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हाथरस केस: पीड़ित परिवार ने फिर बदला स्टैंड, अब सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में न्यायिक जाँच की डिमांड

उत्तर प्रदेश और केंद्र की सरकार को बदनाम करने और अपनी राजनीति चमकाने को लेकर कॉन्ग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के लिए हाथरस मामला मुख्य मुद्दा बना हुआ है। उत्तर प्रदेश के हाथरस में चार लोगों द्वारा कथित रूप से यौन उत्पीड़न और गला घोंटने के बाद एक 19 वर्षीय लड़की की मौत हो गई थी। इस मामले की जाँच उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा गठित एक एसआईटी द्वारा की जा रही थी। मामले की गंभीरता और पूरे देश मे फैले आक्रोश को देखते हुए योगी सरकार ने अब इसकी जाँच सीबीआई से कराने का फैसला किया है।

मामले में मृतक लड़की के परिजन लगातार अपने बदलते बयान और स्थिति को लेकर शक के दायरे में हैं। शुरुआत में पीड़ित परिवार ने केवल हमले का आरोप लगाया था। फिर मामले में एक हफ्ते बाद बलात्कार का आरोप जोड़ा गया था। इस बयान से मामले में काफी भ्रम पैदा हो गया है, क्योंकि घटना में सामने आए चिकित्सा और फोरेंसिक सबूत बलात्कार के आरोप का समर्थन नहीं करते हैं। इसी तरह मामले की जाँच को लेकर भी परिवार का रुख बदलता दिख रहा है। खासकर इस मामले में मृतका के भाई की स्थिति समझ के परे है।

जहाँ एक तरफ उत्तरप्रदेश योगी सरकार ने मामले की गंभीरता समझते हुए मामले को सीबीआई को सौंपने का फैसला किया है, वहीं इस फैसले पर आपत्ति जताते हुए मृतका के भाई ने कहा कि इसकी जरूरत नहीं थी। रिपोर्ट के अनुसार, मृतका के भाई ने कहा कि उन्होंने सीबीआई जाँच की माँग नहीं की, क्योंकि एसआईटी जाँच पहले से ही चल रही है। अब परिवार सुप्रीम कोर्ट के तहत न्यायिक जाँच की माँग कर रहा है।

वहीं कल पीड़िता की माँ ने भी यही कहा था। यहीं नहीं परिवार ने मामले से जुड़े सभी पक्षों का नार्को टेस्ट कराने के फैसले का का भी विरोध किया था। बता दें विशेष जाँच दल ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट में नार्को टेस्ट की सिफारिश की थी। पीड़िता की माँ ने कहा कि उसका परिवार नार्को टेस्ट नहीं करवाएगा। हालाँकि परिवार ने पहले एसआईटी जाँच पर नाराजगी व्यक्त की थी और अदालत की निगरानी में सीबीआई जाँच की माँग की थी।

गौरतलब है कि 1 अक्टूबर को कई समाचार एजेंसियों ने बताया था कि पीड़ित के भाई ने कहा है कि वह चल रही जाँच से संतुष्ट नहीं हैं। इंडिया टुडे से बात करते हुए पीड़ित के छोटे भाई ने कहा, “हम जाँच से संतुष्ट नहीं हैं। हम इस मामले में सीबीआई जाँच चाहते हैं। मेरी बहन की मौत हो गई है। प्रशासन ने उसका चेहरा दिखाए बिना ही उसकी लाश को जला दिया। उन्हें कैसे लगता है कि हम संतुष्ट होंगे?”

पीड़ित के भाई ने 3 अक्टूबर को फिर से कहा कि वे चल रही जाँच से संतुष्ट नहीं हैं। एएनआई की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने कहा, “हम चल रहे जाँच से संतुष्ट नहीं हैं, क्योंकि हमें अब तक हमारे सवालों के जवाब नहीं मिले हैं। खुले तौर पर हमें धमकी देने वाले डीएम को अभी तक निलंबित नहीं किया गया है।” वहीं सीएम योगी आदित्यनाथ ने एसआईटी की प्रारंभिक रिपोर्ट के बाद एसपी, डीएसपी, इंस्पेक्टर और कुछ अन्य अधिकारियों के निलंबन आदेश दिए थे।

उल्लेखनीय है कि अब यानी 4 अक्टूबर को परिवार ने सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की निगरानी में न्यायिक जाँच की माँग की है, क्योंकि उन्हें राज्य सरकार के साथ-साथ SIT और CBI सहित किसी भी जाँच एजेंसी पर भरोसा नहीं है। इसके अलावा पीड़िता के भाई ने हाथरस जिलाधिकारी को निलंबित करने की भी माँग की।

मीडिया ट्रायल और पॉलिटिकल ड्रामा

स्थानीय और राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर विपक्षी दल उक्त मामले में अपनी सारी ताकत को झोंकने में तुले हैं। राज्य सरकार द्वारा मीडिया और राजनेताओं को पीड़ित परिवार से मिलने की अनुमति देने के बाद राजनेताओं और मीडिया कर्मियों का गाँव के आसपास के क्षेत्र में जमावड़ा है। कॉन्ग्रेस नेता राहुल और प्रियंका गाँधी परिवार से मिलने गए थे। हालाँकि परिवार से मिलने से पहले सोशल मीडिया पर उनकी एक वीडियो वायरल हुई, जिसमें वह हाथरस की यात्रा के दौरान जोर-जोर से ठहाके लगाते हुए नजर आए।

वहीं अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी के सदस्य भी 4 अक्टूबर को परिवार से मिले। उन्होंने पहले परिवार के नार्को टेस्ट औए एसआईटी की सिफारिश पर सवाल उठाए थे और कहा था कि यह परीक्षण केवल पुलिस अधिकारियों का होना चाहिए, परिवार वालों का नहीं।

हाल ही में ऑपइंडिया ने कुछ ऑडियो रिकॉर्डिंग शेयर की थी। जिसमें इंडिया टुडे की पत्रकार तनुश्री को पीड़ित के भाई को वीडियो बनाने और उसे भेजने के लिए मार्गदर्शन करते हुए सुना गया। वहीं कई अन्य समाचार एजेंसियों के रिपोर्टर को पुलिसकर्मियों को डराने की कोशिश करते हुए भी देखा गया था, जिनको जाँच की वजह से गाँव मे जाने से रोक दिया गया था।

हाथरस मामला

गौरतलब है कि दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में हाथरस की कथित सामूहिक बलात्कार पीड़िता की मौत हो गई थी। जिसके बाद से ही मामले में सभी विपक्षी पार्टियों को अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेकने का मौका मिल गया। खबरों के अनुसार, उसके साथ दो सप्ताह पहले कथित तौर पर बलात्कार किया गया था। वहीं लोगों का गुस्सा तब और भड़क गया जब सोशल मीडिया पर यह भ्रामक चलाई गई कि हाथरस पुलिस ने परिवार के सदस्यों की सहमति के बिना लड़की का जबरन अंतिम संस्कार कर दिया। हालाँकि पुलिस ने बाद में खबरों को खरिज करते हुए कहा था कि दाह संस्कार के दौरान मृतका के पिता मौजूद थे।

एडीजी प्रशांत कुमार ने एएनआई से बात करते हुए बताया था कि फोरेंसिक रिपोर्ट के मुताबिक़ लड़की के साथ बलात्कार की घटना नहीं हुई थी। पीड़िता के साथ किसी भी तरह का यौन शोषण नहीं हुआ। मौत का कारण गला दबाना और रीढ़ की हड्डी में लगी चोटें थी।

डूब कर मर गया जयप्रकाश, जिंदा है सोनकलिया, दोनों को दादी ने छला; हाथरस में वही हाथ दिखा रहे पोता-पोती

वैसे तो अभी राजनीति की प्रयोगशाला कहलाने वाले बिहार में चुनाव हैं, लेकिन कॉन्ग्रेस के वादों की राजनीति फ़िलहाल उत्तर प्रदेश में चल रही है। ऐसा नहीं है कि राहुल-प्रियंका ने जो शुरू किया है, वो कोई पहली घटना है। ऐसी परंपरा कॉन्ग्रेसी परिवार में राहुल-प्रियंका की दादी के दौर से ही चलती आ रही है।

इसे याद करना हो तो इंदिरा गाँधी के दौर यानी 1980 के वक्त की यूपी की राजनीति को याद करना होगा। उस समय वहाँ जनता पार्टी की सरकार थी और मुख्यमंत्री बनारसी दास हुआ करते थे।

कुशीनगर जनपद, देवरिया जिले का हिस्सा था और यहीं नारायणपुर गाँव में बसकाली नाम की एक स्त्री अपने 8 साल के पोते जयप्रकाश और 6 साल की पोती सोनकलिया के साथ रहती थी। इन बच्चों के पिता की मृत्यु हो चुकी थी और इनकी माता बच्चों को दादी के पास छोड़कर जा चुकी थी।

जैसे-तैसे गरीबी में जीवनयापन करते इस परिवार का दुर्भाग्य ने अभी पीछा नहीं छोड़ा था। एक दिन बस से कुचले जाने से बसकाली की मौत हो गई और दोनों बच्चे अनाथ रह गए। ग्रामीणों ने जब परिवार की ऐसी दुर्दशा देखी तो कम से कम सरकार से कुछ मुआवजा ही मिल जाए, इस माँग के साथ हाटा-कप्तानपुर मार्ग को जाम करके बैठ गए। 

जाम हटवाने के लिए ग्रामीणों पर लाठी चार्ज हुआ और गाँव में पीएससी तैनात कर दी गई। कॉन्ग्रेस के लिए ये अच्छा अवसर था। ग्रामीणों पर हुई बर्बरता के लिए अख़बारों के पन्ने रंगे जाने लगे। नारायणपुर काण्ड के नाम से विख्यात हुई ये घटना चुनावी मुद्दा बन गई। इसके असर से बनारसी दास की सरकार 17 फ़रवरी 1980 को बर्खास्त कर दी गई। इसी हलचल के दौरान इंदिरा गाँधी नारायणपुर पहुँच गई। 

ग्रामीणों को सांत्वना देते हुए उन्होंने वादा किया कि अनाथ हो चुके बच्चों को वो गोद लेंगी और उनकी शिक्षा इत्यादि का इंतजाम किया जाएगा। खूब तालियाँ बजीं। कुल 113 दिनों के राष्ट्रपति शासन के बाद राज्य में कॉन्ग्रेस की सरकार बनी और राजा मांडा, यानी वीपी सिंह मुख्यमंत्री हुए। बोफोर्स घोटालों का आरोप राजीव गाँधी पर लगाने से पहले वो कॉन्ग्रेसी ही थे।

सरकार बनने के बाद कॉन्ग्रेसी सरकार बहादुर को वादे कहाँ याद रहते? इंदिरा गाँधी भी अपना वादा भूल गई। अनाथ बच्चे जैसे-तैसे पलते रहे। उनकी जमीनें लोगों ने हथिया ली। थोड़े साल बाद दोनों बच्चों में से एक जयप्रकाश की डूबने से मौत हो गई।

सोनकलिया अभी भी जीवित है। वो अपने परिवार के साथ एक झोपड़े में, गरीबी में ही जीवन बिताती है। इंदिरा गाँधी या उसके बाद के कॉन्ग्रेसी नेताओं में से किसी ने जीतने के बाद उसे मुआवजा दिलवाने या उसकी कोई मदद करना जरूरी नहीं समझा। गिद्धों के झुण्ड की तरह वो लाश नोंचने के बाद अगले शिकार की तलाश में उड़ चुके थे।

हाल का हाथरस कांड देखकर भी नेताओं के वादे और उनका टूटना याद आता है। जनभावनाओं को सुलगाने और दूसरी सभी ऐसी घटनाएँ (जिनमें से कुछ तो कॉन्ग्रेस शासित राज्यों में हुई हैं) उन्हें भुलाकर, किसी एक घटना को राष्ट्रीय स्तर की बहस और विपक्ष की सरकार द्वारा जनता का शोषण बताना कॉन्ग्रेस की पुरानी परंपरा रही है। बाकी उनके किए वादे कितनी जल्दी टूटते हैं, ये तो बिहार चुनावों के बीतने तक दिख ही जाएगा!

₹100 करोड़ की फंडिंग, जातीय दंगों की साजिश: हाथरस के बहाने योगी सरकार को बदनाम करने की बड़ी साजिश का खुलासा

हाथरस मामले में योगी सरकार को भेजी गई खुफिया जाँच रिपोर्ट में कई चौंकाने वाले खुलासे सामने आए हैं। जाँच एजेंसियों को योगी सरकार के खिलाफ खतरनाक साजिश के अहम सुराग मिले हैं। हाथरस के बहाने योगी सरकार को बदनाम करने के लिए बड़ी साजिश रचने की बात सामने आ रही है। मामले में उत्तर प्रदेश सरकार ने रविवार (अक्टूबर 4, 2020) को आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत FIR दर्ज की है।

खुफिया रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में सांप्रदायिक दंगे भड़काने की साजिश भी रची गई थी। इसके लिए बकायदा फंडिंग की बात भी सामने आई है। यूपी सरकार को भेजी गई खुफिया रिपोर्ट में कहा गया है कि चूँकि पीड़िता दलित थी, इसलिए हाथरस के बहाने उत्तर प्रदेश में जातीय और सांप्रदायिक उन्माद पैदा करने की कोशिश की जा रही है।

दंगे भड़काने के लिए अफवाहों और फर्जी सूचनाओं का सहारा लिया जा रहा। साजिश में पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI), सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) और सरकार के निशाने पर रहे माफियाओं की मिलीभगत के ठोस सबूत मिले हैं। प्रदेश में अराजकता पैदा करने के लिए बड़े पैमाने पर फंडिंग की बात भी सामने आ रही है। इस रिपोर्ट में योगी सरकार को बदनाम करने के लिए 100 करोड़ रुपए की फंडिंग की बात भी सामने आ रही है।

बताया जा रहा है कि पीड़ित लड़की की जीभ काटे जाने, अंग-भंग करने और गैंगरेप से जुड़ी तमाम अफवाहें उड़ा कर नफरत की आग भड़काने की कोशिश की गई। वहीं अफवाह फैलाने के लिए ढेरों वेरिफाइड सोशल मीडिया अकाउंट का भी इस्तेमाल किया गया। जाँच एजेसियाँ वेरिफाइड अकाउंट्स का ब्योरा तैयार करने में जुटी हैं।

बताया गया कि हाथरस साजिश में CAA को लेकर हुए उपद्रव में शामिल रहे संगठनों की भूमिका के भी सबूत मिले हैं। उपद्रवियों के पोस्टर लगाए जाने, उपद्रवियों से वसूली कराए जाने और घरों की कुर्की कराने जाने की सीएम योगी की कार्रवाइयों से परेशान तत्वों ने बड़ी साजिश रची। इस दौरान कथित गैंगरेप पीड़ित लड़की से जुड़ी तमाम अफवाहें उड़ा कर मामले को तूल दिया गया।

इसके साथ ही हाथरस के पीड़ित परिवार को सरकार के खिलाफ भड़काने की साजिश का भी पर्दाफाश हुआ है, जिसके सबूत के तौर पर कई ऑडियो टेप पुलिस के हाथ लगे है। जाँच एजेंसियों ने ऑडियो टेप का संज्ञान लेकर जाँच शुरू कर दी है। ऑडियो टेप में कुछ राजनीतिक दलों के साथ ही कुछ पत्रकारों की भी आवाज शामिल है। इन ऑडियो टेप से पीड़ित परिवारों को सरकार के खिलाफ भड़काने के लिए 50 लाख से लेकर एक करोड़ रुपए तक का लालच दिया गया।

ऑडियो टेप से खुलासा हुआ है कि सीएम से पीड़ित परिवार की बातचीत के तुरंत बाद एक महिला पत्रकार ने उन्हें भड़काया। उन्होंने कथित तौर पर कहा कि अगर सीएम की बात मान ली तो पुलिस म्हें ही अपराधी साबित कर देगी। इस बातचीत के बाद परिवार दहशत में आ गई।

ऑडियो टेप की फोरेंसिक जाँच रिपोर्ट आते ही भड़काने वालों का पॉलीग्राफ और नार्को की तैयारी में जाँच एजेंसियाँ जुटी हैं। पीड़ित परिवार द्वारा नार्को और पॉलीग्राफ टेस्ट और सीबीआई जाँच से मना करने पर रिपोर्ट में सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि आरोपित पक्ष हर तरह की जाँच के लिए तैयार है।

राजस्थान: 6 दिन में अगवा नाबालिग का सुराग नहीं लगा पाई पुलिस, गुलफाम और उसके साथियों पर आरोप

राजस्थान के धौलपुर जिले के बाड़ी उप खंड में 17 वर्षीय नाबालिग लड़की के अपहरण का मामला सामने आया है। बीते 6 दिनों से लड़की घर से लापता है। परिजन लगातार पुलिस थाने के चक्कर काट रहे है। फिलहाल पुलिस को अभी तक मामले में किसी भी प्रकार का सबूत नहीं मिला है। वहीं स्थानीय नागरिकों का कहना है कि गुलफाम, अलीम, सिराज और रिजवान द्वारा पीड़िता का अपहरण किया गया है।

एनबीटी की रिपोर्ट के अनुसार, 26-27 सितंबर की देर रात बाड़ी निवासी 17 वर्षीय नाबालिग का अपहरण कर लिया गया। परिजनों का आरोप है कि 4 युवक बहला-फुसलाकर उसे उठा ले गए। परिजनों ने पुत्री की जान खतरे में बताते हुए कहा कि बेटी को लापता हुए 6 दिन बीत गए हैं, लेकिन अभी तक पुलिस ने मामले में कोई सख्त कदम नहीं उठाया है।

पीड़ित परिवार के अनुसार 26 सितंबर को लड़की घर पर ही थी। लेकिन सुबह जब परिजनों ने आँखें खोली तब वह घर से लापता थी। परिवारवालों ने उसे खोजने की बहुत कोशिश की लेकिन जब वह नहीं मिली तब उन्होंने थाने जा कर तहरीर दी। परिजनों ने बताया कि पास में रहने वाले लोगों ने उन्हें जानकारी दी है कि उन्होंने गुलफाम, अलीम, सिराज और रिजवान के साथ सुबह उनकी बेटी को देखा था। बताया गया है कि सभी लोग बाइकों पर सवार थे ।

वहीं पुलिस ने पीड़ित परिजनों की शिकायत पर आरोपितों के खिलाफ आईपीसी की धारा 363, 366 व 17-18 पोक्सो एक्ट में मामला दर्ज कर किया है। लेकिन आज 6 दिन बाद भी पुलिस आरोपितों के ठिकानों तक नहीं पहुँच पाई है और ना ही उनके हाथ नाबालिग का कोई सुराग लगा है।

गौरतलब है कि इसी तरह का एक मामला राजस्थान के भरतपुर जिले के कैथवाड़ा थाना क्षेत्र से 2 दिन पहले आया था। जहाँ एक 8 वर्षीय नाबालिग बच्ची का अपहरण कर उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया था। पुलिस ने मामले में आरोपित सुबेदीन उर्फ इन्नस पुत्र काला खां को गिरफ्तार किया था।

इसके अलावा हाल ही में राजस्थान के बारां (Baran) जिले में दो नाबालिग लड़कियों से गैंगरेप का मामला सामने आया था। रिपोर्ट के अनुसार, आरोपितों ने पहले बारां से दो नाबालिग लड़कियों का अपहरण किया। अपहरण के बाद आरोपित दोनों लड़कियों को कोटा, जयपुर और अजमेर ले गए। कथिततौर पर तीन दिनों तक उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया।

बिहार: जिसने कहा टिकट के बदले तेजस्वी यादव ने माँगे ₹50 लाख, उस RJD नेता की गोली मारकर हत्या

बिहार के पूर्णिया में रविवार (अक्टूबर 4, 2020) को राजद नेता शक्ति मलिक की गोली मारकर हत्या कर दी गई। शक्ति मलिक वही नेता हैं, जिन्होंने कुछ दिन पहले तेजस्वी यादव पर टिकट के बदले 50 लाख रुपए माँगने और जातिसूचक टिप्पणी करने का आरोप लगाया था। वह आरजेडी के अनुसूचित जाति और जनजाति प्रकोष्ठ के प्रदेश सचिव थे।

डीएसपी आनंद पांडे ने बताया कि आज सुबह शक्ति मलिक के निवास पर तीन लोगों ने उनकी गोली मारकर हत्या कर दी। मामला दर्ज कर लिया गया है और आगे की जाँच चल रही है। 

शक्ति मलिक ने तेजस्वी यादव पर जातिसूचक टिप्पणी करने का आरोप भी लगाया था। शक्ति मलिक का नेता प्रतिपक्ष पर आरोपों के बाद वीडियो वायरल हुआ था। वीडियो में वो तेजस्वी यादव पर कई गंभीर आरोप लगाते हुए दिखाई दिए थे।

शक्ति मलिक ने आरोप लगाया था कि जब वो अपने प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष अनिल साधु के साथ तेजस्वी यादव से मिलने पहुँचे तो उन्होंने पहले तो रकम की माँग की और जब कहा कि विचार करेंगे तब उन्हें जातिसूचक गाली देकर कहा कि तुमको विधानसभा नहीं जाने देंगे और वहाँ से भगा दिया।

वीडियो में आरोप लगाते हुए शक्ति मलिक ने कहा था कि पार्टी में टिकट की माँग करने पर तेजस्वी यादव ने 50 लाख रुपए चंदा माँगा था और जब कहा कि ठीक है सोच कर बताते हैं, तब उन्हें जातिसूचक गाली देकर भगा दिया।

शक्ति मलिक की पत्नी और परिजनों ने नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव और अनिल साधु पर हत्या करवाने का आरोप लगाया गया है। इसके अलावा उन्होंने अररिया के राजद नेता कालो पासवान और सुनीता देवी पर भी शक जताया है।

घटना की सूचना मिलते ही सदर एसडीपीओ आनन्द कुमार पांडेय सदर अस्पताल पहुँचे। उन्होंने शक्ति के परिजन से बात की। परिजनों ने घटना के संबंध में बात करते हुए सीधे तौर पर तेजस्वी यादव और अनिल साधु का नाम लिया है। परिजनों का आरोप है कि शक्ति को जान से मारने की धमकी दी जा रही थी।

बता दें कि बिहार में जब से विधानसभा चुनाव का ऐलान हुआ तब से हत्या की यह कोई पहली वारदात नहीं है। कुछ दिनों पहले भारतीय जनता पार्टी के उपाध्यक्ष राजेश कुमार झा उर्फ राजा बाबू की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। राजेश कुमार झा की पटना में हत्या हुई थी। वह बेउर थाना क्षेत्र के अंतर्गत तेज प्रताप नगर में अपने घर के नज़दीक टहलने के लिए निकले थे, तभी दो पहिया वाहन सवार नकाबपोश अपराधी उनके नज़दीक आए और उनकी कनपटी पर गोली मार दी। 

हाथरस केस: सपा और RLD के कार्यकर्ताओं ने महिला पुलिसकर्मियों से बदसलूकी की, UP पुलिस ने खदेड़ा

उत्तर प्रदेश के हाथरस केस में राजनीतिक सरगर्मी बढ़ती जा रही है। आज (सितंबर 4, 2020) सुबह सबसे पहले एसआईटी की टीम मृतका के घर फिर से पहुँची। पिता के बयान दर्ज किए। मृतका के परिजनों से मिलने के लिए नेताओं का आना जारी है। पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी और पार्टी महासचिव प्रियंका गाँधी शनिवार (सितंबर 3, 2020) को मृतका के परिवार से मिलने के लिए बुलगढ़ी गाँव पहुँचे थे। 

रविवार को समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल (RLD) के नेता पहुँचे। इस दौरान समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल कार्यकर्ताओं का पुलिस के साथ टकराव हो गया। बताया जा रहा है कि नारेबाजी कर रहे सपा कार्यकर्ताओं पर पुलिस ने लाठियाँ भाँजी।

हाथरस सदर के एसडीएम प्रेम प्रकाश मीणा ने लाठीचार्ज के बारे में बताते हुए कहा, “गाँव में अभी 5 से अधिक लोगों के प्रतिनिधिमंडल को जाने की इजाजत नहीं है। हमें समाजवादी पार्टी और RLD के 5 लोगों के नाम मिले थे। हमने उन्हें जाने की इजाजत दे दी। तभी उनके कार्यकर्ताओं ने महिला पुलिसकर्मियों के साथ दुर्व्यवहार करना शुरू कर दिया और बैरिकेडिंग तोड़ डाली। पत्थरबाजी भी की गई। हमारे एक CO घायल हुए हैं। भीड़ को नियंत्रण में लेने के लिए हमें लाठीचार्ज करना पड़ा। अभी हालात सामान्य हैं।”

बताया जा रहा है कि काफी संख्या में पहुँचे कार्यकर्ताओं ने हंगामा शुरू कर दिया और बैरिकेडिंग तोड़ दी। इसके बाद पुलिस ने दौड़ाकर लाठियाँ भाँजनी शुरू कर दी। गौरतलब है कि एक दिन पहले ही कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी ने भारी हंगामे के बीच पीड़ित परिजन से मुलाकात की।

रविवार दोपहर को समाजवादी पार्टी के नेता धर्मेंद्र यादव, अक्षय यादव, सपा विधायक संजय लठार और जयवीर ने पीड़िता के परिवार से मुलाकात की। मामले में पुलिस और प्रशासन की लापरवाही के खिलाफ सपा कार्यकर्ताओं ने इस दौरान यूपी सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। पुलिस ने कार्यकर्ताओं को हटाने के लिए बल का प्रयोग करते हुए लाठीचार्ज किया। 

गौरतलब है कि इससे पहले हाथरस मामले पर विवादित बयान देते हुए कॉन्ग्रेस नेता निजाम मलिक ने कहा था कि जो व्यक्ति आरोपितों का सिर कलम करेगा, उसे उनका समुदाय 1 करोड़ रुपए का इनाम देगा। इस बयान के चर्चा में आने के बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर कॉन्ग्रेस नेता को गिरफ्तार कर लिया।

बयान देते हुए निजाम मलिक ने कहा था, “जिन दरिंदों ने बलात्कार किया है, मैं अपने समाज और खुद की तरफ से माँग करता हूँ कि उन्हें फाँसी की सज़ा होनी चाहिए। जो लोग उन अपराधियों का सिर काट कर लाएँगे उन्हें हमारा समाज 1 करोड़ रुपए का इनाम देगा।”

अदम्य साहसी नागा रेजिमेंट Vs चीन के बहकावे वाला NSCN-IM: स्थानीय करेंगे 3000 हिंसक समर्थकों की चाल बेकार

लम्बे समय से भारत सरकार के समक्ष नागालैंड के स्वयम्भू प्रतिनिधित्व का दावा करने वाले नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ़ नागालैंड (NSCN-IM) को किसी भी तरह से नागालैंड का एक मात्र प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता। NSCN-IM वस्तुतः विदेशी शक्ति द्वारा नियंत्रित एक ऐसा संगठन है, जिसमें सभी नागाओं के स्थान पर तांगखुल नागाओं को विशेष प्रभावकारी महत्व दिया गया है।

समस्त नागा जनसमूह का प्रतिनिधित्व करने का छद्म दावा करने वाला यह तांगखुल समूह मुख्यतः मणिपुर की पहाड़ियों तक सीमित है और मणिपुर के अंदर भी इनका प्रभाव केवल सेनापति, उखरुल, चंदेल और तमेंगलोंग चार जिलों तक ही सीमित है।

1966 से ही नागालैंड के पृथकतावादी नेतृत्व और चीन के मध्य स्थित दुरभि-संधि के साक्ष्य देखने को मिलते हैं। मुइवाह के नेतृत्व काल से ही चीन के दक्षिण-पश्चिम स्थित युन्नान प्रान्त में नागा अलगाववादियों को शुरू से ही प्रशिक्षण दिया जाता रहा है।

NSCN-IM के शीर्ष नेतृत्व की चीन की तीन से अधिक यात्राओं के उदाहरण किसी से छुपे नहीं हैं। चीन की बद्लिंग की दीवार पर खिंची गई, इनकी छवि आज भी चीन के साथ इनके प्रगाढ़ संबंधों को स्पष्ट करती है।

चीन आरंभ से ही अलगाववादी नागा गुटों का प्रणेता रहा है। चीन पाकिस्तान के विपरीत, जो जम्मू कश्मीर के अलगाववादियों को प्रत्यक्ष सहायता देता है, पिछले पाँच दशकों से पूर्वोत्तर भारत में, भारत के विरुद्ध पूर्वोत्तर स्थित विभिन्न जन समूहों के मध्य असंतोष को षड्यंत्रकारी रूप से उभार कर, भारत में अव्यवस्था उत्पन्न करने की रणनीति पर कार्य कर रहा है। इस सन्दर्भ में असम, मणिपुर और नागालैंड सदैव से उसके प्रिय लक्ष्य रहे हैं।

भारत के पूर्वोत्तर के अलगाववादी गुट उपरी म्यांमार के प्राचीन पारम्परिक व्यापारी मार्ग का उपयोग चीन तक जाने के लिए करते रहे हैं। अपनी विस्तारवादी नीति का अनुसरण करने के लिए चीन किसी भी सीमा तक जा सकता है। इसका उदाहरण म्यांमार के सन्दर्भ में देखने को मिलता है।

लम्बे समय तक म्यांमार के संसाधनों का दोहन करने के बाद भी चीन, म्यांमार के इस क्षेत्र में दक्षिण कोरिया और भारत के प्रभाव को नियंत्रित करने के उद्देश्य से, अराकान आर्मी जैसे पृथकतावादी समूह को तकनीकी और सैन्य सहायता प्रदान करने की दुर्नीति पर अग्रसर है। चीन ने NSCN-IM की स्थापना के साथ ही उसे सैन्य रूप से सुसज्जित करने में सक्रिय रूप से सहायता की।

चाइना ऑर्डिनेंस इंडस्ट्रीज ग्रुप कॉर्पोरेशन लिमिटेड द्वारा नागालैंड के इस चरमपंथी अलगाववादी समूह को नियमित रूप से पिछली शताब्दी के सातवें दशक से ही मशीन-गन, मोर्टार और अन्य स्वचालित शास्त्रों की आपूर्ति की जाती रही है।

आज भी चीन द्वारा इस समूह को हथियारों की आपूर्ति की सूचना है। इस समूह के अनेक नेताओं और कैडरों को चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी के पश्चिमी कमान द्वारा हथियारों की आपूर्ति के साथ-साथ चीन में सुरक्षित आश्रय और गुप्त सैन्य प्रशिक्षण दिए जाने की पुष्ट सूचना है।

1980 में नागा नेशनल काउंसिल से अलग होने साथ साथ मुइवाह ने अपने नए संगठन का नामकरण नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ़ नागालैंड किया। इस नाम में सोशलिस्ट प्रत्यय के संयोजन के परोक्ष भी चीन का प्रभाव स्पष्ट है।

चीन का NSCN-IM पर प्रभाव केवल नामकरण में परिवर्तन तक ही सीमित नहीं है, वरना इसके कई और भी आयाम परिलक्षित किए जा सकते हैं। चीन की सरकार के “सत्ता की बागडोर बन्दूक की नली से निकलती है” के आदर्श वाक्य को इस समूह की कार्यप्रणाली में स्पष्टतः अनुभव किया जा सकता है।

NSCN-IM सदैव से हिंसा के बल पर जनप्रतिनिधित्व का छद्म-दावा करने वाला संगठन रहा है। अपने प्रभाव की स्थापना के लिए इस संगठन द्वारा टी सखरी और डॉ इम्कोंग्लिबा आओ जैसे शांतिप्रिय नागा नेताओं की हत्या करवाए जाने के दृष्टान्त किसी से छुपे नहीं हैं।

इस संगठन द्वारा कुग्हतो सुखाई, कैटो सुखाई और स्काटो स्वू जैसे नेताओं को नागा वार्ता-परिदृश्य से बलपूर्वक बाहर किए जाने के उदाहरण भी हैं। यह समूह चीन की किसी भी विषय के शांतिप्रिय समाधान को होने न देने की रणनीति का अनुसरण करता है। यह इसी रणनीति का परिणाम है कि वह आज भारत सरकार को हिंसा के नए दौर का आरंभ होने की गीदड़-भभकी दे रहा है।

भारतीय सन्दर्भ में विदेशी दखलंदाजी को कई घटनाओं द्वारा और सहजता से समझा जा सकता है। फरवरी 2000 में NSCN-IM के शीर्ष नेता को बैंकॉक हवाई अड्डे पर कोरिया के फर्जी पासपोर्ट पर यात्रा करते हुए पकड़ा गया। इस सन्दर्भ में यह देखने को मिला कि इस नेता द्वारा इस यात्रा का आरंभिक बिंदु पाकिस्तान स्थित कराची था। जनवरी 2011 में वांग किंग नामक एक चीनी टीवी पत्रकार को जासूसी के आरोप में दीमापुर से गिरफ्तार किया गया।

विस्तृत जाँच के बाद यह तथ्य सामने आया कि इस पत्रकार का सम्बन्ध चीन की पीपल्स सिक्यूरिटी ब्यूरो से था और उसने नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ़ नागालैंड के मुख्यालय में बंद कमरे में चार घंटे से भी अधिक तक गुप्त वार्ता की। NSCN-IM के शीर्ष नेता शिम्राई ने स्वयं माना है कि उन्हें गुट के शीर्षस्थ नेता ने खोलोसे स्वू सुमी को चीन में सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ़ नागालैंड के स्थाई प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त करने के लिए पत्र लिखने का आदेश दिया था।

इधर लद्दाख क्षेत्र में भारत-चीन सीमा विवाद के बढ़ने के बाद NSCN-IM ने एक अलग प्रकार का हठधर्मी रूख अपना लिया है। इस गुट का मुखिया अन्थोनी शिम्राई, हेब्रोन स्थित मुख्यालय से लापता है और यह सूचना है कि वह भारत-म्यांमार सीमा पर 3000 समर्थकों के साथ चीन के प्रभाव में पुनः हिंसक गतिविधियों को आरंभ करने के आदेश की प्रतीक्षा कर रहा है। अरुणाचल प्रदेश के भारत-म्यांमार सीमावर्ती, लॉन्गडिंग जिले में छः नागा चरमपंथियों का मारा जाना भी इसी ओर संकेत करता है।

NSCN-IM के बृहद नगालिम की कल्पना में अरुणाचल प्रदेश के तिराप ,चांगलांग तथा लोंगडिंग जिले हैं। भारत का एक राज्य ,अरुणाचल प्रदेश जिसे चीन विवादित मानता है और इसके उस पार चीनी सेना का सघन जमावड़ा है। किसी भी प्रकार के प्रत्यक्ष संघर्ष में न जाकर, अन्तरराष्ट्रीय सन्दर्भ में पाकिस्तान और आतंरिक सन्दर्भ में पूर्वोत्तर भारत के अलगाववादियों को सैन्य समर्थन देना, चीन की सुपरिचित नीति रही है, जिसमें चीन के अपने जान-माल का कम से कम नुकसान होता है।

नागालैंड के निवासियों ने NSCN-IM की चीन के साथ गुप्त-संधि और हिंसा के दुष्प्रभावों को समझा है और वे भारत सरकार के साथ शांति समझौते के होने की तन्मयता से प्रतीक्षा कर रहे हैं। नागालैंड स्थित सभी गुटों में भारत सरकार के प्रति विश्वास और आशा की भावना जगी है।

इन गुटों में विभिन्न समूह हैं, उदाहरणस्वरूप, नागा नेशनल पॉलिटिकल ग्रुप (एनएनपीजी), ये 7 सशस्त्र गुटों का समूह है, जो भारत सरकार के साथ संधि कर चुके हैं। दूसरा गुट नागालैंड गाँव बूढ़ा फेडरेशन है, जो 1585 गाँवों के गाँव बुढ़ाओं का संघटन है, जिसके सदस्य नागालैंड के गाँवों के मुखिया हैं। ये NSCN-IM द्वारा अपने किसी भी विरोध को नागा विरोधी घोषित करने और इसकी आड़ में हिंसा को बढ़ावा देने की चिरपरिचित शैली का खुल कर विरोध कर रहे हैं।

तीसरा गुट नागालैंड के 14 जनजातियों की शीर्षस्थ संस्था (होहो) है। चौथा गुट नागा ट्राइबल काउंसिल है। इसी एकता को देखते हुए ही, NSCN-IM ने अलग संविधान और ध्वज जैसी रूढ़िवादी माँगों के प्रति दुराग्रह दिखाना शुरू कर दिया है, जिसे वह पहले छोड़ चुका था।

यह गुट संप्रभुता के जिस विषय से भारत सरकार के हट जाने की बात करता है, वह भारत के संविधान में अन्तर्निहित संघवाद में पहले से ही उपस्थित है। इस गुट का यह कहना कि नागालैंड की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान रही है, तथ्यों से मेल नहीं खाता।

गुट का यह कहना कि वह भारत के साथ मिलकर तो रहेगा लेकिन विलय पर एकमत नहीं होगा, वार्ता के प्रति उनकी दुर्भावना और उनके द्वारा उत्तरदायित्व से पलायन करने के अतिरिक्त कुछ नहीं है। चीन के प्रोत्साहन से नागा शांति वार्ता को अपने आयाम तक न पहुँचने देने के पीछे इस गुट के अपने निहितार्थ हैं।

इस क्षेत्र में भारी फिरौती की वसूली, नागा समाज में अपना वर्चस्व, विदेश यात्राएँ और महानगरों में उपलब्ध महँगी संपत्तियों की सहज उपलब्धता का लोभ और चीनी प्रश्रय, इस गुट को शांति-वार्ता के मार्ग में अवरोध को प्रेरित करने के लिए बाध्य कर रहा है।

आज चीन के उकसावे में, एक अलग झंडे और संविधान की आड़ में वार्ता को भंग करने की इस संगठन की मंशा का पूरे नागालैंड में विरोध हो रहा है। NSCN-IM की जबरदस्ती उगाही और अन्य अवैध गतिविधियों पर लगाई गई रोक और संगठन के एकमात्र स्वयंभू होने के दावे को नागालैंड में चुनौती मिल रही है।

नागालैंड के निवासियों का अलगाववाद में कभी विश्वास नहीं था, इसके साक्ष्य हमें काफी पहले से मिलते हैं। नागा नेशनल काउंसिल (एनएनसी) के सचिव द्वारा 4 दिसंबर 1948 को तत्कालीन प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में माँग की गई थी कि नागा हिल जिले को केंद्रीय प्रशासित प्रदेश घोषित किया जाए तथा इसे नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर एरिया नेफा के नाम से जाना जाए।

भारत की स्वाधीनता के ठीक बाद 1948 में लन्दन ओलंपिक खेल में भारत के धवज को थामने का श्रेय डॉ टालिमेरेन आओ को जाता है, जिन्होंने इस स्पर्धा में भारतीय फुटबाल प्रतिस्पर्धा में भारतीय टीम की कप्तानी भी की थी।

फिजो द्वारा सशस्त्र आतंकवाद का विरोध करने वाले नागा समाज के प्रबुद्ध लोगों ने ही नागा पीपल्स कन्वेंशन (एनपीसी) के द्वारा अपने अथक परिश्रम से वर्त्तमान नागालैंड राज्य की संरचना की है। कुछ शांतिप्रिय नागा नेताओं को अपनी जान भी गँवानी पड़ी।

नागालैंड के बारे में NSCN-IM ने, चीन जैसी विदेशी शक्तियों के साथ मिलकर नागालैंड के निवासियों की मिथ्या रूप से हिंसक छवि बनाने में सक्रिय योगदान दिया है। यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि नागालैंड के निवासियों का भारतीय लोकतंत्र में गहरा विश्वास है। यही कारण है कि 2014 के आम चुनावों में इस राज्य का मत प्रतिशत 87.82% था, जो देश में किए गए सर्वाधिक मतदान में से एक था।

नागालैंड के ही लोकप्रिय नेता तथा पूर्व मुख्यमंत्री एससी ज़मीर (एनपीसी) के सचिव रहे हैं। वो विभिन्न मंत्रिपदों पर रहते हुए चार अलग-अलग प्रान्तों के राज्यपाल रहे। भारत सरकार ने भी उनके योगदान को देखते हुए उन्हें 2020 में भारत के तृतीय सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म-भूषण से सम्मानित किया। अपने उल्लेखनीय योगदान के लिए नागालैंड के एक अन्य स्वतंत्रता सेनानी को पद्मभूषण तथा 10 प्रबुद्ध जनों को भी भारत के चतुर्थ सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया जा चुका है।

आज अनेक नागा युवक भारतीय सिविल सेवा में अपना सक्रिय और उल्लेखनीय योगदान दे रहे हैं। गत दिनों संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को उनके देश के पिछले सात दशकों से आतंकवाद, जनसंहार, धार्मिक कट्टरपंथ और परमाणु तस्करी का स्मरण दिलाने का श्रेय मिजिटो विनिटो (स्थाई मिशन में प्रथम सचिव) नाम के जिस भारतीय राजनयिक को जाता है, वह नागालैंड के सुमि जनजाति से हैं।

कारगिल युद्ध में अदम्य साहस और शौर्य के लिए नागा रेजिमेंट पूरे देश में आदर से जानी जाती है। अपनी स्थापना के बाद से इसे 1 महावीर चक्र, 8 वीर चक्र, 6 शौर्य चक्र, 1 युद्ध सेवा पदक, 1 विश्व सेवा पदक और 48 सेना पदकों से सम्मानित किया जा चुका है।

आज अधिकाधिक नागावासियों को इस बात का आभास है कि उन्हें भारत के अन्य हिस्सों में रहने वाले अपने नागरिक भाइयों के साथ संवाद और सम्बन्ध स्थापित करने की आवश्यकता है। वे मानते हैं कि किसी भी तरह की हिंसा के परित्याग द्वारा ही इस क्षेत्र का सर्वंगीण विकास संभव है।

आज नागालैंड के निवासियों में निश्चित ही यह भावना बलवती हुई है कि भारत सरकार और उनके मध्य विश्वास और सहयोग को बनाकर ही इस क्षेत्र का समन्वित विकास किया जा सकता है। इस के साथ ही वे अपने देश के विकास और प्रगति में भी अपना योगदान देना चाहते हैं।

आज साधारण नागा यह मानता है कि किसी एक गुट के स्थान पर सभी नागाओं को अपनी बात कहने का समान रूप से अधिकार है। अब यह NSCN-IM जैसे गुट पर निर्भर है कि वह चीन जैसे विस्तारवादी राष्ट्र के हाथों में खेले या फिर पूर्ण नागा जनमानस की अपेक्षाओं के अनुरूप नागा शांति वार्ता को साकार करने में अपना उल्लेखनीय योगदान दे।

(लेखिका दीपिका सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनैतिक शास्त्र की सह अध्यापक हैं तथा सेंटर फॉर नॉर्थ ईस्ट स्टडीज से जुड़ी हुई हैं)

बलरामपुर गैंगरेप: गाल, छाती, जाँघ, कोहनी, घुटना… हैवानियत के वक्त दरिंदों ने हर जगह दिए निशान

हाथरस केस की मीडिया से लेकर राजनीति के गलियारों तक खूब चर्चा है। लेकिन उत्तर प्रदेश के ही बलरामपुर में दलित छात्रा के साथ गैंगरेप के मामले को लेकर वैसा आक्रोश नहीं दिख रहा है। बलरामपुर के गैसड़ी थाना स्थित मझौली गाँव में जिस तरह से दलित छात्रा के साथ गैंगरेप हुआ और फिर उसकी मौत हुई, वह राष्ट्रीय मीडिया में चर्चा का विषय नहीं बन पाई।

इस मामले में शाहिद और साहिल की गिरफ्तारी हो चुकी है। हैवानियत के वक्त छात्रा के साथ किस तरह दरिंदगी की गई उसका पता पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से चलता है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में गैंगरेप की शिकार छात्रा के शरीर पर चोट के 10 निशान मिलने की बात कही गई है। गाल, छाती, जाँघ, कोहनी और घुटने पर निशान मिले हैं।

हाथरस को लेकर चल रहे हंगामे के बीच बलरामपुर की घटना को लेकर उतनी चर्चा न होने से इस मामले में न्याय की माँग कमजोर न हो जाए, ऐसा कई लोगों को डर है। ये घटना मंगलवार (सितम्बर 29, 2020) की है। 22 वर्षीय पीड़िता लक्ष्मी (बदला हुआ नाम) के परिवार के सभी लोग शिल्पकार का कार्य करते हैं। ये लोग देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ बनाने के साथ-साथ पत्थर के सिलबट्टे इत्यादि बनाते थे।

उत्तर प्रदेश में शिल्पकार वर्ग एससी-एसटी समुदाय के अंदर आता है। कुछ स्थानीय लोगों ने पीड़िता के नाबालिग होने की बात भी कही है। हमने इस पूरे मामले की जानकारी के लिए बजरंग दल के अवध प्रान्त सह-संयोजक महेश तिवारी से बातचीत की, जिन्होंने बताया कि कॉलेज से लौटने के दौरान ही छात्रा का अपहरण कर लिया गया और उनमें से एक के कमरे पर पीड़िता को ले जाया गया।

वहाँ गैंगरेप के बाद जब पीड़िता की हालत बिगड़ने लगी तो आरोपितों ने एक डॉक्टर को बुला कर उसका इलाज कराना चाहा, लेकिन उसकी स्थिति देख कर डॉक्टर ने इलाज करने से इनकार कर दिया। महेश तिवारी ने बताया, “एक स्थानीय मेडिकल प्रैक्टिशनर को बुला कर पीड़िता के इलाज के लिए लाया गया। उसने देखा कि कमरे में कोई महिला नहीं है जो पीड़िता पर ध्यान दे सके, तो उसे वहाँ की गतिविधियाँ संदिग्ध लगीं।

इसके बाद किसी अन्य डॉक्टर को बुला कर पीड़िता के इलाज की कोशिश की गई। इस दौरान पीड़िता को इंजेक्शन भी लगाया गया था, जिसके बारे में साफ़ नहीं था कि ये डॉक्टर ने लगाया या फिर आरोपितों ने। महेश तिवारी ने बताया, “पीड़िता को कुछ ऐसा रसायन इंजेक्ट कर दिया गया कि उसका नीचे का पूरा शरीर ही सुन्न हो गया और वो चलने-फिरने में अक्षम हो गई। फिर उसे ई-रिक्शा पर बिठा कर घर भेज दिया गया।

आरोपितों ने ही ई-रिक्शा की व्यवस्था कर पीड़िता को उसके घर भेजा। चूँकि उसके शरीर का निचला हिस्सा काम नहीं कर रहा था, इसीलिए उसके घर पर पहुँचने पर परिजनों ने ही उसे उतारा। इसके बाद पीड़िता के पिता की तरफ से थाने में तहरीर दी गई, जिसेक आधार पर एफआईआर दर्ज हुई। तत्पश्चात शाहिद और साहिल नामक दो आरोपितों को गिरफ्तार किया गया, जिसकी पुष्टि पुलिस ने भी की है।

मृतका का निवास स्थान गैसड़ी थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले मझौली गाँव में पड़ता है। मृतका के पिता हनुमान शिल्पकार (बदला हुआ नाम) पत्थरों से शिल्पकारी व संरचनाएँ बनाने का कार्य करते हैं। महेश तिवारी ने बताया कि उनके संगठन के कई कार्यकर्ताओं ने भी पीड़ित परिवार से मिल कर उनका हाल जाना है और साथ ही उनका दुःख बाँटा।

बजरंग दल के जिला संयोजक चन्दन मिश्र ने बताया कि उन्होंने परिजनों से संपर्क किया, जिन्होंने बताया कि उक्त छात्रा ‘विमला विक्रम विद्यालय’ में पढ़ती थी। वो वहीं से परीक्षा का फॉर्म भर कर लौट रही थी, तभी उसके साथ ये घटना हुई। चन्दन मिश्र ने बताया, “मुझे पीड़ित परिजनों ने जानकारी दी कि छात्रा जब लौटी तो उसने अपने शरीर पर चोट के कई निशान दिखाए। उसे काफी बुरी तरह मारा-पीटा गया था।”

ऑपइंडिया के पास इस मामले की एफआईआर कॉपी भी है। इसमें लिखा है, “लक्ष्मी (बदला हुआ नाम) को जब ई-रिक्शा से घर भेजा गया, तब उसके साथ 10 साल का एक लड़का भी था, जो उसे उतार कर चला गया। मेरी बहन के हाथ में वीगो लगा हुआ था। जब उसकी हालत बहुत खराब हो गई, तब हम दवा के लिए उसे अस्पताल ले जा रहे थे, रास्ते में उसकी मौत हो गई।

चन्दन मिश्र ने बताया, “जब घरवाले पीड़िता की गंभीर स्थिति को देखते हुए वहाँ से अस्पताल ले जाने लगे, तभी उसकी मौत हो गई।” उन्होंने कहा कि उनका संगठन इस घड़ी में परिवार के साथ है और उन पर कोई प्रशासनिक दबाव वगैरह नहीं हो, इसे सुनिश्चित करने में लगा हुआ है। वहीं विश्व हिन्दू परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल ने इस प्रकरण पर ऑपइंडिया से बातचीत करते हुए कहा,

“छात्रा को जिस तरह से दिन-दहाड़े बाइक पर बिठा कर ले जाया गया, ये लव-जिहाद, सामूहिक दुष्कर्म और हत्या – इन तीनों का मामला है। पीड़िता दलित है लेकिन चूँकि हमलावर मुस्लिम हैं, इसीलिए ‘सेलेक्टिव सेकुलरिज्म’ के कारण बड़े-बड़े राजनीतिक दलों के झंडाबरदार वहाँ नहीं जा रहे हैं लेकिन हाथरस में गिरने का नाटक कर रहे हैं। लोगों की सहानुभूति के लिए ऐसा किया गया। यही लोग महात्मा गाँधी की प्रतिमा पर माल्यार्पण करते हैं लेकिन सब एकतरफा।”

पुलिस ने भी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के बाद प्रथम दृष्टया पाया है कि छात्रा के साथ बलात्कार हुआ था। परिजनों ने ये भी कहा है कि उन्हें इस घटना पर राजनीति नहीं चाहिए।

बलरामपुर पुलिस ने भी इस घटना को सांप्रदायिक रंग न देने को कहा है। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि पुलिस ने गाँव में बैरेकेडिंग भी कर रखी है, जिससे लोगों को पीड़ित परिवार से मिलने में परेशानी हो रही है। हमने कई नंबरों पर कॉल कर के पुलिस का बयान लेना चाहा, लेकिन पुलिस से हमारा संपर्क नहीं हो पाया। रविवार को राज्य के अपर मुख्य सचिव सहित कई आला अधिकारी बलरामपुर पहुँचे और पीड़ित परिवार से मुलाकात कर स्थिति की समीक्षा की।

यह भी सामने आया है कि बलरामपुर स्थित गैसड़ी में दलित छात्रा से गैंगरेप मामले में आरोपितों में से दो चाचा-भतीजा ही हैं। पीड़िता का अंतिम संस्कार भी पुलिस की निगरानी में हुआ और परिजनों ने भी इससे सहमति जताई। हालाँकि, अंतिम संस्कार के बाद मृतका के घर के आसपास सुरक्षा-व्यवस्था ज़रूर कड़ी कर दी गई है। मृतका बीकॉम प्रथम वर्ष की छात्रा थी। परिजनों को पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट भी दे दिया गया है। दोनों आरोपितों को जेल भेज दिया गया है।

टाइम्स ग्रुप के टैबलॉयड अहमदाबाद मिरर का कमाल! बिना बात किए ही छाप दिया गुजरात बीजेपी अध्यक्ष का 2 पन्नों का इंटरव्यू

टाइम्स ग्रुप अहमदाबाद मिरर नाम से एक टैबलॉयड प्रकाशित करता है। इस टैबलॉयड में शनिवार (3 अक्टूबर 2020) को गुजरात बीजेपी अध्यक्ष सीआर पाटिल का ‘इंटरव्यू’ प्रकाशित हुआ। वह भी छोटा-मोटा नहीं। बकायदा दो पन्नों का इंटरव्यू। कदाचित यह ‘इंटरव्यू‘ अहमदाबाद मिरर की संपादक दीपल त्रिवेदी ने किया है। पर दिलचस्प यह है कि ऐसा कोई इंटरव्यू कभी किया ही नहीं गया।

पाटिल ने ट्विटर पर इस काल्पनिक इंटरव्यू को साझा किया है। बताया है कि कॉन्ग्रेस के प्रति सद्भावना रखने वाली संपादिका इसकी लेखक हैं। उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा, “कैसा समय आ गया है जिसमें समाचार पत्र काल्पनिक लेखकों को पैसे दे रहे हैं। मुझे अपना साक्षात्कार देख कर हैरानी हो रही है। मैंने ऐसी कोई बातचीत की ही नहीं।”

इस ‘इंटरव्यू’ में पाटिल के हवाले से दावा किया गया है किया गया है कि 2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी 182 में से 175 सीटें जीतेगी। यदि सभी 182 सीटें भी जीत ले तो हैरानी नहीं होनी चाहिए।

लेकिन, दीपल त्रिवेदी ने ट्वीट कर कहा है कि यह इंटरव्यू 1 सितंबर को सर्किट हाउस में हुआ था। हालाँकि इसे 3 अक्टूबर को प्रकाशित किया गया। उनका दावा है कि यह ‘इंटरव्यू’ गुजराती और अंग्रेजी दोनों में हुआ था।

साथ ही यह भी बताया है कि इस ‘इंटरव्यू’ के ठीक बाद पाटिल कोरोना वायरस संक्रमित हो गए थे। दिलचस्प यह है कि 3 अक्टूबर को प्रकाशित इंटरव्यू का एक सवाल पाटिल की प्रतिक्रिया को लेकर है जिसमें उन पर कोरोनों संक्रमण फैलाने का आरोप था। सोचने योग्य बात है कि जब इंटरव्यू पाटिल को कोरोना होने से पहले किया गया था तो वह सवाल कैसे पूछ लिया गया जो आरोप उन पर संक्रमण के बाद लगा था।

इसके अलावा त्रिवेदी ने ‘इंटरव्यू’ की पाँच सेकंड की एक क्लिप भी साझा की है। साथ ही कहा है कि अहमदाबाद मिरर पर फेक इंटरव्यू का आरोप लगाने के लिए पाटिल माँफी माँगे।

मिरर की संपादक के ट्वीट के बाद पाटिल ने ट्वीट कर कहा है कि जो क्लिप साझा की है वह एक महीने पहले की है और जब उन्होंने 2 अक्टूबर को एक साक्षात्कार के लिए उनसे संपर्क किया था, तो उन्होंने स्पष्ट रूप से मना कर दिया था।

2017 में गुजरात विधानसभा चुनाव के वक्त त्रिवेदी ने पाटीदारों के बारे में तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का फर्जी कोट शेयर किया था। दीपल त्रिवेदी द्वारा साझा किए गए इस फर्जी बयान से पाटीदार समुदाय आक्रोशित हो सकता था और हिंसा के हालात बन सकते थे। इस ट्वीट के लिए आलोचना होने पर त्रिवेदी ने दावा किया था कि उन्होंने यह बताने के लिए कि यह तस्वीर कितनी ‘खतरनाक’ है हार्दिक और अमित शाह को टैग कर दिया था। इसी तरह साल 2018 में वे भाजपा नेता तेजिंदर बग्गा की मौत की कामना करते पकड़ी गई थी। 

वैसे यह पहला मौका नहीं है जब फर्जी इंटरव्यू प्रकाशित करने का आरोप किसी पत्रकार पर लगा हो। गालीबाज ट्रोल पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी पर भी पूर्व रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस का फेक इंटरव्यू करने के आरोप लग चुके हैं। मामला सामने आने के बाद यह इंटरव्यू रहस्यमय तरीके से गायब हो गया था।    

‘यही मौका है’: हाथरस पर पॉलिटिक्स को लेकर शशि थरूर बोले- क्या लोकतंत्र में राजनीति करना मना है

हाथरस कांड को लेकर राजनीति अपने चरम पर है। एक तरफ जहाँ हाथरस मामले को लेकर देश में लोगों का गुस्सा देखने को मिल रहा है। वहीं कॉन्ग्रेस पार्टी इस मामले पर राजनीति करने से बाज नहीं आ रही है। इस क्रम में शनिवार (सितंबर 3, 2020) को कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी पूरे लाव-लश्कर के साथ दिल्ली से हाथरस पहुँचे। हाथरस पहुँचे राहुल की कार खुद बहन प्रियंका गाँधी चला रही थीं। 

राहुल और प्रियंका गाँधी अपने साथ दो नेताओं को लेकर पहुँचे। जिसमें से एक थे- पूर्व केंद्रीय मंत्री और कॉन्ग्रेस सांसद शशि थरूर। शशि थरूर का एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें उन्होंने कॉन्ग्रेस के हाथरस जाने के पीछे की सच्चाई सबके सामने ला दी है। 

दरअसल सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में शशि थरूर हाथरस कांड की सच्चाई सबको बता रहे हैं। उनसे जब एक पत्रकार ने हाथरस को लेकर सवाल पूछा कि ऐसा आरोप लग रहा है कि आप इस मुद्दे पर राजनीति कर रहे हैं, तो शशि थरूर ने इसका जवाब देते हुए कहा, “क्या अभी एक लोकतंत्र में राजनीति करना मना है। लोकतंत्र में लोग कैसे जानेंगे कि कौन किसके साथ है। यही मौका है।”

शशि थरूर के इस बयान ने हाथरस कांड को लेकर कॉन्ग्रेस के सच्चाई की पोल खोल दी है कि आखिरकार कॉन्ग्रेस पार्टी इस मुद्दे को राजनीतिकरण कर रही है। वह इस मुद्दे का फायदा उठाना चाहती है। शशि थरूर का यह बयान कॉन्ग्रेस के एजेंडे की हवा निकाल सकती है।

जब पत्रकार ने थरूर को याद दिलाया कि महामारी अधिनियम लागू है और उनकी पार्टी के नेता महामारी संबंधी दिशा-निर्देशों की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं, तो कॉन्ग्रेस नेता इस सवाल का जवाब देने से बचते हैं। थरूर का कहना था कि एक लोकतांत्रिक देश में लोग कभी भी जाने और संवेदना व्यक्त करने के लिए स्वतंत्र हैं।

इसी दौरान शशि थरूर बोलते हैं कि उनकी पार्टी हाथरस के पीड़ितों पर अत्याचार से बेहद परेशान है और पीड़ित परिवार के साथ अपनी संवेदना व्यक्त करना चाहता है। इससे पहले राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी का कार से हाथरस जाते हुए वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वह ठहाके लगाते हुए दिख रहे हैं। जिस पर लोगों ने सवाल भी उठाए थे कि ऐसे वक़्त पर राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी इस तरह संवेदनहीन होकर हँसी-मजाक करते हुए कैसे जा यात्रा कर सकते हैं?