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सिख सैनिकों को भड़काया, कश्मीर में अलगावाद का समर्थन: SFJ के खतरनाक इरादे, 36 साल पहले ऐसे ही ‘खोए’ थे 574 जवान

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) द्वारा दायर चार्जशीट में एक चौंकाने वाली बात सामने आई है कि अमेरिका आधारित ‘सिख फॉर जस्टिस’ (SFJ/Sikh for Justice), जो कि एक खालिस्तान समर्थक संगठन है, भारतीय सेना में शामिल सिख समुदाय के भीतर भारत-विरोधी भावनाओं को भरने का प्रयास करता रहा है। इस खुलासे में पता चला है कि SFJ इन सिख सैनिकों को देश के खिलाफ विद्रोह करने के लिए भी उकसा कर देश की सुरक्षा को खतरे में डालने की कोशिश करता रहा है।

NIA के अनुसार, “SFJ भारतीय सेना में शामिल सिख सैनिकों को उकसाने के साथ-साथ कश्मीर के युवाओं को कट्टरपंथी बनाने और भारत के लिए कश्मीर के अलगाव को खुले तौर पर समर्थन देने की कोशिश कर रहा है।”

SFJ नेता और आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू, खालिस्तान टाइगर फोर्स के प्रमुख हरदीप सिंह निज्जर और बब्बर खालसा इंटरनेशनल के प्रमुख परमजीत सिंह उर्फ ​​पम्मा सहित 16 आरोपितों के नाम वाली चार्जशीट में यह भी दावा किया गया है कि SFJ कश्मीरी युवाओं को कट्टरपंथी बनाने की कोशिश कर रहा है और खुले तौर पर कश्मीर के अलगाव को समर्थन दे रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, एनआईए के प्रवक्ता ने बताया कि जाँच एजेंसी, और अन्य केंद्रीय एजेंसियों द्वारा सौंपे गए डोजियर के आधार पर, एसएफजे के मुख्य संरक्षक – गुरपतवंत सिंह पन्नु, हरदीप सिंह निज्जर और परमजीत सिंह उर्फ ​​पम्मा को गैर-कानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत ‘आतंकवादी’ के रूप में नामित किया गया है।

प्रवक्ता के अनुसार, फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सएप, यू-ट्यूब और कई अन्य वेबसाइटों पर अनेकों सोशल मीडिया अकाउंट लॉन्च किए गए थे जिनका उपयोग युवाओं को कट्टरपंथी बनाने, शांति और सद्भाव को बिगाड़ने और आतंकवादी गतिविधियों के लिए धन जुटाने के लिए किया जा रहा था।

केंद्रीय जाँच एजेंसी ने बुधवार (दिसंबर 08, 2020) को यूएपीए के तहत संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम और कनाडा के 16 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दायर की, जो कथित रूप से भारत में धर्म और क्षेत्र के बहाने देशद्रोही गतिविधियों और शत्रुतापूर्ण दुश्मनी में शामिल थे।

एनआईए के एक अधिकारी के अनुसार, मामले की जाँच से पता चला है कि मानवाधिकारों की वकालत करने वाले समूह के नाम पर शुरू किया गया एसएफजे पाकिस्तान सहित विदेशी धरती से संचालित होने वाले ‘खालिस्तानी आतंकवादी समूहों’ का फ्रंटल ऑर्गनाइजेशन है।

अधिकारी ने कहा, “यह अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे विभिन्न देशों में ‘मानवाधिकार सुरक्षा समूह’ की आड़ में अपने कार्यालय चलाने वाला एक अलगाववादी संगठन था।”

स्वर्ण मंदिर पर सेना की कार्रवाई से नाराज 574 भगौड़े सिख सैनिक हुए थे गिरफ्तार- न्यूयॉर्क टाइम्स

SFJ संगठन को लेकर NIA का खुलासा न्यूयॉर्क टाइम्स की एक खबर को पुख्ता करता है। जून 12, 1984 के दिन अमेरिकी समाचार पत्र ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ में प्रकाशित एक खबर के अनुसार, भारतीय सेना ने ऐसे 574 सिखों को गिरफ्तार किया था, जो खालिस्तानी चरमपंथी भिंडरावाले के कब्जे से स्वर्ण मंदिर को आजाद कराने के लिए चलाए गए ऑपरेशन से नाराज होकर भारतीय सेना से भाग निकले थे। सम्भव है कि यह SFJ संगठन के षड्यंत्रों का ही नतीजा था जो भारत को अपने जाँबाज सिख सैनिकों को खोना पड़ा।

इस रिपोर्ट के अनुसार, पूर्वोत्तर भारत में सेना छोड़कर गए 500 से 600 सिख सैनिकों को तीन स्थानों पर गिरफ्तार किया गया, जिनमें एक एनकाउंटर में 26 सिख चरमपंथी मारे गए थे। उसी समय, उत्तर में और पश्चिम में, बॉम्बे (अब मुंबई) के पास भी ऐस घटनाएँ सामने आई थीं। इस रिपोर्ट में जिक्र किया गया है कि ‘प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया’ ने रामगढ़ और नई दिल्ली के बीच कई जगहों पर 574 गिरफ्तारियों की सूचना दी।

न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, “ये वो भगौड़े सिख सैनिक थे जो सिख धर्म के सबसे पवित्र स्थल, पंजाब के अमृतसर में स्वर्ण मंदिर पर पिछले मंगलवार और बुधवार को भारतीय सेना के हमले के बाद गुस्से में बिहार राज्य के रामगढ़ चले गए थे। ये सैनिक भारत भर से अमृतसर जा रहे अन्य सिखों में शामिल हो गए।”

गौरतलब है की यह रिपोर्ट जिस घटना का जिक्र करती है वह भारतीय सेना द्वारा खालिस्तानी चरमपंथियों से स्वर्ण मंदिर को आजाद करने को लेकर चलाए गए ऑपरेशन ब्लू स्टार है जिसे लेकर सिख समुदाय के एक वर्ग के भीतर सत्ता पख के प्रति जबरदस्त आक्रोश भी रहा और इसके चलते तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को अक्टूबर 31, 1984 उन्हीं के सिख सुरक्षाकर्मियों ने गोली मारकर हत्या कर दी।

भारत सरकार द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार, इस ऑपरेशन में 83 सैनिक तथा 493 आम नागरिक व चरमपंथी मारे गए। इस कार्यवाही में 86 से अधिक नागरिक, 249 सैनिक घायल हो गए जबकि 1592 को गिरफ्तार किया गया।

वंदे मातरम का मंच से ही विरोध कर दिया था कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मो. जौहर ने, बोया था जामिया का बीज, जहाँ गूँजता है नारा-ए-तकबीर

सन् 1920 की बात है। महात्मा गाँधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन छिड़ चुका था। हर ओर अंग्रेजों के बहिष्कार के लिए मुहीम चल रही थी। जनमानस की जागृति हेतु हर संभव प्रयास हो रहे थे। ब्रिटिश सरकार के प्रभुत्व को खारिज करने के लिए गाँधी चाहते थे कि हर हाल में भारतीय लोग ब्रिटिश सरकार को अपना सहयोग देना बंद करें। 

उनके इस अभियान का उद्देश्य था कि चाहे बात सरकारी निकाय में काम करने वाले भारतीय अधिकारियों की हो या फिर अंग्रेजों द्वारा संचालित स्कूल-कॉलेज में पढ़ रहे छात्र-छात्राओं की, हर कोई उन चीजों का बहिष्कार करे, जिससे ब्रिटिश अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही थी। इसके अलावा इस आंदोलन के पीछे उनका एक और महत्तवपूर्ण मकसद था, जो देश में राष्ट्रीय स्कूलों और कॉलेजों की स्थापना करके पूरा होना था।

अब चूँकि गाँधी के असहयोग आंदोलन में कई मुस्लिम नेता बढ़-चढ़ कर शामिल हुए थे, तो गाँधी समेत इन सबके लिए राष्ट्रीयता के नाम पर मुस्लिमों के लिए शैक्षणिक संस्थान खोलना एक ड्रीम प्रोजेक्ट था। नतीजा, इसी सपने को आधार बना कर सन् 1920 में 26 अक्टूबर को अलीगढ़ में जामिया की स्थापना एक संस्थान के रूप में हुई। 

जामिया मिलिया इस्लामिया की आधारशिला मौलाना महमूद हसम ने रखी थी। लेकिन इसके संस्थापकों में एक ऐसे शख्स का नाम शामिल था, जिसके बारे में कहा जाता है कि उनका सपना हिंदुस्तान को दारुल इस्लाम बनाना था और जिसने 1923 में भरी सभा में खड़े होकर सबके बीच वंदे मातरम का विरोध कर दिया था।

मोहम्मद अली जौहर, जामिया के पहले कुलपति

जी हाँ, हम बात कर रहे हैं मोहम्मद अली जौहर की। जौहर, भारत के इतिहास में एक ऐसे मजहबी नेता थे, जिन्होंने साल 1930 में मुस्लिम लीग की ओर से लंदन में हुए गोल मेज सम्मेलन में, ब्रिटिश हुकूमत के सामने गुलाम भारत में मरने तक से मना कर दिया था। उन्होंने उस सम्मेलन में बात रखते हुए कहा था कि या तो भारत को आजादी दी जाए या फिर लंदन में उन्हें कब्र के लिए जमीन दी जाए। सम्मेलन में वह कह चुके थे कि वो गुलाम भारत में वापस नहीं जाना चाहते। इसलिए उन्हें वहीं कब्र मिले।

आज मुहम्मद अली जौहर का जन्मदिवस है। उनका जन्म 10 दिसंबर 1878 में यूपी के रामपुर में हुआ था। अलीगढ़ के देवबंद से तालीम पाने वाले जौहर उच्च शिक्षा के लिए ऑक्सफॉर्ड तक पहुँचे। उन्होंने वहाँ लिंकन कॉलेज से 1898-1902 में मॉर्डन हिस्ट्री की पढ़ाई की लेकिन ICS परीक्षा में असफल होने के कारण ब्रिटिश सरकार की सिविल सर्विस का हिस्सा नहीं बन पाए। तत्पश्चात उन्होंने रामपुर और बडोरा में सेवा दी। इसी बीच उनकी करीबियाँ मुस्लिम लीग से बढ़ने लगीं।

सन् 1911 में कलकत्ता से अंग्रेजी साप्ताहिक ‘कामरेड’ और 1913 में दिल्ली से ‘हमदर्द’ जैसी पत्रिकाएँ निकाल कर इस्लामी प्रोपगेंडा को हवा देने वाले जौहर पर धर्मांतरण का समर्थन करने के इल्जाम लगते रहे हैं। कहते हैं कि उन्होंने यही सब करके ‘मौलाना’ की उपाधि प्राप्त की थी। 1918 में वह मुस्लिम लीग के अध्यक्ष बन चुके थे और 1919 में खिलाफत आंदोलन का आगाज करने वाले सबसे प्रमुख नेता।

खिलाफत आंदोलन से चमके मोहम्मद अली जौहर

कुछ लोगों को आज भी लगता है कि आजादी के संग्राम में ‘खिलाफत आंदोलन’ मात्र भारत की स्वतंत्रता के लिए चलाया गया एक अभियान था। लेकिन नहीं! वास्तविकता में यह एक ऐसा आंदोलन था, जिसकी नींव तुर्की में खलीफा का शासन बरकरार रखने के लिए पड़ी थी।

दरअसल विश्व युद्ध के दौरान जब तुर्की ने जर्मनी का साथ दे दिया था तो ब्रिटिश आग बबूला हो उठे। उन्होंने तुर्की को विभाजित किया, जिससे खलीफा शासन कमजोर हो गया और विश्व के अन्य मुसलमान क्रोधित हो गए। भारत में वही गुस्सा जौहर अली और शौकत अली में भी दिखने को मिला और इन्होंने ब्रिटिशों के ख़िलाफ़ खिलाफत आंदोलन की शुरुआत की। उस समय चूँकि महात्मा गाँधी मुसलमानों को आजादी की लड़ाई में हिस्सेदार बनाना चाहते थे तो उन्होंने व इंडियन नेशनल कॉन्ग्रेस ने मोहम्मद अली जौहर के साथ समझौता कर लिया।

वंदे मातरम का विरोध करने वाले मोहम्मद अली जौहर

मोहम्मद अली जौहर को लेकर एक और किस्सा जो बेहद प्रचलित है, वो यह कि उन्होंने 1923 में आंध्र प्रदेश के काकीनाड़ा में कॉन्ग्रेस के अधिवेशन के समय मंच से उतर कर वंदे मातरम को इस्लाम विरोधी बता दिया था। उस समय के मशहूर गायक विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने उन्हें समझाया भी था कि यह कॉन्ग्रेस का मंच है न कि कोई मस्जिद। मगर, जौहर ने नहीं सुनी तो नहीं सुनी। उनकी मुखालफत का ही परिणाम है कि आज भी कई कट्टरपंथी वंदे मातरम को इस्लाम विरोधी बता देते हैं।

जौहर की इस हरकत से पहले कॉन्ग्रेस के सभी सत्र और बैठकें वंदे मातरम से प्रारंभ होती थीं, लेकिन उस दिन एक मजहबी नेता ने पूरा माहौल बिगाड़ दिया। हालाँकि उनके मंच छोड़ने के बाद हर किसी ने वंदे मातरम दोबारा मन से गाया। देशघाती कई नीतियों और मजहबी झुकाव के कारण कॉन्ग्रेस में बाद में उनका विरोध हुआ और अंतत: वह फिर मुस्लिम लीग के नेता बने।

मुस्लिम लीग में शामिल होने के बाद 1924 में अधिवेशन के दौरान उन्होंने सिंध से पश्चिम का सारा क्षेत्र अफगानिस्तान में मिलाने की माँग की। लोगों के बीच दांडी यात्रा से प्रसिद्ध हुए महात्मा गाँधी के लिए जौहर ने सार्वजनिक रूप से जहर उगलते हुए कहा था कि गाँधी से अच्छा तो व्यभिचारी मुसलमान है।

मोहम्मद अली जौहर का जामिया प्रेम

जौहर पर चर्चा करने की और भी बहुत सी वजहे हैं लेकिन इन सबमें जो आज सबसे अधिक प्रासंगिक है, वो जामिया मिलिया इस्लामिया के प्रति इनका प्रेम। गुलाम हैदर, मौलाना को जामिया की बीज बोने वाला बताते हैं। उन्होंने भले ही जामिया को ज्यादा समय नहीं दिया मगर इस्लामी शिक्षा के प्रचार-प्रसार में उनकी संलिप्ता ने उन्हें अपने समुदाय की एक बड़ी पहचान दिलाई।

लंदन में अली जौहर की मृत्यु के बाद एक ओर जहाँ उन्हें उनकी इच्छानुसार भारत न भेज कर येरुशरम में दफनाया गया, वहीं उनकी बीवी अमजदी बेगम ने उनकी सारी एकेडमिक संबंधी चीजें जामिया को दे दीं। यानी जीते जी और मरने के बाद भी जामिया के लिए मौलाना एक महत्वपूर्ण शख्सियत थे।

साभार:जामिया मिलिया इस्लामिया की वेबसाइट

1 मार्च 1935 को इस यूनिवर्सिटी को दिल्ली के कनॉट प्लेस से ओखला में लाया गया और उसके बाद 1936 में इसे नए कैंपस में शिफ्ट किया गया, जहाँ जामिया के सभी संस्थान आए। जामिया को दिसंबर 1988 में भारतीय संसद में एक एक्ट के तहत संस्थान से यूर्निवर्सिटी का दर्जा मिला और तब यह सेंट्रल यूनिवर्सिटी में तबदील हो गई।

इस यूनिवर्सिटी की वेबसाइट पर आज इसका बखान आपको हर सेक्शन में पढ़ने को मिल जाएगा। यहाँ से आपको ये भी पता चलेगा कि पिछले कुछ सालों में यूनिवर्सिटी ने कितनी उपलब्धियाँ हासिल की हैं। वेबसाइट से लिए गए स्क्रीनशॉट में आप विश्वविद्यालय द्वारा अर्जित कामयाबी को पढ़ सकते हैं। इसे लिखने वाली स्वयं इस यूनिवर्सिटी की वाइस चांसलर प्रोफेसर नज्मा अख्तर हैं।

साभार:जामिया मिलिया इस्लामिया की वेबसाइट

मगर, ये सब पढ़ते हुए यह ध्यान रहे कि पिछले कुछ सालों में जामिया यूनिवर्सिटी केवल अपनी शैक्षिक उपलब्धियों के कारण चर्चा का विषय नहीं बनी। इस यूनिवर्सिटी, जिसका बीज मोहम्मद अली जौहर ने बोया था, आज उन्हीं के विचारों का अनुसरण करने वालों छात्रों के कारण भी चर्चा में रही है।

जामिया मिलिया इस्लामिया क्यों बनी रही चर्चा में?

साल 2008 में बाटला हाउस एनकाउंटर के बाद मोहम्मद अली जौहर का यह जामिया चर्चा में आया था। हैरानी इस बात की नहीं थी कि दिल्ली को धमाकों से दहलाने वाले आतंकी उसी इलाके में छिपे थे। आश्चर्य इसका था कि आतंकियों के समर्थन में ऐसा ममतामयी माहौल तैयार किया जा चुका था कि संदिग्ध आतंकी एक न्यूज चैनल में घुस कर खुली चुनौती दे रहा था और तत्कालीन वीसी मुशीरुल हसन ने बाटला हाउस से गिरफ्तार आतंकियों को कानूनी मदद की घोषणा कर दी थी। हालाँकि बाद में जब दिल्ली पुलिस के तत्कालीन संयुक्त आयुक्त कर्नल सिंह ने मुशीरुल हसन के सामने सारे तथ्य रखे, तो वे चुप हो गए। इस बाटला हाउस एनकाउंटर में मोहन चंद्र शर्मा वीरगति को प्राप्त हुए थे।

इसके बाद जामिया मिलिया इस्लामिया को लेकर विवाद साल 2019 में बढ़ा और पूरे देश ने एक विश्वविद्यालय के रूप में राष्ट्रीय राजधानी में फलता-फूलता एक इस्लामी संगठन देखा। याद करिए, पिछले दिसंबर की शुरुआत में एंटी सीएए प्रोटेस्ट भड़कने से पहले एक ‘जामिया का छात्र’ नामक संगठन सामने आया था, जिसने एक पोस्टर जारी करके मजहब विशेष के लोगों से राजनीतिक रूप से अल्लाह के कानून द्वारा ‘शासन स्थापित करने’ के लिए संगठित होने का आह्वान किया था। इस पोस्टर में लिखा था ‘अल्लाह की आज्ञा हर कानून से सबसे ऊपर है।’

जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के छात्रों द्वारा नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ उग्र प्रदर्शन शुरू हुए। स्थिति इतनी बिगड़ गई की पुलिस को छात्रों को टाँगकर वहाँ से हटाना पड़ा। कुछ समय में वहाँ पत्थरबाजी की खबरें आनी शुरू हो गईं। बाद में वीडियोज से पता चला कि जामिया के ‘छात्रों’ ने हिंदुओं से आजादी के नारे भी लगाए हैं। छात्रों ने बुलंद आवाज में कहा था कि वह हिंदुओं से आजादी लेकर रहेंगे।

माहौल को बिगड़ता देख उस दौरान दिल्ली पुलिस ने बल का प्रयोग जरूर किया था और अराजक तत्वों पर कैंपस में घुस कर एक्शन लिया था, लेकिन हालातों को आँकिए तो शायद समय की वही माँग थी। बाद में पूरे मामले की जाँच में पता चला थ कि जामिया से 750 फेक आईडी कार्ड मिले, जिसने साफ कर दिया कि पूरी हिंसा एंटी सीएए प्रोटेस्ट के कारण नहीं भड़की बल्कि उसकी तैयारी बहुत पहले से चल रही थी।

विचार करने वाली बात है कि आखिर एक शैक्षणिक संस्थान में ‘तेरा-मेरा रिश्ता क्या? ला इलाहा इल्लल्लाह’ और ‘आज़ादी कौन दिलाएगा? जैसे नारे कौन लगाता है। कौन नारा-ए-तकबीर चिल्लाता है या कौन हिंदू राष्ट्र के नाम पर हिंदुओं पर हमला करता है? शायद एक लोकतांत्रिक देश में कोई भी नहीं। लेकिन अफसोस! जामिया के दिमाग में उस समय यही चल रहा था। उन्होंने आयशा व लदीदा जैसी कट्टरपंथी लड़कियों को पूरे प्रोटेस्ट की पोस्टर गर्ल बना दिया था और उनकी आड़ में अपनी आवाज उठा रहे थे।

धीरे-धीरे जब जामिया हिंसा शांत हुई और मामले की जाँच शुरू हुई तो हिंसा में शामिल प्रमुख चेहरों की हकीकत खुलने के साथ, दिल्ली पुलिस को पूरी हिंसा में पीएफआई की भूमिका भी मिली। पुलिस ने बताया कि कैसे हिंसा से दो दिन पहले 13 दिसंबर 2019 को कट्टरपंथी इस्लामी संगठन PFI के लगभग 150 सदस्यों ने विभिन्न राज्यों से दिल्ली में प्रवेश किया था और इन्हीं अराजक तत्वों द्वारा पथराव और आगजनी की शुरुआत हुई थी। पुलिस ने ये भी कहा था कि सिर्फ दिल्ली में हुई हिंसा के लिए ही नहीं बल्कि लखनऊ की हिंसा के पीछे भी पीएफआई का हाथ था।

सोचिए, एक समय था जब देश के राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने इस जामिया के लिए कटोरा लेकर भीख माँगने की बात कह दी थी और एक पिछले साल का जामिया था, जिसके छात्र पुलिस प्रशासन पर पत्थर फेंकने से नहीं चूके और न ही पीएफआई जैसे कट्टरपंथी संगठनों के साथ हाथ मिलाने से गुरेज किया। शायद वह जौहर के आदर्शों का परिणाम था कि जामिया में मजहब को आधार बना कर उपद्रव मचाने वाले लोग शाहीन बाग से लेकर दिल्ली में हुए उत्तर-पूर्वी दिल्ली के दंगों तक में सक्रिय भूमिका में पाए गए।

S02E05: किसान आंदोलन पर 14 दिन से बकैती | Ravish Kumar’s continuous propaganda on farmer protest

लगातार दो सप्ताह से बकैत रवीश कुमार ने वैसा ही प्रपंच फैलाना जारी रखा है जैसे वो शाहीन बाग के समय कर रहा था।

इस लिंक पर देखें पूरा वीडियो

अनिल कपूर और अनुराग पर जताई आपत्ति तो IAF पर ही टूट पड़े लिबरल ट्रोल्स व कॉन्ग्रेस समर्थक

नेटफ्लिक्स पर आने वाले शो ‘एके वर्सेज़ एके’ (AK vs AK) के एक सीन पर भारतीय वायुसेना की आपत्ति जताने के बाद कई कॉन्ग्रेस समर्थकों और लिबरल गिरोह के लोगों ने मात्र लोगों की नजरों में आने के लिए मामले में घुसने की कोशिश की और भारतीय वायु सेना से ही कह दिया कि उन्हें इसे गंभीरता से नहीं लेना चाहिए।

बता दें कि AK vs AK नाम के इस इस शो में अनिल कपूर और अनुराग कश्यप ने अभिनय किया है। नेटफ्लिक्स ने ‘AK vs AK’ के प्रचार के लिए एक वीडियो क्लिप शेयर की। जिसमें अनिल कपूर भारतीय वायुसेना (IAF) की वर्दी में दिख रहे हैं और ताबड़तोड़ गालियों का प्रयोग कर रहे हैं। वहीं इस क्लिप पर IAF ने प्रतिक्रिया देते हुए आपत्ति दर्ज की और संबंधित दृश्यों को फिल्म से हटाने के लिए कहा था।

हालाँकि कुछ कॉन्ग्रेस समर्थकों और उदारवादियों को IAF की प्रतिक्रिया अच्छी नहीं लगी। उन्होंने भारतीय वायुसेना को ही उपदेश देना शुरू कर दिया। एक कॉन्ग्रेस समर्थक ने भारतीय वायुसेना से कहा कि यह ‘सिर्फ एक फिल्म’ थी और फ़िल्म वायुसेना की शान को कम नहीं करेंगे।

वहीं, शिल्पी तिवारी नाम की एक यूज़र ने, शायद यह मानते हुए कि भारतीय वायुसेना को पता नहीं था कि यह एक फिल्म है, इस बारे में विस्तृत विवरण दिया कि IAF की वर्दी केवल एक “पोशाक” है और अनिल कपूर एक IAF अधिकारी नहीं बल्कि एक अभिनेता है। इतना ही नहीं उसने तो इस मामले पर IAF पर ही हमला बोल दिया और सवाल किया कि क्या वह फैंसी ड्रेस प्रतियोगिताओं में बच्चों द्वारा पहने जाने वाले ‘सामान पोशाकों’ को लेकर भी यहीं कहेंगे।

अब इन मोहतरमा को कौन समझाए की फ़िल्म में पोशाक पहनना गलत नहीं है, बल्कि उसको पहनकर अभद्र हरकतें करना गलत है। जो कि फैंसी ड्रेस प्रतियोगिताओं में बच्चें नहीं करते हैं।

इसी तरह ट्विटर पर अपने आप को ‘लेखक’, ‘अन्धकार-परस्त’, ‘आईलोरोफाइल- बिल्ली प्रेमी’ और ‘सागर-प्रेमी’ बताने वाली सानिया सैयद ने भी भारतीय वायुसेना को निशाना बनाते हुए कहा कि यह सिर्फ एक फिल्म थी और उन्हें इस पर ‘चिल’ करने की जरूरत है।

एक अन्य व्यक्ति जो ट्विटर पर @vanillaessence नाम से है, फिल्म में दृश्यों के लिए IAF की आपत्ति के बाद बताया कि कैसे स्कूल में उनकी एक दोस्त ने एक फैंसी ड्रेस पार्टी में IAF पहनकर और अनुचित तरीके से कार्टून मोगली का गीत गाया था।

@Meetsengupta नाम से जाने वाले एक अन्य ट्विटर यूजर ने भी IAF को सिनेमा के उद्देश्य को समझाने की कोशिश की। यहीं नहीं, भारतीय वायुसेना को बेहतर समझाने के लिए उसने अपना दृष्टिकोण भी रखा।

हद तो तब हो गई जब @aaliznat नाम के एक ट्विटर यूज़र ने IAF अधिकारी को ही संघी घोषित कर दिया।

बता दें हाल ही में अनिल कपूर और अनुराग कश्यप ने अपनी फिल्म एके बनाम एके को प्रमोट करने के लिए सोशल मीडिया पर एक स्टंट भी किया था। इस फिल्म के प्रमोशन के लिए दोनों फ़िल्मी हस्तियों ने ट्विटर पर आपस में झगड़ा किया।

दोनों अपनी वास्तविक ज़िंदगी के पेशे को ही स्क्रीन पर भी जिएँगे। इसकी कहानी कुछ यूँ है कि फिल्म स्टार से निर्देशक का झगड़ा होने के बाद निर्देशक अपमानित महसूस करेगा और बदला लेने के लिए उसकी बेटी का अपहरण करेगा। अनिल कपूर और अनुराग कश्यप अभिनीत 1:48 घंटे की ‘AK vs AK’ एक क्राइम जॉनर की डार्क-कॉमेडी फिल्म होगी।

‘रेफरंडम 2020’ मामले में NIA ने 16 विदेशी खालिस्तानी आतंकियों के खिलाफ दायर की चार्जशीट

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने रेफरेंडम 2020 (सिख फॉर जस्टिस) मामले में 16 विदेशी खालिस्तानियों के खिलाफ चार्जशीट दायर की है।

एनआईए ने आज कहा कि इन सभी पर ‘रेफरंडम 2020’ के बैनर तले ‘खालिस्तान’ के लिए सोची समझी साजिश के तहत अभियान चलाने का आरोप है। सभी आरोपितों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता तथा गैर कानूनी गतिविधि निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया है।

रिपोर्ट के अनुसार, जाँच में पता चला है कि अलगाववादी संगठन सिख फॉर जस्टिस ने मानवाधिकारों की वकालत के नाम पर यह संगठन बनाया और अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन तथा आस्ट्रेलिया जैसे देशों में इसके कार्यालय बनाए गए है।

चार्जशीट में शामिल आरोपितों की पहचान गुरवपंत सिंह पन्नू, अवतार सिंह, गुरप्रीत सिंह बागी, हरप्रीत सिंह, परमजीत सिंह, सरबजीत सिंह बन्नूर, अमरदीप सिंह शुद्धवाल, जे एस धालीवाल, कुलवंत सिंह मोथाडा, दपिन्दरजीत सिंह, हरदीप सिंह निज्जर, कुलवंत सिंह, हरजाप सिंह, सरबजीत सिंह, जितेंदर सिंघ ग्रेवाल, एस हिम्मत सिंह के रूप में हुई है। यह सभी सिख फ़ॉर जस्टिस के सदस्य है, जिसे UAPA अधिनियम के तहत अनलॉफुल एक्टिविटी के रूप में घोषित किया गया है।

एनआईए और अन्य एजेंसियों की रिपोर्ट के आधार पर, एसएफजे के मुख्य संरक्षक गुरवपंत सिंह पन्नू, हरदीप सिंह निज्जर और परमजीत सिंह को पहले ही UAPA अधिनियम के तहत आतंकवादी घोषित किया गया है।

जाँच के दौरान एनआईए को पंजाब के अमृतसर और जालंधर में आतंकी गुरवपंत सिंह पन्नू और आतंकी हरदीप सिंह निज्जर से संबंधित अचल संपत्तियों का पता चला था। जिसे एनआईए के अनुरोध पर गृह मंत्रालय ने गैरकानूनी गतिविधियों (रोकथाम) अधिनियम 1967 की धारा 51-ए के तहत कुर्की का आदेश दिया है। वहीं मामले में आगे की तफ्तीश जारी है।

गौरतलब है कि राष्ट्रीय जाँच एजेंसी ने इससे पहले खालिस्तानी आतंकी धरमिंदर सिंह के खिलाफ सप्लीमेंट्री चार्जशीट दायर की थी। रिपोर्ट के अनुसार उसने प्रतिबंधित आतंकी संगठन ‘खालिस्तानी लिबरेशन फ्रंट (KLF)’ की गतिविधियों को आगे बढ़ाया था और सीमा पार से आतंकी नेटवर्क को बढ़ावा देने में भी उसकी सहभागिता थी।

KLF नार्को-टेरर मामले में पंजाब स्थित मोगा के रहने वाले 32 वर्षीय खालिस्तानी आतंकी धरमिंदर सिंह के खिलाफ केस चल रहा है। वह पाकिस्तान में रहने वाले जज्बीर सिंह सामरा से हेरोइन लेकर स्थानीय तस्करों को मुहैया कराता था। इससे जो भी धन प्राप्त होता था, उसे पाकिस्तान भेजा जाता था। इसका इस्तेमाल भारत विरोधी आतंकी गतिविधियों में किया जाता था।

आज जब ‘किसान आंदोलन’ को हाइजैक कर खालिस्तानी अपने एजेंडे को बढ़ावा देने की कोशिश में लगे हुए हैं, इस बीच NIA की इस कार्रवाई से इस खतरे के फिर से सर उठाने को लेकर चिंता व्यक्त की जा रही है। इसी तरह से इस प्रदर्शन में प्रतिबंधित संगठन ‘सिख फॉर जस्टिस (SFS)’ के उपद्रवी भी शामिल हैं।

ज्ञात हो कि खालिस्तानी समूह सिख फॉर जस्टिस (SFJ) ने किसानों के विरोध-प्रदर्शनों के लिए समर्थन की घोषणा की थी। YouTube और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर ऐसे विज्ञापन दिखाई देने लगे हैं, जिसमें लोगों से खालिस्तानी आंदोलन में शामिल होने का आग्रह किया जा रहा है।

कर्नाटक: हंगामे के बीच गोहत्या के खिलाफ विधेयक पारित, सदन की कार्यवाही छोड़कर भागे कॉन्ग्रेसी

कर्नाटक विधानसभा में बुधवार (9 दिसंबर, 2020) को गोवंश वध रोकथाम और मवेशी संरक्षण विधेयक 2020 को पारित कर दिया गया है। हालाँकि इस दौरान कॉन्ग्रेस ने काफी हंगामा भी किया। इस बिल में गाय की तस्करी, अवैध ढुलाई, अत्याचार एवं गो-हत्या में लिप्त पाए जाने वाले व्यक्ति के खिलाफ सख्त कार्रवाई का प्रावधान भी है।

इस विधेयक में गोशाला स्थापित करने का भी प्रावधान किया गया है। साथ ही पुलिस को जाँच करने संबंधी शक्ति प्रदान की गई है। सदन में हंगामे के चलते विधेयक बिना बहस के ही पारित किया गया।

कर्नाटक के मंत्री केजी मधुस्वामी ने इसे लेकर न्यूज़ एजेंसी एएनआई से कहा,” गाय और बछड़ों को मारने की अनुमति नहीं है, 13 वर्ष से अधिक आयु वाली भैंसों को मारने की अनुमति दी गई है। अवैध बिक्री, परिवहन और गोहत्या को दंडनीय बनाया गया है। हालाँकि, उन्होंने कहा कि अगर कोई गाय किसी बीमारी से पीड़ित हो जाती है और वह बीमारी दूसरे मवेशियों में फैल सकती है तो उस गाय को मारा जा सकता है।”

बता दें कि पशुपालन मंत्री प्रभु चव्हाण द्वारा विधेयक पेश करने के बाद पर कॉन्ग्रेसी नेता तिलमिला गए थे। विपक्ष के नेता सिद्धरमैया के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस के विधायक अध्यक्ष के आसन के सामने आ कर हंगामा भी खड़ा किया। सिद्धरमैया ने भाजपा पर आरोप लगाते हुए कहा कि विधेयक को पेश करने के संबंध में कार्य मंत्रणा समिति की बैठक में चर्चा नहीं की गई।

सिद्धरमैया ने कहा, ”हमने कल इस बारे में चर्चा की थी कि नए विधेयक पेश नहीं किए जाएँगे। हम इस बात को लेकर सहमत हुए थे कि केवल अध्यादेश पारित किए जाएँगे। अब, उन्होंने (प्रभु चव्हाण) अचानक यह गो हत्या रोधी विधेयक पेश कर दिया।”

वहीं इस मामले पर विधानसभा अध्यक्ष विश्वेश्वर हेगड़े केगेरी ने कहा कि उन्होंने बैठक में यह साफ तौर पर कहा था कि महत्वपूर्ण विधेयक बुधवार और बृहस्पतिवार को पेश किए जाएँगे। जिस पर असंतुष्टि जाहिर करते हुए कॉन्ग्रेस विधायकों ने जमकर भाजपा के खिलाफ नारे लगाए। साथ ही विरोध जाहिर करते हुए कुछ लोग सदन के बाहर भी चले गए।

गौरतलब है कि भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव सीटी रवि ने पिछले दिनों कर्नाटक में गोवध पर प्रतिबंध लगाने की बात कही थी। उन्होंने कहा था कि निकट भविष्य में कर्नाटक में गोवध पर प्रतिबंध एक वास्तविकता होगा। कर्नाटक के पूर्व मंत्री एवं महाराष्ट्र, गोवा और तमिलनाडु में पार्टी मामलों के प्रभारी सीटी रवि ने कहा था कि गौवध पर प्रतिबंध लगाने वाला कानून आगामी विधानसभा सत्र में पारित किया जाएगा।

चिक्कमंगलुरु के विधायक गो-हत्या का विरोध और इसके खिलाफ सख्त कानून की माँग रखते हुए ट्वीट किया था कि, “मैंने पशुपालन मंत्री श्री प्रभु चव्हाण से कहा है कि कर्नाटक पशु वध संरक्षण और मवेशी संरक्षण विधेयक कैबिनेट में पारित हो और आगामी विधानसभा सत्र में भी पेश किया जाए।”

AK vs AK: IAF की आपत्ति के बाद अनिल कपूर और नेटफ्लिक्स ने माँगी माफी

वीडियो स्ट्रीमिंग साइट नेटफ्लिक्स पर आने वाले शो ‘AK vs Ak’ को लेकर काफी बवाल मच गया है। शो के ट्रेलर में एक सीन दिखाया गया है, जिसमें अन‍िल कपूर वायुसेना (IAF) की वर्दी में अनुराग कश्यप को आपत्त‍िजनक शब्द कहते नजर आ रहे हैं। इस सीन को लेकर वायुसेना ने आपत्त‍ि जताई थी और वह सीन हटाने को कहा था। अब इस पर शो के एक्टर अन‍िल कपूर ने वायुसेना से माफी माँगते हुए अपना एक वीड‍ियो शेयर किया है।

अन‍िल कपूर ने एक वीडियो शेयर करते हुए कहा है, “मेरी नई फिल्म AK vs Ak के ट्रेलर ने कुछ लोगों को दुख पहुँचाया है। उसमें मैंने भारतीय वायुसेना की यूनिफॉर्म पहनकर कुछ आपत्त‍िजनक शब्दों का इस्तेमाल किया है। अनजाने में लोगों की भावनाओं को आहत करने के लिए मैं माफी माँगना चाहता हूँ।”

इसी के साथ अन‍िल ने उस सीन के बारे में भी जानकारी दी है। वो कहते हैं, “फिल्म में यूनिफॉर्म पहने मेरा वो कैरेक्टर इसल‍िए नजर आया क्योंकि वो एक ऑफिसर का रोल अदा कर रहा है। जब उसे पता चलता है कि उसकी बेटी किडनैप हो गई है तब वो अपना गुस्सा जाहिर करता है जो कि एक भावनात्मक रूप से टूटे और व्याकुल पिता की है। वो बस कहानी के प्रति ईमानदार रहने के लिए था, इसल‍िए मेरा कैरेक्टर यूनिफॉर्म पहने हुए है जो कि अपनी बेटी को जी जान से ढूँढना चाहता है। मेरा या फिल्म निर्माताओं का वायुसेना का अनादर करने का कभी ये इरादा नहीं था। सभी सुरक्षा बलों के अध‍िकार‍ियों के प्रति हमेशा मेरे दिल में इज्जत और आभार है। इसल‍िए अनजाने में किसी की भावनाओं को चोट पहुँचाने के लिए मैं दिल से माफी माँगता हूँ।”

अन‍िल कपूर के अलावा नेटफ्ल‍िक्स ने भी ट्व‍ीट कर वायुसेना से माफी माँगी है। नेटफ्लिक्स ने लिखा, “आदरणीय @IAF_MCC हम किसी भी तरीके से कभी भी सशस्त्र बल का अनादर नहीं करना चाहते हैं। AK vs AK ऐसी फिल्म है ज‍िसमें अन‍िल कपूर और उनके को-स्टार्स बतौर एक्टर्स अपना किरदार निभा रहे हैं।”

सीन की बात करें तो जिस सीन की यहाँ बात हो रही है उसमें अनिल कपूर एक वायुसेना अधिकारी की वर्दी पहने हुए नजर आ रहे हैं। सीन में अनिल कपूर बॉलीवुड डायरेक्टर अनुराग कश्यप के साथ हैं और आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं।

वायु सेना ने इस वीडियो को लेकर आपत्ति जताते हुए लिखा था, “वीडियो में वायु सेना की यूनिफॉर्म को गलत ढंग से पेश किया गया है और जो भाषा इस्तेमाल की गई है, वह भी सही नहीं है। यह वीडियो भारतीय सेनाओं में तैनात सैनिकों के व्यवहार के अनुकूल नहीं है। इससे संबंधित सीन्स को हटाया जाना चाहिए।”

योगी सरकार ने चार साल में दी 4 लाख नौकरियाँ, सुप्रीम कोर्ट ने भी की तारीफ: जानिए किन पदों पर हुआ चयन

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने 4 साल में लगभग चार लाख लोगों को नौकरी और रोजगार देकर एक अनोखा रिकॉर्ड कायम किया है। यूपी सरकार ने चार साल में सबसे ज्यादा नौकरी और रोजगार दिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस रिकॉर्ड के तहत यूपी सबसे ज्यादा नौकरी और रोजगार देने वाला राज्य बन गया है।

बता दें, कोरोना काल के दौरान जहाँ सबकी नौकरियाँ जा रहीं थी, उस वक्त भी प्रदेश सरकार की भर्ती प्रक्रिया नहीं थमी। सीएम योगी बुधवार (9 दिसंबर,/2020) को 3209 ट्यूबवेल (Tubewell) चालकों को नियुक्ति पत्र दे कर वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए कैंडिडेट्स को संबोधित किया।

गौर करने वाली बात यह है कि अभ्यर्थियों से संवाद कर भर्ती प्रक्रिया की शुचिता और पारदर्शिता को सिर्फ अधिकारी ही नहीं बल्कि भर्ती प्रक्रिया के पश्चात खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी कैंडिडेट के टैलेंट को परखते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी योगी सरकार की भर्ती प्रक्रिया की सराहना की है।

पिछले 4 सालों में प्रदेश में इन पदों पर युवाओं को नौकरी मिली है:-

  • पुलिस विभाग – 1,37,253 नौकरियाँ
  • बेसिक शिक्षा – 1,21,000 नौकरियाँ
  • राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मिशन – 28,622 नौकरियाँ
  • यूपी लोक सेवा आयोग – 26,103 नौकरियाँ
  • उत्‍तर प्रदेश अधीनस्‍थ चयन बोर्ड – 16,708 नौकरियाँ
  • चिकित्‍सा स्‍वास्‍थ्‍य एवं परिवार कल्‍याण – 8,556 नौकरियाँ
  • माध्‍यमिक शिक्षा विभाग – 1,400 नौकरियाँ
  • यूपीपीसीएल – 6,446 नौकरियाँ
  • उच्‍च शिक्षा – 4,615 नौकरियाँ
  • चिकित्‍सा शिक्षा विभाग – 1,112 नौकरियाँ
  • सहकारिता विभाग – 726 नौकरियाँ
  • नगर विकास – 700 नौकरियाँ
  • वित्‍त विभाग – 614 नौकरियाँ
  • तकनीकी शिक्षा – 365 नौकरियाँ

सीएम ने कैंडिडेट्स से बातचीत के दौरान कहा कि सभी 3209 नवचयनित अभ्यर्थियों को इस बात पर गर्व करना चाहिए कि उन्हें किसी सिफारिश या जुगाड़ से यह सरकारी नौकरी नहीं मिली है। यह नौकरी आपकी अपनी मेधा, क्षमता और मेहनत से मिली है। सीएम ने कहा कि उत्तर प्रदेश में नौकरी का एक मात्र आधार ‘मेरिट’ ही है।

लव जिहाद के बाद बुजुर्ग माता-पिता को सताने, संपत्ति हड़पने वाले बच्चों के खिलाफ योगी सरकार सख्त: जल्द लागू होगा कानून

लव जिहाद के खिलाफ कानून बनाने के बाद यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार अब बुजुर्ग माता-पिता की सेवा नहीं करने और संपत्ति को हड़पकर उनको बेदखल करने वालों के खिलाफ कड़े नियम बनाने की तैयारी में है। इसके लिए सरकार भरण-पोषण एवं कल्याण नियमावली 2014 में संशोधन करने जा रही है। साथ ही इसमें बेदखली की प्रक्रिया को जोड़ा जाएगा।

इस कानून को लेकर राज्य विधि आयोग की सचिव सपना त्रिपाठी का कहना है कि नियमावली के प्रस्तावित संशोधन में न सिर्फ बुजुर्ग माता पिता के बच्चों, बल्कि रिश्तेदारों को जोड़ा गया है। पीड़ित माता-पिता अगर चाहें तो वह अपने केस को पहले एसडीएम और फिर प्राधिकरण के सामने प्रस्तुत कर सकते हैं। एसडीएम के आदेश के बाद ऐसे बच्चों को वह अपनी संपत्ति से बेदखल कर सकते हैं जो उनकी देखभाल नहीं करते या उन्हें प्रताड़ित करते हैं।

बता दें कि उत्तर प्रदेश स्टेट लॉ कमीशन ने शासन को संशोधन का प्रारूप तैयार कर पिछले दिनों ही इसकी रिपोर्ट भेजी है। दरअसल, यह नियमावली 2014 में ही बना दी गई थी। कोर्ट को लगातार मिल रहे शिकायतों से पता चला है कि बच्चें बूढ़े माता-पिता को बोझ समझकर उन्हें उनकी ही जायदाद से बेदखल कर देते है। यहीं नहीं उनका ख्याल रखने की जगह घर में वे उनसे दुर्व्यवहार भी करते है। हाई कोर्ट ने राज्य सरकार से इस नियमावली को और प्रभावशाली बनाने के निर्देश दिए थे।

वहीं उत्तर प्रदेश राज्य विधि आयोग ने भी इस मामले पर गहन रिसर्च किया। जिसके तहत माँ-बाप पर बच्चों द्वारा किए जा रहे शारिरिक व मानसिक उत्पीड़न का भी पता चला। यूपी लॉ कमीशन की स्टडी में पता लगा है कि ‘उत्तर प्रदेश माता-पिता तथा वरिष्ठ नागरिकों के भरण पोषण एवं कल्याण नियमावली-2014’ और ‘माता-पिता तथा वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण अधिनियम 2007’ जिन उद्देश्यों से बने थे वे उसे पूरा नहीं कर पा रहे। ऐसे में आयोग ने खुद ही नियमावली-2014 की विस्तृत कार्य योजना बनाई है और बेदखल की प्रक्रिया को भी शामिल करते हुए संशोधन का ड्राफ्ट तैयार किया है।

अब नए कानून के तहत माँ-बाप के साथ दुर्व्यवहार नहीं होगा। अध्यादेश के पास होने के बाद बुजुर्ग माँ-बाप बच्चों की सेवा न करने वालों बच्चों को प्रॉपर्टी से ही बेदखल कर दिया जाएगा। न ही वे किसी प्रकार का दुर्व्यवहार माँ-बाप से कर पाएँगे। बरसों से कमाई मेहनत के हकदार माँ-बाप ही होगा। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, प्रशासन जल्द ही इस कानून पर अपना फैसला देते हुए इसे पारित करेगी। आयोग की सचिव सपना त्रिपाठी ने बताया कि शासन को प्रारूप का प्रतिवेदन चार दिसंबर को प्रस्तुत किया गया है।

स्वदेशी कोरोना वैक्सीन को लेकर NDTV ने फैलाई फेक न्यूज़, स्वास्थ्य मंत्रालय ने किया खंडन

केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने भारत में बन रही कोरोना वैक्सीन को लेकर NDTV के एक फर्जी दावे का खंडन किया है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने NDTV की फेक न्यूज़ का खंडन करते हुए स्पष्ट किया है कि उसने सीरम इंस्‍टीट्यूट ऑफ इंडिया और भारत बायोटेक से कोरोना वायरस वायरस वैक्सीन के आपातकालीन इस्तेमाल के प्रस्तावों को अस्वीकार नहीं किया है।

मंत्रालय ने कहा कि विवादास्पद मीडिया हाउस एनडीटीवी की एक नई रिपोर्ट फर्जी है। इस तरह से विशेष तौर पर भारत में बन रही कोरोना वैक्सीन आने से पहले NDTV द्वारा इसे लेकर अफवाह फैलाने की एक प्रयास असफल रहा है।

NDTV समेत कुछ मीडिया चैनल्स ने दावा किया कि सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया और भारत बायोटेक के वैक्सीन के आपातकालीन इस्तेमाल के सुझाव को सुरक्षा के मद्देनजर खारिज कर दिया गया है। इस दावे को स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने पूरी तरह से गलत बताया है।

प्रोपेगेंडा समाचार चैनल NDTV की इस फेक रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया की सबसे बड़ी वैक्सीन बनाने वाली कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने 6 दिसंबर को ऑक्सफोर्ड वैक्सीन, ‘कोविशिल्ड’ के लिए अनुमोदन का अनुरोध किया था, और भारत बायोटेक ने अपने स्वदेशी रूप से विकसित COVID-19 वैक्सीन ‘कोवाक्सिन’ के आपातकालीन उपयोग अनुमोदन के लिए आवेदन किया था।

NDTV ने आदतन ‘सूत्रों’ के हवाले से प्रकाशित एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि ‘सीरम इंस्‍टीट्यूट ऑफ इंडिया और भारत बायोटेक के अपने कोरोना वायरस के आपातकालीन उपयोग के प्रस्तावों को अपर्याप्त सुरक्षा और दक्षता के आँकड़ों के कारण दोनों प्रस्तावों को मंजूरी नहीं दी गई है’। इसके साथ ही NDTV ने कहा कि दोनों से ही और जानकारी माँगी गई है।

स्वास्थ्य मंत्रालय और ‘पीआईबी फैक चेक’ के ट्विटर हैंडल ने कहा कि NDTV की यह रिपोर्ट फर्जी है, और दोनों ही प्रस्तावों को अस्वीकार नहीं किया गया है।

हालाँकि, सरकार ने NDTV की रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया दी, लेकिन इसे कई अन्य मीडिया हाउसों द्वारा भी प्रकाशित किया गया। News18, India Today, CNBC TV 18 और कई अन्य समाचार चैनल्स द्वारा भी इसी तरह की खबरों को लेकर दावा किया था कि डेटा के अभाव में सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और भारत बायोटेक की वैक्सीन को आपातकालीन इस्तेमाल की इजाजत नहीं दी गई है। सभी मीडिया रिपोर्ट्स ने अपनी रिपोर्ट को ‘सूत्रों के हवाले’ से ही प्रकाशित किया।

उल्लेखनीय है कि भारत में 6 वैक्‍सीन का क्‍लिनिकल ट्रायल चल रहा है जबकि भारत में तीन दवा कंपनियों ने नियामक एजेंसी से COVID-19 वैक्सीन के आपात इस्तेमाल की अनुमति माँगी हैं।

NBT की एक रिपोर्ट के अनुसार, बुधवार (दिसंबर 09, 2020) को नई दिल्ली से 64 देशों के राजनयिक हैदराबाद स्थित भारत बायोटेक और ‘बायोलाजिकल ई लिमिटेड’ का दौरा करने भी पहुँचे। भारत बायोटेक के अधिकारियों ने राजदूतों को लैब का टूर कराया और कोरोना वैक्सीन के विकास के बारे में जानकारी दी।