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वो जज जिन्हें कपड़ों के ऊपर से छूना, पैंट खोलना यौन अपराध नहीं लगता, हाईकोर्ट का स्थायी जज बनाने की सिफारिश वापस

बॉम्बे हाई कोर्ट (Bombay High Court) की जज जस्टिस पुष्पा वीरेंद्र गनेदीवाला (Justice Pushpa Virendra Ganediwala) इन दिनों अपने कुछ विवादित फैसलों की वजह से सुर्खियों में हैं। उन्होंने हाल में कुछ ऐसे फैसले दिए हैं, जिसे काफी विवादास्पद माना जा रहा है और एक पर तो सुप्रीम कोर्ट ने रोक भी लगा दी है। जस्टिस गनेदीवाला 2019 में ही हाई कोर्ट जज बनी हैं और अभी नागपुर बेंच में पदास्थापित हैं। उन्होंने बच्चों से जुड़े यौन अपराधों को लेकर पॉक्सो कानून (POCSO Act) की व्याख्या करते हुए जो टिप्पणियाँ की हैं, उस पर बहस हो रही है।

इस बीच खबर आ रही है कि सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में यौन उत्पीड़न मामलों पर उनके विवादास्पद आदेशों को देखते हुए न्यायमूर्ति पुष्पा वीरेंद्र गनेदीवाला को बॉम्बे उच्च न्यायालय का स्थायी न्यायाधीश बनाने की अपनी सिफारिश को कथित रूप से वापस ले लिया है।

इस वजह से चर्चा में हैं जस्टिस पुष्पा वीरेंद्र गनेदीवाला 

दरअसल, 19 जनवरी को बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच (Nagpur bench of Bombay High Court) में जस्टिस पुष्पा वीरेंद्र गनेदीवाला की अगुवाई वाली अदालत ने चार साल पुराने एक मामले में फैसला देते हुए कहा था कि ‘स्किन टू स्किन’ स्पर्श हुए बिना या कपड़ों के ऊपर से नाबालिग पीड़िता को ‘स्पर्श करना’ पॉक्सो कानून (POCSO Act) या यौन अपराधों पर बाल संरक्षण कानून के तहत यौन हमला नहीं माना जा सकता। 

फैसले में कहा गया था कि इस कानून के तहत अपराध करार देने के लिए यौन इच्छा के साथ-साथ ‘स्किन टू स्किन’ संपर्क होना चाहिए। 2016 के दिसंबर की इस घटना में 39 वर्षीय एक आदमी पर 12 साल की पीड़िता का यौन उत्पीड़न का आरोप था। 

अदालत ने पाया कि आरोपित ने पीड़ित बच्ची को ‘पकड़ा’ था, लेकिन यह पॉक्सो कानून (POCSO Act)के तहत यौन हमला नहीं, बल्कि आईपीसी की धारा 354 या एक महिला के साथ छेड़छाड़ का अपराध है। इसके पीछे जज ने दलील दिया कि पीड़िता कपड़े में थी, इसलिए आरोपित और उसका ‘स्किन टू स्किन’ संपर्क (skin to skin contact) नहीं हुआ, और ऐसे में इसे यौन हमला (sexual assault) नहीं माना जा सकता।

बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले से हैरान हो गए लोग 

बॉम्बे हाई कोर्ट का यह फैसला ना केवल पीड़िता के लिए, बल्कि बाल सुरक्षा अधिकारों से जुड़े विशेषज्ञों के लिए भी हैरान करने वाला था, क्योंकि उन्हें लगता था कि अगर यौन हमलों का व्याख्या इस तरह से किया जाएगा तो यह अपराध एक खतरनाक शक्ल अख्तियार कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के आरोपपत को बरी करने वाले विवादास्पद आदेश पर रोक लगा दिया। 

अदालत में अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा था कि यह खतरनाक मिसाल बनेगा कि बिना त्वचा से त्वचा संपर्क हुए यौन उत्पीड़न हो ही नहीं सकता। बाल अधिकारों के लिए काम करने वाले विशेषज्ञों का भी कहना है पॉक्सो कानून की यह बहुत ही अजीब व्याख्या है कि कपड़ों के ऊपर से यौन हमला नहीं किया जा सकता। सार्वजनिक स्थानों पर तो इससे महिलाओं का जीना मुहाल हो जाएगा।

‘हाथ पकड़ना, पैंट की जिप खोलना यौन उत्पीड़न नहीं’ 

इसके बाद जस्टिस पुष्पा वीरेंद्र गनेदीवाला का एक और फैसला आया। उनकी अगुवाई वाली बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच की एकल पीठ ने यह फैसला दिया कि किसी लड़की का हाथ पकड़ना और आरोपित का पैंट की जिप खोलना प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेज ऐक्ट, 2012 (POCSO) के तहत यौन हमले की श्रेणी में नहीं आता। 

इस संबंध में लड़की की माँ ने शिकायत दर्ज कराई थी। उनका कहना था कि आरोपित की पैंट की ज़िप खुली हुई थी, और उसकी बेटी के हाथ उसके हाथ में थे। माँ का दावा यह भी था कि उनकी बेटी ने बताया कि आरोपित उसे सोने के लिए बिस्तर पर आने को कह रहा था।

अदालत के मुताबिक यह आईपीसी की धारा 354 ए (1) के तहत यौन उत्पीड़न की श्रेणी में आता है। इसलिए, पॉक्सो अधिनियम की धारा 8, 10 और 12 के तहत सजा को रद्द किया गया और आरोपित को आईपीसी की धारा 354A (1) (i) के तहत दोषी पाया गया, जिसमें अधिकतम 3 साल की कैद का प्रावधान है। 

इस केस में 50 साल का एक आरोपित 5 साल की बच्ची के साथ यौन उत्पीड़न का दोषी ठहराए जाने के बाद अदालत में पहुँचा था। सेशन कोर्ट ने उसे पॉक्सो ऐक्ट के तहत घोर यौन उत्पीड़न का दोषी मानते हुए 5 साल की कठोर सजा और 25,000 रुपए का जुर्माना लगाया था।

मुँह दबाना, कपड़े खोलना, फिर रेप करना… अकेला युवक नहीं कर सकता

बुधवार (जनवरी 29, 2021) को उन्हीं जस्टिस का एक और फैसला सामने आया। ये भी रेप से जुड़ा मामला था। इस मामले में भी निचली अदालत ने 26 साल के आरोपित को रेप का दोषी पाया था, लेकिन जस्टिस पुष्पा ने उसे बरी कर दिया। जस्टिस पुष्पा ने तर्क दिया, “बिना हाथापाई किए युवती का मुँह दबाना, कपड़े उतारना और फिर रेप करना एक अकेले आदमी के लिए बेहद असंभव लगता है।” 

जस्टिस पुष्पा गनेदीवाला ने कहा, “अगर यह जबरन रेप का मामला होता, तो हाथापाई होती। मेडिकल साक्ष्य भी लड़की के आरोपों के पक्ष में नहीं हैं क्योंकि मेडिकल रिपोर्ट में किसी भी तरह की जबरदस्ती किए जाने के कोई चोट या उसके निशान नहीं पाए गए।”

बता दें कि 6 जुलाई 2013 को सूरज कासरकार नाम के युवक पर लड़की के घरवालों ने रेप का आरोप लगाया था। इसके 6 साल बाद 14 मार्च 2019 को वह रेप करने का दोषी ठहराया गया। सत्र न्यायालय ने मामले में फैसला सुनाते हुए आरोपित को 10 साल की सजा सुनाई। उस समय उसके ख़िलाफ़ पॉक्सो एक्ट की धारा 4 के साथ आईपीसी की धारा 376(1) और 451 के तहत आरोप तय हुए थे।

2019 में बॉम्बे हाईकोर्ट में एडिशनल जज बनीं

1969 में महाराष्ट्र के अमरावती जिले में जन्मीं पुष्पा गनेडीवाला ने बीकॉम, एलएलबी और फिर एलएलएम की पढ़ाई की है। वो 2007 में डिस्ट्रिक्ट जज अपॉइंट हुई थीं। वो मुंबई सिविल कोर्ट और नागपुर की डिस्ट्रिक्ट और फैमिली कोर्ट में रहीं। फिर बाद में वो बॉम्बे हाईकोर्ट की रजिस्ट्रार जनरल रहीं। 2019 में वो बॉम्बे हाईकोर्ट में अडिशनल जज बनीं।

विवादित फैसलों के इतर जस्टिस गनेडीवाला ने कुछ अच्छे फैसले भी दिए हैं। हालाँकि, रेप और यौन शोषण के मामलों में, खासकर छोटे बच्चों के साथ होने वाली ऐसी घटनाओं को लेकर उनसे संवेदनशीलता की उम्मीद की जाती है। ‘स्किन टू स्किन’ टच वाले उनके फैसले के बाद सोशल मीडिया पर कई लड़कियों ने यौन शोषण की आपबीती शेयर की थी।

26 जनवरी ट्रैक्टर रैली हिंसा में 38 FIR दर्ज, अब तक 84 ‘दंगाई’ गिरफ्तार: दिल्ली पुलिस

गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) पर किसानों की ट्रैक्टर परेड के दौरान हुई हिंसा को लेकर अभी तक कुल 38 FIR दर्ज़ की गई हैं और 84 आरोपितों को गिरफ़्तार किया गया। यह जानकारी शनिवार (जनवरी 30, 2021) को दिल्ली पुलिस की ओर से दी गई। वहीं, हरियाणा सरकार ने 31 जनवरी शाम 5 बजे तक अंबाला, यमुनानगर, कुरुक्षेत्र, करनाल, कैथल, पानीपत, हिसार, जींद, रोहतक, भिवानी, चरखी दादरी, फतेहाबाद, रेवाड़ी, सोनीपत, पलवल, झज्जर और सिरसा में इंटरनेट सेवाओं को निलंबित कर दिया है।

बता दें कि गणतंत्र दिवस के दिन दिल्ली के अलग-अलग क्षेत्रों में किसान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच संघर्ष हुआ, जिसमें कई लोग घायल हुए और काफी जगह तोड़-फोड़ हुई, लेकिन सबसे बड़ा विवाद लाल किले पर फहराए गए झंडे और वहाँ हुई तोड़-फोड़ को लेकर हुआ है। लाल किला परिसर में हजारों प्रदर्शनकारियों ने घुसकर वहाँ मौजूद सामानों को तोड़ा और प्राचीर के पास एक धार्मिक झंडा फहरा दिया। इस दौरान झड़प में करीब 300 से अधिक पुलिसवाले घायल हो गए।

इस घटना की दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच जाँच कर रही है। कई टीमों को दोषियों की पहचान करने में लगाया गया है। फोर्स ने किले में हुई बर्बरता को ‘राष्ट्र-विरोधी कार्य’ करार दिया है। शुक्रवार को दिल्ली पुलिस ने एक अपील जारी कर लोगों से कहा था कि वे दिल्ली हिंसा के वीडियो-फ़ोटो आदि सबूत के तौर पर उनसे साझा कर सकते हैं। इसके लिए पुलिस ने मोबाइल नंबर और एड्रेस भी शेयर किया था।

इसके साथ ही खबर है कि दिल्ली पुलिस ने लाल किले पर धार्मिक झंडा फहराने के मामले में वांछित तरनतारन के 2 आरोपितों की तलाश में जालंधर में दबिश दी है। न्यूज़ एजेंसी ANI की रिपोर्ट के मुताबिक, जालंधर के डीसीपी का कहना है, “जानकारी मिली थी कि दिल्ली हिंसा में शामिल तरनतारन के दो युवक जालंधर में छिपे है। NIA और दिल्ली पुलिस की संयुक्त टीम ने छापा मारा। हालाँकि, दोनों इलाके में नहीं मौजूद मिले।”

बता दें कि लाल किले में हुई हिंसा और बर्बरता की घटना की जाँच के लिए एनकाउंटर स्पेशलिस्ट एसीपी ललित मोहन नेगी को नया इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर नियुक्त किया गया है। इस घटना के कई वीडियो वायरल हुए थे, जिनमें सभी प्रदर्शनकारियों के हाथों में डंडे देखे जा सकते हैं। वहीं कई लोग घोड़े पर सवार देखे जा सकते हैं। इन वीडियोज में कहीं दंगाई पुलिस की गाड़ियों को तोड़फोड़ रहे हैं तो कहीं आक्रामक तरीके से ट्रैक्टर चलाते हुए दिखाई दे रहे हैं।

ट्रैक्टर पलटने से हुई थी ‘किसान’ की मौत, ‘The Wire’ ने परिजनों के नाम पर डॉक्टरों पर मढ़ा दोष: प्रशासन ने फटकारा

दिल्ली में गणतंत्र दिवस के दिन मंगलवार (जनवरी 26, 2021) को ‘किसान आंदोलन’ के तहत आयोजित ट्रैक्टर रैली में जम कर हिंसा हुई। जहाँ लगभग 400 पुलिसकर्मी घायल हुए, नवरीत सिंह नामक एक प्रदर्शनकारी की भी मौत हो गई। वीडियो में देखा जा सकता था कि ट्रैक्टर पलटने के हादसे के कारण वो घायल हुआ, जिससे उसकी मौत हुई। लेकिन, ‘The Wire’ और सिद्धार्थ वरदराजन लगातार अफवाह फैलाने में लगे हुए हैं।

अब उत्तर प्रदेश में ‘The Wire’ के मालिक सिद्धार्थ वरदराजन के खिलाफ फेक न्यूज़ फैलाने के लिए संज्ञान लिया गया है। उसने मृतक के परिजनों के हवाले से जिस डॉक्टर पर ऑटोप्सी रिपोर्ट में गड़बड़ी का आरोप लगाया है, उसका बयान तक नहीं लिया। साथ ही बड़ी चालाकी से पूरी खबर में सारे आरोप परिजनों के कंधे पर बन्दूक रख कर ही चलाए गए हैं। वरदराजन ने इसे अपने ट्विटर हैंडल से भी शेयर किया। इन मामलों में वरदराजन सहित कइयों के खिलाफ पहले ही एक FIR दर्ज हो चुकी है।

उक्त प्रदर्शनकारी अपने ट्रैक्टर से पुलिस बैरिकेडिंग को तोड़ने का प्रयास कर रहा था। ऐसे ही स्टंट के दौरान ट्रैक्टर पलट गया। ये पूरी वारदात कैमरे में भी कैद हो गई। लेकिन, राजदीप सरदेसाई की अगुआई में मीडिया के एक वर्ग ये अफवाह फैलाने में जुट गया कि उक्त प्रदर्शनकारी को पुलिस ने गोली मार दी, जिससे उसकी मौत हो गई। जबकि वीडियो के अलावा पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट भी इस दावे की पुष्टि नहीं करते।

‘The Wire’ ने ‘किसान आंदोलन’ को लेकर फैलाई फेक न्यूज़

‘The Wire’ ने नवरीत सिंह के परिजनों और एक तथाकथित प्रत्यक्षदर्शी के हवाले से दावा किया कि दिल्ली पुलिस झूठ बोल रही है। ऑटोप्सी रिपोर्ट में सामने आया है कि सर में लगी चोट के कारण हुए शॉक और हेमरेज से उसकी मौत हुई। मृतक के दादा के हवाले से प्रोपेगंडा पोर्टल ने छापा है कि ऑटोप्सी करने वाले डॉक्टर ने भी सिर में गोली देखी थी, लेकिन उसने कहा कि उसके हाथ बँधे हुए थे और वो कुछ नहीं कर सकता था।

इस मामले में यूपी पुलिस का भी बयान प्रकाशित किया गया है, जिसने कहा है कि उन्होंने बस डॉक्टरों की टीम बनाई थी, जब ये मामले दिल्ली पुलिस का है तो भला वो क्यों इससे छेड़छाड़ करवाएँगे? वहीं ‘विशेषज्ञों’ के हवाले से परिवार को अप्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग जाने की सलाह दी गई है, ताकि डॉक्टर से पूछताछ हो सके। नवरीत के शरीर पर कई जगह घाव थे, जो एक हो गोली से कैसे हो सकते हैं?

Relevant sections from The Wire article

इसके अलावा, रिपोर्ट में परिवार द्वारा किए गए दावों को दबाने के लिए मृतक का एक वीडियो भी जोड़ा गया। वीडियो का हवाला देते हुए, परिवार ने कहा कि नवरीत के कानों के ऊपर गोली का एक घाव था। लेकिन, रामपुर के जिला अस्पताल में डिप्टी सीएमओ और डॉक्टर मनोज शुक्ला, जिन्होंने पोस्टमार्टम रिपोर्ट तैयार की थी, ने कहा कि ऐसा कुछ भी नहीं था। शुक्ला ने कहा कि हो सकता है कि उसके कान पर किसी तरह का कोई लगा हो या फिर वामपंथी पोर्टल को कोई गलत डॉक्यूमेंट्स मिल गया हो।

Relevant section from The Wire article

यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि उत्तर प्रदेश पुलिस और अस्पताल के डिप्टी सीएमओ के मना करने के बावजूद द वायर ने अपने शीर्षक में बदलाव न करके भ्रामक शीर्षक को आगे बढ़ाया। हालाँकि, जिला मजिस्ट्रेट रामपुर ने उन तीन डॉक्टरों की एक हस्ताक्षरित डेक्लरेशन को साझा किया जिन्होंने शव परीक्षण किया था और बताया था कि उपरोक्त आरोप झूठे थे।

हस्ताक्षरित डेक्लरेशन में कहा गया है कि शव परीक्षण में शामिल तीन डॉक्टरों में से किसी ने भी किसी मध्यस्थ या किसी अन्य व्यक्ति से बात नहीं की थी। शव परीक्षण वीडियो-रिकॉर्ड किया गया था और निष्कर्ष अधिकारियों को सीलबंद लिफाफे में दिए गए थे। इसके बाद, द वायर ने उपरोक्त जानकारी को शामिल करने के लिए लेख को अपडेट किया है।

घटनास्थल पर ‘Times Now’ के पत्रकार प्रियांक त्रिपाठी भी मौजूद थे। उन्होंने बताया कि दिल्ली पुलिस तो उक्त प्रदर्शनकारी ‘किसान’ के ट्रैक्टर पलटने के बाद उसे इलाज के लिए अस्पताल लेकर जाना चाहती थी लेकिन प्रदर्शनकारियों ने ही ऐसे किसी भी प्रयास को नाकाम कर दिया, जिससे उसकी मौत हो गई। न वो अस्पताल लेकर गए, न पुलिस को ले जाने दिया। जहाँ एक्सीडेंट के बाद किसान बेहोश पड़ा था, वहाँ अन्य प्रदर्शनकारी लाठी और तलवार लेकर खड़े होकर पुलिस को धमका रहे थे। 

गर्लफ्रेंड के नखरों से तंग युवक पड़ा सेक्सडॉल के प्यार में, सगाई के बाद कहा- उसके साथ जिंदगी बिताना ज्यादा आसान

हॉन्गकॉन्ग से एक अजीबोगरीब मामला सामने आया है। जहाँ एक एक शख्स को किसी इंसान से नहीं बल्कि सेक्स डॉल (Sex doll) से ही प्यार हो गया है। इतना ही नहीं उस व्यक्ति ने सेक्स डॉल से सगाई भी कर ली है और जल्द ही उससे शादी करने वाला है। सेक्स डॉल से शादी का फैसला लेने वाले शख्स का कहना है कि इंसानों की तुलना में सेक्स डॉल को प्यार करना और उसके साथ जिंदगी बिताना ज्यादा आसान है।

साभार: द सन

हॉन्गकॉन्ग के रहने वाले 36 वर्षीय जी टियनरॉन्ग (Xie Tianrong) ने 2019 में 10 हजार युआन (करीब एक लाख रुपए) में सेक्स डॉल को खरीदा था और उसका नाम मोची’ (Mochi) रखा। मोची को पहली बार टियनरॉन्ग ने 26 साल की उम्र में इंटरनेट पर देखा था और उसी दिन के बाद से उन्हें उससे प्यार हो गया। हालाँकि, उस वक्त सेक्स डॉल की कीमत 80 हजार युआन (9 लाख रुपए से ज्यादा) थी, जो कि उसकी औकात से बाहर था।

द सन की न्यूज़ रिपोर्ट के मुताबिक, “टियनरॉन्ग ने कभी मोची के साथ संबंध नहीं बनाए। टियनरॉन्ग ने दावा किया कि उन्होंने मोची को कभी किस भी नहीं किया है। क्योंकि उन्हें डर है कि अगर वह मोची को किस करते हैं तो उससे उसकी संवेदनशील त्वचा को नुकसान पहुँच सकता है। दिलचस्प बात यह है कि टियनरॉन्ग ने अपनी मंगेतर डॉल को iPhone 12 सहित महँगे कपड़े और गिफ्ट दिए।”

साभार: द sun

टियनरॉन्ग हॉन्गकॉन्ग में अपने माता-पिता के साथ रहते हैं। उन्होंने इस महीने की शुरुआत में अपने करीबी दोस्तों और परिवार की उपस्थिति में मोची के साथ सगाई की। उनका कहना है कि मोची के साथ उनका प्यार करीब 10 साल पुराना है।

उन्होंने बताया कि उनकी लड़कियाँ भी गर्लफ्रेंड रह चुकी है लेकिन उन्हें सच्चा प्यार सिर्फ सेक्स डॉल मोची से ही हुआ। टियनरॉन्ग ने यह भी बताया, “असली गर्लफ्रैंड उनसे तमाम तरीके की डिमांड रखती थी, लेकिन मोची उनसे कभी कुछ नहीं माँगती। इसलिए उसको डेट करना आसान है। हालाँकि मैंने अभी तक उसके साथ शारीरिक संबंध भी नहीं बनाया है।”

द सन

सेक्स डॉल से प्यार करने वाले शख्स ने बताया कि जब वह पहले अपनी गर्लफ्रेंड के साथ डेट पर जाते थे, तो हमेशा अपने फ़ोन पर ही लगी रहती थी, लेकिन मोची उनमें से नहीं है। वह सिर्फ उसी को अपना पूरा समय देती है। मोची से सगाई करने के बाद टियनरॉन्ग उसे दुनिया के वो सभी ऐशोआराम दे रहा है जो एक गर्लफ्रेंड या पत्नी का सपना होता है।

ट्रैक्टर रैली में हिस्सा लेने आए 100 दंगाई लापता, अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी ने कहा- झंडा फहराना कोई अपराध नहीं

26 जनवरी को दिल्ली में हुड़दंग मचाने के बाद से ही पंजाब के विभिन्न क्षेत्रों से ट्रैक्टर रैली में हिस्सा लेने वाले लगभग 100 से भी ज्यादा प्रदर्शनकारी किसान गायब हैं। इस बात की जानकारी पंजाब मानवाधिकार संगठन द्वारा दी गई है। वहीं पुलिस ने जानकारी दी है कि 18 किसानों को हिंसा में शामिल होने के चलते गिरफ्तार किया गया है। हालाँकि, बाकी के किसानों का पता नहीं चल पाया है।

लाल किले पर धार्मिक झंडे फहराए जाने और गिरफ्तार किए गए किसानों को लेकर अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह ने कहा है कि “निशान साहिब सिख पहचान का प्रतीक है। झंडा फहराना अपराध नहीं बनता।”

NGO के एक कार्यकर्ता सरबजीत सिंह वेरका का कहना है, “ऐसा लगता है कि पुलिस किसानों को जान-बूझकर लाल किले तक ले गई थी। जब निशान साहिब को वहाँ फहराया गया तो हंगामा खड़ा हो गया। तिरंगे को छुआ तक नहीं गया, यह अपराध नहीं हो सकता। ज्यादातर प्रदर्शनकारियों को मौके पर अवैध रूप से हिरासत में लिया गया था, तब से उनके ठिकाने का पता नहीं है।”

मामले में पुलिस का कहना है, “गिरफ्तार किए गए 18 किसानों में 7 बठिंडा जिले के तलवंडी साबो उपमंडल के तहत आने वाले बंगी निहाल सिंह गाँव के है। इन पर आरोप है कि इन्होंने लाल किले में हुई हिंसा में अपना पूर्ण योगदान दिया था। जिसके चलते किले पर राष्ट्रीय ध्वज की जगह सांप्रदायिक झंडा लहराया गया। इनके खिलाफ पश्चिम विहार पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज की गई थी, जिसके तहत इनकी गिरफ्तारी हुई है।”

गौरतलब है कि 26 जनवरी को दंगाइयों द्वारा किए गए हिंसक घटनाओं के संबंध में दिल्ली पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए लोगों को पंजाब ह्यूमन राइट्स आर्गेनाईजेशन, दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी, खालसा मिशन और पंथी तालमेल संगठन जैसे विभिन्न संगठनों ने भी मुफ्त कानूनी सहायता देने की घोषणा की है।

दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष मनजिंदर सिंह सिरसा ने आज तक न्यूज़ चैनल से बातचीत करते हुए कहा है, ”मोगा के 11 प्रदर्शनकारियों को नांगलोई पुलिस ने गिरफ्तार किया था, जिन्हें अब तिहाड़ जेल में डाल दिया गया है। मोगा के ही तातारी वाला गाँव (Tatarie Wala) के 12 लोग 26 जनवरी की घटना के बाद से ही गायब हैं। उनका कुछ भी अता-पता नहीं है। सूत्रों का कहना है कि अलीपुर और नरेला क्षेत्र के आसपास से गिरफ्तारियाँ हुई हैं।”

वहीं गायब लोगों को जाँच पड़ताल के लिए भारतीय किसान यूनियन (राजेवाल) के प्रमुख बलबीर सिंह राजेवाल ने कहा कि किसान संघों को गणतंत्र दिवस परेड के बाद लापता हुए लोगों की सूची तैयार करने के लिए कहा गया है।

उत्तराखंड पुलिस ने लाल किले की घेराबंदी और उपद्रव करने वाले 300 किसानों की पहचान की: रिपोर्ट

उत्तराखंड पुलिस ने कथित तौर पर कम से कम 300 लोगों की पहचान करने का दावा किया है, जो 26 जनवरी को लाल किले पर हिंसक विरोध प्रदर्शन का हिस्सा थे। राज्य की पुलिस ने कहा है कि ये लोग उस भीड़ का हिस्सा थे जो लाल किले में ‘सुरक्षाकर्मियों से भिड़ गए थे।’

ये लोग जिले के विभिन्न हिस्सों से आते हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि उधम सिंह नगर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) दलीप सिंह कुंवर ने कहा, “हमने जिले के खटीमा, सितारगंज, किच्छा, रुद्रपुर, गदरपुर, बाजपुर, काशीपुर और जसपुर शहरों के किसानों की पहचान की है जिन्होंने लाल किले में हंगामा किया था। हम दिल्ली पुलिस के साथ विवरण साझा कर रहे हैं।”

रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि तराई किसान महासभा के अध्यक्ष तेजेंदर सिंह विर्क का नाम दिल्ली पुलिस द्वारा दर्ज की गई एफआईआर में शामिल है। वहीं विर्क ने कहा कि गाजीपुर सीमा पर विरोध कर रहे किसानों की ‘राष्ट्रीय राजधानी में सामने आई घटनाओं’ में कोई भूमिका नहीं थी।

उन्होंने कहा कि रैली असामाजिक तत्वों द्वारा हिंसा की गई थी और वह लाल किले पर हंगामा करने वालों और उनके ‘काम को खराब करने’ की कोशिश करने वालों के खिलाफ उच्च स्तरीय जाँच की माँग करते हैं। उन्होंने कहा है कि किसान दिल्ली पुलिस द्वारा भेजे गए नोटिस का जवाब देंगे।

गौरतलब है कि लाल किला में पुलिसकर्मियों को खदेड़ा गया। उन्हें दीवार फाँद-फाँद कर अपनी जान बचानी पड़ी। कई पुलिसकर्मी ICU में हैं। 300 से अधिक घायल हुए हैं। कइयों का सिर फट गया। अधिकतर के हाथ-पाँव और सिर में ही चोटें आई हैं। तलवारें लहराते हुए उन्हें खदेड़ा गया। जम्मू कश्मीर के आतंकियों जैसी हरकतें करके ये सरकार और सुप्रीम कोर्ट के लिए किसान कैसे बन जाते हैं, ये समझ से परे है।

पुलिस की पिटाई कर के उलटा पुलिस को ही दोष दिया जा रहा है। कोरोना के दिशानिर्देशों का उल्लंघन तो शाहीन बाग़ वालों ने भी किया था, 3 महीने से ये ‘किसान’ भी कर रहे। इनके खिलाफ ‘महामारी एक्ट’ के तहत कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? बस एक, अगर सरकार एक ऐसा उदाहरण सेट कर दे जहाँ ऐसे करतूतों की उचित सजा मिले तो ये दोबारा निकलने से पहले सोचेंगे। इसके लिए यूपी मॉडल अपनाया जा सकता है।

कॉन्ग्रेसी ट्रोल की ‘भगवा आतंक’ को फिर हवा देने की कोशिश, RSS को बताया इजरायली दूतावास ब्लास्ट का जिम्मेदार

दिल्ली स्थित इजरायली दूतावास के नज़दीक हुए बम धमाकों के बाद प्रोपेगेंडा फैलाने वाले ट्रोल भी सक्रिय हो चुके हैं। इसी कड़ी में कॉन्ग्रेसी ट्रोल साकेत गोखले कल (जनवरी 29, 2021) हुए बम धमाकों के पीछे की साज़िश का शिगूफा लेकर हाजिर है। उनका कहना है कि संभावित रूप से यह आतंकवादी हमला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने कराया होगा जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए और निश्चित रूप से अब तक इसे दबाया जा चुका होगा। 

साकेत गोखले के झूठे दावे

साकेत गोखले ने नफरत फैलाने वाले षड्यंत्र को भड़काते हुए यह प्रसारित किया है, जिसके आधार पर कॉन्ग्रेस पार्टी ने ‘भगवा आतंक’ की नकारात्मक अवधारणा का आविष्कार किया था। हालाँकि, सालों बीत चुके हैं लेकिन कॉन्ग्रेसी ट्रोल ने ‘भगवा आतंक’ नैरेटिव की पुष्टि करने वाला एक भी सबूत पेश नहीं किया है। एक बार फिर वो वही दोहराना चाहता है लेकिन इस बार भी उसके पास कोई सबूत मौजूद नहीं है। 

साकेत गोखले ने अपने ट्वीट में लिखा, “हमले में भाजपा/आरएसएस के गुंडों की भूमिका की संभावना को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है हालाँकि, अब तक इसे निश्चित रूप से दबाया जा चुका होगा।” 

साकेत गोखले के झूठे दावे

फर्जी और भ्रामक जानकारी साझा करने के मामले में साकेत गोखले का इतिहास पुराना है। जुलाई 2020 में साकेत गोखले ने बिना सबूत दावा किया था कि आरएसएस कार्यकर्ता उनके घर के बाहर प्रदर्शन कर रहे थे। आरएसएस ने इस झूठे और पब्लिसिटी बटोरने वाले दावे को खारिज कर दिया था। 

एक और मौके पर साकेत गोखले ने दावा किया था कि दिल्ली पुलिस ने उसे अनुमति दी है कि वह रैली आयोजित करके देश के गद्दारों को गोली मारो सालों को दोहरा सकता है। दिल्ली पुलिस ने कॉन्ग्रेसी ट्रोल के इस दावे को झूठा बताते हुए कहा था कि जो पत्र प्रचारित किया जा रहा है, वह साकेत द्वारा माँगी गई अनुमति का पत्र था जो कि उसे दी नहीं गई थी। 

झूठे दावों का प्रचार करके कॉन्ग्रेस पार्टी के लिए माहौल बनाने के मामले में साकेत गोखले का इतिहास पुराना रहा है। ठीक उसी तरह अब कॉन्ग्रेसी ट्रोल ने ‘भगवा आतंक’ जैसी खोखली अवधारणा में प्राण फूँकने का प्रयास किया है। 

बिजनौर से बलिया तक 1100 जगहों पर रोज होगी माँ गंगा की भव्य आरती: योगी सरकार का ऐलान

उत्‍तर प्रदेश सरकार जीवन दायिनी गंगा के भव्‍य स्‍वागत की तैयारी कर रही है। योगी आदित्यनाथ सरकार पवित्र गंगा आरती को अब बड़े पैमाने पर शुरू करने जा रही है। योगी सरकार ने घोषणा की है कि काशी, प्रयाग समेत उत्तर प्रदेश के करीब 1100 स्थानों पर भव्य तरीके से गंगा आरती का आयोजन किया जाएगा।

योगी सरकार द्वारा जारी प्रेस रिलीज के मुताबिक, बिजनौर से बलिया तक योगी सरकार 1038 नए आरती चबूतरों का निर्माण करने जा रही है। नमामि गंगे विभाग की अगुआई में गंगा के दोनों किनारों पर बसे लगभग हर गाँवों और शहरों को नए आरती स्थल के तौर पर चुना गया है।

सरकार के अनुसार, बिजनौर से लेकर बलिया तक गंगा के 5 किलोमीटर के दायरे में दोनों किनारों पर बसे 1038 गाँवों में नए आरती स्थलों के निर्माण की प्रक्रिया जल शक्ति मंत्रालय के नेतृत्व वाली नमामि गंगे विभाग पर्यटन विभाग के सहयोग से शुरू की जाएगी। नए आरती स्थलों को जन सहभागिता के आधार पर संचालित किया जाएगा। आरती चबूतरों पर रोज तय समय पर गंगा आरती का आयोजन किया जाएगा।

उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ ने राज्य में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए पिछले साल दिसंबर में जल विभाग के अन्य अधिकारियों के साथ एक बैठक में निर्देश दिया था कि इन गाँवों में सभी प्राचीन और ऐतिहासिक धार्मिक स्थलों का दोबारा से नव निर्माण किया जाना चाहिए।

गौरतलब है कि गंगा आरती को गाँव और कस्बों से जोड़ कर योगी सरकार गंगा स्वच्छता अभियान को सबसे बड़े जन अभियान का रूप देना चाहती है। इस अभियान के जरिए राज्य सरकार युवा पीढ़ी के बीच अपनी संस्कृति के प्रति लगाव और खास तौर से जीवन दायिनी गंगा से जुड़ाव को और मजबूत करना चाहती है।

गंगा (नमामि गंगे मिशन) को स्वच्छ बनाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मिशन के लक्ष्यों और उद्देश्यों को प्राप्त करने के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ गंगा की स्वच्छता के लिए भागीरथ प्रयास कर रहे हैं। राज्य सरकार ने पुष्टि की है कि प्रदेश के अलग-अलग इलाकों में निर्माणाधीन 62 एसटीपी भी जल्‍द ही तैयार हो कर गंगा के साथ ही अन्‍य नदियों की स्‍वच्‍छता अभियान से जुड़ जाएँगे। नमामि गंगे विभाग के मुताबिक निर्माणाधीन 62 सीवेज ट्रीटमेंट प्‍लांट की क्षमता 1522 एमएलडी होगी। 16 MLD अभी निर्माणाधीन है और उसे जल्द ही राज्य में 14 नए जिलों में सीवेज ट्रीटमेंट कैपेसिटी को बढ़ावा देने के लिए जोड़ा जाएगा।

नए ट्रीटमेंट प्लांट शुरू हो जाने के बाद कुल एसटीपी से लैस जिलों की संख्या यूपी में 41 हो जाएगी। फिलहाल उत्तर प्रदेश में कुल 104 एसटीपी संचालित हो रहे हैं, जिनकी कुल क्षमता 3298.84 एमएलडी है। नए एसटीपी मिलने के बाद जल शक्ति मंत्रालय गंगा में भारी मात्रा में गिरने वाले रासायनिक और दूषित पानी को बड़ी तादाद में रोकने में सफल होगा।

‘हमें आत्मरक्षा का अधिकार नहीं, उन्होंने महिलाओं को भी नहीं छोड़ा’: दिल्ली हिंसा के खिलाफ पुलिसकर्मियों के परिजन सड़क पर

दिल्ली पुलिस के सभी वर्तमान और रिटायर्ड जवानों के परिजनों ने गणतंत्र दिवस के दिन मंगलवार (जनवरी 26, 2021) को हुई हिंसा के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया, जिसमें 400 के करीब पुलिसकर्मी घायल हुए हैं। इस विरोध प्रदर्शन में इन सभी घायल जवानों के परिजन शामिल थे। दिल्ली के शहीदी पार्क में दिल्ली पुलिस महासंघ ने ये प्रदर्शन किया। उन सभी ने हिंसा करने वाले प्रदर्शनकारियों की निंदा की।

इस दौरान दिल्ली के लाल किले पर उस दिन तैनात एक जवान ने बताया कि अंदर घुस कर अपना झंडा फहराने वाले प्रदर्शनकारियों ने पुलिसकर्मियों पर अचानक से हमला कर दिया था। हेड कॉन्स्टेबल अशोक कुमार ने कहा कि प्रदर्शनकारियों के हाथ में तलवारें और डंडे थे। उन्होंने बताया कि उनके पाँवों और सिर में चोटें आई हैं। मॉडल टाउन में तैनात हेड कॉन्स्टेबल सुनीता ने भी अपना अनुभव साझा किया।

उन्होंने कहा कि उन्हें मुबारका चौक पर तैनात किया गया था, जहाँ डीसीपी और एसीपी भी तैनात थे। उन्होंने बताया कि वरिष्ठ अधिकारी लगातार उनसे निवेदन कर रहे थे कि वो बताए गए रूट पर ही रैली करें, लेकिन वो अचानक से आक्रामक हो गए और उन्होंने पुलिस बैरिकेडिंग के साथ-साथ कई वाहनों को भी क्षतिग्रस्त कर दिया। उन्होंने बताया कि पुलिसकर्मियों को इसका अंदाज़ा भी नहीं था कि उन पर भी हमला होगा।

वहीं लाल किले पर ड्यूटी में तैनात सब-इंस्पेक्टर सतीश वर्मा के बेटे अभिषेक वर्मा ने कहा कि उनके पिता तो किसी तरह बच गए, लेकिन उनके लगभग सारे साथी चोटिल हो गए। एक अन्य परिजन ने कहा कि प्रदर्शनकारी इस दौरान महिला पुलिसकर्मियों को भी नहीं छोड़ रहे थे। एक अन्य परिजन ने कहा कि तिरंगे का अपमान पूरे देश का अपमान है। उन्होंने कहा कि पुलिसकर्मियों के पीछे ट्रैक्टर भगा कर किसान क्या साबित करना चाहते थे, वो चाहती तो हथियार प्रयोग कर सकती थी।

एक परिजन ने अफ़सोस जताया कि पुलिस में आने के बाद आपका आत्मरक्षा का अधिकार भी ख़त्म हो जाता है। उन्होंने कहा कि इसे सहिष्णुता का स्तर कहते हैं, जिसके तहत पुलिस के जवानों को ट्रेनिंग देकर सहिष्णु बनाया जाता है। उनका कहना था कि इसी सहिष्णुता का ‘किसानों’ ने फायदा उठाया। उन्होंने कहा कि अगर हथियार प्रयोग करने के आदेश दिए जाते तो कुछ और ही परिणाम होता। इनमें कई ऐसे भी थे, जिनकी तीन पीढ़ियाँ पुलिस में थीं।

युवाओं ने कहा कि उनके इरादे इस घटना से ध्वस्त नहीं हुए हैं, वो भी आगे दिल्ली पुलिस में भर्ती होने का प्रयास करेंगे। लेकिन, उन्होंने सिस्टम बदलने की बात करते हुए दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के रुख को लेकर भी नाराजगी जताई। दिल्ली पुलिस अब तक इस मामले में 25 FIR दर्ज कर ली है। इसमें UAPA के साथ-साथ IPC की धारा-12A (राजद्रोह) भी लगाई गई है। कई गिरफ्तार भी हुए हैं।

अधिकतर पुलिसकर्मियों के हाथ-पाँव और सिर पर चोटें आई हैं। एक वीडियो में देखा जा सकता है कि कैसे लाल किले में घुसे लाठी-डंडों और तलवारों से लैस प्रदर्शनकारियों के खदेड़ने के कारण पुलिस के जवानों को दीवार कूद-कूद कर जान बचानी पड़ रही है। वहाँ पुलिस के जवानों की लाठी से पिटाई की गई है। इसके बाद ITO और नांगलोई में हिंसा देखने को मिली। दोपहर के कुछ बाद तक घायल पुलिसकर्मियों का आँकड़ा 86 था, जो शाम तक 153 हो गया। अगले दिन पता चला इससे दोगुने पुलिसकर्मी जख्मी हुए हैं।

राजदीप कितना बड़ा ‘झूठा’: राष्ट्रपति के प्रेस सचिव ने इंडिया टुडे को पत्र लिख बताया, कहा- भूल माफ करने योग्य नहीं

राष्ट्रपति के प्रेस सचिव अजय कुमार सिंह ने मीडिया चैनल ‘इंडिया टुडे’ ग्रुप के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ अरुण पुरी को एक पत्र लिखा है। इस पत्र में राजदीप सरदेसाई का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि संस्थान से जुड़े कुछ पत्रकार गलत फैक्ट्स सामने रखते हैं। झूठा साबित होने पर बिना माफी मॉंगे उसे डिलीट कर देते हैं और ऐसा बार-बार किया जाता है।

राष्ट्रपति के प्रेस सचिव अजय कुमार सिंह की ओर से राष्ट्रपति भवन में लिखे गए पत्र में कहा गया कि इंडिया टुडे समूह से जुड़े कुछ पत्रकारों द्वारा विवाद में राष्ट्रपति भवन को घसीटने के पीछे की मंशा स्पष्ट नहीं है।

इंडिया टुडे को लिखा गया पत्र

पत्र में 23 जनवरी को सुभाष चंद्र बोस की जयंती पर राजदीप सरदेसाई द्वारा फैलाए गए झूठ का जिक्र किया गया है। इसमें बताया गया है कि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने 23 जनवरी को सुभाष चंद्र बोस की 125वीं जयंती के मौके पर उनका पोट्रेट का अनावरण किया था। जिसके बाद सरदेसाई समेत कई पत्रकारों ने दावा किया कि वह सुभाष चंद्र बोस की तस्वीर नहीं है। उनके अनुसार ये पोट्रेट प्रसनजीत चटर्जी (Prosenjit Chatterjee) की है, जिन्होंने बोस पर बनी फिल्म में उनका किरदार अदा किया था।

इंडिया टुडे को लिखे गए पत्र में कहा गया है, “खेद की बात यह है कि आपके ग्रुप के पत्रकार तथ्यों के बारे में जानकारी इकट्ठा करने की जहमत नहीं उठाते हैं। जैसे कि इस खबर के लिए वह नेताजी के परिवार के सदस्यों (उदाहरण के लिए सीके बोस से, जिन्होंने ट्विटर पर स्पष्ट किया था कि तस्वीर नेताजी की ही है) या फिर खुद एक्टर से पुष्टि कर सकते थे, जिन्होंने भी ट्विटर पर यही बात लिखी थी। उन्होंने फैक्ट चेक करने की बिल्कुल भी कोशिश नहीं की और राजनीतिक लाभ लेने के लिए राष्ट्रपति के खिलाफ बेतुके आरोप लगाने लगे।”

पत्र में आगे कहा गया है कि उन्होंने ऐसा करके न सिर्फ अपनी पत्रकारिता की नीति को अपमानित किया है, बल्कि राष्ट्रपति भवन की गरिमा को भी धूमिल किया है। इस तरह की भूल माफ करने के लायक नहीं है, क्योंकि चीजें पहले से ही स्पष्ट है। ये पत्रकार बाद में अपना ट्वीट डिलीट कर देते हैं, बिना अपना ब्लंडर स्वीकार किए, बिना माफी माँगे। पत्रकारों ने केवल अपना ट्वीट डिलीट किया है, माफी नहीं माँगी है। प्रेस सचिव ने इस आचरण को अक्षम्य बताते हुए कहा कि वो इंडिया टुडे ग्रुप के साथ जुड़ाव की समीक्षा करने के लिए मजबूर हैं।

राजदीप ने अब इस ट्वीट को डिलीट कर दिया है

यह चिट्ठी 27 जनवरी 2021 को लिखी गई है और 28 जनवरी को खबर आई थी कि इंडिया टुडे प्रबंधन द्वारा 2 हफ्तों के लिए ऑफ एयर किए जाने के बाद राजदीप सरदेसाई ने चैनल छोड़ने का फैसला किया है। रिपोर्ट्स में कहा गया था कि अप्रमाणित सूचना साझा करने वाले राजदीप ने अपने ऊपर कार्रवाई के बाद संस्थान को इस्तीफा सौंप दिया है। राजदीप पर संस्थान ने कार्रवाई 26 जनवरी की ट्रैक्टर रैली के दौरान हुई एक मौत को लेकर झूठा दावा करने को लेकर की थी।

गौरतलब है कि नेताजी वाले मामले में राजदीप सरदेसाई ने फेक न्यूज फैलाने के बाद चुपके से ट्वीट डिलीट कर दिया था और माफी माँगने की जगह राष्ट्रपति भवन पर ही आरोप लगाया था। उन्होंने ट्वीट किया था कि सरकार इस बात पर ‘जोर’ देती है कि नेताजी का यह मूलचित्र है, न कि फिल्म से लिया गया है। इससे समझ में आता है कि वह अभी भी मानते हैं कि चित्र प्रसनजीत का था, नेताजी का नहीं।

कुछ समय बाद, उन्होंने फिर से नेताजी की तस्वीर को ट्वीट किया, जिसके आधार पर कलाकार परेश मैती ने पोट्रेट बनाया था।