पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव 2026 में घुसपैठ का मुद्दा सबसे बड़ा चुनावी हथियार बनकर उभरा। बीजेपी ने पूरे चुनाव में लगातार बंगाल में बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा उठाया, जबकि ममता बनर्जी और TMC इसे पूरी तरह नकारती रहीं। उल्टा ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को घुसपैठिया घोषित कर डाला। लेकिन चुनावी नतीजों के बाद अब जमीन पर जो तस्वीर दिख रही है, उसने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
राज्य में शुभेंदु सरकार के बनते ही घुसपैठियों के खिलाफ ‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’ नीति के तहत सख्त कार्रवाई शुरू हुई तो बंगाल से से ऐसे वीडियो सामने आने लगे, जहाँ घुसपैठिए अपने देश वापस लौटते दिखाई दे रहे हैं। कहीं लोग बॉर्डर पार जाने का इंतजार कर रहे हैं तो कहीं प्रशासन की कार्रवाई के डर से राज्य को छोड़ रहे हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि जब ममता बनर्जी कहती थीं कि बंगाल में घुसपैठिए हैं ही नहीं तो आखिर ये लोग कौन हैं जो कार्रवाई शुरू होते ही दुम दबाकर भागते नजर आ रहे हैं?
बंगाल में घुसपैठियों की बदलती तस्वीर
बंगाल में सरकार बनाते ही बीजेपी ने घुसपैठ के मुद्दे को प्राथमिकता दी। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने सरकार गठन के तुंरत बाद साफ कर दिया कि अब बंगाल में ‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’ नीति लागू होगी। सीएम शुभेंदु अधिकारी ने घुसपैठियों को चेतावनी दी, “जल्दी-जल्दी भागो। हम उन्हें जेल में रखकर खिलाना नहीं चाहते। आखिर हम जेल में उन्हें खाना खिलाने पर अपना पैसा क्यों बर्बाद करें?”
सरकार की इस कार्रवाई के बाद बंगाल के बॉर्डर इलाकों से जो तस्वीरें सामने आईं, वह विपक्ष की आँखों को चुभने वाली थीं। उत्तर 24 परगना जिले के हाकिमपुर चेकपोस्ट पर 100 से ज्यादा बांग्लादेशी परिवार अपने सामान के साथ बॉर्डर के पास जमा दिखाई दिए। यहाँ बांग्लादेशी खुद बता रहे थे कि उन्होंने भारत में घुसपैठ की है।
#WATCH | North 24 Parganas, West Bengal | A large group of allegedly illegal Bangladeshi immigrants gather at the Hakimpur checkpost near the Bangladesh border, after the newly formed, BJP-led, West Bengal government, launched its 'detect, delete and deport' policy. (26.05) pic.twitter.com/RBN79D0cfP
हावड़ा में तीन साल से रहे एक घुसपैठिए ने कहा कि एक व्यक्ति की मदद से वह भारत आया था, उसके साथ 10 और लोग थे और यहाँ वह बिना आधार कार्ड और राशन कार्ड के तीन साल तक रहा। उसने बताया कि उन 10 लोगों में से अब वह अकेला लौट रहा है।
#WATCH | North 24 Parganas, West Bengal | A Bangladeshi migrant says, "There is a lot of trouble going on here right now, so we are leaving. We cannot find any work, and no one is allowing us to stay… It has been two or three years since we arrived here from Bangladesh. We were… pic.twitter.com/9Ow4jRCcUe
इन्हीं में से एक बांग्लादेशी महिला ने कहा कि TMC ने उन्हें ‘लक्ष्मी भंडार’ से पैसे दिए। इतना ही नहीं महिला ने बताया कि आधार कार्ड, राशन कार्ड और वोटर आईडी भी बनाकर दिए, इसके बदले उन्हें सिर्फ TMC को वोट देना था।
SHOCKER FROM WEST BENGAL
Illegal Bangladeshi Immigrant says Trinamool Congress helped her get: -Money from Lakshmi Bhandar -Aadhar Card, Ration Card and Voter Card -Only asked her to vote for TMC in return
— Sensei Kraken Zero (@YearOfTheKraken) May 27, 2026
बंगाल में बीजेपी सरकार की घुसपैठ के खिलाफ कार्रवाई
बंगाल के बॉर्डर इलाकों से जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, उनके पीछे या सिर्फ डर या अफवाह नहीं, बल्कि सरकार की घुसपैठियों के खिलाफ लगातार कार्रवाई है। विधानसभा चुनाव 2026 के दौरान बीजेपी ने घुसपैठ को सबसे बड़ा मुद्दा बनाया था और दावा किया था कि बंगाल में अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या नेटवर्क तेजी से बढ़ा है।
अब वही बीजेपी सत्ता में आने के बाद शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में उसी मुद्दे पर तेजी से फैसले लेती दिखाई दे रही है। मुख्यमंत्री बनने के बाद शुभेंदु अधिकारी ने साफ कहा है कि उनकी सरकार ‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’ की नीति पर काम करेगी। इसी दौरान उनका बयान भी काफी चर्चा में रहा, जब उन्होंने कहा, “क्या ये घुसपैठिए हमारे दामाद हैं? उन्हें जल्दी-जल्दी भगाओ।”
घुसपैठ के मुद्दे को केवल चुनाव तक सीमित न रखकर बीजेपी ने सरकार गठन के महज दो दिन बाद, 11 मई 2026 को सीएम शुभेंदु अधिकारी की हुई पहली कैबिनेट बैठक में भारत-बांग्लादेश बॉर्डर पर फेंसिंग के लिए बीएसएफ को जमीन देने का फैसला लिया गया। शुभेंदु अधिकारी सरकार ने ऐलान किया कि सीमा के 27 किलोमीटर हिस्से में फेंसिंग के लिए करीब 75 एकड़ जमीन बीएसएफ को सौंपी जाएगी और अगले 45 दिनों में प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
सरकार ने बीएसएफ को जमीन देकर सीमावर्ती इलाकों में लंबे समय से अधूरी फेंसिंग की वजह से घुसपैठ के संकट को खत्म करने की कोशिश की। लेकिन वहीं, ममता सरकार ने इस जमीन के मुद्दे को कोर्ट तक घसीटा लेकिन बीएसएफ को जमीन नहीं दी।
अब राज्य में घुसपैठियों की पहचान और उन्हें वापस भेजने के लिए सरकार 23 जिलों में ‘होल्डिंग सेंटर‘ यानी डिटेंशन सेंटर बनवा रही है मालदा और मुर्शिदाबाद में ये सेंटर बन भी चुके हैं, जिनमें 12 बांग्लादेशी घुसपैठियों को पकड़कर रखा गया है। इन घुसपैठियों पर ‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’ की नीति लागू होगी। सबसे पहले इन घुसपैठियों की पहचान कर डिटेंशन सेंटर तक लाया जा चुका है, अब अगले पड़ाव में इनकी सरकारी रिकॉर्ड खंगालकर डिलीट किए जाएँगे और फिर बीएसएफ को सौंप दिया जाएगा। बीएसएफ ने सीमा पार करवाकर वापस बांग्लादेश भेज देगी।
सरकार की इसी कार्रवाई के बाद ही उत्तर 24 परगना जैसे जिलों में घुसपैठिए वापस बांग्लादेश लौटने का इंतजार करते दिखे।
ममता बनर्जी लगातार घुसपैठ से करती रही इनकार
बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में जहाँ बीजेपी ने घुसपैठ को सबसे बड़ा मुद्दा बनाया, वहीं ममता बनर्जी लगातार इस पूरे मुद्दे को राजनीतिक एजेंडा बताती रहीं। चुनाव से पहले कई रैलियों और सार्वजनिक कार्यक्रमों ने ममता बनर्जी ने बीजेपी पर हिंदू-मुस्लिम की राजनीति करने का आरोप लगाया और कहा कि घुसपैठ का मुद्दा सिर्फ बंगाल को बदनाम करने के लिए उठाया जा रहा है।
20 मार्च 2026 को कोलकाता के रेड रोड पर ईद की नमाज के बाद ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही ‘सबसे बड़ा घुसपैठिया‘ बता दिया। उन्होंने कहा कि लोगों को घुसपैठिया कहकर उनके वोटिंग अधिकार छीने जा रहे हैं और बीजेपी धर्म के नाम पर देश को बाँटने की कोशिश कर रही है।
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) पर भी ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ खड़ी दिखीं। उन्होंने 3 अप्रैल 2026 को दक्षिण दिनाजपुर की रैली में उन्होंने कहा कि अगर घुसपैठियों के वोट से सरकार बनी है, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस्तीफा दे देना चाहिए। इसे पहले जनवरी 2025 में ममता बनर्जी ने घुसपैठ को लेकर केंद्र सरकार और बीएसएफ पर ही आरोप मढ़ दिया।
लेकिन जब बीजेपी ने ममता सरकार पर घुसपैठियों को संरक्षण देने और वोटबैंक की राजनीति करने का आरोप लगाया तो मता बनर्जी ने इससे मुँह मोड़ लिया। चुनाव के दौरान ममता बनर्जी लगातार यह संदेश देने की कोशिश करती रहीं कि घुसपैठ का मुद्दा असल में बंगाल चुनाव को ध्रुवीकृत करने की रणनीति है। लेकिन चुनाव नतीजों के बाद जब शुभेंदु अधिकारी सरकार ने घुसपैठ के खिलाफ सख्त कार्रवाई शुरू हुई और बॉर्डर इलाकों से लौटते घुसपैठियों की तस्वीरें सामने आने लगीं तो अब ममता बनर्जी चुप हैं।
TMC की तुष्टिकरण की राजनीति ने बंगाल की कहाँ लाकर खड़ा कर दिया?
बंगाल में ममता बनर्जी नेतृत्व वाली TMC सरकार में पिछले 15 सालों तक घुसपैठ के मुद्दे को या तो नकारा गया या फिर उसे राजनीति कहकर टाल दिया गया। लेकिन सरकार बदलते ही जिसे तेजी से सीएम शुभेंदु के नेतृत्व में फेंसिंग, डिटेंशन सेंटर, पहचान और डिपोर्ट की कार्रवाई शुरू हुई और उसके बाद बॉर्डर इलाकों से जो तस्वीरें सामने आईं, उन्होंने ममता बनर्जी के दावों पर सवाल खड़े कर दिए। अगर बंगाल में घुसपैठिए थे ही नहीं, तो फिर कार्रवाई शुरू होते ही बॉर्डर पर लौटने वालों की भीड़ क्यों दिखाई देने लगी?
असल फर्क सरकार की नीयत और इरादों का होता है। जब सरकार कानून लागू करने की इच्छा रखती है तो सिस्टम जमीन पर दिखने लगता है। लेकिन जब राजनीति तुष्टिकरण और वोटबैंक के इर्द-गिर्द घूमने लगे, तब घुसपैठ भी ‘मुद्दा’ नहीं लगता। यही वजह रही कि वर्षों तक सीमा से जुड़े सवाल दबे रहे और बंगाल की कानून-व्यवस्था, पहचान और सुरक्षा पर लगातार सवाल उठते रहे। अब पहली बार कार्रवाई के बाद जो तस्वीर सामने आई है, उसने यह बहस फिर जिंदा कर दी है कि आखिर बंगाल का यह हाल बनने दिया किसने?
उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में 15 वर्षीय गोपाल शर्मा की हत्या के बाद विरोध प्रदर्शन का सिलसिला लगातार जारी है। परिजन का आरोप है कि 9वीं कक्षा का छात्र गोपाल शर्मा की बेरहमी से हत्या की गई है और पुलिस ने अब तक हत्यारों को गिरफ्तार नहीं किया है। वहीं, पुलिस की इस पर अलग थ्योरी है। इस बीच कई ब्राह्मण संगठन सड़कों पर उतर आए हैं और जल्द से जल्द आरोपितों को गिरफ्तार किए जाने की माँग कर रहे हैं।
21 मई से लापता था गोपाल शर्मा: जानें- पहली FIR की डिटेल्स
जेवर कोतवाली क्षेत्र के बनवारी बाँस गाँव के रहने वाले रवि भूषण उर्फ बंटी का बेटा गोपाल 21 मई से लापता था। परिवार ने तलाश की लेकिन कोई सुराग नहीं मिला और शुक्रवार (22 मई 2026) को जेवर कोतवाली में गुमशुदगी की FIR दर्ज कराई।
ऑपइंडिया के पास मौजूद इस FIR कॉपी के मुताबिक, पिता ने शिकायत में लिखा, “मेरा पुत्र गोपाल शर्मा, 21 मई 2026 को अपने घर से समय 3:30 से 4:00 बजे के बीच घर से कही चला गया है और अभी तक घर वापस नही आया है। हमने अपने सब रिश्तेदार को फोन करके पता लगाया गया है। आपसे निवेदन है कि इस मामले को गंभीरता से लें, उसकी खोजबीन जल्द से जल्द शुरु करने की कृपा करें।”
FIR का एक हिस्सा
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, शुक्रवार को FIR कराए जाने के बाद पुलिस भी जाँच में जुट गई। इसके बाद शनिवार (23 मई 2026) को गोपाल शर्मा का शव उसके गाँव से 4 किलोमीटर दूर रोही गाँव में एक खाली मकान के कमरे से बरामद हुआ था। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि किशोर के सिर पर गहरे चोट के निशान मिले और कमरे में काफी मात्रा में खून फैला हुआ था। इसके बाद परिजन ने उसकी हत्या की आशंका जताई। इसके बाद पुलिस ने कई लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू कर दी।
आँखे निकालीं, एसिड से जलाया: नाबालिग के साथ वीभत्सता का दावा
इस मामले में गोपाल शर्मा के साथ वीभत्सता का दावा किया गया है। गोपाल के पिता बंटी ने ZEE न्यूज को बताया कि बच्चे का शव इतनी गंदी हालात में था कि देखा भी नहीं जा रहा था। आँखें निकली हुई थीं, तेजाब डला हुआ था, जीभ कटी हुई थी। वहीं, गोपाल की माँ सरोज शर्मा ने बताया कि बहुत खराब हालत थी और मुझसे देखा तक नहीं गया। मृतक गोपाल की दादी ने बताया कि उसके मुँह में कुछ ठूँस दिया गया था, आँखें भी बाहर निकली हुई थीं।
बंटी ने एक अन्य चैनल से बातचीत में दावा किया कि हमने खुद ही शव ढूँढा था। उन्होंने बताया कि पुलिस ने बताया है कि हमने 6 लोगों को गिरफ्तार किया है लेकिन बेटे के साथ क्या हुआ यह अभी तक कोई नहीं बता रहा है। उन्होंने कहा कि मुझे एनकाउंटर चाहिए, मुझे बुलडोजर कार्रवाई चाहिए।
उन्होंने बताया, “बेटे का प्राइवेट पार्ट काट लिया गया, इतना अत्याचार किया है। मेरे बेटे को एक गोली मार दी होती तो मुझे इतना दुख ना होता जितना इन बातों को सुनकर हुआ है। हाथों में कील गाड़ दी गई, तेजाब डाला और उसके ऊपर पेशाब किया है।”
पुलिस ने क्या बताया?
पुलिस ने इस मामले में बच्चे के साथ वीभत्सता की खबरों को खारिज किया है। ग्रेटर नोएडा के DCP प्रवीण रंजन सिंह ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा कि बच्चे के शव का पोस्टमार्टम किया गया है, उसकी वीडियोग्राफी हुई है और उसमें वीभत्सता जैसी कोई बात सामने नहीं आई है, यह सिर्फ अफवाह उड़ाई गई है। DCP ने बच्चे के शव के वायरल फोटो पर भी बातचीत की है।
बच्चे के शव का वायरल फोटो
DCP प्रवीण रंजन ने वायरल तस्वीर और उसमें दिख रही वीभत्सता को लेकर बताया है कि वो शव के ‘डीकंपोज’ होने की वजह से ऐसे नजर आ रहा है और भी अंग कटा-फटा नहीं है। तस्वीर में आँखें बाहर दिखने पर उन्होंने बताया, “शव ‘डीकंपोजड’ हो रहा था, गरमी थी और कमरा भट्टी जैसा तप रहा था।” वहीं, सोशल मीडिया पर बच्चे का रेप किए जाने के दावों को भी खारिज किया है।
वहीं, मौत की वजह को लेकर DCP ने बताया कि पोस्टमार्ट रिपोर्ट में सिर पर चोट लगने की बात है लेकिन मृत्यु का सही कारण अभी नहीं पता चला है। साथ ही, उन्होंने इसे यकीनी तौर पर हत्या भी नहीं बताया है।
ग्रेटर नोेएडा DCP ने X पर लिखा, “थाना जेवर पर वादी द्वारा अपने पुत्र गोपाल उम्र करीब 15 वर्ष के घर से बिना बताए चले जाने के संबंध में अभियोग पंजीकृत कराया गया। थाना जेवर पुलिस द्वारा तत्काल सूचना प्राप्त होते ही परिजनों के साथ मिलकर गोपाल की तलाश की जा रही थी, इसी दौरान स्थानीय पुलिस को सूचना प्राप्त हुई कि उक्त बालक का शव ग्राम रोही में खाली मकान में है।”
DCP ने आगे लिखा, “प्राप्त सूचना पर त्वरित कार्रवाई करते हुए पुलिस बल तत्काल मौके पर पहुँचा व फील्ड यूनिट / फॉरेंसिक टीम बुलाकर घटना स्थल का निरीक्षण कराया गया। मृतक के शव का पंचायतनामा भरकर पोस्टमार्टम कराया जा चुका है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार लगाए गए कथित आरोप ‘प्राइवेट पार्ट का काटना, आँखें पर एसिड अटैक’ पूर्णतः असत्य एवं भ्रामक हैं। घटना के अनावरण के लिए 4 पुलिस टीमें गठित है, इस संबध मे महत्तवपूर्ण सुराग मिले है। शीघ्र सफल अनावरण किया जायेगा।”
— DCP Greater Noida (@DCPGreaterNoida) May 27, 2026
दरिंदों के साथ, दरिंदों जैसी कार्रवाई होगी: BJP विधायक
देवरिया सदर से BJP के विधायक शलभ मणि त्रिपाठी ने बताया है कि उन्होंने इस घटना को लेकर यूपी के डीजीपी से बातचीत की है। शलभ मणि ने X पर लिखा, “ग्रेटर नोएडा में मासूम बालक गोपाल शर्मा की जघन्य हत्या से हृदय अत्यंत व्यथित है, इस घटना को अंजाम देने वाले इंसान नहीं कहे जा सकते, वे दरिंदे हैं और उनके साथ दरिंदों जैसी ही कार्रवाई होगी।”
उन्होंने आगे लिखा, “योगी आदित्यनाथ जी की सरकार इस प्रकरण पर तेजी से कार्रवाई कर रही है, मैंने भी इस घटना पर उत्तर प्रदेश के डीजीपी राजीव कृष्ण एवं एसटीएफ चीफ अमिताभ यश से वार्ता कर हैवानों के खिलाफ कठोरतम के कार्रवाई के लिए कहा है। हम सभी की संवेदना पीड़ित परिवार के साथ है, घटना का शीघ्र खुलासा होगा।”
ग्रेटर नोएडा में मासूम बालक गोपाल शर्मा की जघन्य हत्या से हृदय अत्यंत व्यथित है, इस घटना को अंजाम देने वाले इंसान नहीं कहे जा सकते, वे दरिंदे हैं और उनके साथ दरिंदों जैसी ही कार्रवाई होगी, माननीय मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी की सरकार इस प्रकरण पर तेजी से कार्रवाई कर रही है,…
— Dr. Shalabh Mani Tripathi (@shalabhmani) May 27, 2026
पुलिस की कार्रवाई से नाराज लोगों का गुस्सा लगातार बढ़ता जा रहा है और कई सामाजिक संगठन अब पीड़ित परिवार से मिलने पहुँचे हैं। राष्ट्रीय विप्र एकता मंच के लोगों ने पीड़ित परिजन से मुलाकात की है और कार्रवाई ना किए जाने पर बड़े आंदोलन की चेतावनी दी है। ब्राह्मण समाज के कई संगठन भी आक्रोशित हैं तो वहीं पुलिस ने जल्द से जल्द मामले का खुलासा करने की बात कही है।
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने सोशल मीडिया पर राज्य की एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिक कामयाबी की जानकारी दी है। असम में मातृ मृत्यु दर (MMR) अब तेजी से घटकर महज 84 पर आ गई है। राज्य के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब असम का यह आँकड़ा देश के राष्ट्रीय औसत यानी 88 से भी नीचे चला गया है।
मुख्यमंत्री ने इस पल को अपने सार्वजनिक जीवन का सबसे भावुक करने वाला क्षण बताया है। उन्होंने इस सफलता का पूरा श्रेय असम के हजारों डॉक्टरों, नर्सों, आशा बहुओं और स्वास्थ्य कर्मियों को दिया है। CM हिमंता ने बताया कि साल 2006 में जब उन्होंने स्वास्थ्य विभाग संभाला था, तब राज्य में मातृ मृत्यु दर 480 थी। उस समय इस स्थिति को सुधारना बिल्कुल नामुमकिन लगता था, लेकिन स्वास्थ्य कर्मियों के लगातार काम और त्याग से आज यह सच हो चुका है।
There are some moments in public life which touch you very deeply. Today is one such moment for me.
Assam’s Maternal Mortality Rate has come down to 84. For the first time in our history, Assam is now below the national average of 88.
When I took over the Health Department in…
— Himanta Biswa Sarma (@himantabiswa) May 26, 2026
क्या है मातृ मृत्यु दर?
अगर हम आम लोगों की बिल्कुल सरल भाषा में समझें तो जब कोई महिला गर्भवती होती है या बच्चे को जन्म देती है, तब सही इलाज न मिलने या स्वास्थ्य की अन्य जटिलताओं के कारण यदि उसकी मृत्यु हो जाती है, तो उसे मातृ मृत्यु माना जाता है। इस पूरी व्यवस्था में बच्चे के जन्म के बाद के 42 दिनों का नाजुक समय भी शामिल किया जाता है।
स्वास्थ्य विज्ञान की दुनिया में इसे ठीक से मापने के लिए एक पैमाना बनाया गया है जिसे मातृ मृत्यु अनुपात कहा जाता है। इसका मतलब यह होता है कि समाज में हर एक लाख जीवित बच्चों के जन्म लेने पर कितनी माताओं को अपनी जान गँवानी पड़ी है। यह विशेष आँकड़ा किसी भी राज्य या देश की अस्पताल व्यवस्था, डॉक्टरों की उपलब्धता और इलाज की असली मजबूती को दुनिया के सामने साफ-साफ दिखाता है।
असम में पहले और अब के आँकड़ों में अंतर
असम राज्य ने पिछले दो दशकों के भीतर गर्भवती माताओं की देखभाल को लेकर स्वास्थ्य व्यवस्था को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। अगर हम साल 2006 के पुराने आँकड़ों को देखें तो असम की स्थिति पूरे देश में सबसे ज्यादा चिंताजनक और डरावनी मानी जाती थी। उस समय असम में हर एक लाख बच्चों के जन्म पर 480 माताओं की मौत प्रसव के दौरान हो जाती थी।
इसके बाद सरकार, अस्पतालों और जमीनी स्वास्थ्य कर्मियों ने मिलकर एक लंबा और कठिन सफर तय किया। इसी लगातार की गई मेहनत का नतीजा है कि साल 2026 में यह आँकड़ा बहुत तेजी से नीचे गिरकर केवल 84 पर टिक गया है। भारत सरकार के ताजा आँकड़ों के अनुसार इस समय पूरे देश की मातृ मृत्यु दर का औसत आँकड़ा 88 बना हुआ है। इसका सीधा और साफ मतलब यह है कि असम अब देश के सबसे पिछड़े राज्यों की सूची से बाहर निकलकर राष्ट्रीय औसत से भी कहीं ज्यादा बेहतर और शानदार काम कर रहा है।
आखिर किन वजहों से होती है गर्भवती माताओं की मौत
गर्भावस्था और बच्चे के जन्म के समय महिलाओं की अचानक जान जाने के पीछे मुख्य रूप से कुछ बड़ी स्वास्थ्य समस्याएँ जिम्मेदार होती हैं। डॉक्टरों के अनुसार इनमें सबसे बड़ी और जानलेवा समस्या डिलीवरी के तुरंत बाद महिला के शरीर से बहुत ज्यादा खून बह जाना है। अगर इस खून के बहाव को समय पर नहीं रोका जाए तो महिला की कुछ ही घंटों में मौत हो सकती है। इसके अलावा प्रसव के समय या उसके बाद अस्पतालों या घरों में पूरी तरह साफ-सफाई न होने से महिला के शरीर में बहुत तेजी से इंफेक्शन यानी संक्रमण फैल जाता है।
गर्भावस्था के दिनों में अचानक ब्लड प्रेशर यानी रक्तचाप का बहुत ज्यादा बढ़ जाना भी दिमाग और दिल पर गहरा असर डालता है जिसे चिकित्सा की भाषा में एक्लेम्पसिया कहा जाता है। कई बार समाज में बिना डॉक्टरी सलाह के या दाइयों के जरिए गलत तरीके से कराया गया असुरक्षित गर्भपात भी सीधे मौत का कारण बन जाता है। इन सभी समस्याओं के साथ ग्रामीण इलाकों की महिलाओं के शरीर में पहले से पोषण की कमी और खून की भारी कमी यानी एनीमिया का होना स्थिति को प्रसव के समय और ज्यादा नाजुक बना देता है।
माताओं की जान बचाने के सबसे सरल उपाय
चिकित्सा विशेषज्ञों का साफ कहना है कि गर्भवती माताओं की होने वाली इन अधिकांश मौतों को बहुत ही आसान उपायों से पूरी तरह रोका जा सकता है। इसके लिए सबसे जरूरी और प्राथमिक उपाय यह है कि बच्चे का जन्म हमेशा किसी अच्छे और मान्यता प्राप्त अस्पताल में डॉक्टरों और प्रशिक्षित नर्सों की देखरेख में ही होना चाहिए। पुराने तौर-तरीकों से घरों पर प्रसव कराने से अचानक पैदा होने वाले खतरों को संभालना नामुमकिन हो जाता है।
इसके अलावा गर्भावस्था के शुरुआती दिनों से ही महिला की कम से कम चार बार नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र में मुफ्त जाँच होनी चाहिए और समय पर सभी जरूरी टीके लगने चाहिए। गर्भवती महिला के रोज के खान-पीने का विशेष ध्यान रखना बेहद जरूरी है, जिसमें हरी पत्तेदार सब्जियाँ, फल, दूध और सरकार द्वारा दी जाने वाली आयरन की गोलियाँ नियमित रूप से शामिल हों। इसके साथ ही किसी भी अचानक पैदा होने वाली आपातकालीन स्थिति के लिए एम्बुलेंस या गाड़ी की व्यवस्था पहले से तैयार रखनी चाहिए ताकि बिना समय गँवाए मरीज को बड़े अस्पताल पहुँचाया जा सके।
सुरक्षा के लिए देश और राज्य में चलाई जा रही योजनाएँ
गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं की सुरक्षा के लिए भारत सरकार और असम सरकार मिलकर कई बेहतरीन और बेहद मजबूत योजनाएँ चला रही हैं। इन योजनाओं का मुख्य लक्ष्य गरीब से गरीब परिवार की महिला को भी बिना किसी खर्च के बड़े अस्पतालों में इलाज की सुविधा देना है।
जननी सुरक्षा योजना– इस दिशा में एक बहुत बड़ा और क्रांतिकारी कदम साबित हुई है। इस योजना के तहत सरकार ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की गर्भवती महिलाओं को सीधे नकद पैसे की मदद देती है ताकि वे पैसों की तंगी छोड़कर अस्पताल में आकर ही सुरक्षित डिलीवरी करवाएँ। इसी तरह जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम को शुरू किया गया है, जिसका पूरा उद्देश्य गर्भवती महिलाओं और बीमार शिशुओं के इलाज में जेब से होने वाले हर एक पैसे के खर्च को पूरी तरह खत्म करना है।
इस योजना के तहत किसी भी सरकारी अस्पताल में महिला का सीजेरियन ऑपरेशन, प्रसव, सभी जरूरी दवाइयाँ, जाँच, खून की जरूरत और डॉक्टर द्वारा बताया गया भोजन पूरी तरह मुफ्त मिलता है। इतना ही नहीं, महिला को घर से अस्पताल लाने और डिलीवरी के बाद वापस घर सुरक्षित छोड़ने के लिए एम्बुलेंस की गाड़ी भी पूरी तरह बिना किसी पैसे के सरकारी स्तर पर उपलब्ध कराई जाती है।
प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के तहत पूरे देश में हर महीने की 9 तारीख को एक विशेष दिन तय किया गया है। इस दिन सभी सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों पर प्रसूति विशेषज्ञों द्वारा हर एक गर्भवती महिला की व्यापक और बिल्कुल मुफ्त जाँच की जाती है। इस अभियान के तहत जिन महिलाओं की गर्भावस्था में ज्यादा खतरा दिखाई देता है, उनकी पहचान करके सुरक्षित प्रसव होने तक आशा वर्कर्स के जरिए लगातार उनकी व्यक्तिगत ट्रैकिंग की जाती है।
माताओं के स्वास्थ्य को और ज्यादा सम्मानजनक बनाने के लिए सरकार ने सुरक्षित मातृत्व आश्वासन यानी ‘सुमन’ योजना भी शुरू की है, जिसमें अस्पताल आने वाली हर महिला को बिना किसी कोताही के गुणवत्तापूर्ण और सुरक्षित इलाज की गारंटी दी जाती है। लेबर रूम की कमियों को दूर करने के लिए ‘लक्ष्य’ नाम का एक विशेष कार्यक्रम चलाया जा रहा है, जिससे अस्पतालों के प्रसव कक्षों को आधुनिक और पूरी तरह साफ-सुथरा बनाया जा सके।
पहली बार माँ बनने वाली महिलाओं के अच्छे खान-पान के लिए प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के तहत सीधे बैंक खाते में 5,000 रुपए भेजे जाते हैं, और मिशन शक्ति के तहत दूसरा बच्चा लड़की होने पर परिवार को 6,000 रुपए की मातृत्व सहायता दी जाती है। ग्रामीण इलाकों में खून की कमी को खत्म करने के लिए एनीमिया मुक्त भारत रणनीति के तहत स्कूलों और गाँवों में आयरन की दवाइयाँ मुफ्त बाँटी जा रही हैं और RCH पोर्टल के जरिए हर गर्भवती महिला का नाम लिखकर ऑनलाइन कंप्यूटर पर उसकी हर जाँच का हिसाब रखा जा रहा है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन का वैश्विक नजरिया और 2030 का बड़ा संकल्प
विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO पूरी दुनिया के स्तर पर मातृ मृत्यु दर को एक बेहद गंभीर और संवेदनशील स्वास्थ्य समस्या मानता है। इस वैश्विक संगठन के अनुसार साल 2023 के आँकड़ों को देखें तो दुनिया भर में हर दिन गर्भावस्था और प्रसव से जुड़ी रोकी जा सकने वाली कमियों के कारण 700 से अधिक महिलाओं को अपनी जान गँवानी पड़ती थी, जिसका मतलब है कि हर दो मिनट में एक माँ दुनिया छोड़ देती थी।
WHO ने दुनिया के सभी देशों के साथ मिलकर सतत विकास लक्ष्य के तहत एक बड़ा संकल्प लिया है कि साल 2030 तक पूरी दुनिया में मातृ मृत्यु दर को घटाकर प्रति एक लाख जन्म पर 70 से भी नीचे लेकर आना है। WHO की रिपोर्ट साफ बताती है कि दुनिया भर में होने वाली कुल मातृ मौतों में से लगभग 92% मौतें सिर्फ कम आय वाले और पिछड़े देशों में होती हैं, जहाँ अमीर और गरीब के बीच स्वास्थ्य सुविधाओं का बहुत बड़ा अंतर है।
संगठन का मानना है कि इन मौतों के पीछे अस्पताल प्रणालियों की खराब जवाबदेही, आवश्यक चिकित्सा उपकरणों की कमी, दूरदराज के इलाकों में डॉक्टरों की अनुपलब्धता और महिलाओं के अधिकारों को कम प्राथमिकता देना जैसे बड़े सामाजिक कारण शामिल हैं। WHO लगातार अनुसंधान और तकनीकी दिशा-निर्देशों के जरिए भारत सहित दुनिया के तमाम विकासशील देशों की स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूत कर रहा है।
संगठन का स्पष्ट संदेश है कि यदि गर्भावस्था और प्रसव के समय हर एक महिला को प्रशिक्षित डॉक्टर या दाई की सही देखरेख मिल जाए, तो दुनिया की अधिकांश माताओं को एक नया और सुरक्षित जीवन दिया जा सकता है।
प्रवर्तन निदेशालय ने अंतरराष्ट्रीय ईसाई मिशनरी टिमोथी इनिशिएटिव यानी टीटीआई की जाँच की है, जिसके बाद भारत में लाखों हिंदुओं के धर्मांतरण के पीछे मौजूद विदेशी चर्च तंत्र को लेकर सवाल खड़ा हो गया है। यह सर्वविदित है कि कई मिशनरी, चाहे व्यक्तिगत रूप से हों या किसी चर्च से जुड़े हुए, पर्यटक वीजा पर भारत आते हैं और ईसाइयत का प्रचार करते हैं। ये वीजा नियमों का भी उल्लंघन है। जाँच में ये बात भी सामने आई है कि गाँव-गाँव तक ये फैले हुए हैं और चर्च आपस में मिलकर यानी गठजोड़ बना कर काम करते हैं, जो बिल्कुल एक अलग कहानी है।
टीटीआई ने खुद माना है कि 2007 में ‘द इंडिया प्रोजेक्ट’ बना कर उसने भारत में लाखों चर्च स्थापित किए। ऑप इंडिया की जाँच में पता चला है कि कम से कम बारह प्रमुख विदेशी चर्च टीटीआई के साथ मिलकर हिंदुओं और दूसरे समुदाय के लोगों को ईसाइयत का पाठ पढ़ा रहे हैं।
चर्च दस्तावेज, मिशन के बुक, न्यूजलेटर, अभियान अपडेट और दूसरी सामग्री से पता चलता है कि टीटीआई का भारत में कार्य किसी एक विदेशी संगठन तक सीमित नहीं रहा है। अंतरराष्ट्रीय चर्चों, विदेशी फंडिंग और मिशनरी की भागीदारी का एक व्यापक नेटवर्क बन गया है। ये वर्षों से टीटीआई की ‘हर गाँव में चर्च’ स्थापना के मिशन में खुल कर मदद कर रहा है।
ऑपइंडिया ने टीटीआई से जुड़े भारतीय संदर्भों वाले कम से कम बारह गैर-भारतीय संस्थाओं की पहचान की है, जिनमें संयुक्त राज्य अमेरिका स्थित चर्च और एक कनाडाई संप्रदाय नेटवर्क शामिल हैं। ये संबंध केवल सामान्य मिशन संबंधी काम तक सीमित नहीं थे। कई मामलों में, चर्चों ने धन जुटाने के अभियानों, पादरी प्रशिक्षण, क्षेत्रीय दौरों, लोकल लेवल पर चर्चों की स्थापना, भारत से जुड़े डोनेशन जैसे मुद्दों पर बात की है।
इन नामों में केंसिंग्टन चर्च, मिशन ग्रोव चर्च, नॉर्थवेस्ट बैपटिस्ट चर्च, वुडडेल चर्च, राइज सिटी चर्च, मिशन हिल्स चर्च, फर्स्ट प्रेस्बिटेरियन चर्च ऑफ हैनफोर्ड, स्प्रिंगब्रुक कम्युनिटी चर्च और बैपटिस्ट जनरल कॉन्फ्रेंस ऑफ कनाडा शामिल हैं। लिबर्टी चर्च नेटवर्क, ऑल एक्सेस इंटरनेशनल, साल्टबॉक्स चर्च और वुडसाइड बाइबल चर्च के नेटवर्क और चर्चों से जुड़े संगठन भी टीटीआई तंत्र का हिस्सा थे।
टीटीआई की भारत में जड़ें और ‘प्रोजेक्ट इंडिया’ की शुरुआत
टीटीआई का मुख्यालय उत्तरी कैरोलिना के रैले में है। यह एक वैश्विक चर्च स्थापना संगठन के रूप में कार्य करता है। हालाँकि इसकी जड़ें भारत से गहराई से जुड़ी हुई दिखाई देती हैं। संगठन की वैचारिक उत्पत्ति कथित तौर पर डेविड नेल्म्स की 1992 में भारत की प्रारंभिक खोज यात्राओं से जुड़ी है, जिसके बारे में ओपइंडिया ने इस श्रृंखला के पिछले लेख में बताया था। इसके क्षेत्रीय संचालन की औपचारिक शुरुआत 2007 में आंतरिक नाम ‘प्रोजेक्ट इंडिया’ के तहत हुई थी।
शुरुआत से ही घोषित उद्देश्य आक्रामक और व्यापक था। टीटीआई भारत के हर गाँव में कम से कम एक चर्च स्थापित करना चाहता था। 2009 में संगठन ने वैश्विक स्तर पर विस्तार करने के उद्देश्य से अपना नाम बदलकर द टिमोथी इनिशिएटिव कर लिया। हालाँकि भारत इसके सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक क्षेत्रों में से एक बना रहा।
टीटीआई का मकसद तेजी से चर्च बनाना और लोगों को जोड़ना है। इसमें ‘पॉल’, ‘तिमोथी’ और ‘टाइटस’ होते हैं। ‘पॉल’ स्थानीय प्रशिक्षक हैं, जो स्थानीय प्रशिक्षण केंद्र स्थापित करते हैं और छात्रों के समूहों को प्रशिक्षित करते हैं। ‘तिमोथी’ शिष्य बनाने वाले और चर्च स्थापित करने वाले हैं, जो जमीनी स्तर पर काम करते हैं। ‘टाइटस’ नए धर्मान्तरित लोग हैं, जिन्हें आध्यात्मिक प्रशिक्षण दिया जाता है। बाद में उन्हें भावी कार्यकर्ताओं के रूप में आगे बढ़ाया जा सकता है।
पश्चिमी चर्चों को टीटीआई का मकसद काफी आकर्षित करता है, क्योंकि इससे उसकी लागत कम हो जाती है और तेजी से ईसाइयत का प्रचार होता है। संगठन का दावा है कि एक ‘स्वदेशी चर्च’ संस्थापक को प्रशिक्षित कर करीब 240 से 400 डॉलर में स्थानीय स्तर पर चर्च स्थापित किया जा सकता है। इससे विदेशी चर्चों और डोनेशन नेटवर्क को भारत में बड़े पैमाने पर चर्च स्थापना अभियान प्रायोजित करने में मदद मिली।
इस मामले को इस तरह समझा जा सकता है। जाँच में ईडी ने बताया कि टीटीआई ने विदेशी डेबिट कार्डों का उपयोग करके छह महीनों में 95 करोड़ रुपए निकाले। अगर हम यह भी मान लें कि इसमें से केवल 40 करोड़ रुपए ही सीधे चर्चों की स्थापना के लिए इस्तेमाल किए गए, बाकी राशि पादरियों के वेतन, प्रार्थना सभाओं के आयोजन, दौरों, स्थानीय समन्वय और अन्य परिचालन खर्चों में खर्च हुई होगी, और अगर मान लें कि 1 अमेरिकी डॉलर 88 रुपये के बराबर थी, तब भी यह लगभग 454 लाख डॉलर बनता है, जो टीटीआई के बताए गए 400 डॉलर प्रति चर्च मॉडल के अनुसार 11300 से अधिक चर्च स्थापित करने के लिए पर्याप्त है। यह केवल छह महीनों का अनुमान है।
जरा सोचिए, 2007 में अपनी स्थापना के बाद से यह समूह क्या कर सकता था। यह भी न भूलें कि उनके अपने दावे के अनुसार, उन्होंने 50 देशों में 268000 से अधिक चर्च स्थापित किए हैं, और भारत उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता है।
स्रोत: टीटीआई
केंसिंग्टन चर्च और उत्तरी भारत में चर्च स्थापना
केंसिंग्टन चर्च अमेरिका के मिशिगन में मौजूद एक बहुद्देशीय चर्च है। हमारे रिसर्च के दौरान, यह टीटीआई के भारत नेटवर्क से जुड़े प्रमुख विदेशी चर्चों में से एक के रूप में सामने आया। इसके आधिकारिक टीटीआई दस्तावेज में ‘दक्षिण एशिया में 3000 से अधिक गृह चर्चों की शुरुआत’ का उल्लेख किया गया है। चर्च से संबंधित अन्य सार्वजनिक दस्तावेजों में उत्तरी भारत में चर्च स्थापित करने के लिए 200000 डॉलर से अधिक की धनराशि जुटाने का उल्लेख है।
केंसिंग्टन आठ चर्चों के एक बड़े नेटवर्क से भी जुड़ा हुआ था, जिन्होंने कथित तौर पर चर्च स्थापित करने के लिए 10 लाख डॉलर जुटाने का संकल्प लिया था। इसकी सार्वजनिक सामग्री में न केवल साझेदारी की भाषा शामिल थी, बल्कि भारत यात्रा के लिए व्यावहारिक बुनियादी ढाँचा भी था, जिसमें भारत के लिए सामान की सूची भी शामिल थी। इससे पता चलता है कि यह संबंध केवल प्रतीकात्मक या प्रार्थना कराने तक सीमित नहीं था।
इसके भारत पेज के अनुसार , यह चर्च, चर्च संस्थापकों और पादरियों के रूप में पुरुषों और महिलाओं को दो साल के प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए भर्ती करता है। यही लोग पूरे भारत में हिंदुओं को इस चर्च के माध्यम से धर्मांतरित करते हैं। इन्होंने देश भर में अस्पताल स्थापित किए हैं, चिकित्सा शिविर चलाए हैं, अनाथालय स्थापित किए हैं और भी बहुत कुछ किया है।
स्रोत: केंसिंग्टन चर्च
स्वयं चर्च के अनुसार, उसका ‘ग्रेस चिल्ड्रन्स होम’ एक समय में 125 बच्चों को ‘आश्रय’ प्रदान करता है। उसका लक्ष्य केवल वयस्क ही नहीं, बल्कि भारत में 1 करोड़ बेघर बच्चे भी हैं। चर्च के पादरी की अगली भारत यात्रा नवंबर के दूसरे सप्ताह में निर्धारित है। हालाँकि इस विशेष कार्यक्रम में टीटीआई का उल्लेख नहीं है, लेकिन भारतीय एजेंसियों द्वारा इसकी जाँच की जानी चाहिए, क्योंकि चर्च का दावा है कि वह 2000 से भारत में इस तरह की गतिविधियों से जुड़ा हुआ है।
स्रोत: केंसिंग्टन चर्च
केंसिंग्टन से जुड़े तथ्यों से साफ होता है कि यह धन जुटाने, जन लामबंदी और जमीनी स्तर पर व्यावहारिक भागीदारी को सुनिश्चित करता है। इसका उत्तरी भारत से जुड़ाव विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि टीटीआई के भारत में परिचालन पर अब एफसीआरए ढाँचे के बाहर विदेशी धन के कथित हस्तांतरण के लिए नियामक जाँच चल रही है।
मिशन ग्रोव चर्च ने जुटाए करीब 15.32 करोड़ रुपए
एरिजोना के केव क्रीक में स्थित मिशन ग्रोव चर्च लगातार चर्चों की स्थापना और धर्मांतरण में लगा हुआ है। मिशन ग्रोव के एक पेज में कथित तौर पर ‘अगले 4 वर्षों में उत्तरी भारत और नेपाल में 4000 चर्च स्थापित करने’ का उल्लेख किया गया था। बाद में चर्च द्वारा जारी एक लिखित दस्तावेज में कहा गया कि भारत और बांग्लादेश में 4000 से अधिक चर्च स्थापित करने के लिए 1.6 मिलियन डॉलर जुटाए गए थे।
मिशन ग्रोव मामले के संबंध में पादरी जॉन क्रैगेल का नाम सामने आया है। सार्वजनिक घटनाक्रम से पता चलता है कि चर्च ने पहले भारत और नेपाल के लिए चार साल का लक्ष्य रखा था, लेकिन बाद में भारत और बांग्लादेश के अभियान की जानकारी दी । बताया जाता है कि एरिजोना में 81 व्यक्तियों, चर्चों और संगठनों की भागीदारी से 1.6 मिलियन डॉलर जुटाए गए थे।
स्रोत: मिशन ग्रोव चर्च
मिशन ग्रोव इस बात का एक अहम उदाहरण है कि कैसे टीटीआई के भारत से जुड़े अभियानों को विदेशों में चर्च स्थापना अभियानों के रूप में प्रस्तुत किया गया था।
वुडडेल चर्च और भारत, नेपाल और बांग्लादेश की प्रशिक्षण यात्रा
मिनेसोटा के ईडन प्रेयरी में मौजूद वुडडेल चर्च भी टीटीआई से जुड़ा दिखाई देता है। इसके बुलेटिन में कथित तौर पर कहा गया है कि पादरी डेल और रिचर्ड पायने ‘भारत, नेपाल और बांग्लादेश की टिमोथी इनिशिएटिव प्रशिक्षण यात्रा’ से लौट आए हैं।
वुडडेल की 2015 की वार्षिक रिपोर्ट में लिखा था , “2015 में, टिमोथी इनिशिएटिव के साथ साझेदारी में एशिया में 600 से अधिक नए चर्च स्थापित करने के लिए 1000 से अधिक नए लोगों को प्रशिक्षित किया गया। #चर्चस्थापना”। 2023 में चर्च ने दावा किया कि उसने टीटीआई की मदद से 2000 से अधिक चर्च स्थापित किए।
स्रोत: वुडडेल चर्च
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि वुडडेल के कुछ आँकड़े एशिया सेंट्रिक थे। यह सिर्फ भारत से जुड़ा नहीं था। हालाँकि भारत, नेपाल और बांग्लादेश की प्रशिक्षण यात्रा से यह स्पष्ट होता है कि चर्च और टीटीआई ने दक्षिण एशिया को टारगेट किया।
राइज सिटी चर्च और उत्तर भारत
ओरेगन के ग्रेशम में स्थित राइज सिटी चर्च ने भारत के संदर्भ में अपनी टीटीआई साझेदारी के बारे में बताया है। 2021 में चर्च ने कहा, “भारत में पादरियों को प्रशिक्षित करने और चर्च स्थापित करने में मदद करने” के लिए टीटीआई के साथ साझेदारी की है। 2022 में इसने टीटीआई को ‘भारत में तेजी से चर्च स्थापित करने वाली संस्था’ बताया।
इसके 2022 के अंत में जानकारी दी थी कि एक प्रतिनिधि ने उत्तर भारत की यात्रा की थी, ताकि उन कुछ चर्चों का दौरा कर सके, जिन्हें टिमोथी इनिशिएटिव के माध्यम से स्थापित की गई थी। यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे पता चलता है कि संबंध केवल विदेशी फंडिंग तक सीमित नहीं था। राइज सिटी ने उत्तरी भारत में स्थापित चर्चों के साथ जमीनी स्तर पर जुड़ाव की जानकारी दी है।
रिपोर्ट के अनुसार, राइज सिटी के किंगडम बिल्डर्स फंड ने शुरुआती चरण में लगभग 10000 डॉलर जुटाए थे , जबकि बाद के एक योजना पृष्ठ में कहा गया कि किंगडम बिल्डर्स का बजट बढ़कर लगभग 100000 डॉलर हो गया था। इसके अपडेट में यह भी बताया गया कि किंगडम बिल्डर्स ने दो वर्षों में दुनिया भर में 56 चर्च स्थापित किए।
मिशन हिल्स चर्च और 600 भारतीय पादरियों का सम्मेलन
कोलोराडो के लिटिलटन में स्थित मिशन हिल्स चर्च ने टिमोथी इनिशिएटिव को अपने ‘वर्ल्ड आउटरीच पार्टनर‘ के रूप में अपने लिस्ट में शामिल किया है । इसके अपडेट में कहा गया है कि 2025 तक इसने 1000 नए चर्चों के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की होगी। इसी अपडेट में भारत में एक पार्टनर को 600 से अधिक भारतीय पादरियों के लिए एक पादरी सम्मेलन आयोजित करने में सहायता करने का भी उल्लेख किया गया है।
स्रोत: मिशन हिल चर्च
1000 चर्चों की स्थापना की बात पूरे विश्व के लिए कहा गया होगा, ऐसा लगता है। हालाँकि 600 भारतीय पादरियों का सम्मेलन करने की बात स्पष्ट रूप से भारत से जुड़ा मामला है। यह टीटीआई के भारत में मौजूद तंत्र का एक और पहलू है, जिसमें न केवल चर्चों की स्थापना शामिल है, बल्कि पादरी प्रशिक्षण और नेतृत्वकर्ता पैदा करना भी शामिल है।
बीजीसी कनाडा और प्रति चर्च 400 डॉलर का मॉडल
कनाडा के बैपटिस्ट जनरल कॉन्फ्रेंस (बीजीसी कनाडा) के संबंध भी साफ जाहिर होते हैं। इसके आधिकारिक दस्तावेज में कहा गया है कि यह टिमोथी इनिशिएटिव के साथ साझेदारी कर रहा है। इसने बताया है कि एक चर्च स्थापित करने की लागत लगभग 400 अमेरिकी डॉलर है।
स्रोत: बीजीसी
अगस्त 2022 में भारत से प्रकाशित एक न्यूजलेटर में कथित तौर पर कहा गया था, ‘बीजीसी, टीटीआई के साथ मिलकर चर्च स्थापित कर रहा है,’ और यह भी बताया गया था कि टीटीआई को डोनेशन एडमोंटन के बीजीसी कार्यालय के माध्यम से दिया जा सकता है। न्यूजलेटर का लिंक बीजीसी कनाडा के कार्यकारी निदेशक केविन शूलर से था।
इससे पता चलता है कि किस प्रकार विदेशी संगठन टीटीआई की चर्च स्थापना से जुड़े हुए हैं और डोनेशन दे रहे हैं। हर चर्च के लिए 400 डॉलर का प्रस्ताव यह भी दर्शाता है कि कैसे अभियान को अंतरराष्ट्रीय ईसाई डोनर के लिए सरल बनाया गया, जिससे भारत में चल रहा नेटवर्क आसानी से काम कर सके।
नॉर्थवेस्ट बैपटिस्ट, हैनफोर्ड और स्प्रिंगब्रुक
वाशिंगटन के बेलिंगहैम स्थित नॉर्थवेस्ट बैपटिस्ट चर्च ने ईसाइयत के प्रचार-प्रसार करने वाले संगठन के लिस्ट में टिमोथी इनिशिएटिव को शामिल किया है और इसे भारत और नेपाल के ‘हर गाँव में एक चर्च’ स्थापित करने पर केंद्रित बताया। हालाँकि यहाँ सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी केंसिंग्टन या मिशन ग्रोव की तुलना में कम है, फिर भी टीटीआई चर्च के सक्रिय अंतर्राष्ट्रीय मिशनों की सूची में शामिल था।
कैलिफोर्निया के हैनफोर्ड स्थित फर्स्ट प्रेस्बिटेरियन चर्च का जिक्र चर्च के न्यूजलेटर के माध्यम से सामने आया । न्यूजलेटर में कहा गया था कि ‘डैन एस’ भारत के नेताओं से मजबूत संबंध बना कर चर्च स्थापना के लिए टीटीआई की मदद करवा रहे थे। इसके लिए प्रशिक्षण दिया जा रहा था।
स्प्रिंगब्रुक कम्युनिटी चर्च 2014 की भारत यात्रा से जुड़ा था । पास्टर रिच के भारत पेज पर कथित तौर पर कहा गया था कि यह यात्रा द टिमोथी इनिशिएटिव और कन्वर्ज वर्ल्डवाइड के साथ साझेदारी में होगी। इस यात्रा में दक्षिण और उत्तर भारत के नेताओं और चर्च संस्थापकों से सीखने का अवसर मिलेगा।
लिबर्टी चर्च नेटवर्क, ऑल एक्सेस इंटरनेशनल और दूसरी संस्थाएँ
टीटीआई के सिस्टम में चर्च से जुड़ी दूसरी संस्थाएँ और नेटवर्क भी शामिल थे । लिबर्टी चर्च नेटवर्क ने कथित तौर पर 2011 में टीटीआई के साथ साझेदारी की और 2011 से 2012 के दौरान पूरे भारत में 780 चर्चों को आर्थिक मदद की। यह 2012 से 2013 के दौरान पूर्वोत्तर भारत के 200 चर्चों से भी जुड़ा हुआ था।
ऑल एक्सेस इंटरनेशनल ने कथित तौर पर 2026 से 2027 तक ‘अचीव साउथ एंड साउथईस्ट एशिया’ पोर्टफोलियो का प्रबंधन किया , जिसके लिए 4578240 डॉलर का बजट आवंटित किया गया था। योजना के तहत 1050 ‘पॉल’ और 19000 ‘टिमोथी’ को प्रशिक्षित करके भारत और आसपास के क्षेत्रों में 11000 ‘हाउस चर्च’ स्थापित किया जाना है। ये उन इलाकों में होगा, जहाँ तक ईसाइयत की पहुँच काफी कम है।
खबरों के मुताबिक, साल्टबॉक्स चर्च ने अपने अंतरराष्ट्रीय मिशन पोर्टफोलियो के तहत मिशन इंडिया के साथ-साथ टीटीआई के वैश्विक चर्च स्थापना मंच को भी शामिल किया । वुडसाइड बाइबल चर्च ने भारत में अपनी अलग उपस्थिति बनाए रखी और 28 भारतीय राज्यों के 180 पादरियों और चर्च संस्थापकों के प्रशिक्षण के लिए टीमें भेजीं।
कुल मिलाकर इन सभी संस्थाओं की कार्यप्रणाली देखने से पता चलता है कि टीटीआई का भारत से संबंधित कार्य कोई अनौपचारिक या हवा में नहीं हो रहा। यह चर्चों, नेटवर्कों, दानदाताओं, प्रशिक्षकों और मिशन निकायों के एक व्यापक गठजोड़ का हिस्सा है।
जाति आधारित रणनीति
विदेशी चर्च नेटवर्क की मौजूदगी तब और भी चिंताजनक हो जाती है, जब इसे टीटीआई की क्षेत्रीय रणनीति के संदर्भ में देखा जाता है। स्थानीय प्रशिक्षण केन्द्र और स्थानीय लोगों को टारगेट करने के सुनियोजित चाल का पता चलता है, ताकि हिंदू बहुसंख्यक ग्रामीण समुदायों में पैठ बनाया जा सके। इससे स्थानीय विरोध को कम किया जा सकता है।
सबसे विवादित जाति आधारित मध्यस्थ रणनीति थी। आम जनता को उपदेश देने के बजाय, टीटीआई के माध्यम से चर्च संस्थापकों को निर्देश दिया गया था कि वे अलग-अलग जातियों के प्रमुख नेताओं की पहचान करें और उनका धर्म परिवर्तन कराएँ। इसके पीछे का तर्क आसान था। चूँकि जातियाँ स्थानीय सामाजिक जीवन को प्रभावित करती हैं, इसलिए किसी विशेष जाति के नेता को धर्म परिवर्तन कराने से उसी समूह के अन्य लोगों को भी धर्म परिवर्तन कराने का मार्ग प्रशस्त हो सकता था।
एक बार जब ऐसा कोई प्रभावशाली व्यक्ति धर्म परिवर्तन कर लेता है, तो उसे समुदाय को भीतर से प्रभावित करने के लिए मध्यस्थ के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसका अर्थ यह है कि भारत की मौजूदा सामाजिक संरचनाओं को ध्यान में रखते हुए व्यापक रणनीति के तहत धर्मांतरण के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।
हिंदू धर्म की कर्म- पुनर्जन्म जैसी बातों को टारगेट करना
रिपोर्ट के अनुसार, टीटीआई के पाठ्यक्रम में कर्म और पुनर्जन्म जैसे प्रमुख हिंदू विचारों को भी टारगेट किया गया था। इसके दसवें मैनुअल में ग्रामीण दर्शकों के सामने हिंदू दार्शनिक अवधारणाओं को नए सिरे से प्रस्तुत करने के तरीके बताए गए थे।
कथित तौर पर कर्म को एक ऐसा चक्र बताया गया, जिसमें क्षमा नहीं मिलती। ईसाइयत में चर्च में जाकर माफी माँगने से मसीह के माध्यम से तत्काल मुक्ति मिलने और दिव्य कृपा होने की बात कही गई। इसी प्रकार पाप के बारे में बताया गया।
यह महज एक धार्मिक चर्चा नहीं थी। यह गैर-ईसाई समुदायों को आकर्षित करने और उनके धर्मांतरण पाठ्यक्रम का हिस्सा था।
प्रतिरोध से बचने के लिए रणनीति
रिपोर्ट के अनुसार, टीटीआई ने कार्यकर्ताओं को उन क्षेत्रों में खुलेआम ईसाइयत के प्रचार से बचने की सलाह दी गई थी, जहाँ विरोध की आशंका थी। बाइबिल ले जाना, पर्चे बाँटना या धार्मिक फिल्में दिखाने से विरोध हो सकता था। इसलिए यहाँ रणनीति में बदलाव किया गया।
कार्यकर्ताओं को धर्मग्रंथों को याद करने और मौखिक तौर पर बताने, कहानियाँ सुनाने और धीरे-धीरे लोगों से संबंध मजबूत करने के निर्देश दिए गए, ताकि गाँवों के रोजमर्रा के कामों और सामाजिक जीवन में घुला-मिला जा सके।
इससे पता चलता है कि परिचालन मॉडल केवल आर्थिक मदद और प्रशिक्षण तक ही सीमित नहीं था। इसमें स्थानीय माहौल के हिसाब से बदलाव भी शामिल था।
FCRA उल्लंघन की ED कर रही जाँच
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जाँच ने टीटीआई के भारत में संचालन को राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में ला दिया है। अप्रैल 2026 में ईडी ने टीटीआई संचालकों से जुड़े कई ठिकानों पर छापेमारी की। एजेंसी ने पाया कि टीटीआई विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) के तहत पंजीकृत नहीं थी, जिसके कारण यह भारत में विदेशी दान प्राप्त करने या वितरित करने के लिए कानूनी रूप से अयोग्य थी।
जाँचकर्ताओं ने पाया कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ और विदेशी नागरिक ट्रांजिट हब के माध्यम से भारत में प्रवेश करते थे। बेंगलुरु अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर माइग्रेशन से जुड़े अधिकारियों ने ‘मिका मार्क’ या ‘जोस बेल’ नाम एक कूरियर को पकड़ा, जो कथित तौर पर लुक आउट सर्कुलर के तहत काम कर रहा था।
खबरों के मुताबिक, उसकी तलाशी के दौरान 24 विदेशी बैंक डेबिट कार्ड बरामद किए गए, जो अमेरिका के ट्रूइस्ट बैंक द्वारा जारी किए गए और विदेशों में खातों से जुड़े थे। फॉरेंसिक जाँच में पता चला कि नवंबर 2025 से अप्रैल 2026 के बीच, कई राज्यों में सुनियोजित तरीके से एटीएम से बड़ी रकम निकाले गए। इनमें से 95 करोड़ रुपए भारत में भेजे गए।
खबरों के मुताबिक, इस पैसे को एक विदेशी नियंत्रण वाले ऑनलाइन बिलिंग और अकाउंटिंग डेटाबेस के माध्यम से ट्रैक किया गया था। संवेदनशील क्षेत्रों में कथित तौर पर 6.5 करोड़ रुपए का पता चला जाँचकर्ताओं को उस वक्त ज्यादा हैरान हुई जब लगभग 6.5 करोड़ रुपए छत्तीसगढ़ के बस्तर और धमतारी के साथ-साथ झारखंड में पाया गया। ये रकम संवेदनशील, आदिवासी बहुल और वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में भेजे गए थे।
यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी चिंता की बात है। जनजातीय संवेदनशीलता और विदेशी फंडिंग वाले मिशनरी गतिविधियों के कारण ये क्षेत्र पहले से ही असुरक्षित हैं। इन क्षेत्रों में औपचारिक एफसीआरए चैनलों के बाहर एक नकदी-प्रधान समानांतर सिस्टम चल रहा है।
विदेशी चर्च नेटवर्क क्यों महत्वपूर्ण है?
अंतर्राष्ट्रीय चर्चों के साथ संबंध महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे दर्शाते हैं कि टीटीआई का भारत में संचालन केवल स्थानीय या अचानक नहीं था। विदेशी चर्चों ने सार्वजनिक रूप से धन जुटाया, चर्च स्थापना लक्ष्यों को बढ़ावा दिया, टीमें या प्रतिनिधि भेजे, पादरियों के प्रशिक्षण का समर्थन किया और भारत को एक ‘रणनीतिक मिशन क्षेत्र’ बनाया।
केंसिंग्टन का उत्तरी भारत अभियान, मिशन ग्रोव का 1.6 मिलियन डॉलर का धन उगाहना, बीजीसी कनाडा का प्रति चर्च 400 डॉलर का मॉडल, राइज सिटी की उत्तरी भारत यात्रा, मिशन हिल्स का 600 भारतीय पादरियों का सम्मेलन और वुडडेल की दक्षिण एशिया प्रशिक्षण यात्रा, ये सभी एक वैश्विक नेटवर्क की ओर इशारा करते हैं।
असल सवाल यह नहीं है कि टीटीआई को विदेशी मदद मिल रही है या नहीं। असली सवाल यह है कि एक विदेशी समर्थित चर्च स्थापना प्रणाली ने नकदी का कारोबार कैसे भारत में करने लगा। उसने नेटवर्क कैसे बनाया। इसके बारे में जाँचकर्ताओं का कहना है कि यह एफसीआरए की निगरानी से बाहर चल रहा था।
सबूतों से पता चलता है कि भारत में टीटीआई की उपस्थिति सीमित नहीं थी। इसके पास धन, प्रशिक्षण प्रणाली, विदेशी चर्च की मदद, जातियों और संप्रदायों के नेटवर्क, स्थानीय स्तर पर जन अभियान में वह शामिल था। दूसरे शब्दों में, टीटीआई के इर्द-गिर्द फैला नेटवर्क एक संगठन से कहीं अधिक व्यापक था और भारत पर केंद्रित एक विस्तृत अंतरराष्ट्रीय चर्च ढाँचे का एक हिस्सा था।
उत्तराखंड के कोटद्वार में ‘मोहब्बत की दुकान’ चलाने का नाटक करने वाले जिम ट्रेनर ‘मोहम्मद दीपक’ की असलियत अब पूरी तरह खुल चुकी है। इस साल जनवरी 2026 में एक विवाद के बाद खुद को इंटरनेट सेंसेशन बताने वाले मोहम्मद दीपक अब अपनी कंगाली का रोना रो रहे हैं। वे मीडिया में जाकर विक्टिम कार्ड खेल रहे हैं कि उनका ‘आर्थिक बहिष्कार’ किया जा रहा है।
लेकिन असलियत यह है कि जब वे विवादों में आए थे, तब देश के बड़े-बड़े नेताओं और वामपंथी गैंग ने उनके पीछे पैसों की बरसात कर दी थी। उनके जिम की मेंबरशिप खरीदने के लिए होड़ मच गई थी। लाखों रुपए हाथ में आने के बाद मोहम्मद दीपक ने उस पैसे का इस्तेमाल अपने जिम को चलाने या किराया देने में नहीं किया।
उसने वह सारा पैसा अपने घर की EMI और बच्चों की फीस जैसी निजी चीजों में उड़ा दिया। अब जब मकान मालिक ने चार महीने से किराया न मिलने पर दुकान खाली करने को कहा, तो मोहम्मद दीपक इस पूरी कानूनी और व्यावहारिक बात को सांप्रदायिक रंग देने में जुट गए हैं।
जनता से मिला पैसा निजी खर्चों में उड़ाया, अब हिंदू मकान मालिक को बता रहे ‘विलेन’
पॉलिटिक्स और सोशल मीडिया की इस हवा के बाद मोहम्मद दीपक के जिम में आने वाले लोगों की संख्या 15 से बढ़कर सीधे 70 तक पहुँच गई। मेंबरशिप ड्राइव से उसके पास मोटा पैसा आया। लेकिन मोहम्मद दीपक की नीयत यहीं डोल गई। लोगों ने पैसा इसलिए दिया था ताकि उनका जिम बिना किसी रुकावट के चल सके। मगर दीपक ने उस पैसे से जिम का 40 हजार रुपए महीना किराया नहीं चुकाया।
दीपक ने खुद मीडिया के सामने कबूल किया है कि मेंबरशिप से मिले सारे पैसों को उन्होंने अपने घर के लोन की किश्तें (EMI) भरने और बच्चों की स्कूल फीस में उड़ा दिया। जब चार महीने तक मकान मालिक को एक रुपया किराया नहीं मिला, तो उसने स्वाभाविक रूप से जिम खाली करने का अल्टीमेटम दे दिया। अब अपनी इस बड़ी नाकामी और धोखेबाजी को छिपाने के लिए मोहम्मद दीपक अपने हिंदू मकान मालिक को ही विलेन साबित करने में तुला है। वे आरोप लगा रहा है कि मकान मालिक उसे इसलिए हटा रहा है क्योंकि उन्होंने मुस्लिमों का साथ दिया था।
यहाँ बड़ा सवाल यह उठता है कि अगर मकान मालिक इतना ही नफरती था, तो उसने चार महीने तक बिना किराए के दीपक को जिम चलाने की छूट क्यों दी? कोई भी आम इंसान कोर्ट-कचहरी के मामलों में फँसे किराएदार को एक महीने का भी समय नहीं देता, लेकिन मकान मालिक ने चार महीने तक सब्र किया।
राहुल गाँधी से लेकर स्वरा भास्कर तक ने बनाया था ‘फर्जी हीरो’
यह पूरा तमाशा 26 जनवरी 2026 को शुरू हुआ था। कोटद्वार में बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने एक मुस्लिम दुकानदार से अपनी दुकान के नाम से ‘बाबा’ शब्द हटाने को कहा था। वहाँ जिम चलाने वाले दीपक कुमार ने बीच में कूदकर मुस्लिम दुकानदार का पक्ष लिया। जब लोगों ने उनका नाम पूछा, तो उन्होंने खुद को ‘मोहम्मद दीपक’ बताया। बस फिर क्या था, देश के तथाकथित सेक्युलर और वामपंथी गैंग को देश को बदनाम करने का एक नया चेहरा मिल गया।
कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने तो 1st फरवरी को सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखकर दीपक को देश का ‘हीरो’ और ‘नफरत के बाजार में मोहब्बत की दुकान‘ का जीता-जागता प्रतीक तक घोषित कर दिया। इसके बाद राहुल गाँधी ने मोहम्मद दीपक को दिल्ली में अपने घर पर भी बुलाया। वहाँ उन्होंने वीडियो शेयर करते हुए दीपक को शेर दिल योद्धा बताया और वादा किया कि वे कोटद्वार आकर उनके जिम की मेंबरशिप लेंगे। हालाँकि, राहुल गाँधी कभी वहाँ नहीं पहुँचे।
राहुल गाँधी के अलावा उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, बॉलीवुड अभिनेत्री स्वरा भास्कर और एक्टिविस्ट हर्ष मंदर जैसे बड़े नामों ने भी सोशल मीडिया पर दीपक के सपोर्ट में कसीदे पढ़े।
इन सबने लोगों से दीपक के जिम की मेंबरशिप खरीदने की अपील की। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के 15 सीनियर वकीलों ने 10-10 हजार रुपए देकर उनके जिम की सालाना मेंबरशिप खरीदी। CPIM के सांसद जॉन ब्रिटास ने भी खुद जाकर जिम की मेंबरशिप ली। यानी दीपक के पास पैसों की कोई कमी नहीं होने दी गई।
जिस समुदाय के लिए दीपक बना ‘मोहम्मद’, उसी ने फेर लिया मुँह
दीपक कुमार ने हिंदुओं को नीचा दिखाने और वामपंथियों से वाहवाही लूटने के लिए अपना नाम ‘मोहम्मद दीपक’ रख लिया था। उसने सोशल मीडिया पर यहाँ तक कह दिया था कि ‘मोहम्मद’ नाम में बहुत ताकत है। लेकिन सबसे मजेदार बात यह रही कि जिस मुस्लिम समुदाय का मसीहा बनने के चक्कर में उसने अपना नाम बदला, उसी मुस्लिम समुदाय ने मुसीबत के समय उनका साथ नहीं दिया।
इतने बड़े विवाद और सोशल मीडिया हाइप के बाद भी उसके जिम की मेंबरशिप केवल 70 तक ही सिमट कर रह गई। किसी भी स्थानीय मुस्लिम संगठन या व्यक्ति ने ग्राउंड पर आकर उनके जिम को बचाने के लिए आर्थिक मदद नहीं की। वे सिर्फ सोशल मीडिया पर बयानबाजी तक ही सीमित रहे।
संदिग्ध रहा है मोहम्मद दीपक का पुराना इतिहास
जाँच में यह भी सामने आया है कि मोहम्मद दीपक का इतिहास पहले से ही काफी विवादित और संदिग्ध रहा है। उसके संबंध दुबई के एक बिजनेसमैन चांद मौला बख्श से रहे हैं, जो उनके लिए बॉडीबिल्डिंग के इवेंट्स आयोजित कराता था। इसके अलावा दीपक यूथ कॉन्ग्रेस के जिला अध्यक्ष विजय रावत के भी बेहद करीबी रहा है। सोशल मीडिया पर उसके पुराने पोस्ट्स में बेहद आपत्तिजनक और भड़काऊ भाषा का इस्तेमाल देखने को मिलता रहा है।
मार्च के महीने में उनके खिलाफ पुलिस में FIR भी दर्ज हुई थी, जिसे रद्द कराने के लिए वे उत्तराखंड हाई कोर्ट पहुँचा था। तब हाई कोर्ट ने उसे फटकार लगाते हुए सोशल मीडिया पर किसी भी तरह के भड़काऊ वीडियो या मैसेज पोस्ट न करने की सख्त हिदायत दी थी।
जाहिर है कि पीड़ित होने का ढोंग करने वाला मोहम्मद दीपक असल में कोई पीड़ित नहीं हैं। उसने केवल एक घटना का फायदा उठाकर देश के बड़े नेताओं से पैसे और पब्लिसिटी बटोरी। जब वह पैसा खत्म हो गया और अपनी ही गलती से जिम बंद होने की कगार पर आ गया, तो वे एक बार फिर देश का माहौल खराब करने के लिए विक्टिम कार्ड खेल रहे हैं।
CBSE की कॉपियाँ जाँचने वाले ‘ऑन-स्क्रीन मार्किंग’ (OSM) पोर्टल में एक बड़ी गड़बड़ी का दावा सामने आया। टेक बिजनेसमैन दीदी दास ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर 19 साल के साइबर सुरक्षा रिसर्चर निसर्ग अधिकारी के हवाले से एक पोस्ट शेयर की। इस पोस्ट में दावा किया गया कि CBSE मार्किंग पोर्टल की सुरक्षा में बड़ी चूक थी, जिसका फायदा उठाकर कोई भी बाहर का व्यक्ति छात्रों के नंबर देख और बदल सकता था। निसर्ग के इस खुलासे के बाद इंटरनेट पर यह मामला काफी वायरल होने लगा और लोगों ने CBSE की इसे बड़ी अनदेखी करार दिया।
A 19-year old broke into India's largest high school examination system of 2M+ students a year, the CBSE, and was able to view and CHANGE any students' marks.
He responsibly wrote to the team 3 months ago, and it took them 3 days to fix only one of the issues. Today, they took… pic.twitter.com/6FR2wAFQgB
जब इस मामले ने सोशल मीडिया पर तूल पकड़ा तो केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने इस पर अपना आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी किया। CBSE ने हैकिंग और डेटा लीक के इन सभी दावों को पूरी तरह से खारिज किया है। बोर्ड ने साफ किया है कि जिस वेबसाइट (http://cbse.onmark.co.in) को हैक करने का दावा किया जा रहा है, वह सिर्फ आंतरिक जाँच के लिए बनाई गई एक टेस्टिंग साइट थी। इस पर किसी छात्र का असली डेटा या नंबर मौजूद नहीं था। कॉपियाँ जाँचने वाला असली पोर्टल बिल्कुल अलग और पूरी तरह सुरक्षित है, इसलिए किसी को चिंता करने की जरूरत नहीं है।
कैसे शुरू हुआ हैकिंग का यह पूरा खेल?
निसर्ग अधिकारी ने इसी साल अपनी 12वीं क्लास पास की है। उन्हें कंप्यूटर सुरक्षा यानी साइबर सिक्योरिटी में बहुत दिलचस्पी है। CBSE ने इस साल कॉपियाँ जाँचने के लिए एक ऑनलाइन वेबसाइट शुरू की थी। इस वेबसाइट को ‘ऑन-स्क्रीन मार्किंग’ (OSM) पोर्टल नाम दिया गया। निसर्ग ने ध्यान दिया कि इस वेबसाइट का लिंक पूरी तरह खुला हुआ था। इसे इंटरनेट पर कोई भी इंसान आसानी से खोल सकता था।
निसर्ग अधिकारी ने सिर्फ अपनी उत्सुकता के कारण इस वेबसाइट को थोड़ा गहराई से देखना शुरू किया। उन्होंने इसके पीछे चल रहे कंप्यूटर कोड की जाँच की। बाहर से देखने पर यह वेबसाइट बिल्कुल आम वेबसाइटों जैसी ही लगती थी। इसके लॉगिन पेज पर यूजर ID, स्कूल कोड और पासवर्ड माँगा जाता था। इसके बाद मोबाइल पर आने वाला ओटीपी (OTP) भी डालना पड़ता था। बाहर से इसमें कोई खराबी नहीं दिख रही थी। लेकिन जैसे ही निसर्ग ने इसके अंदरूनी कोड को खंगाला, तो उनके होश उड़ गए। कोड के अंदर सुरक्षा की बहुत बड़ी कमियाँ छिपी हुई थीं।
कोडिंग के अंदर खुलेआम लिखा था ‘मास्टर पासवर्ड’
निसर्ग अधिकारी ने अपने ब्लॉग में इस वेबसाइट के काम करने का तरीका समझाया है। उन्होंने बताया कि यह एक आधुनिक ‘एंगुलर’ एप्लीकेशन वेबसाइट है। इस तरह की वेबसाइटें अपनी पूरी कोडिंग को एक बंडल (फाइल) में समेट देती हैं। फिर यह मुख्य जावास्क्रिप्ट फाइल यूजर के कंप्यूटर या मोबाइल ब्राउजर पर भेज दी जाती है। यह फाइल इंटरनेट पर पूरी तरह से पब्लिक थी। यानी कोई भी इंसान इस फाइल को आसानी से देख और डाउनलोड कर सकता था।
निसर्ग अधिकारी ने इसी कोडिंग वाली फाइल को डाउनलोड कर लिया। इसके बाद उन्होंने इसे ध्यान से पढ़ना शुरू किया। पढ़ते-पढ़ते उन्हें कोडिंग के अंदर एक ‘मास्टर पासवर्ड’ लिखा हुआ मिल गया। यह पासवर्ड बिल्कुल साफ-साफ अक्षरों में लिखा था। इसे किसी सुरक्षित कोड या गुप्त रूप में नहीं छिपाया गया था।
ब्लॉग स्क्रीनशॉट
इस ‘मास्टर पासवर्ड’ की सबसे खतरनाक बात यह थी कि यह पूरी वेबसाइट का ताला खोल सकता था। इसे लॉगिन पेज पर डालते ही वेबसाइट की सारी सुरक्षा खत्म हो जाती थी। इसे डालने के बाद मोबाइल पर आने वाले ओटीपी (OTP) की जरूरत भी नहीं पड़ती थी। इस पासवर्ड के जरिए कोई भी हैकर कॉपियाँ जाँचने वाले किसी भी टीचर के अकाउंट में सीधे घुस सकता था। इसके लिए हैकर को बस टीचर की यूजर ID और स्कूल कोड का पता होना जरूरी था। यह दोनों जानकारियाँ इंटरनेट पर बहुत आसानी से मिल जाती हैं।
सुरक्षा के नाम पर ‘OTP’ का खेल निकला महज एक नाटक
निसर्ग ने आगे दावा किया कि इस वेबसाइट का ओटीपी (OTP) सिस्टम पूरी तरह से बेकार था। यह सुरक्षा के नाम पर सिर्फ एक दिखावा या नाटक था। आम तौर पर जब हम किसी वेबसाइट पर लॉगिन करते हैं, तो OTP हमारे मोबाइल फोन पर आता है। इसके बाद वेबसाइट का मुख्य कंप्यूटर (Server) जाँच करता है कि आपने सही OTP डाला है या नहीं। लेकिन CBSE की इस वेबसाइट में पूरा खेल ही उल्टा चल रहा था।
इस वेबसाइट में जब कोई लॉगिन करने की कोशिश करता था, तो मुख्य सर्वर खुद ही सही OTP का जवाब कोडिंग के अंदर आपके कंप्यूटर ब्राउजर को भेज देता था। इसके बाद ब्राउजर के अंदर चल रहा कोड खुद ही यह चेक करता था कि यूजर ने जो OTP डाला है, वह सही है या नहीं। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि जैसे कोई छात्र खुद ही अपनी परीक्षा ले रहा हो और खुद ही अपने आप को नंबर भी दे रहा हो।
इंटरनेट और नेटवर्क की थोड़ी सी भी समझ रखने वाला कोई भी व्यक्ति अपने कंप्यूटर की स्क्रीन पर ही सही OTP को साफ-साफ देख सकता था। कोडिंग में थोड़ी सी चालाकी करके बिना कोई OTP डाले भी सीधे वेबसाइट के अंदर एंट्री पाई जा सकती थी। इसी बात पर निसर्ग ने अपने ब्लॉग में एक बड़ी बात लिखी। उन्होंने लिखा, “जो सुरक्षा चक्र हमलावर के खुद के कंप्यूटर पर चलता है, वह असल में कोई सुरक्षा चक्र होता ही नहीं है।”
बिना लॉगिन के ही खुल रहे थे अंदरूनी डैशबोर्ड
इस वेबसाइट में कमियों की लिस्ट यहीं खत्म नहीं होती है। निसर्ग अधिकारी के मुताबिक वेबसाइट के अंदर के कई जरूरी पन्ने पूरी तरह से खुले पड़े थे। इनमें मुख्य डैशबोर्ड, प्रोफाइल पेज और कॉपियाँ देखने वाला पेज शामिल थे। इसके अलावा वेरिफिकेशन डैशबोर्ड भी बिना किसी सुरक्षा के खुला था। इन सभी महत्वपूर्ण पन्नों पर सुरक्षा का कोई ताला नहीं लगा था।
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इन पन्नों को खोलने के लिए किसी असली पासवर्ड की जरूरत नहीं थी। कंप्यूटर के ब्राउजर स्टोरेज में सिर्फ कुछ फर्जी शब्द डालने होते थे। इसके बाद कुछ साधारण कमांड देकर इन सभी गुप्त पन्नों को सीधे खोला जा सकता था।
इस वेबसाइट को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था कि उसे खोलने वाला यूजर असली है या नकली। यह सुरक्षा जाँच के लिए किसी असली टोकन या पास की माँग नहीं करती थी। यह बिना किसी रोक-टोक के किसी भी अनजान व्यक्ति को सीधे मुख्य डैशबोर्ड पर पहुँचा देती थी।
पुराना पासवर्ड जाने बिना बदल जाता था नया पासवर्ड
इस वेबसाइट का पासवर्ड बदलने वाला सिस्टम तो सबसे ज्यादा कमजोर था। आम तौर पर जब हम किसी अकाउंट का पासवर्ड बदलते हैं, तो हमसे पुराना पासवर्ड पूछा जाता है। लेकिन इस वेबसाइट में पुराना पासवर्ड चेक करने का कोई इंतजाम ही नहीं था। कंप्यूटर की कोडिंग में ऐसी गड़बड़ी थी कि पुराना पासवर्ड मुख्य कंप्यूटर (Server) के पास जाता ही नहीं था।
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इसका फायदा उठाना किसी भी हैकर के लिए बहुत आसान था। हैकर को बस कॉपियाँ जाँचने वाले शिक्षक की आईडी (Valuator ID) बदलनी होती थी। वह किसी भी शिक्षक की ID डालकर उसका पासवर्ड अपनी मर्जी से बदल सकता था। कंप्यूटर की दुनिया में इस बड़ी कमी को ‘सिस्टेमिक IDOR’ कहा जाता है।
इन दोनों गलतियों की वजह से कोई भी हैकर किसी भी शिक्षक के अकाउंट पर पूरी तरह कब्जा कर सकता था। इसके बाद वह वेबसाइट के अंदर आसानी से घुस जाता था। वह वहाँ रखी छात्रों की जाँची गई कॉपियों को आराम से देख सकता था। सबसे डरावनी बात यह है कि वह छात्रों के नंबरों को भी अपनी मर्जी से बदल सकता था।
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तीन महीने पहले सरकार को बताया, पर नहीं सुधरी गलती
निसर्ग अधिकारी ने बताया कि उन्होंने इस बड़े खतरे की जानकारी समय रहते सरकार को दे दी थी। उन्होंने 25 फरवरी 2026 को ही भारत सरकार की मुख्य साइबर सुरक्षा एजेंसी ‘CERT-In’ को एक ईमेल भेजा था। अपने पहले ईमेल में उन्होंने मास्टर पासवर्ड के लीक होने की बात बताई थी। साथ ही उन्होंने ओटीपी (OTP) सिस्टम की कमजोरी का भी जिक्र किया था।
इसके बाद सरकारी एजेंसी ने उनसे और जानकारी माँगी। एजेंसी ने उनसे कमियों को साबित करने के लिए सबूत भी माँगे। निसर्ग अधिकारी ने बकायदा कंप्यूटर की स्क्रीन रिकॉर्ड करके Video बनाए। उन्होंने लाइव वीडियो के जरिए पूरे पोर्टल को हैक करके दिखा दिया। उन्होंने सारे वीडियो सबूत के तौर पर एजेंसी को भेज दिए।
यह सब करने के बाद निसर्ग को एजेंसी से एक ईमेल मिला। यह सिर्फ एक साधारण और ऑटोमैटिक ईमेल था। इसमें बस उनकी शिकायत दर्ज होने का एक नंबर लिखा था। निसर्ग का दावा है कि इसके बाद उन्होंने कई बार ईमेल भेजे। उन्होंने अधिकारियों को बार-बार इस खतरे की याद दिलाई। इसके बावजूद महीनों तक इस राष्ट्रीय स्तर की वेबसाइट की कमियों को सुधारा नहीं गया।
निसर्ग अधिकारी को प्राप्त मेल
इस लापरवाही पर निसर्ग अधिकारी ने तंज भी कसा है। उन्होंने अपने ब्लॉग पर लिखा, “अगर यह मेरा सिस्टम होता, तो मैं इन कमियों को एक या दो घंटे में ठीक कर देता।” उन्होंने सरकारी अधिकारियों के इस ढीले रवैये पर गहरी हैरानी जताई है।
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CBSE गड़बड़ी ठीक करने दिल्ली बुलाए गए IIT कानपुर-मद्रास के वैज्ञानिक
CBSE पोर्टल में आ रही लगातार गड़बड़ियों को देख केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस तकनीकी समस्या को तुरंत ठीक करने के लिए एक विशेष टीम बनाई है। इस टीम में IIT कानपुर के 2 और IIT मद्रास के 2 सीनियर वैज्ञानिकों को शामिल किया गया है।
इनमें IIT कानपुर से प्रोफेसर कलोल मंडल और डॉक्टर आनंद हांडा जैसे बड़े नाम हैं। शिक्षा मंत्री ने इन चारों वैज्ञानिकों को तुरंत दिल्ली तलब किया है। उन्हें इस तकनीकी चुनौती का जल्द से जल्द समाधान खोजने का सख्त निर्देश दिया गया है।
CBSE की वेबसाइट हैकिंग मामले पर बोर्ड का स्पष्टीकरण
CBSE ने सोशल मीडिया पर फैले इस पूरे विवाद को शांत करते हुए साफ किया है कि जिस वेबसाइट को हैक करने का दावा किया जा रहा है, वह सिर्फ आंतरिक जाँच के लिए बनाई गई एक टेस्टिंग साइट थी।
Clarification Regarding Claim of Compromise of CBSE OSM Portal
In a post made by a user on social media, it has been claimed that the CBSE On Screen Marking (OSM) bearing URL: https://t.co/cuLrvsxzOH was compromised by him on 26.02.2026. This has also formed the basis for a few…
वेबसाइट का लिंक अलग है: बोर्ड ने साफ किया है कि छात्रों की उत्तर पुस्तिकाओं की जाँच करने के लिए जिस असली पोर्टल का इस्तेमाल किया गया था, उसका इंटरनेट लिंक (URL) बिल्कुल अलग था।
यह केवल एक टेस्टिंग साइट थी: सोशल मीडिया पर जिस लिंक को हैक करने का दावा किया जा रहा है, वह सिर्फ आंतरिक जाँच और समीक्षा के लिए बनाई गई एक टेस्टिंग (सैंपल) साइट थी।
कोई असली डेटा लीक नहीं हुआ: इस टेस्टिंग साइट पर किसी भी छात्र के असली नंबर, कॉपियों का मूल्यांकन या कोई अन्य जरूरी डेटा मौजूद नहीं था। इसमें सिर्फ काल्पनिक डेटा डाला गया था।
सुरक्षा में कोई चूक नहीं: बोर्ड ने भरोसा दिलाया है कि कॉपियाँ जाँचने वाले असली पोर्टल में कोई भी गड़बड़ी नहीं थी और न ही उसकी सुरक्षा से कोई समझौता हुआ है।
सिस्टम पूरी तरह सुरक्षित है: CBSE के अनुसार, यह सिस्टम मूल्यांकन को और बेहतर व पारदर्शी बनाने के लिए तैयार किया गया है। इसमें सुरक्षा के बेहद कड़े इंतजाम हैं, इसलिए सभी छात्र और अभिभावक पूरी तरह निश्चिंत रहें।
‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) को उसके तथाकथित संस्थापक अभिजीत दिपके जितनी गंभीरता से नहीं ले रहे हैं, उससे कहीं ज्यादा वामपंथी-लिबरल गैंग इसके जरिए अपने प्रोपेगेंडा को हवा देने के लिए इस्तेमाल कर रहा है। आज हर वामपंथी-लिबरल गैंग के व्यक्ति के मुँह पर सिर्फ कॉकरोच जनता पार्टी का ही नाम सुनाई दे रहा है। इसी सटायर पार्टी की एक फैन न्यूजलॉन्ड्री (Newslaundry) वाली मनीषा पांडे भी हैं। लेकिन ‘मैडम’ खुशी-खुशी में कुछ ज्यादा ही बोल गईं।
इतना ज्यादा कि कल को न्यूजलॉन्ड्री पर एक और आपराधिक मुकदमा दर्ज हो जाए तो इसकी जिम्मेदार मनीषा पांडे ही होंगी, जैसे वो मानहानि वाले केस में थीं। वही मानहानि वाला केस, जिसमें मनीषा पांडे को दिल्ली हाई कोर्ट ने उनके पत्रकार होने पर दुत्कार दिया था, उन्हें न्यूजलॉन्ड्री बाहर निकालने तक को कह दिया था। बेचारी इतना जलील होने के बाद भी अपने पैरों पर खड़ी हैं.. यहाँ पैरों में ‘र’ कि जगह ‘स’ पढ़ा जाए क्योंकि यह मेरा सटायर मूव है। ठीक वही मूव जिसे मनीषा पांडे अपनी ‘पत्रकारिता’ बताती हैं। खैर इसकी बात आगे करेंगे।
अभी बात करते हैं मनीषा पांडे की फुहड़ता की। तो हुआ कुछ ऐसा कि ‘कॉकरोच जनता पार्टी‘ बनने की खुशी में प्रोपेगेंडाबाज कॉमेडियन कुणाल कामरा ने अपने यूट्यूब चैनल पर ‘दावत’ रखी। इस दावत में पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके चीफ गेस्ट के रूप में आमंत्रित थे और बाकी वामपंथी जखीरे से न्यूजलॉन्ड्री की मनीषा पांडे, ‘डॉ. मेदुसा’ नाम से फेमस डॉ. माधुरी काकोटी और दावत का परमानेंट पैनल रोफल गाँधी और आम्या देशपांडे हिस्सा थे।
इस दावत में ‘कॉकरोच जनता पार्टी‘ के भविष्य, वर्तमान और भूतकाल को लेकर चर्चा हुई। मजाक-मजाक में राजनीतिक दल बनाने वाले अभिजीत पांडे भी सन्न रह गए कि जिसे वे ‘जोकरों का शो’ समझकर आए थे, वहाँ ऐसी गंभीर चर्चा क्यों हो रही है। वह बार-बार बोलते: “मुझे तो लगा ही नहीं कि सब इतना सीरियस हो जाएँगे।”
लेकिन बातों-बातों में अभिजीत भी सच बोल गए। उन्होंने बताया कि कैसे CJP को विदेशों से प्रेम मिल रहा है, यहाँ तक कि सरकार विरोधी गतिविधियों पर नजरें गाढ़कर बैठने वाले अल जजीरा, द टेलीग्राफ जैसे विदेशी मीडिया संस्थान उनकी इस ऑनलाइन ट्रेंड को फॉलो भी कर रहे हैं। जैसे बाकी लोगों को पता ही नहीं कि इन विदेशी मीडिया में भारत के खिलाफ कैसी खबरें लिखी जाती हैं।
दावत के सभी गणमान्य लोगों ने मिलकर एक संकल्प भी लिया। यह संकल्प था, अपने-अपने पिता के फोन से BJP का कंटेन्ट हटाना है, उनका एल्गोरिदम बिगाड़कर उन्हें सिर्फ न्यूजलॉन्ड्री जैसे वामपंथी संस्थान का कंटेन्ट देखने को मजबूर करना है। यानी CJP को गंभीरता से लेने का ड्रामा करते हुए पूरी तरीके से BJP-विरोधी माहौल बनाया गया।
इस बीच मनीषा पांडे ने भी सरकार पर खूब गुस्सा निकाला और CJP बनने की खुशी में खूब बातें की। पहली चीज कि मनीषा पांडे ने CJP को नेपाल में GenZ प्रदर्शन से जोड़ा और कहा कि CJP की ही तरह नेपाल में भी सोशल मीडिया से सत्ता परिवर्तन का सिलसिला शुरू हुआ था। अपनी बातों में उन्होंने देश के युवाओं को नेपाल जैसा ही कुछ हिंसक करने के लिए भड़काया। इसीलिए मैंने कहा था कि अगर कल को मनीषा पांडे पर कानूनी कार्रवाई हुई तो वह खुद इसकी जिम्मेदार होंगी और खुद तो डूबेंगी ही अपनी रोजी-रोटी के संसाधन न्यूजलॉन्ड्री को भी ले डूबेंगी।
ऐसा भी इसीलिए क्योंकि मनीषा पांडे ने न्यूजलॉन्ड्री की पोल भी खोलकर रख दी। उन्होंने कबूल किया कि वह जो Newsance शो करती हैं, जिसमें वह भारत के पत्रकारों की हँसी-मजाक करते हुए आलोचना करती हैं, उसको देखने वाले अधिकतर पाकिस्तानी ही हैं।
गौर करने वाली बात यह है कि वह अपने शो में एक QR स्कैनर दिखाती हैं, जिसमें पैसा माँगती हैं। यानी अगर मनीषा के अनुसार उनके शो के अधिकतर फैंस पाकिस्तानी हैं तो क्या पैसा देने वाले भी पाकिस्तानी ही हैं, और उसी पैसे से यह न्यूजलॉन्ड्री सरकार-विरोधी और मीडिया-विरोधी प्रोपेगेंडा गढ़ भी रहा है?
मनीषा पांडे ने चाहे व्यंग्य में चाहे गंभीर होकर जो भी पोल खोली है, उसका अंदाजा पहले ही उनकी रिपोर्टिंग स्टाइल और भारत में हुए उनसे जुड़े विवाद को देखकर लगाया जा सकता था कि उनके फैंस पाकिस्तान में ही हो सकते हैं।
2024 में जब हल्द्वानी में अवैध मस्जिद गिराने गई पुलिस टीम पर मुस्लिम दंगाइयों ने हमला किया, लेकिन मनीषा पांडे ने उन हमलावरों को ‘मुस्लिम’ कहने से परहेज किया औऱ सिर्फ ‘भीड़’ बताकर मामला पेश किया। उस दौरान न्यूजलॉन्ड्री भी लगातार उन्हें पीड़ित साबित करने में जुटा रहा।
उधर, जनवरी 2024 में जब महाराष्ट्र के थाने जिले स्थित मीरा रोड पर जब मुस्लिमों ने हिंदुओं पर हमला किया, तब भी मनीषा पांडे का वही रवैया देखने को मिला। न्यूजलॉन्ड्री ने खबरें चलाईं कि हिंदू भगवान राम के नारे लगाकर मुस्लिमों को उकसा रहे थे, जबकि हिंसा करने वालों की पहचान पर चुप्पी साध ली गई।
यहाँ तक कि जब मई 2025 में नैनीताल में 73 साल के एक मुस्लिम ने 12 साल की बच्ची का रेप किया, तब भी न्यूजलॉन्ड्री ने इसे मुस्लिम और हिंदू के बीच अफेयर बताकर पेश करने की कोशिश की। लगातार ऐसे मामलों में एक ही नैरेटिव आगे बढ़ाया गया।
तो अब तो कोई सवाल ही नहीं बचा कि ऐसे पत्रकार जिनका काम ही हिंदुओं के प्रति घृणा दिखाना, भारत पर सवाल उठाना और इस्लामी कट्टरपंथियों के कारनामों को ‘भीड़ के अपराध’ के तौर पर पेश करना हो… उनका फैनबेस कहाँ से होगा?
आखिर में सिर्फ यही, मनीषा पांडे के इस बड़बोलापन से लगता हैं कि वह पत्रकारिता बिरादरी की ‘सस्ती आलिया भट्ट’ हैं, जिनकों नहीं पता कि कहाँ क्या बोलना है और जो कॉमेडी तो करना चाहती हैं लेकिन कर नहीं पातीं। तो अब पत्रकारिता बिरादरी की सस्ती आलिया भट्ट का क्या होगा, ये तो समय बताएगा। लेकिन अभी जिस तरह खुलेआम सटायर, कॉमेडी और पत्रकारिता के नाम पर पूरा प्रोपेगेंडा चलाया जा रहा है, उससे इतना तो साफ है कि मामला सिर्फ मजाक तक सीमित नहीं है। पहले लगता था कि न्यूजलॉन्ड्री बस एक खास नैरेटिव चला रहा है, लेकिन अब खुद उसकी स्टार एंकर यह बता रही हैं कि उनके शो को सबसे ज्यादा पाकिस्तान में देखा जाता है और वहीं से उन्हें प्यार भी मिलता है। और यह कोई भी कंटेन्ट क्रिएटर बता सकता है कि ऑडियंस के हिसाब से कंटेन्ट देना कितना जरूरी होता है।
जब आप देश के हाईवे, एक्सप्रेसवे या फिर शहरों की सड़कों पर चलते होंगे, तो कारों की लंबी-लंबी कतारें देखते होंगे। आपको यकीनन लगता होगा कि देश में सबसे ज्यादा पेट्रोल की खपत (Consumption) यही गाड़ियाँ करती हैं।
और अगर आप आज-कल के वैश्विक कच्चे तेल (Crude Oil) के संकट से वाकिफ हैं, तो सोचते होंगे कि अगर ये गाड़ियाँ इलेक्ट्रिक हो जाएँ, तो हम बाहर से तेल मंगवाने की मजबूरी से मुक्त हो जाएँगे। शायद ऐसा ही विचार आपके मन में तब भी आता होगा, जब आप शहरों में डीजल से धुआँ उड़ाती बसें देखते होंगे।
लेकिन शायद आप सही समस्या का गलत इलाज ढूँढ रहे हैं! आपके इस नजरिए ने आपको यह मानने पर मजबूर कर दिया है कि सिर्फ कारों को इलेक्ट्रिक बना देने से पूरी समस्या का समाधान हो जाएगा। लेकिन ऐसा कतई नहीं होने वाला। और इसकी वजह यह नहीं है कि हमारे पास बिजली कम है, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी है या इलेक्ट्रिक गाड़ियाँ महँगी हैं, बल्कि इसका कारण कुछ और ही है।
सिर्फ कारों को इलेक्ट्रिक बनाने से हमारे कच्चे तेल के आयात (Import) की समस्या क्यों हल नहीं होगी, यह मैं आपको बस कुछ ही देर में समझाता हूँ। उससे पहले एक हालिया खबर सुनिए। ‘इकोनॉमिक टाइम्स’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र सरकार लगभग 9,000 करोड़ रुपए की एक नई स्कीम की तैयारी कर रही है, जिसका इस्तेमाल देश में ट्रक्स और बसों को इलेक्ट्रिफाई (Electrify) करने के लिए किया जाएगा।
अब हम अपने पहले सवाल पर वापस आते हैं कि आखिर सिर्फ कारों को ही इलेक्ट्रिक करने से बात क्यों नहीं बनेगी? इसके लिए पहले यह समझना होगा कि असल में देश में सबसे ज्यादा तेल की खपत करता कौन है।
दोपहिया वाहन पीते हैं सबसे ज्यादा पेट्रोल
चिंता मत करिए, इसके लिए हमें किसी पेट्रोल पंप पर जाकर एक-एक गाड़ी गिनने की जरूरत नहीं है, बल्कि यह काम पहले ही हो चुका है। मिनिस्ट्री ऑफ पेट्रोलियम की ‘पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल’ (PPAC) और रेटिंग एजेंसी CRISIL ने देश के करीब 3,000 पेट्रोल पंपों पर इसी बात का पता लगाने के लिए एक सर्वे किया था।
इस सर्वे के नतीजे काफी चौंकाने वाले थे। पहले बात करते हैं पेट्रोल की। सर्वे से पता चला कि सड़कों पर सबसे ज्यादा दिखने वाली कारें नहीं, बल्कि हमारी बाइक्स और स्कूटर्स, यानी टू-व्हीलर्स (2-Wheelers) इस देश में पेट्रोल के सबसे बड़े कंज्यूमर हैं। देश के कुल पेट्रोल कंजम्पशन का 59% हिस्सा अकेले ये टू-व्हीलर्स डकार जाते हैं!
वहीं, जो कारें आपको ट्रैफिक, हाईवे और एक्सप्रेसवे पर सबसे ज्यादा नजर आती हैं, उनका कुल पेट्रोल खपत में शेयर सिर्फ 39.91% है। इसमें से भी अगर कमर्शियल टैक्सियों को हटा दें, तो पर्सनल कारों का हिस्सा सिर्फ 36.62% ही रह जाता है।
यानी, जिस कार सेगमेंट को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा होती है, अगर उसे हम पूरी तरह इलेक्ट्रिक में शिफ्ट कर भी दें, तो भी पेट्रोल की समस्या सिर्फ एक-तिहाई ही हल होगी; करोड़ों लीटर पेट्रोल की खपत फिर भी बनी रहेगी। अब आपके मन में आएगा कि फिर तो हमें टू-व्हीलर्स को भी तेजी से इलेक्ट्रिक में शिफ्ट करना चाहिए।
लेकिन यहाँ भी एक पेंच है। ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन (FADA) का डेटा कहता है कि साल 2025-26 में देश में जितने भी टू-व्हीलर्स बिके, उनमें से सिर्फ 6.5% ही इलेक्ट्रिक थे। वहीं फोर-व्हीलर्स (कारों) के मामले में यह आँकड़ा महज 4.4% था। साफ है कि ग्रीन एनर्जी ट्रांजिशन की यह राह अभी बहुत लंबी और चुनौतीपूर्ण है।
असली खेल तो डीजल का है
मान लेते हैं कि हम किसी तरह जादू की छड़ी घुमाकर अपने सारे टू-व्हीलर्स और फोर-व्हीलर्स को इलेक्ट्रिक में बदल भी दें, तब भी कच्चे तेल के इम्पोर्ट का संकट खत्म नहीं होगा। आप सोचेंगे कि जब सड़कों से पेट्रोल गाड़ियाँ गायब हो जाएँगी, तब भी समस्या क्यों रहेगी? इसके लिए आपको डेटा की एक दूसरी लेन में चलना होगा।
दरअसल, भारत में पेट्रोल से कहीं ज्यादा डीजल की खपत होती है। इसकी मुख्य वजह यह है कि भारत का अधिकांश मालभाड़ा (Freight) सड़कों के जरिए तय होता है। नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, देश का लगभग 65% माल रोड ट्रांसपोर्ट के जरिए एक जगह से दूसरी जगह भेजा जाता है।
इस भारी-भरकम मूवमेंट को संभालते हैं ट्रक्स। ये ट्रक्स छोटी-मोटी दूरी नहीं, बल्कि महीने भर में 15,000 किलोमीटर तक का सफर तय करते हैं। स्वाभाविक है कि इनका फ्यूल कंजम्पशन भी बहुत ज्यादा होता है और ये सभी ट्रक्स डीजल पर चलते हैं।
हमारे देश में डीजल की मांग पेट्रोल के मुकाबले ढाई गुना से भी ज्यादा है। उदाहरण के लिए, साल 2024-25 में जहाँ देश में 40 मिलियन मीट्रिक टन पेट्रोल की खपत हुई, वहीं डीजल की खपत 90 मिलियन मीट्रिक टन को पार कर गई थी।
यही वजह है कि सिर्फ कार या बाइक को EV में बदलने से देश का इम्पोर्ट बिल कम नहीं होने वाला। PPAC की रिपोर्ट बताती है कि देश के कुल डीजल कंजम्पशन में से 64% हिस्सा अकेले ट्रक्स और पिक-अप गाड़ियाँ पी जाती हैं। एक आम ट्रक एक बार में करीब 111 लीटर डीजल भरवाता है। जब तक हैवी कमर्शियल व्हीकल्स (Heavy Commercial Vehicles) को इलेक्ट्रिफाई नहीं किया जाएगा, तब तक कच्चे तेल पर हमारी निर्भरता बनी रहेगी।
चीन का मॉडल और भारत की तैयारी
हमारे पड़ोसी देश चीन ने इस दिशा में तेजी से काम शुरू कर दिया है। ‘रॉयटर्स’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, चीन में बिकने वाले नए भारी ट्रकों (Heavy Trucks) में से अब एक-चौथाई (25%) इलेक्ट्रिक हो चुके हैं, और हालिया ईरान-इजराइल संकट के बाद इस रफ्तार में और तेजी आई है। अगर भारत को भी अपना फ्यूल बिल और कार्बन एमिशन कम करना है, तो उसे पर्सनल व्हीकल्स के साथ-साथ इस हैवी सेगमेंट पर फोकस करना ही होगा।
राहत की बात यह है कि अब भारत सरकार भी इस दिशा में कदम बढ़ा रही है। जैसा कि मैंने शुरुआत में बताया, मोदी सरकार जल्द ही इलेक्ट्रिक ट्रक्स और बसों के लिए ठीक वैसे ही इंसेंटिव्स (FAME स्कीम की तरह) लाने की तैयारी में है, जैसे टू-व्हीलर्स और कारों के लिए दिए गए थे। इससे न सिर्फ तेल का आयात घटेगा, बल्कि सड़कों पर होने वाले प्रदूषण का सबसे बड़ा सोर्स भी खत्म हो जाएगा।
बसों से ज्यादा डीजल पीते हैं खेतों के पंप
इसी सर्वे से जुड़ा एक और दिलचस्प आँकड़ा बसों और खेतों में चलने वाले पंपों का है। अमूमन हमें लगता है कि देश भर में चलने वाली लाखों बसें बहुत ज्यादा डीजल खाती होंगी। लेकिन डेटा के मुताबिक, कुल डीजल खपत में बसों का शेयर सिर्फ 4.1% है, जबकि कृषि कार्यों (जैसे सिंचाई के पंप और ट्रैक्टर) में 4.7% डीजल का इस्तेमाल होता है। यानी हमारी बसें, खेतों से कम डीजल कंज्यूम करती हैं।
सिर्फ कारों को इलेक्ट्रिक कर देना मर्ज की दवा नहीं
आज जब भी वैश्विक तनाव या युद्ध (जैसे ईरान क्राइसिस) की वजह से कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो सीधे तौर पर देश की अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि सिर्फ कारों को इलेक्ट्रिक कर देना इस मर्ज की दवा नहीं है। असली समाधान छुपा है टू-व्हीलर्स और देश की लाइफलाइन कहे जाने वाले ट्रक्स को ग्रीन एनर्जी पर शिफ्ट करने में।
वैसे इस चौंकाने वाले डेटा को जानने के बाद आपकी क्या राय है? क्या आपको पहले से पता था कि कारें नहीं, बल्कि आपकी बाइक देश का सबसे ज्यादा पेट्रोल पीती है?
पश्चिम बंगाल में BJP सरकार बनने के बाद कानून-व्यवस्था को दुरुस्त करने के साथ-साथ आपराधिक नेटवर्क पर लगाम कसी जा रही है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में बीजेपी सरकार बांग्लादेशियों को बाहर निकाल रही है, वहीं ‘तोलाबाजी’ यानी सिंडिकेट, चुनाव बाद हिंसा और आपराधिक गिरोहों के खिलाफ अभियान चला रही है। बीते एक हफ्ते में 70 से ज्यादा टीएमसी नेताओं और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया है।
कोई बनियान-कच्छे में तो कोई लुंगी पहने हुआ गिरफ्तार
अपराधियों को हर हाल में गिरफ्तार करने के आदेश हैं। यही वजह है कि कई ऐसी तस्वीरें सामने आई जब इनलोगों को अचानक घरों, अड्डों और शराब के ठेकों से उठाया गया और सड़कों पर घुमाया गया। ये वे लोग हैं, जिन्होंने बंगाल में अराजकता फैला दी थी और जनता दहशत में जीने के लिए मजबूर थी।
West Bengal Police after getting free from shackles of TMC govt, Now catching Goons and Culprits.
The don of Howrah, Akash Singh, accused of shooting policemen in 2021 and hurling more than 20 bombs was paraded in his underwear on the streets of Howrah to send a strong message pic.twitter.com/EBypfNzOTZ
बंगाल पुलिस ने हावड़ा के गैंगस्टर आकाश सिंह को कच्छा और बनियान में सड़कों पर घुमाया था। वह हावड़ा के डॉन कहलाता था। आकाश सिंह पर 2021 में पुलिसकर्मियों पर गोली चलाने और 20 से ज्यादा बम फेंकने का आरोप है। एक कड़ा संदेश देने के लिए उसे हावड़ा की सड़कों पर सिर्फ अंडरवियर में घुमाया गया।
पश्चिम बंगाल में TMC के गुंडे सनी मोल्ला पर पुलिस का शिकंजा
इसके बाद 25 मई 2026 को टीएमसी के गुंडे और कुख्यात सनी मोल्ला को पुलिस ने गिरफ्तार कर सड़कों पर बनियान-पैजामा में घुमाया। स्थानीय लोगों के अनुसार, सनी मोल्ला TMC से जुड़ा एक संविदा आधारित होम गार्ड था और लंबे समय से संकराइल और आसपास के इलाकों में रंगदारी और दबंगई का नेटवर्क चला रहा था। वह व्यापारियों, छोटे दुकानदारों से रंगदारी वसूलता था। विरोध करने पर धमकी देता, मारपीट करता और कारोबार बंद कराने की चेतावनी देता था। इलाके में लोग उसे ‘छोटा डॉन’ कहकर बुलाते हैं।
TMC’s “Bade Bhai” Shamim Ahmed,paraded by WB Police.
The same man accused of unleashing Islamist violence in Shibpur, bombing streets, and opening fire on BJP supporters.
From threatening citizens to being marched publicly.
टीएमसी से जुड़ा और ‘बड़े भाई’ कहलाने वाले शमीम अहमद को भी पश्चिम बंगाल पुलिस ने बनियान- ऑफ पेंट में सड़कों पर घुमाया। दरअसल ये वह व्यक्ति है, जिस पर शिबपुर में इस्लामी हिंसा भड़काने, सड़कों पर बमबारी करने और BJP समर्थकों पर गोली चलाने के आरोप है।
जलपाईगुड़ी जिले में टीएमसी नेता पंचानन रॉय को एक कार में शराब पीते हुए पकड़ा गया था। वह स्थानीय पंचायत समिति के अध्यक्ष हैं और शराब पार्टी करते हुए गिरफ्तार किया गया। टीएमसी पार्षद मोनी गाजी को भी पुलिस रेड के दौरान शराब की बोतलों और आपत्तिजनक स्थिति में पकड़ा गया था। उस पर सेक्स रैकेट चलाने का आरोप है।
ऐसे अपराधी शुभेंदु शासन के आते ही छिपने की कोशिश कर रहे हैं। यही वजह है कि इनलोगों को बनियान कच्छा शॉर्ट पैंट में ही पुलिस उठा कर ले गई। इनलोगों को सड़कों पर घुमा भी रही है, ताकि लोगों के मन में उनका भय खत्म हो सके, जो पिछले 15 सालों से व्याप्त है। सरकार ‘नो नोटिस एक्शन’ वाली छवि बना रही है। अपराधियों को देर रात छापेमारी कर भी गिरफ्तार किया जा रहा है। कई जिलों में लगातार तलाशी के बाद कई लोगों को दबोचा गया, ताकि लोगों को संदेश मिले कि ‘भागने पर भी बचना मुश्किल’ है।
बीते 18 मई से करीब एक हफ्ते में राज्य में भ्रष्टाचार वसूली और चुनाव बाद हिंसा को लेकर टीएमसी के 70 से ज्यादा नेताओं को गिरफ्तार किया जा चुका है। इनमें पूर्व मंत्री सुजीत बसु भी शामिल हैं। वहीं पूर्व मंत्री के करीबी बंगाल के बिधाननगर नगर निगम के 34 नंबर वार्ड के टीएमसी पार्षद और बोरो चेयरमैन रंजन पोद्दार को बिधाननगर उत्तर थाना पुलिस ने गिरफ्तार किया। उनके खिलाफ तोलाबाजी यानी जबरन वसूली करने और लोगों को डराने-धमकाने का आरोप है।
बीते 23 मई 2026 को एक दिन में राज्यभर में 17 टीएमसी नेताओं को गिरफ्तार किया गया। इनमें कोलकाता और बिधाननगर के कई पार्षद शामिल हैं। मुर्शिदाबाद के बड़ंचा में दबंग तृणमूल नेता अबु बक्कर को हत्या के प्रयास और हथियार से हमला करने के आरोप में पकड़ा गया।
कोलकाता नगर निगम के पार्षद सुदीप पोल्ले और बिधाननगर के पार्षद बरुआ को तोलाबाजी के आरोप में गिरफ्तार किया गया। हावड़ा से 2021 विधानसभा चुनाव के बाद बीजेपी कार्यकर्ताओं पर हमले के आरोपित उपग्राम प्रधान गुरुपद माझी और उसके भाई राजू माझी को गिरफ्तार किया गया। इसके अलावा हुगली, नदिया, मुर्शिदाबाद से लेकर कूचबिहार तक के टीएमसी गुंडों को पुलिस ने पकड़ा।
उत्तर 24 परगना जिले में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के एक पार्षद को घर के अंदर सेक्स रैकेट चलाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। बनगांव नगर पालिका के वार्ड नंबर 22 से TMC पार्षद सुकुमार राय को पुलिस कॉलर पकड़कर थाने ले गई।
पश्चिम बर्धमान के पांडवेश्वर में शेख कमरुद्दीन को चुनावी आतंक, भ्रष्टाचार और वसूली के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। वहीं कूच बिहार से भवरंजन बर्मन को बीजेपी कार्यकर्ता को पीटने और पैसे माँगने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। बीजेपी नेता पप्पू साना पर हमले और शुभेंदु अधिकारी के पीएम रहे चंद्रनाथ रथ की हत्या के बाद पुलिस ने कई इलाकों में लगातार छापेमारी की है और कई लोगों को हिरासत में लिया।
टीएमसी नेताओं और कार्यकर्ताओं के जुल्मों से त्रस्त जनता की प्रतिक्रिया भी इस दौरान सामने आई। जब कोलकाता के युवा टीएमसी अध्यक्ष तपन बिस्वास और उसके साथियों को पुलिस गिरफ्तार कर ले जा रही थी तो उसे लोगों ने थप्पड़ मारे। कुछ ऐसा ही हाल हावड़ा से गिरफ्तार श्यामला मित्रा का हुआ। उसे भी लोगों ने पीटा।
दक्षिण 24 परगना से जब TMC नेता अरित्रा बोस को गिरफ्तार किए जाने के बाद महिलाएँ उसे पीटने के लिए चप्पल- झाड़ू लेकर दौड़ी। जब पुलिस उसे वैन में बैठाकर ले जा रही थी, तब झाड़ू, चप्पल और पानी की बोतलें पुलिस वैन पर फेंकने लगी। संदेशखाली में ईडी टीम पर हमले को लेकर गिरफ्तार टीएमसी नेता शाहजहाँ की मदद करने वाली दो महिला नेताओं को भी गिरफ्तार किया गया। इन पर शाहजहाँ को बचाने के लिए भीड़ जमा कर हिंसा भड़काने का आरोप है।
घुसपैठियों को बाहर निकालने का अभियान
अवैध घुसपैठ और बॉर्डर नेटवर्क पर भी कार्रवाई तेज हुई है। बंगाल सरकार ने ‘होल्डिंग सेंटर’ शुरू किए हैं और पुलिस-आरपीएफ-बीएसएफ के समन्वय से संदिग्ध घुसपैठियों को बाहर निकालने का अभियान चलाया जा रहा है।
North 24 Parganas, West Bengal: More than 100 Bangladeshi nationals allegedly living illegally in different parts of West Bengal gathered at the Hakimpur check post in North 24 Parganas on Tuesday morning to return to Bangladesh. The gathering comes after directives regarding… pic.twitter.com/TC06rVaeMm
हाल ही में राज्य के अलग-अलग हिस्सों में अवैध रूप से रह रहे 100 से ज्यादा बांग्लादेशी घुसपैठियों को मंगलवार सुबह (26 मई 2026) को बांग्लादेश लौटने के लिए उत्तरी 24 परगना के हाकिमपुर चेक पोस्ट पर जमा किया गया।
हाल ही में सीएम शुभेंदु अधिकारी ने घुसपैठियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का ऐलान किया था। उन्होंने कहा था कि बगैर दस्तावेज वाले बांग्लादेशियों की पहचान कर उसे पुलिस के हवाले करें, ताकि जनता से इनलोगों को अलग किया जा सके और देश से निकाला जा सके।
बीजेपी सरकार का पूरा अभियान ये दिखाता है कि अपराधियों और घुसपैठियों को अब ‘पहले जैसा संरक्षण’ नहीं दिया जाएगा। अपराधियों का जेल भेजा जाएगा और घुसपैठियों को ‘देश निकाला’ मिलेगा। चाहे ये लोग कहीं भी छिप जाएँ, पुलिस उन्हें ढूंढ निकालेगी और हर हाल में सलाखों के पीछे भेजेगी। इसलिए अपराधी कहीं जंगल में छिपे मिल रहे हैं तो कहीं घरों में छिप कर शराब पीते।
भारतीय राजनीति में पिछले कुछ सालों में एक नया बदलाव तेजी से देखने को मिला है। अब राजनीति सिर्फ पुराने नेताओं या पारंपरिक पार्टियों तक सीमित नहीं रही। आंदोलन से निकले चेहरे और फिल्मी सितारे सीधे सत्ता तक पहुँचने लगे हैं। जनता भी ऐसे चेहरों को जल्दी अपनाती है क्योंकि उन्हें लगता है कि शायद ये लोग पुराने सिस्टम से अलग कुछ नया करेंगे।
लेकिन यहीं से सबसे बड़ा सवाल भी शुरू होता है। क्या सिर्फ लोकप्रियता और जनता से जुड़ाव के दम पर सरकार चलाई जा सकती है? क्योंकि आंदोलन करना, भाषण देना और लोगों की उम्मीद बन जाना एक अलग बात है लेकिन सत्ता संभालना बिल्कुल अलग खेल होता है। वहाँ सिर्फ नारे नहीं, आपके फैसले काम आते हैं।
तमिलनाडु की राजनीति इस समय कुछ ऐसे ही मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है। राज्य को एक नया और बेहद लोकप्रिय चेहरा मिल चुका है। फिल्म स्टार जोसेफ विजय 10 मई 2026 को मुख्यमंत्री बने। जनता ने उन्हें उम्मीदों के साथ सत्ता तक पहुँचाया लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर विजय सरकार की असली दिशा क्या है? क्योंकि अब तक जो तस्वीर सामने आई है, उसमें एक साफ विचारधारा से ज्यादा प्रयोग, विरोधाभास और असमंजस दिखाई देता है।
विजय की लोकप्रियता और सरकार चलाने की चुनौती
इसमें कोई शक नहीं, विजय की सबसे बड़ी ताकत उनकी लोकप्रियता है। उन्होंने फिल्मों के जरिए खुद को हमेशा आम लोगों से जुड़ा हुआ चेहरा दिखाया। वैसे भी तमिलनाडु की राजनीति में फिल्म स्टार्स का असर कोई नई बात नहीं है। एमजीआर से लेकर जयललिता तक जनता पहले भी सिनेमा के चेहरों को सत्ता तक पहुँचाती रही है। इसलिए विजय का मुख्यमंत्री बनना पूरी तरह हैरान करने वाला नहीं था।
लेकिन चुनाव जीतना और सरकार चलाना, दोनों अलग चीजें हैं। यही असली परीक्षा होती है। और फिलहाल ऐसा लग रहा है कि विजय सरकार अभी उसी परीक्षा में उलझी हुई है।
अब जैसे सरकार बनने के तुरंत बाद मंत्रालयों का बंटवारा शुरू हुआ और उसी समय से सवाल भी उठने लगे। उदाहरण के लिए राजमोहन अरुमुगम को फिल्म टेक्नोलॉजी और सिनेमाटोग्राफी मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई। इसके बाद खुद फिल्म इंडस्ट्री के भीतर से विरोध शुरू हो गया।
मशहूर तमिल अभिनेता विशाल ने खुलेआम सवाल उठाया कि जिस व्यक्ति को फिल्म इंडस्ट्री की समस्याओं और काम करने के तरीके की समझ ही नहीं है, उसके सामने इंडस्ट्री अपनी परेशानियाँ कैसे रखे?
इस सवाल को आप अगर ऐसे देखें कि ये केवल फिल्म इंडस्ट्री की बात नहीं है। ये सवाल सरकार के फैसले लेने की क्षमता पर था क्योंकि लोगों को लगा कि अगर विजय खुद इसी इंडस्ट्री से आते हैं, तो शायद इसे वो ज्यादा बेहतर तरीके से संभाल सकते थे।
ओएसडी विवाद और फैसलों में असमंजस
खैर इसके पहले ओएसडी वाला विवाद भी सामने आया था जिसने सरकार की छवि को और उलझा दिया। विजय के करीबी ज्योतिषी राधन पंडित को ओएसडी बनाया गया। शुरुआत में सरकार ने इस फैसले को सामान्य नियुक्ति की तरह पेश किया, लेकिन जब विधानसभा में इसका जमकर विरोध हुआ और विपक्ष कहने लगा कि अगर वो आपके निजी ज्योतिषी हैं तो उन्हें निजी दायरे में रखिए, शासन-प्रशासन में क्यों ला रहे हैं? इसके बाद उनके ज्योतिषी को ओएसडी नहीं बनाया गया।
अब यहाँ फिर सवाल सीधा खड़ा होता है कि क्या सरकार, फैसले किसी साफ प्रशासनिक प्रक्रिया से ले रही है या फिर निजी घेरे और निजी आस्थाओं का असर ज्यादा दिखाई दे रहा है? क्योंकि अगर फैसला सही था तो वापस क्यों लिया गया? और अगर गलत था तो शुरुआत में किया ही क्यों गया?
यही चीज सरकार की छवि को कमजोर करती है। ऐसा लगता है जैसे सरकार कई बार योजना बनाकर नहीं, बल्कि प्रतिक्रिया देने के ढर्रे पर काम कर रही है।
TVK और खुद विजय की विचारधारा को लेकर विरोधाभास
सबसे बड़ा असमंजस सिर्फ फैसलों में नहीं है बल्कि असमंजस विजय की विचारधारा को लेकर भी है। एक तरफ वो खुद को उदारवादी और धर्मनिरपेक्ष राजनीति का चेहरा दिखाना चाहते हैं, वो हाथ में कड़ा, कलावा पहनते हैं, ज्योतिष में भरोसा करते हैं, वहीं दूसरी तरफ डीएमके की राजनीति से पूरी दूरी भी नहीं बनाते। तमिलनाडु में डीएमके लंबे समय से द्रविड़ राजनीति और सनातन विरोध जैसे मुद्दों पर अपनी पहचान बनाती रही है।
पिछले कुछ वर्षों में डीएमके नेताओं के कई बयान विवादों में रहे हैं। हाल ही में विधानसभा में उदयनिधि स्टालिन ने तो सनातन को मिटाने का अपना बयान फिर से दोहराया। “सनातन कब मिटेगा जब सनातनी यानी हिन्दू ख़तम होगा…” उदयनिधि ने जब ये बयान दिया तब विजय भी सदन में मौजूद थे लेकिन उनकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई।
यहीं से लोगों के मन में सवाल उठने लगे कि आखिर विजय की अपनी राजनीतिक लाइन क्या है? इसी बीच उनकी कैबिनेट के एक आईयूएमएल मंत्री सचिवालय में इस्लामी रस्म-रिवाज करते भी दिखाई दिए। इसके बाद फिर सरकार की धर्मनिरपेक्ष छवि पर बहस शुरू हो गई।
अब जनता के मन में असमंजस होना स्वाभाविक है। क्या सरकार डीएमके की वैचारिक लाइन पर चल रही है? क्या हर वर्ग को खुश रखने की कोशिश हो रही है? या फिर खुद विजय अभी तय नहीं कर पा रहे कि उन्हें किस तरह की राजनीति करनी है?
देखिए, सबको साथ लेकर चलने की बात सुनने में हमेशा अच्छी लगती है। लोकतंत्र में समावेशी राजनीति जरूरी भी है। लेकिन सिर्फ संतुलन बनाने के खेल से सरकारें नहीं चलतीं।
सरकार को आखिरकार एक साफ दिशा चाहिए। क्योंकि अगर हर तरफ थोड़ा-थोड़ा खुश करने की कोशिश होगी, तो धीरे-धीरे सरकार की अपनी अलग पहचान ही खो जाती है।
आर्थिक मोर्चा और मुफ्त योजनाओं का मॉडल
यहाँ आर्थिक मोर्चे पर भी तस्वीर बहुत साफ नहीं है। तमिलनाडु पहले से ही भारी कर्ज के दबाव में है। विजय सरकार लगातार पिछली डीएमके सरकार पर आर्थिक हालत खराब करने के आरोप लगा रही है। लेकिन दूसरी तरफ उनकी खुद की राजनीति भी कल्याणकारी योजनाओं और मुफ्त की रेवड़ियों के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई देती है।
अब सवाल है कि अगर राज्य पहले से कर्ज में दबा हुआ है, तो लगातार मुफ्त योजनाओं के सहारे यह मॉडल कितने समय तक चलेगा?
जनता को मुफ्त सुविधाएँ देना राजनीतिक तौर पर हमेशा लोकप्रिय रहता है। हर सरकार चाहती है कि लोग खुश रहें। लेकिन लंबे समय में किसी भी राज्य को सिर्फ मुफ्त की योजनाओं से नहीं चलाया जा सकता।
उसे निवेश चाहिए। उद्योग चाहिए। नौकरियाँ चाहिए। वित्तीय अनुशासन चाहिए और फिलहाल विजय सरकार की तरफ से ऐसा कोई बड़ा आर्थिक रोडमैप साफ नजर नहीं आता जिससे लगे कि वो सिर्फ चुनावी राजनीति नहीं, बल्कि लंबे समय के शासन पर भी ध्यान दे रही है।
दिल्ली का उदाहरण और शासन का सच
यहाँ दिल्ली का उदाहरण भी याद आता है। कट्टर ईमानदारी की कसमे खाकर अरविंद केजरीवाल ने भी सत्ता हासिल की थी। अन्ना हजारे आंदोलन के दौरान उन्होंने खुद को सिस्टम बदलने वाले नेता के रूप में पेश किया था। संयोग की बात ये है कि उस समय विजय भी उस आंदोलन के समर्थन में दिखाई दिए थे। जनता को लगा था कि नई राजनीति आएगी, पुरानी व्यवस्था बदलेगी और राजनीति का स्तर ऊपर जाएगा। लेकिन समय के साथ दिल्ली में भी लोगों ने देखा कि आंदोलन की राजनीति और शासन की राजनीति में बहुत फर्क होता है।
विरोध करना जितना आसान होता है उतना ही मुश्किल होता है प्रशासन चलाना। जब तक आप विपक्ष में होते हैं, तब तक हर समस्या का जवाब आपके पास होता है। लेकिन सत्ता में आने के बाद वही समस्याएँ आपकी जिम्मेदारी बन जाती हैं।
अब तमिलनाडु में भी यही परीक्षा विजय के सामने है। क्या उनकी राजनीति सिर्फ लोकप्रियता और जन-छवि तक सीमित रह जाएगी? या वो वास्तव में एक मजबूत प्रशासक बन पाएँगे?
शुरुआत में जनता छवि से प्रभावित होती है लेकिन कुछ समय बाद लोग सिर्फ भाषण नहीं देखते, वो नतीजे देखते हैं, जिसमें…
कौन मंत्री है?
कैसे फैसले लिए जा रहे हैं?
कानून-व्यवस्था कैसी है?
निवेश आ रहा है या नहीं?
सरकार विवादों को कैसे संभाल रही है?
ये सारी चीजें धीरे-धीरे छवि से ज्यादा बड़ी हो जाती हैं और फिलहाल इन सवालों पर विजय सरकार पूरी स्पष्टता देती नजर नहीं आ रही।
सरकार चलाने के लिए राजनीतिक समझ और प्रशासनिक परिपक्वता जरूरी
तमिलनाडु की राजनीति वैसे भी बेहद उलझी हुई रही है। यहाँ पहचान की राजनीति है, भाषा की राजनीति है, क्षेत्रीय गौरव है, कल्याणकारी मॉडल है और सिनेमा संस्कृति भी है। ऐसे राज्य में सिर्फ एक लोकप्रिय चेहरा होना काफी नहीं होता। वहाँ राजनीतिक समझ और प्रशासनिक परिपक्वता दोनों चाहिए।
फिलहाल तस्वीर यही कहती है कि विजय मुख्यमंत्री तो बन गए हैं, लेकिन उनकी सरकार की असली दिशा अभी भी पूरी तरह साफ नहीं है।
एक तरफ उदारवादी छवि बनाने की कोशिश है, दूसरी तरफ गठबंधन की राजनीति का दबाव है। एक तरफ कल्याणकारी राजनीति है, दूसरी तरफ बढ़ता कर्ज है। एक तरफ नई राजनीति का दावा है, दूसरी तरफ पुराने सत्ता के प्रयोग दिखाई दे रहे हैं।
अब आने वाला समय ही तय करेगा कि जोसेफ विजय सिर्फ भीड़ खींचने वाले मुख्यमंत्री बनकर रह जाएँगे या सच में तमिलनाडु की राजनीति को कोई नई और स्पष्ट दिशा दे पाएँगे।