवित्र धारा को मलिन करने का प्रयास करते हैं, क्या ऐसे पत्रकार गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ का नाम भी लेने के अधिकारी हैं?

लेकिन ये ‘पत्रकार’ ऐसा करते हैं। वे गणेश शंकर का नाम लेकर अपने पापों को धोते हैं। ये ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि इन्हें इतिहास का अपने अनुसार उपयोग करना सिखाया गया है। ये लंबे लेखों और सुंदर शब्दों से गणेश शंकर को श्रद्धांजलि देते हैं और आँसू बहाते हैं। प्रश्न करते हैं कि यदि आज गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ होते तो कहाँ होते? तब इन्हीं की जमात का एक और स्वघोषित निष्पक्ष पत्रकार उत्तर देता है, ‘जेल में’।

इन पत्रकारों ने तब प्रश्न नहीं किया जब घोटालों से भारत बर्बाद हो रहा था। ये पत्रकार तब भी प्रश्न नहीं करते, जब इस्लामी आतंकवादी भारत के शहरों में घुसकर सैकड़ों काफिरों को मार देता है। इन पत्रकारों ने तब भी प्रश्न नहीं उठाए, जब हिन्दू आतंकवाद शब्द गढ़ा जा रहा था और मुंबई हमलों में पाकिस्तान की भूमिका को धुँधला किए जाने के षड्यंत्र किए जा रहे थे।

गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ की कलम और उनका अखबार ‘प्रताप’ आज भी पत्रकारों और पत्रकारिता के लिए आदर्श है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्होंने सत्य पर अडिग रहते हुए अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध लेखन का कार्य किया। अपने ओजस्वी लेखों से उन्होंने अंग्रेजी सरकार की जड़ें हिलाकर रख दी। वो तब का समय था। आज का समय अलग है।

अपने जीवन को गरीबों और मजदूरों के लिए समर्पित करने वाले गणेश शंकर आज क्या उज्ज्वला और पीएम आवास जैसी योजनाओं पर सरकार के समर्थन में नहीं होते? आर्थिक असमानता के विरुद्ध लेख लिखने वाले गणेश शंकर क्या रोजगार देने वाली मुद्रा योजना की सराहना नहीं करते? गणेश के ही उत्तर प्रदेश में जहाँ कानून-व्यवस्था का कोई नाम नहीं था और जहाँ डकैती, लूट, बलात्कार, अपहरण और फिरौती आम घटनाओं की तरह ही थी, उस प्रदेश में कानून-व्यवस्था का राज स्थापित कर अंग्रेजों जैसी शोषक प्रवृत्ति के समाजवादियों को खदेड़ने वाले योगी आदित्यनाथ का साधुवाद क्या गणेश नहीं करते?

गणेश शंकर प्रश्न पूछते। जरूर पूछते। लेकिन बंगाल और केरल में हो रही राजनैतिक हत्याओं पर। महाराष्ट्र के सियासी नाटक और महामारी की रोकथाम की असफलता पर। धार्मिक केंद्रों के रखरखाव और प्रबंधन में हिंदुओं के साथ हो रहे छल और अन्याय पर। गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ पत्रकारों की उस जमात से प्रश्न करते जो मुसलमान अपराधी का नाम लिखने से डरती है, जो किसी मजहबी नुमाइंदे के बलात्कारी होने पर खबरों के शीर्षक और फीचर इमेज में हिन्दू साधु के नाम और फोटो का प्रयोग करती है। गणेश शंकर हर उस पत्रकार से प्रश्न करते जो हिंदुओं को उनके धर्म के कारण दोयम दर्जे का मानता आया है। तब यही निष्पक्ष और क्रांतिकारी पत्रकार गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ को भी ‘भक्त’ कह देते।

उपद्रवियों की एक भीड़ को समझाने की कोशिश कर रहे गणेश शंकर विद्यार्थी को आज ही के दिन, 25 मार्च 1931 को तेज धार वाले हथियारों से काट डाला गया था। यही वो दिन था जब कानपुर में सांप्रदायिक दंगे हो रहे थे। भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी दिए जाने के विरोध में तत्कालीन काँग्रेस सदस्यों द्वारा जुलूस निकाला जा रहा था। यह जुलूस जब एक समुदाय विशेष के क्षेत्र से गुजरा तब अचानक ही दंगे भड़क उठे। जब गणेश को दंगों की जानकारी मिली तो वे अकेले ही उस मुस्लिम बहुल इलाके में दंगों को रोकने के लिए निकल पड़े किन्तु दंगों को रोकने के इस प्रयास का परिणाम हुआ उनकी हत्या। कानपुर के चौबे गोला चौराहे के पास चाकू घोंप कर गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ की हत्या कर दी गई। हत्या किस समुदाय के लोगों ने की इसका अंदाजा हत्या की क्रूरता से लगाया जा सकता है। गणेश शंकर एक सुधारवादी व्यक्ति थे, किन्तु बड़े धर्मपरायण और ईश्वरभक्त भी थे। जब तत्कालीन समाज में धर्मनिरपेक्षता के बीज पड़ रहे थे, तब गणेश अपनी धार्मिक पहचान को बनाए हुए थे।

समाज में शांति की इच्छा रखने वाला एक धर्मपरायण पत्रकार सही मायनों में क्रांतिकारी था। लिहाजा आप उन पत्रकारों को देखें और उनका नाम याद रखें जो गणेश शंकर का नाम लेकर धर्मनिरपेक्षता का ढोंग करते हैं। उनके नाम का उपयोग अपने स्वार्थ और अपनी झूठी पहचान को साधने का कार्य के लिए करते हैं। हम आपको गणेश शंकर विद्यार्थी की जीवनी भी उपलब्ध करा सकते थे, लेकिन हमने वर्तमान भारत के कुछ दोगले और छद्म पत्रकारों के उस झुंड से आपका परिचय कराया जो इतिहास के ऐसे ही कुछ पात्रों को अपने नैरेटिव के हिसाब से याद करता है और उनके नाम पर आपको भ्रमित करता है। 

याद रखिए सिर्फ प्रश्न पूछना ही पत्रकारिता नहीं है, अपितु सही प्रश्न पूछना और जिम्मेदार से प्रश्न पूछना ही वास्तविक पत्रकारिता है।