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फ्री कश्मीर का बैनर लहराई थी महक मिर्जा, मुंबई पुलिस ने कहा – ‘बंद हो केस, दुर्भावनापूर्ण उद्देश्य नहीं था’

मुंबई पुलिस ने अपनी चार्जशीट में 39 वर्षीय महक मिर्जा प्रभु के खिलाफ केस बंद करने की माँग की है, जिसने गेटवे ऑफ इंडिया पर ‘फ्री कश्मीर’ लिखा बैनर लहराया था। JNU में नकाबपोश वामपंथी छात्रों ने हॉस्टल में घुस-घुस कर ABVP के छात्रों की पिटाई की थी, लेकिन देश भर में इसका उलटा नैरेटिव ही फैलाया गया था। फिर उलटा भाजपा के विरोध में ही कई शहरों में वामपंथियों ने विरोध प्रदर्शन आयोजित किए।

मुंबई में आयोजित इसी विरोध प्रदर्शन में महक मिर्जा ने ‘फ्री कश्मीर’ लिखा बैनर लहराया था, जबकि जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और पाकिस्तान ने उसके एक हिस्से पर जबरन कब्ज़ा कर के रखा हुआ है। एस्प्लेनेड अदालत में पेश की गई रिपोर्ट में मुंबई पुलिस ने कहा है कि महक मिर्जा के खिलाफ लगाए गए आरोप सही नहीं हैं। सोमवार को पुलिस ने 36 आरोपितों के खिलाफ चार्जशीट दायर की और कहा कि लगाए गए आरोप सही नहीं हैं।

इनमें से अधिकतर वकील, कार्यकर्ता, छात्र, कलाकार और शिक्षाविद हैं। 5-6 जनवरी, 2020 को आयोजित इस प्रदर्शन में केंद्र सरकार द्वारा लाए गए कानून CAA के साथ-साथ उस NRC के खिलाफ भी विरोध प्रदर्शन हुआ, जो अभी असम से बाहर कहीं लागू ही नहीं हुआ है। साथ ही जनगणना से पहले होने वाले नियमित NPR को लेकर भी भ्रम फैलाया गया। 36 में से 29 आरोपितों को 10,000 रुपए के मुचलके पर जमानत दे दी गई।

ये सभी अदालत में उपस्थित भी हुए थे। जनवरी 7, 2020 को महक मिर्जा के खिलाफ IPC की धारा 153B (भारत की प्रभुता और अखंडता की मर्यादा के विरुद्ध कुछ प्रकाशित करना) के तहत मामला दर्ज किया गया था। जाँच रिपोर्ट में मुंबई पुलिस ने कहा कि उसे आरोपित के खिलाफ दुर्भावनापूर्ण उद्देश्य के कोई सबूत नहीं मिले, ऐसे में उन्हें बरी कर दिया जाए।

वकील मिहिर देसाई, लारा जेसानी, और सुजान अब्राहम, पत्रकार जतिन देसाई और कार्यकर्ता सुवर्णा साल्वे, सलीम साबुवाला और फिरोज मीठीबोरवाला का नाम भी इस चार्जशीट में शामिल है, जिन पर IPC की धारा 143 (गैरकानूनी तरीके से जमा होना) और महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम के तहत मामले दर्ज हैं। पुलिस का कहना है कि इन लोगों ने अनुमति के बिना गेटवे ऑफ इंडिया पर विरोध प्रदर्शन किया, जबकि आज़ाद मैदान में ऐसा किया जा सकता था।

मुंबई पुलिस ने माना कि इस विरोध प्रदर्शन में दिल्ली पुलिस, ABVP, CAA, और NPR के खिलाफ नारेबाजी की और पीएम मोदी व केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ भी नारे लगाए। अगर महक मिर्जा प्रभु पर आरोप साबित हो जाते तो उसे 5 वर्षों तक की सजा दी जा सकती थी। हालाँकि, अब अदालत के हाथ में है कि वो पुलिस की इस रिपोर्ट को स्वीकार या अस्वीकार करे। ‘फ्री प्लाकार्ड’ मामले में सोशल मीडिया पर आम लोगों ने भी आक्रोश जताया था।

सामना के एग्जीक्यूटिव संपादक संजय राउत ने तब ‘फ्री कश्मीर’ बैनर का बचाव करते हुए कहा था कि जिन्होंने यह बैनर थामा था, उनका मकसद कश्मीर में फ्री इंटरनेट, फ्री मोबाइल सर्विसेज और अन्य प्रतिबंधों से है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रहे देवेंद्र फडणवीस ने भी इसके खिलाफ आवाज़ उठाते हुए कहा था कि उद्धव ठाकरे अपनी नाक के नीचे फ्री कश्मीर एंटी इंडियन कैंपेन को बर्दाश्त कर रहे हैं।

‘मुझ पर पेशाब फेंका, रात में बाहर रखा… बहन के लिए डरता था’: पादरी के कैंप में प्रताड़ना झेल चुके युवक की आपबीती

अमेरिकन पादरी व जॉर्जिया डेमोक्रेटिक सीनेट के राजनेता रेव रैफेल वार्नोक (Rev. Raphael Warnock) द्वारा संचालित चर्च कैंप में 18 साल पहले (साल 2002) 12 साल के एक बच्चे के साथ दुर्व्यव्हार करने का मामला प्रकाश में आया है। एंथनी वॉशिंगटन नाम का वह लड़का आज 30 साल का हो चुका है। उसने वॉशिंगटन फ्री बिकॉन (Washington Free Beacon) को दिए इंटरव्यू में अमेरिकन नेता व चर्च पादरी रेव रैफल वार्नोक के कैंप को लेकर कई खुलासे किए।

एंथनी ने रेव रैफेल की देखरेख में चलाए जा रहे कैंप के बारे में बताया कि वहाँ साल 2002 में उसके ऊपर कैंप काउंसलर ने पेशाब कर दिया था और बाद में उसे कैबिन में बंद करके रात भर रखा गया था। वॉशिंगटन आपबीती सुनाते हुए कहते हैं कि एक शाम अपना बिस्तर गीला करने के कारण वार्नोक के कैंप में उन्हें पूरी रात बाहर सोने को मजबूर किया गया। वो भी बिना तकिया, कंबल या किसी अन्य चीज के, जिससे उसे गर्माहट मिले।

पीड़ित लड़के के मुताबिक चर्च के कैंप में हुई गलती के कारण उसे टेंट में घुसने नहीं दिया जा रहा था, जबकि बाहर एकदम रात हो गई थी। भयावह रात के बारे में बात करते हुए वॉशिंगटन कहते हैं कि उनके सामने एक बास्केट बॉल के अलावा कुछ भी नहीं था। काउंसलर ने उसे अंदर घुसने से साफ मना कर दिया था।

लड़के के मुताबिक काउंसलर ने उस समय उनके ऊपर बाल्टी में बचा हुआ पेशाब भी फेंका, जो आमतौर पर बाथरूम न जा पाने के कारण लड़के इस्तेमाल करते थे। वॉशिंगटन ने अपनी बात को जारी रखते हुए बताया कि उसने काउंसलर को बच्चे पकड़ते भी देखा, लेकिन आगे बताते-बताते वह बिलकुल चुप हो गए और बस यही बता पाए कि उन्हें अपने व अपनी बहन के लिए डर लगता था।

सबसे हैरानी की बात पीड़ित ने यह बताई कि रैफेल द्वारा मैरीलैंड में चलाए जा रहे इस कैंप में बच्चों के अभिभावकों को जाने की अनुमति नहीं थी। लेकिन, लगातार प्रताड़ना झेलने के बाद वह किसी तरह अपनी माँ को कहीं से फोन कर पाए और उनकी माँ ने पुलिस को संपर्क किया। इसके बाद पीड़िता के अनुसार, जब पुलिस आकर काउंसलर से पूछताछ करने लगी तो रैफेल ने उसमें हस्तक्षेप करने का प्रयास किया, जिसके कारण पुलिस ने उन्हें अरेस्ट भी किया। मगर बाद में इस मिसकम्युनिकेशन कह दिया गया।

बता दें कि साल 2005 के बाद से अटलांटा के एबेनेज़र बैपटिस्ट चर्च के पादरी वार्नोक, पहले बाल्टीमोर चर्च के पादरी के रूप में 5 साल तक काम कर चुके थे। उसी चर्च के शिविर पर अब दुर्व्यव्हार के आरोप लगे हैं। इसके अलावा इस चर्च द्वारा करवाए जा रहे कैंप के बंद होने का कारण भी वहाँ बरती जा रही स्वास्थ्य संबंधी असावधानियाँ थीं, जिसे देखते हुए साल 2003 में मैरीलैंड के स्वास्थ्य विभाग ने कैंप को आयोजित करने से मना किया था। उन्होंने इस फैसले के पीछे एक कारण बाल शोषण भी बताया था।

विदेशी मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, इन इल्जामों पर अभी वार्नोक के प्रवक्ता की ओर से स्पष्ट टिप्पणी नहीं आई है। हालाँकि, पहले कि बात करें तो इस घटना पर उनकी ओर से कहा गया था, “यह बहुत दुर्भाग्य की बात है कि हमारे बच्चों को अपने पादरी को गिरफ्तार होते देखना पड़ा। मेरी चिंता का विषय सिर्फ काउंसलर की उपस्थिति से था। हमने पड़ताल में पूरा सहयोग किया था। हमारे पास छिपाने के लिए कुछ नहीं था।”

संजय राउत की बीवी नहीं पेश होंगी ED के सामने, 5 जनवरी तक का माँगा समय

शिवसेना सांसद संजय राउत की पत्नी प्रवर्तन निदेशालय के सामने आज (दिसंबर 29, 2020) पेश नहीं होंगी। समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार, उन्होंने केंद्रीय जाँच एजेंसी से 5 जनवरी तक का समय माँगा है। इससे पहले खबर थी कि मनी लॉन्ड्रिंग मामले में उन्हें 10:30 बजे अधिकारियों के समक्ष पेश होना था। मगर, अब उन्होंने इससे मना कर दिया।

बता दें कि संजय राउत की पत्नी से पूछताछ के संबंध में ईडी ने तीसरा समन जारी किया था। इससे पूर्व भी वो दो दफा स्वास्थ्य आधार पर जाँच एजेंसी के समक्ष पेश नहीं हुईं थीं। इस मामले को लेकर उनके पति व शिवसेना नेता संजय राउत ने आरोप लगाया था, बीजेपी महाराष्ट्र सरकार को गिराने के लिए ईडी का इस्तेमाल कर रही है। वहीं ईडी की नोटिस पर भड़के शिवसैनिकों ने मुंबई के कोलाबा में ईडी दफ्तर के सामने भाजपा प्रदेश कार्यालय का पोस्टर लगाया और शिवसेना भवन के सामने मोदी सरकार के खिलाफ नारेबाजी की।

ईडी संजय राउत की पत्नी वर्षा से क्यों पूछताछ करना चाहती है?

उल्लेखनीय है कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने शिवसेना के वरिष्ठ नेता संजय राउत की पत्नी वर्षा को पंजाब और महाराष्ट्र सहकारी बैंक (PMC) घोटाला मामले में जाँच में शामिल होने के लिए समन जारी किया था। इस समन में उन्हें आज यानी 29 दिसंबर को पेश होने के लिए कहा गया था। रिपोर्ट्स में बताया गया था कि प्रवीण राउत नाम के एक अन्य आरोपित की पत्नी के साथ वर्षा राउत का 50 लाख रुपए का लेन-देन संदेह के घेरे में है।

संजय राउत के नजदीकी प्रवीण राउत को कुछ दिन पहले ईडी ने गिरफ्तार किया था। जिसके बाद बताया गया कि प्रवीण राउत के अकाउंट से कुछ ट्रांजेक्शन वर्षा राउत के अकाउंट में हुआ। अब इसी संबंध में ईडी जानकारी जुटाना चाह रही है। प्रवर्तन निदेशालय जानना चाहती है कि ये ट्रांजेक्शन कैसे हुआ है और इसके पीछे का कारण क्या है? पूरी जानकारी जुटाने के लिए ही वर्षा राउत को समन किया गया था। मगर उन्होंने इस बार पेश होने की बजाय आगे का समय माँग लिया।

क्या है PMC बैंक का पूरा मामला?

पिछले साल सितंबर में रिजर्व बैंक को पंजाब एंड महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव बैंक (पीएमसी) में हो रहे कथित घोटाले का पता चला था। इसके बाद आरबीआई ने बैंक से पैसे की निकासी पर सीमा लगा दी थी। भारतीय रिज़र्व बैंक को पता चला था कि पीएमसी बैंक मुंबई के एक रियल इस्टेट डेवलेपर को क़रीब 6500 करोड़ रूपए ऋण देने के लिए नकली बैंक खातों का उपयोग कर रहा है।

जिन डिप्टी स्पीकर को कॉन्ग्रेसी विधायकों ने कुर्सी से खींच धक्का-मुक्की की, उनका शव कर्नाटक में रेलवे ट्रैक पर

कर्नाटक में राज्य विधान परिषद के उपाध्यक्ष और जेडीएस के नेता एसएल धर्मगौड़ा (SL Dharmegowda) का शव मंगलवार (दिसंबर 29, 2020) को कदूर के रेलवे ट्रैक के पास मिला। खबरों में उनकी मौत को आत्महत्या बताया जा रहा है। उनके शव के पास एक पत्र भी मिला है। कथित तौर पर उन्होंने ट्रेन के आगे आकर आत्महत्या की।

जानकारी के मुताबिक, सोमवार (दिसंबर 28, 2020) शाम करीब 7 बजे धर्मगौड़ा अपनी कार में अकेले निकले थे। लेकिन जब वह देर रात तक घर नहीं लौट, तो परिवार ने उनकी खोजबीन शुरू की और बाद में उनकी गुमशुदगी की सूचना पुलिस को दी गई। बहुत प्रयास के बाद जब आसपास तलाशने पर उनका कोई सुराग नहीं मिला, तो पुलिस रेलवे ट्रैक के पास गई, जहाँ उनका शव पड़ा दिखा। इसके बाद शव को जाँच के लिए शिमोंगा के सरकारी अस्पताल भेजा गया। आईजीपी का कहना है कि इस मामले में पड़ताल हो रही है। एक सुसाइड नोट मिला है लेकिन इसमें क्या लिखा है, ये अभी नहीं बता सकते।

राज्य विधान परिषद के उपाध्यक्ष की मृत्यु के बाद पूर्व प्रधानमंत्री और जेडीएस नेता एचडी देवगौड़ा ने दुख जताया है। उन्होंने कहा, “राज्य विधान परिषद के सभापति और जेडीएस नेता एसएल धर्मगौड़ा की आत्महत्या की खबर जानकर हैरान हूँ। वह एक शांत और सभ्य व्यक्ति थे। यह राज्य के लिए नुकसान है।”

गौरतलब है कि एसएल धर्मगौड़ा अभी हाल में काफी सुर्खियों में भी आए थे। उन्हें विधान परिषद के सत्र के दौरान कॉन्ग्रेस के सदस्यों ने जबरन कुर्सी से हटा दिया था। कॉन्ग्रेस वहाँ गोरक्षा कानून का विरोध कर रही थी और इसके ख़िलाफ़ वोटिंग के लिए उन्होंने व्हीप भी जारी किया था। लेकिन जब विधानसभा शुरू हुई तो कॉन्ग्रेस के सदस्य कुर्सी पर उपाध्यक्ष को देख कर भड़क गए।

कॉन्ग्रेस एमएलसी प्रकाश राठौड़ ने इस दौरान कहा था कि बीजेपी और जेडीएस ने डिप्टी चेयरमैन को गैरकानूनी तरीके से चेयरमैन की कुर्सी पर बैठाया, जबकि सदन ऑर्डर में नहीं था। कॉन्ग्रेस ने उन्हें चेयर से नीचे उतरने को कहा और उन्हें बेदखल करना पड़ा क्योंकि यह एक अवैध बैठक थी।

80% सीटों पर BJP की जीत: अरुणाचल के स्थानीय चुनावों में रचा इतिहास, निर्दलीय दूसरे नंबर पर, बाकी पार्टियाँ फुस्स

भारतीय जनता पार्टी ने (BJP) अरुणाचल प्रदेश में हुए स्थानीय निकाय के चुनावों में कमाल का प्रदर्शन किया है। भाजपा ने न सिर्फ कॉन्ग्रेस, बल्कि उत्तर-पूर्व की स्थानीय राजनीतिक दलों को भी पटखनी देकर इतिहास रच दिया। पंचायत और जिला परिषद स्तर पर भाजपा को मिली बड़ी सफलता 2019 की याद दिला गई। तब राज्य में हुए विधानसभा चुनावों में भी भाजपा ने 60 में से 41 सीटें और 50.86% वोट शेयर पाकर सरकार बनाई थी।

पासीघाट म्युनिसिपल काउंसिल की बात करें तो यहाँ BJP ने 8 में से 6 सीटें जीतीं और कॉन्ग्रेस मात्र 2 पर सिमट कर रह गई। वहीं ईटानगर म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन में भाजपा ने 20 में से 10 सीटें जीत ली और दूसरे नंबर पर 9 सीटों के साथ जदयू रही। कोर्नाड संगमा की NPP को 1 सीट मिली, जो मेघालय में भाजपा की सहयोगी पार्टी है। पासीघाट और ईटानगर में भाजपा की जीत से अरुणाचल के बड़े शहरों में उसकी पैठ का पता चलता है।

वहीं अगर ग्रामीण इलाकों की बात करें तो जिला परिषद की 237 सीटों में से भाजपा ने 187 सीटें जीतीं। भाजपा ने जिला परिषद की 78.9% सीटें जीत लीं। दूसरी पार्टियों का प्रदर्शन इतना बुरा रहा कि 22 सीटों के साथ निर्दलीय ने ये स्थान काबिज किया। जदयू को जिला परिषद में 10 और कॉन्ग्रेस को 9 सीटों पर कामयाबी मिली। वहीं NPP ने भी 6 सीटें जीती। कुल मिला कर भाजपा का यहाँ एकतरफा दबदबा रहा।

जहाँ तक ग्राम पंचायत की बात है, उसमें भाजपा को जिला परिषद से भी बड़ी सफलता मिली। भाजपा ने ग्राम पंचायत सदस्यों की 79.48% सीटों को अपने नाम किया। भाजपा ने 8125 कुल सीटों में से 6458 को जीत कर इतिहास रच दिया। ग्राम पंचायत में भी 974 सीटों के साथ निर्दलीय दूसरे स्थान पर रहे। कॉन्ग्रेस को 328 तो NPP को 238 सीटें प्राप्त हुईं। जदयू ने भी 121 सीटें जीत कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

कुल मिला कर देखें तो पूरे स्थानीय निकाय चुनावों में अरुणाचल प्रदेश में भाजपा ने कुल 8390 सीटों में से 6661 को जीत कर एकतरफा दबदबा कायम किया और राज्य में अपनी स्थिति पूरी तरह मजबूत कर ली। 79.39% सीटों पर जीत को मुख्यमंत्री पेमा खांडू के परफॉरमेंस पर जनता के मुहर के रूप में भी देखा जा रहा है। सीएम खांडू ने इसे मोदी सरकार के कामकाज का नतीजा बताया है और जनता का धन्यवाद किया है।

अब अरुणाचल प्रदेश की विधानसभा में भी जदयू के 6 विधायकों के भाजपा में शामिल होने के बाद पार्टी के विधायकों की संख्या 48 हो गई है। इसके 1 दिन बाद ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद छोड़ दिया और उनकी जगह उनके ही विश्वस्त आरसीपी सिंह को जनता दल यूनाइटेड (जदयू) का नया अध्यक्ष चुना गया। अरुणाचल की राजनीति का असर बिहार में भी देखने को मिल रहा है।

‘अडानी रेलवे… अब रेलवे निजी संपत्ति है’: पुणे जंक्शन का टिकट वायरल, PM मोदी ने अडानी को बेच दी भारतीय रेलवे?

भारत में अक्सर विपक्षी दल भाजपा की केंद्र सरकार को देश के दिग्गज उद्योगपतियों अंबानी और अडानी से जोड़ते रहते हैं। इस पीएम नरेंद्र मोदी के साथ उनकी तस्वीरें शेयर की जाती है और लोगों को भड़काने के लिए तरह-तरह की बातें की जाती हैं। अब सोशल मीडिया पर पुणे जंक्शन का एक टिकट शेयर किया जा रहा है, जिसके साथ दावा किया जा रहा है कि पीएम मोदी ने भारतीय रेलवे को अडानी को बेच दिया है।

रेलवे अडानी की निजी संपत्ति हो गई है?

राज प्रीत नामक फेसबुक यूजर ने इस तस्वीर को शेयर किया, जिसमें टिकट पर लिखा नजर आ रहा है – “अडानी रेलवे; रेलवे अब हमारी निजी संपत्ति है”। साथ ही इस पर अगस्त 6, 2020 की तारीख भी अंकित की गई है। इस तस्वीर को शेयर करते हुए दावा किया जा रहा है कि सरकार ने अडानी को भारतीय रेलवे को बेच दिया है। साथ ही ये भी कहा जा रहा है कि अडानी ने रेलवे टिकटों के दाम भी काफी बढ़ा दिए हैं।

बता दें कि ये दावा पूरी तरह फेक है, क्योंकि देश के किसी भी हिस्से में कोई भी रेलवे स्टेशन या कोई भी ट्रेन किसी भी अन्य कंपनी को ‘बेची’ नहीं गई है। इसीलिए, ये दावा झूठा है। असली टिकट की तस्वीर के ऊपर अडानी का नाम लिख कर उसे रेलवे की निजी संपत्ति बताते हुए एडिट किया गया है और फिर उसे किसी ने भ्रम फैलाने के लिए सोशल मीडिया पर शेयर कर दिया। ये दावा वैसे पहली बार वायरल नहीं हो रहा।

अगस्त 2020 में पत्रकार प्रशांत कनौजिया ने भी पुणे जंक्शन पर टिकट के दाम बढ़ाए जाने की बात लिखी थी, जिस पर जवाब देते हुए भारतीय रेलवे ने लिखा था – “पुणे जंक्शन द्वारा प्लेटफार्म टिकट का मूल्य ₹50 रखने का उद्देश्य अनावश्यक रूप से स्टेशन पर आने वालों पर रोक लगाना है, जिस से सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया जा सके। रेलवे प्लेटफॉर्म टिकट की दरों को कोरोना महामारी के शुरुआती दिनों से ही इसी प्रकार नियंत्रित करता आया है।”

अडानी सहित 15 ऐसी कंपनियाँ हैं, जिन्हें भारत में कंटेनर ट्रेन्स के ऑपरेशन की अनुमति मिली हुई है, इसीलिए उन कंटेनर ट्रेन्स की तस्वीरें और वीडियो शेयर कर के भी दावा किया जा रहा है कि भारतीय रेलवे अडानी चला रहा है। ‘General-Purpose Wagon Investment Scheme’ के तहत टाटा जैसे कंपनियों को भी कोयला और मिनरल्स ढोने की अनुमति है। लेकिन, इन ट्रेनों का भी नियंत्रण और रेगुलेशन पूर्णरूपेण भारतीय रेलवे के हाथ में है।

विपक्षी दलों द्वारा ऐसे ही भ्रम फैलाने का नतीजा है कि पंजाब के किसान रिलायंस जियो की दूरसंचार आपूर्ति सेवाओं को बाधित कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो शेयर किए जा रहे हैं, जिनमें लोगों को कियो टॉवर की बिजली सप्लाई को बंद करते देखा जा सकता है। रिलायंस के पेट्रोल पम्प और रिटेल स्टोर के बाहर विरोध प्रदर्शन के बाद, पंजाब में किसानों ने अब राज्य के कई हिस्सों में दूरसंचार कंपनी की सेवाओं को बाधित करने के लिए रिलायंस Jio मोबाइल टावरों की बिजली आपूर्ति बंद कर दी है।

बेटे को गोविंदा बनाने निकले थे, डेविड धवन की Coolie No 1 बन गई दूसरी सबसे ज्यादा खराब रेटिंग वाली फिल्म

वरुण धवन और सारा अली खान अभिनीत फिल्म ‘Coolie No 1’ को रेटिंग के मामले में गहरा धक्का लगा है। विश्लेषकों में चर्चा थी कि 90 के दशक के सुपरस्टार गोविंदा से दुश्मनी मोल लेने के बाद फिल्म निर्देशक डेविड धवन अपने बेटे को गोविंदा बनाना चाहते थे, लेकिन फिलहाल IMDb पर 10 में से 1.3 की रेटिंग के साथ ही ऑल टाइम वर्स्ट फिल्मों की सूची में आ गई है। फिल्म को दर्शकों ने पूरी तरह नकार दिया है।

इससे पहले जून 2018 में आई सलमान खान की ‘रेस 3’ को IMDb पर 1.9 रेटिंग मिली थी। उससे भी पहली मार्च 2013 में रिलीज हुई अजय देवगन की ‘हिम्मतवाला’ को काफी खराब रेटिंग मिली थी। उसे 10 में से मात्र 1.7 रेटिंग ही मिल पाई थी। ‘Coolie No. 1’ को OTT वीडियो प्लेटफ़ॉर्म अमेजन प्राइम पर इस शुक्रवार (दिसम्बर 25, 2020) को क्रिसमस के मौके पर रिलीज किया गया था। फिल्म बुरी तरह फ्लॉप हो गई है।

वहीं अगर जून 1995 मे आई गोविंदा की ‘Coolie No 1’ की बात करें तो IMDb पर उसकी रेटिंग 6.3 है, जो इसकी रीमेक से काफी अच्छी है। समीक्षकों ने भी वरुण धवन की फिल्म को नकार दिया है। फिल्म में कोरोना वायरस का प्रयोग भी मजाक के रूप में किया गया है, जिसने दुनिया भर में 17 लाख से भी अधिक लोगों की जान ले ली है। वहीं सारा आली खान का कहना है कि अगर राजनीतिक चश्मे से देखा जाए तो कोई भी मजाक या कॉमेडी खत्म हो जाएगी।

यहाँ तक कि इस फिल्म के गाने भी अरिजनल नहीं हैं और पुरानी ‘Coolie No 1’ के 2 लोकप्रिय गानों ‘हुस्न है सुहाना’ और ‘मैं तो रस्ते से जा रहा था’ को रीक्रिएट किया गया है। ये फिल्म मई 2020 में ही रिलीज की जाने वाली थी, लेकिन कोरोना संक्रमण के चलते इसे आगे बढ़ाया गया। ‘इंडिया टुडे’ ने भी इसे साल की सबसे बुरी 8 फिल्मों की सूची में रखा है। डेविड धवन गोविंदा को लेकर 17 फिल्में निर्देशित कर चुके हैं, लेकिन अब उनमें बातचीत बंद है।

इससे पहली इसी साल रिलीज हुई ‘सड़क 2’ के ट्रेलर को अब तक 6 मिलियन (60 लाख) से ज्यादा बार डिस्लाइक किया चुका था, जो कि अपने आप में बेहद ही खराब रिकॉर्ड है। जबकि इस ट्रेलर को देखकर इसे पसंद या लाइक करने वालों की संख्या महज तीन लाख के आसपास है। सड़क 2 भारत की सबसे ज्यादा डिसलाइक वीडियो बन गई थी। सोशल मीडिया पर इस दौरान ‘अनइंस्टॉल हॉटस्टार’ ट्रेंड होता रहा क्योंकि लोगों का कहना था कि इस फिल्म में केवल नेपोटिज्म के प्रोडक्ट्स भरे पड़े हैं, जिन्हें महेश भट्ट आगे बढ़ा रहे हैं।

सिखों की लाश पर PM बने, मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए हदें पार की: कॉन्ग्रेस का ‘मिस्टर क्लीन’… लेकिन कहे गए ‘बोफोर्स चोर’

भारत के लोकसभा चुनाव के इतिहास में अगर किसी पार्टी को कभी सबसे ज्यादा सीटें मिलीं तो वो थी 1984 में कॉन्ग्रेस पार्टी को मिली 414 सीट। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या के कुछ ही दिनों बाद हुए इन चुनावों में राजीव गाँधी के नेतृत्व में पार्टी ने 76.5% सीटें जीत कर एक बहुत बड़ा बहुमत प्राप्त किया। पूरे देश में कॉन्ग्रेस और गाँधी परिवार के लिए सहानुभूति की एक बहुत बड़ी लहर थी, जिसका फायदा राजनीति में नए-नवेले आए राजीव गाँधी को मिला।

इस चुनाव में विपक्ष की हालत इतनी पतली थी कि एक क्षेत्रीय पार्टी दूसरे नंबर पर उभरी। आंध्र प्रदेश के तेलुगु सुपरस्टार NTR की TDP को 30 सीटें मिलीं और देश के चुनावी इतिहास में पहली बार एक क्षेत्रीय पार्टी मुख्य विपक्षी दल बन गई। ये भाजपा का पहला चुनाव था और उसने मात्र 2 सीटों के साथ बस अपना खाता भर ही खोला था। वामपंथी CPI (M) को 22 और जनता पार्टी को मात्र 10 सीटें ही मिलीं।

लेकिन, इसके बाद अगले 5 वर्ष तक राजीव गाँधी ने जो सरकार चलाई, वो भारत की सबसे विवादित सरकारों में से एक थी। ऐसे-ऐसे फैसले लिए गए, जिसे न सिर्फ न्यायपालिका एक मजाक बन कर रह गई, बल्कि तुष्टिकरण की भी नई परिभाषा लिखी गई। आवाज़ उठाने वाला कोई विपक्ष तो था नहीं, ऐसे में जम कर मनमानी की गई। इस दौरान कॉन्ग्रेस टूटी भी और वीपी सिंह जैसे नेता निकल गए। राजीव गाँधी द्वारा अन्य नेताओं के साथ व्यवहार की भी खूब चर्चा हुई।

राजीव गाँधी इस दौरान सबसे पहले दल-बदल कानून लेकर आए। कहा तो गया कि इसका उद्देश्य नेताओं को प्रलोभन दिए जाने व दल-बदल को रोकना है। लेकिन, असली बात ये थी कि 80 के दशक में कॉन्ग्रेस के ही कई नेताओं ने पार्टी छोड़ दी थी। ये वो समय था, जब कॉन्ग्रेस देश की सबसे प्रभावशाली और समृद्ध पार्टी हुआ करती थी। ऊपर से आपातकाल के फैसले से कई नेता नाराज थे। ऐसे में कई शीर्ष नेताओं ने पार्टी छोड़ना उचित समझा।

शाहबानो केस: मुस्लिम तुष्टिकरण का सबसे बड़ा दाँव

लेकिन, उनके प्रधानमंत्रित्व काल का सबसे विवादित निर्णय था शाहबानो केस। इसमें सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट कर मुस्लिम तुष्टिकरण की हदें पार कर दी गईं। आपने इस केस का नाम खूब सुना होगा, यहाँ हम इस बारे में और इसके प्रभाव को लेकर चर्चा करेंगे। मोहम्मद अहमद खान द्वारा तलाक दिए जाने के बाद शाहबानो सुप्रीम कोर्ट गईं, जहाँ उनके शौहर को आदेश दिया गया कि वो तलाक के बाद भी अपनी बीवी को वित्तीय खर्च मुहैया कराएँ।

1932 में हुए निकाह के 14 वर्षों बाद अधिवक्ता अहमद खान एक दूसरी पत्नी लेकर आ गया, जिसकी उम्र उससे काफी छोटी थी। दोनों पत्नियों के साथ कई वर्षों तक रहने के बाद उसने 62 साल की शाहबानो को तलाक दे दिया और बाद में 200 रुपए का मासिक पेंशन भी रोक दिया, जिसका उसने वादा किया था। सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय संविधान और कुरान का हवाला देते हुए कहा कि पति को पत्नी को मेंटेनेंस खर्च देना चाहिए।

इसके बाद पूरे देश के मुस्लिमों ने इस जजमेंट के खिलाफ अभियान शुरू कर दिया। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सहित कई इस्लामी संगठनों ने सड़क पर आंदोलन शुरू कर दिया। शरीया कानून के बचाव में ऐसा अभियान चला कि कॉन्ग्रेस पार्टी को भी मुस्लिमों का मसीहा बनने का मौका सूझा। राजीव गाँधी ने तलाकशुदा महिलाओं को अधिकार देने के नाम पर कानून बनाया और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटते हुए मेंटेनेंस राशि की अवधि मात्र 90 दिन कर दी।

मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए पहली बार भारतीय संसद ने इस तरह का कानून बनाया। तब भाजपा ने इसे सुप्रीम कोर्ट की पवित्रता को ठेस पहुँचाने वाला करार दिया। राम जेठमलानी सहित कई वरिष्ठ वकीलों ने इसकी आलोचना की। विश्लेषकों ने कहा कि भारत न जाने कितने ही वर्ष पीछे चला गया है। ये भारतीय नागरिकों को दिए गए बराबरी के अधिकार के भी विरुद्ध था। तमाम विरोधों के बाद राजीव गाँधी सरकार को भी एहसास हुआ कि उसने कितनी बड़ी गलती की है।

छवि सुधारने के लिए राम मंदिर का इस्तेमाल

इसके बाद राम मंदिर आंदोलन में भाजपा और VHP जैसे संगठनों से क्रेडिट लेने और मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए की गई गलती को ढकने के लिए गलती पर गलती हुई। फ़रवरी 1986 में राजीव गाँधी ने राम मंदिर का ताला खोल कर वहाँ हिन्दुओं को पूजा की अनुमति दी। अपनी राजनीति चमकाने के लिए राम मंदिर का इस्तेमाल किया गया। जहाँ एक तरफ कॉन्ग्रेस नेता राम मंदिर के नाम पर वोट माँग रहे थे, राजीव गाँधी मुस्लिमों को फिर से ये एहसास दिलाने में लग गए कि बाबरी मस्जिद सुरक्षित है।

‘मिस्टर क्लीन’ के रूप में खुद को प्रचारित कर के सत्ता में आए राजीव गाँधी के लिए उस समय के विपक्षी नेताओं ने ‘बोफोर्स चोर’ शब्द का इस्तेमाल किया। बोफोर्स स्कैम का लिंक इटली और स्वीडन से जुड़े होने के आरोप लगे। स्वीडिश कम्पनी ‘Saab-Scania’ से उनका नाम जुड़ा। ये कम्पनी भारत को एयरक्राफ्ट्स बेचना चाहती थी। बोफोर्स तोप घोटाले ने भारत के रक्षा सौदों को पूरी तरह से लकवाग्रस्त कर दिया।

विदेश नीति में भी वो फेल रहे। बिना ज़रूरत श्रीलंका में LTTE को छेड़ डाला, जो उनकी हत्या का भी कारण बना। उन्होंने श्रीलंका में भारतीय सेना को ‘शांति मिशन’ पर भेजा। विशेषज्ञ आज भी कहते हैं कि इतने बड़े स्तर पर श्रीलंका में हस्तक्षेप से पहले तमिलनाडु के तमिलों को भरोसा में लेना चाहिए था। इससे तमिलों के मन में भारत के खिलाफ अलगाववाद की भावना प्रबल होकर उभरने लगी। अब उनकी हत्या के दोषियों को माफ़ी देने का नाटक कर गाँधी परिवार तमिल वोटों की आस लगाए बैठा है।

‘प्रधानमंत्री’ राजीव गाँधी के किस्से और भी हैं..

इसी तरह लक्षद्वीप में राजीव गाँधी किस तरह छुट्टियाँ मनाने गए थे और उस दौरान INS विराट को उनके व उनके पूरे परिवार की सेवा में लगाया गया था, ये भी ज्ञात कहानी है। पीएम मोदी ने भी इसका जिक्र किया था। जब ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में उस वक़्त ये खबर छपी तो कॉन्ग्रेस ने उस मीडिया संस्थान को भी बदला लेने के लिए प्रताड़ित किया। इन छुट्टियों के दौरान अमिताभ बच्चन का परिवार भी उनके साथ था।

भोपाल गैस त्रासदी कोई भारतीय शायद ही भूल सकता है। हजारों लोगों की मौत के जिम्मेदार एंडरसन को राजीव गाँधी ने 25 हजार रुपए के पर्सनल बॉन्ड पर भारत से बाहर भेज दिया था। भोपाल गैस त्रासदी हुई, उसके एक महीने पहले ही राजीव गाँधी प्रधानमंत्री बने थे। 8000 लोगों की मौत इस त्रासदी के महज 2 हफ़्ते के भीतर ही हो गई थी। अब तक इससे 25,000 की जान जा चुकी है। बताया जाता है कि राजीव गाँधी के मौखिक आदेश के बाद अर्जुन सिंह ने वॉरेन को भोपाल से जाने दिया था। 

इन सबके अलावा सिख दंगों पर कई बार बात हो चुकी है, जिसके बारे में उन्होंने कहा था कि जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती ही है। साथ ही अपनी सरकार के भ्रष्टाचार को खुद स्वीकारते हुए उन्होंने कहा था कि सरकार एक रुपया भेजती है तो गरीब के पास 15 पैसा ही पहुँचता है। आंध्र प्रदेश के दलित नेता अंजैय्या का उन्होंने अपमान किया था। भीड़ के सामने उन्हें डाँटने का नतीजा ये हुआ कि कॉन्ग्रेस आंध्र से साफ़ ही हो गई।

अरुणाचल में 6 विधायकों के जदयू छोड़ने के बाद नीतीश कुमार ने छोड़ा पार्टी अध्यक्ष का पद, कहा- ‘दबाव में बना मुख्यमंत्री’

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पार्टी मुखिया का पद छोड़ दिया है। बीते दिन रविवार (27 नवंबर 2020) को नीतीश कुमार के सहयोगी आरसीपी सिंह को जनता दल यूनाइटेड (जदयू) का नया अध्यक्ष चुना गया। नीतीश कुमार ने ही आरसीपी सिंह के नाम का सुझाव दिया था जिस पर कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक में सहमति जताई थी। 2019 में बिहार के मुख्यमंत्री को जदयू का अध्यक्ष चुना गया था और उनका कार्यकाल 3 साल का था। उन्होंने इस्तीफ़ा देते हुए इस पद को आरसीपी सिंह के हवाले कर दिया जो कि राज्यसभा में जदयू का प्रतिनिधित्व करते हैं। 

पार्टी मुखिया का पद छोड़ने के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि उनकी बिहार का मुख्यमंत्री बनने की कोई इच्छा नहीं थी। वह सिर्फ इतना चाहते थे कि जनादेश का सम्मान हो भले मुख्यमंत्री कोई भी क्यों न बने। 

जदयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक के दौरान नीतीश कुमार ने कहा था, “लोग कह रहे हैं कि भाजपा को मुख्यमंत्री पद चाहिए। मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है, मैं इन पदों से नहीं बंधा हुआ हूँ। बहुत ज़्यादा दबाव होने की वजह से मुझे मुख्यमंत्री का पद स्वीकार करना पड़ा, मुझे वाकई इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि इस कुर्सी पर कौन बैठने वाला है। जैसे ही चुनाव के नतीजे आए मैंने गठबंधन के सामने अपनी इच्छा जाहिर कर दी लेकिन दबाव इतना ज़्यादा बढ़ गया था कि मुझे ज़िम्मेदारी संभालनी ही पड़ी।”

नीतीश कुमार ने 2016 के बिहार विधानसभा चुनावों में भाजपा को हाशिये पर रख कर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और कॉन्ग्रेस के साथ गठबंधन कर लिया था। इतना सब कुछ सिर्फ यह सुनिश्चित करने के लिए कि वह मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल कर लें। लेकिन जब उनके इस गठबंधन का विरोध शुरू हुआ तब उन्होंने राजद को नकार कर भाजपा का दामन थाम लिया और फिर से मुख्यमंत्री बन गए।  

इस बात की अटकलें चरम पर हैं कि उन्होंने मुख्यमंत्री बनने की आकांक्षा नहीं रखने वाला बयान इसलिए दिया क्योंकि उनके ही विधायक पार्टी की लुटिया डुबाने में लग गए हैं। 

हाल ही में अरुणाचल प्रदेश में जदयू के 6 विधायक पार्टी से इस्तीफ़ा देकर भाजपा में शामिल हो गए थे लिहाज़ा वहाँ राजनीतिक अस्थिरता पैदा होना स्वाभाविक था। वहीं पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने इस बात पर रोष जाहिर किया है और कहा है कि इससे बिहार की गठबंधन सरकार प्रभावित हो सकती है। 

फर्जी आधार कार्ड से रवि बना.. पूजा पाठ भी करता था रफ़ीक खान: हिन्दू लड़की से निकाह करने की साजिश में गिरफ्तार

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से लव जिहाद का एक मामला सामने आया है, जिसमें रफ़ीक खान नाम का युवक अपनी पहचान छुपा कर एक हिन्दू युवती से शादी करने जा रहा था। इस बात की जानकारी मिलते ही हिन्दूवादी संगठनों ने युवक से पूछताछ कर जब उसका आधार कार्ड देखा, तो पता चला कि उसका आधार कार्ड भी नकली है। ज़ी न्यूज़ की रिपोर्ट के मुताबिक़, पुलिस ने इस घटना की जानकारी मिलते ही आरोपित रफ़ीक को गिरफ्तार कर लिया।

रफ़ीक मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले का निवासी है और उसने अपना नाम रवि यादव बताया था। रफ़ीक खान ने रवि नाम से ही एक फ़र्ज़ी पहचान पत्र (आधार कार्ड) भी बनवा रखा था। लगभग डेढ़ साल पहले रफ़ीक का रायसेन के गेंहूरास गाँव की रहने वाली हिन्दू लड़की के घर आना जाना शुरू हुआ। वह पीड़िता के भाई के साथ काम करता था, जिसकी वजह से उसकी युवती से भी पहचान हुई। फिर हिन्दू युवती और रफ़ीक के बीच बातचीत बढ़ी, उसने पीड़िता को बहला-फुसलाकर प्रेम जाल में फँसा लिया। 

दोनों के बीच शादी की बात होने लगी, इस बीच रफ़ीक कई बार पीड़िता के परिवार वालों से मिलने भी गया। उसने हिन्दू युवती के परिवार वालों से बताया कि काफी समय पहले उसके माता-पिता की मृत्यु हो चुकी है और वह अनाथ है। इस संबंध में पीड़िता के परिजनों का कहना था कि आरोपित का काफी समय से उनके घर आना जाना था। वह पूजा पाठ में भी शामिल होता था और मदद भी करता था जिसकी वजह से उन्हें कभी किसी तरह का संदेह नहीं हुआ। 

रफ़ीक हिन्दू युवती के साथ भोपाल के कोलार स्थित मंदिर में शादी कर ही रहा था कि तभी रायसेन जिला स्थित मंडीदीप के हिन्दू संगठन को इस बात की सूचना मिली। मामले की जानकारी मिलते ही वह तुरंत मौके पर पहुँचे और उन्होंने तुरंत रफ़ीक से पूछताछ शुरू कर दी। पूछताछ में उसने बताया कि उसका नाम रवि है और उसका अपना कोई नहीं है।

जब आरोपित से उसका आधार कार्ड माँगा गया तो वह नकली निकला और हिन्दूवादी संगठन ने इस मामले की जानकारी पुलिस को दी। इसके बाद पुलिस ने तत्काल प्रभाव से आरोपित रफ़ीक को गिरफ्तार कर लिया। 

हिन्दूवादी संगठनों ने इस मामले में एक और युवक के शामिल होने का भी आरोप लगाया है। उनका कहना है कि शिव कुमार भार्गव नाम का युवक इस घटना के षड्यंत्र में शामिल था। वह शादी के वक्त मंदिर में मौजूद था लेकिन हिन्दू संगठन के लोगों को देखकर मौके से फ़रार हो गया। फ़िलहाल उसका नंबर बंद है और पुलिस उसकी खोजबीन में जुट गई है।