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अयातुल्ला से भी ‘कट्टर’ मोजतबा खामेनेई बने ईरान के सुप्रीम लीडर, मुल्क को परमाणु बम देना ख्वाब: प्रदर्शनकारियों पर दिखाई थी सख्ती, जाने- ट्रंप ने क्या कहा?

ईरान की सरकारी मीडिया ने बताया कि अयातुल्ला अली खामेनेई के बेटे मोजतबा खामेनेई (56) को एक्सपर्ट्स की असेंबली ने देश का नया सुप्रीम लीडर चुन लिया है।

रविवार (8 मार्च 2026) को जारी एक आधिकारिक बयान में कहा गया, “एक अहम वोट से, एक्सपर्ट्स की असेंबली ने अयातुल्ला सैय्यद मोजतबा हुसैनी खामेनेई को इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान के पवित्र सिस्टम का तीसरा लीडर चुन लिया।” नए लीडर को नियुक्त करने का काम 88 मौलवियों के एक ग्रुप ने किया।

राष्ट्रपति ट्रंप को खामेनेई मंजूर नहीं

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस फैसले को नामंजूर कर दिया है। ABC न्यूज से बात करते हुए उन्होंने चेतावनी दी कि अगर उन्हें हमसे मंजूरी नहीं मिली, तो वे ज्यादा दिन तक नहीं टिक पाएँगे।” इससे पहले इजरायल ने ईरान के अगले सुप्रीम लीडर पर हमला करने की धमकी भी दी थी।

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा था, ‘वे अपना समय बर्बाद कर रहे हैं। खामेनेई का बेटा एक कमजोर खिलाड़ी है। मुझे नियुक्ति प्रक्रिया में शामिल होना होगा, जैसा कि वेनेजुएला में डेल्सी रोड्रिगेज के मामले में हुआ था।’ राष्ट्रपति ट्रंप ने मोजतबा खामेनेई को ‘अस्वीकार्य’ बताते हुए कहा कि वे ऐसे नेता को देखना चाहते हैं जो ईरान में ‘सद्भाव और शांति’ ला सके। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर अली खामेनेई की नीतियाँ जारी रहीं, तो भविष्य में अमेरिका और ईरान के बीच फिर टकराव हो सकता है।

नवंबर 2019 में अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने मोजतबा खामेनेई पर प्रतिबंध लगाए थे। उन पर आरोप था कि वे उस समय के सुप्रीम लीडर का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, जबकि वे किसी सरकारी पद पर चुने या नियुक्त नहीं हुए थे। अमेरिकी ट्रेजरी के अनुसार, उस समय के सुप्रीम लीडर ने अपनी कुछ जिम्मेदारियां मोजतबा खामेनेई को सौंप दी थीं।

विभाग ने आरोप लगाया कि उन्होंने अपने पिता को कमजोर करने के लिए इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स-क़ुद्स फ़ोर्स (IRGC-QF) और बासिज रेजिस्टेंस फ़ोर्स (बासिज) के कमांडर के साथ हाथ मिलाया। इसके अलावा यह भी बताया गया कि यूनाइटेड किंगडम, स्विट्जरलैंड और लिकटेंस्टीन में उनकी संपति है। लंदन में उनकी पॉश इलाके में संपत्ति का भी उल्लेख है।

कौन हैं मोजतबा खामेनेई

ईरान के मशहद में 8 सितंबर 1969 में पैदा हुए मोजतबा खामेनेई शिया धर्मगुरु अयातुल्ला खामेनेई के दूसरे सबसे बड़े बेटे हैं। उन्हें शक्तिशाली इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉप्स का समर्थन हासिल है। अपने पिता की तुलना में मोजतबा ज्यादा कट्टरपंथी माने जाते हैं।

ईरान के बड़े फैसलों में अब मोजतबा खामेनेई का निर्णय ही अंतिम होगा। वह सेना और पैरामिलिट्री संगठन इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के सर्वोच्च कमांडर भी होंगे। दूसरे नीतिगत और देश-विदेश से जुड़े मुद्दों पर भी अंतिम फैसला उन्हीं का होगा, जिसमें ईरान के परमाणु हथियारों से जुड़े निर्णय भी शामिल हैं। ईरान में परमाणु हथियार बनाने का समर्थन करने वालों में मोजतबा खामेनई का नाम भी आता है।

ईरान में हुए प्रदर्शनों के दौरान मोजतबा खामेनेई का विरोध किया गया था। इजरायली मीडिया ने मोजतबा को अपने पिता से भी ज्यादा कट्टर रुख वाला बताया है। उसके मुताबिक, ईरान में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हुई सख्त कार्रवाई के पीछे भी उनकी भूमिका रही है। युवती की मौत के बाद ईरान में जबरदस्त प्रदर्शन हुए थे। युवती को देश के कपड़ों को लेकर बने कानूनों को तोड़ने के आरोप में हिरासत में लिया गया था। वह कट्टरपंथी महमूद अहमदीनेजाद से करीब से जुड़े थे, जो 2005 में ईरान के प्रेसिडेंट चुने गए थे।

ईरान के सरकारी मीडिया ने मोजतबा खामेनेई के सुप्रीम लीडर बनने की घोषणा के बाद पूरे ईरान में जश्न मनाते लोगों की तस्वीरें सामने आईं।

टाइम्स ऑफ इजरायल के मुताबिक, सोशल मीडिया पर एक ऐसी तस्वीरें भी दिखी जिसमें तेहरान में लोगों को अपनी खिड़कियों से ‘मोजतबा की मौत’ चिल्लाते हुए सुना गया। हालाँकि इसे वेरिफाई नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम लीडर का पद मोजतबा खामेनेई को इस्लामिक रिपब्लिक में देश के सभी मामलों में आखिरी फैसला लेने का अधिकार देता है, जिसमें इसकी सेना के साथ-साथ यूरेनियम संवर्धन और उसके स्टॉक पर नियंत्रण भी शामिल है। अगर सुप्रीम लीडर चाहे तो परमाणु हथियार बनाने की इजाजत ईरानी एक्सपर्ट को दे सकता है।

28 फरवरी को, अयातुल्ला अली खामेनेई को US-इज़राइल के हमले में मार दिया गया, जिससे मिडिल ईस्ट में लड़ाई और तेज हो गई।

बिजली संशोधन विधेयक 2025: कर्मचारी संगठन कर रहे विरोध तो सरकार गिना रही फायदे, जानें- क्या हैं दोनों पक्षों के तर्क और इससे विद्युत व्यवस्था में क्या बदलेगा?

देश में प्रस्तावित बिजली संशोधन विधेयक 2025 को लेकर केंद्र सरकार और बिजली क्षेत्र से जुड़े कर्मचारी-इंजीनियर संगठनों के बीच टकराव की स्थिति बन गई है। सरकार इस विधेयक को बिजली क्षेत्र में बड़े सुधारों के रूप में पेश कर रही है जबकि कर्मचारी संगठन इसे निजीकरण की दिशा में उठाया गया कदम बताते हुए विरोध कर रहे हैं।

संभावना जताई जा रही है कि सरकार इस बिल को मौजूदा बजट सत्र के दूसरे हिस्से में संसद में पेश कर सकती है, जिसके खिलाफ बिजली कर्मचारियों और इंजीनियरों की राष्ट्रीय समन्वय समिति ने 10 मार्च 2026 को देशभर में विरोध प्रदर्शन का ऐलान किया है।

कर्मचारी संगठनों का कहना है कि यह विधेयक बिजली वितरण के क्षेत्र में निजी कंपनियों के आने का रास्ता खोल सकता है। उनका मानना है कि इससे किसानों, आम उपभोक्ताओं और बिजली विभाग के कर्मचारियों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। वहीं, सरकार का कहना है कि इस विधेयक का मकसद बिजली क्षेत्र को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना, इसमें प्रतिस्पर्धा बढ़ाना और स्वच्छ ऊर्जा को तेजी से बढ़ावा देना है।

बिजली संशोधन बिल को लेकर क्या है विवाद?

प्रस्तावित विधेयक को लेकर सबसे बड़ा विवाद इस बात पर है कि बिजली वितरण व्यवस्था में निजी कंपनियों को शामिल किया जा सकता है। कर्मचारी संगठनों का आरोप है कि यह कानून बिजली क्षेत्र के निजीकरण को बढ़ावा देगा। उनका कहना है कि अगर यह बिल पास हो गया तो निजी कंपनियों को भी बिजली वितरण का लाइसेंस मिल सकता है, जिससे सरकारी बिजली व्यवस्था में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी बढ़ जाएगी।

इस व्यवस्था के लागू होने पर कंपनियों को यह तय करने की छूट मिल सकती है कि वे किन उपभोक्ताओं को बिजली दें। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि ऐसी स्थिति में निजी कंपनियाँ उन इलाकों पर ज्यादा ध्यान देंगी जहाँ ज्यादा मुनाफा है जबकि कम कमाई वाले क्षेत्रों की जिम्मेदारी सरकारी बिजली कंपनियों पर ही ज्यादा आ जाएगी।

कर्मचारी संगठनों का यह भी आरोप है कि सरकार निजी कंपनियों के हितों को ध्यान में रखते हुए स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगाने जैसे कदम उठा रही है। इसी मुद्दे को लेकर देशभर में विरोध की तैयारी की गई है।

कर्मचारियों और संगठनों का विरोध क्यों?

बिजली कर्मचारियों और इंजीनियरों की राष्ट्रीय समन्वय समिति के अनुसार, यह बिल आम उपभोक्ताओं और किसानों के लिए नुकसानदेह हो सकता है। उनका कहना है कि अगर वितरण व्यवस्था में निजी कंपनियाँ आती हैं तो बिजली दरों पर असर पड़ सकता है और सब्सिडी व्यवस्था भी प्रभावित हो सकती है।

समिति का आरोप है कि सरकार ने बिजली क्षेत्र से जुड़े संगठनों और ट्रेड यूनियनों से सुझाव जरूर माँगे थे लेकिन उनकी आपत्तियों को सार्वजनिक नहीं किया गया। इसके अलावा बिजली मंत्रालय द्वारा एक वर्किंग ग्रुप बनाए जाने पर भी सवाल उठाए गए हैं।

कर्मचारी संगठनों के नेताओं का कहना है कि जिस संस्था ने पहले ही बिजली क्षेत्र के निजीकरण का समर्थन किया है, उसे ही कानून को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में शामिल करना निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करता है। उनका मानना है कि इससे निर्णय पहले से तय होने का संदेह पैदा होता है। इसी कारण कर्मचारी संगठनों ने इस विधेयक के खिलाफ अपना विरोध और तेज कर दिया है।

सरकार के मुताबिक बिल की जरूरत क्यों?

केंद्र सरकार का कहना है कि बिजली क्षेत्र को मजबूत बनाने और भविष्य की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के लिए सुधार करना जरूरी है। सरकार के मुताबिक प्रस्तावित विधेयक का मकसद बिजली वितरण कंपनियों की आर्थिक हालत को बेहतर बनाना, बिजली दरों को ज्यादा तर्कसंगत बनाना और इस क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा देना है।

सरकार का तर्क है कि कई राज्यों में बिजली वितरण कंपनियाँ आर्थिक संकट का सामना कर रही हैं, इसलिए बिजली की लागत के हिसाब से दर तय करना और नियामक व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी हो गया है।

इसके अलावा सरकार इस विधेयक को ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य से भी जोड़कर देख रही है। सरकार का कहना है कि आने वाले समय में स्वच्छ ऊर्जा और गैर-जीवाश्म ईंधन से बनने वाली बिजली को तेजी से बढ़ाना देश की ऊर्जा जरूरतों के लिए जरूरी होगा।

बिल में प्रस्तावित मुख्य सुधार

विधेयक में कई महत्वपूर्ण बदलाव प्रस्तावित किए गए हैं।

वित्तीय स्थिरता: बिजली वितरण कंपनियों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए लागत के अनुसार बिजली दर तय करने का प्रावधान रखा गया है। नियामक आयोगों को हर साल 1 अप्रैल से टैरिफ निर्धारित करने का अधिकार देने का प्रस्ताव है।

प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा: औद्योगिक उपभोक्ताओं पर ज्यादा दर और क्रॉस-सब्सिडी के कारण उद्योगों की प्रतिस्पर्धा प्रभावित होने की बात कही गई है। बिल का उद्देश्य दरों को संतुलित करना, बिजली की माँग बढ़ाना और लागत कम करना है ताकि भारत की आर्थिक उत्पादकता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ सके।

ऊर्जा परिवर्तन: सरकार 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखती है। इसके लिए बिजली नियामक आयोग को बाजार आधारित नए उपकरण लागू करने का अधिकार देने का प्रस्ताव है, जिससे नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश बढ़ सके।

उपभोक्ता सुविधा: बिजली आपूर्ति की गुणवत्ता और सेवा मानकों को पूरे देश में एक जैसा बनाने का प्रस्ताव है। इसके साथ ही बिजली के अनधिकृत उपयोग से जुड़े मामलों में आकलन की अवधि को एक वर्ष तक सीमित करने और अपील प्रक्रिया को आसान बनाने की बात कही गई है।

नियामक व्यवस्था को मजबूत करना: केंद्रीय और राज्य बिजली नियामक आयोगों के सदस्यों के खिलाफ शिकायतों की प्रक्रिया को स्पष्ट करने का प्रस्ताव है। साथ ही बिजली से जुड़े विवादों के फैसलों के लिए समय सीमा तय करने और अपीलीय न्यायाधिकरण की क्षमता बढ़ाने की भी योजना है।

अन्य बदलाव: बिजली लाइनों के निर्माण और रखरखाव से जुड़े अधिकार पुराने टेलीग्राफ कानून से बिजली कानून में स्थानांतरित करने का प्रस्ताव है। इसके अलावा नेटवर्क साझा करने की अनुमति देकर लागत कम करने और व्यवस्था को अधिक कुशल बनाने का प्रयास किया गया है।

सरकार के अनुसार, यह विधेयक लागू होने के बाद पूरे देश में समान रूप से लागू होगा और इससे बिजली क्षेत्र की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। राज्यों को यह भी अधिकार रहेगा कि वे विशेष उपभोक्ता श्रेणियों, जैसे जनजातीय परिवारों या गरीब उपभोक्ताओं को पारदर्शी तरीके से सब्सिडी दे सकें।

कोपेनहेगन सम्मेलन 1910 में प्रस्ताव, दुनिया भर में संगठिन आंदोलन: जानें- क्लारा जेटकिन के बारे में, जिनकी वजह से आज मनाया जाता है अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस

हर साल 8 मार्च को दुनियाभर में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसकी शुरुआत कैसे हुई और इसका मूल उद्देश्य क्या था? इसका श्रेय जर्मनी की समाजवादी और महिला अधिकार कार्यकर्ता क्लारा जेटकिन को जाता है। 1910 में डेनमार्क के कोपेनहेगन में हुई दूसरी अंतर्राष्ट्रीय वर्किंग विमेन कॉन्फ्रेंस में जेटकिन ने प्रस्ताव रखा कि हर साल एक दिन महिलाओं के लिए समर्पित किया जाए, जब वे अपनी समानता और अधिकारों की माँग उठाएँ। इस प्रस्ताव को सम्मेलन में सर्वसम्मति से मंजूरी मिल गई।

जेटकिन का उद्देश्य केवल एक दिन की पहचान बनाना नहीं था, बल्कि महिलाओं को संगठित करने और उनके सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों की लड़ाई को मजबूत करना था। उनका यह विचार पहले लहर के नारीवाद (फर्स्ट वेव फेमिनिज्म) के आंदोलन का हिस्सा बना और आज भी यह दिन दुनिया भर में महिलाओं के अधिकारों और समानता की प्रतीक के रूप में मनाया जाता है।

महिलाओं के कामकाजी अधिकारों की आवश्यकता

क्लारा जेटकिन का जन्म 1857 में जर्मनी के विज़्डराउ में हुआ। उस समय जर्मनी में पूंजीवाद तेजी से बढ़ रहा था और इसके कारण महिलाओं द्वारा निर्मित घरेलू और औद्योगिक उत्पादों का मूल्य घटता जा रहा था। जेटकिन ने महसूस किया कि पूंजीवादी समाज में महिलाएँ आर्थिक रूप से पुरुषों पर निर्भर रहती हैं और उनकी स्वतंत्रता सीमित है।

उन्होंने माध्यमिक शिक्षा पूरी की, लेकिन विश्वविद्यालय की शिक्षा नहीं ले पाईं क्योंकि उस समय महिलाओं को हाइयर एजुकेशन की अनुमति नहीं थी। वोटिंग और राजनीतिक अधिकार भी महिलाओं के लिए प्रतिबंधित थे। जेटकिन का सामना इस समय की सामाजिक असमानताओं और लैंगिक भेदभाव से हुआ। उनके भाई और स्कूल के एक मित्र ने उन्हें समाजवादी विचारों से परिचित कराया।

जल्द ही जेटकिन ने जर्मन सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (SPD) में शामिल होकर महिलाओं के लिए काम करना शुरू किया। शुरुआत में उन्हें सीमित जिम्मेदारियाँ ही दी जाती थीं, लेकिन समय के साथ उन्होंने अपने वक्तृत्व और लेखन कौशल को सुधारते हुए समाजवाद और महिला अधिकारों के बीच संबंध को स्पष्ट किया।

जेटकिन का मानना था कि “पुरुष की आय और पत्नी की घरेलू मेहनत पहले परिवार की जरूरतें पूरी करती थी। अब यह एक मजदूर के जीवन यापन के लिए पर्याप्त नहीं है।” इसका मतलब था कि महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने का अवसर मिला, लेकिन यह स्वतंत्रता केवल पूंजीपतियों के लाभ के लिए काम कर रही थी। उन्होंने कहा, “पति के अधीन दासी से अब वे नियोक्ता की दासी बन गई हैं।”

उनकी यह समझ थी कि महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाने से उनके राजनीतिक अधिकार भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं। उन्होंने यह तर्क दिया कि परिवार में पुरुष और महिला के बीच असमानता पूंजीवाद के कारण है और समाजवाद इसे दूर कर सकता है।

महिलाओं का राजनीतिक और सामाजिक संगठन

जेटकिन मानना था कि महिलाओं को केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता नहीं चाहिए, बल्कि उन्हें राजनीतिक और सामाजिक रूप से भी सक्रिय होना होगा। उन्होंने कहा, “महिला को पुरुष की तरह कठिन परिस्थितियों में अपने जीवन की लड़ाई लड़ने के लिए अपने पूर्ण राजनीतिक अधिकारों की आवश्यकता है। ये अधिकार हथियार की तरह हैं जिनसे वह अपनी आवश्यकताओं की रक्षा कर सकती है।”

उन्होंने देखा कि केवल आर्थिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं है। महिलाओं को मतदान और राजनीतिक भागीदारी के माध्यम से अपने हितों की रक्षा करनी होगी। जेटकिन ने महिलाओं के लिए शिक्षा, ट्रेड यूनियन और सामाजिक जागरूकता पर जोर दिया। उन्होंने महिला अधिकारों और समाजवाद को जोड़कर एक मजबूत आंदोलन खड़ा किया।

उन्होंने विशेष रूप से पूंजीवादी और संपन्न वर्ग की महिलाओं की आलस्य की आलोचना की। उनका मानना था कि वर्ग भेदभाव के कारण महिलाएँ एकजुट होकर अपने अधिकारों की लड़ाई नहीं लड़ पातीं। इसलिए उनका आंदोलन केवल महिलाओं के लिए नहीं, बल्कि सभी श्रमिक महिलाओं के अधिकारों के लिए था।

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस और जेटकिन की विरासत

1910 में कोपेनहेगन कॉन्फ्रेंस में क्लारा जेटकिन ने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का प्रस्ताव रखा। इसका उद्देश्य महिलाओं को वैश्विक स्तर पर एकजुट करना और उनके अधिकारों की आवाज को मजबूत करना था। पहला महिला दिवस 1911 में मनाया गया और तब से यह दिन लगातार मनाया जा रहा है।

जेटकिन ने केवल महिला दिवस ही नहीं, बल्कि महिला समाजवाद और मजदूर वर्ग की महिलाओं के अधिकारों के लिए कई आंदोलनों का नेतृत्व किया। उन्होंने 1892 से 1917 तक डाई ग्लेइचहाइट नामक जर्नल का संपादन किया, जिसमें समाजवादी महिला लेखकों के योगदान प्रकाशित होते थे। उन्होंने पार्टी में महिलाओं को नेतृत्व में लाने की भी माँग की।

1918 में जर्मनी में महिलाओं को मतदान का अधिकार मिला। जेटकिन 1932 में जर्मन संसद (रैहस्टाग) की सबसे बड़ी सदस्य बनीं। उन्होंने समाजवादी विचारों और महिलाओं के अधिकारों के लिए लगातार काम किया। जब नाज़ी सत्ता आई, तो वह 75 साल की उम्र में सोवियत संघ चली गईं। 20 जून 1933 को उनका निधन हुआ। उनके योगदान को जर्मनी में क्लारा जेटकिन पार्क, क्लारा जेटकिन हॉल और कई संस्थानों द्वारा सम्मानित किया गया।

क्लारा जेटकिन की सोच और कार्य आज भी मार्क्सवादी नारीवाद और महिला अधिकार आंदोलन के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस और उनकी मृत्यु दिवस पर उनके योगदान को याद किया जाता है। उनके कार्य ने यह साबित किया कि सामाजिक और आर्थिक समानता केवल महिलाओं की स्वतंत्रता नहीं बल्कि समाज के सभी वर्गों के लिए जरूरी है।

राष्ट्रपति के प्रोटोकॉल का उल्लंघन करने पर ममता सरकार घिरी, मुख्य सचिव से रिपोर्ट तलब: जानिए क्या है सर्वोच्च संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को रिसीव करने के नियम

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की पश्चिम बंगाल यात्रा पर प्रोटोकॉल उल्लंघन से देश में नई बहस शुरू हो गई है। सीवी आनंद बोस के इस्तीफे के बाद केंद्र द्वारा नियुक्त नए राज्यपाल आरएन रवि 11 मार्च को कोलकाता पहुंचेंगे। ऐसे में मुख्यमंत्री की अहम जिम्मेदारी थी कि वह राष्ट्रपति को रिसीव करने पहुँचती। लेकिन न तो वह पहुँची और न ही किसी मंत्री को ये जिम्मेदारी सौंपी। हद तो तब हो गई जब सुरक्षा नियमों का भी उल्लंघन हुआ और न तो मुख्य सचिव पहुँचा और न ही डीजीपी। इसको लेकर केन्द्र ने राज्य के मुख्य सचिव से रिपोर्ट माँगी है।

उपष्ट्रपति सीबी राधाकृष्णन, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह से लेकर विपक्ष के कई नेताओं ने नाराजगी जताई है। उपराष्ट्रपति ने कहा कि राष्ट्रपति को उनके पद की गरिमा और प्रोटोकॉल के मुताबिक सम्मान मिलना चाहिए। पीएम मोदी ने ममता सरकार पर सवाल उठाए वहीं मायावती ने राष्ट्रपति पद के राजनीतिकरण पर दुख जताया। उन्होंने कहा कि प्रोटोकॉल तोड़ना ‘अति दुर्भाग्यपूर्ण’ है। राष्ट्रपति का सम्मान और प्रोटोकॉल का ध्यान रखना बेहद जरूरी है।

क्या है विवाद

राष्ट्रपति 9वें अंतरराष्ट्रीय संथाल कॉन्फ्रेंस में शामिल होने सिलीगुडी के फाँसीदेवा पहुँची थीं। प्रोटोकॉल के मुताबिक वहाँ उन्हें स्वागत करने के लिए मुख्यमंत्री या मुख्यमंत्री द्वारा नियुक्त मंत्री को होना चाहिए था, लेकिन कोई नहीं था। कार्यक्रम स्थल काफी छोटा था, जिससे कई संथाली लोग शामिल नहीं हो सके। राष्ट्रपति ने इस पर दुख जताया और कहा कि कार्यक्रम स्थल 5000 लोगों के लायक नहीं था। वहीं कार्यक्रम के बाद जब राष्ट्रपति मुर्मू एक दूसरे कार्यक्रम में शामिल होने विधाननगर मैदान पहुँची, तो उन्होंने कहा कि इतना बड़ा मैदान रहने के बावजूद अंतर्राष्ट्रीय संथाल सम्मेलन के लिए छोटी सी जगह क्यों चुनी गई।

ममता बनर्जी का जवाब

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अपने संबोधन के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का भी जिक्र किया था और कहा था कि ममता बनर्जी उनकी छोटी बहन की तरह हैं और वह उन्हें छोटी बहन की तरह प्यार करती हैं। लेकिन नहीं पता कि अंतर्राष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस के लिए इतनी छोटी जगह क्यों दी गई? ऐसा लगा जैसे जल्दी बुलाकर भगाने की तैयारी थी।

राष्ट्रपति मुर्मू की नाराजगी पर ममता बनर्जी कहाँ अपनी गलती मानने वाली थीं। उन्होंने राष्ट्रपति मुर्मू को बीजेपी का एजेंट तक कह डाला। इतना ही नहीं छोटी जगह दिए जाने पर कहा कि राष्ट्रपति बीजेपी की राजनीति में फँस गई है। राज्य सरकार न तो कार्यक्रम की आयोजक थी और न ही उन्हें कार्यक्रम और उसके आयोजक या फंडिंग के बारे में पता है। जब राष्ट्रपति राज्य में आती-जाती हैं तो उन्हें आधिकारिक सूचना मिलती है।

ममता बनर्जी ने ये भी कहा कि वह राष्ट्रपति का सम्मान करती हैं लेकिन कोई 50बार आए तो हर बार कार्यक्रम में शामिल होना संभव नहीं है। चुनाव के वक्त तो कार्यक्रम में शामिल होना और भी मुश्किल है। ममता बनर्जी ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की साजिश रची जा रही है और बंगाल को बाँटने की कोशिश हो रही है।

लेकिन ये बंगाल की राजनीति या केन्द्र की साजिश का मसला नहीं था। मुख्यमंत्री होकर धरने पर बैठीं ममता बनर्जी चाहती तो किसी मंत्री को राष्ट्रपति के स्वागत के लिए भेज सकती थीं। उनके कार्यक्रम स्थल में किसी तरह की सुविधा नहीं थी।

न्यूज 18 के मुताबिक, राष्ट्रपति के लिए बनाए गए वॉशरूम में पानी तक उपलब्ध नहीं था। जहाँ से राष्ट्रपति मुर्मू का काफिला गुजरा, उस रास्ते में गंदगी थी और कचरे पड़े थे यानी राष्ट्रपति, जो देश की प्रथम नागरिक होने के साथ-साथ देश का सम्मान हैं, उनका इतना भी सम्मान नहीं किया गया कि कार्यक्रम स्थल की अच्छी व्यवस्था की जाती और रास्ते की कम से कम सफाई कराई जाती। इसके लिए स्थानीय प्रशासन से लेकर ममता सरकार तक जिम्मेदार है।

राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के ऑफिस और उनसे जुड़े सभी इंतज़ाम ब्लू बुक के हिसाब से मैनेज किए जाते हैं, जिसे समय-समय पर केंद्रीय गृह मंत्रालय तैयार और अपडेट करता है और नंबर वाली (हर कॉपी का एक नंबर होता है) कॉपी संबंधित लोगों को भेजी जाती हैं। जमीनी स्तर पर, हर जिले में यह बुक जिला मजिस्ट्रेट और जिले के पुलिस हेड की कस्टडी में रखी जाती है।

राष्ट्रपति के लिए जरूरी प्रोटोकॉल

राष्ट्रपति की अगुवानी केवल औपचारिक शिष्टाचार नहीं है, बल्कि ‘वॉरंट ऑफ प्रेसिडेंट’ के तहत अनिवार्य प्रक्रिया होता है। यह न सिर्फ संवैधानिक तौर पर सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति का सम्मान है, बल्कि केन्द्र-राज्य संबंध की मजबूती का आधार भी है। राष्ट्रपति को रिसीव करने के भी नियम है, जिसे हर राज्य को पालन करना अनिवार्य है।

राष्ट्रपति जिस राज्य में जाते हैं या हवाई अड्डे पर उतरते हैं, तो उनके स्वागत के लिए राज्य के प्रथम नागरिक यानी राज्यपाल को अगुवानी के लिए मौजूद होना चाहिए। राज्यपाल के बाद मुख्यमंत्री की मौजूदगी जरूरी है। ये राज्य की ओर से राष्ट्रपति के सम्मान के लिए जरूरी माना जाता है, साथ ही ये संवैधानिक दायित्व भी है, क्योंकि मुख्यमंत्री चुनी हुई सरकार और जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं। अगर कोई मुख्यमंत्री बहुत जरूरी सरकारी कार्य या स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों की वजह से नहीं जा पा रहा हो, तो वह किसी कैबिनेट मंत्री को जिम्मेदारी सौंप सकता है, जो राष्ट्रपति के स्वागत के लिए पहुँचे। किसी मंत्री का वहाँ न होना प्रोटोकॉल का उल्लंघन है।

इसके अलावा राज्य के प्रशासनिक ढाँचे का प्रतिनिधित्व करने वाले शीर्ष अधिकारी का तकनीकी रूप से वहाँ होना जरूरी है। इसलिए मुख्य सचिव और डीजीपी प्रोटोकॉल के तहत राष्ट्रपति के स्वागत के लिए रहते हैं। इनका काम न सिर्फ राष्ट्रपति का स्वागत करना है, बल्कि राज्य में उनकी सुरक्षा और प्रशासनिक समन्वय की जिम्मेदारी संभालना है। इसके अलावा स्थानीय सैन्य कमांडर और मेयर भी वहाँ मौजूद रहते हैं। राष्ट्रपति का स्वागत हल्के से झुक कर हाथ जोड़ कर किया जाता है। ये पूरी प्रक्रिया पहले से तय कार्यक्रम के मुताबिक होता है। इसमें राज्य बदलाव नहीं कर सकता।

राष्ट्रपति की सुरक्षा जब तक वह उस राज्य में तरह तक राज्य सरकार के अधीन होती है। आम तौर पर वह राजभवन में ठहरते हैं और जहाँ कार्यक्रम होगा, वहाँ भी उन मानकों का पालन करना अनिवार्य होगा। उनके काफिले में ‘कारकेड’ यानी वाहनों का क्रम और उसकी सुरक्षा राज्य की पुलिस और खुफिया विभाग की जिम्मेदारी होती है। अगर राज्य इन नियमों की अवहेलना करना है, तो ये संवैधानिक पद का अपमान माना जाता है।

अगर मुख्यमंत्री किसी कारणवश नहीं जा पा रही थी, तो वो किसी मंत्री को अपना नुमाइंदा बना कर राष्ट्रपति के स्वागत के लिए भेज सकती थीं। लेकिन राष्ट्रपति के स्वागत के लिए सिलीगुड़ी के मेयर ही मौजूद रहे। न तो मुख्य सचिव पहुँचे और न ही कोई मंत्री। यहाँ तक कि सुरक्षा की भी अवहेलना की गई और डीजीपी भी रिसीव करने नहीं पहुँचे।

ममता बनर्जी इसे प्रोटोकॉल का उल्लंघन नहीं मानतीं। उनका कहना है कि सिलीगुड़ी में आयोजित कार्यक्रम कोई सरकारी कार्यक्रम नहीं था और यह एक निजी संस्था इंटरनेशनल संथाल काउंसिल द्वारा आयोजित था। इसमें राष्ट्रपति आई थी।

मुख्यमंत्री के मुताबिक, राष्ट्रपति सचिवालय को लिखित और मौखिक तरीके से ये बता दिया गया था कि कार्यक्रम स्थल पर पर्याप्त व्यवस्थाएँ नहीं हैं, इसके बावजूद कार्यक्रम तय समय पर आयोजित किया गया। ममता बनर्जी ने मुख्य सचिव और डीजीपी की अनुपस्थिति पर कहा कि प्रोटोकॉल सूची राष्ट्रपति सचिवालय की ओर से तय की गई थी। इसमें सिलीगुड़ी नगर निगम के मेयर, दार्जिलिंग के डीएम और सिलीगुड़ी पुलिस आयुक्त मौजूद थे।

ममता बनर्जी को मुख्यमंत्री के तौर पर ये अच्छे से पता है कि राष्ट्रपति की सुरक्षा की जिम्मेदारी जिस राज्य में राष्ट्रपति का दौरा होता है, उनकी होती है। स्थानीय प्रशासन के साथ-साथ राज्य के अधिकारी और पूरा महकमा राष्ट्रपति की सुरक्षा को लेकर मुस्तैद रहते हैं। ऐसी परिस्थिति में राष्ट्रपति के दौरे को निजी बता कर सुरक्षा से खिलवाड़ नहीं किया जा सकता। आखिर राष्ट्रपति जब उतरीं तो उनके स्वागत के लिए मुख्यमंत्री और आलाधिकारी क्यों नहीं पहुँचा। मुख्यमंत्री अपने राजनीतिक एजेंडे में अगर कुछ ज्यादा व्यस्त थीं, तो किसी और मंत्री को भेजा जा सकता था। जाहिर है राष्ट्रपति के दौरे को नजरअंदाज किया गया। राष्ट्रपति प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया गया। कार्यक्रम स्थल की व्यवस्था ठीक नहीं थी। राष्ट्रपति के काफिले का मार्ग गंदा था और सुरक्षा व्यवस्था काफी खराब थी। राज्य के शीर्ष अधिकारी राष्ट्रपति के आने पर नदारद थे।

प्रधानमंत्री मोदी ने जताई नाराजगी

यही वजह है कि प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट कर राज्य सरकार की जमकर क्लास लगाई। राष्ट्रपति को लेकर बंगाल सरकार की ऐसी करतूत को पीएम मोदी ने ‘शर्मनाक और अभूतपूर्व’ करार दिया। उन्होंने ट्वीट कर कहा कि हर वह व्यक्ति जो लोकतंत्र और जनजातीय समुदाय की सशक्तिकरण में विश्वास रखता है, उसे दुख हुआ है। उन्होंने सारी हदें पार कर दी।

माननीया द्रौपदी मुर्मू न सिर्फ राष्ट्रपति हैं, बल्कि जनजातीय समाज से भी हैं। पश्चिम बंगाल को बेटी हैं। उनके दौरे को तय करने का अधिकार राज्य को नहीं है, इसलिए वो राज्य में कब जाएँगी, किस कार्यक्रम में शामिल होंगी, ये तय करने का अधिकार उनका है। राज्य सरकार को उनके पद के मुताबिक प्रोटोकॉल का पालन करना चाहिए। ये संवैधानिक पद है जो दलगत राजनीति से ऊपर हैं। उनका आदर-सम्मान, देश का आदर और सम्मान है।

Exclusive अहमदाबाद कोर्ट में हिंदू लड़कियों-मुस्लिम लड़कों की शादियों का नेटवर्क? मैरिज रजिस्ट्रार MM सैयद पर गंभीर आरोप: पढ़ें- कैसे काम करता था ये पूरा रैकेट

ऑपइंडिया ने गुजरात के अहमदाबाद में ऐसे रैकेट का भंडाफोड़ किया है, जहाँ प्लानिंग करके हिंदू लड़कियों की शादी मुस्लिम युवकों से कराई जाती थी। ये मामला सीधे-सीधे बड़े प्लानिंग की ओर इशारा करता है। ये रैकेट अहमदाबाद में घी-काँटा की कोर्ट में चल रहा था, जहाँ काम करने वाला मुस्लिम मैरिज रजिस्ट्रार MM सैयद ऐसी शादियों की व्यवस्था करता था, जिसमें लड़का मुस्लिम और लड़की हिंदू होते थे।

मुस्लिम युवक और हिंदू युवती वाले ये जोड़े देश में कहीं भी हो, अगर उन्हें शादी करने में दिक्कत होती थी तो वो अहमदाबाद में आकर शादी करते थे। इसमें सीधे-सीधे मैरिज रजिस्ट्रार MM सैयद की भूमिका सामने आई है। सैयद ने बीते कुछ माह में एक दर्जन से अधिक ऐसी शादियाँ कराई। यही नहीं, इस कोर्ट में अगर हिंदू लड़के और मुस्लिम लड़की की शादी का मामला होता, तो MM सैयद उसमें अड़ंगा लगा देता था।

इस मामले का खुलासा तब हुआ, जब कुछ दिन पहले मुस्लिम युवक और एक हिंदू लड़की वकील के भेष में शादी के रजिस्ट्रेशन के लिए पहुँचे थे। उन्होंने वकीलों के कपड़े इसलिए पहने, ताकि कोर्ट में उनकी पहचान एक जोड़े के रूप में न हो सके। इस मामले की जाँच के दौरान ही इस बड़े रैकेट का खुलासा हुआ, जिसकी अहम कड़ी मैरिज रजिस्ट्रार MM सैयद से जुड़ रही है।

आरोप है कि रजिस्ट्रार एम एम सैयद ने दोनों को निर्धारित समय से करीब दो घंटे पहले ही विवाह पंजीकरण कार्यालय के पिछले दरवाजे से अंदर प्रवेश करने दिया था। इस घटना के बाद सामने आई एक जमीनी रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि सैयद न केवल अहमदाबाद में बल्कि अन्य जिलों और राज्यों से आने वाले मुस्लिम युवकों को भी हिंदू लड़कियों से शादी कराने में से मदद करता था।

यह मामला बुधवार (4 मार्च 2026) को सामने आया, जिसके बाद लगातार नए खुलासे हो रहे हैं। पीड़ित हिंदू लड़की की माँ का आरोप है कि आरोपित सलमान, जो पेठापुर का रहने वाला है, कुछ महीने पहले उनकी बेटी का अपहरण कर ले गया था। जब 2026 में दोनों विवाह पंजीकरण कराने पहुँचे तो यह भी सामने आया कि लड़की गर्भवती थी और सलमान उस पर शादी करने के लिए दबाव बना रहा था।

मुंबई-UP के मुस्लिम युवक और हिंदू लड़की की शादी का रजिस्ट्रेशन यहीं

इस मामले में और जानकारी जुटाने के लिए ऑपइंडिया की टीम अहमदाबाद के घी कांटा कोर्ट पहुँची, जहाँ कई चौंकाने वाले खुलासे सामने आए। पिछले चार महीनों के रिकॉर्ड की जाँच में पता चला कि विवाह रजिस्ट्रार एम एम सैयद कथित तौर पर हिंदू लड़कियों की मुस्लिम युवकों से शादी कराने के मामलों में सक्रिय रूप से शामिल था।

दिसंबर 2025 से जनवरी 2026 के आँकड़ों की पड़ताल करने पर सामने आया कि सिर्फ इन दो महीनों में ही सैयद ने ऐसी 11 शादियों का पंजीकरण कराया, जिनमें लड़का मुस्लिम और लड़की हिंदू थी।

मामला यहीं तक सीमित नहीं रहा। जाँच में यह भी सामने आया कि इन शादियों में कुछ मामले ऐसे थे, जिनमें एक पक्ष उत्तर प्रदेश से और दूसरा मुंबई से आकर सैयद के पास विवाह पंजीकरण कराने पहुँचा था।

गौरतलब है कि यह मामला सामने आने के बाद वकीलों ने इस संबंध में शिकायत दर्ज कराई है। शिकायत में एम एम सैयद को सह-आरोपित बनाने और उसे पद से बर्खास्त करने की माँग की गई है। इसी सिलसिले में ऑपइंडिया ने शिकायत दर्ज कराने वाले एक वकील से भी बातचीत की।

इस मामले में ऑपइंडिया ने जिस वकील से बात की, उनका नाम सुधा क्रिश्चियन है, जो घी कांटा कोर्ट में नोटरी और अधिवक्ता के रूप में कार्य करती हैं। सुधा क्रिश्चियन ने बताया कि घटना वाले दिन सुबह करीब 10 बजे हिंदू लड़की के परिवार के लोग कोर्ट के बाहर पहुँचे और उनसे रजिस्ट्रार कार्यालय जाने के लिए कहने लगे। उस समय रजिस्ट्रार की ओर से कहा गया कि कार्यालय सुबह 11 बजे खुलता है।

हालाँकि लड़की के परिवारवालों का दावा था कि उनकी बेटी पहले से ही कार्यालय के अंदर मौजूद है। इसी बीच, सुधा क्रिश्चियन को भी रजिस्ट्रार कार्यालय में कुछ काम था, इसलिए वह अंदर चली गईं।

जब एक महिला वकील शादी रोकने गई तो दफ्तर में ताला लगा हुआ

सुधा क्रिश्चियन ने बताया कि जब वह कार्यालय के अंदर पहुँचीं तो उन्होंने देखा कि रजिस्ट्रार के दफ्तर में वकील के कपड़े पहने एक हिंदू लड़की और एक मुस्लिम युवक खड़े थे। उनके साथ मनीषा नाम की एक महिला वकील और एक पुलिसकर्मी भी मौजूद था।

सुधा के अनुसार, जब उन्होंने पूछा कि एक हिंदू लड़की को वकील के भेष में कार्यालय में कैसे आने दिया गया और रजिस्ट्रार इस पर आपत्ति क्यों नहीं कर रहे हैं, तो वहाँ मौजूद पुलिसकर्मी ने तुरंत कार्यालय का दरवाजा बंद कर दिया। पुलिसकर्मी ने कहा कि शादी पूरी होने तक दरवाजा नहीं खुलेगा, क्योंकि दरवाजा खुलने पर बाहर हंगामा हो सकता है।

इसके बाद सुधा क्रिश्चियन ने अपनी मित्र वकील मीना बरोट को इसकी जानकारी दी। सूचना मिलने पर मीना बरोट वहाँ पहुँचीं और लोगों को बताया कि एक लड़की वकील का भेष बनाकर रजिस्ट्रार कार्यालय आई है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह पूरी योजना रजिस्ट्रार एम एम सैयद और वकील मित्तल जडेजा ने मिलकर बनाई थी। योजना के तहत दोनों को वकील के वेश में लाया गया, ताकि कोई उन पर सवाल न उठाए और शादी शांतिपूर्वक संपन्न हो जाए।

सुधा क्रिश्चियन ने यह भी आरोप लगाया कि वकील मित्तल जडेजा ने ही विवाह प्रमाण पत्र वापस लिया था। उनके अनुसार, यह स्पष्ट रूप से धोखाधड़ी का मामला था, क्योंकि कोर्ट परिसर में केवल लाइसेंस प्राप्त वकीलों को ही वकील का कोट पहनने की अनुमति होती है।

उन्होंने आगे कहा कि लड़की के माता-पिता बाहर मौजूद होने के बावजूद रजिस्ट्रार एम एम सैयद ने लड़की को उनसे मिलने नहीं दिया। सुधा के मुताबिक, जब उन्होंने मौके की तस्वीरें खींचकर अन्य लोगों को भेजीं, तब वहाँ लोग इकट्ठा हो गए और मामले की जानकारी सार्वजनिक हो गई, जिसके बाद इस पूरे प्रकरण का खुलासा हुआ।

वकील का चोला पहनकर धोखाधड़ी करना

एक अन्य महिला वकील और नोटरी रागिनी दवे ने इस मामले में वकीलों द्वारा दायर शिकायतों और आवेदनों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि घटना वाले दिन लड़की के माता-पिता, परिवार के सदस्य, कई वकील और कुछ हिंदू संगठन के लोग भी कोर्ट परिसर में मौजूद थे। उनके अनुसार, यह केवल शादी का मामला नहीं था, बल्कि वकीलों का भेष धारण कर की गई धोखाधड़ी का मामला था।

रागिनी दवे ने बताया कि उस दिन करंज पुलिस, मधुपुरा पुलिस और शाहपुर पुलिस भी मौके पर मौजूद थीं। बड़ी संख्या में वकीलों ने इस घटना का विरोध किया था। उन्होंने कहा कि इन तीनों थानों के मुख्य जाँच अधिकारी और उप-मुख्य जाँच अधिकारी भी वहाँ मौजूद थे, जिनके सामने आरोपित के खिलाफ कार्रवाई की माँग रखी गई थी।

उन्होंने बताया कि जब इस पर सवाल उठे तो संबंधित युवक यह दावा करने लगे कि उन्होंने जो कोट पहना है वह वकील का नहीं बल्कि वेटर का कोट है। हालाँकि दवे के अनुसार, वेटर और वकील के कोट में स्पष्ट और बड़ा अंतर होता है, इसलिए यह तर्क स्वीकार करने योग्य नहीं था।

दवे ने आगे बताया कि उसी दिन वकील समुदाय के लोगों ने आरोपितों के खिलाफ कार्रवाई की माँग करते हुए एक याचिका भी सौंपी। यह आवेदन करंज पुलिस स्टेशन में दिया गया, जिसमें आरोपित के खिलाफ FIR दर्ज करने की माँग की गई थी।

उन्होंने कहा कि सामान्यतः शादी के दिन लड़कियाँ चोली-साड़ी या पारंपरिक कपड़े पहनती हैं, इसलिए कोई भी व्यक्ति काले कोट या वर्दी में शादी नहीं करता। रागिनी दवे ने आरोप लगाया कि यह पूरी साजिश वकील मित्तल जडेजा द्वारा रची गई, जिसने दोनों की शादी करवाई और लोगों को गुमराह करने के इरादे से यह योजना बनाई।

ग्रीन कॉरिडोर के भीतर रची गई एक साजिश

रागिनी दवे ने आगे बताया कि सामान्यतः जब कोई जोड़ा विवाह पंजीकरण के लिए आता है, तो उन्हें रजिस्ट्रार एम एम सैयद के काँच के केबिन के बाहर खड़ा रखा जाता है। लेकिन इस मामले में दोनों को सीधे केबिन के अंदर बैठाया गया, जो नियमों के विपरीत था। उन्होंने कहा कि उन्हें एक ग्रीन कॉरिडोर में बुलाया गया था और उस दौरान न तो किसी वकील को अंदर जाने दिया गया और न ही लड़की को अपने परिवार से मिलने की अनुमति दी गई।

वहीं, वकील सुधा क्रिश्चियन ने बताया कि वकीलों द्वारा दायर आवेदन में IPC की धारा 319(2) का उल्लेख किया गया है। इस धारा के तहत बार काउंसिल में अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है और धोखाधड़ी से जुड़ी शिकायत दर्ज कराई जाती है।

सुधा क्रिश्चियन ने कहा कि फर्जी वकील बनकर कोर्ट परिसर में प्रवेश करना गंभीर अपराध है और इसके लिए सजा मिलनी चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि रजिस्ट्रार ने ऐसे अज्ञात लोगों को उस कार्यालय में कैसे प्रवेश करने दिया, जहाँ सामान्य तौर पर वकीलों को भी जाने की अनुमति नहीं होती और जहाँ महत्वपूर्ण दस्तावेज रखे जाते हैं।

बिल का भुगतान निर्धारित समय सीमा समाप्त होने के 2 घंटे बाद किया गया

रागिनी दवे ने आगे कहा कि इस मामले में एक और सवाल यह है कि शाम 4 बजे के बाद के बकाया चालान आखिर शाम 6 बजे कैसे जमा कर दिए गए। उनके अनुसार यह भी जाँच का विषय है। उन्होंने बताया कि इस पूरे प्रकरण में वसीम नाम का एक व्यक्ति भी सामने आया है, जो पहले यहाँ काम करता था लेकिन अब उसका तबादला हो चुका है। दवे के मुताबिक वह सैयद का प्रशासक रहा है।

उन्होंने आरोप लगाया कि रजिस्ट्रार एम एम सैयद और वकील मित्तल जडेजा ने मिलकर यह पूरी साजिश रची, इसलिए दोनों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए और उन्हें नौकरी से बर्खास्त किया जाना चाहिए। दवे ने यह भी कहा कि संभव है कि इस तरह की साजिशों में कुछ अन्य रजिस्ट्रार और वकील भी गुमराह होकर शामिल होते हों।

रागिनी दवे ने आगे बताया कि लड़की के माता-पिता करीब एक महीने से लगातार कोर्ट आकर रजिस्ट्रार से यह अनुरोध कर रहे थे कि अगर उनकी बेटी वहाँ आए तो उन्हें तुरंत सूचित किया जाए। उस समय सैयद ने उन्हें भरोसा दिलाया था कि वह ऐसा करेंगे।

हालाँकि, जब लड़की वास्तव में कोर्ट परिसर में आई, तो उसे हरे गलियारे में रोक दिया गया और उसे अपने माता-पिता से मिलने तक की अनुमति नहीं दी गई।

अगर मामला एक मुस्लिम लड़की और एक हिंदू लड़के का होता तो रजिस्ट्रार सैयद उस मामले को बिगाड़ देते

इसके अलावा ऑपइंडिया को यह भी जानकारी मिली कि यदि रजिस्ट्रार एम एम सैयद के सामने ऐसा कोई मामला आता था जिसमें लड़की मुस्लिम और लड़का हिंदू होता, तो वह शादी होने नहीं देते थे। बताया जाता है कि ऐसे मामलों में वह किसी न किसी तरह मुस्लिम लड़की के माता-पिता या परिवार को सूचना दे देते थे, जिसके बाद अधिकतर मामलों में शादी रुक जाती थी।

इस तरह के ही एक मामले के गवाह एडवोकेट अभि राजपूत से ऑपइंडिया ने बात की। उन्होंने बताया कि करीब दो महीने पहले एक हिंदू युवक और एक मुस्लिम युवती उनके पास आए थे और दोनों अपनी मर्जी से शादी करना चाहते थे। लेकिन संयोग से 30 दिन की पूर्व सूचना अवधि समाप्त हो चुकी थी और शादी की तारीख नजदीक थी। इसी दौरान लड़की के माता-पिता को उकसाया जाने लगा कि वे अपनी बेटी की शादी उस हिंदू युवक से न होने दें।

अभि राजपूत के अनुसार, शादी के दिन जब दूल्हा-दुल्हन रजिस्ट्रार कार्यालय पहुँचे, तभी लड़की के माता-पिता अचानक वहाँ आ गए और उसे अपने साथ ले गए। उन्होंने कहा कि लड़का आर्थिक रूप से मजबूत नहीं था, इसलिए उसने आगे कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की और मामला वहीं समाप्त हो गया।

राजपूत ने यह भी कहा कि जब कोई व्यक्ति रजिस्ट्रार जैसे द्वितीय श्रेणी के पद पर होता है, जहाँ लोग न्याय और निष्पक्षता की अपेक्षा रखते हैं, तो केवल धर्म के आधार पर एकतरफा फैसला लेकर किसी मामले को प्रभावित नहीं किया जाना चाहिए।

अगर कोई मुस्लिम लड़की और एक हिंदू लड़का हो तो सैयद को आ जाता गुस्सा

अधिवक्ता अभि राजपूत ने कहा कि इस तरह की घटनाओं से लोगों के मौलिक अधिकारों का भी उल्लंघन होता है। उन्होंने कहा कि यदि कोई रजिस्ट्रार धर्म के आधार पर पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाता है, तो उसे उसके पद से हटाया जाना चाहिए और उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।

अभि राजपूत के अनुसार, इस अनुभव के बाद उन्होंने अपना एक वीडियो सोशल मीडिया पर साझा किया, जिस पर कई अन्य अधिवक्ताओं ने भी टिप्पणी की। उनका कहना था कि जब भी किसी मामले में लड़की मुस्लिम और लड़का हिंदू होता है, तो रजिस्ट्रार अक्सर किसी न किसी तरीके से मामले को उलझा देते हैं।

उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसे मामलों में रजिस्ट्रार दस्तावेजों को लेकर अनावश्यक आपत्तियाँ उठाते हैं और प्रक्रिया को जटिल बनाकर लोगों को परेशान करते हैं। अभि राजपूत ने दावा किया, “मुझे जानकारी मिली है कि अलग-अलग स्थानों से आने वाले मुस्लिम लड़कों और हिंदू लड़कियों की कई शादियाँ इसी पंजीकरण कार्यालय में दर्ज कराई गई हैं”

इस पूरे मामले से यह संकेत मिलता है कि कुछ सरकारी अधिकारी और बिचौलिए विवाह पंजीकरण की मौजूदा प्रक्रिया की खामियों का लाभ उठाकर व्यवस्था का दुरुपयोग कर रहे हैं। जब सरकारी पद पर बैठे लोग धर्म के आधार पर भेदभाव करने लगते हैं और कानून से जुड़े पेशे जैसे वकीलों की वर्दी का इस्तेमाल  धोखाधड़ी के लिए किया जाता है, तो इससे कानूनी व्यवस्था पर सवाल खड़े होते हैं।

इसी संदर्भ में, गुजरात सरकार द्वारा प्रस्तावित नए विवाह पंजीकरण कानून और संशोधन को ऐसी अनियमितताओं को रोकने के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विवाह पंजीकरण प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता, अभिभावकों को सूचना देने की व्यवस्था और रजिस्ट्रार की शक्तियों पर स्पष्ट सीमाएँ जैसे प्रावधान संभावित दुरुपयोग को रोकने में सहायक हो सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस प्रक्रिया को अधिक स्पष्ट और सख्त नहीं बनाया गया, तो अदालत परिसर जैसे संवेदनशील स्थानों का दुरुपयोग होने की आशंका बनी रह सकती है।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)


‘च**रों तुम्हें रहने नहीं देंगे…’ दिल्ली की तर्ज पर UP में भी हिंदू युवक पर हमला, होली पर अरबाज-शाहबाज-मुस्तफा ने किया अधमरा: पढ़ें- FIR में क्या-क्या लिखा है

होली के रंगों से सराबोर देश में दिल्ली के उत्तम नगर की तर्ज पर एटा के मोहल्ला काजी में एक और दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है। मुस्लिम समुदाय के तीन सगे भाइयों ने होली खेल रहे ST हिंदू युवक आकाश को कपड़ों पर रंग गिरने के बहाने गंदी गालियाँ दीं, फिर लाठी-डंडे और पिस्तौल की बट से पीट-पीटकर अधमरा कर दिया। पीड़ित की बहन और भाभी बचाने आईं तो उनके साथ भी मारपीट की गई।

आरोपितों ने पीड़ित दलित परिवार इलाका छोड़ने की धमकी देते हुए कहा, “तुम्हें यहाँ रहने नहीं देंगे, जान से मार देंगे।” यह घटना ठीक दिल्ली के उत्तम नगर वाली हत्या की तरह है, जहाँ होली के पानी के गुब्बारे के विवाद में मुस्लिम युवकों ने 26 वर्षीय तरुण कुमार की पत्थर मारकर हत्या कर दी थी।

रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली की तर्ज पर एटा जिले के सकीट थाना क्षेत्र के मोहल्ला काजी में 4 मार्च 2026 को रात 8 बजे ठीक वैसी ही घटना घटी। 22 वर्षीय आकाश पुत्र विनोद अपने घर के बाहर होली खेल रहा था। इसी दौरान मोहल्ले के ही अरबाज, शाहबाज और मुस्तफा (तीनों सगे भाई, अब्बू का नाम मुइल्तयार अली) उधर से गुजरे। गलती से रंग उनके कपड़ों पर गिर गया। इसके बाद तीनों ने आकाश की माँ-बहन को गंदी-गंदी गालियाँ देना शुरू कर दिया।

आकाश ने गालियाँ बंद करने को कहा तो आरोपियों ने उसे जमीन पर गिराकर लाठी-डंडों से जमकर पीटा। अरबाज ने अपने पास रखी तमंचे की बट से आकाश के सिर पर जोरदार वार किया। सिर फट गया, नाक में गंभीर चोट आई। खून से लथपथ आकाश की चीख सुनकर बहन और भाभी बचाने पहुँचीं तो मुस्तफा और अरबाज ने उनके साथ भी मारपीट की। काफी भीड़ इकट्ठा हो गई तो आरोपितों ने धमकाते हुए कहा, “च**रो, तुम्हें यहाँ रहने नहीं देंगे” और जान से मारने की धमकी देकर भाग गए।

एफआईआर की कॉपी

पीड़ित आकाश ने शुक्रवार (6 मार्च 2026) को सकीट थाने में लिखित तहरीर दी। इसमें भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 115(2) (स्वेच्छा से गंभीर चोट पहुँचाना), 351(3) (हमला), 352 (मारपीट) और अनुसूचित जाति एवँ जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 की धारा 3(2)(va) लगाई गई। पीड़ित दलित समुदाय से है, इसी कारण SC/ST एक्ट भी दर्ज किया गया है।

FIR की कॉपी के मुताबिक, पीड़ित ने बताया, “प्रार्थी के माँ-बहन की गंदी गाली देने लगे… जमीन पर गिराकर लाठी डंडे से जमकर मारा पीटा… अरबाज ने तमंचे की बट से सिर पर वार किया… बहन बीना व भाभी वर्षा बचाने आईं तो मुस्तफा व अरबाज ने मारपीट की… चमारो तुम्हें यहाँ रहने नहीं देगें… जान से मारने की धमकी देते हुए भाग गए।”

थाना प्रभारी विदेश राठी ने बताया, “होली के दिन मोहल्ला काजी में मारपीट हुई, आकाश पुत्र विनोद को गंभीर चोटें आई हैं। चिकित्सकीय परीक्षण कराया गया। तहरीर के आधार पर FIR दर्ज कर कार्रवाई की जा रही है। आरोपितों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज है, जाँच चल रही है।”

दिल्ली और एटा की घटनाओं का पैटर्न एक जैसा

मोहल्ला काजी में दोनों समुदायों के लोग रहते हैं। घटना के बाद हल्का तनाव है, लेकिन पुलिस ने भारी फोर्स तैनात कर स्थिति नियंत्रण में रखी है। आकाश का परिवार डरा हुआ है। पीड़ित पक्ष का कहना है कि छोटी सी बात पर इस कदर बेरहमी से पीटा गया, जैसे दिल्ली में तरुण के साथ हुआ। दोनों मामलों में सगे भाइयों का गिरोह, होली का बहाना, गाली-गलौज से शुरू होकर हत्या/अधमरा करने तक का पैटर्न एक जैसा है। दिल्ली में उमरुद्दीन, कमरुद्दीन जैसे भाइयों ने तरुण को मार डाला, तो एटा में अरबाज, शाहबाज, मुस्तफा ने आकाश को निशाना बनाया।

होली पर मुस्लिमों का हमला
प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI Grok)

दोनों घटनाएँ त्योहार के मौके पर सांप्रदायिक हमलों के मामलों को उजागर करती हैं। हिंदू युवक छोटी सी गलती या बहाने पर निशाने पर आ जाते हैं। एटा पुलिस ने आश्वासन दिया है कि आरोपियों को जल्द गिरफ्तार कर सख्त कार्रवाई की जाएगी। यह घटना सिर्फ एक FIR नहीं, बल्कि पूरे देश में होली जैसे त्योहारों पर बढ़ते सांप्रदायिक हमलों का प्रतिबिंब है।

Ex मुस्लिम सलीम के हमलावरों के लिए रो रहे पड़ोसी, अब्बा कह रहा- ‘लोग बनेंगे डकैत’: क्या सिर्फ मजहब के आधार पर जीशान-गुलफाम के साथ खड़े कट्टरपंथी?

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में दो सगे भाइयों जीशान और गुलफाम ने Ex मुस्लिम और यूट्यूबर सलीम वास्तिक का गला रेत दिया था। घटना के कुछ ही दिनों में उत्तर प्रदेश पुलिस ने दोनों भाइयों का एनकाउंटर कर दिया। दोनों भाइयों ने रोके जाने की कोशिश के दौरान पुलिस पर फायरिंग की और क्रास फायरिंग में पुलिस की गोली लगने से मारे गए।

दोनों भाइयों ने जिस तरह सलीम की गर्दन काटी थी, उसका वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ था। दोनों भाइयों ने पेशेवर अपराधी की तरह सलीम पर चाकू से करीब एक दर्जन वार किए। एक भाई के पास एनकाउंटर के वक्त पुलिस को इटली की पिस्टल भी मिली थी। इससे साफ है कि दोनों भाई कोई एक दिन जाकर अचानक अपराधी नहीं बन गए बल्कि कट्टरपंथ का जहर उनके भीतर तक फैला था।

दोनों भाई एक टेलीग्राम ग्रुप ‘मुस्लिम आर्मी मेहदी मॉडरेटर’ से भी जुड़े थे जहाँ से उनके ‘जिहादी’ विचारों को पानी मिल रहा था। हजारों लोगों की मौजूदगी वाले इस कट्टरपंथी ग्रुप के जरिए लोगों के मन में घृणा भरी जा रही थी। ये सब बातें हम आपको इसलिए बता रहे हैं क्योंकि अभी भी कुछ लोगों के लिए वे दोनों दरिंदे पाक साफ हैं, पीड़ित हैं और दोषी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश सरकार है।

सबसे पहले जीशान-गुलफाम के अब्बू बुनियाद अली की बात सुनते हैं। बुनियाद अली ने कहा कि जो आज बोया जा रहा है उसके काँटे 20 साल बाद निकलेंगे। बुनियाद ने कहा कि हिंदुस्तान में ऐसे काँटे बो दिए गए हैं कि आज की पीढ़ी तबाह हो गई है और उनके बच्चे डकैती करेंगे।

ये बुनियाद का कोई इकलौता बयान नहीं है, एक अन्य वीडियो में वो दोनों को शहीद बताता नजर आया। बुनियाद से पूछा गया कि दो बेटे मरे हैं, उसके चेहरे पर कोई दुख नहीं है। इस पर वो कहता है, “इस्लाम की हकीकत बताऊँ? हुसैन ने भी 72 शहीदों को कंधा दिया था।”

इसके अलावा बुनियाद ने एक अन्य शख्स से बातचीत में कहा, “कोर्ट कार्रवाई करे, सुप्रीम कोर्ट बैठा है, अगर सबने चूड़ियाँ पहन ली हैं तो फिर जैसे जिसका आए तो ठीक है। कोर्ट सब बेकार हो गए।” बुनियाद ने ड्रेमेटिक अंदाज में योगी आदित्यनाथ पर सवाल उठाए और कहा, “मुझे भी मार दो, खत्म करो।”

UP Tak के एक पत्रकार अमरोहा में उस गाँव में पहुँचे जहाँ दोनों भाई रहते थे। पत्रकार से बातचीत में जमील अहमद नाम के एक ग्रामीण ने कहा कि दोनों बहुत नेक लड़के थे और उनमें कोई फाल्ट नहीं था। वो बार दोनों को बेचारा कहता रहा और अंत में बोला कि एनकाउंटर गलत किया गया है।

जाकिर अली नाम के एक-दूसरे ग्रामीण ने कहा कि इस एनकाउंटर का पूरी बस्ती को अफसोस है। जाकिर बोलते-बोलते रोने लगा और कहने लगा कि रोजे में यहाँ किसी ने कुछ नहीं खाया है। हालाँकि, उसने यह जरूर कहा कि किसी ने उन्हें भड़काया होगा। मोहम्मद अयूब नाम के एक पड़ोसी ने कहा कि दोनों नेक बच्चे थे और ऐसे ही चले गए। अयूब ने कहा कि हमारी नजर में तो उन दोनों को कोई फॉल्ट नहीं है। जब अयूब से सलीम का गला रेते जाने को लेकर पूछा भी गया तो उन्होंने कहा कि इसकी उन्हें जानकारी नहीं है।

कट्टरपंथियों के लिए निकलता दर्द, गला रेतने पर खामशी

यह घटना केवल एक शख्स की गर्दन रेते जाने या कोई एक आपराधिक मामले तक सीमित नहीं है बल्कि यह कट्टरपंथी समाज की सोच और संवेदनाओं पर भी बड़ा सवाल खड़ा करती है। और ऐसे में इन सभी लोगों के बयान सुनने के बाद एक सवाल यह उठता है कि आखिर ऐसा क्या हो रहा है कि जघन्य अपराध के आरोपियों के लिए आँसू बहाए जा रहे हैं जबकि उस व्यक्ति के दर्द और उसके परिवार की पीड़ा पर की कोई बात नहीं कर रहा है जिसकी गर्दन रेत दी गई, जिस पर चाकू से वार पर वार किए गए।

आरोपितों के गाँव के लोगों के मन में एक बार भी यह बात नहीं आई कि जीशान-गुलफाम ने कुछ गलत किया है। ऐसा क्यों हुआ होगा? क्या ऐसा सिर्फ इसलिए क्योंकि सलीम ने इस्लाम की कट्टरता और कुरीतियों पर सवाल उठाने शुरू कर दिए थे तो क्या वो इस्लाम में होते हुए भी उम्माह का हिस्सा नहीं रहा था क्योंकि उसने सवाल उठाने शुरू कर दिए थे।

यहाँ एक बात और जो भुला दी गई वो ये कि उन दोनों को कहीं सोते या पुण्य काम करते नहीं मारा गया। दोनों आरोपित पुलिस पर फायरिंग कर रहे थे और अपनी जान बचाने के लिए पुलिस की जान लेने पर आमादा थे। पुलिसकर्मी घायल तक हुए। तो ये कोई एकतरफा कार्रवाई नहीं थी लेकिन ऐसे मामलों में में जब पुलिस की कार्रवाई होती है तो अचानक सहानुभूति की लहर उठने लगती है। पीड़ित के लिए नहीं बल्कि आरोपित के लिए।

जब कोई अपराध इतना क्रूर हो कि वह इंसानियत की सीमाओं को ही पार कर जाए, तब आरोपित के लिए कितनी इंसानियत दिखानी चाहिए, क्या दिखानी भी चाहिए? अव्वल तो समाज को साफ शब्दों में यह कहना चाहिए कि ऐसी हिंसा किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है।

ऐसे में एक खतरा और है, या यूँ कहें कि संदेश है वो ये कि अगर इस तरह के अपराध किए जाएँगे तब भी समाज का एक तबका आपकी मजहबी पहचान के आधार पर आपके साथ खड़ा रहेगा फिर चाहे आपने कितना ही वीभत्स गुनाह क्यों ना किया हो।

अगर मजहबी पहचान को न्याय और नैतिकता से ऊपर रख दिया जाएगा तो यह समाज के लिए गंभीर समस्या है और इस मामले में यही होता दिख रहा है। यह जानते हुए भी कि जीशान-गुलफाम ने गुनाह किया है लोग केवल मजहबी पहचान के आधार पर उसके साथ खड़े नजर आ रहे हैं।

इसी तरह की घटनाएँ ना केवल आपसी अविश्वास और सामाजिक तनाव बढ़ाती है बल्कि लोकतांत्रिक समाज के लिए बहुत नुकसानदायक हैं।

आधुनिक बिहार के ‘शिल्पकार’ की विदाई, 20 साल के ‘सुशासन’ के बाद जा रहे नीतीश: जानें- महिला शिक्षा से सुरक्षा तक, कैसे बदली राज्य की तकदीर

राजनीति की बिसात पर जब कोई मोहरा अपनी चाल चलता है, तो हार-जीत के आँकड़े गिने जाते हैं। लेकिन जब कोई जननायक विदा लेता है, तो आँकड़े नहीं, आँखें बोलती हैं। भारतीय राजनीति जब कोई नेता पद छोड़ता है, तो अक्सर सत्ता के गलियारों में सन्नाटा पसर जाता है, लेकिन पार्टी के कार्यकर्ताओं की आँखों में आँसू कम ही देखे जाते हैं। राजनीति की इस काजल की कोठरी में जहाँ हर कदम पर दाग लगने का डर रहता है, वहाँ एक नाम ऐसा है जिसने उजले कपड़े पहनकर प्रवेश किया और दो दशकों के सफर के बाद भी बेदाग निकल आया। वह नाम है ‘नीतीश कुमार’।

जिन पर न तो कभी परिवारवाद का साया पड़ा और न ही भ्रष्टाचार का कोई छींटा। आज जब नीतीश कुमार बिहार की सत्ता की बागडोर छोड़कर राज्यसभा जाने की तैयारी कर रहे हैं, तो यह केवल एक नेता का पद छोड़ना नहीं है, बल्कि बिहार के राजनीतिक इतिहास के एक स्वर्णिम ‘नीतीश युग’ का समापन है। नीतीश कुमार का यह कदम बिहार की राजनीति में एक बड़े बदलाव का प्रतीक है।

2005 में जब उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली थी, तब बिहार प्रशासनिक कमजोरी, जातीय हिंसा और फिरौती जैसे अपराधों के गहरे संकट में था। आज 20 साल बाद, बिहार ने स्थिरता, विकास और संस्थागत मजबूती की एक लंबी दूरी तय कर ली है। नीतीश कुमार ने घोषणा की है कि वे मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर राज्यसभा जाएँगे, ताकि वे संसद के दोनों सदनों और राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों का सदस्य बनने की अपनी इच्छा को पूरा कर सकें। उनके इस प्रस्थान के साथ ही बिहार के विकास की वो गाथा याद आती है, जिसे उन्होंने अपने विजन और कठिन परिश्रम से लिखा है।

कानून का राज: ‘जंगलराज’ से ‘जीरो टॉलरेंस’ तक का सफर

नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने से पहले बिहार की पहचान जातीय हिंसा, फिरौती के लिए अपहरण और चरमराई कानून-व्यवस्था से होती थी। शाम ढलते ही सड़कों पर सन्नाटा पसर जाता था। नीतीश ने सत्ता संभालते ही ‘थ्री सी’ (3C) का मंत्र दिया- करप्शन, क्राइम और कम्युनलिज्म के प्रति जीरो टॉलरेंस। उन्होंने पुलिस व्यवस्था में आमूल-चूल बदलाव किए और प्रशासनिक अनुशासन को प्राथमिकता दी।

नीतीश कुमार की सरकार ने ‘स्पीडी ट्रायल’ की शुरुआत की, जिससे कुख्यात अपराधियों को कम समय में सजा मिलना सुनिश्चित हुआ। इसके कारण अपराधियों में खौफ पैदा हुआ और वर्षों से फरार चल रहे बाहुबली सलाखों के पीछे पहुँचे। पुलिस स्टेशनों की कार्यप्रणाली में सुधार किया गया और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए नौकरशाही की जवाबदेही तय की गई। इसी सुरक्षा के माहौल ने आम जनता में वह भरोसा जगाया, जिससे राज्य में निवेश और आर्थिक गतिविधियों के द्वार खुले। आज बिहार में महिलाएँ रात में भी बेखौफ होकर घर से बाहर निकल सकती हैं, जो कभी एक सपना मात्र था।

आधी आबादी का सशक्तिकरण: साइकिल से लेकर 50% आरक्षण तक

नीतीश कुमार की सबसे बड़ी जीत महिलाओं के बीच उनकी लोकप्रियता रही है। उन्होंने महिलाओं को केवल ‘वोट बैंक’ नहीं समझा, बल्कि उन्हें राज्य के विकास का केंद्र बनाया। वर्ष 2006 में उन्होंने पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं को 50% आरक्षण देने का ऐतिहासिक फैसला लिया। यह देश में अपनी तरह की पहली पहल थी, जिसने हजारों महिलाओं को चूल्हे-चौके से निकालकर राजनीति की मुख्यधारा में ला खड़ा किया। आज बिहार की पंचायतों में महिलाओं की भागीदारी 55% तक पहुँच चुकी है।

शिक्षा के क्षेत्र में ‘मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना’ और ‘पोशाक योजना’ ने एक सामाजिक क्रांति ला दी। सड़कों पर साइकिल चलाकर स्कूल जाती लड़कियाँ बदलते बिहार का सबसे सशक्त प्रतीक बन गईं। इसके साथ ही, ‘जीविका’ (SHG) कार्यक्रम के जरिए 1.40 करोड़ से अधिक महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया गया। आज ये ‘जीविका दीदियाँ’ न केवल अपना घर चला रही हैं, बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था में भी सक्रिय योगदान दे रही हैं। सरकारी नौकरियों में महिलाओं को मिलने वाला 35% क्षैतिज आरक्षण और पुलिस बल में 30% महिलाओं की मौजूदगी नीतीश सरकार की उन नीतियों का परिणाम है, जिसने बिहार को महिला सशक्तिकरण के वैश्विक मानचित्र पर ला दिया।

शिक्षा और स्वास्थ्य: बुनियादी ढांचे का पुनर्जन्म

शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के लिए नीतीश सरकार ने शिक्षकों की बड़े पैमाने पर बहाली की और स्कूलों के भवन निर्माण पर जोर दिया। ‘अक्षर अंचल योजना’ के माध्यम से 67 लाख से अधिक महिलाओं को साक्षर बनाया गया। मेडिकल व इंजीनियरिंग कॉलेजों में 33 प्रतिशत आरक्षण देकर उन्होंने सुनिश्चित किया कि बिहार की बेटियाँ हर क्षेत्र में पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर चल सकें। अल्पसंख्यक और महादलित समुदाय के बच्चों के लिए ‘हुनर’ और ‘औजार’ जैसे कार्यक्रम चलाकर उन्हें स्वरोजगार के लिए प्रशिक्षित किया गया।

स्वास्थ्य क्षेत्र में भी बदलाव की लहर स्पष्ट दिखी। वर्ष 2005 में जहाँ सरकारी अस्पतालों की स्थिति दयनीय थी, वहीं नीतीश सरकार ने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर बड़े अस्पतालों तक दवाइयों और डॉक्टरों की उपलब्धता सुनिश्चित की। ‘जननी बाल सुरक्षा योजना’ और ‘कन्या उत्थान योजना’ जैसे कदमों से संस्थागत प्रसव (Institutional Delivery) की दर 4% से बढ़कर 50% के पार पहुँच गई। आज हर जिले में आधुनिक सुविधाओं से लैस अस्पताल और मेडिकल कॉलेज बिहार की बदलती तस्वीर बयाँ कर रहे हैं।

विकास का सात निश्चय और आधारभूत संरचना

नीतीश कुमार ने बिहार को सड़कों और पुलों का जाल दिया। ‘सात निश्चय’ योजना (1 और 2) के तहत ‘हर घर नल का जल’, ‘पक्की गली-नालियाँ’ और ‘हर घर बिजली’ जैसे वादों को धरातल पर उतारा। बिहार का बजट, जो 2004-05 में मात्र 24,000 करोड़ रुपए था, आज बढ़कर 3 लाख करोड़ रुपए से अधिक हो चुका है। प्रति व्यक्ति आय में भी लगभग 9 गुना की वृद्धि दर्ज की गई है।

राजगीर में ‘ग्लास स्काई वॉक’, बिहार संग्रहालय, बापू टावर और पटना मेट्रो जैसे प्रोजेक्ट्स ने बिहार को आधुनिकता से जोड़ा। वहीं, गंगा पथ (पटना का मरीन ड्राइव) और वाराणसी-कोलकाता एक्सप्रेस-वे जैसे हाई-स्पीड कॉरिडोर ने व्यापारिक गतिविधियों को नई गति दी। नीतीश सरकार ने पर्यटन को भी बढ़ावा दिया, जिससे राजगीर, बोधगया और वैशाली जैसे स्थल अंतरराष्ट्रीय स्तर के पर्यटन केंद्र बन गए।

शराबबंदी: एक कड़ा और साहसी सामाजिक फैसला

नीतीश कुमार के सबसे चर्चित और विवादास्पद फैसलों में से एक रहा- पूर्ण शराबबंदी। 2016 में महिलाओं की माँग पर लिए गए इस फैसले ने राज्य के राजस्व को करीब 10 हजार करोड़ रुपए का नुकसान पहुँचाया, लेकिन इसका सामाजिक प्रभाव गहरा रहा।

अध्ययनों के अनुसार, शराबबंदी के बाद घरेलू हिंसा में 35-40% की कमी आई और गरीब परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ। आलोचकों के बावजूद, नीतीश अपने इस फैसले पर अडिग रहे, क्योंकि वे इसे केवल एक कानून नहीं बल्कि एक व्यापक ‘समाज सुधार’ के रूप में देखते थे।

सुशासन के सारथी का विदाई संदेश

नीतीश कुमार का राजनीतिक सफर किसी मिसाल से कम नहीं है। एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार से निकलकर, इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद लोहिया के समाजवाद को अपनी रगों में बसाने वाले नीतीश ने बिहार को उसकी खोई हुई पहचान वापस दिलाई है।

अक्सर उन्हें ‘पलटू राम’ कहकर आलोचना की जाती है, लेकिन हम बारीकी से देखें, तो उनके हर राजनीतिक कदम के केंद्र में बिहार का हित और ‘न्याय के साथ विकास’ का एजेंडा रहा है। उन्होंने गठबंधन भले ही बदले, लेकिन अपने शासन के मूल्यों और प्राथमिकताओं से कभी समझौता नहीं किया।

नीतीश कुमार ने राजनीति में वह शुचिता दिखाई जो आज के दौर में दुर्लभ है। जब वे सत्ता छोड़ रहे हैं, तो उनके पास विरासत के नाम पर न कोई महल है और न ही करोड़ों की बेनामी संपत्ति। उनके पास है तो बस करोड़ों बिहारियों का भरोसा और वो लाखों दुआएँ जो उन बेटियों ने दीं जिन्हें साइकिल और शिक्षा का पंख दिया।

राज्यसभा में उनकी उपस्थिति निश्चित रूप से राष्ट्रीय राजनीति को एक अनुभवी और और दूरदर्शी ने नेतृत्व प्रदान करेगी। बिहार नीतीश को एक ऐसे मुख्यमंत्री के रूप में याद रखेगा जिसने धूल से सने राज्य को उठाकर विकास के शिखर की ओर अग्रसर किया।

नेपाली Gen-Z आंदोलन को दिशा देने वाले बालेन शाह बनेंगे PM, भारत में पढ़ाई लेकिन दिल में नफरत: जानें दिल्ली की तरफ झुकेंगे या बनेंगे अमेरिका के पिट्ठू?

नेपाल की राजनीति इस समय बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। 5 मार्च 2026 को हुए आम चुनाव के बाद जारी मतगणना के शुरुआती रुझानों में 35 वर्षीय बालेन शाह और उनकी पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) को भारी बढ़त मिलती दिखाई दे रही है। 165 सीटों वाली संसद में उनकी पार्टी 100 से अधिक सीटों पर आगे बताई जा रही है।

यदि अंतिम परिणाम भी इसी दिशा में आते हैं तो नेपाल की राजनीति में दशकों से सक्रिय पारंपरिक दलों, नेपाली कॉन्ग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों को बड़ा झटका लग सकता है। हालाँकि बालेन शाह का संभावित सत्ता में आना केवल राजनीतिक बदलाव नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे राष्ट्रवादी बयानबाजी और पड़ोसी देशों पर तीखी टिप्पणियों से भी जोड़ा जा रहा है।

बालेन शाह खुद को नई पीढ़ी का नेता बताते हैं, लेकिन उनके आलोचक उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में देखते हैं जो आक्रामक बयानबाजी, जनभावनाओं को भड़काने और राजनीतिक अस्थिरता से फायदा उठाने की कोशिश करते रहे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अगर बालेन शाह नेपाल के प्रधानमंत्री बनते हैं तो इसका असर केवल नेपाल की राजनीति तक सीमित रहेगा या भारत-नेपाल संबंधों और क्षेत्रीय कूटनीति पर भी पड़ेगा।

चुनावी रुझानों ने नेपाल की राजनीति में मचाया भूचाल

नेपाल में इस बार का चुनाव सामान्य परिस्थितियों में नहीं हुआ था। 2025 में देश गंभीर राजनीतिक संकट से गुजरा। सितंबर 2025 में सोशल मीडिया प्रतिबंध के विरोध से शुरू हुआ Gen-Z आंदोलन जल्द ही सरकार विरोधी आंदोलन में बदल गया।

राजधानी काठमांडू समेत कई शहरों में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए। इन प्रदर्शनों के दौरान हिंसा भी हुई जिसमें लगभग 19 लोगों की मौत हुई और 300 से अधिक लोग घायल हुए। इन घटनाओं के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को इस्तीफा देना पड़ा और संसद भंग हो गई।

इसके बाद नए चुनाव की घोषणा की गई। अब उसी राजनीतिक अस्थिरता के बाद हुए चुनावों में बालेन शाह की पार्टी को बड़ी बढ़त मिलती दिखाई दे रही है। यदि यह रुझान परिणामों में बदलता है तो यह नेपाल की राजनीति में एक बड़ा सत्ता परिवर्तन होगा।

कौन हैं बालेन शाह: रैपर से संभावित प्रधानमंत्री तक

बालेन शाह का पूरा नाम बालेंद्र शाह है। उनका जन्म 1990 में काठमांडू में हुआ था। उनके पिता राम नारायण शाह आयुर्वेद के चिकित्सक थे और उनकी माँ गृहिणी थीं। उन्होंने नेपाल में सिविल और स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और बाद में भारत के कर्नाटक स्थित विश्वेश्वरैया टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी से मास्टर्स डिग्री हासिल की।

2015 में आए विनाशकारी नेपाल भूकंप के बाद उन्होंने पुनर्निर्माण के कुछ कार्यों में हिस्सा लिया, लेकिन उनकी असली पहचान एक इंजीनियर के रूप में नहीं बल्कि रैपर और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट के रूप में बनी। उनकी लोकप्रियता का आधार उनके गाने और सोशल मीडिया पोस्ट रहे, जिनमें वे नेपाल की राजनीति और नेताओं पर तीखे हमले करते थे।

बालेन शाह के कई रैप गाने नेपाल की राजनीति पर सीधा हमला करते थे। उनका गाना ‘बलिदान’ युवाओं के बीच बेहद लोकप्रिय हुआ। इस गाने में उन्होंने राजनीतिक व्यवस्था पर हमला करते हुए कहा कि देश को बचाने का दावा करने वाले नेता ही देश को बर्बाद कर रहे हैं। नेपाल के युवाओं के बीच यह गाने व्यवस्था विरोधी भावना को बढ़ाने वाले माने गए।

आलोचकों का कहना है कि बालेन शाह ने इसी असंतोष को राजनीतिक पूंजी में बदलने का काम किया।

काठमांडू के मेयर बनकर बढ़ी राजनीतिक महत्वाकांक्षा

2022 में बालेन शाह ने काठमांडू के मेयर का चुनाव स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में लड़ा। इस चुनाव में उन्होंने पारंपरिक दलों के उम्मीदवारों को हराकर जीत हासिल की। उन्हें लगभग 61 हजार से अधिक वोट मिले। हालाँकि मेयर बनने के बाद उनका कार्यकाल भी विवादों से भरा रहा।

उन्होंने कई बार प्रशासनिक अधिकारियों और राष्ट्रीय नेताओं के खिलाफ सार्वजनिक रूप से आक्रामक बयान दिए। कुछ मामलों में उन्होंने सोशल मीडिया पर ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया जिसे कई राजनीतिक विश्लेषकों ने गैर-जिम्मेदाराना बताया।

Gen-Z आंदोलन: समर्थन, उकसावे और राजनीतिक लाभ के आरोप

सितंबर 2025 में हुए Gen-Z आंदोलन में बालेन शाह का नाम लगातार चर्चा में रहा। 7 सितंबर 2025 को उन्होंने फेसबुक पर पोस्ट लिखकर युवाओं के आंदोलन का समर्थन किया। उन्होंने लिखा कि Gen-Z की सोच और इच्छाशक्ति को समझना जरूरी है और वे उनके साथ हैं।

इसके अगले दिन काठमांडू समेत कई शहरों में हजारों युवा सड़कों पर उतर आए। प्रदर्शन जल्द ही हिंसक हो गए और कई जगह सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाया गया। इस आंदोलन के दौरान सोशल मीडिया पर बालेन शाह को प्रधानमंत्री बनाने की माँग भी तेजी से बढ़ी।

आलोचकों का कहना है कि बालेन शाह ने युवाओं की नाराजगी को राजनीतिक मौके में बदलने की कोशिश की। हालाँकि बाद में उन्होंने प्रदर्शनकारियों से शांत रहने की अपील भी की।

भारत विरोधी बयान और विवादों का लंबा इतिहास

बालेन शाह कई बार भारत को लेकर विवादित बयान दे चुके हैं। 2023 में जब भारत में संसद के नए भवन में ‘अखंड भारत’ का नक्शा चर्चा में आया तो इसके जवाब में उन्होंने अपने कार्यालय में ‘ग्रेटर नेपाल’ का नक्शा लगा दिया। इस नक्शे में भारत के कई क्षेत्रों को नेपाल का हिस्सा दिखाया गया था।

इसी साल फिल्म ‘आदिपुरुष’ को लेकर भी उन्होंने विवाद खड़ा कर दिया। उनका आरोप था कि फिल्म में माता सीता को भारत की बेटी बताया गया है। इसके विरोध में उन्होंने काठमांडू में भारतीय फिल्मों की स्क्रीनिंग पर अस्थायी प्रतिबंध लगा दिया था। हालाँकि बाद में नेपाल के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद यह प्रतिबंध हटाना पड़ा।

नवंबर 2025 में बालेन शाह ने फेसबुक पर एक विवादित पोस्ट लिखी जिसमें भारत, अमेरिका और चीन के खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया गया था। इस पोस्ट में उन्होंने कई देशों और राजनीतिक दलों के लिए गालियाँ लिखीं। बाद में यह पोस्ट हटा दी गई, लेकिन तब तक यह सोशल मीडिया पर वायरल हो चुकी थी।

उस पोस्ट में लिखा था: “F**k America, F**k India, F**k China, F**k UML, F**k Congress, F**k RSP, F**k RPP, F**k Maobaadi, Go to hell, you guys all combined can do nothing” दिलचस्प बात यह है कि बाद में बालेन उसी RSP पार्टी में शामिल हो गए, जिसे उन्होंने अपनी फेसबुक पोस्ट में निशाना बनाया था।

अमेरिका से करीबी संपर्क को लेकर उठते सवाल

बालेन शाह को लेकर यह चर्चा भी रही है कि उनके अंतरराष्ट्रीय संपर्क काफी मजबूत हैं। उन्हें 2023 में टाइम मैगजीन की प्रभावशाली लोगों की सूची में शामिल किया गया था। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी उन्हें काफी कवरेज मिली। काठमांडू के मेयर रहते हुए उनकी मुलाकात नेपाल में अमेरिकी राजदूत से कई बार हुई।

इन बैठकों की तस्वीरें भी सार्वजनिक हुईं। इसी वजह से नेपाल की राजनीति में कुछ लोग उन्हें अमेरिका के प्रभाव वाला नेता भी बताते हैं। हालाँकि उनके समर्थक इसे सामान्य कूटनीतिक संपर्क बताते हैं। नेपाल की विदेश नीति लंबे समय से भारत और चीन के बीच संतुलन बनाए रखने पर आधारित रही है।

बालेन शाह ने भी कई बार कहा है कि नेपाल को अपने हितों के आधार पर दोनों देशों के साथ संबंध रखने चाहिए। हालाँकि चुनाव के दौरान उन्होंने चीन से जुड़े कुछ औद्योगिक परियोजनाओं को अपने घोषणा पत्र से हटा दिया। कुछ विश्लेषकों ने इसे भारत को संदेश देने की कोशिश बताया। फिर भी यह स्पष्ट नहीं है कि सत्ता में आने के बाद वे भारत और चीन के बीच किस तरह की रणनीति अपनाएँगे।

अगर बालेन शाह बने PM तो भारत के लिए क्या चुनौती?

भारत और नेपाल के बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध रहे हैं। दोनों देशों के बीच खुली सीमा है और आर्थिक संबंध भी काफी मजबूत हैं, लेकिन बालेन शाह के पिछले बयानों और विवादों को देखते हुए यह आशंका जताई जा रही है कि उनकी सरकार भारत के साथ संबंधों को लेकर अधिक आक्रामक रुख अपना सकती है।

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि वे राष्ट्रवादी राजनीति के जरिए घरेलू समर्थन बनाए रखने की कोशिश कर सकते हैं, जिससे समय-समय पर भारत-नेपाल संबंधों में तनाव पैदा हो सकता है। बालेन शाह की लोकप्रियता मुख्य रूप से सोशल मीडिया और युवाओं के बीच उनकी छवि पर आधारित है।

लेकिन आलोचकों का कहना है कि लोकप्रियता और शासन क्षमता अलग चीजें होती हैं। नेपाल इस समय आर्थिक चुनौतियों, बेरोजगारी और राजनीतिक अस्थिरता जैसी कई समस्याओं से जूझ रहा है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या एक रैपर से राजनेता बने नेता इन जटिल समस्याओं से निपट पाएँगे या उनकी राजनीति केवल जनभावनाओं को भड़काने तक ही सीमित रहेगी।

अगर वे प्रधानमंत्री बनते हैं तो नेपाल की राजनीति में एक नई शैली देखने को मिल सकती है। लेकिन यह भी संभव है कि उनकी आक्रामक और विवादास्पद राजनीति नेपाल के भीतर और पड़ोसी देशों के साथ नए तनाव पैदा कर दे।

आने वाले दिनों में अंतिम चुनाव परिणाम और उसके बाद बनने वाली सरकार यह तय करेगी कि बालेन शाह का उभार नेपाल के लिए स्थायी बदलाव साबित होगा या नई राजनीतिक अनिश्चितता की शुरुआत।

US का दावा कुछ भी हो, भारत लगातार खरीदता रहा है रूसी तेल: पढ़ें कैसे ‘जहाँ सस्ता मिले’ की नीति पर चलता रहा है हिंदुस्तान

भारतीय समय के मुताबिक अमेरिका ने शुक्रवार (6 मार्च 2026) को नई दिल्ली को 30 दिन का समय दिया कि वो समुद्र में पहले से मौजूद रूसी टैंकरों से कच्चा तेल खरीद सकता है, क्योंकि ईरान-इजराइल संघर्ष की वजह से अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन बाधित हो गई है। यह आधिकारिक आदेश सिर्फ उन शिपमेंट्स के लिए है जो अभी समुद्र में हैं। बयान में यह भी साफ कहा गया कि ईरान से ऐसे कोई खरीदारी की इजाजत नहीं दी जा रही, क्योंकि ईरान पर भारी प्रतिबंध हैं।

ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तारीफ की कि उन्होंने ग्लोबल एनर्जी सप्लाई को आने वाले खतरे से निपटने के लिए बड़ा फैसला लिया है, बिना रूस को कोई फायदा दिए। उन्होंने लिखा, “उनकी एनर्जी एजेंडा की वजह से तेल और गैस का उत्पादन अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुँच गया है। ग्लोबल मार्केट में तेल का बहाव जारी रखने के लिए ट्रेजरी विभाग भारतीय रिफाइनरियों को रूसी तेल खरीदने के लिए 30 दिन का अस्थायी छूट दे रहा है।”

उस संदेश में सबसे अहम शब्द था ‘अलाउ’ यानी इजाजत देना। ट्रंप प्रशासन ने जोर देकर कहा कि वो भारत को जरूरी कच्चा तेल खरीदने के लिए रूसी टैंकरों से छूट ‘दे रहा है’। अपनी तारीफ बढ़ाने के लिए बेसेंट ने इसे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की समझदारी और मेहरबानी बता दिया।

फिर बेसेंट ने चुपके से भारत को अमेरिका से तेल खरीदने के लिए कहा और दोनों देशों के बीच मजबूत रिश्तों का हवाला दिया। उन्होंने आगे कहा, “यह जानबूझकर छोटी अवधि का उपाय है जो रूसी सरकार को ज्यादा फायदा नहीं देगा क्योंकि यह सिर्फ उन ट्रांजेक्शन को मंजूरी देता है जो समुद्र में फंसे तेल से जुड़े हैं। भारत अमेरिका का जरूरी पार्टनर है और हमें पूरा विश्वास है कि नई दिल्ली अमेरिकी तेल की खरीदारी बढ़ाएगी। यह स्टॉप-गैप उपाय ईरान द्वारा ग्लोबल एनर्जी को बंधक बनाने की कोशिश से होने वाले दबाव को कम करेगा।”

भारत के करीब 40 प्रतिशत तेल आयात खाड़ी क्षेत्र से आता है और उसका बड़ा हिस्सा होर्मुज स्ट्रेट से गुजरता है जो अभी ईरान के नियंत्रण में है। मोदी सरकार ने पहले ही घोषणा की थी कि देश एनर्जी सुरक्षा के मामले में बहुत आरामदायक स्थिति में है और हर दिन दो बार अपनी एनर्जी स्थिति का जायजा ले रहा है। स्टॉक की स्थिति भी अच्छी है और रोजाना भराई हो रही है। इसके अलावा भारत दूसरे स्रोतों से भी बात कर रहा है ताकि तेल का बहाव बिना रुके जारी रहे।

भारत सिर्फ अपने हितों को देखता है, अमेरिका को ‘अलाउ’ करने का कोई अधिकार नहीं

दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका का यह नया कदम कई असफल दबाव वाली रणनीतियों के बाद आया है, जिसमें अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ बढ़ाकर कुल 50 प्रतिशत करना और भारत को ‘यूक्रेन युद्ध को फंडिंग’ के नाम पर रूसी तेल छोड़ने के लिए मजबूर करना शामिल है। दूसरी ओर नई दिल्ली ने बार-बार जोर दिया कि उसके फैसले अपनी संप्रभुता और हितों पर आधारित हैं, इसलिए वो किसी चुनौती के सामने नहीं झुकने वाला।

मॉस्को से तेल की खरीद हर महीने विभिन्न कारणों से ऊपर-नीचे होती रही, लेकिन वो कभी ‘रुकी’ नहीं, भले ही वाशिंगटन कुछ भी कहे। असल में भारत रूसी विक्रेताओं से लगातार संपर्क में रहा ताकि होर्मुज स्ट्रेट बंद होने के बाद अपनी एनर्जी जरूरतें पूरी की जा सकें।

रीटर्स ने हाल ही में एक इन्फोग्राफिक शेयर किया जो बात साफ कर देता है। रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारत की रूसी तेल खरीद निश्चित रूप से बढ़ गई। लेकिन यह इसलिए नहीं क्योंकि भारत ‘युद्ध को फंडिंग’ देना चाहता था। भारत का उस युद्ध से कोई लेना-देना नहीं था। भारत ने रूसी तेल इसलिए खरीदा क्योंकि रूसी तेल सस्ता मिल रहा था। और देश की जरूरतें पूरी करने के लिए तेल खरीदना भारत सरकार के लिए NATO नेताओं और यूरोपीय मीडिया को खुश करने से ज्यादा अहम था।

फोटो साभार: रायटर्स

रीटर्स के ऊपर वाले इन्फोग्राफिक में साफ दिखता है कि अक्टूबर 2025 के बाद भारत की रूसी तेल खरीद थोड़ी कम हुई, लेकिन वो कभी ‘रुकी’ नहीं, जैसा अमेरिका दावा करना चाहता है।

इसलिए अमेरिका का यह खुद को बड़ा बताना सिर्फ खोखली श्रेष्ठता का एक और प्रयास है जबकि वो खुद को मेहरबान महाशक्ति दिखाने की कोशिश कर रहा है, जो हकीकत से बिल्कुल उलट है।

अमेरिकी छूट से पहले ही रूसी तेल के कार्गो भारत लौट आए

भारत ने ट्रंप प्रशासन की तथाकथित ‘इजाजत’ आने से पहले ही समुद्र में मौजूद रूसी टैंकरों से तेल लेना शुरू कर दिया था ताकि मिडिल ईस्ट से आने वाले कच्चे तेल की कमी पूरी हो सके, क्योंकि उस इलाके में तनाव बढ़ रहा है। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक पहले से सुरक्षित किए गए 1 करोड़ बैरल से ज्यादा तेल का बड़ा हिस्सा शायद अमेरिका के इस नए बयान से पहले ही लिया जा चुका था।

भारत सरकार के सूत्रों ने पहले ही कहा था कि फरवरी में रूस भारत का टॉप एनर्जी सप्लायर में से एक था। फरवरी में भारत ने 10.4 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल आयात किया।

ब्लूमबर्ग के शिप-ट्रैकिंग डेटा से पता चला कि अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में रूसी कच्चे तेल के लगभग 1.5 करोड़ बैरल टैंकरों पर हैं जबकि सिंगापुर के पास और 70 लाख बैरल हैं। एक हफ्ते के अंदर ये सब भारतीय बंदरगाहों पर पहुंच सकते हैं। इसके अलावा कुछ और सूज सागर और भूमध्य सागर से होते हुए उपमहाद्वीप की ओर बढ़ रहे हैं।

रूसी तेल वाले टैंकरों ने अपने रूट बदलकर भारतीय बंदरगाहों की ओर इशारा करना शुरू कर दिया था, इससे पहले कि व्हाइट हाउस से ‘हम इजाजत दे रहे हैं’ वाला नोटिस आया। केप्लर के मुताबिक कम से कम 18 जहाज जो उराल्स तेल ले जा रहे हैं, वे भारत की ओर बढ़ रहे हैं। कंपनी के एनालिस्ट सुमित रितोलिया ने कहा कि यह विकास “जल्द ही मात्रा को 20 लाख बैरल प्रतिदिन से ऊपर ले जा सकता है।”

एक सूत्र ने बताया कि सूजमैक्स टैंकर ओड्यून जो लगभग 10 लाख बैरल ले जा रहा था। रॉयटर्स ने रिपोर्ट किया कि 4 मार्च को पूर्वी पारादीप बंदरगाह पर राज्य रिफाइनर इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड को तेल देने के लिए दिखा।

इसके अलावा आईओसी को 7 मार्च यानी शनिवार को पश्चिम भारत के वडिनार बंदरगाह पर स्प्रिंग फॉर्च्यून से लगभग 7 लाख बैरल रूसी तेल मिलने की उम्मीद है। आईओसी के सूत्र ने बताया कि कंपनी रूस से खरीदारी तेज कर रही है जिसमें भारत के आसपास घूम रहे जहाजों पर रखे कंटेनर शामिल हैं।

मीडिया हाउस के एक अंदरूनी सूत्र ने कहा कि भारतीय जल क्षेत्र के पास लगभग 95 लाख बैरल रूसी कच्चा तेल तैर रहा है और कुछ हफ्तों में पहुंच सकता है। एक और भारतीय रिफाइनर ने भी इस तेल का इस्तेमाल करने में दिलचस्पी दिखाई है। रितोलिया ने कहा, “अगर मिडिल ईस्ट से आने वाला तेल कम हो जाता है तो भारतीय रिफाइनर जल्दी ही रूसी ग्रेड की ओर मुड़ सकते हैं।”

उन्होंने देखा कि सिंगापुर स्ट्रेट, अरब सागर क्षेत्र और हिंद महासागर में लगभग 3 करोड़ बैरल रूसी तेल जहाजों पर उपलब्ध है, जिसमें फ्लोटिंग स्टोरेज में रखा तेल भी शामिल है।

ब्लूमबर्ग की एक अलग रिपोर्ट के मुताबिक, केप्लर और वोर्टेक्सा के ट्रैकिंग विश्लेषण से पता चला कि दो टैंकर जो कुल 14 लाख बैरल उराल्स कच्चा तेल ले जा रहे हैं, वे इस हफ्ते भारतीय बंदरगाहों पर उतारने जा रहे हैं, पहले वे पूर्व की ओर जाने का संकेत दे रहे थे।

5 मार्च को मटारी नाम का आफ्रामैक्स टैंकर जो लगभग 7 लाख बैरल ले जा रहा था, वडिनार पहुँचने वाला था। अरब सागर में एक और सूजमैक्स इंड्री जो 730 हजार बैरल से ज्यादा उराल्स लेकर सिंगापुर जा रहा था, इस हफ्ते अचानक उत्तर की ओर भारत की तरफ मुड़ गया। पिछले साल ब्रिटेन और यूरोपीय संघ ने इन तीनों जहाजों पर प्रतिबंध लगा दिए थे।

भारत अपनी नीति खुद बनाता है, व्हाइट हाउस की ‘इजाजत’ से नहीं

ऊपर दिया डेटा साफ कर देता है कि भारत को समय देने का अमेरिका का दावा सिर्फ एक हताश कोशिश है जहाँ उसे क्रेडिट नहीं मिलना चाहिए। नई दिल्ली ने कभी इजाजत माँगी नहीं और न ही ऐसी किसी मेहरबानी की उम्मीद की थी क्योंकि वो चल रहे तनाव के बीच अपनी संप्रभु एनर्जी हितों का पीछा कर रही थी।

इसके अलावा इन आरोपों, जवाबों या रणनीतियों की बेकारता बार-बार साबित हो चुकी है क्योंकि ये मोदी सरकार के किसी फैसले को कभी प्रभावित नहीं करते। पिछले महीने केंद्र ने फिर दोहराया कि वो कच्चा तेल जहां सस्ता और अच्छी क्वालिटी का मिले वहां से आयात करता रहेगा।

भारतीय तेल कंपनियाँ गैर-प्रतिबंधित स्रोतों और भू-राजनीतिक माहौल को ध्यान में रखकर काम करेंगी। यह वाणिज्य और विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ प्रतिनिधियों ने कॉन्ग्रेस नेता और लोकसभा सांसद शशि थरूर की अध्यक्षता वाली संसदीय स्थायी समिति को बताया।

एक ऐसा ही किस्सा तब हुआ जब भारत ने अमेरिका के इस दावे का जवाब दिया कि वो रूस से तेल लेना ‘बंद’ करने पर सहमत हो गया। विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने 9 फरवरी को कहा, “हमारे लिए एनर्जी खरीद के फैसलों में राष्ट्रीय हित मार्गदर्शक सिद्धांत होंगे।” उन्होंने बताया कि पर्याप्त उपलब्धता, उचित कीमत और सप्लाई की विश्वसनीयता ही देश की खरीद नीति के पीछे मुख्य कारण हैं।

विदेश सचिव के अनुसार भारत की ‘सबसे बड़ी प्राथमिकता’ है अपने नागरिकों के हितों की रक्षा करना और सुनिश्चित करना कि उन्हें सही कीमत पर पर्याप्त ऊर्जा मिले, भरोसेमंद और सुरक्षित स्रोतों से।

उन्होंने कहा, “इसलिए हमारी आयात नीति एनर्जी के मामले में पूरी तरह इन्हीं उद्देश्यों से चलती है। हम किसी एक स्रोत पर निर्भर नहीं हैं और न ही रहना चाहते हैं। और स्रोतों का मिश्रण समय-समय पर बाजार की वास्तविक स्थितियों के आधार पर बदलता रहता है।”

उन्होंने आगे कहा, “हमारा तरीका है कई स्रोतों को बनाए रखना और जरूरत पड़ने पर उन्हें विविधता देना ताकि स्थिरता बनी रहे। इसलिए मैं कहूंगा कि इस क्षेत्र में जितना ज्यादा विविधता होगी, हम उतने ज्यादा सुरक्षित होंगे।” यह मजबूत जवाब तब आया जब ट्रंप ने दावा किया कि भारत रूसी तेल नहीं खरीदेगा और दोनों देशों के बीच व्यापार व्यवस्था के फ्रेमवर्क की घोषणा के दौरान 25 प्रतिशत टैरिफ घटा दिया।

जैसे ही संकेत मिला, भारत सरकार के सूत्रों ने फिर दोहराया कि रूसी कच्चा तेल भारत में आता रहेगा। भारत सरकार ने कहा, “आज हमारे पास होर्मुज स्ट्रेट में फंसे तेल से ज्यादा एनर्जी स्रोत हैं। हम कच्चे तेल, तेल उत्पादों और एलपीजी के मामले में आरामदायक स्थिति में हैं। हमारी मौजूदा स्टॉक स्थिति अच्छी है। हम दूसरे भौगोलिक क्षेत्रों से अपनी सप्लाई बढ़ाएंगे और होर्मुज स्ट्रेट से आने वाली कमी पूरी करेंगे।”

भारत सरकार ने कहा, “हम 2022 से रूस से कच्चा तेल खरीद रहे हैं। 2022 में हम रूस से कुल आयात का सिर्फ 0.2 प्रतिशत ले रहे थे। फरवरी में हमने कुल कच्चे तेल आयात का 20 प्रतिशत रूस से लिया। फरवरी में भारत ने रूस से 10.4 लाख बैरल प्रतिदिन आयात किया।”

ट्रंप को अपने MAGA समर्थकों को खुश करना है, भारत को नहीं

ट्रंप प्रशासन में बिना वजह खुद को बधाई देने या सराहने की अजीब आदत है, जिसकी वजह से भारत के लगातार जवाबों के बाद खुद को शर्मिंदगी झेलनी पड़ती है।

दूसरी ओर नई दिल्ली लगातार अपने हितों की रक्षा कर रही है और मोदी सरकार इन हरकतों से बिल्कुल प्रभावित नहीं होती। दोनों के बीच यह अब रूटीन बन गया है जहाँ वाशिंगटन कोई बेतुका आदेश या शिकायत लाता है और नई दिल्ली उसे अनदेखा कर देती है या विनम्रता से खारिज कर देती है।

इसी तरह मौजूदा व्हाइट हाउस प्रशासन ने ‘घमंडी दिखावा’ को अपनी आदत बना लिया है। चाहे ‘8 वैश्विक युद्ध रोकना’ हो या पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर प्रतिबंधों से नियंत्रण, ट्रंप के दावे और जमीन पर उनका असल असर अक्सर मेल नहीं खाता। बहुध्रुवीय दुनिया प्रतिबंधों और टैरिफ से रिमोट कंट्रोल नहीं होती।

एक संप्रभु देश की नीति संप्रभु हितों पर चलती है। प्रतिबंध या टैरिफ सिर्फ भू-राजनीतिक हिचकी हैं जिन्हें कभी-कभी ठीक करना और पार करना पड़ता है। चाहे कच्चा तेल हो, तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी), दुर्लभ पृथ्वी तत्व या कोई भी वस्तु, मौजूदा वैश्विक व्यवस्था सप्लाई चेन और लॉजिस्टिक्स का जटिल जाल है।

कोई एक देश इसे धमकाकर या नखरे करके नहीं नियंत्रित कर सकता। भारत दशकों से इस जटिल जाल में नेविगेट कर रहा है और आगे भी करता रहेगा। इसके अलावा ट्रंप प्रशासन के दावे सिर्फ अपने घरेलू MAGA समर्थकों को खुश करने के लिए हैं।

भारतीय सरकार ऐसा नहीं करती। रूस-यूक्रेन युद्ध, गाजा-इजराइल संघर्ष और पिछले कई सालों के कई परिदृश्यों में भारत का विदेश मंत्रालय ने अपनी बातचीत पूरी तरह आधिकारिक रखी है और अंतरराष्ट्रीय कानूनों तथा राष्ट्रीय प्राथमिकताओं का सम्मान किया है।

ट्रंप प्रशासन के उलट भारत का विदेश मंत्रालय (एमईए) अपनी प्राथमिकताओं को रेखांकित करने के लिए सोशल मीडिया का खेल नहीं खेलता। उन्हें पता है क्या करना है और कहाँ अपनी बात साबित करनी है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)