साउथ दिल्ली म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन ने बुधवार (20 जनवरी, 2021) को दिवंगत फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत के नाम पर सड़क का नाम रखने वाले प्रस्ताव को पास कर दिया है। यह प्रस्ताव कॉन्ग्रेस दल के नेता अभिषेक दत्त द्वारा दिया गया था।
दरअसल, पार्षद अभिषेक दत्त ने माँग की थी कि सुशांत सिंह राजपूत इंजीनियरिंग के छात्र थे और दिल्ली से उनका कनेक्शन था। इस तर्क के साथ उन्होंने एंड्रयूज गंज वार्ड में रोड नंबर 8 (एंड्रयूज गंज से लेकर इंदिरा कैंप तक की सड़क) का नाम सुशांत सिंह राजपूत के नाम पर कर दिया जाना चाहिए।
पार्षद अभिषेक दत्त का मानना है कि सुशांत सिंह राजपूत देश के लिए एक प्रेरणा हैं। क्योंकि वह मध्यम वर्ग की पृष्ठभूमि से उठ कर इतने बड़े मुकाम पर पहुँच कर अपना नाम रोशन किया। उन्होंने बताया कि सुशांत ने दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी की इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा में सातवीं रैंक हासिल की थी, जो अपने आप में बहुत बड़ी उपलब्धि है।
उन्होंने यह भी कहा कि वार्ड संख्या-59 एस एंड्रयूज गंज के अंतर्गत रोड नंबर 8 के अधिकतर निवासी बिहार से संबंध रखते हैं। स्थानीय लोगों की माँग है कि रोड नंबर 8 का नाम ‘सुशांत सिंह राजपूत’ मार्ग रखा जाए, जिससे अभिनेता को याद रखा जा सके।
गौरतलब है कि बॉलीवुड एक्टर सुशांत सिंह राजपूत 14 जून को मुंबई के बांद्रा स्थित घर में मृत पाए गए थे। सुशांत की मौत के मामले में सीबीआई, ईडी और एनसीबी जैसी एजेंसियाँ जाँच कर रही हैं।
वहीं इस मामले में जाँच कर रही एजेंसियों ने ड्रग्स लेने वाले एक बड़े गिरोह का पर्दाफाश किया था। जिसके तहत एनसीबी ने सुशांत की पूर्व प्रेमिका रिया चक्रवर्ती को गिरफ्तार किया था। कथित तौर पर पूछताछ में रिया ने बॉलीवुड से जुड़े 25 लोगों का नाम लिया था, जो ड्रग्स लेते हैं।
डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार जो बायडेन (Joe Biden) ने बुधवार (जनवरी 20, 2021) को अमेरिका के 46वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली। बायडेन ने कार्यभार संभालते ही ट्रंप प्रशासन के कई अहम फैसलों को बदल दिया, जिनमें ‘मुस्लिम ट्रैवल बैन’ (Muslim travel ban) भी एक है। ट्रंप प्रशासन ने इस कदम को चरमपंथी इस्लामी आतंकवादियों से अमेरिका को सुरक्षित बनाने का प्रयास बताया था।
नवनिर्वाचित राष्ट्रपति ने अमेरिका में ‘मुस्लिम ट्रैवल बैन’ (Muslim travel ban) को हटाकर पाँच मुस्लिम-बहुल राष्ट्रों- ईरान, लीबिया, सोमालिया, सीरिया और यमन के साथ-साथ उत्तर कोरिया और वेनेजुएला के कुछ अन्य अधिकारियों पर जारी प्रतिबंध समाप्त करने का फैसला लिया है।
कार्यालय संभालने के कुछ घंटे बाद ही बायडेन ने ‘मुस्लिम यात्रा प्रतिबंध’ को समाप्त करने सहित 17 कार्यकारी आदेश ज्ञापनों और घोषणाओं पर हस्ताक्षर किए। दरअसल, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसके तहत कुछ मुस्लिम देशों और अफ्रीकी देशों के अमेरिका में ट्रेवल पर रोक लगा दी थी। इतना ही नहीं, अमरीका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति बायडेन ने मेक्सिको बॉर्डर (Mexico border) पर दीवार बनाने के डोनाल्ड ट्रंप के फैसले को भी पलट दिया और इसके लिए फंडिंग भी रोक दी है। इस फैसले के बाद मैक्सिको ने जो बायडेन की भी प्रशंसा की है।
बायडेन के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जैक सुलिवन ने कहा कि प्रतिबंध ‘हमारे देश पर एक दाग से कम नहीं था और यह ज़ेनोफोबिया (अपरिचित या विदेशियों को पसंद ना करना) और धार्मिक दुश्मनी ही थी’। 2017 में ट्रंप के कार्यालय में पहले सप्ताह से ही लागू, मुस्लिम प्रतिबंध ने शुरू में सात मुस्लिम-बहुसंख्यक देशों- ईरान, इराक, लीबिया, सोमालिया, सूडान, सीरिया और यमन से यात्रा को प्रतिबंधित कर दिया था।
ट्रंप ने कहा था- यह मुस्लिमों पर प्रतिबंध नहीं
इस प्रतिबन्ध के शासकीय आदेश का बचाव करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तब जोर देकर कहा था कि ‘यह प्रतिबंध मुस्लिमों पर नहीं है’ जैसा कि मीडिया द्वारा गलत प्रचार किया जा रहा है। ट्रंप ने आदेश पर हस्ताक्षर करते हुए कहा था कि यह मुस्लिमों पर प्रतिबंध नहीं है जैसा कि मीडिया गलत प्रचार कर रहा है, यह धर्म के बारे में भी नहीं है। यह आतंकवाद और हमारे देश को सुरक्षित रखने को लेकर है। ट्रंप ने कहा था कि दुनिया भर में 40 से अधिक देश मुस्लिम बहुल हैं जो इस आदेश से प्रभावित नहीं होंगे।
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बायडेन ने शपथग्रहण के बाद पहले ही दिन कई अहम फैसलों पर हस्ताक्षर किए, जिनमें प्रमुख तौर पर पेरिस जलवायु समझौता भी है। व्हाइट हाउस ने जानकारी दी कि जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते में अमेरिका की फिर से वापसी होगी। बायडेन ने पेरिस जलवायु समझौते में दोबारा शामिल होने का ऐलान किया। डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति ने देश की जनता से चुनाव के दौरान ही यह वादा किया था।
इसके अलावा, बायडेन ने कोरोना वायरस के खिलाफ मुहिम तेज करने के उद्देश्य से एक निर्णय पर हस्ताक्षर करते हुए मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग को अनिवार्य कर दिया है। साथ ही, दोबारा WHO में शामिल होने का फैसला किया है। कोरोना महामारी के दौरान तत्कालीन राष्ट्रपति ट्रंप ने WHO से हटने का फैसला किया था।
कोरोना वायरस का शुरुआती दौर कभी भुलाया नहीं जा सकता। महामारी का ऐसा खौफ कि लोग अपने ही परिजनों को छूने से बचने लगे। ऐसे ही एक खौफ की खबर शिकागो (Chicago) से देखने को मिली।
कैलिफ़ोर्निया का भारतीय मूल का एक नागरिक शिकागो के ओ’हारे (O’Hare) इंटरनेशनल एयरपोर्ट के सिक्योर्ड एरिया में 3 महीने से छिपा हुआ था। जब इसकी जानकारी सिक्योरिटी स्टाफ को पता लगी तो उसे हिरासत में ले लिया गया।
रिपोर्ट के मुताबिक, शख्स का कहना है कि वह COVID-19 के कारण अपने घर जाने से बहुत डर रहा था। 36 साल के आदित्य सिंह लॉस एंजिल्स से 19 अक्टूबर को ओ’हारे इंटरनेशनल एयरपोर्ट पहुँचे थे, जिसके बाद वो वहीं रुक गए। एयरपोर्ट पर आने-जाने वाले दूसरे यात्री उसे खाना दे देते थे, जिस वजह से वह इतने दिन तक एयरपोर्ट पर रह सके।
एयरपोर्ट स्टाफ के मुताबिक आदित्य सिंह ने पकड़े जाने पर एक एयरपोर्ट आईडी बैज दिखाया, जो एयरपोर्ट स्टाफ का ही था। इस आईकार्ड (I-Card) के खोने की रिपोर्ट एयरपोर्ट मैनेजमैंट को दे दी गई थी, जिसकी वजह से आदित्य सिंह का झूठ पकड़ा गया।
हालाँकि पुलिस ने इस मामले में उसे गिरफ्तार कर लिया है। साथ ही उस पर एयरपोर्ट पर अवैध तरीके से रहने और चोरी का चार्ज लगाया गया। पुलिस के मुताबिक, आदित्य सिंह बेरोजगार है और वर्तमान में लॉस एंजल्स (Los Angeles) में रहता था। उसके खिलाफ कोई भी क्रिमिनल केस दर्ज नहीं है।
मामले की सुनवाई कर रहे Cook County Judge, Susana Ortiz ने पूरे वाकये को सुनने के बाद हैरानी जताई कि कोई इंसान बिना पकड़े गए इतने दिनों तक एयरपोर्ट पर कैसे रह गया। जज ने माना कि फेक आईडी कार्ड लेकर जिस तरह यह युवक एयरपोर्ट पर छिपा था, उससे वो दूसरों के लिए खतरा भी हो सकता था।
आदित्य सिंह पर एयरपोर्ट कैंपस में छिपने के लिए यूएस डॉलर 1,000 (लगभग 73 हजार रुपये) का जुर्माना लगाया गया है। मामले में आगे की जाँच की जा रही है।
जज का कहना है, “एक अनधिकृत, गैर-कर्मचारी व्यक्ति फर्जी बैज के साथ 19 अक्टूबर 2020 से 16 जनवरी 2021 के बीच ओ’हारे हवाई अड्डे टर्मिनल के एक सुरक्षित हिस्से में कथित तौर पर रह रहा था और किसी को पता नहीं चला? लोगों की सुरक्षित हवाई यात्रा के लिए एयरपोर्ट्स का पूरी तरह से सेफ होना जरूरी है। इसलिए मुझे लगता है कि ऐसे कथित कामों से वो शख्स समुदाय के लिए खतरा बन गया।”
पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनाव में अब बस कुछ ही महीने बाकी हैं। ममता की पार्टी में कई नेताओं की बगावत के बाद अब एक और राजनीतिक दल बंगाल में चर्चा का विषय है। इस राजनीतिक फ्रंट को बनाने वाला कोई नेता नहीं, बल्कि राजस्थान के अजमेर शरीफ के बाद देश की दूसरी सबसे बड़ी सूफी मजार टालटोला स्थित फुरफुरा शरीफ दरगाह के प्रमुख पीरजादा अब्बास सिद्दीकी हैं।
ममता बनर्जी को राज्य की सत्ता तक पहुँचाने वाले सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभाने वाली फुरफुरा शरीफ दरगाह के 34 साल के पीरजादा अब्बास सिद्दीकी उर्फ़ ‘भाईजान’ बंगाल चुनाव के लिए आज बृहस्पतिवार (जनवरी 21, 2021) को ही एक नए राजनीतिक फ्रंट की औपचारिक घोषणा कर सकते हैं। यह एक अहम फैसला हो सकता है क्योंकि उसका मुस्लिम मतदाताओं पर खासा प्रभाव माना जाता है।
समाचार पत्र ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के अनुसार, सिद्दीकी ने कहा कि वो 10 दलों का गठबंधन लेकर चलेंगे, और उन 60 से 80 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे जहाँ उनकी जीतने की अच्छी संभावना होगी।
पीरजादा सिद्दीकी के राजनीतिक गठबंधन में असदुद्दीन ओवैसी भी शामिल हो सकते हैं, जिनकी पार्टी एआईएमआईएम पश्चिम बंगाल चुनावों में उतरने की इच्छा भी जाहिर कर चुकी है। बताया जा रहा है कि ओवैसी ने 3 जनवरी को भाईजान के साथ बैठक में सिद्दीकी के नेतृत्व को स्वीकार भी किया था। सिद्दीकी का 26 वर्षीय भाई पीरजादा नौशाद भी उम्मीदवारों में से एक होगा। नौशाद के पास इतिहास विषय में बीएड और मास्टर डिग्री है।
भाजपा-TMC के खिलाफ माहौल बना रहे हैं ‘भाईजान’
‘भाईजान’ नाम से मशहूर पीरजादा सिद्दीकी इन दिनों राज्य के विभिन्न जिलों का दौरा करते हुए खुद को मुस्लिमों, आदिवासियों और दलितों की आवाज़ के रूप में सामने रख रहे हैं। यही नहीं, ‘भाईजान’ ने मुख्यमंत्री ममता की पार्टी पर भाजपा की मदद करने का आरोप भी लगाया है।
कयास लगाए जा रहे हैं कि सिद्दीकी तृणमूल के बंगाली मुस्लिम वोट का एक बड़ा हिस्सा छीन सकते हैं। ये वो वोट होंगे, जो अब तक दक्षिण बंगाल में तृणमूल के साथ थे और उत्तरी बंगाल में में कॉन्ग्रेस के साथ!
गौरतलब है कि पीरजादा अब्बास सिद्दीकी पश्चिम बंगाल की फुरफुरा शरीफ दरगाह से जुड़े हैं। इस दरगाह का पूरे दक्षिण बंगाल के इलाके में काफी प्रभावशाली माना जाता है। इससे पहले, अब्बास सिद्दीकी काफी समय से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के समर्थक भी रह चुके हैं।
सिद्दीकी ने अपने एक बयान में कहा, “वर्षों तक कॉन्ग्रेस का शासन रहा, फिर बंगाल में सीपीएम और तृणमूल ने मुस्लिमों या गरीबों के लिए कुछ नहीं किया। मैं केवल मुस्लिमों के लिए ही नहीं, बल्कि राज्य के गरीब आदिवासियों और दलितों के लिए भी बोल रहा हूँ। NRC और CAA ने पहली बार मुझे एक राजनीतिक मंच की ओर काम करने के लिए प्रेरित किया। हमें अपने लोगों को विधानसभा में भेजने की जरूरत है, जो सही मुद्दों को उठाएँ और गलतियों पर आपत्ति करें। भाजपा देश की दुश्मन है।”
सिद्दीकी ने कहा कि तृणमूल ने अल्पसंख्यकों और दलितों के मतों के साथ खिलवाड़ किया जिस कारण 2019 के आम चुनावों में भाजपा बंगाल में 18 लोकसभा सीटों के साथ पैठ बनाने में कामयाब रही।
तृणमूल से गठबंधन के बारे में स्पष्ट करते हुए भाईजान ने कहा कि उन्होंने पहले तृणमूल को अपने साथ आने का न्योता दिया लेकिन उन्होंने इसे ठुकरा दिया। भाईजान ने कहा कि कुछ लोग पूछते हैं कि एक पीरजादा राजनीति में क्यों आ रहा है। उन्होंने कहा, “मैं कहता हूँ कि यह मेरा संवैधानिक अधिकार है। यह समय है जब मैं राज्य के वंचित लोगों के लिए कुछ करूँ.. मैं जीवन के आध्यात्मिक पक्ष पर लोगों का मार्गदर्शन करता था, अब समय आ गया है कि मैं उन्हें सांसारिक मामलों में भी मार्गदर्शन दूँ।”
गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल की 294 विधानसभा सीटों पर चुनाव अगले कुछ महीनों में होने वाले हैं। भाजपा भी पिछले कुछ महीनों से पश्चिम बंगाल में आक्रामक तरीके से प्रचार कर रही है, जिसमें शीर्ष नेता अमित शाह, जेपी नड्डा राज्य का दौरा कर रहे हैं।
SDMC (दक्षिण दिल्ली म्युनिशपल कॉर्पोरेशन) ने बुधवार (20 जनवरी, 2021) को एक अहम फैसला लिया। इसके अंतर्गत आने वाले सभी होटलों, रेस्टोरेंट या मीट की दुकानों को ‘झटका’ या ‘हलाल’ मीट बेचने से संबंधित बोर्ड लगाना होगा।
दक्षिण दिल्ली म्युनिशपल कॉर्पोरेशन के पास विभिन्न कमिटियों द्वारा कुछ प्रस्ताव आए थे। इनमें से झटका-हलाल संबंधी प्रस्ताव भी था। SDMC की सिविक बॉडी की स्टैंडिंग कमिटी ने यह प्रस्ताव 24 दिसंबर 2020 को पास कर दिया था। इसी प्रस्ताव पर अब मुहर लग गई है।
“दक्षिण दिल्ली म्युनिशपल कॉर्पोरेशन के अंतर्गत आने वाले चार ज़ोन के 104 वार्डों में हजारों होटल-रेस्टोरेंट हैं। इनमें से लगभग 90 प्रतिशत में मांस परोसा जाता है। लेकिन किसी में यह बताया नहीं किया जाता है कि परोसा जा रहा मांस ‘हलाल’ या ‘झटका’ है।’ SDMC द्वारा पारित प्रस्ताव में यह कहा गया।
SDMC द्वारा ‘झटका’ या ‘हलाल’ मीट बेचने से संबंधित प्रस्ताव को पास करने का मतलब हुआ कि जो भी होटल-रेस्टोरेंट-ढाबा या फिर मटन-चिकन बेचने वाले दुकान इस म्युनिशपल कॉर्पोरेशन के अंतर्गत आते हैं, उन्हें एक साइन बोर्ड लगा कर यह स्पष्ट बताना होगा कि उनके यहाँ बिकने वाला मांस झटका है या हलाल।
आपको बता दें कि इसके संबंध में छतरपुर काउंसिलर अनिता तँवर ने प्रस्ताव रखा था, जिसे मेडिकल रिलीफ ऐंड पब्लिक हेल्थ पैनल ने 9 नवंबर 2020 को स्टैंडिंग कमिटी के सामने प्रस्तावित किया था। इस प्रस्ताव का उद्देश्य ग्राहकों को जानकारी उपलब्ध कराना है कि वो जो खा रहे हैं, वो क्या है।
झटका क्या, क्या होता है हलाल
झटका का अर्थ है कि जानवर को एक ही वार द्वारा तुरंत मार दिया जाता है, जैसा कि नाम से पता चलता है “एक ही झटके में”। इस मामले में जानवर के सिर को किसी विशेष दिशा में करने या किसी भी तरह की प्रार्थना का उच्चारण करने का कोई विशिष्ट नियम नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कोई भी वध कर सकता है।
इसके उलट हलाल में जानवर की गले की नस में चीरा लगाकर छोड़ दिया जाता है, और जानवर खून बहने से तड़प-तड़प कर मरता है। इसके अलावा मारे जाते समय जानवर को मुस्लिमों के पवित्र स्थल मक्का की तरफ़ ही चेहरा करना होगा। सबसे आपत्तिजनक शर्तों में से एक है कि हलाल मांस के काम में ‘काफ़िरों’ (‘बुतपरस्त’, गैर-मुस्लिम, जैसे हिन्दू) को रोज़गार नहीं मिलेगा।
हलाल मतलब जिहाद
किसी भी भोज्य पदार्थ, चाहे वे आलू के चिप्स क्यों न हों, को ‘हलाल’ तभी माना जा सकता है, जब उसकी कमाई में से एक हिस्सा ‘ज़कात’ में जाए- जिसे वे जिहादी आतंकवाद को पैसा देने के ही बराबर मानते हैं, क्योंकि हमारे पास यह जानने का कोई ज़रिया नहीं है कि ज़कात के नाम पर गया पैसा ज़कात में ही जा रहा है या जिहाद में। और जिहाद काफ़िर के खिलाफ ही होता है- जब तक यह इस्लाम स्वीकार न कर ले!
यानी जब कोई गैर-मुस्लिम हलाल वाला भोजन खरीदता है, तो वह उसका एक हिस्सा अपने ही खिलाफ होने जा रहे जिहाद को आर्थिक सहायता देने में खर्च करता है। ‘Dr. झटका’ और ‘King of झटका revolution’ जैसे उपनामों से नवाज़े जा चुके Live Values Foundation के अध्यक्ष और झटका सर्टिफिकेशन अथॉरिटी के चेयरमैन रवि रंजन सिंह ने ऑपइंडिया से बात करते हुए इसे ‘हलालो-नॉमिक्स’ यानी हलाल का अर्थशास्त्र बताया था। “हलालो-नॉमिक्स का अर्थ है आप अपनी सुपारी खुद दे रहे हैं।”
एक विशेष अदालत ने बुधवार (जनवरी 20, 2021) को पिछले साल अक्टूबर माह में गाजियाबाद के कवि नगर इलाके में एक ढाई साल की बच्ची के साथ बलात्कार और हत्या के दोषी 30 वर्षीय व्यक्ति को मौत की सजा सुनाई है। खास बात ये है कि कोर्ट ने मात्र 29 दिन में मामले की सुनवाई पूरी कर फैसला सुना दिया।
कवि नगर थाना क्षेत्र में रहने वाली ढाई साल की बच्ची 18 अक्तूबर 2020 के दिन संदिग्ध परिस्थितियों में लापता हो गई थी। परिवार ने बहुत प्रयास किए लेकिन जब बच्ची का पता नहीं चला तो उन्होंने पुलिस से मदद माँगी। इसके बाद बच्ची का शव बरामद हुआ। बच्ची के परिजनों ने बताया था कि पड़ोस में ही रहने वाला एक युवक, जिसका उनके घर पर आना-जाना था, वही बच्ची को खिलाने के बहाने ले गया, इसके बाद से बच्ची वापस नहीं लौटी।
परिवार ने पड़ोस में रहने वाले चंदन पुत्र बृजकिशोर के खिलाफ रेप और हत्या का आरोप लगाते हुए तहरीर दी। जिसके बाद त्वरित कार्रवाई करते हुए एसएसपी ने बताया कि तहरीर के आधार पर हत्या, बलात्कार और पॉक्सो अधिनियम के तहत मामला दर्ज करते आरोपित को गिरफ्तार कर लिया गया। आरोपित ने ढाई साल की मासूम का बलात्कार कर उसका शव झाड़ियों में फेंक दिया था।
विशेष न्यायाधीश (POCSO अधिनियम) महेंद्र श्रीवास्तव, जिन्होंने फैसला सुनाया, ने कहा कि इस मामले में केवल मृत्युदंड के द्वारा ही न्याय किया जा सकता है। उन्होंने कहा, “आरोपितों में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है। यह मामला दुर्लभतम श्रेणी का है। यह ध्यान देने योग्य है कि एक ढाई साल की लड़की को यह भी समझ नहीं आता है कि उसका लिंग क्या है। वह शायद समझ नहीं पा रही थी कि उसके साथ क्या हो रहा था और क्यों?”
फैसला सुनाते समय न्यायाधीश ने इस घटना को समाज को झकझोरने वाली बताया और कहा कि यदि अभियुक्त को फाँसी की सजा नहीं दी गई तो समाज में गलत संदेश जाएगा और लोग हैदराबाद मुठभेड़ (महिला चिकित्सक के बलात्कार और हत्या के मामले) जैसी घटनाओं को सही ठहराएँगे। इससे अदालतों की प्रासंगिकता पर सवाल उठेंगे।”
पॉक्सो कोर्ट के विशेष न्यायाधीश महेंद्र श्रीवास्तव ने अभियुक्त पर 1.50 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है। इस मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस ने 19 दिसंबर को ही अदालत में आरोप पत्र पेश किया। मामले में 10 गवाहों के बयान भी दर्ज किए गए। उन्होंने बताया कि आखिरी बार बच्ची को उन्होंने आरोपित के पास ही देखा था। यह घटना CCTV कैमरे में भी देखी गई थी। पूछताछ के बाद आरोपित ने कहा कि बच्ची की माँ ने उसे शराब पीने के लिए डाँट दिया था, जिसका बदला लेने के लिए उसने मासूम के साथ दुष्कर्म किया।
विशेष पॉक्सो एक्ट कोर्ट के न्यायाधीश महेंद्र श्रीवास्तव ने मामले की अंतिम सुनवाई करते हुए सुबूत और गवाहों के बयान के आधार पर चंदन को ढाई साल की मासूम का बलात्कार करने, उसकी हत्या करने और सबूत मिटाने का अपराधी पाया। बुधवार को अदालत ने आरोपित को फाँसी की सजा सुनाई।
पश्चिम बंगाल में नेताओं की बेलगाम जुबान बंद होने का नाम ही नहीं ले रही। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहा है टीएमसी नेताओं की घटिया राजनीति और बयानबाजी बढ़ती जा रही है। टीएमसी समर्थकों के एक रैली में ‘बंगाल के गद्दारों को गोली मारो सालो को’ जैसे नारे लगा कर BJP कार्यकर्ताओं को जान से मारने की धमकी दी तो वहीं ममता सरकार में परिवहन मंत्री रह चुके टीएमसी नेता मदन मित्रा ने भाजपा को लेकर कहा कि ‘अगर दूध माँगोगे तो खीर देंगे, लेकिन अगर बंगाल माँगोगे तो चीर देंगे।’
टीएमसी कार्यकर्ताओं द्वारा दी गई जान से मारने वाली धमकियों पर अब भाजपा ने पलटवार किया है। भाजपा ने सत्तारुढ़ पार्टी पर हिंसा भड़काने का आरोप लगाते हुए कहा है कि टीएमसी की ओर से तनावपूर्ण माहौल बनाने की कोशिश उस समय की जा रही है जब राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति का जायजा लेने के लिए चुनाव आयोग की पूर्ण टीम रिव्यू बैठक करने वाली है।
चुनाव के नजदीक आते और टीएमसी के बदलते रवैए पर प्रहार करते हुए भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की बंगाल इकाई ने ट्वीट करते हुए कहा, “टीएमसी इसे ‘पीस रैली’ करार दे रही है लेकिन इस दौरान बड़े पैमाने पर तनावपूर्ण स्थिति देखी गई और बीजेपी के झंडे तथा पोस्टर तक फाड़ दिए गए। दक्षिण कोलकाता में टीएमसी की ‘पीस रैली’ के दौरान ‘गोली मारो…. को’ जैसे नारे सुने गए। क्या यह ‘शांति’ की परिभाषा है?”
TMC called it “Peace Rally” but it witnessed rampant vandalism and tearing away of BJP flags and posters. Slogans like “Goli Maro Salo Ko” were heard in their ‘Peace Rally’ in South Kolkata.
बता दें जिस रैली में ये नारे लगाए गए, टीएमसी ने उसे ‘शांति रैली’ का नाम दिया था। टीएमसी की इस रैली में बंगाल सरकार में ऊर्जा मंत्री शोभनदेव चट्टोपाध्याय और दक्षिण कोलकाता से सांसद माला रॉय समेत टीएमसी के कई बड़े नेता शामिल हुए थे।
गौरतलब है कि वहीं 19 जनवरी को बंगाल तृणमूल कॉन्ग्रेस नेता और राज्य में परिहन मंत्री रह चुके मदन मित्रा ने हावड़ा में कहा था, “जो बीजेपी के लोग हैं वे सुन लें, दूध माँगोगे तो खीर देंगे और बंगाल माँगोगे तो चीर देंगे।”
इसके अलावा टीएमसी नेता मदन मित्रा ने हाल ही में उनकी पार्टी से बीजेपी में शामिल हुए शुभेंदु अधिकारी पर हमला बोला था। मित्रा ने कहा- “कल मैंने सुना है, नंदीग्राम में शुभेंदु अधिकारी ने घोषणा की है कि वह सीएम ममता बनर्जी को 50,000 वोटों से हरा देंगे, नहीं तो वे राजनीति छोड़ देंगे। मैं कह रहा अगर ममता बनर्जी एक लाख वोट से नहीं जीत पाईं तो मैं अपनी कलाई काट दूँगा। कभी भी अपने जीवन में झंडा नहीं लहरुँगा।”
नंदीग्राम अधिकारी का गढ़ माना जाने वाला इलाका है। उन्होंने टीएमसी के टिकट पर पिछले राज्य चुनावों में विधानसभा सीट जीती थी। मित्रा ने अधिकारी को भी चेतावनी दी कि वह अपना मुँह बंद रखें।
टीएमसी नेता मित्रा के इस धमकी पर 20 जनवरी को बंगाल बीजेपी अध्यक्ष दिलीप घोष ने जवाब देते हुए कहा कि इस तरह के संवाद उद्देश्य की पूर्ति करने वाले नहीं हैं। बीजेपी नेता ने पूछा, “किसको फोड़ोगे? संवाद किसी भी उद्देश्य की पूर्ति नहीं करेंगे। लोग उनसे इतने परेशान हैं कि सभी स्कोर तय कर लेंगे। कानून और व्यवस्था की स्थिति जर्जर है। लोग इससे छुटकारा चाहते हैं इसलिए वे हमारे पास आ रहे हैं। इससे वे (टीएमसी) चिंतित हो गए और उन्होंने हम पर हमला किया।”
गौरतलब है कि भाजपा ने आगामी विधानसभा चुनावों के प्रचार के लिए टॉप नेताओं द्वारा नियमित रैलियों और यात्राओं की योजना बनाई है। जहाँ चुनाव के मद्देनजर गृह मंत्री अमित शाह हर महीने राज्य का दौरा करेंगे। वहीं वरिष्ठ नेता कैलाश विजयवर्गीय पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार की कमान संभाल रहे हैं। बीजेपी ने दावा किया है कि वह 200 सीटें जीतेगी, जबकि टीएमसी ने दावा किया कि बीजेपी 99 सीटों को पार नहीं कर पाएगी।
इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी 23 जनवरी को नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 125 वीं जयंती पर आयोजित एक कार्यक्रम में भाग लेने के लिए पश्चिम बंगाल का दौरा करेंगे। हाल ही में केंद्र सरकार ने 23 जनवरी को पराक्रम दिवस के रूप में घोषित किया है।
तमिलनाडु में एक हिन्दू मंदिर पर हुए हमले की घटना सामने आई है। Commune Mag की रिपोर्ट के अनुसार, तमिलनाडु के वेल्लोर जिले में एक हिंदू मंदिर की दीवारों पर ईसाई क्रॉस चिन्ह पेंट कर उसे एक चर्च में बदलने का प्रयास किया गया है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, घटना तिरुपत्तूर जिले के नटरमपल्ली तालुक में एलापल्ली गाँव में घटित हुई है। जहाँ जिले में स्थित अम्मान मंदिर की सभी दीवारों पर क्रिश्चियन क्रॉस सिंबल को पेंट कर दिया गया।
ग्रामीणों द्वारा नटरामपल्ली पुलिस के पास दर्ज शिकायत के मुताबिक, मंदिर काफी पुराना है और जहाँ हिंदू परंपराओं के अनुसार 250 परिवारों द्वारा देवी देवताओं की पूजा की जाती है। ग्रामीणों को संदेह है कि यह घिनौनी करतूत मंदिर को चर्च में बदलने का एक प्रयास है।
शिकायत में बताया गया है कि महेंद्रन और बेबी के बेटे बासकर ने पहले भी मूर्तियों और मंदिर के दानपात्र को तोड़ा था, जिसकी शिकायत 2 बार जुलाई और नवंबर 2020 में पुलिस में दर्ज की गई थी। ग्रामीणों का आरोप है कि उसी व्यक्ति ने फिर से मंदिर में तोड़फोड़ की है।
साभार: Commune Mag
रिपोर्ट्स के मुताबिक, 14 जनवरी की रात (पोंगल का दिन) बासकर ने कथित तौर पर स्ट्रीट लाइट को बंद कर मंदिर को चर्च में बदलने के लिए वहाँ की दीवारों, फर्श आदि पर ईसाई क्रॉस पेंट किया था। यहीं नहीं उसी ने मंदिर के पास बिजली के खंभे और पुल पर भी क्रॉस बनाया था।
ग्रामीणों ने आगे आरोप लगाया कि इस घटना के बारे में पूछने पर बासकर ने उन लोगों से गाली-गलौज और उनके साथ दुर्व्यवहार किया था। उन्होंने कहा कि बासकर ने उन्हें यह कहकर धमकाया कि वे उसके साथ कुछ नहीं कर सकते क्योंकि उसके पीछे पाँच लोगों का सपोर्ट है। उसने यह भी कहा था कि उसने उन्हीं पाँच लोगों के उकसाने पर यह हरकत की और उनका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता।
वहीं अब ग्रामीणों ने उनकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाले अपराधियों के खिलाफ पुलिस से कड़ी कार्रवाई की माँग की है।
डेढ़ साल की थीं भाषा सुंबली जब अपनी माँ की गोद में रहते हुए उन्हें कश्मीर घाटी छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। 19 जनवरी 1990 की उस भयावह रात को अब 31 साल बीत गए हैं। भाषा दोबारा अपने घर कभी नहीं लौटीं। उजाड़े गए आशियाने का भटकता परिंदा कैसा होता है, उन्हें अपने लोगों को देख कर इसका एहसास है।
अभिनय क्षेत्र में लगातार नई सीढ़ी चढ़ने वाली यह कश्मीरी हिंदू महिला आज चाहे तो उस दर्द पर चुप्पी साध सकती है और अपने माता-पिता व अपने लोगों पर हुए अत्याचार को भुलाकर आगे बढ़ सकती है। आखिर देखा जाए तो जिस समय कश्मीरी पंडितों का नरसंहार हुआ उस समय वह थी भी कितने साल की? महज डेढ़ साल की तो थी! इस उम्र में तो शायद कोई बच्चा ठीक से बोलना भी नहीं सीखता। लेकिन, भाषा अगर 31 साल बाद भी ये सब नहीं भूल पा रहीं तो शायद इसके पीछे वजह है, जो इतनी सामान्य नहीं है कि मानवता के नाम पर उसे क्षमादान देकर आगे बढ़ चला जाए।
आज देशभर में निर्वासित उन्हें उनके अपने लोग याद दिलाते हैं कि कैसे घर से निकाल फेंके जाने के बाद उन्हें और उनकी माँ को शरणार्थी शिविरों में लंबा समय गुजारना पड़ा। उन्हें याद है शायद कि कश्मीर के पॉश इलाके से कैसे वह रातोंरात दिल्ली की धूल चाटने को मजबूर हुईं। उन्हें याद है अपनों का वह भयभीत चेहरा, जो उस रात इस्लामी आतताइयों की बर्बरता का शिकार हुआ और घाटी की वादी खून से रंग गई।
19 जनवरी 2021! कल अचानक भाषा सुंबली की एक कविता सोशल मीडिया पर नजर आई। अपनी रचनात्मकता के साथ उन्होंने जिस तरह लाखों कश्मीरी हिंदुओं की भावना को प्रस्तुत किया वह वाकई विस्थापन की उस तकलीफ को बताता है, जो शायद आप या हम अनेकों किस्से पढ़ने के बाद भी महसूस न कर पाएँ।
भाषा लिखती हैं:
“जनवरी के बर्फीले महीने की उन्नीसवीं तारीख आती है हर बार और कहती हूँ मैं मेरे गाँव को, तू करना मेरा इंतज़ार आऊँगी मैं… डाकिए से पूछती हूँ अक्सर खोल अपनी जादुई पोटली देख, क्या मेरे घर ने भेजा है कोई तार…? आऊँगी मैं… मेरे मोहल्ले गनपतयार..! जानती हूँ, मोटी जमीं बर्फ को चीरकर उग आए केसर के नन्हें फूल की तरह होंगे हम एक दिन निष्कासन की इस लंबी अंधेरी सुरंग के उस पार और तब, आऊँगी मैं… मेरे आँगन के बूढ़े चिनार ने पिछले 31 पतझड़ों में हर बार बिछाए हैं पलकों की तरह मेरे लिए अपने ज़र्द पत्ते… आऊँगी मैं.. ओ मेरे बून्य शहजार! वितस्ता बहती है वहाँ पर कहती हैं यहाँ सपनों में मुझसे, फिर से सजा मेरे घाट पर अखरोट के दियों की लंबी कतार ओ मेरी नदी, आऊँगी मैं.. कसम शिव की, ओ कश्मीर, आएँगे हम, और अंगद के पाँव की तरह अब उखड़ न पाएँगे हम सदा सदा के लिए बस जाएँगे हम आएँगे हम! आएँगे हम… ओ कश्मीर आएँगे हम!“
भाषा सुंबली की यह कविता कई लोगों के लिए बेहद सामान्य हो सकती है। लेकिन इसमें निहित भावुकता, संवेदनशीलता और ठहराव उनसे पूछिए जो वाकई उस इंतजार में हैं कि एक बार दोबारा वह अपने घर लौटेंगे.. हक से लौटेंगे… हमेशा के लिए लौटेंगे…।
कश्मीर से दूर, उसकी संस्कृति से अनभिज्ञ, हम सिर्फ़ ये जानते हैं कि सदियों के इतिहास के बावजूद 90 के उस नरसंहार के बाद शेष हिंदुओं ने घाटी से उजड़कर अलग-अलग राज्यों में अपनी दुनिया बसाई। लेकिन हमें नहीं मालूम कि उस नई जगह पर अपनी संस्कृति, अपनी सभ्यता, अपनी भाषा के विलुप्त होने की घबराहट क्या होती है? सुंबली उसी घबराहट से आज जूझ रही हैं। उनके मन में सवाल है कि आने वाली अपनी पीढ़ी को सभ्यता के नाम पर क्या सौंपेगी? वह इस कारण निरंतर प्रयास कर रही हैं कि अपनी युक्तियों से उस संस्कृति, खान-पान को जीवित रख सकें जिसे धीरे-धीरे भावी पीढ़ी ‘कूल’ या ‘सेकुलर’ होने के कारण भुलाती जा रही है।
ऑपइंडिया से बात करते हुए सुंबली बताती हैं कि वह भारतीय फिल्म निर्देशक/निर्माता विवेक अग्निहोत्री द्वारा निर्देशित फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ में जल्द ही बतौर अभिनेत्री नजर आने वाली हैं। मसूरी में फिल्म की अधिकतर शूटिंग पूरी करने के बाद ‘कश्मीर शेड्यूल’ पर भाषा यह कहकर नहीं गईं कि वे कश्मीर जाना बर्दाश्त ही नहीं कर पाएँगी। उन्होंने कहा-
“क्योंकि मैं बर्दाश्त नहीं कर पाऊँगी वहाँ टूरिस्ट बनकर जाना। ये बहुत बड़ी बात होती है अपने ही घर में जाकर होटल में रुक कर आना। नहीं गई, क्योंकि मेरे लिए मुश्किल है अपने घर जाने के बावजूद वहाँ न हो पाना। घर न होता तो शायद दिक्कत नहीं थी लेकिन कश्मीर में मेरा घर है।”
वह अपनी बातचीत में उस कश्मीर को लेकर सवाल करती हैं जिस जगह को बॉलीवुड में उसके गानों में सिर्फ़ वादियों के लिए दिखाया जाता रहा, आखिर वह हकीकत में उस घाटी की बाशिंदा होने के बावजूद उस खूबसूरती को क्यों नहीं देख पाईं?
उन्होंने देखा भी क्या; निर्वासित हुए अपने लोग। वह बताती हैं कि किस तरह वह दिल्ली के शरणार्थी शिविरों में सड़क पर रहने वाले लोगों की तरह रहने को मजबूर हुईं। डेढ़ साल की उम्र में उन्हें नहीं याद है कि उन्होंने क्या किया। मगर उनकी माँ उन्हें बताती हैं कि कैसे वह एक ही रात में सड़क पर रह रहे भिखारी की भाँति हो गए थे, जिनकी बच्ची को न खुली सड़क पर खेलने से डर था और न मिट्टी खाने से परहेज।
शिकारा फिल्म पर अपना गुस्सा जाहिर करते हुए वह कहती हैं कि उस फिल्म में संदेश दिया गया कि कश्मीरी हिंदू अपने साथ हुए अत्याचार को भुलाकर एक दूसरे से माफी माँगें और आगे बढ़ें। वह पूछती हैं, “हमें किस बात की माफी माँगनी है कि हम वहाँ से भाग निकले और वो लोग हमारी नस्ल को खत्म नहीं कर पाए? या इस इस बात का माफी माँगें कि हम शून्य से एक बार फिर खड़े हो रहे हैं? या इस बात की माफी माँगे कि अलग अलग क्षेत्रों में भारत के प्रतिनिधि बनकर हम देश का नाम ऊँचा कर रहे हैं,?”
अपनी कविता को सुंबली अपनी चेतना का हिस्सा कहती हैं। उसे वह अपनी हर साँस के साथ महसूस करती हैं। वह बताती हैं कि वो पीड़ा, उसका भाव सिर्फ़ केवल 19 जनवरी को जागृत नहीं होता। उनकी भाषा में बताएँ तो एक पेड़ जब अपनी मिट्टी से उखड़ गया तो वो अपनी मिट्टी को हमेशा याद करता है।
विस्थापित कश्मीरी हिंदुओं को सुंबली उखड़ी हुई जड़ मानती हैं, और उनके जल्द से जल्द कश्मीर लौटने की कामना करती हैं। वह कहती हैं कि कश्मीर जाना उनका ध्येय है और सिर्फ़ अकेले जाना नहीं, सामूहिक तौर पर पूरे सम्मान के साथ अपने घर लौटना ही उनकी इच्छा है। कोरोना महामारी में भी लॉकडाउन के समय सुंबली इसी प्रयास में जुटी थीं कि कश्मीरी हिंदू ऐसे समय का उपयोग करें और अपने बच्चों को उस संस्कृति से, वहाँ की भाषा से, स्थानीय खान-पान के स्वाद से रूबरू करवाएँ जो विस्थापन के बाद खत्म होने की कगार पर है।
इस संस्कृति जीर्णोंद्धार की प्रक्रिया में वह अपना सबसे बड़ा हथियार अपनी रचनात्मकता को मानती हैं। उन्होंने तमाम शॉर्टफिल्म को युक्तियों की तरह प्रयोग किया है। उनका मकसद बस यही है कि कुछ भी करके उन लोगों की घरवापसी हो ताकि ये संस्कृति विलुप्त न हो और आने वाली पीढ़ी भी समृद्ध तहजीब के साक्षी रहे। उसके वाहक रहे।
बता दें कि ‘द कश्मीर फाइल्स’ में जल्द ही नजर आने जा रहीं भाषा सुंबली ‘छपाक’ फिल्म में भी एक छोटा अभिनय कर चुकी हैं। इसके अतिरिक्त, ‘द कश्मीर फाइल्स’ में उनकी भूमिका बतौर अभिनेत्री के अतिरिक्त कश्मीरी सभ्यता से जुड़ी जानकार के तौर पर भी रही है। उनका दावा है यह फिल्म पंडितों पर हुए नरसंहार को जस के तस परोसने वाली है।
अपने बारे में सुंबली कहती हैं कि जम्मू से शुरुआती शिक्षा और संस्कृति के बारे में जानने के बाद उन्होंने दिल्ली के मशहूर NSD इंस्टिट्यूट में आगे खुद को निखारा। अब वह कश्मीर एक्टिविस्ट के तौर पर अपने लोगों के अधिकार के लिए आवाज उठा रही हैं। अपनी कलाओं को जिंदा रखने की कोशिश कर रही हैं। वह बोलती हैं कि भारत के किसी भी क्षेत्र में रहने वाले व्यक्ति के पास (चाहे वो कहीं भी रह रहा है) कभी भी जाने को उसकी मातृभूमि है।
भाषा ने कहा, “उदाहरण के तौर पर, एक पंजाबी के पास वापस जाने को पंजाब है हमारे पास हमारी मातृभूमि नहीं है, इसलिए हमारे पास कम से कम हमारी मातृभाषा हमारी संस्कृति तो है इसी चेतना को ज़िंदा रखते हुए मैं अपनी संस्कृति से बहुत ज़्यादा जुड़ी हुई हूँ!”
हिंदुओं के नरसंहार के बाद उन्होंने हमारी संस्कृति का दमन किया: कश्मीरी एक्टिविस्ट अग्निशेखर
भाषा से संपर्क करने के दौरान हमारी बात उनके पिता डॉ अग्निशेखर से हुई। जो स्वयं एक लेखक हैं। एक कवि हैं और सक्रिय कश्मीरी एक्टिविस्ट के तौर पर सालों से अपने लोगों की घर वापसी के लिए प्रयासरत हैं। कश्मीरी लोगों के लिए आवाज बुलंद करने में उनकी क्या भूमिका है इसका अंदाजा हम इस बात से लगा सकते हैं कि घाटी में कई आतंकियों की लिस्ट में उनका नाम शामिल है।
डॉ अग्निशेखर,लेखक, कवि, कश्मीरी एक्टिविस्ट
वह बातचीत में 1990 की भयावह सच्चाई से जुड़े अपने कई अनुभव ऑपइंडिया से साझा करते हैं। वह कहते हैं कि वह सब आकस्मिक नहीं था। 1986 में राजनीतिक हितों के चलते इसकी पृष्ठभूमि तैयार हुई थी। एक पूरा रिहर्सल हुआ था एक ऐसे नाटक का जिसका भयानक व विस्तृत रूप 1990 में कश्मीरी हिंदुओं ने झेला।
उस समय को याद करते हुए वो बोलते हैं कि जिस दौरान घाटी में हिंदू समुदाय का नरसंहार हुआ उस समय उनकी बेटी डेढ़ साल की थी और बेटा साढ़े तीन साल का। उनके अनुसार, उस समय माहौल ऐसा था कि जिनके पास भी बेटी-बहन-माँ-पत्नी थीं, वह सब आशंकित थे। छोटी-छोटी बच्चियों को छिपा-छिपा कर हाथ में चाकू दे दिया गया था कि कोई आए तो अपनी आत्मरक्षा में उसे चला सकें। मिट्टी के तेल दिए गए थे कि आएँ तो उन्हें जला सकें।
डॉ अग्निशेखर को कश्मीर छोड़े 31 साल हो गए हैं। वह उस रात के बाद जम्मू आ बसे थे। आज भी उनका निवास जम्मू ही है। हाँ, उनकी पत्नी और बच्चे दिल्ली, प्रयागराज जैसी जगहों पर जाकर जरुर रहे, लेकिन काम के कारण उन्हें जम्मू रहना पड़ा। अभी हाल में जब वह कश्मीर गए तो स्थिति ये थी कि उन्हें बीएसएफ के जवानों को साथ लेना पड़ा था।
भयावह रात की स्मृतियों को जेहन से निकाल पाना अग्निशेखर, उनके परिवार और उनके जैसे तमाम लोगों के लिए आज भी असंभव है। पड़ोसी इमारतों समेत मस्जिदों से किस तरह इलाके के बहुसंख्यक आतताइयों ने हिन्दू अल्पसंख्कों को निशाना बनाया था, उसे याद कर आज भी उनकी आत्मा सिहर उठती है। तमाम किस्से ऐसे हैं, जिसकी कल्पना करना भी आपके और हमारे लिए मुश्किल है। निर्वासन की पीड़ा झेल चुके अग्निशेखर बताते हैं कि हर हिंदू के मन में उस समय बस यही था कि कभी भी दरवाजें, दिवारें तोड़ कर उन्हें मार दिया जाएगा।
बतौर एक चश्मदीद, अग्निशेखर उस समय की कल्पना करवाते हैं कि सोचिए कैसा माहौल होगा उस जगह का जहाँ भारत पाकिस्तान के हर मैच के बाद हमेशा आपके घर में पत्थरबाजी हो। पाकिस्तान जीते तो खुशी में की जाए, हारे तो गुस्से में आपको निशाना बनाया जाए। हिंदुओं की हालात वह उस कसाईबाड़े में भरे गए भेड़ों से करते हैं जिन्हें मालूम है कि कसाई कभी भी गेट खोलकर उन्हें काट देगा।
पाकिस्तान समर्थित नारे, हिंदुओं से हर समय गालीगलौच उस दौर में कश्मीर घाटी की हकीकत हो चली थी जो 90 के बाद एक बर्बर सच बनकर इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गई। कश्मीरी पंडितों ने अपनी जान और अपने परिवार को बचाने के लिए अपना बचपन, अपनी आस्था, अपने धार्मिक स्थल, अपनी परंपरा, अपनी जमीन, अपनी संपत्ति सबकुछ त्याग कर दिया।
हम अनुमान लगा सकते हैं कि उस रात हिंदुओं के मन पर क्या गुजरी होगी जब तमाम बहुसंख्यकों ने कश्मीरी में ये कहा कि उन सबको वहाँ कश्मीरी हिंदू महिलाओं के साथ पाकिस्तान बनाना है और हिंदू पुरूष उन्हें एक भी नहीं चाहिए।
एक कश्मीरी हिंदू होने के नाते अग्रिनशेखर बताते हैं कि वह लोग नई शुरुआत इसलिए कर पाए क्योंकि कश्मीरी हिंदू हमेशा से पढ़े लिखे थे। उन्होंने शिक्षा को महत्ता दी और खुद का हर मायनों में विस्तार किया। उनकी मानें तो स्थानीय हिंदू व्यवसाय में अधिक योगदान नहीं देते थे लेकिन अन्य विधाओं में वह बहुत आगे थे।
कश्मीर को ज्ञान का स्रोत कहते हुए वह दुख जताते हैं कि इस सरजमीं से ऐसे लोगों को विस्थापित किया गया जो उस ज्ञान और संस्कृति के वंशधर थे। ऐसे संस्थानों के नाम बदले गए (इस्लामीकरण) जिनका ऐतिहासिक रूप से बहुत महत्तव था। उनके मुताबिक, घाटी से हिंदुओं के नरसंहार के बाद सीधे सीधे सम्पूर्ण विनाश के लिए उनकी संस्कृति का दमन किया गया।
अग्निशेखर अपने तमाम अनुभवों को बताते हैं कि 31 साल में वह 4-5 बार कश्मीर गए हैं और इस बीच उन्हें ऐसी परिस्थिति भी देखी कि उन्हें भेष बदलकर अपने घर जाना पड़ा। वहीं उनकी बेटी भाषा और उनकी पत्नी, बहन तो अकेले कश्मीर जाने से इंकार करते हैं। कारण कोई डर नहीं है। एक गुस्सा है कि आखिर उन्हें, उनके लोगों, उनके घरों से कैसे अपमानित करके बाहर किया गया? वह सब चाहते हैं कि कश्मीर लौटें लेकिन अपनी शर्तों पर, अपने अपनों के शाथ, मान सम्मान और सुरक्षा के साथ। अपनी बिटिया की कविता को डॉ अग्निशेखर लाखों कश्मीरी हिंदुओं का संकल्प बताते हैं। उनका कहना है कि जिस दिन भी ऐसा हुआ उस दिन भाषा सबसे वहाँ पहुँचेंगी।