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शाने अली से प्रेम में हस्मतुल निशा ने करवाई होने वाले शौहर मनीष की हत्या, माँस काटने वाले चाकू से किए ताबड़तोड़ वार

उत्तर प्रदेश के लखनऊ में एक हत्या के मामले में पुलिस ने एक महिला और उसके प्रेमी समेत 6 लोगों को गिरफ्तार किया है। हस्मतुल निशा नाम की महिला पर आरोप है कि उसने शाने अली नाम के अपने प्रेमी से निकाह करने के लिए अपने मंगेतर मनीष को धोखे से सुनसान जगह पर बुलवाकर बेहरमी से मौत के घाट उतरवा दिया।

दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार बंथरा निवासी मनीष उर्फ शहाबुद्दीन की चाकुओं से गोदकर हत्या की गई। उसका शव खून से लथपथ अवस्था में कल्ली पूरब के बाबूखेड़ा में निजी प्लॉन्टिंग साइड के पीछे खेत में मिला। शव से थोड़ी दूर पर मिली मृतक की बाइक से पुलिस ने उसके परिजनों का पता लगाया।

इसके बाद मनीष के भाई अनीश ने इस केस में हसमतुल निशा और उसके दो भाइयों के विरुद्ध केस दर्ज कराया। पड़ताल में पता चला कि हस्मतुल निशा का कल्ली पश्चिम निवासी चिकन का काम करने वाले शाने अली उर्फ सानू के साथ प्रेम संबंध थे। मगर, परिवार वाले उसके प्रेम संबंध के खिलाफ थे, इसलिए उससे सारे रिश्ते तुड़वाकर 6 माह पूर्व उसकी शादी मनीष से तय कर दी थी।

डीसीपी के अनुसार, आरोपित महिला हस्मतुल निशा ने पहले तो इस संबंध में मुँह नहीं खोला, लेकिन बाद में सख्ती से पूछताछ में उसने पूरे घटनाक्रम के बारे में बताया। उसके मुताबिक पहले उसने अपने प्रेमी को हत्या के लिए मनाया, उसके बाद एक बर्थडे पार्टी में शामिल होने को कहा।

मनीष, ट्रांस्पोर्ट नगर में जहाँ काम करता था वहाँ से 1 हजार रुपए लेकर पार्टी में जाने की बात कहकर निकला और बताए गए स्थान पर पहुँचा। इसके बाद मुख्य आरोपित शाने अली ने अपने दोस्तों को बुलाया। फिर पीजीआई क्षेत्र के एक निजी स्कूल के पास से उसे उसकी होने वाली बीवी से मिलाने की बात कहकर अपने साथ ले गया। वहाँ उन्होंने डॉग चेन से मनीष का गला दबाया और माँस काटने वाले चाकू से सीने पर ताबड़तोड़ कई वार किए। बाद में मोटरसाइकिल से मौके से फरार हो गए।

डीसीपी ने यह भी बताया कि उन्हें मामले की जाँच में सीडीआर के जरिए महत्तवपूर्ण सुराग मिले थे। इसी के बाद सारी जाँच को आगे बढ़ाया गया। हस्मतुल निशा को पकड़ने के बाद चिकन का काम करने वाले उसके प्रेमी शाने अली, उसके दोस्त अरकान, संजू गौतम, अमन कश्यप, समीर मोहम्मद को गिरफ्तार करके उनके पास से चाकू, डॉग, चैन, मोटरसाइकिल, 6 मोबाइल सहित सामान बरामद किया गया।

‘दुनिया को छोड़ने का समय आ गया है’- एंटीलिया केस में फँसे सचिन वाजे ने लगाया WhatsApp स्टेटस: रिपोर्ट्स

एंटीलिया बम केस में मुंबई पुलिस अधिकारी व एनकाउंटर स्पेशलिस्ट सचिन वाजे का नाम सामने आने के बाद उन्होंने अपने जीवन के खत्म होने की ओर इशारा किया है। अपने व्हॉट्सएप स्टेटस में उन्होंने अपने ऊपर लगे आरोपों को खारिज करते हुए लिखा कि अब समय आ गया है दुनिया को अलविदा कहा जाए।

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार इस संदेश में लिखा है, “3 मार्च 2004। सीआईडी ​​के साथी अधिकारियों ने मुझे झूठे मामले में गिरफ्तार किया। वह गिरफ्तारी आज की तारीख तक भी अनिर्णायक है। मुझे लग रहा है कि इतिहास को फिर से दोहराया जाएगा। मेरे साथी अधिकारी मुझे झूठा फँसाना चाहते हैं। इस बार परिदृश्य में थोड़ा अंतर है। तब शायद मेरे पास 17 साल की आशा, धैर्य, जीवन और सेवा भी थी। अब मेरे पास न तो 17 साल का जीवन होगा और न ही सेवा और न ही जीने के लिए धैर्य। मुझे लगता है कि दुनिया को अलविदा कहने का समय नजदीक आ रहा है।”

गौरतलब है कि सचिन वाजे के इस स्टेटस की बात सामने आने के बाद इसी बीच उन्होंने ने NIA के दफ्तर पहुँचकर अपना बयान भी दर्ज करवाया है। इससे पहले ठाणे के सत्र कोर्ट में उनकी अंतरिम जमानत याचिका को खारिज किया गया था।

बता दें कि सचिन वाजे को लेकर केस एंटीलिया के बाहर मिले विस्फोटकों से लदी और उस कार के मालिक मनसुख हिरेन की मृत्यु के ईर्द गिर्द है। बुधवार को उनका नाम इस केस में उछलने के बाद उन्हें मुंबई पुलिस क्राइम ब्रांच से हटाया गया था। पड़ताल में पता चला था कि जून 2020 के बाद से वेज कार के मालिक मनसुख हिरेन के संपर्क में थे।

हिरेन की पत्नी ने इस मामले में सचिन वाजे पर गंभीर आरोप लगाए थे। उन्होंने कहा कि पुलिस अधिकारी सचिन वाजे ही उनके पति की उस स्कॉर्पियो कार का प्रयोग कर रहे थे, जो एंटीलिया के बाहर मिली थी। बकौल विमला हिरेन, वाजे ने उनके पति से इस मामले में गिरफ्तार हो जाने को कहा था और जमानत दिलाने का आश्वासन भी दिया था। 

मंदिरों की 50000 एकड़ भूमि पर कब्जा, 1200 प्राचीन प्रतिमाएँ चोरी, 12000 लगभग खत्म: जानिए क्यों जरूरी है ‘फ्री टेम्पल्स’

सद्गुरु जग्गी वासुदेव मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं और उनका मानना है कि हमारे प्राचीन धार्मिक धरोहरों को बचाना है तो हमें उन्हें सरकार के कब्जे से मुक्त कराना ही होगा। उन्होंने इसके लिए मिस्ड कॉल कैम्पेन भी शुरू किया है। हालाँकि, उनका अभियान फ़िलहाल तमिलनाडु के मंदिरों के लिए है, लेकिन साफ़ है कि इसका असर व्यापक होगा और पूरे देश पर प्रभाव पड़ेगा।

सद्गुरु आखिर क्यों चाहते हैं कि मंदिरों को सरकार के नियंत्रण से मुक्त किया जाना चाहिए? दरअसल, हम एक ऐसे समय में रह रहे हैं जब आम जनमानस और विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को एयरलाइंस, एयरपोर्ट्स, इंडस्ट्री, माइनिंग और ट्रेड नहीं करना चाहिए। ये उसका कार्य नहीं है। एयर इंडिया और BSNL सालों से घाटे में है, ऐसे में ये साफ़ हो जाता है कि सरकार का कार्य शासन करना है, व्यापार नहीं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब ‘Disinvestment’ की बात करते हैं तो वो कई बार कह चुके हैं कि सरकार कारोबार करने के लिए नहीं है। सद्गुरु भी इसकी ही याद दिलाते हुए कहते हैं कि जब इन चीजों का प्रबंधन सरकार को नहीं करना चाहिए तो फिर इन पवित्र मंदिरों का प्रबंधन सरकार के पास क्यों है? उनका सीधा सवाल है कि सरकार के पास ऐसी क्या योग्तयाएँ हैं जो उन्हें इसका पात्र बनाती हैं?

तमिलनाडु में चुनाव होने हैं। इसीलिए, हिन्दुओं के लिए ये मामला और महत्वपूर्ण हो जाता है। फ़िलहाल वहाँ के मुख्यमंत्री एडापड्डी पलानिस्वामी हैं और ओ पनीरसेल्वम उप-मुख्यमंत्री, दोनों मिल कर इस सरकार को चलाते हैं। AIADMK भाजपा की गठबंधन साथी भी है। उधर स्टालिन के नेतृत्व वाली DMK सत्ता के लिए प्रबल दावेदार मानी जा रही है, जिसका गठबंधन कॉन्ग्रेस के साथ है। तमिलनाडु में यही दोनों द्रविड़ पार्टियाँ राज करती रही हैं।

ये वही द्रविड़ पार्टियाँ हैं, जिन्होंने ब्राह्मणों को गाली दे-दे कर अपना आधार बनाया है। पेरियार से लेकर करुणानिधि तक, हिन्दू देवी-देवताओं पर आपत्तिजनक टिप्पणियाँ करने वाले नेताओं की लंबी फेरहिस्त है। यहाँ सवाल ये उठता है कि अगर ईश्वर में इन नेताओं की आस्था ही नहीं है तो फिर इन्हीं नेताओं की सरकारें दशकों से मंदिरों का प्रबंधन क्यों करती आ रही हैं? क्या ये सच्चे श्रद्धालुओं को स्वीकार्य होना चाहिए?

राजनीतिक और सामाजिक रूप से सद्गुरु के प्रभाव को देखते हुए स्पष्ट था कि उनके आने से इस मुद्दे पर चर्चा भी होगी और उनके विरोधी विवाद भी खड़ा करेंगे। सद्गुरु ने किसी पार्टी विशेष के समर्थन या विरोध न करते हुए सभी दलों के अलावा सुपरस्टार रजनीकांत को भी इस मामले को उठाने को कहा है। सद्गुरु ये माँग उठाने वाले अकेले नहीं हैं। काफी पहले से इसे लेकर कई बार प्रदर्शन हो चुके हैं।

इसके पीछे दो तर्क दिए जाते हैं। पहला, मस्जिदों, चर्चों और गुरुद्वारों का प्रबंधन सरकार नहीं करती हैं। उनका नियंत्रण और प्रबंधन क्रमशः मुस्लिमों, ईसाईयों और सिखों के हाथ में रहता है। जिसकी श्रद्धा, वही उसका प्रबंधन करे। जो दान दे रहे हैं, जो आस्था रखते हैं, उनके हाथ में ही नियंत्रण हो। दूसरा, जब भारत को चिल्ला-चिल्ला कर सेक्युलर कहा जाता है और एक सेक्युलर राष्ट्र की सरकार मंदिरों को क्यों अपने कब्जे में रखना चाहती है?

फ़िलहाल ‘Hindu Religious and Charitable Endowments (HR&CE) Act’ के तहत मंदिरों का प्रबंधन सरकार के हाथों में है और तमिलनाडु में भी ऐसा ही एक एक्ट है। केरल का देवस्वोम बोर्ड वहाँ के सभी मंदिरों का नियंत्रण अपने पास रखता है। सभी राज्यों में कमोबेश यही व्यवस्था है। इन बोर्ड्स में सदस्यों और कर्मचारियों की नियुक्तियाँ भी सरकार के माध्यम से ही की जाती है। मंदिर के फंड्स को मंदिर के लिए खर्च करने की व्यवस्था है, लेकिन क्या ऐसा होता है?

आइए, जानते हैं कि जग्गी वासुदेव इस पर क्या कहते हैं। उन्होंने तमिलनाडु का आँकड़ा देते हुए बताया कि वहाँ करीब 12,000 मंदिर अवसान की ओर हैं, वो खात्मे की तरफ बढ़ रहे हैं। क्यों? क्योंकि वहाँ पूजा नहीं हो रही है। 34,000 मंदिर ऐसे हैं जिन्हें 10,000 रुपए वार्षिक के हिसाब से अपने कामकाज चलाने पड़ते हैं। यानी, महीने में मात्र 833 रुपए! प्रतिदिन के हिसाब से तो यह 28 रुपए भी नहीं पहुँच पाता।

ध्यान दीजिए, ये केवल तमिलनाडु के आँकड़े हैं। 37,000 मंदिर वहाँ ऐसे हैं, जहाँ सिर्फ एक ही व्यक्ति है जिसके हाथ में पूजा की पूरी जिम्मेदारी है। उनका प्रबंधन और सुरक्षा से लेकर सभी चीजें वो एक अकेला व्यक्ति निभा रहा है। सद्गुरु इसे ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ के लालच से जोड़ते हैं, जिसने इन मंदिरों पर कब्ज़ा करने की रणनीति अपनाई। उन्हें मंदिरों के महँगे धातुओं और धन से मतलब था। यहाँ न कोई श्रद्धा थी, न आस्था। सद्गुरु कहते हैं:

“एक आक्रांता कंपनी की ये नीति आज तक चली आ रही है, जिसे देख कर दुःख होता है। एक मंदिर सिर्फ पूजा की जगह ही नहीं होती, बल्कि ये समुदाय की आत्मा है। तमिलनाडु में अधिकतर शहरों को मंदिरों को केंद्र मान कर बनाया गया और फिर उन मंदिरों के आसपास शहर बसे। पहले मंदिर बसे, फिर शहर। आज भी वो मंदिर अवसान की तरफ हैं। अगर इन मंदिरों को ध्वस्त किया गया होता तो श्रद्धालु उन्हें फिर से बना लेते, लेकिन वो मंदिरों का गला घोंट रहे हैं। विजयनगर के लीपाक्षी मंदिर को ही देख लीजिए। एक भव्य और शक्तिशाली स्थल, जहाँ हजारों श्रद्धालु आया करते हैं। आज ये ख़त्म हो रहा है। इसमें नई जान फूँकने के लिए सरकार को मंदिरों का नियंत्रण छोड़ना होगा।”

मंदिरों पर अधिकार ज़माने के लिए मद्रास रेगुलेशन-111, 1817 लाया गया, लेकिन ईस्ट इंडिया कम्पनी ने 1840 में यह रेगुलेशन वापस ले लिया था। इसके बाद, 1863 में रिलिजियस एंडोवमेंट एक्ट लाया गया, जिसके अनुसार मंदिर ब्रिटिश ट्रस्टी को सौंप दिए गए। तमिलनाडु सरकार ने वर्ष 1951 में एक कानून पारित किया– ‘हिन्दू रिलिजियस एंड एंडोवमेंट एक्ट’। 1959 में तत्कालीन कॉन्ग्रेस राज्य सरकार ने हिन्दू रिलिजियस एंड चेरिटेबल एक्ट पास किया।

सद्गुरु ने कोयम्बटूर में महाशिवरात्रि के दिन गुरुवार (मार्च 11, 2021) को इसके लिए मिस्ड कॉल अभियान शुरू किया। ‘ईशा फाउंडेशन’ के बैनर तले 8300083000 फोन नंबर जारी किया गया, जिस पर कॉल कर के आप मिस्ड इस अभियान को समर्थन दे सकते हैं। उन्होंने तमिलनाडु के दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों को पत्र लिख कर इसे अपने-अपने घोषणापत्रों में शामिल करने का निवेदन किया। उनका स्पष्ट कथन है – मंदिरों का प्रबंधन श्रद्धालुओं के हाथ में हो।

ईशा योग सेंटर में हर वर्ष महाशिवरात्रि के मौके पर लाखों लोग आदियोगी की प्रतिमा के सामने जुटते हैं और ध्यान, योग, मेडिटेशन से परिपूर्ण कार्यक्रम में भाग लेते हैं। रात भर कार्यक्रम चलता है। इस बार भी ये कार्यक्रम हुआ, लेकिन कोरोना संक्रमण के कारण सरकारी व मेडिकल दिशानिर्देशों का पालन करते हुए अधिकतर लोगों को इससे ऑनलाइन जुड़ने को कहा गया था। इसी दौरान कावेरी नदी को बचाने के अलावा सद्गुरु ने मंदिरों को मुक्त कराने की बात की।

सद्गुरु का कहना है कि अगर सरकार को मंदिरों का नियंत्रण करना ही है तो वो स्वीकार कर लें कि वो लोकतांत्रिक नहीं हैं, बल्कि ईश्वरतंत्र शासन हैं, ईश्वर के नाम पर सत्ता चलाते हैं। उनका सवाल जायज है। फिर ये सेक्युलरिज्म का नाटक क्यों? जब किसी भी अन्य मजहब के स्थलों को सरकार प्रबंधित नहीं कर रही है तो मंदिरों का क्यों? न मंदिरों की सुरक्षा हो रही है और न ही उनकी परंपराओं का पालन।

फरवरी 2018 में मद्रास हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से माना था कि ये बोर्ड मंदिरों और उसकी संपत्ति की सुरक्षा में विफल रहे हैं और आदेश दिया था कि कम से कम वो 50,000 एकड़ की मंदिरों की उन जमीनों को वापस पाने के लिए प्रयास करें, जिन पर अवैध रूप से कब्ज़ा कर लिया गया है। तब 5.25 लाख एकड़ की मंदिरों की भूमि में से मात्र 4.78 लाख एकड़ बची थी। मंदिरों की आय इन्हीं सम्पत्तियों से ही तो आती हैं।

एक और भयवाह आँकड़ा है तमिलनाडु से। वहाँ के मंदिरों में स्थित देवता भी सुरक्षित नहीं हैं। 1992 से 2007 के बीच तमिलनाडु की मंदिरों से 1200 प्राचीन प्रतिमाओं को चोर और तस्कर उड़ा कर ले गए। इनमें से 350 प्रतिमाओं का अब तक कोई थाह-पता नहीं है। इनमें से मात्र 18 को ही पुलिस वापस पा सकी और 50 के लोकेशन का पता लगा। 36,595 मंदिरों में से मात्र 11,500 में ही प्रतिमाओं को सुरक्षित रखने के लिए कमरे हैं।

UNESCO की एक रिपोर्ट भी अगस्त 2017 में सामने आई थी, जिसमें बताया गया था कि तमिलनाडु के कई प्राचीन मंदिर अब अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। मंदिर के परिसरों में अवैध निर्माण हो गए हैं। संस्था की टीम ने पाया था कि हजारों वर्ष पुराने मंदिरों की प्रतिमाएँ बिना किसी सुरक्षा के पड़ी हुई हैं। तंजावुर में राजेंद्र चोल के राज्याभिषेक के समय का एक मंदिर ध्वस्त कर दिया गया है। यूनेस्को ने HR&CE विभाग से कहा कि भले पूजा-पाठ वो कराए, लेकिन मंदिरों के पुनर्निर्माण का कार्य ASI जैसी एजेंसियों को दे।

‘ये कीबोर्ड वॉरियर लोगों के दिमाग में जहर घोल रहा है’: कुणाल कामरा को SC में दिया जवाब

वामपंथी गालीबाज स्टैंड अप कॉमेडियन कुणाल कामरा के ख़िलाफ़ चल रहे कोर्ट की अवमानना मामले में एक याचिकाकर्ता ने अपना प्रत्युत्तर सुप्रीम कोर्ट में जमा किया है। इसमें याचिकाकर्ता ने कुणाल कामरा द्वारा दायर किए गए हलफनामे को कामरा के अहंकार, घमंड, अज्ञानता और इगोटिज्म और पुरुषवादी रवैये को दिखाने वाला कहा। 

रिपोर्ट्स के अनुसार, मामले में याचिकाकर्ताओं में से एक लॉ छात्र श्रीरंग कटनेश्वर (Shrirang Katneshwarkar) ने अपनी प्रतिक्रिया कोर्ट में जमा करते हुए कहा कि कॉमेडियन कुणाल कामरा के पास 1.7 मिलियन फॉलोवर्स हैं, वह अपने फॉलोवर्स के दिमाग पर जहरीली बातें डाल सकते हैं। साथ ही न्यायपालिका में बने उनके विश्वास को झकझोर सकते हैं।

अपने प्रत्युत्तर में याचिकाकर्ता ने कामरा को ‘कीबोर्ड वॉरियर’ कहा है जो लोगों के दिमाग में जहर घोल रहा है। इसमें कामरा के ट्वीट को ‘अपमानपूर्ण ट्वीट’ कहा गया है, साथ ही उनके ट्वीट पर जोक का लेबल लगाने से भी आपत्ति जताई है। याचिकाकर्ता का मानना है कि कामरा के ट्वीट कोर्ट के मान को कम करते हैं और न्यायिक प्रणाली के प्रति लोगों के विश्वास को हिलाते हैं।

याचिकाकर्ता का कहना है, “कुणाल कामरा द्वारा दायर हलफनामे ने सुप्रीम कोर्ट को उनके कर्तव्यों को सिखाने की कोशिश की है, और उसे अपने ‘निंदनीय ट्वीट्स’ को मजाक / व्यंग्य / हास्य के रूप में सही नहीं ठहराना चाहिए।”

इसके अलावा याचिकाकर्ता का कामरा के लिए ये भी कहना है कि उनके पास सेंस ऑफ ह्यूमर की कमी है। उन्होंने अपने दिमाग की सिर्फ़ घृणा दिखाई है। उन्हें आत्मनिरीक्षण करना चाहिए और अपने पुरुषवादी रवैया में बदलाव करना चाहिए।

गौरतलब है कि ये प्रत्युत्तर कोर्ट द्वारा कुणाल के मामले को कुछ समय के लिए स्थगित किए जाने के बाद डाला गया है। 22 फरवरी को इससे पूर्व कुणाल कामरा के विवादित ट्वीट के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें राहत दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने कथित विवादित ट्वीट मामले में अवमानना की कार्यवाही को चार सप्ताह के लिए स्थगित कर दिया था।

कामरा ने अदालत में दायर अपने हलफनामे में कहा था कि जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट जनता के उसमें विश्वास को महत्व देता है, ठीक उसी तरह उसे जनता पर यह भी भरोसा करना चाहिए कि जनता ट्विटर पर सिर्फ कुछ चुटकुलों के आधार पर अदालत के बारे में अपनी राय नहीं बनाएगी।

बता दें कि 18 दिसबंर 2020 को शीर्ष अदालत ने स्टैंड अप कॉमेडियन कुणाल कामरा को कारण बताओ नोटिस जारी किया था। उस दौरान अटॉर्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल का पत्र कोर्ट की सुनवाई के बीच पढ़ा गया था, जिसमें कामरा के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने को लेकर सहमति दी गई थी और कहा गया था,

“लोग समझते हैं कि कोर्ट और न्यायाधीशों के बारे में कुछ भी कह सकते हैं। वह इसे अभिव्यक्ति की आजादी समझते हैं। लेकिन संविधान में यह अभिव्यक्ति की आजादी भी अवमानना कानून के अंतर्गत आती है। मुझे लगता है कि ये समय है कि लोग इस बात को समझें कि अनावश्यक और बेशर्मी से सुप्रीम कोर्ट पर हमला करना उन्हें न्यायालय की अवमानना कानून, 1972 के तहत दंड दिला सकता है।”

अटॉर्नी जनरल ने अपने पत्र में कामरा के ट्वीट को बेहद आपत्तिजनक बताया था। साथ ही कहा था कि ये ट्वीट न केवल खराब हैं बल्कि व्यंग्य की सीमा को लाँघ रहे हैं और कोर्ट की अवमानना कर रहे हैं।

बुर्का पर बैन लगाएगा श्रीलंका, 1000 से ज्यादा मदरसा भी होंगे बंद; राष्ट्रीय सुरक्षा का दिया हवाला

अप्रैल 2019 में इस्लामिक आतंकवाद ने श्रीलंका को दहला दिया था। उसके बाद से ही वह इस्लामी कट्टरपंथ को लेकर लगातार सख्ती दिखा रहा है। इसी क्रम में वह अब बुर्का पर प्रतिबंध लगाने जा रहा है। साथ ही 1000 से ज्यादा इस्लामिक स्कूल (मदरसा) भी बंद किए जाएँगे।

श्रीलंका के पब्लिक सिक्योरिटी मंत्री सरत विरासेकेरा (Sarath Weerasekera) ने इसकी जानकारी दी है। उन्होंने बताया कि शुक्रवार (12 मार्च 2021) को उन्होंने कैबिनेट से मँजूरी के लिए इससे संबंधित दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए हैं। इसमें बुर्का पहनने पर प्रतिबंध लगाने की बात कही गई है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए यह फैसला किया गया है।

विरासकेरा ने बताया, “हमारे शुरुआती दिनों में मुस्लिम महिलाएँ और लड़कियाँ बुर्का नहीं पहनती थीं। यह मजहबी अतिवाद का प्रतीक है जो हाल में ही सामने आया है। हम इसे निश्चित तौर पर बंद कर देंगे।” उल्लेखनीय है कि बौद्ध बहुल देश में चर्च और होटलों पर 2019 में हुए आतंकी हमलों के बाद बुर्का पहनने पर अस्थायी तौर पर पाबंदी लगा दी गई थी। इन हमलों में 250 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी।

विरासेकेरा ने कहा कि सरकार की योजना 1000 से ज्यादा ऐसे मदरसों को बंद करने की भी है, जो राष्ट्रीय शिक्षा नीति की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं। उन्होंने कहा, “कोई भी स्कूल खोल कर बच्चों को वह नहीं पढ़ा सकता जो वह पढ़ाना चाहता है।”

इससे पहले पिछले साल कोविड संकट के दौरान श्रीलंकाई सरकार ने संक्रमण से मौत होने पर मुस्लिमों की इच्छा के विपरीत उन्हें दफनाने की बजाए उन्हें जलाने के आदेश दिए थे। अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय अधिकार समूहों की आलोचना के बाद इस साल इस आदेश को हटा लिया गया था।

2019 के हमले के बाद गोटाभाया राजपक्षे श्रीलंका के राष्ट्रपति चुने गए थे। लिट्टे के सफाए के लिए जाने जाने वाले राजपक्षे ने सत्ता सँभालते ही इस्लामिक आतंकवाद से सख्ती से निपटने की बात कही थी। हिंदुस्तान टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, “लिट्टे से हम काफ़ी अच्छी तरह से निपटे। हमारी खुफिया एजेन्सियाँ उस आंदोलन की पृष्ठभूमि, नेताओं, तौर-तरीकों और इतिहास से अच्छी तरह अवगत थे। खुफिया एजेंसियों को उनके नेताओं के ठिकानों के बारे में पता था। लेकिन, इस्लामी आतंकवाद को लेकर दुर्भाग्य से ऐसा कुछ भी नहीं है। यह नया खतरा है। इससे निपटने के लिए हमें और क्षमता विकसित करनी पड़ेगी। लेकिन मैं अपने देश में इस्लामी आतंकवाद को पनपने नहीं दूँगा और कभी बर्दाश्त नहीं करूँगा।” इस दिशा में उन्होंने भारत के साथ मिलकर काम करने की बात कही थी।

गौरतलब है कि यूरोपीय देश स्विट्जरलैंड भी बुर्का पर बैन की तैयारी कर रहा है। पिछले दिनों बुर्का और नकाब पर प्रतिबंध को लेकर वहाँ हुए रेफेरेंडम में 51% वोटरों ने इसका सम​र्थन किया था। स्विट्जरलैंड के 26 में से 15 प्रांतों में पहले से ही ऐसे प्रतिबंध लागू हैं।

अमेरिका: 28 साल बाद स्कूलों में योग पर लगा प्रतिबंध हटाएगा अलबामा, अंग्रेजी में होंगे आसन के नाम

अमेरिकी प्रांत अलबामा करीब 28 साल बाद स्कूलों में योग पर लगा प्रतिबंध हटाने जा रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, अलाबामा हाउस ऑफ रिप्रेजेंटिव्स ने इससे संबंधित एक बिल को मँजूरी दे दी है। गुरुवार (12 मार्च 2021) को सदन में ये बिल 73-25 वोट के साथ पास किया गया। इसमें योग शिक्षा को ऐच्छिक रूप से स्कूलों में शामिल करने की बात की गई है।

हालाँकि, इसी के साथ ये भी कहा गया कि मंत्रों के उच्चारण और ‘नमस्ते’ कहना प्रतिबंधित होगा। लोकल स्कूल बोर्ड्स को इससे जुड़ी क्लास की समय सीमा व फ्रीक्वेंसी तय करनी होगी। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस बिल को डेमोक्रेटिक रिप्रजेंटेटिव के जेरेमी ग्रे द्वारा स्पॉन्सर किया गया। उन्होंने कहा, “मैं 7 साल से योग कर रहा हूँ। मुझे इसके फायदे पता हैं। ये मेरे दिल के करीब था और मुझे लगता है अलाबामा के भी होगा।”

ग्रे का कहना है कि कुछ शिक्षक वैसे भी योग करवाते हैं बिना ये समझे कि योग बैन है। बाकी भी इसकी शिक्षा देना चाहते हैं। मालूम हो कि वर्तमान में इस बिल के अनुसार योग आसन के नाम अंग्रेजी में पढ़ाए जाएँगे। ग्रे ने कहा, “कुछ सदस्यों को कई ईमेल आए कि योग हिंदुत्व का हिस्सा है। लेकिन वह (ग्रे) कहते हैं कि कुछ लोगों का दिमाग कभी नहीं बदल सकता।” 

बता दें कि अलबामा बोर्ड ऑफ एजुकेशन ने पब्लिक स्कूल क्लासरूम में 1993 में योग बैन करने को कहा था। इस प्रतिबंध के पीछे कन्जर्वेटिव ग्रुप्स का हाथ भी बताया जाता है।

उल्लेखनीय है कि इस सप्ताह पारित बिल का उद्देश्य छात्रों को व्यायाम और स्ट्रेचिंग तकनीक का अभ्यास करने की अनुमति देना है, लेकिन किसी भी धार्मिक भाषा से दूर रखते हुए। खबरों के अनुसार, नया बिल मंत्र, मुद्रा, मंडलों और नमस्ते अभिवादन के उपयोग को प्रतिबंधित करता है। 

इस प्रतिबंध को हटवाने के लिए जेरेमी ग्रे 3 साल से कोशिश कर रहे थे। वह खुद उत्तरी कैरोलिना राज्य के पूर्व खिलाड़ी हैं जो कई सालों से योग कर रहे हैं। उनका कहना है कि व्यायाम के जरिए बच्चे मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ होंगे।

जिन लोगों ने सदन में योग के ख़िलाफ़ वोट दिया, उनके लिए ग्रे कहते हैं कि उन्हें ये देखकर लगता है कि कइयों को योग के बारे में गलत बताया गया है। उनके अनुसार, “मेरे बहुत से साथियों को सिर्फ इसके हिंदू धर्म का हिस्सा होने के बारे में बहुत सारे ईमेल मिले। यदि आप इसे स्थानीय वाईएमसीए में कर सकते हैं, तो आप इसे चर्चों में कर सकते हैं। जब पब्लिक स्कूलों की बात आती है तो यह समस्या क्यों है? कुछ लोग कभी भी अपने विचार नहीं बदल सकते।”

2 हफ्ते की बच्ची का खतना करने की फिराक में थी 2 औरतें, कोर्ट ने कहा- इनको बच्ची वापस करना दोबारा शेर की गुफा में डालने जैसा

ऑस्ट्रेलिया में 2 हफ्ते की मासूम बच्ची के गुप्तांग को विकृत करने की साजिश रचने के आरोप में दो महिलाओं के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई हो रही है। महिलाओं के नाम- सबरीना लाइटबॉडी (Sabrina Lightbody) और नोरिडाह बिंते मोहम्मद (Noridah Binte Mohd) है। दोनों पर्थ के दक्षिण में कैनिंगटन पुलिस जिले के एक उपनगर से हैं।

कथित तौर पर दोनों महिलाओं ने इस साल जनवरी में एक डॉक्टर से बच्ची का खतना करवाने के लिए संपर्क किया था। हालाँकि, डॉक्टर ने इसके लिए मना कर दिया और प्रशासन को इसके बारे में बता दिया। जाँच हुई तो चाइल्ड एब्यूज स्क्वॉड के जासूसों ने मामले को सच पाया। 

बता दें कि फीमेल जेनिटल म्युटिलेशन यानी खतना पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में अपराध माना जाता है। इसलिए ऑस्ट्रेलिया पुलिस ने महिलाओं पर बच्ची के विरुद्ध साजिश रचने के आरोप लगाया। दोनों को शुक्रवार को आरमाडेल मजिस्ट्रेट कोर्ट (Armadale Magistrates Court) के समक्ष पेश किया गया। 

इस सुनवाई में बाल संरक्षण अधिकारियों से बच्चे के कस्टडी को फिर से हासिल करने के महिलाओं के अनुरोध को कोर्ट द्वारा अस्वीकार कर दिया गया। उन्होंने जेनिटल म्यूटिलेशन को एक गंभीर अपराध भी बताया।

मजिस्ट्रेट ने कहा कि महिलाओं को बच्ची वापस करना बिलकुल ऐसे है, जैसे बच्चे को दोबारा शेर की गुफा में डाल दिया गया हो। संभव है कि इस केस में महिलाओं के दोषी पाए जाने के बाद 10 साल की सजा होगी।

पुलिस का कहना है कि बच्ची के गुप्तांग को विकृत करना सांस्कृतिक मान्यताओं के तौर पर योजनाबद्ध किया गया था। लेकिन बिना किसी मेडिकल कारण के महिला के गुप्तांग का बाहरी हिस्सा हटाना या फिर गुप्तांगों को चोट पहुँचाना ऑस्ट्रेलिया में बैन है। रिपोर्ट बताती है कि पूरे ऑस्ट्रेलिया में करीब 53000 महिलाएँ इस दर्द को झेल चुकी हैं।

जानकारी के मुताबिक आमतौर पर जेनिटल म्यूटिलेशन की प्रक्रिया 4 से 10 साल की उम्र में की जाती है। लेकिन इसे शादी से पहले, गर्भावस्था के दौरान या फिर बच्चे के जन्म के बाद भी किया जा सकता है। ये प्रक्रिया तमाम सामाजिक व मनोवैज्ञानिक उदाहरण दे देकर इस्लामिक कानून में अनिवार्य की गई है।

Rutgers-Newark यूनिवर्सिटी ने हिन्दुओं से माँगी माफ़ी, ‘वामपंथी’ इतिहासकार ऑड्रे ट्रूस्के के हिन्दू-विरोधी बयानों पर साधी चुप्पी

रटगर्स-नेवार्क (Rutgers-Newark) यूनिवर्सिटी द्वारा इतिहासकार ऑड्रे ट्रूस्के के हिन्दू विरोधी बयानों को ‘अकादमी स्वतंत्रता’ बता कर उसका बचाव करने के कुछ ही दिनों बाद अब यूनिवर्सिटी ने इस मामले में अपने कदम पीछे खींचे हैं और हिन्दुओं से माफ़ी माँगी है। यूनिवर्सिटी ने कहा है कि हिन्दू समुदाय से संचार में उसे दिक्कत आई और इस वजह से ग़लतफ़हमी हो गई। हालाँकि, इतिहासकार के ताज़ा बयानों को लेकर यूनिवर्सिटी ने चुप्पी साधे रखी है।

शुक्रवार (मार्च 12, 2021) को दिए गए बयान में यूनिवर्सिटी ने कहा कि वो हिन्दू समुदाय के सदस्यों का समर्थन करता है और अपने पिछले संदेशों को उन तक ठीक से न पहुँचा पाने के कारण ‘गंभीर रूप से माफ़ी’ माँगता है। रटगर्स-नेवार्क यूनिवर्सिटी ने कहा कि हिन्दू समुदाय के लोगों के साथ हुई बैठक में उसने इस ग़लतफ़हमी पर बात करते हुए फिर से माफ़ी माँगी है। उसने कहा कि ताज़ा घटनाओं में हिन्दुओं को जो ठेस पहुँची है, उससे वो दुःखी है।

यूनिवर्सिटी ने कहा, “समरसता के प्रति हमारी प्रतिबद्धता में सारे धर्म शामिल हैं। एक व्यक्ति या समुदाय के रूप में आपके पास अपने धर्म और अपने चीजों को सेलिब्रेट करने का न सिर्फ अधिकार है, बल्कि स्वतंत्रता भी है।” ऑड्रे ट्रूस्के के बयानों का समर्थन करने वाले यूनिवर्सिटी ने कहा कि वो हिन्दुओं की समृद्ध और पवित्र परम्पराओं से परिचित है। उसने कहा कि हिन्दुओं को मिल रही धमकियों और गंदे संदेशों को खत्म होना चाहिए।

यूनिवर्सिटी ने कहा, “हम विश्वविद्यालय के छात्र नेताओं के प्रति कृतज्ञ हैं। उन्होंने आवाज़ उठाई और हिन्दू समुदाय की भावनाओं को हमारे समक्ष रखा। हम उनके साथ मिल कर एक ऐसे वातावरण के निर्माण के लिए कार्य करेंगे, जो हर धर्मों और संस्कृतियों को गले लगाएगा। स्वस्थ संचार व्यवस्था के लिए ये ज़रूरी है और कठिन भी।” पूरे बयान में इतिहासकार ऑड्रे ट्रूस्के के हिन्दू विरोधी बयान का कहीं जिक्र नहीं किया गया।

वहाँ के हिन्दू छात्र इस बयान से संतुष्ट नहीं हैं और उन्होंने कहा है कि ये तो शुरुआत है और लड़ाई और आगे जाएगी। कई हिन्दू छात्रों ने यूनिवर्सिटी प्रबंधन से मुलाकात करके ‘वामपंथी’ इतिहासकार ऑड्रे ट्रूस्के के प्रोपेगंडा से आगाह कराया। हिन्दू संस्थाओं के साथ मिल कर इस मामले पर काम कर रही इंदू विश्वनाथन ने कहा कि यूनिवर्सिटी के बयान में जो चीजें हैं, छात्रों के साथ बातचीत के दौरान उससे कहीं अधिक व्यापक चर्चा हुई थी।

बता दें कि छात्रों के एक समूह ने रटगर्स-नेवार्क विश्वविद्यालय (Rutgers-Newark University) को एक याचिका देते हुए विवादित इतिहासकार और प्रोफेसर ऑड्रे ट्रूस्के (Audrey Truschke) के खिलाफ हिंदू धर्म के अपमान के लिए कड़ी कार्रवाई करने के लिए आग्रह किया था, मगर संस्थान ने कार्रवाई करने के बजाय ‘हिंदू विरोधी’ टिप्पणी को ‘अकादमिक स्वतंत्रता’ बताते हुए इसे सही ठहरा डाला था।

प्रोफेसर ट्रुस्के ने मुगल राजा का यह कहकर बचाव किया कि उसने नष्ट करने की तुलना में अधिक हिंदू मंदिरों की रक्षा की और उसने मुगल राज्य के कुलीन स्तरों पर हिन्दुओं की भागीदारी बढ़ाई।” ऑड्रे ट्रूस्के का हिंदू-विरोधी रुख नया नहीं है। 2018 में, ‘प्रख्यात’ इतिहासकार ने यह दावा किया था कि भगवान राम को ‘अग्निपरीक्षा’ के दौरान देवी सीता ने एक ‘मेसोजिनिस्ट पिग’ कहा था। वो अक्सर हिन्दू विरोधी बयान देती रहती हैं।

मांगलिक कार्यक्रम में थूक लगा कर रोटियाँ बना रहा था मोहसिन, वीडियो वायरल होने पर गिरफ्तार: मेरठ के बाद दूसरा मामला

मेरठ के बाद अब उत्तर प्रदेश के ही गाजियाबाद से रोटी बनाते समय तंदूर में थूक लगाने का वीडियो सामने आया है। जिले के भोजपुर गाँव का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसमें एक व्यक्ति को रोटियाँ सेंकते समय उसमें थूकते हुए देखा जा सकता है। पुलिस ने जाँच के बाद जब आरोपित मोहसिन की पहचान की और उसकी तलाश में दबिश देनी शुरू की तो वह मुरादनगर स्थित अपने घर से फरार हो गया।

हालाँकि, उत्तर प्रदेश पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया है। गाजियाबाद पुलिस ने कहा, “वीडियो का तत्काल संज्ञान लेते हुए FIR दर्ज कर आरोपित अभियुक्त मोहसिन को गिरफ्तार कर लिया गया है। वैधानिक कार्यवाही शुरू कर दी गई है।” उक्त वीडियो गाँव के एक मांगलिक कार्यक्रम का है, जो कुछ दिनों पहले आयोजित किया गया था। कार्यक्रम में भोजन का जिम्मा हलवाइयों को दिया गया था। नान की रोटी बनाने के लिए इसी युवक को बुलाया गया था।

वीडियो में देखा जा सकता है कि मोहसिन रोटी बनाकर उसमें थूकता है और फिर उसे नान में सेंकने के लिए डाल देता है। थाना प्रभारी प्रदीप कुमार ने बताया कि शुक्रवार (मार्च 12, 2021) को भोजपुर पुलिस गाँव में पहुँची। वहाँ स्थानीय लोगों ने बताया कि उक्त वीडियो शादी समारोह का है, जिसमें मुरादनगर का मोहसिन रोटियाँ सेंक रहा था। इसके बाद उसे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। उसके खिलाफ FIR भी दर्ज कर ली गई है।

इससे पहले मेरठ में ऐसा मामला सामने आया था, जहाँ शादी समारोहों में थूक लगा कर रोटियाँ बनाने वाले नौशाद के ऊपर ‘राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA)’ के तहत मामला दर्ज कर कार्रवाई की गई थी। नौशाद ने बताया था कि वो 10-15 सालों से रोटी बना रहा है और उतने ही समय से रोटियों पर थूक भी लगा रहा है। हिन्दू जागरण मंच के महानगर अध्यक्ष सचिन सिरोही ने माँग की थी कि नौशाद पर रासुका की कार्रवाई की जाए।

असम में BJP बूथ अध्यक्ष को धारदार हथियारों से गोदा, MP में मंदिर जा रहे पार्टी नेता का गला बीच सड़क पर रेता

देश के दो राज्यों से भाजपा (BJP) नेता की हत्या की खबरें सामने आई है। मध्य प्रदेश के रीवा में भाजपा के ग्राम संयोजक सुरेंद्र तिवारी तो पूर्वी असम के तिनसुकिया जिले में पार्टी के बूथ अध्यक्ष देवानंद गोगोई की हत्या कर दी गई। मध्य प्रदेश वाली घटना महाशिवरात्रि के दिन गुरुवार (मार्च 11, 2021) की देर शाम हुई, असम वाली वारदात इसके अगले दिन हुई।

तिनसुकिया में भाजपा नेता की हत्या

असम में विधानसभा चुनाव के लिए तारीखों का ऐलान हो चुका है, जो मार्च 27 से लेकर अप्रैल 6 तक तीन चरणों में होना है। भाजपा बूथ स्तर की रणनीति पर खास ध्यान देती है। दुमदुमा-नागाँव में उसने देवानंद गोगोई को बूथ अध्यक्ष बनाया था। पता लगाया जा रहा है कि राजनीतिक रंजिश के कारण उनकी हत्या हुई है या कोई अन्य कारण है। वे अपने घर के पीछे कुछ काम कर रहे थे, तभी एक युवक ने धारदार हथियार से उन्हें गोद डाला।

गंभीर रूप से घायल होने के बाद उन्हें अरुणाचल प्रदेश स्थित बरदुम्सा सरकारी अस्पताल में ले जाया गया, जहाँ उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। इस घटना के बाद पूरे मार्घेरिटा विधानसभा क्षेत्र में तनाव का माहौल व्याप्त है। पुलिस ने आरोपित जयचंद्र गोगोई को गिरफ्तार कर लिया है, जो उसी गाँव का रहने वाला है। हत्या के बाद वो फरार हो गया था, जिसे दबोचने के लिए पुलिस ने टीम लगाई हुई थी।

असम के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनवाल ने इस मामले में राज्य के DGP को निर्देश दिया है कि वो दोषियों को जल्द से जल्द सज़ा दिलाएँ। उन्होंने इस घटना की निंदा भी की। उन्होंने कहा कि हिंसा के कृत्य बर्दाश्त नहीं किए जाएँगे। मंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने भी इस हत्याकांड पर दुःख जताया और पीड़ित परिजनों के लिए प्रार्थना की।

रीवा में भाजपा नेता की हत्या

मध्य प्रदेश में कानून-व्यवस्था को लेकर कई बार मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अधिकारियों के साथ बैठक कर उन्हें सख्त निर्देश दे चुके हैं। इसी बीच, नौढ़िया गाँव में भाजपा के ग्राम संयोजक की हत्या कर दी गई। धारदार हथियारों से करीब आधा दर्जन बदमाशों ने उनका गला रेत डाला। उनकी हत्या महाशिवरात्रि के मौके पर मंदिर जाते वक्त की गई।

रास्ते में अचानक से बदमाशों ने दौड़ कर उन पर हमला कर दिया। इस वारदात के दौरान आसपास मौजूद लोग दौड़कर मौके पर पहुँचे भी, लेकिन तब तक अपराधी फरार हो चुके थे। एसपी राकेश सिंह ने घटनास्थल पर जाकर स्थिति की समीक्षा की। इस मामले में 5 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। ग्रामीण सरेआम हुई हत्या के बाद आक्रोशित हैं।