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दानिश सैफी ने पोस्ट की हिन्दू लड़की की अश्लील वीडियो-तस्वीरें, धोखे से फोन लेकर बना दिया फेक FB-इंस्टा हैंडल: अलीगढ़ पुलिस ने दर्ज की FIR, निकाह का बना रहा था दबाव

अलीगढ़ में एक हिंदू लड़की को धोखे से फँसाने का मामला सामने आया है। लड़की ने बताया कि दानिश सैफी ने उससे दोस्ती की और धोखे से उसका मोबाइल फोन ले लिया। फिर उसने फोन में मौजूद तस्वीरों और वीडियो को अपने पास रख लिया। इसके बाद उसने लड़की पर शादी करने का दबाव बनाना शुरू कर दिया। यही नहीं, वो लड़की को शादी के लिए दबाव डाल रहा है और ऐसा न करने पर जान ले ले और जान दे देने की धमकी दे रहा है। इस मामले की एफआईआर की कॉपी ऑपइंडिया के पास मौजूद है।

एफआईआर के मुताबिक, अलीगढ़ के लॉर्ड कॉष्ण हॉस्पिटल के पास अरमान नाम के लड़के ने 22 फरवरी 2025 को लड़की का फोन ले लिया, जिससे दानिश सैफी ने फोन ले लिया। इसके बाद उसने लड़की के नंबर को अपने नाम से पोर्ट करा लिया। और रिश्तेदारों के पास फोन करने लगा।

चूँकि लड़की का फोन और उसका नंबर दानिश के पास था और उसका ऐक्सेस भी, ऐसे में उसके पास लड़की के सारे कॉन्टैक्ट पहुँच गए। दानिश सैफी ने इसके बाद लड़की को धमकाना शुरू कर दिया। यही नहीं, उसने लड़की की भांजी के नाम से फेसबुक पर आईडी बना ली और तस्वीरें पोस्ट करने लगा।

दानिश सैफी ने इसके बाद फोन और सिम देने के बहाने पीड़ित हिंदू लड़की को क्वॉसी चौराहे के पास बुलाया। उसने लड़की से बदतमीदी की और फोन भी नहीं लौटाया। दानिश सैफी की ब्लैकमेलिंग से तंग आकर युवती ने पुलिस से संपर्क किया और एफआईआर दर्ज कराई है। हालाँकि पुलिस ने मामले में क्या कार्रवाई की है, ये पता नहीं चल पाया है।

FIR में भी इस बात का जिक्र है कि दानिश ने लड़की का मोबाइल नंबर इस्तेमाल कर सकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर डालीं। उसकी करतूतों की वजह से लड़की मानसिक तौर पर परेशान है। इस पूरे मामले में अब विश्व हिंदू परिषद से जुड़े लोग सोमवार (14 अप्रैल 2025) को पुलिस अधीक्षक से भी मुलाकात करेंगे। विहिप पदाधिकारी ने कहा कि स्थानीय पुलिस और शिकायतकर्ता पर समझौता करने का दबाव बनाया जा रहा है।

कोरोना पीड़िता को अस्पताल ले जाने की जिम्मेदारी मिली, लेकिन एंबुलेंस ड्राइवर नौफल ने गाड़ी रोक किया बलात्कार: केरल की अदालत ने सुनाई उम्रकैद की सज़ा

केरल में रेप का एक मामला फिर से चर्चा में है। केरल में कोरोना पीड़ित 20 वर्षीय महिला को एंबुलेंस चालक नौफल कोविड स्वास्थ्य केंद्र ले जा रहा था। रास्ते में गाड़ी रोक कर उसने पीड़ित के साथ दुष्कर्म किया। जब पीड़ित अस्पताल पहुँची और स्वास्थ कर्मियों को इसकी जानकारी दी तो नौफल को पकड़ा गया। अब केरल की अदालत ने नौफल को उम्रकैद की सजा सुनाई है।

घटना 6 सितंबर, 2020 की है। केरल के पतनमतिट्टा जिले में कोरोना संक्रमित लड़की को देर रात एक बजे 108 एंबुलेंस सर्विस से कोजेनचेरी स्थित कोविड स्वास्थ्य केंद्र ले जाया जा रहा था। रिपोर्ट्स के अनुसार, एंबुलेंस में दो मरीज थे। स्वास्थ्य अधिकारियों ने एक मरीज को कोजेनचेरी जिला अस्पताल और दूसरे को कोविड स्वास्थ्य केंद्र में ले जाने की हिदायत एंबुलेंस चालक नौफल को दी थी।

नौफल ने एक मरीज को जिला अस्पताल पहुँचाया और महिला मरीज को कोविड स्वास्थ्य केंद्र के तरफ ले गया, लेकिन केंद्र पहुँचने से पहले ही एर्नामुला हवाई अड्डे के पास एंबुलेंस रोककर गाड़ी के पिछले हिस्से में पहुँचा और दरवाजा अंदर से बंद कर लड़की के साथ बलात्कार किया। महिला ने जब विरोध किया तो उसके साथ मारपीट भी की। इस दौरान महिला को चोट भी लगी और वह बेहोश हो गई।

बेहोशी की हालत में वह पीड़ित को अस्पताल के सामने छोड़कर फरार हो गया। महिला ने अस्पताल के कर्मचारियों को इस बारे में बताया तो उन्होंने पुलिस को सूचना दी। पुलिस ने त्वरित कार्यवाही करते हुए नौफल को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस जाँच में यह भी सामने आया कि नौफल पर एक हत्या का मामला भी दर्ज है। इसके बाद अब केरल के पतनमतिट्टा के प्रिंसिपल सेशन कोर्ट ने आरोपित को सजा सुनाई है। नौफल अलप्पुझा का रहने वाला है। जस्टिस एन हरिकुमार ने दोषी को दो लाख 12 हजार के जुर्माने के साथ उम्रकैद की सजा सुनाई है।

हिन्दू लोग हैं, मारो-पीटो जो भी करो… बंगाल के ‘शरणार्थी’ हिन्दुओं की आपबीती, बताया – पानी में जहर मिलाया, हर शुक्रवार मचाते हैं आतंक

पश्चिम बंगाल के हिन्दुओं ने माँग की है कि मुर्शिदाबाद में राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाए। मुस्लिमों की हिंसा के चलते भागे हिन्दुओं ने बताया है कि इस्लामी भीड़ पानी तक में जहर मिला रही है। मुर्शिदाबाद में इस्लामी भीड़ की हिंसा के चलते 3 हिन्दुओं की मौतों के बाद पश्चिम बंगाल के DGP राजीव कुमार ने दावा किया है कि स्थिति नियंत्रण में है।

ANI से बात करते हुए इस्लामी हिंसा के पीड़ित एक हिन्दू ने बताया, “सारे घर जलाए गए, सारी दुकानें जलाई गई हैं। सब लूट लिया है। इनका इरादा ही ऐसा है कि हिन्दू लोग हैं, मारो-पीटो जो मन हो करो। हमलोग यहाँ चाहते हैं कि स्थायी रूप से BSF रहे। तोड़फोड़ के बाद 4 घंटे तक पुलिस का कोई नामोनिशान नहीं होता।”

पीड़ित ने बताया कि पुलिस थाना हिंसा वाली जगह से कुछ ही दूर है लेकिन इस्लामी भीड़ की हिंसा के दौरान कोई उन्हें बचाने नहीं आया। एक पीड़ित हिन्दू ने बताया कि हर शुक्रवार (जुमे) को यहाँ बवाल होता है। उन्होंने माँग की कि राज्य में ममता बनर्जी की सरकार हटा कर राष्ट्रपति शासन लगाया जाए।

रोते हुए पीड़ित महिला ने बताया, “हमको सुरक्षा चाहिए और कुछ नहीं। हमलोग का दुकान तोड़ दिया, आदमी को मारकाट दिया, दुकान लूटपाट कर ले गए। चुरा के सब ले गए। हमारे यहाँ छोटे-छोटे बच्चे हैं। घर में महिलाएँ हैं, हम कहाँ जाएँगे। चाकू-छुरी लेकर ये लोग घर में घुसते हैं।”

मुर्शिदाबाद में मुस्लिमों की हिंसा के चलते बड़ी संख्या में हिन्दू इलाके छोड़ कर भी भागे हैं। आजतक की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि मुर्शिदाबाद से बड़ी संख्या में हिन्दू परिवार इस्लामी कट्टरपंथियों के डर से मालदा जिले में भाग आए हैं। यहाँ इन लोगों ने स्कूलों और सार्वजनिक जगहों पर शरण ली है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि मालदा पहुँचे यह हिन्दू शरणार्थी मुर्शिदाबाद के धुलियान इलाके से भागे हैं। धुलियान में ही मंदिरों पर भी हमला हुआ था। यहाँ हिन्दुओं ने बताया है कि धुलियान में पानी की टंकियों में जहर मिला दिया गया है और घर लूट लिए गए हैं। हिन्दुओं ने बताया है कि उनका राशन तक लूट कर इस्लामी भीड़ ले गई है।

मुर्शिदाबाद से भागने वालों में महिलाओं और बच्चों की भी बड़ी तादाद है। कई बुजुर्ग और गर्भवती महिलाएँ भी हिंसाग्रस्त इलाकों से भागी हैं। वहीं इस सब के बीच पश्चिम बंगाल के डीजीपी राजीव कुमार ने दावा किया है कि स्थिति नियंत्रण में है और अब कोई अशांति का माहौल नहीं है।

उनका यह बयान तब आया है जब कलकत्ता हाई कोर्ट ने मुर्शिदाबाद में बिगड़ते हालात देखकर शनिवार (12 अप्रैल, 2025) को केन्द्रीय बल तैनात करने का आदेश दिया था। केन्द्रीय बलों की तैनाती के बाद मुर्शिदाबाद में कुछ शान्ति आई है। हालाँकि, इस्लामी भीड़ ने BSF पर भी हमले किए हैं।

मुर्शिदाबाद में इस्लामी हिंसा में 3 लोगों की मौत हो चुकी है। 15 से अधिक पुल्सिकर्मी घायल हुए हैं। बड़ी संख्या में दुकानें लूटी, जलाई और तोड़ी गई हैं। पुलिस ने बताया है कि उसने हिंसा के बाद 150 लोगों को गिरफ्तार किया है और बाकियों की गिरफ्तारी के लिए प्रयास कर रही है मुर्शिदाबाद में इन्टरनेट भी बंद है।

इस बीच भाजपा ने आरोप लगाया है कि राज्य की ममता बनर्जी की सरकार हिंसा को रोकने के बजाय अब भी मुस्लिमों को बढ़ावा दे रही है। भाजपा ने पुलिस पर भी एक्शन ना लेने का आरोप जड़ा है।

क्या राष्ट्रपति को आदेश दे सकता है सुप्रीम कोर्ट, किन कारणों से डेडलाइन तय करने के फैसले पर उठ रहे सवाल: जानिए अधिकारों को लेकर क्या कहता है संविधान

सुप्रीम कोर्ट ने स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार राष्ट्रपति को आदेश दिया है। एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल की ओर से भेजे गए बिल पर राष्ट्रपति को 3 महीने के भीतर फैसला लेना होगा। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट के बीच की शक्तियों को लेकर सोशल मीडिया से लेकर प्रबुद्ध वर्ग तक के बीच बहस छिड़ गई है कि सुप्रीम कोर्ट आदेश दे सकता है या नहीं।

दरअसल, यह मामला तमिलनाडु से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने 8 अप्रैल 2025 को तमिलनाडु सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा था कि विधानसभा की ओर से भेजे गए बिल पर राज्यपाल को एक महीने के भीतर फैसला लेना होगा। इस फैसले के दौरान अदालत ने राष्ट्रपति को लेकर भी समय सीमा तय की। कोर्ट का यह आदेश 11 अप्रैल 2025 को सार्वजनिक किया गया है।

अपलोड किए गए ऑर्डर शीट में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 201 का हवाला दिया है। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने इसमें कहा है, “राज्यपालों द्वारा भेजे गए बिल के मामले में राष्ट्रपति के पास पूर्ण वीटो या पॉकेट वीटो का अधिकार नहीं है। उनके (राष्ट्रपति के) फैसले की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है और न्यायपालिका बिल की संवैधानिकता का फैसला करेगी।”

सु्प्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर राज्यपाल किसी बिल को राष्ट्रपति के पास भेजता है तो राष्ट्रपति को उस बिल को स्वीकार करना होगा, उस पर राय देकर देकर वापस भेजनी होगी या फिर अस्वीकार करना होगा। यह सब कुछ तीन महीने के भीतर करना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने यहाँ तक कह दिया कि राज्यपाल द्वारा भेजे गए बिल पर राष्ट्रपति को बार-बार लौटाने की प्रक्रिया रोकनी होगी।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने अपने फैसले में आगे कहा, “कानून की स्थिति यह है कि जहाँ किसी कानून के तहत किसी शक्ति के प्रयोग के लिए कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं है, वहाँ भी उचित समय सीमा के भीतर यह प्रयोग किया जाना चाहिए। अनुच्छेद 201 के तहत राष्ट्रपति द्वारा शक्तियों का प्रयोग कानून के इस सामान्य सिद्धांत से अछूता नहीं कहा जा सकता है।”

सर्वोच्च न्यायालय ने आगे कहा कि अगर राष्ट्रपति समय-सीमा के भीतर कार्रवाई करने में विफल रहते हैं तो प्रभावित राज्य कानूनी सहारा ले सकते हैं और समाधान हासिल करने के लिए अदालतों का दरवाजा खटखटा सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिल की संवैधानिकता के मामले में कार्यपालिका को जज नहीं बनना चाहिए। ऐसे मुद्दों को अनुच्छेद 143 के तहत निर्णय के लिए सुप्रीम कोर्ट भेजना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय और संविधान

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय राजनैतिक कारणों से किसी भी विधेयक को रोकने की प्रवृत्ति को हतोत्साहित करने के लिए है। अगर सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय को देखा जाए तो यह आम जनता और निर्णय प्रक्रिया को प्रभावी बनाने की दिशा में सही कदम है। हालाँकि, लोग शक्ति के बँटवारे में न्यायिक हस्तक्षेप को लेकर सवाल उठा रहे हैं। यहाँ यह जानना बेहद जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय कितना वैध है और कितना अवैध।

यहाँ जानना यह बेहद महत्वपूर्ण है कि यह निर्णय सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ द्वारा नहीं दिया गया है, जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 145(3) में अनिवार्य है। अनुच्छेद 145(3) में कहा गया है, “संविधान की व्याख्या के संबंध में विधि के किसी सारवान प्रश्न से संबंधित किसी मामले का निर्णय करने के लिए या अनुच्छेद 143 के अंतर्गत किसी संदर्भ की सुनवाई के लिए न्यायाधीशों की न्यूनतम संख्या पाँच होगी।”

इसमें ऐसे मामलों की सुनवाई करने के लिए संविधान पीठ का विकल्प नहीं दिया गया है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने जो निर्णय दिया है वह संविधान के अनुच्छेद 200 और 201 की व्याख्या करके दिया है। सुप्रीम कोर्ट की यह बेंच ना संवैधानिक थी और ना ही इसमें न्यूनतम पाँच जज थे। ऐसे में सवाल यह है कि संविधान के अनुच्छेद 145(3) का उल्लंघन करके सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया निर्णय वैध है या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि कार्यपालिका को खुद जज नहीं बनना चाहिए, उसे संवैधानिक मामलों से जुड़े मामलों को अनुच्छेद 143 के तहत सुप्रीम कोर्ट भेजना चाहिए। अब ध्यान देने वाली बात ये है कि संविधान के मसलों से जुड़े ऐसे प्रश्नों को हल करने के लिए संविधान के निर्माताओं ने उसमें अनुच्छेद 145 (3) का प्रावधान किया था, ताकि उस पर विद्वान जजों की बहुमत द्वारा विश्लेषण किया जा सके।

संविधान का अनुच्छेद 143(1) कहता है कि यदि किसी समय राष्ट्रपति को प्रतीत होता है कि विधि या तथ्य का कोई प्रश्न उत्पन्न हुआ है या उत्पन्न होने की आशंका है, जो ऐसी प्रकृति का और ऐसे महत्व का है कि उस पर उच्चतम न्यायालय की राय प्राप्त करना समीचीन होगा तो वह उस प्रश्न पर विचार करने के लिए न्यायालय को ‘निर्देशित’ करेगा और वह न्यायालय, ऐसी सुनवाई के पश्चात जो वह ठीक समझता है, राष्ट्रपति को उस पर अपनी राय प्रतिवेदित करेगा।

दरअसल, संविधान के अनुच्छेद 124 के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट की स्थापना की गई थी। इसमें तब सुप्रीम कोर्ट के लिए एक मुख्य न्यायाधीश और इसके साथ ही 7 अन्य न्यायाधीश की बात कही गई थी। अनुच्छेद 145(3) में साफ कहा गया है कि ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए न्यूनतम पाँच जज होंगे। यानी कुल 8 जजों में से कम-से-कम 5 जज यानी कम-से-कम 62 प्रतिशत जज शामिल रहेंगे।

इस तरह देखें तो सुप्रीम के वर्तमान पीठ में सिर्फ दो जज थे। अब अगर अनुच्छेद 143 की बात करें तो इसमें सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान जजों की कुल 33 में से कम-से-कम 21 न्यायाधीश शामिल होने चाहिए, जो इस तरह के संवैधानिक मामले पर सुनवाई करें। इतना ही नहीं, वर्तमान निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 200 और 201 में समय-सीमा का प्रावधान जोड़ा है, जो यह उसके अधिकार क्षेत्र का नहीं है।

यह एक तरह से व्याख्या के रूप में संविधान संशोधन है। यहाँ बताना आवश्यक है कि संविधान संशोधन का अधिकार सिर्फ और सिर्फ विधायिका है। भारत के संविधान में उसके अनुच्छेद 368 के तहत ही संशोधन किया जा सकता है। इसके अलावा किसी अन्य तरीके से संविधान में संशोधन का प्रावधान नहीं है। न्यायालय सिर्फ कानून का संरक्षक है, उसका निर्माता नहीं है।

संविधान के अनुच्छेद 168 के अनुसार, राज्य का राज्यपाल विधानमंडल का हिस्सा होता है। राज्यपाल जब किसी बिल पर सहमति देता है तो वह कानून बन जाता है। इस तरह, कानून बनाने, उसे पारित करने और उस पर सहमति देने का कार्य पूरी तरह से विधायी प्रक्रिया का हिस्सा है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया निर्णय विधायी प्रक्रिया में न्यायपालिका का सीधा हस्तक्षेप कहा जा सकता है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि संविधान का अनुच्छेद 361 राष्ट्रपति और राज्यपालों के खिलाफ अदालती कार्यवाही से सुरक्षा प्रदान करता है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट उन्हें नोटिस जारी करके या अन्य तरीके से जवाब नहीं माँग सकता है। जब सुप्रीम कोर्ट उनसे जवाब नहीं माँग सकता है तो उनकी बात सुने बिना उन पर टिप्पणी करना, उन्हें आदेश और निर्देश देना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का सीधा उल्लंघन है।

जैसा कि सीनियर एडवोकेट पी. श्रीकुमार ने वर्डिक्टम लॉ पोर्टल पर अपने लेख में लिखा है कि संविधान का अनुच्छेद 361 राष्ट्रपति और राज्यपालों के कार्यों की न्यायिक समीक्षा को भी सीधे तौर पर रोकता है। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल और यहाँ तक कि राष्ट्रपति को निर्देश जारी कर दिया। यह अपने आप में बहुत बड़ा एवं ढाँचागत सवाल है।

राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट

बहस का सबसे बड़ा मुद्दा सुप्रीम कोर्ट का राष्ट्रपति को दिया गया निर्देश है। भारत संघ का प्रमुख राष्ट्रपति होता है। संविधान का अनुच्छेद 79 कहता है कि संघ (भारत) के लिए एक संसद होगी, जो राष्ट्रपति और दो सदनों से मिलकर बनेगी, जिनके नाम लोकसभा और राज्यसभा होंगे। देश का शासन भी राष्ट्रपति के नाम से प्रधानमंत्री द्वारा संचालित होता है, जिसका एक हिस्सा न्यायपालिका है।

सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता रीना एन सिंह का कहना है कि भारत के संविधान की निम्नलिखित धाराओं एवं सिद्धांतों के अंतर्गत यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि क्या भारत का सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India), भारत के राष्ट्रपति (President of India) अथवा किसी राज्यपाल (Governor) को यह निर्देश दे सकता है कि वे विधानमंडल द्वारा पारित किसी विधेयक पर निर्धारित समय के भीतर निर्णय लें।

संवैधानिक प्रावधान (Constitutional Provisions):

अनुच्छेद 200 (Article 200): राज्यपाल विधानसभा द्वारा पारित विधेयक को –

(क) स्वीकृति दे सकता है,
(ख) अस्वीकृत कर सकता है, या
(ग) राष्ट्रपति को विचारार्थ भेज सकता है

  • अनुच्छेद 201 (Article 201): यदि राज्यपाल विधेयक को राष्ट्रपति के पास भेजते हैं, तो राष्ट्रपति उसे स्वीकृत या अस्वीकृत कर सकते हैं।
  • अनुच्छेद 32 और 226 (Articles 32 & 226): ये संविधानिक अधिकार न्यायालयों को writ jurisdiction प्रदान करते हैं, जिसके अंतर्गत सुप्रीम कोर्ट अथवा उच्च न्यायालय mandamus जारी कर सकते हैं ताकि कोई संवैधानिक पदाधिकारी (जैसे कि राज्यपाल या राष्ट्रपति) अपने संवैधानिक कर्तव्यों का पालन करें।
  • नयायिक व्याख्या (Judicial Interpretation)
  • सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु बनाम राज्यपाल केस (2024) में स्पष्ट कहा कि राज्यपाल द्वारा विधेयकों को अनिश्चितकाल तक लंबित रखना संविधान की भावना के विरुद्ध है और “reasonable time ” में निर्णय लेना अनिवार्य है।
  • अतः, यदि राष्ट्रपति या राज्यपाल संविधानिक कर्तव्य में अनुचित विलंब करें, तो सुप्रीम कोर्ट उन्हें निर्देश दे सकता है ताकि वे विलंब किए बिना निर्णय लें। भारत का संविधान किसी भी संस्था को पूर्णतः सर्वोच्च (absolute authority) नहीं मानता। परंतु, सुप्रीम कोर्ट संविधान का सर्वोच्च व्याख्याकार (final interpreter) है।
  • अनुच्छेद 141 के अनुसार: सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया निर्णय और विधिक सिद्धांत पूरे देश में बाध्यकारी होगा। अतः यदि राष्ट्रपति या राज्यपाल किसी संविधानिक प्रक्रिया में विलंब करें तो सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया निर्देश बाध्यकारी होता है।
  • भारत का सुप्रीम कोर्ट, संविधान के अनुच्छेद 32, 226 एवं 141 के तहत यह अधिकार रखता है कि वह राष्ट्रपति या राज्यपाल को उनके संवैधानिक दायित्वों का पालन करने हेतु निर्देश दे सके, विशेषतः जब वे विधेयकों पर अनुचित विलंब करें। सुप्रीम कोर्ट किसी भी संवैधानिक पदाधिकारी को कानून एवं संविधान के अनुसार समयबद्ध निर्णय के लिए बाध्य कर सकता है।

राष्ट्रपति को सुप्रीम कोर्ट का ‘निर्देश’

संविधान का अनुच्छेद 53(1) कहता है कि संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रपति को ‘निर्देश’ दे सकता है, यह अहम सवाल है। यहाँ बताना आवश्यक है कि सुप्रीम कोर्ट के सभी न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होती है। अनुच्छेद 124(2) के अनुसार, राष्ट्रपति अपनी मुद्रा और हस्ताक्षर सहित अधिपत्र द्वारा उच्चतम न्यायालय के प्रत्येक न्यायाधीश को नियुक्त करेगा।

नियुक्ति ही नहीं, बल्कि महाभियोग के बाद जजों का निष्कासन या फिर पद से त्याग-पत्र भी राष्ट्रपति के नाम से होता है। संविधान के अनुच्छेद 124(2)(क) के अनुसार, कोई भी न्यायाधीश राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा। ऐसे में भारत संघ के प्रमुख को सुप्रीम कोर्ट को माँगने पर सलाह दे सकता है, लेकिन ‘निर्देश’ दे सकता है या नहीं यह सवाल है।

जिस सुप्रीम कोर्ट में किसी व्यक्ति को मृत्युदंड जैसी सजा दी जाती है, उस सजा को क्षमा करने का अधिकार राष्ट्रपति को है। संविधान का अनुच्छेद 72(2) इसका प्रावधान करता है। इस अनुच्छेद के अनुसार, राष्ट्रपति को किसी अपराध में दोषसिद्ध ठहराए गए किसी व्यक्ति के दंड को क्षमा, उसका प्रविलंबन, विराम या परिहार करने की अथवा दंडादेश के निलंबन कर सकता है.

इतना ही नहीं, संविधान के अनुच्छेद 361 के तहत राष्ट्रपति तो दूर की बात है, राज्यपाल तक पर कार्रवाई नहीं हो सकती है। राष्ट्रपति इस देश के शासन का प्रमुख ही नहीं होता, जिसका एक हिस्सा न्यायपालिका भी है, बल्कि वो सेना का सर्वोच्च कमांडर भी होता है। सैन्य निर्णयों के मामलों को संविधान के अनुसार चुनौती नहीं दी जा सकती है।

संविधान के अनुच्छेद 136(2) के अनुसार, सशस्त्र बलों से संबंधित किसी विधि द्वारा या उसके अधीन गठित किसी न्यायालय या अधिकरण द्वारा पारित किए गए या दिए गए किसी निर्णय, अवधारणा, निर्णय, दंडादेश या आदेश लागू नहीं होगी। जब संसद के किसी सदस्य पर सदन में कही गई बातों को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट कोई कार्रवाई नहीं कर सकता।

अनुच्छेद 105 (2) के अनुसार, संसद में या उसकी किसी समिति में संसद के किसी सदस्य द्वारा कही गई किसी बात या दिए गए किसी मत के संबंध में उसके विरुद्ध किसी न्यायालय में कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी और किसी व्यक्ति के विरुद्ध संसद के किसी सदन के प्राधिकार द्वारा या उसके अधीन किसी प्रतिवेदन, पत्र, मत या कार्यवाहियों के प्रकाशन के संबंध में इस प्रकार की कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी।

संविधान के अनुच्छेद 143(1) में साफ कहा गया है कि राष्ट्रपति किसी विषय पर उच्चतम न्यायालय की राय प्राप्त करने के लिए उसे न्यायालय को ‘निर्देशित’ कर सकते हैं। ऐसे में राष्ट्रपति को सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘निर्देशित’ करना कुछ लोगों को न्यायपालिका का अन्य क्षेत्रों में हस्तक्षेप या कहें तो घुसपैठ माना जा रहा है। लोगों में मन में गंभीर सवाल है कि सुप्रीम कोर्ट इस देश के सर्वोच्च पद को निर्देश दे सकता है या नहीं।

157 स्कूलों के 1 भी छात्र 10वीं में नहीं हुए पास: ‘नई बोतल में पुरानी शराब’ बेच गुजरात को बदनाम कर रहे अखिलेश यादव और अरविंद केजरीवाल, जानिए सच

मोदी सरकार को सवालों को घेरे में लेने के लिए विपक्षी नेता हमेशा इंतजार में रहते हैं इस क्रम में कई बार वो झूठी और पुरानी खबरें भी साझा करने से नहीं चूकते। इस बार ऐसा ही कुछ ऐसा ही हुआ। अखिलेश यादव ने अपने सोशल मीडिया पर एक स्क्रीनशॉट शेयर करके गुजरात के शिक्षा मॉडल पर सवाल खड़े किए और फिर अरविंद केजरीवाल भी उसी के आधार पर गुजरात की शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़ा करने लगे। हालाँकि, बाद में दोनो नेताओं की किरकिरी तब हुई जब सोशल मीडिया पर लोग इसे फेक न्यूज कहने लगे।

अखिलेश यादव ने अपने ट्वीट में लिखा था- गुजरात मॉडल ही फ़ेल हो गया… गुजरात में 157 स्कूलों में 10वीं की बोर्ड परीक्षा में एक भी छात्र पास नहीं हुआ। भाजपा हटाएॉँगे, भविष्य बचाएँगे!

इस ट्वीट को अरविंद केजरीवाल ने भी आगे बढ़ाया। उन्होंने ट्वीट किया कि भाजपा पूरे देश को अनपढ़ रखना चाहती है। उन्होंने ट्वीट में लिखा- ये गुजरात मॉडल है। ये बीजेपी मॉडल है जो ये पूरे देश में लागू करना चाहते हैं। ये डबल इंजन मॉडल है। पूरे देश को ये अनपढ़ रखना चाहते हैं। आप मुझे एक राज्य बता दीजिए जहाँ इनकी सरकार हो और इन्होंने वहाँ शिक्षा का कबाड़ा ना किया हो। इसी मॉडल के तहत अब ये दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था को भी ध्वस्त करने में लगे हैं।

दोनों नेताओं के ट्वीट को पढ़कर लग रहा है कि जैसे ये नतीजे इस बार के हैं जबकि जब खबर को सर्च किया गया तो पता चला गुजरात बोर्ड ने तो 10वीं परीक्षा के इस वर्ष नतीजे ही अभी नहीं घोषित किए। इसे लेकर कई नेटिजन्स ने दोनों नेताओं को लताड़ा भी। वो लिंक खोजकर दिए जिसमें कहा गया है कि बोर्ड परीक्षा का रिजल्ट 11 मई तक आएगा।

अब रही बात इसकी कि अगर इस बात नतीजे नहीं आए तो दोनों नेताओं ने झूठ कैसे फैलाया, तो बता दें कि ये खबर 2 साल पुरानी यानी 2023 के नतीजों की है। दो साल बाद इस खबर को विवाद की तरह दिखाना साफ दिखाता है कि इनका उद्देश्य राजनीति के अतिरिक कुछ नहीं है।

लोग इस तरह के हथकंडे आजमाने पर अखिलेश यादव को उनका समय याद दिला रहे हैं जब नकल कराकर परीक्षा लिए जाने के मामले चर्चा में होते थे। लोग पूछ रहे हैं कि उन खबरों को क्यों नहीं शेयर करते जिसमें सीढ़ी लगाकर बच्चों को नकल कराई जाती थी।

जब ‘अकाल तख़्त’ ने ‘साहिब’ को दिया सम्मान: जिस डायर ने जलियाँवाला की मिट्टी को किया लाल, उसे स्वर्ण मंदिर में बुलाकर दिया गया पगड़ी-कृपाण

जब पूरे देश में जलियाँवाला बाग़ नरसंहार के विरोध में ग़म का माहौल था, उस समय कुछ सिख नेता डायर की चापलूसी में लगे थे। अप्रैल 1919 के अंत में कर्नल रेजिनाल्ड एडवर्ड डायर और लेफ्टिनेंट जनरल सर हेरोल्ड रॉडन ब्रिग्स को न केवल स्वर्ण मंदिर में आमंत्रित किया गया था, बल्कि उन्हें सम्मानित भी किया गया था। गोलीबारी के दौरान स्वर्ण मंदिर को ‘बख़्श’ देने के लिए उन्हें धन्यवाद भी दिया गया। इतना ही नहीं, उन्हें मानद सिख भी बना दिया गया। डायर की पत्नी फ़्रांसिस ऐनी ट्रेवर ओम्मेनी के अनुसार, उनके पति ने उन्हें इस समारोह के बारे में बताया था।

उनके अनुसार, अमृतसर स्थित सिखों की सर्वोच्च संस्था ‘अकाल तख़्त’ के लोग आए और उन्होंने डायर से कहा कि उसे जॉन निकोल्सन की तरह सिख बनना चाहिए। बता दें कि ब्रिगेडियर जनरल जॉन निकोल्सन को सिख एक ‘संत’ की तरह देखते थे। उसे सनकी और हिंसक बताया जाता रहा है, लेकिन पंजाब में उसके बारे में तरह-तरह की कहानियाँ प्रचारित थीं और लोग उसे पूजने लगे थे। जब डायर के सामने सिख बनने का प्रस्ताव रखा गया तो उसने कहा कि वो अपने बाल लंबे नहीं रख सकता, क्योंकि वो एक ब्रिटिश अधिकारी है।

जब ‘अकाल तख़्त’ ने ‘साहिब’ को स्वर्ण मंदिर में किया सम्मानित

उस समय ज्ञानी अरूर सिंह ‘अकाल तख़्त’ का जत्थेदार हुआ करता था, वो कर्नल डायर को ‘साहिब’ कहकर बुलाया करता था। उसने कहा कि आपको लंबे बाल रखने की ज़रूरत नहीं है। इसके बाद डायर ने ये भी शर्त रखी कि वो धूम्रपान नहीं छोड़ेगा। जत्थेदार ने चापलूसी में और आगे बढ़ते हुए उन्हें सलाह दी कि वो धीरे-धीरे करके इसे छोड़ दे। हालाँकि, डायर ने एक तरह से खिल्ली उड़ाते हुए हर साल एक सिगरेट कम करने का वादा किया। इसके बाद स्वर्ण मंदिर में डायर और ब्रिग्स को बुलाकर पगड़ी, कृपण और सिरोपा दिया गया।

‘सिरोपा’ का अर्थ है सिर से पाँव तक का सम्मान। ‘मंदिर की सुरक्षा’ के लिए उसे धन्यवाद ज्ञापित किया गया। कई दिनों बाद जब डायर अफगान युद्ध के लिए अमृतसर छोड़कर जाने लगा तो शहर के कुछ प्रमुख सिख नेताओं ने उसकी सहायता के लिए 10,000 सिखों को भेजने की पेशकश की। डायर ने इस पेशकश को आगे भेजा, लेकिन ब्रिटिश सरकार ने इसे अस्वीकार कर दिया था। यहाँ तक कि ‘गुरु सत सुल्तानी’ नाम से उसके सम्मान में एक गुरुद्वारा भी स्थापित किया गया। आज इन तथ्यों पर कोई बात नहीं करना चाहता। बड़ी बात ये कि ‘अकाल तख़्त’ के जत्थेदारों की नियुक्ति भी तब अंग्रेज ही करते थे।

स्वर्ण मंदिर में पगड़ी पहनाकर डायर को किया गया सम्मानित

अब थोड़ा पीछे चलते हैं। जलियाँवाला बाग़ नरसंहार के अगले दिन मृतकों के परिजनों को अंतिम संस्कार के लिए भी अंग्रेजों की अनुमति लेनी पड़ी। अंग्रेज अधिकारियों ने प्रति मृतक मात्र 8 परिजनों के जुटने की अनुमति दी। जनरल डायर ने एक आदेश जारी करके सबको जल्द से जल्द अंतिम क्रिया-कर्म निपटाने और घर जाने के लिए कहा। डायर को अन्य अंग्रेज अधिकारियों ने आगाह किया कि स्वर्ण मंदिर के पास भारतीयों की एक और बैठक होनी है। तब खालसा कॉलेज के प्रिंसिपल रहे जेरार्ड एन्स्ट्रुथर वाथेन ने अपनी पत्नी को बताया था कि गोल्डन टेम्पल पर बमबारी न हो इसके लिए उसे डायर से बहस करनी पड़ी थी।

इसके बाद डायर ने ‘अकाल तख़्त’ के जत्थेदार को बुलावा भेजा। उसके साथ अमृतसर का एक अन्य अंग्रेजों का वफादार सिख नेता सरदार सुंदर सिंह मजीठिया भी पहुँचा। डायर ने उन्हें आदेश दिया कि वो शहर में ये फैलाएँ कि गोल्डन टेम्पल को नुकसान नहीं पहुँचाया गया है। इसके बाद शहर के 150 प्रमुख लोगों को पब्लिक लाइब्रेरी में एक बैठक के लिए बुलाया गया, जहाँ डायर ने पूरे भाषण के दौरान उन्हें खड़े रखा और धमकाया कि अगर अगर वो युद्ध चाहते हैं तो सरकार इसके लिए भी तैयार है।

डायर ने धमकाया कि उसके लिए फ्रांस और अमृतसर का युद्ध मैदान समान ही है। उसने ये भी कहा कि वो अपनी दुकानें खोलकर चुपचाप अपना काम शुरू करें। बाद में डायर ने ख़ुद को ‘पंजाब का रक्षक’ के रूप में पेश किया। असल में डायर सिख सैनिकों को वफादार बनाकर रखना चाहता था और इसीलिए अंग्रेजों के खिलाफ सिखों में फैली खबरों को काटना चाहता था। उसे सूचना मिली थी कि अंग्रेज सैनिकों द्वारा सिख लड़कियों के बलात्कार की ख़बरें भी फैली हुई हैं। उसने इसीलिए कूटनीति का सहारा लिया और स्वर्ण मंदिर में किसी भी प्रकार की बैठक न होने का आश्वासन जत्थेदार व सिख नेताओं से ले लिया।

अमृतसर की गली, डायर का भारतीयों को सड़क पर रेंगने का आदेश

उसी दौरान डायर को सूचना मिली थी कि मार्सेला शेरवुड नामक एक अंग्रेज महिला जब साइकिल से जा रही थी तब कुचा कुरिचन नामक गली में उसके साथ मारपीट हुई। डायर ने उस जगह पर एक त्रिभुज बनाकर 150 यार्ड की गली के दोनों तरफ खड़े के दिए। उसने आदेश दिया कि जो भी व्यक्ति इस गली से गुजरेगा उसे रेंग कर जाना होगा। जलियाँवाला बाग़ नरसंहार के एक सप्ताह बाद 19 अप्रैल, 1919 को ये आदेश जारी किया गया। ये बताता है कि डायर को अपने किए का बिलकुल भी पछतावा नहीं था। कुछ लोगों को शेरवुड को पीटने के शक में पकड़ा गया और उसी जगह पर ले जाकर कोड़े बरसाए गए।

सुबह 6 बजे से लेकर शाम 8 बजे तक वहाँ गोरे तैनात रहते थे। एक पीड़ित ने बताया था कि अपने पेट को जमीन में सटाकर रेंगना पड़ता था, और नितम्ब जरा सा भी ऊपर उठने पर कोड़े बरसाए जाते थे। एक 16 साल के लड़के को शेरवुड को पीटने के आरोप में गिरफ़्तार करके उसपर भी कोड़े बरसाए गए थे। डायर का कहना था कि जूते से पीटा जाना भारत में सबसे बड़ा अपमान है, इसीलिए एक ब्रिटिश महिला के बारे में ऐसा सुनकर उसे बहुत दुःख हुआ था। इसीलिए, उसने ये आदेश जारी किया।

अरूर सिंह के पोते आज भी करते हैं बचाव

आज भी ज्ञानी अरूर सिंह के वंशज उसके द्वारा एक क्रूर अंग्रेज अधिकारी को सम्मानित किए जाने के फ़ैसले को जायज ठहराते हैं। तरनतारन व संगरूर से सांसद रहे सिमरनजीत सिंह मान उसके पोते हैं। सिमरनजीत सिंह मान ने 2007 में बलिदानी भगत सिंह को ‘छोटा आतंकवादी’ कहा था। जबकि ये व्यक्ति पंजाब में DIG के पद पर रहा है। पिछले 31 वर्षों से वो अमृतसर में ‘शिरोमणि अकाली दल’ (SAD) के अध्यक्ष हैं। अमृतसर सिखों के लिए सबसे पवित्र व प्रभावशाली स्थल है।

उनका तर्क है कि उनके दादा ने जनरल डायर को इसीलिए सम्मानित किया, क्योंकि वो स्वर्ण मंदिर पर हवाई बमबारी का निर्णय ले चुके अंग्रेजों को शांत करना चाहते थे और अमृतसर को बचाना चाहते थे। उनका कहना था कि खालसा कॉलेज के तत्कालीन प्राधायाध्यापक GA वाथेन के कहने पर उन्होंने ऐसा किया था। सोचिए, जो व्यक्ति भगत सिंह को ‘हत्यारा’ और ‘आतंकवादी’ बताता हो उसकी मानसिकता और कैसी होगी। ऐसे ही लोग खालिस्तानी अलगाववादी तत्वों को बढ़ावा देते हैं।

जलियाँवाला बाग़ नरसंहार: जहाँ की मिट्टी है चंदन, अंग्रेजी क्रूरता की निशानी

जलियाँवाला बाग़ नरसंहार – 13 अप्रैल, 1919 को यहाँ भारतीय नागरिकों ने ख़ून का एक ऐसा खेल देखा था जिसने पूरे देश के दिल में में अंग्रेजी आक्रांताओं के विरुद्ध चिंगारी को प्रज्वलित कर दिया था। सरकार ने मृतकों का सरकारी आँकड़ा 379 दिया, लेकिन सच ये है कि इस नरसंहार में 1500 से भी अधिक लोग मारे गए थे और लगभग इतने ही घायल हुए थे। ये निर्दोष आम लोग थे, कोई सैनिक नहीं थे। इनमें बच्चे, महिलाएँ, बुजुर्ग सब शामिल थे। कई ने जान बचाने के लिए कुएँ में छलाँग लगा दी थी। आज जलियाँवाला बाग़ एक स्मारक है।

जलियाँवाला बाग़ की मिट्टी हर देशभक्त के लिए चंदन है। यही वो जगह है जहाँ नरसंहार के बाद 11 साल के एक बच्चे ने रक्तरंजित मिट्टी को अपने माथे से लगाकर भारत के दुश्मनों से बदला लेने की क़सम खाई थी। ये हमेशा उसकी स्मृति में रहे, इसके लिए उसने इस मिट्टी को अपने घर में भी रखा हुआ था। आगे चलकर यही बच्चा भगत सिंह कहलाया, जो भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में बलिदान का पर्यायवाची बन गए। जलियाँवाला बाग़ की यही वो मिट्टी थी जिसने उधम सिंह को क्रांतिकारी बनने के लिए प्रेरित किया। आज तक ब्रिटेन ने इस नरसंहार के लिए माफ़ी नहीं माँगी है।

1997 में और फिर सितंबर 2022 में क्वीन एलिजाबेथ भारत आई थीं तब लोगों को लगा था कि वो जलियाँवाला बाग़ नरसंहार के लिए माफ़ी माँगेंगी, लेकिन दोनों बार वो जलियाँवाला बाग़ तो गईं, स्वर्ण मंदिर का भी दौरा किया, लेकिन मृतकों को श्रद्धांजलि देकर इतिश्री कर ली। 1997 में राजघाट पर स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों ने धरना भी दिया था, लेकिन क्वीन ने माफ़ी नहीं माँगी। अमृतसर के गोल्डन टेम्पल रोड में स्थित जलियाँवाला बाग़ हर बैशाखी के दिन भारतीयों को उस क्रूरता की याद दिलाता है, स्वतंत्रता की क़ीमत बताता है।

आइए, सबसे पहले जानते हैं कि हुआ क्या था। जिस शख्स ने गोलीबारी का आदेश दिया था, उसका नाम था – कर्नल रेजिनाल्ड एडवर्ड डायर (तब ब्रिगेडियर जनरल)। गोलियों के निशान आज भी वहाँ देखे जा सकते हैं। ये वो समय था जब रॉलेट एक्ट के विरुद्ध देशभर में प्रदर्शन चल रहा था। ये क़ानून बनाकर ब्रिटिश सरकार ने ऐसा प्रावधान कर दिया था, जहाँ वो बिना सुनवाई किसी भी भारतीय को सज़ा सुनाकर जेल में डाल सकती थी। इसीलिए, भारतीयों द्वारा इसे काला क़ानून नाम दिया गया था। कई नेता गिरफ़्तार कर लिया गया था।

जलियाँवाला बाग़ नरसंहार के बाद गाँधी का ‘असहयोग आंदोलन’

सोचिए, भगदड़ की स्थिति में लोग कितने ख़ौफ़ में रहे होंगे। 10 मिनट तक गोलीबारी चलती रही थी, ये तभी ख़त्म हुई जब सैनिकों की गोलियाँ ख़त्म हो गईं। ये प्रथम विश्व युद्ध के बाद का समय जब तक अंग्रेज एक के बाद एक काले क़ानून लेकर आ रहे थे। विरोध प्रदर्शन तक पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। जलियाँवाला बाग़ में उस दिन अधिकतर लोग बैशाखी बनाने के लिए जुटे थे, उनमें एकाध ऐसा समूह भी था जो अंग्रेजों के विरुद्ध शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन कर रहा था। बाग़ का रास्ता काफी संकरा था, जिसे अंग्रेजी सैनिकों ने ढँक दिया था ताकि लोग भाग भी न पाएँ। अचानक से बिना किसी चेतावनी के कर्नल रेजिनाल्ड एडवर्ड डायर 50 सैनिकों के साथ आ पहुँचा।

बताया जाता है कि 10 मिनट के भीतर 1650 गलियाँ चली थीं। बाद में ख़ुद डायर ने कहा था कि उसका उद्देश्य भीड़ को तितर-बितर करना नहीं था बल्कि वो पूरे पंजाब का मनोबल गिराना चाहता था ताकि कोई विद्रोह के लिए आवाज़ न उठा सके। इस नरसंहार के बाद महात्मा गाँधी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया। डायर ने भारतीयों को जमीन पर रेंग कर चलने का आदेश दे रखा था। किसी ब्रिटिश अधिकारी को देखते ही गाड़ी से निकल कर सलाम ठोकना होता था। नग्न करके कोड़े बरसाए जाते थे। बच्चों को ब्रिटिश झंडा यूनियन जैक को सलाम करवाने के लिए मीलों चलवाया जाता था।

डायर ने पंजाब में मार्शल लॉ लगा रखा था। भारतीय परिवारों की बिजली काट दी जाती थी। अक्टूबर 1919 में महात्मा गाँधी लाहौर पहुँचे और उन्होंने इस घटना की जाँच की। अंग्रेज सरकार के विरोध में उन्होंने कैसर-ए-हिन्द की उपाधि लौटा दी। अंग्रेजों ने 1915 में उन्हें इस उपाधि से नवाज़ा था। उन्होंने ब्रिटिश संचालित सभी संस्थाओं, खासकर स्कूल-कॉलेजों और नौकरियों का। उसी दौरान प्रिंस ऑफ वेल्स के भारत दौरे का ऐलान हुआ, गाँधी ने उसके बहिष्कार का भी ऐलान किया।

कर्नाटक में 4 साल में 5.16% बढ़ गए मुस्लिम, आरक्षण 4 से 8% करने की सिफारिश: कोटा 85% तक ले जा सकती है कॉन्ग्रेस सरकार, ‘अहिन्दा वोट’ पक्के करने की तैयारी

कर्नाटक में अन्य पिछड़ा वर्ग का आरक्षण बढ़ाया जा सकता है। इसकी सिफारिश कर्नाटक में की गई जाति जनगणना नई रिपोर्ट में की गई है। OBC आरक्षण में बढ़ोतरी का सीधा फायदा मुस्लिमों को होने वाला है, वह राज्य में सबसे बड़ा OBC समूह हैं। जाति जनगणना की यह रिपोर्ट हाल ही में कर्नाटक कैबिनेट के सामने पेश की गई है।

कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार इस जातिगत जनगणना के नए सर्वे पर 17 अप्रैल को बैठक करने वाली है। मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि इस सर्वे OBC आरक्षण 32% से बढ़ाकर 51% करने की सिफारिश की गई है। इसी रिपोर्ट में मुस्लिम आरक्षण को भी 4% से बढ़ाकर 8% करने की सिफारिश की गई है।

85% हो जाएगा आरक्षण

17 अप्रैल को होने वाली कैबिनेट बैठक में इस आरक्षण को लेकर फैसला लिया जा सकता है। इसी बैठक में यह रिपोर्ट सार्वजनिक करने सम्बन्धित फैसला भी हो सकता है। कर्नाटक की जाति जनगणना रिपोर्ट में की गई सिफारिश अगर मानी जाती हैं, तो राज्य में कुल आरक्षण 85% हो जाएगा।

इस 85% में 51% OBC आरक्षण होगा जबकि 24% आरक्षण अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए रहेगा। इसके अलावा 10% आरक्षण आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी EWS को पहले की तरह मिलता रहेगा। इस रिपोर्ट को लेकर राज्य में बहस चालू हो गई है।

यह जातिगत जनगणना कर्नाटक पिछड़ा वर्ग आयोग ने करवाई थी। यह 2015 में एच. कांथराज के नेतृत्व में शुरू हुई थी। इसके बाद 2020 में के. जयप्रकाश हेगड़े के नेतृत्व में कर्नाटक राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग ने इसे पूरा किया। रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछड़ी जातियों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण मिलना चाहिए।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि पिछड़ा वर्ग आयोग ने OBC और मुस्लिम आरक्षण को बढ़ाने की सिफारिश तो की है लेकिन SC-ST तथा EWS आरक्षण को पहले की तरह ही रखने की बात कही है। अभी इस पर अंतिम फैसला बाक़ी है।

OBC में सबसे बड़ा समूह मुस्लिमों का

कर्नाटक में मुस्लिम OBC में सबसे बड़ा समूह हैं। राज्य में उनकी आबादी 75.25 लाख है। मुस्लिम OBC कर्नाटक के ओबीसी वर्गीकरण की श्रेणी 2B के अंतर्गत आते हैं। इसी के आधार पर रिपोर्ट में उनका आरक्षण 4% से दोगुना करके 8% करने की सिफारिश की गई है।

राज्य की कुल आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी 18.08% है, जो 2011 की जनगणना में 12.92% बताई गई थी। सर्वे का यह आँकड़ा 2015 का है। ऐसे में 4 साल में मुस्लिम आबादी कर्नाटक में 5.16% बढ़ गई।

रिपोर्ट में इस आरक्षण बढ़ाने के पीछे राज्य में OBC की हिस्सेदारी सबसे अधिक होना कारण बताया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि राज्य में कुल आबादी में ओबीसी की हिस्सेदारी 69.60% है, ऐसे में उन्हें जनसंख्या के आधार पर आरक्षण मिलना चाहिए

क्या 50% की सीमा पार करेगी कॉन्ग्रेस?

इस रिपोर्ट में आरक्षण को 50% से ऊपर ले जाने के क्रम में बाधा को भी पार करने की बात की गई है। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के इन्द्रा साहनी मामले में दिए गए फैसले के अनुसार, कोई भी राज्य 50% से अधिक आरक्षण नहीं दे सकता है। EWS आरक्षण इससे अलग है।

यदि कर्नाटक के पिछड़ा आयोग की रिपोर्ट की सिफारिश मानी गई तो यह आरक्षण 50% से कहीं अधिक 85% हो जाएगा। रिपोर्ट में इसके लिए झारखंड और तमिलनाडु का उदाहरण दिया गया है, जहाँ पहले ही 77% और 69% आरक्षण दिया जा चुका है। रिपोर्ट में सुप्रीम कोर्ट के इन्द्रा साहनी फैसले को आज के समय में प्रांसगिक ना होना बताया गया है।

राहुल गाँधी कर चुके दीवाल तोड़ने की सिफारिश

कर्नाटक में आरक्षण पर से सीमा हटाने की बात ऐसे समय हो रही है जब राहुल गाँधी हाल ही में इसकी वकालत कर चुके हैं। राहुल गाँधी ने हाल ही में कहा था कि उनकी पार्टी भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित 50% आरक्षण की ‘दीवार’ को तोड़ने के पक्ष में है। कर्नाटक में OBC आरक्षण बढ़ाने की सिफारिश और मुस्लिमों को अपने पाले में करने की कोशिश कॉन्ग्रेस की चुनावी तैयारी के तौर पर देखी जा रही है।

क्या आरक्षण से सधेगी ‘अहिन्दा वोट’ की नैया?

कर्नाटक में OBC आरक्षण पर हो रही यह पूरी कवायद ‘अहिन्दा वोट’ साधने की तरकीब मानी जा रही है। राज्य में OBC, मुस्लिम और SC-ST वोट को मिला कर ‘अहिन्दा वोटबैंक’ का नाम दिया जाता है। अहिन्दा शब्द कॉन्ग्रेस के बड़े नेता देवराज उर्स ने दिया था। वर्तमान मुख्यमंत्री सिद्दारमैया इस फ़ॉर्मूला पर काम करते आए हैं।

कॉन्ग्रेस चाहती है कि वह OBC, मुस्लिम और दलित वोटरों में इन सब कदम से वह और मजबूत हो जाए, जिससे आगामी चुनावों में उसे आसानी हो। जातिगत जनगणना में आरक्षण की सिफारिश के अलावा हाल ही में मुस्लिमों को राज्य में ठेकों में आरक्षण दिया गया था। यह भी इसी दिशा में एक कदम माना गया था।

राज्य यह अहिन्दा वोट लिंगायत और वोक्कालिगा समुदाय से इतर है। लिंगायत परंपरागत रूप से भाजपा जबकि वोक्कालिगा JD(S) के वोटर रहे हैं। वर्तमान में यह दोनों पार्टियां साथ में हैं, ऐसे में कॉन्ग्रेस की चिंताएँ और भी बढ़ गई हैं। ऐसे में वह इन दोनों समुदाय से इतर अपना अहिन्दा वोटबैंक बचाए रखना चाहती है।

14 मोबाइल, 546 लड़कियों की न्यूड Video… उसके ही कैफे में बने जो है वाराणसी गैंगरेप का मास्टरमाइंड: पीड़िता हेपेटाइटिस-B पॉजिटिव, ज्यादा नशे से पीलिया भी हुआ

वाराणसी में छात्रा से गैंगरेप के मामले ने अब एक बड़े सेक्स रैकेट का रूप ले लिया है। पुलिस ने इस केस में अब तक 12 आरोपितों को गिरफ्तार किया है, जिनके 14 मोबाइल फोन से 546 लड़कियों के न्यूड और आपत्तिजनक वीडियो बरामद हुए हैं। ये वीडियो व्हाट्सएप के जरिए उत्तर प्रदेश समेत महाराष्ट्र, दिल्ली, बिहार, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में शेयर किए गए थे। वहीं, पीड़िता की हालत खराब बताई जा रही है। लगातार नशे की वजह से वो पीलिया की शिकार हो गई है।

रिपोर्ट के मुताबिक, इस रैकेट के सरगना अनमोल गुप्ता (कांटिनेंटल कैफे का मालिक) के कब्जे से दो आईफोन बरामद हुए हैं, जिनमें कैफे के अंदर तैयार किए गए अश्लील वीडियो, आपत्तिजनक तस्वीरें और ग्राहकों का पूरा डेटा मौजूद है। ऐसा माना जा रहा है कि अनमोल इन वीडियो का इस्तेमाल नए ग्राहकों को जोड़ने और पुराने ग्राहकों को बनाए रखने के लिए करता था।

पुलिस ने बताया कि अब तक गिरफ्तार 12 में से अधिकांश आरोपित ड्रग एडिक्ट हैं। पूछताछ में पता चला कि इन युवकों को नशे की लत अनमोल की संगत में लगी। छात्रा ने जिन लड़कों की पहचान की, पुलिस उन्हें हिरासत में लेकर पूछताछ कर रही है। मोबाइल से मिले कंटेंट की फोरेंसिक जाँच आगरा की विधि विज्ञान प्रयोगशाला में की जा रही है।

छात्रा की हालत अभी भी मानसिक रूप से अस्थिर है। उसे बार-बार ड्रग्स दिया गया था, जिससे उसका मानसिक संतुलन बिगड़ गया है। डॉक्टर की देखरेख में उसका इलाज चल रहा है और पुलिस सुरक्षा में उसे घर भेजा गया है। इस बीच, उसे हेपेटाइटिस-बी की शिकायत हो चुकी है, जिसकी वजह से उसकी हालत बेहद खराब हो गई है।

इस मामले में तीन और आरोपित रेहान, जाहिर और मोहम्मद रजा भी पकड़े गए हैं, जो सीधे अनमोल के कैफे से जुड़े थे। पूछताछ में उन्होंने कबूल किया कि नशे में धुत होकर उन्होंने भी छात्रा के साथ ज्यादती की। जाँच में यह भी सामने आया है कि अनमोल का पिता शरद गुप्ता भी पुराना सेक्स रैकेट संचालक है और दोनों पहले भी गिरफ्तार हो चुके हैं।

तीन थानों की पुलिस ने बीते 72 घंटों में 41 से अधिक ठिकानों पर आरोपितों की गिरफ्तारी के लिए छापेमारी की है। चेतगंज एसीपी गौरव कुमार के नेतृत्व में स्पा सेंटर, कैफे होटल, ड्रिंक हाउस, और हुक्का बार पर छापे मार रही हैं। पुलिस अब तक 100 से ज्यादा सीसीटीवी फुटेज खंगाल चुकी है और जाँच लगातार जारी है।

मुर्शिदाबाद में अब BSF पर इस्लामी भीड़ का हमला, फायरिंग-पत्थरबाजी: बच्चे भी घायल, BJP ने बताया- तुलसी माला पहने हिन्दू को किया अधमरा

पश्चिम बंगाल में वक्फ कानून के विरोध के नाम पर इस्लामी भीड़ की हिंसा लगातार जारी है। इस्लामी भीड़ सुरक्षाबलों को भी निशाना बना रही है। पुलिस के बाद उसने अब कलकत्ता हाई कोर्ट के आदेश पर मुर्शिदाबाद पहुँची सीमा सुरक्षा बल (BSF) को निशाना बनाया है। BSF जवानों पर फायरिंग की गई है। हिंसा के बीच हिन्दू मुर्शिदाबाद से पलायन को मजबूर हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, शनिवार (12 अप्रैल, 2025) को BSF की टीम पर इस्लामी भीड़ ने हमला किया गया। यह हमला मुर्शिदाबाद के शमशेरगंज इलाके में हुआ। यहाँ तैनात जवानों को निशाना बनाया गया। वक्फ के नाम पर प्रदर्शन कर रहे इस्लामी कट्टरपंथियों ने BSF जवानों पर पत्थर बरसाए और उनकी गाड़ियाँ तोड़ दीं।

BSF को निशाना बनाए जाने की घटनाएँ रविवार (13 अप्रैल, 2024) को भी जारी हैं। रविवार को धुलियान इलाके में BSF के ऊपर कट्टरपंथियों ने फायरिंग की। इस फायरिंग में 2 बालक घायल हो गए। BSF के किसी सुरक्षाकर्मी के घायल होने की अभी सूचना नहीं है।

मुर्शिदाबाद में इस्लामी भीड़ की हिंसा रोकने में पश्चिम बंगाल पुलिस के नाकाम होने के बाद कलकत्ता हाई कोर्ट ने शनिवार को केन्द्रीय सुरक्षाबलों की तैनाती के आदेश दिए थे। इसके बाद मुर्शिदाबाद में BSF तैनात की गई थी। हिंसा में पहले पुलिसकर्मी भी घायल हुए थे। BSF के पहुँचने के बाद इस्लामी भीड़ ने उन्हें भी निशाने पर लिया।

BSF पहले के अलावा धुलियान में 2 हिन्दू मंदिरों पर भी इस्लामी भीड़ के हमले की बात सामने आई है। भाजपा ने आरोप लगाया है कि राज्य की TMC सरकार इस्लामी भीड़ पर कार्रवाई नहीं कर रही है और उन्हें लगातार प्रदेश भर में हिंसा फैलाने की खुली छूट दी जा रही है।

भाजपा ने बताया है कि इसी के चलते दक्षिण 24 परगना के बरुईपुर में तुलसी की माला पहने एक हिंदू व्यक्ति को मुस्लिम भीड़ ने बुरी तरह पीटा और अधमरा कर दिया है। उसकी एक वीडियो भी भाजपा ने साझा की है। इसमें वह अस्पताल में भर्ती है और अपनी पीड़ा बता रहा है।

भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी ने बताया है कि मुर्शिदाबाद के शमशेरपुर में इस्लामी भीड़ के हमलों से बचने के लिए सैकड़ों लोग भाग कर दूसरी जगह जा रहे हैं। अपना घर-बार छोड़ने वालों में अधिकांश महिलाएँ हैं। बड़ी संख्या में बच्चे और पुरुष भी इलाका छोड़ रहे हैं।

इससे पहले मुर्शिदाबाद में इस्लामी भीड़ ने एक हिन्दू पिता-पुत्र की हत्या कर दी थी। वह लोग मूर्तिकार थे। इस्लामी भीड़ के हमले में 15 से अधिक पुलिसकर्मी भी घायल हैं। वहीं इस दौरान भी राज्य में लगातार वक्फ के खिलाफ प्रदर्शन की अनुमति ममता सरकार दिए जा रही है।

‘ड्रम में राजा’… मुस्कान-साहिल ने केवल सौरभ को ही काटकर सील नहीं किया, इस संवेदनहीन समाज को भी कर दिया है बेपर्दा: कुछ तो शर्म करो रील-मीमबाजों

देश में पहले जब भी कोई जघन्य अपराध होता था तो कुछ समय के लिए वह मामला खबरों की सुर्खियाँ बनता था। लोग प्रदर्शन करते थे। न्याय माँगते थे। आगे उस घटना से सबक लेते थे या फिर उसे भूल जाते थे। लेकिन, अब सोशल मीडिया के जमाने में चीजें ऐसी नहीं है। यहाँ कोई भी मामला ज्यादा उछलता है तो पहले उससे वायरल होने वाला कंटेंट तैयार होता है बाकी चरण बाद के हैं। इस कंटेंट बनाने की होड़ में क्रिएटर्स भूल जाते हैं कि जो वो परोस रहे हैं उसका समाज पर क्या असर पड़ेगा।

बात को समझने का सबसे ताजा उदाहरण मेरठ हत्याकांड का है। एक महिला मुस्कान ने प्रेमी साहिल संग मिलकर अपने पति सौरभ की निर्मम हत्या की और उसके बाद शव को नीले ड्रम में छिपा दिया। मामले का खुलासा हुआ तो लोग पत्नी की हैवानियत सुन सिहर गए। मगर, कुछ ही दिन बाद देखा गया कि इस संवेदनशील घटना पर मीम और रील बनने लगी। बीमार मानसिकता का लोग इसका मजाक बनाने लगे। हद्द तो तब हुई जब इस घटना पर गाना तक तैयार हो गया।

यह संवेदना की मौत नहीं तो और क्या है ? सोशल मीडिया की ताकत तो किसी से छिपी नहीं है। लेकिन जब किसी गंभीर अपराध को भी लोग सिर्फ मज़े लेने के नजरिए से देखने लगें तो सवाल उठते हैं।

सोशल मीडिया पर निर्भर हमारी ‘सोच’

अब हमारी सोच सोशल मीडिया पर निर्भर हो गई है। हत्या होने के बाद संवेदनाएँ जताने के बजाए मीम्स बना रहे हैं। पहले अपराध होने पर ‘जागो’ कहा जाता था। अब ‘हँस लो और भूल जाओ’ वाला ट्रेंड है।

इस अपराधिक मामले में खास बात यह थी कि महिला ने पति को मार डाला। लेकिन इससे भी चौंकाने वाली बात सामने आई थी कि हत्या के बाद जिस ड्रम में शव को सीमेंट डालकर रखा गया। वही ड्रम अब सोशल मीडिया पर मीम्स और कॉमेडी वीडियो का विषय बन गया। इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब शॉर्ट्स, फेसबुक पोस्ट्स जैसे प्लैटफॉर्म पर लोग इस ड्रम का मज़ाक बनाने लगे।

मृत व्यक्ति के बारे में न सोचकर ड्रम को बड़ा मुद्दा बना दिया गया है। कुछ मीडिया संस्थान भी इसे ‘ड्रम मर्डर केस’ बताकर रिपोर्ट कर रहे हैं। जहाँ अपराध खबर नहीं बल्कि मनोरंजन बन जाता है। हमें अपराध के मुख्य कारणों पर बात करनी चाहिए। न कि इसे मजाक बनाना चाहिए।

मेरठ मर्डर केस पर जो प्रतिक्रिया सोशल मीडिया पर दिखीं। वह हमारे समाज के एक वर्ग की मानसिकता को उजागर करती हैं। कैसे हम दूसरों का दुख हमारे लिए मज़े का साधन बन गई हैं। घर में झगड़ा हो, हत्या हो या कोई सड़क हादसा। लोग पहले मोबाइल निकालते हैं, वीडियो बनाते हैं, अपलोड करते हैं और फिर वायरल होने की खुशी मनाते हैं।

भोजपुरी में ‘ड्रम में राजा’ हुआ रिलीज

भोजपुरी सिनेमा ने तो ड्रम पर गाना ही निकाल दिया। Born Music Bhojpuri नाम के प्रोडक्शन हाउस ने यूट्यूब पर ‘ड्रम में राजा’ गाने को रिलीज किया। गाने के बोल में प्रेमिका अपने प्रेमी को उसकी बात न मानने पर ड्रम में डालने की धमकी दे रही है। जिसके बाद से विरोध तेज़ हो गया। वीडियो का कमेंट सेक्शन अभद्र टिप्पणियों से भर गया। गाने के मेकर्स पर हिंसा को बढ़ावा देने के आरोप लगे। जिसके बाद गाने के ऑडियो को हटा दिया गया।

मनीषा रानी ने आवाज़ उठाई

बिग बॉस ओटीटी फेम एक्ट्रेस मनीषा रानी ने मेरठ मर्डर केस पर मजाकिया कंटेन्ट बनाने वाले पर नाराजगी जताई। हाल ही में एक वीडियो शेयर कर लिखा, “इतने सेंसिटिव टॉपिक को ऐसे डील करते हैं?” वीडियो में उन्होंने कहा, “आपको सीरियस विषय पर ऐसा वीडियो बनाने पर शर्म आनी चाहिए। कोई इसके कारण मर गया है और आप उसका मजाक उड़ा रहे हैं। यहाँ तक कि कंटेंट क्रिएटर ऐसे पोस्ट भी बना रहे हैं।”

रिश्तो की टूटती डोर में ‘ड्रम की धमकी’

मेरठ में सौरभ की हत्या के बाद पति को प्रताड़ित करने के मामले लगातार सामने आने लगे। जो कि आज के दौर में टूटते रिश्तों को दर्शाता है। कैसे अब पति-पत्नी का पवित्र रिश्ता ड्रम की धमकी के बाद खबरें बन जाता है। गोंडा में इंजीनियर की पत्नी ने मारपीट के बाद पति को हत्या कर ड्रम में भरने की धमकी दे डाली। गुरुग्राम में पति ने पत्नी को प्रेमी संग पकड़ा। फिर विरोध जताया तो टुकड़े कर ड्रम में भरने की धमकी मिल गई। ‘नीले ड्रम’ ने समाज में अपराध करने के तरीके का ट्रेन्ड चला दिया है।

अपराधी का कोई जेंडर नहीं

सोशल मीडिया पर लोगों की ऐसी असंवेदनशीलता पहली बार उजागर नहीं हुई है। बस ये है कि इस बार टारगेट पर महिलाएँ हैं। लगातार महिलाओं का मजाक इस तरह उड़ाया जा रहा है जैसे समाज में होते अपराधों की असली दोषी वही हैं। लेकिन, हकीकत तो ये है कि एक तरफ अगर मुस्कान जैसी लड़कियाँ हैं तो दूसरी तरफ श्रद्धा वॉकर- प्रिया-अलका जैसी भी लड़कियाँ भी हैं जिनके साथ जो हुआ वो सोचा भी नहीं जा सकता।

सोशल मीडिया का क्या है वो दोनों मामलों में मजाक उड़ाएगा, अपना कंटेंट निकालेगा। मगर, हमें आभासी दुनिया से निकलकर वास्तविकता में ये नहीं भूलना है कि अपराधियों का कोई जेंडर नहीं होता।

इन मामलों में महिलाएँ भले अपराधी हैं लेकिन इसका ये अर्थ नहीं इससे हर महिला को संदेह की दृष्टि से देखा जाए। ऐसा करके हम सिर्फ उस सच से आँख मूंद रहे हैं जहाँ महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध अब भी चिंता का विषय होने चाहिए। महिलाओं के खिलाफ दुष्प्रचार करने से पहले ये याद रखने की जरूरत है कि आज भी महिलाओं के साथ रोजाना बलात्कार, यौन शोषण और मारपीट की खबरें आती हैं।

हाल ही में उत्तर प्रदेश के वाराणसी में ग्रेजुएशन की छात्रा के साथ लगातार सात दिन तक 23 लोगों ने सामूहिक दुष्कर्म का मामला झकझोरने वाला है। तो क्या अब ये कहा जाए कि अपराध सिर्फ महिला के साथ होता है। नहीं बल्कि अपराधी की मानसिकता एक समान होती है। सौरभ की हत्या का मुद्दा मज़ाक बना लेकिन पुरुष है इसीलिए मज़ाक बनाया जाए। ये भी गलत है।

अगर हम सोशल मीडिया पर ऐसा माहौल बनाएँगे तो जाहिर हैं लोगों की संवेदनाएँ अस मुद्दों को लेकर खत्म होती जाएँगी। लोग अपराध को एक मजाक समझेंगे और पीड़ित को सिर्फ तमाशा।