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सुनवाई के पहले ही दिन वक्फ बोर्ड में गैर मुस्लिमों की एंट्री रोकने का सुप्रीम कोर्ट ने दिया प्रस्ताव, केंद्र से पूछा- क्या हिंदू संस्थाओं में मुस्लिमों को देंगे प्रवेश?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली NDA सरकार द्वारा बनाए गए वक्फ संशोधन कानून को लेकर कट्टरपंथी मुस्लिम देश भर में हंगामा कर रहे हैं। वहीं, इस कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में लगभग 73 याचिकाएँ दाखिल की गई हैं, जिस पर बुधवार (16 अप्रैल) को सुनवाई हुई। सुनवाई के पहले दिन सुप्रीम कोर्ट ने कानून के कई प्रावधानों पर रोक लगा दिया है।

सुनवाई के पहले दिन भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना की अधक्षता वाली जस्टिस पीवी संजय कुमार और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने इस मामले पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब माँगा है। हालाँकि, कोर्ट ने कानून के क्रियान्वयन पर रोक नहीं लगाई है, लेकिन बेहद कठोर टिप्पणी की है। इस मामले की अगली सुनवाई 17 अप्रैल को होगी।

सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने आगे कहा कि वह वक्फ संशोधन अधिनियम 2025 को चुनौती देने वाली याचिकाओं में कुछ अंतरिम आदेश पारित करने का प्रस्ताव कर रहा है। इसमें पहला ये है कि कोर्ट द्वारा वक्फ के रूप में घोषित की गई संपत्तियों को वक्फ संपत्ति से हटाया नहीं जाना चाहिए, चाहे वे वक्फ-बाय-यूजर हों या विलेख द्वारा वक्फ हों। हालाँकि, आदेश अभी पारित नहीं किया है।

वहीं, सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने आगे आदेश दिया कि संशोधन अधिनियम के उस प्रावधान, जिसके अनुसार वक्फ संपत्ति को वक्फ के रूप में नहीं माना जाएगा, जब तक कि कलेक्टर यह जाँच ना करे कि संपत्ति सरकारी भूमि है या नहीं, को प्रभावी नहीं किया जाएगा। न्यायालय ने यह भी कहा कि वक्फ बोर्ड और केंद्रीय वक्फ परिषद के सभी सदस्य मुस्लिम होने चाहिए, सिवाय पदेन सदस्यों के।

सीजेआई संजीव खन्ना ने कहा, “हमारा अंतरिम आदेश समानता को संतुलित करेगा। हम कहेंगे कि जो भी संपत्तियाँ कोर्ट द्वारा वक्फ घोषित की गई हैं, उन्हें गैर-वक्फ नहीं माना जाएगा, चाहे वह उपयोगकर्ता द्वारा वक्फ हो या नहीं। कलेक्टर कार्यवाही जारी रख सकते हैं, लेकिन प्रावधान लागू नहीं होंगे। बोर्ड और परिषद के संबंध में पदेन सदस्य नियुक्त किए जा सकते हैं, लेकिन अन्य सदस्य मुस्लिम होने चाहिए।”

इस मामले में सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार का पक्ष सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने की। वहीं, वक्फ संशोधन कानून के खिलाफ विभिन्न याचिकाकर्ताओं की ओर से कपिल सिब्बल, राजीव धवन, अभिषेक मनु सिंघवी, सीयू सिंह ने दलीलें पेश कीं। सुनवाई के पहले दिन दोनों पक्षों ने विभिन्न मौकों पर अपनी बातें रखीं।

बहस के दौरान कपिल सिब्बल ने कहा, “हम उस प्रावधान को चुनौती देते हैं, जिसमें कहा गया है कि केवल मुस्लिम ही वक्फ बना सकते हैं। सरकार कैसे कह सकती है कि केवल वे लोग ही वक्फ बना सकते हैं, जो पिछले 5 सालों से इस्लाम को मान रहे हैं? राज्य कैसे तय कर सकता है कि मैं मुस्लिम हूँ या नहीं और इसलिए वक्फ बनाने के योग्य हूँ या नहीं?”

एडवोकेट कपिल सिब्बल ने कहा कि वक्फ सैकड़ों साल पहले बनाया गया है। अब ये 300 साल पुरानी संपत्ति की वक्फ डीड माँगेंगे तो समस्या आएगी। इस पर जस्टिस विश्वनाथन ने कहा कि जो अल्लाह का है, वो वक्फ है। कानून में झूठे दावों से बचने के लिए वक्फ डीड का प्रावधान है। वहीं, CJI ने कहा कि वक्फ रजिस्ट्रेशन मददगार साबित होगा।

सिब्बल ने कहा कि इस कानून के जरिए मुस्लिमों की आस्था में दखलअंदाजी की गई है। उन्होंने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 26 अपने धर्म के अनुसार काम करने की इजाजत देता है। इस पर CJI संजीव खन्ना ने कहा, “हिंदुओं के मामले में भी सरकार ने कानून बनाया है। संसद ने मुस्लिमों के लिए भी कानून बनाया है। आर्टिकल 26 धर्मनिरपेक्ष है। यह सभी कम्युनिटी पर लागू होता है।”

सिब्बल ने यह भी तर्क दिया कि नए कानून के तहत वक्फ बोर्ड में हिंदू भी सदस्य होंगे। यह अधिकारों का हनन है। इस पर केंद्र की ओर से पेश SG तुषार मेहता ने कहा कि यह एक वैधानिक कमिटी की बात है, जो नजर रखेगी। इसमें मुस्लिम भी सदस्य हो सकते हैं और नहीं भी हो सकते हैं। इस जस्टिस कुमार ने उनसे पूछा कि क्या तिरुपति बोर्ड में भी गैर-हिंदू हैं।

हालाँकि, CJI ने कहा कि हिंदुओं के दान कानून के मुताबिक कोई भी बाहरी व्यक्ति बोर्ड का हिस्सा नहीं हो सकता है। यहाँ तक कि कपिल सिब्बल ने यह तक कह दिया कि राज्य ये बताने वाला कौन होता है कि मुस्लिमों का उत्तराधिकार कैसे होगा। इस सीजेआई ने कहा कि हिंदुओं के मामले में भी उत्तराधिकार हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम संसद द्वारा बनाया गया है।

केंद्र की ओर से पेश SG ने कहा कि यह यह कानून जेपीसी द्वारा लंबे विचार-विमर्श के बाद आया है। इस पर संयुक्त संसदीय समिति ने  38 बैठकें कीं, विभिन्न क्षेत्रों का दौरा किया और 98 लाख से अधिक मिले सलाहों पर विस्तृत चर्चा की। इसके बाद यह कानून बना। वक्फ के पंजीकरण को लेकर सिब्बल द्वारा उठाए गए सवाल पर भी मेहता ने कहा कि पंजीकरण 1995 के अधिनियम में भी अनिवार्य है।

CJI ने केंद्र सरकार से पूछा कि इस कानून में वक्‍फ बाई यूजर क्‍यों हटाया गया? 14वीं, 15वीं सदी की अधिकांश मस्जिदों में बिक्री डीड नहीं होगा। अधिकांश मस्जिदें वक्‍फ बाई यूजर होंगी। इस पर SG तुषार मेहता ने कहा कि उन्हें (मुस्लिमों को) उन्हें पंजीकृत करवाने से किसने रोका? सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया कि अगर सरकार कहने लगी कि ये जमीनें सरकारी हैं तो क्या होगा? सरकार की ओर से तुषार मेहता ने कहा कि वक्‍फ बोर्ड में पहले सिर्फ शिया और सुन्‍नी थे। अब सभी संप्रदाय के लोगों को इसमें जगह दी गई है।

नई ऊँचाई पर अमेरिका-चीन का ट्रेड वार: ट्रंप ने चीनी माल पर टैरिफ 100% और बढ़ाया, अब देने होंगे 245%… भारत के साथ ‘डील’ पर बातचीत शुरू होने के आसार

अमेरिका ने चीन पर टैरिफ एक बार फिर बढ़ा दिया है। अब चीन को आयात पर 245 फीसदी टैरिफ देना होगा। पहले ये 145 फीसदी था लेकिन जब चीन ने अमेरिका पर पलटवार करते हुए 125 फीसदी टैरिफ लगाया तो अमेरिका ने एक बार फिर टैरिफ में बढ़ोतरी कर दी। मंगलवार (16 अप्रैल 2025) को वाइट हाउस ने इसकी जानकारी दी। अमेरिका के इस सख्त रवैया से चीन-अमेरिका के बीच टैरिफ वार होने की आशंका बढ़ गई है।

अमेरिका ने कहा, “चीन को अब अपने जवाबी कदमों के परिणामस्वरूप अमेरिका में आयात पर 245% तक टैरिफ का सामना करना पड़ रहा है।” व्हाइट हाउस ने इस कदम को ट्रम्प की चल रही ‘अमेरिका फर्स्ट ट्रेड पॉलिसी’ का हिस्सा बताया।

ट्रंप प्रशासन ने चीन पर गैलियम, जर्मेनियम और एंटीमनी जैसे हाईटेक सामग्री पर जानबूझकर प्रतिबंध लगाया है क्योंकि इसका इस्तेमाल सैन्य, एयरोस्पेस और सेमीकंडक्टर से जुड़े उद्योगों के लिए होता है। हाल ही में चीन ने 6 हेवी रेयर मेटल्स के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था, जिससे विश्वस्तर पर इन धातुओं की उपलब्धता पर असर पड़ा।

वाइट हाउस के बयान में कहा गया है, “कुछ महीने पहले, चीन ने संयुक्त राज्य अमेरिका को गैलियम, जर्मेनियम, एंटीमनी जैसे दुर्लभ धातुओं के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था, इससे पहले चीन ने दुनिया भर में ऑटोमेकर्स, एयरोस्पेस निर्माताओं, सेमीकंडक्टर कंपनियों और सैन्य सामग्री के लिए जरूरी घटकों की आपूर्ति को रोकने के लिए 6 भारी दुर्लभ धातुओं के निर्यात को रोक दिया।”

इसके बाद अमेरिका के टैरिफ बढ़ाने की घोषणा की और चीन-अमेरिका आमने-सामने आ गए। जानकारों के मुताबिक टैरिफ लगाने से पहले अमेरिका बात करना चाहता था लेकिन चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग इसके लिए तैयार नहीं हुए। दरअसल जिंगपिंग खुद को बातचीत के टेबुल पर लाकर चीन को कमजोर दिखाना नहीं चाहते थे। इसलिए अमेरिका ने टैरिफ की घोषणा की और चीन ने इसका जवाब जब टैरिफ बढ़ा कर दिया तो राष्ट्रपति ट्रंप ने सख्त रवैया अपनाते हुए टैरिफ को बढ़ा कर अब 245 फीसदी कर दिया।

इससे पहले अमेरिका ने भारत समेत 75 देशों पर टैरिफ बढ़ोतरी को 90 दिनों के लिए रोक दिया था। ये देश अब ट्रेड डील के लिए अमेरिका के संपर्क में हैं। भारत और अमेरिका के बीच भी ट्रेड डील पर बातचीत मई में शुरू हो सकता है। राष्ट्रपति ट्रंप ने जापान के साथ अमेरिका की बातचीत शुरू होने की जानकारी देते हुए खुशी जाहिर की है।

व्हाइट हाउस ने कहा, “75 से ज़्यादा देश पहले ही नए व्यापार सौदों पर चर्चा करने के लिए संपर्क कर चुके हैं।” “नतीजतन, इन चर्चाओं के दौरान व्यक्तिगत रूप से हाई टैरिफ़ फिलहाल रोक दिए गए हैं, सिर्फ चीन को छोड़ कर जिसने जवाबी कार्रवाई की है।”

उत्तराखंड की जिस सुरंग में 17 दिन तक फँसे रहे 41 श्रमिक, वहाँ बना बाबा बौखनाग का भव्य मंदिर: CM धामी ने की पूजा-अर्चना, स्थानीय लोग मानते हैं रक्षक

उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में स्थित सिलक्यारा टनल के पास बाबा बौखनाग के भव्य मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम का आयोजन हुआ। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी बुधवार (16 अप्रैल 2025) को बाबा बौखनाग के मंदिर में पहुँचे और प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में शामिल हुए और बाबा बौखनाग की विधि-विधान से पूजा अर्चना की।

सिलक्यारा वही टनल है जहाँ नवंबर 2023 में बड़ा हादसा हुआ था, जिसमें 41 श्रमिकों की जान बचाने के लिए पूरी दुनिया की नजर इस रेस्क्यू ऑपरेशन पर टिक गई थी। उस समय सीएम धामी ने सुरंग के पास मंदिर निर्माण का संकल्प लिया था, जिसे अब पूरा कर लिया गया है। इस दौरान सीएम धामी ने टनल के निर्माण कार्य का भी रिव्यू किया।

सिलक्यारा टनल हादसे के बाद मंदिर बनाने का किया था वादा

दरअसल, साल 2023 की दीपावली की सुबह निर्माणाधीन सिलक्यारा सुरंग में मलबा आने के चलते 41 श्रमिक अंदर फँस गए थे। तब बड़े स्तर पर रेस्क्यू ऑपरेशन चलाकर उनको बाहर निकाला गया था। इस पूरे ऑपरेशन में ऑस्ट्रेलियाई रेस्क्यू विशेषज्ञ अर्नाल्ड डिक्स की मदद ली गई थी। इस दौरान सुरंग के पास बाबा बौखनाग का एक मंदिर भी स्थापित किया गया था। जहाँ श्रमिकों की सलामती के लिए पूजा-अर्चना की गई थी। श्रमिकों को 17 दिन चले राहत-बचाव ऑपरेशन के बाद सुरक्षित निकाल लिया गया था।

प्रदेश के सीएम पुष्कर धामी उस समय भी घटनास्थल पर लगातार नजर बनाए हुए थे और उन्होंने इस स्थान पर स्थायी मंदिर निर्माण का वादा किया था। अब यह वादा पूरा हो गया है। टनल के पास बाबा बौखनाग मंदिर बनकर तैयार हो गया है। यह मंदिर सुरंग के एकदम नजदीक बनाया गया है ताकि भविष्य में आने-जाने वाले लोग बाबा बौखनाग के दर्शन भी कर सकें।

स्थानीय लोगों की रक्षा करते हैं ‘खेत्रपाल’ देवता

बाबा बौखनाग को यहाँ के स्थानीय लोग खेत्रपाल देवता मानते हैं। उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में खेत्रपाल का अर्थ होता है, ‘क्षेत्र की रक्षा करने वाला देवता’। गढ़वाली भाषा में ‘क्ष’ को ‘ख’ बोला जाता है इसलिए क्षेत्रपाल को खेत्रपाल कहा गया है। बाबा बौखनाग को वासुकि नाग का रूप मानते हैं। कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण यहाँ आए थे और फिर सेम मुखेम की ओर गए थे। सेम मुखेम में भी नागराजा का प्रसिद्ध मंदिर है।

गढ़वाल क्षेत्र में मुख्य हिन्दू देवी-देवताओं के साथ-साथ स्थानीय देवी-देवताओं की भी मान्यता है। यहाँ वन देवता, खेत्रपाल और ग्राम देवता जैसे अनेक रूपों में पूजा की जाती है। कई बार यह पूजा किसी भव्य मंदिर में नहीं बल्कि किसी चिह्न या पत्थर के रूप में भी होती है। जिस स्थान पर यह हादसा हुआ था, वहाँ पहले कोई बड़ा मंदिर नहीं था। लेकिन अब वहाँ एक भव्य मंदिर बन चुका है जो आस्था और राहत-बचाव के इतिहास का प्रतीक बन गया है।

ऑस्ट्रेलिया के रेस्क्यू विशेषज्ञ अर्नाल्ड डिक्स भी पहुँचे थे मंदिर

जब इस मंदिर का निर्माण कार्य चल रहा था, उसी दौरान बाबा बौखनाग के दर्शन करने ऑस्ट्रेलिया के रेस्कयू विशेषज्ञ अर्नाल्ड डिक्स पहुँचे थे। दरअसल सिलक्यारा सुरंग के रेस्क्यू ऑपरेशन के एक साल पूरा होने पर 25 नवंबर 2024 में उसी स्थान पर मेले का आयोजन किया गया था। इसमें रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले अर्नाल्ड डिक्स को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था। इससे पहले भी उन्हें 2023 में हादसे में रेस्क्यू के समय पर बाबा बौखनाग के मंदिर में पूजा-अर्चना करते देखा गया था। डिक्स ने रेस्क्यू ऑपरेशन खत्म होने के बाद मंदिर में बाबा बौखनाग को जाकर आभार व्यक्त किया था।

सुरंग बनने से गंगोत्री और यमुनोत्री की दूरी कम होगी

बता दें कि सिलक्यारा सुरंग अब भी निर्माणाधीन है। लगभग 853 करोड़ की लागत से बनाई जा रही टनल की लंबाई 4.531 किलोमीटर है। टनल को दो लेन और दो दिशा में बनाया जा रहा है। ये सुरंग चारधाम यात्रा के दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण है। सुरंग बनने से गंगोत्री और यमुनोत्री धाम के बीच की दूरी 26 किलोमीटर तक कम हो जाएगी, जिससे यात्रियों को बेहतर सुविधा मिलेगी और समय की बचत भी होगी।

वक्फ पर पाकिस्तान ने किया प्रलाप तो भारत ने लताड़ा, अपना घर देखने की दी सलाह: कहा- यह हमारा आंतरिक मामला

हाल ही में भारत में पारित हुए वक्फ संशोधन अधिनियम को लेकर पाकिस्तान की आलोचनात्मक टिप्पणियों पर भारत ने कड़ा विरोध जताया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने पाकिस्तान के बयानों को ‘प्रेरित’ और ‘निराधार’ बताते हुए उन्हें दृढ़ता से खारिज किया है। उन्होंने साफ कहा कि पाकिस्तान को भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप का कोई अधिकार नहीं है।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने मंगलवार (15 अप्रैल, 2025) को कहा, “हम भारत की संसद द्वारा पारित वक्फ संशोधन अधिनियम पर पाकिस्तान द्वारा की गई टिप्पणियों को पूरी तरह से अस्वीकार करते हैं। पाकिस्तान को दूसरों को उपदेश देने से पहले अपने ही देश में अल्पसंख्यकों के साथ हो रहे व्यवहार पर आत्ममंथन करना चाहिए।”

पाकिस्तान ने क्या कहा था?

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने वक्फ कानून को ‘भेदभावपूर्ण’ बताते हुए दावा किया था कि यह अधिनियम भारत में मुस्लिमों के मजहबी और आर्थिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता शफकत अली खान ने कहा कि यह कानून भारतीय मुस्लिमों को मस्जिदों, दरगाहों और अन्य धार्मिक स्थलों से वंचित कर सकता है। उन्होंने इसे भारत में बढ़ते ‘बहुसंख्यकवाद’ का प्रतीक बताया था।

वक्फ कानून, संसद से सुप्रीम कोर्ट तक

भारत का नया वक्फ संशोधन अधिनियम संसद के दोनों सदनों में व्यापक बहस के बाद पारित हुआ था। लोकसभा ने 3 अप्रैल को और राज्यसभा ने 4 अप्रैल को इसे मंजूरी दी थी। लोकसभा में विधेयक के पक्ष में 288, जबकि विपक्ष में 232 वोट पड़े। वहीं राज्यसभा में 128 सदस्यों ने समर्थन किया जबकि 95 ने विरोध किया।

यह कानून 8 अप्रैल को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी के बाद कानून बन गया था। इस कानून के विरोध में कई याचिकाएँ सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएँ दायर की गई हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इन याचिकाओं पर बुधवार (16 अप्रैल, 2025) को सुनवाई की है।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह कानून मुस्लिम समुदाय की संपत्तियों और धार्मिक स्थलों पर नियंत्रण बढ़ाने की कोशिश है, जिससे उनके अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। वहीं सरकार ने इसे पहले से वक्फ में होती आई अनियमितताओं को खत्म करने के लिए जरूरी बताया है।

उर्दू चलेगी, पर हिंदी नहीं… सुप्रीम कोर्ट वाले मी लॉर्ड हम क्या कहें आप खुद बुधियार हैं, फिर भारत की भाषाओं को स्वीकार करने में परेशानी क्या

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (15 अप्रैल 2025) को महाराष्ट्र में एक नगरपालिका के साइनबोर्ड में उर्दू के इस्तेमाल को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया। उर्दू को गंगा-जमुनी या हिंदुस्तानी तहजीब का सबसे अच्छा नमूना बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भाषा एक संस्कृति है और इसे लोगों को विभाजित करने का कारण नहीं बनना चाहिए। वहीं, शीर्ष न्यायालय ने अदालती कार्यवाही में अंग्रेजी को आधिकारिक भाषा बताया है।

महाराष्ट्र के मामले में दरअसल बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। बॉम्बे हाई कोर्ट ने अकोला जिले के पातुर स्थित नगर परिषद की नई इमारत के साइनबोर्ड पर उर्दू के इस्तेमाल की अनुमति दी थी। इस याचिका को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश सुधांशु धूलिया और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने खारिज कर दिया।

बेंच ने कहा कि किसी अतिरिक्त भाषा का प्रदर्शन महाराष्ट्र स्थानीय प्राधिकरण (राजभाषा) अधिनियम 2022 का उल्लंघन नहीं है। इस अधिनियम में उर्दू के उपयोग पर भी कोई प्रतिबंध नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि साइनबोर्ड पर उर्दू के प्रयोग का उद्देश्य सिर्फ ‘प्रभावी संचार’ है। इसलिए भाषा की विविधता का सम्मान किया जाना चाहिए।

न्यायमूर्ति धूलिया ने अपने आदेश में कहा, ” नगर परिषद का काम क्षेत्र के स्थानीय समुदाय को सेवाएँ प्रदान करना और उनकी रोज़मर्रा की ज़रूरतों को पूरा करना है। अगर नगर परिषद के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र में रहने वाले लोग या लोगों का समूह उर्दू से परिचित हैं तो कम से कम नगर परिषद के साइनबोर्ड पर आधिकारिक भाषा यानी मराठी के अलावा उर्दू का इस्तेमाल करने पर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।”

न्यायाधीश धूलिया ने कहा, ठभाषा विचारों के आदान-प्रदान का एक माध्यम है, जो अलग-अलग विचारों और मान्यताओं वाले लोगों को करीब लाती है। यह उनके बीच विभाजन का कारण नहीं बननी चाहिए।आइए हम उर्दू और हर भाषा से दोस्ती करें। उर्दू भारत के लिए विदेशी नहीं है। इसका जन्म भारत में हुआ और यहीं इसका विकास हुआ है।”

कोर्ट ने कहा, “उर्दू के खिलाफ पूर्वाग्रह इस गलत धारणा से उपजा है कि उर्दू भारत के लिए विदेशी है। यह राय गलत है, क्योंकि मराठी और हिंदी की तरह उर्दू भी एक इंडो-आर्यन भाषा है। यह एक ऐसी भाषा है, जिसका जन्म इसी देश में हुआ है। उर्दू भारत में अलग-अलग सांस्कृतिक परिवेश से जुड़े लोगों की ज़रूरत के कारण विकसित और फली-फूली।”

शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि देश के आम लोगों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली भाषा उर्दू भाषा के शब्दों से भरी पड़ी है, भले ही किसी को इसकी जानकारी न हो। कोर्ट ने कहा, “हिंदी में रोज़मर्रा की बातचीत उर्दू के शब्दों या उर्दू से निकले शब्दों का इस्तेमाल किए बिना नहीं हो सकती। ‘हिंदी’ शब्द खुद फ़ारसी शब्द ‘हिंदवी’ से आया है!”

कोर्ट ने कहा कि शब्दावली का आदान-प्रदान दोनों तरफ़ होता है, क्योंकि उर्दू में संस्कृत समेत कई अन्य भारतीय भाषाओं से भी कई शब्द उधार लिए गए हैं। कोर्ट ने कहा, “भाषा धर्म नहीं है। भाषा धर्म का प्रतिनिधित्व भी नहीं करती। भाषा किसी समुदाय, क्षेत्र, लोगों की होती है किसी धर्म की नहीं। भाषा संस्कृति है। भाषा किसी समुदाय और उसके लोगों की सभ्यता की यात्रा को मापने का पैमाना है।”

शीर्ष न्यायालय ने आगे कहा, “उर्दू का मामला भी ऐसा ही है, जो गंगा-जमुनी तहजीब या हिंदुस्तानी तहजीब का बेहतरीन नमूना है। उत्तरी और मध्य भारत के मैदानी इलाकों की मिश्रित सांस्कृतिक प्रकृति है। हालाँकि, भाषा सीखने का साधन बनने से पहले, इसका सबसे पहला और प्राथमिक उद्देश्य हमेशा संचार ही रहेगा।”

न्यायालय ने कहा, “जब हम उर्दू की आलोचना करते हैं तो हम एक तरह से हिंदी की भी आलोचना कर रहे होते हैं, क्योंकि भाषाविदों और साहित्यिक विद्वानों के अनुसार उर्दू और हिंदी दो भाषाएँ नहीं, बल्कि एक ही भाषा हैं। हिंदी और उर्दू के बीच दोनों तरफ़ से कट्टरपंथियों द्वारा एक बाधा उत्पन्न हुई और हिंदी ज़्यादा संस्कृतनिष्ठ और उर्दू ज़्यादा फ़ारसी बन गई।”

कोर्ट ने आगे कहा कि औपनिवेशिक शक्तियों ने धर्म के आधार पर दोनों भाषाओं को विभाजित करके इस विभाजन का फ़ायदा उठाया। अब हिंदी को हिंदुओं की भाषा और उर्दू को मुस्लिमों की भाषा समझा जाने लगा। कोर्ट ने कहा कि वास्तविकता में विविधता में एकता और सार्वभौमिक भाईचारे की अवधारणा से अलग करने का यह प्रयास है।

अदालत ने यह भी बताया कि उर्दू किस तरह से अदालती कार्यवाही में भी प्रयोग होता है। इसको लेकर उच्चतम न्यायालय ने कहा, “उर्दू शब्दों का न्यायालय की भाषा पर बहुत प्रभाव है, चाहे वह फौजदारी हो या दीवानी कानून। अदालत से लेकर हलफ़नामा और पेशी तक, भारतीय न्यायालयों की भाषा में उर्दू का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।”

अदालती कार्यवाही में अंग्रेजी के इस्तेमाल को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की। उसने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 348 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों की आधिकारिक भाषा अंग्रेज़ी है, लेकिन आज भी इस न्यायालय में कई उर्दू शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है। इनमें वकालतनामा, दस्ती आदि शामिल हैं।

अदालती कार्यवाही की भाषा अंग्रेजी: सुप्रीम कोर्ट

वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कह दिया कि अदालती कार्यवाही की भाषा हिंदी नहीं, बल्कि अंग्रेजी है। यह बात सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2024 में कही थी। इसके पहले मार्च 2023 में तत्कालीन कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट की अदालती कार्यवाही में क्षेत्रीय भाषाओं के इस्तेमाल करने पर सहमति नहीं दी थी।

दरअसल, पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिकाकर्ता द्वारा हिंदी में दलील पेश करने पर आपत्ति जताई थी। शीर्ष न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया था कि अदालत की आधिकारिक भाषा अंग्रेजी है। जस्टिस ऋषिकेश रॉय और जस्टिस एसवीएन भट्टी की पीठ इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक आदेश के खिलाफ दायर एक विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई कर रही थी।

सुनवाई के दौरान जस्टिस रॉय ने कहा, “यह अदालत अपनी कार्यवाही अंग्रेजी में करती है। आपने व्यक्तिगत रूप से पेश किया, और हमने आपको अपनी बात पूरी तरह से कहने के लिए बाधित नहीं किया। दो जज मौजूद हैं। आप यह सुनिश्चित किए बिना हिंदी में दलीलें पेश नहीं कर सकते कि अदालत आपकी बात को समझती है।” इसके बाद, याचिकाकर्ता ने अंग्रेजी में अपनी दलीलें पेश की।

यह पहली बार नहीं है, जब सुप्रीम कोर्ट में भाषा को लेकर रोक लगाई। साल 2022 में एक याचिकाकर्ता ने हिंदी में दलीलें पेश करने का प्रयास किया तो जस्टिस केएम जोसेफ और हृषिकेश रॉय ने उन्हें याद दिलाया था कि सुप्रीम कोर्ट की भाषा अंग्रेजी है। उस मामले में याचिकाकर्ता को उचित भाषा में अपनी दलीलें पेश करने में सहायता करने के लिए एक वकील नियुक्त किया गया था।

मार्च 2023 में तत्कालीन केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु, गुजरात, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और कर्नाटक की सरकारों के उन प्रस्तावों को स्वीकार नहीं किया, जिनमें इन राज्यों के हाई कोर्ट की कार्यवाही में तमिल, गुजराती, हिंदी, बंगाली और कन्नड़ के इस्तेमाल की अनुमति देने की बात कही गई है।

दरअसल, रिजिजू ने यह बात लोकसभा में विल्लुपुरम के सांसद डी रविकुमार के प्रश्न के लिखित उत्तर में दिया था। उन्होंने कहा था, “इन प्रस्तावों पर भारत के मुख्य न्यायाधीश की सलाह माँगी गई थी और यह बताया गया कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्ण न्यायालय ने उचित विचार-विमर्श के बाद फैसले को अस्वीकार कर दिया।”

रिजिजू ने बताया था कि केंद्र सरकार आदेशों और अन्य कानूनी सामग्री का क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद करके कानूनी मामलों को आम नागरिकों के समझने योग्य बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि कानून और न्याय मंत्रालय के तहत बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे की अध्यक्षता में ‘भारतीय भाषा समिति’ का गठन किया है।

कोर्ट की भाषा को लेकर क्या कहता है संविधान

भारत के संविधान में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में कार्यवाही की भाषा का जिक्र है। संविधान के अनुच्छेद 348 के तहत, संसद द्वारा कोई दूसरा प्रावधान किए जाने तक सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में सभी कार्यवाही अंग्रेजी में होगी। यह प्रावधान हाई कोर्ट की कार्यवाही में हिंदी या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के उपयोग की अनुमति देता है, लेकिन इसके लिए राष्ट्रपति की पूर्व सहमति की आवश्यकता होती है।

अनुच्छेद 348 के अनुसार, कानूनों और निर्णयों के आधिकारिक पाठ भी अंग्रेजी में होने चाहिए। हालाँकि, पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने न्यायिक शिक्षा और कार्यवाही को क्षेत्रीय भाषाओं में आयोजित करने की वकालत की थी, ताकि न्याय प्रणाली को और अधिक सुलभ बनाया जा सके। उन्होंने वकीलों के लिए अपनी पसंदीदा भाषाओं में मामले पेश करने की संभावना पर जोर दिया था।

सेवानिवृत्ति के बाद पूर्व CJI ने चंद्रचूड़ ने आगे सुझाव दिया था कि स्थानीय भाषाएँ देश में न्याय वितरण को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। हालाँकि, जिस समय सरकार द्वारा हाई कोर्ट में स्थानीय भाषा में अदालती कार्यवाही के लिए सुप्रीम कोर्ट से राय माँगी गई थी, उस समय भारत के मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ ही थे।

भाषा जोड़ने वाली है तो सुप्रीम कोर्ट अंग्रेजी क्यों नहीं छोड़ना चाहता?

महाराष्ट्र में उर्दू के साइनबोर्ड को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने तमाम टिप्पणी की है, जिसमें भाषा को जोड़ने वाला बताया गया है। वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भाषा प्रभावी संचार का एक माध्यम है। ऐसे में स्थानीय राज्यों के हाई कोर्ट में स्थानीय भाषा का इस्तेमाल और सुप्रीम कोर्ट में हिंदी भाषा का इस्तेमाल आम आदमी को न्यायिक व्यवस्था से और अधिक जोड़ेगा।

माना जाता है कि भारत की कुल जनसंख्या का सिर्फ 10 से 15 प्रतिशत लोग अंग्रेजी समझते हैं। ये संख्या भी शहरी क्षेत्रों की है। ग्रामीण इलाकों में स्थानीय भाषा, जैसे कि तमिल, बंगाली, कन्नड़, मराठी आदि ही अधिक समझी जाती है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट प्रभावी संचार को महत्वपूर्ण मानता तो सरकार द्वारा साल 2022 में हाई कोर्ट में स्थानीय भाषा में कार्रवाई पर रोक नहीं लगाता।

कानून में साफ कहा गया है कि जब तक संसद कोई विकल्प नहीं देती, तभी तक अंग्रेजी अदालती कार्यवाही का माध्यम है। ऐसे में उर्दू को भारत में जन्मा और पनपा बताकर उसकी उसे जोड़ने वाली भाषा बताया जा रहा है, जबकि अंग्रेजी तो विदेशी भाषा है, जिसे अधिकांश लोग समझते भी नहीं, फिर सर्वोच्च न्यायालय इसे अदालतों में कार्यवाही का माध्यम क्यों बनाए रखना चाहता है, यह प्रमुख सवाल है।

दरअसल, भारत में एक भ्रम है कि जो लोग अंग्रेजी बोलते हैं वे अपने आपको एलीट वर्ग का समझते हैं। उन्होंने लगता है कि वे आम भारतीयों से बहुत ऊपर हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का अंग्रेजी के प्रति दीवानगी भी इस भ्रम को और स्थापित करने की कोशिश करेगा। इस देश में हर भारतीय को न्यायिक व्यवस्था को अपनी भाषा में जानने और समझने का हक है। इसलिए इस पर सुप्रीम कोर्ट को फिर से विचार करना चाहिए।

मुंडन, गंगाजल से स्नान… अनवर शेख बने राधेश्याम, घर वापसी के बाद बोले- इस्लाम में महिलाओं का सम्मान नहीं, सनातन में देवियों की भी होती है पूजा

हिन्दू धर्म के वैभव से प्रभावित होकर अनवर शेख ने इस्लाम छोड़कर सनातन धर्म अपनाया। मध्यप्रदेश के खंडवा के रहने वाले शेख अनवर अब राधेश्याम बन गए हैं। इस दौरान उनका मुंडन हुआ और गंगाजल से स्नान कराया गया। इसके बाद पूरे विधि विधान से सनातन धर्म में शामिल कर राधेश्याम नाम दिया गया।

मंदिर पर हुए अनुष्ठान के दौरान भगवान शिव के जयकारे हुए। इस मौके पर लोगों ने राधेश्याम को बधाई दी। राधेश्याम ने हिन्दू धर्म की अच्छाईयों की चर्चा की।

राधेश्याम का कहना है कि हिन्दू धर्म में वैभव और परंपराएं हैं। सभी लोगों को समान भाव से देखा जाता है। सनातन धर्म में धार्मिक स्थलों और अनुष्ठान सभी के लिए एक जैसे हैं। राधेश्याम का कहना है कि बचपन से ही उसके मन में सनातन धर्म की परंपरा का असर पड़ने लगा था।

महिलाओं के प्रति हिन्दू धर्म में जितनी श्रद्धा है, देवी के रूप में महिलाओं की पूजा की जाती है। महिलाओं के प्रति जितनी श्रद्धा है वो दूसरे किसी धर्म में नहीं है। यहां तक कि धरती और नदियों को भी माँ का दर्जा दिया जाता है। राधेश्याम का पेड़-पौधों से भी गहरा लगाव है।

अनवर शेख यानी राधेश्याम ने लक्ष्मी नाम की हिन्दू लड़की से शादी किया। पत्नी का हिन्दू धर्म के प्रति लगाव ने भी अनवर को राधेश्याम बनने के लिए आकर्षित किया। हालाँकि 23 साल तक उन्होने धर्म परिवर्तन नहीं किया था। इस बीच सनातन को समझा।

राधेश्याम का कहना है कि खंडवा के महादेवगढ़ में इससे पहले 5 अन्य लोग भी हिन्दू धर्म में शामिल हो चुके हैं। फिरोज राहुल बन गया था जबकि इमरान का नाम ईश्वर पड़ा। आदिल को आदित्य नाम दिया गया जबकि मुस्तफा को मारुति नंदन के नाम से अब जाना जाता है। इनलोगों ने जीवन की नई शुरुआत की। इस्लाम छोड़कर सनातन की शरण में आए इनलोगों के दिनचर्या में भी काफी परिवर्तन आ गया।

बिहार के लखीसराय में ‘अशरफ’ ने सुमित बन हिन्दू लड़की को फँसाया, 13 साल तक किया यौन शोषण: गोमांस खाने और नमाज़ पढ़ने को किया मजबूर, FIR दर्ज

बिहार के लखीसराय में एक मुस्लिम ने एक हिन्दू लड़की का यौन शोषण किया। उससे निकाह करने के लिए धर्मांतरण करने को कहा गया। उसने हिन्दू युवती से गोमांस खाने को भी कहा। यह सिलसिला 14 वर्ष तक चलता रहा। आरोपित मुस्लिम सरकारी कर्मचारी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, लव जिहाद के आरोपित का नाम अशरफ है जो कि खुद को सुमित बताता था। इसी सहारे उसने एक हिन्दू युवती को प्रेमजाल में फंसाया। हिन्दू लड़की 16 वर्ष की उम्र से उसके साथ है। उसे बाद में अशरफ की सच्चाई का पता चला है। अब इस मामले में लखीसराय पुलिस ने FIR दर्ज कर ली है।

बच्चे के जन्म के बाद सुमित ने ‘अशरफ’ का सच उगला

मामला वर्ष 2012 से शुरू होता है। जब पीड़िता 16 साल की थी। उसे अशरफ ने खुद को राजस्थान निवासी सुमित कुमार बताकर लड़की को जबरदस्ती प्रेमजाल में फँसाया। उस समय अशरफ जनता उच्च विद्यालय अलीनगर में कार्यरत था। इसके बाद कथित सुमिल उसे बहला-फुसलाकर अपने साथ भगा ले गया।

वह हिन्दू पीड़िता के साथ बालिग होने तक जमुई, आसनसोल और मुंगेर में रखकर उसका लगातार यौन शोषण करता रहा। पीड़िता को लिपिक के मुस्लिम होने की जानकारी तब मिली जब वह बालिग हो गई। पीड़िता के मुताबिक, 2014 में पीड़िता गर्भवती हुई लेकिन वो ये बच्चा नहीं चाहती थी।

पीड़िता ने गर्भपात करने की बात अशरफ को बताई लेकिन उसने इनकार कर दिया। पीड़िता के बालिग़ होने के बाद अशरफ ने लखीसराय न्यायालय ले जाकर धारा 164 के तहत उसका बयान दर्ज कराया। जिसमें पीड़िता से शादी करने की बात स्वीकार की। इसके बाद मामला कुछ समय के लिए शांत हो गया।

जनवरी 2015 में पीड़िता बिन शादी के माँ बन गई। 19 वर्ष की आयु में उसने बेटे को जन्म दिया। अब पीड़िता ने शादी की बात कही तो अशरफ ने उसे पूरा सच बताया। उसने कहा कि वह सुमित नहीं बल्कि कमाल अशरफ है। उसने के इसके बाद युवती पर इस्लाम कबूल करने का दबाव डाला।

अशरफ ने बेरहमी से पीटा, पूजा पाठ करने से मना किया : पीड़िता

पीड़िता ने बताया कि कमाल अशरफ हिंदू लड़कियों को सिर्फ भोग की वस्तु समझता है। उसने हिन्दू लड़की से कहा कि बीवी का दर्जा पाने के लिए उसे धर्म बदलना होगा। कमाल ने हिन्दू युवती को हिंदू रीति-रिवाजों को छोड़ने, इस्लाम अपनाने, गोमाँस खाने और यहाँ तक कि अन्य लोगों के साथ शारीरिक संबंध बनाने के लिए भी मजबूर किया।

जब उसने इन माँगों का विरोध किया तो अशरफ ने उसके साथ गलत सलूक किया। आए दिन उसके साथ मारपीट करता। 12 सितंबर 2024 को अशरफ ने उसे इतनी बेरहमी से पीटा, जिससे उसके हाथ और पैर में फ्रैक्चर हो गया। हालाँकि उत्पीड़न झेलने के बाद भी पीड़िता ने इस्लाम कबूल नहीं किया।

पीड़िता के मुताबिक, 20 फरवरी 2025 को लिपिक कमाल अशरफ उस पर प्राथमिक विद्यालय मकतब बालगुदर के शिक्षक इब्राहिम अहमद उर्फ शमशाद आलम के साथ शारीरिक संबंध बनाने का दबाव डाल रहा था। इसके साथ ही उसे पूजा-पाठ सहित बाकि सनातनी परंपराओं का विरोध करने के लिए भी मजबूर करता था।

पुलिस ने चार लोगों पर मामला दर्ज किया

पुलिस अधीक्षक अजय कुमार ने बताया कि पीड़िता के बयान के आधार पर लिपिक कमाल अशरफ, शिक्षक इब्राहिम अहमद उर्फ शमशाद आलम और दो अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। पुलिस मामले की जाँच कर रही है और जल्द कार्रवाई की जाएगी।

आरोपित नंबर 1: सोनिया गाँधी, आरोपित नंबर 2: राहुल गाँधी..₹2000 करोड़ की संपति हड़पने की साजिश, ₹414 करोड़ की टैक्स चोरी: जानिए ED ने चार्जशीट में क्या-क्या बताया?

प्रवर्तन निदेशालय ने कॉन्ग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी समेत कई नेताओं पर चार्जशीट दाखिल की है. ये चार्जशीट नेशनल हेराल्ड मामले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग का है। इस मामले की अगली सुनवाई 25 अप्रैल को होगी। चार्जशीट में कई अहम बातें कही गई है।

पहला आरोपित सोनिया गाँधी, दूसरा आरोपित राहुल गाँधी, तीसरा आरोपित सुमन दूबे, चौथा आरोपित सैम पित्रोदा और पाँचवाँ आरोपित यंग इंडिया को बनाया गया है।

दरअसल इस मामले में ईडी की जाँच, पटियाला हाउेस कोर्ट में 26.06.2014 के आदेश के आधार पर शुरू की गई है। 2013 में सुब्रमण्यम स्वामी ने सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी, मोतीलाल वोरा, ऑस्कर फर्नांडिस, सुमन दुबे, सैम पित्रोदा और मेसर्स यंग इंडियन के खिलाफ धोखाधड़ी का आरोप लगाया था। मोतीलाल वोरा और ऑस्कर फर्नांडिस का निधन हो चुका है इसलिए उनका नाम चार्जशीट में शामिल नहीं है।

ईडी की जाँच को आरोपियों ने दिल्ली उच्च न्यायालय और फिर सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। हालाँकि दोनों अदालतों ने मुकदमे की प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

आरोप के मुताबिक 2010 में एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल), यंग इंडियन (वाईआई) के प्रमुख अधिकारियों और कॉन्ग्रेस के पदाधिकारियों ने मिल कर एजेएल की 2,000 करोड़ रुपए की संपत्तियाँ हड़पने के लिए 99% शेयर यंग इंडियन नामक एक निजी कंपनी को सिर्फ 50 लाख रुपये में स्थानांतरित कर दिए। यंग इंडिया में सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी के पास कुल मिलाकर 76% शेयर थे।

ईडी का कहना है कि आरोपियों ने एआईसीसी द्वारा एजेएल को दिए गए 90.21 करोड़ रुपए के बकाया कर्ज को 9.02 करोड़ इक्विटी शेयरों में बदल दिया और इन सभी शेयरों को यंग इंडियन के पक्ष में सिर्फ 50 लाख रुपए में ट्रांसफर कर दिया। इस तरह से एजेएल की हजारों करोड़ रुपए की संपत्तियों को सोनिया गांधी और राहुल गांधी को ट्रांसफर कर दिया गया।

यंग इंडिया पर राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी का नियंत्रण था क्योंकि इनके पास 76% शेयर थे। बाकी 24% शेयर दिवंगत मोतीलाल वोरा और दिवंगत ऑस्कर फर्नांडीस के पास थे, जो सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी के करीबी माने जाते थे।

चार्जशीट में कहा गया है कि प्रवर्तन निदेशालय ने 20.11.2023 को अंतरिम कुर्की आदेश जारी करके एजेएल की 752 करोड़ रुपए की संपत्तियाँ कुर्क की।

एजेंसी का कहना है कि पीएमएलए के तहत ईडी ने जो जाँच में पाया है वो 27.12.2017 के आयकर विभाग के मूल्यांकन की तरह ही है। आयकर विभाग ने इस मामले में 414 करोड़ रुपए टैक्स में धोखाधड़ी पाया था।

ईडी ने इस मामले में कमाई के रूप में 988 करोड़ रुपए और संपत्तियों की मौजूदा कीमत 5000 रुपए बताया है। ईडी के मुताबिक यंग इंडिया को 23.11.2010 को एसपीवी के रूप में शामिल किया गया था। एजेएल ने 2008 में अपनी प्रकाशन गतिविधि बंद कर दी । ईडी का कहना है कि आरोपियों ने यंग इंडिया के मालिकों सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी को एजेएल की सैकड़ों करोड़ रुपए की संपत्तियों का नियंत्रण देने के लिए एक आपराधिक साजिश रची थी। वाईआई यानी यंग इंडिया ने एजेएल से एआईसीसी द्वारा उसे सौंपे गए 90.21 करोड़ रुपए के ऋण को चुकाने या इस ऋण को इक्विटी में बदलने के लिए कहा। एजेएल, वाईआई और एआईसीसी में एक ही लोगों की नियुक्ति हुई। जांच एजेंसी का कहना है कि इन तीनों संस्थाओं में पदों पर बैठे लोगों के एक ही समूह द्वारा प्रस्ताव पारित करके वाईआई को 50 लाख रुपए की मामूली राशि के लिए 90.21 करोड़ रुपए का ऋण सौंपा गया था। ईडी का आरोप है कि यंग इंडियन को एजेएल के 9.021 करोड़ शेयर आवंटित किए गए।

यंग इंडिया कथित तौर पर एजेएल की होल्डिंग कंपनी बन गई, जिसके पास 99% शेयर थे और अन्य शेयरधारकों की इक्विटी घटकर 1% रह गई। जाँच में मिले कई दस्तावेज, अभियुक्तों और गवाहों के बयान की रिकॉर्डिंग के आधार पर ईडी ने 5,000 करोड़ रुपये से अधिक के मौजूदा बाजार मूल्य के आधार पर आरोप पत्र तय किया गया।

ED ने जब्त की सहारा की ₹1400 करोड़ की प्रॉपर्टी, आंबी वैली सिटी भी हुई सीज: निवेशकों को पैसा ना लौटाने पर हुई कार्रवाई

सहारा ग्रुप के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने बड़ी कार्रवाई की है। ये कार्रवाई ED की कोलकाता शाखा की तरफ की गई है। ED ने महाराष्ट्र के लोनावला में मौजूद एंबी वैली की 707 एकड़ जमीन को जब्त कर लिया है, जिसकी अनुमानित कीमत ₹1460 करोड़ बताई जा रही है। यह कार्रवाई सहारा समूह के निवेशकों को उनकी धनराशि वापस करने में विफल रहने के चलते की गई है।

सहारा ने लगाया लोगों को चूना

मामले की छानबीन में पता चला है कि सहारा ग्रुप ने लोगों को पैसे इन्वेस्ट करने के लिए मजबूर किया था, इस काम में लोगों की सहमति नहीं ली गई थी। जब लोगों ने अपनी जमा पूँजी माँगी, तो पैसे वापस नहीं किए गए।

बताया गया है कि सहारा समूह पोंजी स्कीम चला रहा था, इसमें सहारा हाउसिंग इन्वेस्टमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड, सहारा इंडिया कमर्शियल कॉर्पोरेशन लिमिटेड, सहारा क्रेडिट कोऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड, सहारा समूह , सहारायन यूनिवर्सल मल्टीपर्पज कोऑपरेटिव सोसाइटी आदि कम्पनियाँ शामिल थीं।

ED का कहना है कि सहारा ग्रुप ने पैसा वापस तो नहीं किया बल्कि जमाकर्ताओं की अपना पैसा फिर से जमा करने के लिए मजबूर किया और एक योजना से दूसरी योजना में लगाया। खातों की कॉपी को छुपाने में हेराफेरी भी की। कई ऐसे ऑफर देकर निवेश का नाम देकर लोगों के पैसों की ठगी की।

क्या है पूरा मामला?

सहारा समूह ने 2007-2008 में ऑप्शनली फुली कन्वर्टिबल डिबेंचर्स (OFCD) के माध्यम से लगभग 3 करोड़ निवेशकों से ₹17400 करोड़ की राशि जुटाई थी। हालाँकि, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने इन योजनाओं को अवैध घोषित किया और निवेशकों को पैसा वापस करने का आदेश दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने 2012 में सहारा को ₹24000 करोड़ निवेशकों को लौटाने का निर्देश दिया था, जिसमें से अब तक केवल ₹11000 करोड़ ही वापस किए गए हैं।

नेटवर्क 18 की रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में मामला दर्ज हुआ था। ED की जाँच 4 FIR के आधार पर हुई थी, जिसमें ओडिशा, बिहार और राजस्थान की पुलिस ने हमारा इंडिया क्रेडिट को-ऑपरेटिव सोसाईटी लिमिटेड और अन्य के खिलाफ दर्ज की थी। 500 से ज्यादा मामले इस केस में दर्ज किए जा चुके है, जिसमें 300 से ज्यादा मामले मनी लॉन्ड्रिंग को लेकर है।

क्यों की गई कानूनी कार्रवाई?

सुप्रीम कोर्ट ने सहारा समूह को निवेशकों की बकाया राशि चुकाने के लिए एंबी वैली की संपत्तियों को अटैच करने का आदेश दिया था। बॉम्बे हाईकोर्ट के ऑफिशियल लिक्विडेटर ने एंबी वैली की नीलामी प्रक्रिया शुरू की, जिसका रिजर्व प्राइस 37392 करोड़ रुपये निर्धारित किया गया। ईडी को पता चला है कि ये भूखंड बेनामी नामों से खरीदने के लिए सहारा समूह की कंपनियों से पैसे निकाले गए थे। यह फैसला निवेशकों को उनकी धनराशि वापस दिलाने के प्रयासों का हिस्सा है।

दुबई में 2 हिंदुओं को पाकिस्तानी ने तलवार से काटा, मजहबी नारे भी लगाए: तेलंगाना के रहने वाले थे मृतक, बेकरी में करते थे काम

संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के दुबई में एक पाकिस्तानी ने मजहबी नारे लगाते हुए 3 भारतीय हिन्दू कामगारों पर हमला कर दिया। उसने तलवार से 2 भारतीयों को काट दिया, इस हमले में उनकी मौत हो गई। 1 घायल का इलाज चल रहा है। मृतक तेलंगाना के रहने वाले थे। हत्या का कारण मजहबी विवाद बताया गया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह घटना दुबई की एक बेकरी में शुक्रवार (11 अप्रैल, 2025) को हुई है। यहाँ काम करने वाले अष्टपु प्रेमसागर और श्रीनिवास की हत्या एक पाकिस्तानी ने कर दी। प्रेमसागर तेलंगाना के निर्मल जिले के जबकि श्रीनिवास निजामाबाद के रहने वाले थे।

पाकिस्तानी के हमले में एक और भारतीय गंभीर रूप से घायल हो गया, उसका नाम सागर है। बताया गया कि किसी छोटी बात से विवाद चालू हुआ और फिर पाकिस्तानी ने मजहबी नारे लगाते हुए इन लोगों पर हमला बोल दिया। उसने अष्टपु प्रेमसागर और श्रीनिवास को कई बार चाकुओं से गोदा।

हमलावर पाकिस्तानी इन भारतीयों का सहकर्मी था। मृतक प्रेमसागर के घर में 2 छोटी बेटियाँ और पत्नी हैं। वह आखिरी बार 2 वर्ष पहले घर आए थे। प्रेमसागर 5 वर्ष पूर्व दुबई काम करने गए थे। वह जल्द ही घर लौटने वाले भी थे। उनके परिवार का तेलंगाना में बुरा हाल है।

प्रेमसागर के भाई संदीप ने मीडिया से बताया, “मेरे भाई की हत्या सिर्फ इसलिए कर दी गई क्योंकि वो एक भारतीय थे, मैं इस मामले में विदेश मंत्रालय से जल्द एक्शन लिए जाने की माँग करता हूँ।” उन्होंने बताया कि हत्या से पहले प्रेमसागर ने पाकिस्तानी से छोड़ देने की गुहार लगाई और अपने परिवार के विषय में भी बताया लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ।

पीड़ितों के परिवार ने बताया है कि उन्हें अभी दुबई की पुलिस या सरकारी एजेंसियों की तरफ से कोई जानकारी नहीं मिली है। उन्होंने बताया है कि किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए वह अपने रिश्तेदारों पर निर्भर हैं। दोनों मृतकों के शवों के लाने के लिए प्रयास चल रहे हैं।

मामले में केन्द्रीय मंत्री बंडी संजय कुमार और जी किशन रेड्डी ने भी दुख जताया है। उन्होंने विदेश मंत्रालय से पूरी सहायता दिए जाने का आश्वासन दिया है। जी किशन रेड्डी, “दुबई में तेलंगाना के दो तेलुगु युवकों, निर्मल जिले के अष्टपु प्रेमसागर और निजामाबाद जिले के श्रीनिवास की नृशंस हत्या से मैं स्तब्ध हूँ।”

उन्होंने आगे लिखा, “इस मामले में विदेश मंत्री श्री डॉक्टर जयशंकर जी से बात की और उन्होंने शोक संतप्त परिवारों को पूर्ण सहायता और पार्थिव शरीर को तत्काल वापस भारत भेजने का आश्वासन दिया है। विदेश मंत्रालय भी इस मामले में शीघ्र न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में काम करेगा। मैं जयशंकर जी के समर्थन और सहायता के लिए उनका आभार व्यक्त करता हूँ।”

मामले में अभी हत्यारे पाकिस्तानी पर क्या कार्रवाई हो रही है, इसकी कोई जानकारी सामने नहीं आई है।