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पत्रकार की गोली मार कर हत्या: UP पुलिस ने गिरफ्तार किए 6 आरोपित, SHO सस्पेंड, आपसी रंजिश का मामला

उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के फेफना थाना क्षेत्र में सोमवार (अगस्त 24, 2020) की देर शाम आपसी रंजिश और जमीन विवाद के कारण रतन सिंह नाम के व्यक्ति (42) को गोली मार दी गई। रतन सिंह पेशे से पत्रकार थे और एक हिंदी न्यूज चैनल में काम करते थे।

घटना को उस समय (करीब 8:45 बजे) अंजाम दिया गया, जब वह अपने मित्र के घर से लौट रहे थे। बदमाशों को देखकर उन्होंने प्रधान के घर में जाकर अपनी जान बचाने का भी प्रयास किया। लेकिन बदमाशों ने तब भी दौड़कर उनके सिर में गोली मार दी, जिसके कारण मौके पर ही पत्रकार रतन सिंह ने दम तोड़ दिया।

घटना के बाद बलिया पुलिस ने फेफना के प्रभारी निरीक्षक शशिमौलि पांडेय को निलंबित कर दिया है। इसके अलावा इस मामले में 10 नामजद आरोपितों में से 6 आरोपितों की गिरफ्तारी भी हो चुकी है। इनमें से चार की पहचान दिनेश सिंह, अरविंद सिंह, सुनील सिंह और मोती सिंह के रूप में हुई है।

उधर, प्रदेश मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी मामले को संज्ञान में लेते हुए परिवार के साथ अपनी संवेदनाएँ प्रकट की हैं। उन्होंने रतन लाल के परिवार को 10 लाख रुपए देकर मदद करने की घोषणा की है। साथ ही निर्देश दिए हैं कि हर मुमकिन कार्रवाई आरोपितों के ख़िलाफ़ की जाए।

जानकारी के मुताबिक, सारा मामला पिछले साल 26 दिसंबर को शुरू हुआ था, जब दोनों पक्षों में मारपीट हुई थी। पुलिस का कहना है कि लड़ाई के बाद दोनों ही पक्षों ने एक दूसरे के ख़िलाफ़ मुकदमा दर्ज कराया था। लेकिन रतन सिंह पर मुकदमा दर्ज मुकदमा गलत पाया गया था।

वहीं, रतन सिंह की हत्या में 5 अभियुक्त उन्हीं लोगों में से हैं, जिनके ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज हुई थी। इसलिए इस मामले में प्रभावी कार्रवाई न करने पर प्रभारी निरिक्षक को निलंबित कर दिया गया है।

कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, 2 साल पहले इनके भाई की भी हत्या हो चुकी है। परिजनों का दावा है कि उन्होंने इससे पहले 10 लोगों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज करवाई थी।

गौरतलब है कि इससे पहले यूपी के गाजियाबाद में पत्रकार विक्रम जोशी हत्याकांड हुआ था। जहाँ देर रात अपने घर लौट रहे पत्रकार को गोली मारी गई थी। पुलिस ने इस मामले में 9 आरोपितों को गिरफ्तार किया था। जिनमें तीन मुख्य आरोपित थे और 6 उनके साथी थे।

इस मामले में घटना का सीसीटीवी फुटेज भी सामने आया था, जिसमें दिख रहा था कि पहले तो पत्रकार के साथ मारपीट की गई, उसके बाद गोली मारी गई। इस मामले में भी लापरवाही के लिए सम्बंधित चौकी इंचार्ज को लापरवाही बरतने के आरोप में सस्पेंड कर दिया गया था।

कॉन्ग्रेस में बगावत के पीछे थरूर की डिनर पार्टी: 5 महीने पहले ही बन गई थी योजना, राज्यसभा का एंगल भी आया सामने

कॉन्ग्रेस के 23 नेताओं ने पत्र लिख कर पार्टी के प्रथम परिवार को असहज कर दिया था। अब पता चला है कि बगावत के ये तेवर जो आज दिख रहे हैं, इसकी नींव 5 महीने पहले ही पड़ गई थी। कॉन्ग्रेस में रिफॉर्म की माँग के लिए एजेंडा शशि थरूर द्वारा आयोजित एक डिनर पार्टी में ही तैयार कर लिया गया था, जिसमें कई कॉन्ग्रेस नेता शामिल हुए थे। इसका ही परिणाम सोनिया गाँधी को पत्र भेजे जाने के रूप में सामने आया।

हालाँकि, थरूर की पार्टी में ऐसे कई नेता भी थे, जिन्होंने गाँधी परिवार के प्रति वफादारी दिखाने के लिए पत्र पर हस्ताक्षर नहीं किया था। उनमें पी चिदंबरम, उनके बेटे कार्ति चिदंबरम, सचिन पायलट और मणिशंकर अय्यर शामिल थे। अभिषेक मनु सिंघवी ने बताया कि वो डिनर में उपस्थित थे, जिसके लिए उन्हें एक दिन पहले ही आमंत्रित किया गया था। उस दौरान पार्टी में रिफॉर्म्स को लेकर चर्चा होने की बात भी उन्होंने कबूली है।

ये सब ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ में हरिंदर बावेजा की एक रिपोर्ट में सामने आया है। सिंघवी ने HT को बताया कि पत्र लिखे जाने के बारे में उन्हें कुछ भी पता नहीं था। जबकि चिदंबरम ने पार्टी के मामलों पर बात करने से इनकार कर दिया। सचिन पायलट ने तो पिछले ही महीने राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खिलाफ बगावत की थी। वो भी टिप्पणी करने से बचते नज़र आए। वही मणिशंकर अय्यर ने कहा कि उन्हें पत्र पर साइन करने कहा ही नहीं गया था, इसीलिए उन्होंने ऐसा नहीं किया।

मणिशंकर अय्यर ने कहा कि उनसे इसके लिए किसी ने संपर्क ही नहीं किया था। उन्होंने बताया कि शशि थरूर के डिनर में इस बात पर चर्चा हुई थी कि पार्टी का जीर्णोद्धार कैसे किया जाए और इसकी सेक्युलर विचारधारा की तरफ कैसे लौटा जाए। उन्होंने कहा कि उसी दौरान पत्र लिखने पर बात हुई थी और किसी ने भी इसका विरोध नहीं किया था। उन्होंने कहा कि डिनर के बाद उनसे किसी ने संपर्क ही नहीं किया।

सोमवार (अगस्त 24, 2020) को हुई बैठक में इस पत्र को लेकर चर्चा हुई, जिसमें राहुल गाँधी द्वारा इन नेताओं पर तल्ख़ टिप्पणी करने की बातें सामने आईं, जिसे बाद में नकार दिया गया। एक अन्य नेता ने बताया कि वो शशि थरूर के डिनर में उपस्थित थे और उन्होंने पत्र पर हस्ताक्षर भी किया, क्योंकि पार्टी में बड़ी सुधार की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि ये मुद्दों की लड़ाई है, व्यक्तित्वों की नहीं।

साथ ही उक्त नेता ने गाँधी परिवार को सलाह दी कि वो सन्देश को समझने की बजाए सन्देश देने वालों पर निशाना साधने से बचें। बता दें कि 1999 में शरद पवार के बाद से पार्टी में सोनिया गाँधी की एकमात्र सत्ता को चुनौती देने की हिम्मत कोई भी नहीं जुटा पाया है। कई लोग ऐसे भी हैं, जिन्होंने गाँधी परिवार के खिलाफ पत्र पर साइन तो नहीं किया लेकिन वो भी पार्टी में सुधार के लिए खासे इच्छुक हैं।

वहीं इस पूरे मामले में राज्यसभा का एंगल भी सामने आ रहा है। कर्नाटक में पूर्व IIM प्रोफेसर राजीव गौड़ा को पीछे हटने बोल कर राज्यसभा में मल्लिकार्जुन खड़गे के लिए राह बनाने को कहा गया था, जिसके बाद पार्टी में कइयों की भौहें तन गई थी क्योंकि 9 बार सांसद रहे खड़गे 2014-19 में संसद में कॉन्ग्रेस के नेतृत्वकर्ता थे और गाँधी परिवार के पुराने वफादार हैं। ऊपर से वो लोकसभा चुनाव भी हार चुके हैं।

आनंद शर्मा भी राज्यसभा में पार्टी के नेता बनने के दावेदार थे लेकिन खड़गे की वहाँ एंट्री से उनकी और गुलाम नबी आजाद की भौहें तनी हुई हैं। यहाँ तक कि गाँधी परिवार के करीबी मुकुल वासनिक ने भी इस पत्र पर हस्ताक्षर किया। महाराष्ट्र में भी कॉन्ग्रेस ने राहुल गाँधी के वफादार राजीव सतव को उम्मीदवार बनाया था। परिवार के वफादारों को जगह मिलने से पार्टी के अन्य नेता नाराज़ हैं।

बता दें कि सोनिया गाँधी के दोबारा अंतरिम अध्यक्ष बनने से पहले उनके इस्तीफे की खबर आई। फिर जल्द ही दावा किया गया कि उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया था। सोनिया गॉंधी को कॉन्ग्रेस ने भले फिर से अंतरिम अध्यक्ष चुन लिया हो, लेकिन इसने पार्टी के अंदरूनी कलह को बेनकाब कर दिया है। ताजा घमासान के बाद सब कुछ सामान्य होने और नुकसान का ठीक-ठीक पता लग पाने में ही महीनों लग सकते हैं।

तस्लीम ने अपने मालिक ओम प्रकाश की हत्या कर दी… क्योंकि लॉकडाउन में नहीं दे पा रहा था पूरी सैलरी

दिल्ली का एक डेयरी ओनर पिछले 15 दिनों से लापता था, जिसके बारे में पता चला है कि उसकी हत्या कर दी गई। पता चला है कि नजफगढ़ के उस डेयरी ओनर की उसके ही कर्मचारी ने हत्या कर दी। आरोपित इस बात से खफा था कि लॉकडाउन के दौरान उसे सैलरी (जितनी थी, उतनी नहीं) नहीं मिल रही थी। 21 वर्षीय आरोपित मोहम्मद तस्लीम को गिरफ्तार कर लिया गया है। वो उत्तर प्रदेश के शामली का रहने वाला है।

‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की खबर के अनुसार, पुलिस को 12 अगस्त को सूचित किया गया था कि दिल्ली के डेयरी ओनर ओम प्रकाश लापता हो गए हैं। शुरुआत में एक मिसिंग रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी। इसके कुछ दिनों बाद स्थानीय कुआँ से ही दुर्गन्ध आने के बाद लोगों ने शिकायत की। जब छानबीन की गई तो ओम प्रकाश की लाश उसी में पड़ी हुई थी, जो सड़ चुकी थी। इसके बाद तुरंत हत्या और सबूत मिटाने का मामला दर्ज किया गया।

डीसीपी आंतो अलफोंसे ने बताया कि इसके बाद बॉडी को ऑटोप्सी के लिए भेजा गया। इसके बाद पुलिस ने रूटीन जाँच के जरिए मृतक के दोस्तों, रिश्तेदारों और कर्मचारियों पर नजर रखनी शुरू की। मृतक का मोबाइल फोन भी गायब था। इसके बाद पुलिस को पता चला कि तस्लीम नाम का एक कर्मचारी गायब है। साथ ही वो डेयरी ओनर का बाइक लेकर भी चला गया था। वो छुट्टी की बात कह कर गायब हो गया था।

शामली और पानीपत में छापेमारी की गई लेकिन पुलिस को कुछ पता नहीं चल सका। इसके बाद पुलिस को सूचना मिली कि तस्लीम उसी क्षेत्र में बाइक लेकर घूम रहा है। लेकिन, उसने डेयरी में आना-जाना बंद कर दिया था। इसके बाद पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए उसे गिरफ्तार किया। पूछताछ के दौरान तस्लीम ने स्वीकार किया कि सैलरी को लेकर ओम प्रकाश के साथ उसकी झड़प हुई थी।

उसके पास से मृतक के मोबाइल फोन के अलावे उस चाक़ू को भी जब्त कर लिया गया, जिसका प्रयोग कर के उसने डेयरी ओनर की हत्या की थी। उसने बताया कि पहले उसे 15,000 रुपए प्रति महीने की सैलरी मिलती थी लेकिन लॉकडाउन में उसे कम सैलरी पर काम करने बोला गया, जो उसे मंजूर नहीं था। इसके बाद दोनों में झड़प हुई। ओम प्रकाश ने 10 अगस्त की रात तस्लीम को थप्पड़ भी मारा था।

इसके बाद ओम प्रकाश जैसे ही सोने गए, तस्लीम ने एक लाठी से उनके सिर पर जोरदार वार किया। इसके बाद चाकू लेकर उनका गला रेत डाला। इसके बाद सबूत मिटाने की मंशा से उसने बॉडी को एक बैग में पैक कर के उसे पास के कुएँ में फेंक दिया। जब उससे परिजनों ने ओम प्रकाश के बारे में पूछा तो उसने कह दिया कि वो काम से कहीं गए हैं। इसके बाद वो अपने घर से फरार हो गया। अंततः पुलिस ने उसे धर-दबोचने में कामयाबी पाई।

30 सितंबर तक धार्मिक उत्सव या समारोह पर UP में पाबंदी: 29 अगस्त को मोहर्रम, घर में ताजिया रखने पर छूट

उत्तर प्रदेश सरकार ने कोरोना महामारी के बीच सुरक्षा लिहाज से किसी भी प्रकार के सार्वजनिक समारोह, धार्मिक उत्सव, राजनैतिक आंदोलन व सभाएँ आयोजित करने पर एक बार फिर बैन लगा दिया है। ये प्रतिबंध 30 सितंबर तक प्रदेश में लागू रहेगा।

उल्लेखनीय है कि 29 अगस्त को मोहर्रम मनाया जाना है। हिंदुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार अपर मुख्य सचिव गृह अवनीश कुमार अवस्थी ने इस बारे में आदेश जारी किया है। इस आदेश में कहा गया है कि सभी प्रकार के जुलूस एवं झाँकी पर भी प्रतिबंध रहेगा।

बता दें कि यह रोक इसलिए भी लगाई गई है क्योंकि ऐसी आशंका है कि असामाजिक तत्वों द्वारा कानून-व्यवस्था एवं सांप्रदायिक सौहार्द को भंग करने का प्रयास किया जा सकता है। हालाँकि अपने-अपने घरों में मूर्तियाँ, ताजिया एवं अलम की स्थापना पर किसी प्रकार की रोक नहीं होगी।

सभी जिलाधिकारियों व पुलिस कप्तानों के अलावा पुलिस कमिश्नरों, एडीजी जोन तथा आईजी-डीआईजी रेंज को इस संबंध में सूचित किया गया है। इस आदेश के अनुसार सभी अधिकारियों से प्रदेश के सभी धार्मिक स्थलों विशेषकर श्रीकृष्णजन्मभूमि (मथुरा), श्रीराजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र (अयोध्या), श्री काशी विश्वनाथ मंदिर (वाराणसी) तथा ऐतिहासिक स्थल ताजमहल की सुरक्षा व्यवस्था और पुख्ता करने को कहा गया है। इसके अलावा असामाजिक तत्वों, आतंकवादियों एवं समाज में अस्थिरता फैलाने वाले व्यक्तियों पर भी सतर्क नजर रखने के निर्देश दिए गए हैं।

गौरतलब करवा दें कि इससे पहले योगी सरकार ने मोहर्रम को लेकर ताजिया निकालने पर लगी पाबंदी को हटा दिया था। इस जानकारी इस पाबंदी का विरोध कर रहे इमाम-ए-जुमा मौलाना कल्बे जवाद ने इमामबाड़ा गुफरानमआब में धरना खत्म कर दिया था।

उन्होंने कहा था कि सरकार ने उनकी माँगे मान ली हैं। अब मोहर्रम के दौरान ताजिया को घर में रखा जाएगा और मजलिसों का आयोजन सोशल डिस्टेंसिंग को ध्यान में रखकर किया जाएगा।

धरना खत्म करने से पहले मौलाना कल्बे जवाद का आरोप था कि यूपी के कई हिस्सों में प्रशासन अकीदतमंदों को अजादारी करने और ताजिया रखने से रोक रहा है। यहाँ तक की मुकदमा तक दर्ज किया जा रहा है। मौलाना ने कहा था कि सरकार ने ताजिया रखने और घरों में मजलिस करने की इजाजत नहीं दी तो धरना जारी रहेगा।

मौत के 9 दिन बाद भी एक्टिव था सुशांत की पूर्व मैनेजर दिशा सालियान का मोबाइल फोन

बॉलीवुड एक्टर सुशांत सिंह राजपूत की मौत की सीबीआई जाँच के बीच उनकी पूर्व मैनेजर दिशा सालियान के केस में भी सोमवार (अगस्त 24, 2020) को एक नया खुलासा हुआ। दिशा की कॉल डिटेल्स से पता चला है कि उनका फोन उनकी मौत के कई दिनों बाद तक एक्टिव था। 

बता दें कि कुछ समय के लिए सुशांत सिंह राजपूत के मैनेजर के रूप में काम कर चुकी दिशा की इसी साल 8 जून को रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो गई थी, इसके 6 दिन बाद सुशांत ने भी कथित तौर पर आत्महत्या कर ली।

सूत्रों के हवाले से बताया जा रहा है कि दिशा सालियान की मौत के 9 दिन बाद तक यानी 17 जून तक उनका फोन एक्टिव रहा। इतना ही नहीं उसके फोन से 9 से 17 जून के बीच इंटरनेट कॉल भी की गई थी। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि वो कौन शख्स है जो उसका फोन इस्तेमाल कर रहा था।

सूत्रों के मुताबिक, दिशा ने 7 जून को कम से कम 36 कॉल किए, जिसमें उसकी दोस्त एकता को किया फोन कॉल भी है, जिसे उन्होंने करीब 12:10 बजे किया था। चश्मदीद के मुताबिक पुलिस हादसा होने कुछ ही मिनट में पहुँच गई, मगर किसी भी अधिकारियों द्वारा फोन जब्त नहीं किया गया। मुंबई पुलिस ने उनके फोन को 9 दिन बाद तक फोरेंसिक जाँच के लिए नहीं भेजा था।

गौरतलब है कि सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले की गुत्थी सुलझाने के लिए सीबीआई लगातार पूछताछ कर साक्ष्य जुटा रही है। इसी बीच सुशांत के जिम पाटर्नर सुनील शुक्ला ने रिया चक्रवर्ती पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनके मुताबिक रिया चकवर्ती के ‘दो डैडी’ ने मिलकर सुशांत की हत्या की साजिश रची। उनके अनुसार सुशांत डिप्रेशन में नहीं थे और रिया उन्हें अपने पिता द्वारा दी गई दवाइयॉं दे रही थीं।

सुनील शुक्ला ने कहा, “सुशांत सिंह राजपूत की हत्या की साजिश ‘दो डैडी’ द्वारा की गई थी। इसमें एक रिया चक्रवर्ती के सगे पिता इंद्रजीत चकवर्ती और दूसरे उनके ‘शुगर डैडी’ महेश भट्ट हैं।”

शुक्ला ने दावा किया रिया ने अपने पिता के द्वारा दी गई दवाएँ सुशांत को दी और रिया के घर छोड़कर जाने के बाद घर के किस व्यक्ति ने उसे दवा दी? घर में सुशांत के अलावा उनके फ्लैटमेट सिद्धार्थ पिठानी, कुक नीरज और मैनेजर दीपेश सावंत था।

बता दें कि एक्टर की मौत के मामले में जाँच के दौरान सीबीआई ने रिपोर्ट का विश्लेषण करने और स्वास्थ्य-कानूनी राय देने के लिए एम्स फॉरेंसिक टीम की मदद भी माँगी है। अधिकारियों ने सुशांत के मैनेजर सैमुअल मिरांडा और बावर्ची नीरज के साथ बांद्रा में दिवंगत अभिनेता के घर का दोबारा से दौरा भी किया ताकि सीन री-क्रिएट हो सके। इसके अलावा सिद्धार्थ पिठानी और नीरज के बयान लिए गए हैं, जो पहले मैच नहीं हुए थे। इसलिए हो सकता है आगे इन्हें समन फिर भेजा जाए।

साधु सरवनन ने हिंदुओं का धर्म परिवर्तन रोका, इसलिए एंथनी माइकल ने उन्हें पीटा: हिंदू मक्कल काची का दावा

तमिलनाडु के सलेम जिले के संकागिरी तालुक के कुंदंगल कादु में पुलिस सब इंस्पेक्टर एंथनी माइकल के हाथों यातना और अपमान सहन करने के बाद 42 वर्षीय साधु सरवनन ने आत्महत्या कर ली थी। साधु ने अपने दोस्तों को भेजे वीडियो में सब इंस्पेक्टर एंथनी माइकल को अपने ‘डिप्रेशन’ के लिए जिम्मेदार ठहराया था।

आज, तमिलनाडु में एक दक्षिणपंथी हिंदू राष्ट्रवादी पार्टी, हिंदू मक्कल काची (एचएमके) ने सलेम में एक प्रदर्शन किया और इस घटना की सीबीआई जाँच की माँग की। स्वराज्य की एक रिपोर्ट के अनुसार, कार्यक्रम के स्थानीय आयोजक, सीएम मणिकंदन ने आरोप लगाया है कि सब इंस्पेक्टर एंथनी माइकल ने हिंदू साधु की पिटाई की थी, उन्हें आत्महत्या के लिए उकसाया था। उन्होंने आरोप लगाया कि एंथनी माइकल ने ऐसा इसलिए किया, क्योंकि उनकी गतिविधियाँ स्थानीय चर्च द्वारा किए गए रूपांतरण प्रयासों में बाधा बन रही थीं। 

HMK नेता ने दावा किया कि इलाके में एक चर्च है। इस चर्च में अधिक संख्या में लोग नहीं जा रहे थे। इसके लिए साधु को जिम्मेदार ठहराया गया था। इसलिए, माइकल ने उन्हें पीटा, ताकि वह इसमें बाधा न बन सके।

हिंदू राष्ट्रवादी पार्टी के सदस्य का कहना था कि जब से साधु सरवनन ने भूतों से पीड़ित लोगों की शिकायत सुनकर अपने दिव्य उपचार से उसे ठीक करने लगे, ईसाई धर्म प्रचारक लोगों को चर्च के लिए लुभा सकने में नाकामयाब होने लगे। आम तौर पर ईसाई प्रचार इन्हीं परिस्थितियों का हवाला देकर उन्हें चर्च के प्रति आकर्षित करते हैं। इसी वजह से, उन्हें चर्च की गतिविधियों में बाधा के रूप में देखा जा रहा था।

गौरतलब है कि सरवनन का शव शुक्रवार (अगस्त 21, 2020) को विघटित अवस्था में उनके आवास के पास एक वन क्षेत्र में चट्टानों के बीच पाया गया था। पुलिस को शव के पास एक मोबाइल मिला। जिसकी जाँच करने पर वीडियो मिला। इसमें उन्होंने सब इंस्पेक्टर को अपनी मौत के लिए जिम्मेदार ठहराया है।

साधु ने आरोप लगाया था, “सब-इंस्पेक्टर एंथनी माइकल ने मुझे यह सोचकर पीटा कि उसे जो पावर मिली, उससे वह कुछ भी कर सकता है।” सरवनन के बच्चों ने पुलिस द्वारा उनके पिता की पिटाई देखी थी, जबकि उनकी पत्नी ने कहा है कि उन्होंने सब-इंस्पेक्टर के खिलाफ शिकायत नहीं की, क्योंकि पुलिस ने उन्हें धमकी दी थी। 

इसको लेकर सीबीआई जाँच की माँग करने वाला अभियान शुरू किया गया है। इस मुद्दे पर संज्ञान लेने के लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को ईमेल भेजे जा रहे हैं। सोशल मीडिया पर इस घटना की ओर प्रधानमंत्री कार्यालय का ध्यान भी आकर्षित किया गया है। ट्विटर पर #JusticeForSaravanan और #ArrestAntonyMichael जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं, जिसमें नेटिज़न्स हिंदू संत के लिए न्याय की माँग कर रहे हैं। नाराज सोशल मीडिया यूजर्स ने यह भी बताया है कि तमिलनाडु में मीडिया ने कैसे मौत पर चुप्पी बना रखी है, क्योंकि इस मामले में मृतक हिंदू है।

सड़क 2 के बाद अब ‘खाली पीली’ का टीजर बना रहा डिसलाइक के नए रिकॉर्ड: नेपोटिज्म को फिर पड़ी मार

आज यानी 24 अगस्त 2020 को “खाली पीली” फ़िल्म का टीज़र लॉन्च हुआ। ध्यान रहे ट्रेलर नहीं टीज़र! ख़बर लिखे जाने के वक्त तक टीज़र यूट्यूब पर चौथे नंबर पर ट्रेंड कर रहा था और ट्विटर पर भी ट्रेंड कर रहा था। टीज़र को लाखों लोग देख चुके थे, लेकिन इस टीज़र पर जितना शोर मचा हुआ है उसकी कोई अच्छी वजह नहीं है।

असल में इस टीज़र को खबर लिखे जाने तक 2.8 लाख डिसलाइक और महज़ 35 हज़ार लाइक मिले थे। यह सिर्फ टीज़र का हाल है, अभी ट्रेलर आएगा, उस पर दर्शकों की क्या प्रतिक्रिया होगी? ट्रेलर के बाद फिल्म का क्या होगा?  

इस फिल्म के निर्देशक हैं मकबूल खान और इसके प्रोड्यूसर हैं अली अब्बास ज़फर और हिमांशु मेहरा। अब आती है ज़िक्र करने वाली बात, फिल्म में मुख्य भूमिका निभाई है ईशान खट्टर और अनन्या पाण्डेय। अनन्या पाण्डेय, अभिनेता चंकी पाण्डेय की बेटी हैं। यानी एक ऐसे परिवार से ताल्लुक रखती हैं जो फ़िल्मी हैं इसके बाद मुद्दा समझना काफी आसान होगा। वहीं ईशान अभिनेता शाहिद कपूर के भाई हैं। वे भी फिल्मी परिवार से ही आते हैं।

इस बात पर शायद ही कोई असहमति जता पाए कि सुशांत सिंह की मौत के बाद बॉलीवुड में नेपोटिज्म (भाई-भतीजावाद) पर शुरू हुई बहस का असर दिखने लगा है। खाली-पीली फिल्म के टीज़र पर आई प्रतिक्रिया उसका ही नतीजा है।

बॉलीवुड में भाई-भतीजावाद पर छिड़ी बहस का ही नतीजा था ‘सड़क’ फिल्म के ट्रेलर का हाल। ट्रेलर को अभी तक 6.7 करोड़ लोग देख चुके हैं। जिसमें से महज़ 6.8 लाख लोगों ने इसे लाइक किया है और 1.2 करोड़ लोगों ने डिसलाइक किया है। इस फिल्म के निर्देशक हैं महेश भट्ट और प्रोडूसर हैं मुकेश भट्ट। फिल्म में मुख्य भूमिकाएँ निभाई हैं संजय दत्त, आलिया भट्ट और आदित्य रॉय कपूर ने। इसके बाद यह बताने की ज़रूरत नहीं बचती कि इनमें से कौन-कौन बॉलीवुड के फ़िल्मी परिवारों से आता है।  

अब वापस लौटते हैं खाली-पीली की अभिनेत्री अनन्या पाण्डेय पर। वैसे तो इनके वीडियो अक्सर सोशल मीडिया पर वायरल होते रहते हैं लेकिन एक वीडियो सबसे अलग है। वीडियो है एक टीवी कार्यक्रम का जिसमें उनसे सब्जियों के नाम पूछे जाते हैं। अनन्या पाण्डेय के सामने करी पत्ता रखा गया और उनसे पूछा गया कि यह क्या है? जवाब में उन्होंने कई हरी सब्जियों का नाम ले लिया पालक, पुदीना और न जाने क्या-क्या। यानी असली नाम छोड़ कर बाकी सारे नाम ले लिए। हालाँकि सब्जियों का नाम जानना अनिवार्यता नहीं है, फिर भी अपने चहेते कलाकारों की छोटी और अनूठी बातें दर्शकों को पता होनी ही चाहिए।  

सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद बॉलीवुड में भाई भतीजावाद की बहस पर बड़ी बहस शुरू हुई। जिसकी चिंगारी को अक्सर कोई न कोई हवा दे ही देता है। सोनाक्षी सिन्हा से लेकर करीना कपूर तक और आलिया भट्ट से लेकर सोनम कपूर तक। हर बड़े बॉलीवुड घराने से आने वाले अभिनेता और अभिनेत्री इस बहस में घसीटे गए। करीना कपूर ने तो इतना कह दिया था कि अगर हमारी फ़िल्में अच्छी नहीं लगती तो देखने मत जाया करो। हमने कब आप पर दबाव बनाया कि आप हमारी फ़िल्में देखने जाइए।  

सोनाक्षी सिन्हा तो इस बहस से इतनी परेशान हुई कि उन्होंने ट्विटर छोड़ दिया। इसके अलावा कहा भी इससे दूर रहने में भी भलाई है। इसके बाद सोनाक्षी ने यह भी कहा कि अब उनकी इस प्लेटफॉर्म पर वापसी की कोई उम्मीद भी नहीं है। वहीं सोनम कपूर ने कहा था कि उन्हें इस बार पर फक्र है कि वह एक सुपरस्टार अभिनेता की बेटी हैं। उन्हें अपने परिवार से जो पहचान मिली है वह उस पर गर्व करती हैं। यह तो कुछ कलाकार हैं, इनके अलावा भी फ़िल्मी दुनिया के ऐसे कई नाम हैं। जो किसी न किसी तरह इस बहस का हिस्सा बने।

चाहे सड़क फिल्म के ट्रेलर की बात हो या खाली पीली फिल्म के टीज़र की। इन दोनों पर आई प्रतिक्रिया से बहुत कुछ साफ़ हो जाता है। बॉलीवुड की दुनिया में समीकरण बदलें या नहीं, बदलाव हो या नहीं। लेकिन बदलावों की पहले की बहस सतह पर है। बेशक इसके अपने प्रभाव होंगे और अपने नतीजे होंगे।

कॉन्ग्रेस के गाँधी को गुस्सा क्यों आता है… क्योंकि तीसरी बार हारने पर लूडो में भी खिलाड़ी को गुस्सा आ जाता है

कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष का चुनाव होना था। होता क्यों नहीं, आखिर वर्तमान अध्यक्ष ने अपनी पार्टी के निकम्मेपन से कुपित होकर त्यागपत्र जो दे दिया था। वैसे तो जैसा कि कॉन्ग्रेस में सदा से होता आया है, कॉन्ग्रेस का अध्यक्ष कोई गाँधी ही होता है और गाँधी कभी त्यागपत्र नहीं देते।

दें भी तो किसको? वैसे किसी ने माँगा भी नहीं था। किसी गाँधी से त्यागपत्र भला कौन माँग सकता है? किन्तु फिर भी उन्होंने दे दिया था। देते काहे नहीं, गुस्सा जो थे। गुस्सा आता काहे नहीं, आखिर हारने की भी कोई हद होती है! कोई इतना कैसे हार सकता है? तीसरी बार हारने पर तो लूडो में भी खिलाड़ी को गुस्सा आ जाता है।

चलो हार भी सकता हो तो कोई बात नहीं, लेकिन इतना घनघोर अपमान कोई कैसे सह सकता है? सह तो लेते अगर कोई और स्वयं को जिम्मेदार घोषित कर देता। किन्तु कॉन्ग्रेसी और जिम्मेदार दो अलग-अलग छोरों पर लिखे हुए शब्द हैं, जिनका आपस में कोई रिश्ता नहीं है।

चुनाव के पश्चात जब जनता द्वारा काटी गई नाक को उनके हाथ में धर दिया गया तो पहले एक सप्ताह तक उन्होंने इस पर विचार किया कि यह पार्टी की नाक है या स्वयं उनकी, और उस कटी हुई नाक को लेकर वे भ्रमण करते रहे। तन्द्रा टूटी तो उन्होंने विचार किया कि किसी गाँधी की नाक कैसे कट सकती है? अतः जो नाक कटी है वह निश्चित रूप से पार्टी की ही नाक है।

नाक पार्टी की है तो पार्टी को जिम्मेदारी लेनी चाहिए। लेकिन जब उन्होंने देखा कि पार्टी की ओर से कोई और उस नाक पर अपना दावा नहीं ठोक रहा है, तो उन्होंने इशारों में कहा कि देखो-देखो ये कटी हुई नाक किसकी है? उन्हें लगा कोई तो होगा जो उनकी भावनाओं को समझते हुए उस कटी हुई नाक के लिए स्वयं को अपराधबोध से त्यागपत्र दे देगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अध्यक्ष जी ने सीधा पूछा, यह नाक किसकी है? सभी कॉन्ग्रेसियों ने एक स्वर में उत्तर दिया कॉन्ग्रेस में जो है सो सब आपका ही है, हम सब तो आपके दास हैं। 

तब अध्यक्ष जी ने यह कहते हुए त्यागपत्र दे दिया कि सब जिम्मेदार हैं, लेकिन मैं महान, त्यागी हूँ, निर्मोही हूँ और मैं त्यागपत्र दे रहा हूँ, और तो जिम्मेदार आदमी है ही नहीं। पार्टी में हाहाकार मच गया। जैसा कि सदैव होता आया है। कॉन्ग्रेसी आँखें लाल कर-कर के रोने लगे। एक के बाद एक त्यागपत्र देने लगे। बहुत मनाया,किन्तु अध्यक्ष जी कहाँ मानने वाले थे। वे अड़ गए, बोले किसी और को बना दो, हम नहीं बनेंगे। उधर कॉन्ग्रेसी अड़ गए कि किसी और को वो बनने नहीं देंगे। किसी गाँधी की पादुकाएँ (अथवा इटालियन सैंडल) तो अध्यक्ष बन सकती हैं, किन्तु किसी समझदार को अध्यक्ष बना दे तो कॉन्ग्रेस ही कैसी? 

मान-मनौव्वल का दौर चल पड़ा। झंडा, मोर्चा, प्रार्थना, याचना, जिस कॉन्ग्रेसी से जो बन पड़ा, उसने अध्यक्ष जी को मनाने का प्रयत्न किया। किन्तु इस बार वे नहीं माने। अध्यक्ष जी को चुनाव के बाद से ही नानी की याद आई हुई थी। उन्होंने पुनः कहा नहीं.. नहीं… नहीं।

कॉन्ग्रेसियों ने कहा ऐसे कैसे अध्यक्ष नहीं बनोगे, तुम नहीं अध्यक्ष तो बनेंगी तुम्हारी माताजी अध्यक्ष बनेंगी। वे फिर भी न माने। इस पर कॉन्ग्रेस की एक और गुप्त बैठकी हुई जिसमें पुनः कॉन्ग्रेस ने अपनी पुरातन परम्पराओं का निर्वाह करते हुए किसी भी निर्णय को न लेने का निर्णय किया। माता जी अंतरिम अध्यक्षा बन गईं।

मामले को उन्होंने वैसे ही टरकाया जैसे कि सत्ता में रहते हुए हर महत्त्वपूर्ण मामले को टरकाते रहे। कुछ माह बाद फिर उन्होंने एक बैठक बुलाई, इस बार तो लग रहा था जैसे कोई न कोई अध्यक्ष बन ही जाएगा। कई वरिष्ठ और कई गरिष्ठ नेता अपनी अपनी जुगाड़ बनाना तो चाहते थे, लेकिन कॉन्ग्रेसी थे। कॉन्ग्रेस में दास बनने की सब सोचते हैं, किन्तु अध्यक्ष बनने की केवल कोई गाँधी ही। अतः किसी ने स्वयं आगे आना उचित ही न समझा। फिर भी नया अध्यक्ष के चुनाव किए जाने की घोषणा कर दी गई।

कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष का चुनाव वैसे तो दुनिया का सबसे आसान चुनाव घोषित किया जाना चाहिए। इसमें एक ही विकल्प होता है, जो भी गाँधी सामने हो उसे सभी कॉन्ग्रेसी मिलकर अपना अध्यक्ष मान लेते हैं। कोई सामने न खड़ा होता है, न गाँधी से कोई बड़ा होता है। किंतु इस बार कुछ अलग होने की उम्मीद थी। मुनादी पिटवा दी गई, मीडिया के अधमरे, लुप्त होने की कगार पर खड़े हुए सूत्र पुनः जाग उठे। जैसा कि कॉन्ग्रेस की परम्परा और पहचान है, मीडिया में अलग-अलग नामों पर अटकलें लगाई जाने लगी। 

अतिउत्साह में फूलकर कुप्पा हुए कॉन्ग्रेसी सड़कों पर बैनर लेकर खड़े हो गए। कहने लगे गाँधी के अलावा कोई अध्यक्ष बना तो पार्टी टूट जाएगी। पार्टी नष्ट हो जाए स्वीकार है, लेकिन टूटना नहीं। धन्य है कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं की स्वामिभक्ति और एकता।   

कुछ ने भावनाओं में बहकर चिट्ठी पत्तरी भी लिख डाली- “लिखते हैं खत खून से सियाही न समझना, तुम ही सदा अध्यक्ष थे, तुम ही बने रहना।”

यहाँ तक कि कॉन्ग्रेस दरबार के पत्रकार भी कहने लगे- अरे यार फिर वही ड्रामा। गुप्त बैठक हुई, जिसकी खबरें गुप्ता जी गुप्त रूप से लीक करते रहे। अंतरिम अध्यक्षा ने परम्परानुसार त्यागपत्र दिया, त्यागपत्र किसने लिया, पता नहीं। सिंह साहब ने उनसे अध्यक्ष बने रहने का अनुरोध किया, माताजी ने मना किया। कुछ कॉन्ग्रेसी रोए। कुछ गिड़गिड़ाए, कुछ पैरों में पड़ गए।

संभावित अध्यक्ष जी गुस्से में थे, न जाने क्या क्या बोल गए। एक-दो को संभावित अध्यक्ष जी की बातें बुरी लग गईं। कहने लगे हमने तो जिंदगी भर तुम्हारे कितने केस लड़े हैं, फिर भी फिर भी ऐसा बोल दिया। थोड़ी देर में उन्हें दूध बिस्किट देकर कहा गया- सीताराम सीताराम भजो, तब जाकर चुप हुए। बोले हमारे लिए नहीं कहा गया।

कुछ खींच हुई कुछ तान हुई। अंत में निर्णय हुआ कि गाँँधी आपस में निर्णय कर लें किसको अध्यक्ष बनना है, कॉन्ग्रेसी उसे ही चुन लेंगे। इस पर सभी कॉन्ग्रेसियों ने सहमति जताईl भाजपा ने भी इस प्रस्ताव को बाहर से समर्थन दिया। इस प्रकार कॉन्ग्रेस ने अपनी परंपरा का निर्वाह करते हुए, दासता से मुक्त होने का एक अवसर होते हुए भी किसी गाँधी की सेवा में ही सर झुकाए रखना स्वीकार कर लिया। 

10वीं की छात्रा ने भगवान गणेश पर बनाए आपत्तिजनक मीम, हिंदुओं के प्रति नफरत से है भरी पड़ी

वह उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के एक बेहद पुराने और प्रतिष्ठित कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ती है। 10वीं कक्षा की वह छात्रा है। वह आजकल दोस्तों के बीच हिंदुओं के प्रति अपनी नफरत को लेकर चर्चा में है।

उसने भगवान गणेश और जीसस को लेकर किए आपत्तिजनक पोस्ट की है। इस ओर हमारा ध्यान उसके ही कुछ सहपाठियों ने दिलाया। असल में जब सहपाठियों ने इसके लिए आपत्ति जाहिर की तो समुदाय विशेष से आने वाली इस इस छात्रा ने उनसे कथित तौर पर कहा कि हिंदू धर्म पर क्यों नहीं हॅंस सकते?

छात्रा द्वारा किया गया आपत्तिजनक पोस्ट

हालाँकि अब छात्रा ने अपना पोस्ट डिलीट कर दिया है। मगर उसका स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इसमें देखा जा सकता है कि कक्षा 10 में पढ़ने वाली बच्ची के दिमाग में किस तरह की गंदगी और दूसरे धर्मों के प्रति नफरत भरी हुई है। यह बेहद दुखद और चिंतनीय है।

छात्रा द्वारा किया गया आपत्तिजनक पोस्ट

हमने इस बारे में स्कूल का पक्ष जानने के लिए प्रिंसिपल को कई बार फोन किया। मगर उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया। इसके बाद हमने छात्रा की क्लास टीचर को फोन किया। जब हमने इस बारे में उनसे बात की तो उन्होंने अनभिज्ञता जाहिर की।

उन्होंने कहा कि उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। छात्रा का व्यवहार पूछने पर वो कहती हैं कि वो उसे अच्छी तरह से नहीं जानती। अभी ऑनलाइन क्लासेस चल रही है, तो वो कभी आती है, कभी नहीं। 

जब उसकी क्लास के बच्चों ने उससे पूछा कि क्या उसी ने इस तरह का पोस्ट डाला है, तो उसने कहा कि हाँ, उसी ने ये पोस्ट डाला है और आगे भी डालती रहेगी। उसने कहा कि तुम लोग भी तो समुदाय विशेष पर बने मीम्स पर हँसते हो तो हिंदू धर्म के मीम पर क्यों नहीं हँस सकते।

मीम पोस्ट करने पत्र छात्रा का अपने दोस्तों को जवाब

फिलहाल छात्रा ने अपना इंस्टाग्राम अकाउंट प्राइवेट कर लिया है। उसकी क्लास की ही एक छात्रा ने ऑप इंडिया को बताया कि वो पहले भी अप्रत्यक्ष रूप से हिन्दुओं के खिलाफ मीम्स और पोस्ट डाला करती थी। वो बताती है कि किसी ने भी उसके धर्म के खिलाफ कुछ भी नहीं कहा था, इसके बावजूद उसने इस तरह का पोस्ट डाला।

मीम पोस्ट करने पत्र छात्रा का अपने दोस्तों को जवाब

सवाल उठता है कि आखिर इन बच्चों के मन में ये जहर भर कौन रहा है। कहाँ से इनके दिमाग में इतनी गंदगी आती है? बच्ची की ये हरकत उसकी परवरिश पर भी सवाल उठाता है। क्या उनके परिवार में सभी धर्मों का सम्मान करना नहीं सिखाया जाता? क्या उन्हें नहीं बताया जाता कि जिस तरह उसे अपनी मजहब के प्रति आस्था है, बाकी धर्म के लोगों की भी अपनी आस्था होती है।

क्या उनके परिवार के लोगों की इस पोस्ट पर कोई आपत्ति नहीं होगी? इसके साथ ही स्कूल के शिक्षकों का इस बारे में पता न होना भी सवाल के दायरे में आता है। जब ये पोस्ट सोशल मीडिया पर वायरल हो चुका है, तो फिर उनकी नजर में कैसे नहीं आया? 

14-15 साल की बच्ची के जेहन में इतनी कट्टरता कहाँ से आई होगी? वैसे ये पहली बार नहीं है, जब बच्चों के ऐसी कट्टरता सोशल मीडिया में दिखी हो। नागरिकता संशोधन कानून के पारित होने के समय भी आपने ऐसे अनगिनत वीडियो और फोटो देखा होगा, जिसमें बच्चे गालियाँ दे रहे हैं, देश के प्रधानमंत्री के ऊपर आपत्तिजनक टिप्पणी कर रहे हैं, आजादी के नारे लगा रहे हैं।

भला एक छोटा सा बच्चा, जिसे न तो आजादी का मतलब पता होगा और न ही सीएए का, वह कैसे इस तरह की बातें कर सकता है। हाल ही में एक वीडियो सामने आया था, जिसमें पाकिस्तान का लगभग 4-5 साल का बच्चा कहता है कि अगर इस्लामाबाद में मंदिर बना तो ये याद रखना मैं उन हिंदुओं को चुन-चुनकर मारूँगा।

हैरानी की बात है कि लोग इसे गर्व के साथ शेयर करते हैं और उसे शाबासी भी देते हैं। हिंदुओं के देवी-देवता पर आए दिन धड़ल्ले से टिप्पणी कर दी जाती है, मगर जब इस्लाम या पैगंबर टिप्पणी की जाती है, तो बात कत्लेआम तक पहुँच जाती है। कमलेश तिवारी की हत्या और हाल ही में बेंगलुरु में हुए दंगे तो याद ही होंगे आपको। तो क्या धर्मनिरपेक्षता, सर्वधर्म सद्भाव का बोझ सिर्फ हिंदुओं के कंधों पर है?

नोट: छात्रा की पहचान उजगार नहीं हो इसकी वजह से हमने स्कूल और शिक्षकों के नाम का भी जिक्र नहीं किया है। इस स्टोरी का मकसद हमारा ध्यान उस बेहद गंभीर समस्या की ओर खींचना है जो एक खास समुदाय के बच्चों को मजहबी तौर पर कट्टर बना रहा। जब आधुनिक स्कूल में पढ़ने वाली एक छात्रा के मन में दूसरे धर्म के लोगों के लिए इतनी नफरत भरी है तो आप समझ सकते हैं कि उनका क्या हाल होगा जो मुल्लों से तालीम ले रही हैं या फिर जो शिक्षा से दूर हैं।

दिल्ली दंगों पर किताब रुकवाने वाला विलियम डेलरिम्पल है औरंगजेब का मुरीद, #Metoo में भी उछला था नाम

दिल्ली दंगों पर आधारित किताब ‘दिल्ली रायट्स 2020: द अनटोल्ड स्टोरी’ का प्रकाशन ब्लूम्सबरी ने रोक दिया था। ऐसा करने के लिए वामपंथी, लिबरल और इस्लामी समूह ने सबसे ज़्यादा दबाव बनाया था। इनके अलावा एक नाम खूब चर्चा में रहा। वह है स्कॉटिश इतिहासकार और लेखक विलियम डेलरिम्पल का। पुस्तक का प्रकाशन रुकवाने में इस कथिम इतिहासकार की मुख्य भूमिका बताई जा रही। हालॉंकि यह पहला मौका नहीं है जब विलियम ने अपनी ज़हरीली मानसिकता का परिचय दिया हो।

विलियम डेलरिम्पल का मुग़लों से लगाव कभी छिपा नहीं रहा। यही वजह है कि मुग़लों का महिमामंडन करते हुए उसने दो पुस्तकें लिखी, ‘द लास्ट मुग़ल’ और व्हाइट मुग़ल।’ इतिहास गवाह है कि मुग़ल शासकों से ज्यादा मानव सभ्यता और मानव अधिकारों का नुकसान किसी और ने नहीं किया। डेलरिम्पल ने अपनी किताब में सबसे ज़्यादा औरंगज़ेब की तारीफ़ की है। उसने औरंगज़ेब को जादुई व्यक्तित्व वाला बताया है।

उसने अपनी किताब में लिखा है, “औरंगज़ेब का शुरुआती रवैया भले कैसा भी रहा हो लेकिन अंत में उसे अपनी भूल का पछतावा हुआ था। उसने अपने अंतिम पत्रों में इन बातों का ज़िक्र किया है कि उसने लोगों को जितना नुकसान पहुँचाया, जितनी तोड़-फोड़ और लूट-पाट की उसे सारी बातों का पछतावा था।” औरंगज़ेब की असलियत पर अपने झूठ का पर्दा डालते हुए डेलरिम्पल ने ऐसी कुछ और बातें लिखी हैं जो हैरान करने वाली हैं।  

सभी जानते हैं कि औरंगज़ेब ने कितने मंदिरों का विध्वंस किया। लेकिन इन वास्तविक तथ्यों को दरकिनार करते हुए डेलरिम्पल ने लिखा कि औरंगज़ेब ने भारत हिंदू धर्म के मंदिरों में जितना दान किया वह उल्लेखनीय था। एक ऐसा मुग़ल शासक जिसने राज करने के लिए अपने दो भाइयों को मरवा दिया, अपने पिता को कारावास में कैद करवा दिया, वह डेलरिम्पल जैसे इतिहासकारों की नज़र में दानवीर, दयालु और जादुई है।  

लेकिन यह तो विलियम डेलरिम्पल के व्यक्तित्व का सिर्फ एक पहलू है। साल 2018 के दौरान तथाकथित बुद्धिजीवी लेखक और इतिहासकार पर #Metoo के तहत भी आरोप लगे थे। स्क्रॉल की कर्मचारी कर्णिका ने कहा था कि डेलरिम्पल का व्यवहार बहुत भद्दा है। क्या हम कभी उसके व्यवहार के बारे में बात करेंगे?

इसके अलावा प्रीठा ने भी डेलरिम्पल के व्यवहार के बारे में विस्तार से जानकारी दी थी। उन्होंने कहा था कि डेलरिम्पल के आसपास रहना बिलकुल आसान नहीं है। उन्होंने पूरी घटना का ज़िक्र करते हुए बताया था कि कैसे विलियम डेलरिम्पल ने उन्हें फेसबुक पर मित्रता निवेदन भेजा। वह इतने पर ही नहीं रुका और तारीफ़ करते हुए संदेश में भद्दे स्माइली का इस्तेमाल करने लगा। प्रीठा ने बताया कि वह इन बातों से असहज हो ही रही थीं कि डेलरिम्पल ने उनसे डिनर और कॉफ़ी के लिए भी पूछ लिया।  

मिस कांडपाल ने भी कहा था कि जैसा प्रीठा के साथ हुआ कुछ वैसा ही मेरे साथ भी हुआ। विलियम ने मुझसे भी डिनर के लिए पूछा था। इसके अलावा लेखक और राजनीतिक विश्लेषक शुभ्रष्ठा ने भी इस बारे में जानकारी दी थी। उन्होंने कहा था शुक्र है मैं इस डिनर से बच गई और इसके बाद उन्होंने विलियम डेलरिम्पल के सन्देश का स्क्रीनशॉट साझा किया था।

ठीक ऐसे ही साल 2008 में एक साक्षात्कार के दौरान विलियम डेलरिम्पल ने काफी ज़हर उगला था। उसने कहा था कि लोग सीमाओं के पार एक दूसरे से मिलने के लिए आते-जाते रहेंगे। ठीक ऐसा ही जिन्ना ने भी इन दो देशों के बीच बर्लिन की दीवार जैसा कुछ नहीं सोचा था। जिन्ना ने सोचा था कि उसका घर मालाबार की घाटियों में होगा और सप्ताह का अंत बॉम्बे में बीतेगा। मैं इस बात के लिए पूरी तरह आशावादी हूँ, पाकिस्तान का मध्यम वर्ग तरक्की कर ही रहा है।

इस साक्षात्कार के प्रकाशित होने के कुछ महीने बाद ही मुंबई के ताज होटल पर पाकिस्तान के आतंकवादियों ने हमला कर दिया था। जिसमें सैकड़ों लोगों की जान गई थी। इसके अलावा डेलरिम्पल ने तहलका पत्रिका को एक साक्षात्कार दिया था। इसमें उसने कहा था, “मैंने पाकिस्तान को 20 साल तक कवर किया है और मैं वहाँ के लोगों के बारे में पूरी तरह गलत था। वहाँ के लोग मेरी अपेक्षा से कहीं ज़्यादा अच्छे हैं और मैं उनके लिए आशावादी हूँ।”

खुद को उदारवादी साबित करने की होड़ में विलियम डेलरिम्पल ने अपनी किताब ‘The Anarchy: The Relentless Rise of the East India Company’ में समलैंगिकता पर विचित्र श्रेणी के विचार रखे हैं। डेलरिम्पल लिखता है कि इस्लाम के अभिजात्य वर्ग में उच्च और निम्न वर्ग के लोगों के बीच समलैंगिक संबंध स्वीकार्य थे। जबकि सच यह था कि वह समलैंगिक संबंध नहीं बल्कि नाबालिग और वयस्क के बीच संबंधों की घंटनाएँ थीं। यानी डेलरिम्पल बुद्धिजीवी बनने की दौड़ में अप्राकृतिक कृत्यों को सही बता रहा था।

इतना ही नहीं खुद को इतिहासकार बताने वाला डेलरिम्पल इतिहास से जुड़े तथ्यों में भी गलती करता है। इस संबंध में लेखक अनीश गोखले ने ट्वीट कर जानकारी दी थी। उन्होंने अपनी किताब में नारायणराव पेशवा को माधवराव पेशवा से मिला दिया था। इसके अलावा झूठा दावा भी किया कि बंगाल की लड़ाई में मराठाओं की हार हुई थी।

खुद को इतिहासकार, क्यूरेटर, ब्रॉडकास्टर और आलोचक बताने वाले विलियम डेलरिम्पल ने अभी तक कई किताबें लिखी हैं। जिसमें साल 2009 में आई ‘नाइन लाइव्स’ उल्लेखनीय है, जो अलग-अलग पंथ और समुदाय से आने वाले साधुओं पर आधारित है। डेलरिम्पल ने दो टेलीवीज़न सीरीज़ भी लिखी हैं स्टोन्स ऑफ़ द राज और इंडियन जर्नीज़। कुल मिला कर उसने भारत के आधुनिक इतिहास को कई बार नए सिरे से बताने की कोशिश की है। लेकिन हर बार कही गई बात में विचारधारा ऊपर हो जाती है और वास्तविकता नीचे। मुग़लों पर लिखी गई विलियम डेलरिम्पल की पुस्तकें इस बात का सबसे सटीक उदाहरण हैं। जिस तरह अपनी किताब में उन्होंने औरंगज़ेब को अच्छा शासक बताया, उससे लेखक की असल मंशा पूरी तरह साफ़ हो जाती है।   

ठीक वैसा ही कुछ नज़र आ रहा है दिल्ली दंगों पर आधारित किताब दिल्ली रायट्स 2020: द अनटोल्ड स्टोरी के मामले में। ख़बरों में बात यहाँ तक सामने आई है कि किताब के प्रकाशन पर रोक उसके बिना संभव ही नहीं होती। कई लोगों ने ट्विटर पर सार्वजनिक रूप से इसके लिए विलियम डेलरिम्पल का आभार तक जताया है।  

इतना ही नहीं वह इस किताब का प्रकाशन रुकवाने के लिए काफ़ी समय से लगा हुआ था। इसके लिए उससे कई वामपंथी लेखकों से निवेदन भी किया था। ऐसे में इस बात का अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है कि डेलरिम्पल ने भारतीय आधुनिक इतिहास को केंद्र में रख कर जितना कुछ लिखा है, वह कितना विश्वसनीय और प्रासंगिक होगा।