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पंजाब सरकार संविधान का पालन करने में विफल: हाई कोर्ट की गंभीर टिप्पणी, केंद्र को 500 करोड़ रुपए का नुकसान

पंजाब में ‘रेल रोको’ आंदोलन के कारण भारतीय रेलवे को राजस्व में लगभग 500 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। ऑल इंडस्ट्रीज एंड ट्रेड फोरम के अध्यक्ष बद्रीश जिंदल ने कहा कि राज्य के कारोबारियों को कुल मिलाकर करीब 5000 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है, क्योंकि ‘किसानों’ द्वारा रेल लाइन को बंद करने का अभियान जारी है। इस्पात उद्योग से लेकर आवश्यक वस्तुओं तक, पंजाब में लगभग हर चीज की कमी है। पंजाब सरकार की निष्क्रियता के कारण, बिजली स्टेशनों को बिजली उत्पादन के लिए कोयला नहीं मिल पा रहा है, जिससे राज्य भर में बिजली की भारी कमी हो रही है।

हाईकोर्ट ने पंजाब सरकार को कानून के नियम का पालन करने में विफल बताया

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने पंजाब सरकार द्वारा रेलवे पटरियों को खाली कराने में विफलता पर नाराजगी व्यक्त की। उच्च न्यायालय ने 29 अक्टूबर को कहा था कि पंजाब सरकार कानून-व्यवस्था को संभालने में असमर्थ है। उच्च न्यायालय ने यहाँ तक ​​कहा था कि यदि सरकार पटरियों को खाली कराने में विफल रहती है, तो वह एक आदेश जारी करेगी और उस पर लिखा होगा कि पंजाब सरकार संविधान का पालन करने में विफल रही है।

केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सत्यपाल जैन ने अदालत को बताया कि पंजाब सरकार राज्य में माल गाड़ियों को न चलने देने के लिए केंद्र को दोषी ठहराने की कोशिश कर रही है। मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल को पत्र लिख कर राज्य में माल और यात्री ट्रेनों को फिर से शुरू करने की माँग की।

जैन ने कहा कि पंजाब सरकार का दावा है कि पटरियाँ खाली हैं, लेकिन कई जगहों पर ट्रेनों को रोककर तलाशी ली जा रही है। उच्च न्यायालय ने पंजाब सरकार और केंद्र को जल्द से जल्द समस्या का हल खोजने का निर्देश दिया था।

पंजाब सरकार ने कोयले की कमी के लिए केंद्र पर दोषारोपण किया

एक सोशल मीडिया पोस्ट में पंजाब सरकार ने कहा था, “मालगाड़ियों के निलंबन के कारण पंजाब के कोयले के भंडार पूरी तरह से खाली हो गए हैं। पिछले थर्मल पावर प्लांट के परिचालन में कटौती के कारण उपभोक्ता बड़े पैमाने पर बिजली कटौती का सामना कर रहे हैं।” इस पोस्ट को पंजाब सरकार के फेसबुक और ट्विटर अकाउंट से श्यर किया गया था।

विधानसभा में अपने बयान के दौरान सिंह ने कहा कि पीएसपीसीएल उत्तरी ग्रिड को 12.23 रुपए प्रति यूनिट के हिसाब से दैनिक भुगतान कर रहा है और साथ ही 8.73 रुपए का अनिर्धारित लेन-देन चार्ज भी दे रहा है क्योंकि राज्य को बिजली स्टेशनों के लिए कोयला नहीं मिल पा रहा है।

पंजाब सरकार द्वारा किया गया सोशल मीडिया पोस्ट

नेटिज़न्स ने पंजाब सरकार के दावे का तुरंत खंडन किया और कैप्टन अमरिंदर सिंह से भारतीय रेलवे को दोष देने के बजाय रेलवे ट्रैक को खाली कराने का आग्रह किया।

रिपोर्टों के अनुसार, आंदोलनकारी जंडियाला, जगराओं, फिल्लौर, मुक्तसर, करतारपुर, फाजिल्का, रोमाना अल्बेल सिंह, गंगसर जैतो, फरीदकोट, फिरोजपुर, बटारी, मोगा, और मखु में रेल सेवाओं को रोक रहे हैं। हर जगह पर लगभग 10 से 20 आंदोलनकारी पटरियों को अवरुद्ध कर रहे हैं। उन्होंने पटरियों की पूर्ण नाकाबंदी सुनिश्चित करने के लिए कई स्थानों पर टेंट लगाए हैं।

पीयूष गोयल ने पंजाब सरकार से पटरियों को खाली कराने का अनुरोध किया था

26 अक्टूबर को पंजाब में माल और यात्री गाड़ियों को फिर से शुरू करने की कैप्टन अमरिंदर की माँग के जवाब में, रेल मंत्री पीयूष गोयल ने पंजाब सरकार से पूरी सुरक्षा सुनिश्चित करने का आग्रह किया था। उन्होंने कहा था कि वो रेल ट्रैक पर से आंदोलनकारियों को हटाएँ, सेवाओं की पूरी तरह से बहाली के लिए सुरक्षा की गारंटी दें।

गोयल ने पंजाब के सीएम को लिखे पत्र में कहा था कि रेलवे ने 23 अक्टूबर को माल परिचालन शुरू किया था, लेकिन पटरियों की छिटपुट नाकाबंदी जारी रहने के कारण इसे रोक दिया गया। सुगम सेवाओं को बाधित करते हुए आंदोलनकारी अभी भी पावरहाउस और रेलवे स्टेशनों के बाहर हैं।

उन्होंने आगे कहा, “नाकाबंदी की कुल निकासी के बिना, हमारे कर्मचारी, विशेष रूप से लोको पायलट और गार्ड गाड़ियों को चलाने के बारे में आश्वस्त नहीं हैं।” आंदोलनकारियों द्वारा लोको पायलटों के साथ मारपीट की भी खबरें थीं। गोयल ने यह भी उल्लेख किया कि आंदोलन के कारण पंजाब में माल की 200 से अधिक रेक फँसी हुई थीं।

किसान बिलों को लेकर रेल रोको आंदोलन के कारण ट्रेन सेवाएँ स्थगित

पंजाब में रेल रोको आंदोलन सितंबर में शुरू हुआ, जिसके बाद रेलवे ने सुरक्षा कारणों को बताते हुए राज्य में अपनी सेवाओं को स्थगित कर दिया। सेवाओं को थोड़े समय के लिए फिर से शुरू किया गया, लेकिन फिर से निलंबित कर दिया गया क्योंकि पंजाब सरकार पटरियों को खाली कराने में विफल रही।

सितंबर में, केंद्र सरकार ने कृषि उद्योग के लिए तीन नए बिलों की घोषणा की। इन बिलों का उद्देश्य बिचौलियों को उपज की बिक्री और खरीद से दूर करना है। हालाँकि, विपक्षी दलों ने न्यूनतम विक्रय मूल्य (MSP) को हटाने के प्रयास के रूप में बिलों को चित्रित करने का प्रयास किया और आरोप लगाया कि मोदी सरकार ने कृषि व्यवसाय में बड़े खिलाड़ियों की सुविधा के लिए इन बिलों को लाया। कैप्टन अमरिंदर ने नए नियमों को दरकिनार करने के लिए एक प्रस्ताव पेश किया था।

अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तारी पर AAP और कॉन्ग्रेसी नेता-समर्थक खुलेआम मना रहे जश्न, श्रेय लेने की लगी होड़

फासीवाद का रोना रोने वाले आम आदमी पार्टी और कॉन्ग्रेसी नेता और समर्थक मुंबई पुलिस द्वारा अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तारी पर जश्न मनाते हुए नजर आ रहे हैं। बता दें कि सत्ता में बैठे उद्धव सरकार के इशारे पर मुंबई पुलिस के अधिकारी AK-47 के साथ अर्णब के घर, उन्हें गिरफ्तार करने पहुँचे।

कथित तौर पर उन्होंने न सिर्फ रिपब्लिक चीफ अर्णब के बाल खिंचे बल्कि उनके बेटे को भी मारा और उनके ससुराल वालों से बद्तमीजी भी की। यह गिरफ्तारी पुलिस ने अदालत द्वारा बंद किए गए 2018 के केस में की है।

वहीं एक पत्रकार की गिरफ्तारी की निंदा करने के बजाय, कॉन्ग्रेस और आम आदमी पार्टी के समर्थक और नेता इस मामले में खुश होते हुए नजर आए।

आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता ने ट्विटर पर कहा कि अर्णब किसी भी प्रकार से सहानुभूति के हकदार नहीं हैं। यह कह कर उन्होंने मुंबई पुलिस द्वारा किए गए बल प्रयोग को भी सही ठहराया। इसके अलावा कॉन्ग्रेसी नेताओं ने अर्णब की गिरफ्तारी का श्रेय भी लिया।

अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तारी का श्रेय लेने की होड़ में कॉन्ग्रेसी नेता इतना खो गए कि उन्होंने 2018 आत्महत्या के मामले में हुए उन्मूलन के बारे में गलत सूचना फैलाना शुरू कर दिया।

गौरव पांडे और रुचिरा चतुर्वेदी जैसे कॉन्ग्रेसी नेताओं ने 2018 में आत्महत्या मामले की रिपोर्ट का हवाला भी दिया। हालाँकि इन लोगों ने मुंबई पुलिस द्वारा दायर क्लोजर रिपोर्ट के बारे में बताना सही नहीं समझा।

अन्य लोगों ने भी अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तारी की खुशी मनाई।

इस मामले में राहुल गाँधी के प्रशंसक ने भी मुंबई पुलिस की सराहना की।

फ्रीडम ऑफ स्पीच का हवाला देते हुए हमेशा से मातम मनाने वाले भी इस मामले में जश्न मनाने में पीछे नहीं दिखे।

मुखौटा पहनकर प्रोपेगैंडा फैलाने वाले फैक्टचेकर भी अर्णब की गिरफ्तारी पर अपने फ्रीडम ऑफ स्पीच की लड़ाई भूलते हुए नजर आए।

गौरतलब है कि अर्णब गोस्वामी ने खुद इस बात का खुलासा किया कि उन्हें जबरदस्ती ले जाया जा रहा और मुम्बई पुलिस ने उनसे और उनके परिजनों ने मारपीट की है। इसके बावजूद कॉन्ग्रेस समर्थक इन बातों से मुँह फेरते हुए पुलिस के इस कारनामे पर उनकी प्रशंसा करते हुए नजर आए।

रिपब्लिक टीवी और अर्णब गोस्वामी पर हो रहे लगातार पुलिस ‘हमले’ पर ऑपइंडिया के विचार

समाचार चैनल ‘रिपब्लिक टीवी’ के एडिटर-इन-चीफ अर्णब गोस्वामी के साथ मुंबई पुलिस का दुर्व्यवहार आज की सबसे बड़ी खबर है। अर्णब को जिस तरह से मारपीट के बाद पुलिस अधिकारियों ने उनके घर से उठाया और साल 2018 के केस का हवाला देकर अपने साथ थाने ले गए, उसके पीछे की मंशा सभी को मालूम है। यह वही केस है जिसे कुछ समय पहले स्वयं मुंबई पुलिस बंद कर चुकी थी लेकिन अब नई सरकार के नेतृत्व में यह फिरसे खोला गया है। केस दोबारा क्यों खोले जाते हैँ यह बताने की जरूरत नहीं है।

यह बात सब जानते हैं कि अर्णब गोस्वामी के समाचार चैनल रिपब्लिक टीवी की पत्रकारिता ने पिछले दिनों किस तरह से महाराष्ट्र सरकार के नाक में दम किया हुआ था। पिछले 4-5 महीनों से  रिपब्लिक टीवी प्रमुखता से महाराष्ट्र सरकार व मुंबई पुलिस के ख़िलाफ़ अपनी कवरेज कर रहा था। यानी, यदि चैनल 18 घंटे लाइव आया तो 9 घंटे या उससे भी ज्यादा प्रशासन के ख़िलाफ़ बोलता रहा।

क्रमानुसार देखें तो बांद्रा में रिपोर्टिंग को लेकर शुरू हुए विवाद के बाद पालघर लिंचिंग में सोनिया गाँधी से सवाल पूछने, सुशांत सिंह केस में सीबीआई जाँच की माँग करने, फिर ड्रग मामले तक रिपब्लिक टीवी लगातार सुर्खियों में रहा। बाद में अचानक खबर आई कि पूरे संस्थान के 1000 कर्मचारियों के ख़िलाफ़ एफआईआर हो गई है। 

आजाद भारत के इतिहास में किसी सरकार ने शायद ही ऐसा कदम कभी किसी संस्थान के ख़िलाफ़ उठाया हो या आजादी के बाद से शायद ही पत्रकारों के ख़िलाफ़ हुए केसों की कुल गिनती भी इस संख्या के आस-पास पहुँच पाई हो। हो सकता है नैतिकता के आधार पर रिपब्लिक टीवी की पत्रकारिता गलत हो मगर रिपब्लिक टीवी अकेला ऐसा चैनल नहीं है जिसने जर्नलिज्म को इस गर्त में पहुँचाया। 

आज अन्य चैनलों के मुकाबले अर्नब गोस्वामी के इस चैनल की टीआरपी सबसे ज्यादा है। दर्शक उन्हें देखना पसंद कर रहे हैं। उन्हें सुनना पसंद करते हैं। ऐसे में यदि वामपंथी गिरोह के लोग उनकी गिरफ्तारी को प्रेस फ्रीडम पर खतरा बताने की जगह उन्हें पत्रकारिता का ज्ञान दे रहे हैं, तो सोचिए ये कहाँ तक वाजिब है कि एक ऐसे शख्स को जर्नलिज्म के गुण दोष बताना जिसने इसी क्षेत्र में रहते हुए मीडिया चैनल के रूप में एक पूरा एम्पायर खड़ा कर दिया हो।

पूरा वीडियो इस लिंक पर क्लिक करके देखें।

मुख़्तार अंसारी के परिवार को फायदा पहुँचाने वाले 2 IAS अधिकारियों को योगी सरकार ने हटाया

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार ने दो IAS अधिकारियों गुरुदीप सिंह और राजीव शर्मा को हटा कर उन्हें प्रतीक्षारत कर दिया है। आरोप है कि इन अधिकारियों ने विवादास्पद फैसले लिए और ऐसे एक्शन लिए, जिनसे दोनों को फायदा हुआ। इन दोनों IAS अधिकारियों पर मऊ के विधायक मुख़्तार अंसारी और उसके भाई अफजल अंसारी के परिवार को फायदा पहुँचाने का आरोप है।

यह भी आरोप है कि करियर मेडिकल कॉलेज व डेंटल कॉलेज के मालिकों को भी इन दोनों IAS अधिकारियों ने फायदा पहुँचाया। उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने मीडिया में प्रकाशित खबर का संज्ञात लेते हुए इस पर कार्रवाई की है। जहाँ गुरुदीप सिंह वरिष्ठ IAS अधिकारी व राजस्व परिषद में सदस्य थे, वहीं दूसरी तरफ राजीव शर्मा अभी कुछ समय पहले ही विशेष सचिव, नगर विकास से राजस्व परिषद में नियुक्त किए गए थे।

‘हिंदुस्तान’ में प्रकाशित खबर के अनुसार, राजस्व परिषद के सदस्य के पास न्यायिक अधिकार होता है और वो जमीन से जुड़े मामले की सुनवाई करते हैं। इन दोनों IAS अधिकारियों ने ऐसे-ऐसी फैसले लिए, जिनसे न सिर्फ जिला प्रशासन, बल्कि उत्तर प्रदेश के योगी आदित्यनाथ सरकार की भी खूब किरकिरी हुई। दोनों को ही राजस्व परिषद से हटा दिया गया है। सरकार ऐसे अन्य अधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई करेगी, जो माफिया से गठजोड़ में हैं।

परिषद सदस्य व IAS अधिकारी गुरुदीप सिंह ने उस सरकारी आदेश को ही निरस्त कर दिया था, जिसमें करियर मेडिकल व डेंटल कालेज के सरकारी जमीन पर बने होने की रिपोर्ट दी गई थी। इस आदेश को लखनऊ के तहसीलदार (सदर न्यायिक) और अपर जिलाधिकारी (वित्त एवं राजस्व, सीतापुर) द्वारा जारी किया गया था। इसी तरह राजीव शर्मा ने भी एक आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी थी।

उन्होंने उस आदेश को ही रद्द कर दिया था, जिससे एक जमीन को सरकारी होने का दर्जा दिया गया था। ये वही जमीन है, जिस पर मुख़्तार अंसारी के दोनों बेटों और गाजीपुर से दूसरी बार सांसद बने अफजल अंसारी के बँगले बने हुए हैं। मुख़्तार के बेटों के बँगले पहले ही ध्वस्त किए जा चुके हैं। राजस्व परिषद के अध्यक्ष दीपक त्रिवेदी के साथ विचार-विमर्श के बाद राज्य सरकार ने इन IAS अधिकारियों को प्रतीक्षारत करने का फैसला लिया।

हाल ही में उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने माफिया विधायक मुख़्तार अंसारी के अवैध साम्राज्य पर अब तक का सबसे करारा प्रहार किया था। गाजीपुर में ‘मुख़्तार अंसारी का ताजमहल’ कहे जाने वाले उसके गजल होटल को ध्वस्त कर दिया गया था। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह ने भी देवरिया की चुनावी सभा में याद दिलाया था कि कैसे योगी सरकार गुंडे-माफियाओं की अवैध सम्पत्तियों पर बुलडोजर चलवा रही है।

‘अर्णब की गिरफ्तारी मीडिया की स्वतंत्रता, व्यक्ति की स्वाधीनता का हनन’: IDMA ने महाराष्ट्र सरकार की ‘मनमानी’ की निंदा की

‘इंडियन डिजिटल मीडिया असोसिएशन (IDMA)’ ने ‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ के मुख्य संपादक अर्णब गोस्वामी की गिरफ़्तारी और मुंबई पुलिस की ‘मनमानी’ पर हैरानी जताई है। ‘रिपब्लिक टीवी’ के अनुसार, अर्णब गोस्वामी के साथ दुर्व्यवहार किया गया, उन्हें जबरन पुलिस थाने ले जाते समय कई गाड़ियों का बदल-बदल कर इस्तेमाल किया गया। चैनल ने ये भी बताया है कि अर्णब गोस्वामी की गिरफ़्तारी के लिए पुलिस न तो कोई वारंट और न ही कोई अदालती आदेश लेकर आई थी।

IDMA ने कहा कि वीडियो में दिख रहे विजुअल्स से ये स्पष्ट है कि पुलिस अर्णब गोस्वामी की पत्नी पर लगातार दबाव बना रही थी और उन्हें जबरन एक दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने को कह रही थी, और वो कौन से दस्तावेज थे, ये स्पष्ट नहीं है। IDMA ने इसे ‘महाराष्ट्र सरकार की मनमानी की हैरान कर देने वाली अवस्था’ बताया और कहा कि एक पत्रकार को चुप कराने के लिए स्टेट मशीनरी का इस्तेमाल किया जा रहा है।

IDMA ने ये भी याद दिलाया कि ‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ के दोनों चैनलों द्वारा महाराष्ट्र सरकार की आलोचना की गई थी, इसीलिए ये ‘बदले की भावना’ से की गई कार्रवाई हो सकती है। उसने न सिर्फ इसे मीडिया की स्वतंत्रता का हनन बताया, बल्कि व्यक्तिगत आज़ादी का हनन भी करार दिया। साथ ही कहा कि ये उस स्वाधीनता का अतिक्रमण है, जिसे भारत के संविधान द्वारा हर नागरिक को प्रदान की गई है।

IDMA ने चेताया कि जिन लोगों पर नागरिकों की रक्षा की जिम्मेदारी है, जब उन्हीं लोगों से नागरिकों को खतरा पैदा हो जाता है – तब लोकतांत्रिक शक्तियों को अपनी पूरी शक्ति लगा कर निष्पक्षता से न्याय की माँग करनी चाहिए। संस्था ने कहा कि अगर कुछ गलत हुआ है तो पुलिस कार्रवाई करने का अधिकार रखती है, लेकिन इसमें कानून का पालन किया जाना चाहिए। साथ ही इस घटनाक्रम को ‘रिपब्लिक’ के खिलाफ महाराष्ट्र सरकार का ‘विच हंट’ करार दिया, जो पिछले कई हफ़्तों से चल रहा है।

IDMA ने माँग की है कि अर्णब गोस्वामी को तुरंत रिहा किया जाए और राज्य सरकार भारत की जनता को स्पष्टीकरण दे कि नागरिकों के अधिकारों का इस तरह से क्यों हनन किया जा रहा है। डिजिटल मीडिया संस्थानों का समूह IDMA ने आशंका जताई कि छोटे मीडिया संस्थानों की आवाज़ों को दबाने के लिए कुछ भी किया जा सकता है। संस्था ने ऐसी कोशिशों का विरोध करते हुए इसके खिलाफ लड़ाई की बात भी कही।

ज्ञात हो कि ‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ और ‘ऑपइंडिया’ सहित 9 मीडिया संस्थानों ने मिल कर ‘इंडियन डिजिटल मीडिया असोसिएशन (IDMA)’ नामक प्लेटफॉर्म का गठन किया है। ये भारत में डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का सबसे बड़ा समूह है। ये भारत के स्वामित्व वाला, भारत का, और भारत के लिए समर्पित मीडिया समूह होगा। इसके सभी संस्थापक सदस्यों के 10 करोड़ यूजर्स हैं और ये सभी ‘इंडिया फर्स्ट’ की थ्योरी पर काम करेंगे।

अर्णब गोस्वामी ‘पत्रकार’ नहीं, जो ऐसा कह रहे… वो फैला रहे झूठ: ऑल्ट न्यूज के प्रतीक सिन्हा ने फैलाया प्रोपेगेंडा

अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तारी के बाद बड़े-बड़े राजनेता तक प्रेस पर हुए हमले की निंदा करने से गुरेज नहीं कर रहे हैं। वहीं इस मौके पर प्रोपेगेंडा वेबसाइट ऑल्ट न्यूज का संस्थापक और फर्जी न्यूज फैलाने के लिए कुख्तात प्रतीक सिन्हा अब भी जहर उगलने में व्यस्त है।

अर्णब की गिरफ्तारी पर प्रतीक सिन्हा ने लिखा, “जो दावा कर रहे हैं या सलाह दे रहे हैं कि अर्णब गोस्वामी एक पत्रकार है, वो सक्रियता से केवल झूठी जानकारी फैला रहे हैं।”

इतना ही नहीं उसे इस बात से भी परेशानी है कि आखिर स्मृति ईरानी जैसे भाजपा नेता अर्णब पर हुई कार्रवाई पर क्यों बोल रहे हैं। उसने स्मृति इरानी के ट्वीट पर जवाब दिया है कि भाजपा ने हमेशा से प्रेस को दबाया। उसने पूछा है कि क्या भाजपा नेताओं ने पहले इसी तरह पत्रकारों पर हुए हमलों के लिए बोला था। उसका कहना है कि वो जानता है भाजपा नेता आने वाले समय में भी किसी और के लिए नहीं बोलेंगे?

ऐसे में सोशल मीडिया यूजर्स ने प्रतीक सिन्हा को आड़े हाथों लेते हुए उसको करारा जवाब दिया है। लोगों ने पूछा है कि यदि अर्णब गोस्वामी पत्रकार भी नहीं है तो क्या एके-47 लेकर पुलिस उसके घर में घुसेगी, वो भी कुछ बिलों और पुराने केसों को लेकर।

एक यूजर ने पलटवार करते हुए कहा कि जो लोग दावा कर रहे हैं या बता रहे हैं कि प्रतीक सिन्हा एक फैक्ट चेकर है, वो सक्रियता से झूठी खबर फैला रहे हैं।

लोगों का यह भी कहना है कि अर्णब गोस्वामी ऐसे लोगों को ऐसे ही दोहरे रवैये के कारण एक्सपोज करता है। आज गिरफ्तार कॉन्ग्रेस सरकार ने अर्णब को करवाया है लेकिन हमला तब भी बीजेपी पर किया जा रहा है।

यहाँ बता दें कि एक ओर जहाँ प्रतीक सिन्हा जैसे मीडिया गिरोह के लोग अर्णब की गिरफ्तारी पर उनके ख़िलाफ़ जहर उगल रहे हैं। वहीं कई भाजपा नेताओं और कंगना रनौत जैसे कलाकारों ने इस गिरफ्तारी की निंदा की है। इसे प्रेस पर खतरा बताया है। इस घटना को आपातकाल की याद कहा है।

अभी कुछ देर पहले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ के संस्थापक अर्णब गोस्वामी की गिरफ़्तारी की निंदा की है। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस और उसके गठबंधन साथियों ने एक बार फिर से लोकतंत्र को शर्मसार किया है।

उन्होंने कहा कि ‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ और अर्णब गोस्वामी के खिलाफ सत्ता की शक्ति का दुरूपयोग करना व्यक्तिगत अधिकारों का हनन है। अमित शाह ने गोस्वामी पर कार्रवाई को लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ पर हमला करार दिया।

इसी तरह स्मृति इरानी ने लिखा, “स्वतंत्र प्रेस में जो लोग आज अर्नब का समर्थन नहीं कर रहे हैं वह फासीवाद का समर्थन कर रहे हैं। आप उन्हें पसंद या न पसंद कर सकते हैं, आप उनकी मौजूदी को तुच्छ समझ सकते हैं लेकिन यदि आप आज चुप रहते हैं तो आप दमन का समर्थन करते हैं। अगर आप अगले होंगे तो कौन बोलेगा?”

‘कॉन्ग्रेस और उसके साथियों ने लोकतंत्र को शर्मसार किया, चौथे स्तम्भ पर हमला’: अर्णब पर कार्रवाई पर अमित शाह

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ के संस्थापक अर्णब गोस्वामी की गिरफ़्तारी की निंदा की है। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस और उसके गठबंधन साथियों ने एक बार फिर से लोकतंत्र को शर्मसार किया है।

उन्होंने कहा कि ‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ और अर्णब गोस्वामी के खिलाफ सत्ता की शक्ति का दुरूपयोग करना व्यक्तिगत अधिकारों का हनन है। अमित शाह ने गोस्वामी पर कार्रवाई को लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ पर हमला करार दिया।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अर्णब गोस्वामी के खिलाफ मुंबई पुलिस की कार्रवाई को ‘लोकतंत्र की हत्या’ करार दिया। उन्होंने कहा कि ये स्वतंत्र पत्रकारिता पर हमला है और इसका विरोध होना ही चाहिए।

कंगना रनौत ने महाराष्ट्र की सरकार को ‘सोनिया सेना’ करार देते हुए कहा कि उनसे पहले तो कितने ही बलिदानियों के गले काटे गए और उन्हें लटका दिया गया, सिर्फ फ्री स्पीच के लिए। उन्होंने कहा, “एक आवाज़ बंद करेंगे तो कई आवाज़ें उठ जाएँगी। कितनी आवाजों को बंद करेंगे आप?” कंगना ने पूछा कि आपको कोई पेंगुइन, पप्पू सेना या सोनिया सेना कहता है तो गुस्सा क्यों आता है? उन्होंने कहा कि आप ये सब हो, तभी कोई कहता है।

कपिल मिश्रा ने आरोप लगाया कि अर्णब गोस्वामी के साथ-साथ मीडिया और मीडिया की आज़ादी को कुचलने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने अपील करते हुए कहा कि इस ‘लोकतंत्र की हत्या’ के खिलाफ किसी को भी चुप नहीं रहना चाहिए। उन्होंने इसे मीडिया का गला दबाने की कोशिश बताते हुए कहा कि हथियारबंद पुलिस एक पत्रकार के घर में घुस कर उनके घर को गाड़ियों से घेर कर दिखाना क्या चाहती है?

7,686,369,774,870 × 2,465,099,745,779 का उत्तर क्या होगा? वो महिला, जिन्होंने मात्र 28 सेकेंड्स में बता दिया था…

आपने हाल ही में रिलीज हुई फिल्म ‘शकुंतला देवी’ का नाम सुना होगा, जो जुलाई 31, 2020 को ‘अमेज़न प्राइम वीडियो’ पर स्ट्रीम हुई थी। इसमें मशहूर अभिनेत्री विद्या बालन ने ‘ह्यूमन कम्प्यूटर’ कही जाने वाली शकुंतला देवी का किरदार निभाया था। शकुंतला देवी (1929-2013) के पास औपचारिक शिक्षा में बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ नहीं थीं, परीक्षाओं में वो असाधारण परिणाम नहीं लाती थीं, लेकिन गणित की गणनाओं में उनका कोई सानी न था।

वो बड़े से बड़े कैलकुलेशंस भी इतने कम समय में कर दिया करती थीं कि कैलकुलेटर को भी शर्म आ जाए। यहाँ हम आपको बताएँगे कि आखिर क्यों वो लोकप्रिय हुईं और वो कौन सी उपलब्धियाँ थीं, जिन्होंने उन्हें महान बनाया। सबसे पहले तो आते हैं क्यूब रूट्स पर। 1930 के दशक में जब वो बच्ची थीं, तभी वो बड़े-बड़े क्यूब रूट्स तेज़ी से निकाल दिया करती थीं। अब बात करते हैं इसके 58 साल बाद 1988 की एक घटना की।

स्थान था बर्केले का ‘यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया’, जिसके बारे में कोई परिचय देने की ज़रूरत ही नहीं है। मनोवैज्ञानिक आर्थर जेन्सेन ने शकुंतला देवी की क्षमताओं का परीक्षण किया। पूरी दुनिया की नजरें इस पर थीं। वहाँ पर उन्होंने 95,443,993 (उत्तर- 457), 204,336,469 (उत्तर- 589) और 2,373,927,704 (उत्तर- 1334) के क्यूब रूट्स क्रमशः मात्र 2, 5 और 10 सेकेंड्स में कैलकुलेट कर लिया।

ये सब उन्होंने मन ही मन किया, बिना कागज-कलम का इस्तेमाल किए। स्क्वायर रूट्स और क्यूब रूट्स तो दूर की बात है, उन्होंने मात्र 40 सेकेंड्स में 455,762,531,836,562,695,930,666,032,734,375 जैसी विशाल संख्या का 7वाँ रूट निकाल लिया था। इसका उत्तर 46,295 होगा। इसका अर्थ ये हुआ कि अगर आप इस संख्या को 7 बार इसी संख्या से ही गुणा करेंगे, तो इसका उत्तर वो 27 डिजिट्स वाली विशाल संख्या होगी।

ये भी उसी टेस्ट में हुआ और इसे औपचारिक रूप से रिकॉर्ड में भी रखा गया। अब आ जाते हैं बड़े-बड़े गुणा पर। ये एक ऐसी कला थी, जिसके कारण उन्हें 1982 में ‘गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड्स’ में स्थान मिला। जून 18, 1980 में शकुंतला देवी को 13 अंकों की दो संख्याएँ दी गईं और उन्हें गुणा कर के परिणाम बताने को कहा गया। उन्होंने मात्र 28 सेकेंड्स में उसका उत्तर निकाल लिया। ये गुणा और इसका जवाब कुछ इस प्रकार था:

7,686,369,774,870 × 2,465,099,745,779 = 18,947,668,177,995,426,462,773,730

शकुंतला देवी की एक खासियत ये थी कि वो किसी भी तारीख को देख कर ही बता देती थीं कि उस डेट को कौन सा दिन रहा होगा। अगर आपसे हम पूछें कि जुलाई 31, 1920 को कौन सा दिन था, तो आप गूगल कैलेंडर पर ढूँढने लगेंगे। लेकिन, शकुंतला देवी ने तुरंत बता दिया था कि उस दिन शनिवार था। अगर आप उन्हें इसे महीना-तारीख-वर्ष के हिसाब से बताते, (जैसे जुलाई 13, 1920) तो वो मात्र एक सेकेण्ड में इसका उत्तर दे देती थीं।

वहीं अगर उन्हें वर्ष-महीना-तारीख के फॉर्मेट में बताया जाता था तो वो इतने कम समय में उत्तर बता देती थीं कि उत्तर बताने के समय की गणना के लिए आपको स्टॉपवॉच चालू करना पड़ता, ऐसा विशेषज्ञों ने पाया था। ये सब उन्होंने खुद ही सीखा था। उन्हें किसी स्कूल-कॉलेज में ये सब नहीं सिखाया गया। उनके पिता सर्कस में काम करते थे और इसीलिए उन्हें बचपन से ही माता-पिता के साथ घूमना पड़ता था।

वो कार्ड ट्रिक्स से खेलते-खेलते गणनाएँ सीख गईं और कब उनके दिमाग ने कम्प्यूटर की तरह काम करना शुरू कर दिया, पता ही नहीं चला। जब उन्होंने बड़े-बड़े क्यूब रूट्स के कैलक्युलेशन्स सीखे तो वो इस पर परफॉरमेंस भी देने लगीं। अपनी युवावस्था के पहले ही वो दुनिया भर में कई कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज में घूम-घूम कर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुकी थीं। एक तरह से उन्होंने खुद की प्रतिभा को खुद ही निखारा।

उन्होंने कई किताबें लिखीं, जिनमें से गणित के पजल्स और कई ट्रिक्स के बारे में सिखाया। उन्होंने बच्चों को गणित की शिक्षा देने के लिए भी किताबें लिखीं। इन किताबों से पता चलता है कि उन्हें गणित के बारे में वो सब पता था, जो छात्रों को औपचारिक रूप से पढ़ाया जाता है। उन्होंने ये सारे गुर खुद ही बड़ी-बड़ी किताबों को पढ़ कर सीखा था। उनकी मानसिक क्षमताओं पर रिसर्च हुए थे, जर्नल्स भी प्रकाशित हुए थे।

लेकिन, बड़े-बड़े मनोवैज्ञानिक भी ये नहीं खोज पाए कि आखिर उनकी ऐसी क्षमताओं के पीछे क्या कारण थे और वो कैसे इतने बड़े-बड़े कैलकुलेशंस कर लिया करती थीं। पाया गया कि ये सब उन्होंने बचपन में ही सीख लिया और फिर बाद में सब कुछ ऑटोमैटिक हो गया। ऐसी थी उनकी प्रतिभा! कहा जाता था कि उन्हें बड़े-बड़े अंकों की संख्याएँ अपने सामने उसी तरह से दिखती थीं, जैसे हमें एक-दो अंकों की संख्याएँ दिखती हैं।

उनके बारे में एक और बात जानने लायक ये है कि वो समलैंगिक विषय (Homosexuality) पर एक पुस्तक भी लिख चुकी हैं। समलैंगिकों के लिए उनके मन में एक सॉफ्ट कॉर्नर था। उनका कहना था कि हर व्यक्ति की सेक्सुअल टेन्डेन्सीज अलग-अलग होती हैं और अलग-अलग समय पर अलग ओरिएंटेशन हो सकते हैं। इन सबके अलावा वो एस्ट्रोलॉजी और कुकिंग पर भी पुस्तक लिख चुकी हैं। उन्होंने ‘ह्यूमन कम्प्यूटर’ टाइटल को अपने लिए पसंद नहीं किया, क्योंकि वो मानती थीं कि मनुष्य का दिमाग कम्प्यूटर से कहीं ज्यादा तेज़ है।

‘कितनों का गला दबाएगी सोनिया सेना, सच्चाई दिखाना गलती है?: अर्णब गोस्वामी के साथ खड़े हुए कंगना और कपिल मिश्रा

‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ के संस्थापक अर्णब गोस्वामी को मुंबई पुलिस गिरफ्तार कर के ले गई, जिसके बाद अभिनेत्री कंगना रनौत और भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने उद्धव ठाकरे सरकार की इस कार्रवाई की निंदा की है। उन्होंने महाराष्ट्र सरकार से पूछा कि आज अर्णब गोस्वामी के घर में घुस कर पुलिस ने मारा-पीटा है और उनके बाल नोचे हैं, उस तरह से आप कितने घर तोड़ेंगे, कितने गले दबाएँगे और कितनों के बाल नोचेंगे? उन्होंने पूछा कि महाराष्ट्र सरकार कितनों की आवाज़ें दबाएँगी?

कंगना रनौत ने महाराष्ट्र की सरकार को ‘सोनिया सेना’ करार देते हुए कहा कि उनसे पहले तो कितने ही बलिदानियों के गले काटे गए और उन्हें लटका दिया गया, सिर्फ फ्री स्पीच के लिए। उन्होंने कहा, “एक आवाज़ बंद करेंगे तो कई आवाज़ें उठ जाएँगी। कितनी आवाजों को बंद करेंगे आप?” कंगना ने पूछा कि आपको कोई पेंगुइन, पप्पू सेना या सोनिया सेना कहता है तो गुस्सा क्यों आता है? उन्होंने कहा कि आप ये सब हो, तभी कोई कहता है।

इसके अलावा भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने भी इस घटना की निंदा की है। उन्होंने कहा कि अर्णब गोस्वामी के पास जो पुलिस गई है, ऐसा ‘पुलिसिया अत्याचार’ मीडिया के खिलाफ पहली बार दिख रहा है। उन्होंने पूछा कि अर्णब गोस्वामी की गलती क्या है, सवाल उठाना गलती है या फिर सच्चाई दिखाना गलती है? उन्होंने पूछा कि अपने दम पर इतना बड़ा चैनल खड़ा कर देना गलती है या फिर बाकी चैनल पीछे छूट गए, इसकी सज़ा दी जा रही है।

कपिल मिश्रा ने आरोप लगाया कि अर्णब गोस्वामी के साथ-साथ मीडिया और मीडिया की आज़ादी को कुचलने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने अपील करते हुए कहा कि इस ‘लोकतंत्र की हत्या’ के खिलाफ किसी को भी चुप नहीं रहना चाहिए। उन्होंने इसे मीडिया का गला दबाने की कोशिश बताते हुए कहा कि हथियारबंद पुलिस एक पत्रकार के घर में घुस कर उनके घर को गाड़ियों से घेर कर दिखाना क्या चाहती है?

कपिल मिश्रा ने कहा कि लोकतंत्र इस प्रकार से नहीं चल सकता है, ये महाराष्ट्र सरकार को समझ आ जाना चाहिए। उधर अब ‘एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया’ भी नींद से जाग गई है और उसने महाराष्ट्र सरकार की इस कार्रवाई की निंदा करते हुए मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से अपील की है कि अर्णब गोस्वामी के साथ न्यायोचित व्यवहार किया जाए और सरकार के आलोचकों के खिलाफ सत्ता की शक्ति का इस्तेमाल न किया जाए। कंगना और कपिल मिश्रा, दोनों ने अर्णब गोस्वामी की गिरफ़्तारी के लिए उद्धव को निशाना बनाया।

अर्णब ने अपने रिपोर्टर के सामने पुलिस वैन से अपनी बात रखते हुए बताया कि न केवल पुलिस ने उनके साथ मारपीट व दुर्व्यवहार किया बल्कि उनके बेटे को भी पीटा। उन्होंने बताया कि मुंबई पुलिस ने उन्हें उनके परिवार तक से नहीं मिलने दिया। उन्हें उनके सास-ससुर से भी बात नहीं करने दी गई। चैनल का कहना है कि अर्णब के घर पहुँची पुलिस टीम के पास कोई समन, दस्तावेज या कोर्ट के पेपर तक नहीं थे।

बिहार में 10 नवंबर को क्या होगा? उलझे समीकरणों के बीच जमीन के संकेत स्पष्ट हैं

बिहार विधानसभा की 243 सीटों के लिए तीन चरणों में हो रहा चुनाव अब अंतिम दौर में है। आखिरी चरण का मतदान 7 नवंबर को होना है। 10 नवंबर को नतीजे आएँगे। ऐसे में एक सवाल जो बार-बार लोग पूछ रहे हैं और जिसकी हम भी लगातार तलाश कर रहे हैं, वह है- किसकी सरकार बनने वाली है?

कितनी सीटें फँसी हैं?

असल में इस चुनाव में किसी की लहर जमीन पर नहीं दिखती। लिहाजा, हर सीट के अपने-अपने समीकरण हैं। 40 की करीब सीटें ऐसी हैं, जहाँ एनडीए या राजद के नेतृत्व वाले गठबंधन की जीत लोजपा, जाप, रालोसपा और निर्दलीय तय करेंगे या यूँ कहें कि इनमें से कुछ सीटें अन्य के खाते में जानी तय है। मसलन, जमुई की चकाई सीट पर निर्दलीय सुमित सिंह। सीतामढ़ी की सुरसंड सीट से लोजपा के अनिल चौधरी। बेनीपुर में लोजपा के ही कमल सेठ। हसनपुर में पप्पू यादव की जाप के अर्जुन यादव। शिवहर में जाप के मोहम्मद वामिक और बसपा के संजीव कुमार गुप्ता। हरलाखी में निर्दलीय मंदाकिनी चौधरी वगैरह, वगैरह…

चुनाव के तीन पिच

क्रिकेट की भाषा में कहें तो यह चुनाव तीन पिच पर लड़ी जा रही है। इसका सबसे बड़ा कारण किसी के पक्ष में लहर नहीं होना है। पहली पिच तेजस्वी यादव की है। वे चुनाव को रोजगार के मुद्दे पर केंद्रित करने की लगातार कोशिश करते रहे हैं पर अभी तक इसमें पूरी तरह सफल नहीं हुए हैं। नीतीश कुमार इसे लालू-राबड़ी शासनकाल के कथित जंगलराज की पिच पर लड़ना चाहते हैं, लेकिन अब उनके खिलाफ नाराजगी भी दिखती है। बीजेपी इसे मोदी सरकार के कामकाज के इर्द-गिर्द केंद्रित रखने की कोशिश में है। लेकिन यह फॉर्मूला भी हर सीट पर कारगर नहीं है।

यानी, जमीन पर उम्मीदवार का निजी प्रभाव और छवि इस बार सबसे असरकारी है। जो लगातार 10-15 साल से विधायक हैं, उनमें से ज्यादातर मुश्किल मुकाबले में फँसे हैं। चुनाव प्रचार के दौरान उन्हें कई जगह वोटरों का विरोध झेलना पड़ा है। जिन जगहों पर प्रमुख दलों ने फ्रेश चेहरे या पिछली बार हार गए उम्मीदवार को मौका दिया है, वे थोड़ी बेहतर स्थिति में हैं। इसका कारण यह है कि नीतीश सरकार के इस 5 साल को हर कोई निराशाजनक मान रहा है।

मोदी, नीतीश और तेजस्वी का कितना प्रभाव है?

यादव और मुस्लिम मतदाता ज्यादातर सीटों पर राजद के पीछे गोलबंद हैं। वे मानकर बैठे हैं कि यह फिर से सत्ता में प्रभाव में आने का अवसर है और तेजस्वी यादव का मुख्यमंत्री बनना तय है। तेजस्वी यादव अपनी सभाओं के लिए ऐसी जगह भी चुन रहे हैं, जिसके आसपास इन मतदाताओं का बाहुल्य हो। इसका असर उनकी सभाओं में भीड़ के तौर पर दिख भी रहा है। लेकिन, इस वर्ग के लोगों को भी उनके रोजगार के वादे पर भरोसा नहीं है।

नीतीश कुमार को लेकर नाराजगी दिखती है। लेकिन, उन्होंने जो अपना वोट बैंक इन सालों में बनाया है, वह ज्यादातर ग्रामीण इलाकों में है। ये वोटर साइलेंट हैं। महिलाओं में अब भी उनका असर बना हुआ है। महादलित और अतिपिछड़ों के बीच उनकी पकड़ थोड़ी कमजोर हुई है।

मोदी का प्रभाव बना हुआ है। बिहार सरकार में बीजेपी के कोटे से मंत्री रहे कई उम्मीदवारों ने भी हमें ऑफ द रिकॉर्ड बताया कि उनकी उम्मीदें मोदी की सभा पर टिकी है। कोरोना के कारण पैदा हुए संकट के दौरान ग्रामीण इलाकों में लोगों को जो सरकारी सहायता मिली है, उसका भी असर है। मोदी का चेहरा कई सीटों पर वोटरों को हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर भी लामबंद कर रहा है।

बची हुई 200 सीटों पर क्या हो सकता है?

अन्य के प्रभाव वाली 40 सीटों को छोड़ दें तो इस चुनावी लड़ाई में बीजेपी सबसे आगे दिखती है। राजद और जदयू उसके पीछे। एनडीए के लिए अच्छी बात यह है कि नीतीश से नाराजगी के बावजूद जदयू का प्रदर्शन कॉन्ग्रेस के स्तर तक गिरने की कोई संभावना नहीं दिखती। राजद और कॉन्ग्रेस 2015 के नंबर के आसपास पहुँचती नहीं दिख रही।

तेजस्वी की इतनी चर्चा होने की एक बड़ी वजह यह है कि कुछ महीने पहले तक यह चुनाव एकतरफा लग रहा था, जिसे उन्होंने लड़ाई में बदल दी है और जदयू से राजद स्पष्ट तौर पर आगे दिखती है। राजद के पक्ष में लहर नहीं होने की बात इससे भी समझी जा सकती है कि हसनपुर से लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेजप्रताप यादव की जीत इस सीट पर मतदान के बाद भी पक्की नहीं बताई जा रही। इसी तरह सुरसंड सीट पर लालू परिवार के खासमखास अबू दुजाना को इलाके में विरोध तक झेलना पड़ा है और वे भी मुश्किल में हैं। मुस्लिम बहुल केवटी सीट पर बीजेपी प्रत्याशी मुरारी मोहन झा की छवि के आगे माई समीरकण टूटता दिख रहा है और मतदान तक यही ट्रेंड बना रहा तो राजद के बड़े नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी के लिए जीत मुश्किल हो जाएगी।

ई बिहार छै, थाह नै लागत

कल 3 नवंबर को बिहार की जिन सीटों पर मतदान हुआ, उसमें एक मधुबनी भी थी। शहर में सन्नाटा पसरा था और इक्का-दुक्का दुकानें ही खुली थीं। राजद के समीर महासेठ को यहाँ मतदान से पहले बढ़त दिख रही थी। मतदान के बाद वीआईपी के सुमन महासेठ के जीतने की भी चर्चा होने लगी है।

3 नवंबर को ही मधुबनी जिला मुख्यालय से कुछ किलोमीटर दूर कलुआही में चहल-पहल थी। केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय की सभा हुई। लेकिन, इसी दिन इसी जिले के हरलाखी में नीतीश कुमार को विरोध झेलना पड़ा।

कलुआही से सटे ढंगा गाँव के काली मंदिर के पास सत्यनारायण मिश्र मिले। वे कहते हैं, “उम्हर जरैल, दामोदरपुर सब आ इम्हर हरिपुर ढंगा सब युगेश्वर झा का बनायल इलाका छै।” उनके कहने का मतलब था कि बेनीपट्टी विधानसभा क्षेत्र के जरैल, दामोदरपुर, ढंगा जैसे इलाके युगेश्वर झा का गढ़ रहा है। दिवंगत युगेश्वर झा इस सीट से कॉन्ग्रेस की टिकट पर लड़ रहीं निवर्तमान विधायक भावना झा के पिता थे। पिछली बार उन्होंने बीजेपी के विनोद नारायण झा को करीबी मुकाबले में इसी इलाके में मिले इकतरफा वोट की बदौलत हराया था।

सत्यनारायण मिश्र ने अपने आँगन में ‘हर घर नल जल’ योजना के तहत लगा नल दिखाया, साथ ही बताया कि इसमें पानी अभी नहीं आता। मैंने उन्हें बगल के गाँव में पानी आने का हवाला दिया तो उन्होंने बताया कि कई बार सुना है कि अब पानी शुरू हो जाएगा लेकिन आज तक यहाँ पानी नहीं आया। मिश्र का दावा है कि वे मोदी समर्थक हैं और बीजेपी को ही वोट देंगे। पर वे आश्वस्त नहीं हैं कि बीजेपी यह सीट निकाल ही लेगी।

हालाँकि उनका मानना है कि अब उनके गॉंव में एकतरफा कॉन्ग्रेस वाला माहौल नहीं रहा। उनके गाँव के ज्यादातर ब्राह्मणों का झुकाव भावना झा की तरफ है। लेकिन, अन्य जतियाँ बीजेपी उम्मीदवार विनोद नारायण झा का खुलकर समर्थन कर रही हैं। इसकी वजह कोरोना के कारण पैदा हुए संकट के दौरान मिली सरकारी सहायताएँ हैं।

मंदिर के पास ही मिले महेंद्र झा कहते हैं, “ई बिहार छै बाबू, थाह नै लागत। लोग किछ कहत वोट ककरो द देतै।” यानी, ये बि​हार है। लोग बात किसी की करते हैं और वोट किसी को देते हैं।

उनकी बातें आसानी से खारिज नहीं की जा सकतीं। मोतिहारी के गाँधी मैदान में कैमरे के सामने जो युवा रोजगार और बदलाव की बातें कर रहे थे, उनमें से कई कैमरा बंद होते ही हिंदुत्व के मुद्दे पर बीजेपी का समर्थन करने की बात करने लगे थे। ग्रामीणों इलाकों में लोग कैमरे के सामने आने से बचते हैं। बिना कैमरे के उनसे बात करिए तो वे आपको जंगलराज की याद दिलाने लगते हैं। इससे समझा जा सकता है कि बदलाव और रोजगार का विपक्ष का वादा उन्हें नहीं लुभा रहा। इसी तरह खासकर, यादव विकास के दावों को खारिज कर लालू प्रसाद यादव को फँसाने की बात करने लगते हैं।

…तो क्या होगा?

असल में मेनस्ट्रीम मीडिया और सोशल मीडिया में जो बातें आ रही हैं, वह मुखर वोटरों का है। ये शहरों में रहते हैं। अगड़ी जातियों अथवा यादव होते हैं। इनकी गोलबंदी साफ दिखती है। पर ग्रामीण इलाकों में जहाँ वोटिंग ज्यादा होती है, वहाँ के वोटर साइलेंट हैं। बीजेपी के एलजेपी के साथ सरकार बना लेने की कोई संभावना नहीं दिखती। एनडीए ही बहुमत के करीब पहुँचती फिलहाल दिख रही है। अन्य के निर्णायक वाली सीटों के अंतिम नतीजे ही तय करेंगे कि एनडीए को मजबूत बहुमत मिलेगा या या फिर बहुमत से दूर नजर आ रहा विपक्ष और मजबूत होगा।