अंडमान निकोबार का उत्तरी सेंटिनल द्वीप एक बार फिर से चर्चा में है। यहाँ रहने वाली दुनिया की सबसे संवेदनशील सेंटिनल जनजाति से संपर्क की कोशिश में एक अमेरिकी यूट्यूबर को गिरफ्तार किया गया है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 24 साल के अमेरिकी यूट्यूबर मिखाइलो विक्टरोविच पोल्याकोव अपनी जान जोखिम में डालकर इस प्रतिबंधित द्वीप तक पहुँच भी गया। उसने सेंटिनल लोगों से मिलने की कोशिश की, लेकिन कोई नहीं मिला, जिसके बाद उसे द्वीप पर ही नारियल और डाइट कोक छोड़ दिया। हालाँकि बाद में उसे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।
मिखाइलो कोई आम यूट्यूबर नहीं है। तालिबान जैसे खतरनाक इलाकों में वीडियो बना चुके इस शख्स ने 29 मार्च 2025 को जीपीएस और मोटर से लैस हवा वाली नाव से कुर्मा डेरा बीच से 25 मील का सफर तय किया। 9 घंटे की थकाऊ यात्रा के बाद वह सेंटिनल द्वीप के उत्तर-पूर्वी तट पर पहुँचा।
वहाँ उसने दूरबीन से जनजाति के लोगों को ढूँढने की कोशिश की, एक घंटे तक सीटी बजाई, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। फिर उसने नारियल और डाइट कोक छोड़कर वापस लौटने का फैसला किया। मगर किस्मत को कुछ और मंजूर था। एक मछुआरे की नजर उस पर पड़ गई और पुलिस को खबर मिलते ही उसे गिरफ्तार कर लिया गया।
तीसरी बार पहुँचा था सेंटिनल लोगों के पास
पुलिस ने बताया कि मिखाइलो ने यह खतरनाक कदम पहले भी उठाया था। अक्टूबर 2024 और जनवरी 2025 में भी वह इस द्वीप पर जा चुका है। इस बार उसने जेमिनी इन्फ्लेटेबल डिंगी नाव का इस्तेमाल किया, जो हल्की और आसानी से ले जाई जा सकती है।
उसके होटल से गो प्रो कैमरा, दूरबीन और लाइफ जैकेट जब्त किए गए। होटल वालों ने उसे रोकने की कोशिश की थी, लेकिन उसकी जिद के आगे हार मान ली। अब वह कानूनी पचड़े में फँस गया है, क्योंकि सेंटिनल द्वीप पर बिना अनुमति जाना भारतीय कानून के खिलाफ है।
बाइबिल लेकर ईसाई बनाने पहुँचे मिशनरी की गई थी जान
वैसे भी, सेंटिनल जनजाति को दुनिया की सबसे खतरनाक और नाजुक जनजातियों में गिना जाता है, क्योंकि ये लोग बाहरी दुनिया से कोई संपर्क नहीं चाहते। साल 2018 में अमेरिकी मिशनरी जॉन एलन शाओ ने उनसे मिलने की कोशिश की थी, लेकिन जनजाति के लोगों ने तीर मारकर उसकी जान ले ली। उसके पास से बाइबिल बरामद हुई थी।
सबसे नाजुक लोग, कोक से हो सकती है पूरी प्रजाति खत्म
दरअसल, यह घटना सिर्फ एक साहसिक कहानी नहीं, बल्कि उस नाजुक जनजाति के लिए खतरे की घंटी है, जो बाहरी दुनिया के संपर्क से बचकर हजारों सालों से जिंदा है। ये जनजाति इसलिए भी नाजुक है, क्योंकि इनका इम्यून सिस्टम हमारी आम बीमारियों को झेल नहीं सकता। एक छींक या खाँसी भी इनके लिए मौत का पैगाम बन सकती है। ऐसे में बाहरी दुनिया से आई कोक जैसी चीजों की वजह से पूरी जनजाति का ही सफाया हो सकता है।
इतिहास गवाह है कि यूरोपीय लोगों के संपर्क से अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अमेरिका की कई जनजातियाँ खत्म हो गईं। क्या हम सेंटिनल को भी ऐसे ही खतरे में डाल दें? मिखाइलो की इस हरकत से लोग गुस्से में हैं। सर्वाइवल इंटरनेशनल जैसे संगठन इसे लापरवाही और मूर्खता बता रहे हैं। एक नारियल और कोक की बोतल शायद उसे रोमांचक लगी हो, लेकिन ये जनजाति के लिए जहर से कम नहीं। पुलिस अब उससे पूछताछ कर रही है कि उसका मकसद क्या था।
केरल के मलप्पुरम की रहने वाली 35 साल की आसमाँ की पाँचवें बच्चे को जन्म देते समय मौत हो गई। शनिवार (5 अप्रैल 2025) को चिट्टीपरंबू के किराए के मकान में प्रसव के बाद उसकी हालत बिगड़ गई और उसकी साँसें थम गईं। आसमाँ का शौहर सिराजुद्दीन उसकी मौत के बाद शव को लेकर एर्नाकुलम के पेरुंबवूर अपने घर पहुँचा और चुपचाप दफनाने की कोशिश कर रहा था, तभी पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, पुलिस ने तुरंत मौके पर पहुँचकर शव को कब्जे में लिया और पेरुंबवूर तालुक अस्पताल भेज दिया। आसमाँ का नवजात बच्चा अभी जिंदगी की जंग लड़ रहा है और उसे एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया है। आसमाँ के घरवालों का आरोप है कि प्रसव के दौरान आसमाँ का खून बहुत बह गया, लेकिन सिराजुद्दीन उसे अस्पताल नहीं ले जाया। परिजनों का कहना है कि अगर सिराजुद्दीन वक्त पर अस्पताल ले जाता, तो शायद आसमाँ आज जिंदा होती।
सिराजुद्दीन ‘मदावुर काफिला’ नाम से यूट्यूब चैनल चलाता है और पारंपरिक चिकित्सा में उसका गहरा यकीन है। वो यूट्यूब पर घरेलू इलाज को लेकर ‘तकरीरें’ करता रहता है। सिराजुद्दीन पर आरोप है कि उसने आसमाँ को जानबूझकर अस्पताल नहीं ले जाया, क्योंकि उसे मॉडर्न मेडिसिन से ज्यादा पुराने तरीकों पर भरोसा था। पुलिस इस बात की भी जाँच कर रही है कि क्या उसकी ये सोच आसमाँ की मौत की वजह बनी।
ये कोई पहला मामला नहीं है, जिसमें घर में बच्चे को जन्म देते समय मौत की बात सामने आई हो। केरल में बीते कुछ समय से मुस्लिम समुदाय के लोग बच्चे को घर में जन्म देने वाली महिलाओं को ‘बहादुर’ बताकर सम्मानित करते रहे हैं, ऐसे में केरल में इस तरह से मामलों में काफी बढ़ोतरी देखी गई है। बीते 5 साल में केरल में करीब 3000 ऐसी मौतें हो गई हैं, जिसमें ‘बहादुर’ बनने की कोशिश में उन्हें अस्पताल नहीं ले जाया गया। इसमें से भी 1 तिहाई से अधिक मामले अकेले मलप्पुरम से सामने आए हैं।
रिपोर्ट्स की मानें, तो मलप्पुरम और केरल में इस तरह के मामलों में काफी तेजी आई है। अधिवक्ता कुलथुर जयसिंह के सूचना के अधिकार से पता चला कि 2019 से सितंबर 2024 तक केरल में 2931 घरेलू प्रसव हुए, जिनमें अकेले मलप्पुरम में 1244 मामले थे। इस दौरान 18 नवजात बच्चों की भी जान गई।
इसी तरह से कुछ समय पहले कोझिकोड में एक कार्यक्रम हुआ था, जहाँ घर पर प्रसव करने वाली महिलाओं को ‘बहादुर महिला’ कहकर सम्मानित किया गया। वहाँ कहा गया कि वो घर पर डिलीवरी को बढ़ावा नहीं दे रहे, बल्कि ‘प्राकृतिक प्रसव’ की खुशी मना रहे हैं। पुलिस को शक है कि इस्लामी संगठनों से जुड़ा ये आयोजन भी ऐसे मामलों को प्रभावित कर सकता है, हालाँकि अभी पूरी जानकारी नहीं मिली है।
This is a program applauding moms who delivered at home, insisting it’s not pushing home births & they are just celebrating “natural” ones. While tech advances globally, why’s this religion stuck in reverse?#HomeBirthsInKeralapic.twitter.com/tWqRtCwXkf
ऐसे मामलों में अक्सर परिवार का कहना होता है कि प्रसव जल्दी हो गया, इसलिए अस्पताल नहीं ले जा सके, लेकिन सच ये है कि ये पहले से प्लान किए जाते हैं। खासकर मुस्लिम परिवारों में ये चलन तेजी से बढ़ रहा है।
RSS के सरसंघचालक मोहन भागवत फ़िलहाल वाराणसी दौरे पर हैं, जहाँ उन्होंने काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन एवं पूजा-अर्चना की। इस दौरान उन्होंने स्वयंसेवकों के साथ संवाद भी किया, संघ में मुस्लिमों एवं जातियों को लेकर जवाब दिया। मोहन भागवत ने कहा कि हम संघ में किसी की जाति नहीं पूछते। RSS में अनुसूचित जाति-जनजातियों के प्रतिनिधित्व के सवाल पर उन्होंने कहा कि हम किसी से पूछते नहीं हैं। इस दौरान उन्होंने तब का एक किस्सा भी सुनाया, जब वो नए-नए सरकार्यवाह चुने गए थे।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख ने बताया कि सुरेश सोनी उस दौरान सह-सरकार्यवाह चुने गए। इस दौरान मीडिया ने चलाया कि भागवत गुट की विजय हुई है, OBC को प्रतिनिधित्व देने के लिए सुरेश सोनी को रखा गया है। बकौल मोहन भागवत, मीडिया रिपोर्ट्स देखकर उन्होंने सुरेश सोनी से पूछा कि क्या वो ओबीसी समाज से आते हैं? इसपर वो मुस्कुराकर रह गए। मोहन भागवत ने कहा कि संघ में ऐसा वातावरण है कि आजतक उन्हें नहीं पता है कि सुरेश सोनी किस जाति से आते हैं।
इस दौरान मोहन भागवत ने ये भी कहा कि RSS की शाखा में सबका स्वागत है, मुस्लिमों का भी। लेकिन, साथ ही सरसंघचालक ने जोड़ा कि इसके लिए उन्हें न केवल ‘भारत माता की जय’ के नारे को स्वीकार करना होगा बल्कि भगवा ध्वज का भी सम्मान करना होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि पूजा-पद्धति या धार्मिक रीति-रिवाजों को लेकर RSS कोई भेदभाव नहीं करता है, हर जाति-संप्रदाय के लोगों के लिए संघ के दरवाजे खुले हुए हैं। उन्होंने इस दौरान हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई सबका नाम लिया।
हालाँकि, इस दौरान मोहन भागवत ने इस्लामी आक्रांताओं के महिमा-गान पर करारा प्रहार करते हुए कहा कि जो लोग ख़ुद को औरंगज़ेब का वंशज मानते हैं, उनके लिए संघ में कोई जगह नहीं है। बता दें कि RSS में पहले से ही ‘राष्ट्रीय मुस्लिम मंच’ चल रहा है। मुहम्मद अफजल इसके राष्ट्रीय संयोजक हैं, वहीं इंद्रेश कुमार मार्गदर्शक की भूमिका में हैं। मोहन भागवत ने स्पष्ट संदेश दे दिया है कि भारत की संस्कृति एक है और ‘भारत माता की जय’ व भगवा ध्वज उस संस्कृति के प्रतीक हैं, इसका सम्मान करना ही होगा।
पश्चिम बंगाल में हिन्दू विरोधी हिंसा आम हो चली है, पिछले कई वर्षों से चुनाव के दौरान न केवल भाजपा कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया जाता है बल्कि हिन्दू पर्व-त्योहारों पर हिन्दुओं को भी निशाना बनाया जाता है। केंद्रीय शिक्षा एवं उत्तर-पूर्वी राज्यों के विकास मामलों के राज्यमंत्री सुकांता मजूमदार ने एक वीडियो शेयर करके आरोप लगाया है कि राजधानी कोलकाता के पार्क सर्कस सेवन पॉइंट एरिया में रामनवमी की शोभायात्रा पर वापसी के समय हमला किया गया। उन्होंने बताया कि गाड़ियों पर सिर्फ़ इसीलिए पत्थर बरसाए गए, क्योंकि उनपर भगवा ध्वज लगे हुए थे।
पश्चिम बंगाल में रामनवमी शोभायात्रा पर हमला
कई गाड़ियों के शीशे क्षतिग्रस्त हो गए हैं। हमले के कारण वहाँ भगदड़ मच गया। सुकांता मजूमदार पश्चिम बंगाल में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं। उन्होंने 2 वीडियो शेयर करते हुए आगे बताया कि ये कोई अचानक हुआ हमला नहीं था बल्कि जानबूझकर निशाना बनाया गया, जबकि पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तुष्टिकरण की राजनीति ने बंगाल पुलिस को लकवाग्रस्त कर दिया है, हिन्दुओं की सुरक्षा के लिए एक क़दम तक नहीं उठाए गए।
उन्होंने कहा कि इस कायराना चुप्पी ने एक चीज तो साफ़ कर दी – है रामनवमी पर पश्चिम बंगाल के हिन्दुओं की एक की दहाड़ ने यहाँ की सत्ताधारी व्यवस्था को हिलाकर रख दिया है। ममता बनर्जी ने राज्य में सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने के लिए ‘शांति वाहिनी’ के गठन की घोषणा की थी। सुकांता मजूमदार ने कहा कि ये वाहिनी शांतिपूर्ण नहीं है, वो घबराई हुई और भयभीत है। उन्होंने घोषणा की कि अगले वर्ष इसी क्षेत्र में इससे भी विशाल रामनवमी शोभायात्रा निकलेगी और जो पुलिस वाले आज चुपचाप देख रहे हैं वो फूल बरसाएँगे।
As the Ram Navami procession returned, Hindu devotees were savagely attacked in Kolkata’s Park Circus Seven Point area. Stones rained down on vehicles just for carrying saffron flags. Windshields shattered. Chaos unleashed. This wasn’t random—it was targeted violence. And where… pic.twitter.com/Ed74Xbi2K6
— Dr. Sukanta Majumdar (@DrSukantaBJP) April 6, 2025
वहीं पश्चिम बंगाल पुलिस ने न केवल भाजपा के दावे को नकार दिया है, बल्कि ये भी कहा है कि उक्त इलाक़े में न तो शोभायात्रा के लिए कोई अनुमति ली गई थी और न ही ऐसी कोई गतिविधि हुई है। पुलिस ने कहा कि वाहन क्षतिग्रस्त होने की सूचना मिली थी, तुरंत मौके पर पहुँचकर स्थिति को सँभाला गया। पुलिस ने लोगों से अफवाहों पर ध्यान न देने की अपील करते हुए कहा कि जाँच हेतु मामला दर्ज किया जा रहा है। भाजपा नेता तरुणज्योति तिवारी ने पुलिस के वर्जन पर सवाल उठाते हुए पूछा कि पार्क सर्कस क्रॉसिंग में वक़्फ़ बिल के खिलाफ हुए प्रदर्शन के लिए अनुमति ली गई थी क्या?
‘9% हिन्दू हमें वोट कर दें तो…’: मिथुन चक्रवर्ती
उधर वरिष्ठ अभिनेता व भाजपा नेता मिथुन चक्रवर्ती ने भी हिन्दुओं की सुरक्षा के लिए दहाड़ लगाई है। ‘द कश्मीर फाइल्स’ में दिख चुके अभिनेता ने कहा कि अगर पश्चिम बंगाल में वोट न करने वाले 9% हिन्दू मतदाता हमारे साथ खड़े हो जाते हैं तो यहाँ रामराज्य स्थापित हो जाएगा। कोलकाता से सटे उत्तर 24 परगना जिले के बारासात में एक रामनवमी शोभायात्रा में शामिल होते हुए भाजपा की राष्ट्रीय कार्यसमिति के सदस्य मिथुन चक्रवर्ती ने ये बयान दिया।
मिथुन चक्रवर्ती की आगामी फिल्म ‘द दिल्ली फाइल्स – द बंगाल चैप्टर’ में पश्चिम बंगाल में विभाजन के दौरान हिन्दुओं के हुए नरसंहार का इतिहास दिखाया जाएगा। ‘द ताशकंद फाइल्स’ और ‘द कश्मीर फाइल्स’ के निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ही इसका निर्देशन कर रहे हैं। उन दोनों फिल्मों में भी मिथुन चक्रवर्ती अहम भूमिका में थे। मिथुन चक्रवर्ती का मानना है कि हिन्दुओं ने एकजुट होकर आगामी विधानसभा चुनावों में भाजपा को वोट नहीं किया तो बांग्लादेश की तरह यहाँ के हिन्दू भी मुश्किल में पड़ जाएँगे। उन्होंने कहा कि TMC फिर जीती तो बंगाल में हिन्दू नहीं बचेंगे।
TMC नेता कल्याण बनर्जी ने रुकवा दी हनुमान चालीसा
उधर संसद में अजीबोगरीब हरकतें करके सुर्खियाँ बटोरने वाले तृणमूल कॉन्ग्रेस के सांसद कल्याण बनर्जी ने हनुमान चालीसा रुकवा दी और मंदिर की परंपरा का अपमान किया। कल्याण बनर्जी का वीडियो भी वायरल हुआ है, जिसमें वो हनुमान चालीसा के दौरान पुजारी को बाधित करते हुए दिखाई दे रहे हैं। वो पुजारी से पूछते हुए दिखाई दे रहे हैं कि क्या पूरी हनुमान चालीसा पढ़ी जाएगी।
#BREAKING | TMC MP Kalyan Banerjee caught on camera scolding priest
उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में रविवार (6 अप्रैल, 2025) को रामनवमी के दिन गाजी सालार मसूद की मजार पर भगवा ध्वज लहराए गए। महाराजा सुहेलदेव से जुड़े संगठन के कार्यकर्ताओं ने ऐसा किया। तीन युवकों ने दीवार के सहारे मजार की छत पर चढ़ कर भगवा झंडे लहराए। इस दौरान नीचे अन्य हिन्दू कार्यकर्ता भगवा ध्वज लेकर खड़े थे। इन झंडों पर ‘ॐ’ लिखा हुआ था। मनेंद्र प्रताप सिंह इन युवकों का नेतृत्व कर रहे थे। उन्होंने ख़ुद को भाजपा का कार्यकर्ता भी बताया है। उन्होंने गाजी सालार मसूद को एक आक्रांता करार दिया।
गाज़ी सालार मसूद की दरगाह पर भगवा झंडे, गूँजा ‘जय श्री राम’
बकौल मनेंद्र प्रताप सिंह, तीर्थराज प्रयागराज में किसी आक्रांता की कब्र नहीं होनी चाहिए। उन्होंने उस दरगाह को त्वरित रूप से ध्वस्त किए जाने की माँग करते हुए कहा कि इस जगह को हिन्दुओं को पूजा-पाठ के लिए सौंप दिया जाना चाहिए। सूचना मिलने के बाद यूपी पुलिस मौके पर पहुँची, लेकिन तबतक ये युवक वहाँ से जा चुके थे। ‘सुहेलदेव सम्मान सुरक्षा मंच’ के कार्यकर्ताओं ने डीएम और एसपी को ज्ञापन भी दिया है। जिस गंगापार इलाक़े में ये घटना हुई, वो प्रयागराज शहर से 40 किलोमीटर की दूरी पर है।
इस घटना पर DCP कुलदीप गुणावत का कहना है कि वीडियो की जाँच कराई जा रही है और इसमें दिख रहे युवकों की तलाश हो रही है। दरगाह की छत पर खड़े होकर युवकों ने ‘जय श्री राम’ के नारे भी लगाए। शाम के करीब 4 बजे बाइक से भगवा ध्वज के साथ इन युवकों ने रैली भी निकाली। रैली में 20 युवक शामिल थे। मनेंद्र प्रताप सिंह ‘करणी सेना’ के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं, साथ ही वो इलाहाबाद सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी के छात्र नेता भी रहे हैं। संगठन द्वारा प्रशासन को सौंपे गए पत्र में लिखा है कि बहरिया के सिकंदरा में गाजी सालार मसूद की दरगाह बनी हुई है।
गाजी सालार मसूद को आक्रांता और हिन्दुओं का हत्यारा बताते हुए लिखा गया है कि ये मजार अवैध है, ऊपर से वो कभी सिकंदरा आया ही नहीं था। दावा किया गया है कि यहाँ शिवकंद्रा वाले महादेव, सती बड़े पुरुख का मंदिर था। ज्ञापन में झाड़फूँक के जरिए महिलाओं से अभद्रता और हिन्दुओं का धर्मांतरण के अलावा जमीन पर अवैध कब्जा करने कराने का आरोप लगाया गया है। वहाँ शिव-सती का मंदिर और महाराज सुहेलदेव का पार्क बनाने की माँग की गई है।
#प्रयागराज में #रामनवमी के मौके पर महाराजा सुहेलदेव सम्मान सुरक्षा मंच के कार्यकर्ताओं ने सालार मसूद गाजी की दरगाह पर भगवा झंडे फहराए और नारेबाज़ी की।
"हंगामे की सूचना पर पुलिस मौके पर पहुंची, लेकिन हंगामा करने वाले युवक फरार हो चुके थे। ये दरगाह गंगापार इलाके में प्रयागराज शहर… pic.twitter.com/yjzkitPHWy
बता दें कि मई में लगने वाले वार्षिक नेजा मेले पर रोक लगाते हुए पुलिस ने इस दरगाह पर ताला लगा दिया था। हालाँकि, अंदर काम चलने की वजह से ताला जड़ा गया था और पुलिस ने बताया था कि लोगों की आवाजाही पर कोई रोकटोक नहीं है। गुरुवार (जुमेरात) और रविवार के दिन यहाँ बड़ी भीड़ उमड़ती है। अखिलेश यादव ने इस घटना को लेकर भाजपा पर सांप्रदायिक सियासत करने का आरोप लगाया। वहीं कांग्रेस प्रवक्ता हसीब अहमद ने इसे भाजपा द्वारा सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की कोशिश करार दिया।
कौन था आक्रांता गाज़ी सालार मसूद?
याद दिलाते चलें कि सालार मसूद क्रूर आक्रांता था, जिसने बड़े पैमाने पर हिंदुओं का नरसंहार किया और मंदिरों को ध्वस्त किया। इसी कारण उसे ‘गाजी’ (इस्लाम के लिए काफिरों से लड़ने वाला) की उपाधि मिली थी। सालार मसूद गाजी भारत में आक्रमण करने के दौरान जहाँ-जहाँ डेरा डाला था, वहाँ-वहाँ आज मुस्लिमों द्वारा उर्स मनाया जाता है। इनमें मेरठ का नौचंदी मेला, पुरनपुर (अमरोहा) का नेजा मेला, थमला और संभल के मेले प्रमुख हैं।1400 साल पहले सालार मसूद का अब्बा ‘बूढ़े बाबा’ अपनी बीवी और बेटों के साथ अजमेर शरीफ आ गया था।
यहीं पर सालार मसूद गाजी का जन्म हुआ। कहा जाता है कि बच्चे के जन्म के बाद उसकी बीवी वापस अफगानिस्तान चली गई। वहीं, अबू सैयद सालार साहू गाजी बूढ़े बाबा अपने बेटे सैयद सालार मसूद गाजी के साथ बाराबंकी के सतरिख आ गया। यहाँ पर अबू सैयद मर गया और दफना दिया गया। महमूद गजनी के नेतृत्व में सन 1026 ईस्वी में सैयद सालार मसूद गाजी ने सबसे बड़ा हमला सोमनाथ मंदिर पर किया था। बहराइच जिला मुख्यालय के पास सालार मसूद का मुकाबला महाराजा सुहेलदेव से हुआ।
महाराजा सुहेलदेव ने 21 अन्य छोटे-बड़े राजाओं के साथ मिलकर उसका सामना किया और आखिरकार इस गाजी का उपाधि धारण करने वाले इस आक्रांता को मार गिराया। वहीं प्रयागराज में गाजी सालार मसूद की मजार पर भगवा ध्वज लहराए जाने पर ALTNews के संस्थापक मोहम्मद ज़ुबैर जैसों ने ‘दरगाह का अपमान’ बताया। हालाँकि, लोगों ने याद दिलाया कि वो एक आक्रांता की याद में बनाया गया ढाँचा भर है। लोगों ने कहा कि ये कोई मस्जिद नहीं है, इसीलिए इसे मस्जिद के अपमान की श्रेणी में नहीं डाला जा सकता है।
The structure on which people climbed is unislamic mausoleum of a barbaric invader. It isn’t a mosque. So please calm down. pic.twitter.com/Qq7YA3VY5q
बता दें कि संभल में गाजी सालार मसूद के नेजा मेले पर रोक लगा दी गई थी। संभल में हर साल नेजा मेला आयोजित किया जाता था। यह मेला आक्रान्ता महमूद गजनवी के भांजे सालार मसूद गाजी की याद में मनाया जाता था। इस बार भी मुस्लिम इसे इसी प्रकार आयोजित करना चाहते थे। हालाँकि, प्रशासन ने इससे इनकार कर दिया। मुस्लिम इस बीच दावा करते रहे कि यह मेला लगातार चलता आया है। इसके बाद ASP ने स्पष्ट कर दिया कि सारे ऐतिहासिक तथ्य सालार मसूद की क्रूरता साबित करते हैं।
ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी ने शुक्रवार (4 अप्रैल 2025) को कहा कि अगर वक्फ (संशोधन) बिल कानून बन गया, तो संभल की जामा मस्जिद वक्फ की संपत्ति नहीं रहेगी। ओवैसी ने ये बात ABP न्यूज पर संदीप चौधरी के साथ इंटरव्यू में कही।
ओवैसी ने कहा कि वक्फ (संशोधन) एक्ट के सेक्शन 3D के तहत, जो संपत्ति ASI (आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया) के अधीन संरक्षित घोषित है, वो वक्फ की नहीं हो सकती। इसमें संभल की मस्जिद के अलावा देश भर की कई दूसरी इस्लामिक इमारतें भी शामिल हैं।
असदुद्दीन ओवैसी ने सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) के राम मंदिर (Ram Mandir) फैसले का हवाला देते हुए कहा कि कोर्ट ने जमीन पर इस्तेमाल के आधार पर दावा माना था। लेकिन नए एक्ट के मुताबिक, इस्तेमाल का नियम तभी लागू होगा, जब जमीन पर कोई विवाद न हो या वो सरकारी संपत्ति न हो। उन्होंने आगे कहा कि इस एक्ट से ASI के तहत आने वाली सारी वक्फ संपत्तियाँ अपनी पहचान खो देंगी। ओवैसी ने कहा, “ASI की परिभाषा को बढ़ा दिया गया है। अब वो सारी संपत्तियाँ हाथ से निकल जाएँगी।”
वक्फ बिल को लेकर क्या मुसलमानों में डर पैदा किया जा रहा है? सुनिए क्या बोले असदुद्दीन ओवैसी…
भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू (President Droupadi Murmu) ने शनिवार (5 अप्रैल 2025) को वक्फ (संशोधन) बिल को मंजूरी दे दी, जिसके बाद ये कानून बन गया। मूल एक्ट के सेक्शन 3 में कई बदलाव किए गए हैं। ओवैसी ने जिस सेक्शन 3D का जिक्र किया, वो कहता है कि अगर कोई संरक्षित स्मारक या इलाका वक्फ की संपत्ति घोषित किया गया है, तो वो दावा अब रद्द हो जाएगा।
इस सेक्शन में लिखा है: “इस एक्ट या किसी पुराने कानून के तहत वक्फ संपत्तियों के लिए जारी कोई घोषणा या नोटिफिकेशन तब रद्द माना जाएगा, अगर वो संपत्ति उस घोषणा या नोटिफिकेशन के वक्त प्राचीन स्मारक संरक्षण एक्ट, 1904 या प्राचीन स्मारक और पुरातत्व स्थल और अवशेष एक्ट, 1958 के तहत संरक्षित स्मारक या संरक्षित इलाका था।”
वक्फ (संशोधन) एक्ट का सेक्शन 3D ये सुनिश्चित करता है कि किसी भी ऐसी जगह पर वक्फ का दावा नहीं किया जा सकता, जो पहले से ही हेरिटेज कानूनों के तहत संरक्षित स्मारक या इलाका घोषित हो चुकी हो। अगर पहले इस एक्ट या किसी पुराने कानून के तहत ऐसी कोई घोषणा हुई थी, तो अब उसे कानूनी तौर पर रद्द मान लिया जाएगा। इस नियम का मकसद ऐतिहासिक स्मारकों, खासकर ASI की सुरक्षा में आने वाले स्मारकों को धार्मिक दावों के तहत दोबारा वर्गीकृत होने या उन पर कब्जा होने से बचाना है, ताकि भारत की पुरातत्व और सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित रखा जा सके।
संभल में विवादित जगह से जुड़े ऐतिहासिक तथ्य
नवंबर 2024 में संभल कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के संभल में जामा मस्जिद की सर्वे करने का आदेश दिया। ये आदेश हरि शंकर जैन, महंत ऋषिराज गिरी और कुछ अन्य लोगों की याचिका के जवाब में आया था।
याचिका में दावा किया गया कि ये मस्जिद भगवान कल्कि को समर्पित सदियों पुराने श्री हरि हर मंदिर की जगह पर बनाई गई थी, जिसे बाबर ने तोड़ दिया था। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ये जगह हिंदुओं के लिए बहुत धार्मिक महत्व रखती है और मुगल काल में इसे जबरदस्ती मस्जिद में बदल दिया गया।
साथ ही ये 1904 के प्राचीन स्मारक संरक्षण एक्ट के तहत एक संरक्षित स्मारक है और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने इसे राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित किया है। उन्होंने ये भी कहा कि मौजूदा हालात उनके धर्म को मानने के संवैधानिक अधिकार को ठेस पहुँचा रहे हैं और इस जगह पर आम लोगों की पहुँच बहाल करने के लिए तुरंत कदम उठाने चाहिए।
श्री हरि मंदिर से जुड़ा ऐतिहासिक तथ्य
याचिका में श्री हरि हर मंदिर के प्राचीन और ऐतिहासिक महत्व को बताया गया। इसमें कहा गया कि हिंदू शास्त्रों में इस जगह को बहुत पवित्र माना जाता है और ये भगवान कल्कि के अवतार से जुड़ी है। जो लोग नहीं जानते, उनके लिए बता दें कि भगवान कल्कि को भगवान विष्णु का दसवाँ और आखिरी अवतार माना जाता है। हिंदू मान्यता के मुताबिक, कल्कि संभल में प्रकट होंगे और कलियुग को खत्म करके सतयुग की शुरुआत करेंगे।
महिस्मत नदी के किनारे रोहिलखंड के बीच में बसे संभल शहर को अलग-अलग युगों में अलग-अलग नामों से जाना जाता था – सतयुग में सब्रित या संभलेश्वर, त्रेतायुग में महादगिरी, द्वापरयुग में पिंगला और कलियुग में संभल।
भगवान कल्कि को समर्पित श्री हरि हर मंदिर के बारे में माना जाता है कि इसे सृष्टि की शुरुआत में भगवान विश्वकर्मा ने बनाया था। विश्वकर्मा को देवताओं का शिल्पकार कहा जाता है। ये मंदिर हिंदू धर्म में खास जगह रखता है, क्योंकि ये भगवान विष्णु और शिव की एकता को दिखाता है, जैसा कि शास्त्रों में लिखा है: “यथा शिवस्तथा विष्णु, यथा विष्णुस्तथा शिवः” यानी “जैसा शिव है, वैसा विष्णु; जैसा विष्णु है, वैसा शिव।” ये मंदिर प्राचीन वास्तुकला का शानदार नमूना था। याचिका में कहा गया कि ये आध्यात्मिक महत्व और खूबसूरत डिजाइन का मेल था।
याचिका के मुताबिक, मुगल आक्रमण के दौरान इस मंदिर को काफी नुकसान पहुँचा। बाबर के सेनापति हिंदू बेग ने 1527-28 में इसे आंशिक रूप से तोड़ा और मस्जिद में बदल दिया। ऐसा कहा जाता है कि ये काम बाबर के आदेश पर हुआ था, ताकि इस्लाम की ताकत दिखाई जा सके और स्थानीय हिंदू आबादी का मनोबल तोड़ा जा सके।
इस घटना का जिक्र बाबर की डायरी (बाबरनामा) में मिलता है। इसमें लिखा है कि हिंदू बेग ने मंदिर को मस्जिद में बदला। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि मस्जिद के अंदर बाबर का नाम लिखी एक शिला (पत्थर का नेमप्लेट) बाद में बनाई गई नकली चीज है, जिसका मकसद मंदिर को मस्जिद में बदलने को सही ठहराना था।
ASI के अधीन संपत्ति
याचिका में इस विवादित जगह के नियंत्रण और प्रबंधन के कानूनी और प्रशासनिक इतिहास की बात भी की गई। इसमें ASI की भूमिका का जिक्र है। 22 दिसंबर 1920 को यूनाइटेड प्रोविंस की सरकार के सचिव ने एक्ट के सेक्शन 3(3) के तहत एक नोटिफिकेशन जारी कर इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया था। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इससे ये जगह ASI के नियंत्रण में आ गई। इसलिए ASI को इसका कानूनी संरक्षक होना चाहिए, जो इसकी देखभाल, प्रबंधन और आम लोगों की पहुँच सुनिश्चित करे।
1904 और 1958 के कानूनों के तहत ASI की जिम्मेदारी
1904 के प्राचीन स्मारक संरक्षण एक्ट और फिर 1958 के प्राचीन स्मारक और पुरातत्व स्थल और अवशेष एक्ट के तहत, ASI को ऐतिहासिक महत्व के स्मारकों को बचाने और उनकी देखभाल करने का कानूनी अधिकार है। 1958 के एक्ट के सेक्शन 18 के मुताबिक, ASI को ये सुनिश्चित करना है कि इन स्मारकों तक आम लोगों की पहुँच बनी रहे।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ASI अपनी इस कानूनी जिम्मेदारी को निभाने में नाकाम रही, खासकर तब जब इस जगह पर धार्मिक विवाद चल रहा है। ASI की निष्क्रियता की वजह से जामा मस्जिद की मैनेजमेंट कमेटी ने इस जगह पर लोगों की पहुँच रोक दी। उनका मानना है कि ये हिंदू भक्तों के उस अधिकार का उल्लंघन है, जो इस जगह को श्री हरि हर मंदिर का मूल स्थान मानते हैं, जिसे मुगलों ने तोड़ा था।
इसके अलावा याचिकाकर्ताओं ने कहा कि ASI ने इस जगह को सुरक्षित करने, इसके ऐतिहासिक महत्व को बनाए रखने या उन निशानों और चीजों को बचाने के लिए जरूरी कदम नहीं उठाए, जो इसके हिंदू मूल को साबित कर सकते हैं। उनका कहना है कि ये ASI की कानूनी जिम्मेदारियों को पूरा न करने की नाकामी है।
संभल में सर्वे के दौरान हुई थी हिंसा
बता दें कि 19 नवंबर 2024 को पहला सर्वे तनाव भरे माहौल में हुआ, लेकिन शांति से पूरा हो गया और कोई हिंसा नहीं हुई। मगर 24 नवंबर 2024 को दूसरा सर्वे शुरू होते ही स्थानीय लोगों ने विरोध शुरू कर दिया। कोर्ट द्वारा नियुक्त टीम जब मस्जिद के अंदर सर्वे कर रही थी, तब बड़ी संख्या में मुस्लिम भीड़ ने मस्जिद और आसपास के इलाकों को घेर लिया।
गुस्साई भीड़ का ‘विरोध’ जल्दी ही हिंसक हो गया। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए तैनात पुलिस टीमों पर हमला हुआ। दंगाइयों ने पुलिस पर पत्थर और डंडों से हमला किया और गोलीबारी भी की।
संभल हिंसा के बाद स्थानीय प्रशासन, राज्य सरकार और पुलिस ने दोषियों को पकड़ने के लिए कई कदम उठाए। जाँच में पता चला कि संभल के सांसद जिया उर रहमान बर्क समेत स्थानीय नेताओं ने भीड़ को भड़काया था और ये हिंसा पहले से प्लान की गई थी। घटनास्थल से पाकिस्तान में बनी गोलियाँ भी मिलीं, जिसने जाँच को और गंभीर बना दिया। 45 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया और कई FIRs के तहत मामले चल रहे हैं।
विवादित जगह पर हिंदू मंदिर के सबूत
जनवरी 2025 में मस्जिद का सर्वे रिपोर्ट चंदौसी कोर्ट में सील बंद लिफाफे में जमा किया गया। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, मस्जिद में दो बरगद के पेड़ हैं, जो आमतौर पर हिंदू मंदिरों से जुड़े होते हैं, जहाँ उनकी पूजा होती है। इसके अलावा मस्जिद के अंदर एक कुआँ है, जिसका एक हिस्सा अंदर और दूसरा बाहर है। कुएँ का बाहरी हिस्सा ढका हुआ था। सर्वे रिपोर्ट में करीब साढ़े चार घंटे की वीडियोग्राफी शामिल थी, जिसमें लगभग 1,200 तस्वीरें ली गईं।
रिपोर्ट में कहा गया कि मस्जिद में ऐसे निशान हैं, जो उस दौर के मंदिरों और हिंदू स्थानों की पहचान हैं। मंदिर की मूल वास्तुकला को दरवाजों, खिड़कियों और सजी हुई दीवारों पर प्लास्टर और पेंट लगाकर छिपा दिया गया है।
सेक्शन 3D और संभल मस्जिद
संभल की जामा मस्जिद का मामला सीधे तौर पर बताता है कि सेक्शन 3D क्यों जरूरी था। 1920 से ये एक केंद्रीय संरक्षित स्मारक है, फिर भी इसे वक्फ संपत्ति के तौर पर दावा किया जाता रहा। इससे न सिर्फ हिंदू भक्तों की पहुँच रुकी, जो इसे श्री हरि हर मंदिर मानते हैं, बल्कि ASI को भी दिक्कत हुई। वक्फ (संशोधन) एक्ट कानूनी साफगोई लाता है और ऐसे संरक्षित स्मारकों को धार्मिक या प्रशासनिक झगड़ों में फँसने से बचाता है।
ओवैसी का ये कहना कि “संभल मस्जिद भी वक्फ बोर्ड की नहीं रहेगी” वक्फ (संशोधन) एक्ट के मकसद को सही साबित करता है। ये एक्ट भारत की पुरातत्व धरोहर को गैरकानूनी या राजनीतिक कब्जों से बचाने के लिए है।
ASI संरक्षित स्मारकों को वक्फ संपत्ति के तौर पर दावा न करने देने से ये एक्ट ऐतिहासिक सच्चाई को बनाए रखता है और लंबे समय से चले आ रहे धार्मिक विवादों में न्याय देता है। ये सभ्यता की उन सच्चाइयों को फिर से हासिल करने और बचाने की जरूरी कोशिश है, जो सदियों की जबरदस्ती के नीचे दब गई थीं।
कर्नाटक हाई कोर्ट ने शुक्रवार (4 अप्रैल 2025) को संसद एवं राज्य विधानसभाओं से समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने के लिए हरसंभव प्रयास करने का आग्रह किया। अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 44 तहत समान नागरिक संहिता पर कानून बनाने से भारत के संविधान की प्रस्तावना में निहित उद्देश्य और आकांक्षाएँ सही मायने में साकार होंगी।
जस्टिस हंचते संजीवकुमार की एकल पीठ ने कहा कि समान नागरिक संहिता को लागू करने से महिलाओं के लिए न्याय सुनिश्चित होगा, सभी जातियों और धर्मों में समानता को बढ़ावा मिलेगा तथा भाईचारे के माध्यम से व्यक्तिगत गरिमा कायम रहेगी। न्यायालय ने कहा कि संविधान के अनुसार भारत में सभी महिलाएँ एक नागरिक के तौर पर समान हैं, लेकिन पर्सनल लॉ उनके साथ भेदभाव करते हैं।
कोर्ट ने कहा कि धर्म के आधार पर बने पर्सनल लॉ के कारण महिलाओं के भेदभाव होता है। हिंदू कानून के तहत बेटी को बेटे के समान जन्मसिद्ध अधिकार और पत्नी को अपने पति के बराबर दर्जा प्राप्त है। हालाँकि, मुस्लिम कानून के तहत ऐसी समानता नहीं दिखाई देती है। इसलिए, कोर्ट ने कानून के समक्ष समानता सुनिश्चित करने के लिए समान नागरिक संहिता की आवश्यकता पर जोर दिया।
कर्नाटक हाई कोर्ट के न्यायाधीश हंचते संजीवकुमार ने समान नागरिक संहिता कानून को लेकर संविधान सभा का तर्क दिया। उन्होंने कहा कि संविधान सभा में भी समान नागरिक संहिता विवाद का एक विषय था। जस्टिस संजीवकुमार ने कहा कि संविधान सभा के कुछ सदस्यों ने समान नागरिक संहिता का समर्थन किया और कुछ सदस्यों ने इसका विरोध किया था।
न्यायालय ने कहा, “संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. बीआर अंबेडकर ने अपने सबसे शानदार भाषण में समान नागरिक संहिता के पक्ष में तर्क दिया है।” कर्नाटक हाई कोर्ट के जस्टिस संजीवकुमार ने आगे कहा कि सरदार वल्लभभाई पटेल, डॉ राजेंद्र प्रसाद, टी कृष्णमाचारी और मौलाना हसरत मोहानी जैसे प्रमुख नेताओं ने समान नागरिक संहिता का समर्थन किया था।
इसके अलावा, कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों का भी हवाला दिया। इनमें मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम और अन्य (1985), सरला मुद्गल (श्रीमती) और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य (1995) और जॉन वल्लमट्टम और अन्य बनाम भारत संघ (2003) प्रमुख हैं। इन फैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने संसद को समान नागरिक संहिता पर कानून बनाने का सुझाव दिया था।
दरअसल, कर्नाटक हाई कोर्ट ने यह टिप्पणी एक मामले की सुनवाई के दौरान की। अब्दुल बशीर खान नामक व्यक्ति की मृत्यु के बाद उनके कानूनी उत्तराधिकारियों के बीच संपत्ति बँटवारे को लेकर विवाद हो गया। दरअसल, अब्दुल बशीर ने अपनी मृत्यु से पहले कोई वसीयत नहीं लिखी थी। वे अपने पीछे कई अचल संपत्तियाँ छोड़ गए, जिनमें से कुछ पैतृक थीं तथा कुछ उन्होंने स्वयं अर्जित की थीं।
अब्दुल बशीर की मौत के बाद उनकी संपत्ति के बँटवारे को लेकर उनके बच्चों के बीच मतभेद उत्पन्न हो गए। बेटी शहनाज़ बेगम की मौत के बाद उनका प्रतिनिधित्व उनके शौहर सिराजुद्दीन मक्की (प्रतिवादी) ने किया। मक्की ने आरोप लगाया कि उन्हें संपत्ति के बँटवारे से बाहर रखा गया और उसमें से उन्हें उचित हिस्सा नहीं दिया गया। इसको लेकर मक्की ने बेंगलुरु सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर किया।
नवंबर 2019 में ट्रायल कोर्ट ने माना कि विचाराधीन तीन संपत्तियाँ संयुक्त परिवार की संपत्ति का हिस्सा हैं और शहनाज़ बेगम उन में पाँचवें हिस्से की हकदार हैं। हालाँकि, ट्रायल कोर्ट ने अन्य संपत्तियों को बँटवारा योग्य नहीं बताया। ट्रायल कोर्ट के फैसले से असंतुष्ट अब्दुल बशीर के दो बेटों- समीउल्ला खान और नूरुल्ला खान तथा बेटी राहत जान (अपीलकर्ता) ने कर्नाटक हाई कोर्ट में अपील दायर की।
इधर, सिराजुद्दीन मक्की ने निचली अदालत के फैसले के खिलाफ आपत्ति दायर की, जिसमें अपने हिस्से को बढ़ाने या पहले के आदेश में संशोधन की माँग की गई। हाई कोर्ट ने दोनों पक्ष की याचिकाओं को स्वीकार किया और अपील एवं आपत्ति याचिका, दोनों पर एक साथ सुनवाई की। तमाम दलीलों को सुनने के बाद हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।
बंगाल में राम मंदिर बनवाने के लिए भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी ने राम नवमी के मौके पर मंदिर की आधारशिला रखी। यह मंदिर नंदीग्राम के सोनाचूडा में बनाया जाएगा। इसका मॉडल अयोध्या के राम मंदिर पर ही आधारित होगा।
खुद सुवेंदु अधिकारी ने इस शिलान्यास समारोह की तस्वीरें अपने सोशल मीडिया पर साझा की है। वीडियो में सैंकड़ों लोग भगवा धारण करके, सनातन की पताका लिए कार्यक्रम में शामिल होते दिख रहे हैं। वहीं सुवेंदु अधिकारी को सभी भक्तों का अभिवादन और मंदिर की आधारशिला रखने देखा जा सकता है।
अपने एक्स में ये वीडियो साझा करते हुए उन्होंने लिखा, “भारतीय सनातन संस्कृति और धार्मिक परंपराओं के अनुसार, अयोध्या में ऐतिहासिक पवित्र राम जन्मभूमि मंदिर की तर्ज पर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री रामचंद्र को समर्पित एक भव्य मंदिर का भूमिपूजन और शिलान्यास का शुभ समारोह आज रामनवमी के पावन अवसर पर आयोजित किया गया।”
Today, I had the privilege of participating in the Foundation Laying Ceremony of the Ram Mandir at Sonachuda, Nandigram.
In accordance with Indian Sanatan culture and religious traditions, the auspicious ceremony of the groundbreaking and foundation stone laying of a grand… pic.twitter.com/DEojL6U1sJ
उन्होंने बताया कि शिलान्यास समारोह नंदीग्राम के पहले ‘हिंदू शहीद’ स्वर्गीय देवव्रत मैती की पत्नी श्रीमती कल्पना मैती द्वारा किया गया। आगे वह बोले, “यह उन सभी के लिए एक ऐतिहासिक और खुशी का अवसर है, जो भगवान राम के धर्म, साहस और करुणा के मूल्यों को अपने दिल के करीब रखते हैं। इस मंदिर का निर्माण केवल ईंट और गारा रखना नहीं है, यह विश्वास, एकता और सांस्कृतिक गौरव की विरासत का निर्माण है।”
बता दें कि अयोध्या वाले राम मंदिर की तर्ज पर बंगाल में बनने जा रहा ये मंदिर करीबन 3.5 बिघा (लगभग 1.5 एकड़) भूमि पर बनाया जाएगा। इस मंदिर की विशेषता होगी कि यहाँ मुख्य पूजा स्थल के अलावा एक गौशाला, गौशाला, एक आयुष स्वास्थ्य केंद्र और आगंतुकों के लिए एक अतिथि गृह भी होगा।
गौरतलब है कि तृणमूल कॉन्ग्रेस ने इस मंदिर के बनने की खबर पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। पार्टी ने यह आरोप लगाया कि शुभेंदु अधिकारी ने उस भूमि का उपयोग किया है जिसे पहले शहीद परिवारों की याद में अस्पताल बनाने के लिए खरीदा गया था। टीएमसी नेता कुणाल घोष ने कहा कि यह धार्मिक राजनीति का उदाहरण है और अधिकारियों को इस मुद्दे पर जनता से जवाब देना चाहिए।
ये भी मालूम हो कि तृणमूल कॉन्ग्रेस के लिए नंदीग्राम में भाजपा नेता द्वारा मंदिर की आधारशिला रखा जाना इसलिए भी परेशान करने वाला है नंदीग्राम पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का राजनीतिक गढ़ रहा है। यहाँ 2007 में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन हुआ था, जिसने ममता को राजनीतिक रूप से प्रमुखता दिलाई थी। अब, सुवेंदु अधिकारी ने इस स्थान पर राम मंदिर बनाने की घोषणा की है। सुवेंदु अधिकारी इसी जगह से भाजपा के विधायक हैं।
आज 6 अप्रैल है। रामनवमी है। बीजेपी का स्थापना दिवस भी। यह तारीखों का गजब संयोग है कि 2025 में राम को उनके जन्मस्थान में विराजमान करने वाली पार्टी की स्थापना की तारीख रामनवमी को ही पड़ी है।
अयोध्या के रामजन्मभूमि पर राम मंदिर का निर्माण बीजेपी के कोर एजेंडे में रहा है। सालों तक ‘मंदिर वहीं बनाएँगे, पर तारीख नहीं बताएँगे’, जैसे तंज कस बीजेपी का मजाक उड़ाया गया है। आज न केवल रामलला अपने भव्य मंदिर में विराजमान हैं, बल्कि जिस बीजेपी का ‘काउ बेल्ट पार्टी’ कहकर मजाक बनाया जाता था, वह भी पूरे देश में फैल चुकी है।
इस यात्रा में कई मौके आए जब पार्टी के समर्थक भी अधीर हो गए। खासकर, 2014 के बाद से, जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने राजनीतिक सफलताओं की नई गाथा लिखनी प्रारंभ की, ऐसे समर्थक भी मैगी बनने की गति से परिणाम की आकांक्षा करने लगे, जिन्होंने शनै: शनै: पार्टी को खड़े होते देखा है।
वास्तविकता यही है कि बीजेपी कभी अपने कोर मुद्दों से पीछे नहीं हटी। उसकी सरकारों ने ऐसे मोर्चों पर कार्य कर दिखाया है जिसकी स्वतंत्र भारत में कल्पना नहीं की जाती रही है। जिन मुद्दों को छूने मात्र से देश जलने की धमकी दी जाती है। उन मुद्दों को भी धीरे—धीरे शांति के साथ दफन किया गया है।
जैसे, हाल में संसद से पास हुआ वक्फ संशोधन विधेयक। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से यह कानून भी अब बन चुका है। आज से 10 वर्ष पूर्व कोई सोच तक नहीं सकता था कि कोई सरकार वक्फ, तीन तलाक और 370 जैसे मुद्दों को छू भी पाएगी। इन्हें छूना मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालने जैसा था।
मुस्लिमों की सड़क पर शक्ति प्रदर्शन का इतना डर भारतीय जनमानस में बैठा हुआ था कि सब ऐसी कोई कल्पना से ही डर जाते थे। आज खुद को दक्षिणपंथी बताने वाले तक आशंका जताते थे कि अगर ऐसे कानून छुए गए तो इस देश में खून खराबा होगा, हिंदुओं पर हमले होंगे और ना जाने कितनी जानें जाएँगी।
आशंका के विपरीत चाहे वक्फ हो या फिर नागरिकता संशोधन अधिनियम के लागू होने का समय, ‘सब शांतिपूर्वक’ से निपट गया। एकाध जुबानी जुगाली और बयानों को छोड़ दें तो देश के वो बटेर तक नहीं मरी। इस कानून के संसद में पारित होने ने साफ कर दिया कि भाजपा अपने एजेंडे पर कायम है और लगातार एक एक करके उन्हें पूरा करेगी। लेकिन इस पूरे एपिसोड से एक और बात निकल कर आती है, वो ये है कि पार्टी अपने हर वादे को पूरा करेगी लेकिन समय देख कर।
इस बात को समझना जनता और विशेषकर उन समर्थकों के लिए जरूरी है, जो हर बात पर मोदी से आशा रखते हैं कि वह बम-बंदूक चला दें और एकदम कठोर एक्शन ले लें। किसी भी पार्टी का समर्थक होने के नाते कार्यकर्ता की आकांक्षा होती है कि सभी एजेंडा फटाफट पूरे हों। लेकिन सरकारें इस तरह नहीं चलती।
वर्ष 2020 में होने वाले शाहीन बाग के ड्रामे को लेकर पूरा देश गुस्सा था। चाहे शरजील इमाम का देश काटने वाला बयान हो या फिर कुदरती बिरयानी और बिल्किस दादी वाले ड्रामे, सबको मालूम था कि इस भीड़ का असल एजेंडा देश को एक गृह युद्ध में झोंकना था। तब सरकार ने उन्हें थकाया, बैठे रहने दिया और बाद में उनपर हंटर चलाया। तुरंत लाठी और गोली चलाने से क्या होता, बांग्लादेश में शेख हसीना का तख्तापलट इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।
हसीना ने कुछ दिन धैर्य से काम लिया, लेकिन बाद में पुलिस को खुली छूट दी। उसने इस्लामी कट्टरपंथियों को वह दे दिया, जो वह चाहते थे। यह था उकसावे का मौका। इसके बाद हसीना को देश छोड़ना पड़ा। उनका घर जमींदोज हो गया और मोहम्मद युनुस नाम की कठपुतली ढाका में आकर बैठ गई। पीछे से उसे इस्लामी कट्टरपंथी ही चला रहे हैं, यह दुनिया को पता है।
शाहीन बाग की कारस्तानिययों का सरकार ने कोई संज्ञान नहीं लिया। यह कहना झूठ है। आज शरजील इमाम, उमर खालिद और खालिद सैफी जैसे लोग जेलों में सड़ रहे हैं। उन दादी और नेताओं का कोई नामलेवा तक नहीं बचा जो सरकार को उखाड़ फेंकना चाहते थे। इसी तरह मोदी सरकार के CAA कानून को रोकने पर भी समर्थकों ने प्रश्न उठाए थे। वह मार्च, 2024 में लागू भी हो गया और कोई कुछ नहीं बोल सका। इसी तरह अनुच्छेद 370 का मामला रहा। भाजपा सरकार ने ऐसे समय पर यह हटाया कि इसे वापस लाना अब संभव नहीं है।
वक्फ बोर्ड को लेकर आज से कुछ साल पहले व्हाट्सऐप पर मैसेज चलते थे, यह कानून कितना भयावह है, इसके विषय में बताया जाता था। अब वो इतिहास हो चुका। साल भर तक दिल्ली घेर कर बैठने वाले कथित किसान आंदोलनकारी भी आज अप्रासंगिक हो गए, उनके भीतर ही आज इतने गुट और सिर फुटौव्वल है कि एका नहीं हो पा रहा।
सरकार जिस दिन चाहेगी कानून लागू हो जाएगा। समर्थकों को समझना होगा कि हम चीन की तरह कोई देश नहीं जहाँ लोकतंत्र नाम की चिड़िया का उड़ना मना हो। ना हम पाकिस्तान हैं जहाँ फौज जो चाहे, संगीनों की नोक के बल पर वो कर ले। हम पूर्ण रूप से लोकतंत्र हैं और विरोधी आवाज का भी सम्मान करते हैं।
महान दार्शनिक प्लेटो का कहना है कि जो काम एक आदमी एक घंटे में राजतंत्र में करता है, वही काम लोकतंत्र में 7 आदमियों की समिति मिलाकर 7 दिन में करती है।
भारत के संबंध में भी यही बात है, यहाँ सब काम झटके से नहीं हो सकते। लेकिन जो होता है, स्थाई होता है। इस हिसाब से देखा जाए तो मोदी सरकार बीते 10 सालों के भीतर इतने मुद्दे हल करने के सफल रही है, जितने बीते 67 साल में भी पार्टियां नहीं कर पाई थीं। अगर आपको मोदी सरकार की स्पीड कछुए जैसी लगती हो, तो समझिए कि इससे पूर्व में काम घोंघे की रफ़्तार से होते थे।
मालदीव का भारत विरोध और फिर मुइज्जु का भारत आकर कर्ज माँगना इसका क्लासिक उदाहरण है। स्वाभाविक है कि भारत के किसी शहर के एक मुहल्ले की आबादी वाला देश आपके प्रधानमंत्री पर अपमानजनक टिप्पणियां करे तो गुस्सा आती है।
आप चाहते हैं कि उस देश को मसल कर रख दिया जाए। लेकिन सरकार ऐसे नहीं सोचती। उसने इसी मुइज्जु को दिल्ली बुलाकर भिखारी साबित किया। वो दिन दूर नहीं है जब यही सरकार UCC भी लाएगी और वह भी देश में लागू होगा।
आगे चलकर शायद देश का संविधान अपने मूल स्वरूप में भी वापस लौट सके। उसमें जबरदस्ती समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता का जो पुट डाला गया है, उसे हटाया जाए।
ऐसे सैकड़ों उदाहरण है और लिखने की कोई सीमा नहीं है, लेकिन समर्थकों को एक बात समझने की जरूरत है:
महाराष्ट्र के ठाणे जिले के कल्याण में एक शख्स ने सड़क के किनारे मोमोज की दुकान खोलने के लिए 60 साल की एक वृद्धा की हत्या कर दी। 30 वर्षीय हत्यारा अकबर मोहम्मद शेख उर्फ़ चाँद (चाँद शेख उर्फ अकबर) एक आदतन अपराधी है। उसने रंजना चंद्रकांत पाटेकर के घर में घुसकर रंजना की हत्या कर दी और लूटपाट की। कुछ दिन पहले ही उसे ‘अच्छे व्यवहार’ के कारण जेल से छोड़ा गया था।
यह घटना 20 मार्च की है। अंबिवली इलाके में 60 साल की रंजना पाटेकर अपने घर में मृत पाई गई थीं। पुलिस ने जब जाँच शुरू की तो उसे कोई सुराग हाथ नहीं लगा। इलाके बेहद घना था और वहाँ सीसीटीवी कैमरे भी नहीं लगे थे। इस कारण से महिला के घर में किसी को आते-जाते किसी ने नहीं देखा। यह पुलिस के लिए बेहद चुनौती भरा वक्त था।
इस बीच मृत महिला के परिजनों ने अपने पड़ोसी दीपेश सपकाले पर हत्या की आशंका व्यक्त की। आशंका के आधार पर महाराष्ट्र पुलिस ने दीपेश सपकाले को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया। हालाँकि, लगातार पूछताछ के बाद भी सपकाले के पास से लूट का माल बरामद नहीं हुआ और ना ही इसके बारे में वह कोई जानकारी दे पाया। इसके बाद पुलिस ने इलाके के सभी अपराधियों की सूची जुटाई।
पुलिस ने लगभग 25 लोगों से पूछताछ की। इसी बीच खड़कपाड़ा पुलिस के खबरियों ने चाँद के बारे में जानकारी दी। किसी तरह पुलिस को उसके बारे में जानकारी मिली और उसे शुक्रवार (4 अप्रैल) को अटाली क्षेत्र से गिरफ्तार कर लिया गया। वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक अमरनाथ वाघमोडे ने बताया कि आरोपित अकबर मोहम्मद शेख उर्फ़ चाँद के पास से चोरी के गहने बरामद कर लिए गए हैं।
आरोपित चाँद ने अपना गुनाह कबूल कर लिया है। उसने पुलिस को बताया कि घटना वाले दिन रंजना का दरवाजा खटखटाया और पानी माँगा। जब रंजना पानी लाने के लिए अंदर गई तो वह घर में जबरन भीतर घुस गया और टीवी की आवाज तेज कर दी, ताकि आवाज बाहर ना जाए। जब महिला पानी लेकर आई तो चाँद ने उसकी गला और मुँह पकड़कर जमीन पर पटक दिया।
इस दौरान उसने महिला की घोंटकर हत्या कर दी। महिला की हत्या करने के बाद चाँद ने उसकी कानों से लगभग एक लाख रुपए की कीमत वाली सोने की बालियाँ निकाल लीं और वहाँ से फरार हो गया। गिरफ्तारी के बाद उसने पुलिस को बताया कि जेल से बाहर आने के बाद वह बेरोजगार था। वह रोड के किनारे मोमोज का ठेला लगाना चाहता था।
उसने बताया कि मोमोज का ठेला लगाने के लिए उसके पास पैसे नहीं थे। इसके उसने लूटने की योजना बनाई। उसने बुजुर्ग महिला को अपना टारगेट बना लिया। वह महिला के घर की लगातार रेकी करने लगा। वह ठाणे के निकट आंबिवली इलाके के ही नवनाथ कॉलोनी में रहता है। उसका पहले से ही आपराधिक रिकॉर्ड रहा है।
पुलिस उपायुक्त अतुल जेंडे के अनुसार, आरोपित चाँद कुछ महीने पहले ही आधारवाड़ी जेल से छूटकर आया था। उसके खिलाफ खड़कपाड़ा के कोलसेवाड़ी पुलिस स्टेशन में साल 2014 में हत्या का एक मामला दर्ज किया गया था। उसने कल्याण की ही एक अन्य महिला की इसी तरह हत्या की थी। उस समय वह गैस सिलेंडर डिलीवरी बॉय के तौर पर काम करता था।
इस मामले में चाँद शेख और एक अन्य डिलीवरी बॉय को कोर्ट ने आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई थी। हालाँकि, उसके ‘अच्छे व्यवहार’ को देखते हुए उसे 10 साल बाद ही रिहा कर दिया गया। आरोपित चाँद आठ महीने पहले ही जेल से रिहा होकर बाहर आया था। बाहर आते ही उसने एक दूसरी महिला को अपना निशाना बना लिया।