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इधर मनोज तिवारी से टिकट के लिए ₹5 करोड़ माँगती रही TMC, उधर ‘नरेंद्र कप’ से BJP ने बदल दी गेम: बंगाल के इन नतीजों का क्रिकेट-फुटबॉल भी एक प्लेयर

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) का किला ढह गया है। इस बीच TMC में तनातनी साफ दिख रही है। पूर्व क्रिकेटर और TMC सरकार में खेल मंत्री रहे मनोज तिवारी ने पार्टी का दामन छोड़ दिया है। उनका कहना है कि इस बार के विधानसभा चुनाव 2026 में पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दिया, क्योंकि क्रिकेटर ने पार्टी को ₹5 करोड़ देने से इनकार कर दिया था। दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने क्रिकेट और फुटबॉल जैसे खेलों को अपनी जीत का फैक्टर बनाया।

दरअसल, पूर्व क्रिकेटर मनोज तिवारी ने मंगलवार (05 मई 2026) को कहा कि उनका और TMC का चैप्टर अब बंद हो चुका है। मनोज ने TMC पर आरोप लगाते हुए कहा, “जो लोग भारी भरकम रकम दे सकते थे वो ही टिकट खरीद सकते थे। इस बार 70-72 लोगों ने टिकट के बदले ₹5 करोड़ दिए हैं। मुझसे भी यह कहा गया था, लेकिन मैंने देने से मना कर दिया। जरा देखिए कि जिन लोगों ने टिकट के बदले पैसे दिए तो वह जीत पाए हैं या नहीं। जहाँ तक TMC की बात है तो, मेरे लिए ये चैप्टर खत्म हो गया है।”

बता दें कि मनोज तिवारी भारतीय टीम के पू्र्व क्रिकेटर रहे हैं। साल 2021 में वे हावड़ा की शिबपुर सीट से TMC से विधायक बने और ममता बनर्जी की सरकार में वे खेल राज्य मंत्री भी रह चुके हैं। लेकिन अब बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की प्रचंड बहुमत की सरकार बनने के बाद उनका भी कार्यकाल खत्म हो चुका है। TMC की हार पर भी मनोज तिवारी ने कहा, मैं इस हार से बिल्कुल हैरान नहीं हूँ क्योंकि एक दिन यह होना ही था। जब एक पार्टी पूरी तरह भ्रष्टाचार में लिप्त हो तो और किसी भी सेक्टर में कोई विकास नहीं हो तो, ये होना ही था।”

भारत के लिए क्रिकेट में सम्मान प्राप्त कर चुके मनोज तिवारी का यह बयान TMC पर लग रहे ‘जंगलराज’ के आरोपों को सिद्ध करते हैं। वहीं दूसरी तरफ BJP है, जिसकी बंगाल चुनाव में प्रचंड जीत में क्रिकेट और फुटबॉल की पूर्ण भूमिका है।

बंगाल में क्रिकेट और फुटबॉल बने BJP का हथियार

पश्चिम बंगाल में क्रिकेट और खासकर फुटबॉल सिर्फ खेल नहीं बल्कि सामाजिक पहचान का हिस्सा हैं। राज्य को ‘भारत का फुटबॉल हब’ माना जाता है, जहाँ मोहुन बागान, ईस्ट बंगाल क्लब जैसे क्लबों की मजबूत जड़े हैं। यही कारण है कि किसी भी राजनीतिक पार्टी के लिए खेल के जरिए जनता तक पहुँच बनाना बेहद प्रभावी रणनीति बन जाता है।

BJP ने इसी सामाजिक जुड़ाव को समझते हुए अपने चुनावी कैंपेन में क्रिकेट और फुटबॉल को सीधे शामिल किया। चुनावी भाषा में ‘मैच’, ‘टीम’, ‘रणनीति’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया, जिससे जनता, खासतौर पर युवाओं में एक जुड़ाव बना। राजनीतिक विश्लेषण में भी इस चुनाव को T-20 मुकाबले जैसा बताया गया, जहाँ हर चरण एक ओवर की तरह अहम था।

‘नरेंद्र कप’ से ग्राउंड लेवल पर मजबूत की पकड़

BJP ने फुटबॉल को जमीनी स्तर पर मजबूत कनेक्शन बनाने का माध्यम बनाया। पार्टी ने कई इलाकों में स्थानीय फुटबॉल टूर्नामेंट आयोजित किए, जिनमें सबसे चर्चित ‘नरेंद्र कप फुटबॉल टूर्नामेंट’ रहा। इस टूर्नामेंट का नाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जोड़ा गया, जिससे पार्टी ने खेल के जरिए राजनीतिक पहचान को सीधे जनता तक पहुँचाया।

‘नरेंद्र कप’ में 1200 पुरुष टीमों और 18000 खिलाड़ियों ने भाग लिया। लगभग 1 लाख खिलाड़ियों को जर्सी और टी-शर्ट वितरित की गईं। खिलाड़ियों को 80,000 से अधिक फुटबॉल भी दिए गए। इतना ही नहीं BJP ने महिला मतदाताओं को टारगेट करने के लिए महिलाओं के अलग से टूर्नामेंट आयोजित किए, जिसमें 253 टीमों ने भाग लिया। दिल्ली में बैठे BJP के बड़े नेताओं ने भी बंगाल में ‘नरेंद्र कप’ पर बात की।

पार्टी ने प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर वाले 5000 से अधिक क्रिकेट बैट भी वितरित किए। इन टूर्नामेंट के जरिए गाँव और कस्बों में युवाओं की बड़ी भागीदारी देखने को मिली। इससे BJP को उन क्षेत्रों में भी पकड़ा बनाने का मौका मिला जहाँ पहले संगठन कमजोर था। इसके साथ ही पार्टी ने लगभग 70,671 बूथों पर कमेटियाँ बनाईं और करीब 8.76 लाख कार्यकर्ताओं को जोड़ा, जिससे यह फुटबॉल नेटवर्क सीधे वोट-बैंक में बदलता गया।

लियोनेल मेसी बना TMC की हार की वजह, BJP ने उठाया फायदा

इसके अलावा BJP को फुटबॉल स्टार लियोनेल मेसी के बंगाल दौरे का भी फायदा हुआ। जब दिसंबर 2025 में मेसी का GOAT टूर कोलकाता पहुँचा, लेकिन स्टेडियम में महँगे टिकट (₹8000-₹10000)खरीदकर पहुँचे फैंस को मेसी की एक झलक देखने को नहीं मिली। तो कार्यक्रम कुप्रबंधन के कारण बवाल हुआ और फुटबॉल प्रेमियों पर ममता सरकार की पुलिस ने लाठीचार्ज किया।

तब BJP ने इस मुद्दे पर TMC सरकार पर हमला बोला। BJP ने इसे ‘बंगाल का अपमान’ बताकर TMC को घेरा। BJP नेता अमित मालवीय समेत बड़े-बड़े नेताओं ने इसे TMC की भ्रष्टाचार वाली इमेज से जोड़ा। फुटबॉल प्रेमियों की नाराजगी को BJP ने वोट बैंक में बदला। अब बंगाल में BJP की जीत के बाद लियोनेल मेसी फिर ट्रेंड करने लगे। लोग लियोनेल मेसी के कार्यक्रम में कुप्रबंधन को TMC की हार की वजह बता रहे हैं।

क्रिकेट चेहरों की लोकप्रियता को वोट में बदला

BJP ने लोकप्रिय क्रिकेट चेहरों के जरिए अपनी पहुँच बढ़ाने की कोशिश की। 2022 में सौरव गांगुली को BCCI अध्यक्ष पद से हटाए जाने पर बंगाल की राजनीति गरमाई। TMC ने BJP पर आरोप लगाया कि पार्टी ने 2021 चुनाव से पहले गांगुली को अपनी पार्टी में शामिल करने की कोशिश की थी, लेकिन वे शामिल नहीं हुए। TMC ने आरोप लगाए कि BJP ने सौरव गांगुली को प्रतिशोध में पद से हटवाया। लेकिन BJP ने इसे खारिज किया, कहा कि हमने कभी शामिल करने की कोशिश नहीं की, TMC घड़ियाली आँसू बहा रही है।

BJP ने गांगुली जैसे ‘प्रिंस ऑफ कोलकाता’ की लोकप्रियता को भुनाने की कोशिश की, लेकिन वे पार्टी में नहीं गए। इससे BJP ने बंगाली गर्व का मुद्दा बनाया, TMC पर हमला किया कि गांगुली का अपमान TMC की नाकामी साबित करता है।

ऐसे ही पूर्व भारतीय तेज गेंदबाज अशोक डिंडा को BJP ने 2021 और 2026 विधानसभा चुनावों में टिकट दिया। दोनों ही चुनावों में अशोक डिंडा ने TMC उम्मीदवारों को करारी शिकस्त दी। डिंडा का हावड़ा में लोकल कनेक्ट और क्रिकेट स्टार इमेज ने BJP को ग्रामीण शहरी वोटरों से जोड़ा।

यह BJP का लोकप्रिय चेहरों को वोट में बदलने की रणनीति का हिस्सा था, जहाँ क्रिकेटरों की इमेज से युवा वोटरों को लुभाया गया।

जिस्म मर्दाना, रूह जनाना: मिलिए औरतों के कपड़े पहन अंग की नुमाइश करने वाले OP जिंदल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर विक्रमादित्य सहाय से, भारत-हिंदू घृणा ही है पहचान

भारत के शैक्षणिक संस्थानों में घुसकर भारत विरोधी विचारधारा का प्रचार-प्रसार करना अर्बन नक्सलियों का लंबे समय से काम रहा है। इस बार ये हरकत करते एक ट्रांसजेंडर टीचर पकड़ा गया है। टीचर का नाम- विक्रमादित्य सहाय है। सहाय पहले भी अपनी विवादित हरकतों के चलते चर्चा में आया था, मगर तब बातें आई-गई हो गईं।

इस बार सोशल मीडिया पर एक ऑडियो वायरल हुई है। कथिततौर पर यह विक्रमादित्य सहाय की ही है, जिसमें वो खाप पंचायत के खिलाफ बोलता सुनाई पड़ रहा है। दावा है कि स्प्रिंग 2026 क्लास में Consent मुद्दे पर पढ़ाते हुए वह छात्रों से कहता है- “तुम जानते हो तुम्हारे कॉलेज का चांसलर और सांसद जिंदल खाप पंचायतों को आधिकारिक रूप से सपोर्ट करता है।” यहाँ ये पढ़ाते हुए वह जोर देता है- “वही खाप पंचायतें जो ऑनर किलिंग कराती हैं।”

यह आडियो अब वायरल है। सामने आ रहा है कि खाप पंचायत इससे भड़की हुई हैं और साथ में वो छात्र भी जिन्हें समझ आ चुका है कि कैसे ये टीचर क्लासरूम में शिक्षा के नाम पर बच्चों के दिमाग में जहर भर रहा था।

सहाय से जुड़ी विवादित ऑडियो वायरल होने के बाद जब हमने इसे बैकग्राउंड को खंगाला तो पता चला कि ये यह केवल अकेला मामला नहीं है जिसके कारण विक्रमादित्य सहाय की ओपी जिंदल यूनिवर्सिटी में नियुक्ति पर सवाल खड़े हुए।

इससे पहले उसके कई ऐसे बयान सामने आए हैं जिसे देखते हुए लोग पूछ रहे हैं कि आखिर भारत विरोधी-हिंदू विरोधी मानसिकता वाले शख्स किस बिनाह पर शिक्षा संस्थानों में पढ़ाने के लिए चुन लिए जाते हैं?

कौन है विक्रमादित्य सहाय?

‘सेंटर फॉर जस्टिस लॉ एंड सोसायटी’ पर साझा की गई विक्रमादित्य सहाय की प्रोफाइल के अनुसार, वह इस समय जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत है। इससे पहले उसने दिल्ली की अंबेडकर यूनिवर्सिटी में जहाँ साहित्य, विकास अध्ययन और जेंडर स्टडीज़ जैसे विषयों पर पढ़ाया है।

इसके अलावा बेंगलुरु के ‘सेंटर फॉर लॉ एंड पॉलिसी रिसर्च’ में में सीनियर रिसर्च एसोसिएट के तौर पर काम किया है। वहीं मुंबई के TISS में महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर एक प्रोजेक्ट में कंसल्टेंट भी रहा है। शिक्षा को लेकर उसकी प्रोफाइल में जानकारी है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी से राजनीति विज्ञान में पोस्टग्रेजुएट है।

अकादमिक प्रोफाइल जहाँ बताती है कि विक्रमादित्य सहाय की रुचि समाज, कानून, और जेंडर से जुड़े मुद्दों को समझने में है। वहीं अगर सोशल मीडिया फुटप्रिंट्स देखेंगे तो आपको समझ आएगा कि कैसे ट्रांसजेंड एक्टिविज्म के नाम पर विक्रमादित्य सहाय अलग ही नैरेटिव और प्रोपगेंडे को बढ़ाने में जुटा हुआ है।

प्रोफेसर की डिजिटल पहचान और इंस्टा ID पर अधनंगी तस्वीरों की भरमार

उसकी इंटाग्राम आईडी- Vqueer नाम से है। आईडी में 400+ पोस्ट डाले गए हैं। अकॉउंट खंगालने पर पता चलता है कि कैसे उसने ट्रांसजेंडर आइडेंटिटी और उनकी आजादी के नाम पर अश्लील तस्वीरों की झड़ी लगा रखी है। किसी तस्वीर में अर्धनग्न अवस्था में लेटा है तो किसी में उसने बिकनी तक शरीर पर नहीं पहनी है। यहाँ तक प्रोफाइल फोटो में भी जिंदल ग्लोबल स्कूल के प्रोफेसर ने बिकनी पहनी फोटो को लगा रखा है।

नैतिकता के आधार पर शायद ऐसी हरकत अगर कोई सामान्य टीचर करता तो शायद उससे सवाल पूछे जाते, उनकी हरकतों के लिए उनके खिलाफ एक्शन भी लिया जाता, लेकिन यहाँ विक्रमादित्य सहाय की सारी अश्लीलता ‘ट्रांसजेंडर एक्टिविज्म’ के नाम पर गिनकर माफ की जा रही हैं।

इंस्टा आईडी पर साझा किए गए पोस्टों का स्क्रीनशॉट

चिंताजनक बात यह है कि विक्रमादित्य के डिजिटल फुटप्रिंट को अगर निजी जीवन कहकर एक बार को नकार भी दिया जाए तो भी ये देखना जरूर चाहिए कि कैसे ये अपनी अधनंगी तस्वीरों के साथ लिखे गए कैप्शन में अपने भारत विरोधी एजेंडे को बढ़ावा दे रहा है। इंस्टा पोस्ट के कैप्शन में इसने कश्मीर (में अलगाववाद), बस्तर ( में नक्सलवाद), फिलीस्तीन (में हमास के आतंकवाद) को प्रमोट किया हुआ है।

विक्रमादित्य सहाय का पोस्ट

वहीं क्लासरूम की बात दोबारा करें तो सामने आई ऑडियो से पता चलता है कि कैसे इसे हिंदुओं के आस्था वाली जगहों से घृणा आती है, राम मंदिर पर सवाल का जवाब देने से परहेज करता है, मगर जब मजहबी विचार का प्रचार करना होता है तो खुलकर क्लास में ‘इंशाल्लाह’ बोलता है।

विक्रमादित्य सहाय के पुराने बयान

गौरतलब हो कि विक्रमादित्य सहाय का वर्तमान विवाद कोई इकलौती घटना नहीं है, बल्कि यह उनके पुराने विवादित दृष्टिकोण का ही विस्तार नजर आता है।

आपको याद है क्या 2021 में NCERT द्वारा जेंडर और ट्रांसजेंडर विषय पर शिक्षकों के लिए जारी किया गया विवादित मैनुएल। 115 पेज के मैनुअल में सवाल ये खड़े किए गए थे कि आखिर स्कूलों में लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग टॉयलेट क्यों होते हैं?

तर्क था कि इस प्रैक्टिस के चलते लिंग भेदभाव बढ़ता है। मैनुअल सामने आने के बाद विवाद बढ़ा तो इससे बनाने वालों के बारे में जाँच हुई। सामने आया कि ऐसी हरकत करने वाली टीम में विक्रमादित्य सहाय भी हिस्सा था। उस समय भी इसकी सोशल मीडिया प्रोफाइल को लेकर कई सवाल उठे थे और इसकी हरकतों को लेकर ध्यान दिलाया गया था।

इसी तरह, इसकी एक पुरानी ऑडियो अगर सुनेंगे तो उससे साफ होगा कि कैसे अपने आपको बुद्धिजीवी मानकर बैठा विक्रमादित्य सहाय अपनी ट्रांस आईडी का फायदा उठाकर कैमरे तक पर कहता है कि भारत का होना या हिंदू होना कोई बड़ी बात नहीं है जिसे दोहराया जाए।

वीडियो में समझाता है है- आपको हिंदू कहने में, अपने आपको भारतीय कहने में या फिर अपने आपको आदमी कहने में कोई गर्व करने वाली बात नहीं होनी चाहिए। उसके मुताबिक अगर आप खुद को आदमी कहते हो तो महिलाओं पर अत्याचार करोगे, हिंदू कहते हो तो दलितों पर अत्याचार करोगे या फिर मुस्लिमों और ईसाइयों पर, अगर खुद को भारतीय कहते हो आप उस हर भूमि पर अपना राज चलाओगे जिसे आपने कब्जा किया होगा।

ट्रांस आइडेंटी का फायदा और अर्बन नक्सल विचारधारा

आमतौर पर ऐसे चेहरे ‘ट्रांसजेंडर राइट्स’ और ‘समानता’ के नाम पर जगह बनाते हैं, फिर उसका इस्तेमाल अर्बन नक्सल विचारधारा को फैलाने के लिए करने लगते हैं। विक्रमादित्य सहाय भी यही कर रहे हैं। एक्टिविस्ट का मुखौटा पहनकर भारत और हिंदू घृणा को फैलाने का काम कर रहे हैं।

इस मामले के चर्चा में आने के बाद आज हमारे लिए सबसे चिंताजनक बात यह होनी चाहिए है कि ये लोग अपने एजेंडे को फैलाने के लिए ‘क्लासरूम’ जैसी जगहों को चुन रहे हैं। क्लासरूम वह जगह है जहाँ भविष्य के राष्ट्र निर्माता तैयार होते हैं। यदि शिक्षा के मंच से ही छात्रों के मन में अपनी सभ्यता, राष्ट्र और संस्कृति के प्रति जहर भरा जाएगा, तो ये ‘बौद्धिक नक्सली’ बंदूकधारी आतंकवादियों से भी अधिक घातक सिद्ध होंगे।

शिक्षण संस्थानों को ट्रांसजेंडर को मौका देने के नाम पर नियुक्ति करने से पहले ऐसे लोगों की मानसिकता और पिछले रिकॉर्ड की समीक्षा करनी चाहिए। यदि जिंदल यूनिवर्सिटी ने ऐसा नहीं किया है तो उन्हें भी इस पर गौर करना चाहिए। इनके साथ नरमी का मतलब है कैंपस में अर्बन नक्सलिज्म को संरक्षण देना।

चुनाव हारने के बाद भी मुख्यमंत्री इस्तीफा न दें तो क्या कर सकते हैं गवर्नर, जानिए ममता बनर्जी की बकलोली का कितना है महत्व: पश्चिम बंगाल में नई सरकार का गठन कैसे?

भारतीय लोकतंत्र की परंपरा रही है कि चुनाव नतीजे आने के बाद मुख्यमंत्री अपना इस्तीफा राज्यपाल को सौंप देते हैं। फिर राज्यपाल नई सरकार और विधानसभा के गठन की प्रक्रिया शुरू करते हैं। सत्ताधारी दल के चुनाव जीतने पर भी यही प्रक्रिया है। लेकिन पश्चिम बंगाल का चुनाव हारने के बाद भी इस्तीफा नहीं देने की बात कह ममता बनर्जी ढीठपना का एक नया अध्याय लिख रही हैं।

हालाँकि जो संवैधानिक प्रक्रिया हैं उसमें ममता बनर्जी की बकलोली का कोई खास महत्व नहीं है। आइए जानते हैं कि ऐसी स्थिति में पश्चिम बंगाल में नई सरकार और विधानसभा का गठन कैसे होगा? क्या अतीत में भारत के किसी राज्य में पहले भी ऐसी स्थिति बन चुकी है?

क्या मुख्यमंत्री की जिद कानून से बड़ी है?

संविधान के हिसाब से मुख्यमंत्री की कुर्सी किसी की निजी जागीर नहीं होती। यह एक तय प्रक्रिया से चलती है। सुप्रीम कोर्ट के बड़े वकील विकास सिंह का कहना है कि मुख्यमंत्री तब तक पद पर रहता है जब तक राज्यपाल की सहमति हो। इसे कानून की भाषा में ‘डॉक्ट्रिन ऑफ प्लेजर’ कहते हैं।

जब तक मुख्यमंत्री के पास बहुमत रहता है, तब तक राज्यपाल उनके काम में दखल नहीं देते। लेकिन जैसे ही चुनाव के नतीजे आते हैं और यह साफ हो जाता है कि सरकार हार गई है, तो मुख्यमंत्री की सारी ताकत खत्म हो जाती है। ऐसे में इस्तीफा न देने की बात कहना सिर्फ राजनीति का हिस्सा है, कानूनन इसका कोई आधार नहीं है।

इस्तीफा न देने पर राज्यपाल क्या करेंगे?

अगर कोई मुख्यमंत्री चुनाव हार जाए और फिर भी कुर्सी न छोड़े, तो राज्यपाल चुप नहीं बैठते। संविधान के अनुच्छेद 164 के तहत उनके पास बहुत ताकत होती है। राज्यपाल सबसे पहले मुख्यमंत्री को खुद इस्तीफा देने के लिए कहते हैं। अगर मुख्यमंत्री मना कर देते हैं, तो राज्यपाल उन्हें और उनके मंत्रियों को तुरंत उनके पद से हटा यानी बर्खास्त कर सकते हैं।

इसके लिए उन्हें मुख्यमंत्री की परमिशन की जरूरत नहीं होती। इसके बाद राज्यपाल चुनाव आयोग से जीतने वाले नेताओं की लिस्ट माँगते हैं और देखते हैं कि किस पार्टी के पास सबसे ज्यादा सीटें हैं, ताकि नई सरकार बनाई जा सके।

कैसे बनेगी नई सरकार?

ममता बनर्जी भले ही राजभवन जाने से मना कर दें, लेकिन वह नई सरकार को बनने से रोक नहीं सकतीं। राज्यपाल सीधे बहुमत पाने वाली पार्टी यानी BJP के नेता को सरकार बनाने के लिए बुलाएँगे। कानून के मुताबिक राज्यपाल को नए मुख्यमंत्री को शपथ दिलाने का पूरा हक है।

जैसे ही नया मुख्यमंत्री शपथ लेता है, पुराने मुख्यमंत्री की सारी पावर खत्म हो जाती है। पुलिस और प्रशासन की कमान भी नए मुख्यमंत्री के पास चली जाती है। इसके बाद पुरानी सरकार के पास कोई कानूनी ताकत नहीं बचती और उनका कुर्सी पर अड़े रहने का कोई फायदा नहीं होता।

7 मई की आखिरी तारीख और कुर्सी का जाना

बंगाल की पुरानी विधानसभा का समय 7 मई को खत्म हो रहा है। यह एक बहुत जरूरी नियम है। संविधान कहता है कि जैसे ही विधानसभा का समय पूरा होता है, वह अपने आप खत्म यानी भंग हो जाती है। इसका मतलब है कि 8 मई की सुबह होते ही ममता बनर्जी कानूनी रूप से मुख्यमंत्री नहीं रहेंगी।

भले ही वह इस्तीफा दें या न दें, 8 मई से नई सरकार बनाने का काम शुरू करना ही होगा। BJP ने पहले ही बता दिया है कि 9 मई को नए मुख्यमंत्री शपथ ले सकते हैं। ऐसी स्थिति में इस्तीफा देने की जिद का कोई मतलब नहीं रह जाएगा, क्योंकि कानून की नजर में उनकी सरकार की ताकत पहले ही खत्म हो चुकी होगी।

जब हालात बिगड़ें तो क्या है आखिरी रास्ता?

अगर हारने के बाद भी मुख्यमंत्री कुर्सी न छोड़ें और सरकारी काम में अड़ंगा डालने लगें, तो राज्यपाल के पास एक बहुत सख्त कानून होता है। वह केंद्र सरकार से राज्य में ‘राष्ट्रपति शासन‘ (अनुच्छेद 356) लगाने की सिफारिश कर सकते हैं। यह कदम तब उठाया जाता है जब राज्य की कानून-व्यवस्था पूरी तरह फेल हो जाए।

हालाँकि, बंगाल के मामले में BJP को साफ बहुमत मिला है, इसलिए इसकी जरूरत नहीं पड़ेगी। राज्यपाल सीधे नए मुख्यमंत्री को शपथ दिलाकर सरकार बनवा सकते हैं। सीधी बात यह है कि लोकतंत्र में जनता का फैसला ही सबसे बड़ा होता है। कोई भी नेता बहुमत खोने के बाद जबरदस्ती सत्ता में नहीं रह सकता।

किन-किन मुख्यमंत्रियों ने इस्तीफा देने से किया था इनकार?

साल 2015 में बिहार में भी ऐसा ही ड्रामा हुआ था। नीतीश कुमार ने अपनी जगह जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया था। कुछ समय बाद जब नीतीश वापस मुख्यमंत्री बनना चाहते थे, तो मांझी ने कुर्सी छोड़ने से मना कर दिया। पार्टी में भारी खींचतान हुई और उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया। आखिरकार बहुमत साबित करने से ठीक पहले उन्होंने इस्तीफा दिया।

साल 2007 में कर्नाटक में JDS और BJP के बीच सरकार चलाने का समझौता हुआ था। तय हुआ था कि 20 महीने बाद कुमारस्वामी मुख्यमंत्री का पद येदियुरप्पा को सौंप देंगे। लेकिन समय आने पर कुमारस्वामी ने इस्तीफा देने से साफ मना कर दिया। इसके बाद BJP ने समर्थन वापस ले लिया। नतीजा यह हुआ कि राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा।

उत्तर प्रदेश में साल 1998 में भी ऐसा ही ड्रामा हुआ था, जब राज्यपाल ने कल्याण सिंह को हटाकर जगदंबिका पाल को रातों-रात मुख्यमंत्री बना दिया था। हालाँकि, मामला अदालत पहुँचा और सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हुए चुनाव (फ्लोर टेस्ट) के बाद जगदंबिका पाल को महज 44 घंटे में अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी थी।

लेकिन जो ड्रामा बंगाल चुनाव के बाद ममता बनर्जी ने किया, वो अभी तक किसी ने नहीं किया था। अपनी हार को ममता बनर्जी पचा नहीं पा रही है और मुख्यमंत्री पद पर बने रहने की जिद कर रही हैं।

अगर TMC जीतती तो क्या होता?

यहाँ यह समझना भी जरूरी है कि अगर बंगाल चुनाव में TMC को बहुमत मिलता, तब भी पुरानी सरकार का कार्यकाल तो खत्म होना ही था। नियम के मुताबिक, ममता बनर्जी को पहले इस्तीफा देना पड़ता और फिर नई विधानसभा के गठन की प्रक्रिया शुरू होती। वे बहुमत के साथ दोबारा दावा पेश करतीं और फिर से मुख्यमंत्री पद की शपथ लेतीं।

संविधान के अनुसार, बिना शपथ लिए और बिना नई विधानसभा के गठन के कोई भी मुख्यमंत्री कुर्सी पर नहीं रह सकता। यानी जीत हो या हार, 7 मई के बाद पुरानी सत्ता का अंत और नई प्रक्रिया का पालन करना कानूनी मजबूरी है। लोकतंत्र में कोई भी व्यक्ति बिना शपथ और बिना जनादेश के मुख्यमंत्री की शक्तियों का इस्तेमाल नहीं कर सकता।

बंगाल में BJP की जीत ‘मील का पत्थर’, लेकिन परीक्षा अब होगी शुरू: जानें- कौनसी हैं बड़ी चुनौतियाँ, कैसे ‘हिंदू इकोसिस्टम’ है समाधान

4 मई 2026 का दिन पश्चिम बंगाल में बीजेपी के लिए एक दशकों पुराने सपने के सच होने का दिन था। भाजपा की जीत बड़ी थी, आँकड़े बहुत बड़े थे। ममता बनर्जी अपनी परंपरागत सीट भबानीपुर तक नहीं बचा पाईं। यह महज एक चुनावी जीत नहीं थी यह दशकों की पीड़ा, भय और दबी भावनाओं का एक सामूहिक विस्फोट था।

भाजपा ने 207 सीटें जीतकर स्पष्ट और बड़ा बहुमत हासिल किया लेकिन असली बात यह थी कि जो मिट्टी दशकों से एक खास राजनीतिक रंग में रंगी हुई थी उसमें यह बदलाव कैसे आया। राजनीति में हार-जीत होती रहती है। आज यह जीता, कल वो जीतेगा और यही लोकतंत्र की सामान्य प्रक्रिया होती है। लेकिन बंगाल में जो हुआ वह सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं है। बंगाल की जीत की कहानी वहाँ की सोच, माहौल आर ‘राजनीतिक जीन’ में बदलाव का संकेत है।

बदल गया दशकों का एंटी BJP कल्चर

पश्चिम बंगाल की राजनीतिक संस्कृति को समझने के लिए इतिहास में थोड़ा पीछे जाना होगा। इस राज्य में लंबे समय तक राजनीति एक ही दिशा में चलती रही है। पहले कांग्रेस और फिर वामपंथियों दशकों का शासन। इसके बाद भी जब जनता ने वामपंथियों से ऊब कर बदलाव भी चाहा तो उन्होंने ममता बनर्जी की तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) को चुना। लेकिन यह बदलाव कोई बदलाव नहीं था बल्कि यह राजनीतिक मॉडल की नई पैकेजिंग थी जिसका चेहरा बदला हुआ था। बाकी तो राजनीतिक हिंसा वैसी ही थी, तुष्टीकरण वही था और सत्ता का दुरुपयोग भी उसी तरह चल रहा था।

बंगाल की दशकों की यात्रा में एक चीज जो लगातार बनी हुई थी वो थी यहाँ का एंटी-भाजपा कल्चर। भाजपा के बारे में धारणा ऐसी बन दी गई थी कि यह तो बस उत्तर भारत की पार्टी है जो ‘बांग्ला संस्कृति’ को नहीं समझती है। यह धारणा लोगों के दिल में इस तरह घर कर गई थी कि भाजपा का सत्ता में आना असंभव नहीं तो बहुत कठिन जरूर लगता था। इसीलिए यह जीत सामान्य नहीं है। यह उस मिट्टी में फूल खिलाने जैसा है जो इस फूल के अनुकूल नहीं मानी जाती थी।

बंगाल की जीत: BJP की यात्रा में मील का पत्थर

भाजपा की राजनीतिक यात्रा को अगर ध्यान से देखा जाए तो उसमें कुछ ऐसे पड़ाव साफ दिखाई देते हैं जिन्होंने पार्टी की दिशा और दशा दोनों को बदला दिया। 1984 में महज 2 सीटों से शुरुआत और फिर 1999 में केंद्र की सत्ता तक पहुँचना, बीजेपी की इस यात्रा का बड़ा अध्याय था। इसके बाद 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जब अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनी तो यह जीत पार्टी के इतिहास का एक निर्णायक मोड़ साबित हुई।

बंगाल की जीत को भी किसी भी मायने में इससे कम नहीं समझा जाना चाहिए। यह केवल एक चुनावी सफलता भर नहीं है बल्कि पार्टी के वैचारिक विस्तार का संकेत है। दशकों तक जिस राज्य में भाजपा को स्वीकार्यता नहीं मिली, जहाँ उसकी राजनीतिक सोच को लगातार खारिज किया गया अब वहीं पर उस विचार का जनसमर्थन में बदल जाना अपने आप में एक असाधारण घटना है।

यह जीत बीजेपी के लिए मील के पत्थर की तरह है। जब भविष्य में बीजेपी के विराट विस्तार की कहानियाँ लिखी जाएँगी तो उसमें बंगाल की यह जीत एक महत्वपूर्ण अध्याय होगी। 2026 की इस जीत को किसी पैराग्राफ या 4 लाइनों में नहीं लिखकर आगे नहीं बढ़ा जा सकेगा बल्कि इसके लिए अलग से पूरा अध्याय लिखना होगा। यह अध्याय भाजपा के स्वर्णिम काल का एक चमकता पन्ना बनेगा।

असाधारण बदलाव – असाधारण चुनौतियाँ

पश्चिम बंगाल में भाजपा की यह जीत जितनी बड़ी और असाधारण है, उतनी ही बड़ी जिम्मेदारियाँ और चुनौतियाँ भी इसके साथ आई हैं। लंबे समय से एक अलग राजनीतिक संस्कृति में चल रहे इस राज्य को नई दिशा देना आसान काम नहीं होगा। यह जीत तो मुश्किल थी ही लेकिन बीजेपी के लिए जीत के बाद असली परीक्षा अब शुरू होने जा रही है। हम बात करेंगे कुछ चुनौतियों की जिनसे निपटना सत्ता के इस दौर में बीजेपी के लिए जरूरी होगा।

  1. राजनीतिक हिंसा की संस्कृति को खत्म करना

बंगाल में राजनीतिक हिंसा कोई नई बात नहीं है बल्कि यह वर्षों से चली आ रही एक व्यवस्था का हिस्सा बन चुकी है। चाहे कॉन्ग्रेस का शासन रहा हो, वामपंथी शासन रहा हो या तृणमूल कॉन्ग्रेस का दौर, विरोधियों को दबाने के लिए राज्य में हिंसा का इस्तेमाल किए जाने के आरोप लगातार लगते रहे हैं। सत्ता द्वारा पोषित गुड़ों का कहर लोगों पर टूटा है, महिलाओं की इज्जत-आबरू के साथ खिलवाड़ हुआ है और राजनीतिक हत्याओं के आँकड़े भी कम डराने वाले नहीं हैं।

अब बीजेपी की नई बनने जा रही सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि व्यवस्था का हिस्सा बन चुकी इस परंपरा को खत्म कैसे किया जाए। यह काम आसान नहीं होने जा रहा है। लेकिन बीजेपी ने इस बात के संकेत दिया है कि वो इस हिंसा की इस संस्कृति को बदल देगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कार्यकर्ताओं को चुनावी जीत के बाद ‘बदला नहीं, बदलाव’ का संदेश इसी वजह से अहम है। इसका मतलब है कि कानून का राज कायम हो लेकिन बिना किसी प्रतिशोध की भावना के। साथ ही यह भी जरूरी होगा कि वर्षों से दबाव में रहे कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों को सुरक्षा और भरोसा मिल सके। यह संतुलन बनाना ही असली चुनौती है।

  1. प्रशासनिक मशीनरी का पुनर्गठन

बंगाल की प्रशासनिक व्यवस्था पर भी लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। यह आरोप लगता रहा है कि सरकारी मशीनरी खासकर पुलिस और स्थानीय प्रशासन सत्ताधारी दल के प्रभाव में काम करती रही है।

नई सरकार के लिए चुनौती यह है कि इस पूरे सिस्टम को निष्पक्ष बनाया जाए। लेकिन यह कोई ऐसा काम नहीं है जो एक दिन में हो जाए। हजारों अधिकारियों और कर्मचारियों को न तो तुरंत बदला जा सकता है, न ही हटाया जा सकता है। ऐसे में उनसे ईमानदारी और निष्पक्षता के साथ काम करवाना, सिस्टम में भरोसा लौटाना, यह एक धीमी लेकिन जरूरी प्रक्रिया होगी।

  1. पारा मॉडल और कट मनी की व्यवस्था

बंगाल में ‘पारा’ यानी मोहल्ला स्तर पर एक अलग तरह की गुंडों की स्थानीय सत्ता संरचना विकसित हो चुकी थी। तृणमूल कॉन्ग्रेस के दौरान कई जगहों पर कैरम क्लब जैसे स्थानीय क्लबों के जरिए आम लोगों से वसूली किए जाने के मामले सामने आए। यहाँ तक कि ये स्थानीय गुंडे ही तय करते थे कि किसी को सरकारी योजनाओं का लाभ मिलेगा या नहीं, किसी की शिकायत पुलिस में दर्ज होगी की नहीं और इन सब काम के बदले ‘कट मनी’ ली जाती रही है।

यह व्यवस्था इतनी गहराई तक फैल चुकी है कि इसे खत्म करना एक लंबी प्रक्रिया होगी। नई सरकार के सामने चुनौती यह है कि वह ऐसी व्यवस्था बनाए जिसमें सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे लोगों तक पहुँचे, बिना किसी बिचौलिए के, बिना किसी अतिरिक्त पैसे के। इसके लिए तकनीकी सुधार, पारदर्शिता और सख्त निगरानी जरूरी होगी।

  1. डेमोग्राफिक असंतुलन की चुनौती

यह बंगाल की सबसे संवेदनशील और जटिल चुनौती है। बीजेपी ने अपने पूरे चुनावी अभियान को दौरान जिन मुद्दों को लगातार पकड़ रखा उनमें एक घुसपैठियों का भी है। बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ के कारण कई सीमावर्ती जिलों की डेमोग्राफी बदल गई है। यह चुनौती अब इसलिए और मुश्किल हो गई है क्योंकि इन घुसपैठियों के पास अब आधार कार्ड और वोटर ID जैसे डॉक्यूमेंट है यानी ये लोग ‘डि फैक्टो’ सिटीजन बन चुके हैं।

बंगाल उन स्थानों में से है जिन्होंने डेमोग्राफी बदलाव के कारण होने वाले खतरे को सबसे नजदीक से महसूस किया है। डेमोग्राफी के कारण हुए बँटवारे और हिंदू के नरसंहार की पीड़ा बंगाल ने देखी है। धर्म के नाम पर पलायन, लाखों हिंदुओं की हत्याएँ एक त्रासदी के तौर पर बंगाल के सामने खड़ी हैं। अब जब डेमोग्राफी बदलने के संकेत मिलने लगे हैं तो लोगों में वो भय फिर से जागने लगा है। सीमावर्ती जिलों में बेतहाशा बढ़ती मुस्लिम आबादी ने हिंदुओं के मन में बेचैनी पैदा कर दी है।

पूर्ववर्ती सरकारों ने इस घुसपैठ को वोट-बैंक की तरह देखा और इसे रोकने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। इससे और दो कदम आगे बढ़कर ममता बनर्जी की सरकार बांग्लादेशी घुसपैठियों को संरक्षण देती रही जिससे बंगाल की डेमोग्राफी बदलती गई।

हिंदुओं के लिए इकोसिस्टम बनाना समाधान

बंगाल में बीजेपी के मुख्यमंत्री पद के सबसे प्रबल दावेदार और ममता बनर्जी को चुनावी रण में पटखनी देने वाले शुभेंदु अधिकारी ने अपनी जीत के बाद कहा है कि ‘वे हिंदुओं के हक के लिए काम करेंगे’। हो सकता है कि यह बात सुनने में सांप्रदायिक लगे लेकिन बंगाल की जमीनी स्थिति को देखते हुए ऐसा करने बेहद जरूरी है।

बंगाल में दशकों तक हिंदुओं ने राजनीतिक और धार्मिक प्रताड़ना झेली है। वो कभी राजनीतिक हिंसा का शिकार हुए तो कभी अपने धर्म के लिए उन्हें मारा-पीटा गया। शोभायात्राओं पर हमले की भयावह कहानियाँ भी इसी सच्चाई का हिस्सा हैं। दुर्गा पूजा पर हिंसा, मंदिरों पर हमले, हिंदू परिवारों का विस्थापन यह सब एक लंबी पीड़ा की कहानी है।

अब इन्हीं हिंदुओं ने एकजुट होकर हालात बदल दिए हैं, भगवा पार्टी को सत्ता में ला दिया है। तो ऐसे में अब पार्टी के सामने भी यह चुनौती है कि जन हिंदुओं ने प्रताड़ना झेली उन्हें अब आगे ऐसी प्रताड़ना ना झेलनी पड़े, उनके लिए हालात सुरक्षित हों और सरकार की योजनाओं का लाभ उन लोगों तक सीधे पहुँचे।

बीजेपी को एक ऐसा हिंदू इकोसिस्टम बनाने पर काम करना होगा जो इन पीड़ितों की आवाज बन सके। जो इनकी वेदना, इनकी जरूरतों का खयाल रहे और ये फिर एक बार अपने ही देश में उपेक्षित या दोयम दर्जे के नागरिक जैसा ना महसूस करने लग जाएँ।

अंत में बात सिर्फ एक चुनावी जीत या हार की नहीं रह जाती बल्कि बात उस भरोसे की होती है जो लोग अपने वोट के जरिए जताते हैं। पश्चिम बंगाल की जनता ने इस बार केवल सरकार नहीं बदली बल्कि अपने भीतर छुपे डर, गुस्से और उम्मीद तीनों को एकसाथ बीजेपी के सामने रख दिया है। यह जनादेश एक संदेश है कि लोग बदलाव चाहते हैं लेकिन वह बदलाव जमीनी हकीकत में दिखे यह बीजेपी की जिम्मेदारी है।

जिन लोगों ने सालों तक असुरक्षा, भेदभाव या उपेक्षा महसूस की वे अब राहत और सम्मान की उम्मीद कर रहे हैं। यह समय जश्न के साथ-साथ और जिम्मेदारी का भी है। जनता ने अपना काम कर दिया है और अब इतिहास लिखने की बारी सत्ता में बैठने वाले लोगों की है।

SIR में जहाँ कटे सबसे ज्यादा वोट वहाँ भी जीती TMC, आँकड़ों ने खोली विपक्ष के दावों की पोल: बंगाल चुनाव में नहीं चला ममता का ‘विक्टिम कार्ड’

भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने 4 मई को पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) को उसके ही घर में हराकर इतिहास रच दिया। दो चरणों में हुए चुनावों और 91% की रिकॉर्ड वोटिंग के बाद, BJP ने विधानसभा की 296 में से 208 सीटों पर जीत दर्ज की। जैसे ही सोमवार को नतीजे आने शुरू हुए, विपक्ष और वामपंथी उदारवादियों ने TMC की हार के लिए चुनाव आयोग द्वारा राज्य में किए गए विशेष सुधार (SIR) को जिम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया।

हालाँकि, आँकड़े कुछ और ही कहानी बयाँ कर रहे हैं। जिन 20 विधानसभा सीटों पर जाँच के बाद सबसे ज्यादा वोटर्स के नाम काटे गए थे, उनमें से 13 सीटों पर ममता बनर्जी की पार्टी ने ही जीत हासिल की है। वहीं, BJP को इनमें से 6 और कॉन्ग्रेस को सिर्फ 1 सीट मिली है।

ये आँकड़े इसलिए अहम हैं क्योंकि सोशल मीडिया पर एक ऐसा माहौल बनाया जा रहा था, जिसमें चुनाव आयोग को TMC के खराब प्रदर्शन का विलेन (दोषी) बताया जा रहा था।

नतीजों के बाद चुनाव आयोग विपक्ष और लिबरल गैंग के निशाने पर

चुनाव के नतीजे आते ही विपक्ष और उनके समर्थक सोशल मीडिया पर सक्रिय हो गए। पूरे दिन विपक्षी खेमे और वामपंथी उदारवादियों (लेफ्ट लिबरल्स) ने चुनाव आयोग और वोटर लिस्ट सुधार (SIR) की प्रक्रिया पर जमकर हमला बोला।

चुनाव हारने के बाद पश्चिम बंगाल की कार्यवाहक मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ‘विक्टिम कार्ड’ खेलते हुए दावा किया कि BJP ने बंगाल में उनकी 100 सीटें ‘चोरी’ कर ली हैं। उनके इस सुर में सुर मिलाते हुए कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने भी समर्थन किया। राहुल गाँधी ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग की मदद से BJP ने टीएमसी की 100 सीटें झटक लीं।

रेडियो मिर्ची की RJ सायमा ने ‘एक्स’ (ट्विटर) पर लिखा, “चुनाव आयोग जीत गया।” उनका इशारा साफ था कि BJP की जीत आयोग की वजह से हुई है।

वहीं, द वायर की आरफा खानम शेरवानी ने तंज कसते हुए चुनाव आयोग को “आजाद भारत के सबसे निष्पक्ष चुनाव” कराने के लिए बधाई दी और TMC की हार का ठीकरा एजेंसी पर फोड़ दिया। हालाँकि, उन्होंने इस बात को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया कि आँकड़े इस थ्योरी का साथ नहीं दे रहे हैं।

पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने एक Video साझा किया, जिसमें योगेंद्र यादव ने दावा किया कि 27 लाख लोगों को गलत तरीके से वोट देने से रोका गया। उन्होंने सवाल उठाया कि फाइनल लिस्ट आने के बाद 6 लाख वोट कैसे जुड़ गए।

आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने भी मोर्चा खोलते हुए कहा कि 27 लाख वोटर्स को उनके अधिकार से वंचित रखा गया।

हालाँकि, अगर सीटों के हिसाब से असल आँकड़ों को देखा जाए, तो वे इन तमाम दावों को पूरी तरह गलत साबित करते हैं। सिर्फ वोटर्स के नाम कटने की वजह से TMC चुनाव नहीं हारी है।

जहाँ कटे सबसे ज्यादा वोट, वहाँ भी जीती TMC

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के आँकड़ों के मुताबिक, जिन 20 सीटों पर जाँच के बाद सबसे ज्यादा वोट काटे गए थे, उनमें से ज्यादातर पर TMC ने ही कब्जा जमाया है। इन सीटों में समशेरगंज, लालगोला, भगवानगोला, रघुनाथगंज, मटियाबुर्ज, सूती, मोथाबाड़ी, गोलपोखर, मालतीपुर, चोपड़ा, सुजापुर, राजारहाट न्यू टाउन और बशीरहाट उत्तर शामिल हैं। इन सभी 13 सीटों पर ममता बनर्जी की पार्टी को जीत मिली है।

अन्य सीटों की बात करें तो फरक्का सीट पर सबसे ज्यादा 38,222 वोट काटे गए थे, लेकिन वहाँ से कॉन्ग्रेस ने जीत दर्ज की। वहीं BJP को जंगीपुर, रतुआ, करनदिघी, केतुग्राम, मानिकचक और मोंतेश्वर जैसी 6 सीटों पर जीत मिली।

सीधे शब्दों में कहें तो, जिन 20 क्षेत्रों में सबसे ज्यादा नाम हटाए गए थे, उनमें से 13 सीटें ममता बनर्जी की पार्टी ने जीतीं। यह अकेला आँकड़ा ही उस प्रोपेगेंडा की हवा निकाल देता है जिसमें यह दावा किया जा रहा था कि वोटर लिस्ट में सुधार (SIR) से सिर्फ TMC को नुकसान हुआ और BJP को फायदा पहुँचा।

क्या कहते हैं बड़े आँकड़े?

अगर बड़े पैमाने पर देखें, तो जिन 187 सीटों पर 5,000 से ज्यादा वोटर्स के नाम काटे गए थे, वहाँ BJP ने 119 और TMC ने 65 सीटों पर जीत दर्ज की। इसके अलावा कॉन्ग्रेस को 2 और AJUP को 1 सीट मिली।

इन 187 सीटों में से 47 सीटें ऐसी थीं, जहाँ कटे हुए वोटों की संख्या जीत के अंतर से ज्यादा थी। BJP ने जो 119 सीटें जीतीं, उनमें से 28 सीटों पर जीत का अंतर कटे हुए वोटों से कम था। खास बात यह है कि इनमें से 26 सीटें 2021 के चुनाव में TMC ने जीती थीं। दूसरी तरफ, TMC की जीती हुई 65 सीटों में से भी 18 सीटें ऐसी थीं, जहाँ जीत के अंतर से ज्यादा वोट काटे गए थे।

इन आँकड़ों से साफ है कि कई सीटों पर कांटे की टक्कर थी और वहाँ कटे हुए वोटों की संख्या जीत के मार्जिन से ज्यादा रही। लेकिन हार का पूरा ठीकरा सिर्फ वोटर लिस्ट सुधार (SIR) की प्रक्रिया पर फोड़ देना और इसे ही हार की एकमात्र वजह बताना पूरी तरह से भ्रामक और गलत है।

बंगाल में कैसे हुई वोटर लिस्ट की छंटनी (SIR)?

वोटर लिस्ट में सुधार की यह प्रक्रिया (SIR) आम लिस्ट अपडेट से काफी अलग और खास थी। इसमें पंजीकृत वोटर्स को नए फॉर्म भरने थे और अपनी योग्यता व नागरिकता साबित करने के लिए जरूरी दस्तावेज जमा करने थे। चुनाव आयोग ने इस अभियान की शुरुआत पिछले साल जून में बिहार से की थी। बाद में इसे पश्चिम बंगाल सहित नौ अन्य राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में भी लागू किया गया।

पश्चिम बंगाल में फरवरी में जारी हुई फाइनल लिस्ट के करीब 60.06 लाख वोटर्स (लगभग 8.5 प्रतिशत) को जाँच के घेरे में रखा गया था। लगभग 700 न्यायिक अधिकारियों ने इन मामलों की बारीकी से जाँच की, जिसके बाद 27.16 लाख वोटर्स के नाम लिस्ट से हटा दिए गए। जिन लोगों के नाम काटे गए हैं, उन्होंने इसके खिलाफ अपील भी की है, जो फिलहाल 10 अपीलीय ट्रिब्यूनल (अदालतों) में लंबित हैं।

प्रोपेगेंडा बनाम हकीकत: आँकड़ों ने खोली पोल

चुनाव नतीजों के बाद विपक्षी नेताओं, ड्राइंग रूम में बैठकर खबरें लिखने वाले पत्रकारों और टीवी कमेंटेटर्स ने मिलकर एक खास माहौल बनाने की कोशिश की। उन्होंने यह दिखाने की कोशिश की कि TMC के खराब प्रदर्शन के पीछे वोटर लिस्ट से नाम हटाना (SIR) ही सबसे बड़ी वजह है और यह चुनाव आयोग की गड़बड़ी का सबूत है। हालाँकि, जब सीटों के हिसाब से आँकड़े सामने आए, खासकर उन 20 सीटों के जहाँ सबसे ज्यादा नाम काटे गए थे, तो इन दावों की पूरी तरह हवा निकल गई।

अगर विपक्षी खेमे और खास इकोसिस्टम की ये ‘थ्योरी’ सच होती कि नाम कटने से TMC हार गई, तो जिन 20 सीटों पर सबसे ज्यादा नाम कटे थे, वहाँ से TMC 13 सीटें कभी नहीं जीत पाती। इससे यह साफ हो जाता है कि हार के लिए आँकड़ों को तोड़-मरोड़कर पेश किया जा रहा है। बंगाल चुनाव में मिली करारी शिकस्त को छिपाने के लिए SIR प्रक्रिया को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है, और आने वाले कई महीनों तक हार के बहाने के रूप में इसे बार-बार दोहराया जाएगा।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है। अंग्रेजी की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

रवीश कुमार, हम जानते हैं भगवा बंगाल देख आपके अंग विशेष में हो रही जलन, पर बर्नोल नहीं हैं विजय; क्योंकि BJP बनाम TVK नहीं था तमिलनाडु का यह चुनाव

तमिलनाडु में 50 साल से अधिक चला आ रहा द्रविड़ राजनीति (DMK/AIADMK) का वर्चस्व कमजोर पड़ गया है। क्योंकि इस बार विधानसभा चुनाव 2026 में एक्टर जोसेफ विजय चेंद्रशेखर की पार्टी तमिझागा वेट्री कजगम (TVK) यानी तमिलनाडु विजय पार्टी ने 35% (लगभग 1.7 करोड़ वोट) वोट शेयर से डेब्यू कर तमिलनाडु में नया अध्याय लिखा है। अब विजय और उनकी पार्टी TVK की इस जीत पर प्रोपेगेंडा पत्रकार और यूट्यूबर रवीश कुमार ने नया नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की है।

बंगाल में BJP की जीत के बाद रवीश कुमार तमिलनाडु के नतीजों में अपनी खुशी तलाश रहे हैं, जहाँ भारतीय जनता पार्टी (BJP) को 3% वोट शेयर भी नहीं मिला, वहाँ भी ‘BJP को हराने’ वाला प्रोपेगेंडा चला रहे हैं। उन्होंने तमिलनाडु में विजय की जीत पर पूरी वीडियो बनाई है और नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की कि कैसे तमिलनाडु में BJP का विरोध कर विजय चुनाव जीत गए। विजय की जीत को रवीश कुमार ने तमिलनाडु की जनता में BJP के खिलाफ रोष के रूप में पेश किया। यहाँ तक कि यह साबित करने में लगे रहे कि तमिलनाडु का अगला ‘ईसाई’ मुख्यमंत्री BJP से नफरत करता है।

विजय की जीत और उनकी पार्टी की BJP के खिलाफ नफरत बताते हुए रवीश कुमार कहते हैं, “पहली बार ईसाई मुख्यमंत्री बनेगा। धर्मनिर्पेक्ष छवि बनाने वाले विजय पर तमिलनाडु की जनता ने जाति और धर्म के आधार के बगैर साथ दिया।” वे बताते हैं कि कैसे विजय बार-बार कहते रहे कि वह BJP के साथ नहीं जाएँगे, क्योंकि उनकी विचारधारा BJP से मेल नहीं खाती है।

रवीश कुमार बताते हें कि विजय मानते हैं, “BJP द्रविड़ विरोधी राजनीति करने वाली पार्टी है। BJP तमिलनाडु की धर्मनिर्पेक्षता की राजनीति के मूल्यों के खिलाफ है। विभाजनकारी राजनीति करती है। फासीवादी पार्टी है, इसीलिए उसके साथ कभी गठबंधन नहीं करेंगे क्योंकि यह उनके आत्मसम्मान के खिलाफ है।” रवीश कुमार कहते हैं कि विजय ने BJP से दूरी बनाई है।” और रवीश का मानना है कि तमिलनाडु में BJP का विरोध करते हुए एक नई पाटी सत्ता तक पहुँच गई।”

दरअसल, विधानसभा चुनाव 2026 में विजय की पार्टी 234 सीटों पर अकेले चुनावी मैदान में उतरी और 108 सीटों पर जीत दर्ज की। लेकिन बहुमत के लिए आँकड़ा पूरा नहीं है। विजय की पार्टी को सरकार बनाने के लिए 10 सीटें और चाहिए होंगी। रिपोर्ट्स में सामने आया है कि विजय के फादर और फिल्म निर्माता एसए चंद्रशेखर ने कॉन्ग्रेस को गठबंधन का खुला न्योता दिया है। उधर, BJP ने खुद द्रविड़ राजनीति करने वाली AIADMK के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा, जिसमें BJP केवल एक सीट पर जीती और AIADMK 47 सीटों पर।

प्रोपेगेंडा पत्रकार रवीश कुमार ने विजय की जीत को BJP विरोध का रंग देकर अपनी पुरानी आदत दोहराई है, लेकिन हकीकत में यह चुनाव BJP बनाम TVK कभी था ही नहीं। विजय ने BJP को ‘विभाजनकारी‘ और ‘फासीवादी’ कहकर दूरी बनाई तो सही, पर द्रविड़ियन राजनीति को खत्म करने के लिए। विजय ने DMK-AIADMK से अलग होकर एक स्वतंत्र पार्टी बनाई।

विजय अपनी राजनीतिक विचारधारा सेकुलर सोशल जस्टिस, सामाजिक न्याय, समानता और राज्य स्वायत्ता जैसे मूल्यों को बताते चुनाव लड़े। विजय BJP को अपना वैचारिक विरोधी बताते रहे और DMK को अपना राजनीतिक प्रतिद्वंदी कहते रहे, लेकिन यह भी देखा गया कि TVK की मूल विचारधारा, जो द्रविड़ियन को बचाने का दावा करती है, वह खिसकते नजर आई। क्योंकि विजय पेरियार जैसे द्रविड़ विचारकों को वैचारिक स्तंभ मानते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का भी मानना है कि विजय की पार्टी TVK द्रविड़ विचारधारा और तमिल राष्ट्रवाद का मिश्रण है।

उधर, एक ओर रवीश कुमार अपनी वीडियो में विजय की धर्मनिर्पेक्ष छवि पर बात करते हैं, तो दूसरी ओर विजय को अगला ‘ईसाई’ मुख्यमंत्री बताकर अपना नैरेटिव ध्वस्त करते हैं। यह सच है कि विजय ईसाई हैं, लेकिन उन्होंने अब तक राजनीति में धर्म को आगे नहीं रखा, जो कि BJP की हिंदुत्व पॉलिटिक्स से टकराता भी है और तमिलनाडु की सेकुलर ग्राउंड रियलिटी से मेल खाता है। पर BJP को राज्य में 2.9% से वोट शेयर मिला है, तो यहाँ भी विजय की BJP से ‘लड़ाई’ जैसी कोई बात है ही नहीं।

असल में विजय और उनकी पार्टी की जीत को तमिलनाडु में 50 से ज्यादा साल से स्थापित द्रविड़ राजनीति को चुनौती देते हुए नए विकल्प के रूप में देखा जा रहा है, जो पेरियार के मूल्यों पर चलती है लेकिन स्वीकार नहीं करती। विजय की यह जीत असल में भ्रष्टाचार से तंग जनता, युवाओं और उनके कट्टर फैन क्लब्स की है, जिसने एक ‘नॉन-पॉलिटिकल’ चेहरे को मंदिर, मस्जिद और गिरजाघरों में जाते देखकर सीधे सत्ता के करीब पहुँचा दिया। आखिरकार विजय ने द्रविड़ राजनीति को कमजोर तो किया, पर अपनी मूल विचारधारा को छिपा नहीं सके।

रवीश कुमार जैसे प्रोपेगेंडाबाज पत्रकार यह जानने में असमर्थ होंगे, क्योंकि उनके नैरेटिव में सबसे पहला शब्द BJP आता है। जहाँ 5 राज्यों में से असम, बंगाल और पुडुचेरी समेत 3 राज्यों में BJP ने प्रचंड बहुमत से सरकार बनाई, तब रवीश कुमार ‘निष्पक्ष’ पत्रकारिता के लिए BJP की जीत या विरोधियों की हार पर एक भी विश्लेषण करना जरूरी नहीं समझते। इन राज्यों में BJP की जीत से जलन होने लगी, इसीलिए वे तमिलनाडु में विजय की जीत को ‘बर्नोल’ की तरह इस्तेमाल कर प्रोपेगेंडा गढ़ने में लग गए।

अटलांटिक में ‘डेथ क्रूज’ बना MV होंडियस, हंता वायरस ने ली 3 की जान: जानें- आखिर कितना खतरनाक है यह संक्रमण, WHO ने जारी की ग्लोबल एडवाइजरी

अटलांटिक महासागर की लहरों के बीच एक आलीशान सफर उस समय खौफनाक मंजर में बदल गया, जब एक लग्जरी क्रूज शिप पर ‘हंता वायरस’ ने हमला कर दिया। MV होंडियस नाम के इस जहाज पर सवार 155 लोगों के लिए यह छुट्टियाँ किसी बुरे सपने जैसी बन गई हैं।

अब तक इस वायरस की चपेट में आने से 3 यात्रियों की मौत हो चुकी है, जबकि कई अन्य जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) इस स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हड़कंप मचा हुआ है।

लग्जरी क्रूज पर मातम का साया

यह दुखद वाकया ‘MV होंडियस‘ नाम के एक आलीशान जहाज का है। लोग लाखों रुपए खर्च करके अटलांटिक महासागर की सैर पर निकले थे। जहाज 20 मार्च को अर्जेंटीना से रवाना हुआ और उसे 4 मई को केप वर्डे पहुँचना था।

लेकिन बीच रास्ते में ही अचानक लोग बीमार पड़ने लगे और पता चला कि जहाज पर खतरनाक इन्फेक्शन फैल गया है। अब हालात ये हैं कि जहाज समुद्र के बीचों-बीच फँसा हुआ है और उसे किनारे पर आने की इजाजत नहीं मिल रही। जहाज पर सवार यात्री बुरी तरह डरे हुए हैं और उन्हें नहीं पता कि वे कब सुरक्षित अपने घर पहुँच पाएँगे।

मौत का सिलसिला और दहशत

इस वायरस की चपेट में सबसे पहले हॉलैंड के रहने वाले एक बुजुर्ग व्यक्ति आए, जिनकी 11 अप्रैल को जहाज पर ही मौत हो गई। उनके बाद उनकी पत्नी की भी तबीयत बिगड़ी और दक्षिण अफ्रीका के अस्पताल में इलाज के दौरान उन्होंने भी दम तोड़ दिया। जाँच में पुष्टि हुई कि उन्हें हंता वायरस था।

अब तक इस संक्रमण से तीन लोगों की जान जा चुकी है, जिनमें एक जर्मनी का नागरिक भी शामिल है। जहाज पर मौजूद 155 लोगों में से कई और यात्रियों में भी इसके लक्षण दिख रहे हैं। हालत इतनी खराब है कि क्रू मेंबर्स भी बीमार पड़ रहे हैं और दो सदस्यों को सांस लेने में दिक्कत होने की वजह से तुरंत डॉक्टर की मदद लेनी पड़ी है।

इन्फ्लुएंसर की आँखों देखी दास्ताँ

जहाज पर फँसे लोगों की आपबीती जेक रोसमारिन नाम के एक ट्रैवल ब्लॉगर ने दुनिया को बताई है। जेक ने इंटरनेट पर एक Video डाला है, जिसमें वे रोते हुए अपना दर्द बयाँ कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि वे सिर्फ अखबार की कोई खबर नहीं हैं, बल्कि जीते-जागते इंसान हैं जिनके परिवार वाले घर पर उनका इंतजार कर रहे हैं।

जेक ने बताया कि जहाज पर किसी को कुछ पता नहीं चल रहा है कि आगे क्या होगा, जिससे हर कोई बहुत डरा हुआ है। उनका यह भावुक Video अब सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है और लोग उनके लिए दुआएँ माँग रहे हैं।

क्या है यह हंता वायरस?

हंता वायरस वैसे तो पुराना है, लेकिन यह बहुत खतरनाक और जानलेवा है। यह वायरस मुख्य रूप से चूहों और उनके जैसे छोटे जानवरों से फैलता है। इंसानों के शरीर में जाने के बाद यह दो तरह से हमला करता है या तो यह फेफड़ों को खराब कर देता है या फिर किडनी को पूरी तरह फेल कर देता है।

सबसे ज्यादा डर की बात यह है कि इससे मौत होने का खतरा बहुत ज्यादा रहता है। अमेरिका जैसे देशों में इस संक्रमण की चपेट में आने वाले आधे मरीजों की जान बचाना भी मुश्किल हो जाता है।

कैसे फैलता है यह जानलेवा संक्रमण?

हंता वायरस सीधे तौर पर चूहों से फैलता है। अगर कोई व्यक्ति चूहों की गंदगी, पेशाब या लार के संपर्क में आता है, तो वह बीमार पड़ सकता है। यह वायरस हवा के जरिए भी शरीर में जा सकता है। उदाहरण के लिए, अगर चूहों की गंदगी वाली जगह पर झाड़ू लगाई जाए, तो हवा में उड़ने वाली धूल के साथ यह वायरस सांस के रास्ते फेफड़ों तक पहुँच जाता है।

कभी-कभी चूहे के काटने से भी यह संक्रमण हो सकती है। अच्छी बात यह है कि यह कोरोना की तरह एक इंसान से दूसरे इंसान में आसानी से नहीं फैलता, हालाँकि कुछ खास किस्म के हंता वायरस बहुत कम मामलों में एक व्यक्ति से दूसरे में जा सकते हैं।

पहचानिए हंता वायरस के लक्षण

हंता वायरस के लक्षण शुरू में साधारण बुखार या फ्लू जैसे लगते हैं, इसलिए इसे पहचानना मुश्किल होता है। संक्रमण के संकेत दिखने में एक से आठ हफ्ते का समय लग सकता है। शुरुआत में मरीज को तेज बुखार, सिरदर्द, बदन दर्द, उल्टी-दस्त और पेट में दर्द जैसी शिकायतें होती हैं।

लेकिन कुछ ही समय बाद यह संक्रमण जानलेवा हो जाती है। अचानक फेफड़ों में पानी भर जाता है, जिससे सांस लेने में भारी तकलीफ होने लगती है और ब्लड प्रेशर गिर जाता है। अगर सही समय पर डॉक्टर की मदद न मिले, तो मरीज का दिल काम करना बंद कर सकता है और उसकी जान जा सकती है।

WHO की एडवायजरी और वैश्विक रिस्क

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) इस मामले को लेकर काफी अलर्ट है और प्रभावित देशों की सरकारों के साथ मिलकर काम कर रहा है। WHO का कहना है कि इस जहाज पर हालात काफी गंभीर हैं क्योंकि बीमार पड़े 7 लोगों में से 3 की मौत हो चुकी है।

हालाँकि, राहत की बात यह है कि दुनिया के बाकी लोगों के लिए अभी डरने वाली बात नहीं है, क्योंकि यह वायरस एक इंसान से दूसरे इंसान में बहुत मुश्किल से फैलता है। इसलिए इसके महामारी बनने का खतरा कम है, लेकिन जहाज जैसी बंद जगहों पर जहाँ लोग करीब रहते हैं, वहाँ बहुत ज्यादा सावधानी रखने की जरूरत है।

सुरक्षा के उपाय: खुद को कैसे बचाएँ?

हंता वायरस से बचने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि आप अपने घर और आसपास चूहों को न आने दें। अगर कहीं चूहों की गंदगी साफ करनी हो, तो वहाँ सूखी झाडू बिल्कुल न लगाएँ, क्योंकि इससे वायरस हवा में फैल सकता है।

सफाई से पहले उस जगह पर फिनाइल या सैनिटाइजर छिड़ककर उसे गीला कर लें और मास्क-दस्ताने जरूर पहनें। अपने खाने-पीने के सामान को हमेशा ढककर रखें। चूंकि इस संक्रमण का अब तक कोई टीका (वैक्सीन) नहीं बना है, इसलिए चूहों से दूरी बनाए रखना ही खुद को सुरक्षित रखने का इकलौता तरीका है।

यूँ ही नहीं खुद को ‘मुस्लिमों की पार्टी’ कहती है कॉन्ग्रेस: असम में जीते 19 विधायकों में केवल 1 हिंदू, बंगाल में दोनों मुस्लिम

2018 में उर्दू अखबार ‘इंकलाब’ ने एक खबर छापी जिसमें राहुल गाँधी का एक बयान था जिसमें कहा गया था कि ‘कॉन्ग्रेस मुस्लिमों की पार्टी है’। तब कॉन्ग्रेस पार्टी ने इस बयान को झुठलाने की कोशिश की लेकिन पार्टी के ही तब के अल्पसंख्यक मोर्चा के चेयरमैन ने इस बयान की पुष्टि की थी। इस बात को 8 साल बीत गए हैं।

अब आज की बात, सोमवार (4 मई 2026) को राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे आए। कॉन्ग्रेस के उस दावे में कितना सच था या नहीं थे इस थोड़ी देर के लिए भूल जाते हैं और नतीजों से कॉन्ग्रेस के मौजूदा स्वरूप को समझने की कोशिश करते हैं। बात करते हैं, असम और पश्चिम बंगाल की, इन दोनों राज्यों में बीजेपी सत्ता में आई है।

बंगाल में टक्कर TMC-BJP के बीच थी तो कॉन्ग्रेस की गर्त में जाना लगभग तय था, हुआ भी वही। असम में मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में पार्टी के आक्रामक प्रचार ने राज्य में पार्टी की जीत की हैट-ट्रिक तय कर दी।

कॉन्ग्रेस को असम और पश्चिम बंगाल में कुल जमा 21 विधानसभा सीटें मिलीं। असम में पार्टी ने 19 सीटें जीतीं जबकि पश्चिम बंगाल में कॉन्ग्रेस के खाते में 2 सीटें आईं। इसमें एक दिलचस्प बात जो सामने आई वो उस 2018 के अखबार की उस रिपोर्ट की ही याद दिला रही थी जो राहुल गाँधी ने तब कथित तौर पर कहा था।

असम में जीते कॉन्ग्रेस के 19 विधायकों में केवल 1 विधायक हिंदू है। असम की नोबोइचा सीट से जीते जोय प्रकाश दास राज्य में कॉन्ग्रेस के इकलौते हिंदू विधायक हैं बाकी विधायकों के नाम आप इस लिस्ट में देख सकते हैं।

असम में जीते कॉन्ग्रेस के विधायक (फोटो साभार: ECI Result)

यही हाल पश्चिम बंगाल में भी कॉन्ग्रेस का हुआ। पश्चिम बंगाल के फरक्का में कॉन्ग्रेस के मोताब शेख और रानीनगर में जुल्फीकार अली ने जीत दर्ज की है।

पश्चिम बंगाल में जीते कॉन्ग्रेस के विधायक (फोटो साभार: ECI Result)

वहीं, केरल में कॉन्ग्रेस उस इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) के साथ गठबंधन में सरकार बनाने जा रही है जिसकी कट्टरपंथी विचार किसी ने छिपे नहीं है। इस कट्टरपंथी और हिंदू विरोधी पार्टी को राहुल गाँधी सेकुलर तक बता चुके हैं।

भले ही IUML यह दावा करती है कि उसका गठन 1948 के बाद हुआ लेकिन असल में यह ऑल इंडिया मुस्लिम लीग (AIML) की ही एक शाखा है। AIML वही पार्टी थी जिसे पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने बनाया था। देश के बँटवारे के बाद AIML की जगह पाकिस्तान में मुस्लिम लीग और भारत में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) ने ले ली।

IUML का गठन AIML की सोच और विचारधारा को जिंदा रखने के लिए किया गया था। इसका एक बड़ा उदाहरण यह है कि IUML के पहले अध्यक्ष मोहम्मद इस्माइल खुद देश के बँटवारे के आंदोलन में शामिल थे और पाकिस्तान बनने के समर्थक थे।

कॉन्ग्रेस का मुस्लिम घुसपैठियों से भी प्रेम बताता है कि उसकी आज की दशा क्या हो गई है। असम और बंगाल दोनों ऐसे राज्य हैं जो घुसपैठ और डेमोग्राफी परिवर्तन से जूझ रहे हैं लेकिन कॉन्ग्रेस को ना ये अवैध घुसपैठिए नजर आते हैं, ना ही डेमोग्राफी में बदलाव नजर आता है। वो जमीनी हकीकत को भी जानते समझते हुए भी केवल वोट के लिए या कहें तो मुस्लिम वोट के लिए इस मुद्दे पर चुप्पी साधे रखती है।

अब भले ही 2018 में राहुल गाँधी ने कॉन्ग्रेस को मुस्लिमों की पार्टी बताया हो या ना बताया हो लेकिन पार्टी के कृत्य तो इस बात को स्थापित करते ही हैं। बाकी अभी इन दोनों राज्यों में कॉन्ग्रेस के करीब 95% चुने गए विधायक मुस्लिम हैं, आगे ये आँकड़ा और कॉन्ग्रेस की राजनीति कहाँ जाएगी ये तो वक्त ही बताएगा।

Tamil Nadu के नए नायक की ‘विजय’, ‘थलापति’ की सुनामी में ढह गई दो ध्रुवीय राजनीति की दीवार: पढ़ें- कैसे फिल्मी फेम को जनसमर्थन में बदलकर सत्ता के केंद्र में आते गए ‘सितारे’

Tamil Ndau की राजनीति सिर्फ सत्ता का खेल नहीं बल्कि भावनाओं और पहचान की गहराई से जुड़ा एक मंच है। यहाँ नेता केवल नेता नहीं होते बल्कि कई बार वे प्रतीक बन जाते हैं, जिन्हें जनता पर्दे से उठाकर अपने जीवन का हिस्सा बना लेती है। सिनेमा और सियासत का यह अनोखा संगम दशकों से इस राज्य की पहचान रहा है जहाँ MG रामचंद्रन से लेकर जयललिता तक कई सितारों ने पर्दे की लोकप्रियता को सत्ता की ताकत में बदला।

इसी परंपरा के बीच जब थलापति विजय ने अपनी पार्टी TVK के साथ राजनीति में कदम रखा तो इसे पहले सिर्फ एक और स्टार की महत्वाकांक्षा माना गया। लेकिन 2026 के विधानसभा चुनावों में उभरते रुझानों ने इस धारणा को चुनौती दे दी है। 106 सीटों पर बढ़त केवल एक आँकड़ा नहीं बल्कि यह संकेत है कि Tamil Ndau की जनता एक बार फिर अपने ‘नायक’ को नई भूमिका में स्वीकार करने को तैयार है।

Tamil Nadu की राजनीति लंबे समय से दो बड़े धड़ों द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) और अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (AIADMK) के बीच घूमती रही है। ऐसे में एक नए दल का इस तरह उभरना बताता है कि जनता के मन में बदलाव की एक धीमी लेकिन गहरी इच्छा बन चुकी थी जो अब सामने आ रही है। यह पूरी तरह पारंपरिक एंटी-इंकंबेंसी (सत्ता विरोधी) नहीं है बल्कि एक भावनात्मक बदलाव है, जहाँ लोग पुराने विकल्पों से हटकर कुछ नया तलाश रहे हैं। विजय का यह उभार उसी तलाश का परिणाम लगता है।

Tamil Nadu में सिनेमा और राजनीति का गहरा रिश्ता

Tamil Nadu में सिनेमा और राजनीति का रिश्ता सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं रहा बल्कि यह सामाजिक और राजनीतिक संवाद का एक मजबूत माध्यम बना। यहाँ फिल्मों के जरिए नेताओं ने जनता के बीच अपनी पहचान बनाई और विचारधारा को लोकप्रिय किया।

इस परंपरा की नींव सी एन अन्नादुरई ने रखी जिन्होंने थिएटर और सिनेमा को राजनीतिक संदेश देने का साधन बनाया। उनके बाद एम करुणानिधि ने फिल्मों के संवादों और पटकथाओं के जरिए सामाजिक न्याय और द्रविड़ विचारधारा को मजबूत किया।

यहीं से एक ऐसा मॉडल तैयार हुआ जिसमें स्क्रीन पर दिखने वाला चेहरा जनता के दिल और दिमाग दोनों पर असर डालने लगा। यही वजह है कि तमिलनाडु में फिल्मी सितारों को सिर्फ अभिनेता नहीं, बल्कि संभावित नेता के रूप में भी देखा जाता है।

सुपरस्टार से मुख्यमंत्री तक: एम जी रामचंद्रन का मॉडल

अगर फिल्म से राजनीति में सफल बदलाव का सबसे मजबूत उदाहरण देखें, तो वह एमजी रामचंद्रन (MGR) हैं। उन्होंने फिल्मों में एक ऐसे नायक की छवि बनाई जो गरीबों का रक्षक था और अन्याय के खिलाफ खड़ा होता था।

जब उन्होंने राजनीति में कदम रखा और AIADMK की स्थापना की, तो जनता ने उसी छवि को असल जिंदगी में भी स्वीकार कर लिया। 1977 से 1987 तक उनका लगातार मुख्यमंत्री बने रहना इस बात का प्रमाण है कि उनकी लोकप्रियता कितनी गहरी थी।

उनकी सरकार की पहचान जनकल्याण योजनाएँ और आम लोगों से जुड़ाव रही। MGR ने यह साबित किया कि अगर फिल्मी छवि और जनविश्वास एक साथ मिल जाएँ, तो राजनीति में बड़ी सफलता हासिल की जा सकती है।

विरासत को आगे बढ़ाने वाली नेता: जय जयललिता

जयललिता का सफर भी इसी परंपरा का विस्तार था, लेकिन उन्होंने इसे एक नए स्तर पर पहुँचाया। MGR के बाद उन्होंने AIADMK की कमान संभाली और खुद को एक मजबूत नेता के रूप में स्थापित किया। उनकी पहचान सिर्फ एक अभिनेत्री या उत्तराधिकारी की नहीं रही, बल्कि उन्होंने अपनी अलग राजनीतिक छवि बनाई।

‘अम्मा’ ब्रांड के जरिए उन्होंने महिला वोटर्स और गरीब वर्ग में गहरी पकड़ बनाई। उनकी नीतियाँ, नेतृत्व शैली और सख्त प्रशासनिक छवि ने उन्हें Tamil Ndau की सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल कर दिया। यह दिखाता है कि सिर्फ फिल्मी लोकप्रियता ही नहीं, बल्कि संगठन और नेतृत्व क्षमता भी जरूरी होती है।

अलग-अलग रास्ते, अलग-अलग नतीजे

अभिनेता विजयकांत – तेज शुरुआत से धीमे अंत की ओर

अभिनेता विजयकांत ने जब राजनीति में कदम रखा तो उन्हें जबरदस्त समर्थन मिला। उनकी पार्टी DMDK ने अच्छा प्रदर्शन किया और वह विपक्ष के नेता भी बने। लेकिन समय के साथ संगठन कमजोर हुआ और पार्टी का प्रभाव घटता गया।

अभिनेता कमल हासन – शहरी सीमाओं में सिमटे

अभिनेता कमल हासन ने मक्कल नीधि मय्यम के जरिए राजनीति में एंट्री की। उनकी राजनीति विचारों और सुधारों पर आधारित थी, लेकिन उनका प्रभाव मुख्य रूप से शहरी और पढ़े-लिखे वर्ग तक ही सीमित रह गया।

अभिनेता रजनीकांत – कभी चुनाव नहीं लड़े

अभिनेता रजनीकांत का राजनीतिक सफर सबसे अलग रहा। उनकी लोकप्रियता बहुत बड़ी थी, लेकिन उन्होंने चुनावी राजनीति में कदम नहीं रखा। इस वजह से उनका प्रभाव राजनीतिक रूप से स्थापित नहीं हो पाया।

क्यों अलग हैं विजय?

थलापति विजय का उभार सिर्फ एक और फिल्मी स्टार की राजनीति में एंट्री नहीं है, बल्कि एक अलग तरह की राजनीतिक कहानी है। जहाँ पहले के अभिनेता-नेता किसी न किसी राजनीतिक ढाँचे, विचारधारा या संगठन से जुड़े रहे, वहीं विजय सीधे जनता के बीच से उभरे चेहरे के तौर पर सामने आए हैं। सबसे पहले उनकी पर्सनल और प्रोफेशनल पृष्ठभूमि।

विजय का असली नाम जोसेफ विजय चंद्रशेखर है। उनका जन्म 22 जून 1974 को एक फिल्मी परिवार में हुआ। उनके पिता एस ए चंद्रशेखर फिल्म निर्देशक रहे हैं और उनकी माँ शोभा चंद्रशेखर सिंगर हैं। यानी सिनेमा उनके लिए सिर्फ करियर नहीं, बल्कि बचपन से ही जीवन का हिस्सा रहा। उन्होंने एक बाल कलाकार के रूप में शुरुआत की और धीरे-धीरे खुद को तमिल सिनेमा के सबसे बड़े सुपरस्टार्स में शामिल कर लिया।

करीब 69 फिल्मों की अपनी यात्रा में उन्होंने सिर्फ अभिनय नहीं किया, बल्कि एक खास इमेज तैयार की एक ऐसे हीरो की जो सिस्टम से लड़ता है, आम लोगों के लिए खड़ा होता है और भ्रष्टाचार या अन्याय के खिलाफ आवाज उठाता है। यही इमेज बाद में उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक पूँजी बनती दिख रही है।

अब बात आती है उनके जनता से जुड़ाव की। विजय का कनेक्शन पारंपरिक राजनीति की तरह भाषणों या विचारधाराओं से नहीं बना, बल्कि फिल्मों, डायलॉग्स और किरदारों के जरिए बना। उनके फैंस उन्हें सिर्फ एक स्टार नहीं, बल्कि अपने जैसा मानते हैं। यही वजह है कि जब उन्होंने राजनीति में कदम रखा, तो यह जुड़ाव सीधे वोट में बदलता हुआ नजर आ रहा है।

उनका फैन क्लब विजय मक्कल अय्यकम भी यहाँ अहम भूमिका निभाता है। यह सिर्फ फैन क्लब नहीं, बल्कि एक तरह का ग्राउंड नेटवर्क बन चुका था, जिसने 2022 के स्थानीय चुनावों में भी अच्छा प्रदर्शन किया। यानी विजय ने बिना पारंपरिक पार्टी स्ट्रक्चर के भी एक बेस तैयार कर लिया था, जिसे बाद में उन्होंने तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) में बदल दिया।

दूसरी बड़ी बात उनका फुल-टाइम राजनीति में आना। जहाँ कई स्टार्स ने फिल्मों और राजनीति को साथ-साथ चलाने की कोशिश की विजय ने साफ फैसला लिया कि वे फिल्मों को छोड़कर पूरी तरह राजनीति में उतरेंगे। 2024 में पार्टी लॉन्च करते वक्त उन्होंने यह भी संकेत दिया कि वे एक्टिंग से दूरी बना लेंगे।

Tamil Nadu की राजनीति के इतिहास को देखें, तो यह एक अहम फैक्टर रहा है। एम जी रामचंद्रन और जे जयललिता दोनों ने सत्ता में आने से पहले खुद को पूरी तरह राजनीति को समर्पित किया था। विजय ने उसी पैटर्न को अपनाया, लेकिन अपने तरीके से।

तीसरी और सबसे जोखिम भरी रणनीति अकेले चुनाव लड़ना। Tamil Nadu में नई पार्टियाँ अक्सर बड़े गठबंधनों का सहारा लेती रही हैं, लेकिन विजय ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने DMK या AIADMK जैसे स्थापित दलों के साथ जाने के बजाय सीधे मुकाबले का रास्ता चुना। इससे उन्होंने खुद को तीसरे विकल्प के रूप में पेश किया, न कि किसी के सहयोगी के तौर पर।

यह फैसला आसान नहीं था, क्योंकि इससे हार का खतरा भी उतना ही बड़ा था। लेकिन शुरुआती रुझान यह दिखा रहे हैं कि यह दाँव असरदार साबित हो सकता है।

एक और महत्वपूर्ण पहलू है उनकी टाइमिंग। विजय ऐसे समय पर राजनीति में आए हैं जब राज्य की राजनीति में एक तरह की थकान महसूस की जा रही है। दशकों से वही चेहरे, वही पार्टियाँ और वही ढाँचा ऐसे में एक नया चेहरा लोगों को आकर्षित करता है। विजय ने इसी गैप को पहचाना और खुद को उस खाली जगह में स्थापित किया।

उनकी अपील खासतौर पर युवाओं और महिलाओं में ज्यादा दिखती है। युवा मतदाता, जो MGR या जयललिता के दौर को सिर्फ कहानियों में जानते हैं, उनके लिए विजय पहला ऐसा चेहरा हैं जो उनके समय का है। वहीं महिलाएँ उन्हें एक अपेक्षाकृत सॉफ्ट और अपने करीबी नेता के रूप में देखती हैं।

अगर हम विजय की पॉलिटिक्स का मॉडल कैडर पॉलिटिक्स से ज्यादा कैरेक्टर पॉलिटिक्स पर आधारित है। यानी संगठन से ज्यादा उनकी व्यक्तिगत छवि और भरोसा काम कर रहा है।

यही वजह है कि विजय बाकी फिल्मी नेताओं से अलग नजर आते हैं। उनके पास पारंपरिक राजनीतिक अनुभव भले न हो, लेकिन उनके पास एक मजबूत इमोशनल कनेक्शन, तैयार बेस और सही समय पर लिया गया बड़ा जोखिम है। जो उन्हें इस चुनाव में एक असाधारण खिलाड़ी बना रहा है।

इस चुनाव में विजय के समर्थन का सबसे दिलचस्प पहलू उनका वोट बैंक है। महिलाएँ उन्हें एक नए और भरोसेमंद विकल्प के रूप में देख रही हैं। Tamil Nadu में महिला वोटर्स हमेशा से निर्णायक रही हैं और विजय ने इस वर्ग में अपनी जगह बनाई है।

वहीं युवा मतदाता, जो पुराने नेताओं के दौर में बड़े नहीं हुए, विजय को अपने समय का नेता मान रहे हैं। उनके लिए विजय सिर्फ एक अभिनेता नहीं, बल्कि एक ऐसा चेहरा हैं जो उनकी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करता है।

Tamil Nadu की राजनीति पारंपरिक रूप से कैडर आधारित रही है, जहाँ संगठन और कार्यकर्ताओं की बड़ी भूमिका होती है। लेकिन विजय का मॉडल इससे अलग है। यह कैरेक्टर पॉलिटिक्स है, जहाँ नेता की व्यक्तिगत छवि और लोगों के साथ भावनात्मक जुड़ाव ज्यादा महत्वपूर्ण होता है।

उनके समर्थक उन्हें एक नेता से ज्यादा एक परिचित चेहरे के रूप में देखते हैं, जिसे उन्होंने सालों तक फिल्मों में देखा है।

क्या विजय MGR बन सकते हैं?

विजय की तुलना अक्सर MGR से की जा रही है, लेकिन दोनों के बीच अंतर भी उतना ही महत्वपूर्ण है। MGR के पास राजनीतिक अनुभव और संगठन दोनों थे, जबकि विजय का सफर सीधे फिल्मों से राजनीति तक का है।

विजय का मॉडल ज्यादा आधुनिक है, जहाँ मीडिया, छवि और समय का सही इस्तेमाल उनकी ताकत बनता है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि वे MGR जैसे बनेंगे, लेकिन इतना जरूर है कि उन्होंने एक नई दिशा जरूर दिखा दी है।

अभी अंतिम नतीजे आना बाकी हैं, लेकिन यह साफ हो चुका है कि Tamil Nadu की राजनीति बदल रही है। अब मुकाबला सिर्फ दो पार्टियों के बीच नहीं रहा। एक तीसरी ताकत उभर चुकी है, जो आने वाले समय में राजनीति की दिशा तय कर सकती है। इस जीत के बाद तमिलनाडु को दशकों बाद एक नया राजनीतिक विकल्प मिलेगा और यही इस चुनाव की सबसे बड़ी कहानी हो सकती है।

जिन-जिन दलों के लिए प्रचार, जिन-जिन का किया समर्थन, सबका बैठ गया भट्ठा: साथियों के लिए फिर पनौती साबित हुए अखिलेश यादव और तेजस्वी

चुनावी राजनीति में बयान देना, माहौल बनाना और जीत का दावा करना आम बात है, लेकिन जब यही दावे लगातार अलग-अलग राज्यों में दोहराए जाएँ और हर बार नतीजे उसके उलट आएँ, तो मामला सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहता। वह यह दिखाता है कि आपका बोलना सही नहीं है क्योंकि आप कर कुछ पा नहीं रहे और ‘पनौती’ साबित हो रहे सो अलग। पिछले कुछ चुनावों में अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव के साथ यही होता नजर आ रहा है।

दोनों नेताओं ने खुद को विपक्षी राजनीति के अहम चेहरे के तौर पर स्थापित करने की कोशिश की है। उन्होंने बंगाल से लेकर तमिलनाडु, दिल्ली, हरियाणा और बिहार तक अलग-अलग राज्यों में विपक्षी दलों के समर्थन में न सिर्फ प्रचार किया, बल्कि बार-बार दावा कर विपक्षी पार्टियों के लिए जीत लगभग तय बताई।

हालाँकि जब वास्तविक नतीजे सामने आए तो लगभग हर जगह पर तस्वीर इतनी उलट थी कि इन दावों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होने लगे। इस पूरे सिलसिले को अगर ध्यान से देखा जाए, तो यह सिर्फ हार-जीत की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस गैप की कहानी है जो राजनीतिक दावों और जमीनी नतीजों के बीच लगातार बढ़ता जा रहा है।

बंगाल: ममता को लेकर किया ‘एक अकेली लड़ जाएगी’ का दावा, जीती BJP

इस पैटर्न की सबसे ताजा कड़ी पश्चिम बंगाल में देखने को मिली। यहाँ अखिलेश यादव ने खुलकर ममता बनर्जी के समर्थन में सोशल मीडिया पर लिखा, “एक अकेली लड़ जाएगी, जीतेगी और बढ़ जाएगी।” यह बयान महज औपचारिक समर्थन नहीं था, बल्कि भविष्यवाणी जैसा था। इसमें संदेश साफ था कि ममता बनर्जी के लिए कोई चुनौती नहीं है और उनकी जीत तय है।

हालाँकि जैसे ही मतगणना के रुझान सामने आने लगे, यह दावा जमीनी हकीकत से टकराता नजर आया। पश्चिम बंगाल में BJP ने इतिहास रच दिया। बीजेपी ने ममता बनर्जी की अगुवाई वाली TMC सरकार को 15 साल के बाद उखाड़ फेंका है। यहाँ बीजेपी पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने वाली है।

तमिलनाडु: ‘उत्तर-दक्षिण एकता’ का नारा लगातीं तेजस्वी की रैलियाँ पर वोट पर नहीं पड़ा असर

तमिलनाडु में तेजस्वी यादव की सक्रियता इस पूरे पैटर्न का अगला बड़ा उदाहरण है। तेजस्वी ने तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 में मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के ‘सेक्युलर प्रोग्रेसिव अलायंस’ के लिए खूब पसीना बहाया था। उन्होंने एमके स्टालिन के नेतृत्व वाले गठबंधन के लिए उन इलाकों में प्रचार किया जहाँ उत्तर भारतीय प्रवासी और मजदूरों की संख्या अधिक है।

उनके भाषणों में ‘सामाजिक न्याय’ और ‘उत्तर-दक्षिण एकता’ की बात प्रमुखता से उठाई गई। यह स्थानीय राजनीति में एक नया सामाजिक समीकरण जोड़ने की कोशिश के साथ एक सोची-समझी रणनीति थी।

रैलियों में थोड़ी-बहुत भीड़ भी दिखी, मीडिया कवरेज भी मिला, लेकिन जब नतीजों के रुझान आए तो यह साफ हो गया कि यह रणनीति अपेक्षित असर नहीं छोड़ पाई। जिन सीटों पर तेजस्वी ने विशेष ध्यान दिया था, वहाँ भी DMK गठबंधन पिछड़ता नजर आया।

कई जगह मुकाबला AIADMK और TVK के बीच सिमट गया, जिससे यह संकेत मिला कि स्थानीय मुद्दे और एंटी-इंकम्बेंसी की लहर, बाहरी प्रचार से कहीं ज्यादा प्रभावी रही। यानी मंच पर जो भीड़ दिखाने की कोशिश हो रही थी, वह वोट में तब्दील नहीं हो सकी। आँकड़ों की बात करें तो TVK ने अब तक 36 सीटों पर जीत दर्ज करते हुए मजबूत बढ़त बना ली है और 72 सीटों पर आगे चल रही है।

दूसरी ओर सत्तारूढ़ DMK ने 17 सीटों पर जीत हासिल की है और 45 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है। कॉन्ग्रेस ने अब तक 1 सीट पर जीत दर्ज की है और 4 सीटों पर आगे है, जबकि AIADMK ने 13 सीटों पर जीत दर्ज की और वह 30 सीटों पर आगे चल रही है।

दिल्ली: अखिलेश यादव का ’70 में 70 हार जाएगी भाजपा’ वाला दावा, लेकिन हकीकत उलट

दिल्ली में अखिलेश यादव ने अरविंद केजरीवाल के साथ रोड शो करते हुए कहा था कि भाजपा सभी 70 सीटें हार सकती है और आम आदमी पार्टी ऐतिहासिक जीत दर्ज करेगी। यह बयान चुनावी भाषण से आगे बढ़कर एक तरह की पूरी चुनावी तस्वीर पेश करता था, जहाँ इनकी ओर से तो मुकाबला लगभग खत्म माना जा रहा था।

हालाँकि दिल्ली की राजनीति इतनी सीधी नहीं होती। हर सीट पर अलग समीकरण, स्थानीय उम्मीदवारों का प्रभाव और संगठन की ताकत चुनावी नतीजों को प्रभावित करती है। दिल्ली में BJP ने अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के किले को ढहाते हुए अपनी सरकार बनाई। यहाँ BJP ने लगभग 40 सीटों के साथ बहुमत हासिल किया।

हरियाणा: इतिहास रचने का दावा और नतीजों में अचानक बदलाव

हरियाणा में भी अखिलेश यादव ने INDI गठबंधन को लेकर बड़े दावे किए। उन्होंने कहा कि विपक्ष की एकजुटता भाजपा को हराकर नया इतिहास लिख सकती है।

शुरुआती रुझानों में कॉन्ग्रेस की बढ़त ने इस दावे को कुछ समय के लिए सही साबित किया, लेकिन जैसे-जैसे मतगणना आगे बढ़ी, तस्वीर बदल गई। भाजपा ने बढ़त बनाई और निर्णायक जीत दर्ज की।

यह बदलाव यह दिखाने के लिए काफी था कि चुनावी रणनीति सिर्फ शुरुआती माहौल पर नहीं टिकी होती, बल्कि अंत तक संगठन ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। यहाँ विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 90 में से 48 सीटें जीतकर लगातार दूसरी बार सरकार बनाई।

महाराष्ट्र: विपक्षी उम्मीदों के बीच सत्ता पक्ष की मजबूत वापसी

महाराष्ट्र में भी अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव की राजनीतिक लाइन विपक्षी एकजुटता के जरिए सत्ता परिवर्तन का दावा करने वाली रही। अलग-अलग मंचों और बयानों में यह लगातार कहा गया कि राज्य में सत्ता के खिलाफ माहौल है और गठबंधन मिलकर चुनावी तस्वीर बदल सकता है, लेकिन महाराष्ट्र में भी वही पैटर्न दिखा जो दूसरे राज्यों में नजर आया।

लेकिन जब मतदान और उसके बाद के रुझान सामने आए, तो तस्वीर दावों से अलग नजर आई। बीजेपी और उसके सहयोगियों के गठबंधन ने 288 में से करीब 235 सीटों पर जीत दर्ज कर भारी बहुमत हासिल किया। अकेले बीजेपी ने 130 से ज्यादा सीटों पर जीत दर्ज की। अंततः यह साफ हुआ कि सिर्फ राजनीतिक संदेश और मंचीय भाषण चुनाव नहीं जिताते।

बिहार: सबसे मजबूत गढ़ में सबसे बड़ी हार

इस पूरे पैटर्न का सबसे बड़ा और सबसे निर्णायक उदाहरण बिहार है। यहाँ तेजस्वी यादव खुद चुनावी लड़ाई के केंद्र में थे और अखिलेश यादव भी उनके समर्थन में सक्रिय थे। ‘वोटर अधिकार यात्रा’, एमवाई समीकरण और PDA फॉर्मूले के जरिए यह दावा किया गया कि इस बार सत्ता परिवर्तन तय है, लेकिन जब नतीजे सामने आए, तो यह पूरा नैरेटिव बिखर गया।

NDA ने प्रचंड जीत हासिल की जबकि महागठबंधन लगभग 40 सीटों पर सिमट गया। यह सिर्फ हार नहीं थी, बल्कि एक राजनीतिक झटका था जिसने यह दिखा दिया कि जमीन पर वोटर का मूड उस नैरेटिव से पूरी तरह अलग था जो बनाया जा रहा था। सबसे बड़ी बात यह थी कि यह हार उसी राज्य में हुई जहाँ तेजस्वी यादव की सबसे मजबूत पकड़ मानी जाती है।

दावों और नतीजों के बीच बढ़ती दूरी

अगर इन सभी घटनाओं को एक साथ देखा जाए, तो यह साफ होता है कि एक ही तरह का पैटर्न बार-बार दोहराया जा रहा है। जहाँ अखिलेश और तेजस्वी जाते हैं, वहाँ माहौल बनता है, दावे किए जाते हैं, जीत की तस्वीर पेश की जाती है। लेकिन जब नतीजे आते हैं, तो वही तस्वीर बदल जाती है।

अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव की राजनीति आज भी चर्चा में रहती है, लेकिन हालिया चुनावी नतीजे यह दिखाते हैं कि उनके दावों और वास्तविक परिणामों के बीच का अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है।

जब एक ही कहानी बंगाल, तमिलनाडु, दिल्ली, हरियाणा और बिहार जैसे अलग-अलग राज्यों में दोहराई जाए, तो इसे महज संयोग नहीं कहा जा सकता। अब अखिलेश और तेजस्वी यादव को अपनी ‘जीत की भविष्यवाणी’ करने वाली रणनीति में बदलाव लाने पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता जरूर है।