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पश्चिम बंगाल के ओंकारनाथ मठ की जमीन पर गुंडों का अतिक्रमण: माफियाओं ने स्वामी केशव रामानुज को दी मारने की धमकी

पश्चिम बंगाल ताड़केश्वर के ओंकारनाथ मठ में बड़े पैमाने पर भूमि अतिक्रमण को लेकर रियल एस्टेट माफियाओं का दबदबा बढ़ता जा रहा है। हाल ही में, बिल्डरों द्वारा भूमि अतिक्रमण के खिलाफ विरोध करने पर मठ के प्रमुख को धमकी दी गई।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, हाल ही में ओंकारनाथ मठ के प्रमुख त्रिवेणी स्वामी केशव रामानुज जीयूर महाराज जी ने मंदिर की भूमि पर अतिक्रमण करने के मामले का विरोध किया था। जिसको लेकर एक बिल्डर ने उन्हें धमकी दी। जिसके बाद मठ के प्रमुख ने तारकेश्वर पुलिस स्टेशन में एक लिखित शिकायत दर्ज कराई है।

बता दें हाल ही में मठ के परिसर से सटे भूमि को एक स्थानीय प्रमोटर द्वारा खरीदा गया था। तारकेश्वर जोय कृष्ण बाजार के पास की जमीन पर आने जाने की जगह नहीं थी। जिसके बाद जगह बनाने के लिए बिल्डर ने मठ से जुड़ी दलदली जमीन को ही जेसीबी से भरकर मठ परिसर के माध्यम से एक सड़क बनाना शुरू किया, जिस वजह से दोनों पक्षों के बीच बहस शुरू हो गई। जैसे ही इस अतिक्रमण का स्वामी महाराज ने विरोध किया, उन्हें धमकी दी गई और साथ ही दुर्व्यवहार किया गया।

गौरतलब है कि 2017 में बहु-मंजिला इमारत के निर्माण के समय मठ की सीमा की दीवार को भी ध्वस्त कर दिया गया था। उस दौरान घटना के संबंध दर्ज किया गया मुकदमा अभी भी अदालत की तारीखों के चक्कर काट रहा है।

इतना ही नहीं स्वामी केशव रामानुज जीयूर महाराज जी को कथिततौर पर स्थानीय गुंडों द्वारा मानसिक रूप से परेशान किया जा रहा है। गुंडों ने मठ के प्रमुख को गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी भी दी है। वहीं इस मामले में उन्होंने स्थानीय पुलिस स्टेशन में एक शिकायत दर्ज कराई है क्योंकि उनके पास इसके अलावा कोई चारा नहीं है।

वहीं अब मामले के सामने आने के बाद विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने अन्य हिंदू संगठनों के साथ मिलकर राज्य में रियल एस्टेट माफिया और भूमि अतिक्रमण के खिलाफ मंदिर को समर्थन देने के लिए मठ प्राधिकरण से संपर्क करने की कोशिश कर रहे हैं।

UP के इंटर कॉलेजों में सेनेट्री पैड वेंडिंग मशीन, स्कूलों में लड़कियों को करियर काउंसलिंग: योगी सरकार की पहल

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार पर अक्सर पितृसत्तात्मक होने के इल्जाम मढ़े जाते रहे हैं, लेकिन इन सभी चीजों से ऊपर उठ कर इस सरकार ने हमेशा प्रदेश की महिलाओं के लिए उपयुक्त कदम उठाए और उनके कल्याण हेतु योजना चलाई।

अब इसी क्रम में सरकार ने एक और सराहनीय फैसला लिया है। इस फैसले के अनुसार राज्य में पहली बार 1000 राजकीय कन्या इंटर कॉलेजों में सेनेट्री पैड वेंडिंग मशीन व इंसीनिरेटर लगेंगे।

हर मशीन व इंसीनिरेटर के लिए 30 हजार रुपए दिए जाएँगे। पूरी योजना पर 3 करोड़ रुपए का खर्चा आएगा। इस योजना का उद्देश्य लड़कियों को मासिक धर्म के दौरान स्कूल में होने वाली परेशानियों से निजात दिलाना है ताकि वह अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित कर पाएँ।

इससे पूर्व 6 से 8 कक्षा तक चलने वाले कस्तूरबा गाँधी आवासीय स्कूलों में सेनेट्री नैपकिन वेंडिंग मशीन व इंसीनिरेटर लगाए जाते थे। लेकिन अब पहली बार समग्र शिक्षा अभियान के तहत इसे विस्तार देते हुए राजकीय कन्या इंटर कालेजों में लगाया जाएगा।

इसके अलावा सरकार ने स्कूल जाने वाली लड़कियों के सुनहरे भविष्य के लिए 779 स्कूलों में करियर काउंसलिंग कार्यक्रम चलाने की योजना भी बनाई है। इसके लिए सरकार प्रति स्कूल 7 हजार रुपए खर्च करेगी। इसके साथ ही सरकार ने 28839 स्कूलों में लड़कियों को सेल्फ डिफेंस ट्रेनिंग देने का ऐलान किया है।

जानकारी के अनुसार 8वीं कक्षा तक की लड़कियों को सेल्फ डिफेंस की ट्रेनिंग दी जाएगी। इसके लिए 28839 स्कूलों में 3 महीने तक का प्रशिक्षण दिया जाएगा। इसके लिए प्रति स्कूल 9000 रुपए खर्च होंगे।

सरकार ने ग्रामीण परिवेश की लड़कियों में आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए उनकी पर्सनेलिटी डेवलवमेंट भी करवाने का फैसला लिया है। इसके तहत लड़कियों को बातचीत करने की कला, व्यवहार, उठने-बैठने का सही तरीका समेत ऐसी सभी सॉफ्ट स्किल को सिखाया जाएगा। यह अभियान लड़कियों के लिए प्रदेश के 1.59 लाख प्राइमरी स्कूलों में कार्यक्रम चलाया जाएगा, जिसके लिए केन्द्र सरकार ने 23 करोड़ रुपए का बजट मंजूर किया है।

लड़की या तो सब की ‘भाभी’ या ‘आवारा बदचलन’: ‘गोदी मीडिया’ कहने वाले मनचले लड़के, रोहित सरदाना ने समझाया

‘गोदी मीडिया’ का मतलब क्या है? आपने अक्सर लिबरल गिरोह के पत्रकारों को और विपक्षी नेताओं को उनके लिए ‘गोदी मीडिया’ का प्रयोग करते हुए देखा होगा, जो उनके रुख से सहमत नहीं होते। किसी भी मीडिया संस्थान या न्यूज़ पोर्टल के लिए इस शब्दावली का इस्तेमाल कर दिया जाता है। अब ‘आज तक’ के पत्रकार रोहित सरदाना ने एक वीडियो के माध्यम से काफी रोचक तरीके से समझाया है कि ये ‘गोदी मीडिया’ क्या होता है?

एक लाइव वीडियो सेशन के दौरान धरम यादव नामक यूजर ने रोहित सरदाना से पूछा कि ये ‘गोदी मीडिया’ क्या होता है? इसके जवाब में रोहित सरदाना ने कहा कि आप सब जहाँ भी मोहल्ले में या स्कूल-कॉलेजों में पढ़ते होंगे, वहाँ आस-पास में कुछ कुछ बदमाश लड़के होते हैं, जो चौराहे पर बैठे रहते हैं और उनकी नजर हमेशा मोहल्ले में रहने वाले और कॉलेज में पढ़ने वाली लड़कियों पर ही होती है।

उन्होंने आगे समझाया, “इन गुंडों को जो लड़की पसंद आ जाती है, उसके बारे में कहने लगते हैं कि ये सबकी भाभी है, इसका सम्मान करो। अगर वो लड़की मना कर दे कि दोस्ती पसंद नहीं है, तो वो सब मिल कर उस लड़की को आवारा-बदचलन घोषित कर देते हैं। दीवारों पर जा-जा कर उसके खिलाफ लिख देते हैं।” डिबेट शो ‘दंगल’ के एंकर ने कहा कि इस समय की स्थिति में कमोबेश यही है।

उन्होंने कहा कि जिन राजनीतिक पार्टियों की गोद में हम नहीं बैठे हैं, वो जा-जा कर दीवारों पर ‘गोदी मीडिया, गोदी मीडिया’ लिख देते हैं। उनका ये कहना है कि अगर तुम हमारी गोद में नहीं बैठोगे तो हम तुम्हें बदनाम करने में लग जाएँगे। रोहित सरदाना ने कहा कि ऐसों से तो जनता ही निपट सकती है, निपटा भी रही है। उन्होंने कहा कि जब इनके हिसाब से बोला जाए तो ये वाह-वाही करते हैं और इनके रुख के विपरीत हो तो ‘गोदी मीडिया’ चिल्लाने लगते हैं।

रोहित सरदाना ने कहा, “मूल रूप से उनका दर्द वही है, जो चौराहे पर बैठे हुए मनचलों और बदमाशों का होता है। यही ‘गोदी मीडिया’ की सच्चाई है।” बता दें कि मीडिया पत्रकारों का एक बड़ा हिस्सा ट्विटर पर यही देखने में लगा रहता है कि कौन उनकी बात नहीं मान रहा और अराजकता में उनका साथ नहीं दे रहा, उन्हें वो ‘गोदी मीडिया’ के विशेषण से नवाज देते हैं। कभी-कभी वो खुद अपने ही जाल में फँस जाते हैं।

रोहिणी सिंह को मिला ‘फ्लैट’ जवाब, रुबिका लियाकत को लोगों ने कहा – ‘सरे आम बेइज्जती मत कीजिए’

दो भिन्न विचारधारओं का आपस में टकराना एक सामान्य बात है, लेकिन इस टकराव के कारण पैदा होने वाला विवाद अक्सर चर्चा का कारण बन जाता है। कुछ ऐसा ही ट्विटर पर दो महिला पत्रकारों के बीच हुआ। इनके नाम रुबिका लियाकत और रोहिणी सिंह हैं। 

रुबिका जहाँ टीवी न्यूज जगत का मशहूर नाम हैं और एबीपी न्यूज की एंकर हैं, वहीं डिजिटल मीडिया की द वायर की पत्रकार रोहिणी सिंह वामपंथी विचारधारा वाले लोगों की पहली पसंद हैं। रुबिका के पास ट्विटर पर 29 लाख फॉलोवर्स हैं और रोहिणी को फॉलो करने वाले भी 5 लाख से ऊपर हैं।

ऐसे में मंगलवार को रोहिणी सिंह ने रुबिका लियाकत को ट्विटर पर घेरने का प्रयास किया। किसान आंदोलन पर रुबिका के एक शो की 9 मिनट की वीडियो शेयर की। इस वीडियो में लियाकत समझा रही थीं कि आखिर सरकार किसानों की माँग मानने से पहले विचार क्यों कर रही है।

उन्होंने इस बिंदु को समझाने के लिए अपने वीडियो में कई तर्क दिए। इसके बाद उन्होंने एक रिपोर्ट दिखाई, जिसमें MSP के फायदे और नुकसान बताए गए। इसमें कई जानकारों ने अपनी राय भी दी।

इसी वीडियो को शेयर करके रोहिणी सिंह ने लिखा

“जब पत्रकार सरकार द्वारा लिखी गई ‘प्रेस रिलीज’ पढ़ कर सुनाने लगें, तब लोकतंत्र कमजोर होना लाजमी है। यहाँ रुबिका लियाकत बता रही हैं कि किसानों को MSP देने से अर्थव्यवस्था की कमर टूट जाएगी। पत्रकारिता के भेष में बैठे ‘पार्टी प्रवक्ताओं’ को पहचानिए।”

रोहिणी के इस ट्वीट पर कई लोगों ने उनका समर्थन किया और रुबिका को कोसने के लिए कई प्रतिक्रिया आती गईं। यूजर्स के बीच बहुत तर्क-वितर्क हुए। लोगों ने रुबिका लियाकत पर अभद्र टिप्पणियाँ तक कर डालीं। लेकिन थोड़ी देर बाद रुबिका ने रोहिणी के आरोपों पर अपना जवाब दिया।

रुबिका लियाकत ने रोहिणी सिंह का ट्वीट रीट्वीट करते हुए लिखा,

“इस महिला को मैं वैसे तो जानती नहीं लेकिन जब भी यूपी की एक क्षेत्रीय पार्टी का ज़िक्र करती हूँ तो बेचैन होकर अनायास ही मेरे टाइम लाइन पर कूद पड़ती हैं…बड़ा ही ‘फ़्लैट’ सा संयोग है…”

रुबिका के इस ट्वीट के बाद कई लोग इसे रोहिणी सिंह की खुलेआम बेइज्जती बता रहे हैं। ट्विटर के सक्रिय अकाउंट्स में से एक द स्किन डॉक्टर लिखते हैं, “ऐसे सरे आम बेइज्ज़ती तो मत कीजिए। कहीं रोष व्यक्त करने के लिए फ्लैट वापसी का ऐलान ना कर दे। आजकल वैसे ही अवार्ड वापसी का सीज़न चल रहा है।”

यहाँ बता दें कि रोहिणी सिंह से जुड़ा फ्लैट का किस्सा अभी हाल में दीपक चौरसिया द्वारा उठाया गया था। रोहिणी सिंह को लेकर दीपक चौरसिया ने तंज कसा था कि उन्हें किसी सरकार के प्रति अनुकूल ख़बरें लिखने के लिए 3BHK अपार्टमेंट नहीं दिया गया। ऐसा उन्होंने इसलिए लिखा था क्योंकि उत्तर प्रदेश चुनावों से पहले, यह अफ़वाह थी कि रोहिणी सिंह को समाजवादी पार्टी द्वारा 2BHK अपार्टमेंट प्राप्त हुआ था। 

राजस्थान के सबसे बड़े ‘मिनी चुनाव’ में BJP को 1836 + 323 सीटें: CM, पूर्व डिप्टी CM और अध्यक्ष के क्षेत्रों में कॉन्ग्रेस की हार

राजस्थान में पंचायत समिति और जिला परिषद के चुनाव परिणाम में कॉन्ग्रेस को हार मिली है। ‘किसान आंदोलन’ को लेकर कॉन्ग्रेस के आक्रामक रवैये के बावजूद गाँवों की जनता ने भाजपा पर ही भरोसा जताया। कॉन्ग्रेस के लिए स्थति इतनी खराब हो गई कि प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा, मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और पूर्व उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट – तीनों के ही गृह जिलों में पार्टी को मुँह की खानी पड़ी है।

फाइनल रिजल्ट्स की बात करें तो पंचायत समिति चुनाव में कॉन्ग्रेस ने 1856 और भाजपा ने 1990 सीटों पर जीत दर्ज की है। वहीं जिला परिषद के चुनावों में 323 सीटों पर भाजपा को विजय मिली और कॉन्ग्रेस 246 सीटों पर जीती। पिछले एक दशक में ऐसा पहली बार हुआ है, जब किसी सत्ताधारी पार्टी को पंचायत चुनावों में हार मिली हो। निर्दलीयों को भी 422 सीटें मिली हैं। कॉन्ग्रेस को ग्रामीण इलाकों में फजीहत का सामना करना पड़ा है।

प्रदेश अध्यक्ष डोटासरा के लक्ष्मणगढ़ में 25 में से भाजपा ने 13 सीटें जीत कर बहुमत प्राप्त किया, वहीं कॉन्ग्रेस 11 पर अटकी रह गई। पूर्व उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट के एरिया टोंक में भाजपा ने 19 में से 9 सीटें जीती, तो कॉन्ग्रेस 7 पर आकर रुक गई। स्वास्थ्य मंत्री रघु शर्मा के अजमेर में तो 11 में से 9 सीटें भाजपा ले गई। सहकारिता मंत्री उदयलाल आंजना के निंबाहेड़ा में 14 में से 14 सीटें भाजपा को मिलीं।

खेल मंत्री अशोक चांदना के हिण्डोली में 23 में से 13 पंचायत समिति की सीटों पर भाजपा ने जीत का परचम लहराया। उप मुख्य सचेतक महेंद्र चौधरी के नाँवा में 21 में से 14 सीट भाजपा ने झपट लिए। प्रदेश और जिला स्तर तक कॉन्ग्रेस संगठन में न वो जोश दिखा और न ही सक्रियता। जयपुर, कोटा और जोधपुर नगर निगम चुनावों की गलतियाँ दोहराते हुए विधायकों को सिंबल दे दिया गया और उन्होंने अपने रिश्तेदारों में टिकट बाँट दिए।

टिकट बेचने तक के भी आरोप लगे हैं। परिवारवाद के आरोपों के बीच कॉन्ग्रेस को घाटा हुआ। अगले साल होने वाले विधानसभा उपचुनाव से पहले पार्टी के मनोबल को ठेस पहुँची है। आने वाले दिनों में पार्टी संगठन में होने वाली नियुक्तियों में इसका असर देखने को मिल सकता है और हार का ठीकड़ा फोड़ने के लिए सिर-फुटव्वल हो सकती है। अब बात करते हैं अशोक गहलोत के गढ़ पाली की, जहाँ 10 साल पहले कॉन्ग्रेस का दबदबा था

पाली में जिला परिषद के 33 वार्डों में से 30 पर भाजपा ने कब्ज़ा जमाया। वहीं पंचायत समिति की बात करें तो 10 में से 9 सीटें जीत कर भाजपा ने बड़ा बहुमत प्राप्त किया। कॉन्ग्रेस अब तक गहलोत-पायलट गुट में ही बँटी हुई है और पार्टी नेतृत्व का फायदा संगठन को नहीं मिला। संगठन में समन्वय नहीं दिखा। कई नेताओं ने जनता के बीच निकलना भी ठीक नहीं समझा। वहीं भाजपा ने गंभीरता से चुनाव लड़ा।

भाजपा के जनप्रतिनिधि बूथों तक पहुँचे। संगठन के नेताओं ने सर्वसम्मति से ही टिकट बँटवारे का निर्णय लिया। बड़े पदाधिकारियों और नेताओं ने अपने क्षेत्रों तक सीमित रह कर वहाँ जीत सुनिश्चित की। पीएम मोदी के चेहरे के अलावा राम मंदिर और अनुच्छेद-370 पर केंद्र के फैसलों को भाजपा ने मुद्दा बनाया। गहलोत सरकार कोरोना को लेकर किए गए कार्यों को गिनाते रही, जिससे जनता संतुष्ट नहीं दिखी।

इससे पहले अक्टूबर 2020 में अशोक गहलोत सरकार के खिलाफ उनके ही एक विधायक ने मोर्चा खोल दिया था। कॉन्ग्रेसी विधायक बाबूलाल बैरवा ने आरोप लगाया था कि सरकार में न तो दलित विधायकों की बात सुनी जाती है और न ही कर्मचारियों की कोई सुनवाई होती है। उन्होंने कहा था कि सरकार में जो ब्राह्मण मंत्री बैठे हुए हैं वह दलितों के काम नहीं करते हैं। कठूमर विधानसभा क्षेत्र से आने वाले कॉन्ग्रेस के विधायक बाबूलाल बैरवा दलित हैं।

मंदिर के पास शव दफनाने के लिए खोद डाला कब्र, UP पुलिस-प्रशासन ने जमीन का रिकॉर्ड दिखा JCB चलवा दी

उत्तर प्रदेश के बदायूं के बिल्सी शहर में मंदिर (देवस्थान) के पास कब्र खोदे जाने पर सांप्रदायिक तनाव पैदा हो गया। दैनिक जागरण की रिपोर्ट के मुताबिक इलाके में ये कब्र सकुरी नाम के व्यक्ति के बेटे समीर के शव के लिए खोदी गई थी, जिसके बाद इलाके की शांति भंग हुई।

लोगों ने जब इस कब्र को देखा तो इस पर आपत्ति जताई और दोनों समुदाय के लोगों में बहस शुरू हो गई। सूचना मिलने के बाद मौके पर पुलिस व तहसील टीम पहुँची। तहसील टीम ने रिकॉर्ड देखकर बताया कि वहाँ एक मंदिर बना है और वहीं कुछ लोगों की निजी जमीन भी है, इसलिए यहाँ कब्र नहीं खोदी जा सकती

पुलिस ने फौरन मामले पर सख्ती दिखाई और जेसीबी बुलवाकर जमीन को पाट दिया। बिल्सी के एसएचओ ने बताया कि लोगों की निजी भूमि के साथ देवस्थान के पास कब्र खोदकर कुछ लोगों ने माहौल बिगाड़ने की कोशिश की। फिलहाल कब्र को पटवा दिया गया है। सुरक्षा-व्यवस्था के लिए मौके पर पुलिस तैनात कर दी गई है। तनाव जैसी कोई स्थिति नहीं है।

बता दें कि सोमवार को ईंटों से भरी ट्रॉली पलट जाने के कारण बिल्सी में समीर की मौत हुई थी। मंगलवार को उसके परिजनों ने उसके शव को दफनाने के लिए मंदिर के पास कब्र खोद दी। जब स्थानीय लोगों ने इसका विरोध किया तो पुलिस प्रशासन भी वहाँ पहुँचा, मगर दूसरे समुदाय के लोग शव को उसी जगह पर दफनाने के लिए अड़े रहे।

मामले के तूल पकड़ने पर तहसीलदार ने जमीन का रिकॉर्ड दिखाया, जिससे पता चला कि उस जमीन पर पीपल का पेड़ है और आसपास की जमीन कुछ लोगों के नाम दर्ज है। रिकॉर्ड देखने के बाद पुलिस ने अपनी ओर से जब सख्ती दिखाई, तब दूसरे समुदाय के लोग शांत पड़े।

इस मामले के प्रकाश में आने के बाद लोग समुदाय विशेष की मंशा पर सवाल उठाने लगे हैं। शिवानी भटनागर खबर पर प्रतिक्रिया देते हुए कहती हैं कि जमीन हड़प करने का ये बहुत पुराना तरीका है। अपना अनुभव साझा करते हुए वह दावा करती हैं कि उनके पुराने घर के पास ऐसी ही जमीन थी। कुछ दिन बाद दूसरे समुदाय के कुछ लोग वहाँ नमाज पढ़ने आने लगे। फिर संख्या बढ़ी और अब जमीन उनके कब्जे में है।

‘इस 2 पैसे के प्रेस को यहाँ किसने बुलाया?’ TMC में बगावत सलटाने गईं सांसद महुआ मोइत्रा ने पत्रकार को कार्यक्रम से निकाला

तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की सांसद महुआ मोइत्रा ने मीडिया के लिए ‘दुइ पोइसा प्रेस (दो पैसे का प्रेस)’ शब्दावली का इस्तेमाल किया था, जिसके लिए उनका विरोध हो रहा है। इसके बाद उन्होंने अपने इस बयान पर माफ़ी माँगने से भी इनकार कर दिया और उलटा इसका जवाब दिया। कृष्णानगर की सांसद ने रविवार (दिसंबर 6, 2020) को एक पत्रकार को ‘दो पैसे का प्रेस’ कहा। नदिया जिले की इस घटा का वीडियो मंगलवार को सोशल मीडिया पर वायरल हुआ।

महुआ मोइत्रा ने न सिर्फ पत्रकार के लिए ऐसी भाषा का प्रयोग किया, बल्कि उसे कार्यक्रम से बाहर निकलने के लिए भी कहा। जब TMC सांसद को पता चला कि उक्त व्यक्ति पत्रकार है, तो उन्होंने पूछा – “इस दो पैसे के प्रेस को यहाँ किसने बुलाया है? ऐसे तत्वों को कार्यक्रम से निकाल बाहर करो। हमारी पार्टी के ही कुछ लोग इन्हें बंद कमरों में बैठक के लिए बुलाते हैं, ताकि वो खुद को टिका देख सकें। ऐसा नहीं चलेगा।”

‘कोलकाता प्रेस क्लब (KPC)’ ने TMC सांसद के इस बयान की निंदा करते हुए कहा कि वो तुरंत इसे वापस लें। क्लब ने कहा कि एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में पत्रकारिता का क्या महत्व है और इसे कैसा सम्मान प्राप्त है, ये किसी से छिपा नहीं है। KPC ने कहा कि पत्रकार आज विपरीत परिस्थितियों में अपने पेशे से सम्बन्धित कर्तव्य सामाजिक जिम्मेदारियों के साथ निभा रहे हैं, पूरे विश्व में उनकी इज्जत की जाती है।

वहीं महुआ मोइत्रा ने कहा है कि जिला स्तर पर पार्टी संगठन में हुए बदलावों से नाराज TMC के एक धड़े ने उक्त पत्रकार को बंद कमरे की बैठक के लिए बुलाया था। उन्होंने अपने बयान का बचाव किया। KPC की आलोचना के विषय में उन्होंने कहा कि उसे पत्रकारों को प्रशिक्षित करना चाहिए, क्योंकि कोई भी मोबाइल फोन लेकर आ जाए, तो वो पत्रकार नहीं हो जाता। उन्होंने कहा कि वो जब ‘बंद कमरों में बैठक’ आयोजित करती हैं तो पार्टी कार्यकर्ताओं तक को मोबाइल फोन अंदर लाने की अनुमति नहीं देतीं।

बता दें कि गयेशपुर में बापी चटर्जी TMC के जिलाध्यक्ष थे। 2019 लोकसभा चुनाव के समय इस पद भी वो ही थे। हालाँकि, इसके बाद उन्हें हटा कर मिंटू डे को इस पद पर बिठाया गया। फिर पार्टी में प्रशांत किशोर की एंट्री हुई और उन्होंने चटर्जी को फिर से इस पर पर बिठा दिया। इस फेरबदल के बाद मिंटू धड़ा नाराज है। इस धड़े ने चटर्जी को बाहरी बताया है, क्योंकि वो पड़ोसी कल्याणी जिले से ताल्लुक रखते हैं।

रविवार को महुआ मोइत्रा को दोनों धड़ों में सुलह कराने के लिए भेजा गया था। वो जैसे ही वहाँ पहुँचीं, कार्यकर्ताओं ने ‘बाहरी अध्यक्ष मानबो ना’ के प्लाकार्ड्स लहराए। इस दौरान मिंटू और डे के समर्थकों में हाथापाई भी हुई। महुआ मोइत्रा का कहना है कि उक्त पत्रकार पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ उनकी बातचीत रिकॉर्ड कर रहा था, इसीलिए उन्हें गुस्सा आया। राज्य के वन मंत्री राजीब बनर्जी ने कहा कि महुआ खुद को उच्च-शिक्षित मानती हैं, ऐसे में उनसे ये टिप्पणियाँ अस्वीकार्य हैं।

इस विवाद के बाद महुआ मोइत्रा ने एक मीम भी ट्वीट किया। इसमें एक तरफ 2 पैसे के सिक्के की तस्वीर है और नीचे लिखा है, “मैंने जो तुच्छ, दुःख पहुँचाने वाली और सटीक टिप्पणी की है, उसके लिए मैं माफ़ी माँगती हूँ।” महुआ मोइत्रा का विरोध करने वाले कह रहे हैं कि जहाँ एक तरफ वो संसद में ‘फासिज्म के 7 संकेत’ पर भाषण देते हुए सुर्खियाँ बटोरती हैं, वहीं दूसरी तरफ मीडिया के लिए तानाशाही रवैया अपनाती हैं।

तृणमूल कॉन्ग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ को भी बुरा-भला कह चुकी हैं । जून 2020 में महुआ ने राज्यपाल पर ‘सड़ा हुआ सेब’ वाला कमेंट किया था, जिसके बाद दोनों के बीच शब्दों का वाकयुद्ध शुरू हो गया था। इस दौरान महुआ ने सीमाएँ लाँघी थीं। राज्यपाल ने कहा था कि महुआ अपनी पार्टी की मुखिया ममता बनर्जी की चहेती बनने के लिए ये सब कर रही हैं।

पद्मिनी के बेटे प्रियांक करेंगे करीम मोरानी की बेटी शाजा से शादी, लोग पूछ रहे तरह-तरह के सवाल

बॉलीवुड जगत से जुड़ी तमाम ऐसी हस्तियाँ हैं, जिन्होंने दूसरे समुदाय के हमसफर चुनने में कभी गुरेज नहीं किया। अब इस सूची में एक नाम बॉलीवुड की मशहूर एक्ट्रेस पद्मिनी कोल्हापुरे के बेटे प्रियांक शर्मा का भी जुड़ने जा रहा है। पद्मिनी के बेटे प्रियांक शर्मा प्रोड्यूसर करीम मोरानी की बेटी शाजा मोरानी से शादी करने वाले हैं। खबर आई है कि प्रियांक और शाजा अपनी शादी के लिए आज कोर्ट में आवेदन देंगे और हो सकता है कि वह अगले साल फरवरी तक सभी रस्मों के साथ शादी भी कर लें।

टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, करीम मोरानी ने इस शादी को लेकर पुष्टि की है। उन्होंने कहा, “हाँ, हमने आखिरकार निर्णय ले लिया है। शाजा और प्रियांक शादी का आवेदन मैरेज रजिस्ट्रार ऑफिस में देंगे और हो सकता है कि इस फरवरी तक शादी हो भी जाए।”

करीम ने इस शादी की पुष्टि करते हुए प्रियांक की बहुत तारीफ की और उम्मीद जताई कि प्रियांक उनकी बेटी के लिए सही साबित होंगे। उन्होंने बताया कि उनकी बेटी प्रियांक के साथ 2-3 सालों से नहीं है, बल्कि वह लोग 10 सालों से साथ हैं।

इसके बाद पद्मिनी की करीबी सहेली पूनम ढिल्लों ने भी इस रिश्ते पर अपनी राय दी। उन्होंने कहा कि उन्हें बहुत पहले से मालूम था कि प्रियांक-शाजा एक दूसरे से शादी करेंगे और उन्हें लग भी रहा था कि इस पर निर्णय वह इसी साल ले सकते हैं। 

पूनम ढिल्लों ने कहा कि पद्मिनी और मोरानी दोनों का परिवार उनका करीबी है। ऐसे में इन दोनों शादियों के लिए उनके मन में बहुत अच्छे भाव हैं। वह प्रियांक और शाजा को एक प्यारा जोड़ा बताती हैं और एक दूसरे के लिए ईमानदार कहती हैं। पूनम कहती हैं, “मैं कहना चाहूँगी कि वो दोनों एक दूसरे के लिए ही बने हैं। मैं उन्हें तब से जानती हूँ जब वह पैदा हुए।”

खबर के ऊपर किए गए कमेंट

गौरतलब है कि प्रियांक शर्मा और शाजा मोरानी की शादी की बात जानकार एक ओर जहाँ कई बॉलीवुड हस्तियाँ उन्हें शुभकामनाएँ दे रहे हैं, वहीं टाइम्स ऑफ इंडिया के पाठकों की प्रक्रिया इस शादी पर जरा अलग है। वह इस खबर पर पूछ रहे हैं कि ये कौन सा जिहाद है।

वो शशि थरूर से कहते थे – ‘अपनी पत्नी को संभालो’ – कश्मीरी पंडितों के लिए आवाज उठाने पर सुनंदा पुष्कर का ट्वीट

सोशल मीडिया पर एक स्क्रीनशॉट वायरल हो रहा है, जो बताया जा रहा है कि केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम से कॉन्ग्रेस के सांसद शशि थरूर की पत्नी सुनंदा पुष्कर का है। हमने जब इसे खँगाला तो पता चला कि ये सुनंदा पुष्कर का ही ट्विटर हैंडल है, जिसकी पुष्टि कई मेनस्ट्रीम मीडिया रिपोर्ट्स ने अपनी पुरानी खबरों में की हैं। ट्विटर पर उनका जो कंवर्शेशन वायरल हो रहा है, उसमें वो दावा कर रही हैं कि उनके पति को उन्हें ‘संभालने’ के लिए कहा गया है।

ये ट्वीट्स दिसंबर 24, 2013 की हैं। उनकी मौत से लगभग एक महीने पहले की। जनवरी 17, 2014 को उनकी मृत्यु हो गई थी। उस समय केंद्र में यूपीए-2 की सरकार थी और उनके पति शशि थरूर मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल में केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री हुआ करते थे। उक्त ट्वीट में सुनंदा पुष्कर ने लिखा था कि भारत में अल्पसंख्यकों के लिए काफी कुछ किया जा रहा है। उन्होंने लिखा था कि खासकर दंगा पीड़ित अल्पसंख्यकों के लिए बहुत कुछ हो रहा है।

लेकिन, साथ ही उन्होंने सवाल उठाया था कि आखिर उन कश्मीरी अल्पसंख्यकों को क्यों नज़रअंदाज किया जा रहा है, जिन्हें 1989 में घाटी छोड़नी पड़ी थी। उनका इशारा जम्मू कश्मीर में कश्मीरी पंडितों के साथ हुए अत्याचार को लेकर था, जिसके बाद वो अपने ही देश में शरणार्थी बन कर रह गए थे। उन्होंने लिखा था कि हम सब अल्पसंख्यक हैं क्योंकि 5% की जनसंख्या को अल्पसंख्यक नहीं माना जाएगा, फिर इसकी परिभाषा क्या है?

इस ट्वीट का शशि थरूर ने भी जवाब दिया था और कहा था कि वो पिछले 20 सालों से पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद की निंदा करते रहे हैं। सुनंदा की ट्वीट का जवाब देते हुए जेनरल सर्जन नारायण रुपानी ने ट्वीट किया कि कश्मीरी पंडित नेतृत्वविहीन हैं, उनका कोई नेता नहीं है। उन्होंने उम्मीद जताई कि वो दिल्ली के मंच पर अपना कोई स्पष्ट नेता खड़ा कर सकें, जो उनकी आवाज़ उठाए और इस मामले को सरकार तक पहुँचाए।

इसके जवाब में सुनंदा पुष्कर ने लिखा, “मैं हमेशा कोशिश करती हूँ, लेकिन फिर मेरे पति को कहा जाता है कि अपनी पत्नी को ‘संभालो’। वो ये कह कर सुनिश्चित करते हैं कि मैं चुप रहूँ। इसीलिए, या तो मुझे एक कश्मीरी होना पड़ेगा, या फिर एक पत्नी।” हालाँकि, उन्होंने ये भी कहा था कि उनके पति एक अच्छे व्यक्ति हैं और उन्हें पता है कि मैं कश्मीर को लेकर कितनी उत्साही हूँ। उन्होंने दावा किया था कि उनके पति ने उन्हें कश्मीर पर बात करने से कभी नहीं रोका।

जुलाई 2020 में शशि थरूर की तरफ से पेश होते हुए वकील विकास पाहवा ने दिल्ली हाईकोर्ट में कहा था कि सुनंदा पुष्कर की ट्वीट्स को स्टोर कर के रखा गया है और वो कॉन्ग्रेस नेता के पक्ष में सबूत हैं। उन्होंने इन ट्वीट्स को ‘प्राइमरी एविडेंस’ करार दिया था। उनका दावा था कि इन ट्वीट्स से सुनंदा पुष्कर की दिमागी स्थिति का पता चलता है, जो दिल्ली पुलिस की रिपोर्ट के विपरीत हैं। थरूर ने भी इन ट्वीट्स को ‘ऑन रिकॉर्ड’ पेश करने की इजाजत माँगी थी।

अगस्त 2019 में कॉन्ग्रेस सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री शशि थरूर की पत्नी सुनंदा पुष्कर की मौत के मामले में लोक अभियोजक ने पुष्कर की मित्र और पत्रकार नलिनी सिंह का बयान पढ़ते हुए दावा किया था कि थरूर ने दुबई में तीन रातें पाकिस्तानी पत्रकार मेहर तरार के साथ बिताईं थीं। अतुल श्रीवास्तव ने यह बयान दिल्ली की अदालत में पढ़ा था। पुष्कर के बेटे शिव मेनन ने दावा किया कि उनकी माँ बहुत ही (मानसिक रूप से) ताकतवर महिला थीं, और वे आत्महत्या नहीं कर सकतीं थीं।

सीताराम को बाथरूम में किया बंद, सिंधिया को नहीं दिया समय: सोनिया गाँधी ने ‘यूज एंड थ्रो’ से 22 साल चलाया कॉन्ग्रेस

सोनिया गाँधी फ़िलहाल कॉन्ग्रेस की अध्यक्ष हैं। मीडिया में तरह-तरह के लेख लिख कर बताते जाते हैं कि कैसे उन्होंने ‘कठिन समय और विषम परिस्थितियों में’ पार्टी अध्यक्ष का कार्यभार संभाल कर कितना कुशल नेतृत्व किया है। लेकिन, इस दौरान वो ये भूल जाते हैं कि उनके लगभग 20 (बेटे को मिला कर 22) वर्षों के कार्यकाल में कैसे कॉन्ग्रेस के कई बड़े नेताओं को किनारे लगाया गया और राहुल गाँधी के लिए जगह तैयार करने में सारा दम लगाया गया।

जब सोनिया गाँधी कॉन्ग्रेस की अध्यक्ष बनीं, तब दलित नेता सीताराम केसरी को कैसे किनारे लगाया गया था, ये सभी को पता है। तत्कालीन कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी जब बैठक में पहुँचे तो कोई उन्हें सुनने वाला तक नहीं था और जब सोनिया अध्यक्ष चुनी गईं, उस समय उन्हें बाथरूम में बंद कर दिया गया था। इसके बाद उन्हें कोई पूछने वाला तक नहीं था और जब वो घर गए तो वहाँ उनके कुत्ते के अलावा कोई मौजूद नहीं था।

इस तरह से बुजुर्ग नेताओं को ठिकाने लगाने की कॉन्ग्रेस की ये परंपरा 1998 से ही चली आ रही है। ये परंपरा यूँ तो इससे भी पुरानी है, लेकिन तब नेहरू, इंदिरा और राजीव के लिए ऐसा होता था, उसके बाद सोनिया और अब राहुल के लिए यही हो रहा है। चाहे सीताराम केसरी हों या फिर मनमोहन सिंह, सोनिया गाँधी ने जब जैसे ज़रूरत पड़ी, इन बुजुर्ग नेताओं का इस्तेमाल किया और फिर बाद में उन्हें ठिकाने लगा दिया।

आप सोचिए, कोई राष्ट्रीय पार्टी दो-दो आम चुनाव बड़े अंतर से हारती है और कई राज्यों में उसकी सत्ता जाने के बावजूद उसके नेतृत्व में कोई परिवर्तन नहीं होता है। पहले माँ अध्यक्ष रहती है, फिर बेटे को अध्यक्ष बनाया जाता है, फिर माँ को अंतरिम अध्यक्ष बना कर बिठाया जाता है। अब फिर बेटे को अध्यक्ष बनाने की चर्चा है। हालाँकि, अब किसी को भी ये उम्मीद नहीं है कि गाँधी परिवार से बाहर का कोई अध्यक्ष बनेगा।

अब कॉन्ग्रेस में चार समूह बन गए हैं। एक सोनिया गाँधी के वफादारों का है, जिसमें प्रमुख रूप से अहमद पटेल शामिल हुआ करते थे। एक राहुल गाँधी के वफादारों का समूह है, जो अपेक्षाकृत युवा हैं और सोनिया के वफादारों को किनारे करने में लगा रहता है। एक तीसरा समूह है यूपी में प्रदेश कॉन्ग्रेस के नेताओं का, जिस पर पूर्णरूपेण प्रियंका गाँधी का कब्ज़ा है। एक चौथा समूह है, जो पार्टी में लोकतंत्र चाहता है।

सीताराम केसरी के बाद अब बात प्रणब मुखर्जी की, जिनके प्रधानमंत्री बनने की चर्चा तभी शुरू हो गई थी, जब राजीव गाँधी की मृत्यु हुई थी। लेकिन, आगे की सभी कॉन्ग्रेस सरकारों के वे तभी तक सर्वेसर्वा रहे, जब तक वो राष्ट्रपति न बन गए। कॉन्ग्रेस को उम्मीद थी कि 2014 में उसकी सरकार बनेगी और राहुल गाँधी की कैबिनेट में प्रणब मुखर्जी जैसे नेता तो हो नहीं सकते, इसीलिए ये चाल चली गई।

प्रणब मुखर्जी भी जब तक कॉन्ग्रेस में रहे, गाँधी परिवार के वफादार बने रहे। उन्होंने सोनिया को अध्यक्ष बनाने के लिए तमाम रणनीति बनाई और फिर यूपीए काल में लगभग सभी संसदीय समितियों के अध्यक्ष भी रहे। जब उनका काम समाप्त हुआ, उन्हें राष्ट्रपति बना दिया गया। जब उन्हें भारत रत्न से नवाजा गया, उस कार्यक्रम में सोनिया-राहुल शामिल नहीं हुए। जब वो RSS मुख्यालय पहुँचे, तब कॉन्ग्रेस के कई नेताओं ने उनकी आलोचना की।

इसी तरह मनमोहन सिंह को ले लीजिए। यूपीए-1 में उन्हें सिर्फ इसीलिए प्रधानमंत्री बनाए रखा गया, क्योंकि गाँधी परिवार को अपना कोई विश्वस्त उस कुर्सी पर चाहिए था। यूपीए-2 में उन्होंने अपना कार्यकाल इसीलिए पूरा किया, क्योंकि सरकार की नकारात्मक छवि के कारण राहुल गाँधी की ताजपोशी न करने का निर्णय लिया गया। कॉन्ग्रेस चाहती थी कि सारा दोष मनमोहन के मत्थे मढ़ा जाए और गाँधी परिवार की छवि अक्षुण्ण रहे।

लेकिन, अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के साथ-साथ नरेंद्र मोदी भी ‘आउट ऑफ सिलेबस’ आ गए। अब यही काम राहुल गाँधी के लिए किया जा रहा है। पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया को ठिकाने लगाया गया, उसके बाद सचिन पायलट को शांत कर दिया गया। सिंधिया एक समय इंतजार करते रहे, सोनिया ने समय ही नहीं दिया। हिमंत बिस्वा सरमा जब राहुल से मिलने गए थे तो वो अपने कुत्ते को बिस्किट खिलाने में व्यस्त थे और नहीं मिले। परिणाम ये हुआ कि हिमंत भाजपा में आ गए और पूरे उत्तर-पूर्व से कॉन्ग्रेस साफ़ हो गई।

सीताराम केसरी, प्रणब मुखर्जी और मनमोहन सिंह की तरह ही शरद पवार भी कॉन्ग्रेस में एक बड़ी धुरी बन कर उभर रहे थे, लेकिन उनके बगावत के बाद उनके दो साथियों पीए संगमा और तारिक अनवर के साथ उन्हें पार्टी से निकाल बाहर किया गया। हाल ही में कॉन्ग्रेस के 23 नेताओं ने पत्र लिख कर पार्टी में चुनाव कराने की माँग की। कपिल सिब्बल, शशि थरूर और गुलाम नबी आजाद जैसे वफादारों को भी सन्देश दे दिया गया कि पार्टी में सोनिया ही सर्वोपरि है।

कई विशेषज्ञ मानते हैं कि कॉन्ग्रेस के नक्शेकदम पर चलते हुए ही देश में कई ऐसे राजनीतिक दल खड़े हो गए हैं, जो ‘प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी’ की तरह चलते हैं और जहाँ एक ही परिवार के बीच सत्ता की चाभी अटकी रहती है। कोई मतभेद होता भी है तो एक ही परिवार के दो वारिसों के बीच। मनमोहन सिंह की सरकार में PMO की फाइलें भी सोनिया गाँधी से होकर ही गुजरती थी, ये आरोप भी कई बार लग चुके हैं।

सोनिया गाँधी ने उस दौरान ‘राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (NAC)’ का गठन किया और समानांतर सरकार चलाती रहीं। कहा जाता है कि उस दौरान कई ऐसे NGO थे, जिनकी सोनिया गाँधी सुनती थीं और मनमोहन मंत्रिमंडल के मंत्री भी उनसे परेशान होकर उन्हें ‘झोलेवाला’ कहते थे। सजायाफ्ता नेताओं को राहत देने वाला बिल जब राहुल गाँधी ने फाड़ा था, तब भी सोनिया गाँधी को उनके पुत्रमोह ने चुप रखा। मनमोहन अपमानित हुए, पर वो भी चुप रहे।

इस तरह से 1998 में सीताराम केसरी हों या 2019 में ज्योतिरादित्य सिंधिया, सोनिया गाँधी ने कॉन्ग्रेस को दूसरे नेताओं को किनारे लगा कर ही चलाया है। बाद में शरद पवार ने कॉन्ग्रेस के साथ गठबंधन किया, अर्जुन सिंह और तारिक अनवर वापस लौट आए और सचिन पायलट को वापस बुला लिया गया – लेकिन, किसी को अपना कद नहीं बढ़ाने दिया गया। अभी उनकी ढलती उम्र के कारण जब बदलाव की माँग हो रही है, फिर कई किनारे लगाए जाएँगे।