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अंग्रेज जमाने के जिस पम्बन ब्रिज से बह गई ट्रेन, उसकी जगह मोदी सरकार ने खड़ा किया नया पुल: रामनवमी पर PM ने राष्ट्र को किया समर्पित, जानिए इसकी खासियतें

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चैत्र रामनवमी के दिन यानी रविवार (6 अप्रैल 2025) को तमिलनाडु के रामेश्वरम में पम्बन ब्रिज का उद्घाटन किया। इस दौरान पीएम मोदी ने सड़क पुल से एक ट्रेन और एक जहाज को हरी झंडी दिखाई। इसके साथ ही उन्होंने इसके संचालन को और इसके बारे में जानकारी ली। यह ब्रिज भारत की शानदार इंजीनियरिंग का नमूना है।

पीएम मोदी ने साल 2019 में इसका शिलान्यास किया था। इसे डबल ट्रैक और हाई-स्पीड ट्रेनों के लिए डिजाइन किया गया है। इसे 2022 में बनना था, लेकिन कोविड के कारण इसमें देर हो गई। अब यहाँ से इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र रामेश्वरम के प्रसिद्ध रामनाथस्वामी मंदिर जाएँगे और वहाँ रामनवमी के शुभ अवसर पर पूजा-अर्चना करेंगे।

रामायण में कहा गया है कि लंका में आततायी रावण का वध करने जाने के लिए भगवान राम ने रामेश्वरम के पास धनुषकोडी से ही सेतु निर्माण का काम शुरू किया था। बता दें कि पीएम मोदी श्रीलंका से लौटकर सीधे तमिलनाडु पहुँचे हैं। यहाँ वह राज्य में 8,300 करोड़ रुपए से अधिक की रेल और सड़क परियोजनाओं का भी शिलान्यास एवं उद्घाटन करेंगे।

नए पम्बन ब्रिज की खासियत

पम्बन ब्रिज रामेश्वर के पम्बन द्वीप को भारत की मुख्य भूमि तमिलनाडु के मंडपम से जोड़ता है। यह भारत का पहला वर्टिकल लिफ्ट सी ब्रिज है, जिसकी ऊँचाई 3 मीटर है। समुद्र तल से इसकी नेविगेशनल एयर क्लीयरेंस 22 मीटर है। ब्रिज की लंबाई 2.08 किलोमीटर (यानी 2,070 मीटर या 6790 फीट) है। इसे सरकारी कंपनी रेल विकास निगम लिमिटेड ने 535 करोड़ रुपए की लागत से बनाया है।

पम्बन ब्रिज में समुद्र के पार 100 स्पैन (यानी अलग-अलग हिस्से) हैं। इनमें से 99 स्पैन 18.30 मीटर का और एक प्रमुख लिफ्ट स्पैन 72.5 मीटर का है। समुद्री जहाज गुजरते समय यह स्पैन ऊपर उठ जाएगा। ऊपर उठने वाले ‘लिफ्ट स्पैन’ 16 मीटर चौड़ा है और इसका कुल वजन 550 टन है। पम्बन ब्रिज एक रेलवे ब्रिज है, जो बांद्रा-वर्ली सी लिंक के बाद देश का दूसरा सबसे लंबा रेलवे ब्रिज है।

दक्षिण रेलवे ने कहा कि यह ब्रिज 58 साल तक सुरक्षित है। पुराने पुल की तुलना में इसकी ऊँचाई को भी बढ़ाया गया है। इससे ज्यादा ऊँचाई वाले जहाज पुल के नीचे से गुजर पाएँगे। पुराना पुल 19 मीटर ऊँचाई तक खुलता था, लेकिन नए पुल में 22 मीटर खुलता है। इसके अलावा, इस पुल पर रेलवे का दोहरा ट्रैक बिछाया गया है। इसके साथ ही ट्रैक का इलेक्ट्रिफिकेशन भी किया गया है।

सफेद रंग में दिख रहा नया पम्बन ब्रिज (साभार: इंडिया टुडे)

नए पम्बन ब्रिज पर ट्रेन की गति 75 किलोमीटर प्रतिघंटा रहेगी। इससे पहले यह गति सीमा सिर्फ 10 किलोमीटर प्रतिघंटा थी। हालाँकि, लिफ्ट स्पैन वाले हिस्से पर ट्रेन की अधिकतम गति की सीमा 50 किलोमीटर प्रति घंटा रखी गई है। यह वर्टिकल लिफ्ट स्पैन देश का पहला और दुनिया में दूसरा है। इस स्टील ब्रिज का डिजाइन अंतर्राष्ट्रीय कंसल्टेंट TYPSA ने किया है।

इसे यूरोपीय और भारतीय कोड के साथ डिजाइन किया गया है। टिकाऊ एवं मजबूती के लिए इसमें स्टेनलेस स्टील का प्रयोग किया गया है। इस पर जंग या समुद्र की नमकीन पानी से बचाने के लिए ब्रिज पर पॉलीसिलोक्सेन कोटिंग की गई है। इससे पहले वाले पुल में जंग लगने के कारण उसे साल 2022 में बंद कर दिया गया था। इससे रामेश्वरम और मंडपम के बीच रेल संपर्क खत्म हो गया था।

हालाँकि, रेलवे ब्रिज के समानांतर ही एक सड़क पुल है। इस सड़क पुल से मंडपम और रामेश्वरम का संपर्क बना रहा। पीएम मोदी द्वारा उद्घाटन करने से पहले दक्षिण रेलवे ने नए पम्बन ब्रिज का कई चरणों में ट्रायल किया। सबसे पहले 12 जुलाई 2024 पर हल्के इंजन का ट्रायल रन किया गया। सुरक्षा की पुष्टि होने के बाद 4 अगस्त 2024 को इस पर टावर कार ट्रायल रन किया गया।

इस ट्रायल में रामेश्वरम स्टेशन तक ओवरहेड इक्विपमेंट टावर कार चलाई गई थी। इस ब्रिज का अंतिम ट्रायल 31 जनवरी 2025 को हुआ। इस ट्रायल में रामेश्वरम एक्सप्रेस ट्रेन को ब्रिज पर दौड़ाया गया। यह ट्रायल पूरी तरह सफल रहा था। ट्रेन को मुख्य भूमि मंडपम से रामेश्वरम स्टेशन तक ले जाया गया था। इस दौरान इंडियन कोस्ट गार्ड की पेट्रोलिंग बोट के लिए लिफ्ट स्पैन को पहली बार ऊपर उठाया गया था।

कैसे काम करता है यह ब्रिज

नए पम्बन ब्रिज के नीचे से जब समुद्री जहाज को निकलना होगा तो इसका नेविगेशन ब्रिज यानी लिफ्ट स्पैन (समुद्री जहाजों के लिए खुलने वाले ब्रिज) ऊपर उठ जाएगा। इसके बाद इसके नीचे से समुद्री जहाज या क्रूज निकल सकेंगे। इस लिफ्ट स्पैन को ऊपर उठने में 5 मिनट का समय लगेगा। इलेक्ट्रो-मैकेनिकल सिस्टम पर काम करने वाला यह स्पैन 5 मिनट में ही 22 मीटर तक ऊपर उठ सकता है।

पुराना और उसके बगल में नया पम्बन ब्रिज (साभार: द हिंदू)

समुद्री जहाज को पार कराने के लिए नए पम्बन ब्रिज के लिफ्ट स्पैन को ऊपर करना होगा। इसके लिए सिर्फ एक आदमी की जरूरत होती है। यह आदमी बटन दबाएगा और लिफ्ट स्पैन में ऊपर उठ जाएगा। यानी यह पूरी तरह ऑटोमेटिक है। वहीं, इसके पहले वाला पम्बन पुल कैंटिलीवर पुल था। इसे लीवर के जरिए खोला जाता था। पुल को ऊपर की ओर उठाकर खोलने के लिए 14 आदमी मिलकर लीवर घुमाते थे।

नए पम्बन ब्रिज की खास बात यह है कि यह समुद्री हलचल या चक्रवात का भी ध्यान रखता है। अगर समुद्री हवा की गति 58 किलोमीटर प्रति घंटा या उससे ज्यादा हो जाती है तो यह वर्टिकल सिस्टम काम नहीं करेगा। यहाँ पर ऑटोमैटिक रेड सिग्नल हो जाएगा। यानी हवा की गति सामान्य होने तक पुल पर ट्रेन की आवाजाही बंद रहेगी। तूफान, चक्रवात जैसी आपदा में सुरक्षा को ध्यान में रखकर यह सिस्टम तैयार किया गया है।

पुराना पम्बन ब्रिज का इतिहास

पम्बन का पुराना रेलवे पुल अंग्रेजों ने 111 साल पहले बनवाया था। रेलवे बोर्ड के सूचना एवं प्रकाशन के कार्यकारी निदेशक दिलीप कुमार ने बताया कि पम्बन के पुराने पुल को 24 फरवरी 1914 को शुरू किया गया था। दरअसल, ब्रिटिश शासन ने सन 1850 में भारत और श्रीलंका को जोड़ने के लिए समुद्री मार्ग बनाने की योजना बनाई थी। इसके लिए पाल्क स्ट्रेट में एक नहर बनाने पर विचार किया गया।

नहर बनाना आसान नहीं है। इसके लिए आर्थिक सहित भौगोलिक कारण जिम्मेदार थे। जब अंग्रेजों को लगा कि यह योजना असंभव है तो अंग्रेजों ने अन्य विकल्पों पर विचार करना शुरू कर दिया। नए प्लान में अंग्रेजों ने तमिलनाडु के मंडपम और पम्बन द्वीप के बीच रेलवे लाइन बिछाने का फैसला किया। इसके बाद धनुषकोडी से श्रीलंका की राजधानी कोलंबो तक नाव से जोड़ने की योजना बनाई।

इस योजना पर काम करते हुए साल 1870 में पम्बन ब्रिज बनाने का प्लान तैयार किया गया। विभिन्न कारणों से इस पम्बन ब्रिज बनाने का काम 41 साल बाद यानी साल 1911 में शुरू हुआ। आखिरकार तीन साल में बाद 143 खंभों पर 2.2 लंबा एक ब्रिज बनकर तैयार हो गया और 24 फरवरी 1914 को इस पर रेल सेवा शुरू हुई। उस समय पम्बन पुल को बनाने की कुल लागत 20 लाख रुपए आई थी।

पुराना पम्बन ब्रिज (साभार: जागरण)

पुराने पुल का डिजाइन जर्मन इंजीनियर शेरजर तैयार किया था। इसलिए इसे ‘कैंटिलीवर शेरजर रोलिंग लिफ्ट ब्रिज’ भी कहा जाता था। इसे समुद्र के खारे पानी और तेज हवाओं से बचाने के लिए खास किस्म के लोहे से बनाया गया था। यह ब्रिज इंग्लैंड की राजधानी लंदन की टेम्स नदी पर बने ‘ट्रावर ब्रिज’ की तर्ज पर बनाया गया था। टावर ब्रिज का उद्धाटन 1895 में हुआ था और यह ब्रिज आज भी चालू है।

पम्बन का पुराना ब्रिज बेहद मजबूत था। वह साल 1964 के चक्रवात को भी झेल गया था। हालाँकि, ब्रिज को काफी नुकसान पहुँचा था, लेकिन मरम्मत के बाद इसे फिर से चालू कर दिया गया था। दरअसल, 23 दिसंबर 1964 को 240 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से चक्रवात आया था। इस भयानक चक्रवात में धनुषकोडी पूरी तरह बर्बाद हो गया था। वहीं, इस ब्रिज को भी भारी नुकसान पहुँचा था।

उस दिन रात 11 बजे 6 डिब्बों वाली 653 पम्बन-धनुषकोडी पैसेंजर ट्रेन पुल पार कर रामेश्वरम से धनुषकोडी की ओर जा रही थी। चक्रवात के कारण यह ट्रेन समुद्र में पलट गई और बह गई। इसमें सवार लगभग 150 लोगों की मौत हो गई। अगली सुबह सिर्फ ट्रेन का सिर्फ इंजन मिला, बाकी हिस्से समुद्र में बह गए थे। तब यह ट्रेन धनुषकोडी तक जाती थी।

उस चक्रवात में पुराने ब्रिज के हुए नुकसान का मरम्मत करने की जिम्मेदारी दिल्ली मेट्रो को शुरू कराने वाले प्रसिद्ध इंजीनियर ई. श्रीधरन को दी गई थी। उन्होंने सिर्फ 46 दिनों में ही इसकी मरम्मत करके इस पुल को फिर से शुरू कर दिया था। साल 1988 तक यह ब्रिज मंडप को रामेश्वरम से जोड़ने का एक मात्र संपर्क-सूत्र था। बाद में यहाँ सड़क पुल बनाया गया।

जबलपुर में ‘इस्लामी धर्मांतरण का क्लीनिक’ चलाने वाला डॉक्टर खालिद खान गिरफ्तार, इलाज के लिए आई हिंदू लड़की को मुस्लिम बनाने पर था अमादा: पढ़िए FIR की डिटेल

मध्य प्रदेश के जबलपुर में एक दीनी डॉक्टर गिरफ्तार किया गया है। यहाँ क्रेशर बस्ती, तिलवारा इलाके में खालिद खान नाम का डॉक्टर नाबालिग हिंदू लड़की के ब्रेनवॉश और इस्लाम में कन्वर्जन के एकदम करीब था। हालाँकि वो अब पुलिस की गिरफ्त में है।

जबलपुर के इस मामले में 17 साल 11 महीने की नाबालिग लड़की के पिता ने 2 अप्रैल 2025 को पुलिस को दी गई शिकायत में सारे घटनाक्रम को विस्तार से लिखा है। इसके बाद क्लीनिक में बैठ ‘दीनी’ काम करने वाले खालिद के खिलाफ तिलवारा थाने में एफआईआर दर्ज हुई है।

पीड़ित परिवार का कहना है कि खालिद खान ने उनकी बेटी को बहला-फुसलाकर, लालच देकर और हिंदू धर्म के खिलाफ भड़काकर इस्लाम अपनाने का दबाव बनाया। ऑपइंडिया के पास इस केस के एफआईआर की कॉपी मौजूद है।

पीड़ित परिवार के मुताबिक, सब कुछ पिछले साल अगस्त से शुरू हुआ। लड़की को बुखार हुआ तो वो पास के खान क्लीनिक में इलाज के लिए गई, जहाँ खालिद खान बैठता था। यहीं से खालिद खान ने लड़की को अपने जाल में फँसाना शुरू किया। उसने लड़की का नंबर लिया और लगातार फोन पर बातें करने लगा।

परिवार का आरोप है कि खालिद खान ने हिंदू धर्म को बुरा-भला कहा, इस्लाम को श्रेष्ठ बताया और बाहर पढ़ाई, अच्छा घर और सुख-सुविधाओं का लालच देकर उसे धर्म बदलने के लिए उकसाया। लड़की नाबालिग और नासमझ थी, इसलिए वो उसके बहकावे में आ गई। उसने पूजा-पाठ छोड़ दिया और खालिद खान के कहने पर मुस्लिम रीति-रिवाज अपनाने लगी।

परिवार ने जब खालिद खान को समझाने की कोशिश की, तो उसने धमकी दी कि लड़की अब उसके कहने पर चलेगी। उसने कहा, “अगर तुमने उसे रोका, तो मैं लड़की से तुम्हारे खिलाफ झूठी रिपोर्ट लिखवा दूँगा।” परिवार डर गया, लेकिन खालिद खान रुका नहीं। उसने फोन और छिपकर मिलकर लड़की पर दबाव बनाना जारी रखा। हालत ये हुई कि लड़की ने रमजान में रोजा रखना शुरू कर दिया। उसका शरीर कमजोर होने लगा, चेहरा पीला पड़ गया। माँ ने जब पूछा तो लड़की ने सारी बातें उगल दीं। उसने बताया कि खालिद खान के कहने पर उसने ऐसा किया।

पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की और खालिद खान को गिरफ्तार कर लिया। तिलवारा थाने के प्रभारी ब्रजेश मिश्रा ने बताया कि खालिद खान के खिलाफ मध्य प्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम-2021 की धारा 3 और 5 के तहत मामला दर्ज किया गया है। परिवार का कहना है कि खालिद खान ने उनकी बेटी की जिंदगी बर्बाद करने की कोशिश की।

अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सूर्यकांत शर्मा ने बताया कि तिलवारा घाट थानान्तर्गत क्रेशर बस्ती में डॉक्टर खालिद खान होम्योपैथिक क्लीनिक चलाता था। क्षेत्र में रहने वाली एक नाबालिग बच्ची उसके पास इलाज के लिए जाती थी। इलाज की आड़ में डॉक्टर उसका ब्रेन वॉश कर इस्लाम अपनाने के लिए दबाव बनाने लगा था। उसके खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। फिलहाल उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है।

पीड़ित पिता की शिकायत के आधार पर दर्ज एफआईआर का अंश

इस घटना से नाराज बजरंग दल और हिंदू संगठनों ने 4 अप्रैल 2025 को सड़कों पर प्रदर्शन किया। लोगों ने खालिद खान के खिलाफ सख्त सजा की माँग की और पूछा कि उसने और कितनी मासूम लड़कियों को अपने जाल में फँसाया होगा।

वक्फ बिल बना कानून, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने किए हस्ताक्षर: विरोध में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई हैं 4 याचिका, मुस्लिम संगठन कर रहे विरोध

संसद के दोनों सदनों से पास होने के बाद वक्फ (संशोधन) बिल-2025 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अपनी मंजूरी दे दी है। इसका गजट नोटिफिकेशन जारी हो गया है। इसके साथ ही अब वक्फ (संशोधन) बिल-2025 कानून बन गया है। अधिसूचना में कहा गया है, ‘संसद से पारित वक्फ संशोधन अधिनियम को 5 अप्रैल 2025 को राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई है और इसे सामान्य जानकारी के लिए प्रकाशित किया जाता है।’

बता दें कि यह बिल बुधवार (3 अप्रैल 2025) की रात को लोकसभा में लगभग 12 घंटे तक बहस के बाद पारित हुआ था। लोकसभा में इस विधेयक के पक्ष में 288 वोट पड़े थे, जबकि विरोध में 232 वोट पड़े थे। इसके बाद यह बिल गुरुवार (4 अप्रैल 2025) की रात राज्यसभा में भी पास हो गया। इस विधेयक के पक्ष में 128 सांसदों ने वोट दिया, जबकि विरोध में 95 वोट पड़े।

भारत का राजपत्र (साभार: TOI)

राज्यसभा में इस बिल पर लगभग 12 घंटे तक चर्चा चली थी। इस विधेयक पर विपक्ष की ओर से कई संशोधन भी पेश किए गए थे, लेकिन सदन ने इन संशोधनों को खारिज कर दिया था। राज्यसभा में वोटिंग के दौरान अंतिम समय में ओडिशा की बीजू जनता दल (BJD) ने सरकार का समर्थन किया। इससे पहले BJD ने बिल का कड़ा विरोध किया था और इसे अल्पसंख्यकों के खिलाफ बताया था। 

इसके अलावा, संसद ने मुसलमान वक्फ (निरसन) विधेयक, 2025 को भी मंजूरी दी। यह बिल 1923 के ‘मुसलमान वक्फ अधिनियम’ को निरस्त करता है। इसे खत्म करने का उद्देश्य इसके पुराने प्रावधानों को खत्म करना है। अब जबकि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संसद के दोनों सदनों में पारित इन विधेयकों पर हस्ताक्षर कर दिया है तो ये कानून लागू हो गए हैं।

दरअसल, वर्तमान में राज्यसभा सदस्यों की संख्या 236 हैं। बहुमत का आँकड़ा 119 है। वहीं, राज्यसभा में के सासंदों की कुल संख्या 98 सांसद हैं, जबकि NDA के सदस्यों की संख्या 118 है। वहीं, 6 मनोनीत सदस्य भी हैं। इस तरह NDA के पक्ष में कुल 124 संख्या है। राज्यसभा में कॉन्ग्रेस के 27 सांसद हैं। अगर इंडी गठबंधन की बात करें तो यह संख्या 88 पहुँच जाती है।

राज्यसभा में वक्फ (संशोधन) विधेयक-2025 पर चर्चा का जवाब देते हुए अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि वक्फ बोर्ड एक वैधानिक निकाय है। इस कारण से इसे धर्मनिरपेक्ष होना चाहिए। रिजिजू ने कहा कि मुस्लिमों की भावनाओं को देखते हुए फिर भी हमने गैर-मुस्लिमों की संख्या सीमित कर दी गई है। उन्होंने कहा कि विपक्षी पार्टियाँ वक्फ विधेयक से मुस्लिमों को डरा रही हैं।

विधेयक पर चर्चा के दौरान विपक्ष के अधिकांश सदस्य सदन से नदारद रहे। वहीं, सत्ता पक्ष सदस्य मौजूद रहे। बिल को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मोर्चा संभाल रखा था। चर्चा के दौरान कई बार खड़े होकर उन्होंने हस्तक्षेप किया। कॉन्ग्रेस सांसद नासिर हुसैन को टोकते हुए उन्होंने कहा कि अब तक ट्रिब्यूनल के फैसले को चुनौती नहीं दी जा सकती थी, लेकिन विधेयक में ऐसा नहीं है।

सरकार का कहना है कि इस अधिनियम का उद्देश्य वक्फ संपत्तियों के प्रशासन में सुधार करना, लेन-देन में पारदर्शिता बढ़ाना और वक्फ बोर्डों में विभिन्न मुस्लिम संप्रदायों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है। इसमें विरासत स्थलों की सुरक्षा, सामाजिक कल्याण में सुधार और मुस्लिम विधवाओं एवं तलाकशुदा महिलाओं सहित हाशिए पर पड़े लोगों के आर्थिक समावेशन का समर्थन करने के प्रावधान भी शामिल हैं।

वहीं, अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि इस कानून से लाखों गरीब मुस्लिमों को लाभ होगा। उन्होंने कहा, “यह कानून व्यापक हितधारक परामर्श पर आधारित है और इसमें संयुक्त संसदीय समिति की सिफारिशें शामिल हैं।” उन्होंने स्पष्ट किया कि केंद्रीय वक्फ परिषद में 22 सदस्य होंगे, जिसमें चार से अधिक गैर-मुस्लिम नहीं होंगे।

इस कानून के खिलाफ में कोर्ट पहुँचे विरोधी

वक्फ संशोधन अधिनियम-2025 (तब बिल था) को लागू करने पर रोक लगाने की माँग वाली 4 याचिकाएँ सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई हैं। इनमें से दो याचिकाएँ शनिवार (5 अप्रैल 2025) को लागू की गई हैं। एक याचिका वक्फ घोटाले के आरोपित AAP विधायक अमानतुल्लाह खान ने और दूसरी याचिका ‘एसोसिएशन फॉर द प्रोटेक्शन इन द मैटर्स ऑफ सिविल राइट्स’ नामक संस्था ने दाखिल की है।

इससे एक दिन पहले यानी शुक्रवार (4 अप्रैल 2025) को कॉन्ग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने इसे चुनौती दी थी। अपनी याचिका में इसकी वैधता को चुनौती देते हुए दोनों ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट में वक्फ (संशोधन) कानून भारत के संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करता है।

बिहार के किशनगंज से लोकसभा सांसद मोहम्मद जावेद ने अधिवक्ता अनस तनवीर के माध्यम से दायर अपनी याचिका में कहा है कि यह विधेयक वक्फ संपत्तियों और उनके प्रबंधन पर मनमाने ढंग से प्रतिबंध लगाता है। इस कारण से मुस्लिमों मजहबी स्वायत्तता कमजोर होती है। उन्होंने यह भी कहा है कि इसमें विभिन्न प्रतिबंधों के जरिए मुस्लिम समुदाय के साथ भेदभाव किया गया है।

वहीं, असदुद्दीन ओवैसी ने अपनी याचिका में कहा है कि इस विधेयक के माध्यम से वक्फों और बौद्ध, जैन और सिख धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्तों को दी जाने वाली कई सुरक्षा को छीन लिया है। याचिका में कहा गया है, “यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन करता है, जो धर्म के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है।” वहीं, इसके खिलाफ ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने देश में विरोध प्रदर्शन की चेतावनी दी है।

दिल्ली में ₹10 लाख का इलाज मुफ्त, लागू हुई ‘आयुष्मान भारत योजना’: BJP सरकार ने किया ₹2144 करोड़ का बजट पास, जानिए किसे मिलेगा फायदा

दिल्ली में शनिवार (5 अप्रैल 2025) को प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत योजना को लागू कर दिया गया है। इसके लिए केंद्र और नई दिल्ली सरकार ने समझौते पर हस्ताक्षर किए। नई दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा कि स्वास्थ्य सेवाओं को लोगों तक पहुँचाने की दिशा में ये महत्वपूर्ण कदम है।

आयुष्मान योजना तहत दिल्ली में इसकी पात्रता वाले परिवारों को सालाना 10 लाख रुपए की सहायता मिलेगी। इसमें केंद्र से पाँच और दिल्ली सरकार की ओर से पाँच लाख रुपए शामिल होंगे। अन्य राज्यों में 5 लाख रुपए तक का है।

योजना लागू होने के पहले चरण में 10 अप्रैल तक एक लाख लोगों का आयुष्मान कार्ड बनाए जाएँगे। बीजेपी ने विधानसभा चुनाव से पहले ही ऐलान किया था कि सत्ता में आने के बाद इस योजना को दिल्ली में लागू किया जाएगा।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जिन लोगों के पास अंत्योदय अन्न योजना (AAY) का कार्ड है, उनके कार्ड सबसे पहले बनाए जाएँगे। राशन कार्ड की श्रेणी में ये सबसे नीचे आते हैं। इन परिवारों को 35 किलो राशन हर माह दिया जाता रहै। उनके बाद बीपीएल कार्ड धारकों की बारी आएगी। इस योजना के लिए सरकार ने 2144 करोड़ रुपए का बजट पास किया है।

गौरतलब है कि अरविंद केजरीवाल सरकार के वक्त राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 की सिफारिश के तहत दिल्ली में आयुष्मान योजना को लागू नहीं किया गया था। उलटा इस योजना के तहत दिए जा रहे हेल्थ कवर पर सवाल उठाए गए थे। लेकिन अब जब सरकार बदली है और कमान भाजपा के हाथ आई है तो उन्होंने दिल्ली के गरीब परिवारों को यह तोहफा दिया है।

शहनाज की जो दलीलें कोर्ट ने नहीं मानी, उसको आधार बना ‘मुस्लिम विक्टिम’ कार्ड चल रहा The Wire: हिंदू लड़की से रोजा रखवाने का मामला

उत्तर प्रदेश के झाँसी में शाहनाज और खुशनुमा नाम की दो महिलाओं ने 16 साल की एक हिंदू नाबालिग लड़की को बहला-फुसलाकर धर्मांतरण करने की कोशिश की थी। उन्होंने नाबालिग को झाँसा दिया था कि रोजा रखने से वह अमीर हो जाएगी। इसके बाद नाबालिग लड़की ने 2-3 दिन तक रोजा भी रखा। अब इस मामले को वामपंथी प्रोपेंगडा न्यूज पोर्टल ‘द वायर’ ने आरोपितों की जमानत याचिका के हवाले से पैसे का मामला बताकर एक अलग एंगल देने की कोशिश की है।

दरअसल, यह मामला झाँसी के कोतवाली थाना क्षेत्र के भांडेरी गेट बाहर मोहल्ले से जुड़ा है। एक व्यक्ति ने अपनी पड़ोसी 40 वर्षीया शहनाज उर्फ सना और खुशनुमा पर आरोप लगाया था कि दोनों ने उसकी 16 साल की नाबालिग बेटी का इस्लाम में धर्मांतरण करने की कोशिश की। इसके लिए दोनों ने उसकी बेटी को बहकाया और रोजा रखने और नमाज पढ़ने के लिए उकसाया।

पिता का कहना था कि दोनों मुस्लिम महिलाओं ने उसकी बेटी को झाँसा दिया कि अगर वह मुस्लिमों के पाक महीने में रोजा रखने और नमाज पढ़ने से उसके परिवार की तरक्की होगी और वह अमीर हो जाएगी। चूँकि, दोनों पड़ोसी हैं तो नाबालिग ने शहनाज की बातों पर विश्वास कर लिया। नाबालिग लड़की ने रोजा रखना शुरू कर दिया और घर में नमाज पढ़ने लगी। तीन-चार दिन तक उसने ऐसा किया।

एक दिन उसके परिजनों ने उसे ऐसा करते हुए देख लिया। उन्होंने नाबालिग लड़की को समझाया। जब शहनाज को पता चला कि नाबालिग के घर वालों ने उसका विरोध किया है तो वह उनके घर पहुँच गई।शहनाज नाबालिग लड़की के चाचा के कमरे में घुस गई और दरवाजा बंद करके आत्महत्या कर परिवार को फँसाने की धमकी देने लगी। इससे घबरा कर पीड़िता के चाचा ने पुलिस को फोन करके बुलाया।

शहनाज उन्हें झूठे मुकदमे में फँसाने की धमकी देते हुए वहाँ से भाग गई। घटना की जानकारी हिंदू संगठनों को मिली तो उन्होंने इसे धर्मांतरण का मुद्दा बताकर विरोध प्रदर्शन किया। नाबालिग लड़की के पिता ने 13 मार्च को कोतवाली थाने जाकर शिकायत दी। इसके आधार पर पुलिस ने उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 की धारा 3 और 5 (1) मुकदमा दर्ज कर लिया।

सीओ सिटी स्नेहा तिवारी ने कहा था कि शहनाज के खिलाफ नाबालिग लड़की को धर्म परिवर्तन के लिए उकसाने का केस दर्ज किया गया है। बाद में पुलिस ने दोनों महिलाओं को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद दोनों महिलाओं को कोर्ट में पेश करके जेल भेज दिया गया। पुलिस ने शांति भंग करने, जान से मारने या गंभीर चोट पहुँचाने और संपत्ति को नष्ट करने की धमकी देने, आपराधिक धमकी देने जैसी धाराएँ जोड़ीं।

इसके बाद दोनों महिलाओं ने जमानत के लिए कोर्ट में अर्जी दी। इस पर 26 मार्च को कोर्ट ने सुनवाई की। झाँसी के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विजय कुमार वर्मा ने शहनाज़ को ज़मानत देने से इनकार कर दिया। जज विजय कुमार वर्मा ने कहा कि शहनाज़ जाँच के दौरान गवाहों या सबूतों को प्रभावित कर सकती है, क्योंकि वह पीड़िता के बगल में रहती है। इस आधार पर शहनाज की जमानत याचिका खारिज हो गई।

वामपंथी प्रोपेंगेडा पोर्टल वायर ने दिया नया एंगल

सिद्धार्थ वरदराजन द्वारा संचालित वामपंथी प्रोपगेंडा वेब पोर्टल इस खबर को शहनाज की जमानत याचिका के आधार पर एक अलग एंगल देने की कोशिश की है। जमानत की याचिका दायर होने से पहले धर्मांतरण की कोशिश वाली इस खबर को विस्तार से वायर ने अपने पोर्टल पर जगह भी नहीं दी। अब इस पोर्टल पर उमर राशिद ने इसे धर्मांतरण को वित्तीय विवाद के रूप में दिखाने की कोशिश की है।

उमर राशिद ने ‘रोज़ा या आर्थिक विवाद: यूपी में एक मुस्लिम महिला को रमज़ान के दौरान ‘धर्मांतरण’ के लिए क्यों गिरफ़्तार किया गया?’ शीर्षक वाले अपनी खबर में आरोपितों के दावों को आधार बनाया है। जाहिर है कि कोई भी अपराधी ये नहीं कहता है कि उसने अपराध किया है। वह अक्सर यही कहता है कि सामने वाले ने उसे झूठे केस में फँसाया है और मामला कुछ दूसरा है।

इस मामले में भी राशिद ने आरोपित शहनाज के हवाले से धर्मांतरण के प्रयास वाले आरोपों को वित्तीय विवाद बनाने की कोशिश की और बड़ी चालाकी से मीडिया में सामने आया धर्मांतरण एंगल धूमिल करने का प्रयास किया। उसने आरोपित शहनाज के हवाले से रिपोर्ट में कहा कि कर्ज चुकाने से बचने की कोशिश में धर्मांतरण के केस में फँसाने के लिए झूठी कहानी रची है। शहनाज का कहना है कि शिकायकर्ता हिंदू व्यक्ति कुछ समय पहले बीमार पड़ गया था और उसकी पत्नी ने उससे 50,000 रुपए उधार लिए थे।

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि शिकायतकर्ता की पत्नी ने शहनाज से 10 दिनों में पैसे लौटाने का वादा किया था। जब वह पैसे वापस नहीं किए तो वह माँगने के लिए उसके घर जाने लगी, लेकिन शिकायतकर्ता की पत्नी किसी ना किसी बहाने से उसे टालती रही। घटना के दिन वह पैसे माँगने के लिए ही शिकायतकर्ता के घर गई थी, लेकिन शिकायतकर्ता के भाई ने उसे घर में बंद कर दिया।

उमर राशिद ने इस आरोप को बताने के लिए प्रोपगेंडा वेबसाइट के आर्टिकल में आधार शहनाज की बेल को रखा है जो हिंदू बच्ची से नमाज पढ़वाने, रोजा रखने के केस में आरोपित है। जाहिर है कि वह अपने-आप को पाक-साफ बताएगी ही और वो क्यों स्वीकारेगी कि उसने वो काम किया है। इस पूरे मामले में द वायर के पत्रकार ने पूर्व में क्या केस था इस पर तो बात रखी है, लेकिन इन वित्तीय लेन-देन के आरोप में पीड़ित या पुलिस जाँच का क्या कहना है इसे नहीं जाना। पूरी रिपोर्ट बेल याचिका पर बनाई गई। अगर पक्ष जाना भी होगा तो रिपोर्ट देख मालूम पड़ता है मामले को अलग मोड़ देने के उद्देश्य से या पाठकों के मन में भ्रम पैदा करने के उद्देश्य से उस पक्ष को रिपोर्ट में शामिल नहीं किया होगा।

वायर का यह रवैया कोई नया नहीं है। वह हिंदू विरोधियों और वामपंथियों के पक्ष में ऐसे ही तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करने के लिए जाना जाता है। इस तरह की एक पक्षीय रिपोर्ट को लेकर द वायर मीडिया सर्किल में काफी बदनाम भी है। इस मामले में भी पोर्टल ने कुछ ऐसा ही करने की कोशिश की है।

पादरी ने प्रेगनेंट करके करवाया गर्भपात, इंफेक्शन से हो गई लड़की की मौत मौत: पंजाब में बजिंदर सिंह के बाद पास्टर जशन गिल पर रेप का इल्जाम, पिता को 2 साल बाद भी न्याय का इंतजार

पादरी बजिंदर सिंह के बाद पंजाब के एक और पादरी जशन गिल पर 22 साल की एक लड़की से बलात्कार का आरोप लगा है। पादरी गिल पंजाब के गुरदासपुर का रहने वाला है। मृतक पीड़िता के पिता ने बताया है कि कैसे पादरी ने बहला फुसलाकर उनकी बेटी के साथ रेप किया और उसे गर्भपात के लिए मजबूर किया गया। लड़की की संक्रमण के कारण इलाज के दौरान मौत हो गई। यह घटना ऐसे समय में हुई है जब कुछ दिन पहले ही मोहाली कोर्ट ने स्वयंभू पादरी बजिंदर सिंह को एक महिला से बलात्कार के आरोप में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।

बजिंदर सिंह के बाद पंजाब के एक और पादरी पर लगा रेप का आरोप

पीड़िता के पिता ने ANI को बताया कि कैसे पादरी ने उनकी बेटी को गुमराह किया और 2023 में उसके साथ बलात्कार किया। पिता के मुताबिक वे अपने परिवार के साथ गुरदासपुर जिले के अबुल खैर गाँव के एक चर्च में जाया करते थे। जशन गिल नाम का पादरी उस चर्च में ही था। उसने उनकी बेटी को गुमराह किया और बहला-फुसला कर बलात्कार किया। उस वक्त उनकी बेटी 22 साल की थी और बीसीए की छात्रा थी। पादरी ने बेटी के साथ कई बार रेप किया जिससे वो गर्भवती हो गई। पादरी को जब पता चला तो उसने खोखर गाँव में कुलवंत कौर नाम की एक नर्स से उसका गर्भपात करवा दिया।

‘पादरी की करतूत से हुई बेटी की मौत’

बेटी का गर्भपात नर्स ने लापरवाही से किया था, जिसके कारण बेटी को संक्रमण हो गया। बेटी ने पेट दर्द की शिकायत की जिसके बाद उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया। इलाज के दौरान पेट में संक्रमण की जानकारी मिली और बाद में अल्ट्रासाउंड के बाद परिजनों को पता चला कि उनकी बेटी गर्भवती थी जिसका गर्भपात कराया गया है। बेटी को गंभीर हालत में अमृतसर ले जाया गया, जहाँ इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।

‘पादरी खुला घूम रहा, पुलिस पैसे खा रही है’

पिता के मुताबिक गुरदासपुर पुलिस ने पादरी जशन गिल की सच्चाई उजागर होने के बाद भी गिरफ्तार नहीं किया। वह खुलेआम घूमता रहा और पुलिस उससे पैसे लेती रही। यह घटना 2023 में हुई थी लेकिन सालों बाद भी पादरी का बाल भी बांका नहीं हुआ। हालात ये हो गए कि परिवार को मारने की धमकियाँ मिलने लगी जिसके बाद परिवार को अपना गाव छोड़कर भागने के लिए मजबूर होना पड़ा।

परिवार अब हर हाल में अपनी बेटी के लिए न्याय चाहता है। पंजाब पुलिस पर परिवार को विश्वास नहीं है इसलिए गुनहगार पादरी को सजा दिलवाने के लिए घटना की सीबीआई जाँच की माँग कर रहा है। इसके लिए परिवार ने पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया है। जानकारों के मुताबिक पादरी पर 2023 में केस दर्ज किया गया था लेकिन गिरफ्तारी नहीं हुई। वो फरार है और पुलिस की कई टीमें उसे लगाई गई हैं लेकिन दो साल से उसका सुराग नहीं मिल पाया है। पादरी के संपर्क काफी ऊपर तक बताए जा रहे हैं।

‘डॉक्टर’ बन खालिद खान हिन्दू नाबालिग लड़की के पीछे पड़ा, इलाज के बहाने रखवाने लगा रोजा: शरीर पीला पड़ने पर बच्ची ने मुँह खोला, आरोपित पुलिस की गिरफ्त में

जबलपुर में एक होम्योपैथिक डॉक्टर खालिद खान को पुलिस ने गिरफ्तार किया है। उसपर आरोप लगा है कि उसने एक नाबालिग हिन्दू लड़की को इस्लाम कबूल करने के लिए उकसाया। इसके बाद लड़की का व्यवहार बदल गया जिसे देख घरवाले काफी परेशान हो गए। लड़की घरवालों से बात कम करती थी और हिन्दू रीति रिवाजों में दिलचस्पी लेना बंद कर दिया था। लड़की की धार्मिक सोच में बदलाव के बाद इसका खुलासा हुआ।

हिन्दू लड़की को खालिद ने झांसे में लिया

बताया जा रहा है कि लड़की अगस्त 2024 में बीमार पड़ गई थी और उसके परिजन लड़की को होम्योपैथिक डॉक्टर खालिद खान के क्लिनिक पर ले गए थे। उसका क्लिनिक क्रेशर बस्ती इलाके में है। नाबालिग लड़की से सेहत की जानकारी लेते वक्त खालिद ने उससे उसका मोबाइल नंबर पूछ लिया। वो लगातार लड़की को फोन करने लगा। खालिद लड़की पर इस्लाम धर्म अपनाने के लिए मानसिक तौर पर दबाव डालने लगा। लड़की उसके झाँसे में आ गई और रमजान में रोजा रखने लगी।

जब लड़की के घरवालों ने देखा कि लड़की काफी कमजोर होती जा रही है और उसका शरीर पीला पड़ रहा है तब लड़की माँ ने उससे बात की। लड़की ने इस दौरान सारी बातें बता दी। उसने कहा कि खालिद खान के कहने पर उसने रोजा रखा है। इस मामले में तिलवारा पुलिस ने आरोपित खालिद खान के खिलाफ शिकायत दर्ज किया और उसे गिरफ्तार कर लिया। तिलवारा थाने के प्रभारी ब्रजेश मिश्रा के मुताबिक आरोपित के खिलाफ लड़की को गुमराह करने, धर्म परिवर्तन के लिए उकसाने के लिए कई धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है।

इस मामले में बजरंग दल समेत कई हिन्दू संगठन घटना के विरोध में सड़कों पर उतर आए और 4 अप्रैल की शाम को प्रदर्शन किया। इस दौरान बड़ी संख्या में लोग जुटे और जमकर नारेबाजी की। इन लोगों ने आरोपित खालिद खान के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की माँग की। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि खालिद खान ने अब तक कितनी मासूम बच्चियों को अपने झाँसे में लिया है पुलिस इसका खुलासा करे। पुलिस मामले की जाँच कर रही है।

वक्फ बिल पास होते ही केरल के 50 ईसाई BJP में हुए शामिल, PM मोदी से मिल आभार प्रकट करने की जताई इच्छा: मुनम्बम में इनकी 404 एकड़ जमीन पर वक्फ बोर्ड ने ठोका है दावा

लोकसभा के बाद राज्यसभा में वक्फ संशोधन बिल पास होने के बाद केरल के 50 ईसाई भाजपा में शामिल हो गए। ये सभी लोग केरल के मुनंबम के रहने वाले हैं। लगभग 404 एकड़ में फैला मुनंबम वही इलाका है, जिस पर वक्फ बोर्ड अपना दावा करता है। इस दावे की वजह से यहाँ रहने वाले 600 से अधिक ईसाई और हिंदू परिवारों पर ग्रहण लग गया है। वक्फ बिल पास होने से इन लोगों में खुशी है।

वक्फ (संशोधन) विधेयक पारित होने के बाद भाजपा की केरल इकाई के नेताओं ने मुनंबम का दौरा किया। वहाँ के लोगों ने भाजपा नेताओं का जोरदार स्वागत किया और 50 लोग पार्टी में शामिल हो गए। केरल के इस तटीय गाँव के लोग वक्फ बोर्ड के दावों के खिलाफ पिछले 174 दिनों से विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने वहाँ पहुँचकर प्रदर्शनकारियों से मुलाकात की।

चंद्रशेखर ने उनसे कहा, “यह राज्य के राजनीतिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण दिन है। इस आंदोलन ने प्रधानमंत्री और संसद को वक्फ संशोधन विधेयक पारित करने की ताकत दी है। जब तक आपको जमीन पर राजस्व अधिकार वापस नहीं मिल जाते, हम आपके साथ हैं। मुनंबम के लोगों को उनके सांसदों और विधायकों ने धोखा दिया है, लेकिन उनकी आवाज संसद तक आखिरकार पहुँची।”

इसके बाद 50 लोग भाजपा में शामिल हो गए। मुनंबम प्रदर्शनकारियों की कार्यसमिति के संयोजक जोसेफ बेनी ने बताया कि भाजपा में शामिल होने वाले सभी 50 लोग ईसाई हैं। वे पहले कॉन्ग्रेस और सीपीआई (एम) को वोट देते थे। ईसाई बहुल मुनंबम के लोगों को उम्मीद है कि वक्फ (संशोधन) विधेयक के पारित होने से वक्फ बोर्ड द्वारा उनकी भूमि पर किए दावों का समाधान निकालने में मदद मिलेगी।

इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने चंद्रशेखर से पीएम नरेंद्र मोदी से मुलाकात की व्यवस्था करने का अनुरोध किया, ताकि वे उनका आभार व्यक्त कर सकें। इस पर चंद्रशेखर ने प्रधानमंत्री कार्यालय से बात करने का आश्वासन दिया है। आभार प्रकट करने के लिए मुनंबम विरोध समिति ने चंद्रशेखर को ‘ईसा मसीह के अंतिम भोज’ की एक तस्वीर भेंट की। वहीं, फादर एंटनी जेवियर ने मिठाई बाँटी।

इस बीच, कैथोलिक चर्च से जुड़े मलयालम दैनिक दीपिका ने कहा कि कॉन्ग्रेस और वामपंथी संघ परिवार को लेकर अल्पसंख्यकों में भय पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। दरअसल, कैथोलिक चर्च ने कॉन्ग्रेस और वामपंथी से आग्रह किया था कि वे अपने सांसदों को वक्फ कानून में जनविरोधी धाराओं को हटाने के लिए लाए गए वक्फ संशोधन बिल के पक्ष में मतदान करने के लिए कहें।

हालाँकि, दोनों दलों ने चर्च की इस माँग को खारिज कर दिया था। कैथोलिक चर्च मुनंबम के लोगों के साथ खड़ा है। वहीं, ईसाई समुदाय के लोग वक्फ पारित होने के लिए चर्चों में प्रार्थना करते रहे। दरअसल, अधिकांश ईसाई परिवार वाले मुनंबम के लोगों का कहना है कि वे इस जगह पर पीढ़ियों से रहते आ रहे हैं। इसके बावजूद वक्फ बोर्ड ने इस गाँव पर अपना दावा ठोका है।

क्या है मामला?

केरल वक्फ बोर्ड ने साल 2019 में दावा किया कि मुनम्बम, चेराई और पल्लिकाल द्वीप के इलाके वक्फ संपत्ति है। वक्फ बोर्ड का कहना है कि यह जमीन साल 1950 में वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज की गई थी, जबकि यहाँ रहने वाले लोगों का दावा है कि उन्होंने इस जमीन को कानूनी रूप से दशकों पहले खरीदा था। उनकी पीढ़ियाँ यहाँ रहते आ रही हैं। इन लोगों के पास 1989 से जमीन के वैध कागजात हैं।

इन परिवारों का कहना है कि उन्होंने वैध तरीके से अपनी जमीन खरीदी है। अब वक्फ बोर्ड द्वारा किए गए दावे के बाद उन्हें इस जमीन को जबरन खाली करने के आदेश दिए जा रहे हैं। बता दें कि समुद्र तट पर बसा यह इलाका न केवल केरल के 600 से अधिक परिवारों का घर है, बल्कि यहाँ विभिन्न धर्मों के लोग रहते हैं। इसके बावजूद, वक्फ बोर्ड ने इस इलाके पर अपना दावा ठोक दिया।

केरल के एर्नाकुलम जिले में कोच्चि से लगभग 38 किलोमीटर दूर अरब सागर के किनारे मुनम्बम स्थित है। यहाँ 610 परिवारों रहते हैं, जिनमें 510 कैथोलिक ईसाई और 100 हिंदू परिवार हैं। इन लोगों कहना है कि इन लोगों ने फारूख कॉलेज के मैनेजमेंट से यह जमीन खरीदी थी। इसको लेकर वे पिछले 60 साल से कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। वहीं, साल 2019 में वक्फ ने इसे अपनी संपत्ति घोषित कर दी।

साल 1902 तक जाती है विवाद की जड़

दरअसल, 1341 ईस्वी में केरल में भयानक बाढ़ आई। इस दौरान वाइपिन आईलैंड के ऊतरी हिस्से पर मुनम्बम बना। साल 1503 में पुर्तगालियों ने यहाँ हमला किया और 1663 में डचों ने इस पर कब्जा कर लिया। यह डचों के अधिकार में लंबे समय तक रहा। इसके बाद 1789 ईस्वी में डचों ने मुनम्बम को त्रावणकोर के महाराजा को बेच दिया। इसके बाद विवाद की शुरुआत होती है।

साल 1902 में त्रावणकोर के महाराजा ने गुजरात से आए एक किसान अब्दुल सत्तार मूसा हाजी सैत को यहाँ की 404 एकड़ जमीन और 60 एकड़ जल क्षेत्र पट्टे पर दिया था। उस समय, यह जमीन मछुआरों के लिए अलग रखी गई थी, जो वहाँ कई वर्षों से रह रहे थे। 1948 में सेठ के उत्तराधिकारी एवं दामाद सिद्दीक सैत ने यह जमीन अपने नाम पर पंजीकृत करवा ली।

इस जमीन का एक बड़ा हिस्सा समुद्री कटाव के कारण खो गया और साल 1934 की भारी बारिश ने पांडरा समुद्र किनारे की जमीन को पूरी तरह नष्ट कर दिया था। हालाँकि, सिद्दीक सैत द्वारा पंजीकृत जमीन में मछुआरों के रहने वाले इलाके भी शामिल हो गए। साल 1950 में सिद्दीक सैत ने यह जमीन फरूख कॉलेज को उपहार में दे दी, जो मुस्लिमों को शिक्षित करने के लिए 1948 में बनाया गया था।

इसके साथ ही सिद्दीकी सैत ने शर्त रखी थी। शर्त यह थी कि कॉलेज केवल शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए ही इसका उपयोग करेगा। अगर कभी कॉलेज बंद हो जाता है तो जमीन वापस सिद्दीकी सैत के वंशजों को लौटा दी जाएगी। हालाँकि, दस्तावेजों में गलती से या जानबूझकर ‘वक्फ’ शब्द लिख दिया गया, जिससे अब यह विवाद खड़ा हो गया है। कहा जाता है कि 1 नवंबर 1950 को कोच्चि के एडापल्ली में उप-पंजीयक कार्यालय में एक वक्फ पंजीकृत किया गया था। इसमें सैत ने फारूक कॉलेज के अध्यक्ष के पक्ष में पंजीकृत कराया था।

विवाद की शुरुआत और आयोग का गठन

फारूख कॉलेज के प्रबंधन को करीब एक दशक बाद जमीन का मालिकाना हक मिल गया। साल 1960 के दशक के आखिर में जमीन पर कब्जा करने वालों के बीच कानूनी लड़ाई शुरू हो गई। कॉलेज प्रबंधन यहाँ रहने वाले लोगों को बेदखल करना चाहता था। कैथोलिक ईसाई और दलित हिंदू समुदाय के ये लोग पीढ़ियों से वहाँ रह रहे थे, लेकिन उनके पास स्वामित्व साबित करने के लिए कानूनी दस्तावेज नहीं थे।

आखिरकार, अदालत के बाहर समझौते में कॉलेज प्रबंधन ने बाजार दर पर जमीन को अपने कब्जेदारों को बेचने का फैसला किया। दस्तावेजों से पता चलता है कि बिक्री के कामों में कॉलेज प्रबंधन ने यह उल्लेख नहीं किया कि विचाराधीन भूमि वक्फ संपत्ति थी, जिसे शिक्षा के उद्देश्य से कॉलेज प्रबंधन समिति के अध्यक्ष को दिया गया था। इसके बजाय उन्होंने कहा कि यह संपत्ति 1950 में गिफ्ट डीड में मिली थी।

निसार आयोग और नया विवाद: केरल राज्य वक्फ बोर्ड के खिलाफ कई शिकायतों मिलने के बाद वीएस अच्युतानंदन के नेतृत्व वाली सीपीआई (एम) सरकार ने 2008 में एक आयोग गठित किया। यह आयोग सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश एमए निसार के नेतृत्व में नियुक्त किया गया। आयोग का काम बोर्ड द्वारा परिसंपत्तियों के नुकसान के लिए जिम्मेदारी तय करना था।

इसके अलावा, अयोग को इन परिसंपत्तियों की वसूली के लिए कार्रवाई की सिफारिश करना भी शामिल था। आयोग ने साल 2009 में अपनी रिपोर्ट दी। इस रिपोर्ट में आयोग ने मुनंबम में जमीन को वक्फ संपत्ति माना और कहा कि कॉलेज प्रबंधन ने बोर्ड की सहमति के बिना इसकी बिक्री को मंजूरी दे दी थी। इसने इसकी वसूली के लिए कार्रवाई की सिफारिश की थी।

वक्फ बोर्ड ने घोषित कर दी वक्फ संपत्ति: इसके बाद साल 2019 में वक्फ बोर्ड ने खुद ही मुनंबम भूमि को वक्फ अधिनियम 1995 की धारा 40 और 41 के अनुसार वक्फ संपत्ति घोषित कर दी। बोर्ड ने राजस्व विभाग को निर्देश दिया कि वह भूमि के वर्तमान कब्जेदारों (जो कई वर्षों से कर का भुगतान कर रहे थे) से भूमि कर स्वीकार ना करे।

राजस्व विभाग को दिए गए इस निर्देश को राज्य सरकार ने साल 2022 में खारिज कर दिया। इसके बाद बोर्ड ने राज्य सरकार के फैसले को केरल हाई कोर्ट में उसी साल चुनौती दी। न्यायालय ने फिलहाल राज्य सरकार के फैसलों पर रोक लगा दी है। वर्तमान में, इस विवाद को लेकर भूमि के कब्जेदारों के साथ-साथ वक्फ संरक्षण समिति की ओर से एक दर्जन से अधिक अपीलें न्यायालय में लंबित हैं।

राहुल गाँधी ने तैश में आकर किया था वीर सावरकर का अपमान, अब केस में बुरा फँसे: इलाहाबाद HC ने राहत देने से किया मना, ट्रायल कोर्ट ने भी कहा था- दुश्मनी फैलाने वाला

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने शुक्रवार (4 अप्रैल 2025) को विनायक दामोदर सावरकर के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करने वाले राहुल गाँधी को राहत देने से इनकार कर दिया। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी ने साल 2022 में भारत जोड़ो यात्रा रैली के दौरान यह टिप्पणी की थी। इस मामले में सत्र न्यायालय ने उन्हें तलब किया था। इस आदेश को हाई कोर्ट ने रद्द करने से इनकार कर दिया।

इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने राहुल गाँधी की याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि राहुल गाँधी के पास दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 397 (निचली अदालत के रिकॉर्ड की समीक्षा) के तहत सत्र न्यायाधीश के समक्ष याचिका दायर करने का विकल्प है। पिछले साल दिसंबर में लखनऊ सत्र न्यायालय ने उन्हें अदालत में हाजिर होने के लिए कहा था।

अदालत के इस आदेश को रद्द करने के लिए राहुल गाँधी ने हाई कोर्ट में याचिका दी थी। अपने आदेश में ट्रायल कोर्ट ने कहा था कि राहुल गाँधी ने कहा था कि सावरकर एक ब्रिटिश नौकर थे, जिन्हें पेंशन मिलती थी। ट्रायल कोर्ट ने कहा कि इन टिप्पणियों से समाज में नफरत और दुर्भावना फैली है। इसलिए, ट्रायल कोर्ट ने राहुल गाँधी के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला पाया है।

अदालत ने पाया था कि राहुल गाँधी ने 17 नवंबर 2022 को समाज में नफरत और दुर्भावना फैलाई थी। लखनऊ के अपर सिविल जज (सीनियर डिविजन)/एसीजेएम आलोक वर्मा ने अपने आदेश में कहा था, “प्रेस कॉन्फ्रेंस में पहले से छपे पर्चे और पत्रक वितरित करना दर्शाता है कि राहुल गाँधी ने समाज में नफरत और दुश्मनी फैलाकर राष्ट्र की बुनियादी विशेषताओं को कमजोर और अपमानित किया है।”

दरअसल, सावरकर के खिलाफ की गई टिप्पणी को लेकर अधिवक्ता नृपेंद्र पांडे ने राहुल गाँधी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। याचिका में कहा गया है, “राष्ट्रवादी विचारधारा के महान नेता क्रांतिवीर सावरकर आजादी के इतिहास में एक निडर स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्होंने भारत माता को गुलामी से मुक्त कराने के लिए अंग्रेजों के अमानवीय अत्याचारों को सहन किया।”

पांडे ने अपनी शिकायत में यह भी दावा किया है कि महात्मा गाँधी ने पहले भी विनायक दामोदर सावरकर को देशभक्त माना था। अधिवक्ता की शिकायत के बाद कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष एवं रायबरेली से लोकसभा सांसद राहुल गाँधी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 153A (शत्रुता को बढ़ावा देना) और 505 (सार्वजनिक शरारत) के तहत आरोप लगाए गए हैं।

शिकायत के बाद जून 2023 में अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अंबरीश कुमार श्रीवास्तव ने पांडे की शिकायत को खारिज कर दिया था। इसके बाद पांडे ने सत्र न्यायालय में इसे चुनौती दी थी। सत्र न्यायालय ने तब याचिका को स्वीकार कर लिया और मामले को वापस मजिस्ट्रेट अदालत में भेज दिया था।

कैम्पस में धूमधाम से इफ्तार और ईद, लेकिन रामनवमी की अनुमति नहीं: जादवपुर यूनिवर्सिटी के छात्रों ने ममता बनर्जी की सरकार को ललकारा, कहा- हर क़ीमत पर मनाएँगे

कोलकाता के जादवपुर यूनिवर्सिटी में रामनवमी के आयोजन को लेकर बवाल मचा हुआ है। छात्र-छात्राओं ने यूनिवर्सिटी कैंपस के अंदर रामनवमी मनाने की तैयारी की थी, लेकिन यूनिवर्सिटी प्रशासन ने इसकी मंजूरी नहीं दी। विद्यार्थियों का कहना है कि कुछ दिन पहले रमजान के दौरान कैंपस में इफ्तार और ईद भी मनाई गई थी। ऐसे में प्रशासन रामनवमी उत्सव क्यों नहीं मनाने देना चाहता?

दरअसल, जादवपुर यूनिवर्सिटी विद्यार्थियों ने कैंपस में रामनवमी उत्सव मानने के लिए 28 मार्च को वाइस चांसलर कार्यालय को आवेदन दिया था। अब 3 मार्च को इस आवेदन पर विचार करने के लिए वाइस चांसलर के कार्यालय में एक बैठक की। सदस्यों ने बैठक में रामनवमी मनाने की इजाजत देने संबंधी छात्रों की माँगों को अस्वीकार कर दिया।

इसके पीछे विश्वविद्यालय प्रशासन ने दो तर्क दिए हैं। पहला ये कि यूनिवर्सिटी कैंपस में रामनवमी मनाने की परंपरा नहीं रही है। यूनिवर्सिटी प्रशासन ने कहा कि पिछले साल भी विद्यार्थियों को रामनवमी मनाने की अनुमति नहीं दी गई थी। यूनिवर्सिटी प्रशासन ने दूसरा तर्क यह दिया कि अभी यूनिवर्सिटी में VC नहीं हैं। ऐसे में नई परंपरा शुरू करने का फैसला नहीं लिया जा सकता।

छात्रों को मिला बीजेपी का साथ

यूनिवर्सिटी प्रशासन द्वारा आवेदन खारिज करने के बाद भी विद्यार्थी कैंपस में रामनवमी मनाने के लिए अड़े हुए हैं। छात्रों के समर्थन में अब बीजेपी भी आ गई है और राज्य की ममता बनर्जी की सरकार पर हमला बोला है। बीजेपी नेताओं का कहना है कि बंगाल की ममता बनर्जी सरकार जान-बूझकर ईद और इफ्तार कैंपस में करने देती है, लेकिन रामनवमी का उत्सव नहीं मनाने देती। ये सरासर अन्याय है।

उधर, छात्रों ने भी ठान लिया है कि वो रामनवमी मना कर ही रहेंगे। इसको लेकर तनाव का माहौल बन गया है। वहीं, पुलिस भी अलर्ट पर है। बता दें कि जादवपुर यूनिवर्सिटी वामपंथियों का गढ़ रहा है। यहाँ SFI काफी मजबूत है। यह छात्र संगठन रामनवमी का विरोध कर रहा है। वहीं, ABVP रामनवमी मनाने पर अड़ी हुई है। ऐसे में दो छात्र संगठन भी आमने-सामने आ गए हैं।