रिलायंस जियो ने टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया (TRAI) को एक पत्र लिखा है। पत्र में रिलायंस जियो ने टेलीकॉम कम्पनी एयरटेल और वोडा आइडिया (Airtel-Vi) पर किसान आंदोलन का फ़ायदा उठाते हुए झूठी अफ़वाहें फ़ैलाने और दुष्प्रचार का आरोप लगाया है। इस पत्र में TRAI से माँग की गई है कि दोनों कंपनियों पर सख्त कार्रवाई की जाए। साथ ही, दावा किया गया है कि यह अनैतिक तरीकों का इस्तेमाल कर भ्रम फैला रहे हैं कि कृषि सुधार क़ानूनों से रिलायंस जियो को फ़ायदा होगा।
पत्र में इस बात का भी ज़िक्र किया गया है कि दोनों कंपनियों ने TRAI के दिशा निर्देशों का उल्लंघन किया है। पत्र के मुताबिक़, “एयरटेल और वोडा आइडिया (Airtel-Vi) प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ऐसी अटकलों को बढ़ावा दे रहे हैं, इस तरह का मिथ्या प्रचार कर रहे हैं कि नए कृषि सुधार क़ानूनों से रिलायंस का लाभ होगा। दोनों कंपनियों द्वारा चलाए गए इस तरह के ब्रांड विरोधी अभियान का ही नतीजा है कि भारी संख्या में ‘पोर्ट आउट रिक्वेस्ट’ (Port out request) आ रही हैं। दोनों कंपनियों द्वारा चलाए गए अभियान की वजह हमारे ग्राहक अलग हो रहे हैं जबकि उन्हें हमारी सेवाओं से संबंधित किसी भी तरह की परेशानी नहीं है।”
इसके बाद रिलायंस ने अपने पत्र में यह आरोप भी लगाया है कि एयरटेल और वोडा-आइडिया अपने कर्मचारियों, एजेंट्स और रिटेलर्स की मदद से पूरा अभियान ज़ोर शोर से चला रहे हैं। इतना ही नहीं, वह रिलायंस के ग्राहकों को गुमराह करने का प्रयास कर रहे हैं और इससे कंपनी की छवि को बहुत ज़्यादा नुकसान हो रहा है। दोनों कंपनी उत्तर भारत के तमाम हिस्सों में मौजूद ग्राहकों को अपनी तरफ खींचने के लिए तमाम अनैतिक हथकंडे अपना रहे हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, रिलायंस ने दोनों प्रतिद्वंद्वी कंपनियों पर दुष्प्रचार का अभियान चलाने का आरोप लगाते हुए सबूत भी साझा किए हैं। अंत में रिलायंस ने यह भी कहा है कि इसके पहले भी उसने इस मुद्दे पर TRAI से शिकायत दर्ज कराई थी लेकिन दोनों कंपनियों ने ऐसी हर बात को पूरी तरह नज़रअंदाज़ किया। ताज़ा मामले में भी दोनों कंपनियों के TRAI के तमाम अहम नियमों की अनदेखी करते हुए इस तरह का अभियान चलाया है।
पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में सत्तारूढ़ तृणमूल कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं ने शुक्रवार (दिसंबर 11, 2020) शाम को एक बीएसएफ के जवान की कथित तौर पर पिटाई की और उन्हें पागल घोषित कर दिया। इस सम्बन्ध में पीड़ित परिवार ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है। हालाँकि, इस मामले में अभी तक किसी को गिरफ्तार नहीं किया गया है।
पीड़ित जवान की पहचान 32 वर्षीय बिस्वजीत साहनी (Biswajit Sahani) के रूप में हुई है। वह जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा में 169 बटालियन में तैनात थे और इलाज के लिए कोरोना महामारी के बीच जारी लॉकडाउन से पहले घर लौट आए थे।
सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के अनुसार, बिस्वजीत साहनी पिछले कुछ महीनों से छुट्टी पर थे और अपने आवास पर रह रहे थे। उन्होंने बताया कि घटना के समय वह कोई आधिकारिक ड्यूटी पर भी नहीं थे।
घटना के दिन बिस्वजीत गत शुक्रवार को अपनी मोटरसाइकिल पर सवार होकर घर लौट रहे थे। तभी उन्होंने रास्ते में एक TMC रैली को ओवरटेक करने की कोशिश की, जिससे उनके और कुछ TMC के गुंडों के बीच विवाद हो गया।
यह विवाद जल्द ही हिंसक हो गया और TMC के गुंडों ने बीएसएफ के जवान की लकड़ी के डंडों से पिटाई कर दी। यही नहीं, उनका दोपहिया वाहन भी क्षतिग्रस्त कर दिया गया। बाद में, कुछ स्थानीय लोगों ने उन्हें बचाया और अस्पताल पहुँचाया।
पीड़ित जवान के बड़े भाई राजेश साहनी ने कहा, “मेरा भाई जम्मू और कश्मीर से कुछ इलाज के लिए इस फरवरी में घर लौटा था। शुक्रवार दोपहर को, मेरा भाई किसी काम के लिए कंडी गया था। जब वह घर लौट रहे थे तो टीएमसी के लोगों ने उनकी पिटाई की।”
स्थानीय लोगों ने कहा कि टीएमसी रैली का नेतृत्व कंडी ब्लॉक के टीएमसी अध्यक्ष अपूर्वा सरकार कर रहे थे। अपूर्वा सरकार ने पीड़ित पर ‘पागल ’होने का भी आरोप लगाया और दावा किया कि पार्टी ने उसके इलाज की व्यवस्था की थी।
रिपोर्ट्स के अनुसार, मुर्शिदाबाद जिले के टीएमसी प्रवक्ता अपूर्वा सरकार ने कहा, “बीएसएफ जवान पागल है। वो जानबूझकर हमारी रैली में घुसा और समस्या खड़ी की। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी। जवान का परिवार हमारा समर्थक है। हम उनके इलाज की व्यवस्था कर रहे हैं।”
जवान के परिवार ने भी उन्हें पागल कहे जाने पर टीएमसी पर हमलावर होते हुए कहा, “मैं और मेरा भाई दोनों बीएसएफ के जवानों के रूप में देश की सेवा कर रहे हैं। लेकिन इस क्रूर हमले के बाद, पुलिस में से कोई भी अपना बयान दर्ज करने नहीं आया। जबकि हमने कंडी पुलिस स्टेशन के पास लिखित शिकायत दर्ज की है।”
पत्रकार और एंकर रोहित सरदाना ने सवाल-जवाब के लाइव सेशन में एक ट्रोल को जवाब दिया था, जिस पर काफी विवाद हुआ था। शौकत अली नाम के ट्रोल ने सरदाना से पूछा था, “अगर आप ऐसा सोचते हैं कि किसान आंदोलन में प्रदर्शन करने वाले लोग खालिस्तानी हैं तो ‘आपके नेता’ मोदी उन सभी को जेल में क्यों नहीं डाल देते हैं?” रोहित सरदाना ने इस बात का जवाब बेहद सख्त शैली में दिया लेकिन इस दौरान वह अपने अधिकारों के दायरे में ही थे।
उन्होंने कहा, “देखिये! सबसे पहली बात मोदी जी आपके भी नेता हैं। अगर नहीं हैं तो आप पतली गली लेकर निकल लें उधर।” बेशक इस बात का कोई धार्मिक पहलू नहीं है, लेकिन लिबरल्स ने इस बता की व्याख्या कुछ वैसे ही की और सोशल मीडिया पर रोहित सरदाना की आलोचना शुरू कर दी। ऑल्ट न्यूज़ के कुछ प्रोपेगेंडापरस्त लोगों ने तो इंडिया टुडे के चेयरमैन से माँग कर दी कि रोहित सरदाना पर सख्त कार्रवाई हो।
एक ट्रोल को दिए गए तीखे जवाब पर विरोध काफी असंतुलित और ज़्यादा नज़र आया जब हमने उस ट्रोल (शौकत अली) को खोजा जिसने रोहित सरदाना से सवाल पूछा था। लेकिन इतना विवाद पैदा करने के बाद शौकत अली बेफिक्र नज़र आ रहा था। हालाँकि उसकी प्रोफाइल देखने पर हमें कई विवादित और घृणित पोस्ट देखे। वह पोस्ट ऐसे मुद्दों की तरफ इशारा करते हैं जो उसके सोशल मीडिया पर्सोना (Persona) में पनप रहे हैं।
इस पोस्ट से साबित होता है कि शौकत अली वही ट्रोल है जिसका रोहित सरदाना ने जवाब दिया
पहले भी उगल चुका है रोहित सरदाना के लिए जहर
हम इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं है कि सरदाना को इस बात की जानकारी है या नहीं, लेकिन यह पहला ऐसा मौक़ा नहीं जब वह शौकत अली को जवाब दे रहे हैं। अक्टूबर 2018 में उन्होंने इसी ट्रोल के नफ़रत और अभद्रता से भरे ट्वीट का जवाब दिया था।
अक्टूबर 2018 में रोहित सरदाना ने दिया था ट्रोल का जवाब
इसके बाद शौकत अली ने सोशल मीडिया पर रोहित सरदाना को लेकर तमाम अपमानजनक ट्वीट किए। ऐसे ही एक ट्वीट में उसने हिन्दूफ़ोबिक ‘गौमूत्र’ अपशब्द का इस्तेमाल किया था, जिस तरह पुलवामा के आतंकवादियों ने किया था।
रोहित सरदाना को जवाब देने के लिए ‘गौमूत्र ‘ का ज़िक्र
ऐसे तमाम मामले सामने आए हैं जब शौकत अली ने रोहित सरदाना के लिए अपशब्दों भरी भाषा का इस्तेमाल किया है।
रोहित सरदाना को अपशब्द कहता शौकत अली
अंजना ओम कश्यप के लिए आपत्तिजनक रवैया
रोहित सरदाना की सहकर्मी अंजना ओम कश्यप को लेकर शौकत अली का रवैया बेहद नकारात्मक है। उसने अंजना ओम कश्यप के साथ ऐसी फोटोशॉप तस्वीरें साझा की हैं जो बेहद आपत्तिजनक हैं। फेसबुक पर साझा की गई इस तस्वीर पर उसके मित्र भी बेहद घटिया टिप्पणी करते हैं।
ट्रोल का अंजना ओम कश्यप के लिए घटिया नज़रिया
इसने आज तक की कुछ अन्य एंकरर्स के साथ भी एडिट की गई तस्वीरें साझा की।
मूल फोटो सना खान की है
शौकत ने अंजना ओम कश्यप को लेकर कुछ ऐसे भी ट्वीट किए जिनमें उसने बेहद अभद्र भाषा का उपयोग किया है।
ट्रोल ने अंजना ओम कश्यप के लिए इस्तेमाल की अभद्र भाषा
अपने एक ट्वीट में उसने अंजना ओम कश्यप को भाजपा की बहू कहा है। इसी ट्वीट में उसने के दिल्ली हिन्दू विरोधी दंगों के आरोपित आम आदमी पार्टी के पूर्व नेता ताहिर हुसैन का बचाव भी किया।
अंजना ओम कश्यप को कहा भाजपा की बहू
रोहित सरदाना के अलावा अंजना ओम कश्यप शौकत अली के चुनिंदा निशानों में से एक हैं।
एक और टिप्पणी में की गई अभद्रता
शौकत अली की भाजपा से नफ़रत
बिहार चुनाव के ठीक पहले लोक जनशक्ति पार्टी के मुखिया रामविलास पासवान की मृत्यु होने पर शौकत अली ने कहा था कि इसकी सीबीआई जाँच होनी चाहिए, क्योंकि मृत्यु लोजपा के एनडीए से अलगाव के बाद हुई है। वह इस तरह की तमाम षड्यंत्रकारी थियरी बना रहा था, जबकि किसी ने भी रामविलास पासवान की मृत्यु पर सवाल नहीं उठाया था। यहाँ पर भी उसने अंजना ओम कश्यप के ट्वीट को कोट किया था।
शौकत अली की विचित्र थियरी
इस ट्रोल ने पश्चिम बंगाल में भाजपा विधायक देबेन्द्र नाथ रॉय की मृत्यु का मज़ाक बनाया था। उनकी मृत्यु को आत्महत्या बताया था, जबकि उस मृत्यु को लेकर संदेह बना हुआ है। कुछ का तो यहाँ तक मानना था कि वह हत्या का मामला था।
शौकत अली ने बनाया भाजपा नेता की हत्या का मज़ाक
जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह कोरोना पॉजिटिव पाए गए थे तब यह ट्रोल बहुत ज़्यादा खुश हुआ था, जबकि वह बहुत जल्द ठीक भी हो गए थे।
अमित शाह के कोरोना पॉजिटिव होने पर खुश हुआ था शौकत अली
शौकत अली ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल किया है।
शिवराज सिंह चौहान को अपशब्द कहता शौकत अली
ट्रोल ने भाजपा नेताओं को सूअर तक कहा है।
शौकत अली उनके लिए भी खूब अपशब्दों का उपयोग करता है जो विपक्ष के लिए आलोचनात्मक रवैया रखते हैं। इसने कंगना रनौत को लेकर भी बेहद अपमानजनक पोस्ट किया था जिस पर इसके साथियों ने घटिया टिप्पणी की थी।
कंगना रनौत पर ट्रोल की अभद्र टिप्पणी
इसके अलावा ट्रोल ने अर्णब गोस्वामी पर भी अपमानजनक टिप्पणी की, जिन्होंने कॉन्ग्रेस और शिवसेना की जम कर आलोचना की थी।
अर्णब गोस्वामी पर ट्रोल की टिप्पणी
शौकत अली ने कुणाल कामरा की सुप्रीम कोर्ट की फोटोशॉप तस्वीर साझा की थी। यह तस्वीर साझा करने की वजह से कुणाल कामरा पर मानहानि का मुकदमा दर्ज कर लिया गया था।
शौकत अली द्वारा साझा की गई सुप्रीम कोर्ट की तस्वीर
शौकत अली का मानना है कि वैक्सीनेशन (टीकाकरण) से नसबंदी होती है।
वैक्सीन का विरोध
इस तरह के तमाम मीम्स भी मौजूद हैं जो वैक्सीन विरोधी विचारों की खिल्ली उड़ाते हैं।
शौकत अली के विचारों का मज़ाक बनाने वाले मीम
शौकत अली का दावा, भारतीय सैनिक करते हैं कश्मीरी महिलाओं का बलात्कार
अपने एक और पोस्ट में उसने कुछ प्रोपेगेंडा वेबसाइट से प्रेरित होकर दावा किया कि भारतीय सैनिक कश्मीरी महिलाओं के साथ बलात्कार करते हैं।
सेना को लेकर शौकत अली के झूठ
निसंदेह एक गालीबाज ट्रोल है शौकत अली
इस बात में कोई दो राय नहीं है कि शौकत अली एक गाली बकने वाला ट्रोल है, जो अंजना ओम कश्यप के लिए बेहद अपमानजनक नज़रिया रखता है। रोहित सरदाना के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल करता है और वैक्सीन को लेकर अफ़वाहें फैलाता है। उसने कई हिन्दूफ़ोबिक बातों को बढ़ावा दिया और भारतीय सेना के बारे में झूठ फैलाया।
बॉलीवुड अभिनेता रितिक रोशन (Hrithik Roshan) द्वारा वर्ष 2016 में दर्ज की गई एक एफआईआर साइबर सेल से क्राइम ब्रांच सीआईयू (क्राइम इंटेलिजेंस यूनिट) में स्थानांतरित कर दी गई है। रितिक रोशन का आरोप है कि उन्हें वर्ष 2013 और 2014 में बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत (Kangana Ranaut) की ई-मेल आईडी से उन्हें सौ से अधिक ईमेल भेजे गए थे, जिसके लिए रितिक रोशन ने वर्ष 2016 में साइबर सेल में शिकायत दर्ज की थी।
इस शिकायत के सम्बन्ध में रितिक रोशन द्वारा अज्ञात लोगों के खिलाफ आईपीसी आर/डब्ल्यू 66 सी और डी की धारा 419 के तहत मामला दर्ज किया गया था। वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी ने पुलिस आयुक्त (पुलिस कमिश्नर) को पत्र लिखकर कहा था कि मामले की जाँच में कोई प्रगति नहीं हुई है।
मुंबई पुलिस ने एक बयान में पुष्टि करते हुए कहा है कि रितिक के वकीलों द्वारा मुंबई पुलिस आयुक्त से अनुरोध के बाद रितिक रोशन की शिकायत को क्राइम इंटेलिजेंस यूनिट को ट्रांसफर कर दिया गया है। गौरतलब है कि कंगना को मुंबई पुलिस ने कई केसों में बुलावा भेज रखा है। इस केस को सायबर विभाग से मुंबई क्राइम ब्रांच को देना, एक अलग तह खोलती है।
इस पर अभिनेत्री कंगना रनौत ने अपने ट्विटर अकाउंट से एकबार फिर रितिक रोशन को लेकर प्रतिक्रिया दी है। कंगना रनौत ने लिखा, “इसकी दुखभरी कहानी फिर से शुरू हो गई। हमारे ब्रेकअप और उसके तलाक को कई साल हो गए हैं लेकिन वह आगे नहीं बढ़ना चाहता है, किसी और महिला को डेट करने से इंकार कर रहा है। जब भी मैं अपने निजी जीवन में कुछ आशा कर हिम्मत जुटाती हूँ तो वो फिर से वही ड्रामा शुरू कर देता है।”
कंगना रनौत ने अपने इसी ट्वीट में रितिक रोशन को टैग करते हुए लिखा है, “कब तक रोता रहेगा इस छोटे से अफेयर के लिए?”
His sob story starts again, so many years since our break up and his divorce but he refuses to move on, refuses to date any woman, just when I gather courage to find some hope in my personal life he starts the same drama again, @iHrithik kab tak royega ek chote se affair keliye? https://t.co/qh6pYkpsIP
उल्लेखनीय है कि कंगना रनौत और रितिक रोशन के बीच कई सालों से जुबानी जंग चलती आ रही है। कंगना ने कुछ वक्त पहले रितिक को लेकर कई सारे खुलासे भी किए और ईमेल से लेकर रितिक और अपने संबंधों के बारे में भी मीडिया के सामने काफी कुछ कहा था।
बताया जाता है कि फिल्म ‘कृष 3’ की शूटिंग के दौरान कंगना और रितिक की अच्छी दोस्ती भी थी। इसके बाद कंगना रनौत ने कई जगहों पर खुलकर इस बारे में कहा कि दावे के मुताबिक रितिक ने भी पत्नी से तलाक़ के बाद शादी का वादा किया था लेकिन बाद में पहचानने से भी इनकार कर दिया।
एक टीवी शो में सवालों का जवाब देते हुए कंगना ने कहा था, ”2014 में हम दोनों की रिलेशनशिप बिल्कुल ख़त्म हो गई थी। उसने (रितिक) सैकड़ों ई-मेल मेरे ही अकाउंट से ख़ुद को मेल किए। मेरे ही अकाउंट से वो ख़ुद को मेल भेजता था। इस मेल में वो लिखता था कि मुझे तुम्हारी बहुत याद आ रही है, मैं तो मर गई. मेरा दिमाग़ ख़राब है, मेरा इलाज करा दो।”
पंजाब के एक DIG लखविंदर सिंह जाखड़ ने ‘किसानों’ के समर्थन में अच्छी-अच्छी बातें करते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया और कहा कि वो पदमुक्त होकर किसानों की सेवा करना चाहते हैं। यह दीगर बात है कि वे घूसखोरी के आरोपित और निलंबित हैं।
क्या इसे महज एक संयोग की तरह ही देखा जाना चाहिए कि अक्सर सत्ता-विरोधी प्रपंचों के समर्थन में होने का स्वांग करने वाले आइएएस या पीसीएस अधिकारी किसी न किसी तरह से भ्रष्टाचार में आरोपित रह चुके होते हैं। और जब ये नहीं होते तब ये एक तरह से ‘पोटेंशियल भ्रष्टाचारी’ का तमगा लेकर किसी न किसी दिन इस मिथ को सही साबित कर देते हैं। मामला चाहे जम्मू-कश्मीर के विशेष राज्य का दर्जा समाप्त करने का रहा हो, नागरिकता कानून का रहा हो, या फिर अब कृषि सुधार कानूनों का, समय-समय पर ये अधिकारी अपने एजेंडा के साथ सामने आए हैं।
गत वर्ष नागरिकता कानून के विरोध में देशभर में हो रहे विरोध-प्रदर्शनों के दौरान भी देखा गया था कि कुछ अधिकारियों ने इसके समर्थन में या तो त्यागपत्र देने की बातें कहीं या फिर परोक्ष रूप से उन्मादियों के साथ खड़े रहे और समय के साथ यह तथ्य भी सामने आए कि किस तरह से अतीत में उनके करियर में उन पर कभी न कभी भ्रष्टाचार के आरोप लग चुके थे या फिर उन्होंने वर्तमान केंद्र सरकार के तरीकों को गैरलोकतांत्रिक बताते हुए कॉन्ग्रेस से रिश्ता जोड़ लिया।
ऐसे ही कुछ अधिकारियों पर एक नजर –
1. आईपीएस अधिकारी अब्दुर रहमान
गत वर्ष आईपीसी ऑफिसर अब्दुर रहमान ने नागरिकता संशोधन बिल पास होने के विरोध में नौकरी से इस्तीफा दे दिया। अब्दुर रहमान महाराष्ट्र मानवाधिकार आयोग में बतौर आईजीपी पोस्टेड थे।
इस्तीफे का ऐलान करते हुए अब्दुर रहमान ने एक ट्वीट में लिखा, “मैं इस नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 के विरुद्ध हूँ और मैं इस विधेयक की निंदा करता हूँ। जिसके चलते मैंने कल से कार्यालय में उपस्थित ना होने का फैसला लिया हैऔर अंततः मैं अपनी सेवा को छोड़ रहा हूँ।”
अब्दुर रहमान ने नागरिकता संशोधन बिल को अलोकतांत्रिक बताते हुए भारत के धार्मिक बहुलतावाद के खिलाफ बताया था। ख़ास बात यह है कि इससे पहले पुलिस भर्ती के दौरान अब्दुर रहमान पर ‘अपने समुदाय के लोगों को‘ लाभ पहुँचाने को लेकर फर्जीवाड़े के आरोप लग चुके हैं। जिसके संबंध में पिछले वर्ष ही अप्रैल माह में पूर्व महाराष्ट्र सरकार ने उनके ख़िलाफ़ जाँच के आदेश दिए थे।
दरअसल पूरा मामला वर्ष 2007 में हुई पुलिस भर्ती से जुड़ा है। साल 2007 में हुई पुलिस भर्ती की परीक्षा में मराठी में लिखना अनिवार्य था, लेकिन अब्दुर रहमान ने ‘विशेष समुदाय’ के लोगों को उर्दू में लिखने की अनुमति दी थी। साथ ही महिला अभ्यर्थियों का कोटा होने के बावजूद भी उनकी भर्ती नहीं की थी।
2. कॉन्ग्रेस से जुड़े आईएएस शशिकांत सेंथिल
कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिला उपायुक्त (डिप्टी कमिश्नर) एस शशिकांत सेंथिल ने सितम्बर, 2019 में भारतीय प्रशासनिक सेवा IAS से यह कहते हुए इस्तीफा दे दिया था कि लोकतंत्र के मूलभूत सिद्धांतों के साथ अभूतपूर्व रूप से छेड़छाड़ की जा रही है। 40 वर्षीय आईएएस अधिकारी जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद370 के प्रावधानों को निरस्त करने के केंद्र सरकार के फैसले से आहत थे।
दिलचस्प बात यह है कि अब, लगभग ठीक एक साल बाद शशिकांत सेंथिल ने कॉन्ग्रेस पार्टी ज्वाइन करने का फैसला किया है। 41 वर्षीय पूर्व नौकरशाह ने ट्वीट में लिखा, “मैं सभी को सूचित करना चाहूँगा कि मैंने लड़ाई जारी रखने के अपने प्रयास में कॉन्ग्रेस पार्टी में शामिल होने का फैसला किया है। मैं एक ऐसा कार्यकर्ता रहा हूँ जो अपने पूरे जीवन में कम से कम विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के लिए एक आवाज बनने की कोशिश कर रहा है, जहाँ भी मैं था और अपनी अंतिम साँस तक ऐसा ही करता रहूँगा।”
3. DIG लखविंदर सिंह जाखड़
पंजाब के डीआईजी (जेल) लखविंदर सिंह जाखड़ ने किसानों के मुद्दे पर समर्थन की बात करते हुए राज्य के प्रमुख सचिव (गृह) को अपना इस्तीफा सौंप दिया है, जबकि लखविंदर सिंह जाखड़ को मई 2020 में ही निलंबित किया जा चुका है। उन पर घूसखोरी के आरोप लगे थे।
जाखड़ पर जब ये आरोप लगे, तब वो अमृतसर के DIG (जेल) के रूप में कार्यरत थे। पंजाब के जेल मंत्री सुखजिंदर सिंह रंधावा ने भ्रष्टाचार के मामले में उनके खिलाफ विभागीय जाँच का आदेश भी दिया था। पट्टी सब-जेल के इंचार्ज DSP विजय कुमार ने उन पर ये आरोप लगाए थे। इस मामले में जाँच के बाद चार्जशीट भी दायर की जा चुकी है।
दरअसल, आरोप है कि अप्रैल 7, 2020 को लखविंदर सिंह जाखड़ ने विजय कुमार से घूस की माँग की थी। जाखड़ और उनके कर्मचारी ने मासिक 10,000 रुपए की माँग की थी। एक कैदी उनके ड्राइवर को 3000 रुपए का घूस दिया करता था। जाँच में पाया गया कि इस मामले में और भी कई तह हो सकते हैं। पटियाला जेल के सुपरिटेंडेंट रहते हुए उन्होंने बेअंत सिंह के हत्यारे बीएस राजोआना को मिले मृत्युदंड का पालन करने से इनकार कर दिया था।
4. कन्नन गोपीनाथन
अगस्त, 2019 में ही कश्मीर मुद्दे पर अपनी ‘चिंता व्यक्त न कर पाने’ के कारण केंद्र शासित प्रदेश दादरा नगर हवेली में आईएएस अधिकारी ने भी नौकरी से इस्तीफा दे दिया था। 33 साल के कन्नन गोपीनाथन ने बताया कि सरकारी अधिकारी होने के नाते वे अनुच्छेद 370 के हटाए जाने पर अपने विचार व्यक्त नहीं कर सकते हैं और इसी मजबूरी की वजह से उन्होंने इस्तीफ़ा देने का फ़ैसला किया। केरल से आने वाले गोपीनाथन ने जम्मू-कश्मीर में धारा 370 के कई प्रावधानों को निरस्त किए जान के बाद लोगों की अभिव्यक्ति की आजादी का हनन करने का आरोप लगाया था।
खास बात यह है कि इन्हीं कन्नन गोपीनाथन पर कोरोना वायरस महामारी के बीच सरकार के निर्देशों के बावजूद ड्यूटी पर नहीं लौटने के चलते प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई थी। दमन एवं दीव और दादरा एवं नगर हवेली की सीमा अंतर्गत आने वाले मोती दमन पुलिस थाने में अप्रैल 21, 2020 को गोपीनाथन के खिलाफ महामारी रोग अधिनियम और आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया गया। सरकारी आदेश की अवहेलना के कारण गोपीनाथन पर आईपीसी की धारा 188 के तहत यह केस दर्ज हुआ।
नए कृषि कानूनों के खिलाफ तथाकथित किसानों द्वारा जारी विरोध के बीच अखिल भारतीय किसान समन्वय समिति (AIKCC) से जुड़े दस किसान नेताओं ने केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर से मुलाकात की और संसद में पारित तीन नए कृषि कानूनों को अपना समर्थन दिया। अखिल भारतीय किसान समन्वय समिति (AIKCC) किसानों का चौथा समूह है, जिन्होंने पिछले दो सप्ताह में कृषि कानूनों के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया है।
किसानों संगठनों के ये प्रतिनिधि उत्तर प्रदेश, केरल, तमिलनाडु, तेलंगाना, बिहार और हरियाणा जैसे कई राज्यों से केंद्रीय कृषि मंत्री से मिलने और तीन कृषि कानूनों को अपना समर्थन देने के लिए राष्ट्रीय राजधानी पहुँचे। नई दिल्ली में उन्होंने इस संबंध में केंद्रीय मंत्री को अपना ज्ञापन सौंपा।
10 organisations from various states like Uttar Pradesh, Kerala, Tamil Nadu, Telangana, Bihar and Haryana, associated with All India Kisan Coordination committee, are meeting Union Agriculture Minister Narendra Singh Tomar, to extend their support on 3 Farm Bills. pic.twitter.com/FMnzpoO2c1
ज्ञापन में खास तौर पर उन अराजत तत्वों को लताड़ा गया है, जो नए कानूनों के खिलाफ किसानों को गलत जानकारी देने और उन्हें भड़काने की कोशिश कर रहे थे। उनके अनुसार, किसानों के विरोध में शामिल कुछ अराजक तत्व प्रदर्शनकारियों के बीच कृषि कानूनों के बारे में गलत धारणा फैलाने की कोशिश कर रहे हैं।
कुछ लोग कानून के खिलाफ भड़का कर उन्हें वापस काल कोठरी में भेजना चाहते हैं: AIKCC
किसान नेताओं ने उल्लेख किया कि पिछले तीन दशकों में किसानों का शोषण करने वाले कानूनों के खिलाफ एआईसीसी ने हमेशा आवाज उठाई है और आगे भी ऐसा करना जारी रखेगा। नए कानूनों को अपना समर्थन देने के पीछे की वजह बताते हुए संगठन ने कहा कि नए कृषि कानून किसानों के लिए एक नई शुरुआत होगी। उन्होंने कहा कि किसान आंदोलन में शामिल अराजक तत्व किसानों को मोदी सरकार द्वारा लाए गए कानूनों के खिलाफ भड़का कर उन्हें वापस काल कोठरी में धकेलने की कोशिश कर रहे हैं।
उनका तर्क था कि किसानों को एपीएमसी का पालन करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। इसके अलावा, किसानों के प्रतिनिधियों ने चेतावनी दी कि अगर केंद्र कृषि कानूनों को रद्द करती है तो वे सड़कों पर उतरेंगे। ज्ञापन में किसानों को आधुनिक तकनीक की उपलब्धता, कृषि उपकरणों और उर्वरकों पर जीएसटी में कमी और आवश्यक वस्तु अधिनियम के पूर्ण निरसन जैसी अन्य माँगों को भी सूचीबद्ध किया गया।
अखिल भारतीय किसान समन्वय समिति ने केंद्र सरकार का जताया आभार
अखिल भारतीय किसान समन्वय समिति (AIKCC) से जुड़े किसान नेताओं ने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि वह नए कृषि कानूनों को लागू करने के अपने फैसले पर अड़े रहें और प्रदर्शनकारी किसानों की त्रुटिपूर्ण माँगों को न मानें। उन्होंने कहा कि वे देश के विभिन्न हिस्सों से एकजुट होकर केंद्र सरकार के प्रति अपना आभार व्यक्त करने के लिए आए हैं, जिन्होंने ऐसा कानून लाया है, जो किसान की किस्मत बदल देगा।
इस बीच, केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर 40 किसान यूनियनों के साथ खाद्य मंत्री पीयूष गोयल और वाणिज्य और उद्योग राज्य मंत्री सोम प्रकाश के साथ बातचीत का नेतृत्व कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “हमने किसानों और किसान यूनियनों के नेताओं को समझाने की कोशिश की। हमारी इच्छा है कि वे क्लाउज-बाइ-क्लाउज चर्चा के लिए आएँ। यदि वे क्लाउज-बाइ-क्लाउज अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए तैयार हैं, तो हम चर्चा के लिए तैयार हैं।”
गौरतलब है कि विपक्षी दलों, खालिस्तानी कट्टरपंथियों और वामपंथियों के हाथों ‘किसान आंदोलन’ के हाइजैक होने के बाद अब किसान संगठनों में भी आपस में लड़ाई शुरू हो गई है। कोई वार्ता के पक्ष में है तो कोई तीनों कृषि कानूनों की वापसी के बगैर बातचीत नहीं करना चाहता।
भारतीय किसान यूनियन (BKU) के ‘एकता उगराहा’ गुट ने सोमवार (दिसंबर 14, 2020) को आयोजित उपवास से खुद को अलग कर लिया। बीकेयू (भानु) के तीन नेताओं ने इस्तीफा दे दिया। वहीं कॉन्ग्रेस नेता और अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के प्रमुख सरदार वीएम सिंह आंदोलन में पंजाब के किसानों के दबदबे से नाराज बताए जा रहे हैं।
खालिस्तानी और इस्लामी कट्टरपंथी ताकतों की घुसपैठ। वामपंथी अतिवादी संगठनों की साजिश को लेकर आशंका। विपक्षी दलों की सियासी रोटियाँ। इन सबसे बढ़कर किसान आंदोलन में शामिल प्रमुख संगठन भारतीय किसान यूनियन (BKU) और उसके नेता राकेश टिकैत की कलाबाजियाँ। एक नहीं कई कारण हैं, नए कृषि कानूनों के विरोध के नाम पर खड़े किए गए कथित किसान आंदोलन की मंशा पर संदेह होने के।
हम आपको पहले ही बता चुके हैं कि जिन सुधारों को लेकर किसानों के अब तक के सबसे बड़े नेता महेंद्र सिंह टिकैत ने 27 साल पहले आंदोलन किया था, आज उसी का विरोध हो रहा है। राकेश टिकैत इन्हीं महेंद्र सिंह टिकैत के बेटे हैं और बीकेयू से जुड़े फैसले लेते हैं। केंद्र सरकार से बातचीत करने वाले किसानों के कोर ग्रुप का भी वे हिस्सा हैं।
लेकिन ऐसा नहीं है कि राकेश टिकैत सिर्फ पिता का कहे भूले हैं। वे अपनी कही बातों से भी अब पीछे हट रहे हैं। वे आज उन्हीं सुधारों का विरोध कर रहे हैं जिसकी इस साल जून में उन्होंने प्रशंसा की थी। इतना ही नहीं 2019 के आम चुनावों के वक्त जब कॉन्ग्रेस ने इन्हें अपने घोषणा पत्र में जगह दी थी, तब भी बीकेयू ने उसे सराहा था।
दरअसल, साल 2019 में भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) ने अपने ट्विटर हैंडल से एक किसान घोषणा-पत्र जारी किया था। इस घोषणा-पत्र के साथ किसान यूनियन ने 4 ट्वीट किए थे। इनमें कहा गया था कि ये वो डॉक्यूमेंट हैं जिसमें उनकी परेशानी और उसके निदानों का विवरण है। उन्होंने कहा था कि कृषि में आजादी जरूरत है और हर राजनीतिक पार्टियों को इस सलाह को मानना चाहिए।
अगले ट्वीट में बीकेयू ने APMC एक्ट को खत्म करने की माँग करते हुए कहा था कि इससे किसानों को इंसाफ नहीं मिलता और इसके कारण व्यापार की आजादी, भविष्य में व्यापार करने की संभावनाओं पर भी रोक लगती है।
अगले ही ट्वीट में भारतीय किसान यूनियन ने अपने घोषणा-पत्र के जरिए इन सभी माँगों को रखते हुए कॉन्ग्रेस और राहुल गाँधी की प्रशंसा की थी। बीकेयू ने लिखा था, “इंडिया तभी खुशहाल होगा जब भारत अपनी आजादी का आनंद लेगा। गाँधी के 150वें जन्मदिवस पर ये घोषणा पत्र भारत की आजादी और न्याय के लिए है। हम खुश हैं कि कॉन्ग्रेस और राहुल गाँधी ने इसके कुछ अंश लिए हैं। देखते हैं भाजपा और नरेंद्र मोदी इसमें से क्या अपनाएगी।”
आगे इस ट्वीट में किसानों की बात करते हुए राजनीतिक पार्टियों पर भी सवाल उठाए गए थे कि अब समय है कि पार्टियाँ किसानों को देश का नागरिक मानें।
फिर भी बीकेयू नेता राकेश टिकैत का पाखंड समझ नहीं आया हो तो एक और प्रमाण देखिए। हिंदुस्तान अखबार में 4 जून 2020 को प्रकाशित इस खबर का स्क्रीनशॉट इस समय सोशल मीडिया पर खूब शेयर हो रहा है। राकेश टिकैत ने उस समय ‘एक मंडी’ के तोहफे को सराहते हुए सरकार के कदम का स्वागत किया था।
4 जून 2020 की खबर में टिकैत ने कहा था कि उनकी यूनियन इन माँगों पर वर्षों पहले से आवाज उठा रही थी और अब वह इस फैसले का स्वागत करते हैं। खबर में टिकैत के हवाले से आग्रह करते हुए बिचौलियों की गतिविधियों पर विशेष रूप से ध्यान देने की बात कही गई थी ताकि कहीं इन कानूनों के आने के बाद भी बिचौलिए सक्रिय होकर किसानों की फसल सस्ते दामों पर खरीद कर आगे बेचना न शुरू कर दें।
उल्लेखनीय है कि किसानों के लिए लाए गए नए कृषि कानूनों के खिलाफ़ चल रहे इस आंदोलन में सिर्फ बीकेयू नेता राकेश टिकैत की दोहरी प्रवृत्ति सामने नहीं आई है, बल्कि कॉन्ग्रेस के फर्जी चेहरे का भी खुलासा हुआ है। साल 2019 में इसी कॉन्ग्रेस ने अपने घोषणा-पत्र में ऐलान किया था कि वह सरकार में आई तो सरकारी मंडी में फसल बेचने की अनिवार्यता को खत्म कर देगी।
ख़ास बात यह है कि तब भारतीय किसान यूनियन (BKU) ने भी कॉन्ग्रेस के इस कदम का स्वागत किया था। आज यही BKU इन कृषि सुधारों का विरोध कर रही है। इसका कारण क्या है? यह कैसी किसान पॉलिटिक्स है? यह बेहतर राकेश टिकैत ही बता सकते हैं, क्योंकि AAP सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल के भी BKU के साथ लिंक सामने आए हैं।
तमिलनाडु में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। उससे पहले सियासी हलचल तेज हो गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक़ असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लमीन (AIMIM) और कमल हासन की मक्कल नीधि मैयम (MNM) आगामी चुनावों के लिए गठबंधन कर सकती है।
न्यूज़ 18 में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार बिहार चुनाव में सफलता हासिल करने के बाद ओवैसी अप्रैल-मई 2021 में होने वाले तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के लिए तैयारियाँ शुरू कर चुके हैं। बिहार चुनाव में 5 सीट जीतने वाली ओवैसी की पार्टी तमिलनाडु के चुनावों में लगभग 25 सीट पर चुनाव लड़ सकती है। 2019 आम चुनावों के दौरान कमल हासन के साथ ओवैसी सहमति बनाने में कामयाब नहीं हुए थे। लेकिन अब इसकी सम्भावनाएँ नज़र आ रही हैं।
ओवैसी सोमवार को एआईएमआईएम (तमिलनाडु) पदाधिकारियों के साथ बैठक भी करने वाले हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ ओवैसी जनवरी के दौरान आगामी विधानसभा चुनावों की रणनीति को अंतिम स्वरूप देने के लिए चेन्नई और त्रिची में प्रेस वार्ता कर सकते हैं। कमल हासन ने भी सोमवार को कहा कि उनकी पार्टी आगामी तमिलनाडु विधानसभा चुनावों का हिस्सा बनेगी। सीटों को लेकर उनका कहना था, “उन सीटों की घोषणा बाद में करूँगा जिन पर मेरी पार्टी के उम्मीदवार चुनाव लड़ेंगे।“
एआईएमआईएम का बढ़ता प्रभाव
एआईएमआईएम को बिहार विधानसभा चुनावों में सफलता हासिल हुई थी। पार्टी ने 5 मुस्लिम बाहुल्य सीटों अमौर, कोचाधमन, बहादुरगंज, जोकीहाट और बायसी पर जीत दर्ज की थी। इसके अलावा एआईएमआईएम ने हैदराबाद के निकाय चुनावों में भी 44 सीटें हासिल की थीं।
मुस्लिम समुदाय के लोगों पर पार्टी का राजनीतिक प्रभाव बढ़ने की वजह से एआईएमआईएम मदुरै, वेल्लौर, रानीपेट, तिरुपत्तूर, कृष्णगिरी, रामनाथ, पुदुकोट्टई, त्रिची और तिरुनवेल्ली में भी बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद कर रही है, क्योंकि इन सभी सीटों पर पर्याप्त मुस्लिम वोट बैंक है। 2011 में आई जनगणना के मुताबिक़ तमिलनाडु में मुस्लिम आबादी 5.86 फ़ीसदी है।
अभी तक वहाँ का मुस्लिम वोट परंपरागत रूप से डीएमके और एआईएडीएमके को जाता था, जबकि वहाँ पर तमाम मुसलमान केंद्रित राजनीतिक दल हैं। इसमें इंडियन नेशनल लीग, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग, मणिथानेया मक्कल कात्ची, मणिथानेया जननायागा कात्ची, ऑल इंडिया मुस्लिम लीग और तमिलनाडु तौहीद जमात शामिल हैं। फ़िलहाल ओवैसी की पार्टी तमिलनाडु में बड़ी सफलता की उम्मीद देख रही है।
एआईएडीएमके को ना, डीएमके के जवाब का इंतज़ार
नवंबर 2020 के दौरान एआईएमआईएम के तमिलनाडु अध्यक्ष ने डीएमके को गठबंधन का प्रस्ताव भेजा था, फ़िलहाल उनकी तरफ से प्रतिक्रिया आना बाकी है। एआईएमआईएम ने एआईएडीएमके के साथ किसी भी तरह का गठबंधन करने से साफ़ इनकार कर दिया है, क्योंकि वह भाजपा के साथ चुनाव लड़ने वाली है। एक सूत्र के मुताबिक़, “ओवैसी प्रदेश के सभी राजनीतिक दलों को एक करके चुनाव लड़ने की योजना बना रहे हैं। एआईएमआईएम इन चुनावों में मक्कल नीधि मैयम (कमल हासन की पार्टी), नाम तमिलर और अन्य छोटे दलों के साथ गठबंधन कर सकते हैं.”
पश्चिम बंगाल में चुनाव लड़ेगी एआईएमआईएम
ओवैसी ने पहले ऐलान किया था कि उनकी पार्टी आगामी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव भी लड़ेगी। चुनाव पर पार्टी का पक्ष रखते हुए ओवैसी ने कहा था, “बिहार की जीत उन लोगों के लिए जवाब है जिन्हें ऐसा लगता है कि एआईएमआईएम को अन्य राज्यों में चुनाव नहीं लड़ना चाहिए। क्या हम एनजीओ हैं जो अभी तक सिर्फ सेमिनार आयोजित कराएँगे और पेपर प्रेजेंट करेंगे। हम राजनीतिक दल हैं और हम चुनाव लड़ेंगे।“
कर्नाटक हाईकोर्ट ने सोमवार (दिसंबर 14, 2020) को उन रिट याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिसमें ऐसे निर्देश की माँग की गई थी कि गैर हिन्दुओं को कर्नाटक हिंदू धार्मिक संस्थान और धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग (KHRICE) के तहत आयुक्तों (कमिश्नर्स) के कार्यालय में काम करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि हम ऐसी याचिका पर विचार नहीं कर सकते, जो हमें सौ साल पीछे ले जाती हो।
याचिका को रद्द करते हुए मुख्य न्यायाधीश अभय एस ओका की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, “हिंदू धर्म कभी भी इतना संकीर्ण नहीं था। हिंदू धर्म में ऐसे लोग नहीं हैं जो इतने संकीर्ण विचार रखते हों।”
याचिकाओं में कर्नाटक हिंदू धार्मिक संस्थान और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम की धारा 7 को सख्ती से लागू करने की माँग की गई, जिसमें यह माँग की गई कि कोई भी व्यक्ति जो हिंदू धर्म को स्वीकार नहीं कर रहा है, को उक्त अधिनियम के तहत नियुक्त आयुक्त के कार्यालय में काम करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
इनमें से एक याचिका एनपी अमृतेश ने महालिंगेश्वर मंदिर द्वारा आयोजित वार्षिकोत्सव के निमंत्रण कार्ड पर एबी इब्राहिम, जो हिंदू धार्मिक संस्थानों और धर्मार्थ बंदोबस्त विभाग, मंगलुरु में डिप्टी कमिश्नर के रूप में काम कर रहे थे, के नाम पर सवाल उठाते हुए दायर की थी।
लाइव लॉ की एक रिपोर्ट के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश अभय ओका और न्यायमूर्ति एस विश्वजीत शेट्टी की खंडपीठ ने अमृतेश द्वारा दायर याचिका में ऐसी प्रार्थना को पढ़कर हैरानी व्यक्त की, जिसमें डिप्टी कमिश्नर (उपयुक्त) को मंदिर में प्रवेश करने से रोकने के लिए निर्देश देने की माँग की गई थी।
दूसरी याचिका ‘भारत पुनारत्थान ट्रस्ट’ द्वारा दायर की गई थी, जिसमें अधिनियम के तहत आयुक्त के कार्यालय में मोहम्मद देशव अलीखान को अधीक्षक के रूप में नियुक्त करने पर आपत्ति जताई गई थी।
अदालत ने कहा कि क्या आसमान टूट पड़ेगा अगर वो मंदिर में प्रवेश करेंगे? पीठ ने कहा कि हिंदू धर्म कभी इतना संकीर्ण नहीं था। पीठ ने कहा, “देश में कहीं भी चले जाइए, ऐसे कई उदाहरण हैं, जहाँ बड़े हिंदू त्योहारों में ऐसे सरकारी अधिकारियों ने प्रशासन की मदद की, जो हिंदू धर्म स्वीकार नहीं करते।”
याचिकाओं पर कड़ी आपत्ति जताते हुए, प्रधान न्यायाधीश ओका ने कहा, “संविधान लागू होने के बाद हमने कभी भी अदालत में ऐसी याचिकाओं पर विचार नहीं किया। संविधान नाम की भी कोई चीज है, संवैधानिक दर्शन नाम की भी एक चीज होती है। हम एक ऐसी याचिका पर विचार नहीं करेंगे, जो हमें 100 साल पीछे ले जाती है।”
असम के शिक्षा मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता हिमांत बिस्वा सरमा ने सोमवार (दिसंबर 14, 2020) को कहा कि राज्य मंत्रिमंडल ने राज्य में शिक्षा को सेक्युलर बनाने का फैसला किया है। इसलिए, असम में 198 उच्च मदरसे और 542 अन्य मदरसे सामान्य शिक्षण संस्थान के रूप में संचालित होंगे। उन्होंने कहा कि इन संस्थानों में अब मजहबी पढ़ाई के लिए छात्रों को एडमिशन नहीं दिया जाएगा।
बता दें कि फरवरी 2020 में एक महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए असम सरकार ने घोषणा की थी कि सरकार सभी राज्य संचालित मदरसों और संस्कृत टोल्स को बंद कर रही है। सरमा ने उस समय कहा था कि धार्मिक उद्देश्यों के लिए धार्मिक शास्त्र, अरबी और अन्य भाषाओं को पढ़ाना सरकार का काम नहीं है।
असम में राज्य सरकार द्वारा संचालित किए जाने वाले लगभग 1000 मदरसे हैं। राज्य सरकार इन मदरसों पर लगभग 260 करोड़ रुपए सालाना खर्च करती है। सरमा ने कहा था कि राज्य सरकार ने स्थिति का मूल्यांकन किया है और फैसला किया है कि राज्य को सार्वजनिक धन का उपयोग करके कुरान को पढ़ाना या प्रचार नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि राज्य द्वारा संचालित मदरसों की उपस्थिति के कारण कुछ संगठनों द्वारा भगवद गीता और बाइबल के साथ-साथ स्कूलों में पढ़ाने की माँग की गई थी, लेकिन सभी धार्मिक शास्त्रों के अनुसार स्कूलों को चलाना संभव नहीं था।
गौरतलब है कि हिमांत बिस्वा सरमा ने ग्रीष्मकालीन विधानसभा सत्र के दूसरे दिन शिक्षा विभाग पर बोलने के दौरान मदरसों के प्रान्तीयकरण के सवाल का जवाब देते हुए कहा था कि सरकार के मदरसे नवंबर से बंद हो रहे हैं, इसलिए नए मदरसों के प्रांतीयकरण करने का कोई सवाल ही नहीं है। उन्होंने कहा था कि अब से असम सरकार केवल धर्मनिरपेक्ष और आधुनिक शिक्षा को बढ़ावा देगी।
वहीं संस्कृत के बारे में बात करते हुए शर्मा ने कहा था कि संस्कृत सभी आधुनिक भाषाओं की जननी है। असम सरकार ने सभी संस्कृत टोल्स को कुमार भास्कर वर्मा संस्कृत और प्राचीन अध्ययन विश्वविद्यालय (नलबाड़ी में) के तहत लाने का फैसला किया है। वह एक नए रूप में कार्य करेंगे।