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रोशनी घोटाला में महबूबा मुफ्ती का नाम: जम्मू में सरकारी जमीन कब्ज़ा कर बनाया गया PDP का दफ्तर, CBI कर रही जाँच

रोशनी लैंड स्कैम में अब जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और PDP की मुखिया महबूबा मुफ्ती का नाम सामने आ रहा है। ये लैंड स्कैम अपने-आप में प्रदेश के इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला है। गरीबों को शासित जमीन मुहैया कराने और प्रदेश में बिजली लाने के लिए जिस कानून को बनाया गया था, जम्मू कश्मीर के नेताओं ने उसका जम कर फायदा उठाया और अकूत धन-संपत्ति अर्जित की। जबकि जनता गरीब ही बनी रही।

इस घोटाले की जाँच CBI ने अपने हाथों में ली हुई है। अभी तक के जाँच में कई खुलासे हुए हैं और इन सब के तार जम्मू कश्मीर के दो पूर्व मुख्यमंत्रियों से जुड़ रहे हैं, जिनमें से एक फारूक अब्दुल्लाह का नाम पहले ही सामने आ चुका है। ‘न्यूज़ 18’ की खबर के अनुसार, अब पता चला है कि महबूबा मुफ्ती की पार्टी PDP ने जम्मू के संजवान क्षेत्र में तीन कनाल सरकारी भूमि पर अवैध रूप से कब्ज़ा जमा लिया।

इसके बाद इस जमीन पर पार्टी के दफ्तर का निर्माण कराया गया। इसी ऑफिस के पहले फ्लोर पर विवादास्पद नेता राशिद खान ने डेरा जमा लिया। जिस समय ये सब हुआ, उस वक़्त राज्य में मुफ्ती मोहम्मद सईद की सरकार थी। 2 बार जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री रहे सईद काफी विवादित नेता थे और उनके केंद्रीय गृह मंत्री रहते ही घाटी से कश्मीरी पंडितों का पलायन हुआ था। उनके निधन के बाद उनकी बेटी महबूबा सीएम बनी थीं।

PDP के नेता चौधरी तालिब हुसैन ने भी जम्मू डिविजन के चन्नी रामा इलाके में दो कनाल सरकारी जमीन पर अवैध रूप से कब्ज़ा जमा रखा है। उन्होंने रोशनी एक्ट का सहारा लेने की जहमत तक नहीं उठाई और सीधा भूमि कब्ज़ा डाली। वो बलात्कार के भी आरोपित हैं और उन्हें अप्रैल 2019 में खुद महबूबा मुफ्ती ने अपनी पार्टी में पूरे गर्मजोशी के साथ शामिल किया था। उन्हें आदिवासियों के अधिकार के लिए लड़ने वाला बता कर उन्होंने ऐसा किया।

‘न्यूज़ 18’ की खबर में एक CBI अधिकारी के हवाले से दावा किया गया है कि गुजरे जमाने की फ़िल्मी हस्तियाँ फिरोज खान और संजय खान की बहन दिलशाद शेख ने भी राजधानी श्रीनगर में 7 कनाल सरकारी जमीन पर कब्ज़ा जमा लिया। दिलशाद ने जमीन को नियमित करने के लिए राशि भी नहीं जमा कराई लेकिन रोशनी एक्ट का इस्तेमाल किया। इसी तरह एक अन्य PDP नेता असलम मट्टू ने भी राजधानी में भूमि कब्जाई।

उन्होंने भी इसके तहत जमा कराई जाने वाली रकम नहीं दी। जम्मू-कश्मीर के एक अन्य पूर्व मुख्यमंत्री बख्शी गुलाम मोहम्मद के परिवार के एक सदस्य ने भी इस एक्ट का गलत तरीके से फायदा उठा कर सरकारी भूमि पर कब्ज़ा किया। फारूक अब्दुल्लाह ने दावा किया था कि अवैध रूप से कब्ज़ा की गई सरकारी जमीन के बदले चुकाई गई रकम से राज्य में बिजली आएगी, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।

सीएम फारुक अब्दुल्ला सरकार द्वारा 2001 में लाई गई इस स्कीम के तहत 1990 से हुए अतिक्रमणों को इस एक्ट के दायरे में कट ऑफ सेट किया गया था। सरकार का कहना था कि इसका सीधा फायदा उन किसानों को मिलेगा, जो सरकारी जमीन पर कई सालों से खेती कर रहे है। लेकिन नेताओं ने जमीनों पर कब्जे जमाने का काम शुरू कर दिया। वर्ष 2005 में तब की मुफ्ती सरकार ने 2004 के कट ऑफ में छूट दी। उसके बाद गुलाम नबी आजाद ने भी कट ऑफ ईयर को वर्ष 2007 तक के लिए सीमित कर दिया।

10 साल में 800% बढ़ी संपत्ति: उद्धव ठाकरे के बेहद करीबी सरनाईक कभी ऑटो रिक्शा चलाते थे, आज करोड़ों के मालिक

प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने मंगलवार (नवंबर 24, 2020) को शिवसेना नेता प्रताप सरनाईक के आवास और दफ्तर पर छापेमारी की। यह छापेमारी सरनाईक के मुंबई और ठाणे के 10 ठिकानों पर की गई। उन पर वित्तीय अनियमितता का आरोप है, जिसके कारण ईडी ने इस कार्रवाई को अंजाम दिया। तलाशी अभियान के बाद ईडी के अफसरों ने ठाणे स्थित ठिकाने से सरनाईक के बेटे विहंग सरनाईक को हिरासत में ले लिया और उसे अपने साथ ले गए।

बता दें कि 56 वर्षीय शिव विधायक ठाणे में एक रियल एस्टेट डेवलपर हैं और मुंबई और आस पास के होटल और क्लबों के हॉस्पिटलिटी इंडस्ट्री में भी कारोबार करते हैं। जानकारी के मुताबिक सरनाईक 1980 के दशक में ठाणे में ऑटोरिक्शा चलाते थे। 2009 में ओवला-मजीवाड़ा निर्वाचन क्षेत्र के लिए अपना नामांकन दाखिल करने के लिए रिक्शे से पहुँचे थे। वो भी रिक्शे में बैठकर नहीं, बल्कि रिक्शा चलाकर।

सरनाईक ने उस समय बताया था कि उन्होंने 1984 से 1989 तक रिक्शा चलाकर अपना जीवन-यापन किया था। उस समय उन्होंने अपनी संपत्ति 16 करोड़ बताई थी। वहीं 2019 विधानसभा चुनावों से पहले दायर अपने हलफनामे में उन्होंने 143 करोड़ रुपए की संपत्ति घोषित की। यानी कि 10 साल में उनकी संपत्ति में 800% की बढ़ोतरी हुई।

सरनाईक शिव सेना प्रमुख और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के करीबी माने जाते हैं और ठाणे क्षेत्र से पार्टी के प्रमुख नेताओं में से एक हैं, जहाँ सेना का बोलबाला है। सरनाईक के मराठी फिल्म और थिएटर सर्कल में भी अच्छे संपर्क हैं। कई मराठी फिल्म हस्तियाँ उनके द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में शामिल होती हैं।

प्रताप सरनाईक शिवसेना के विधायक हैं। प्रताप सरनाईक शिवसेना के टिकट पर ठाणे शहर के ओवला-माजीवाड़ा सीट से लगातार तीन बार विधायक चुने गए हैं। यह उनका तीसरा टर्म है। साथ ही वह शिवसेना के प्रवक्ता भी हैं। 

वहीं प्रताप सरनाईक बीजेपी पर काफी आक्रामक रहते हैं और बीजेपी पर निशाना साधने से चूकते नहीं हैं। प्रताप सरनाईक कलर्स टीवी चैनल के रियलिटी शो बिग बॉस में कुमार शानू के बेटे जान शानू के मराठी के खिलाफ बोलने का मुद्दा भी उठा चुके हैं।

वहीं सरनाईक पिछले कुछ हफ्तों में बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत और रिपब्लिक टीवी के मुख्य संपादक अर्णब गोस्वामी के आलोचक रहे हैं। उन्होंने रनौत के खिलाफ कार्रवाई की माँग की थी, जब अभिनेत्री ने मुंबई को पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर बताया था। सरनाईक ने कंगना के मुँह तोड़ देने की भी धमकी बात कही थी।

‘उन्हें देश के गरीबों की समझ नहीं, राजनीति में नहीं आना चाहिए’: TMC ने सौरभ गांगुली पर साधा निशाना, अटकलों का बाजार गर्म

पश्चिम बंगाल में 2021 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा की बढ़ती लोकप्रियता के बीच तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) ने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) अध्यक्ष सौरभ गांगुली पर निशाना साधा है। पश्चिम बंगाल में सौरभ गांगुली के राजनीति में आने की ख़बरें हर कुछ दिनों के बाद चर्चा में आती रहती हैं और बिना किसी आधिकारिक ऐलान के ही TMC ने उन पर निशाना साधते हुए दबाव की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है।

TMC सांसद सौगत रॉय ने कहा कि अगर भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान राजनीति में आने का निर्णय लेते हैं तो उन्हें उनके इस फैसले से काफी निराशा होगी। उन्होंने कहा कि सौरभ गांगुली के राजनीति में आने से वो तो बिलकुल ही खुश नहीं होंगे। उन्होंने कहा कि वो पूरे बंगाल के एक आइकॉन हैं और एकमात्र ऐसे बंगाली क्रिकेटर हैं, जिन्हें भारतीय टीम का नेतृत्व करने का मौका मिला। साथ ही याद दिलाया कि वो टीवी शो की वजह से ही यहाँ खासे लोकप्रिय हैं।

दमदम से लगातार तीसरी बार लोकसभा का चुनाव जीतने वाले IIM कोलकाता के प्रोफेसर सौगत रॉय ने कहा कि सौरभ गांगुली का कोई राजनीतिक बैकग्राउंड नहीं है और उन्हें राजनीति में आना ही नहीं चाहिए। उन्होंने ‘इंडिया टुडे’ के एसोसिएट एडिटर इंद्रजीत कुंडू से बातचीत करते हुए कहा कि सौरभ गांगुली न तो इस देश की समस्याओं को समझते हैं और न ही इस देश के गरीबों के बारे में कुछ जानते हैं।

1977 में बैरकपुर से लोकसभा चुनाव जीत कर चौधरी चरण सिंह की सरकार में मंत्री रहे सौगत रॉय ने कहा कि BCCI अध्यक्ष के पास गरीबी और मजदूरी की समस्याओं को लेकर कोई अनुभव नहीं है। पश्चिम बंगाल में सौरभ गांगुली के भविष्य, खासकर राजनीति में उनकी एंट्री को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। यूपीए-2 में भी मंत्री रहे सौगत रॉय का कहना है कि भाजपा राज्य में मुख्यमंत्री उम्मीदवार के रूप में कोई चेहरा नहीं ढूँढ पा रही है, इसीलिए ऐसे अफवाह फैलाए जा रहे हैं।

पश्चिम बंगाल में सौगत रॉय को ममता बनर्जी के बुद्धिजीवी सलाहकारों में से एक माना जाता है। वो अलीपुर, बनगाँव और ढाकुरिया- 3 अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों से 5 बार विधायक रह चुके हैं और 2 अलग-अलग लोकसभा क्षेत्रों से 4 बार संसद जा चुके हैं। नारदा स्कैम में भी उनका नाम आ चुका है, जिसमें कई तृणमूल सांसदों का कच्चा चिट्ठा खुला था। ऐसे में उनके बयान से राज्य में गांगुली के राजनीतिक मैदान में उतरने की चर्चाएँ फिर चल पड़ी हैं।

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी अपनी ही पार्टी में बगावतों से जूझ रही हैं। कूच बिहार के विधायक मिहिर गोस्वामी ने आरोप लगाया था कि तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) ममता बनर्जी के नियंत्रण में है ही नहीं। बड़ा राजनीतिक घराना अधिकारी परिवार भी उनसे नाराज चल रहा है। ये परिवार ईस्ट मिदनापुर के अलावा वेस्ट मिदनापुर, बाँकुरा, पुरुलिया, झारग्राम और बीरभूम के 35 विधानसभा क्षेत्रों में प्रभाव रखता है।

राजस्थान में कोरोना संक्रमित कॉन्ग्रेसी मंत्री ने RUHS का दौरा कर उड़ाई प्रोटोकॉल की धज्जियाँ: तस्वीरें वायरल

राजस्थान में कोरोना महामारी के बीच कॉन्ग्रेसी मंत्री की बड़ी लापरवाही का मामला सामने आया है। चिकित्सा व स्वास्थ्य मंत्री डॉ रघु शर्मा ने मंगलवार (नवंबर 25, 2020) को RUHS अस्पताल का दौरा किया जबकि वह खुद कोरोना संक्रमित हैं। कोरोना प्रोटोकॉल का उल्लंघन करते हुए RUHS में वार्ड का दौरा करने वाले डॉ रघु शर्मा की कई तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुईं। 

दिलचस्प बात यह है कि स्वास्थ्य मंत्री का यह दौरा 8 माह में पहली बार हुआ है, वो भी तब जब वह खुद अस्पताल में भर्ती हैं। 23 नवंबर के IANS के ट्वीट के अनुसार, कोरोना संक्रमित पाए जाने के बाद राजस्थान के स्वास्थ्य मंत्री को अस्पताल में भर्ती किया गया था।

इसके बाद वह वहाँ पहुँच कर अस्पताल से जुड़ी सेवाओं की मॉनिटरिंग करने लगे। उन्होंने पहले अस्पताल प्रशासन द्वारा कोरोना संक्रमितों को उपलब्ध कराई जाने वाली सुविधाओं के बारे में जानकारी ली और फिर कुछ दिशा-निर्देश भी दिए। 

इसके अतिरिक्त उन्होंने दूसरी और तीसरी मंजिल पर बनाए जा रहे नए 70 आईसीयू बेड का भी अवलोकन किया। वर्तमान में आरयूएचएस अस्पताल में 135 आईसीयू बैड हैं। उन्होंने बताया कि जल्द ही अस्पताल को 70 और नए बेड मिल जाएँगे और आईसीयू बेड्स की संख्या 205 हो जाएगी। उन्होंने बताया कि अस्पताल में वर्तमान में 1200 ऑक्सीजन बेड हैं और कोरोना संक्रमितों को बेहतर चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध कराई जा रही है। 

जब उनसे दौरे के संबंध में पूछा गया तो उन्होंने कहा, “आरयूएचएस में पहले से सब पॉजिटिव हैं और मैं भी पॉजिटिव हूँ, इसलिए प्रश्न उठता है कि मुझसे कोरोना फैलेगा कैसे? मैं डॉक्टरों की सलाह के बाद इंतजामों को देखने गया था।”

डॉ रघु शर्मा का यह बयान आने के बाद सवाल उठाया जा रहा है कि क्या वह मानते हैं कि यदि वह संक्रमित हैं तो अस्पताल के डॉक्टर नर्स आदि सब संक्रमित हैं। लोगों का पूछना है कि थोड़ी सी पब्लिसिटी के लिए उन्होंने कोरोना नियमों की धज्जियाँ क्यों उड़ाई? यदि इससे स्टंटबाजी न कहा जाए तो क्या कहा जाए।

बता दें कि राजस्थान चिकित्सा मंत्री की तस्वीरों को यदि देखें को पता चलेगा कि कोविड वार्ड में जाते हुए न कॉन्ग्रेस नेता के पास पीपीई किट है और न ही डॉक्चरों के पास। सारे लोग सिर्फ कोरोना संक्रमित स्वास्थ्य मंत्री के पीछे घूम रहे हैं।

उनके इस स्टंट को देखने के बाद पूर्व स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र राठौड़ ने उन पर निशाना साधा है और उनके ख़िलाफ़ महामारी एक्ट लगाने की बात कही है। राठौड़ ने कहा कि हेल्थ मिनिस्टर ने पहले चुनावों में कोरोना प्रोटोकॉल को तोड़ा और अब दूसरों की जान को जोखिम में डाल रहे हैं। इनके ख़िलाफ़ महामारी एक्ट में कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं खुद प्रोटोकॉल को ताक पर रखने वाले स्वास्थ्य मंत्री ने आमजन से हर कोरोना गाइडलाइड को पालन करने की अपील की है। साथ ही सोशल डिस्टेंसिंग और हाथ धोने के साथ मास्क के उपयोग को आवश्यक बताया है।

वो सीक्रेट बैठक, जिससे उड़ी इमरान खान की नींद: तुर्की की गोद में बैठा कंगाल Pak अब चीन के लिए होगा खिलौना

सऊदी अरब के शाहजादे मोहम्मद बिन सुल्तान और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच इस हफ्ते खुफिया मुलाकात की खबरों से कई इस्लामी देशों में हड़कंप है। मक्का-मदीना की स्थिति और अपनी माली हैसियत के कारण सऊदी अरब इस्लामी देशों का स्वाभाविक सिरमौर माना जाता है। लेकिन, पाकिस्तान समेत ज़्यादातर मुस्लिम देश इजरायल को अपना दुश्मन नंबर एक मानते हैं।

इनकी मौजूदा घोषित नीति इजरायल के साथ कोई संबंध नहीं रखने की है। खबर है कि इस रविवार (नवंबर 22, 2020) की देर शाम प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और शाहजादे मोहम्मद बिल सुल्तान करीब 3 घंटे तक सऊदी अरब के नियोम शहर में खुफिया तौर पर मिले। अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो भी इस दौरान वहाँ मौजूद थे। संकेत हैं कि इस ख़ुफ़िया मुलाकात में दोनों देशों के बीच राजनयिक सम्बन्ध कायम करने के साथ साथ ईरान और तुर्की के बारे में भी बातचीत हुई।

अगर इनके बीच कोई खिचड़ी पकती है तो इससे पाकिस्तान का मौजूदा सिरदर्द निश्चित ही और बढ़ जाएगा। पाकिस्तान की तुर्की के साथ नजदीकियों को लेकर सऊदी अरब पहले से ही उससे बेहद नाराज है। इजरायल और सऊदी अरब के रिश्तो में अगर नजदीकियाँ बढ़ती हैं तो पाकिस्तान पूरी तरह से तुर्की की गोद में जा बैठेगा। ऐसा होता है तो बेहद नाजुक आर्थिक बदहाली के दौर से गुजरता हुआ पाकिस्तान, सऊदी अरब से मिलने वाली सहायता और आमदनी से हाथ धो बैठेगा।

याद रखने की बात है कि पिछले कुछ महीनों में पश्चिम एशिया के कई इस्लामी देश इजराइल के साथ राजनयिक संबंध कायम कर चुके हैं। इनमें सूडान, संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन शामिल है। अमीरात और इजरायल के बीच पहली उड़ान सऊदी अरब से ऊपर उड़ कर गई। इससे पहले ऐसी सोच भी मुमकिन नहीं थी। पिछले महीने ही पहला समुद्री व्यापारिक जहाज़ इजरायल से संयुक्त अरब अमीरात पहुँचा। पश्चिम एशिया का यह नया गठजोड़ दरअसल एक तरफ तुर्की के खिलाफ है तो दूसरी तरफ ईरान के भी खिलाफ है।

तुर्की के महत्वाकांक्षी राष्ट्रपति एर्दोआँ इन दिनों खुद को इस्लामी देशों का नेता बनाने की जोड़तोड़ में लगे हैं। पिछले कुछ समय से एक के बाद एक उन्होंने कई कदम उठाए हैं, जो कि तुर्की को इस्लामी कट्टरपंथ की तरफ ले जाने वाले हैं। उन्हें लगता है कि ऐसा करके इस्लामी जनमानस सऊदी अरब की जगह तुर्की की ओर झुकने लगेगा। इसका ताजातरीन उदाहरण फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों के खिलाफ एर्दोआँ के बयान हैं। आइए, सऊदी अरब और इजरायल की सीक्रेट बैठक से पाकिस्तान की नींद क्यों उड़ी है, ये समझते हैं।

स्कूल में चार्ली हेब्दो के कार्टून दिखाए जाने के बाद एक कट्टरपंथी मुस्लिम युवक ने फ़्रांस में उस शिक्षक की हत्या कर दी थी। इसके बाद फ़्रांस ने अपने देश में आतंकवाद और इस्लामी कट्टरपंथ के खिलाफ कई कदम उठाए। एर्दोआँ ने इस आतंकवादी घटना की निंदा करने के बजाय मैक्रों के कदमों को ही पागलपन  करार दिया था। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान भी इसमें पीछे नहीं रहे। उनकी सरकार ने फ्रांस के खिलाफ कई आपत्तिजनक टिप्पणियाँ कीं।

पाकिस्तान के एक केंद्रीय मंत्री ने तो ट्वीट करके राष्ट्रपति मैक्रों को नाज़ी घोषित कर दिया। पिछले हफ्ते की इस घटना के बाद फ्रांस ने बाकायदा इस पर अपना आधिकारिक विरोध दर्ज कराया है। सऊदी अरब मानता है कि इस्लामी देशों का नेतृत्व करने का नैसर्गिक अधिकार सिर्फ उसके पास है। उधर तुर्की प्राचीन ऑटोमन साम्राज्य की तर्ज़ पर एक बार फिर अपना दबदबा कायम करने की इच्छा रखता है।

इस उद्देश्य से कई टीवी सीरियल तुर्की में बनाए गए। ये वहाँ प्रचलित भी हुए। एर्दोआँ और तुर्की का ये रवैया सऊदी अरब को बेहद नागवार गुजरा है। उधर इमरान खान के प्रधानमंत्री बनने के बाद पाकिस्तान तुर्की का एक तरह से पिछलग्गू बन गया है। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के पाकिस्तान से नाराज होने की सबसे खास वजह यही है। पाकिस्तान से सऊदी अरब की नाराजगी का आलम ये है कि कुछ समय पहले उसने पाकिस्तान को दिए गए कर्जे के 2 खरब डॉलर वापस देने के लिए कहा।

इसके बाद संयुक्त अरब अमीरात ने भी ऐसा ही किया। इन दोनों देशों ने पाकिस्तान को कर्जे पर तेल देने की सुविधा भी वापस ले ली। यहाँ तक कि जब पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल बाजवा उन्हें मनाने के लिए सऊदी अरब गए तो कोई छह घंटे इंतज़ार कराने के बाद शाहजादे मोहम्मद बिन सुलतान ने उनसे मुलाकात नहीं की। पिछले ही हफ़्ते संयुक्त अरब अमीरात में पाकिस्तान से आने वालों को कामकाज और पर्यटक वीजा देने पर भी रोक लगा दी है। 

स्थिति यहाँ तक पहुँच गई है कि जो पाकिस्तानी संयुक्त अरब अमीरात में पहले से काम कर रहे हैं, उनकी भी तकलीफें काफी बढ़ गई हैं। खाड़ी देशों में काम करने वाले पाकिस्तानी हर साल कोई 9 खरब डॉलर कमाकर अपने देश भेजते हैं। इनमें थोड़ी भी कटौती पाकिस्तान की पहले से ही लड़खड़ा रही अर्थव्यवस्था के लिए ऐसी परेशानी बन जाएगी, जिसका घाटा पूरा करने के लिए उसे और क़र्ज़ लेना पड़ेगा। पाकिस्तान पहले से ही गर्दन तक क़र्ज़ में डूबा हुआ है और उसे इसकी ब्याज चुकाने में भी दिक्कत हो रही है।

सवाल है कि आखिर मोहम्मद बिल सुल्तान पाकिस्तान से इतने नाराज क्यों हुए ? देखा जाए तो करीब 14 महीने पहले तक दोनों देशों के सम्बन्ध बेहद मधुर थे। यहाँ तक कि सितम्बर 2019 में जब पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान संयुक्त राष्ट्र महासभा की 74 वीं बैठक को सम्बोधित करने के लिए न्यूयॉर्क गए थे तो शाहजादे ने अपना निजी विमान उन्हें यात्रा के लिए बड़े आग्रह के साथ दिया था। उससे पहले फरवरी 2019 में जब शाहजादे पाकिस्तान गए थे तो इमरान खान हवाई अड्डे से खुद उनकी कार चला कर ले गए थे।

अर्थात, संयुक्त राष्ट्र महासभा में इमरान खान का भाषण होने तक स्थितियाँ बहुत अच्छी थी। संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने भाषण के दौरान इमरान खान ने खुद को ऐसे पेश किया मानो वे इस्लामी दुनिया का नेतृत्व स्वयं करना चाहते हैं। इस्लामोफोबिया पर भी उन्होने बड़े बोल बोले थे। अपनी इसी यात्रा के दौरान इमरान खान ने तुर्की और मलेशिया के साथ मिलकर एक अंतरराष्ट्रीय इस्लामिक टीवी चैनल शुरू करने की घोषणा कर दी थी।

उनके भाषण और टीवी चैनल की घोषणा से मोहम्मद बिन सुल्तान बहुत नाराज हो गए। यहाँ तक कि न्यूयॉर्क से अपने निजी जहाज को उन्होंने बीच हवा से ही वापस बुला लिया था। इमरान खान उस समय उसमें बैठ कर पाकिस्तान रवाना हो चुके थे। बाद में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को एक कमर्शियल फ्लाइट से वापस लौटना पड़ा था। इसके जरिए सऊदी अरब ने पाकिस्तान को एक संकेत देने की कोशिश की थी।

लेकिन, इमरान खान ने संभवत इसे अपना व्यक्तिगत अपमान मान लिया। वे अंग्रेजी की उस कहावत को भूल गए, जिसमें कहा गया है  कि ‘माँगने वाले ऊँचे ख्वाब नहीं संजोया करते अथवा भिखारियों की महत्वाकांक्षाएँ नहीं हुआ करतीं।’ फिर तो एक के बाद एक इमरान ने कई कदम ऐसे उठाए, जो उन्होंने उन्हें तुर्की के और करीब ले जाते गए। उन्होंने पाकिस्तान में तुर्की में ऑटोमन साम्राज्य को महिमामंडित करने वाले सीरियल्स को दिखाना शुरू किया।

व्यक्तिगत तौर पर उन्होंने इसका खूब उल्लेख किया। उन्होंने तुर्की और मलेशिया के साथ मिलकर ओआईसी के खिलाफ एक संगठन बनाने की असफल कोशिश भी की। हद तो तब हुई, जब इसी अगस्त में पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह अहमद कुरैशी ने सरेआम कश्मीर के मामले को लेकर सऊदी की सार्वजनिक निंदा कर दी। इसे सऊदी अरब ने पाकिस्तान की बड़ी हिकामत माना। कुल मिला कर इन सब से सऊदी अरब की नाराजगी तुर्की और पाकिस्तान से लगातार बढ़ती ही चली गई।

यों भी पश्चिम एशिया में सऊदी अरब की तुर्की से प्रतिद्वंद्विता जग जाहिर है। इसी तरह ईरान के साथ भी सऊदी अरब के संबंध बेहद तल्ख हैं। ईरान एक शिया देश है तो सऊदी अरब सुन्नी देश। ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सऊदी अरब, इजरायल और अमेरिका तीनों ही एक बड़ा खतरा मानते हैं। इमरान खान के प्रधानमंत्री बनने से पहले उनका देश तुर्की, सऊदी अरब और ईरान तीनों के बीच एक संतुलन बनाकर चलने की कोशिश करता था।

यह उसकी विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण स्तम्भ था। इमरान खान ने अपनी मूर्खताजनित महत्वाकांक्षा और अहंकार में बरसों से बनाए इस नाज़ुक संतुलन को तोड़ दिया। इसी बीच भारत ने खाड़ी के देशों और इजरायल के साथ अपने संबंधों को और बेहतर बनाया। साथ ही इन देशों को ये भी बताया कि पाकिस्तान संचालित आतंकवाद खुद इन इस्लामी देशों के लिए भी कैसे गंभीर खतरा बन सकता है। अब आलम यह है कि पाकिस्तान की स्थिति साँप-छछूंदर जैसी हो गई है।

इमरान खान की हरकतों ने उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा है। अपने भारत विरोध में वे पश्चिम एशिया के उन देशों से भी दूर होते जा रहे हैं, जो इस्लामी देश होने के नाते परंपरागत तौर पर पाकिस्तान के बेहद करीब थे। इजरायल और सऊदी अरब के साथ आने के संकेत बिल्कुल स्पष्ट और साफ हैं। इजराइल और सऊदी अरब एक साथ अमेरिका से मिलकर तुर्की की नई पैदा हुई महत्वाकांक्षाओं को उसकी जगह दिखाना चाहते हैं, जिसका असर पाकिस्तान पर भी पड़ना तय है।

साथ ही वे ईरान के भी पंख कुतरना चाहते हैं। मगर इससे ऐसा लगता है कि पाकिस्तान पर जैसे पहाड़ ही टूट पड़ा हो। पहले से ही राजनीतिक और आर्थिक रूप से बदहाल पाकिस्तान इन नई परिस्थितियों के लिए तैयार नहीं है। अब उसके पास पूरी तरह से चीन का एक क्लाइंट स्टेट बन जाने के अलावा कोई चारा नहीं बचेगा। आने वाले समय में पाकिस्तान के लिए स्थिति बद से बदतर हो सकती है। ठीक ही कहते हैं कि ‘ना खुदा ही मिला न विसाले सनम, ना इधर के रहे ना उधर के रहे।’

‘PFI वाले मुझे घर, नौकरी और रुपए देंगे’: इस्लाम अपनाने की घोषणा करने वाली केरल की दलित महिला

केरल में इस्लामी धर्मांतरण को लेकर नया खुलासा हुआ है। ‘एशियानेट न्यूज़’ ने अपनी एक तहकीकात में पाया है कि केरल में इस्लामी धर्मांतरण के लिए ‘पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI)’ संगठन द्वारा रुपए, घर और नौकरी तक का प्रलोभन दिया जा रहा है। केरल की दलित महिला और ऑटोरिक्शा ड्राइवर चित्रलेखा ने इस्लाम अपनाने की घोषणा की थी और CPI (मार्क्सिस्ट) पर जाति के आधार पर भेदभाव का आरोप लगाया था।

अब इस बात के सबूत मिल रहे हैं कि उनकी इस परिस्थिति का फायदा PFI ने उठाया। केरल में PFI पहले से ही रडार पर है और देश भर में हो रही आतंकी वारदातों से इस संगठन के नाम जुड़ते रहे हैं। केरल के कन्नूर की चित्रलेखा के मामले में भी PFI एंगल सामने आ रहा है। पुलाया समुदाय से आने वाली चित्रलेखा ने दावा किया कि उन्हें अपना गाँव से भागना पड़ा था, क्योंकि उन्हें वहाँ रहने की अनुमति नहीं दी जा रही थी।

उन्होंने दावा किया कि गाँव से भागने के बावजूद उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है और न्याय मिलने की सारी उम्मीदें खोने के बाद उन्होंने इस्लाम में धर्मांतरण का फैसला लिया है। अब ‘एशियानेट न्यूज़’ ने पाया है कि इसके पीछे PFI की साजिश हो सकती है। उसकी एक वीडियो में चित्रलेखा बता रही हैं कि SDPI (PFI का राजनीतिक संगठन) ने उन्हें इस्लामी धर्मांतरण के बाद घर, नौकरी और वित्तीय सहायता दिलाने का आश्वासन दिया है।

इस वीडियो में चित्रलेखा बताती हैं कि वो इस बात को लेकर निश्चित हैं कि उनके कदम की आलोचना होगी और कुछ लोग तो उन्हें आतंकी तक घोषित कर सकते हैं। वो आगे आशंका जताती हैं कि उन्हें आने वाले दिनों में उससे भी ज्यादा समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है, जितनों का वो आज कर रही हैं। वो आशंका जाहिर करती हैं कि उन्हें RSS, CPI (M) और कॉन्ग्रेस द्वारा भी परेशान किया जा सकता है। वो कहती हैं:

“SDPI वालों ने बताया है कि वो मेरी सुरक्षा करेंगे। उन्होंने मुझे आश्वासन दिया है कि मुझे एक घर, नौकरी और वित्तीय सहायता भी दी जाएगी। मैंने उन्हें बताया है कि अगर इस्लामी धर्मांतरण के बाद ये चीजें नहीं आती हैं तो फिर मेरे पास कोई विकल्प नहीं बच जाएगा। निसार नाम का एक व्यक्ति आया था। वो पॉपुलर फ्रंट का है। वो यहाँ की स्थानीय समिति का भी हिस्सा है। वो कल हमारे घर आए थे और कुछ घरेलू व किचन की चीजें देकर गए।”

चित्रलेखा का बयान (वीडियो साभार: Asianet Newsable)

आखिर उन लोगों ने क्या कहा? इसके जवाब में इस्लामी धर्मांतरण का ऐलान करने वाली केरल की महिला ने बताया कि वो (PFI/SDPI वाले) अपने ऊपर के लोगों से बात कर के वापस लौटेंगे, वो तिरुवनंतपुरम में अपनी पार्टी के वरिष्ठ सदस्यों को इस बारे में जानकारी देंगे। चित्रलेखा ने अनुमान लगाया कि शायद यही उनके काम करने का तरीका है। उन्होंने बताया कि SDPI में शामिल होना ज़रूरी नहीं है, लेकिन उन्हें पार्टी का काम करने में कोई समस्या नहीं है, क्योंकि बस आपकी एक राजनीतिक विचारधारा होनी चाहिए।

PFI का इतिहास देखें तो हाल ही में हाथरस मामले पर दंगे कराने के लिए इस संगठन को मॉरिशस से मिले 50 करोड़ रुपए की फंडिंग की खबर सामने आई थी और इस पर सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा भी था कि वो किसी भी साजिश को सफल होने नहीं देंगे और न ही किसी को लोगों के भरोसे के साथ खिलवाड़ करने की इजाजत देंगे। हाथरस जाते हुए 4 PFI सदस्यों के पकड़े जाने से इसका खुलासा हुआ था। उनकी पहचान उर रहमान ,सिद्दीकी, मसूद अहमद व आलम के रूप में हुई थी। 

उमर खालिद नास्तिकता का ढोंग करता है, वस्तुतः वह कट्टर मुस्लिम है जो भारत को तोड़ना चाहता है: दिल्ली पुलिस

दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों में दिल्ली पुलिस द्वारा दायर की गई चार्जशीट में उमर खालिद को लेकर कहा गया है कि उसने केवल नास्तिक होने का ढोंग किया, वस्तुत: वह कट्टर मुस्लिम है जो भारत को तोड़ना चाहता था। उमर ऐसा मानता था कि हिंसक राजनीतिक इस्लाम (violent political Islam) को फ्रंटल पॉलिटिकल पार्टियों के साथ मिलना चाहिए ताकि भारत को अपने हिस्से में लिया जा सके।

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, ये दावा खालिद के ख़िलाफ दायर हुई सप्लीमेंट्री चार्जशीट में किया गया है। इस चार्जशीट में जेएनयू छात्र शरजील इमाम और फैजान खान का भी नाम है। इमाम पर इल्जाम है कि उसने खालिद का साथ दिया और फैजान खान ने उन सिम कार्ड्स को दिलवाने में मदद की, जिसे बाद में जामिया कॉर्डिनेशन कमेटी और सीएए का विरोध करने वाले प्रदर्शनकारियों व कार्यकर्ताओं द्वारा इस्तेमाल किया गया।

पुलिस ने खालिद पर आरोप लगाया कि उसने साल 2016 में भारत के विचार को एक ऐसे प्लान के साथ स्वीकारा, जिसमें साल 2020 तक भारत को तोड़ने की योजना थी और जिसकी सारी अवधारणा सेकुलर और राष्ट्रीय पहचान के विनाश के साथ सिर्फ उम्माह पर आधारित थी।

यहाँ बता दें कि इमाम और खालिद के वकीलों ने भी इन आरोपों पर अपनी टिप्पणी देने से इंकार कर दिया है। यह चार्जशीट रविवार को अतिरिक्त सत्र के न्यायाधीश अमिताभ रावत की अदालत में दायर की गई है।

इसमें यूएपीए एक्ट के तहत तीनों आरोपितों पर मुकदमा दर्ज किया गया है। इन तीनों को गैर-कानूनी बैठकें, आपराधिक साजिश, हत्या, दंगे भड़काने, धर्म के आधार पर दुश्मनी को बढ़ावा देने, आदि का आरोपित बनाया गया है। कोर्ट ने इस चार्जशीट पर मंगलवार को संज्ञान लिया।

इस चार्जशीट में बताया गया कि खालिद को मालूम था कि भारतीय मुस्लिम इस्लाम की विकृत परिभाषा से नहीं जुड़ेंगे। लेकिन उसके लिए राष्ट्रीय राजधानी में रहने वाले बांग्लादेशी और रोहिंग्या अप्रवासी ऐसे लोग थे, जिनका इस्तेमाल करना आसान था। 

इस आरोप पत्र में खालिद को ऐसा कन्वर्जेंस बिंदु बताया गया, जिसने पैन-इस्लाम और अल्ट्रा लेफ्ट अनार्किजम को उकसाया, पोषित किया और उसका प्रचार किया।

पुलिस ने कहा कि खालिद के पास दो विचारों की परस्पर मजबूत रेखाएँ हैं। इसमें एक उसे अपने पिता से विरासत में मिली और दूसरी अल्ट्रा लेफ्ट विचारधारा, जिसमें वह योगेंद्र यादव की पसंदों के अनुरूप मिलान करने की कोशिश करता है।

शरजील इमाम- एक साम्प्रदायिक बीज

ऐसे ही शरजील इमाम के ख़िलाफ़ आरोप पत्र में कहा गया है कि शाहीन बाग विरोध स्थल से उसकी वापसी एक क्लासिकल माओवादी रणनीति यानी आंदोलन को बड़े पैमाने पर आधारित रखने और व्यक्तिवाद को प्राप्त करने के बहाने से हुई थी।

पुलिस ने इमाम के लिए कहा कि उसकी गिरफ्तारी के बाद मुख्य षड्यंत्रकारियों ने उसकी रिहाई के लिए बड़े पैमाने पर प्रेस का उपयोग किया और इस साम्प्रदायिक बीज (कम्यूनउल सीड) को लोकतंत्र का फूल बताया। पुलिस ने चार्जशीट में शरजील इमाम के ख़िलाफ़ दायर मुकदमों पर बात करते हुए खुलासा किया कि इमाम ने अपने भाई से कहा था, “हम दोनों हैं मास्टरमाइंड।”

पुलिस के मुताबिक उसकी इसी मजहबी कट्टरता का प्रयोग खालिद द्वारा किया गया। पुलिस ने खालिद पर घोर साम्प्रदायिक होने का इल्जाम लगाया और कहा कि उसके लिए इमाम एक ऐसा चेहरा था, जिसका इस्तेमाल दंगों की साजिश रचने के लिए इस्तेमाल किया जाना था।

वो अहमद पटेल, जिसे राज्यसभा सीट जिताने के लिए कॉन्ग्रेस ने खो दिया था पूरे गुजरात को

8 अगस्त 2017, कॉन्ग्रेस ने गुजरात में अपने नेता अहमद पटेल की राज्यसभा सीट को बचाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था। राज्य में तीन सीटों पर दोबारा चुनाव होने थे और दावेदार 4 थे। यही वो समय था जब गुजरात 1996 के बाद पहली दफा राज्यसभा चुनावों को देख रहा था क्योंकि इससे पहले हर राज्यसभा चुनाव निर्विरोध होता आ रहा था।

उस साल दो सीटों पर अमित शाह और स्मृति ईरानी की जीत सुनिश्चित थी, लेकिन तीसरी सीट के लिए भाजपा ने गुजरात में कॉन्ग्रेस के अहमद पटेल के सामने कॉन्ग्रेस के ही पूर्व चीफ व्हिप बलवंत सिंह राजपूत को उतार दिया था।

उस समय अहमद पटेल गुजरात से 7वीं बार सांसद (3 बार लोकसभा और 4 बार राज्यसभा) थे। वह सोनिया गाँधी के सलाहकार भी थे। अगस्त के पहले हफ्ते तक ऐसा स्पष्ट हो चुका था कि कॉन्ग्रेस की नैया इस बार डूब ही जाएगी, क्योंकि वैसे तो राज्यसभा में अपने नेता की सीट बचाने के लिए कॉन्ग्रेस को 45 वोट चाहिए थे और उनके पास 57 विधायक थे, लेकिन 1 अगस्त को इनमें से 6 विधायकों ने इस्तीफा दे दिया था, जिसकी वजह से मुकाबला बराबर का हो गया था।

अब ऐसे में कॉन्ग्रेस क्या करती? तो इन्होंने अपनी राजनीति का पुराना तरीका अपनाया और भाजपा से अपने विधायकों को दूर रखने के लिए फौरन उन्हें एक शानदार रिजॉर्ट में किडनैप कर लिया। शर्मनाक बात यह थी कि जिस समय कॉन्ग्रेस ने यह चाल चली, उस दौरान गुजरात बाढ़ से प्रभावित था।

एक ओर कॉन्ग्रेस के विधायक रिजॉर्ट में नाश्ते का आनंद फरमा रहे थे और दूसरी तरफ उस समय गुजराती पूरे दशक की सबसे खराब बाढ़ की मार झेल रहे थे। बनासकांठा (Banaskantha) का धानेरा (Dhanera) बाढ़ से सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में से एक था। वहीं उस इलाके की कॉन्ग्रेस विधायक जोइताभाई पटेल उन 44 विधायकों में से एक थी, जो कॉन्ग्रेस शासित बेंगलुरु में आराम फरमा रही थीं।

प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए जब जनता अपने प्रतिनिधि की ओर ताक रही थी, तब उन्होंने अपने फोन स्विच ऑफ किए हुए थे। इन लोगों के लिए अलग से शेफ तक की व्यवस्था की गई थी जबकि इनके राज्य में तो बाढ़ आई हुई थी, जनता दाने-जाने को मोहताज थी।

चुनावों के लिए चली गई चाल का ड्रामा मतदान के बाद भी आधी रात तक चला। कॉन्ग्रेस ने अपना सारा पैसा, सारी ताकत एक राज्यसभा सीट को बचाने में लगा दिया। इस चुनाव में अहमद पटेल तो जीत गए लेकिन कॉन्ग्रेस राज्य को हार गई।

खास बात यह है कि गुजरात में यह तब हुआ, जब विधानसभा चुनाव को कुछ महीने ही बाकी बचे थे। भाजपा राज्य में 20 साल से सत्ता विरोधी लहर को झेल रही थी। मतदाता का एक वर्ग कॉन्ग्रेस रहित राज्य में बड़ा हुआ था, जिसने 20 सालों में प्राकृतिक आपदा, कारसेवकों का जलना, दंगे और एनकाउंटर वाली खबरें पढ़ीं थीं। लेकिन इस बीच गुजरात इस बात का भी गवाह था कि कैसे राज्य में विदेशी निवेश में वृद्धि, नर्मदा कैनल का निर्माण और बेहतर पानी व बिजली की कनेक्टिविटी हुई।

लेकिन क्या कॉन्ग्रेस ने राज्य में जो कुछ भी किया वो सिर्फ अहमद पटेल को बचाने के लिए किया? नहीं। वो सब सिर्फ सोनिया गाँधी के चेहरे को बनाए रखने के लिए किया गया था। अहमद पटेल को नुकसान मतलब सोनिया गाँधी का नुकसान था। बीजेपी इन कोशिशों में जुटी थी कि इस हार से सोनिया गाँधी को झटका लगे। लेकिन कॉन्ग्रेस पटेल को बचाकर चाहती थी कि सोनिया की साख पर आँच न आए।

एक पार्टी जिसने वर्षों से राष्ट्र के साथ धोखा किया, उसने जब सोनिया गाँधी को बचाने के लिए पूरे गुजरात के साथ जुआ खेला, तो ये कोई हैरान करने वाली बात नहीं थी। 

आज 71 साल के अहमद पटेल का इंतकाल हो गया है। उनकी मौत का कारण मल्टिपल ऑर्गन फेल्यर बताया गया। उनसे यूपीए काल में हुए कई घोटालों के संबंध में पूछताछ की जा रही थी। उनके बाद, अब गुजरात में कॉन्ग्रेस के लिए दंगा आरोपित व देशद्रोह आरोपित हार्दिक पटेल ही पार्टी प्रमुख के रूप में बचे हुए हैं।

‘स्पीकर के चुनाव में साथ दो, तुम्हें मंत्री बनाएँगे’: लालू यादव का MLA को लालच देने वाला कॉल, सुनें ऑडियो क्लिप

बिहार के पूर्व उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने लालू यादव पर विधायकों को प्रलोभन देने का आरोप लगाया है। बिहार विधानसभा में स्पीकर का चुनाव होना है और इसके लिए वहाँ राजग की तरफ से विजय कुमार सिन्हा को उम्मीदवार बनाया गया है, वहीं महागठबंधन ने अवध बिहारी को उम्मीदवार बना दिया है। अब सुशील मोदी ने एक ऑडियो क्लिप शेयर कर दावा किया है कि इसमें लालू यादव विधायकों को प्रलोभन देते दिख रहे हैं।

उनके द्वारा शेयर किए गए ऑडियो क्लिप में एक व्यक्ति फोन करता है और पूछता है कि क्या उधर से विधायक जी बोल रहे हैं? फोन उठाने वाला व्यक्ति खुद को विधायक का PA बताता है। इसके बाद फोन करने वाला व्यक्ति विधायक को कॉल देने को कहता है और बताता है कि लालू प्रसाद यादव उनसे बात करेंगे। साथ ही ये भी बताता है कि उसने राँची से कॉल किया है। विधायक के कॉल उठाते ही लालू यादव उन्हें चुनावी जीत की बधाई देते हैं।

इसके बाद सुशील मोदी द्वारा शेयर किए गए ऑडियो क्लिप में लालू यादव विधायक से कहते हैं, “अच्छा सुनो। हम लोग तुमको आगे भी आगे बढ़ाएँगे। कल जो स्पीकर का चुनाव है, उसमें हम लोगों का साथ दो। हम लोग तुम्हें मंत्री बनाएँगे। कल तो इसको हम गिरा देंगे।” जब विधायक कहते हैं कि वो पार्टी में हैं तो लालू यादव कहते हैं कि पार्टी में हो तो अनुपस्थित हो जाओ, कह दो कि कोरोना हो गया है।

इसके बाद लालू यादव कहते हैं, “फिर तो स्पीकर हमारा हो जाएगा तो हम लोग देख लेंगे न।” सुशील कुमार मोदी ने कहा है कि बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने ऐसा कर के अपनी असलियत दिखा दी है।

सुशील कुमार मोदी ने 1 दिन पहले भी आरोप लगाया था कि राजद सुप्रीमो 8051216302 नंबर से राजग विधायकों को कॉल कर के मंत्री बनाने का प्रलोभन दे रहे हैं और जब उन्होंने इस नंबर पर कॉल किया तो खुद लालू ने उठाया। बिहार विधानसभा चुनाव के बाद नीतीश कुमार फिर से CM बने हैं और राजग सत्ता में वापस आया।

जानिए क्या है रोशनी एक्ट, जिसका गुनाह छिपाने के लिए हंगामा कर रहा है घोटालेबाज गुपकार गैंग

जम्मू-कश्मीर के ‘रोशनी एक्ट’ भूमि घोटाले की लिस्ट सार्वजनिक कर दी गई है। इस लिस्ट में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम फारुक अब्दुल्ला समेत कई दिग्गज नेताओं के नाम सामने आए हैं। अब्दुल्ला पर सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा करने का गंभीर आरोप है। हालाँकि, उन्होंने इसे एक बड़ी साजिश करार देते हुए सभी आरोपों को बेबुनियाद बताया है। फारुक अब्दुल्ला का कहना है कि इस इलाके में सिर्फ उनका ही घर नहीं है। उन्होंने कहा कि इन आरोपों से साफ पता चलता है कि सरकार की मंशा सिर्फ उन्हें फँसाने की है और कुछ नहीं। 

फारुक अब्दुल्ला पर सरकारी जमीन कब्जा करने का आरोप

फारुक अब्दुल्ली पर सरकारी जमीन कब्जा कर घर बनाने का आरोप है। मीडिया रिपोर्ट में बताया जा रहा है कि जम्मू के सजवान में उनका जो घर है, वो जंगल की जमीन पर है। ये घर 10 कनाल में बना हुआ है। इनमें से 7 कनाल जंगल की जमीन है जबकि 3 कनाल जमीन उनकी अपनी है। आरोप ये है कि जमीन रोशनी एक्ट के तहत गलत तरीके से ली गई। हालाँकि पूर्व मुख्यमंत्री ने इस पर सफाई देते हुए कहा कि उन पर लगे सभी आरोप बेबुनियाद हैं।

PDP, NC के कई नेताओं के नाम आए सामने

वहीं इससे पहले पीडीपी, एनसी समेत कॉन्ग्रेस के कई नेताओं के नाम इस घोटाले में सामने आए थे। इनमें से एक नाम जम्मू कश्मीर के पूर्व वित्त मंत्री हसीब द्राबू का भी था। दरअसल 25,000 करोड़ रुपए के कथित रोशनी भूमि घोटाले के मामले की जाँच हाईकोर्ट ने सीबीआई को सौंपी थी। जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने इस गड़बड़ी को ‘बेशर्म’ और ‘राष्ट्रहित को नुकसान पहुँचाने वाला’ बताते हुए सीबीआई जाँच के आदेश दिए। आरोप है कि कश्मीर में प्रदेश के दो बड़े राजनीतिक दलों को करोड़ों की जमीन तय मूल्य से 85 प्रतिशत तक के कम मूल्य पर दी गई। 

‘रोशनी एक्ट’ या ‘रोशनी स्कीम’ जैसा नाम सुनकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह बिजली से जुड़ी कोई योजना होगी। जी नहीं, यह जम्मू कश्मीर में ‘अंधेरगर्दी’ से जुड़े एक घोटाले का नाम है। बेशक, रियल एस्टेट सेक्टर में सरकारी स्तर पर अरबों रुपए के घपले को अंजाम देने के लिए यह एक्ट लाया गया था। इस भूमि घोटाले के तहत हुए तमाम आवंटन और प्रक्रियाएँ निरस्त कर दी गई और हाई कोर्ट ने इसे पूरी तरह ‘गैर कानूनी और असंवैधानिक’ करार दे दिया।

जम्मू कश्मीर के इतिहास में 25,000 करोड़ रुपए के सबसे बड़े घोटाले के तौर पर देखे जा रहे इस एक्ट को सिरे से खारिज कर दिया गया और हाई कोर्ट ने इसकी सीबीआई जाँच के आदेश दे दिए थे। सियासी कद्दावरों और ब्यूरोक्रेटों को सीधे तौर पर फायदा पहुँचाने के लिए बनाई गई इस खुराफाती स्कीम के बारे में सब कुछ जानिए।

क्या है ऐतिहासिक भूमि घोटाला?

इस स्कीम का आधिकारिक नाम जम्मू और कश्मीर राज्य भूमि एक्ट 2001 था, जिसे ‘रोशनी स्कीम’ के नाम से भी जाना गया। इसके तहत राज्य सरकार ने मामूली कीमतें तय कर उन लोगों को उन ज़मीनों पर स्थाई कब्जा देने की बात कही, जिन्होंने सरकारी ज़मीन पर अतिक्रमण कर रखा था। यानी सरकारी जमीनों पर गैर कानूनी कब्जों को कानूनी तौर पर मालिकाना हक देने की कवायद की गई।

सीएम फारुक अब्दुल्ला सरकार द्वारा 2001 में लाई गई इस स्कीम के तहत 1990 से हुए अतिक्रमणों को इस एक्ट के दायरे में कट ऑफ सेट किया गया था। सरकार का कहना था कि इसका सीधा फायदा उन किसानों को मिलेगा, जो सरकारी जमीन पर कई सालों से खेती कर रहे है। लेकिन नेताओं ने जमीनों पर कब्जे जमाने का काम शुरू कर दिया। वर्ष 2005 में तब की मुफ्ती सरकार ने 2004 के कट ऑफ में छूट दी। उसके बाद गुलाम नबी आजाद ने भी कट ऑफ ईयर को वर्ष 2007 तक के लिए सीमित कर दिया।

इसकी गंभीरता का अंदाजा इसी से लग जाता है कि जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट की चीफ जस्टिस गीता मित्तल और जस्टिस राजेश बिंदल की खंडपीठ ने सीबीआई डायरेक्टर को इसकी जाँच के लिए एसपी रैंक के पुलिस अफसरों से कम की टीम नहीं बनाने को कहा था और गहराई से जाँच के बाद मुकदमा दर्ज करने का निर्देश दिया। रोशनी ऐक्ट के तहत तत्कालीन राज्य सरकार का लक्ष्य 20 लाख कनाल सरकारी जमीन अवैध कब्जेदारों के हाथों में सौंपना था, जिसकी एवज में सरकार बाजार भाव से पैसे लेकर 25,000 करोड़ रुपए की कमाई करती।

गौरतलब है कि रोशनी ऐक्ट सरकारी जमीन पर कब्जा करने वालों को मालिकाना हक देने के लिए बनाया गया था। इसके बदले उनसे एक रकम ली जाती थी, जो सरकार तय करती थी। 2001 में फारूक अब्दुल्ला सरकार ने जब ये कानून लागू किया था, तब सरकारी जमीन पर अतिक्रमण करने वालों को मालिकाना हक देने के लिए 1990 को कट ऑफ वर्ष निर्धारित किया गया था। लेकिन, उसके बाद की हर सरकारों ने इस कट ऑफ साल को बढ़ाना शुरू कर दिया, जिसकी आड़ में सरकारी जमीन की बंदरबाँट की आशंका जताई जा रही है। कोर्ट ने कहा था कि मुफ्ती मोहम्मद सईद (2004) और गुलाम नबी आजाद (2007) की सरकारों ने इस कानून में और संशोधन किए ताकि गैर-कानूनी रूप से जमीन हथियाने वालों को फायदा पहुँचाई जा सके।

जम्मू कश्मीर हाई कोर्ट ने लगाई थी फटकार

जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने राज्य सरकार के अधिकारियों और सतर्कता अधिकारियों को ‘लूट की’ इस नीति के प्रति आँखें मूँदकर अतिक्रमणकारियों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर कोताही बरतने के लिए जमकर लताड़ लगाई। अदालत ने सरकारी जमीन पर गैर-कानूनी कब्जा करने वालों को लेकर कहा कि इन लुटेरों की सत्ता में इतनी गहरी पैठ रही है कि यह अपने फायदे के लिए कानून भी बनवा सकते थे। 

अदालत ने यह भी आशंका जताई कि जिस तरह से जमीन के ये लुटेरे प्रभावी रहे हैं, उससे लगता है कि उन्होंने नीति निर्धारण से लेकर उसके लागू करवाने तक में हर स्तर पर भूमिका निभाई है। अदालत की ऐसी टिप्पणी उन राजनेताओं के लिए भी सख्त संकेत हैं, जिनके कार्यकाल में ऐसे कानून बनाए गए हैं। अदालत ने यहाँ तक टिप्पणी की कि उन्होंने अब तक ऐसी आपराधिक गतिविधि नहीं देखी है, जिसमें सरकार ने राष्ट्रीय और जनता के हित को ताक पर रखकर कोई कानून बनाया हो और जनता के खजाने और पर्यावरण को होने वाले नुकसान का कोई आँकलन भी नहीं किया गया हो।

कितनी जमीन पर अवैध कब्जे?

जम्मू-कश्मीर में लाखों एकड़ सरकारी जमीन पर नेताओं, पुलिस, प्रशासन और रेवेन्यू डिपार्टमेंट के अफसरों का कब्जा था। इस एक्ट के जरिए ही करीब ढाई लाख एकड़ जमीन पर कब्जे को कानूनी रूप दे दिया गया। करोड़ों रुपए की ये जमीनें नाम मात्र की कीमतों पर दी गई थीं। शुरुआती जाँच में पता चला है कि राज्य के कई पूर्व मंत्रियों ने खुद के साथ रिश्तेदारों के नाम पर भी कई एकड़ सरकारी जमीन पर कब्जा किया था।

क्यों मिला ‘रोशनी’ नाम और कैसे हुआ ‘अंधेर’?

अब्दुल्ला सरकार ने इस एक्ट को बनाते समय कहा कि जमीनों के कब्ज़ों को कानूनी किए जाने से जो फंड जुटेगा, उससे राज्य में पावर प्रोजेक्टों का काम किया जाएगा, इसलिए इस एक्ट का नाम ‘रोशनी’ रखा गया, जो मार्च 2002 से लागू हुआ। 1 एकड़ में 8 कनाल होते हैं और इस लिहाज़ से ढाई लाख एकड़ से ज्यादा अवैध कब्जे वाली जमीन को हस्तांतरित करने की योजना बनाई गई।

‘अंधेर’ ये था कि ज़मीन को मार्केट वैल्यू के सिर्फ 20 फीसदी दर पर सरकार ने कब्जेदारों को सौंपा। यानी कुल मिलाकर इससे 25 हज़ार करोड़ रुपए का घोटाला होने की बात सामने आई। अंधेर ये भी रहा कि अब्दुल्ला सरकार के बाद की सरकारों ने भी इसका फायदा उठाया। 2005 में सत्तारूढ़ मुफ्ती सरकार ने कट ऑफ को 2004 तक बढ़ा दिया था और फिर गुलाम नबी आजाद सरकार ने 2007 तक।

किसे मिलता रहा नाजायज़ फायदा?

इस विवादास्पद रोशनी एक्ट से किस किसको फायदा हुआ? इस बारे में आई रिपोर्ट्स में कहा गया कि ‘स्थानीय स्तरों पर जो भी प्रभावशाली था या प्रभावशालियों के संपर्क में था’, हर उस व्यक्ति को फायदा पहुँचा। मंत्रियों, कारोबारियों, नौकरशाहों और इन सबके रिश्तेदारों या करीबियों को ज़मीनें कौड़ियों के भाव मिलीं। हसीब द्रबू, मेहबूब बेग, मुश्ताक अहमद चाया, कृशन अमला, खुर्शीद अहमद गनी और तनवीर जहान जैसे प्रभावशाली नाम इस लिस्ट में सामने आ चुके हैं।

इस घोटाले की गहराई की अंदाजा इस बात से लगाइए कि श्रीनगर शहर के बीचों बीच ‘खिदमत ट्रस्ट’ के नाम से कॉन्ग्रेस के पास कीमती जमीन का मालिकाना हक पहुँचा, तो नेशनल कॉन्फ्रेंस का भव्य मुख्यालय तक ऐसी ही ज़मीन पर बना हुआ है, जो इस भूमि घोटाले से तकरीबन मुफ्त के दाम ​हथियाई गई।

एक लाख हेक्टेयर जमीन बाँट दी

बता दें कि जम्मू-कश्मीर के विवादित रोशनी एक्ट के तहत 20.55 लाख कनाल (1,02,750 हेक्टेयर) सरकारी जमीन लोगों को औने-पौने दाम में बाँट दी गई थी। इसमें से मात्र 15.58 प्रतिशत जमीन को ही मालिकाना हक के लिए मंजूरी दी गई। योजना का उद्देश्य था कि जमीन के आवंटन से प्राप्त होने वाली राशि का इस्तेमाल राज्य में बिजली ढाँचे को सुधारने में किया जाएगा। इस एक्ट के तहत रसूखदारों ने अपने तथा अपने रिश्तेदारों के नाम जमीन आवंटित करा ली।

एक्ट निरस्त होने का मतलब क्या है?

जम्मू और कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक की अगुवाई वाली राज्य प्रशासनिक परिषद यानी SAC ने 2018 में रोशनी एक्ट को निरस्त किया, तो इसका शुरुआती मतलब यही था कि इस स्कीम में जो आवेदन या प्रक्रियाएँ पेंडिंग थीं, उन्हीं को निरस्त माना जाए। लेकिन, बाद में इसे लेकर हलचल बढ़ी और हाई कोर्ट ने इसे गैरकानूनी, अन्यायपूर्ण, असंवैधानिक और असंगत करार दे दिया।

हाई कोर्ट ने जब इसे सिरे से खारिज किया तो इस एक्ट की शुरुआत से हुई तमाम प्रक्रियाएँ और आवंटन गैर कानूनी हो गए। हाल में, जस्टिस गीता मित्तल व राजेश बिंदल की हाई कोर्ट बेंच ने सीबीआई जाँच के आदेश देकर यह भी कहा कि हर आठ हफ्ते में केस की जाँच के स्टेटस की रिपोर्ट दी जाती रहे।

‘रोशनी’ करा सकती है जम्मू-कश्मीर के ‘राजघरानों’ में ‘अंधेरा’, गुपकार से नहीं होगा बचाव

सुरक्षा एवं राजनीतिक विश्लेषक ब्रिगेडियर अनिल गुप्ता (रिटायर्ड) के मुताबिक महबूबा मुफ्ती, फारूक अब्दुल्ला और कॉन्ग्रेस पार्टी को आखिर ‘गुपकार’ समझौता करने के लिए साथ आना पड़ा। दरअसल, ये लोग खुद को रोशनी एक्ट के घोटाले से बचाने के लिए ‘गुपकार’ बैठकें कर रहे हैं। इनका मकसद है कि देश-दुनिया का ध्यान ‘रोशनी’ जैसे बड़े घोटाले से हट कर गुपकार पर आ जाए।

ब्रिगेडियर अनिल गुप्ता बताते हैं कि कई जगह की जमीन तो अब दूसरे व तीसरे व्यक्ति को बेची जा चुकी है। पावर अटॉर्नी का जबरदस्त खेल चला है। जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के आदेश पर सीबीआई ने जम्मू और सांबा जिलों में जमीन हड़पने के मामलों की जाँच शुरू कर दी है। जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटने के बाद से ही इन नेताओं के चेहरे उतरे हुए थे। अब रही सही कसर ‘रोशनी’ एक्ट की जाँच ने पूरी कर दी।

जिन लोगों ने रोशनी एक्ट की आड़ लेकर करोड़ों रुपए की जमीनों पर कब्जे कराए हैं, वही लोग अब ‘गुपकार’ समझौते के जरिए देश दुनिया का ध्यान अपनी तरफ खींचना चाह रहे हैं। हालाँकि वे इसमें कामयाब नहीं होंगे, क्योंकि सीबीआई जब अपनी चार्जशीट दाखिल करेगी तो उस वक्त इन नेताओं के पास कोई जवाब नहीं होगा।

जम्मू-कश्मीर के राजस्व विभाग के प्रमुख सचिव पहले ही कह चुके हैं कि एक जनवरी 2001 के आधार पर सरकारी जमीन का ब्योरा एकत्र कर उसे वेबसाइट पर प्रदर्शित करेंगे। कौन सी जमीन पर किसका कब्जा है, इस बाबत सभी अवैध कब्जा धारकों के नाम सार्वजनिक करने की प्रक्रिया शुरू की जा रही है।

अब नेताओं और उनके रिश्तेदारों के अलावा उन नौकरशाहों को भी पसीना आ रहा है, जिन्होंने जमीन पर कब्जा कराने में मदद की थी। सांबा जिले में राजस्व अधिकारियों ने रोशनी एक्ट के प्रावधानों का जान-बूझकर उल्लंघन कर सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा कराया है।

बता दें कि यही वो गुपकार गैंग है, जिन्होंने अपने शासनकाल के दौरान जम्मू की डोगरा संस्कृति को खत्म करने का भरसक प्रयास किया है। साठ साल के शासन में इन लोगों ने सिलसिलेवार तरीके से गौरवशाली संस्कृति पर प्रहार किए हैं। कॉन्ग्रेस पार्टी भी इसके लिए बराबर की जिम्मेदार है। यही वजह है कि अब जम्मू-कश्मीर में उसका अपना कोई वजूद नहीं रहा। 

पिछले दिनों श्रीनगर में गुपकार समझौता हुआ है। यह समझौता केवल इसी बात को लेकर हुआ है कि अब रोशनी एक्ट घोटाले से खुद को कैसे बचाएँ। इन तीनों दलों के नेताओं ने थोक के भाव में रोशनी एक्ट का फायदा उठाया था। अनिल गुप्ता का कहना है कि अब उन्हें यह डर सताने लगा है कि जब अखबारों में उनके नाम सार्वजनिक होंगे तो जनता के बीच उनका नकाब उतर जाएगा।

इसी के चलते उन्होंने आपस में गुपकार समझौता कर लिया। इसमें उन्होंने अनुच्छेद 370 को दोबारा से लाने की माँग दोहराई है, जबकि हकीकत यह है कि वे रोशनी एक्ट से खुद को कैसे बचाएँ, लोगों तक किसी तरह इसकी सच्चाई न पहुँचे, इस बाबत रणनीति बना रहे हैं।

महबूबा मुफ्ती, नेशनल कॉन्फ्रेंस के फारुख अब्दुल्ला और कॉन्ग्रेस पार्टी के नेता यह बात अच्छे से जानते हैं कि बिना साथ आए वे रोशनी एक्ट पर लोगों को गुमराह नहीं कर सकेंगे। इसके लिए मिलकर रणनीति बनानी जरूरी है। हालाँकि अब इन तीनों दलों के नेताओं की पोल खुलनी तय है। जनता समझ चुकी है कि रोशनी एक्ट में क्या कुछ हुआ है। जल्द ही इनके चेहरे का नकाब उतरेगा और इनका असली चेहरा लोगों के सामने आएगा।