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नौसेना लेफ्टिनेंट की 6 दिन पहले हुई थी शादी, परिवार संग घूमने गए बिहार के IB अधिकारी की भी हत्या: पहलगाम में नाम पूछ-पूछकर गोली मार रहे थे आतंकी

जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में मंगलवार (22 अप्रैल 2025) को हुए आतंकी हमले में 28 लोगों की मौत हो गई। वहीं, हमले में 20 से अधिक लोग घायल भी हो गए हैं, जिनमें से कुछ ही हालत नाजुक है। मृतकों में 2 विदेशी पर्यटक के अलावा, खुफिया ब्यूरो (IB) का एक अधिकारी और भारतीय नौसेना का एक अधिकारी भी शामिल हैं।

आईबी अधिकारी

आतंकी हमले में मारे गए आईबी अधिकारी की पहचान मनीष रंजन के रूप में हुई है। वे बिहार के रहने वाले थे और हैदराबाद स्थित आईबी कार्यालय में सेक्शन ऑफिसर के पद पर कार्यरत थे। मनीष अपने परिवार के साथ जम्मू-कश्मीर घूमने गए थे। हमले के दौरान उन्हें सिर में गोली लगी, जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई। हमले में उनकी पत्नी और दो बच्चे बाल-बाल बचे हैं।

भारतीय नौसेना के लेफ्टिनेंट

इस हमले में भारतीय नौसेना के लेफ्टिनेंट विनय नरवाल की भी जान चली गई। वे हरियाणा के रहने वाले थे और केरल के कोच्चि में तैनात थे। 26 साल के विनय नरवाल की शादी 16 अप्रैल 2025 को गुरुग्राम के हिमांशी नरवाल के साथ हुई थी और 19 अप्रैल को रिसेप्शन आयोजित किया गया था। इसके बाद वे 21 अप्रैल को पत्नी के साथ घूमने के लिए पहलगाम पहुँचे थे।

पत्नी हिमांशी का कहना है कि वे बैसरण घाटी में घूम रहे थे। उसी दौरान आतंकी आए उनके पति से नाम पूछा और फिर गोली मार दी। हिमांशी का वीडियो भी वायरल हुआ है। इस वीडियो में हिमांशी को यह कहते हुए सुना गया था, “मैं अपने पति के साथ भेलपुरी खा रही थी। इसी दौरान एक आदमी आया और पूछा कि मुस्लिम हो। इसके बाद गोली मार दी।”

हमले के बाद भारतीय सेना और जम्मू-कश्मीर पुलिस ने अनंतनाग के बैसरण क्षेत्र में संयुक्त तलाशी अभियान शुरू कर दिया है। आतंकियों की तलाश के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चलाया जा रहा है। सेना की चिनार कोर ने जानकारी दी कि घायल लोगों को तुरंत अस्पताल पहुँचाया गया और स्थिति पर लगातार निगरानी रखी जा रही है।

हमले के तुरंत बाद केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने श्रीनगर पहुँचकर एक उच्चस्तरीय सुरक्षा समीक्षा बैठक की। बैठक में जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, उपराज्यपाल मनोज सिन्हा और अन्य वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। गृह मंत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घटना की जानकारी दी और हमले में शामिल लोगों को कड़ी से कड़ी सजा देने का आश्वासन दिया।

पहलगाम हमले में बाल-बाल बचे केरल हाई कोर्ट के 3 जज, परिवार समेत 8 लोगों का समूह गया था कश्मीर घूमने: अब सुनाई आपबीती

जम्मू कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले में अब तक 28 पर्यटकों की जान चली गई है, जिसमें से 2 विदेशी नागरिक भी शामिल थे। मंगलवार (22 अप्रैल, 2025) दोपहर ढाई बजे के करीब हुए इस हमले की जिम्मेदारी ‘द रेजिस्टेंस फ्रंट’ (TRF), जो पाकिस्तान के आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ा हुआ है, ने ली है। हमलावर, जो सेना की वर्दी में थे, पहलगाम के बाईसरन हिल स्टेशन की पहाड़ियों से उतरे और पर्यटकों पर अंधाधुंध गोलियाँ बरसाईं।

इसी बीच केरल हाई कोर्ट के तीन जज, अनिल के नरेंद्रन, जी गिरीश और PG अजितकुमार, अपने परिवार के साथ जम्मू-कश्मीर घूमने गए थे, तभी आतंकवादियों ने हमला कर दिया, जिसमें तीनों जज बाल-बाल बचे। पहलगाम में हुए आतंकी हमले पर जजों ने आपबीती बताई है।

जज और उनके परिवार हमले से कुछ घंटे पहले ही पहलगाम से निकल गए थे। 8 लोगों का यह समूह 17 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर पहुँचा था और घूमते हुए सोमवार (21 अप्रैल, 2025) को पहलगाम पहुँचा। वहाँ उन्होंने कई मशहूर जगहें देखीं और फिर वहीं रुक गए।

अगले दिन, मंगलवार (22 अप्रैल, 2025) की सुबह 9:30 बजे, वे पहलगाम से श्रीनगर के लिए रवाना हो गए। यह हमला दोपहर के आसपास हुआ था, जिसमें 28 पर्यटकों की जान चली गई।

केरल हाई कोर्ट के जज ने बताई आपबीती

‘द हिंदू’ से बातचीत के दौरान जस्टिस अनिल के नरेंद्रन बताते है कि मौसम अच्छा था और उन्होंने सोमवार को ही कई मंदिर और घूमने लायक पर्यटन देख लिए थे। जस्टिस के ड्राइवर ने उनसे कई और भी जगहें दिखाने की बात कहीं थी। लेकिन, जज ने श्रीनगर लौटकर डल झील में नाव की सवारी करने की बात कहीं और वे वहाँ से सुरक्षित श्रीनगर के लिए निकल चुके थे। 

जस्टिस नरेंद्रन ने यह भी बताया कि श्रीनगर के होटल में उन्हें एक ऐसा व्यक्ति मिला, जो आतंकी हमले का सामना कर बाल-बाल बचा था। इस घटना के बाद वे व्यक्ति बुरी तरह से डर गया था।

इसके अलावा जस्टिस अजितकुमार भी हमले के समय वहाँ से निकलकर श्रीनगर सुरक्षित पहुँच चुके थे। वो बुधवार को केरल लौटने के लिए रवाना होंगे।

‘जाओ… जाकर अपनी सरकार को बता देना’: आतंकियों ने कानपुर के शुभम द्विवेदी को पत्नी के सामने ही सिर में मारी गोली, 2 महीने पहले ही हुई थी शादी

जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 28 लोगों की मौत हुई है। मृतकों में कानपुर के रहने वाले शुभम द्विवेदी भी शामिल हैं। आतंकियों ने उनकी पत्नी के सामने ही उनकी गोली मारकर हत्या कर दी। शुभम की दो महीने पहले ही शादी हुई थी। वह पत्नी और परिवार के 11 सदस्यों के साथ कश्मीर घूमने गए थे। शुभम 23 अप्रैल को वापस लौटने वाले थे।

बता दें कि 12 फरवरी 2025 को शुभम का विवाह ऐशान्या के साथ हुआ था। शादी के बाद पूरे परिवार ने कश्मीर घूमने की योजना बनाई थी और 17 अप्रैल को वे सभी कश्मीर पहुँचे थे। जिस समय शुभम की हत्या की गई, उस समय वे पत्नी ऐशान्या के साथ घुड़सवारी करने के लिए ऊपर पहाड़ी पर निकले थे। वहीं, शुभम के पिता और अन्य परिजन नीचे ही ही रुक गए थे।

मृतक शुभम की पत्नी ऐशान्या ने बताया कि जब वे घुड़सवारी कर रहे थे, उसी समय हमलावर आए। आतंकियों ने उनसे उनका नाम पूछा और कलमा पढ़ने को कहा। इसके बाद आतंकियों ने उन्हें गोली मारकर हत्या कर दी। इसके बाद सुरक्षाकर्मियों ने आनन-फानन में उन्हें कश्मीर भेजा। कश्मीर के अस्पताल में शुभम की उपचार के दौरान मौत हो गई।

पिता की सीमेंट कंपनी में काम करते थे शुभम

शुभम द्विवेदी मूल रूप से कानपुर के महाराजपुर क्षेत्र के गाँव हाथीपुर रघुवीरनगर के रहने वाले थे। 31 साल के शुभम के पिता डॉक्टर संजय द्विवेदी सीमेंट के डिस्ट्रीब्यूटर हैं। वह पिता के साथ ही काम करते थे। शुभम के चाचा ज्योतिषाचार्य मनोज द्विवेदी ने बताया कि शुभम के पिता, माँ सीमा द्विवेदी, बहन आरती, बहनोई, उनके दो बच्चे, ससुर और सास पहाड़ी के नीचे ही रुके थे।

वहीं, शुभम और उनकी पत्नी ऐशान्या पहलगाम में घुड़सवारी करने के लिए दोपहर लगभग एक बजे गए थे। लगभग सवा दो बजे के करीब दो से तीन आतंकवादी सेना की वर्दी में आए और ताबड़तोड़ गोलीबारी करने लगे। हमलावरों ने एक गोली शुभम के माथे पर मारी और वह गिर गए। इस दौरान उनकी पत्नी बेहोश हो गई। पिता को घटना की जानकारी मिली तो वो बेटे और बहु को ढूँढने के लिए निकल गए।

शाम को पुलिस ने उनके पिता से शुभम के शव की पहचान कराई। चचेरे भाई सौरभ द्विवेदी ने बताया, “पहलगाम आतंकी हमले के बाद परिवार ने वीडियो भेजा। कहा कि ये देखो शुभम को क्या हो गया है। इसके एक बॉडी दिख रही थी। देखकर लगा कि उसके माथे में गोली मारी गई है। इसके बाद हमने परिवार के बाकी लोगों को जानकारी दी।”

सौरभ ने आगे कहा कि आतंकियों ने उनकी भाभी एशान्या को यह कहते हुए छोड़ दिया कि ‘जाओ अपनी सरकार को बता दो’। सौरभ ने सरकार से माँग की है कि उनका भाई शुभम जिस भी हाल में है, वैसे ही उनके शव को कानपुर पहुँचाया जाए।

बंदूकधारी, चरमपंथी, भारत प्रशासित कश्मीर…. जिन्होंने पहलगाम में 28 को उतारा मौत के घाट, उन्हें आतंकी कहने में ‘अल जज़ीरा’ से लेकर BBC तक को आई शर्म

जम्मू कश्मीर के पहलगाम में आतंकियों ने 28 निर्दोष नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया। इनमें अधिकतर वो पर्यटक हैं, जो वहाँ घूमने गए थे। स्पष्ट दिख रहा है कि ये आतंकियों की करतूत है। ये आतंकी आज से नहीं, बल्कि पिछले कई दशकों से जम्मू कश्मीर में यूँ ही ख़ून बहा रहे हैं। क़तर के सरकारी मीडिया संस्थान ‘अल जज़ीरा’, पाकिस्तान के ‘द डॉन’, अमेरिका के ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ (NYT) और ब्रिटेन के सरकारी मीडिया BBC ने शब्दों का हेरफेर करके आतंकियों का महिमामंडन करने का प्रयास किया।

‘अल जज़ीरा’ ने आतंकियों को कहा ‘बंदूकधारी’

आइए, सबसे पहले ‘अल जज़ीरा’ की भाषा देखते हैं। वो लिखा है, “भारतीय पुलिस के अनुसार, सशस्त्र व्यक्तियों ने भारत प्रशासित कश्मीर में पर्यटकों गोलीबारी की जिसमें 26 लोग मारे गए।” इसके बाद पुलिस का बयान डालते हुए “आतंकी हमला” को कुछ इस तरह डबल कोट में लिखा गया, जैसे अगर ‘अल जज़ीरा’ इन हत्यारों को ख़ुद से आतंकी कह देगा तो ये एकदम से उसकी संपादकीय नीतियों के विरुद्ध चला जाएगा।

वैसे ये पहली बार नहीं हो रहा है जब ‘अल जज़ीरा’ ने ऐसी हरकत की हो, आतंकियों को बार-बार ‘बंदूकधारी’ कहते रहे हैं।

पाकिस्तानी मीडिया ‘डॉन’ भी चला आतंकियों की लाइन पर

अब पाकिस्तानी मीडिया संस्थान ‘डॉन’ से क्या ही अपेक्षा करें! चूँकि घाटी में सारा का सारा आतंक ही पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित है, ऐसे में पाकिस्तानी मीडिया भला कैसे आतंकी को आतंकी कहेगा। ‘डॉन’ ने भी जम्मू कश्मीर को भारत का प्रांत मानने से इनकार करते हुए इसे ‘भारत अधिकृत कश्मीर’ बताया। इसने भी आतंकियों को ‘बंदूकधारी’ लिखा। साथ ही इसने पहलगाम को भी इसने ‘मुस्लिम बहुसंख्यक वाला क्षेत्र’ करार दिया। साथ ही इसने इस घटना की जिम्मेदारी लेने वाले आतंकी समूह ‘कश्मीर रेजिस्टेंस’ को भी ‘Little Known Group’ लिखा।

अख़बार बार-बार जम्मू कश्मीर को IOK लिखता रहा। साथ ही इसने लिखा कि अब सुरक्षा बल घाटी में वो स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं जिसे वो ‘सामान्य और शांतिपूर्ण’ कहते हैं। बताइए, ‘डॉन’ को जम्म कश्मीर को लेकर ये भी नहीं पता है कि ‘सामान्य’ और ‘शांतिपूर्ण’ माहौल क्या होता है।

‘वाशिंगटन पोस्ट’ के लिए भी ये आतंकी ‘बंदूकधारी’

अमेरिकी मीडिया संस्थान ‘वाशिंगटन पोस्ट’ ने भी आतंकियों को अंग्रेजी में ‘Gunmen’, यानी ‘बंदूकधारी’ कहकर संबोधित किया। इसकी एक और ‘चालाकी’ देखिए। इसने लिखा कि आतंकी जंगलों से आए और बिना किसी भेदभाव के गोलीबारी की। सोचिए, ‘बिना भेदभाव के’। जबकि पीड़ितों ने बार-बार कहा कि पुरुषों के पैंट खोल-खोलकर ये चेक किया गया कि उनका खतना हुआ है या नहीं। जिनका खतना नहीं हुआ था, उन्हें हिन्दू समझकर मारा गया। आईडी कार्ड चेक किया गया, पूछा जा रहा था, “मुस्लिम हो?”

इसके बावजूद ‘वाशिंगटन पोस्ट’ लिखता है कि ‘बिना किसी भेदभाव के’ गोलीबारी हुई। इतना ही नहीं, धूर्त ‘वाशिंगटन पोस्ट’ ने ये भी लिखा कि मुस्लिम बहुल इलाक़ों में भारत सरकार ने असहमति को लेकर बड़ी कार्रवाई की। साथ ही किसी ‘अब्दुल वहीद’ का गुणगान किया गया कि उसने पीड़ितों को बचाया।

BBC: हमेशा भारत के ख़िलाफ़, आतंकियों को मानता ही नहीं आतंकी

ब्रिटेन का सरकारी मीडिया संस्थान अब भी उसी मानसिकता में जी रहा है, जब भारत पर ब्रिटेन का राज था और हम ग़ुलाम थे। बीबीसी को लगता है कि वो कुछ भी कहकर बच जाएगा। इसने भी जम्मू कश्मीर को ‘भारत प्रशासित कश्मीर’ लिखा और आतंकियों को ‘बंदूकधारी’ कहकर संबोधित किया। इसने भी कश्मीर को ‘मुस्लिम बहुल इलाक़ा’ कहकर संबोधित किया। इसने जम्मू कश्मीर में आतंकवाद को ‘अलगाववादी विद्रोह’ कहकर संबोधित किया। साथ ही जम्मू कश्मीर में 5 लाख भारतीय सैनिकों के तैनात होने का दावा किया।

पहलगाम आतंकी हमला पर विदेशी मीडिया का प्रपंच

BBC ने जम्मू कश्मीर को भारतीय क्षेत्र मानने से एक तरह से इनकार करते हुए इतिहास बताया कि आज़ादी के बाद दोनों देश जम्मू कश्मीर पर अपना दावा ठोकते रहे हैं। इसने आतंकियों को भी चरमपंथी लिखा, ऐसा दिखाया जैसे वो कोई बागी हों। BBC की हिंदी शाखा ने तो हेडिंग में ही ‘चरमपंथियों’ लिखा। साथ ही आतंकियों को ‘बंदूकधारियों’ भी लिखा। इसी तरह जर्मन मीडिया संस्थान DW ने भी ‘भारत प्रशासित कश्मीर’ और ‘बंदूकधारियों’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया।

जब आतंकी हमको (हिन्दू) मार रहे थे गोली, तब स्थानीय (मुस्लिम) पढ़ रहे थे कुरान की आयतें : पहलगाम में मारे गए जिसके पिता-चाचा, उसने मीडिया को बताया

जम्मू कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले में इस्लामी आतंकियों ने हिन्दुओं को चुन-चुन कर मारा। हमले में बचे लोगों ने बताया कि इस आतंकी हमले के दौरान स्थानीय लोग कुरान की आयतें पढ़ रहे थे। हमले के बाद स्थानीय लोग ‘बिस्मिल्लाह-बिस्मिल्लाह’ करते हुए भी सुने गए थे। जिन हिन्दुओं को मारा गया, उनसे अजान करने को भी कहा गया।

इस पहलगाम हमले में पुणे के परिवार ने भी अपने सदस्य खोए हैं। इसके बाद परिवार की एक 26 वर्षीय सदस्य आसावारी ने मीडिया को बताया, “हम पाँच लोग एक साथ थे, जिसमें मेरे माता-पिता भी शामिल थे। हम पहलगाम में मिनी स्विट्ज़रलैंड कहे जाने वाले बैसरन घाटी में थे, तभी हमला शुरू हो गया।”

आसावारी ने आगे बताया, “हम तुरंत सुरक्षा के लिए पास के एक टेंट में भाग गए। छह-सात अन्य (पर्यटक) भी वहाँ पहुँच गए। हम सभी गोलीबारी से बचने के लिए जमीन पर लेट गए, हमें तब लगा कि आतंकियों और सुरक्षाबलों के बीच फायरिंग हो रही है।”

उन्होंने कहा, “फिर वे हमारे तंबू में आए और मेरे पिता से बाहर आने को कहा… उन्होंने कहा कि चौधरी बाहर आजा।” आसावारी ने बताया कि आतंकियों ने इसके बाद उनके पिता को प्रधानमंत्री मोदी का समर्थन करने के लिए गालियाँ दी। आसावारी ने बताया कि आतंकियों ने इसके बाद उनके पिता से कुरान की आयतें पढ़ने को कहा।

उन्होंने बताया, “फिर उन्होंने मेरे पिता से इस्लामी आयत (शायद कलमा) सुनाने को कहा। जब वह ऐसा नहीं कर पाए, तो उन्होंने उन पर तीन गोलियाँ चला दी। उन्होंने एक गोली सिर पर एक कान के पीछे और एक पीठ में मारी… इसके बाद उन्होंने मेरे अंकल को मार दिया। उनको 4-5 गोलियाँ मारीं।” उन्होंने बताया कि इस दौरान स्थानीय लोग कुरान की आयतें पढ़ रहे थे।

महिला ने बताया, “आतंकवादियों ने केवल आदमियों पर हमला किया। यह 26/11 के मुंबई हमले जैसा था। उन्होंने पुलिस जैसी वर्दी पहन रखी थी और उनके हावभाव सेना के जवानों जैसे ही थे।” महिला ने बताया कि उसे अभी अपने पिता और चाचा की स्थिति के विषय में कोई जानकारी नहीं है।

पहलगाम हमले का शिकार हुई कर्नाटक की एक महिला पल्लवी ने भी ऐसी ही आपबीती बताई है। उसके पति मंजूनाथ की हत्या कर दी गई है। पल्लवी ने बताया कि उसकी आँखों के सामने यह हमला हो गया और उसके पति को मार दिया गया। पल्लवी ने बताया कि वह कुछ समझ ही नहीं पाई।

उसने बताया कि उसे वापस लाते समय स्थानीय लोग बिस्मिल्लाह-बिस्मिल्लाह कर रहे थे। इस हमले के पीड़ित अब अपनी-अपनी कहानी बता रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस हमले के चलते अपना सऊदी अरब का दौरा बीच में ही छोड़ कर बुधवार (23 अप्रैल, 2025) को वापस आ गए हैं।

गौरतलब है कि कश्मीर के पहलगाम में मंगलवार (22 अप्रैल, 2025) को इस्लामी आतंकियों ने हमला किया। उन्होंने यहाँ मौजूद हिन्दू पर्यटकों को अलग किया। इसके लिए उन्होंने उनके आईडी कार्ड देखे और कुरान की आयतें पढ़ने को कहा। कई पुरुषों के पैंट खोल कर देखे गए।

इस हमले में 26 लोगों की मौत हो गई है। इनमें 2 विदेशी नागरिक भी शामिल हैं। एक दर्जन से अधिक पर्यटक घायल भी हैं, जिनका इलाज चल रहा है। इस हमले को लेकर देश में काफी गुस्सा है और इसके बदले की माँग की जा रही है।

सऊदी दौरा छोड़ दिल्ली लौटे PM मोदी, एयरपोर्ट पर ही NSA डोभाल-जयशंकर के साथ की मीटिंग: पहलगाम आतंकी हमले की जाँच NIA ने सँभाली, इलाके को सुरक्षाबलों ने घेरा

जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए भीषण आतंकी हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया। इस हमले में 26 लोग मारे गए, जिनमें अधिकतर लोग टूरिस्ट थे। इस आतंकी हमले के बाद पीएम मोदी सऊदी अरब के अपने दो दिवसीय दौरे को बीच में ही छोड़कर मंगलवार (22 अप्रैल 2025) रात जेद्दा से दिल्ली लौट आए।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरते ही राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, विदेश मंत्री एस. जयशंकर और विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने उन्हें पहलगाम हमले की पूरी जानकारी दी। पीएम ने तुरंत हालात का जायजा लिया और बुधवार (23 अप्रैल 2025) को कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी की बैठक बुलाई।

इससे पहले, सऊदी अरब में पीएम मोदी ने क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के साथ पहलगाम हमले पर चर्चा की। क्राउन प्रिंस ने हमले की कड़ी निंदा की और भारत के साथ आतंकवाद के खिलाफ मजबूत साझेदारी की बात दोहराई। पीएम ने सऊदी में आधिकारिक रात्रिभोज में हिस्सा नहीं लिया और तुरंत भारत लौटने का फैसला किया। सूत्रों के मुताबिक, हमले की गंभीरता को देखते हुए पीएम ने अपनी तयशुदा योजना बदली।

पहलगाम के बायसरण घाटी में हुए इस हमले को 2019 के पुलवामा हमले के बाद सबसे बड़ा आतंकी हमला माना जा रहा है। लश्कर-ए-तैयबा के मुखौटा आतंकी संगठन द रेसिस्टेंस फ्रंट ने हमले की जिम्मेदारी ली है। हमले में दो विदेशी नागरिकों (यूएई और नेपाल) और दो स्थानीय लोगों की भी मौत हुई। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने श्रीनगर पहुँचकर हाई-लेवल मीटिंग की और सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लिया।

इस बीच, राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) ने हमले की जाँच शुरू कर दी है। इसके साथ ही सेना, पुलिस और सीआरपीएफ ने इलाके की घेराबंदी कर दी है।

पति को मार डाला, ‘मोदी को बता देना’ कहकर पत्नी को ज़िंदा छोड़ा: घोड़े से आए थे पैंट खोल खतना चेक कर-कर के मारने वाले आतंकी, 50 राउंड फायरिंग

जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले के पहलगाम में मंगलवार (22 अप्रैल, 2025) को आतंकियों ने हमला किया। आतंकियों ने एक रिजॉर्ट को निशाना बनाया और अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। इस हमले में दो विदेशियों और दो स्थानीय व्यक्ति समेत 27 लोगों की मौत हुई है। हमले की जिम्मेदारी आतंकी संगठन ‘द रेजिस्टेंस फ्रंट’ (TRF) ने ली है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, हमलावरों ने रिजॉर्ट में मौजूद पर्यटकों से पहले सवाल-जवाब किए और फिर बर्बरता से हमला किया। हमलावर स्थानीय भाषा में बात कर रहे थे और पूरी योजना बनाकर आए थे। वे फौजी वर्दी में थे, जिससे उन्हें पहचानना मुश्किल हो गया। हमले की खबर मिलते ही सुरक्षाबल, स्थानीय पुलिस और मेडिकल टीमें मौके पर पहुँचीं। घायल पर्यटकों को तुरंत एयरलिफ्ट कर श्रीनगर के हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया।

पीड़ितों ने जो देखा बयाँ किया

  • दरअसल, घटना दोपहर करीब 2:45 बजे पहलगाम की बैसरन घाटी की है, जब पहलगाम के एक मशहूर रिजॉर्ट में अचानक गोलियों की आवाज़ें गूँजीं। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, दो संदिग्ध लोग घोड़े पर सवार होकर रिजॉर्ट के पास पहुँचे। यहाँ एक व्यक्ति से नाम पूछा और सीधे सिर में गोली मार दी। इसके बाद 50 राउंड फायरिंग की। जिससे अफरा-तफरी मच गई।

पहलगाम में पर्यटक पुलिसकर्मी के रूप में काम करने वाले एक स्थानीय व्यक्ति ने कहा, “मैंने तीन घायल लोगों को रेस्क्यू किया और अस्पताल पहुँचाया। स्थानीय लोगों ने सभी घायलों को रेस्क्यू कर लिया। पहले ऐसी घटना यहाँ कभी नहीं हुई।” एक महिला ने बताया कि उसके पति की हत्या कर दी गई तो जब उन्होंने कहा कि मुझे भी शूट कर दो। इसपर आतंकियों ने कहा, “तुम्हें ज़िंदा छोड़ रहा हूँ, मोदी को जाकर बता देना।”

आंतकी हमले के बाद के कई वीडियो भी सामने आए हैं। वीडियो में स्थानीय लोग और पर्यटकों को भागते हुए देखा जा सकता है। एक वीडियो में महिला ने रोते हुए कहा कि वो अपने पति संग भेलपुरी खा रही थी। इतने में एक आंतकी उनके पास आया और पति से पूछा कि क्या वह मुस्लिम है? और फिर उनको गोली मार दी।

पहलगाम से आई एक और ताजा तस्वीर में एक महिला स्थानीय लोगों से अपने पति को बचाने की अपील करती नजर आ रही हैं। इसके साथ ही घटना से संबंधित एक वीडियो भी देखा गया जिसमें एक व्यक्ति डरते हुए भागता नजर आ रहा है। वीडियो में पीछे गोलीबारी का शोर सुनाई दे रहा है।

इस मामले को लेकर स्थानीय लोगों ने भी चिंता जताई है। एक स्थानीय शख्स उमर ने कहा, “हम इस वक्त बहुत परेशान है। इस हमले से हमारा बहुत नुकसान हुआ है। यह सभी के लिए नुकसान है। इस हमले में जिन लोगों की जान चली गई, हमें उनके लिए भी काफी दुःख है। इस घटना के बाद से हम खुद भी परेशान है और हमारे यहाँ आए हुए गेस्ट भी परेशान हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए था।”

श्रीनगर में गृहमंत्री अमित शाह की बैठक

पहलगाम आतंकी हमले को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और जम्मू -कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह की उच्च स्तरीय बैठक जारी है। बैठक में उपराज्यपाल मनोज सिन्हा और अन्य वरिष्ठ अधिकारी मौजूद हैं। हमले की सूचना पर गृह मंत्री श्रीनगर पहुँचे हैं। सीएम उमर अब्दुल्ला ने हवाई अड्डे पर उनका स्वागत किया। इससे पहले सऊदी अरब गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गृह मंत्री से फोन पर बातचीत कर आंतकी हमले की जानकारी ली थी। इसके साथ ही घटना की समीक्षा करने के निर्देश दिए थे।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ‘राष्ट्रीय जाँच एजेंसी’ (NIA) जल्द ही पहलगाम आतंकी हमले की जाँच अपने हाथ में ले लेगी। इससे पहले दिल्ली के NIA के वरिष्ठ अधिकारियों ने सोनमर्ग का दौरा किया था। बुधवार (23 अप्रैल 2025) को पहलगाम जाने की संभावना है।

आतंकी हमले पर संवेदनाएँ जताईं

  • जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में आतंकी हमले में कई हस्तियों ने संवेदनाएँ जताई हैं। हमले की निंदा करते हुए पीड़ितो के न्याय और दोषियों को सजा दिलाने की माँग की है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने X पर ट्वीट कर लिखा, “मैं जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले की कड़ी निंदा करता हूँ। जिन लोगों ने अपने प्रियजनों को खो दिया है, उनके प्रति मेरी संवेदनाएँ। मैं प्रार्थना करता हूँ कि घायल लोग जल्द से जल्द ठीक हो जाएँ। प्रभावित लोगों को हर संभव सहायता प्रदान की जा रही है।”

इसके साथ ही पीएम ने कहा, “इस जघन्य कृत्य के पीछे जो लोग हैं उन्हें न्याय के कटघरे में लाया जाएगा…उन्हें बख्शा नहीं जाएगा! उनका नापाक एजेंडा कभी सफल नहीं होगा। आतंकवाद से लड़ने का हमारा संकल्प अडिग है और यह और भी मजबूत होगा।”

भारत में इजरायल के राजदूत रूवेन अजार ने X पर लिखा, “जम्मू-कश्मीर में हुए आतंकी हमले से दुःखी और स्तब्ध हूँ, जिसमें निर्दोष नागरिकों की जान चली गई। हमारी संवेदनाएँ पीड़ितों और उनके परिवारों के साथ हैं। हमारा समर्थन आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष में सुरक्षा बलों के साथ है।”

भारत में अर्जेंटीना के राजदूत मारियानो कॉसिनो ने एक्स पर पीएम नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और विदेश मंत्री एस जयशंकर को टैग करते हुए लिखा, “हम इस घृणित आतंकवादी कृत्य के पीड़ितों के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त करते हैं। अर्जेंटीना आतंकवाद, उग्रवाद और कट्टरता के सभी रूपों को खारिज करने में भारत के साथ खड़ा है। हमेशा जीवन के साथ और आतंक के खिलाफ।”

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा, “जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुआ आतंकी हमला कायरतापूर्ण, अक्षम्य और घोर निंदनीय है। जिन लोगों ने इस दुःखद घटना में अपने प्रियजनों को खो दिया है। उनके प्रति मेरी शोक संवेदनाएं। प्रभु श्री राम से प्रार्थना है कि दिवंगत पुण्यात्माओं को सद्गति और घायलों को शीघ्र स्वास्थ्य लाभ प्रदान करें।”

हमले के खिलाफ प्रदर्शन, न्याय की माँग

पहलगाम में पर्यटकों पर आंतकी हमला निंदनीय है। इस हमले के बाद जम्मू-कश्मीर में बजरंग दल कार्यकर्ताओं ने विरोध-प्रदर्शन किया। स्थानीय लोगों ने कैंडल मार्च निकालकर हमले का विरोध किया। इसके साथ पीड़ितो के लिए न्याय की माँग की।

सऊदी में मोदी, जयपुर में वेंस, अमरनाथ यात्रा… अब लोगों को डराएँगे ‘कश्मीरियत’ और ‘जम्हूरियत’ जैसे शब्द, मुर्शिदाबाद से पहलगाम तक वही खतने वाली सोच

जम्मू कश्मीर के पहलगाम में आतंकी हमला हुआ है। सिर्फ़ आतंकी हमला ही नहीं, इसको इस्लामी आतंकी हमला कहिए। इतना भी नहीं, इसे हिन्दुओं को निशाना बनाकर किया गया इस्लामी आतंकी हमला कहिए। ऐसा इसीलिए, क्योंकि पुरुष पर्यटकों के पैंट खोल-खोलकर देखा गया कि उनका खतना हुआ है या नहीं। जिन-जिनका खतना नहीं हुआ था, उन्हें जान से हाथ धोना पड़ा। एक बड़े मैदान में लाशें पड़ी दिखीं, महिलाएँ चीख-चीख कर मदद माँगती दिखीं। इनमें कई ऐसे जोड़े थे जो नई-नई शादी के बाद हनीमून मनाने गए थे। ये अनुच्छेद-370 और 35A को निरस्त किए जाने के बाद का सबसे बड़ा आतंकी हमला है।

पहलगाम में नरसंहार, आप टाइमिंग देखिए

इस हमले की टाइमिंग देखिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंगलवार (22 अप्रैल, 2025) को ही सऊदी अरब के जेद्दाह पहुँचे हैं। वहाँ उनका भव्य स्वागत हुआ। उनके एयरक्राफ्ट को एस्कॉर्ट करने के लिए सऊदी अरब ने अपने जेट्स भेजे। ये अपने-आप में पीएम मोदी के प्रति खाड़ी मुल्क़ों के सम्मान को दिखाता है। जेद्दाह का एक वीडियो भी सामने आया, जिसमें एक शेख ‘राजी’ (2018) फिल्म का गाना ‘ऐ वतन, वतन मेरे आबाद रहे तू’ गाना गाते हुए दिखा। तमाम मुस्लिम शख्स भी पीएम मोदी के सामने इसे गुनगुनाते हुए दिखे। तभी अचानक से, ऐसी खबर!

प्रधानमंत्री ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से बातचीत करके पूरी स्थिति की जानकारी ली, उनके निर्देश पर अमित शाह तुरंत ग्राउंड जीरो पर निकल गए। याद कीजिए, जून 2024 में रियासी में माता वैष्णो देवी मंदिर जा रही बस पर हमला किया गया था। 20 मिनट तक गोलीबारी चलती रही थी। मृतकों में 2 साल का एक बच्चा भी था, जिसकी तस्वीर आजतक हमें झकझोड़ती रहती है। लेकिन, हम कमज़ोर याददाश्त वाले लोग हैं। चीजों को बड़ी जल्दी भूल जाते हैं। महिलाओं-बच्चों को निशाना बनाने वाले इन कायरों के कुछ ‘हमदर्द’ सिर्फ़ जम्मू कश्मीर ही नहीं बल्कि देश के भीतर भी बैठे हैं।

हाँ, तो मैं बात कर रहा था टाइमिंग की। इधर केंद्रीय मंत्री अमित शाह का पूरा ध्यान मार्च 2026 तक देश को नक्सल-मुक्त करने पर है, छत्तीसगढ़ के सुकमा और बीजापुर में हाल ही में 33 नक्सलियों के आत्म-समर्पण की ख़बर आई, जिनपर कुल 50 लाख रुपए का इनाम था। ऐसे सरेंडर लगातार हो रहे हैं। हमने इन नक्सलियों का उत्पात देखा है, इनका बचाव करने वाले फादर स्टेन स्वामी, सुधा भारद्वाज, वरवरा राव और गौतम नवलखा जैसों को समाज के भीतर से इन्हें समर्थन देते हुए देखा है। ये सब जेल गए, तभी नक्सलियों की कमर टूटी।

कुछ ही दिनों पहले जमीन पर जमीन हड़पते जा रहे वक़्फ़ बोर्ड में सुधार के लिए वक़्फ़ क़ानून बना संसद से पास होकर। इसके विरोध के नाम पर पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बनाने वाले हरगोविंद दास और उनके बेटे चंदन को घर में घुसकर काट डाला गया। मुस्लिम भीड़ के उत्पात के कारण 400 हिन्दुओं को मालदा पलायन करना पड़ा। कहीं से इस्लामी कट्टरपंथ के विरुद्ध एक शब्द नहीं निकला। उधर राहुल गाँधी अमेरिका में जाकर भारत के चुनाव आयोग पर हमला कर रहे हैं। इसीलिए मैंने कहा, इस हमले की टाइमिंग देखिए। निशाना बनाए गए पर्यटकों में महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और ओडिशा और तमिलनाडु जैसे ग़ैर-हिन्दीभाषी राज्यों के भी लोग हैं, पूरे देश में आतंक का एक सन्देश भेजा गया है।

टाइमिंग देखिए, क्योंकि 27 जून, 2025 से अमरनाथ यात्रा शुरू हो रही है। ध्यान दीजिए, ये यात्रा पहलगाम से ही शुरू होती है। वही इलाक़ा, जिसे आतंकियों ने निशाना बनाया है। टाइमिंग इसीलिए देखिए, क्योंकि अमेरिका के उप-राष्ट्रपति JD वेंस इसी दिन जयपुर के दौरे पर थे जहाँ वो पत्नी और बच्चों समेत आमेर के किले में घूमे, वहीं 1 दिन पहले ही उनकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बेहद ही सौहार्दपूर्ण माहौल में बैठक हुई थी। याद कीजिए, फरवरी 2020 के अंत में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प दिल्ली आए थे, तब दिल्ली में दंगा किया गया था। शाहीन बाग़ सज़ा हुआ था पड़ोसी मुल्क़ों के पीड़ित हिन्दुओं को नागरिकता देने वाले क़ानून CAA के विरुद्ध।

आतंकियों की इस बौखलाहट का कारण क्या?

अब अमेरिकी उप-राष्ट्रपति के दौरे के दौरान ये सब। भीतर के दंगाइयों और कश्मीर के आतंकियों की विचारधारा को अलग करके मत देखिए। अब आते हैं कारण पर। एक बड़ा कारण ये है कि जम्मू कश्मीर से लद्दाख को अलग किए जाने और शांतिपूर्ण विधानसभा चुनाव के बाद सरकार बनने के कारण आतंकी बेचैन थे। ऊपर से घाटी में पर्यटन फल-फूल रहा था। 2024 में लगभग 35 लाख, 2023 में 27 लाख और 2022 में 26 लाख पर्यटक कश्मीर घाटी पहुँचे थे (आँकड़े जम्मू को हटाकर)।

इनमें हजारों की संख्या में विदेशी पर्यटक भी शामिल थे। जैसा कि हमें पता है, भारत ने 2023 में G20 अध्यक्षता की और इस दौरान देशभर में तमाम बैठकें हुईं। जम्मू कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में मई 2023 में G20 की टूरिज्म वर्किंग ग्रुप की बैठकें हुईं। कश्मीर के उत्पाद विदेशी प्रतिनिधिमंडल को दिखाए गए, कलाकारों से उन्हें मिलवाया गया। श्रीनगर में तमाम स्थलों पर विदेशी प्रतिनिधिमंडल घूमा भी। ऐसे दृश्य आतंकियों को और उनके आकाओं को लगाकर असहज कर रहे थे।

ये कोई आम आतंकी हमला नहीं है, क्योंकि एक महिला की जान बख्शते हुए आतंकियों ने कहा कि जाओ मोदी को बता देना। इसीलिए मैंने लिखा, ‘सन्देश’ है ये। ऐसा नहीं है कि मोदी सरकार, तमाम ख़ुफ़िया/सुरक्षा एजेंसियाँ, जम्मू कश्मीर सरकार और अधिकारियों को ख़तरे का अंदाज़ा नहीं है या उनकी अगली रणनीति तय नहीं होगी। फिर भी, जो तेज़ स्थिति बनी है उसमें सबसे बड़ी चुनौती होगी पर्यटकों को वापस कश्मीर जाने के लिए प्रेरित करना। मरने कोई नहीं जाना चाहता। अमरनाथ यात्रा को लेकर रेजिस्ट्रेशन्स रद्द हों तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। सबके लिए अपनी जान पहली प्राथमिकता होती है।

कश्मीरियत और जम्हूरियत की रट्टेबाजी करती है परेशान

अगर जम्मू कश्मीर को आतंकवाद की गिरफ़्त से बचाना है तो सबसे पहले कश्मीरियत, जम्हूरियत और इंसानियत जैसे रट्टामार शब्दों से नेताओं को बचना होगा, क्योंकि अब ये जनता को परेशान करते हैं। जनता ने इनकी परिभाषा तभी समझ ली थी जब 1989 में भाजपा नेता टीकालाल टपलू को श्रीनगर स्थित घर में घुसकर मार डाला गया, जब जज नीलकंठ गंजू को हाईकोर्ट के पास ही मार डाला गया, जब रावलपुरा में स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना समेत भारतीय वायुसेना के 4 जवानों को मार डाला गया, जब बुजुर्ग कवि सर्वानंद कौल को उनके बेटे सहित घर में ही फाँसी पर लटका दिया गया।

जिनलोगों ने इन क्रूर घटनाओं को अंजाम दिया, उनमें से एक यासीन मलिक से दिल्ली में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हाथ मिलाते हैं। यही भारत की नियति बन गई थी, आज यही हिन्दुओं की नियति है। 2020 में दिल्ली का दंगा हो या फिर इस वर्ष मुर्शिदाबाद में हिन्दुओं का पलायन या पहलगाम में पर्यटकों पर हमला – इन्हें अलग करके देखने की भूल बिलकुल मत कीजिए। ये वही विचारधारा है, पैंट खोलकर खतना चेक करने वाली। हिन्दुओं को हर जगह वही मारती है।

सर्च ऑपरेशन चल रहा है। आतंकियों का सफाया भी होगा। कार्रवाई तेज़ होगी। लेकिन, एक भी मृतक को वापस नहीं जीवित किया जा सकेगा, ये एक क्रूर सच्चाई है। ‘मुस्लिम हो?’ पूछकर मारने वाली विचारधारा का कैसे काम तमाम किया जाएगा इसकी रणनीति बनानी होगी। जम्मू कश्मीर के बाद अब पश्चिम बंगाल वहाँ की सत्ता की तुष्टिकरण की नीति के कारण हाथ से निकलता हुआ दिख रहा है। हिन्दू कहाँ-कहाँ से पलायन करेंगे, सन् 711 में हिन्दुकुश से लेकर 2025 में मुर्शिदाबाद तक पलायन ही तो कर रहे। देखते हैं, हम कहाँ सिमटते हैं, कहाँ-कहाँ से भागते हैं।

अब्दुल्ला के सांसद ने पर्यटन को बताया था ‘सांस्कृतिक आक्रमण’, अब पहलगाम में आतंकियों ने 20+ को उतारा मौत के घाट: कश्मीर रवाना हुए अमित शाह

जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले के पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले ने पूरे देश को हिला कर रख दिया। अब तक की जानकारी के अनुसार, 20+ पर्यटकों की मौत की ख़बर है। वहीं, कई टूरिस्ट घायल हैं। सुरक्षा बलों ने सर्च ऑपरेशन शुरू कर दिया है। बताया जा रहा है कि जंगलों में छिपे आतंकियों ने अचानक पर्यटकों पर गोलीबारी कर दी। रिपोर्ट्स के अनुसार, हमलावर सेना की वर्दी में थे।

हमले की गंभीरता को देखते हुए केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह पहलगाम के लिए रवाना हो गए हैं। इससे पहले सऊदी अरब से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गृहमंत्री अमित शाह से फोन पर बात कर हमले की जानकारी ली। इसके बाद अमित शाह ने दिल्ली स्थिति अपने आवास पर उच्च स्तरीय सुरक्षा बैठक बुलाई, जिसमें IB चीफ तपन डेका, केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन, CRPF चीफ ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह और जम्मू-कश्मीर के DGP नलिन प्रभात समेत सेना के अधिकारी भी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए शामिल हुए।

ये हमला उस वक्त हुआ जब घाटी में टूरिस्ट सीजन अपने चरम पर है। जुलाई से अमरनाथ यात्रा भी शुरू होने जा रही है। खूबसूरत वादियों और शांत पहाड़ियों के लिए मशहूर इस इलाके में जब अचानक गोलियों की आवाज़ गूँजी तो वहाँ मौजूद पर्यटक दहशत में आ गए।

नेशनल कॉन्फ्रेंस के सांसद ने ‘कल्चरल इन्वेजन’ कहा था

वहीं, इस दर्दनाक घटना से कुछ समय पहले नेशनल कॉन्फ्रेंस के सांसद आगा सैयद रूहुल्लाह मेहदी ने जो बयान दिया था, वह अब और भी सवालों के घेरे में आ गया है। उन्होंने कुछ महीने पहले कहा था कि कश्मीर में टूरिज़्म सांस्कृतिक हमला है। उनका ये बयान मंगलवार (22 अप्रैल, 2025) को पहलगाम में हुए हमले की पृष्ठभूमि में और भी गैर-जिम्मेदार माना जा रहा है।

सांसद रूहुल्लाह ने कहा था, “जो टूरिज़्म कश्मीर की अर्थव्यवस्था को मजबूती देता है, वही यहाँ की संस्कृति पर हमला कर रहा है।” उन्होंने इसे ‘कल्चरल इन्वेज़न’ कहा था और दावा किया था कि इससे कश्मीर की असल पहचान खत्म हो रही है।

सांसद के बयान की बीजेपी जम्मू-कश्मीर के मुख्य प्रवक्ता एडवोकेट सुनील सेठी की तीखी आलोचना की थी। उन्होंने कहा था कि यह बयान घाटी की पर्यटन अर्थव्यवस्था के लिए घातक है। उनका आरोप था कि नेशनल कॉन्फ्रेंस डर फैलाने की राजनीति कर रही है ताकि पर्यटक डरकर घाटी न आएँ। उन्होंने सांसद की टिप्पणी को ‘राजनीतिक आतंकवाद’ करार दिया था।

मंगलवार (22 अप्रैल 2025) को जब पहलगाम की बाईसारन घाटी में हमला हुआ तो अब सवाल और तेज़ी से उठने लगे हैं। क्या सांसद के उस बयान ने कहीं न कहीं उन ताकतों को बल दिया जो घाटी की शांति बिगाड़ना चाहते हैं? पहलगाम के आतंकी हमले के बाद अब यही सांसद बयान जारी करके कह रहे हैं कि कश्मीर ने हमेशा से अतिथियों का खुली बाँहों से स्वागत किया है।

प्रदेश के सीएम ने मृतकों के आँकड़ों पर साधी चुप्पी

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने हमले पर संवेदनाएँ व्यक्त की हैं। उन्होंने कहा, “मैं अविश्वसनीय रूप से स्तब्ध हूँ। हमारे आगंतुकों पर यह हमला एक घृणित कार्य है। इस हमले के अपराधी जानवर, अमानवीय और घृणा के पात्र हैं। निंदा के लिए कोई भी शब्द पर्याप्त नहीं है। मैं मृतकों के परिवारों के प्रति अपनी संवेदनाएँ व्यक्त करता हूँ।”

सीएम ने हमले में मारे गए लोगों की संख्या पर चुप्पी साधी है। उन्होंने कहा, “मृतकों की संख्या का अभी पता लगाया जा रहा है इसलिए मैं उन विवरणों में नहीं जाना चाहता। स्थिति स्पष्ट होने पर उन्हें आधिकारिक रूप से बताया जाएगा। कहने की ज़रूरत नहीं कि यह हमला हाल के वर्षों में नागरिकों पर किए गए किसी भी हमले से कहीं ज़्यादा बड़ा है।”

जब लाइन में खड़ा करके किया गया 3500 हिन्दू पुरुषों का नरसंहार, आज तक महिलाओं को नहीं मिला न्याय: जातीभंगा में पाकिस्तानी फौज और रजाकारों ने बहाई थी खून की नदियाँ

बांग्लादेश की आज़ादी की लड़ाई खून-खराबे और अत्याचार की कहानियों से भरी हुई है। पश्चिमी पाकिस्तान (आज का पाकिस्तान) हर हाल में पूर्वी पाकिस्तान (जो बांग्लादेश बना) पर कब्ज़ा बनाए रखना चाहता था। लेकिन जब वहाँ के लोगों ने आवाज़ उठाई तो दमन और हिंसा शुरू हो गई। हालात इतने बिगड़ गए कि करीब एक करोड़ लोग जान बचाकर भारत भागे। इससे भारत में भारी शरणार्थी संकट पैदा हो गया। आखिरकार, भारत को दख़ल देना पड़ा और बांग्लादेश को आज़ादी की राह दिखाई।

इसके बावजूद, पाकिस्तानी हुकूमत ने 1971 में बांग्लादेश की आज़ादी की माँग करने वालों पर बेरहमी से कहर बरपाया। खासतौर पर हिंदू समुदाय को दोहरे अपराध की सजा दी गई। पहली उनकी आज़ादी की माँग और दूसरा उनका गैर-मुस्लिम होना। पाकिस्तानी सेना और उनके कट्टरपंथी सहयोगियों ने हिंदुओं को निशाना बनाकर भयानक कत्लेआम किया। ऐसा ही एक दिल दहला देने वाला नरसंहार आज से करीब 54 साल पहले हुआ। 23 अप्रैल, 1971 को ठाकुरगाँव जिले के जातीभंगा (अब विधापल्ली) गाँव में।

बांग्लादेश आजादी की लड़ाई
1971 में भारत आ रहे बांग्लादेशी शरणार्थी। (साभार : Harvard Internation Review)

जातीभंगा में क्या हुआ था ?

26 मार्च, 1971 को शेख मुजीबुर रहमान ने पाकिस्तान से बांग्लादेश की आज़ादी का ऐलान कर दिया। इसी के साथ आज़ादी की लड़ाई शुरू हो गई। लेकिन, इसके बाद हालात और भी भयानक हो गए। पाकिस्तानी सेना ने रज़ाकार, अल-बदर और अल-शम्स जैसे कट्टरपंथी संगठनों के साथ मिलकर निर्दोष लोगों पर जुल्म ढाना शुरू कर दिया। जो भी आज़ादी चाहता था उसे बेरहमी से मारा जाने लगा।

इसी डर से ठाकुगाँव जिले के बालिया, शुखनपुकुरी, जगन्नाथपुर, चकहाल्दी, सिंगिया, चांदीपुर, बसुदेवपुर, मिलनपुर, गौरीपुर, खमार भोला, पलाशबाड़ी और देविग जैसे कई गाँवों के हज़ारों हिंदू परिवार अपनी जान बचाकर महिलाओं और बच्चों के साथ भारत भागने लगे।

23 अप्रैल की सुबह, इन्हीं गाँवों के सैकड़ों लोग जातीभंगा में इकट्ठा हुए थे ताकि वहाँ से आगे भारत की ओर निकल सकें। लेकिन एक स्थानीय गद्दार ने पाकिस्तानी सेना को इसकी खबर दे दी। सेना दो ट्रकों में वहाँ पहुँच गई। हिंदू पुरुषों को लाइन में खड़ा किया गया और फिर मशीनगनों से ताबड़तोड़ गोलियाँ बरसाईं गईं। कुछ को धारदार हथियार से मारा गया। ये कत्लेआम सुबह से शुरू होकर दोपहर तक चला।

इसमें करीब 3500 मासूम लोगों की जानें गईं। सैकड़ों औरतें विधवा हो गईं। इसके बाद शवों को पास की पथराज नदी में फेंका गया। काफी शवों को ज़मीन में गड्ढा खोदकर एक साथ दफना दिया गया। उस दिन की खून की नदियाँ आज भी जातीभंगा की मिट्टी में दर्ज हैं। इसके बाद ठाकुरगाँव जिले का ये नरसंहार बांग्लादेश की आज़ादी की लड़ाई का सबसे दर्दनाक और बड़ा कत्लेआम बन गया।

जातीभंगा नरसंहार का इंसाफ आज भी अधूरा

जातीभंगा नरसंहार इतिहास के काले पन्ने में दर्ज हो गया। 2009 में बांग्लादेश सरकार ने जातीभंगा नरसंहार की जगह पर एक स्मारक बनवाया। यह उस दर्दनाक दिन की याद में किया गया। जब सैकड़ों बेगुनाहों की ज़िंदगी छीन ली गई थी। इसके बाद 2011 में पीड़ितों और बचे हुए लोगों ने मिलकर एक शोक रैली निकाली। कुछ समय बाद मरने वालों की याद में एक श्रद्धांजलि सभा रखी गई, जिसमें लोगों ने खुलकर अपनी आवाज़ उठाई। उन्होंने माँग की कि उन दरिंदों को सज़ा दी जाए, जिन्होंने यह खूनी खेल रचा था।

सरकार ने उसी साल अगस्त में 89 विधवाओं को 2 हज़ार टका की एकमुश्त सहायता प्रदान की। ठाकुरगाँव सदर उपजिला के अधिकारी तौहीदुल इस्लाम ने आश्वासन दिया था कि आगे चलकर जातीभंगा गाँव की 500 विधवाओं को इस योजना में शामिल किया जाएगा। लेकिन दुख की बात ये है कि इतने सालों बाद भी इंसाफ अधूरा है।

2014 में ठाकुरगाँव के जगन्नाथपुर गाँव में जब जातीभंगा नरसंहार दिवस मनाया गया तो वहाँ दर्द और गुस्से की लहर फिर उमड़ पड़ी। ‘जातीभंगा गणहत्यादिबश पालन समिति’ ने शोक यात्रा निकाली, जिसमें सैकड़ों महिलाएँ शामिल हुईं। ये वो औरतें थीं, जिन्होंने उस दिन अपने पति, पिता या भाई खो दिए थे। हर कोई एक आवाज़ में माँग कर रहा था, “जिन्होंने इतने लोगों की जान ली उन्हें सज़ा मिलनी चाहिए। अब और इंतज़ार नहीं। न्याय होना चाहिए और सबके सामने होना चाहिए।”

बांग्लादेश जातीभंगा नरसंहार न्याय
23 अप्रैल, 1971 को पाकिस्तानी सेना और उनके स्थानीय सहयोगियों के हाथों अपने पतियों की क्रूर हत्या से विधवा हुई महिलाएँ, जातीभंगा नरसंहार दिवस की याद में ठाकुरगाँव सदर उपजिला के जगन्नाथपुर में शोक जुलूस में शामिल हुईं (साभार : The Daily Star

कत्लेआम के चश्मदीदों का दर्द

  • जातीभंगा नरसंहार की बरसी पर एक भावुक सभा का आयोजन हुआ। इस सभा की अध्यक्षता स्वतंत्रता सेनानी डॉ. निपेंद्रनाथ ने की थी। इसमें पत्रकार अब्दुल लतीफ, जगन्नाथपुर यूनियन परिषद के पूर्व सदस्य धनी चरण, गिरीन चंद्र की विधवा शुशिला बेवा, पबनशोरी और रोशनी रानी जैसे कई वरिष्ठ चेहरों ने अपने विचार रखे। सभा में सभी ने दुख जताया कि आज़ादी के 43 साल बाद भी उन रज़ाकारों को सज़ा नहीं मिली, जिन्होंने निर्दोष लोगों की जान ली थी। बल्कि कई तो आज समाज में बड़े पदों पर हैं।

इस सभा में प्रत्यक्षदर्शी धनी चरण ने नरसंहार की खौफनाक यादें साझा करते हुए बताया, “हम भारत भागना चाहते थे क्योंकि वहाँ रहना अब सुरक्षित नहीं था। जब हम जातीभंगा पहुँचे तो सूरज ढल चुका था। हमने सोचा रात यहीं रुक जाते हैं और सुबह आगे निकलेंगे। लेकिन रज़ाकारों ने हमारी खबर पाकिस्तानी फौज को दे दी। इसके बाद पाकिस्तानी सैनिक आए और चारों तरफ से घेर लिया। फिर पुरुषों को लाइन में खड़ा कराया गया और उन्हें गोलियों से भून दिया गया। करीब 3 हज़ार लोगों को उसी दिन मौत के घाट उतार दिया गया।”

अन्य महिलाएंँ जिन्होंने नरसंहार होते हुए देखा, वो आज भी उस दिन को याद कर काँप उठती हैं। इनमें पबनशोरी, गोठन बाला और रोशनी रानी जैसी कई महिलाओं के नाम शामिल हैं। ये केवल एक घटना नहीं थी। 25 मार्च, 1971 को ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ के नाम पर पाकिस्तानी सेना ने पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में हजारों बेकसूर बंगालियों की हत्या की थी। इस नरसंहार में पीस कमेटी, रज़ाकार, अल-बद्र और अल-शम्स जैसे संगठनों की भूमिका भी थी।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता नहीं मिली

  • आजादी के बाद बांग्लादेश में अब तक करीब पाँच हजार बधभूमि (यानी कत्लगाह) खोजे जा चुके हैं। इनमें से हज़ारों लोगों की पहचान भी हो चुकी है। कई जगहों से नरकंकाल, खोपड़ियाँ और बाल तक मिले हैं। इन सभी में जातीभंगा का नरसंहार सबसे बड़ा और सबसे भयावह था। ये खामोश जमीन आज भी उस दर्दनाक इतिहास को बयाँ करती है।

संयुक्त राष्ट्र की नरसंहार परिभाषा के अनुसार, 1971 की ये घटनाएँ साफतौर पर जनसंहार की श्रेणी में आती हैं लेकिन अब तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार नहीं किया गया है। ये घटनाएँ सिर्फ इतिहास नहीं हैं। बल्कि ये गवाही हैं उस जुल्म, अत्याचार और नफरत की जो पाकिस्तान और उसके इस्लामी चरमपंथियों ने बांग्लादेश के लोगों जिनमें खासकर हिंदू समुदाय पर ढाए हैं।