Home Blog Page 4111

स्वामीये शरणम् अय्यप्पा: गणतंत्र दिवस के दिन राजपथ पर सुनाई देगा ब्रह्मोस रेजिमेंट का यह वॉर क्राई

महज एक सप्ताह बाद गणतंत्र दिवस की परेड के अवसर पर नई दिल्ली में राजपथ पर ‘स्वामीये शरणम् अय्यप्पा’ के पवित्र मंत्र का जाप सुनाई देने वाला है। 861 ब्रह्मोस मिसाइल रेजिमेंट (Brahmos Missile Regiment), जो भारत की सबसे घातक सेनाओं में से एक है, राष्ट्रीय राजधानी में गणतंत्र दिवस समारोह में भाग लेगी और इस अवसर पर भगवान अयप्पा की मंत्रमुग्ध करने वाली प्रार्थनाओं का जाप करने जा रही है।

भारतीय सेना की आर्टिलरी रेजिमेंट का एक हिस्सा 861 मिसाइल रेजिमेंट, राजपथ पर इस वर्ष गणतंत्र दिवस समारोह के दौरान ब्रह्मोस मिसाइल का प्रदर्शन करेगी। रेजिमेंट का ‘वॉर क्राई’ (युद्ध के दौरान लगाए जाने वाले नारे) ‘स्वामीये शरणम् अय्यप्पा’ है।

हाल ही में, 861 मिसाइल रेजिमेंट और उसके ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम ने 15 जनवरी को मनाए गए 73वें भारतीय सेना दिवस में भाग लिया था। इस अवसर पर भगवान अयप्पा के पवित्र मंत्रों को पहली बार सुना गया था, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर खूब लोकप्रिय हुआ था।

संयोग से, ये युद्ध घोष यानी, वॉर क्राई रेजिमेंट द्वारा दुर्गा माता की जय और भारत माता की जय के नारों के साथ दोहराए गए। ब्रह्मोस रेजिमेंट का वॉर क्राई भगवान अयप्पा को श्रद्धांजलि के रूप में देखा जाता है क्योंकि उन्हें एक धनुष और तीर पकड़े बाघ के ऊपर सवार होकर बुरी ताकतों को पराजित करने का प्रतीक माना जाता है।

इसके अलावा, भारतीय सेना के नए भर्ती किए गए राफेल लड़ाकू जेट भी गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल होंगे। वायु सेना ने घोषणा की है कि परेड एक ‘वर्टिकल चार्ली’ संरचना में होगी। वर्टिकल चार्ली एक विमान प्रदर्शन करने की एक विधि है जो कम ऊँचाई पर उड़ान भरती है और ऊपर की ओर उछलती है।

861 ब्रह्मोस मिसाइल रेजिमेंट

गौरतलब है कि 861 मिसाइल रेजिमेंट, भारतीय सेना में वर्तमान में तीन ब्रह्मोस रेजिमेंटों में से एक है। यह 20 जून 1963 को पहली बार 863 लाइट बैटरी से अपग्रेड किया गया था, जिसमें 35 हेवी मोर्टार रेजिमेंट की बैटरी के साथ 121 (स्वतंत्र) हैवी मोर्टार बैटरी (कांगो) को मर्ज किया गया था। पहले कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल सेवा राम थे। रेजिमेंट ने ऑपरेशन मेघदूत, ऑपरेशन विजय और ऑपरेशन पराक्रम में भी भाग लिया।

Jesus Calls चलाने वाले ईसाई धर्म प्रचारक पॉल दिनाकरन के 28 ठिकानों पर आयकर की छापेमारी

तमिलनाडु के चेन्नई में आयकर विभाग की कई इलाको में छापेमारी चल रही है। यह छापेमारी चेन्नई, कोएंबटूर सहित ‘जीसस कॉल्स’ के नाम से ईसाई मिशनरी चलाने वाले विवादास्पद ईसाई धर्म प्रचारक पॉल दिनाकरन के 28 ठिकानों पर हुई है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, आयकर विभाग ने बुधवार को ईसाई धर्म प्रचारक पॉल दिनाकरण के 28 ठिकानों पर आयकर विभाग ने छापेमारी की है। जिन परिसरों में आयकर विभाग ने छापेमारी की है, उनमें करुणा प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान संस्थान और जीसस कॉल्स भी शामिल हैं। बता दें जीसस कॉल्स, पॉल दिनकरन द्वारा संचालित एक संगठन है, जो पूरे तमिलनाडु में ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार करता है।

आईटी अधिकारियों ने बुधवार (20 जनवरी, 2021) की सुबह चेन्नई के कोएंबटूर और तमिलनाडु के विभिन्न अन्य स्थानों पर दिनाकरन की संपत्तियों की तलाशी ली। आयकर विभाग ने ईसाई संगठन द्वारा संचालित करुण्या क्रिश्चियन स्कूल पर भी छापा मारा है।

दरअसल, आयकर विभाग को दिनाकरन और जीसस कॉल्स के खिलाफ टैक्स चोरी और विदेशी फंडिंग में अनियमितता की शिकायत मिली थी, जिसके बाद आयकर विभाग ने यह छापेमारी शुरू की है।

गौरतलब है कि पॉल दिनाकरन, टीवी पर लगातार ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार करने और उसके जरिए फंड इकट्ठा करने वाले डीजीएस दिनाकरन के बेटे हैं। पॉल तमिलनाडु में ईसाई धर्म प्रचारक के रूप में जाने जाते है। उनके काफी फॉलोवर्स हैं और वे ईसाई प्रचार-प्रसार के लिए कई संगठन भी चलाते हैं।

45 साल के ‘मुस्लिम’ ने 12 साल की लड़की का किया कई बार बलात्कार, 24/7 बंदी बनाकर साफ करवाता था तबेला

पाकिस्तान में एक 12 साल की नाबालिग ईसाई लड़की को एक अधेड़ उम्र के कट्टरपंथी के चंगुल से छुड़ा लिया गया है। ऐसा दावा द टेलीग्राफ का है। लड़की पाँच माह तक 45 साल के ‘मुस्लिम’ आदमी के कब्जे में थी। इस आदमी ने कुछ समय पहले पीड़िता का अपहरण करके उसका बलात्कार किया और फिर उसपर निकाह का दबाव बना रहा था। 

आरोप है कि लड़की से आरोपित पूरे पूरे दिन काम करवाता था और बाद में जानवरों का मल साफ करवाता था। जब पुलिस ने फैसलाबाद से बच्ची को पिछले माह बचाया तब उसके पैरों में बेड़ियों के निशान थे।

नाबालिग के परिजनों का कहना है कि उन्होंने इस संबंध में कई दफा पुलिस में शिकायत की। लेकिन हर बार पुलिस में उनकी सुनवाई नहीं हुई। बाद में इस मामले को क्रिश्चियन संस्था ने उठाया जिनका दावा है कि पाकिस्तान में हर साल सैंकड़ों ईसाई व हिंदू लड़कियों का अपहरण होता है और जबरन उनसे इस्लाम कबूल करवाया जाता है।

पीड़िता के पिता कहते हैं, “उसने (उनकी बेटी) मुझे बताया कि उसके साथ नौकरों जैसा बर्ताव होता था। उससे पूरे दिन काम करवाया जाता था। तबेला साफ करवाया जाता था। 24 घंटे उसे बेड़ियों में बाँधे रखा जाता था। ”

डेलीमेल की रिपोर्ट के अनुसार, लड़की का अपहरण पिछले वर्ष 12 जून को हुआ था। इसके बाद उसका कई बार बलात्कार हुआ। परिवार ने शिकायतें की, पर सितंबर तक इस मामले में पुलिस ने कोई रिपोर्ट दायर नहीं की। बदले में धमकी अलग दी गई कि अगर ज्यादा कुछ कहा तो ईशनिंदा का आरोप लगा दिया जाएगा।

पीड़िता के पिता ने पिछले दिनों उस मेडिकल रिपोर्ट की आलोचना भी की थी, जिसमें उनकी बेटी को 16-17 साल की कहा गया था जबकि वास्तविकता में उसके जन्म प्रमाण पर वह 12 साल की थी। जाहिर है इतनी कम उम्र में इतने अत्याचार झेलने के बाद लड़की भीतर से टूट चुकी है। उसे बेड़ियों से आजाद कराने के बाद अलग देख रेख में रखा गया है।

बता दें कि पाकिस्तान में हिंदू महिलाओं के साथ-साथ ईसाई महिलाओं पर भी समान रूप से अत्याचार होता है। इससे पूर्व एक मायरा शहबाज नाम की लड़की का अपहरण का केस सामने आया था। मायरा ने बताया था कि 28 अप्रैल को बंदूक की नोक पर उसका अपहरण हुआ। बाद में उसे ड्रग दिए गए और बलात्कार करके उसका धर्म परिवर्तन करवाकर निकाह किया गया।

वामपंथियों का जीना दुश्वार करके रहूँगी, अकाउंट ‘बैन’ करवा के धमकी देने की कोशिश मत करो: कंगना रनौत की चुनौती

बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत ने बुधवार (जनवरी 20, 2021) को उन लोगों पर निशाना साधा जो कल से उनके अकॉउंट को बंद करवाने की माँग कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि उनकी वर्चुअल पहचान कभी भी देश के लिए शहीद हो जाएगी लेकिन उनकी देशभक्ति हमेशा फिल्मों के जरिए नजर आती रहेगी। 

कंगना ने अपने ट्वीट में लिबरलों पर निशाना साधते हुए कहा, “लिबरलों ने अपने चाचा जैक के आगे रोना रोया और मेरा अकॉउंट अस्थायी रूप से प्रतिबंधित करवाया। ये लोग मुझे धमकी दे रहे हैं। मेरा अकॉउंट/ वर्चुअल पहचान कभी भी देश के लिए शहीद हो सकता है लेकिन मेरा देशभक्ति वाला रूप हमेशा मेरी फिल्मों के जरिए नजर आता रहेगा। तुम्हारा जीना दुश्वार करके रहूँगी।”

बता दें कि हाल में कंगना के एक ट्वीट पर कई लिबरलों ने रोना रोया था। इसमें उन्होंने बताया था कि भगवान कृष्ण ने भी 99 बार शिशुपाल को माफ किया था और उसके बाद उसका सिर काटा था। उन्होंने लिखा था, “पहले शांति फिर क्रांति… समय है कि सिर काटे जाएँ। जय श्री कृष्ण।” इसके बाद उनके अकॉउंट को बंद करने की माँग उठने लगी। बाद में कंगना ने अपना पोस्ट डिलीट किया लेकिन फिर भी उनके ख़िलाफ़ सोशल मीडिया अभियान चलता रहा।

अपना पक्ष रखने के कारण लगातार इतना भारी विरोध झेलने के बाद कंगना ने उक्त ट्वीट किया। इस ट्वीट पर भी कई लोगों ने उन्हें अपशब्द कहे। इंसार शाह ने लिखा, “तुम्हारा अकाउंट परमानेंट बंद होना चाहिए दिन भर मुँह से *&^ रहती हो और अपना इलाज कराओ किसी सरकारी पागलखाने में।”

मोहम्मद नाजिम उनके लिए लिखता है, “आंटी आपके करने से कुछ नहीं होता। आधा भारत तो आपको बद्तमीज की श्रेणी में गिनता है।”

अब्दुल नाम के अकॉउंट से कंगना के लिए लिखा जाता है, “जीना दुश्वार तो हमारी गली के आज कल कुत्तों ने कर रखा है, रात को भो-भो करके। आप से नहीं होगा क्योंकि आप तो हमारी झाँसी की रानी हो।”

उल्लेखनीय है कि अमेजन प्राइम की विवादित सीरीज ‘तांडव’ पर मचे बवाल के बाद इसके मेकर्स ने लोगों की भावनाओं को आहत करने के लिए बिना शर्त माफी माँगी थी। लेकिन इस माफी को सुन सब अधिक भड़क गए और कंगना ने भी इस पर प्रतिक्रिया दी।

कंगना रनौत ने सीरीज के मेकर्स से पूछा कि क्या उनमें ‘अल्लाह’ का मजाक बनाने की हिम्मत है? उन्होंने लिखा, “माफी माँगने के लिए बचेगा कहाँ? ये सीधा गला काट देते हैं, जिहादी देश फतवा निकाल देते हैं, लिबरल मीडिया वर्चुअल लिंचिंग कर देती है, तुम्हें ना सिर्फ़ जान से मार दिया जाएगा बल्कि उस मौत को भी जस्टिफ़ाई किया जाएगा, बोलो अली अब्बास जफर, है हिम्मत अल्लाह का मज़ाक़ उड़ाने की?”

‘गायब’ होने के बाद पहली बार दिखे जैक मा… लेकिन चायनीज मीडिया ने छुपा ली ‘असली पहचान’: रहस्य गहराया

अलीबाबा संस्थापक जैक मा (jack ma) के गायब होने की खबरों के बीच वह पहली बार सार्वजनिक तौर पर नजर आए हैं। चीन के सरकारी मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स ने दावा किया है कि बुधवार (जनवरी 20, 2021) को उन्होंने चीन के 100 ग्रामीण शिक्षकों के साथ वीडियो लिंक के जरिए संवाद किया। जैक मा ने शिक्षकों से कहा, "जब कोरोना वायरस खत्‍म हो जाएगा तो हम फिर मिलेंगे।"

गौरतलब है कि चीन में अफवाहों का बाजार गर्म है कि अलीबाबा का नियंत्रण चीन सरकार अपने हाथ में ले सकती है ऐसे में ग्‍लोबल टाइम्‍स ने भी जैक मा को इंग्लिश टीचर से उद्यमी बनने वाला बताया है और जैक मा के परिचय में उस अलीबाबा का जिक्र तक नहीं किया गया जिसकी स्‍थापना खुद उन्‍होंने की है।

बता दें कि इस वीडियो के आने से पहले जैक मा करीब दो महीने से किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम में नहीं दिखाई दिए थे। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, जैक मा ने चीन के वित्तीय नियामकों और सरकारी बैंकों की पिछले साल अक्टूबर में दिए गए भाषण की आलोचना की थी। इसी आलोचना के बाद उनका और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ विवाद भी हुआ और इस विवाद के बाद से वो लगभग दो महीने से नजर नहीं आए थे।

उससे पहले वह अपने ही टीवी शो ‘अफ्रीका के बिजनेस हीरो’ में नजर आने वाले थे, लेकिन उनकी गैर उपस्थिति ने कई सवाल खड़े कर दिए। शो में उनकी जगह किसी और शख्स को भेज दिया गया। टीवी शो में शामिल नहीं होने पर अलीबाबा के प्रवक्ता ने कहा कि शेड्यूल को लेकर हुए विवाद की वजह से वे टीवी शो में शामिल नहीं हुए।

मालूम हो कि चीन की सरकार अलीबाबा ग्रुप पर मोनोपोली यानी एकाधिकार के गलत इस्तेमाल को लेकर तहकीकात कर रही है। अलीबाबा ने कहा था कि उन्हें एसएएमआर (SAMR) के जरिए एंट ग्रुप (Ant Group) को भी नोटिस भी भेजा गया है। यह जैक-मा की ई-कॉमर्स कंपनी अलीबाबा डॉट कॉम और फिनटेक एंपायर के लिए बहुत बड़ा झटका माना गया था।

केरल से आज भी 6000 कोरोना पॉजिटिव: जिन्हें नाज था केरल मॉडल पर वो कहाँ है?

कोरोना वायरस महामारी की शुरुआत से ही वामपंथी शासन वाले केरल राज्य के ‘कोरोना मॉडल’ की कथित सफलता को लेकर उदारवादी और वामपंथी वर्ग द्वारा जमकर प्रोपेगेंडा चलाया गया। वास्तविकता यह है कि सिर्फ मंगलवार (जनवरी 19, 2021) को केरल राज्य में 6,186 लोग कोरोना वायरस से संक्रमित हुए हैं और अब तक राज्य में रिपोर्ट किए गए कुल मामले 8,57,80 हो गए हैं।

केरल राज्य में कोरोना संक्रमण के मामलों में यह बढ़त ऐसे समय में दर्ज की गई, जब देश और बाकी अन्य राज्यों में संक्रमण से ज्यादा रिकवरी के आँकड़े हैं। इन नए मामलों में, 5,541 लोकल ट्रांसपोर्ट द्वारा संक्रमित मामले हैं जबकि 484 मामलों के संक्रमण का स्रोत उपलब्ध नहीं है। ख़ास बात यह है कि केरल राज्य में मंगलवार को सामने आए संक्रमित लोगों में 69 चिकित्सा या पैरामेडिकल कर्मचारी हैं और 92 लोग राज्य के बाहर से आए हैं।

जनवरी माह में दूसरी बार दर्ज हुआ संक्रमण के मामलों में उछाल

मंगलवार को केरल राज्य में 6,186 कोरोना संक्रमण के मामले दर्ज किए गए, जो कि जनवरी माह में दूसरी बार सबसे ज्यादा संख्या है। वहीं, पूरे देश में 13,821 नए संक्रमण पाए गए। यानी, मंगलवार के दिन पूरे देश में कोरोना के मामलों में 45% मामले अकेले केरल से दर्ज हुए हैं।

पत्रकारों की विच हंटिंग में मशगूल महाराष्ट्र राज्य में कोरोना के संक्रमण के मामलों में दूसरे स्थान पर है, जहाँ मंगलवार को 2294 केस दर्ज किए गए। इस तरह से, पूरे देश में कोरोना संक्रमण के मामलों में 61% मामले मात्र महाराष्ट्र और केरल, इन्हीं दो राज्यों से दर्ज किए गए।

राज्य में बढ़ती कोरोना मामलों की संख्या पर केरल की स्वास्थ्य मंत्री केके शैलजा ने संदेह जताते हुए कहा है कि एक स्टडी के अनुसार, केरल में आगामी जुलाई माह तक ही कोरोना संक्रमित मामलों के प्रति दिन 1,000 तक आने की उम्मीद की जा सकती है।

केरल की स्वास्थ्य मंत्री ने त्योहारों को बताया दोषी

केके शैलजा ने कहा कि स्थानीय निकाय चुनाव और त्योहार राज्य में कोरोना मामलों में वृद्धि का कारण रहे। उन्होंने कहा कि टीकाकरण अभियान एक सकारात्मक संकेत है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम आराम कर सकते हैं।

लिबरल्स का ‘केरल मॉडल’ हुआ फुस्स

‘कोरोना का केरल मॉडल’ पर प्रोपेगेंडा समाचार चैनल के प्रोपेगेंडा पत्रकार रवीश कुमार ने भी उतावलापन दिखाया और जमकर झूठ फैलाया था। रविश कुमार अपने उतावलेपन पर रोक नहीं लगा पाए और मई 13, 2020 को ही ‘केरल मॉडल’ पर जमकर ज्ञान दिया और कहा कि देश को इससे सीखना चाहिए।

दिलचस्प बात ये रही कि मई 14, 2020 को ही ध्रुव राठी नाम के एक ‘सनसनीखेज दावाकार’ ने भी अपने यूट्यूब चैनल पर यही दावे करते हुए जमकर केरल की तारीफ़ कर डाली थी।

जबकि, हालात ये हैं कि बाकी राज्य, जिनमें उत्तर प्रदेश बड़ी आबादी के बावजूद इस महामारी पर अंकुश लगाने स्तर तक कामयाब रहा, अपने मॉडल्स की मार्केटिंग के बजाय चुपचाप अपना काम करते रहे और आज इन राज्यों में कोरोना के केस एकदम न्यून हैं।

लेकिन बड़ा सवाल यही है जो मजहबी फैक्ट चेकर वेबसाइट ऑल्टन्यूज़ के संस्थापक प्रतीक सिन्हा 2015 से ही पूछते आ रहे हैं – “गुजरात मॉडल क्यों? क्या हम स्वास्थ्य का केरल मॉडल अपना सकते हैं?”

फिरदौस ने आदिवासी युवती का 8 साल तक किया यौन शोषण, फिल्मों में काम का झाँसा दे ले गया पोर्न इंडस्ट्री: भाई है गाँव का मुखिया

झारखंड के गढ़वा जिले में स्थित भवनाथपुर के एक मामले में फिरदौस आलम को स्थानीय पुलिस ने गिरफ्तार किया है। उसने शादी का झाँसा देकर एक आदिवासी युवती का 8 वर्षों तक यौन शोषण किया। मकरी गाँव निवासी फिरदौस के बारे में पुलिस को सूचना मिली थी कि वो जिला मुख्यालय के नवादा मोड़ पर छिपा हुआ है। गुप्त सूचना के बाद पुलिस ने उसे धर दबोचा। उसके खिलाफ स्थानीय थाने में नामजद मामला दर्ज है।

झगराखाँड़ की एक आदिवासी युवती ने उसके खिलाफ केस दर्ज कराया था। उसके बाद से ही वो फरार चल रहा था। जेएसआई रामप्रसाद इंदवार, सहायक पुलिस प्रवेश यादव सहित अन्य पुलिसकर्मियों को मिला कर छापेमारी दल का गठन किया गया, जिसके बाद उसे पकड़ने में कामयाबी मिली। आरोपित फिरदौस आलम का भाई अब्दुल्लाह अंसारी मकरी पंचायत का मुखिया है। आरोप है कि अपने भाई की करतूतों में उसने भी पूरा साथ दिया।

आदिवासी युवती का कहना है कि फिरदौस के साथ उसका मेलजोल तभी से बढ़ने लगा था, जब वो 8वीं कक्षा की छात्रा थी। उसके बाद से 8 साल तक वो उसका यौन शोषण करता रहा। वो चाहता था कि पीड़िता पोर्न फिल्मों में काम करे। इसके लिए वह उसे लेकर दिल्ली तक भी गया था। लेकिन, युवती इससे लगातार इनकार करती रही। अगस्त 2020 में कोरोना वायरस लॉकडाउन के दौरान ही उसने शादी भी कर डाली।

विरोध करने पर आरोपित और उसके मुखिया भाई ने अपने रसूख का इस्तेमाल करते हुए जान से मार डालने की धमकी दी। पीड़िता ने राज्य के बाल आयोग में भी शिकायत भेजी थी। वहाँ अध्यक्ष उपेन्द्रनाथ दूबे ने चाइल्ड लाइन के सदस्यों को इस मामले में जाँच करके रिपोर्ट सौंपने को कहा। आरोपित युवती को फिल्मों में काम कराने का झाँसा देता था। जब बातचीत शुरू हुई थी, तब उसकी उम्र मात्र 15 वर्ष ही थी।

पीड़िता जब रोने लगी और परिवार की तरफ से दबाव बनवाया, तब जाकर वो उसे दिल्ली से वापस लेकर आया। आरोपित उसे लेकर चोपन, टाउनशिप और भवनाथपुर में घूमता रहता था और जहाँ भी खुद रहता था, उसे साथ ही रखता था। इसके बाद उसने खरौंधी मोड़ पर प्रज्ञा केंद्र खोल लिया और युवती को भी वहीं रखने लगा। इस दौरान उसने कई बार शारीरिक सम्बन्ध बनाए। किसी और लड़की से शादी के बाद वो अपने भाई के साथ मिल कर पीड़िता को रास्ते से हटाने की कोशिश में लग गया।

झारखंड में पिछले कुछ दिनों में रेप की कई घटनाएँ सामने आई हैं। सितम्बर 2020 में ललमटिया के बसडीहा में एक आदिवासी नाबालिग लड़की के साथ 2 युवकों द्वारा रास्ते से किडनैप कर सामूहिक दुष्कर्म करने का मामला सामने आया था। इस मामले में पुलिस ने छापेमारी कर मुख्य आरोपित नसीम साई को गिरफ्तार किया था। दूसरे आरोपित का नाम सद्दाम उर्फ़ सादाब था। एक अन्य मामले में खुद सीएम हेमंत सोरेन पर भाजपा नेताओं ने कई आरोप लगाए थे।

‘रामायण, रामकथा अनादि है… अनंत है’: गुरु गोविंद सिंह को भूल गए सिख-हिंदू में घृणा फैलाने वाले कट्टरपंथी और नेता

आज ‘किसान आंदोलन’ के नाम पर हिन्दुओं और सिखों को अलग-अलग दिखाने की कोशिश हो रही है, इन दोनों में दरार पैदा किया जा रहा है और वैमनस्य का माहौल बनाया जा रहा है। जिस पार्टी ने सिखों का नरसंहार करवाया, वो आज उनकी हितैषी होने का दावा कर रही है। क्या सच में ऐसा है? इसके विश्लेषण के लिए सिखों के दसवें और अंतिम गुरु गोविंद सिंह की जयंती से अच्छा मौका कब हो सकता है।

आगे बढ़ने से पहले जानते चलें कि गुरु गोविंद सिंह का जन्म आज के पटना साहिब में दिसंबर 22, 1666 में हुआ था। उनके पिता गुरु तेग बहादुर नौवें सिख गुरु थे, जिन्हें मुगलों के हाथों अत्याचार का सामना करना पड़ा। इस्लामी आक्रांताओं ने उनकी हत्या कर दी, जिसके बाद मात्र 9 वर्ष की आयु में ‘गोबिंद राय’ को गुरु की पदवी संभालनी पड़ी। उन्होंने ‘दशम ग्रंथ’ की रचना की और सिख योद्धा समुदाय ‘खालसा’ की स्थापना की।

गुरु गोविंद सिंह का नाम ही ‘गोविंद’ था, जो भगवान कृष्ण का नाम था। उनके पिता ने मौत को इसीलिए हँसते हुए गले लगा लिया, क्योंकि उन्हें कश्मीरी पंडितों पर हो रहे अत्याचार और जबरन इस्लामी धर्मांतरण का प्रतिकार करना था। गुरु गोविंद सिंह के 4 साहिबजादों ने भी धर्म के लिए क़ुरबानी दे दी। आज ये तथ्य झुठलाया नहीं जा सकता कि इस पूरे अत्याचार की जड़ इस्लामी आक्रांता थे, उनकी क्रूरता थी।

फ़तेह शाह, रुस्तम खान, पाइंदा खान, दीना बेग, वज़ीर खान, सैयद खान, रमजान खान, जबरदस्त खान और नाहर खान – ये उन इस्लामी कमांडरों के नाम थे, जिनके खिलाफ गुरु ने एक दर्जन से भी अधिक युद्ध लड़े। इनमें से अधिकतर औरंगज़ेब के पिट्ठू ही थे। इस दौरान राजा धर्मपाल जैसों ने गुरु का साथ दिया। मुग़ल इस बात से नाराज थे कि गुरु गोविंद सिंह ने सिखों को योद्धा बना दिया। वो चाहते थे कि उनके अत्याचारों का प्रतिकार ही न हो।

ख़ालसा को एक ख़ास पहचान दी, एक ख़ास कार्य सौंपा गया और इसीलिए संगत में ये ख़ास हुए। आगे के कई युद्धों में खालसा पंथ ने जो बहादुरी दिखाई, वो तो इतिहास है। 13 अप्रैल वो तारीख है, जब 1699 में गुरु गोविन्द सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की थी। 321 साल हो गए लेकिन सिखों का मातृभूमि और धर्म के प्रति आस्था अडिग ही होती चली गई। गुरु गोविन्द सिंह ने एक तरह से समुदाय को पुनर्जीवन दिया

सिख गुरु हिन्दू देवी-देवताओं की ही पूजा करते थे, तीर्थाटन करते थे। गुरु नानक अयोध्या सहित पूरे देश के हिन्दू तीर्थों के यात्रा पर निकले थे। मध्यकालीन युग में हिंदू और सिख योद्धाओं और महान शख्सियतों की लड़ाई इस्लामी आक्रमण से ही थी। 11वीं शताब्दी से ही भारत में आतंक मचाने वाले इस्लामी आक्रांताओं ने तब तक अपनी क्रूरता जारी रखी, जब तक 18वीं सदी में मराठों ने उन्हें नेस्तनाबूत नहीं किया।

उससे पहले विजयनगर साम्राज्य, मराठे, राजपूत साम्राज्य और दक्षिण भारत के साम्राज्यों ने हिन्दू अस्मिता को जिंदा रखा। वो मुस्लिम आक्रांताओं से लोहा लेते रहे। भक्तिकाल आया और आम जनमानस में हिंदुत्व को जिंदा रखने का बीड़ा कवियों-संतों ने उठा लिया। गुरु ग्रंथ साहिब में भगवान श्रीराम और उनकी कथा का जिक्र है। सिख और हिंदू कभी अलग थे ही नहीं। उन्हें अलग करने की साजिश पहले मुगलों ने की, अब कुछ राजनीतिक दल कर रहे हैं। वो चाहते हैं कि सिखों को गुरु गोविंद सिंह की शिक्षा याद न रहे और वो हिन्दुओं से घृणा करें।

गुरु ग्रन्थ साहिब सिखों की सबसे पवित्र पुस्तक है। गुरु गोविंद सिंह जानते थे कि आने वाले समय में अगर गुरु परंपरा जारी रही तो इसका गलत उपयोग किया जा सकता है, इसीलिए उन्होंने गुरु ग्रन्थ साहिब को ही सिखों को गुरु के रूप में मानने का निर्देश दिया, क्योंकि इसमें सभी सिख गुरुओं की वाणी समाहित है। इसी में गुरु अमरदास ने राम का नाम परमात्मा के रूप में लिखा है। उन्होंने इसमें समझाया है:

राम-राम करता सभ जग फिरै, राम न पाया जाए।
गुर कै शब्दि भेदिआ, इस बिध वासिया मन आए।।

इसमें उन्होंने बताया है कि सिर्फ राम नाम लेने से परमात्मा प्राप्त नहीं हो जाते, बल्कि हमें इस शब्द के मर्म को भी अपने मन में बसाना चाहिए। सिख गुरुओं ने राम और परमात्मा को एक ही माना है।ऐसे में आज अगर अचानक कुछ लोग आकर कहते हैं कि राम मंदिर सिखों का नहीं है या फिर हिन्दू और सिख अलग हैं, तो उनके मन में खोट है। नाम जपने की परंपरा हिन्दुओं में भी है, सिख गुरुओं ने भी इसकी महिमा का बखान किया है। गुरु नानक से लेकर गोविंद सिंह तक ने, किसी ने सिखों व हिन्दुओं को अलग नहीं समझा।

राम को सिखों से अलग नहीं किया जा सकता। गुरु अर्जुन दास ने ‘आदिग्रन्थ’ में ही रामकथा कह दी है। आप एक बात पर गौर कीजिए। सिख धर्म में निर्गुण की ही उपासना होती आई है और वहाँ अवतारों को लेकर उस तरह की मान्यता नहीं है। बावजूद इसके ‘हुकमि उपाई दस अवतारा‘ लिख कर गुरुवाणी ने सनातन के दशावतार को मान्यता दी है। राम-रावण युद्ध का प्रसंग भी उसमें है। “भूलो रावण मुगधु अचेति, लूटी लंका सीस समेत” वाली पंक्ति पर गौर कीजिए।

स्वयं गुरु नानक ने ही राम को गुरुमुख के रूप में चित्रित किया है। परमात्मा की शक्ति से मंडित मुक्तात्मा को ही इन ग्रंथों में ‘गुरुमुख’ कहा गया है। गुरु नानक लिखते हैं, “गुरुमुखि बाँधियों सेतु बिधातै, लंका लूटी देती संतापै। रामचंद्र मारिउ अहिं रावण, भेद बभीषन गुरुमुखि परचाईवु।” निर्गुण ब्रह्म सर्वव्यापक है और गुरु ग्रन्थ साहिब में उसे ‘राम’ कह कर ही पुकारा गया है। गुरुवाणी में बार-बार राम नाम का प्रयोग है।

अब आज बहुत से ऐसे लोग पैदा हो गए हैं, जो कहते हैं कि कबीर के राम अलग थे, तो नानक के राम अलग थे, बाल्मीकि के राम अलग थे और तुलसीदास के राम अलग थे। असल में ये सब भुलावे के लिए किया जाता है। राम एक ही थे, उन्हें विभिन्न महापुरुषों ने अलग-अलग रूप में देखा। कहीं वो मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, कहीं एक आदर्श राजा तो कहीं परमब्रह्म। वो तीनों ही हैं। सिखों और हिन्दुओं में दरार पैदा करने के लिए इस तरह की बातें की जाती हैं।

गुरु गोविंद सिंह ने प्राचीन सनातन ग्रंथों का आम जनमानस की भाषा में अनुवाद किया। ‘गोविंद रामायण’ का जिक्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी किया था। गुरु गोविंद सिंह ने नैनादेवी पहाड़ के नीचे सतलज नदी के किनारे बैठ कर जुलाई 23, 1698 को ‘रामावतार’ की रचना पूरी की थी। इनमें करीब 900 श्लोक युद्ध को लेकर विस्तृत विवरण देते हैं। सिख आज भी दशहरा मनाते हैं। उन्होंने इसके अंत में लिखा है – “रामायण अनंत है। रामकथा सदा अनादि और अनंत रहेगी।

असली बात तो ये है कि जिस 1984 के दंगे ने सिखों और हिन्दुओं के बीच दरार डाली, उसी दंगे के अपराधी आज दोनों को फिर से अलग करने में लगे हुए हैं और खुद को सिखों का हितैषी बता रहे हैं। गुरु गोविंद सिंह के जिन साहिबजादों को दीवार में जिंदा चुनवाया गया और युद्ध में मार डाला गया, उन इस्लामी आक्रांताओं के वंशजों की पैरवी की जाती है। सिख और हिंदू सनातन के ही अंग हैं और सदा रहेंगे, गुरु गोविंद सिंह की रामकथा की तरह। सिखों और हिन्दुओं में घृणा फैलाने वाले गुरु गोविंद सिंह को पढ़ें।

सबसे बुरी स्थिति, क्या होगा परिणाम, कितने लोगों की मौत… सब जोड़-घटाव करते हैं डोवाल, फिर होता है ‘स्ट्राइक’

हकीकत में ‘जेम्स बॉन्ड’ जैसी जिंदगी जी चुके भारत के वर्तमान राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल (अजीत डोभाल) एक ऐसी शख्सियत हैं, जिनके जीवन से जुड़े किस्से किसी फिल्मी हीरो से कम नहीं हैं। इनकी दूरदर्शिता का ही परिणाम रहा कि भारत कई पूर्वानुमानित हमलों से सुरक्षित बच सका। न जाने कितने आतंकियों को इन्होंने बातों ही बातों में सरेंडर करवाया और न जाने कितनों को भारत के पाले में आने के लिए मना डाला। 

स्थिति से निपटने और त्वरित फैसले लेने की इनकी फितरत का ही परिणाम था कि कश्मीर से लेकर मिजोरम तक में उठी विद्रोह की आवाजों का समय रहते निपटान हो सका और बाद में सर्जिकल स्ट्राइक व बालाकोट एयर स्ट्राइक के जरिए डोवाल ने साबित किया कि उनका कोई विकल्प हो ही नहीं सकता।

20 जनवरी 1945 में इस शख्सियत ने उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल में जन्म लिया था। आज वह अपने जीवन के 75वें वर्ष में हैं। आर्मी परिवेश में परवरिश पाकर सिविल सर्वेंट के तौर पर करियर की शुरुआत करने वाले डोवाल के इस एक जीवन में अनेक किस्से रोमांचकारी हैं।

अजमेर मिलिट्री स्कूल से शिक्षा पाने वाले डोवाल ने 1967 में आगरा विश्व विद्यालय से अर्थशास्त्र में एमए कर स्नाकोत्तर की उपाधि ली। इसके बाद देश सेवा की इनकी भावना ने इन्हें 1968 में IPS के पद तक पहुँचाया। IPS बनने के बाद उन्होंने केरल कैडर में अपनी पोस्ट संभाली और 1972 में वह इंटेलीजेंस ब्यूरो में आ गए। हमारे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की सबसे खास बात यह है कि उन्होंने आईपीएस होने के बाद पुलिस वर्दी को सिर्फ़ कुछ सालों तक पहना और उसके बाद नए-नए प्रोजेक्ट के लिए अपना हूलिया बदलते रहे। 

पाकिस्तान में 7 साल तक जासूस बन कर रहने वाला इनका किस्सा सबसे ज्यादा मशहूर है। लेकिन यदि इनकी जीवन यात्रा को देखें तो ये केवल एक उपलब्धि नहीं है जो एक सिविल सर्वेंट को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार तक का सफर तय करवाती है। उनसे जुड़ी तमाम घटनाएँ हैं, जो बताती हैं कि सामान्य व्यक्ति के लिए अजीत डोवाल होना अत्यंत कठिन है। इनके नाम कई सफल ऑपरेशन रहे हैं। जैसे:

1986 में मिजोरम में इन्सर्जेंसी को खत्म करने वालों में डोवाल एक प्रमुख नाम हैं। वहीं पंजाब में भी 80 के दशक में आतंकियों को निष्क्रिय करवाने में डोवाल की भूमिका थी। कहते हैं कि 80 के दशक में जब पंजाब में विद्रोह हुआ और खालिस्तान की माँग उठने लगी, उस समय 1984 के ब्लू स्टॉर ऑपरेशन से आतंकियों का सफाया नहीं हो पाया और 1988 में ऑपरेशन ब्लैक थंडर को अंजाम दिया गया। 

इस पूरे ऑपरेशन में डोवाल ने उस समय रिक्शा वाला बनकर जरूरी भूमिका निभाई थी और जब पकड़े गए थे तो आतंकियों को यह कहकर बच निकले थे कि वो पाकिस्तान के ISI से उन लोगों की मदद करने आए हैं। इस अभियान में डोवाल ने सारी जानकारी ब्लैक कमांडो तक पहुँचाई और उसी के बाद पूरे ऑपरेशन को अंजाम दिया गया। कहते हैं कि जब ब्लैक कमांडो ऑपरेशन के लिए गोल्डन टेंपल में घुसे, तब भी डोवाल वहीं मौजूद थे। इसी तरह उन्होंने पाकिस्तान के इस्लामाबाद में बतौर जासूस भेष बदल कर लंबा समय बिताया था।

साल 1999 में कंधार में आईसी-814 में यात्रियों के अपहरण के मुद्दे पर अजीत डोवाल उन 3 अधिकारियों में से एक थे, जिन्होंने रिहाई के मुद्दे पर देश की ओर से बात की थी। इसके अलावा उनको 1971 से 1999 तक हुए सभी 15 हाईजेकिंग मामलों को संभालने का अनुभव प्राप्त है।

एक दशक तक उन्होंने आईबी के ऑपरेशनों का नेतृत्व किया और मल्टी एजेंसी सेंटर के फाउंडर चेयरमैन भी रहे। 2005 में वह इंटेलीजेंस ब्यूरो से रिटायर हुए और 2009 में विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन के फाउंडिग डायरेक्टर बने।

लंबे समय तक राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों में अपना सर्वेश्रेष्ठ प्रदर्शन देकर वह 30 मई 2014 को भारत के पाँचवे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नियुक्त किए गए। उनके NSA पद संभालते ही भारत में 46 नर्सों की घर वापसी हुई।

फिर डोवाल ने सेना प्रमुख के साथ म्यांमार के बाहर चल रहे आतंकवादियों के खिलाफ अभियान में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और साल 2016 में हुई सर्जिकल स्ट्राइक में भी उनकी भूमिका को अहम माना जाता है।

2018 में उन्हें स्ट्रेटेजिक पॉलिसी ग्रुप का अध्यक्ष नियुक्त किया गया और साल 2019 में जब पाकिस्तान के आतंकियों ने पुलवामा में भारतीय जवानों पर हमला किया तो भारतीय वायुसेना ने बदले में बालाकोट एयर स्ट्राइक को अंजाम दिया। इस कार्रवाई में भी डोवाल का दिमाग था। सबसे हाल की बात करें तो जब दिल्ली दंगों के कारण उत्तर पूर्वी दिल्ली का माहौल बिगड़ा तो डोवाल ने मोर्चा संभाला और आवश्यक कार्रवाई का आदेश दिए।

राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति डोवाल की प्रतिबद्धता अतुलनीय है। जाहिर है किस्से भी इतने ही होंगे। लेकिन वो ये सब कैसे कर पाते हैं, इस पर उन्होंने साल 2019 में डॉ अभय जेरे को दिए साक्षात्कार में बताया था। अपनी व्यक्तिगत निर्णय-प्रक्रिया के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा था कि वे सबसे बुरी स्थिति को सबसे पहले दिमाग में स्पष्ट तौर पर कल्पित करते हैं। उसकी ‘कीमत’ के बारे में सोचते हैं– यहाँ तक कि लोगों की मृत्यु के खतरे को भी कीमत-बनाम-परिणाम के रूप में। फिर वे उस worst-case-scenario के छोटे-छोटे हिस्सों में छोटे-छोटे सुधार करने के तरीके ढूँढ़ते हैं।

इस प्रक्रिया को करते हुए वह worst-case-scenario को उस स्तर पर ले आने की कोशिश करते हैं, जहाँ निर्णय को लेने से होने वाला नुकसान, या उस निर्णय की ‘कीमत’, उससे होने वाले संभावित फायदे से कम हो जाए- यह उस निर्णय पर अमल करने की न्यूनतम शर्त होती है। बाद में वह इसमें और भी सुधार की जहाँ कहीं गुंजाईश हो, उसे करते रहते हैं। उनके अनुसार ‘कठिन निर्णय’ की परिभाषा है – ऐसा निर्णय, जिसके परिणाम एक बड़ी संख्या के लोगों को एक लम्बे समय के लिए प्रभावित करें। ऐसे निर्णयों में वह बताते हैं कि छोटी-सी चूक कई बार इतिहास की पूरी धारा पलट देती है।

वह कहते हैं कि उनके चरित्र, मन और मानसिक स्थिति का निर्माण किसी एक घटना या कारण से नहीं हुआ। दूसरे, इसे चैतन्य रूप से, किसी योजना के तहत नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि जिस चीज़ की हम योजना पहले ही बना चुके हैं, उसका हमारे मन पर न्यूनतम प्रभाव होता है। असल में मन का निर्माण और विकास उन चीजों से होता है जो हमारी योजना का हिस्सा नहीं होतीं।

मटन-चिकेन-मछली वाली थाली 1 घंटे में खाइए, FREE में ₹1.65 लाख की बुलेट ले जाइए: पुणे के होटल का शानदार ऑफर

पुणे के एक रेस्तरॉं ने एक धमाकेदार ऑफर निकाला है। इसके तहत आपको रॉयल एनफील्ड बुलेट जीतने को मिल सकता है। ये रेस्तरॉं पुणे शहर के बाहरी इलाके में स्थित है। ग्राहकों को लुभाने के लिए उसने कुछ अलग किया है। जहाँ कई रेस्तरॉं कोरोना काल में ग्राहकों की कमी के कारण वित्तीय घाटे से जूझ रहे थे, शिवराज होटल ने ‘विन अ बुलेट बाइक’ नामक प्रतियोगिता के जरिए एक ऑफर निकाला है।

इसके तहत, अगर आप 60 मिनट में एक बुलेट थाली को खा कर ख़त्म कर देते हैं तो आपको एक रॉयल एनफील्ड बुलेट बाइक इनाम के रूप में मिलेगी। ये एक नॉन-वेज थाली है, जिसमें अधिकतर मांसाहारी आइटम हैं। इस ‘बुलेट थाली’ को ख़त्म कीजिए और 1.65 लाख रुपए मूल्य वाली बुलेट घर लेकर जाइए। ‘इंडिया टुडे’ से बात करते हुए शिवराज होटल के मालिक अतुल वाइकर ने कहा कि ग्राहकों को रेस्तरॉं की तरफ खींचने के लिए इस प्रतियोगिता का आइडिया उनके मन में आया।

उन्होंने शिवराज होटल के बरामदे में 5 ब्रांड न्यू चमकती हुई बुलेट बाइक्स भी खड़ी की है, जिन्हें ग्राहक अंदर जाते समय देख सकते हैं। ‘बुलेट थाली’ ख़त्म कर के उन्हें इन्हीं में से एक बाइक दी जाएगी। होटल के मेन्यू कार्ड पर इस ‘बुलेट थाली’ को लेकर सारे नियम और दिशा-निर्देश पहले ही लिख दिए गए हैं। ये थाली एक नॉन-वेज ‘Platter’ है, जिसमें एक-दो नहीं बल्कि कुल 12 तरह की अलग-अलग खाने वाली चीजें हैं।

इसे तैयार करने के लिए मटन के साथ-साथ तली हुई मछलियों का इस्तेमाल किया गया है। इस थाली को तैयार करने में होटल के 55 सदस्यों ने मेहनत की है, जिसमें तली हुई समुराई मछली, पॉम्फ्रेट फ्राइड फिश, चिकेन तंदूरी, ड्राई मटन, ग्रे मटन, चिकेन मसाला और कोलम्बी (प्रॉन) बिरयानी शामिल है। ये प्रतियोगिता अब तक जबरदस्त तरीके से हिट भी रही है और लोग इसे खाने के लिए व कंटेस्ट में हिस्सा लेने के लिए होटल में पहुँच भी रहे हैं।

रोज ऐसी 65 थालियाँ बिक रही हैं। अतुल वाइकर ने कहा कि इस दौरान कोरोना वायरस संक्रमण के आलोक में जारी सोशल डिस्टेंसिंग के दिशा-निर्देशों का भी पालन किया जा रहा है। सिर्फ ये नहीं, शिवराज होटल में इसी तरह की 6 जायंट थालियाँ हैं- स्पेशल रावण थाली, बुलेट थाली, मालवणी फिश थाली, पहलवान मटन थाली, बकासुर चिकेन थाली और सरकार मटन थाली। हर थाली की कीमत 2500 रुपए है।

8 वर्ष पूर्व स्थापित हुआ शिवराज होटल इससे पहले भी ग्राहकों के लिए इस तरह के ऑफर लाकर चर्चा में रह चुका है। इससे पहले एक कंटेस्ट और आया था, जिसमें 4 लोगों को मिल कर 8 किलो की रावण थाली को ख़त्म करना था। विजेता को 5000 रुपए का नकद इनाम दिया जाता था और इस थाली के रुपए भी उनसे नहीं लिए जाते थे। शोलापुर के सोमनाथ पवार ने तो 1 घंटे के भीतर बुलेट थाली ख़त्म कर के एक रॉयल एनफील्ड बुलेट जीत भी ली है।