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‘कुरान में बलात्कार से बड़ा गुनाह मूर्तिपूजा’: तथ्य जाँचने की बजाय चरित्र हनन पर उतरा ALTNews वाला जुबैर, जाकिर नाइक भी कर चुका है पुष्टि

ALTNews से जुड़े संदिग्ध फैक्ट-चेकर मोहम्मद जुबैर एक बार फिर दुष्प्रचार के अपने उस काम में जुट गया है, जिसमें उसे महारत हासिल है। अक्सर देखने में आया है कि इस्लाम से जुड़ी बातों की तार्किक व्याख्या करने वालों को जुबैर ने निशाना बनाकर उन्हें खारिज करने काम किया है। उसकी ऐसी गतिविधियों में एक स्पष्ट रुझान यह भी देखने को मिला है कि इस्लाम को असहज करने वाले पहलू उसे बहुत चुभते हैं और ऐसा करने वालों के खिलाफ अभियान चलाने में उसकी तरफ से कोई देरी नहीं होती।

हाल का मामला एहसान नाम के एक व्यक्ति से जुड़ा है। एहसान जैसे लोग जिन समस्याओं को उजागर करते हैं, जुबैर सरीखे लोग उन समस्याओं का समाधान करने के बजाय उलटे झुंड बनाकर मुद्दा उठाने वाले व्यक्ति के पीछे पड़ जाते हैं। जुबैर ने 21 अप्रैल को अपने ट्वीट के जरिए अपनी इसी आदत का परिचय दिया।

कुरान कंठस्थ करने वाले एहसान ने एक वीडियो बाइट में यह बताया कि इस्लाम में मूर्ति पूजा को बलात्कार से भी बड़ा अपराध माना गया है। उसने कहा कि अल्लाह की नजर में बलात्कार को माफ किया जा सकता है, लेकिन शिर्क यानी मूर्ति पूजा को कतई नहीं।

एहसान ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “अगर एक तरफ मूर्ति पूजा हो रही है और दूसरी तरह बलात्कार हो रहा हो तो इस्लाम के अनुसार इसमें मूर्ति पूजा कहीं बड़ा पाप है। इसका कारण यही है कि अल्लाह हर किसी बात को माफ कर सकते हैं, लेकिन शिर्क को नहीं।’

एहसान ने इस सोच के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई। उनकी यह आवाज इस्लाम से जुड़े असहज पहलुओं के प्रति व्यापक जागरूकता का प्रसार करते हुए उसकी वास्तविक तस्वीर सामने रखती है जो पहलू 21वीं सदी वाले समाज के साथ ताल नहीं मिलाते। ऐसे में जुबैर सरीखे लोगों को ऐसी व्याख्या का नागवार गुजरना बहुत स्वाभाविक है और उनके भीतर का कट्टर इस्लामी सक्रिय हो जाता है।

इसे मद्देनजर रखते हुए जुबैर ने एहसान और उनकी आस्था को खारिज करने में जरा भी देरी नहीं की। उन्हें खारिज करने के लिए इस संदिग्ध फैक्ट-चेकर ने एहसान और उनके साथी सलीम की मंशा पर सवाल उठाते हुए उन्हें ‘एक्स-मुस्लिम’ तक करार दे दिया। हालाँकि, इस कवायद में उन्होंने इस्लाम में मूर्ति पूजा और बलात्कार से जुड़े तथ्यों की पड़ताल करना गवारा नहीं समझा।

जुबैर ने एहसान के बयान की फैक्ट-चेकिंग करने के बजाय उन्हें व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाया। जबकि यह स्पष्ट है कि एहसान ने वही बात कही, जिसका इस्लामिक मान्यताओं में उल्लेख है।

‘इस्लाम में रेप माफी के लायक, मूर्ति पूजा इससे बड़ा गुनाहः’ उलेमा

इस्लामिक कट्टरपंथी जाकिर नाइक भी अतीत में यह कह चुका है कि अल्लाह की निगाह में बलात्कार और हत्या को माफ किया जा सकता है। उसका यही कहना था, “अगर किसी ने बलात्कार किया है जो कि एक बड़ा अपराध है और किसी ने हत्या की है जो खुद एक बड़ा पाप है, लेकिन अगर किसी ने उसके लिए दिल से तौबा कर ली तो अल्लाह उसे माफ कर सकते हैं।” नाइक ने आगे यही कहा, “ऐसे मामलों को लेकर अल्लाह बहुत दयालु हैं। इस्लामिक दीनी तालीम के अनुसार, इसका दारोमदार लड़की पर है कि वह शालीन कपड़े पहने अन्यथा बलात्कार का दोषी उसे ही ठहराया जाएगा।”

जाकिर नाइक ने स्पष्ट कहा था, “अगर उसने भड़काऊ कपड़े पहने तो बलात्कार होने पर वही जिम्मेदार मानी जाएगी। लेकिन यदि उसने सामान्य कपड़े पहने हैं और फिर भी कोई व्यक्ति बलात्कार करता है तो यह लड़की के लिए परीक्षा की घड़ी है।”

वहीं, शिकागो में रहने वाले एक इस्लामी कट्टरपंथी यासिर नदीम अल वजीदी ने भी पिछले महीने अपने यूट्यूब चैनल पर स्पष्ट किया है कि शिर्क बलात्कार से भी घिनौना पाप है। उसके 3.5 लाख फॉलोअर्स हैं और वो ‘एक्स-मुस्लिम’ नहीं हैं। यही तर्क मोहम्मद जुबैर ने एहसान के बयानों को गलत साबित करने के लिए इस्तेमाल किया। यह फिर से दिखाता है कि जुबैर ने एहसान की ‘फैक्ट-चेक’ क्यों नहीं की, क्योंकि एहसान सही थे।

मौलवियों के अनुसार, ये एक अलग बहस का मुद्दा है कि एक महिला का बलात्कार हुआ है या नहीं , इस बात को साबित करने की जिम्मेदारी भी पीड़िता पर ही होती है। उसे कई गवाहों की जरूरत होती है। इससे पुरुषों के लिए इस गुनाह से बच निकलना आसान हो जाता है।

मौलवी ये भी कहते हैं कि इस बात को भूलना नहीं चाहिए कि इस तरह के जघन्य अपराधों के लिए दिल से तौबा करने पर माफी भी मिल सकती है क्योंकि रेपिस्ट और रेप पीड़ित दोनों के लिए जीवन एक ‘इम्तेहान’ है।

इस्लाम में मूर्ति की पूजा को जघन्य अपराधों से भी बड़ा गुनाह मानने वाले तथ्य को कुरान की आयत 4:48 में बताया गया है- “वास्तव में, अल्लाह अपनी इबादत में किसी और के साथ जोड़ने की माफी नहीं देता, लेकिन वह जिसे चाहे उसे माफ कर सकता है। और अल्लाह के साथ किसी और की इबादत करना वास्तव में सबसे बड़ा गुनाह करना है।”

इस्लाम की खामियों को छुपाने के लिए व्यक्तिगत हमले करने वाला जुबैर और उसके कुतर्क

ये पहली दफा नहीं है जब ‘ऑल्ट न्यूज’ वाले मोहम्मद जुबैर ने इस्लाम की आलोचना करने पर किसी व्यक्ति विशेष को निशाना बनाया हो और अपना इस्लामोफोबिया वाला कार्ड खेला हो। ये अब उसके काम करने का तरीका हो चुका है। जुबैर तथ्यों पर बात नहीं करता। वो लोगों के चरित्र हनन करने का प्रयास करता है।

नुपूर शर्मा का मामला यदि याद हो तो वहाँ भी जुबैर ने यही किया था। ‘टाइम्स नाऊ’ पर डिबेट के दौरान पूर्व भाजपा प्रवक्ता ने जो कुछ भी कहा था उसे पहले कई इस्लामी स्कॉलर्स अपनी बातों में दोहरा चुके थे। मगर, जुबैर ने जानकर निशाना नुपूर शर्मा को बताया। अब वो यही हथकंडे एहसान पर आजमा रहा है।

ये उनलोगों को चुन-चुनकर निशाना बनाता है जो उसके मजहब की खामियों को पहचानते हैं और उनकी आलोचना करते हैं। उसे उन मुस्लिमों को निशाना बनाना भी अच्छा लगता है जो कट्टरपंथी विचारधारा के नहीं हैं। कई बार अपने मजहब पर सवाल उठाने वालों को वो ‘सरकारी मुसलमान’ कह देता है।

चिंताजनक बात ये है कि जुबैर ने इस बार एहसान की जान को खतरे में डालने का प्रयास किया है। उसने एहसान को कट्टपंथियों की फितरत जानते हुए ‘एक्स मुस्लिम’ लिखा है, जो मजहब छोड़ने वाले के लिए सिर्फ मौत ही सही सजा समझते हैं।

(इस खबर को मूल रूप में अंग्रेजी में लिखा गया था, जिसे इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ा जा सकता है।)

कुणाल की हत्या मामले में दिल्ली पुलिस ने 9 को पकड़ा, उत्तराखंड के रास्ते भाग रहे थे नेपाल: लेडी डॉन जिकरा बोली- मेरा नहीं कोई रोल

दिल्ली में हिन्दू लड़के कुणाल की हत्या मामले में गिरफ्तार जिकरा अब बचने का प्रयास कर रही है। उसने इस हत्या में किसी भी तरह की मौजूदगी से इनकार किया है। जिकरा का दावा है कि उसे गलत तरीके से फँसाया जा रहा है। वहीं कोर्ट ने उसे अब 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है।

अदालत ले जाते समय उसने कहा, “मैंने कुणाल को नहीं मारा। मुझे बेवजह फँसाया जा रहा है।” जिकरा के भाई साहिल को दो दिन की पुलिस रिमांड में भेजा गया है। साहिल से पुलिस अब कुणाल की हत्या के बारे में पूछताछ करेगी। साहिल इस हत्या का मुख्य आरोपित है।

दिल्ली पुलिस ने कुणाल की हत्या के सिलसिले में अब तक नौ लोगों को गिरफ्तार किया है, जिनमें दो नाबालिग भी शामिल हैं। हिरासत में लिए गए लोगों में 18 वर्षीय साहिल भी शामिल है, जिसकी पहचान मुख्य आरोपित के रूप में हुई है। अधिकारियों ने खुलासा किया कि कई संदिग्ध उत्तराखंड के रास्ते नेपाल भागने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन उन्हें सीमा पर ही पकड़ लिया गया।

इस मामले में ज़िकरा का इनकार और नौ लोगों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस अब आगे की जाँच में जुट गई है ताकि हत्या के पीछे के असली मकसद और ज़िकरा की संलिप्तता की पूरी सच्चाई सामने आ सके। यह भी पता है कि ज़िकरा का दो साल का बच्चा है और वो कथित तौर पर अपने पति से अलग रहती है।

उसे पहले भी सोशल मीडिया पर हथियार लहराते हुए वीडियो पोस्ट करने के आरोप में शस्त्र अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया गया था। गौरलतब है कि 16 अप्रैल, 2025 को घर से बाहर दूध लेने के लिए निकले कुणाल की हत्या चाकुओं से गोद कर दी गई थी। इसके बाद सीलमपुर में काफी विरोध प्रदर्शन भी हुए थे।

लोगों ने आरोप लगाया था कि यहाँ हिन्दुओं का जीना मुहाल है। अब इस मामले में जाँच और कार्रवाई चल रही है। पुलिस की पूछताछ में जिकरा ने बताया था कि उसके भाई साहिल पर दीवाली के समय हमला हुआ था। इसी हमले का बदला लेने के लिए कुणाल की हत्या कर दी गई।

जगदीप धनखड़ ‘कु*#%’, हामिद अंसारी ‘संविधान के रक्षक’: TOI से लेकर The Wire तक पड़े उप-राष्ट्रपति के पीछे, जब आया महाभियोग तब कहाँ गई थी ये चिंता?

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक जज हैं – यशवंत वर्मा। कुछ ही दोनों पहले तक वो दिल्ली उच्च न्यायालय के जज हुआ करते थे। एक घटना के बाद उन्हें इलाहाबाद हाईकोर्ट भेज दिया गया। सोचिए, कितनी बड़ी ‘सज़ा’ है ये। ख़ैर, ‘सज़ा’ की तो हम बात करेंगे ही, लेकिन उससे पहले इस घटना के बारे में जान लेते हैं। वो घटना, जिसका जिक्र उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने गुरुवार (17 अप्रैल, 2025) को राज्यसभा की इंटर्नशिप प्रोग्राम के विदाई भाषण में किया। उनके इस भाषण से एक गिरोह विशेष को विशेष मिर्ची लगी हुई है।

जस्टिस यशवंत वर्मा और घर में करोड़ों रुपए कैश: क्या हैं सवाल

14-15 मार्च की रात में जस्टिस यशवंत वर्मा के घर में आग लग जाती है। दमकल विभाग को आग बुझाने के लिए बुलाया जाता है। उस समय जज और उनकी पत्नी घर पर नहीं होते हैं। घर में से बड़ी मात्रा में कैश बरामद होता है। दिल्ली पुलिस को बुलाया जाता है। न FIR होती है, न ज़ब्ती की कार्रवाई। ऊपर से पुलिसकर्मियों ने इस घटना का जो वीडियो बनाया था, उसे भी डिलीट करवा दिया जाता है। बाद में सफ़ाई दी जाती है कि वीडियो ग़लत हाथों में न पड़े, इसीलिए ऐसा किया गया।

जहाँ तक FIR की बात है, उस संबंध में ख़ुद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का बयान आता है कि बिना मुख्य न्यायाधीश की अनुमति के हाईकोर्ट के जज पर एक अदद FIR तक नहीं की जा सकती। हाँ, CJI ज़रूर एक आंतरिक जाँच समिति बनाते हैं। जज यशवंत वर्मा ने ये कहकर पल्ला झाड़ लिया कि ये एकदम बेहूदा व अविश्वसनीय तर्क है कि वो स्टोररूम में इस तरह से कैश रखेंगे, जो उनके घर से अलग हटकर है। उनका कहना है कि उनके या उनके परिवार वालों को इसका कुछ अता-पता ही नहीं था।

सवाल तो कई हैं, उन्हीं सवालों पर बात करने को तो ‘न्यायपालिका पर हमला’ बताया जा रहा है। आख़िर स्टोररूम घर से बाहर हो या भीतर, था तो जज के परिवार के स्वामित्व में ही न? अगर उनके या उनके परिजनों ने नहीं, तो करोड़ों रुपए कैश कहाँ से आ गए? कैश मिलने न सही, आग लगने की घटना की जाँच के लिए भी कोई FIR दर्ज क्यों नहीं हुई? घटनास्थल को सील क्यों नहीं किया गया, जली हुई चीजें किसने हटाईं और कहाँ डालीं? इस घटना को मीडिया में आने में एक सप्ताह क्यों लग गए?

उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने क्या ग़लत कहा?

बार-बार ‘क़ानून का राज’ की बात की जाती है। अगर इस मामले में एक जज की भागीदारी नहीं रहती, तो कार्रवाई भी अलग तरीके से होती। यही तो कहा उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने – ‘क़ानून का राज’ होता तो स्थिति अलग होती। उन्होंने कहा कि भले ही पिटारे में कीड़े दबे हों या फिर अलमारी में कंकाल पड़े हों, समय आ गया है कि ढक्कन खोला जाए और अलमारी के दरवाजे खोल जाएँ। क्यों? ताकि ये कीड़े व कंकाल बाहर आ सकें, ताकि जनता देख सके कि अंदर क्या दबा था, ताकि इन सबकी पहचान करके सफ़ाई की जाए।

भारत में थप्पड़ मारने से लेकर नरसंहार तक के मामले में सबसे पहले FIR दर्ज की जाती है। इसका नाम ही है – फर्स्ट इन्फॉर्मेशन रिपोर्ट। फर्स्ट, यानी हर अपराध या संभावित अपराध के मामले में पहली कार्रवाई। जब FIR ही नहीं हुई तो जाँच क्या होगी, और यही तो है जिसे लेकर उप-राष्ट्रपति ने चिंता ज़ाहिर की। उनका कहना है कि उनपर भी FIR दर्ज की जा सकती है, लेकिन जजों पर बिना न्यायपालिका के अनुमोदन के नहीं। ये छूट क्यों? जगदीप धनखड़ का सिर्फ़ इतना पूछना था कि किसी सामान्य व्यक्ति के घर में ऐसा हुआ होता तो?

तो कार्रवाई की प्रक्रिया रॉकेट की गाड़ी से उड़ती, लेकिन अब ये बैलगाड़ी से भी सुस्त चल रही है। उनका एक और तर्क है – जाँच का अधिकार कार्यपालिका का है, फिर जाँच न्यायिक तंत्र ही क्यों कर रहा है? न्यायिक समितियाँ तो सिफ़ारिश ही करती रही हैं न, फिर इसे जाँच क्यों समझा जाए? उन्होंने एक हालिया सर्वेक्षण की भी बात की, जिसमें पाया गया कि न्यायपालिका के लिए जनता में विश्वास कम हो रहा है। आख़िर है तो ये ‘लोकतंत्र’ ही न, जनता क्या सोचती है – यानी ‘लोक’ की राय मायने रखनी चाहिए लोकतंत्र में।

उन्होंने बाबासाहब डॉ भीमराव आंबेडकर को उद्धृत करते हुए कहा कि वो मुख्य न्यायाधीश को जजों की नियुक्ति के संबंध में वीटो देने के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने ये भी आरोप लगाया कि 1993 में सुप्रीम कोर्ट ने ‘परामर्श’ शब्द को ‘सहमति’ पढ़ने का आदेश दिया जिस कारण CJI की सहमति ज़रूरी हो गई जजों की नियुक्ति के मामले में। ये मामला अनुच्छेद-124 से जुड़ा है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था की गई है। उन्होंने नसीहत दी कि संसद क़ानून बनाए और न्यायपालिका फ़ैसले सुनाए, एक-दूसरे के अधिकारों का अतिक्रमण न हो।

इस दौरान उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने 1973 के केशवानंद भारती केस के फ़ैसले की बात की, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने ‘बेसिक स्ट्रक्चर डॉक्ट्रिन’ तय करके संविधान के मूलभूत प्रावधानों में संशोधन से संसद को रोक दिया था, लेकिन इसके 2 साल बाद ही एक प्रधानमंत्री अपनी कुर्सी बचाने के लिए देश में आपातकाल लगा देती है। उन्होंने हाल ही में एक जज द्वारा ‘बेसिक स्ट्रक्चर’ नामक पुस्तक के लॉन्च का जिक्र करते हुए ये इतिहास याद किया और बताया कि कैसे आपातकाल के दौरान लाखों लोगों को जेल में ठूँस दिया गया था।

उनका कहना था कि उक्त जज से सवाल पूछा जाना चाहिए था कि 1975 में उस बुनियादी ढाँचे का क्या हुआ था, जब 1984 में सिख नरसंहार हुआ तब उस बुनियादी ढाँचे का क्या हुआ था। उनका इशारा रिटायर्ड जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन की तरफ था। सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति के लिए बिलों पर साइन करने हेतु डेडलाइन तय कर दी, इसे भी उप-राष्ट्रपति ने विधायिका के कार्य में हस्तक्षेप बताया। कारण – संसद का अर्थ सिर्फ़ लोकसभा और राज्यसभा नहीं है, बल्कि राष्ट्रपति ही इसका पहला हिस्सा हैं।

उन्होंने इस दौरान अनुच्छेद-142 पर भी हमला बोला, जिसके तहत सुप्रीम कोर्ट को अपने यहाँ लंबित किसी भी मामले में ‘पूर्ण आदेश’ सुनाने का अधिकार है। लेकिन, जगदीप धनखड़ का मानना है कि ये लोकतंत्र पर हमले का एक परमाणु मिसाइल बना दिया गया है। जगदीप धनखड़ ये भी बताना नहीं भूले कि उन्होंने अपने 4 दशक न्यायपालिका को दिए हैं, इनमें से तीन दशक वो वरिष्ठ अधिवक्ता रहे हैं। वो न्यायपालिका के ही सिपाही हैं। बड़ी बात ये है कि जहाँ उनके विचारों पर मंथन होना चाहिए था, वहाँ उन्हें निशाना बनाया जाने लगा।

TOI के लिए उप-राष्ट्रपति पद की कोई महत्ता नहीं, बयान ध्यान देने योग्य नहीं

देश के सबसे पुराने अख़बारों में से एक ‘टाइम ऑफ इंडिया’ (TOI) ने जगदीप धनखड़ के बयान की आलोचना करते हुए एक संपादकीय छापा। इसमें इस बयान को रेखा लाँघने के समान बताया गया। साथ ही ‘ज्ञान’ दिया गया कि औपचारिक पदों पर बैठे व्यक्तियों से जिस शिष्टाचार की अपेक्षा की जाती है, ये बयान उससे बहुत आगे निकल गया। इसे बेहद की खेदजनक करार दिया गया। इसमें उप-राष्ट्रपति पद की महत्ता को कम करते हुए बताया गया कि नीति-निर्माण में उनकी कोई भूमिका नहीं होती। साथ ही पाठकों को कहा गया कि उप-राष्ट्रपति के बयानों से कोई असर नहीं पड़ने वाला है, इन्हें नज़रअंदाज़ किया जा सकता है।

TOI ने कई राज्यपालों पर नेताओं की तरह व्यवहार करने का आरोप लगाते हुए जगदीप धनखड़ को उनके पश्चिम बंगाल के कार्यकाल की याद दिलाई। पहली बात, अगर उप-राष्ट्रपति का पद केवल ‘Ceremonial’ है, तो भी क्या सार्वजनिक विमर्श में उनके योगदान को महत्ता नहीं दी जानी चाहिए? राज्यसभा के सभापति के रूप में वो प्रतिदिन नीति-निर्माण व इसके लिए होने वाले बहसों का हिस्सा बनते हैं, बहस को पूर्ण कराने की ज़िम्मेदारी ही उनकी होती है – ऐसे में उनके किरदार को कैसे नकारा जा सकता है, उनकी राय को खारिज कैसे किया जा सकता है?

राज्यसभा में संवैधानिक प्रक्रियाओं का पालन कराना उनका कर्तव्य है, इसीलिए संवैधानिक मुद्दों पर संतुलन की बात करना उनका अधिकार है। इसीलिए, वो ‘सीमा से बाहर’ नहीं जा रहे। TOI इस दौरान उनके द्वारा उठाई गई चिंताओं को पूरी तरह नकार गया। न्यायपालिका की पारदर्शिता ज़रूरी है, जनता का विश्वास न्यायपालिका में बने रहना ज़रूरी है। हर व्यवस्था सुधार के दौर से गुजरती है समय के साथ, फिर न्यायपालिका को विशेष छूट क्यों? जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया और आपराधिक मामलों में स्वतंत्र जाँच की प्रक्रिया तय क़ानून के तहत होनी चाहिए।

ये भी देखिए कि उप-राष्ट्रपति ने ये बयान कहाँ दिया, युवाओं के बीच, छात्र-छात्राओं के बीच। शैक्षणिक हिसाब से भी देखें तो युवाओं को संवैधानिक संतुलन के बारे में बताना आवश्यक है, अगर किसी संस्था में समस्याएँ नज़र आ रही हैं तो चिंतन, अध्ययन व विमर्श के लिए उन्हें सूचनाओं से अवगत कराया जाना चाहिए, क्योंकि बाद में यही युवा देश के नीति-निर्माता बनेंगे। उप-राष्ट्रपति के बयान को इस संदर्भ में लीजिए कि संसद और पुलिस की तरह न्यायपालिका भी अंततः जनता के प्रति ही जिम्मेदार है। एक नागरिक के रूप में और उप-राष्ट्रपति व राज्यसभा के सभापति के रूप में भी, जगदीप धनखड़ को समस्याओं और समाधान की बात करने का पूरा अधिकार है। उनके क़ानूनी अनुभव को देखते हुए भी उन्हें सुना जाना चाहिए।

The Wire ने उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ को कहा ‘कुत्ता’

अमेरिकी नागरिक सिद्धार्थ वरदराजन द्वारा संचालित ‘The Wire’ ने उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के लिए ‘कुत्ता’ शब्द तक का इस्तेमाल कर दिया। ‘लोकतंत्र को लहूलुहान करने वाला हमलावर कुत्ता’ – संवैधानिक पद पर बैठे एक व्यक्ति के लिए इस तरह की शब्दावली का इस्तेमाल किया गया। जब 2018 में सुप्रीम कोर्ट के 4 बड़े जजों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सरकार पर खुलेआम हमला बोला था, उस समय क्या ‘द वायर’ ने उनके लिए इस तरह की शब्दावली का इस्तेमाल किया? ‘द वायर’ का कहना है कि अनुच्छेद-142 सेफ्टी वॉल्व है। जो बातें उप-राष्ट्रपति ने कही, उन चिंताओं को तो कई पूर्व जज भी उठा चुके हैं।

सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज रुमा लाल ने कई बार न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने की वकालत की है। उनका कहना है कि ऊपरी न्यायालयों में कॉलेजियम व्यवस्था पारदर्शिता का उल्लंघन है। 2011 में एक लेक्चर में उन्होंने न्यायपालिका में भ्रष्टाचार, जवाबदेही से छूट जजों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर सवाल खड़े किए थे। इसी तरह पूर्व मुख्य न्यायाधीश JS वर्मा ने न्यायपालिका को RTI (सूचना का अधिकार) क़ानून के तहत लेन की वकालत की थी। उनका तो ये तक मानना था की न्यायिक नियुक्तियों को भी सार्वजनिक स्क्रूटनी के लिए खुले में आना चाहिए।

इसी तरह भारत के राष्ट्रपति रहे प्रणब मुखर्जी, जो संविधान के भी जानकार थे – उनका भी मानना था कि ‘न्यायिक एक्टिविज्म’ पर रोक लगनी चाहिए। उन्होंने चेताया था कि न्यायपालिका को अपनी सीमाएँ लाँघकर कार्यपालिका और विधायिका का काम नहीं करना चाहिए। उन्होंने नसीहत दी थी कि PIL याचिकाओं को संसद के अधिकारों एवं शक्तियों को अपने हाथ में लेने का जरिया नहीं बनाया जाना चाहिए। उन्होंने न्यायपालिका को आत्म-संयम और आत्म-अनुशासन की सलाह देते हुए कहा था कि उसे ख़ुद की ही शक्तियों की सीमाओं की जाँच करती रहनी चाहिए। अब बताइए, क्या जीवन भर कॉन्ग्रेस में रहे प्रणब मुखर्जी को भी The Wire गाली देगा?

आज न्यायपालिका की स्वतंत्रता की बातें की जा रही हैं, लेकिन तब कहाँ था The Wire जब जस्टिस दीपक मिश्रा के ख़िलाफ़ संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था? तब एक उप-राष्ट्रपति के पद पर बैठे व्यक्ति वेंकैया नायडू ने ही इसे ख़ारिज किया था। तब यही कपिल सिब्बल मोशन लाने वालों में शामिल थे, जो आज सुप्रीम कोर्ट की शुचिता की क़समें खा रहे हैं। तब यही कपिल सिब्बल न्यायपालिका को जनता का विश्वास न खोने की सलाह दे रहे थे। राम मंदिर पर निर्णय के बाद असदुद्दीन ओवैसी समेत तमाम इस्लामी शख्शियतों ने सुप्रीम कोर्ट को निशाना बनाया, तब The Wire भी उसमें शामिल था।

हामिद अंसारी का नाम आते पवित्र हो जाता है उप-राष्ट्रपति का पद

और हाँ, 10 वर्षों तक भारत के उप-राष्ट्रपति रहे हामिद अंसारी की जब बात होती है तब गिरोह विशेष के लिए ये पद अचानक से इतना पवित्र हो जाता है कि पूछिए मत। हामिद अंसारी पर पद के दुरुपयोग के एक नहीं बल्कि कई आरोप लग चुके हैं। ISRO के वैज्ञानिक नंबी नारायणन का करियर बर्बाद किए जाने की साज़िश में भी उनका नाम जुड़ा था। विधायक सुशील सिंह ने आरोप लगाया था कि मुख़्तार अंसारी के कहने पर हामिद अंसारी ने तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार से उनके पूरे परिवार पर मकोका लगवा दिया था। हामिद अंसारी पर मुख़्तार को संरक्षण देने के आरोप लगे।

पाकिस्तान के पत्रकार नुसरत मिर्जा ने खुद एक इंटरव्यू में खुलासा किया था कि 2005 से 2011 के बीच हामिद अंसारी ने उसे निमंत्रण देकर भारत बुलाया और कई सारी खुफिया जानकारियाँ उसके साथ साझा की। तब वो जामा मस्जिद के इमाम से भी मिला था। कभी तिरंगे को सलामी नहीं दी, कभी पहले ‘योग दिवस’ कार्यक्रम से नदारद रहे तो कभी रॉ के नेटवर्क को उजागर करने के आरोप लगे – लेकिन, गैंग के पत्रकारों ने हमेशा हामिद अंसारी का बचाव किया। प्रधानमंत्री के विशेष सलाकार दीपक वोहरा ही उन्हें ‘विश्वासघाती’ कह चुके हैं।

ये वही हामिद अंसारी हैं जिन्होंने 10 वर्ष तक इतने बड़े पद पर रहने के बाद अचानक से लगने लगा था कि भारत में मुस्लिम सुरक्षित नहीं हैं। पत्रकार अमन चोपड़ा ने कठिन सवाल पूछे तो वो इंटरव्यू से भाग खड़े हुए। इतने आरोपों के बावजूद अरफ़ा खानम शेरवानी के लिए हामिद अंसारी ‘संविधान के रक्षक’ हैं, वो अचानक से उनके 50 वर्षों के करियर और उनके पूर्वजों की महानता के बारे में बात करने लगती हैं। अब क्या हो गया? जगदीप धनखड़ अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के सदस्य रहे हैं, उनके करियर पर बात नहीं करेंगे ये लोग? ‘किसान पुत्र’ से ये कैसी एलर्जी?

8 धमाके, 279 मौतें, 500+ घायल और 2 हजार मुस्लिम गिरफ्तार: ISIS ने जब ईस्टर का दिन चुनकर दहलाया पूरा श्रीलंका, बुर्के तक पर देश ने लगा दिया था प्रतिबंध

21 अप्रैल, 2019 को ईस्टर त्यौहार के दिन श्रीलंका में हुए सिलसिलेवार आतंकी हमलों ने देश को हिलाकर रख दिया था। इस्लामिक स्टेट (ISIS) से जुड़े आत्मघाती हमलावरों ने कोलंबो में तीन चर्चों और तीन आलीशान होटलों को निशाना बनाया, इस दौरान 8 धमाके हुए थे जिसमें 279 लोग मारे गए थे। इस आतंकी हमले का शिकार होने वाले 11 लोग भारतीय थे। कुल 45 विदेशी इस हमले में मारे गए थे। हमले में घायल होने वालों की संख्या लगभग 500 थी।

श्रीलंकाई सरकार के अनुसार, इन हमलों को नेशनल तौहीद जमात (NTJ) नामक स्थानीय आतंकवादी समूह से जुड़े श्रीलंकाई नागरिकों ने अंजाम दिया था। प्रारंभिक जाँच में क्राइस्टचर्च में मुस्लिमों पर हुए हमले के प्रतिशोध के रूप में इसे पाया गया। ISIS ने भी इन हमलों की जिम्मेदारी ली थी।

10 दिन पहले मिली थी हमलों की जानकारी

सबसे चिंताजनक पहलू यह था कि सुरक्षा एजेंसियों को हमलों से दस दिन पहले ही इस्लामी समूह से चर्चों पर खतरे की खुफिया जानकारी मिल गई थी, लेकिन इस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। सितंबर 2018 में कोयंबटूर में पकड़े गए 7 ISIS आतंकवादियों के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में NIA को आत्मघाती हमलावरों में से एक जहरान हाशिम की कई रिकॉर्डिंग मिली थीं।

जब यह पता चला कि अधिकारियों ने महीने के शुरू में योजनाबद्ध हमलों के बारे में भारतीय खुफिया चेतावनी को ढंग से नहीं लिया था, तो सरकार ने भी अपनी गलती मानी थी। प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने इस बात पर जोर दिया कि न तो उन्हें और न ही उनके मंत्रिमंडल के सदस्यों को चेतावनी के संबंध में कोई सूचना मिली थी।

2 हजार से अधिक मुस्लिम किए गए थे गिरफ्तार

हमलों के बाद, श्रीलंकाई सरकार ने सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए थे। हमले के बाद आपातकाल लागू किया गया था। इसके बाद NTJ पर प्रतिबंध भी लगाया था। श्रीलंकाई सुरक्षा एजेंसियों ने इसके बाद 2,000 से अधिक मुस्लिम पकडे गए थे। हालाँकि, इन कार्रवाइयों की मानवाधिकार संगठनों ने आलोचना की। सरकार ने बुर्का पर प्रतिबंध लगाने और कई अपंजीकृत इस्लामी स्कूलों को बंद करने जैसे फैसले भी लिए, जिन्हें बाद में वापस ले लिया गया।

नकाब पर प्रतिबंध

राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए नकाब पर भी बैन लगाया गया था। लेकिन 2019 में इसे फिर से हटा दिया गया था। इसके बाद मुस्लिम महिला शिक्षकों के ड्रेस कोड के साथ कई ऐसे नियम लागू हुए, जिस पर हँगामा मचा और उन्हें भी वापस ले लिया गया था।

2024 में कैथोलिक चर्च ने ईस्टर रविवार के पीड़ितों को संत घोषित करने का फैसला किया। पीड़ितों के लिए न्याय की माँग करते हुए, कोलंबो के आर्कबिशप कार्डिनल मैल्कम रंजीत ने हमलों की अंतरराष्ट्रीय जाँच की माँग की है।

निशाने पर थे भाजपा सरकार के हिंदू नेता

गुजरात एटीएस ने 20 मई 2024 को अहमदाबाद हवाई अड्डे पर चार श्रीलंकाई नागरिकों को ISIS आतंकवादी होने के संदेह में गिरफ्तार किया। इन आतंकियों का सीधा कनेक्शन ISIS प्रमुख ‘अबू’ से था, जिनके पास से भरी पिस्तौलें और ISIS का झंडा बरामद किया गया था। ये आतंकवादी भाजपा और RSS नेताओं पर हमला करने की साजिश रच रहे थे।

41 श्रीलंकाई नागरिक ISIS में शामिल होने सीरिया पहुँचे

भारत के सुरक्षा अधिकारियों ने श्रीलंका में हुए हमलों, दक्षिण एशिया में ISIS की उपस्थिति और उसके बढ़ते खतरे को उजागर किया है। अनुमान है कि 41 श्रीलंकाई नागरिक ISIS में शामिल होने के लिए सीरिया गए थे। साल 2014 में NIA को सूचना मिली थी कि 100 भारतीय नागरिक ISIS में शामिल होने के लिए सीरिया गए है। जिसमें से ज्यादातर केरल के रहने थे।

भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान जैसे कट्टरपंथी इस्लामी देशों के पास में स्थित है। भारत पर ISIS का खतरा सबसे ज्यादा है। आतंकवाद को लेकर उसके पड़ोसियों का रवैया खराब होने के चलते उसे और भी समस्या हो रही है। भारत सरकार के लिए अपनी सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों के बीच सहयोग इसलिए भी बढ़ाना चाहिए, क्योंकि क्षेत्रीय आतंकवाद विरोधी सहयोग में कहीं ना कहीं कमी है।

यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में रुकमा राठौर ने लिखी है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

ब्राह्मणों पर मू#ने की बात करने वाले अनुराग कश्यप को आ गई अक़्ल? अब माँग रहे ‘दिल से माफ़ी’, कहा – गुस्से में भूल गया था मर्यादा, मेरा परिवार भी आहत

ब्राह्मणों पर पेशाब करने का ऐलान करने वाले अनुराग कश्यप ने अब माफ़ी माँग ली है। अनुराग कश्यप ने इंस्टाग्राम पर अपने एक कमेंट में लिखा था, “ब्राह्मणों पर मु%गा।” इसके बाद से लगातार उनका विरोध हो रहा था। यहाँ तक कि माफ़ी माँगने से इनकार करते हुए अनुराग कश्यप ने उलटा अपने बयान का बचाव किया था। लेकिन, मंगलवार (22 अप्रैल, 2025) को ‘X’ पर एक पोस्ट में उन्होंने माफ़ी माँग ली। ‘देव डी’ (2009) और ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ (2012) जैसी फ़िल्में बना चुके अनुराग कश्यप ने कहा कि वो गुस्से में किसी को जवाब देने में अपनी मर्यादा भूल गए थे और इसी कारण पूरे ब्राह्मण समाज को बुरा बोल डाला।

अनुराग कश्यप ने लिखा, “वो समाज जिसके तमाम लोग मेरी ज़िंदगी में रहे हैं, आज भी हैं और बहुत कंट्रीब्यूट करते हैं – आज वो सब मुझसे आहत हैं। मेरा परिवार मुझसे आहत है। बहुत सारे बुद्धिजीवी, जिनकी मैं इज्जत करता हूँ, मेरे उस गुस्से में मेरे बोलने के तरीके से आहत हैं। मैंने ख़ुद ही ऐसी बात करके, अपनी ही बात को मुद्दे से भटका दिया। मैं तहे दिल से माफी माँगता हूँ – इस समाज से जिनको मैं ये नहीं कहना चाह रहा था, लेकिन आवेश में किसी की घटिया टिप्पणी का जवाब देते हुए लिख दिया।”

अनुराग कश्यप ने अपनी ख़ुद ही अपने द्वारा इस्तेमाल की गई भाषा को अभद्र करार देते हुए कहा कि वो अपने तमाम सहयोगियों, दोस्तों, परिवार और समाज से माफ़ी माँगते हैं। साथ ही उन्होंने आश्वासन दिया कि वो आगे इसपर काम करेंगे ताकि अबसे ऐसा न हो। उन्होंने मुद्दे की बात करने व सही शब्दों का इस्तेमाल करने का भी वादा किया। अनुराग कश्यप ने आशा जताई कि सब लोग उन्हें माफ़ कर देंगे। अनुराग कश्यप ने इस कमेंट के लिए अपने गुस्से को जिम्मेदार ठहराया है और इसपर काम करने की बात कही है।

इससे पहले इंस्टाग्राम पर अनुराग कश्यप ने माफ़ी के नाम पर अपने घृणित एजेंडे को आगे बढ़ाया था। उन्होंने एक बार फिर ब्राह्मणों के लिए अप्रत्यक्ष रूप से ‘संस्कार के सरगना’ बताते हुए कहा था कि किसी कमेंट के कारण उनके द्वारा किसी की बेटी को बलात्कार की धमकियाँ नहीं मिलनी चाहिए। याद दिलाते चलें कि अनुराग कश्यप को एक यूजर ने लिखा था कि ब्राह्मण से तुम्हारी जितनी सुलगेगी, उतनी सुलगाएँगे। इसी कमेंट का रिप्लाई देते हुए उन्होंने एक पूरे समुदाय पर टिप्पणी कर डाली।

ये पूरा मामला ‘फुले’ फ़िल्म की रिलीज से जुड़ा हुआ है। बता दें कि महाराष्ट्र के ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले के जीवन पर बनी फिल्म ‘फुले’ की रिलीज में देरी को लेकर सेंसर बोर्ड पर भी वो बरसे थे। साथ ही फ़िल्म में हिन्दू धर्म के नकारात्मक चित्रण को लेकर विरोध का गुस्सा उन्होंने ब्राह्मणों पर भद्दी टिप्पणी करके निकाला था। इस प्रकार की टिप्पणियों के बाद लोगों ने अनुराग कश्यप को सनकी तक बताया था। ब्राह्मण समाज उनसे माफ़ी माँगने की लगातार माँग कर रहा था।

जिस नक्सली ने की पूर्व CM बाबूलाल मरांडी के बेटे की हत्या, झारखंड में CRPF ने उसे उतारा मौत के घाट: SP समेत 20 लोगों के मर्डर में था अरविंद यादव का हाथ, पुलिस ने रखा था ₹25 लाख का इनाम

बोकारो मुठभेड़ में अरविंद यादव की मौत के झारखंड में अंतिम सांस ले रहे नक्सली संगठन को बड़ा झटका लगा है। झारखंड में 25 लाख रुपए के साथ बिहार सरकार ने भी उस पर 5 लाख रुपए का इनाम घोषित किया था। बिहार और झारखंड के बॉर्डर वाले इलाकों में नक्सली संगठनों को मजबूत करने में पिछले 30 सालों में इसका अहम रोल था। झारखंड के बोकारो से लेकर जमुई, दुमका, डालटेनगंज, लखीसराय, बांका तक उसका राज था।

क्या था चिलखारी नरसंहार?

मुँगेर के एसपी केसी सुरेन्द्र बाबू, बीजेपी नेता बाबू लाल मरांडी के बेटे की हत्या समेत 85 मामले उस पर दर्ज थे। झारखंड के गिरिडीह में चिलखारी नरसंहार में अरविंद यादव शामिल था। बिहार झारखंड सीमा पर देवरी के चिलखरयोडीह में नक्सलियों का एक ग्रुप कार्यक्रम स्थल पर पहुँच कर मंच पर चढ़कर माइक से चेतावनी दी और अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी। इस हत्याकांड में बाबू लाल मरांडी के बेटे अनूप मरांडी समेत 20 लोगों की मौके पर ही मौत हो गयी थी। मंच पर हर तरफ खून ही खून दिख रहा था। इस भयावह दृश्य को देख कर पुलिस वालों की भी रूह काँप गई थी।

झारखंड-बिहार-पश्चिम बंगाल में ठिकाना

बोलने में तेज तर्रार और पढ़ा-लिखा अरविंद यादव नए लोगों को संगठन से जोड़ता था। जमुई के सोनो प्रखंड के भेलवा मोहनपुर में 8 कमरों के घर में उसके माता-पिता और भाई-बहन आज भी रहते हैं। जानकारी के मुताबिक उसकी पत्नी मुँगेर में रहती है और बच्चे उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।

अरविंद यादव का पश्चिम बंगाल के आसनसोल में भी घर है। इस घर में उसकी पत्नी पहले बच्चों के साथ रहती थी लेकिन अब मुँगेर चली गई है। अलग अलग ब्रांड की घड़ी पहनने का शौकीन अरविंद यादव को नक्सली संगठन का थिंक टैंक माना जाता है।

22 जनवरी को बाल-बाल बचा था अरविंद यादव

बताया जाता है कि अविनाश उर्फ अरविंद यादव की किस्मत ने 22 जनवरी 2025 को बचा लिया था। उस वक्त पुलिस मुठभेड़ बोकारो के ऊपर घाट इलाके में हुई थी। जानकारी के मुताबिक यहाँ से वो भेल्वाघाटी के रास्ते चकाई के बोगी बरमोरिया जंगल में भाग गया था। यहाँ से वह अपने घर मोहनपुर पहुँचा। पुलिस जब तक वहाँ तबिश देती उससे पहले वो बोकारो भाग गया। लेकिन 21 अप्रैल 2025 को सुरक्षाबलों को तब बड़ी सफलता मिली जब बोकारो के ललपनिया में पुलिस ने 8 नक्सलियों को मार गिराया। इसमें अरविंद यादव भी शामिल था।

खुद के मारे जाने की फैलाई थी अफवाह

करीब 4 साल पहले पुलिस मुठभेड़ में अरविंद यादव के मरने की खबर झारखंड से लेकर बंगाल तक फैल गयी थी। यहाँ तक कि उसके घर में श्राद्ध कर्म की तैयारी हो गयी थी। लेकिन पुलिस को इस खबर पर शक था। बाद में पता चला कि उसने जानबूझकर अपनी मौत की खबर उड़ाई थी ताकि पुलिस की नजर उस पर हट जाए।

ना एक दिन की वकालत, ना ही कानून की डिग्री… बन गए भारत के CJI: जानिए कौन थे जस्टिस कैलाशनाथ वांचू, कॉन्ग्रेस सरकार के पक्ष में भी हुए थे खड़े

भाजपा सांसद निशिकांत दुबे की सुप्रीम कोर्ट पर टिप्पणियों के बाद देश में न्यायिक प्रक्रिया पर चर्चाएँ जोर-शोर से चल रही हैं। निशिकांत दुबे इस बीच पीछे हटाने के मूड में नहीं है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व CJI के बारे में जिक्र किया है, जिनके पास कानून की कोई डिग्री नहीं थी।

उन्होंने एक्स (पहले ट्विटर) पर जस्टिस कैलाशनाथ वांचू के विषय में लिखा है। जस्टिस वांचू देश के 10वें CJI थे और उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान एक बड़ा फैसला भी सरकार के हक़ में दिया था।

कौन थे जस्टिस कैलाशनाथ वांचू?

सुप्रीम कोर्ट के कामकाज और जजों के विषय में जानकारी देने वाली वेबसाIइट सुप्रीम कोर्ट आब्जर्वर के अनुसार, कैलाशनाथ वांचू का जन्म 1903 में मध्य प्रदेश में हुआ था। वह पढ़ाई में कुशाग्र थे और उन्होंने 1924 में तब नौकरशाही के लिए करवाई जाने वाली परीक्षा इंडियन सिविल सर्विसेज (ICS) पास की थी।

जस्टिस वांचू इसके बाद अपनी ट्रेनिंग के लिए इंग्लैंड गए थे। उन्होंने इंग्लैंड में 1926 तक ट्रेनिंग ली थी। उनकी शुरुआती तैनातियाँ कलेक्टर के तौर पर हुई थीं। उन्हें सबसे पहले उत्तर प्रदेश (तब संयुक्त प्रांत) में तैनाती दी गई थी। 11 वर्षों तक वह इन्हीं पदों पर काम करते रहे थे। उन्हें 1937 में जिला स्तर के जज के तौर पर पहली तैनाती मिली थी।

इलाहाबाद हाई कोर्ट में भी बने जज

जस्टिस वांचू जिला जज बनने के लगभग 10 वर्ष बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुँच गए थे। सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट बताती है कि जस्टिस वांचू को फरवरी, 1947 में इलाहाबाद हाई कोर्ट में तैनाती मिली थी। वह इसके बाद 1951 तक इलाहाबाद हाई कोर्ट में काम करते रहे थे।

जस्टिस वांचू को राजस्थान हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस भी बनाया गया था। उन्हें 1951 में राजस्थान हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस बना कर भेजा गया था। यहाँ उन्होंने 1958 तक अपनी सेवाएँ दी थीं। उन्हें इस दौरान और भी कई जगह पर जिम्मेदारियां दी गई थीं।

CJI कैसे बने जस्टिस वांचू?

राजस्थान हाई कोर्ट में 7 वर्ष काम करने के बाद जस्टिस कैलाशनाथ वांचू को सुप्रीम कोर्ट में जज बना दिया। उन्हें यहाँ 12 अप्रैल, 1967 को CJI बनाया गया था। इसके पीछे एक विशेष कारण था। बताया गया कि 1967 में तत्कालीन CJI जस्टिस K सुब्बाराव ने एकाएक इस्तीफ़ा दे दिया।

सुब्बाराव के इस्तीफे के पीछे का कारण उनका राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने का फैसला था। हालाँकि, जस्टिस K सुब्बाराव यह चुनाव जाकिर हुसैन से हार गए थे। जस्टिस सुब्बाराव के इस्तीफे के चलते ही जस्टिस कैलाशनाथ वांचू को CJI बनाया गया था।

इसी के साथ वह पहले और अकेले ऐसे CJI बन गए थे, जिसके पास ना वकालत की डिग्री थी और ना ही वह वकील रहे थे। उनकी नियुक्ति का आधार उनका पहले का अनुभव था। वह निचली अदालत में भी जज इस आधार बनाए गए थे कि उनका आपराधिक कानूनों को लेकर ज्ञान अच्छा था। उन्होंने या ज्ञान ICS की ट्रेनिंग के दौरान हासिल किया था।

जस्टिस वांचू 10 महीने CJI के पद पर रहे थे। उनका कार्यकाल फरवरी, 1968 में खत्म हुआ था।

सरकार के पक्ष में भी हुए थे खड़े

जस्टिस वांचू ने कई महत्वपूर्ण मुकदमों की सुनवाई की थी। इनमें कई संवैधानिक मामले भी शामिल थे। इन्हीं में से एक मामला गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य का था। इसे भारतीय संविधान और कानूनी इतिहास में महत्वपूर्ण मामला माना जाता था।

1967 में इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था कि संसद संविधान में दिए गए मूल अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती। यह सुनवाई जस्टिस सुब्बाराव की बेंच ने की थी। इसी बेंच में जस्टिस वांचू भी शामिल थे। उन्होंने इस फैसले से अपना मतभेद प्रकट किया था। जस्टिस वांचू की राय बाकी बेंच से लगा थी।

उनका मानना था कि संसद संविधान में देश के नागरिकों को दिए गए मूल अधिकारों में बदलाव कर सकती है। उनका यह कदम सरकार का पक्ष लेने वाला माना गया था। उनके इस कदम के कुछ ही दिनों बाद उन्हें CJI बनाया गया था।

उर्दू स्कूल के लिए मिली जमीन पर बनाई दुकानें, 20 साल तक वसूला लाखों का किराया: वक्फ संपत्ति घोटाला में सलीम, महमूद समेत 5 गिरफ्तार, गुजरात का मामला

अहमदाबाद में पाँच मुस्लिमों ने वक्फ बोर्ड की जमीन पर अवैध रूप से दुकानें खड़ी कर दीं। इसके बाद उन्होंने खुद को वक्फ का ट्रस्टी घोषित कर 2 दशक से उनका किराया वसूला। यह जमीन अहमदाबाद नगर निगम ने वक्फ बोर्ड को उर्दू स्कूलों के लिए दी थी लेकिन इन पर करोड़ों की दुकाने चल रही थीं। इस मामले में अब FIR दर्ज हुई है।

यह दुकानें अहमदाबाद के जमालपुर में थीं। यह मामला काँच वाली मस्जिद के पास स्थित वक्फ बोर्ड की भूमि से जुड़ा है। दरअसल, 2001 में आए विनाशकारी भूकंप में यह स्कूल जर्जर हो गए थे और इन्हें तोड़ दिया गया था। इसके बाद यह जमीन खाली पड़ी थी।

इसी का फायदा उठाते हुए सलीम खान पठान नामक एक व्यक्ति ने उस जमीन पर 10 दुकानें बना लीं और उन्हें किराए पर उठा दिया। सलीम खान के साथ ही मोहम्मद यासर शेख, महमूद खान पठान, फैज मोहम्मद पीर मोहम्मद और शाहिद अहमद शेख ने ना केवल इन दुकानों से बल्कि वक्फ बोर्ड की लगभग 150 और संपत्तियों से भी पिछले 20 वर्षों से लगातार किराया वसूला।

यह सारा किराया वक्फ बोर्ड के आधिकारिक खाते में जमा होने के बजाय इन आरोपितों की निजी जेबों में जाता रहा, जिससे बोर्ड को करोड़ों रुपये का नुकसान भी झेलना पड़ा। इस व्यापक धोखाधड़ी की जानकारी वक्फ बोर्ड को तब हुई जब जमालपुर के एक रिक्शा चालक, मोहम्मद रफीक अंसारी ने इस संबंध में शिकायत दर्ज कराई।

ऑपइंडिया से बातचीत में अंसारी ने बताया कि उन्होंने खुद गुजरात वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष मोहसिन लोखंडवाला को इस अवैध कब्जे की सूचना दी, लेकिन बोर्ड की ओर से कोई कार्रवाई नहीं की गई। बाद में इस मामले की पुलिस में FIR दर्ज करवाई गई। पाँचों आरोपितों को इस मामले में गिरफ्तार कर लिया गया है। ऑपइंडिया के पास यह FIR कॉपी मौजूद है।

वक्फ संपत्तियों की सुरक्षा वक्फ बोर्ड के सदस्यों और अधिकारियों की देखरेख में आता है। ऐसे में उनकी कार्यशैली पर प्रश्न उठ रहे हैं। इससे जुड़े लोगों ने पूछा है कि वक्फ की इतनी बेशकीमती जमीन पर अवैध निर्माण कैसे हो गया और कुछ बाहरी लोगों ने स्वयं को ट्रस्टी बताकर इतने लंबे समय तक किराया कैसे वसूला।

शिकायतकर्ता अंसारी ने यह भी आशंका जताई है कि इस गोरखधंधे में वक्फ बोर्ड के कुछ अंदरूनी लोग भी शामिल हो सकते हैं, जिसके कारण उनकी शिकायत पर कोई सुनवाई नहीं हुई। अंसारी ने इस मामले में अहमदाबाद पुलिस की तत्परता की सराहना की है।

उन्होंने बताया कि पुलिस अधिकारियों, विशेष रूप से गोसाई साहब, ने उनकी शिकायत पर गंभीरता से ध्यान दिया और मामले की जाँच शुरू कर दी है।

वक्फ कानून के लिए पीएम मोदी का धन्यवाद: अंसारी

ऑपइंडिया से बातचीत में शिकायतकर्ता ने हाल ही में लागू हुए नए वक्फ अधिनियम का पुरजोर समर्थन किया है। उनका मानना है कि इस नए कानून के प्रावधानों के तहत सलीम खान पठान जैसे लोगों के लिए वक्फ की जमीन पर अवैध कब्जा करना और वक्फ बोर्ड के लिए ऐसी गतिविधियों पर आँख बंद करना अब संभव नहीं होगा। अंसारी ने इस कानून के लिए भाजपा सरकार की प्रशंसा भी की।

उन्होंने कहा, “गांधीनगर जाकर गुजरात वक्फ बोर्ड के चेयरमैन से शिकायत करने के बावजूद उन्होंने कुछ नहीं किया। अब अगर नए कानून आ गए तो कोई भी जबरदस्ती वक्फ की जमीन पर कब्जा नहीं कर पाएगा। मैं इस कानून के लिए भाजपा सरकार की बहुत सराहना करता हूँ।”

इसके अलावा, शिकायतकर्ता को यह भी संदेह है कि सलीम खान पठान के साथ-साथ वक्फ बोर्ड के कुछ कथित ठेकेदार भी इस घोटाले में शामिल हो सकते हैं। इसीलिए वक्फ बोर्ड से शिकायत करने के बाद भी उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की।

इसके बाद उन्होंने अहमदाबाद पुलिस से संपर्क किया और अहमदाबाद पुलिस की तारीफ करते हुए कहा, “पुलिस अधिकारी गोसाई साहब और अहमदाबाद पुलिस ने मेरी काफी मदद की है और ऐसे ठेकेदारों के खिलाफ कार्रवाई भी की है।”

पहले कानून बनती तो नहीं होती गड़बड़ी

विडंबना है कि कुछ स्वार्थी तत्व वक्फ अधिनियम को लेकर मुस्लिमों को गुमराह कर रहे हैं और उन्हें सड़कों पर उतरने के लिए उकसा रहे हैं। अहमदाबाद में सामने आया यह करोड़ों का घोटाला ऐसे ही लोगों के स्वार्थों को उजागर करता है। यदि नया वक्फ (संशोधन) अधिनियम पहले ही लागू हो गया होता, तो इस धोखाधड़ी का पर्दाफाश बहुत पहले हो गया होता।

यदि पहले यह संशोधन लागू कर दिया गया होता तो इन मुस्लिम ठेकेदारों की दुकानें बंद हो जातीं और करोड़ों की अवैध कमाई रुक जाती। यही कारण है कि वे इस नए कानून से नाराज हैं और इसे मुसलमानों के खिलाफ अत्याचार का एक साधन बता रहे हैं। लेकिन, कानून का असल उद्देश्य यह है कि वक्फ की जमीनों का असल फायदा गरीब मुस्लिमों को मिले।

यदि नया कानून लागू हो जाता तो संपत्तियों के सर्वेक्षण और रजिस्ट्रार में बदलाव होता, राज्य और केंद्र में वक्फ बोर्ड की संरचना में बदलाव होता, पिछड़े वर्ग के मुसलमानों और महिलाओं को भी बोर्ड में सदस्यता दी जाती और वक्फ और भूमि नियंत्रण की प्रक्रिया से लेकर उसकी देखरेख और वक्फ ट्रिब्यूनल में बदलाव किए जाते।

अगर ऐसा होता तो इस तरह के घोटाले बंद हो जाते और वक्फ बोर्ड के नाम पर गरीब मुसलमानों के साथ अन्याय नहीं होता। केवल 5-7 अधिकारी ही वक्फ संपत्तियों का उपयोग बंद कर देते और बड़ी मुस्लिम आबादी को इसका सीधा लाभ मिलता।

कानून लागू होने के बाद जो लोग अवैध संपत्ति अर्जित कर रहे थे, वे रुक जाएँगे। इसीलिए आज वक्फ एक्ट का विरोध हो रहा है। ताकि वे दोनों हाथों से वक्फ संपत्तियों को लूट सकें और घोटाले करके अपनी जेबें भर सकें।

हकीकत यह है कि ऐसे लोग नए वक्फ कानून पर इसलिए आपत्ति जता रहे हैं क्योंकि यह उन्हें ऐसी सम्पत्तियाँ हड़पने से रोकेगा। उन्हें ना तो गरीब मुसलमानों की परवाह है और न ही उनके मजहब की संपत्तियों की। उनकी एकमात्र चिंता यह है कि यदि कानून लागू हुआ तो उनकी दुकानें बंद हो जाएंगी।

अहमदाबाद की इस घटना का निष्कर्ष यह है कि जहाँ बहुत अधिक संपत्ति होगी, वहाँ केवल 5-7 लोग ही वक्फ की जमीनों पर शासन करेंगे और संपत्ति को अपने पास रख लेंगे। गरीब मुस्लिमों पर हो रहे इस अन्याय को रोकने के लिए सरकार ने वक्फ अधिनियम में संशोधन किया है।

‘PM मोदी एक महान नेता… उनसे सम्मान पाना बड़ी बात’ : प्रधानमंत्री से मिल खुश हुए अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस; टैरिफ पर की बात, साझेदारी मजबूत करने के लिए ‘कॉम्पैक्ट’ लॉन्च

अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस पहली बार भारत आए हैं। चार दिवसीय दौरे में उनके साथ पत्नी उषा चिलुकुरी और उनके तीनों बच्चे शामिल हैं। सोमवार को जेडी वेंस ने पीएम मोदी से मुलाकात की।

उन्होने एक्स पर लिखा, “पीएम मोदी से मिलना सम्मान की बात है। वो एक महान नेता हैं और मेरे परिवार से काफी विनम्रता से मिले। हमारी दोस्ती और सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए भारत और अमेरिका काम करते रहेंगे। भारत और अमेरिका व्यापार समझौते पर अच्छी प्रगति कर रहे हैं। भारत अमेरिकी टैरिफ से बचने की कोशिश कर रहा है और साथ ही ट्रम्प प्रशासन के साथ मजबूत संबंध बनाने की भी कोशिश कर रहा है।”

पीएमओ के मुताबिक दोनों नेताओं ने ऊर्जा, रक्षा और दूसरे एडवांस टेक्नॉलोजी के साथ साथ विश्वस्तरीय और क्षेत्रीय मुद्दों पर भी बातचीत की। दोनों नेता इस बात पर सहमत थे कि हर मुद्दे का समाधान शांति और बातचीत के जरिए हो सकता है।

दोनों नेताओं ने टैरिफ पर की बात

ट्रम्प प्रशासन ने कहा है कि भारत और अमेरिका व्यापार वार्ता जारी रखने की योजना पर सहमत हो गए हैं। इससे आर्थिक प्राथमिकताओं पर चर्चा के लिए ढांचा तैयार हो जाएगा। दोनों नेताओं ने टैरिफ को लेकर जल्द बातचीत पूरा करने पर भी सहमति व्यक्त की ताकि ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गये टैरिफ शुल्क से भारत को बचने में मदद मिले।

उपराष्ट्रपति वेंस ने भारत के साथ संतुलित व्यापार को बढ़ावा देने के लिए अमेरिकी प्राथमिकताओं पर भी जोर दिया। वेंस के ऑफिस के मुताबिक वार्ता का मकसद एक आधुनिक व्यापार समझौता बनाना है जो रोजगार बढ़ाने में मदद करता है और दोनों देशों के लोगों के जीवन को बेहतर बनाता है।

पीएम मोदी- उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने लॉन्च किया कॉम्पैक्ट

प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भारत- अमेरिका कॉम्पैक्ट लॉन्च किया। ये एक नई पहल है। इसका मकसद सैन्य व्यापार और टेक्नोलॉजी में दोनों देशों को संबंध और मजबूत करने की ओर बढ़ना है। दोनों नेताओं ने इस कॉम्पैक्ट को “21वीं सदी की एक महत्वपूर्ण साझेदारी की दिशा में कदम” बताया।

जयपुर की सैर पर वेंस परिवार

अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस अपनी पत्नी उषा और तीन बच्चों इवान, विवेक और मीराबेल के साथ दिल्ली से जयपुर पहुंचे जहाँ रामबाग पैलेस में सोमवार (21 अप्रैल 2025) को रात्रि विश्राम किया। वो मंगलवार यानी 22 अप्रैल 2025 को आमेर किला देखने पहुंचे। उनके दौरे को देखते हुए सुरक्षा कारणों से मंगलवार को आमेर किला आम जनता के लिए बंद कर दिया गया। यहां पारंपरिक तरीके से हाथियों ने उनका स्वागत किया। बुधवार को उपराष्ट्रपित वेंस और उनका परिवार आगरा जा रहा है जहाँ वे लोग ताजमहल का दीदार करेंगे। इसके बाद फिर सिटी पैलेस घूमने के लिए वो वापस जयपुर आ जाएँगे

प्रयागराज के थानों में ‘PDA’ सिर्फ 25% नहीं, अखिलेश यादव ने साफ झूठ बोला: UP पुलिस ने किया फैक्ट चेक, DGP बोले- यहाँ पोस्टिंग जाति देखकर नहीं होती

समाजवादी पार्टी सुप्रीमो अखिलेश यादव के एक दावे की हवा उत्तर प्रदेश पुलिस ने निकाल दी है। अखिलेश यादव ने थानेदारों की तैनाती में प्रयागराज जिले में पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समाज (PDA) को सही प्रतिनिधित्व ना दिए जाने की बात कही थी। उत्तर प्रदेश पुलिस ने इसका आँकड़ों के साथ जवाब दिया।

यह पूरा मामला पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की एक्स (पहले ट्विटर) पर एक पोस्ट के बाद चालू हुआ। अखिलेश यादव ने अपने एक्स अकाउंट पर लिखा, “90% PDA को प्रयागराज पुलिस में केवल 25% प्रतिनिधित्व। ये है पीडीए के साथ किया जा रहा ‘आनुपातिक अन्याय’ है।”

इसी के साथ उन्होंने एक ग्राफ भी पोस्ट किया। इसमें प्रयागराज जिले के पुलिस थानों में तैनात थाना प्रभारी (SHO/SO) के विषय में दावे किए गए थे। इस ग्राफ के अनुसार, प्रयागराज जिले के 44 थानों में 19 में सामान्य वर्ग (गैर सिंह उपनाम वाले) और 14 ‘सिंह’ उपनाम वाले थाना प्रभारी तैनात हैं।

अखिलेश यादव ने दावा किया कि प्रयागराज में मात्र 11 थानों में ही PDA समाज के थाना प्रभारी हैं जो कि उनकी आबादी के हिसाब से कम है। इस पोस्ट के माध्यम से अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश पुलिस की तैनातियों में सरकार ‘सिंह’ उपनाम वाले लोगों को वरीयता दे रही है। यह अखिलेश यादव का योगी सरकार पर ‘ठाकुरवाद’ का आरोप था।

अखिलेश यादव की पोस्ट के बाद उत्तर प्रदेश ने इसका फैक्ट चेक कर दिया और सही स्थिति बयान कर दी। प्रयागराज पुलिस कमिश्नरेट ने इस मामले में अखिलेश यादव को जवाब दिया और बताया कि थाना प्रभारियों की नियुक्तियाँ कैसे होती हैं।

प्रयागराज पुलिस कमिश्नरेट ने बताया, “उक्त पोस्ट में दी गई सूचना सही नहीं है। जनपद प्रयागराज में थाना प्रभारी की नियुक्ति हेतु कर्तव्यनिष्ठा, सत्य निष्ठा, सामाजिक सद्भाव व जन शिकायतों के प्रति संवेदनशीलता के आधार पर योग्य कर्मचारियों का चयन किया जाता है।

कमिश्नरेट ने आगे संख्या सम्बन्धी दावों पर कहा, “जनपद में तैनात लगभग 40 प्रतिशत थाना प्रभारी OBC और SC/ ST वर्ग से हैं। थाना प्रभारी की नियुक्ति एक निष्पक्ष प्रक्रिया के द्वारा की जाती है।” इसी के साथ पुलिस ने साफ़ किया कि थाना प्रभारियों की नियुक्ति में योग्यता आधार बनाई जाती है।

यह कोई पहला मौका नहीं है जब समाजवादी पार्टी और उसके समर्थकों द्वारा उत्तर प्रदेश पुलिस में तैनातियों में राजपूतों को वरीयता देने के आरोप योगी सरकार पर लगाए गए हों। इससे पहले आगरा पुलिस ने भी ऐसी खबरों पर एक स्पष्टीकरण जारी किया।

आगरा पुलिस ने बताया था, “आगरा जनपद में कतिपय सोशल मीडिया साइट्स/हैण्डलर्स/माइक्रो ब्लॉगिंग साइट्स के द्वारा एसएचओ की नियुक्ति के बारे में भ्रामक तथ्य प्रस्तुत किये जा रहे है। इसके सम्बन्ध में अवगत कराना है कि शासन के निर्देशो के अनुसार एसएचओ की नियुक्ति के नियमों का अक्षरशः पालन किया जा रहा है।”

पुलिस ने आगे बताया, “कमिश्नरेट आगरा में 39% ओबीसी संवर्ग, 19% एससी संवर्ग तथा सामान्य संवर्ग के 42% थाना प्रभारी नियुक्त है, जबकि शासनादेश के अनुसार ओबीसी संवर्ग के 27% नियुक्त होने चाहिए।” पुलिस ने भ्रामक सूचना ना फ़ैलाने और तथ्यों पर बात करने की अपील की थी।

उत्तर प्रदेश पुलिस के डीजीपी प्रशांत कुमार ने भी इस संबंध में बात की है। उन्होंने कहा कि थानों में जाति के आधार पर पोस्टिंग नहीं होती। मीडिया से उन्होंने कहा कि जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों को नियुक्तियों के विषय में ऐसी बात नहीं करनी चाहिए। उन्होंने इन बातों को ‘भ्रामक’ और ‘अफवाह’ बताया। उन्होंने वर्तमान में प्रसारित हो रही जानकारी को गलत बताया।