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इस्लामी देश में टॉपलेस फोटो खिंचवाने पर प्लेबॉय मॉडल को धमकी, लोगों ने पूछा- क्यों नहीं किया अरेस्ट

मुस्लिम देश दुबई में एक प्लेबॉय मॉडल को टॉपलेस तस्‍वीर खिंचवाना भारी पड़ गया। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर यूज़र्स आलोचनाओं के साथ उन्हें धमकी भरे मैसेज भेज रहे है। हालाँकि, इस मामले को लेकर मॉडल का कहना है कि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं किया है। शूट के दौरान उन्होंने हाथों से अपने ब्रेस्ट को ढक लिया था।

दरअसल, ब्राजील की चर्चित प्‍लेबॉय मॉडल ल्युआना सैंडियन (27) ने दुबई के रेगिस्‍तान के अंदर टॉपलेस फोटोशूट करवाकर, तस्वीरों को इंस्टाग्राम पर पोस्ट कर दिया। जिसको देखते ही उनके फॉलोवर्स भड़क गए। सोशल मीडिया पर उनके फॉलोवर्स एक मुस्लिम देश में इस तरह की तस्‍वीर खिंचवाने को अश्‍लील बता रहे हैं।

बता दें, इस्‍लामिक नियमों का पालन करने वाले दुबई में बिना कपड़ों के रहना या टॉपलेस होकर सार्वजानिक जगहों पर सूरज की धूप लेना अश्‍लीलता माना जाता है। यहीं नहीं इन कानूनों को नहीं मानने वाले लोगों को गिरफ्तार भी किया जा सकता है।

हालाँकि, लोगों की आलोचनाओं से घिरी ल्युआना सैंडियन ने उनके ऊपर लगे सारे आरोपों को खंडन किया है। डेली स्‍टार की रिपोर्ट के मुताबिक ल्युआना का कहना है कि उनका उद्देश्‍य किसी को आहत करना नहीं था। उन्‍होंने अपने ब्रेस्‍ट को हाथों से कवर कर रखा था ताकि किसी कानून का उल्‍लंघन न हो। उन्होंने बताया कि इंस्टाग्राम पर फ़ोटो पोस्ट करने के बाद से ही उन्हें ऑनलाइन धमकियाँ दी जा रही हैं।

ब्राजीलियाई मॉडल ने अपनी तस्वीरों को लेकर कहा, “ये तस्‍वीरें मेरे जीवन की सबसे अच्‍छी तस्‍वीरें हैं और मैं किसी को भी शर्मिंदा नहीं करना चाहती थी। मैं अपने ब्रेस्‍ट को लेकर सतर्क थी और उसे हाथों से कवर कर रखा था। मैंने कुछ गलत नहीं किया। मैं यह जानती थी कि सऊदी अरब में न्‍यूड होने पर बैन है लेकिन इसके बाद भी मुझसे घृणा करने वाले लोग मुझे धमकी दे रहे हैं।”

वहीं जब प्लेबॉय मॉडल की टॉपलेस तस्वीरों को लेकर सोशल मीडिया पर एक यूजर ने उनसे पूछा कि, क्‍या टॉपलेस होकर तस्‍वीर खिंचवाने पर उन्‍हें अरेस्‍ट नहीं किया गया तो इस पर यूजर को ट्रोल करते हुए उन्होंने कहा कि दुबई में मेरे चार्म के चलते मैं जो चाहती थी उन्होंने मुझे करने दिया।

मानसिक रूप से विक्षिप्त महिला राहुल गाँधी से करना चाहती थी शादी, एयरपोर्ट पर पुलिस ने रोका

मध्य प्रदेश में इंदौर के देवी अहिल्याबाई होल्कर एयरपोर्ट पर सोमवार रात (जनवरी 25, 2021) एक महिला ने ये कहकर खूब हंगामा किया कि उसे कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी से शादी करने दिल्ली जाना है। हंगामा बढ़ते देख पुलिस मौके पर पहुँची और महिला को वहाँ से दूर ले गई।

दरअसल, एक महिला अपने साथ 4-5 बैग के साथ एयरपोर्ट पहुँची और टिकट के ही मेन गेट से अंदर जाने की जिद करने लगी। महिला का दावा था कि वह जल्द ही कॉन्ग्रेस नेता राहुल की पत्नी बनने वाली हैं और ये कहते हुए सुरक्षाकर्मियों से अंदर जाने की जिद करने लगी कि शादी के बाद वो उसे सैल्यूट करेंगे। महिला ने कहा कि राहुल गाँधी उससे मिलने नहीं आते, इसलिए अब वो शादी करने दिल्ली जा रही है।

बहुत देर तक चले ड्रामे के बात सुरक्षाकर्मियों ने इस महिला के परिजनों से संपर्क किया तो पता चला कि वो परदेशीपुरा क्षेत्र की निवासी है। उसके परिजनों ने बताया कि महिला मानसिक रूप से अस्थिर है और इससे पहले भी कई बार इस तरह की हरकतें कर चुकी है। परिजनों ने बताया कि वह महिला आए दिन बिना बताए इसी तरह घर से निकल जाती है। हंगामे के बाद पुलिस ने महिला को परिजनों के सुपुर्द कर दिया।

केजरीवाल सरकार दिल्ली दंगो के आरोपितों को बचा रही, जमानत के लिए छिपाई जानकारी: दिल्ली पुलिस

एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) विक्रमजीत बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली पुलिस का पक्ष रखते हुए कहा कि फरवरी 2020 में हुए दंगों के एक आरोपित को इसलिए जमानत मिली, क्योंकि सरकारी वकील ने हाईकोर्ट के सामने मामले से जुड़ी जानकारी छुपाई। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार के सरकारी वकील (additional public prosecutor) को जानकारी थी कि केंद्र सरकार ने दिल्ली दंगों के लिए विशेष अधिवक्ता नियुक्त किया है। 

फिर भी जब आरोपित इलियास की जमानत याचिका पर सुनवाई होनी थी तब उसने जाँच एजेंसियों को इस बारे में सूचित नहीं किया। 25 अगस्त 2020 के जमानत आदेश को चुनौती देते हुए ASG विक्रमजीत ने कहा कि दिल्ली सरकार के वकील ने पुलिस को इस बात की जानकारी नहीं दी जो कि हाईकोर्ट से जुड़े हुए थे। इसके विपरीत उन्होंने झूठा बयान दिया कि वह इस बारे में डिप्टी कमिश्नर को जानकारी दे चुका है। हाईकोर्ट ने विशेष सरकारी वकील (special prosecutor) को नोटिस भेजे बिना ही आरोपित को जमानत दे दी। 

अपनी याचिका में दिल्ली पुलिस ने आरोप लगाया कि दिल्ली की केजरीवाल सरकार के वकील ने खुफ़िया एजेंसियों को धोखे में रखा और सही जानकारी को रोके रखा। इतना ही नहीं उन्होंने आधिकारिक अनुमति के बगैर इस प्रकरण में दखल दिया और ऐसे बयान दिए जिसकी वजह से आरोपित के पक्ष में जमानत आदेश जारी किया गया। दिल्ली पुलिस के मुताबिक़ यह इकलौता मामला नहीं है और दिल्ली सरकार के इसी वकील का अन्य मामलों में भी ऐसा ही रवैया था। जिसमें इसने न तो विशेष सरकारी वकील को कोई जानकारी दी और न ही हाईकोर्ट में मौजूद दिल्ली पुलिस के अधिकारियों को। 

इसके बाद विक्रमजीत बनर्जी ने दो पुलिसकर्मियों का निजी हलफ़नामा जमा किया, जिसमें लिखा था कि उन्हें इलियास की जमानत याचिका पर सुनवाई की जानकारी नहीं थी। इलियास पर हत्या का प्रयास, दंगा भड़काना, आगजनी जैसे मामलों के तहत दयालपुर पुलिस थाने में एफ़आईआर दर्ज है। हाईकोर्ट के आदेश को ‘विचित्र’ बताते हुए बनर्जी ने कहा कि आदेश के आधार पर कहा जा सकता है कि न तो इलियास की चार्जशीट का संज्ञान लिया गया और न ही उसके खिलाफ़ मौजूद तमाम सबूतों पर गौर किया गया। इस पर सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने ASG विक्रमजीत से कहा कि दिल्ली पुलिस के लिए सही यही होगा कि वह दिल्ली हाईकोर्ट को अपने आदेश की समीक्षा के लिए राज़ी करें।

2020 दिल्ली दंगे 

फरवरी 2020 के दौरान शाहीन बाग़ में सीएए-एनअआरसी विरोधी प्रदर्शन के हिंसक होते ही देश की राजधानी दिल्ली दंगों की चपेट में आ गई थी। फ़िलहाल दिल्ली पुलिस आम आदमी पार्टी के पूर्व नेता ताहिर हुसैन की दंगों में कथित भूमिका की जाँच कर रही है। ताहिर हुसैन पर आईबी (इंटेलिजेंस ब्यूरो) के अंकित शर्मा की हत्या और दिल्ली दंगे भड़काने का आरोप है।      

पैंट की चेन खोल 5 साल की बच्ची का हाथ पकड़ना यौन शोषण नहीं: ‘स्किन टू स्किन’ जजमेंट के बाद बॉम्बे HC का फैसला

बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने यौन अपराध की एक बार फिर नई परिभाषा समझाई है। स्तन दबाने के मामले में ‘स्किन टू स्किन’ जजमेंट सुनाने के बाद अब बताया गया है कि यदि किसी नाबालिग के सामने कोई पैंट की जिप खोल दे, तो वो पॉक्सो एक्ट के तहत यौन शोषण की श्रेणी में नहीं आएगा।

जस्टिस पुष्पा गनेदीवाला की एकल पीठ ने 50 वर्षीय एक व्यक्ति द्वारा 5 साल की लड़की से यौन शोषण मामले में ये फैसला दिया है। इससे पहले आरोपित को निचली अदालत ने पॉक्सो की धारा 10 के तहत यौन शोषण में 5 साल के सश्रम कारावास और 25,000 रुपए के जुर्माने की सजा सुनाई थी।

इस संबंध में लड़की की माँ ने शिकायत दर्ज कराई थी। उनका कहना था कि आरोपित की पैंट की ज़िप खुली हुई थी, और उसकी बेटी के हाथ उसके हाथ में थे। माँ का दावा यह भी था कि उनकी बेटी ने बताया कि आरोपित उसे सोने के लिए बिस्तर पर आने को कह रहा था।

इस मामले पर बॉम्बे अदालत ने सुनवाई करते हुए यौन शोषण की परिभाषा में ‘शारीरिक संपर्क’ शब्द की व्याख्या की। कहा गया कि इसका अर्थ है ‘प्रत्यक्ष शारीरिक संपर्क- यानी यौन प्रवेश के बिना स्किन-टू-स्किन कॉन्टेक्ट।’

अदालत ने यह भी पाया कि ये मामला IPC की धारा 354A (1) (i) के तहत आता है। इसलिए, पॉक्सो अधिनियम की धारा 8, 10 और 12 के तहत सजा को रद्द किया गया और आरोपित को आईपीसी की धारा 354A (1) (i) के तहत दोषी पाया गया, जिसमें अधिकतम 3 साल की कैद का प्रावधान है।

गौरतलब है कि हाल ही में बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने एक फैसला सुनाया था, जिसके मुताबिक़ सिर्फ ग्रोपिंग (groping, किसी की इच्‍छा के विरुद्ध कामुकता से स्‍पर्श करना) को यौन शोषण नहीं माना जा सकता। कोर्ट के मुताबिक इसके लिए शारीरिक संपर्क या ‘यौन शोषण के इरादे से किया गया शरीर से शरीर का स्पर्श’ (स्किन टू स्किन) होना चाहिए।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने यह फैसला उस आरोपित की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया था, जिसे एक नाबालिग लड़की के साथ यौन शोषण करने लिए जेल की सज़ा सुनाई गई थी। हाईकोर्ट के मुताबिक सिर्फ नाबालिग लड़की की छाती को छूना यौन शोषण की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

बता दें कि बॉम्बे हाईकोर्ट के इस विवादित फैसले पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा कल रोक लगाई गई। साथ ही भारत के मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने मामले के आरोपित को नोटिस जारी कर दो हफ्ते में जवाब माँगा।

‘अयोध्या की मस्जिद में नमाज पढ़ना हराम, चंदा देना हराम… इस्लाम के सभी उलेमाओं ने बताया हराम’

अपने बयानों के चलते अक्सर विवादों में बने रहने वाले AIMIM के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी ने अयोध्या में बनने वाली मस्जिद पर बयान दिया। उनका कहना है कि अयोध्या की मस्जिद ‘मस्जिद-ए-ज़ीरार’ है और उसमें नमाज़ पढ़ना हराम है।

ओवैसी के इस बयान पर सुन्नी वक्फ़ बोर्ड द्वारा गठित न्यास, इंडो इस्लामिक कल्चरल फ़ाउंडेशन (IICF) के सचिव अतहर हुसैन ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि ओवैसी का बयान उनके राजनीतिक एजेंडे से प्रेरित है। 

टाइम्स ऑफ़ इंडिया से बात करते हुए अतहर हुसैन ने कहा, “उस ज़मीन का कोई भी टुकड़ा ‘हराम’ नहीं हो सकता है, जिस पर नमाज़ पढ़ी जाती है। ओवैसी एक हैदराबादी राजनेता हैं और उनका बयान राजनीतिक एजेंडे से प्रेरित है। ओवैसी एक ऐसे इलाके से आते हैं, जिन्होंने न तो आज़ादी की पहली लड़ाई का संघर्ष झेला और न ही उसकी विडंबना महसूस की।”

अतहर हुसैन ने अपनी बात रखते हुए आगे कहा कि ऐसा हो सकता है कि ओवैसी के पूर्वजों ने अंग्रेजों के विरुद्ध 1857 की लड़ाई में हिस्सा नहीं लिया हो। लेकिन अपनी बात करते हुए वो बताते हैं कि वो अवध क्षेत्र से आते हैं, जिस क्षेत्र के लोगों ने उस लड़ाई में अहम भूमिका निभाई थी।

उन्होंने कहा, “हम अयोध्या में स्थित IICF केंद्र को महानतम स्वतंत्र सेनानियों में एक अहमदुल्लाह शाह के लिए समर्पित कर रहे हैं। क्या शहीद अहमदुल्लाह की स्मृति में IICF केंद्र का नामकरण करना भी ‘हराम’ है?” 

अतहर हुसैन के मुताबिक़ ऐसी जगह जहाँ ‘सजदा’ किया जाता है, वह हराम नहीं हो सकती है। उन्होंने कहा कि वहीं पर शुरू किया जाने वाला चैरिटी अस्पताल, जो सैकड़ों-हज़ारों लोगों का मुफ़्त इलाज करेगा, वह ‘हराम’ नहीं हो सकता है।

ओवैसी पर निशाना साधते हुए अतहर हुसैन ने कहा कि उन्हें अपने बयान पर दोबारा सोचने की ज़रूरत है। लेकिन ऐसा करने के लिए उन्हें अपना संकुचित राजनीतिक एजेंडा एक तरफ रखना होगा। आखिर एक राजनेता इंसानियत के लिए होने वाले इतने बड़े प्रयास को हराम कैसे कह सकता है।

दरअसल हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने बीदर की एक जनसभा में कहा था, “यह मस्जिद मुनाफ़िकों की मस्जिद है। इस मस्जिद में न केवल चंदा देना बल्कि नमाज़ पढ़ना भी हराम है। इस्लाम के सभी फ़िरकों के उलेमाओं ने इस मस्जिद में नमाज़ पढ़ने को हराम क़रार दिया है।” 

एआईएमआईएम द्वारा किए गए ट्वीट में लिखा था, “मुनाफ़िकों की जमात जो बाबरी मस्जिद के बदले 5 एकड़ ज़मीन पर मस्जिद बनवा रहे हैं, हकीक़त में वह मस्जिद नहीं बल्कि ‘मस्जिद-ए-ज़ीरार’ है। मुहम्मदुर रसूलुल्लाह के ज़माने में मुनाफ़िकों ने मुसलमान की मदद करने के नाम पर एक मस्जिद बनवाई थी। हकीकत में उसका मकसद उस मस्जिद में नबी का खात्मा और इस्लाम को नुकसान पहुँचाना था (कुरान में उसे मस्जिद-ए-ज़ीरार कहा गया है)। ऐसी में मस्जिद में नमाज़ पढ़ना या चंदा देना हराम है।”  

मैंने राज खोले तो भागने का रास्ता नहीं मिलेगा: आधी रात फेसबुक लाइव से दीप सिद्धू ने ‘घमंडी किसान’ नेताओं को दी धमकी

गणतंत्र दिवस के दिन लाल किले (Red Fort) पर किसानों द्वरा किए गए उत्पात के बाद दीप सिद्धू (Deep Sidhu) को इस हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। दीप सिद्धू इस घटना के बाद पहली बार एक फेसबुक लाइव के जरिए सामने आए और उन्होंने किसान नेताओं को चेतावनी भी दे डाली।

पंजाबी अभिनेता से सामाजिक कार्यकर्ता बने दीप सिद्धू ने बृहस्पतिवार (जनवरी 28, 2021) रात डेढ़ बजे फेसबुक लाइव किया और अपना पक्ष रखते हुए कहा कि उन्हें जानबूझ कर निशाना बनाया जा रहा है। सिद्धू ने किसान नेताओं को चेतावनी दी कि अगर उन्होंने अंदर की बातें खोलनी शुरू कर दी तो इन नेताओं को भागने की राह नहीं मिलेगी। उन्होंने कहा कि इस बात को सिर्फ डायलॉग न समझें और उनके पास हर बात की दलील है।

फेसबुक पर लाइव वीडियो में दीप सिद्धू ने कहा कि मैं गद्दार नहीं हूँ और मैंने लोगों को लाल किले तक नहीं पहुँचाया। पंजाबी कलाकार ने कहा कि यह जनता का निर्णय था जो पंजाब से विरोध करने के लिए सभी तरह से आया था। कोई भी उनका नेतृत्व नहीं कर रहा था। उन्होंने कहा कि किसान संगठनों के नेता जिन्होंने उन्हें देशद्रोही कहा, उन्हें शर्म आनी चाहिए क्योंकि वे सरकार की बोली बोल रहे हैं।

गद्दार कहे जाने से नाराज सिद्धू ने कहा कि उनके बारे में कई तरह की बातें कही जा रही हैं, ऐसे में वक्त आ गया है कि कुछ बातें स्पष्ट कर दी जानी चाहिए। दिल्ली में 26 जनवरी को लाल किले पर झंडा लगाने के विषय में दीप सिद्धू ने कहा कि युवाओं को दिल्ली में ट्रैक्टर मार्च की बात कहकर बुलाया गया था। बाद में किसान नेताओं ने दिल्ली में तय रूट पर परेड की बात कह दी, जिस पर युवाओं ने रोष जाहिर किया तो किसान नेता वहाँ से किनारा करने लगे।

अपने लाइव वीडियो में सिद्धू ने भाजपा और आरएसएस से अपने रिश्तों को गलत बताते हुए कॉन्ग्रेस से भी रिश्तों को नकार दिया। किसान नेताओं को घमंडी बताते हुए सिद्धू ने कहा कि उन्होंने इस मामले में स्टैंड नहीं लिया। उन्होंने अपने वीडियो में बार-बार लाल किले पर झंडा लगाने की बात का बचाव किया। साथ ही, बाइक पर भागने के वायरल वीडियो पर दीप सिद्धू ने कहा कि जिसकी पुष्टि नहीं है, उसे सच माना जा रहा है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, पुलिस से बचने के लिए सिद्धू ने मोबाइल फोन बंद कर लिया है। 26 और 27 जनवरी की रात 12 बजे से 12:30 बजे के बीच दीप सिद्धू ने अपना मोबाइल फोन बंद किया था और उसके बाद से सिद्धू मोबाइल बंद कर अंडरग्राउंड हो गए।

गौरतलब है कि 26 जनवरी को दिल्ली के लाल किले में हुई हिंसा के संबंध में पंजाबी अभिनेता दीप सिद्धू (Deep Sidhu) और गैंगस्टर लक्खा सिधाना (Lakha Sidhana) के खिलाफ केस दर्ज कर लिया है। गणतंत्र दिवस के दिन हुए उपद्रव में दोनों की भूमिका को लेकर जाँच भी जारी है।

लाल किले में हुई हिंसा और उपद्रव में नाम उछलने के बाद पंजाबी कलाकार और कार्यकर्ता दीप सिद्धू गायब हो गए हैं। दिल्ली में हुई ट्रैक्टर परेड की घटना के 2 दिन पहले ही दीप सिद्धू और गैंगस्टर लक्खा सिधाना दिल्ली पहुँचे थे और बताया जा रहा है कि सिंघु बॉर्डर पर रेड लाइट पर बैठे किसानों के बीच लक्खा ने भड़काऊ भाषण भी दिया था।

जेल में ही रहेगा मुनव्वर फारुखी, हाई कोर्ट से जमानत याचिका खारिज: कॉमेडी के नाम पर हिंदू देवी-देवताओं को देता था गाली

कॉमेडी के नाम पर हिंदू देवी-देवताओं पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाला मुनव्वर फारुखी अभी कुछ और दिन जेल में रहेगा। हाईकोर्ट ने उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी है।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने मुनव्वर फारुकी के साथ एक अन्य आरोपी नलिन यादव की जमानत याचिका खारिज कर दी। बेल रिजेक्ट करते हुए हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने गुरुवार (28 जनवरी 2021) को कहा कि भाईचारा और सद्भावना हर नागरिक का संवैधानिक कर्तव्य है।

पहले भी 2 बार नहीं मिला था बेल

हिंदू देवी-देवताओं को लेकर अभद्र टिप्पणी करने वाले मुनव्वर फारूकी को इससे पहले दो बार बेल के लिए इनकार कर दिया गया था। हाई कोर्ट से पहले मजिस्ट्रेट कोर्ट में उसकी याचिका खारिज की गई थी। और उससे पहेल सत्र न्यायालय ने भी जमानत देने से मना कर दिया था।

उल्लेखनीय है कि इस मामले में फारूकी के वकील की ओर से दलील दी गई है कि एफआईआर में स्टैंड अप कॉमेडियन के खिलाफ लगाए गए आरोप सरासर ‘अस्पष्ट’ हैं और उसके खिलाफ राजनीतिक दबाव में मामला दर्ज किया गया।

दम भर मार खाया था

इंदौर के एक इवेंट में मुनव्वर ने देवी-देवताओं और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। तब घटना की जानकारी मिलते ही हिन्दू संगठन के कई सदस्यों ने वहाँ पहुँच कर उसकी पिटाई कर दी थी। इसके बाद वे मुनव्वर फारूकी और आयोजक को थाने लेकर गए थे।

16 साल की लड़की का ‘रेप’, शादी का ऑफर और निकाहशुदा अपराधी को बेल क्योंकि उसके मजहब में…

16 साल की नाबालिग के साथ बलात्कार करने और उसे गर्भवती बनाने के 25 वर्षीय आरोपित को पॉक्सो (Protection of child from sexual offences) की विशेष अदालत ने बुधवार (27 जनवरी 2021) को जमानत दे दी। मुंबई के इस मामले में जमानत इसलिए दी गई क्योंकि आरोपित ने अदालत के सामने कहा कि वह पीड़िता से शादी करना चाहता है। 

अदालत द्वारा आरोपित को जमानत देने की वजह यह थी कि निकाहशुदा आरोपित और पीड़िता के बीच सम्बंधों में ‘सहमति’ थी। इसके अलावा आरोपित ने पीड़िता (जो कि फ़िलहाल नाबालिग है) से दो साल बाद यानी 18 साल की होने पर उससे शादी करने की इच्छा जताई।

पीड़िता की माँ ने शुरुआत में इस मामले में एफ़आईआर दर्ज कराई थी और अब आरोपित की रिहाई के लिए अदालत में हलफ़नामा दायर किया है। पीड़िता की माँ का कहना था कि वह चाहती है कि आरोपित उनकी बेटी से शादी करे क्योंकि उनकी बेटी आरोपित के बच्चे को जन्म दे चुकी है। 

पहली पत्नी की सहमति के सबूत नहीं

आरोपित ने दूसरी बार जमानत याचिका दायर की थी। इसके पहले अदालत ने उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी। वहीं पुलिस ने इस जमानत याचिका का विरोध करते हुए कहा था कि इस बात के कोई सबूत नहीं मौजूद हैं कि आरोपित की पहली पत्नी ने उसकी दूसरी शादी के लिए सहमति जताई थी।

पुलिस के मुताबिक़ आरोपित ने नाबालिग को अपने चंगुल में फंसाया। नाबालिग लड़की को ऐसे रिश्ते के दुष्परिणामों का अंदाज़ा नहीं था। वहीं अब आरोपित हालातों का फ़ायदा उठा कर उससे शादी करने की बात कह रहा है। 

25 वर्षीय निकाहशुदा आरोपित की रिहाई की माँग करते हुए उसके वकील ने अदालत के सामने कहा, “आरोपित के मज़हब में एक से ज़्यादा निकाह करने की इजाज़त है।”

क्या है पूरा मामला?

रिपोर्ट्स के मुताबिक़ घटना का आरोपित पीड़िता के पिता का परिचित है और नाबालिग ने आरोपित के दबाव में गर्भवती होने की बात छुपाए रखी। लगाए गए आरोपों के अनुसार जब पीड़िता ने आरोपित को गर्भवती होने की जानकारी दी तब उसने नाबालिग को धमकी दी। साथ ही यह भी कहा कि वह किसी को नहीं बताए कि होने वाले बच्चे का पिता कौन है।

जब पीड़िता की माँ को उसके शरीर में बदलाव नज़र आया, तब उन्हें शक हुआ कि उनकी बेटी गर्भवती है। इसके बाद नाबालिग के परिवार ने आरोपित को खोजा और उस पर मामला दर्ज कराया। 23 अक्टूबर 2020 को उसे गिरफ्तार किया गया था। 

मामले पर सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद न्यायाधीश ने फैसला सुनाया। उन्होंने कहा, “ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि आरोपित की शादी के बारे में किसी को जानकारी नहीं थी। जैसा कि हमें बताया गया है कि नाबालिग और आरोपित एक दूसरे से शादी करना चाहते हैं (पीड़िता के 18 साल की होने पर), इसके आधार पर ऐसा कहा जा सकता है कि इस सम्बंध में आपसी सहमति थी। ऐसे में आरोपित को जेल में बंद रखने के पीछे कोई वजह समझ नहीं आती है।”     

व्यंग्य: गेहूँ काटते किसान को फोटो एडिट कर दिखाया बैरिकेड पर, शर्म करो गोदी मीडिया!

गणतंत्र दिवस के मौके पर दिल्ली की सड़कों पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे किसानों के खिलाफ जो साजिश गोदी मीडिया ने रची है, उससे गोदी मीडिया ने अपने नाम को चरितार्थ कर लिया। बाकी कसर खेत में धान और गेहूँ काट रहे किसानों की तस्वीरों को फोटोशॉप के जरिए दंगा वाली जगहों पर लगा देने वाले आईटी सेल ने पूरी कर डाली।

हर 15 अगस्त और 26 जनवरी पर ‘क्या हम वास्तव में आजाद हैं?’ वाला निबंध लिखने वाले लिबरल फेसबुक स्तम्भकार किसानों के लिए नारे लिखते रह गए और गोदी मीडिया किसानों को दंगाई साबित करती रही। ऐसे में, एक NDTV ही था, जो सच्चाई को सामने रखकर तूफानों के बीच अपनी निजी सच्चाई पर अडिग रहा।

ऐसे ही एक ‘अन्नदाता’, जो अपने खेतों में गेहूँ की फसल काट रहा था, उसकी तस्वीर को बैरिकेड्स लाँघते और उजाड़ते लगा दी गई। ध्यान से देखने पर पता चलता है कि चालाकी से गोदी मीडिया ने पीले रंग के गेहूँ की फसल को पीले रंग के बैरिकेड्स में बदल दिया। लेकिन NDTV हमेशा सत्य को बाहर ले आता है।

NDTV ने स्पष्ट कर दिया कि ‘किसान’ का चरित्र एक फोटोशॉप से नहीं बदला जा सकता

ऐसी ही एक तस्वीर हमारे सामने आई है, जिसमें एक पुलिसकर्मी शरबत पिलाने और लंगर खिलाने के बाद ‘अन्नदाताओं’ को धन्यवाद दे रहा है। लेकिन गोदी मीडिया को बागों में मोहब्बत नजर नहीं आई और इसे भी यह कहकर दिखाया गया कि किसान पुलिस वालों पर अत्याचार और बर्बरता कर रहे हैं।

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थके हुए पुलिसकर्मी को किसानों ने शरबत पिलाया तो बदले में पुलिस ने उन्हें धन्यवाद कहा

अब इस किसान को ही देख लीजिए। महीनों की मेहनत के बाद फरसा लेकर अपनी फसल काटने जाता यह किसान उसी तरह खुश हो रहा है, जिस तरह अपने घोड़े को अपने अस्तबल में देखकर बाबा भारती खुश हुए थे। क्या इस किसान की गलती ये है कि वो भारत का पेट भरने के लिए अपनी फसल काटने निकला था और गोदी मीडिया की साजिश का शिकार हो गया? क्या अब अन्नदाता को आतंकी साबित किया जाना ही राष्ट्रवाद कहलाएगा?

एक पुलिसकर्मी को किसानों ने दिल्ली में जबरन बिठाकर उन पर फूल भी बरसाए लेकिन मीडिया को इसमें भी दंगा नजर आया।

अब इसी तस्वीर को अगर देखा जाए तो ये किसान किसी धार्मिक आयोजन में करतब कर रहे थे लेकिन गोदी मीडिया ने उनके पवित्र करतब को सड़क पर एडिट कर के दिखाया और पंजाब में चल रहे नुक्कड़ नाटक को दिल्ली पुलिस के बीच ले आए। जो दृश्य वस्तुतः मनोरंजन के लिए था, उसे चालाकी से हिंसा का बना दिया गया।

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ये किसान सिर्फ अपनी कला ही नहीं दिखा रहे थे, बल्कि पुलिस वालों को गुलदस्ता भी भेंट कर रहे थे –

ट्रैक्टर पर बैठकर अपनी मस्ती में अपने खेत जोत रहे एक किसान को तो बैरिकेड्स तोड़कर चढ़ाई करते हुए इस तरह से दिखाया गया, मानो औरंगजेब अपने हाथी पर बैठकर दिल्ली पर चढ़ाई कर रहा हो। डिजिटल इंडिया प्रोग्राम के तहत क्या यही होना था कि एक ट्रैक्टर से खेत जोत रहे अन्नदाता को फोटोशॉप से औरंगजेब साबित कर दिया जाए?

पूँजीवादी गोदी मीडिया एक घुड़सवार अन्नदाता से सिर्फ इस वजह से नाराज है क्योंकि वह घोड़े पर बैठकर अप्निफस्ल की रेकी कर रहा था। लेकिन सामंतशाही की यह हद है कि उसे भी दंगाई साबित किया जा रहा है। क्या यह साबित करने के लिए काफी नहीं है कि हम आज भी ब्रिटिश शासन जैसे ही किसी दौर में जी रहे हैं, जहाँ किसान घुड़सवारी नहीं कर सकता?

अपनी लाठी से पुलिसकर्मियों की पीठ पर मालिश करते हुए अन्नदाताओं को आप कैसे नजरअंदाज कर सकते हैं? लेकिन यहाँ भी पुलिस की पीठ की मालिश करते किसान को दंगाई बता जा रहा है।

इसा तस्वीर में किसान महिला पुलिस को बुला कर अपना ट्रैक्टर दिखा रहे थे, लेकिन हाथ में डंडा था तो बेचारों को गोदी मीडिया द्वारा गलत तरीके से दिखाया गया। अब इस देश में हाथ में कलम रखने वाले पत्रकार और हाथ में डंडा रखने वाले किसान को आतंकवादी घोषित किया जा रहा है।

प्रदर्शनकारी किसानों ने महिला पुलिस को डंडों से पीटा, देखें दिल दहला देने  वाला वीडियो Protesting farmers beat women police officer with sticks video  goes viral - News Nation

मुंबई कर्नाटक का हिस्सा, महाराष्ट्र से काट कर केंद्र शासित प्रदेश घोषित किया जाए: गरमाई मराठी-कन्नड़ राजनीति

हाल ही में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने कर्नाटक में मराठी भाषी क्षेत्रों के महाराष्ट्र में विलय की बात कह पुरानी राजनीति को नए ढंग से पेश किया। इसके बाद कर्नाटक और महाराष्ट्र सरकार के बीच सीमा विवाद पर बयानबाजी बढ़ती है।

सीएम उद्धव ठाकरे की बयानबाजी के बाद अब कर्नाटक की ओर से जवाब आया है। कर्नाटक के डिप्टी सीएम लक्ष्मण सावदी ने इसका जवाब दिया है। उनका कहना है कि कर्नाटक के लोग चाहते हैं कि मुंबई को कर्नाटक में शामिल कर लिया जाए। 

कर्नाटक के डिप्टी सीएम लक्ष्मण सावदी ने मीडियाकर्मियों से बात करते हुए कहा कि महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई को केंद्र शासित प्रदेश घोषित कर देना चाहिए। मुंबई कर्नाटक का हिस्सा है। कर्नाटक के लोगों का मानना है कि मुंबई लंबे समय तक कर्नाटक में रही है, इसलिए मुंबई पर उनका अधिकार है।

डिप्टी सीएम लक्ष्मण सावदी ने उद्धव ठाकरे के बयान का जवाब देते हुए कहा, “हमारी माँग है कि मुंबई को कर्नाटक में शामिल किया जाए। कर्नाटक में शामिल किए जाने तक मुंबई को केंद्र शासित प्रदेश घोषित किया जाना चाहिए।” 

दरअसल हाल ही में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने कर्नाटक में मराठी भाषी क्षेत्रों के विलय के विरोध जैसे अपने पुराने एजेंडे को पुनर्जीवित करने के प्रयासों को हवा दी थी। शिवसेना बेलगाम क्षेत्र को कर्नाटक में शामिल करने के खिलाफ रही है और इसके लिए उसने मराठी को आधार बनाया है।

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने बुधवार (जनवरी 27, 2021) को कहा था कि जब तक सर्वोच्च न्यायालय इस मुद्दे पर अपना अंतिम फैसला नहीं दे देता, तब तक कर्नाटक की राज्य की सीमा पर मराठी भाषी लोगों के वर्चस्व वाले क्षेत्रों को केंद्र शासित प्रदेश घोषित किया जाना चाहिए।

दोनों राज्यों के बीच सीमा विवाद पर एक पुस्तक के लोकार्पण पर बोलते हुए, उद्धव ठाकरे ने कहा था कि हम सभी को कर्नाटक सरकार के अन्याय और अत्याचार का विरोध करने के लिए एक मंच पर आना चाहिए। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के मुताबिक़ अगर मराठी बोलने वाले लोग कर्नाटक सरकार के खिलाफ आवाज उठाते हैं तो उनके खिलाफ झूठे केस दायर किए जाते हैं, जिसके खिलाफ हमें एकजुट होने की जरूरत है।

उल्लेखनीय है कि बेलगाम क्षेत्र कर्नाटक और महाराष्ट्र की सीमा पर स्थित है, जहाँ मराठी भाषी बहुसंख्यक रहते हैं। महाराष्ट्र कुछ क्षेत्रों पर अपना दावा करता है, जिनमें बेलगाम, करवार और निप्पनी शामिल हैं और ये कर्नाटक का हिस्सा हैं, इन क्षेत्रों में अधिकांश आबादी मराठी भाषी है। दोनों राज्यों के बीच विवाद का मामला कई वर्षों से उच्चतम न्यायालय के समक्ष लंबित है।

इस पर ठाकरे ने कहा, “जब सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई चल रही है, तो कर्नाटक सरकार बेलगाम का नाम बदलकर उसे दूसरी राजधानी घोषित करती है, एक विधानमंडल भवन का निर्माण करती है और वहाँ एक विधायिका सत्र आयोजित करती है। क्या यह अदालत की अवमानना ​​नहीं है?”