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सऊदी में मोदी, जयपुर में वेंस, अमरनाथ यात्रा… अब लोगों को डराएँगे ‘कश्मीरियत’ और ‘जम्हूरियत’ जैसे शब्द, मुर्शिदाबाद से पहलगाम तक वही खतने वाली सोच

जम्मू कश्मीर के पहलगाम में आतंकी हमला हुआ है। सिर्फ़ आतंकी हमला ही नहीं, इसको इस्लामी आतंकी हमला कहिए। इतना भी नहीं, इसे हिन्दुओं को निशाना बनाकर किया गया इस्लामी आतंकी हमला कहिए। ऐसा इसीलिए, क्योंकि पुरुष पर्यटकों के पैंट खोल-खोलकर देखा गया कि उनका खतना हुआ है या नहीं। जिन-जिनका खतना नहीं हुआ था, उन्हें जान से हाथ धोना पड़ा। एक बड़े मैदान में लाशें पड़ी दिखीं, महिलाएँ चीख-चीख कर मदद माँगती दिखीं। इनमें कई ऐसे जोड़े थे जो नई-नई शादी के बाद हनीमून मनाने गए थे। ये अनुच्छेद-370 और 35A को निरस्त किए जाने के बाद का सबसे बड़ा आतंकी हमला है।

पहलगाम में नरसंहार, आप टाइमिंग देखिए

इस हमले की टाइमिंग देखिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंगलवार (22 अप्रैल, 2025) को ही सऊदी अरब के जेद्दाह पहुँचे हैं। वहाँ उनका भव्य स्वागत हुआ। उनके एयरक्राफ्ट को एस्कॉर्ट करने के लिए सऊदी अरब ने अपने जेट्स भेजे। ये अपने-आप में पीएम मोदी के प्रति खाड़ी मुल्क़ों के सम्मान को दिखाता है। जेद्दाह का एक वीडियो भी सामने आया, जिसमें एक शेख ‘राजी’ (2018) फिल्म का गाना ‘ऐ वतन, वतन मेरे आबाद रहे तू’ गाना गाते हुए दिखा। तमाम मुस्लिम शख्स भी पीएम मोदी के सामने इसे गुनगुनाते हुए दिखे। तभी अचानक से, ऐसी खबर!

प्रधानमंत्री ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से बातचीत करके पूरी स्थिति की जानकारी ली, उनके निर्देश पर अमित शाह तुरंत ग्राउंड जीरो पर निकल गए। याद कीजिए, जून 2024 में रियासी में माता वैष्णो देवी मंदिर जा रही बस पर हमला किया गया था। 20 मिनट तक गोलीबारी चलती रही थी। मृतकों में 2 साल का एक बच्चा भी था, जिसकी तस्वीर आजतक हमें झकझोड़ती रहती है। लेकिन, हम कमज़ोर याददाश्त वाले लोग हैं। चीजों को बड़ी जल्दी भूल जाते हैं। महिलाओं-बच्चों को निशाना बनाने वाले इन कायरों के कुछ ‘हमदर्द’ सिर्फ़ जम्मू कश्मीर ही नहीं बल्कि देश के भीतर भी बैठे हैं।

हाँ, तो मैं बात कर रहा था टाइमिंग की। इधर केंद्रीय मंत्री अमित शाह का पूरा ध्यान मार्च 2026 तक देश को नक्सल-मुक्त करने पर है, छत्तीसगढ़ के सुकमा और बीजापुर में हाल ही में 33 नक्सलियों के आत्म-समर्पण की ख़बर आई, जिनपर कुल 50 लाख रुपए का इनाम था। ऐसे सरेंडर लगातार हो रहे हैं। हमने इन नक्सलियों का उत्पात देखा है, इनका बचाव करने वाले फादर स्टेन स्वामी, सुधा भारद्वाज, वरवरा राव और गौतम नवलखा जैसों को समाज के भीतर से इन्हें समर्थन देते हुए देखा है। ये सब जेल गए, तभी नक्सलियों की कमर टूटी।

कुछ ही दिनों पहले जमीन पर जमीन हड़पते जा रहे वक़्फ़ बोर्ड में सुधार के लिए वक़्फ़ क़ानून बना संसद से पास होकर। इसके विरोध के नाम पर पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बनाने वाले हरगोविंद दास और उनके बेटे चंदन को घर में घुसकर काट डाला गया। मुस्लिम भीड़ के उत्पात के कारण 400 हिन्दुओं को मालदा पलायन करना पड़ा। कहीं से इस्लामी कट्टरपंथ के विरुद्ध एक शब्द नहीं निकला। उधर राहुल गाँधी अमेरिका में जाकर भारत के चुनाव आयोग पर हमला कर रहे हैं। इसीलिए मैंने कहा, इस हमले की टाइमिंग देखिए। निशाना बनाए गए पर्यटकों में महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और ओडिशा और तमिलनाडु जैसे ग़ैर-हिन्दीभाषी राज्यों के भी लोग हैं, पूरे देश में आतंक का एक सन्देश भेजा गया है।

टाइमिंग देखिए, क्योंकि 27 जून, 2025 से अमरनाथ यात्रा शुरू हो रही है। ध्यान दीजिए, ये यात्रा पहलगाम से ही शुरू होती है। वही इलाक़ा, जिसे आतंकियों ने निशाना बनाया है। टाइमिंग इसीलिए देखिए, क्योंकि अमेरिका के उप-राष्ट्रपति JD वेंस इसी दिन जयपुर के दौरे पर थे जहाँ वो पत्नी और बच्चों समेत आमेर के किले में घूमे, वहीं 1 दिन पहले ही उनकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बेहद ही सौहार्दपूर्ण माहौल में बैठक हुई थी। याद कीजिए, फरवरी 2020 के अंत में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प दिल्ली आए थे, तब दिल्ली में दंगा किया गया था। शाहीन बाग़ सज़ा हुआ था पड़ोसी मुल्क़ों के पीड़ित हिन्दुओं को नागरिकता देने वाले क़ानून CAA के विरुद्ध।

आतंकियों की इस बौखलाहट का कारण क्या?

अब अमेरिकी उप-राष्ट्रपति के दौरे के दौरान ये सब। भीतर के दंगाइयों और कश्मीर के आतंकियों की विचारधारा को अलग करके मत देखिए। अब आते हैं कारण पर। एक बड़ा कारण ये है कि जम्मू कश्मीर से लद्दाख को अलग किए जाने और शांतिपूर्ण विधानसभा चुनाव के बाद सरकार बनने के कारण आतंकी बेचैन थे। ऊपर से घाटी में पर्यटन फल-फूल रहा था। 2024 में लगभग 35 लाख, 2023 में 27 लाख और 2022 में 26 लाख पर्यटक कश्मीर घाटी पहुँचे थे (आँकड़े जम्मू को हटाकर)।

इनमें हजारों की संख्या में विदेशी पर्यटक भी शामिल थे। जैसा कि हमें पता है, भारत ने 2023 में G20 अध्यक्षता की और इस दौरान देशभर में तमाम बैठकें हुईं। जम्मू कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में मई 2023 में G20 की टूरिज्म वर्किंग ग्रुप की बैठकें हुईं। कश्मीर के उत्पाद विदेशी प्रतिनिधिमंडल को दिखाए गए, कलाकारों से उन्हें मिलवाया गया। श्रीनगर में तमाम स्थलों पर विदेशी प्रतिनिधिमंडल घूमा भी। ऐसे दृश्य आतंकियों को और उनके आकाओं को लगाकर असहज कर रहे थे।

ये कोई आम आतंकी हमला नहीं है, क्योंकि एक महिला की जान बख्शते हुए आतंकियों ने कहा कि जाओ मोदी को बता देना। इसीलिए मैंने लिखा, ‘सन्देश’ है ये। ऐसा नहीं है कि मोदी सरकार, तमाम ख़ुफ़िया/सुरक्षा एजेंसियाँ, जम्मू कश्मीर सरकार और अधिकारियों को ख़तरे का अंदाज़ा नहीं है या उनकी अगली रणनीति तय नहीं होगी। फिर भी, जो तेज़ स्थिति बनी है उसमें सबसे बड़ी चुनौती होगी पर्यटकों को वापस कश्मीर जाने के लिए प्रेरित करना। मरने कोई नहीं जाना चाहता। अमरनाथ यात्रा को लेकर रेजिस्ट्रेशन्स रद्द हों तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। सबके लिए अपनी जान पहली प्राथमिकता होती है।

कश्मीरियत और जम्हूरियत की रट्टेबाजी करती है परेशान

अगर जम्मू कश्मीर को आतंकवाद की गिरफ़्त से बचाना है तो सबसे पहले कश्मीरियत, जम्हूरियत और इंसानियत जैसे रट्टामार शब्दों से नेताओं को बचना होगा, क्योंकि अब ये जनता को परेशान करते हैं। जनता ने इनकी परिभाषा तभी समझ ली थी जब 1989 में भाजपा नेता टीकालाल टपलू को श्रीनगर स्थित घर में घुसकर मार डाला गया, जब जज नीलकंठ गंजू को हाईकोर्ट के पास ही मार डाला गया, जब रावलपुरा में स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना समेत भारतीय वायुसेना के 4 जवानों को मार डाला गया, जब बुजुर्ग कवि सर्वानंद कौल को उनके बेटे सहित घर में ही फाँसी पर लटका दिया गया।

जिनलोगों ने इन क्रूर घटनाओं को अंजाम दिया, उनमें से एक यासीन मलिक से दिल्ली में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हाथ मिलाते हैं। यही भारत की नियति बन गई थी, आज यही हिन्दुओं की नियति है। 2020 में दिल्ली का दंगा हो या फिर इस वर्ष मुर्शिदाबाद में हिन्दुओं का पलायन या पहलगाम में पर्यटकों पर हमला – इन्हें अलग करके देखने की भूल बिलकुल मत कीजिए। ये वही विचारधारा है, पैंट खोलकर खतना चेक करने वाली। हिन्दुओं को हर जगह वही मारती है।

सर्च ऑपरेशन चल रहा है। आतंकियों का सफाया भी होगा। कार्रवाई तेज़ होगी। लेकिन, एक भी मृतक को वापस नहीं जीवित किया जा सकेगा, ये एक क्रूर सच्चाई है। ‘मुस्लिम हो?’ पूछकर मारने वाली विचारधारा का कैसे काम तमाम किया जाएगा इसकी रणनीति बनानी होगी। जम्मू कश्मीर के बाद अब पश्चिम बंगाल वहाँ की सत्ता की तुष्टिकरण की नीति के कारण हाथ से निकलता हुआ दिख रहा है। हिन्दू कहाँ-कहाँ से पलायन करेंगे, सन् 711 में हिन्दुकुश से लेकर 2025 में मुर्शिदाबाद तक पलायन ही तो कर रहे। देखते हैं, हम कहाँ सिमटते हैं, कहाँ-कहाँ से भागते हैं।

अब्दुल्ला के सांसद ने पर्यटन को बताया था ‘सांस्कृतिक आक्रमण’, अब पहलगाम में आतंकियों ने 20+ को उतारा मौत के घाट: कश्मीर रवाना हुए अमित शाह

जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले के पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले ने पूरे देश को हिला कर रख दिया। अब तक की जानकारी के अनुसार, 20+ पर्यटकों की मौत की ख़बर है। वहीं, कई टूरिस्ट घायल हैं। सुरक्षा बलों ने सर्च ऑपरेशन शुरू कर दिया है। बताया जा रहा है कि जंगलों में छिपे आतंकियों ने अचानक पर्यटकों पर गोलीबारी कर दी। रिपोर्ट्स के अनुसार, हमलावर सेना की वर्दी में थे।

हमले की गंभीरता को देखते हुए केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह पहलगाम के लिए रवाना हो गए हैं। इससे पहले सऊदी अरब से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गृहमंत्री अमित शाह से फोन पर बात कर हमले की जानकारी ली। इसके बाद अमित शाह ने दिल्ली स्थिति अपने आवास पर उच्च स्तरीय सुरक्षा बैठक बुलाई, जिसमें IB चीफ तपन डेका, केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन, CRPF चीफ ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह और जम्मू-कश्मीर के DGP नलिन प्रभात समेत सेना के अधिकारी भी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए शामिल हुए।

ये हमला उस वक्त हुआ जब घाटी में टूरिस्ट सीजन अपने चरम पर है। जुलाई से अमरनाथ यात्रा भी शुरू होने जा रही है। खूबसूरत वादियों और शांत पहाड़ियों के लिए मशहूर इस इलाके में जब अचानक गोलियों की आवाज़ गूँजी तो वहाँ मौजूद पर्यटक दहशत में आ गए।

नेशनल कॉन्फ्रेंस के सांसद ने ‘कल्चरल इन्वेजन’ कहा था

वहीं, इस दर्दनाक घटना से कुछ समय पहले नेशनल कॉन्फ्रेंस के सांसद आगा सैयद रूहुल्लाह मेहदी ने जो बयान दिया था, वह अब और भी सवालों के घेरे में आ गया है। उन्होंने कुछ महीने पहले कहा था कि कश्मीर में टूरिज़्म सांस्कृतिक हमला है। उनका ये बयान मंगलवार (22 अप्रैल, 2025) को पहलगाम में हुए हमले की पृष्ठभूमि में और भी गैर-जिम्मेदार माना जा रहा है।

सांसद रूहुल्लाह ने कहा था, “जो टूरिज़्म कश्मीर की अर्थव्यवस्था को मजबूती देता है, वही यहाँ की संस्कृति पर हमला कर रहा है।” उन्होंने इसे ‘कल्चरल इन्वेज़न’ कहा था और दावा किया था कि इससे कश्मीर की असल पहचान खत्म हो रही है।

सांसद के बयान की बीजेपी जम्मू-कश्मीर के मुख्य प्रवक्ता एडवोकेट सुनील सेठी की तीखी आलोचना की थी। उन्होंने कहा था कि यह बयान घाटी की पर्यटन अर्थव्यवस्था के लिए घातक है। उनका आरोप था कि नेशनल कॉन्फ्रेंस डर फैलाने की राजनीति कर रही है ताकि पर्यटक डरकर घाटी न आएँ। उन्होंने सांसद की टिप्पणी को ‘राजनीतिक आतंकवाद’ करार दिया था।

मंगलवार (22 अप्रैल 2025) को जब पहलगाम की बाईसारन घाटी में हमला हुआ तो अब सवाल और तेज़ी से उठने लगे हैं। क्या सांसद के उस बयान ने कहीं न कहीं उन ताकतों को बल दिया जो घाटी की शांति बिगाड़ना चाहते हैं? पहलगाम के आतंकी हमले के बाद अब यही सांसद बयान जारी करके कह रहे हैं कि कश्मीर ने हमेशा से अतिथियों का खुली बाँहों से स्वागत किया है।

प्रदेश के सीएम ने मृतकों के आँकड़ों पर साधी चुप्पी

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने हमले पर संवेदनाएँ व्यक्त की हैं। उन्होंने कहा, “मैं अविश्वसनीय रूप से स्तब्ध हूँ। हमारे आगंतुकों पर यह हमला एक घृणित कार्य है। इस हमले के अपराधी जानवर, अमानवीय और घृणा के पात्र हैं। निंदा के लिए कोई भी शब्द पर्याप्त नहीं है। मैं मृतकों के परिवारों के प्रति अपनी संवेदनाएँ व्यक्त करता हूँ।”

सीएम ने हमले में मारे गए लोगों की संख्या पर चुप्पी साधी है। उन्होंने कहा, “मृतकों की संख्या का अभी पता लगाया जा रहा है इसलिए मैं उन विवरणों में नहीं जाना चाहता। स्थिति स्पष्ट होने पर उन्हें आधिकारिक रूप से बताया जाएगा। कहने की ज़रूरत नहीं कि यह हमला हाल के वर्षों में नागरिकों पर किए गए किसी भी हमले से कहीं ज़्यादा बड़ा है।”

जब लाइन में खड़ा करके किया गया 3500 हिन्दू पुरुषों का नरसंहार, आज तक महिलाओं को नहीं मिला न्याय: जातीभंगा में पाकिस्तानी फौज और रजाकारों ने बहाई थी खून की नदियाँ

बांग्लादेश की आज़ादी की लड़ाई खून-खराबे और अत्याचार की कहानियों से भरी हुई है। पश्चिमी पाकिस्तान (आज का पाकिस्तान) हर हाल में पूर्वी पाकिस्तान (जो बांग्लादेश बना) पर कब्ज़ा बनाए रखना चाहता था। लेकिन जब वहाँ के लोगों ने आवाज़ उठाई तो दमन और हिंसा शुरू हो गई। हालात इतने बिगड़ गए कि करीब एक करोड़ लोग जान बचाकर भारत भागे। इससे भारत में भारी शरणार्थी संकट पैदा हो गया। आखिरकार, भारत को दख़ल देना पड़ा और बांग्लादेश को आज़ादी की राह दिखाई।

इसके बावजूद, पाकिस्तानी हुकूमत ने 1971 में बांग्लादेश की आज़ादी की माँग करने वालों पर बेरहमी से कहर बरपाया। खासतौर पर हिंदू समुदाय को दोहरे अपराध की सजा दी गई। पहली उनकी आज़ादी की माँग और दूसरा उनका गैर-मुस्लिम होना। पाकिस्तानी सेना और उनके कट्टरपंथी सहयोगियों ने हिंदुओं को निशाना बनाकर भयानक कत्लेआम किया। ऐसा ही एक दिल दहला देने वाला नरसंहार आज से करीब 54 साल पहले हुआ। 23 अप्रैल, 1971 को ठाकुरगाँव जिले के जातीभंगा (अब विधापल्ली) गाँव में।

बांग्लादेश आजादी की लड़ाई
1971 में भारत आ रहे बांग्लादेशी शरणार्थी। (साभार : Harvard Internation Review)

जातीभंगा में क्या हुआ था ?

26 मार्च, 1971 को शेख मुजीबुर रहमान ने पाकिस्तान से बांग्लादेश की आज़ादी का ऐलान कर दिया। इसी के साथ आज़ादी की लड़ाई शुरू हो गई। लेकिन, इसके बाद हालात और भी भयानक हो गए। पाकिस्तानी सेना ने रज़ाकार, अल-बदर और अल-शम्स जैसे कट्टरपंथी संगठनों के साथ मिलकर निर्दोष लोगों पर जुल्म ढाना शुरू कर दिया। जो भी आज़ादी चाहता था उसे बेरहमी से मारा जाने लगा।

इसी डर से ठाकुगाँव जिले के बालिया, शुखनपुकुरी, जगन्नाथपुर, चकहाल्दी, सिंगिया, चांदीपुर, बसुदेवपुर, मिलनपुर, गौरीपुर, खमार भोला, पलाशबाड़ी और देविग जैसे कई गाँवों के हज़ारों हिंदू परिवार अपनी जान बचाकर महिलाओं और बच्चों के साथ भारत भागने लगे।

23 अप्रैल की सुबह, इन्हीं गाँवों के सैकड़ों लोग जातीभंगा में इकट्ठा हुए थे ताकि वहाँ से आगे भारत की ओर निकल सकें। लेकिन एक स्थानीय गद्दार ने पाकिस्तानी सेना को इसकी खबर दे दी। सेना दो ट्रकों में वहाँ पहुँच गई। हिंदू पुरुषों को लाइन में खड़ा किया गया और फिर मशीनगनों से ताबड़तोड़ गोलियाँ बरसाईं गईं। कुछ को धारदार हथियार से मारा गया। ये कत्लेआम सुबह से शुरू होकर दोपहर तक चला।

इसमें करीब 3500 मासूम लोगों की जानें गईं। सैकड़ों औरतें विधवा हो गईं। इसके बाद शवों को पास की पथराज नदी में फेंका गया। काफी शवों को ज़मीन में गड्ढा खोदकर एक साथ दफना दिया गया। उस दिन की खून की नदियाँ आज भी जातीभंगा की मिट्टी में दर्ज हैं। इसके बाद ठाकुरगाँव जिले का ये नरसंहार बांग्लादेश की आज़ादी की लड़ाई का सबसे दर्दनाक और बड़ा कत्लेआम बन गया।

जातीभंगा नरसंहार का इंसाफ आज भी अधूरा

जातीभंगा नरसंहार इतिहास के काले पन्ने में दर्ज हो गया। 2009 में बांग्लादेश सरकार ने जातीभंगा नरसंहार की जगह पर एक स्मारक बनवाया। यह उस दर्दनाक दिन की याद में किया गया। जब सैकड़ों बेगुनाहों की ज़िंदगी छीन ली गई थी। इसके बाद 2011 में पीड़ितों और बचे हुए लोगों ने मिलकर एक शोक रैली निकाली। कुछ समय बाद मरने वालों की याद में एक श्रद्धांजलि सभा रखी गई, जिसमें लोगों ने खुलकर अपनी आवाज़ उठाई। उन्होंने माँग की कि उन दरिंदों को सज़ा दी जाए, जिन्होंने यह खूनी खेल रचा था।

सरकार ने उसी साल अगस्त में 89 विधवाओं को 2 हज़ार टका की एकमुश्त सहायता प्रदान की। ठाकुरगाँव सदर उपजिला के अधिकारी तौहीदुल इस्लाम ने आश्वासन दिया था कि आगे चलकर जातीभंगा गाँव की 500 विधवाओं को इस योजना में शामिल किया जाएगा। लेकिन दुख की बात ये है कि इतने सालों बाद भी इंसाफ अधूरा है।

2014 में ठाकुरगाँव के जगन्नाथपुर गाँव में जब जातीभंगा नरसंहार दिवस मनाया गया तो वहाँ दर्द और गुस्से की लहर फिर उमड़ पड़ी। ‘जातीभंगा गणहत्यादिबश पालन समिति’ ने शोक यात्रा निकाली, जिसमें सैकड़ों महिलाएँ शामिल हुईं। ये वो औरतें थीं, जिन्होंने उस दिन अपने पति, पिता या भाई खो दिए थे। हर कोई एक आवाज़ में माँग कर रहा था, “जिन्होंने इतने लोगों की जान ली उन्हें सज़ा मिलनी चाहिए। अब और इंतज़ार नहीं। न्याय होना चाहिए और सबके सामने होना चाहिए।”

बांग्लादेश जातीभंगा नरसंहार न्याय
23 अप्रैल, 1971 को पाकिस्तानी सेना और उनके स्थानीय सहयोगियों के हाथों अपने पतियों की क्रूर हत्या से विधवा हुई महिलाएँ, जातीभंगा नरसंहार दिवस की याद में ठाकुरगाँव सदर उपजिला के जगन्नाथपुर में शोक जुलूस में शामिल हुईं (साभार : The Daily Star

कत्लेआम के चश्मदीदों का दर्द

  • जातीभंगा नरसंहार की बरसी पर एक भावुक सभा का आयोजन हुआ। इस सभा की अध्यक्षता स्वतंत्रता सेनानी डॉ. निपेंद्रनाथ ने की थी। इसमें पत्रकार अब्दुल लतीफ, जगन्नाथपुर यूनियन परिषद के पूर्व सदस्य धनी चरण, गिरीन चंद्र की विधवा शुशिला बेवा, पबनशोरी और रोशनी रानी जैसे कई वरिष्ठ चेहरों ने अपने विचार रखे। सभा में सभी ने दुख जताया कि आज़ादी के 43 साल बाद भी उन रज़ाकारों को सज़ा नहीं मिली, जिन्होंने निर्दोष लोगों की जान ली थी। बल्कि कई तो आज समाज में बड़े पदों पर हैं।

इस सभा में प्रत्यक्षदर्शी धनी चरण ने नरसंहार की खौफनाक यादें साझा करते हुए बताया, “हम भारत भागना चाहते थे क्योंकि वहाँ रहना अब सुरक्षित नहीं था। जब हम जातीभंगा पहुँचे तो सूरज ढल चुका था। हमने सोचा रात यहीं रुक जाते हैं और सुबह आगे निकलेंगे। लेकिन रज़ाकारों ने हमारी खबर पाकिस्तानी फौज को दे दी। इसके बाद पाकिस्तानी सैनिक आए और चारों तरफ से घेर लिया। फिर पुरुषों को लाइन में खड़ा कराया गया और उन्हें गोलियों से भून दिया गया। करीब 3 हज़ार लोगों को उसी दिन मौत के घाट उतार दिया गया।”

अन्य महिलाएंँ जिन्होंने नरसंहार होते हुए देखा, वो आज भी उस दिन को याद कर काँप उठती हैं। इनमें पबनशोरी, गोठन बाला और रोशनी रानी जैसी कई महिलाओं के नाम शामिल हैं। ये केवल एक घटना नहीं थी। 25 मार्च, 1971 को ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ के नाम पर पाकिस्तानी सेना ने पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में हजारों बेकसूर बंगालियों की हत्या की थी। इस नरसंहार में पीस कमेटी, रज़ाकार, अल-बद्र और अल-शम्स जैसे संगठनों की भूमिका भी थी।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता नहीं मिली

  • आजादी के बाद बांग्लादेश में अब तक करीब पाँच हजार बधभूमि (यानी कत्लगाह) खोजे जा चुके हैं। इनमें से हज़ारों लोगों की पहचान भी हो चुकी है। कई जगहों से नरकंकाल, खोपड़ियाँ और बाल तक मिले हैं। इन सभी में जातीभंगा का नरसंहार सबसे बड़ा और सबसे भयावह था। ये खामोश जमीन आज भी उस दर्दनाक इतिहास को बयाँ करती है।

संयुक्त राष्ट्र की नरसंहार परिभाषा के अनुसार, 1971 की ये घटनाएँ साफतौर पर जनसंहार की श्रेणी में आती हैं लेकिन अब तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार नहीं किया गया है। ये घटनाएँ सिर्फ इतिहास नहीं हैं। बल्कि ये गवाही हैं उस जुल्म, अत्याचार और नफरत की जो पाकिस्तान और उसके इस्लामी चरमपंथियों ने बांग्लादेश के लोगों जिनमें खासकर हिंदू समुदाय पर ढाए हैं।

‘कुरान में बलात्कार से बड़ा गुनाह मूर्तिपूजा’: तथ्य जाँचने की बजाय चरित्र हनन पर उतरा ALTNews वाला जुबैर, जाकिर नाइक भी कर चुका है पुष्टि

ALTNews से जुड़े संदिग्ध फैक्ट-चेकर मोहम्मद जुबैर एक बार फिर दुष्प्रचार के अपने उस काम में जुट गया है, जिसमें उसे महारत हासिल है। अक्सर देखने में आया है कि इस्लाम से जुड़ी बातों की तार्किक व्याख्या करने वालों को जुबैर ने निशाना बनाकर उन्हें खारिज करने काम किया है। उसकी ऐसी गतिविधियों में एक स्पष्ट रुझान यह भी देखने को मिला है कि इस्लाम को असहज करने वाले पहलू उसे बहुत चुभते हैं और ऐसा करने वालों के खिलाफ अभियान चलाने में उसकी तरफ से कोई देरी नहीं होती।

हाल का मामला एहसान नाम के एक व्यक्ति से जुड़ा है। एहसान जैसे लोग जिन समस्याओं को उजागर करते हैं, जुबैर सरीखे लोग उन समस्याओं का समाधान करने के बजाय उलटे झुंड बनाकर मुद्दा उठाने वाले व्यक्ति के पीछे पड़ जाते हैं। जुबैर ने 21 अप्रैल को अपने ट्वीट के जरिए अपनी इसी आदत का परिचय दिया।

कुरान कंठस्थ करने वाले एहसान ने एक वीडियो बाइट में यह बताया कि इस्लाम में मूर्ति पूजा को बलात्कार से भी बड़ा अपराध माना गया है। उसने कहा कि अल्लाह की नजर में बलात्कार को माफ किया जा सकता है, लेकिन शिर्क यानी मूर्ति पूजा को कतई नहीं।

एहसान ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “अगर एक तरफ मूर्ति पूजा हो रही है और दूसरी तरह बलात्कार हो रहा हो तो इस्लाम के अनुसार इसमें मूर्ति पूजा कहीं बड़ा पाप है। इसका कारण यही है कि अल्लाह हर किसी बात को माफ कर सकते हैं, लेकिन शिर्क को नहीं।’

एहसान ने इस सोच के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई। उनकी यह आवाज इस्लाम से जुड़े असहज पहलुओं के प्रति व्यापक जागरूकता का प्रसार करते हुए उसकी वास्तविक तस्वीर सामने रखती है जो पहलू 21वीं सदी वाले समाज के साथ ताल नहीं मिलाते। ऐसे में जुबैर सरीखे लोगों को ऐसी व्याख्या का नागवार गुजरना बहुत स्वाभाविक है और उनके भीतर का कट्टर इस्लामी सक्रिय हो जाता है।

इसे मद्देनजर रखते हुए जुबैर ने एहसान और उनकी आस्था को खारिज करने में जरा भी देरी नहीं की। उन्हें खारिज करने के लिए इस संदिग्ध फैक्ट-चेकर ने एहसान और उनके साथी सलीम की मंशा पर सवाल उठाते हुए उन्हें ‘एक्स-मुस्लिम’ तक करार दे दिया। हालाँकि, इस कवायद में उन्होंने इस्लाम में मूर्ति पूजा और बलात्कार से जुड़े तथ्यों की पड़ताल करना गवारा नहीं समझा।

जुबैर ने एहसान के बयान की फैक्ट-चेकिंग करने के बजाय उन्हें व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाया। जबकि यह स्पष्ट है कि एहसान ने वही बात कही, जिसका इस्लामिक मान्यताओं में उल्लेख है।

‘इस्लाम में रेप माफी के लायक, मूर्ति पूजा इससे बड़ा गुनाहः’ उलेमा

इस्लामिक कट्टरपंथी जाकिर नाइक भी अतीत में यह कह चुका है कि अल्लाह की निगाह में बलात्कार और हत्या को माफ किया जा सकता है। उसका यही कहना था, “अगर किसी ने बलात्कार किया है जो कि एक बड़ा अपराध है और किसी ने हत्या की है जो खुद एक बड़ा पाप है, लेकिन अगर किसी ने उसके लिए दिल से तौबा कर ली तो अल्लाह उसे माफ कर सकते हैं।” नाइक ने आगे यही कहा, “ऐसे मामलों को लेकर अल्लाह बहुत दयालु हैं। इस्लामिक दीनी तालीम के अनुसार, इसका दारोमदार लड़की पर है कि वह शालीन कपड़े पहने अन्यथा बलात्कार का दोषी उसे ही ठहराया जाएगा।”

जाकिर नाइक ने स्पष्ट कहा था, “अगर उसने भड़काऊ कपड़े पहने तो बलात्कार होने पर वही जिम्मेदार मानी जाएगी। लेकिन यदि उसने सामान्य कपड़े पहने हैं और फिर भी कोई व्यक्ति बलात्कार करता है तो यह लड़की के लिए परीक्षा की घड़ी है।”

वहीं, शिकागो में रहने वाले एक इस्लामी कट्टरपंथी यासिर नदीम अल वजीदी ने भी पिछले महीने अपने यूट्यूब चैनल पर स्पष्ट किया है कि शिर्क बलात्कार से भी घिनौना पाप है। उसके 3.5 लाख फॉलोअर्स हैं और वो ‘एक्स-मुस्लिम’ नहीं हैं। यही तर्क मोहम्मद जुबैर ने एहसान के बयानों को गलत साबित करने के लिए इस्तेमाल किया। यह फिर से दिखाता है कि जुबैर ने एहसान की ‘फैक्ट-चेक’ क्यों नहीं की, क्योंकि एहसान सही थे।

मौलवियों के अनुसार, ये एक अलग बहस का मुद्दा है कि एक महिला का बलात्कार हुआ है या नहीं , इस बात को साबित करने की जिम्मेदारी भी पीड़िता पर ही होती है। उसे कई गवाहों की जरूरत होती है। इससे पुरुषों के लिए इस गुनाह से बच निकलना आसान हो जाता है।

मौलवी ये भी कहते हैं कि इस बात को भूलना नहीं चाहिए कि इस तरह के जघन्य अपराधों के लिए दिल से तौबा करने पर माफी भी मिल सकती है क्योंकि रेपिस्ट और रेप पीड़ित दोनों के लिए जीवन एक ‘इम्तेहान’ है।

इस्लाम में मूर्ति की पूजा को जघन्य अपराधों से भी बड़ा गुनाह मानने वाले तथ्य को कुरान की आयत 4:48 में बताया गया है- “वास्तव में, अल्लाह अपनी इबादत में किसी और के साथ जोड़ने की माफी नहीं देता, लेकिन वह जिसे चाहे उसे माफ कर सकता है। और अल्लाह के साथ किसी और की इबादत करना वास्तव में सबसे बड़ा गुनाह करना है।”

इस्लाम की खामियों को छुपाने के लिए व्यक्तिगत हमले करने वाला जुबैर और उसके कुतर्क

ये पहली दफा नहीं है जब ‘ऑल्ट न्यूज’ वाले मोहम्मद जुबैर ने इस्लाम की आलोचना करने पर किसी व्यक्ति विशेष को निशाना बनाया हो और अपना इस्लामोफोबिया वाला कार्ड खेला हो। ये अब उसके काम करने का तरीका हो चुका है। जुबैर तथ्यों पर बात नहीं करता। वो लोगों के चरित्र हनन करने का प्रयास करता है।

नुपूर शर्मा का मामला यदि याद हो तो वहाँ भी जुबैर ने यही किया था। ‘टाइम्स नाऊ’ पर डिबेट के दौरान पूर्व भाजपा प्रवक्ता ने जो कुछ भी कहा था उसे पहले कई इस्लामी स्कॉलर्स अपनी बातों में दोहरा चुके थे। मगर, जुबैर ने जानकर निशाना नुपूर शर्मा को बताया। अब वो यही हथकंडे एहसान पर आजमा रहा है।

ये उनलोगों को चुन-चुनकर निशाना बनाता है जो उसके मजहब की खामियों को पहचानते हैं और उनकी आलोचना करते हैं। उसे उन मुस्लिमों को निशाना बनाना भी अच्छा लगता है जो कट्टरपंथी विचारधारा के नहीं हैं। कई बार अपने मजहब पर सवाल उठाने वालों को वो ‘सरकारी मुसलमान’ कह देता है।

चिंताजनक बात ये है कि जुबैर ने इस बार एहसान की जान को खतरे में डालने का प्रयास किया है। उसने एहसान को कट्टपंथियों की फितरत जानते हुए ‘एक्स मुस्लिम’ लिखा है, जो मजहब छोड़ने वाले के लिए सिर्फ मौत ही सही सजा समझते हैं।

(इस खबर को मूल रूप में अंग्रेजी में लिखा गया था, जिसे इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ा जा सकता है।)

कुणाल की हत्या मामले में दिल्ली पुलिस ने 9 को पकड़ा, उत्तराखंड के रास्ते भाग रहे थे नेपाल: लेडी डॉन जिकरा बोली- मेरा नहीं कोई रोल

दिल्ली में हिन्दू लड़के कुणाल की हत्या मामले में गिरफ्तार जिकरा अब बचने का प्रयास कर रही है। उसने इस हत्या में किसी भी तरह की मौजूदगी से इनकार किया है। जिकरा का दावा है कि उसे गलत तरीके से फँसाया जा रहा है। वहीं कोर्ट ने उसे अब 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है।

अदालत ले जाते समय उसने कहा, “मैंने कुणाल को नहीं मारा। मुझे बेवजह फँसाया जा रहा है।” जिकरा के भाई साहिल को दो दिन की पुलिस रिमांड में भेजा गया है। साहिल से पुलिस अब कुणाल की हत्या के बारे में पूछताछ करेगी। साहिल इस हत्या का मुख्य आरोपित है।

दिल्ली पुलिस ने कुणाल की हत्या के सिलसिले में अब तक नौ लोगों को गिरफ्तार किया है, जिनमें दो नाबालिग भी शामिल हैं। हिरासत में लिए गए लोगों में 18 वर्षीय साहिल भी शामिल है, जिसकी पहचान मुख्य आरोपित के रूप में हुई है। अधिकारियों ने खुलासा किया कि कई संदिग्ध उत्तराखंड के रास्ते नेपाल भागने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन उन्हें सीमा पर ही पकड़ लिया गया।

इस मामले में ज़िकरा का इनकार और नौ लोगों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस अब आगे की जाँच में जुट गई है ताकि हत्या के पीछे के असली मकसद और ज़िकरा की संलिप्तता की पूरी सच्चाई सामने आ सके। यह भी पता है कि ज़िकरा का दो साल का बच्चा है और वो कथित तौर पर अपने पति से अलग रहती है।

उसे पहले भी सोशल मीडिया पर हथियार लहराते हुए वीडियो पोस्ट करने के आरोप में शस्त्र अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया गया था। गौरलतब है कि 16 अप्रैल, 2025 को घर से बाहर दूध लेने के लिए निकले कुणाल की हत्या चाकुओं से गोद कर दी गई थी। इसके बाद सीलमपुर में काफी विरोध प्रदर्शन भी हुए थे।

लोगों ने आरोप लगाया था कि यहाँ हिन्दुओं का जीना मुहाल है। अब इस मामले में जाँच और कार्रवाई चल रही है। पुलिस की पूछताछ में जिकरा ने बताया था कि उसके भाई साहिल पर दीवाली के समय हमला हुआ था। इसी हमले का बदला लेने के लिए कुणाल की हत्या कर दी गई।

जगदीप धनखड़ ‘कु*#%’, हामिद अंसारी ‘संविधान के रक्षक’: TOI से लेकर The Wire तक पड़े उप-राष्ट्रपति के पीछे, जब आया महाभियोग तब कहाँ गई थी ये चिंता?

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक जज हैं – यशवंत वर्मा। कुछ ही दोनों पहले तक वो दिल्ली उच्च न्यायालय के जज हुआ करते थे। एक घटना के बाद उन्हें इलाहाबाद हाईकोर्ट भेज दिया गया। सोचिए, कितनी बड़ी ‘सज़ा’ है ये। ख़ैर, ‘सज़ा’ की तो हम बात करेंगे ही, लेकिन उससे पहले इस घटना के बारे में जान लेते हैं। वो घटना, जिसका जिक्र उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने गुरुवार (17 अप्रैल, 2025) को राज्यसभा की इंटर्नशिप प्रोग्राम के विदाई भाषण में किया। उनके इस भाषण से एक गिरोह विशेष को विशेष मिर्ची लगी हुई है।

जस्टिस यशवंत वर्मा और घर में करोड़ों रुपए कैश: क्या हैं सवाल

14-15 मार्च की रात में जस्टिस यशवंत वर्मा के घर में आग लग जाती है। दमकल विभाग को आग बुझाने के लिए बुलाया जाता है। उस समय जज और उनकी पत्नी घर पर नहीं होते हैं। घर में से बड़ी मात्रा में कैश बरामद होता है। दिल्ली पुलिस को बुलाया जाता है। न FIR होती है, न ज़ब्ती की कार्रवाई। ऊपर से पुलिसकर्मियों ने इस घटना का जो वीडियो बनाया था, उसे भी डिलीट करवा दिया जाता है। बाद में सफ़ाई दी जाती है कि वीडियो ग़लत हाथों में न पड़े, इसीलिए ऐसा किया गया।

जहाँ तक FIR की बात है, उस संबंध में ख़ुद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का बयान आता है कि बिना मुख्य न्यायाधीश की अनुमति के हाईकोर्ट के जज पर एक अदद FIR तक नहीं की जा सकती। हाँ, CJI ज़रूर एक आंतरिक जाँच समिति बनाते हैं। जज यशवंत वर्मा ने ये कहकर पल्ला झाड़ लिया कि ये एकदम बेहूदा व अविश्वसनीय तर्क है कि वो स्टोररूम में इस तरह से कैश रखेंगे, जो उनके घर से अलग हटकर है। उनका कहना है कि उनके या उनके परिवार वालों को इसका कुछ अता-पता ही नहीं था।

सवाल तो कई हैं, उन्हीं सवालों पर बात करने को तो ‘न्यायपालिका पर हमला’ बताया जा रहा है। आख़िर स्टोररूम घर से बाहर हो या भीतर, था तो जज के परिवार के स्वामित्व में ही न? अगर उनके या उनके परिजनों ने नहीं, तो करोड़ों रुपए कैश कहाँ से आ गए? कैश मिलने न सही, आग लगने की घटना की जाँच के लिए भी कोई FIR दर्ज क्यों नहीं हुई? घटनास्थल को सील क्यों नहीं किया गया, जली हुई चीजें किसने हटाईं और कहाँ डालीं? इस घटना को मीडिया में आने में एक सप्ताह क्यों लग गए?

उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने क्या ग़लत कहा?

बार-बार ‘क़ानून का राज’ की बात की जाती है। अगर इस मामले में एक जज की भागीदारी नहीं रहती, तो कार्रवाई भी अलग तरीके से होती। यही तो कहा उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने – ‘क़ानून का राज’ होता तो स्थिति अलग होती। उन्होंने कहा कि भले ही पिटारे में कीड़े दबे हों या फिर अलमारी में कंकाल पड़े हों, समय आ गया है कि ढक्कन खोला जाए और अलमारी के दरवाजे खोल जाएँ। क्यों? ताकि ये कीड़े व कंकाल बाहर आ सकें, ताकि जनता देख सके कि अंदर क्या दबा था, ताकि इन सबकी पहचान करके सफ़ाई की जाए।

भारत में थप्पड़ मारने से लेकर नरसंहार तक के मामले में सबसे पहले FIR दर्ज की जाती है। इसका नाम ही है – फर्स्ट इन्फॉर्मेशन रिपोर्ट। फर्स्ट, यानी हर अपराध या संभावित अपराध के मामले में पहली कार्रवाई। जब FIR ही नहीं हुई तो जाँच क्या होगी, और यही तो है जिसे लेकर उप-राष्ट्रपति ने चिंता ज़ाहिर की। उनका कहना है कि उनपर भी FIR दर्ज की जा सकती है, लेकिन जजों पर बिना न्यायपालिका के अनुमोदन के नहीं। ये छूट क्यों? जगदीप धनखड़ का सिर्फ़ इतना पूछना था कि किसी सामान्य व्यक्ति के घर में ऐसा हुआ होता तो?

तो कार्रवाई की प्रक्रिया रॉकेट की गाड़ी से उड़ती, लेकिन अब ये बैलगाड़ी से भी सुस्त चल रही है। उनका एक और तर्क है – जाँच का अधिकार कार्यपालिका का है, फिर जाँच न्यायिक तंत्र ही क्यों कर रहा है? न्यायिक समितियाँ तो सिफ़ारिश ही करती रही हैं न, फिर इसे जाँच क्यों समझा जाए? उन्होंने एक हालिया सर्वेक्षण की भी बात की, जिसमें पाया गया कि न्यायपालिका के लिए जनता में विश्वास कम हो रहा है। आख़िर है तो ये ‘लोकतंत्र’ ही न, जनता क्या सोचती है – यानी ‘लोक’ की राय मायने रखनी चाहिए लोकतंत्र में।

उन्होंने बाबासाहब डॉ भीमराव आंबेडकर को उद्धृत करते हुए कहा कि वो मुख्य न्यायाधीश को जजों की नियुक्ति के संबंध में वीटो देने के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने ये भी आरोप लगाया कि 1993 में सुप्रीम कोर्ट ने ‘परामर्श’ शब्द को ‘सहमति’ पढ़ने का आदेश दिया जिस कारण CJI की सहमति ज़रूरी हो गई जजों की नियुक्ति के मामले में। ये मामला अनुच्छेद-124 से जुड़ा है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था की गई है। उन्होंने नसीहत दी कि संसद क़ानून बनाए और न्यायपालिका फ़ैसले सुनाए, एक-दूसरे के अधिकारों का अतिक्रमण न हो।

इस दौरान उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने 1973 के केशवानंद भारती केस के फ़ैसले की बात की, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने ‘बेसिक स्ट्रक्चर डॉक्ट्रिन’ तय करके संविधान के मूलभूत प्रावधानों में संशोधन से संसद को रोक दिया था, लेकिन इसके 2 साल बाद ही एक प्रधानमंत्री अपनी कुर्सी बचाने के लिए देश में आपातकाल लगा देती है। उन्होंने हाल ही में एक जज द्वारा ‘बेसिक स्ट्रक्चर’ नामक पुस्तक के लॉन्च का जिक्र करते हुए ये इतिहास याद किया और बताया कि कैसे आपातकाल के दौरान लाखों लोगों को जेल में ठूँस दिया गया था।

उनका कहना था कि उक्त जज से सवाल पूछा जाना चाहिए था कि 1975 में उस बुनियादी ढाँचे का क्या हुआ था, जब 1984 में सिख नरसंहार हुआ तब उस बुनियादी ढाँचे का क्या हुआ था। उनका इशारा रिटायर्ड जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन की तरफ था। सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति के लिए बिलों पर साइन करने हेतु डेडलाइन तय कर दी, इसे भी उप-राष्ट्रपति ने विधायिका के कार्य में हस्तक्षेप बताया। कारण – संसद का अर्थ सिर्फ़ लोकसभा और राज्यसभा नहीं है, बल्कि राष्ट्रपति ही इसका पहला हिस्सा हैं।

उन्होंने इस दौरान अनुच्छेद-142 पर भी हमला बोला, जिसके तहत सुप्रीम कोर्ट को अपने यहाँ लंबित किसी भी मामले में ‘पूर्ण आदेश’ सुनाने का अधिकार है। लेकिन, जगदीप धनखड़ का मानना है कि ये लोकतंत्र पर हमले का एक परमाणु मिसाइल बना दिया गया है। जगदीप धनखड़ ये भी बताना नहीं भूले कि उन्होंने अपने 4 दशक न्यायपालिका को दिए हैं, इनमें से तीन दशक वो वरिष्ठ अधिवक्ता रहे हैं। वो न्यायपालिका के ही सिपाही हैं। बड़ी बात ये है कि जहाँ उनके विचारों पर मंथन होना चाहिए था, वहाँ उन्हें निशाना बनाया जाने लगा।

TOI के लिए उप-राष्ट्रपति पद की कोई महत्ता नहीं, बयान ध्यान देने योग्य नहीं

देश के सबसे पुराने अख़बारों में से एक ‘टाइम ऑफ इंडिया’ (TOI) ने जगदीप धनखड़ के बयान की आलोचना करते हुए एक संपादकीय छापा। इसमें इस बयान को रेखा लाँघने के समान बताया गया। साथ ही ‘ज्ञान’ दिया गया कि औपचारिक पदों पर बैठे व्यक्तियों से जिस शिष्टाचार की अपेक्षा की जाती है, ये बयान उससे बहुत आगे निकल गया। इसे बेहद की खेदजनक करार दिया गया। इसमें उप-राष्ट्रपति पद की महत्ता को कम करते हुए बताया गया कि नीति-निर्माण में उनकी कोई भूमिका नहीं होती। साथ ही पाठकों को कहा गया कि उप-राष्ट्रपति के बयानों से कोई असर नहीं पड़ने वाला है, इन्हें नज़रअंदाज़ किया जा सकता है।

TOI ने कई राज्यपालों पर नेताओं की तरह व्यवहार करने का आरोप लगाते हुए जगदीप धनखड़ को उनके पश्चिम बंगाल के कार्यकाल की याद दिलाई। पहली बात, अगर उप-राष्ट्रपति का पद केवल ‘Ceremonial’ है, तो भी क्या सार्वजनिक विमर्श में उनके योगदान को महत्ता नहीं दी जानी चाहिए? राज्यसभा के सभापति के रूप में वो प्रतिदिन नीति-निर्माण व इसके लिए होने वाले बहसों का हिस्सा बनते हैं, बहस को पूर्ण कराने की ज़िम्मेदारी ही उनकी होती है – ऐसे में उनके किरदार को कैसे नकारा जा सकता है, उनकी राय को खारिज कैसे किया जा सकता है?

राज्यसभा में संवैधानिक प्रक्रियाओं का पालन कराना उनका कर्तव्य है, इसीलिए संवैधानिक मुद्दों पर संतुलन की बात करना उनका अधिकार है। इसीलिए, वो ‘सीमा से बाहर’ नहीं जा रहे। TOI इस दौरान उनके द्वारा उठाई गई चिंताओं को पूरी तरह नकार गया। न्यायपालिका की पारदर्शिता ज़रूरी है, जनता का विश्वास न्यायपालिका में बने रहना ज़रूरी है। हर व्यवस्था सुधार के दौर से गुजरती है समय के साथ, फिर न्यायपालिका को विशेष छूट क्यों? जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया और आपराधिक मामलों में स्वतंत्र जाँच की प्रक्रिया तय क़ानून के तहत होनी चाहिए।

ये भी देखिए कि उप-राष्ट्रपति ने ये बयान कहाँ दिया, युवाओं के बीच, छात्र-छात्राओं के बीच। शैक्षणिक हिसाब से भी देखें तो युवाओं को संवैधानिक संतुलन के बारे में बताना आवश्यक है, अगर किसी संस्था में समस्याएँ नज़र आ रही हैं तो चिंतन, अध्ययन व विमर्श के लिए उन्हें सूचनाओं से अवगत कराया जाना चाहिए, क्योंकि बाद में यही युवा देश के नीति-निर्माता बनेंगे। उप-राष्ट्रपति के बयान को इस संदर्भ में लीजिए कि संसद और पुलिस की तरह न्यायपालिका भी अंततः जनता के प्रति ही जिम्मेदार है। एक नागरिक के रूप में और उप-राष्ट्रपति व राज्यसभा के सभापति के रूप में भी, जगदीप धनखड़ को समस्याओं और समाधान की बात करने का पूरा अधिकार है। उनके क़ानूनी अनुभव को देखते हुए भी उन्हें सुना जाना चाहिए।

The Wire ने उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ को कहा ‘कुत्ता’

अमेरिकी नागरिक सिद्धार्थ वरदराजन द्वारा संचालित ‘The Wire’ ने उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के लिए ‘कुत्ता’ शब्द तक का इस्तेमाल कर दिया। ‘लोकतंत्र को लहूलुहान करने वाला हमलावर कुत्ता’ – संवैधानिक पद पर बैठे एक व्यक्ति के लिए इस तरह की शब्दावली का इस्तेमाल किया गया। जब 2018 में सुप्रीम कोर्ट के 4 बड़े जजों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सरकार पर खुलेआम हमला बोला था, उस समय क्या ‘द वायर’ ने उनके लिए इस तरह की शब्दावली का इस्तेमाल किया? ‘द वायर’ का कहना है कि अनुच्छेद-142 सेफ्टी वॉल्व है। जो बातें उप-राष्ट्रपति ने कही, उन चिंताओं को तो कई पूर्व जज भी उठा चुके हैं।

सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज रुमा लाल ने कई बार न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने की वकालत की है। उनका कहना है कि ऊपरी न्यायालयों में कॉलेजियम व्यवस्था पारदर्शिता का उल्लंघन है। 2011 में एक लेक्चर में उन्होंने न्यायपालिका में भ्रष्टाचार, जवाबदेही से छूट जजों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर सवाल खड़े किए थे। इसी तरह पूर्व मुख्य न्यायाधीश JS वर्मा ने न्यायपालिका को RTI (सूचना का अधिकार) क़ानून के तहत लेन की वकालत की थी। उनका तो ये तक मानना था की न्यायिक नियुक्तियों को भी सार्वजनिक स्क्रूटनी के लिए खुले में आना चाहिए

इसी तरह भारत के राष्ट्रपति रहे प्रणब मुखर्जी, जो संविधान के भी जानकार थे – उनका भी मानना था कि ‘न्यायिक एक्टिविज्म’ पर रोक लगनी चाहिए। उन्होंने चेताया था कि न्यायपालिका को अपनी सीमाएँ लाँघकर कार्यपालिका और विधायिका का काम नहीं करना चाहिए। उन्होंने नसीहत दी थी कि PIL याचिकाओं को संसद के अधिकारों एवं शक्तियों को अपने हाथ में लेने का जरिया नहीं बनाया जाना चाहिए। उन्होंने न्यायपालिका को आत्म-संयम और आत्म-अनुशासन की सलाह देते हुए कहा था कि उसे ख़ुद की ही शक्तियों की सीमाओं की जाँच करती रहनी चाहिए। अब बताइए, क्या जीवन भर कॉन्ग्रेस में रहे प्रणब मुखर्जी को भी The Wire गाली देगा?

आज न्यायपालिका की स्वतंत्रता की बातें की जा रही हैं, लेकिन तब कहाँ था The Wire जब जस्टिस दीपक मिश्रा के ख़िलाफ़ संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था? तब एक उप-राष्ट्रपति के पद पर बैठे व्यक्ति वेंकैया नायडू ने ही इसे ख़ारिज किया था। तब यही कपिल सिब्बल मोशन लाने वालों में शामिल थे, जो आज सुप्रीम कोर्ट की शुचिता की क़समें खा रहे हैं। तब यही कपिल सिब्बल न्यायपालिका को जनता का विश्वास न खोने की सलाह दे रहे थे। राम मंदिर पर निर्णय के बाद असदुद्दीन ओवैसी समेत तमाम इस्लामी शख्शियतों ने सुप्रीम कोर्ट को निशाना बनाया, तब The Wire भी उसमें शामिल था।

हामिद अंसारी का नाम आते पवित्र हो जाता है उप-राष्ट्रपति का पद

और हाँ, 10 वर्षों तक भारत के उप-राष्ट्रपति रहे हामिद अंसारी की जब बात होती है तब गिरोह विशेष के लिए ये पद अचानक से इतना पवित्र हो जाता है कि पूछिए मत। हामिद अंसारी पर पद के दुरुपयोग के एक नहीं बल्कि कई आरोप लग चुके हैं। ISRO के वैज्ञानिक नंबी नारायणन का करियर बर्बाद किए जाने की साज़िश में भी उनका नाम जुड़ा था। विधायक सुशील सिंह ने आरोप लगाया था कि मुख़्तार अंसारी के कहने पर हामिद अंसारी ने तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार से उनके पूरे परिवार पर मकोका लगवा दिया था। हामिद अंसारी पर मुख़्तार को संरक्षण देने के आरोप लगे।

पाकिस्तान के पत्रकार नुसरत मिर्जा ने खुद एक इंटरव्यू में खुलासा किया था कि 2005 से 2011 के बीच हामिद अंसारी ने उसे निमंत्रण देकर भारत बुलाया और कई सारी खुफिया जानकारियाँ उसके साथ साझा की। तब वो जामा मस्जिद के इमाम से भी मिला था। कभी तिरंगे को सलामी नहीं दी, कभी पहले ‘योग दिवस’ कार्यक्रम से नदारद रहे तो कभी रॉ के नेटवर्क को उजागर करने के आरोप लगे – लेकिन, गैंग के पत्रकारों ने हमेशा हामिद अंसारी का बचाव किया। प्रधानमंत्री के विशेष सलाकार दीपक वोहरा ही उन्हें ‘विश्वासघाती’ कह चुके हैं।

ये वही हामिद अंसारी हैं जिन्होंने 10 वर्ष तक इतने बड़े पद पर रहने के बाद अचानक से लगने लगा था कि भारत में मुस्लिम सुरक्षित नहीं हैं। पत्रकार अमन चोपड़ा ने कठिन सवाल पूछे तो वो इंटरव्यू से भाग खड़े हुए। इतने आरोपों के बावजूद अरफ़ा खानम शेरवानी के लिए हामिद अंसारी ‘संविधान के रक्षक’ हैं, वो अचानक से उनके 50 वर्षों के करियर और उनके पूर्वजों की महानता के बारे में बात करने लगती हैं। अब क्या हो गया? जगदीप धनखड़ अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के सदस्य रहे हैं, उनके करियर पर बात नहीं करेंगे ये लोग? ‘किसान पुत्र’ से ये कैसी एलर्जी?

8 धमाके, 279 मौतें, 500+ घायल और 2 हजार मुस्लिम गिरफ्तार: ISIS ने जब ईस्टर का दिन चुनकर दहलाया पूरा श्रीलंका, बुर्के तक पर देश ने लगा दिया था प्रतिबंध

21 अप्रैल, 2019 को ईस्टर त्यौहार के दिन श्रीलंका में हुए सिलसिलेवार आतंकी हमलों ने देश को हिलाकर रख दिया था। इस्लामिक स्टेट (ISIS) से जुड़े आत्मघाती हमलावरों ने कोलंबो में तीन चर्चों और तीन आलीशान होटलों को निशाना बनाया, इस दौरान 8 धमाके हुए थे जिसमें 279 लोग मारे गए थे। इस आतंकी हमले का शिकार होने वाले 11 लोग भारतीय थे। कुल 45 विदेशी इस हमले में मारे गए थे। हमले में घायल होने वालों की संख्या लगभग 500 थी।

श्रीलंकाई सरकार के अनुसार, इन हमलों को नेशनल तौहीद जमात (NTJ) नामक स्थानीय आतंकवादी समूह से जुड़े श्रीलंकाई नागरिकों ने अंजाम दिया था। प्रारंभिक जाँच में क्राइस्टचर्च में मुस्लिमों पर हुए हमले के प्रतिशोध के रूप में इसे पाया गया। ISIS ने भी इन हमलों की जिम्मेदारी ली थी।

10 दिन पहले मिली थी हमलों की जानकारी

सबसे चिंताजनक पहलू यह था कि सुरक्षा एजेंसियों को हमलों से दस दिन पहले ही इस्लामी समूह से चर्चों पर खतरे की खुफिया जानकारी मिल गई थी, लेकिन इस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। सितंबर 2018 में कोयंबटूर में पकड़े गए 7 ISIS आतंकवादियों के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में NIA को आत्मघाती हमलावरों में से एक जहरान हाशिम की कई रिकॉर्डिंग मिली थीं।

जब यह पता चला कि अधिकारियों ने महीने के शुरू में योजनाबद्ध हमलों के बारे में भारतीय खुफिया चेतावनी को ढंग से नहीं लिया था, तो सरकार ने भी अपनी गलती मानी थी। प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने इस बात पर जोर दिया कि न तो उन्हें और न ही उनके मंत्रिमंडल के सदस्यों को चेतावनी के संबंध में कोई सूचना मिली थी।

2 हजार से अधिक मुस्लिम किए गए थे गिरफ्तार

हमलों के बाद, श्रीलंकाई सरकार ने सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए थे। हमले के बाद आपातकाल लागू किया गया था। इसके बाद NTJ पर प्रतिबंध भी लगाया था। श्रीलंकाई सुरक्षा एजेंसियों ने इसके बाद 2,000 से अधिक मुस्लिम पकडे गए थे। हालाँकि, इन कार्रवाइयों की मानवाधिकार संगठनों ने आलोचना की। सरकार ने बुर्का पर प्रतिबंध लगाने और कई अपंजीकृत इस्लामी स्कूलों को बंद करने जैसे फैसले भी लिए, जिन्हें बाद में वापस ले लिया गया।

नकाब पर प्रतिबंध

राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए नकाब पर भी बैन लगाया गया था। लेकिन 2019 में इसे फिर से हटा दिया गया था। इसके बाद मुस्लिम महिला शिक्षकों के ड्रेस कोड के साथ कई ऐसे नियम लागू हुए, जिस पर हँगामा मचा और उन्हें भी वापस ले लिया गया था।

2024 में कैथोलिक चर्च ने ईस्टर रविवार के पीड़ितों को संत घोषित करने का फैसला किया। पीड़ितों के लिए न्याय की माँग करते हुए, कोलंबो के आर्कबिशप कार्डिनल मैल्कम रंजीत ने हमलों की अंतरराष्ट्रीय जाँच की माँग की है।

निशाने पर थे भाजपा सरकार के हिंदू नेता

गुजरात एटीएस ने 20 मई 2024 को अहमदाबाद हवाई अड्डे पर चार श्रीलंकाई नागरिकों को ISIS आतंकवादी होने के संदेह में गिरफ्तार किया। इन आतंकियों का सीधा कनेक्शन ISIS प्रमुख ‘अबू’ से था, जिनके पास से भरी पिस्तौलें और ISIS का झंडा बरामद किया गया था। ये आतंकवादी भाजपा और RSS नेताओं पर हमला करने की साजिश रच रहे थे।

41 श्रीलंकाई नागरिक ISIS में शामिल होने सीरिया पहुँचे

भारत के सुरक्षा अधिकारियों ने श्रीलंका में हुए हमलों, दक्षिण एशिया में ISIS की उपस्थिति और उसके बढ़ते खतरे को उजागर किया है। अनुमान है कि 41 श्रीलंकाई नागरिक ISIS में शामिल होने के लिए सीरिया गए थे। साल 2014 में NIA को सूचना मिली थी कि 100 भारतीय नागरिक ISIS में शामिल होने के लिए सीरिया गए है। जिसमें से ज्यादातर केरल के रहने थे।

भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान जैसे कट्टरपंथी इस्लामी देशों के पास में स्थित है। भारत पर ISIS का खतरा सबसे ज्यादा है। आतंकवाद को लेकर उसके पड़ोसियों का रवैया खराब होने के चलते उसे और भी समस्या हो रही है। भारत सरकार के लिए अपनी सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों के बीच सहयोग इसलिए भी बढ़ाना चाहिए, क्योंकि क्षेत्रीय आतंकवाद विरोधी सहयोग में कहीं ना कहीं कमी है।

यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में रुकमा राठौर ने लिखी है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

ब्राह्मणों पर मू#ने की बात करने वाले अनुराग कश्यप को आ गई अक़्ल? अब माँग रहे ‘दिल से माफ़ी’, कहा – गुस्से में भूल गया था मर्यादा, मेरा परिवार भी आहत

ब्राह्मणों पर पेशाब करने का ऐलान करने वाले अनुराग कश्यप ने अब माफ़ी माँग ली है। अनुराग कश्यप ने इंस्टाग्राम पर अपने एक कमेंट में लिखा था, “ब्राह्मणों पर मु%गा।” इसके बाद से लगातार उनका विरोध हो रहा था। यहाँ तक कि माफ़ी माँगने से इनकार करते हुए अनुराग कश्यप ने उलटा अपने बयान का बचाव किया था। लेकिन, मंगलवार (22 अप्रैल, 2025) को ‘X’ पर एक पोस्ट में उन्होंने माफ़ी माँग ली। ‘देव डी’ (2009) और ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ (2012) जैसी फ़िल्में बना चुके अनुराग कश्यप ने कहा कि वो गुस्से में किसी को जवाब देने में अपनी मर्यादा भूल गए थे और इसी कारण पूरे ब्राह्मण समाज को बुरा बोल डाला।

अनुराग कश्यप ने लिखा, “वो समाज जिसके तमाम लोग मेरी ज़िंदगी में रहे हैं, आज भी हैं और बहुत कंट्रीब्यूट करते हैं – आज वो सब मुझसे आहत हैं। मेरा परिवार मुझसे आहत है। बहुत सारे बुद्धिजीवी, जिनकी मैं इज्जत करता हूँ, मेरे उस गुस्से में मेरे बोलने के तरीके से आहत हैं। मैंने ख़ुद ही ऐसी बात करके, अपनी ही बात को मुद्दे से भटका दिया। मैं तहे दिल से माफी माँगता हूँ – इस समाज से जिनको मैं ये नहीं कहना चाह रहा था, लेकिन आवेश में किसी की घटिया टिप्पणी का जवाब देते हुए लिख दिया।”

अनुराग कश्यप ने अपनी ख़ुद ही अपने द्वारा इस्तेमाल की गई भाषा को अभद्र करार देते हुए कहा कि वो अपने तमाम सहयोगियों, दोस्तों, परिवार और समाज से माफ़ी माँगते हैं। साथ ही उन्होंने आश्वासन दिया कि वो आगे इसपर काम करेंगे ताकि अबसे ऐसा न हो। उन्होंने मुद्दे की बात करने व सही शब्दों का इस्तेमाल करने का भी वादा किया। अनुराग कश्यप ने आशा जताई कि सब लोग उन्हें माफ़ कर देंगे। अनुराग कश्यप ने इस कमेंट के लिए अपने गुस्से को जिम्मेदार ठहराया है और इसपर काम करने की बात कही है।

इससे पहले इंस्टाग्राम पर अनुराग कश्यप ने माफ़ी के नाम पर अपने घृणित एजेंडे को आगे बढ़ाया था। उन्होंने एक बार फिर ब्राह्मणों के लिए अप्रत्यक्ष रूप से ‘संस्कार के सरगना’ बताते हुए कहा था कि किसी कमेंट के कारण उनके द्वारा किसी की बेटी को बलात्कार की धमकियाँ नहीं मिलनी चाहिए। याद दिलाते चलें कि अनुराग कश्यप को एक यूजर ने लिखा था कि ब्राह्मण से तुम्हारी जितनी सुलगेगी, उतनी सुलगाएँगे। इसी कमेंट का रिप्लाई देते हुए उन्होंने एक पूरे समुदाय पर टिप्पणी कर डाली।

ये पूरा मामला ‘फुले’ फ़िल्म की रिलीज से जुड़ा हुआ है। बता दें कि महाराष्ट्र के ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले के जीवन पर बनी फिल्म ‘फुले’ की रिलीज में देरी को लेकर सेंसर बोर्ड पर भी वो बरसे थे। साथ ही फ़िल्म में हिन्दू धर्म के नकारात्मक चित्रण को लेकर विरोध का गुस्सा उन्होंने ब्राह्मणों पर भद्दी टिप्पणी करके निकाला था। इस प्रकार की टिप्पणियों के बाद लोगों ने अनुराग कश्यप को सनकी तक बताया था। ब्राह्मण समाज उनसे माफ़ी माँगने की लगातार माँग कर रहा था।

जिस नक्सली ने की पूर्व CM बाबूलाल मरांडी के बेटे की हत्या, झारखंड में CRPF ने उसे उतारा मौत के घाट: SP समेत 20 लोगों के मर्डर में था अरविंद यादव का हाथ, पुलिस ने रखा था ₹25 लाख का इनाम

बोकारो मुठभेड़ में अरविंद यादव की मौत के झारखंड में अंतिम सांस ले रहे नक्सली संगठन को बड़ा झटका लगा है। झारखंड में 25 लाख रुपए के साथ बिहार सरकार ने भी उस पर 5 लाख रुपए का इनाम घोषित किया था। बिहार और झारखंड के बॉर्डर वाले इलाकों में नक्सली संगठनों को मजबूत करने में पिछले 30 सालों में इसका अहम रोल था। झारखंड के बोकारो से लेकर जमुई, दुमका, डालटेनगंज, लखीसराय, बांका तक उसका राज था।

क्या था चिलखारी नरसंहार?

मुँगेर के एसपी केसी सुरेन्द्र बाबू, बीजेपी नेता बाबू लाल मरांडी के बेटे की हत्या समेत 85 मामले उस पर दर्ज थे। झारखंड के गिरिडीह में चिलखारी नरसंहार में अरविंद यादव शामिल था। बिहार झारखंड सीमा पर देवरी के चिलखरयोडीह में नक्सलियों का एक ग्रुप कार्यक्रम स्थल पर पहुँच कर मंच पर चढ़कर माइक से चेतावनी दी और अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी। इस हत्याकांड में बाबू लाल मरांडी के बेटे अनूप मरांडी समेत 20 लोगों की मौके पर ही मौत हो गयी थी। मंच पर हर तरफ खून ही खून दिख रहा था। इस भयावह दृश्य को देख कर पुलिस वालों की भी रूह काँप गई थी।

झारखंड-बिहार-पश्चिम बंगाल में ठिकाना

बोलने में तेज तर्रार और पढ़ा-लिखा अरविंद यादव नए लोगों को संगठन से जोड़ता था। जमुई के सोनो प्रखंड के भेलवा मोहनपुर में 8 कमरों के घर में उसके माता-पिता और भाई-बहन आज भी रहते हैं। जानकारी के मुताबिक उसकी पत्नी मुँगेर में रहती है और बच्चे उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।

अरविंद यादव का पश्चिम बंगाल के आसनसोल में भी घर है। इस घर में उसकी पत्नी पहले बच्चों के साथ रहती थी लेकिन अब मुँगेर चली गई है। अलग अलग ब्रांड की घड़ी पहनने का शौकीन अरविंद यादव को नक्सली संगठन का थिंक टैंक माना जाता है।

22 जनवरी को बाल-बाल बचा था अरविंद यादव

बताया जाता है कि अविनाश उर्फ अरविंद यादव की किस्मत ने 22 जनवरी 2025 को बचा लिया था। उस वक्त पुलिस मुठभेड़ बोकारो के ऊपर घाट इलाके में हुई थी। जानकारी के मुताबिक यहाँ से वो भेल्वाघाटी के रास्ते चकाई के बोगी बरमोरिया जंगल में भाग गया था। यहाँ से वह अपने घर मोहनपुर पहुँचा। पुलिस जब तक वहाँ तबिश देती उससे पहले वो बोकारो भाग गया। लेकिन 21 अप्रैल 2025 को सुरक्षाबलों को तब बड़ी सफलता मिली जब बोकारो के ललपनिया में पुलिस ने 8 नक्सलियों को मार गिराया। इसमें अरविंद यादव भी शामिल था।

खुद के मारे जाने की फैलाई थी अफवाह

करीब 4 साल पहले पुलिस मुठभेड़ में अरविंद यादव के मरने की खबर झारखंड से लेकर बंगाल तक फैल गयी थी। यहाँ तक कि उसके घर में श्राद्ध कर्म की तैयारी हो गयी थी। लेकिन पुलिस को इस खबर पर शक था। बाद में पता चला कि उसने जानबूझकर अपनी मौत की खबर उड़ाई थी ताकि पुलिस की नजर उस पर हट जाए।

ना एक दिन की वकालत, ना ही कानून की डिग्री… बन गए भारत के CJI: जानिए कौन थे जस्टिस कैलाशनाथ वांचू, कॉन्ग्रेस सरकार के पक्ष में भी हुए थे खड़े

भाजपा सांसद निशिकांत दुबे की सुप्रीम कोर्ट पर टिप्पणियों के बाद देश में न्यायिक प्रक्रिया पर चर्चाएँ जोर-शोर से चल रही हैं। निशिकांत दुबे इस बीच पीछे हटाने के मूड में नहीं है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व CJI के बारे में जिक्र किया है, जिनके पास कानून की कोई डिग्री नहीं थी।

उन्होंने एक्स (पहले ट्विटर) पर जस्टिस कैलाशनाथ वांचू के विषय में लिखा है। जस्टिस वांचू देश के 10वें CJI थे और उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान एक बड़ा फैसला भी सरकार के हक़ में दिया था।

कौन थे जस्टिस कैलाशनाथ वांचू?

सुप्रीम कोर्ट के कामकाज और जजों के विषय में जानकारी देने वाली वेबसाIइट सुप्रीम कोर्ट आब्जर्वर के अनुसार, कैलाशनाथ वांचू का जन्म 1903 में मध्य प्रदेश में हुआ था। वह पढ़ाई में कुशाग्र थे और उन्होंने 1924 में तब नौकरशाही के लिए करवाई जाने वाली परीक्षा इंडियन सिविल सर्विसेज (ICS) पास की थी।

जस्टिस वांचू इसके बाद अपनी ट्रेनिंग के लिए इंग्लैंड गए थे। उन्होंने इंग्लैंड में 1926 तक ट्रेनिंग ली थी। उनकी शुरुआती तैनातियाँ कलेक्टर के तौर पर हुई थीं। उन्हें सबसे पहले उत्तर प्रदेश (तब संयुक्त प्रांत) में तैनाती दी गई थी। 11 वर्षों तक वह इन्हीं पदों पर काम करते रहे थे। उन्हें 1937 में जिला स्तर के जज के तौर पर पहली तैनाती मिली थी।

इलाहाबाद हाई कोर्ट में भी बने जज

जस्टिस वांचू जिला जज बनने के लगभग 10 वर्ष बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुँच गए थे। सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट बताती है कि जस्टिस वांचू को फरवरी, 1947 में इलाहाबाद हाई कोर्ट में तैनाती मिली थी। वह इसके बाद 1951 तक इलाहाबाद हाई कोर्ट में काम करते रहे थे।

जस्टिस वांचू को राजस्थान हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस भी बनाया गया था। उन्हें 1951 में राजस्थान हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस बना कर भेजा गया था। यहाँ उन्होंने 1958 तक अपनी सेवाएँ दी थीं। उन्हें इस दौरान और भी कई जगह पर जिम्मेदारियां दी गई थीं।

CJI कैसे बने जस्टिस वांचू?

राजस्थान हाई कोर्ट में 7 वर्ष काम करने के बाद जस्टिस कैलाशनाथ वांचू को सुप्रीम कोर्ट में जज बना दिया। उन्हें यहाँ 12 अप्रैल, 1967 को CJI बनाया गया था। इसके पीछे एक विशेष कारण था। बताया गया कि 1967 में तत्कालीन CJI जस्टिस K सुब्बाराव ने एकाएक इस्तीफ़ा दे दिया।

सुब्बाराव के इस्तीफे के पीछे का कारण उनका राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने का फैसला था। हालाँकि, जस्टिस K सुब्बाराव यह चुनाव जाकिर हुसैन से हार गए थे। जस्टिस सुब्बाराव के इस्तीफे के चलते ही जस्टिस कैलाशनाथ वांचू को CJI बनाया गया था।

इसी के साथ वह पहले और अकेले ऐसे CJI बन गए थे, जिसके पास ना वकालत की डिग्री थी और ना ही वह वकील रहे थे। उनकी नियुक्ति का आधार उनका पहले का अनुभव था। वह निचली अदालत में भी जज इस आधार बनाए गए थे कि उनका आपराधिक कानूनों को लेकर ज्ञान अच्छा था। उन्होंने या ज्ञान ICS की ट्रेनिंग के दौरान हासिल किया था।

जस्टिस वांचू 10 महीने CJI के पद पर रहे थे। उनका कार्यकाल फरवरी, 1968 में खत्म हुआ था।

सरकार के पक्ष में भी हुए थे खड़े

जस्टिस वांचू ने कई महत्वपूर्ण मुकदमों की सुनवाई की थी। इनमें कई संवैधानिक मामले भी शामिल थे। इन्हीं में से एक मामला गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य का था। इसे भारतीय संविधान और कानूनी इतिहास में महत्वपूर्ण मामला माना जाता था।

1967 में इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था कि संसद संविधान में दिए गए मूल अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती। यह सुनवाई जस्टिस सुब्बाराव की बेंच ने की थी। इसी बेंच में जस्टिस वांचू भी शामिल थे। उन्होंने इस फैसले से अपना मतभेद प्रकट किया था। जस्टिस वांचू की राय बाकी बेंच से लगा थी।

उनका मानना था कि संसद संविधान में देश के नागरिकों को दिए गए मूल अधिकारों में बदलाव कर सकती है। उनका यह कदम सरकार का पक्ष लेने वाला माना गया था। उनके इस कदम के कुछ ही दिनों बाद उन्हें CJI बनाया गया था।