दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी स्मार्टफोन बनाने वाली कंपनी श्याओमी (xiaomi) ने ‘निवेश प्रतिबंध’ को लेकर अमेरिकी सरकार पर मुकदमा दर्ज कराया है। इस प्रतिबंध की वजह से अमेरिका के लोग चीन की इस कंपनी में निवेश नहीं कर सकते हैं।
इस महीने की शुरुआत में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने श्याओमी को पेंटागन ब्लैक लिस्ट (pentagon blacklist) में रखा था। जिसकी वजह से अमेरिकी इस कंपनी में निवेश नहीं कर सकते हैं।
डोनाल्ड ट्रंप का आरोप था कि श्याओमी चीनी सेना के संपर्क में है। हालाँकि कंपनी ने इन आरोपों को खारिज कर दिया था। कंपनी ने अपना पक्ष रखते हुए कहा था कि वह एक ‘कम्युनिस्ट चाइनीज़ मिलिट्री कंपनी’ नहीं है।
अमेरिका की कोलंबिया डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में श्याओमी का कहना था कि अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ़ डिफेंस द्वारा लगाए गए आरोप असंवैधानिक हैं। फ़िलहाल ट्रंप अमेरिकी राष्ट्रपति नहीं हैं लेकिन चीनी कंपनी पर ‘निवेश प्रतिबंध’ जारी है।
प्रतिबंध को चुनौती देते हुए श्याओमी ने अमेरिकी सरकार पर मुकदमा किया है। मुक़दमे के साथ आवेदन भी दिया गया है, जिसमें इस निवेश प्रतिबंध को वापस लेने की माँग की गई है। कंपनी का कहना है कि अगर यह प्रतिबंध जारी रहता है तो उनका बहुत ज़्यादा नुकसान होगा।
अदालत के सामने पेश किए गए अपने आवेदन में चीनी कंपनी ने कहा, “ट्रंप प्रशासन द्वारा यह कार्रवाई अवैध है। 14 जनवरी 2021 को कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी (श्याओमी) को ‘कम्युनिस्ट चाइनीज़ मिलिट्री कंपनी’ (CCMP) कहा गया था। इसकी वजह से कोई भी अमेरिकी कंपनी या आदमी श्याओमी में निवेश नहीं कर पाएगा। कंपनी के लिए CCMP का इस्तेमाल ग़ैरक़ानूनी है, यह हटाया जाना चाहिए।”
श्याओमी ने इसके पहले भी कहा था कि वह व्यापार संबंधी सभी नियमों का पालन करता है। न तो उसका चीनी सेना से कोई संबंध है और न ही चीनी सेना उसे नियंत्रित करती है। इसके अलावा अब कंपनी ने कहा है कि वह ‘कम्युनिस्ट चाइनीज़ मिलिट्री कंपनी’ नहीं है।
किसान आंदोलन के दौरान गणतंत्र दिवस के दिन मंगलवार (जनवरी 26, 2021) को किसानों ने ट्रैक्टर रैली आयोजित की, जिसमें एक प्रदर्शनकारी की मौत को लेकर जम कर प्रोपेगेंडा फैलाया गया। अब उत्तर प्रदेश के रामपुर स्थित सिविल लाइन थाने में ‘The Wire’ के संस्थापक सिद्धार्थ वरदराजन के खिलाफ FIR दर्ज की गई है। ये FIR रविवार (जनवरी 31, 2021) को संजू तुरैहा ने दर्ज कराई है।
असल में सिद्धार्थ वरदराजन ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से शनिवार को सुबह 10:08 बजे एक ट्वीट डाला था, जिसमें ‘The Wire’ ने किसान आंदोलन में ट्रैक्टर से स्टंट करते हुए मारे गए प्रदर्शनकारी की मौत के लिए परिजनों के हवाले से दिल्ली पुलिस को जिम्मेदार ठहराया था और साथ ही पोस्टमॉर्टम करने वाले उत्तर प्रदेश के डॉक्टरों पर सवाल उठाया था। इसमें डॉक्टरों की प्रतिक्रिया भी नहीं ली गई थी।
सिद्धार्थ वरदराजन ने ट्वीट कर के फैलाई फेक न्यूज़
मृतक नवरीत सिंह के दादा हरदीप सिंह के बयान के आधार पर उस ट्वीट और लेख में दावा किया गया था कि उसकी मृत्यु पुलिस की गोली लगने से हुई है। साथ ही डॉक्टर के ‘हाथ बँधे हुए थे और वो कुछ नहीं कर सकता था’ – ऐसा भी लिखा हुआ था। FIR में कहा गया है कि इस बयान को लेख में कुछ ऐसे प्रस्तुत किया गया, जिससे पाठक इसे डॉक्टर का ही बयान समझ कर दिग्भ्रमित हो जाएँ।
FIR के अनुसार, इस ट्वीट और लेख के कारण रामपुर के लोगों में आक्रोश बढ़ गया है और साथ ही क्षेत्र में तनाव का भी माहौल बना हुआ है। वादी का कहना है कि ये पोस्ट निश्चित रूप से षड्यंत्र के अंतर्गत जनसामान्य की क्षति करने के लिए, अनुचित लाभ कमाने के लिए और हिंसा भड़काने के लिए किया गया प्रतीत होता है। नवरीत सिंह के पोस्टमॉर्टम को लेकर इस FIR में डिटेल्स दर्ज हैं, जिसमें लिखा है:
“मृतक का पोस्टमॉर्टम जिला शासकीय चिकित्सालय, रामपुर के शासकीय चिकित्सा अधिकारी के 3 सदस्यीय पैनल द्वारा किया गया था। रिपोर्ट को सीलबंद लिफाफे में एसपी और थाना प्रभारी को सौंपा गया था, जैसा नियमानुसार होता आ रहा है। पोस्टमॉर्टम की वीडियोग्राफी भी हुई है। डॉक्टर ने किसी को कोई बयान नहीं दिया है। तीनों डॉक्टरों ने उक्त ट्वीट और लेख का खंडन किया है। अभी तक सिद्धार्थ वरदराजन ने उसे डिलीट तक नहीं किया है।”
सिद्धार्थ वरदराजन पर सोशल मीडिया पर बिना तथ्यों की जानकारी के गलत और भड़काऊ पोस्ट डालने, डॉक्टर का गलत बयान दर्शा कर ‘किसान’ की मौत के लिए पुलिस की गोली को जम्मेदार ठहराने, जनता को भड़काने, उपद्रव पैदा करने, शांति-व्यवस्था को बिगाड़ने और डॉक्टरों की छवि धूमिल करने के प्रयासों का आरोप लगाया गया है। IPC की धारा-505 और IT एक्ट, 2008 की 66A के तहत इसे गंभीर अपराध माना गया है।
सिद्धार्थ वरदराजन के खिलाफ दर्ज FIR की प्रति का एक अंश
उक्त प्रदर्शनकारी अपने ट्रैक्टर से पुलिस बैरिकेडिंग को तोड़ने का प्रयास कर रहा था। ऐसे ही स्टंट के दौरान ट्रैक्टर पलट गया। ये पूरी वारदात कैमरे में भी कैद हो गई। लेकिन, राजदीप सरदेसाई की अगुआई में मीडिया का एक वर्ग ये अफवाह फैलाने में जुट गया कि उक्त प्रदर्शनकारी को पुलिस ने गोली मार दी, जिससे उसकी मौत हो गई। जबकि वीडियो के अलावा पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट भी इस दावे की पुष्टि नहीं करते।
उत्तर प्रदेश पुलिस और अस्पताल के डिप्टी सीएमओ के मना करने के बावजूद द वायर ने अपने शीर्षक में बदलाव न करके भ्रामक शीर्षक को आगे बढ़ाया। हालाँकि, जिला मजिस्ट्रेट रामपुर ने उन तीन डॉक्टरों की एक हस्ताक्षरित डेक्लरेशन को साझा किया, जिन्होंने शव परीक्षण किया था और बताया था कि उपरोक्त आरोप झूठे थे। घटनास्थल पर ‘Times Now’ के पत्रकार प्रियांक त्रिपाठी भी मौजूद थे। उन्होंने बताया कि प्रदर्शनकारियों ने घायल ‘किसान’ को अस्पताल नहीं ले जाने दिया।
वामपंथियों का ‘केरल मॉडल’ अब फ्लॉप हो गया है। वहीं भाजपा विरोधी गिरोह ने जिस तरह से महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की ‘कोविड मैनेजमेंट’ के लिए जम कर प्रशंसा की थी, वो भी फुस्स हो चुका है। आज भारत में कोरोना वायरस संक्रमण के जितने सक्रिय मामले हैं, उनमें से दो तिहाई से भी अधिक अकेले इन दोनों राज्यों में ही हैं। जहाँ केरल में CPM की सरकार है, महाराष्ट्र में शिवसेना, NCP और कॉन्ग्रेस सत्ता में हैं।
ये सभी पार्टियाँ भाजपा विरोधी खेमे की हैं। यही कारण है कि विपक्षी दल अब भारत सरकार पर कोरोना को लेकर सवाल नहीं उठा रहे। मीडिया में मोदी सरकार को सलाह देने वाले पोस्ट्स बंद हो चुके हैं। केरल और महाराष्ट्र से सीखने की नसीहत नहीं दी जा रही है। लिबरल गिरोह को डर है कि ऐसा करने पर उसके ही गढ़ की पोल खुल जाएगी। कुल सक्रिय मामलों में कर्नाटक तीसरे स्थान पर है, लेकिन वहाँ का आँकड़ा दूसरे नंबर पर काबिज महाराष्ट्र से 7 गुना कम है।
आइए, देखते हैं कि आँकड़े क्या कहते हैं। भारत में अब कोरोना वायरस संक्रमण के मात्र 1,66,176 मामले ही बचे हुए हैं, जिनमें से 71,474 (43.01%) केरल में और 44,199 (26.54%) महाराष्ट्र में मौजूद हैं। अब आप इन दोनों की तुलना कर्नाटक के आँकड़ों से कीजिए, जिसके बारे में हमने ऊपर बताया है। बहुत बड़ा अंतर है। सबसे ज्यादा गौर करने वाली बात तो ये है कि देश की सबसे ज्यादा जनसंख्या वाले राज्य उत्तर प्रदेश में मात्र 5682 सक्रिय मामले ही हैं।
इस तरह से केरल और महाराष्ट्र में भारत के कुल सक्रिय कोरोना मामलों का अकेले 69.6% मौजूद है, जो दो तिहाई (66.66%) से भी अधिक हो जाता है। अर्थात, बाकी के सभी 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों में कोरोना संक्रमण के बाकी 30.4% मामले हैं। इसीलिए सभी चुप हैं। उन्हें डर है कि कहीं लोगों को ये पता न चल जाए कि भाजपा शासित राज्यों ने कोरोना का अच्छा मैनेजमेंट किया है।
कोरोना के सक्रिय मामलों के आँकड़े (साभार: Covid19India)
एक दलील बार-बार ये दी जाती है कि इन राज्यों में टेस्टिंग ज्यादा होती है, इसीलिए वहाँ मामले ज्यादा निकलते हैं। कहा जाता है कि इन राज्यों ने टेस्टिंग पर जोर दिया और बेहतर प्रबंधन की ट्रैकिंग की, इसीलिए वहाँ ज्यादा मामले दिखते हैं। जबकि, आँकड़े कहते हैं कि महाराष्ट्र से पौने 2 गुना कम जनसंख्या वाले राज्य कर्नाटक ने उससे 20 लाख ज्यादा टेस्टिंग की है। जहाँ महाराष्ट्र में ये आँकड़ा 1.5 करोड़ है, तो कर्नाटक में 1.7 करोड़।
आइए, टेस्टिंग की भी बात कर लेते हैं। उत्तर प्रदेश में जहाँ 2.8 करोड़ लोगों का कोरोना के लिए टेस्ट किया गया है, बिहार दूसरे नंबर पर काबिज है और यहाँ ये आँकड़ा 2.1 करोड़ है। कर्नाटक तीसरे नंबर पर है। तमिलनाडु में 1.6 करोड़ लोगों की टेस्टिंग हुई है। महाराष्ट्र का स्थान पाँचवाँ है। इस हिसाब से ये लॉजिक भी फेल हो जाता है कि टेस्टिंग ज्यादा हुई है। पूरे भारत में अब तक 19.6 करोड़ लोगों की टेस्टिंग हो चुकी है, जिनमें 18.87% तो अकेले यूपी-बिहार में हैं। देखिए:
कोरोना की सबसे ज्यादा टेस्टिंग यूपी-बिहार में हुई (साभार: Covid19India)
ऊपर के दोनों स्क्रीनशॉट्स में आपको मृतकों का आँकड़ा भी दिख जाएगा, जो चौंकाने वाला है। कोरोना से सबसे ज्यादा 51,042 लोग महाराष्ट्र में ही मरे हैं। हाँ, 12,350 मामलों के साथ तमिलनाडु ज़रूर दूसरे स्थान पर है, लेकिन यहाँ के आँकड़े महाराष्ट्र से 4 गुना से भी कम हैं। पूरे देश में अब तक कोरोना ने 1,54,312 लोगों की जान ली है, जिनमें से 30.23% अकेले उद्धव ठाकरे के शासन वाले महाराष्ट्र में हैं।
‘कोरोना का केरल मॉडल’ पर प्रोपेगेंडा समाचार चैनल के प्रोपेगेंडा पत्रकार रवीश कुमार ने भी उतावलापन दिखाया और जमकर झूठ फैलाया था। रविश कुमार अपने उतावलेपन पर रोक नहीं लगा पाए और मई 13, 2020 को ही ‘केरल मॉडल’ पर जमकर ज्ञान दिया और कहा कि देश को इससे सीखना चाहिए। दिलचस्प बात ये रही कि मई 14, 2020 को ही ध्रुव राठी नाम के एक ‘सनसनीखेज दावाकार’ ने भी अपने यूट्यूब चैनल पर यही दावे करते हुए जमकर केरल की तारीफ़ कर डाली थी।
35 साल का एक आदमी है – प्रधान सोय। उसकी माँ 60 साल की थी, नाम था – सुमी सोय। अब वो इस दुनिया में नहीं हैं। जिसे उन्होंने इस दुनिया में लाया, उसी बेटे प्रधान सोय ने उन्हें मार डाला – हाथ-पैर बाँध कर, डंडों से पीट-पीट कर।
माँ जब मर गईं तो प्रधान सोय ने उनका ‘अंतिम संस्कार’ भी किया – लेकिन अपने तरीके से। घर के आंगन में ही अपनी माँ के मृत शरीर पर केरोसिन डाला और जला दिया। इसके बाद जलती माँ के ऊपर मुर्गा सेंका और वहीं बैठ कर खाया भी।
यह घटना झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम के मनोहरपुर थाना स्थित जोजोगुटू गाँव की है। शुक्रवार (29 जनवरी 2021) को रात 8 बजे प्रधान सोय ने अपनी माँ की हत्या की थी। मार तो वो अपनी भाभी सोमवारी सोय को भी रहा था लेकिन एक महीने के दूधमुँहे बेटे को लेकर वो किसी तरह घर से जान बचा कर भागने में सफल रही।
सोमवारी सोय ने ही इस पूरी घटना की जानकारी ग्रामीणों को दी। लेकिन माँ के हत्यारे प्रधान सोय को ग्रामीण रात में नहीं पकड़ पाए। वो उन पर भी हमला करने लगा था। सुबह होने पर जब सोमवारी सोय अपने घर के आंगन में पहुँचीं तो देखा कि उनकी सास की अधजली लाश वहाँ पड़ी है। इसके बाद हत्यारे प्रधान सोय ने अपनी माँ की अधजली लाश को घर के जलते चूल्हे में डाल दिया और भागने की कोशिश करने लगा। तभी ग्रामीणों ने उसे पकड़ लिया।
गाँव के लोगों ने सुबह पुलिस को बुलाकर मामले की जानकारी दी। हत्यारे की भाभी ने बताया कि शुक्रवार रात को शराब पीने को मना करने पर प्रधान सोय ने लाठी-डंडों से माँ को पीट-पीट कर मार डाला।
गाँव वालों ने बताया कि प्रधान सोय ने 5 साल पहले 2016 में अपने पिता गोपाल सोय की भी हत्या कर दी थी। जिसके चलते उसे जेल हो गई थी। वो कुछ दिन पहले ही जमानत पर छूट कर आया था और अब उसने अपनी माँ की हत्या कर दी।
एक बार फिर से तृणमूल कॉन्ग्रेस के कई बड़े नेताओं का पार्टी से मोहभंग हुआ है। शनिवार (जनवरी 31, 2021) को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की उपस्थिति में नई दिल्ली में TMC के 5 बड़े नेताओं ने भाजपा का दामन थामा, जिसमें राज्य के पूर्व वन मंत्री राजीब बनर्जी भी शामिल थे। उन्होंने हाल ही में मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था। उनके अलावा वैशाली डालमिया, प्रबीर घोषाल, रतिन चक्रवर्ती और रुद्रनिल घोष भाजपा में शामिल हुए।
खेल मंत्री रहे लक्ष्मी रतन शुक्ल के इस्तीफे के बाद से ही पूर्व BCCI प्रमुख जगमोहन डालमिया की बेटी वैशाली के भाजपा में शामिल होने की अटकलें लगाई जा रही थीं। वो BCCI अध्यक्ष सौरभ गांगुली की भी करीबी हैं। पूर्व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि इन पाँचों नेताओं के पार्टी में आने से ‘सोनार बांग्ला’ के अभियान को मजबूती मिलेगी। राजीब बनर्जी अन्य असंतुष्ट नेताओं के साथ दिल्ली पहुँचे थे।
असल में अमित शाह को शनिवार को पश्चिम बंगाल के लिए निकलना था और हावड़ा में उनका भाषण भी होना था, लेकिन इजरायली दूतावास के पास हुए बम विस्फोट के कारण उन्हें अपनी योजना स्थगित करनी पड़ी और वो देर रात तक बैठकें लेते रहे। अब हावड़ा में मंच से केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी सम्बोधन देंगी। सभी असंतुष्ट नेता स्पेशल प्लेन से दिल्ली पहुँचे थे। उनके साथ पूर्व विधायक पार्थसारथी चट्टोपाध्याय भी थे।
रूद्रनील घोष अभिनेता हैं। इन सभी के साथ भाजपा उपाध्यक्ष मुकुल रॉय और पश्चिम बंगाल में भाजपा के प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय भी थे। विजयवर्गीय ने कहा कि लोगों को अब एहसास होने लगा है कि पश्चिम बंगाल का विकास सिर्फ भाजपा ही कर सकती है। उन्होंने कहा, “बंगाल के लोग जान गए हैं कि इतने वर्षों तक TMC ने उन्हें सिर्फ ठगा है। पीएम मोदी के नेतृत्व में भाजपा वहाँ सरकार बनाएगी और ‘सोनार बांग्ला’ बनेगा।”
Former TMC leaders Mr. Rajib Banerjee, Ms. Baishali Dalmiya, Mr. Prabir Ghoshal, Mr. Rathin Chakraborti and Mr. Rudranil Ghosh joined BJP today in New Delhi. I am sure their induction will further strengthen BJP’s fight for Sonar Bangla. pic.twitter.com/twXrHXWCbY
ये पहली बार नहीं है जब TMC के मंत्री-विधायकों व अन्य असंतुष्ट नेताओं ने भाजपा का दामन थामा हो। राजीब बनर्जी ने बताया कि मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने के बाद उन्हें अमित शाह का फोन कॉल आया था और उन्होंने उन्हें दिल्ली बुलाया। बकौल बनर्जी, अमित शाह ने उन्हें कहा कि वो भाजपा का संदेशा TMC के ऐसे अन्य असंतुष्टों तक पहुँचाएँ, जो बेहतर तरीके से जनसेवा करना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें राज्य के विकास का आश्वासन मिला है, इसीलिए वो भाजपा में आए हैं।
अभिनेता रूद्रनील घोष ने पश्चिम बंगाल में आए अम्फान चक्रवात के बाद हुए राहत कार्यों में बड़े भ्रष्टाचार को उजागर किया और उसके खिलाफ मुखर भी थे। चक्रवात पीड़ितों में रुपए बाँटे गए थे, जिसमें उन्होंने धाँधली का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा कि वो राज्य के भविष्य के लिए एक बेहतर किरदार निभाना चाहते हैं। वहीं प्रबीर घोषाल इससे नाराज थे कि उनके क्षेत्र में एक सड़क के मरम्मत कार्य में पार्टी का धड़ा बाधा बन रहा था।
इससे पहले टीएमसी सुप्रीमो और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को संबोधित इस्तीफे का पत्र लिखते हुए राजीब ने कहा था, ”मैं अखिल भारतीय तृणमूल कॉन्ग्रेस की सदस्यता के साथ-साथ इससे जुड़े सभी पदों से तत्काल प्रभाव से इस्तीफा देता हूँ। मैं उन सभी चुनौतियों और अवसरों के लिए आभारी हूँ, जो मुझे दिए गए हैं और मैं हमेशा पार्टी के सदस्य के तौर पर बिताए अपने समय को याद रखूँगा।”
अक्सर इस्लामवादियों का महिमामंडन करने वाले पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी की ज़ी टीवी के एंकर अमन चोपड़ा ने क्लास लगा दी। दरअसल, हर मुद्दे पर मुस्लिमों को असुरक्षित बताने वाले अंसारी खुद ही नहीं बता पाए कि किस तरह से मुसलमान भारत मे असुरक्षित है।
भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति अपनी नई किताब ‘बाय मैनी ए हैप्पी एक्सीटेंड’ को प्रोमोट करने के लिए शो पर पहुँचे थे। उसी दौरान ज़ी न्यूज़ के एंकर ने कुछ ऐसे पेचीदा सवाल अंसारी से पूछे, जिसने उन्हें उनके ही द्वारा कही गई बातों पर शर्मिंदा कर दिया और वो जवाब देते वक्त हकलाते हुए नजर आए।
साक्षात्कार के दौरान समाचार एंकर ने 10 साल पद पर बने रहने के बाद भारत के उपराष्ट्रपति के रूप में उसे छोड़ने से पहले अंसारी द्वारा दिए गए अंतिम इंटरव्यू का जिक्र किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि देश के अंदर ‘स्वीकार्यता का माहौल’ खतरे में है। देश के मुस्लिमों में बेचैनी का अहसास और असुरक्षा की भावना है।
यहाँ अंसारी ने एक बार फिर दोहराया कि राष्ट्र में मुसलमानों के बीच वास्तव में एक “असुरक्षा की भावना” है।
न्यूज एंकर अंसारी से सवाल करता है कि क्या वह भी उसी तरह महसूस करते है? क्योंकि वह भी एक मुसलमान हैं। इस पर पूर्व वीपी ने जवाब देने के बजाय यह कहते हुए मना कर दिया कि इस विषय पर एक अलग बहस की आवश्यकता है। हालाँकि, इस दौरान एंकर अमन चोपड़ा हामिद अंसारी से पूछते हैं कि क्या हाल ही में मोदी सरकार द्वारा किए गए फैसले सीएए, ट्रिपल तालक, राम मंदिर ने तो कहीं नहीं भारतीय मुसलमानों को असुरक्षित महसूस करने के लिए मजबूर किया है, जैसा कि अंसारी ने कहा है।
जिस पर हामिद अंसारी कहते है कि वह इसके लिए कोई कारण नहीं दे सकते है। तब चोपड़ा यह कहते हुए हस्तक्षेप करते हैं कि वास्तव में कोई ठोस कारण है ही नहीं, यही कारण है कि अंसारी इस पर कोई बात नहीं बोल रहे।
जिसके बाद न्यूज़ एंकर ने चालाकी से लिंचिंग के विषय को लेकर पूछा कि क्या यह एक कारण है कि मुसलमान असुरक्षित हैं। अपने शब्दों को ध्यान से चुनने की पूरी कोशिश करने के बावजूद हामिद अंसारी स्वीकार करते हैं कि यह एक कानून व्यवस्था का मुद्दा है।
इंटरव्यू के दौरान अमन चोपड़ा कहते हैं, “सर, लिंचिंग सिर्फ मुसलमानों कि ही नहीं हिंदुओं की भी की जाती है, वे असुरक्षित क्यों नहीं हैं?” जिसे सुन हामिद अंसारी थोड़े गुस्से में हो जाते हैं और कहते हैं कि उन्हें यकीन नहीं है कि हिंदुओं को लिंचिंग होती है या नहीं।” जिस पर अंसारी को घेरते और उन्हें पक्षपाती कहते हुए अमन चोपड़ा कहते हैं, “इस मामले में तो वह कई हिंदुओं को भी गिना सकते है जिनकी लिंचिंग पश्चिम बंगाल और केरल में हुई है।”
चोपड़ा ने दोहराया कि लिंचिंग का धर्म से कोई लेना-देना नहीं है और यह कानून व्यवस्था का मुद्दा है। अंसारी ने बदतमीजी से चीख-चीख कर अनजाने में यह घोषणा कर दी कि लिंचिंग वास्तव में धार्मिक रूप से प्रेरित है। जब चोपड़ा ने कहा, “लिंचिंग धर्म देखकर थोड़ी न होता है।” जिस पर चिढ़ कर पूर्व-वीपी कहते है, “तो क्या देखकर होता हैं।” और यह भी कहा कि जब से हिंदू राष्ट्रवादी बीजेपी ने भारत में सत्ता हासिल की है, देश के अल्पसंख्यकों की लिंचिंग बढ़ गई है।
वहीं न्यूज़ एंकर ने हामिद अंसारी को यह कहते हुए नसीहत दी कि भारत ने उन्हें बहुत कुछ दिया है, उन्होंने 10 साल तक दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में उपराष्ट्रपति का पद संभाला, लेकिन फिर भी आपने देश के उपराष्ट्रपति के रूप में अपने कार्यकाल के आखरी दिन लोगों को यह कहते हुए भ्रामित किया कि देश में मुसलमानों में असुरक्षा और बेचैनी की भावना है।
हामिद अंसारी को देश ने सब दिया और उन्होंने….
हामिद अंसारी के साथ मेरा पहला और संभवतः आखिरी इंटरव्यू 5.55 PM
अमन चोपड़ा के तेज तर्रार सवालों ने हामिद अंसारी को वास्तव में उनकी किताब के प्रोमोशन की जगह किसी और दिशा में भटका दिया और वह अपने द्वारा ही दिए बयानों पर स्पष्टीकरण नहीं दे पाएँ। साथ ही उन्हें उनके किताब के लिए देने वाले भाषण से भी वंचित कर दिया।
गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं था जब हामिद अंसारी ने मुसलमानों को उकसाते हुए कहा हो कि देश में मुस्लिम खतरे में हैं। उन्होंने पहले भी कहा है कि मोदी के शासन में भारत में इस्लाम और मुसलमान दोनों परेशान है। इसके अलावा उन्होंने इस्लामिक शरिया अदालतों के पक्ष में जाने के लिए अक्सर अपनी इस्लामी प्रवृत्तियों का प्रदर्शन किया है। इससे पहले पूर्व वीपी ने पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना के चित्र के विरोध के दौरान अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्रों का समर्थन किया था।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जम्मू और कश्मीर के पैकेज के तहत, 30,000 से अधिक कश्मीरी पंडितों ने लगभग 2,000 पुन: आवंटित सरकारी नौकरियों के लिए आवेदन किया है। द इकॉनॉमिक टाइम्स ने इसकी जानकारी दी। अधिकारियों ने शनिवार (जनवरी 30, 2021) को बताया कि चयन प्रक्रिया अप्रैल के अंत तक पूरी हो जाएगी।
युवाओं के लिए 6,000 नौकरियों का प्रावधान और भर्ती किए गए कर्मचारियों के लिए 6,000 आवास इकाइयों का प्रावधान कश्मीरी पंडित प्रवासियों के लिए प्रधानमंत्री के पैकेज के दो प्रमुख घटक हैं।
एक राहत और पुनर्वास विभाग के प्रवक्ता ने कहा, “नौकरियों के संबंध में, 6,000 पदों में से 3,841 उम्मीदवारों को पहले ही विभिन्न विभागों में चयनित और नियुक्त किया जा चुका है। शेष 2,000 पदों को जम्मू-कश्मीर सेवा चयन बोर्ड (JKSSB) में भेजा गया है।”
जेकेएसएसबी को रिक्त पदों के लिए 30,000 से अधिक आवेदन प्राप्त हुए हैं और चयन प्रक्रिया अप्रैल के अंत तक पूरी हो जाएगी, इस प्रकार नौकरियों से संबंधित पीएम पैकेज घटक पूरा हो जाएगा। कश्मीरी पंडितों के लिए 3,000 पदों का पुनः आवंटन 2015 में घोषित किया गया था। अब तक केवल 816 भर्तियाँ की गई हैं, जबकि शेष पदों को भरा जाना बाकी है।
हालाँकि, 1,000-इकाइयों का निर्माण पहले ही किया जा चुका है, पिछले साल नवंबर में निर्माण के लिए और 1,500 को मंजूरी दी गई थी। उन्होंने कहा कि इन इकाइयों के लिए निविदाओं को जोड़कर या तो अंतिम रूप दिया गया है या मार्च के अंत से पहले अंतिम रूप दिया जाएगा।
प्रवक्ता ने कहा, “अन्य 2,200 इकाइयों के लिए भूमि की पहचान की गई है। इन इकाइयों के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट को अंतिम रूप दिया जा रहा है और मई के अंत से पहले उनकी निविदाओं को अंतिम रूप दिया जाएगा।”
उन्होंने कहा, “यह उम्मीद की जाती है कि शेष 1,000 इकाइयों के लिए एक महीने के भीतर भूमि की पहचान की जाएगी, जो इस परियोजना को काफी तेजी से आगे बढ़ाएगी। पीएम पैकेज के तहत भर्ती किए गए प्रवासियों को अगले 18 से 24 महीनों के भीतर पूरी तरह से समायोजित किया जाएगा।”
सोशल मीडिया पर तथाकथित किसान और उसके दोस्त के बीच टेलीफोन पर हुई बातचीत का एक ऑडियो वायरल हो रहा है। इस बातचीत में आंदोलन में शामिल किसान का मानना है कि यह किसानों का विरोध प्रायोजित है। वह स्वीकार करता है कि गाजीपुर सीमा पर हो रहे प्रदर्शन में शामिल होने के लिए उसे अच्छा खासा पैसा और खाने पीने का सामान दिया जा रहा है।
बता दें, यह ऑडियो रिकॉर्डिंग बीजेपी दिल्ली की प्रवक्ता नीतू डबास द्वारा साझा की गई थी।
वायरल ऑडियो में बातचीत के दौरान ‘किसान’ बॉर्डर पर उनके लिए की गई व्यवस्था से काफी खुश दिखाई दे रहा है, जहाँ आंदोलनकारी पिछले दो महीनों से डेरा डाले हुए हैं। वह अपने दोस्त को बताता है कि यहाँ पूरा माहौल एक पार्टी की तरह है। दिन के समय उन्हें 2000 से 3000 रुपए के बीच में भुगतान किया जाता है और रात में उन्हें मुफ्त शराब की बोतलें दी जाती हैं।
किसान को कहते हुए सुना जा सकता है, “हम तो आ गए थे घूमने। मज़ा आ रहा है पूरा। यहीं खाना, यहीं पीना, यहीं रहना है। किसान अपने दोस्त को बताता है कि विरोध में शामिल होने के लिए, उसके गाँव से लगभग 20 ट्रैक्टर आए हैं। बातचीत से प्रतीत होता है कि, इन लोगों को विरोध प्रदर्शनों के लिए अपना खाली समय देने के लिए प्रोत्साहित किया गया है।”
वहीं जब उसका दोस्त उससे पूछता है, क्या फरीदाबाद की ही तरह गाजीपुर बॉर्डर पर हिंसा की संभावनाएँ हैं तो किसान कहता है ‘हाँ’
इसके अलावा किसान को मोदी सरकार द्वारा पारित तीन नए-कृषि कानूनों की बड़ाई करते हुए भी सुना जा सकता है। किसान का कहना है कि सरकार सही काम कर रही है और नए कृषि कानूनों में कुछ भी गलत नहीं है, जिसके खिलाफ किसानों ने अपने विरोध को तब तक जारी रखने का दृढ़ संकल्प व्यक्त किया है जब तक कि उन्हें निरस्त नहीं किया जाता।
सोशल मीडिया पर वायरल 2 मिनट की बातचीत के दौरान वह अपने दोस्त से कहता है, “भाजपा सरकार का काम काफी अच्छा रहा है, लेकिन ये बेवकूफ इसे नहीं समझ रहे है।”
उल्लेखनीय है कि गणतंत्र दिवस के मौके पर सैकड़ों दंगाइयों ने ट्रैक्टर रैली के लिए निर्धारित समय से पहले दिल्ली की सीमा पर चढ़ाई कर दी और हद तो तब हो गई जब ये पुलिस के साथ बर्बरता करते हुए जबरन लालकिले के अंदर घुस गए। जिसके बाद पुलिस वालों पर हमला कर दंगाई भीड़ ने लाल किले की घेराबंदी की और ऐतिहासिक स्मारक पर धार्मिक खालसा निशान का झंडा फहरा दिया।
हिंसा के तुरंत बाद सोशल मीडिया पर एक वीडियो भी सामने आई थी। जिसमें तथाकथित किसानों की एक ट्राली विदेशी दारू और उसके साथ खाने पीने के अन्य समानों से भरी देखी गई थी। वहीं जब पुलिस अधिकारियों ने उन्हें रोकने की कोशिश की, तो उन्होंने पुलिस अधिकारियों पर ही लाठी और पत्थरों से हमला बोल दिया।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) के उद्योग को बढ़ावा देने के लिए एक बड़ा ऐलान किया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ पेट्रोल और डीज़ल से चलने वाले वाहनों की तुलना में इलेक्ट्रिक वाहनों को प्राथमिकता दी जाएगी। इलेक्ट्रिक वाहनों के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए इसके पंजीयन शुल्क (रजिस्ट्रेशन फीस) और रोड टैक्स में भी छूट दी जाएगी।
इसके अलावा उत्तर प्रदेश की EV इंडस्ट्री में निवेश को बढ़ावा देने के उत्तर प्रदेश इलेक्ट्रिक व्हीकल मैन्युफैक्चरिंग पालिसी 2019 (Uttar Pradesh Electric Vehicle Manufacturing Policy 2019) का उदारीकरण किया जाएगा। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार इलेक्ट्रिक वाहनों के शोध, विकास, परीक्षण और पंजीयन के लिए केंद्र शुरू करने की योजना बना रही है।
इस केंद्र की मदद से तमाम निजी इलेक्ट्रिक वाहन पार्कों को ‘इंडस्ट्रियल पार्क स्कीम’ के तहत प्रोत्साहन राशि प्रदान किया जाएगा। इलेक्ट्रिक वाहनों के चार्जिंग स्टेशन स्थापित करने के लिए राजस्व प्रतिरूप (रेवेन्यू मॉडल) तैयार किया जाएगा। पेट्रोल और डीज़ल से चलने वाले टैक्सी वाहनों की तुलना में ई रिक्शा के विकल्प को मज़बूत करने के लिए सरकारी योजनाओं के अंतर्गत लोन प्रदान किया जाएगा।
उत्तर प्रदेश में मिलेगा इलेक्ट्रिक वाहन इंडस्ट्री को बढ़ावा
एक कार्यक्रम में इस मुद्दे पर जानकारी देते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा, “इलेक्ट्रिक वाहनों की उत्पादन ईकाई स्थापित करने के लिए तमाम अंतर्राष्ट्रीय ऑटोमोबाइल समूहों से प्रस्ताव प्राप्त हो चुके हैं। हम राज्य के भीतर इसमें निवेश को बढ़ावा देने के लिए हर संभव सहायता करेंगे। जिस तरह स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी सेवाओं को आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है उसी तरह इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए भी किया जाएगा।”
इसके बाद उन्होंने कहा, “बहुत जल्द उत्तर प्रदेश में इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या में भरी इजाफ़ा होगा, उसको ध्यान में रखते हुए जनसुविधा के लिए पर्याप्त चार्जिंग स्टेशन का होना भी ज़रूरी है। पार्किंग स्थानों में इलेक्ट्रिक वाहनों के चार्जिंग स्टेशन बनाए जाएँगे। पेट्रोल पम्पों को भी चार्जिंग स्टेशन स्थापित करने के लिए प्रेरित किया जाएगा। एमएसएमई और मैक्रो क्षेत्र की इकाइयों को अलग-अलग दरों पर कैपिटल सब्सिडी भी प्रदान की जा सकती है। यह इंडस्ट्री के विकास के लिए दी जाने वाली बड़ी आर्थिक मदद साबित होगी।”
भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों की सबसे बड़ी कंपनी का प्रवेश
अमेरिकी इलेक्ट्रिक कार कंपनी टेस्ला (Tesla) ने भारत में उद्योग स्थापित करने की आधिकारिक घोषणा कर दी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक़ टेस्ला ने अपनी सहायक कंपनी बेंगलुरु, कर्नाटक में स्थापित कर दी है। इसका पंजीयन टेस्ला मोटर्स एंड एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड (Tesla Motors and Energy Private Ltd) के नाम से हुआ है और इसे 8 जनवरी को शुरू किया गया था।
वैभव तनेजा, वेंकटरंगम श्रीराम और डेविड जॉन फीनस्टीन को इसका निदेशक नियुक्त किया गया है। दिसंबर 2020 में एक ट्विटर यूज़र का जवाब देते हुए टेस्ला के मुखिया एलोन मस्क (elon musk) ने ऐलान किया था कि कंपनी 2021 तक भारतीय बाज़ार में नज़र आने वाली है।
नितिन गडकरी ने कहा था बड़े पैमाने पर होगा इलेक्ट्रिक वाहनों का उत्पादन
केन्द्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने इलेक्ट्रिक वाहनों से जुड़े एक सवाल का जवाब देते हुए कहा था, “तमाम छोटी कंपनी उत्तर प्रदेश समेत अन्य राज्यों में ई स्कूटर और ई बाइक का उत्पादन करने के लिए तैयार हैं। उनके सामने सबसे बड़ी समस्या है लिथियम आयन बैट्री (lithium-ion battery) की उपलब्धता। अर्जेंटीना इसका बड़े पैमाने पर उत्पादन करता है लेकिन वह चीन के अंतर्गत है इसलिए भारतीय निर्माताओं के दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है। इसको मद्देनज़र रखते हुए एल्युमीनियम आयन (aluminium-ion) पर काफी शोध कार्य जारी है। एल्युमीनियम आयन बैट्री न केवल आसानी से उपलब्ध होंगी बल्कि इनका दाम लिथियम आयन बैट्री से काफी कम होगा।”
केंद्र सरकार द्वारा पारित किए गए तीन कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे किसान आंदोलन के चलते टोल वसूली में लगभग 600 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। क्रेडिट रेटिंग एजेंसी आईसीआरए लिमिटेड की रिपोर्ट के अनुसार, वाहनों की आवाजाही और टोल को फ्री करने से टोल वसूली पर असर पड़ा है।
आईसीआरए द्वारा शुक्रवार को प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि नेशनल हाईवे पर वाहनों की आवाजाही पर लगे प्रतिबंध के कारण टोल प्लाजा को नुकसान होगा। उन्होंने कहा, “पंजाब, हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर में नेशनल हाईवे पर स्थित कुल 52 टोल प्लाजा [सार्वजनिक-वित्त पोषित और बीओटी (बिल्ट, ऑपरेट और ट्रांसफ़र)] किसान आंदोलन के चलते प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर प्रभावित हुए हैं।”
रिपोर्ट में आगे कहा गया है, “नेशनल हाईवे टोल प्लाज़ा पर 26 जनवरी, 2021 तक लगभग 560 करोड़ का अनुमानित राजस्व नुकसान हुआ है; जिसमें से 410 करोड़ बीओटी रियायतकर्ताओं के लिए अनुमानित है। इसके अलावा इन क्षेत्रों में स्टेट हाईवे प्रोजेक्टों में राजस्व की हानि अलग से हुई होगी।”
हरियाणा, पंजाब और दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में सभी टोल प्लाजा पर वाहनों से कोई टोल वसूली नहीं करने के कारण पिछले साल 12 दिसंबर से टोल प्लाजा को राजस्व नुकसान हुआ है। आईसीआरए लिमिटेड ने बताया कि औसत टोल वसूली, विरोध प्रदर्शन और बाद में मुफ्त वाहनों की आवाजाही से पहले, हर दिन लगभग 7 करोड़ था।
क्रेडिट रेटिंग एजेंसी के अनुमान के मुताबिक, यदि फरवरी तक किसान का विरोध समाप्त हो जाता है, तब भी आंदोलन से प्रभावित राज्य पंजाब, हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में 2020-2021 में टोल वसूली में करीब 30-35 फीसदी की गिरावट आ सकती है।
Cumulative toll revenue loss from October last year (Graph Courtesy: ICRA Limited)
ICRA Limited ने अपनी रिपोर्ट में जोर देते हुए बताया, “पंजाब, हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर में लगभग 50% नेशनल हाइवे टोल प्लाज़ा (52 टोल प्लाज़ा में से 26) बीओटी प्रोजेक्ट्स का गठन करते हैं। इन 11 परियोजनाओं के लिए बकाया कर्ज लगभग 9300 करोड़ रुपए है। इनमें से तीन को आईसीआरए ने रेट किया है। 9300 करोड़ के प्रभावित कर्ज में से 8550 करोड़ का कर्ज डिफ़ॉल्ट रूप से हाई रिस्क पर है। वहीं 750-करोड़ का निवेश ग्रेड में किया गया है और इसमें डिफ़ॉल्ट के मध्यम से कम रिस्क है। ”
Debt at risk for 11 BOT toll plaza projects (Graph Courtesy: ICRA)
क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ने आगे कहा, “24 घंटे की निरंतर अवधि के लिए टोल एकत्र करने में असमर्थता और आंदोलन / हड़ताल के कारण एक एकाउंटिंग साल में सात दिनों की कुल अवधि से अधिक होने पर बल के तहत एक अप्रत्यक्ष राजनीतिक घटना के रूप में माना जाएगा। जोकि प्रभावित परियोजनाओं से होने वाले राजस्व के नुकसान का लगभग 25% होगा।”