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बंगाल चुनाव: बंगाल हर बार गलत लोगों को सत्ता क्यों देती है? | Why does Bengal elect wrong people?

चाहे कॉन्ग्रेस हो, उसके बाद कम्यूनिस्ट, उसके बाद TMC, पश्चिम बंगाल हमेशा एक समान ही रहा है, पूरे देश से तीस साल पीछे

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परमादरणीय श्री जाकिर नाइक साहब! जन्नत में मर्दों को तो हूरें मिल जाती हैं, औरतों को क्या मिलता है?

परमादरणीय जनाब-ए-आला स्कॉलर श्री जाकिर नाइक साहब,

इस्लाम और दुनिया के तमाम धर्मों के बारे में आपके ज्ञान को देखकर चकित हूँ, लेकिन एक हजार मुद्दों पर जानकारी लेने में मेरी दिलचस्पी कम है। मैं तो बस जन्नत की हूरों के बारे में अधिक से अधिक जानना चाहती हूँ। आशा है कि जैसे आप भारत से भाग गए हैं, वैसे मेरे इन चंद सवालों से नही भागेंगे।

  1. मैंने सुना है कि मजहबी पुरुष जब जन्नत पहुँचते हैं, तो उन्हें 72 हूरें मिलती हैं, लेकिन जब मजहबी महिलाएँ जन्नत पहुँचती हैं, तो उन्हें कौन मिलता है और जो भी मिलते हैं, उनकी संख्या कितनी होती है?
  2. कहीं ऐसा तो नहीं कि जैसे धरती पर महिलाओं से भेदभाव किया जाता है, वैसे ही जन्नत में भी उनकी अनदेखी की जाती है? वहाँ पुरुष तो हूरों के साथ मगन रहते होंगे, पर महिलाएँ अपना वक्त कैसे काटती हैं?
  3. जन्नत पहुँचे सच्चे मुसलमानों से मिलने के लिए हूरें बुरके में आती हैं या बिकनी में? दुपट्टे सलवार में आती हैं या हॉट पैंट में? 
  4. कृपया हूरों के नैन-नक्श, पहनावे-ओढाबे, खान-पान, रहन-सहन इत्यादि के बारे में विस्तार से बताएँ।
  5. हूरें कौन-सी भाषा बोलती हैं? क्या उन्हें धरती पर बोली जाने वाली भाषाओं की शिक्षा देने के लिए जन्नत में कोई यूनिवर्सिटी स्थापित की गई है? जब धरती से अलग-अलग भाषाएँ और बोलियाँ बोलने वाले लोग जन्नत पहुँचते होंगे, तो क्या उन्हें उन्हीं की भाषा और बोलियों में बात करने वाली हूरें सप्लाई की जाती हैं?
  6. या फिर वे सभी हूरें कोई एक ही भाषा बोलती हैं और धरती से पहुँचने वाले लोगों के लिए ही वहाँ एक मदरसा स्थापित कर दिया गया है, जहाँ हूरों से मिलाने से पहले उन्हें उस भाषा की मुकम्मल तालीम दी जाती है?
  7. यहाँ से जन्नत जाने वाले लोगों को फौरन हूरें मुहैया करा दी जाती हैं या फिर वहाँ भी उन्हें पहले आयतों रवायतों इत्यादि की किसी जाँच से गुजरना पड़ता है?
  8. हूरों के मामले में जन्नत के रूल्स और रेगुलेशन्स क्या हैं? क्या वे सिर्फ इस्लाम मानने वालों को ही सप्लाई की जाती हैं या फिर अन्य धर्मों के अनुयायियों को भी मुहैया कराई जाती हैं?
  9. कहीं ऐसा तो नहीं कि जैसे धरती पर सभी धर्मों के लोगों के रहने की व्यवस्था है, जन्नत में वैसी व्यवस्था नहीं है और वहाँ सिर्फ इस्लाम मानने वालों की ही एंट्री हो पाती है? इसलिए हूरों का लाभ भी एक्सक्लूसिवली इस्लाम के अनुयायियों को ही मिल पाता है?
  10. अगर हाँ, तो क्या हूरों वाले जन्नत की स्थापना कितने साल पहले हुई मानी जा सकती है? और क्या यह माना जा सकता है कि सभी धर्मों के देवी-देवताओं ने अलग-अलग जन्नतें बसा रखी हैं, जहाँ उनके अनुयायियों को अलग-अलग तरह की सुविधाएँ मुहैया कराई जाती हैं? या फिर सिर्फ़ इस्लाम वाला जन्नत ही सच्चा है और बाकी धर्मों में जन्नत के झूठे दावे किए गए हैं?
  11. धरती के मजहबी पुरुषों के लिए हूरों वाला यह जन्नत कहाँ स्थापित है? कृपया इसकी सही-सही लोकेशन बताएँ और यह भी बताएँ कि वहाँ से आप लोगों का कनेक्शन किस प्रकार जुड़ा है? इधर हाल-फिलहाल आपने वहाँ से कोई संवाद कायम किया है या फिर बिना संवाद और कनेक्शन के ही डींगें हाँकते रहते हैं?
  12. क्या धरती पर बढ़ती आबादी के हिसाब से जन्नत में हूरों की सप्लाई भी बढ़ती जाती है? पुरानी हूरों और नई हूरों को मिलाकर उनकी आबादी का एक मुकम्मल आँकड़ा पेश करें। यह भी बताएँ कि इन हूरों का लाभ अभी कुल कितने मजहबी पुरुषों को मिल रहा है? और आने वाले दस-बीस-तीस सालों में वहाँ और कितने सच्चे मुसलमानों की जगहें खाली है?
  13. हूरों की इतनी बड़ी आबादी के साथ पुरुषों को रखने के लिए जन्नत में क्या इंतजाम किए गए हैं? कोठियाँ बनी हैं, मल्टीस्टोरीज़ बिल्डिंगें बनी हैं या रेड लाइट एरिया जैसे इंतज़ाम किए गए हैं, जहाँ हूरों को छोटे-छोटे कमरों में रखा जाता है और धरती के सारे प्यासे मजहबी पुरुष बारी-बारी से वहाँ पहुँचते रहते हैं?
  14. अक्सर युद्ध और दंगे इत्यादि में जब एक साथ हजारों या लाखों लोग शहीद हो जाते हैं, तब जन्नत के दरवाज़े पर भगदड़ तो नहीं मच जाती होगी न? इतने लोगों की एक साथ जन्नत में एंट्री और सबको समय से हूरों की सप्लाई के क्या इंतजामात हैं?
  15. क्या कभी ऐसा भी होता होगा कि हूरों की सप्लाई कम होने की दशा में कुछ पुरुषों को 72 से कम हूरों के साथ ही संतोष करना पड़ता हो? ऐसी दशा में अपने हक से महरूम सच्चे मुसलमान क्या वहाँ फिर से कोई जेहाद छेड़ते होंगे?
  16. जन्नत में पुरुषों की सप्लाई तो धरती से होती है, पर हूरों की सप्लाई किस ग्रह, किस लोक, किस दुनिया से होती है?
  17. धरती पर तो कभी किसी चीज की कमी हो जाती है तो कभी किसी चीज की अधिकता हो जाती है। पर जन्नत में वे कौन-से मैन्यूफैक्चरर और सप्लायर हैं, जो हर पुरुष के लिए 72 हूरों की सप्लाई मेनटेन रख पाते हैं? कृपया जन्नत में हूरों के मैन्यूफैक्चरर और सप्लायर के बारे में विस्तार से बताएँ।
  18. मेरा ख्याल है कि जन्नत पहुँचे लोगों को 72 हूरें तो निःशुल्क ही मुहैया करा दी जाती होंगी, लेकिन अगर इन 72 के अलावा किसी 73वीं-74वीं पर उनका दिल ललचा जाए, तो वो क्या करें? क्या कुछ अतिरिक्त शुल्क इत्यादि के भुगतान से वे हूरें उन्हें दे दी जाएँगी या नहीं दी जाएँगी?
  19. अपनी-अपनी पसंद की हूरें हासिल करने के लिए जन्नत में भी जंग तो नहीं छिड़ जाती होंगी न?
  20. क्या जन्नत में हर व्यक्ति को समान संख्या में हूरें मुहैया कराई जाती हैं? पूछने का मतलब यह है जब आप जैसे बड़े ‘स्कॉलर’ वहाँ पहुँचेंगे, तो आपको भी 72 हूरें, और आपके मामूली फॉलोअर्स को भी 72 ही हूरें? यह कुछ नाइंसाफी नहीं हो जाएगी? इसी तरह, ओसामा बिन लादेन जैसे बड़े जेहादी को भी 72 हूरें और उसकी आर्मी में काम करने वाले एक छोटे जेहादी को भी 72 ही हूरें?
  21. क्या जन्नत पहुँचकर धरती के मजहबी पुरुष हूरों से संतान भी उत्पन्न करते हैं या फिर खाली टाइम पास की ही इजाजत है?
  22. जन्नत पहुँचने वाले मजहबी पुरुषों के लिए कोई कोड ऑफ कंडक्ट भी है क्या? जैसे एक बार आपने बताया था कि मजहबी पुरुष अगर अपनी बीवियों को पीटें, तो इसमें कुछ गलत नहीं है। उसी तरह जन्नत पहुँचकर वे अगर हूरों की भी पिटाई कर दें, तो कोई दिक्कत तो नहीं न?
  23. धरती की बीवियों एवं जन्नत की हूरों में क्या अंतर है? जैसे बीवी से तीन बार तलाक तलाक बोलकर छुटकारा पा सकते हैं, वैसे ही अगर कोई हूर पसंद नहीं आए, या उससे मन भर जाए, तो क्या उससे भी कोई शब्द बोलकर अलग हुआ जा सकता है? अगर हाँ, तो उस शब्द के बारे में कृपया विस्तार से बताएँ।
  24. धरती के पुरुषों को तो जेहाद और काफिरों के कत्ल इत्यादि विभिन्न मजहबी कार्यों से कमाए ‘पुण्य’ के तौर पर 72 हूरें मिलती हैं, लेकिन उन 72 हूरों को किन पापों की सजा के तौर पर एक ही पुरुष को शेयर करने का अभिशाप मिलता है? क्या अपने पिछले जन्म में उन्होंने आयतों और रवायतों का सही ढंग से पालन नहीं किया होता है?
  25. क्या जन्नत पहुँचकर धरती के मजहबी पुरुष हूरों के साथ फुल टाइम मौज-मस्तियाँ ही किया करते हैं या फिर वहाँ भी किसी तरह के मजहबी और जेहादी कार्यों में हिस्सा लेते हैं?
  26. क्या मजहबी पुरुषों की तमाम गतिविधियों का अंतिम उद्देश्य अधिक से अधिक संख्या में हूरों अर्थात् खूबसूरत स्त्रियों को भोगना ही होता है?
  27. अंतिम सवाल। क्या संक्षेप में हूरों को मजहबी पुरुषों की ‘अनंतकालीन सेक्स स्लेव’ कहा जा सकता है?

स्कॉलर श्री परम आदरणीय जाकिर साहब, जैसा कि आप भी मानेंगे कि आज दुनिया के नौजवानों के मन में सबसे ज़्यादा सवाल, जिज्ञासाएँ और ख्वाहिशें हूरों को लेकर ही हैं, इसलिए आशा है कि आप मेरे इन सवालों के यथोचित जवाब देंगे। 

सादर शुक्रिया।

डिस्क्लेमर- यह पत्र किसी धर्म का मखौल उड़ाने के लिए नहीं, बल्कि मजहब के नाम पर मासूम लोगों को गुमराह कर रहे कट्टरपंथियों की पोल खोलने के लिए लिखा गया है।

शेहला रशीद के अब्बू और मीडिया को उनके खिलाफ ‘मानहानि की सामग्री’ प्रकाशित करने पर श्रीनगर कोर्ट ने लगाई रोक

श्रीनगर की अदालत ने 21 दिसंबर को एक आदेश पारित किया। इस आदेश में जेएनयू एक्टिविस्ट शेहला रशीद के पिता को उनके जीवन में हस्तक्षेप करने से रोक लगाया गया है। इसके साथ ही मीडिया या अन्य माध्यमों को भी ऐसी सामग्री प्रकाशित करने पर रोक लगा दी गई है, जो मानहानिकारक हो, निजता के अधिकार का हनन करता हो या फिर उनके सम्मान और सम्मान के साथ जीने के अधिकार में दखल देता हो।

इसके अलावा अदालत ने मीडिया को शेहला के माता-पिता के वैवाहिक संबंध या फिर किसी भी ऐसी सामग्री को प्रकाशित करने से मना किया है जिससे उनकी माँ या बहन की बदनामी हो सकती है।

अदालत के न्यायाधीश फैयाज अहमद कुरैशी ने यह आदेश शेहला, उनकी माँ जुबेदा अख्तर और बहन आसमा रशीद द्वारा दायर एक मुकदमे में दिया। शेहला, उनकी माँ और बहन ने अपने अब्बू (पिता) अब्दुल रशीद शोरा और मीडिया के खिलाफ स्थायी निषेधाज्ञा की माँग की थी। अदालत ने मीडिया आउटलेट्स से कहा कि वे उन संबंधित ऑनलाइन लिंक को निलंबित करें जो कि मानहानि से जुड़ा है या वादी की निजता के अधिकार का उल्लंघन करता है। आदेश में कहा गया, “मीडिया भी सच्चाई का पता लगाने के लिए कानूनी कर्तव्य के तहत है और एक ऐसे मामले पर रिपोर्टिंग करने से परहेज करता है जिसमें निजता या वादी के अन्य अधिकारों के उल्लंघन की संभावना है।”

शेहला, उनकी माँ और बहन ने अदालत के सामने तर्क दिया था कि अब्दुल रशीद शोरा ने उनके खिलाफ झूठे आरोप लगाकर उनकी प्रतिष्ठा को बदनाम करने का प्रयास किया था, जिसमें उन्हें ‘राष्ट्र-विरोधी तत्व’ कहना भी शामिल था। अदालत ने कहा कि शेहला के पिता का आचरण अनुचित था और उनके पास किसी भी तरह का कोई ठोस कानूनी अधिकार नहीं था। अदालत ने कहा कि शोरा ने निजी वैवाहिक मुद्दों के बारे में प्रचार करने के इरादे से मीडिया से संपर्क किया था। अदालत ने कहा कि शोरा ने घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत पारित निचली अदालत के पिछले आदेश का उल्लंघन किया।

मामले की अगली सुनवाई 30 दिसंबर, 2020 को निर्धारित की गई है। अदालत ने अगली सुनवाई तक प्रतिवादियों को संशोधन, परिवर्तन या प्रतिबंध के आदेश को रद्द करने के लिए संपर्क करने की अनुमति दी है।

गौरतलब है कि इस महीने की शुरुआत में कश्मीरी व्यवसायी और राजनेता फिरोज पीरजादा ने शेहला के पिता के खिलाफ 10 करोड़ रुपए का मानहानि का मुकदमा दायर किया था। हाल ही में जम्मू-कश्मीर के डीजीपी को लिखे पत्र में शेहला रशीद के पिता अब्दुल रशीद शोरा ने दावा किया था कि शेहला ने कश्मीर केंद्रित राजनीति में शामिल होने के लिए ‘कुख्यात लोगों’ से 3 करोड़ रुपए नकद लिए हैं। उन्होंने माँग की थी कि फिरोज पीरजादा, जहूर वटाली (एनआईए द्वारा गिरफ्तार) और रशीद इंजीनियर के बीच के ‘रहस्यमय वित्तीय डील’ की जाँच की जाए।

पीरजादा की ओर से भेजे गए चार पेज के नोटिस में कहा गया था कि अब्दुल रशीद शोरा के आरोपों से उनके मुवक्किल (फिरोज पीरजादा) की प्रतिष्ठा को व्यापक नुकसान पहुँचा है। नोटिस में कहा गया है कि उन पर जो भी आरोप लगाए गए वह पूरी तरह आधारहीन हैं।

शोरा ने आरोप लगाया कि उन्हें शेहला ने जान से मारने की धमकी दी

इससे पहले शेहला रशीद के खिलाफ उनके पिता अब्दुल रशीद शोरा ने शिकायत दर्ज कराई थी। उनका कहना था कि बेटी शेहला उन्हें मौत की धमकी दे रही है। अब्दुल ने शेहला के खिलाफ जाँच की माँग की थी। अब्दुल शोरा के अनुसार शेहला ‘कुख्यात गतिविधियों’ में शामिल है। उन्होंने कहा था, “मेरे घर में राष्ट्र विरोधी गतिविधियाँ चल रही हैं।” अब्दुल रशीद शोरा ने जम्मू-कश्मीर के डीजीपी को अपनी शिकायत दी थी। उन्होंने शेहला की ‘कुख्यात गतिविधियों’ को उजागर करते हुए उसके बैंक अकाउंट की जाँच की माँग की थी। 

APMC एक्ट तक न लागू करने वाले केरल के CM ने भी दिया ‘किसान’ आंदोलन को खुला समर्थन

अब केरल ने भी मोदी सरकार द्वारा पारित तीन कृषि कानूनों के खिलाफ हरियाणा-दिल्ली सीमा पर कुछ कथित किसानों द्वारा किए गए विरोध प्रदर्शनों के समर्थन का फैसला किया है। बता दें कि केरल वही राज्य है जहाँ पर APMC एक्ट का कोई कानूनी फ्रेमवर्क नहीं है।

बुधवार (दिसंबर 23, 2020) को, केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने घोषणा की कि राज्य सरकार कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलनकारी किसानों के साथ एकजुटता से खड़ी है। केरल के मुख्यमंत्री ने कहा कि केंद्र को किसानों की ‘उचित माँगों’ को सुनना चाहिए क्योंकि विरोध दिन-प्रतिदिन सार्वजनिक समर्थन प्राप्त कर रहा है।

बता दें कि मोदी सरकार के खिलाफ कथित ‘किसान विरोध’ का समर्थन करने से पहले केरल में माकपा नेतृत्व वाली एलडीएफ (LDF) सरकार ने केन्द्र के नए कृषि कानूनों पर चर्चा करने के लिए 23 दिसम्बर को विधानसभा का एक विशेष सत्र बुलाने का फैसला किया था। मंत्रिमंडल ने निर्धारित सत्र से पहले कृषि कानूनों पर चर्चा करने और उसे खारिज करने के लिए इस विशेष सत्र को बुलाने का फैसला किया था।

हालाँकि, केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने तीन केंद्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ प्रस्ताव पर चर्चा एवं पारित करने के लिए राज्य विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने की मंजूरी देने से मंगलवार (दिसंबर 22, 2020) को इनकार कर दिया

विडंबना यह है कि केरल सरकार द्वारा APMC सुधारों का विरोध कर रहे किसानों के लिए तथाकथित एकजुटता का कोई मतलब नहीं है क्योंकि केरल राज्य में कोई APMC स्ट्रक्चर नहीं है, जो कि तथाकथित विरोध प्रदर्शन का मुख्य आधार है।

इन आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए केरल के मुख्यमंत्री ने कहा कि भले ही वहाँ पर APMC स्ट्रक्चर नहीं है, मगर वे प्रदर्शनकारी किसानों की माँगों का समर्थन करेंगे क्योंकि केरल एक उपभोक्ता राज्य है और अगर देश में खाद्यान्न की कमी होगी तो इसका सबसे ज्यादा असर केरल पर होगा। इसलिए वह किसान आोदंलन का समर्थन कर रहे हैं।

केरल में कोई APMC एक्ट नहीं

पंजाब के कुछ असंतुष्ट किसानों ने राष्ट्रीय राजधानी में मोदी सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने के लिए डेरा डाल रखा है, जिसकी वजह से वहाँ के नागरिकों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। इस तथाकथित विरोध प्रदर्शन ने जल्द ही राजनीतिक रुप ले लिया। विपक्षी पार्टी, वामपंथी प्रदर्शनकारी और खालिस्तानियों ने अपने निजी एजेंडे को बढ़ावा देने के लिए इस आंदोलन को हाइजैक कर लिया है।

इसी तरह, केरल भी अब इन विरोध प्रदर्शनों में शामिल हो गया है ताकि कृषि क्षेत्रों, विशेषकर APMC में सुधार करने वाले कानूनों को निरस्त किया जा सके। हालाँकि, केरल में कोई APMC सिस्टम नहीं है क्योंकि इसने 2003 की कृषि उपज विपणन समिति (एपीएमसी) अधिनियम को लागू नहीं किया है।

‘ग्रेट हिन्दू टेम्पल्स’: सोशल मीडिया में छाई भारतीय मंदिरों की भव्य तस्वीरें, कपिल मिश्रा ने भी की ट्रेंड की तारीफ

सोशल मीडिया पर लोग एक के बाद एक तस्वीरें शेयर कर के भारत के भव्य मंदिरों की सुंदरता के बारे में दुनिया को बता रहे हैं। भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने भी ‘ग्रेट हिन्दू टेम्पल्स‘ ट्रेंड की प्रशंसा की है। नीचे हम उनमें से कुछ मंदिरों की तस्वीरें आपके सामने पेश कर रहे हैं, जो लोगों ने शेयर की हैं। इसमें उत्तर से लेकर दक्षिण तक के मंदिरों को लेकर लोगों ने जानकारी साझा करते हुए उसके बारे में जानकारी दी है।

ऊपर संलग्न की गई तस्वीरों में आप कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक के कई मंदिरों की तस्वीरें देख सकते हैं। हालाँकि, इस दौरान लोगों ने उन इस्लामी आक्रान्ताओं का भी जिक्र किया, जिनके कारण इनमें से कई मंदिरों को आज हम ध्वस्त स्थिति में देखते हैं। खासकर अयोध्या, काशी और मथुरा को लेकर लोग मुखर दिखे। लेकिन, ‘ग्रेट हिन्दू टेम्पल्स’ के तहत लोग मंदिरों को लेकर गजब का उत्साह दिखा रहे हैं।

मिदनापुर में भिड़े शुभेंदु व तृणमूल समर्थक: बीजेपी का आरोप TMC के गुंडों ने किया रैली पर पथराव, कई घायल

पश्चिम बंगाल के मिदनापुर में एक बार फिर से भाजपा और तृणमूल कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं के बीच झड़प हो गई। खबरों के अनुसार आज भाजपा की ओर से इलाके में एक प्रतिवाद रैली निकाली गई थी। आरोप है कि तृणमूल कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने अचानक से इस जुलूस पर हमला कर दिया। वहीं इस झड़प में कई लोगों के गंभीर रूप से घायल होने की रिपोर्ट सामने आई है। पूरे इलाके में तनावपूर्ण स्थिति बनी हुई है, जिसको देखते हुए मौके पर भारी संख्या में पुलिस बल की तैनाती की गई है।

टाइम्स नाउ की रिपोर्ट के अनुसार, शुभेंदु अधिकारी समर्थक और भाजपा कार्यकर्ता पूर्वी मेदिनीपुर के रामनगर में एक रैली निकाल रहे थे। बीजेपी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने सत्तारूढ़ पार्टी समर्थकों की तरफ कुछ इशारे किए, जो पार्टी कार्यालय के पास इकट्ठे हुए थे। जिसके बाद घटना पूरी तरह से हिंसा में बदल गई। वहीं पुलिस ने घटना के दौरान हस्तक्षेप किया लेकिन इसके बावजूद दोनों पक्षों में पथराव जारी रहा, जिसके चलते कई लोगों को गंभीर चोंटे आई है। बीजेपी का आरोप है कि TMC के गुंडों ने रैली पर पथराव किया।

बता दें हाल में देश के गृहमंत्री अमित शाह ने पश्चिम बंगाल का दो दिन का चुनावी दौरा किया था। इस दौरान टीएमसी समेत कई राजनीतिक दलों के नेताओं ने बीजेपी ज्वाइन किया था। इसी दौरान टीएमसी के शुभेंदु अधिरकारी ने भी बीजेपी को ज्वाइन किया था। शुभेंदु ने कई बार अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता जताई थी। जिसके बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय की तरफ से उन्हें जेड कैटेगरी की सुरक्षा भी दी गई।

गौरतलब है कि इससे पहले दिसंबर 10, 2020 को दक्षिण 24 परगना में एक कार्यक्रम के लिए डायमंड हार्बर की ओर जाते वक़्त बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के काफिले पर हमला हुआ था। इस हमले में बीजेपी नेता कैलाश विजयवर्गीय की गाड़ी पर ईंट फेंकी गई थी। उन्होंने वीडियो साझा करते हुए पूरी घटना की सूचना दी थी।

इस घटना पर कैलाश विजयवर्गीय ने लिखा था, “बंगाल पुलिस को पहले ही राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के कार्यक्रम की जानकारी दी गई थी। लेकिन एक बार फिर बंगाल पुलिस नाकाम रही। सिराकोल बस स्टैंड के पास पुलिस के सामने ही TMC के गुंडों ने हमारे कार्यकर्ताओं को मारा और मेरी गाड़ी पर पथराव किया।”

बुरहान वानी के गाँव में भी हार गया गुपकार गैंग, लोगों ने काम करने और राज करने वालों में देखा फर्क: रविशंकर प्रसाद

जम्मू-कश्मीर में जिला विकास परिषद (DDC Election) के चुनाव के नतीजे सामने आने के बाद भारतीय जनता पार्टी (BJP) केंद्र शासित प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। इन चुनावों में बीजेपी को 74 सीटों पर जीत हासिल हुई है।

पार्टी की इस बड़ी जीत पर सारे भाजपा नेता खुश हैं। इसी क्रम में केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने आज (दिसंबर 23, 2020) प्रेस कॉन्फ्रेंस की और इस ऐतिहासिक जीत को जम्मू-कश्मीर की जनता, उनकी आशा और विकास की विजय बताया।

उन्होंने गुपकार गठबंधन को लेकर कहा कि ये बना इसीलिए था क्योंकि इन्हें मालूम था कि ये अकेले भाजपा को हरा नहीं पाएँगे। आज बीजेपी को एनसी, कॉन्ग्रेस और पीडीपी से ज्यादा सीट मिली हैं। उन्होंने दावा किया कि प्रदेश में जिन निर्दलीयों ने विजय हासिल की है उनमें से अधिकतर भाजपा समर्थित हैं।

घाटी में कमल खिलने पर उन्होंने कहा, “मैं पीएम मोदी, जम्मू कश्मीर के लोगों पार्टी के कार्यकर्ता और नेता सभी का अभिनंदन करता हूँ। पुलवामा में कुल 7.4 फ़ीसदी वोट पड़े, जबकि सोपोर में 23.8 फीसदी वोटिंग हुई, वहीं बांदीपोरा में 51.7 फीसदी वोटिंग हुई है।”

प्रसाद ने कहा कि भाजपा की ये जीत, पीएम मोदी ने जो कश्मीर के भविष्य के लिए सोचा था उस सोच की जीत है। उन्होंने इस बात पर गौर करवाया कि गुपकार गठबंधन को बुरहान वानी के गाँव में भी हार का सामना करना पडता है तो समझ लीजिए कि कश्मीर की हवा का रुख क्या है। उन्होंने याद दिलाया कि बुरहान वानी की मौत किस तरह इन्हीं दलों ने बड़ा मुद्दा बना दिया था।

उन्होंने जीत के आँकड़े साझा करते हुए कुछ इलाकों को चिह्नित किया और कहा कि इन इलाकों को हॉट बेड कहा जाता था। लेकिन यहाँ की जनता क्या चाहती है इसे समझना होगा। उन्होंने अनुच्छेद 370 के बाद पहली बार प्रदेश में हुए चुनावों पर कहा कि यहाँ की जनता ने पहली बार ईमानदारी से चुनाव देखे। जब फारूख अब्दुल्ला जीते थे उस समय सिर्फ 7 फीसद वोटिंग हुई थी। 

वह बोले कि जम्मू-कश्मीर की जनता ने आतंकियों को वोट के माध्यम से तमाचा मारा है। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने के बाद यहाँ के लोगों ने जमीन पर विकास देखा। कश्मीर के आवाम ने राज करने वाले और काम करने वालों के बीच अंतर को देखा। कश्मीर में पहली बार केंद्र का पैसा पंचायत में पहुँचा है।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में रविशंकर प्रसाद ने निर्दलीय उम्मीदवारों की तारीफ की और इंजीनियर एजाज को लेकर कहा कि उन्होंने जीतने के बाद जो बोला वो कश्मीर की नई आवाज है। ये कश्मीर की नई शुरूआत है। कश्मीर की जम्हूरियत नई अंगड़ाई ले रही है। लोकतंत्र आशा और उत्साह की अंगड़ाई ले रहा है।

बता दें कि इस बार डीडीसी चुनाव में 51 फीसदी वोटिंग हुई है। नतीजों से पता चला है कि इस बार भाजपा का वोट शेयर भी गुपकार गठबंधन से अच्छा है। जानकारी के मुताबिक बीजेपी का वोट शेयर 38.74 फीसदी है और गुपकार गैंग का कुल वोट शेयर 32.96 फीसदी  है। भाजपा को कुल 4,87,364 वोट मिले और एनसी, पीडीपी तथा कांग्रेस का कुल वोट मिलाकर 4,77,000 है, जो भाजपा के वोट से काफी कम है। 

‘कृषि कानून के समर्थन में किसानों की महारैली देख कॉन्ग्रेसियों और दलालों को पीड़ा होना स्वाभाविक’: वीडियो वायरल

कृषि कानून के विरोध में आंदोलन कर रहे किसान अब भी सरकार से वार्ता करके मामले को सुलझाने के पक्ष में नहीं है। लगभग हर विरोधी पार्टी केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ किसानों की माँग का समर्थन कर रही है। ऐसी स्थिति में जब आंदोलन पर बैठा कोई किसान नेता सरकार की सुनने को तैयार नहीं है, उस समय दूसरी जगहों से कुछ अलग तस्वीर सामने आई है। इनमें देख सकते हैं कि सैंकड़ों किसान इन्हीं कृषि कानूनों से खुश होकर इसके पक्ष में रैली निकाल रहे हैं।

इन रैलियों की वीडियो भी सोशल मीडिया पर तेजी से शेयर की जा रही है। वीडियो में हम देख सकते हैं कि हजारों ट्रैक्टरों-ट्रकों के साथ ये रैली निकाली गई है। कई किसान इस रैली में मौजूद हैं।

भाजपा नेता स्वतंत्र देव सिंह इस पर लिखते हैं, “दशकों पुरानी माँग पूरी होने की खुशी में किसानों ने मेरठ से गाजियाबाद तक हज़ारों ट्रैक्टरों पर सवार हो कर कृषि बिल के समर्थन में रैली निकाली है। (यह वीडियो देख कर कॉन्ग्रेसियों और दलालों को पीड़ा होना स्वाभाविक है।)”

बता दें कि कृषि कानून के समर्थन में किसानों का ऐसा सैलाब सड़कों पर रविवार को देखने को मिला था। हिंद मजदूर किसान समिति के बैनर तले सैकड़ों किसानों ने कृषि कानून के समर्थन में रैली निकाली थी और ट्रैक्टर ट्रालियों व अन्य वाहनों से दिल्ली की ओर कूच किया था। इस दौरान रैली में शामिल वाहनों में देशभक्ति गीत बज रहे थे। 

वाहनों पर लगे बैनरों में दलालों से छुटकारा, किसान कानून हमारा, जैसे स्लोगन लिखे थे। ये किसान अपने काफिले की निगरानी खुद ड्रोन से कर रहे थे। कुछ ट्रैक्टर पर भी ड्रोन कैमरे लगे थे। जानकारी के मुताबिक इस रैली में सैकड़ों वाहनों से हजारों किसान गाजियाबाद पहुँचे थे, जिन्होंने रामलीला मैदान में सभा की।

उल्लेखनीय है कि यूपी सीएम लगातार कृषि कानून के ख़िलाफ़ भ्रामक प्रचार करने वालों को आगाह कर रहे हैं। सीएम योगी आदित्यनाथ जन-जन तक पहुँचकर किसानों को इस बिल के प्रति आश्वस्त कर रहे हैं। वह किसानों को जानकारी दे रहे हैं कि 2022 तक पीएम मोदी किसानों की आय दोगुना करने के प्रयास में लगे हुए हैं।

भदोही के भाजपा नेता राहुल चतुर्वेदी ने भी ट्विटर पर जानकारी दी है कि जंगीगंज भदोही में कृषि कानून के समर्थन में विशाल जनसभा व रैली की गई है। वहाँ विपक्षियों द्वारा बरगलाए लाए जा रहे कुछ किसान भाइयों को कृषि कानून के फायदे गिनाते हुए सभा को संबोधित किया गया है।

इसी तरह भारत देशम नाम के ट्विटर पर 22 दिसंबर को किए गए ट्वीट के मुताबिक साउथ दिल्ली कालकाजी, तुगलकाबाद, संगम विहार, देवली विधानसभा क्षेत्र में क्षेत्रीय सांसद रमेश बिधूड़ी के नेतृत्व में विशाल रैली निकाली गई। लोगों ने इस बिल को किसान हित में बताया।

खेत में काम करने गई 13 साल की दलित लड़की से गैंगरेप: आरोपित रेहान, तस्लीम, दानिश और अब्दुल गिरफ्तार

हापुड़ जिले के गढ़मुक्तेश्वर थाना क्षेत्र में शनिवार को 13 साल की दलित लड़की से गैंगरेप का मामला सामने आया है। घटना के समय लड़की अपनी दादी के साथ खेत में काम कर रही थी। कथिततौर पर उसी दौरान 4 लड़के उसे घसीट कर पास के खेत में ले गए और गैंगरेप किया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पड़ोस के गाँव के रहने वाले रेहान, तस्लीम, दानिश और अब्दुल दलित नाबालिग लड़की को पास के खेत में घसीट कर के गए और बेरहमी से उसका सामूहिक बलात्कार किया। इस दौरान लड़की ने अपने बचाव में काफी हाथ पैर मारे, चीखी चिल्लाई। लड़की के शोर मचाते ही चारों युवक वहाँ से भाग निकले। हालाँकि, चीख पुकार सुन घटना स्थल पर पहुँचे पीड़िता के भाई ने चारों आरोपितों को देख लिया और उनके गाँव तक पीछा किया।

रिपोर्ट के अनुसार, नाबालिग पीड़िता को घटनास्थल से बेहोशी की हालत में घर लाया गया। जिसके बाद मेडिकल जाँच में उसके साथ हुए बलात्कार और यौन उत्पीड़न की पुष्टि हुई।

पुलिस को मामले की जानकारी देते हुए परिजनों ने चारों आरोपितों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। पिता की शिकायत के आधार पर पुलिस ने मामले में आईपीसी की धारा 376-डी (सामूहिक बलात्कार), एससी / एसटी और पीओसीएसओ अधिनियम की धाराओं के तहत चार आरोपितों के खिलाफ मामला दर्ज किया। वहीं मामला अनुसूचित जाति (एससी) समुदाय से जुड़ा होने की वजह से परिजनों को पुलिस सुरक्षा भी दी गई है।

वहीं मामले को तुरंत संज्ञान में लेते हुए पुलिस ने चारों आरोपितों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। चूँकि, सभी आरोपित मुस्लिम समुदाय से है, इसलिए इलाके में तनावपूर्ण स्थिति बनी हुई है।

मामले की गंभीरता को देखते हुए रविवार की रात एडीएम जयनाथ यादव और एएसपी सर्वेश मिश्रा ने घटना स्थल का निरीक्षण किया और पीड़िता के घर पहुँचकर, परिजनों को सांत्वना देते हुए जल्द न्याय दिलाने का भरोसा दिया। एसएसपी सर्वेश कुमार मिश्रा ने बताया कि आरोपितों ने अपना गुनाह भी कबूल कर लिया है। मामले में जल्द ही चार्जशीट दाखिल करते हुए पीड़िता को न्याय दिलाया जाएगा। पीड़ित परिवार को सरकारी प्रावधानों के अनुसार भी आर्थिक सहायता मुहैया कराई जाएगी।

वहीं गढ़मुक्तेश्वर के भाजपा विधायक कमल मलिक के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने भी पीड़ित परिजनों से मिलकर मामले में तेजी से कार्रवाई का आश्वासन दिया है।

‘भले उसमें सूअर का माँस हो, फिर भी कबूल है कोरोना वैक्सीन’: अरब के सर्वोच्च इस्लामी संगठन ने जारी किया फतवा

UAE के फतवा काउंसिल ने कहा है कि मुस्लिमों के लिए कोरोना वैक्सीन लेना हराम नहीं है, भले ही उसमें सूअर का माँस (Pork) ही क्यों न हो। ये संयुक्त अरब अमीरात की सर्वोच्च इस्लामी संगठन है। संस्था ने कहा है कि अगर कोरोना वैक्सीन में पोर्क जेलेटिन हो, फिर भी मुस्लिम इसका प्रयोग कर सकते हैं। अब तक ये बहस चल रही थी कि कोरोना वैक्सीन में पोर्क होने की स्थिति में मुस्लिमों को इसे लेने की अनुमति है या नहीं।

UAE की फतवा काउंसिल के अध्यक्ष शेख अब्दुल्लाह बिन बयाह ने कहा कि आज की तारीख में मनुष्य के शरीर को बचाने की जिम्मेदारी सर्वोपरि है, इसीलिए कोरोना वैक्सीन में सूअर का माँस या उससे जुड़ा कोई कंटेंट होने की स्थिति में भी इसे लिया जा सकता है। उन्होंने कहा कि ये इस्लाम के अंतर्गत आने वाले प्रतिबंधों के तहत नहीं आएगा। इस पर इस्लामी नियम-कायदे लागू नहीं होंगे। अभी मनुष्यता को बचाने की जरूरत है।

फतवा काउंसिल ने आगे कहा कि इस मामले में पोर्क जेलेटिन को दवा के रूप में देखा जाना चाहिए, किसी भोजन के रूप में नहीं। काउंसिल ने कहा कि कोरोना के कई वैक्सीन सामने आए हैं, जो दुनिया पर आई इस आपदा से मनुष्यता को बचाने का प्रयास करेंगे। कहा जा रहा है कि मुस्लिम समाज कहीं कोरोना वैक्सीन लेने से इनकार न कर दे, इसी खतरे के कारण फतवा काउंसिल ने ये व्यवस्था जारी की है।

हालाँकि, संस्था ने ये भी कहा कि अगर किसी के पास के के पास कोई अन्य विकल्प मौजूद है, तो फिर उसे सूअर का माँस वाला कोरोना वैक्सीन लेने से बचने का प्रयास किया जाना चाहिए। लेकिन किसी व्यक्ति के पास कोई अन्य विकल्प न हो तो फिर इस्लाम के नियम-कायदों को किनारे रखा जा सकता है। UAE सरकार ने उम्मीद जताई है कि इसके बाद इसे लेकर फैल रहे भ्रम को दूर किया जा सकेगा और आम राय बनेगी।

वैक्सीन निर्माता कम्पनी फाइजर, मॉडर्न, और एस्ट्राजेनेका के प्रवक्ताओं ने कहा है कि उनके COVID-19 टीकों में सूअर के माँस से बने उत्पादों का इस्तेमाल नहीं किया गया है। लेकिन कई कंपनियाँ ऐसी हैं, जिन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया है कि उनके द्वारा विकसित की जा रही वैक्सीन में सूअर के माँस से बने उत्पादों का इस्तेमाल किया गया है या नहीं। ऐसे में इंडोनेशिया जैसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाले देशों में चिंता फ़ैल गई है।

उधर हाल ही में एक खबर भी सामने आई थी, जिसमें बताया जा रहा था कि मुस्लिम देश कोरोना वैक्सीन के लिए हलाल सर्टिफिकेट की माँग कर रहे हैं। फाइजर, मॉडर्न और एस्ट्राजेनेका के प्रवक्ताओं ने कहा है कि पोर्क उत्पाद उनके कोरोनावायरस टीकों का एक घटक नहीं हैं। लेकिन ऐसे हालातों में मिलियन डॉलर के व्यवसाय और सीमित आपूर्ति के बीच इंडोनेशिया जैसे कुछ मुस्लिम देशों को ऐसे टीके मिलेंगे, जो अभी तक जिलेटिन मुक्त होने के लिए प्रमाणित नहीं हैं।