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मुंबई मेयर के ‘दो टके के लोग’ वाले बयान पर कंगना रनौत ने किया पलटवार, महाराष्ट्र सरकार पर कसा तंज

बॉलीवुड एक्ट्रेस कंगना रनौत की महाराष्ट्र सरकार से तल्खी बढ़ती ही जा रही है। बॉम्बे हाई कोर्ट के अहम फैसले के बाद भी ये विवाद ठंडा पड़ता नहीं दिखाई दे रहा है। कोर्ट के आदेश के बाद मुंबई मेयर किशोरी पेडनेकर के बयान ने नया बवाल खड़ा कर दिया है।

कंगना के ऑफिस में हुई तोड़फोड़ पर जब कोर्ट ने बीएमसी की कार्रवाई को गलत बताया और एक्ट्रेस को मुआवजा देने की बात कह दी, उस समय मुंबई की मेयर का गुस्सा फूट पड़ा।

मेयर ने गुस्से में अपना ऐसा आपा खोया कि एक विवादित बयान दे डाला। उन्होंने कंगना के लिए ‘दो टके के’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर दिया। ANI से बातचीत के दौरान मेयर ने कहा, “ये देख तो हम भी हैरान हैं। ये एक्ट्रेस हिमाचल में रहती है, वो हमारे मुंबई की तुलना पीओके से करती है। ये दो टके के लोग देश की अदालत को राजनीतिक अखाड़ा बनाने की कोशिश करते हैं। ये सब गलत है।”

किशोरी पेडनेकर का ये बयान सोशल मीडिया पर वायरल हो चुका है। जिस तल्ख भाषा का इस्तेमाल किया गया है, उसे देखते हुए इस बयान के सभी तरफ चर्चे हो रहे हैं। अब खुद कंगना रनौत ने इस बयान पर रिएक्ट किया है।

कंगना रनौत ने महाराष्ट्र सरकार पर तंज कसते हुए कह दिया है कि ये सब देख अब उन्हें ऋतिक रोशन और आदित्य पंचोली भले लोग लगने लगे हैं। उनकी नजरों में उन्हें राज्य सरकार से काफी गालियाँ और बेइज्जती मिली है।

ट्वीट में कंगना ने लिखा है, “जितने लीगल केस, गालियाँ और बेइज्जती मुझे महाराष्ट्र सरकार से मिली है, उसे देखते हुए तो अब मुझे ये बॉलीवुड माफिया और ऋतिक-आदित्य जैसे एक्टर भी भले लोग लगने लगे हैं। समझ ही नहीं आ रहा कि मेरे अंदर ऐसा क्या है कि सभी इतना नाराज हो जाते हैं।”

कंगना रनौत का ये जवाब वायरल हो चुका है। एक्ट्रेस का यूँ तंज कसना उनके तमाम फैन्स को काफी पसंद आ गया है। कंगना को इसी अंदाज के लिए जाना भी जाता है और वे ऐसे ही अपने विरोधियों पर हमला करती हैं।

इधर शिवसेना सांसद संजय राउत ने भी कहा कि अभिनेत्री ने मुंबई पुलिस को माफिया और मुंबई को पीओके कहा है। जो पार्टियाँ अदालत के फैसले से खुश नजर आ रही हैं, क्या वो कंगना के बयान से सहमत हैं? जज और अदालत के खिलाफ अभद्र टिप्पणी करना गलत है तो कोई जब महाराष्ट्र या मुंबई को लेकर ऐसा बोलता तो क्या वो मानहानि नहीं है?

प्रदर्शन करने वाले किसानों को $1 मिलियन का ऑफर, खालिस्तान के समर्थन में खुलेआम नारेबाजी: क्या है SFJ का मास्टरप्लान

केंद्र सरकार द्वारा 3 कृषि सुधार विधेयक कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक 2020, कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन-कृषि सेवा पर करार विधेयक 2020 और आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक 2020 पारित किए जाने के बाद से किसानों का प्रदर्शन जारी है। इन विधेयकों को लेकर आने का उद्देश्य यह था कि मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी सोच ‘एक भारत, एक कृषि बाज़ार’ को साकार किया जा सके। इस क़ानून का उद्देश्य एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केट कमेटी (APMC) के एकछत्र राज को ख़त्म किया जा सके। 

विधेयक का उद्देश्य बिचौलियों को हटाना, किसानों का सशक्तिकरण और उनकी आय बढ़ाना था लेकिन पंजाब के किसान इससे खुश नहीं थे। जैसे ही यह विधेयक पारित हुआ उसके बाद आम आदमी पार्टी, कॉन्ग्रेस और तमाम वामपंथियों ने इसके संबंध में दुष्प्रचार करना शुरू कर दिया। जैसे ही विधेयक जुड़े दुष्प्रचार का दायरा बढ़ा उसके बाद ही पंजाब और हरियाणा के अनेक क्षेत्रों में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया। 

लगभग दो दर्जन से अधिक किसान संगठनों ने इस विधेयक का विरोध करना शुरू कर दिया जिसमें भारतीय किसान यूनियन (BKU), ऑल इंडिया फार्मर यूनियन (AIFU), ऑल इंडिया किसान संघर्ष कोआर्डिनेशन कमेटी (AIKSCC) और ऑल इंडिया किसान महासंघ शामिल थे। इन सभी संगठनों ने 18 राजनीतिक दलों के विरोध के बावजूद संसद में पारित किए गए इस विधेयक का विरोध करने के लिए 25 सितंबर को ‘भारत बंद’ का ऐलान किया था। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ पंजाब और हरियाणा के लगभग 31 किसान संगठन पहले ही इसका विरोध कर रहे थे और बाद में राजनीतिक दलों ने उनके साथ मिल कर बंद का आह्वान किया। 

इस विरोध का सबसे ज्यादा प्रभाव देखने को मिला पंजाब में जहाँ के किसानों ने पूरा जोर लगा कर सीमा पार की और दिल्ली पहुँचे। इस विरोध प्रदर्शन के दौरान कई मौकों पर हिंसा भी नज़र आई और खालिस्तान के समर्थन में नारे भी लगाए गए। हरियाणा और पंजाब बॉर्डर के आस-पास विरोध प्रदर्शन के दौरान खालिस्तान समर्थक और भारत विरोधी नारे लगाए जाने के बाद सिख फॉर जस्टिस (SFJ) की भूमिका पर सवाल खड़े हो रहे हैं। इस बात के कयास लगाए जा रहे हैं कि पंजाब के किसानों को मोदी सरकार के विरुद्ध भड़काने में इनका हाथ भी हो सकता है।          

तमाम जानकारियों के सामने आने बाद SFJ की संदिग्ध भूमिका को लेकर जाँच शुरू हो चुकी है। साथ ही इस बात की संभावना जताई जा रही है कि किसान आंदोलन पर खालिस्तान समर्थक ताकतों ने कब्ज़ा कर लिया है। उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान प्रायोजित SFJ पहले इस बात का ऐलान कर चुका है कि वह खालिस्तान का समर्थन करने वाले पंजाब और हरियाणा के किसानों को 1 मिलियन डॉलर की आर्थिक मदद करेगा। 23 सितंबर को सामने आई मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ SFJ ने क़र्ज़ लेने वाले किसानों के बीच 1 मिलियन डॉलर बाँटने का ऐलान करके किसानों के विरोध प्रदर्शन का फायदा उठाने का प्रयास किया था। 

SFJ ने कहा था, “कोई भी किसान चाहे वह किसी भी धर्म का क्यों हो, 1 से 8 अक्टूबर के बीच खालिस्तान जनमत संग्रह के लिए 25 मतों का पंजीयन करा सकता है। इसके बदले में उसे 5 हज़ार रुपए का आर्थिक सहयोग मिलेगा जिससे वह अपना क़र्ज़ चुका सकता है।” यह जानकारी खुफ़िया एजेंसियों को मिले इनपुट पर आधारित है। केंद्र सरकार के कृषि सुधार विधेयकों को किसानों की ज़मीन छीनने का औपनिवेशिक एजेंडा बताते हुए SFJ के जनरल काउंसल गुरपटवंत सिंह पन्नू ने किसानों को मोदी सरकार के विरुद्ध भड़काने का प्रयास किया था। उसका यहाँ तक कहना था कि मोदी सरकार पंजाब और हरियाणा के किसानों को लाचार करना चाहती है। SFJ ने इसमें हरियाणा के किसानों को भी शामिल किया था क्योंकि वह हरियाणा को भी खालिस्तान का हिस्सा मानते हैं। 

SFJ का डोर टू डोर अभियान, सिखों को खालिस्तान आंदोलन का हिस्सा बनने का लालच

इस साल के सितंबर महीने में SFJ ने डोर टू डोर अभियान का ऐलान किया था जिसमें वह अपने अलगाववादी एजेंडे ‘जनमत संग्रह 2020’ (Referendum 2010) का समर्थन करने वालों का पंजीयन करा रहे थे। इस घोषणा के बाद खुफ़िया और आतंकवाद विरोधी एजेंसियों ने प्रदेश की लॉ एनफोर्समेंट एजेंसियों को सूचित कर दिया था। लेकिन पंजाब की कॉन्ग्रेस सरकार इतने गंभीर मुद्दे पर बिलकुल भी सक्रिय नहीं नज़र आई। 

जब SFJ खालिस्तान समर्थकों को इकट्ठा नहीं कर पाया तब वह नई योजना लेकर आया जिसके तहत उसने कनाडा और रूस के पोर्टल के मदद से जनमत संग्रह 2020 के लिए एक हज़ार एम्बेसडर नियुक्त करने का ऐलान किया। इन एम्बेसडर को SFJ की ओर से 7500 रुपए की मासिक आर्थिक सहायता प्रदान की जाएगी। SFJ ने 21 सितंबर को लगभग 30 दिनों के भीतर पंजाब के 12000 गाँवों को कवर करने की योजना बनाई थी। 

इसके पहले खालिस्तान समर्थक संगठन ने पंजाब के किसानों को 3500 रुपए का लालच देकर जनमत संग्रह का समर्थन कराने का प्रयास किया था। संगठन का कहना था कि जो किसान अपना क़र्ज़ नहीं लौटा पा रहे हैं, SFJ उनकी हर महीने आर्थिक सहायता करेगा। एनआईए के सुझाव के बाद गृह मंत्रालय ने इसके विरुद्ध जाँच के आदेश दिए थे। गृह मंत्रालय ने SFJ को गैर कानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के दायरे में पाया था और इसके तमाम नेताओं को आतंकवादी घोषित किया गया था। 

खालिस्तानी तत्वों का प्रदर्शन पर कब्जा 

इसके अलावा किसान आंदोलन का एक और हैरान करने वाला पहलू सामने आया था। कथित तौर पर ऐसी तमाम तस्वीरें और वीडियो सामने आए जिसमें प्रदर्शन के दौरान खालिस्तान के समर्थन की बात सामने आ रही थी। इसी तरह का एक वीडियो सामने आया था जिसमें एक तथाकथित किसान द्वारा स्पष्ट तौर पर यह कहते हुए सुना जा सकता है कि जैसे इंदिरा गाँधी को ठोका वैसे ही नरेंद्र मोदी को भी ठोक देंगे।

ट्विटर पर साझा किए गए एक समाचार चैनल के वीडियो में व्यक्ति कहता है, “अभी हमारी सरकार के साथ एक मीटिंग है अगर उसमें कुछ हल निकलता है तो ठीक है। मीटिंग 3 दिसंबर को तय की गई है और हम तब तक यहीं पर रहने वाले हैं। अगर उस मीटिंग में कुछ हल नहीं निकला तो बैरिकेड तो क्या हम तो इनको (शासन प्रशासन) ऐसे ही मिटा देंगे। हमारे शहीद उधम सिंह कनाडा की धरती पर जाकर उन्हें (अंग्रेज़ों को) ठोक सकते हैं तो दिल्ली कुछ भी नहीं है हमारे लिए। जब इंदिरा ठोक दी तो मोदी की छाती भी ठोक देंगे।”  

SEBI ने NDTV के प्रमोटरों प्रणय रॉय, राधिका रॉय और विक्रम चंद्रा समेत 2 अन्य को किया ट्रेडिंग से प्रतिबंधित, जानिए क्या है मामला

भारत के पूँजी बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने विवादास्पद मीडिया नेटवर्क NDTV के प्रवर्तकों प्रणय रॉय और राधिका रॉय को इनसाइडर ट्रेडिंग से अनुचित लाभ उठाने का दोषी पाया है। इसके बाद वित्तीय अपराध के लिए दंड के रूप में SEBI ने उन्हें प्रतिभूति बाजार में दो साल के लिए व्यापार करने से रोक दिया है। इसके साथ ही दोनों को 12 साल पहले की इनसाइडर ट्रेडिंग के जरिए अवैध तरीके से कमाए गए ₹16.97 करोड़ रुपए लौटाने के लिए भी कहा है।

प्रणय रॉय और राधिका रॉय के अलावा, एनडीटीवी के पूर्व सीईओ विक्रमादित्य चंद्रा, वरिष्ठ सलाहकार ईश्वरी प्रसाद बाजपेयी, ग्रुप सीएफओ सौरव बनर्जी को भी इनसाइडर ट्रेडिंग का दोषी पाया गया है।

SEBI द्वारा की गई जाँच के अनुसार उन्होंने इनसाइडर ट्रेडिंग (PIT) विनियमों का उल्लंघन किया। उन पर 2007-2008 के दौरान अप्रकाशित मूल्य संवेदनशील जानकारी (UPSI) रखने का आरोप है, जो न्यू इंडिया टेलीविजन लिमिटेड के पुनर्गठन से संबंधित है। सेबी ने सितंबर, 2006 से जून, 2008 के दौरान कंपनी के शेयरों में कारोबार की जाँच करने के बाद यह कदम उठाया है। 

सेबी ने पाया कि नई दिल्ली टेलीविजन लिमिटेड (NDTV) में प्राइस को लेकर संवेदनशील जानकारियाँ रखने योग्य पदों पर रहते हुए प्रणय रॉय और राधिका रॉय ने कंपनी के शेयरों का कारोबार किया। 

जाँच लगभग दो वर्षों की अवधि से संबंधित थी, जिसे दो भागों में विभाजित किया गया था। 31 जुलाई 2016 से 7 सितंबर 2007 की अवधि मूल्य संवेदनशील जानकारी (PSI) की अवधि थी, जबकि 7 सितंबर 2007 से 16 अप्रैल 2008 तक अप्रकाशित मूल्य संवेदनशील जानकारी (UPSI) थी। बता दें कि PSI के दौरान, स्टॉक एक्सचेंजों में मूल्य संवेदनशील जानकारी का खुलासा किया जाता है, जबकि UPSI के दौरान इसका खुलासा नहीं किया जाता है।

UPSI की अवधि 7 सितंबर 2007 से 16 अप्रैल 2008 तक थी और रॉय ने 17 अप्रैल 2008 को 16,97,38,335 रुपए का लाभ कमाते हुए कंपनी के शेयर बेचे थे। यह पीआईटी विनियमों का उल्लंघन था, क्योंकि स्टॉक एक्सचेंजों को जानकारी का खुलासा करने से 24 घंटे की समाप्ति से पहले यूपीएसआई रखने वाले लोगों को शेयरों में व्यापार करने से रोक है। उन्होंने यूपीएसआई अवधि के दौरान भी 26 दिसंबर 2007 को शेयर खरीदे थे।

उन्होंने 26 दिसंबर 2007 को ₹400 प्रति शेयर की दर से 48,35,850 एनडीटीवी शेयर खरीदे थे। 17 अप्रैल, 2008 को उन्होंने ₹435.10 प्रति शेयर की दर से 49,13,676 शेयर बेचे। इस तरह उन्होंने यूपीएसआई अवधि के दौरान खरीदे गए 48,35,850 शेयरों पर ₹16,97,38,335 का लाभ कमाया।

यह न केवल पीआईटी नियमों का उल्लंघन था, बल्कि एनडीटीवी के अपने ‘इनसाइडर ट्रेडिंग की रोकथाम के लिए आचार संहिता’ का भी उल्लंघन था। PIT विनियम, 1992 की अनुसूची 1 में निर्दिष्ट मॉडल कोड के खंड 3.2.2 और खंड 3.2.4 के अनुसार, जब ट्रेडिंग विंडो बंद होती है, तो कर्मचारी / निदेशक कंपनी के शेयरों में व्यापार नहीं करेंगे और ट्रेडिंग विंडो यूपीएसआई के सार्वजनिक किए जाने के 24 घंटे बाद खोली जाती है।

NDTV ने 16 अप्रैल 2008 को पुनर्गठन पर चर्चा के बारे में जानकारी का खुलासा किया था, ट्रेडिंग विंडो को 17 अप्रैल तक बंद कर दिया गया था। लेकिन प्रणय रॉय और राधिका रॉय ने इस बंद विंडो की अवधि के दौरान शेयर बेचे, जिससे उनके द्वारा बनाए गए ₹16.97 करोड़ का लाभ कानूनन अवैध माना जाता है।

Part of SEBI order

अब उन्हें लाभ राशि को संयुक्त रूप से या व्यक्तिगत रूप से 6% ब्याज के साथ प्रति वर्ष देना होगा।

प्रणय रॉय और राधिका रॉय के अलावा, इनसाइडर ट्रेडिंग का दोषी पाए गए एनडीटीवी के पूर्व सीईओ विक्रमादित्य चंद्रा, वरिष्ठ सलाहकार ईश्वरी प्रसाद बाजपेयी, ग्रुप सीएफओ सौरव बनर्जी ने हालाँकि जाँच अवधि के दौरान NDTV के किसी भी शेयर को नहीं खरीदा था, लेकिन पीएसआई और यूपीएसआई को पकड़े हुए उस अवधि के दौरान ESOPs जारी किए गए थे। इन तीनों ने इन अवधि के दौरान शेयरों की बिक्री की, जिससे उन्हें इनसाइडर ट्रेडिंग का दोषी पाया गया।

सेबी ने पाया कि विक्रमादित्य चंद्रा ने ₹6,67,385 का अवैध लाभ कमाया, ईश्वरी प्रसाद बाजपेयी ने ₹882,780 प्राप्त किए, और सौरव बनर्जी ने प्रतिबंधित अवधि के दौरान शेयरों को बेचने से ₹47,000 का नुकसान उठाया।

चंद्रा और बाजपेयी को 6% ब्याज के साथ अवैध लाभ राशि को लौटाने के लिए कहा गया है। इसके साथ ही तीनों को प्रतिभूति बाजार में एक वर्ष की अवधि के लिए व्यापार करने से रोक दिया गया है।

सेबी द्वारा जारी तीसरे आदेश में एनडीटीवी के सलाहकार संजय दत्त, उनकी पत्नी प्रनीता दत्त और उनसे जुड़ी तीन संस्थाओं को भी दोषी पाया गया है। ये तीन फर्म हैं- क्वांटम सिक्योरिटीज प्राइवेट लिमिटेड, एसएएल रियल एस्टेट प्राइवेट लिमिटेड और ताज कैपिटल पार्टनर्स प्राइवेट लिमिटेड। संजय दत्त, प्रनीता दत्त और तीनों कंपनियों के पास NDTV के शेयर हैं और उन्होंने भी प्रतिबंधित अवधि के दौरान शेयरों में कारोबार किया था। उन्हें अवैध लाभ राशि 2.2 करोड़ को लौटाने आदेश दिया गया है और साथ ही 2 साल के लिए पूँजी बाजार में कारोबार करने से रोक दिया गया है।

शादी में पैसा, फ्री कार, मस्जिद-दरगाहों का विकास: तेलंगाना में ‘अल्पसंख्यकों’ पर 6 साल में ₹5600 करोड़ खर्च

तेलंगाना में अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के लिए सरकारी खजाने का नायाब उपयोग सामने आया है। तेलंगाना सरकार ने पिछले 6 वर्षों में राज्य में अल्पसंख्यक केंद्रित योजनाओं पर 5,639.44 करोड़ रुपए खर्च किए हैं।

तेलंगाना टुडे में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि चाहे वह शिक्षा हो या छात्रवृत्ति, विवाह के लिए वित्तीय सहायता हो या मजहबी स्थलों का विकास, रोजगार हो या सब्सिडी, तेलंगाना में के चंद्रशेखर राव की सरकार राज्य के अल्पसंख्यकों को लाभ पहुँचाने में काफी उदार रही है।

तेलंगाना सरकार धार्मिक पहचान के आधार पर लाभ पहुँचा रही है। अल्पसंख्यक समुदायों जैसे कि मुस्लिम, सिख, ईसाई से संबंधित निवासी राज्य के कल्याणकारी लाभों का फायदा उठा रहे हैं, जबकि राज्य के बहुसंख्यक हिंदुओं को उनके धर्म के कारण इन कल्याणकारी योजनाओं से वंचित रखा जाता है, उन्हें अयोग्य माना गया है।

अल्पसंख्यकों को लाभ पहुँचाने के लिए बनाई गई योजना में शादी मुबारक, अल्पसंख्यक आवासीय विद्यालय और जूनियर कॉलेज, अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति समुदाय के लिए छात्रवृत्ति, अल्पसंख्यकों के लिए विदेशी छात्रवृत्ति, यूपीएससी परीक्षाओं के लिए कोचिंग, इमामों और मुअज्जिनों के लिए मानदेय, तेलंगाना राज्य अल्पसंख्यक वित्त निगम (TSMFC) के माध्यम से वित्तीय सहायता योजनाएँ शामिल हैं।

इसके अलावा, राज्य सरकार अल्पसंख्यकों को उनके धार्मिक त्योहारों पर उपहार पैकेज भी वितरित करती है। अल्पसंख्यकों के लिए मजहबी महत्व के स्थलों के विकास के लिए विशेष धनराशि निर्धारित की गई है। इतना ही नहीं, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अल्पसंख्यक समुदायों के छात्रों की सहायता के लिए तेलंगाना स्टेट माइनॉरिटी स्टडी सर्कल भी स्थापित किया गया है।

राज्य सरकार मुस्लिम अल्पसंख्यक के प्रति काफी अधिक उदार है। उर्दू को इस आधार पर दूसरी आधिकारिक भाषा के रूप में घोषित किया कि राज्य की आबादी का 12.69 प्रतिशत उर्दू भाषी हैं। सरकार ने अनुवाद कार्यों में मदद के लिए कई विभागों में उर्दू अधिकारियों के रूप में 66 उर्दू अनुवादकों को भी नियुक्त किया। 2017 में केसीआर सरकार ने सरकारी नौकरियों में मजहब विशेष के लिए कोटा 4 प्रतिशत से बढ़ाकर 12 प्रतिशत कर दिया।

शादी मुबारक

इसे 2014 में पहली बार लॉन्च किया गया था, तब तेलंगाना सरकार ने लगभग 1.7 लाख अल्पसंख्यक परिवारों को 1,241.47 करोड़ रुपए की वित्तीय सहायता प्रदान की थी। इस योजना के माध्यम से प्रत्येक परिवार को 1,00,116 रुपए की वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। जब लॉन्च किया गया था, तो प्रारंभिक सहायता 51,000 रुपए आँकी गई थी, लेकिन 6 साल में यह राशि लगभग दोगुनी हो गई है।

शिक्षा

पिछले 6 वर्षों में, अल्पसंख्यक समुदायों के कुल 8,17,242 छात्रों ने तेलंगाना सरकार द्वारा विस्तारित लाभों का लाभ उठाया है। स्कूली शिक्षा और उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों के लिए छात्रवृत्ति पर लगभग 1241.47 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं।

अल्पसंख्यक छात्रों के लिए इसी तरह की योजना में, लगभग 6,55,218 छात्रों की ट्यूशन फीस लौटा दी। केसीआर सरकार ने उन अल्पसंख्यक छात्रों की भी सहायता की है, जो भारत से बाहर जाकर अपनी उच्च पढ़ाई करना चाहते हैं। विदेशी विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा हासिल करने के इच्छुक प्रत्येक छात्र को सरकारी खजाने से 20 लाख रुपए दिए जाते हैं। सरकार ने इस पर अब तक 260.98 करोड़ रुपए खर्च किए हैं और लगभग 1,937 छात्रों को इसका लाभ हुआ है।

मजहबी स्थलों का विकास

मक्का मस्जिद के जीर्णोद्धार के लिए लगभग 8.48 करोड़ रुपए दिए गए। सैंकड़ों साल पुरानी इस्लामिक यूनिवर्सिटी, जामिया निजामिया में एक सभागार का निर्माण तेलंगाना राज्य वक्फ बोर्ड और राज्य अल्पसंख्यक कल्याण विभाग ने 14.65 करोड़ रुपए की लागत से किया।

दरगाह जहाजीर पीर में विकासात्मक कार्य के लिए राज्य सरकार द्वारा 50 करोड़ रुपए मंजूर किए गए। इसी तरह, दरगाह हज़रत बाबा शरफ़ुद्दीन पर 9.60 करोड़ रुपए का खर्च पहाड़ी शरीफ में एक कंक्रीट सीमेंट रैंप बनाने के लिए किया गया था। सरकार ने ईदी बाज़ार में दरगाह हज़रत सैयद ख्वाजा हसन बरहाना शाह शाहिद को 20 करोड़ रुपए आवंटित किए हैं।

तेलंगाना वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष, मोहम्मद सलीम के अनुसार, 20 करोड़ रुपए की लागत से नामपल्ली अनीसुल घुरबा अनाथालय में एक बहुमंजिला इमारत का निर्माण चल रहा है। हैदराबाद में 40 करोड़ रुपए की लागत से एक इस्लामिक और सांस्कृतिक कन्वेंशन सेंटर भी बनाया जा रहा है, जबकि अजमेर में मोहिउद्दीन चिश्ती की दरगाह पर रुबैत के निर्माण के लिए पाँच करोड़ रुपए आवंटित किए गए।

आर्थिक सहायता योजना

तेलंगाना सरकार ने राज्य में अल्पसंख्यकों के ‘उत्थान’ के लिए आर्थिक सहायता भी दी है। राज्य ने ड्राइवर सशक्तिकरण कार्यक्रम, तेलंगाना राज्य अल्पसंख्यक वित्त निगम (TSMFC) के तहत 24.04 करोड़ रुपए की लागत से 542 मारुति स्विफ्ट डिजायर कारों का वितरण किया है। 

इसके अलावा ‘Own Your Autorickshaw scheme’ स्कीम के तहत अल्पसंख्यक लाभार्थियों को 12.76 करोड़ रुपए की लागत पर 1,744 ऑटो-रिक्शा वितरित किए गए। राज्य अल्पसंख्यक वित्त निगम ने 8.03 करोड़ रुपए की लागत से 10,072 सिलाई मशीनें भी वितरित की हैं। निगम द्वारा 20,176 व्यक्तियों को ऋण दिया गया था और लाभार्थियों को 172.77 करोड़ रुपए की राशि ट्रांसफर भी की गई थी।

अल्पसंख्यकों को दिए गए कल्याणकारी लाभों से तेलंगाना के बहुसंख्यक हिंदू वंचित

यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि यही लाभ तेलंगाना के हिंदू बहुसंख्यकों को नहीं दिया गया। आर्थिक सहायता से लेकर छात्रवृत्ति तक अल्पसंख्यकों को राज्य सरकार की उदारता का लाभ मिला है, लेकिन हिंदू को समान लाभ नहीं दिया जाता। हालाँकि भारत का संविधान धर्म के आधार पर भेदभाव को बढ़ावा नहीं देता है। इसके बावजूद तेलंगाना सहित कई राज्य सरकारें कल्याणकारी योजनाओं का लाभ धर्म के आधार पर देते हैं।

यह भी ध्यान देने वाली बात है कि केवल हिंदू मंदिर और संस्थान राज्य सरकार के नियंत्रण में हैं। राज्य का अल्पसंख्यक संस्थानों और धार्मिक स्थानों पर कोई नियंत्रण नहीं है। अल्पसंख्यकों को खुश करने के उद्देश्य से अपनी विशेष योजनाओं और परियोजनाओं को पूरा करने के लिए हिंदू धार्मिक स्थलों से प्राप्त धन का उपयोग भी अक्सर राज्य सरकारों द्वारा किया जाता है।

ना MSP ख़त्म होगी, न APMC पर कोई फर्क पड़ेगा: जानिए मोदी सरकार के कृषि कानूनों को लेकर फैलाई जा रही अफवाहों का सच

केंद्र की मोदी सरकार द्वारा पास किए गए कृषि कानूनों को लेकर तरह-तरह की अफवाह फैलाई जा रही हैं और इसी के सहारे हिंसा को बढ़ावा दिया जा रहा है। पहले कॉन्ग्रेस सरीखी राजनीतिक पार्टियों ने किसानों को भड़का कर उन्हें सड़क पर उतारा और फिर इस्लामी कट्टरपंथी संगठनों से लेकर खालिस्तानी तत्व तक इस प्रदर्शन में जुड़ गए। अब पंजाब के किसान हरियाणा होकर दिल्ली पहुँच रहे हैं, जहाँ जम कर अराजकता फैलाई जा रही है।

केंद्र की मोदी सरकार ने संसद के दोनों सदनों में ‘कृषक उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) अधिनियम 2020’ और ‘कृषक (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार अधिनियम 2020’ को एक्ट का रूप दिया। पहला अधिनियम किसानों को अपने उत्पाद को बेचने के लिए अधिक विकल्प मुहैया कराता है। खरीददारों के बीच बढ़ी प्रतिस्पर्धा से अंतरराज्यीय व्यापार को बढ़ावा मिलता है।

जहाँ इस अधिनियम के बारे में तरह-तरह के अफवाह फैलाए जा रहे हैं, इसकी खूबियों के बारे में स्पष्ट करना ज़रूरी है। सबसे पहले तो बता दें कि इसके तहत किसानों और व्यापारियों के बीच एक बड़ा तंत्र तैयार होता है। इससे मंडी के बाहर बाधामुक्त तरीके से अपने उत्पाद बेचने की सहूलियत किसानों को मिलती है। साथ ही इलेक्ट्रॉनिक व्यापार के लिए भी एक नेटवर्क तैयार होता है। फिर भी अफवाह फैलाए जा रहे हैं।

एक अफवाह ये है कि इससे राज्यों के APMC (एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्किट कमिटी) की शक्ति कम हो जाएगी, या फिर वो निष्प्रभावी हो जाएँगे। जबकि, ऐसा नहीं है। इस बिल का उद्देश्य राज्यों की APMC को निष्प्रभावी करना है ही नहीं। ये किसानों को मौजूदा APMC का अतिरिक्त विपणन चैनल प्रदान करेगा। APMC अपने प्रचलन की दक्षता में और सुधार करें, इसके लिए ये क़ानून उन्हें प्रोत्साहित करेगा।

इसके अलावा एक अन्य अफवाह बार-बार फैलाई जा रही है कि इससे किसानों के उत्पाद पर मिलने वाला ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP)’ ख़त्म हो जाएगा, जिसे लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी बार-बार सफाई दे चुके हैं। असली बात तो ये है कि MSP पर खरीद सरकार की प्राथमिकता बनी रहेगी और इसकी नीति अथवा प्रक्रिया से इस कानून का कुछ भी लेना-देना है ही नहीं। राज्य एजेंसियों के माध्यम से MSP पर खरीद जारी रहेगी।

किसानों को इलेक्ट्रॉनिक व्यापार प्लेटफॉर्म पर किसी भी प्रकार की लेवी, उपकर या मंडी शुल्क नहीं लिया जाएगा। लेन-देन में पारदर्शिता आएगी। किसानों को भुगतान उसी दिन, अथवा 3 दिनों के भीतर हो जाएगा। ये अधिनियम व्यापार क्षेत्र में राज्य या केंद्र के किसी भी कानून से ऊपर नहीं होगा। किसानों के विवाद के निपटारे के लिए भी तंत्र बनाया गया है। उप मंडल अधिकारी ये उसके द्वारा गठित की गई समिति को ये अधिकार दिया गया है।

एक अन्य अफवाह ये है कि इससे व्यापारियों के हाथों में सब कुछ आ जाएगा, जबकि किसानों के पास कुछ भी नहीं रहेगा। ये गलत है, क्योंकि इस कानून में व्यापारियों द्वारा नियमों का उल्लंघन करने पर सज़ा का भी प्रावधान है। 25,000 रुपए से लेकर 5 लाख रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान है। जिसके पास इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म का नियंत्रण है, उसके द्वारा गड़बड़ी की जाने पर इससे दोगुने जुर्माने का प्रावधान है।

नए कृषि कानूनों को लेकर सुनिए केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को (वीडियो साभार: DD News)

जहाँ भी उपज की मूल्य में उतार-चढ़ाव की संभावना है, वहाँ MSP तय किया जाएगा। एक बार उत्पाद बेच दिए जाने के बाद किसी भी प्रकार की जोखिम के लिए खरीददार ही जिम्मेदार होगा, किसान नहीं। फसल की कटाई से पहले बेचे जाने के बावजूद स्वामित्व किसानों के पास बना रहेगा, और उपज की सुपुर्दगी के बाद किसान भुगतान प्राप्त करेगा। अगर प्रायोजक किसी स्थायी संरचना का निर्माण करता है तो उसका स्वामित्व किसानों के पास आ जाएगा। कुछ सवालों के जवाब देखिए:

अगर MSP बना रहेगा तो सरकार ने कृषि कानूनों में इसकी चर्चा क्यों नहीं की है?
ऐसा इसीलिए, क्योंकि MSP हमेशा से एक शासकीय तंत्र का हिस्सा रहा है, न कि विधायिका का। इससे फायदा ये होता है कि जब भी ज़रूरत पड़े, इसे बढ़ाया जा सकता है। इससे किसानों को फायदा मिलेगा।

अगर लेनदेन प्राइवेट हो रहा है, फिर ये कैसे सुनिश्चित किया जाएगा कि MSP मेंटेन रखा गया है?
प्राइवेट ट्रेड MSP की दरों से ज्यादा ही होगा। कोई भी किसान प्राइवेट प्लेयरों के पास तभी जाएँगे, जब उन्हें MSP से ज्यादा रुपए मिलेंगे।

क्या मोदी सरकार ने MSP को कमजोर कर दिया है?
आँकड़े तो ऐसा बिलकुल नहीं कहते। 2009-14 में यूपीए-II के काल में 1.52 LMT दाल MSP पर खरीदे गए। वहीं 2014-19 की पहली मोदी सरकार ने 76.85 LMT दालों की खरीद की। अब आप खुद ही अंतर का अंदाज़ा लगा लीजिए।

किसानों को एक बार कॉन्ट्रैक्ट करने के बाद फँसा लिया जाएगा? फिर वो बाहर नहीं निकल पाएँगे?
ये एक बेहूदा तर्क है क्योंकि इन कृषि कानूनों में किसानों को ये छूट दी गई है कि वो जब चाहें, उन्हें करार रद्द करने का अधिकार है। अगर उन्होंने एडवांस नहीं लिया है, तो उन्हें किसी भी प्रकार की पेनल्टी नहीं देनी है। अगर एडवांस लिया भी है तो उसे लौटा कर कॉन्ट्रैक्ट रद्द किया जा सकता है। इस पर किसी भी प्रकार का ब्याज नहीं लिया जाएगा।

किसानों की जमीन सुरक्षित नहीं रहेगी? उन्हें हड़प लिया जाएगा?
ऐसा नहीं है, क्योंकि किसानों की जमीन को लीज पर देने का किसी अन्य प्रकार से इस्तेमाल करने पर प्रायोजकों को दंड भरना पड़ेगा। किसानों द्वारा तय की गई अवधि और किसानों द्वारा तय किए गए अनाज के लिए ही इसका इस्तेमाल उसी काम के लिए होगा, जिस कृषि कार्य के लिए करार हुआ है।

फिर पंजाब में ही ज्यादा विरोध क्यों हो रहा है? विपक्षी दल इतना बेचैन क्यों हैं?
पंजाब की राजनीतिक पार्टियों की बेचैनी इस बात को लेकर है कि वहाँ अब तक इस तरह क्रय-विक्रय के कार्य में दलालों की बड़ी भूमिका थी, जिनका नेटवर्क काफी तगड़ा है। अब उन दलालों की छुट्टी होगी, जिससे ये दल बेचैन हैं।

और हाँ, ऐसा कुछ बहुत नया भी नहीं है, जो विवादित हो। क्योंकि, APMC के तहत पहले से ही ‘कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग’ का चलन है और ये कई राज्यों में चल रहा है, इसीलिए इसमें कुछ भी विवादित नहीं। पंजाब-बंगाल में पेप्सिको और हरियाणा में SAB Miller इसके उदाहरण हैं। यूपीए ने भी ऐसे नियम ड्राफ्ट किए थे। जब अच्छी फसल के लिए खरीददार ही सारे संसाधन मुहैया कराएगा और क्षति का निर्वहन भी वही करेगा, तो किसानों को फायदा ही है न?

इसके अलावा एक विधेयक में, किसानों के हितों की रक्षा के लिए पर्याप्त व्यवस्था का प्रावधान है। भुगतान सुनिश्चित करने हेतु प्रावधान है कि देय भुगतान राशि के उल्लेख सहित डिलीवरी रसीद उसी दिन किसानों को दी जाएँ। मूल्य के संबंध में व्यापारियों के साथ बातचीत करने के लिए किसानों को सशक्त बनाने हेतु प्रावधान है कि केंद्र सरकार, किसी भी केंद्रीय संगठन के माध्यम से, किसानों की उपज के लिए मूल्य जानकारी और मंडी आसूचना प्रणाली विकसित करेगी।

मोदी सरकार के कृषि कानूनों को लेकर बिचौलियों का साम्राज्य तहस-नहस होने के डर से वो और उनके आका नाराज हैं और अफवाह फैला कर जनता को भड़का रहे हैं। इन कृषि कानूनों को लेकर फैलाई जा रही है अफवाह का जवाब कई बार पीएम मोदी ने भी दिया है। लेकिन, असलियत ये है कि किसानों को अपनी फसल के मनपसंद दाम मिल रहे हैं, वो भी अपने शर्तों पर। लेकिन, कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन के नाम पर अफवाह फैलाई जा रही है, हिंसा की जा रही है और मोदी सरकार के खिलाफ दुष्प्रचार चल रहा है।

4 राज्य, 45 जगहें: कोयला घोटाला में सीबीआई का छापा, TMC नेताओं के करीबी ‘लाला’ पर भी कसा शिकंजा

कोयला घोटाले में सीबीआई ने शनिवार को ताबड़तोड़ छापेमारी की। पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, झारखंड और बिहार की कुल 45 जगहों पर छापा मारा गया।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार सीबीआई ने पश्चिम बंगाल में कोलकाता समेत 30 ठिकानों पर छापे मारे। छापे अनूप माँझी और उससे जुड़े लोगों के ठिकाने पर पड़े।

टाइम्स नाउ की रिपोर्ट के मुताबिक़ अनूप माँझी के दफ्तरों पर भी छापे मारे गए हैं। माँझी के संपर्क राज्य की टीएमसी सरकार के मंत्रियों और अधिकारियों से बताया जाता है। जिन परिसरों में छापे मारे गए उनमें आसनसोल, दुर्गापुर, रानीगंज, बर्दवान, बिशनपुर और दक्षिण 24 परगना स्थित माँझी के सहयोगियों के घर और दफ्तर शामिल हैं।

अनूप माँझी को ‘लाला’ नाम से भी जाना जाता है। वह बंगाल-झारखंड सीमा पर कोयला खदानों के आस-पास रैकेट चलता है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ उसे राजनीतिक दलों से भी फंडिंग मिलती है। इस महीने की शुरुआत में उसे दो नोटिस जारी की गई थी। जारी की गई कुल 3 नोटिस में उसने सिर्फ 2 नोटिस का संज्ञान लिया था। ममता बनर्जी ने केंद्रीय जाँच एजेंसी द्वारा पश्चिम बंगाल में की गई इस छापेमारी पर नाराज़गी जताते हुए सवाल खड़े किए थे। इसमें माँझी और पशु तस्करी के रैकेट शामिल हैं, जिसके सरगना को हाल ही में गिरफ्तार किया गया था। 

पशु तस्करी रैकेट और कोयला तस्करी रैकेट के बीच संबंध 

एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार सीबीआई पशु तस्करी रैकेट और कोयला तस्करी रैकेट के बीच संभावित संबंध को लेकर नज़र रख रही है। सीबीआई ने 6 नवंबर को पशु तस्करी रैकेट के सरगना को गिरफ्तार किया था जो भारत-बांग्लादेश बॉर्डर पर अपना रैकेट चला रहा था। आरोपित एनैमुल हक़ मूल रूप से पश्चिम बंगाल का रहने वाला है और सीबीआई ने उसे दिल्ली से गिरफ्तार किया था। हक़ के साथ सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ़) के एक अधिकारी को भी गिरफ्तार किया गया था। 

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ केंद्रीय जाँच एजेंसी ने इस मामले के संबंध में गुरुवार को कोलकाता के दो चार्टर्ड अकाउंटेंट के दफ्तर पर छापा मारा था। 36 बीएसएफ़ बटालियन के पूर्व कमांडेंट सतीश कुमार (जिसकी तैनाती अभी रायपुर में है), एनैमुल हक़, अनारुल एसके और मोहम्मद गुलाम मुस्तफ़ा को सीबीआई ने हिरासत में लिया था। 

आरोपों के मुताबिक़ पशु तस्कर बीएसएफ़ अधिकारियों को लगातार घूस देते थे, जिससे उनका काम में कोई परेशानी नहीं आए। मार्च 2018 में सीबीआई ने एनैमुल हक़ को बीएसएफ़ कमांडेंट जीबू टी मैथ्यू को घूस देने के आरोप में गिरफ्तार किया था, जिसके बाद वह जमानत पर बाहर आया था। इसके बाद जनवरी 2018 के दौरान मैथ्यू 47 लाख रुपए के साथ अलप्पूज़ा रेलवे स्टेशन पर गिरफ्तार किया गया था। 

सितंबर महीने में सीबीआई ने कोलकाता और मुर्शिदाबाद के अनेक क्षेत्रों में छापा मारा था जिसका उद्देश्य भारत-बांग्लादेश बॉर्डर पर जारी पशुओं की तस्करी की गुत्थी सुलझाना था। इसके अलावा उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद, पंजाब के अमृतसर और छत्तीसगढ़ के रायपुर में छापा मारा था। इस साल अप्रैल में बीएसएफ़ ने इस बात की जानकारी दी थी कि 2216.7 किलोमीटर लंबे भारत-बांग्लादेश बॉर्डर से पशु, सोना, गाँजा, नकली भारतीय मुद्रा की तस्करी हो रही है।       

कैसे बन रही कोरोना वैक्सीन? अहमदाबाद और हैदराबाद में PM मोदी ने लिया जायजा, पुणे भी जाएँगे

कोरोना महामारी संकट के बीच शनिवार (नवंबर 28, 2020) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश में कोरोना वैक्सीन की तैयारियों का जायजा ले रहे हैं। इसके तहत पीएम मोदी हैदराबाद पहुँचे हैं। प्रधानमंत्री मोदी यहाँ भारत बायोटेक के कोरोना सेंटर का दौरा करेंगे। यहाँ भारत बायोटेक और आईसीएमआर द्वारा तैयार स्वदेशी कोरोना वैक्सीन कोवैक्सिन का ट्रायल चल रहा है। 

पीएम इस वैक्सीन सेंटर में तैयारियों का जायजा लेंगे। इससे पहले प्रधानमंत्री मोदी अहमदाबाद पहुँचे। यहाँ वह जायडस बायोटेक पार्क पहुँचे, जहाँ उन्होंने जायडस कैडिला (Zydus Cadila) की कोरोना वैक्सीन जाइकोव-डी (ZyCOV-D) की तैयारियों का जायजा लिया।

भारत बायोटेक वैक्सीन सेंटर की यात्रा के बाद पीएम मोदी पुणे में सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (SII) भी जाएँगे। सीरम इंस्टीट्यूट ने वैक्सीन के लिए वैश्विक फार्मा दिग्गज AstraZeneca और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के साथ साझेदारी की है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को COVID-19 वैक्सीन कैंडिडेट ZYCOV-D के विकास की समीक्षा करने के बाद अहमदाबाद के Zydus Biotech Park की यात्रा का समापन किया। पीएम मोदी की यह यात्रा देश में वैक्सीन विकास और विनिर्माण प्रक्रिया की व्यक्तिगत रूप से समीक्षा करने के लिए उनके तीन-शहरों के दौरे में पहली थी।

अहमदाबाद में जायडस बायोटेक पार्क का दौरा करने के बाद पीएम मोदी ने ट्वीट कर दौरे से जुड़ी जानकारी साझा की। पीएम मोदी ने ट्वीट में लिखा, “अहमदाबाद में ज़ायडस बायोटेक पार्क का दौरा किया, ज़ायडस कैडिला द्वारा विकसित किए जा रहे स्वदेशी डीएनए आधारित वैक्सीन के बारे में अधिक जानकारी के लिए, मैं उनके काम के लिए इस प्रयास के पीछे की टीम की सराहना करता हूँ। भारत सरकार इस यात्रा में उनका समर्थन करने के लिए सक्रिय रूप से उनके साथ काम कर रही है।”

अहमदाबाद में बायोटेक पार्क की अपनी यात्रा के दौरान, पीएम मोदी ने वैज्ञानिकों के साथ बातचीत की और संयंत्र के बाहर एकत्रित भीड़ का भी अभिवादन किया। पीएम नरेंद्र मोदी ने अहमदाबाद में अपनी वैक्सीन यात्रा के दौरान जायडस बायोटेक पार्क के बाहर एकत्रित भीड़ का हाथ हिलाकर अभिवादन किया। इस दौरान सड़कों पर भारी भीड़ नजर आई।

कानपुर लव जिहाद SIT रिपोर्ट की क्रूर सच्चाइयाँ जो वामपंथी छुपा रहे हैं: अजीत भारती का वीडियो | Kanpur SIT report analysis

14 साल की चार, 16 साल की तीन बच्चियाँ कैसी दिखती हैं? हमने अपनी बहनों को देखा है, दोस्तों की बेटियों को देखा है, कितनी मासूम, अनजान और सामाजिकता से परे होती हैं ये बच्चियाँ। ये 6 बच्चियाँ कानपुर SIT की उस रिपोर्ट का हिस्सा हैं जो 2019-20 के कुछ मामलों को आधार बना कर उसमें ‘लव जिहाद’ का पैटर्न खोजने के लक्ष्य से जारी की गई हैं।

इस अन्वेषण के लिए कानपुर इलाके के मात्र 14 मामले ही लिए गए थे, वो भी सिर्फ 2019-20 से जो कि मीडिया में चर्चित हुए थे। इसमें कानपुर जैसे वृहद इलाके का हर मामला नहीं लिया गया था। अतः, इसे वैसे चश्मे से कोई दिखाना चाह रहा है, तो वो विशुद्ध धोखाधड़ी है।

दूसरी बात, ‘लव जिहाद’ को बार-बार समझना आवश्यक है क्योंकि कुछ लम्पट वामपंथी पोर्टल और बकैत एंकर (रवीश कुमार व अन्य) इसे ‘अंतरधार्मिक विवाह‘ का मसला और ‘प्रेम पर सरकार का पहरा’ मान कर स्थापित करने में सत्तू-पानी बाँध कर बैठ गए हैं।

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‘खट्टर का हो गया, अब मोदी की बारी है’: JNU हिंसा और दिल्ली दंगों से जुड़ रहे ‘किसान आंदोलन’ के तार, उपद्रव के 2 चेहरे वहाँ भी-यहाँ भी

नरेंद्र मोदी की सरकार द्वारा पास किए गए तीन कृषि कानूनों के विरोध में चल रहे किसान आंदोलन से दिल्ली में अराजकता का माहौल है। अब पता चल रहा है कि जिन लोगों ने JNU में हिंसा को बढ़ावा दिया था, दिल्ली दंगों के दौरान मुस्लिमों को भड़काया था, वही हरियाणा-पंजाब सीमा पर चल रहे इस ‘किसान आंदोलन’ को भी उपद्रव में बदल रहे हैं। हजारों लोगों के दिल्ली कूच करने के बाद हरियाणा की सिंधु सीमा पर पुलिस की तैनाती बढ़ा दी गई है।

गुरुवार (नवंबर 26, 2020) को पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर वाटर कैनन का इस्तेमाल किया और आँसू गैस के गोले भी छोड़े, लेकिन इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। कई किसानों को गिरफ्तार भी किया गया। अब इस आंदोलन के तार जनवरी 2020 में JNU में हुई हिंसा और फरवरी के अंतिम हफ्ते में दिल्ली में हुए CAA विरोधी दंगों से जुड़ रहे हैं। JNU की हिंसा के दौरान कई व्हाट्सप्प ग्रुप्स बना कर हिंसा के लिए साजिश रची गई थी।

आनंद मंगनाले 2016 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में राहुल गाँधी के रणनीतिकार थे। वो इससे पहले प्रशांत किशोर के साथ काम कर चुके हैं। व्हाट्सप्प पर हुई बातचीत के स्क्रीनशॉट्स के सामने आने के बाद पता चला था कि आनंद ने हिंसा की साजिश रचने में बड़ी भूमिका निभाई थी। आनंद ने दावा किया था कि उन्होंने एक दक्षिणपंथी ग्रुप में घुस कर सूचनाएँ निकाली हैं। उनका इस्लामी समूह ‘यूनाइटेड अगेंस्ट हेट (UAH)’ से भी जुड़ाव सामने आया था।

विंटर सेमेस्टर के रजिस्ट्रेशन के दौरान हुई झड़प के बाद वामपंथी गुंडों ने हॉस्टलों में जाकर छात्रों की पिटाई की थी। शुक्रवार को आनंद मंगनाले को किसान आंदोलन को लेकर भी लेकर प्रोपेगंडा फैलाते हुए पाया गया। कॉन्ग्रेस से जुड़े आनंद ने ट्विटर के जरिए पहले से ही आक्रोशित भीड़ को भड़काया। उन्होंने प्रदर्शनकारियों द्वारा बैरिकेड तोड़ने का महिमामंडन करते हुए धमकाया कि खट्टर का हो गया, अब मोदी की बारी है।

साथ ही उन्होंने ये भी दावा किया कि कंटेंनर्स और वाटर कैनन किसानों को नहीं रोक पाएँगे। सार्वजनिक रूप से उपद्रव, पुलिस से झड़प और सड़कों को ब्लॉक करने का महिमामंडन करने वाले आनंद मंगनाले ने किसानों द्वारा सीमेंट स्ट्रक्चर्स को तोड़े जाने की भी तारीफ की। सार्वजनिक संपत्ति की क्षति की करते हुए उन्होंने दावा किया कि जिन ट्रैक्टरों का काम कृषि के लिए होता था, अब वही ‘सिविल रेजिस्टेंस’ में काम आएँगे।

वहीं योगेंद्र यादव भी अब ‘किसान नेता’ बन गए हैं और उनका संगठन ‘स्वराज इंडिया’ भी प्रोपेगेंडा फैलाने में जम कर लगा हुआ है। उन्होंने लोकतांत्रिक रूप से पास कानून को किसान-विरोधी तो बताया ही, साथ ही किसानों को ये कह कर भड़काया कि उन्हें विरोध करने की अनुमति नहीं दी जा रही है। अपने संगठन के लोगों को इस प्रदर्शन में लगाने वाले योगेंद्र यादव अब ‘बिहार चुनाव विशेषज्ञ’ से ‘किसान नेता’ बन गए हैं।

ये भी याद रखने वाली बात है कि किस तरह वीडियो बना कर और प्रदर्शन स्थलों पर पहुँच कर योगेंद्र यादव ने दिसंबर 2019 में CAA विरोधी आन्दोलनों को भी भड़काया था। उमर खालिद और शरजील इमाम के साथ मिल कर प्रदर्शन स्थलों का दौरा किया था। उमर खालिद ने ही शरजील इमाम से उनका परिचय कराया था। जामिया, DU और JNU के छात्रों को मोबिलाइज करने की चर्चा इन तीनों के बीच हुई थी।

तीनों की बैठक में ये रणनीति बनाई गई थी कि चक्का जाम के लिए मुस्लिमों को सोशल मीडिया के माध्यम से भड़काया जाएगा। इसी तरह ‘पिंजरा तोड़’ की गिरफ्तार एक्टिविस्ट्स नताशा नरवाल और देवांगना कलिता ने खुलासा किया था कि उन्हें योगेंद्र यादव की तरफ से दिशा-निर्देश दिए गए थे। दिल्ली दंगों की चार्जशीट में भी बताया गया है कि कैसे योगेंद्र यादव ने CAA विरोधी आन्दोलनों को हवा दी, जो बाद में हिंसा में बदल गया।

वामपंथी पत्रकार आदित्य मेमन ने ट्वीट किया कि किसान आंदोलनकारियों को मस्जिदों की तरफ से हर सहायता दी जा रही है। उन्हें भोजन-पानी मुहैया कराया जा रहा है। इसी तरह दिल्ली दंगों में हिंसा फ़ैलाने का आरोपित संगठन UAH भी इस आंदोलन में शामिल है। इसके शांतिपूर्ण होने के दावे जरूर किए जा रहे हैं, लेकिन जिस तरह से हरियाणा-दिल्ली सीमा पर हिंसा हुई है, ऐसा लग नहीं रहा कि ये सब कुछ शांतिपूर्ण है।

क्या पुलिस ने बुजुर्ग किसान पर लाठी चलाई? राहुल गाँधी के झूठे दावों की खुली पोल

पंजाब और हरियाणा के किसान केंद्र सरकार के कृषि सुधार क़ानून का विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। इस बीच किसानों के विरोध पर राजनेताओं की ओर से बयानबाजी और प्रोपेगेंडा जारी है, इस दौरान कॉन्ग्रेस सांसद राहुल गाँधी ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर एक तस्वीर साझा की। तस्वीर में एक बुजुर्ग व्यक्ति पर लाठी चार्ज किया जा रहा था, किसी के लिए भी तस्वीर को पहली निगाह में देख कर ठीक वैसा ही सोचना स्वाभाविक था। लेकिन तस्वीर माननीय राहुल गाँधी द्वारा साझा की गई थी इसलिए तस्वीर की पड़ताल ज़रूरी हो जाती है।

देश में जैसे ही कोई बड़ी घटना होती है, वह कॉन्ग्रेस के लिए कुछ ही समय में मिथ्या प्रचार का सुनहरा अवसर बन जाती है। इसी कड़ी में किसान की तस्वीर को ट्वीट करते हुए राहुल गाँधी ने लिखा, “यह बेहद दुखद तस्वीर है। हमारा नारा था ‘जय जवान जय किसान’ लेकिन मोदी सरकार के अहंकार ने जवान को किसान के विरुद्ध खड़ा कर दिया। यह बहुत ही ज़्यादा खतरनाक है।” राहुल गाँधी द्वारा साझा की गई तस्वीर को देख कर किसी के लिए भी यह सोचना लाज़मी था कि कितनी भयावह तस्वीर है जबकि तस्वीर का एक और पहलू था।

इसके बाद कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने भी ट्विटर पर यही तस्वीर साझा की और साथ में लिखा, जय जवान जय किसान।

क्योंकि कॉन्ग्रेस के नेताओं ने इस तस्वीर को साझा करके ट्विटर पर नारे लगाए तो उनके समर्थक भी तस्वीरों के आधार पर प्रोपेगेंडा फैलाने में जुट गए। इस सुनहरे अवसर का उपयोग करते हुए कॉन्ग्रेस समर्थकों ने मोदी सरकार पर जम कर अपनी कुंठा लुटाई।

क्या है इस तस्वीर की वास्तविकता

भारतीय जनता पार्टी ने राहुल गाँधी द्वारा किए गए इस ट्वीट में मौजूद तस्वीर का दूसरा पक्ष सामने लाने में देरी नहीं की। इस दौरान भाजपा ने राहुल गाँधी को देश का सबसे निराशाजनक विपक्षी नेता भी बताया। भाजपा आईटी सेल के मुखिया अमित मालवीय ने अपने ट्वीट में लिखा, “राहुल गाँधी पिछले कुछ समय के सबसे ज़्यादा निराश करने वाले विपक्षी नेता साबित हुए हैं।” राहुल गाँधी द्वारा साझा की गई इस तस्वीर को ‘प्रोपेगेंडा’ बताते हुए अमित मालवीय ने लिखा कि पुलिसकर्मी ने उस किसान को छुआ तक नहीं।   

इसके अलावा तमाम अन्य ट्विटर यूज़र्स ने भी इस बात की पुष्टि की जिसमें उन्होंने बताया कि पुलिस ने किसान पर लाठी चार्ज नहीं किया। बल्कि लाठी ने किसान को छुआ तक नहीं!

इस ट्वीट में भी देखा जा सकता है कि किस तरह कॉन्ग्रेस का अवसरवादी आईटी सेल माहौल बना कर किसी को भी ‘विलेन’ घोषित कर देता है।

यह बात सच है कि पुलिस ने प्रदर्शन की आड़ में हिंसा भड़का रहे तमाम उपद्रवियों को रोकने के लिए सीमित बल का उपयोग किया था। इस बात का उल्लेख भी उतना ही ज़रूरी है कि प्रदर्शनकारियों ने भी कई स्थानों पर हिंसक प्रदर्शन किया था। 26 नवंबर को शम्भू बॉर्डर पर कई प्रदर्शनकारियों ने पत्थरबाजी की थी।

इसके अलावा किसान आंदोलन का एक और हैरान करने वाला पहलू सामने आया था। कथित तौर पर ऐसी तमाम तस्वीरें और वीडियो सामने आए जिसमें प्रदर्शन के दौरान खालिस्तान के समर्थन की बात सामने आ रही थी। इसी तरह का एक वीडियो सामने आया था जिसमें एक तथाकथित किसान द्वारा स्पष्ट तौर पर यह कहते हुए सुना जा सकता है कि जैसे इंदिरा गाँधी को ठोका वैसे ही नरेंद्र मोदी को भी ठोक देंगे।

ट्विटर पर साझा किए गए एक समाचार चैनल के वीडियो में व्यक्ति कहता है, “अभी हमारी सरकार के साथ एक मीटिंग है अगर उसमें कुछ हल निकलता है तो ठीक है। मीटिंग 3 दिसंबर को तय की गई है और हम तब तक यहीं पर रहने वाले हैं। अगर उस मीटिंग में कुछ हल नहीं निकला तो बैरिकेड तो क्या हम तो इनको (शासन प्रशासन) ऐसे ही मिटा देंगे। हमारे शहीद उधम सिंह कनाडा की धरती पर जाकर उन्हें (अंग्रेज़ों को) ठोक सकते हैं तो दिल्ली कुछ भी नहीं है हमारे लिए। जब इंदिरा ठोक दी तो मोदी की छाती भी ठोक देंगे।”