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ईरान में ‘आसमानी आफत’ 82nd एयरबोर्न की एंट्री, जानें- सबसे घातक ‘ऑल अमेरिकन’ फोर्स का इतिहास जो 18 घंटे में पलट देती है जंग का रुख

कल्पना कीजिए एक ऐसी रात की, जहाँ चारों तरफ सन्नाटा हो, लेकिन अचानक आसमान से हजारों सफेद छतरियाँ (पैराशूट) नीचे आने लगें। रडार को कानो-कान खबर न हो और देखते ही देखते दुश्मन के सबसे सुरक्षित किले, उसके हवाई अड्डे और उसके संचार केंद्र कब्जे में ले लिए जाएँ। यह किसी हॉलीवुड फिल्म का सीन नहीं, बल्कि अमेरिकी सेना की उस ‘घातक चाल’ का हिस्सा है जिसे दुनिया ’82nd एयरबोर्न डिवीजन’ के नाम से जानती है।

मिडिल ईस्ट में पिछले तीन हफ्तों से बारूद की गंध फैली हुई है। इजरायल और ईरान के बीच मिसाइलों का आदान-प्रदान अब एक बड़े जमीनी युद्ध की आहट दे रहा है। इसी बीच खबर आती है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी सबसे भरोसेमंद और ‘इमीडिएट रिस्पॉन्स फोर्स’ (IRF) को एक्टिव कर दिया है। पेंटागन के गलियारों से छनकर आ रही खबरें बता रही हैं कि करीब 3,000 जांबाज सैनिक किसी भी वक्त ईरान की सीमाओं के करीब लैंड कर सकते हैं।

यह वो सैनिक हैं जिन्हें न सड़क चाहिए, न बंदरगाह और न ही किसी देश की अनुमति। इन्हें बस एक आदेश चाहिए और अगले 18 घंटों के भीतर ये दुनिया के किसी भी कोने में जंग का रुख पलटने की ताकत रखते हैं। आखिर क्या है इस फोर्स का रहस्य? क्यों ईरान जैसा देश भी इस नाम से सतर्क हो जाता है? आइए, इस ‘आसमानी सेना’ के इतिहास, ताकत और भविष्य की रणनीति को विस्तार से समझते हैं।

82nd एयरबोर्न: वो ‘ऑल अमेरिकन’ योद्धा जो हवा से करते हैं वार

82nd एयरबोर्न डिवीजन अमेरिकी सेना की कोई सामान्य पैदल सेना नहीं है। इन्हें ‘All American’ (AA) कहा जाता है क्योंकि इसकी स्थापना के समय इसमें अमेरिका के हर राज्य के सैनिक शामिल थे। इनकी सबसे बड़ी ताकत इनकी गति और हमला करने का तरीका है। जहाँ सामान्य सेना को युद्ध के मैदान तक पहुँचने के लिए टैंकों, ट्रकों और जहाजों के बेड़े की जरूरत होती है, वहीं ये सैनिक आसमान से सीधे दुश्मन की छाती पर उतरते हैं।

पेंटागन ने इन्हें ‘इमीडिएट रिस्पॉन्स फोर्स’ का दर्जा दिया है। इसका सीधा मतलब यह है कि अगर आज रात व्हाइट हाउस से आदेश निकलता है, तो कल दोपहर तक ये सैनिक साजो-सामान के साथ ईरान के किसी भी रणनीतिक ठिकाने पर मौजूद होंगे। ये सी-17 ग्लोबमास्टर और सी-130 हरक्यूलिस जैसे विशाल विमानों से हजारों फीट की ऊंचाई से कूदते हैं। इनके पास हल्के लेकिन बेहद आधुनिक हथियार होते हैं जो इन्हें तेजी से मूव करने की आजादी देते हैं। इनका मुख्य काम होता है ‘शॉक एंड ऑ’ (Shock and Awe) यानी दुश्मन को हैरान और परेशान कर देना।

ये यूनिट आमतौर पर मुख्य सेना के आने से पहले रास्ता साफ करती है। इनका लक्ष्य होता है दुश्मन के एयरफील्ड्स पर कब्जा करना, ताकि बाद में अमेरिका के भारी टैंक और हजारों की संख्या में अन्य सैनिक वहाँ आसानी से लैंड कर सकें। इनके पैराट्रूपर्स रात के घने अंधेरे में भी जीपीएस और नाइट विजन की मदद से सटीक लैंडिंग करने में माहिर होते हैं, जो इन्हें दुनिया की सबसे प्रोफेशनल पैराशूट यूनिट बनाता है।

इतिहास के पन्नों में दर्ज खूनी दास्ताँ: जब हिटलर की सेना के छूटे थे पसीने

82nd एयरबोर्न का इतिहास वीरता और बलिदान की मिसालों से भरा पड़ा है। इस डिवीजन की असली पहचान द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बनी। 6 जून 1944, जिसे दुनिया ‘D-Day’ के नाम से जानती है, उस दिन जब मित्र देशों की सेनाएँ समुद्र के रास्ते फ्रांस के नॉर्मंडी तट पर उतरने वाली थीं, उससे ठीक 5 घंटे पहले 12,000 पैराट्रूपर्स ने दुश्मन की लाइनों के पीछे छलांग लगा दी थी।

उनका मकसद था हिटलर की नाजी सेना की सप्लाई लाइन काट देना और पुलों पर कब्जा करना। बिना किसी अतिरिक्त मदद के, इन जांबाजों ने 33 दिनों तक लगातार खूनी संघर्ष किया और यूरोप की आजादी की नींव रखी। इसके बाद 1991 के खाड़ी युद्ध में जब सद्दाम हुसैन ने कुवैत पर कब्जा किया, तब इसी डिवीजन ने ‘डेजर्ट शील्ड’ ऑपरेशन के तहत सबसे पहले सऊदी अरब पहुँचकर मोर्चा संभाला था।

2003 के इराक युद्ध में भी इनकी भूमिका निर्णायक रही। सिर्फ 100 घंटों की जमीनी लड़ाई में इन्होंने इराक के बड़े शहरों पर नियंत्रण कर लिया था। हालाँकि, इनका इतिहास सिर्फ जीत का ही नहीं रहा है। वियतनाम और हाल के वर्षों में अफगानिस्तान और इराक में अमेरिका की लंबी खिंचती जंग ने इस एलीट फोर्स की साख पर सवाल भी उठाए। आलोचकों का मानना है कि ये फोर्स हमला करने में तो माहिर है, लेकिन किसी देश पर लंबे समय तक नियंत्रण बनाए रखने के लिए इन्हें काफी संघर्ष करना पड़ता है।

मिडिल ईस्ट में तैनाती के मायने: ट्रंप की शांति नीति या युद्ध का नया अध्याय?

वर्तमान में मिडिल ईस्ट के हालात किसी जलते हुए ज्वालामुखी जैसे हैं। एक तरफ ट्रंप प्रशासन सार्वजनिक रूप से शांति और समझौतों की बात कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ 3,000 से 4,000 सैनिकों की यह तैनाती कुछ और ही इशारा कर रही है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, नॉर्थ कैरोलिना के फोर्ट ब्रैग से इन सैनिकों की रवानगी का मतलब है कि अमेरिका अब ‘वेट एंड वॉच’ की नीति से आगे निकल चुका है।

यह तैनाती केवल ईरान को डराने के लिए नहीं है, बल्कि यह इजरायल को एक सुरक्षा कवच देने की कोशिश भी है। अगर ईरान या उसके समर्थित गुट (जैसे हिजबुल्लाह या हूती) इजरायल पर कोई बड़ा जमीनी हमला करते हैं, तो 82nd एयरबोर्न वो पहली दीवार होगी जिसे उन्हें पार करना होगा। इसके अलावा, हाल ही में यूएसएस बॉक्सर और मरीन एक्सपीडिशनरी यूनिट की तैनाती ने यह साफ कर दिया है कि अमेरिका ‘जल, थल और नभ’ तीनों मोर्चों पर ईरान को घेरने की तैयारी कर चुका है।

ईरान भी इस खतरे से अनजान नहीं है। पिछले 20 सालों से ईरान ने अपनी सेना को इसी तरह के ‘एसिमेट्रिक वॉरफेयर’ (Asymmetric Warfare) के लिए तैयार किया है। ईरान के पास दुनिया का सबसे बड़ा मिसाइल प्रोग्राम और ड्रोन नेटवर्क है। अगर 82nd एयरबोर्न के सैनिक जमीन पर उतरते हैं, तो उन्हें ईरान की ‘रिवोल्यूशनरी गार्ड्स’ (IRGC) से कड़ी टक्कर मिल सकती है, जो गुरिल्ला युद्ध में माहिर माने जाते हैं।

काबुल से तेहरान तक: क्या दोहराया जाएगा इतिहास?

अगस्त 2021 का वो मंजर पूरी दुनिया को याद है, जब अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना वापस जा रही थी और काबुल एयरपोर्ट पर हजारों लोगों की भीड़ अपनी जान बचाने के लिए भाग रही थी। उस अफरातफरी के माहौल में हामिद करजई इंटरनेशनल एयरपोर्ट को सुरक्षित रखने और रेस्क्यू ऑपरेशन को सफलतापूर्वक पूरा करने का जिम्मा इसी 82nd एयरबोर्न डिवीजन के पास था। उन्होंने सबसे कठिन परिस्थितियों में वहाँ से हजारों लोगों को निकाला।

लेकिन आज चुनौती अलग है। अफगानिस्तान में वे जा रहे थे, लेकिन ईरान में उन्हें शायद ‘घुसना’ पड़े। 82वीं एयरबोर्न की सबसे बड़ी परीक्षा उनकी ‘क्विक रिएक्शन’ क्षमता की होगी। क्या वे ईरान के एयर डिफेंस सिस्टम को चकमा देकर लैंड कर पाएँगे? क्या वे बिना भारी नुकसान के अपने लक्ष्यों को हासिल कर पाएँगे? ये वो सवाल हैं जिनका जवाब पेंटागन के पास भी शायद पूरी तरह नहीं है।

पेंटागन के अधिकारियों का कहना है कि हर सैनिक को विशेष ट्रेनिंग दी गई है ताकि वे शहरी इलाकों से लेकर रेगिस्तान तक, हर जगह लड़ सकें। उनके पास अब पहले से कहीं अधिक एडवांस्ड ड्रोन, प्रिसीजन गाइडेड हथियार और जैमिंग डिवाइसेस हैं। यह तकनीक उन्हें दुश्मन के रडार से बचने और सीधे उनके कमांड सेंटर पर वार करने की शक्ति देती है।

क्या यह तीसरे विश्व युद्ध की दस्तक है?

डोनाल्ड ट्रंप की सैन्य रणनीति हमेशा से अनिश्चित रही है। एक तरफ वे अमेरिकी सैनिकों को ‘अंतहीन युद्धों’ से वापस लाने का वादा करते हैं, वहीं दूसरी तरफ इस तरह की आक्रामक तैनाती उनके ‘अमेरिका फर्स्ट’ और ‘स्ट्रेंथ थ्रू पीस’ (शक्ति के जरिए शांति) के नारे को पुख्ता करती है। 82nd एयरबोर्न का मैदान में उतरना इस बात का संकेत है कि अगर बातचीत विफल हुई, तो अमेरिका अपनी पूरी सैन्य ताकत का इस्तेमाल करने से पीछे नहीं हटेगा।

अगर ये 3,000 सैनिक मिडिल ईस्ट की धरती पर कदम रखते हैं, तो यह जंग केवल दो देशों के बीच नहीं रह जाएगी। यह दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति और एक क्षेत्रीय शक्ति के बीच के वजूद की लड़ाई बन जाएगी। दुनिया की नजरें अब उन 18 घंटों पर टिकी हैं, जो किसी भी वक्त आदेश मिलते ही शुरू हो सकते हैं।

बिहार के रोहतास में हिंदू महिला के साथ लव जिहाद, अली असगर ने गोमांस खिलाने की कोशिश में तोड़े दाँत: कहा- जो मजा हिंदू लड़की में, वो मुस्लिम में कहाँ Ground Report

‘जो मजा हिंदू की लड़की में है वो मुस्लिम की लड़की में कहाँ?’ ये शब्द थे अली असगर अंसारी के, जिसने बिहार के रोहतास में हिंदू महिला के साथ लव जिहाद किया। पीड़िता ने कहा, “केरल फाइल्स में जो हुआ, वो मेरे साथ नहीं हुआ, बल्कि वो मेरी ही कहानी है, मुझ पर ही लिखी गई है।” उसने कहा कि उसे जबरन गोमांस खिलाने की कोशिश हुई, कितनी बार रेप किया गया, बच्चों के घर में रहने के दौरान किचन में उसके साथ रेप किया गया। पुलिस के आने की खबर मिलते आरोपित अंडरवियर में ही भाग निकला।

पीड़िता ने बताया कि अली असगर ने खुद को पड्डू सरदार बताकर, कलावा और रुद्राक्ष पहनकर घर में आना-जाना शुरू किया। जब सामने आया कि वह हिंदू नहीं मुस्लिम है तो बीवी की बुराई करते हुए पीड़िता से साथ रहने कहा, इतनी धमकियाँ दी कि वो पीड़िता के पति के सामने घर आता तो उसका पति बाहर चला जाता और उसके जाने के बाद वो पीड़िता के साथ सोने के लिए जाता।

आरोपित अली असगर अंसारी

ऑपइंडिया की रिपोर्टर से बात करते हुए पीड़िता ने कहा कि 2022 की बात है, वह बिहार के देहरी में इन्वर्टर की बैटरी खरीदने गई थी। वहाँ अली असगर ने पीड़िता और उसके पिता का नाम पूछा, नाम बताने पर कहने लगा वह उसके पिता को जानता है। उसने कहा कि नंबर दे दीजिए, बैटरी घर पहुँचा दी जाएगी। बैटरी चेक करने के बहाने वो घर आया।

पीड़िता से उसके पति का भी नंबर ले लिया, पति से भी बात करने लगा और जल्दी ही सबसे घुल मिल गया, घर आने-जाने लगा। अपने लड़के की दोस्ती पीड़िता के लड़के से करा दी। दोनों साथ घूमने लगे। एक दिन वो सुबह-सुबह घर आया और बच्चों से पूछा कि मम्मी कहाँ है तो बच्चों ने बताया कि मम्मी को टायफाइड है, वो आराम कर रही हैं।

इतना सुनते ही वो सीधा कमरे में आ गया और कहा, “हम बनारस जा रहे हैं, आप भी चलिए, आपको दिखा आते हैं।” पीड़िता ने कहा कि उसका पति घर में नहीं है इसलिए वो नहीं जा सकती। पीड़िता के बच्चों ने उससे कहा कि मम्मी अंकल तो अच्छे हैं, आप जाओ डॉक्टर को दिखा आओ।

होटल में की दरिंदगी, वीडियो के सहारे बनाने लगा संबंध

पीड़िता ने कहा, “हम बनारस आए। हम थक गए थे। उसने कहा जूस लेकर आते हैं। और वह जूस लेने चला गया। उसने एक दवा दी और कहा कि दवा खा लो, बुखार की है, आराम हो जाएगा और मैंने जूस पी लिया, दवा खा ली। मुझे पाँच मिनट के बाद पसीना आने लगा। उल्टी आने लगी, मन अजीब होने लगा। हम रोने लगे तो बोला पास में होटल है, वहीं चल कर आप आराम कर लीजिए।”

पीड़िता ने कहा, “होटल के काउंटर तक गए हैं, हमको उतना ही याद है, आगे का कुछ याद नहीं है। हम ऊपर के रुम में गए या नीचे ही किसी रुम में थे, हमको कुछ याद नहीं। शाम को होश आया तो उसने कहा, चलिए शाम हो गया है, घर चलते हैं। वहाँ से आने के बाद हमको चक्कर आता था, कमजोरी महसूस होता था, हम सोचे तबियत खराब है इसलिए ऐसा हो रहा है।”

वो पहले की ही तरह घर आता रहा। उसी बीच पीड़िता के पति ने बाईक लेने की सोची तो अली असगर ने अपने नाम पर लेने की बात करने लगा, उसने गाड़ी देने वाले से भी बात कर ली थी। गाड़ी भी घर आ गई। इन सब के 15 दिन बाद आरोपित घर आया और कहने लगा, “मैं आपसे बहुत प्यार करता हूँ।”

पीड़िता ने कहा, “इतना सुनते ही मेरे होश उड़ गए। उसने कहा, जब से आपको दुकान पे देखे थे, तभी से आप बहुत अच्छी लगती थी। आपके बिना जी नहीं सकते, मर जाएँगे। कहने लगा, मेरी बीवी बहुत खराब है। मेरे भाई के साथ उसका अफेयर चलता है। मेरा कोई शौक पूरा नहीं करती है। मैंने कहा मियाँ बीवी का बात है, आप लोग आपस में समझ लीजिए। फिर उसने मुझे होटल में बनाई मेरी वीडियो दिखाई, इतना गंदा वीडियो दिखाया, कि मेरे होश उड़ गए। मैं उसके पैर पकड़कर रोने लगी।”

पीड़िता से उसने कहा, “आपका दिल दुखाने के लिए वीडियो नहीं बनाए थे। ऐसे तो आप हमसे प्यार करती नहीं, ये आपको दिखाने के लिए था, आप ऐसे ही हमसे प्यार करिए।” इतना कहकर उसने पीड़िता की माँग में सिंदूर डाल दिया। लेकिन जब पीड़िता ने इस रिश्ते को मानने से इंकार किया तो परिवार को जान से मारने की धमकी देने लगा। इसके बाद वो जैसे कहने लगा, पीड़िता वैसा करने लगी।

अली असगर ने पीड़ित महिला से कहा- जो मजा हिंदू की लड़की में है वो मुस्लिम में कहाँ?

आरोपित घर आने लगा, उसके पति के साथ मारपीट कर, धमकी देकर उसे भी ऐसा डराया कि वो उसके आने के बाद घर से बाहर चला जाता था। एक दिन पीड़ित महिला ने उसका आधार कार्ड देख लिया और चौंक गई। उसने कहा कि वह मुस्लिम है फिर उसके घर में टीका लगाकर, कलावा और रुद्राक्ष पहनकर क्यों आता रहा।

पीड़िता ने कहा, “आप हिंदू बनकर क्यों आते रहे, उसने कहा इससे क्या होता है। जो मजा हिंदू की लड़की में है वो मुस्लिम की लड़की में कहाँ। मैंने बोला ये बहुत गलत चीज है। जब मैं बगावत करने लगी तो उसने मेरे साथ मारपीट भी शुरू कर दी। उसने कहा कि मेरे परिवार से मिल लो, मैंने सोचा इसके परिवार से मिल लेते हैं बीवी से भी मिल लेंगे, समझाएँगे तो शायद ये साइड हो जाएगा। लेकिन जाते समय देहरी में एक पुल है, जहाँ गाड़ी रोक दी गई, वहाँ इसके भाई जिसका नाम लड्डू था, वो और उसके चाचा का लड़का था।”

पीड़िता ने आगे कहा, “ उन लोगों ने मुझे पकड़ लिया, मैंने कहा छोड़िए हमको, तब तक उन लोगों ने गाय का मांस निकाला और कहा कि इसे खालो, मेरी जाति में आ जाओ, मैंने उनके हाथ पर दाँत काटकर उन्हें हटाया और गौमांस नीचे गिर गया। इन लोगों ने इसके बाद उनलोगों ने मेरा दाँत तोड़ा और मुझे जबरन जहर पिला दिया। कहा मेरी नहीं होगी तो किसी की भी नहीं होगी।”

पीड़िता को छोड़कर वे भाग गए, जहाँ से कुछ लोगों ने ले जाकर पीड़िता को अस्पताल में भर्ती कराया। वहाँ भी ये लोग पहुँच गए। डॉक्टर को भी आरोपितों ने पैसे दे दिए और ICU के अंदर आकर भी धमकी दी। ठीक हो कर महिला घर आई तो बच्चों के सामने धमकी देकर गया। बच्चे भी डरने लगे।

एक दिन फिर उसने पीड़िता को दिल्ली के एक होटल में ले जाकर खाने में नशे की दवा मिलाकर खिला दी और अगले दिन उसकी आपत्तिजनक वीडियो दिखाकर हँसने लगा। पीड़िता ने कहा, “इतना गंदा वीडियो था, मैं पड़ी हुई हूँ और वो मेरे साथ सेक्स कर रहा है।”

पीड़िता ने कहा, “वह मुझे एक मुस्लिम के साथ मस्जिद ले गया, वहाँ बैठाकर पता नहीं क्या-क्या करवाया। करवाने के बाद उसने कहा तुमसे निकाह कर लिए हैं। इसके बाद मैं अपने घर आई। घर आने के बाद मैं अपने पति के साथ दिल्ली गई, वहाँ से आई तो उसने मुझे बहुत मारा, सिगरेट से मेरा सीना जला दिया। मैंने रोते हुए अपनी एक सहेली को फोन किया। उसको घर बुलाकर सब बताया, उसने कहा कि तुम अपने बच्चों को कहीं भेज दो और थाने में जाकर केस करो, मैं थाने गई, FIR  कराया 76 धारा लगा।”

पीड़िता द्वारा उपलब्ध कराई गई पहली बार दर्ज हुई FIR की कॉपी

उसने कहा कि उसने गिरफ्तारी से पहले ही अपना बेल भी करवा लिया। पीड़िता का कहना है कि उसने जज को पैसे दिए और गिरफ्तारी रुक गई। पीड़िता ने कहा कि उसका धमकाने और घर आने-जाने का सिलसिला चलता रहा और 2024 में एक दिन वह मास्क पहने 3 अन्य लोगों के साथ उसके घर आया। बंदूक और चाकू के दम पर उनलोगों ने पीड़ित महिला से चार लाख रुपए, चार-पाँच लाख रुपए के गहने भी ले लिए।

आरोपित ने बाकियों से गहने भेजवा दिए और खुद रुक गया। उसने पीड़ित महिला के बच्चों के सामने किचन में उससे रेप किया। महिला डिप्रेशन की दवा खा ली, बच्चे हॉस्पिटल के चक्कर काटने लगे। सासराम के सरकारी अस्पताल में पीड़िता ने पुलिस को अपना बयान दिया।

उसने पैसे के बल पर खुद को हर जगह बचाए रखा और अस्पताल से पीड़िता को अपने साथ उसके घर ले आया। उसने धमकी दी कि वह उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। उसने कहा कि देहरी में थाने में उसकी बहुत चलती है।

उसकी आपत्तिजनक वीडियो से वह उसे ब्लैकमेल करता रहा। इतना ही नहीं उसने अपने किसी दोस्त से भी उसे ब्लैकमेल करवाया। उसकी भी शिकायत पीड़ित महिला ने दर्ज करवाई। उसके दुकान का मैनजर भी महिला के साथ बद्तमीजी करता था।

बच्चों के सामने किचन में किया रेप, पुलिस के आने की बात सुन अंडरवियर में भागा अली असगर

28 फरवरी 2026 को उसने घर के बाहर आकर फोन किया और कहा कि दरवाजा खोलो। महिला ने कहा वह किराए के घर में रहती है, तमाशे के डर से उसने दरवाजा खोल दिया। वह एक और आदमी के साथ कट्टा लेकर आता है। कहता है खाना बनाओ। महिला कहती है घर में कुछ नहीं है।

इसके बाद उसने मारपीट शुरू कर दी, महिला को किचन में ही पटककर उसने बच्चों के सामने रेप किया। जब कट्टा लेकर बैठा दूसरा आदमी वहाँ से भाग गया, तब महिला के बेटे ने ताले से आरोपित के सिर पर मारा और महिला ने उसके आँख में मिर्च पाउडर डाल दिया।

महिला की बेटी ने पुलिस को फोन कर दिया तो उसने धमकी दी कि वह उसकी बेटी को भी बेच देगा। इसके बाद पुलिस के आने के डर से वह अंडरवियर में ही भाग गया। पुलिस ने पीड़िता के घर से उसके कपड़े और फोन भी बरामद किए और उसे थाने बुलाया गया। पीड़िता का आरोप है कि उसे रातभर थाने में बैठाया गया। SP के कहने के बाद रिपोर्ट लिखी गई।

पीड़िता द्वारा उपलब्ध कराई गई FIR कॉपी

पीड़ित महिला के अनुसार, अब तक आरोपित के खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया गया है। वह पूरी तरह से थक चुकी है, जिंदगी से हार चुकी है और आरोपित अब भी आजाद घूम रहा है। पीड़िता का कहना है कि वो सलाखों के पीछे होता तो शायद वह इतनी बार रेप का शिकार ना हुई होती।

पीड़िता का आरोप है कि पुलिस और प्रशासन आरोपित अली असगर अंसारी को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। महिला के पास वीडियो और फोटो के रूप में पुख्ता सबूत होने के बावजूद आरोपित खुलेआम घूम रहा है। महिला ने गुहार लगाई है कि उसे इंसाफ दिया जाए ताकि कोई और हिंदू बेटी या महिला इस तरह के ‘लव जिहाद’ के जाल में न फँसे।

(पीड़िता से बात करने के बाद हमने संबंधित थाने से संपर्क करने की कोशिश की, हालाँकि थाने में बात नहीं हो सकी। अगर हमारी बात होती है, तो खबर को अपडेट कर दिया जाएगा।)

AI तस्वीरों के जरिए सपा-कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम ने फैलाई अफवाह, ग्रामीण पेट्रोल पंपों पर दिखने लगा असर: समझें आम लोगों को डरा क्या पाना चाहते हैं अखिलेश यादव

उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में इन दिनों पेट्रोल पंपों पर लंबी-लंबी लाइनें लग रही हैं। लोग घंटों खड़े होकर तेल भरवा रहे हैं। रसोई गैस के सिलेंडर के लिए भी एजेंसियों पर भीड़ उमड़ रही है। लेकिन क्या ये असली किल्लत है? या फिर एक सोची-समझी साजिश?

तथ्य बता रहे हैं कि ये पैनिक समाजवादी पार्टी के समर्थकों ने फैलाया है। नेहा सिंह राठौर और सूर्य समाजवादी जैसे चेले AI जनरेटेड फोटो और वीडियो शेयर कर अफवाहें उड़ाईं। इसके बाद अखिलेश यादव ने इसे राजनीतिक हथियार बना लिया। कॉन्ग्रेस और वामपंथी इकोसिस्टम ने भी इसे बढ़ावा दिया। जबकि योगी आदित्यनाथ सरकार और तेल कंपनियाँ साफ कह रही हैं न पेट्रोल की कमी है, न डीजल की, न गैस की। पर्याप्त स्टॉक है, पैनिक मत फैलाओ, फिर भी ये आम लोगों को भड़काने से बाज नहीं आ रहे।

कैसे फैलाया गया पैनिक, समझें इकोसिस्टम का पूरा खेल

इस खेल के मोहरों में से एक है नेहा सिंह राठौर। खुद को लोकगायिका बताने वाली इस इकोसिस्टम की प्यादी ने बुधवार (25 मार्च 2026) को एक फोटो पोस्ट की। फोटो में पेट्रोल पंप पर लंबी लाइन दिख रही थी। इसका कैप्शन था, “सिलेंडर मिल गया तो पेट्रोल पंप की लाइन में लग जाओ लेकिन एपिस्टीन फाइल्स का नाम मत लो। असली मुद्दा एपिस्टीन फ़ाइल्स है बाक़ी सब उसे दबाने की साज़िश है।”

ध्यान से देखने पर ये फोटो AI जनरेटेड पाई गई। उसी के ट्वीट के जवाब में Gemini का वॉटरमार्क दिखाने लिखे। इसके बावजूद वो सुधरी नहीं।

नेहा सिंह राठौर ने अगले ही दिन यानी गुरुवार (26 मार्च 2026) को फिर से दूसरी AI फोटो पोस्ट की। उसने लिखा, “गैस और तेल के चक्कर में एपिस्टीन फाइल्स भूल गए न! यही तो है उनका मास्टरस्ट्रोक!” असल में ये Epstein files वाली साजिश वाली थ्योरी से जोड़कर पैनिक फैलाने की कोशिश थी।

इससे पहले 15 मार्च को भी नेहा ने एक वीडियो शेयर किया था। गैस एजेंसी पर लाइन दिखाते हुए लिखा, “ये रही ज़मीनी सच्चाई… रसोई गैस की क़िल्लत से लोग परेशान हैं।” लेकिन वीडियो में खुद महिला कह रही थी कि कुछ लोग ज्यादा सिलेंडर जमा कर रहे हैं, किल्लत नहीं है। नेहा ने आधा सच दिखाकर पूरा झूठ फैलाया।

सूर्या समाजवादी नाम के एक्स हैंडल से भी ऐसी ही अफवाहें लगातार फैलाई गई। उसने बुधवार (25 मार्च 2026) को अयोध्या का वीडियो होने का दावा करते हुए एक वीडियो शेयर किया और लिखा कि पेट्रोल पंपों पर भारी भीड़ उमड़ रही है। उसने कैप्शन में लिखा, “बीजेपी ने पूरे देश को लाइन में लगा दिया।”

सोशल मीडिया पर भी इसी तरह के ट्रेंड चलाने की कोशिश की गई। जल्दी ही यूपी के गाँव-गाँव में अफवाह फैल गई। सिद्धार्थनगर में पेट्रोल पंप पर लाइन लगी, वहाँ मारपीट भी हुई। ये वीडियो सपा के पीडीए पर आधारित एक्स हैंडल के माध्यम से फैलाया जा रहा है।

ऐसे ही वीडियो लखनऊ व अन्य जगहों के नाम पर भी वायरल किए जा रहे हैं। फोटो और वीडियो में बताया जा रहा है कि लखनऊ के पेट्रोल पंपों पर भारी भीड़ जमा है और लोग सुबह से ही लाइनों में खड़े हैं।

अखिलेश यादव भी पैनिक फैलाने में शामिल, साफ दिख रही राजनीतिक अकांक्षा

एलपीजी के बाद अब पेट्रोल-डीजल की कमी के नाम पर अफवाह फैलाने वालों में खुद सपा मुखिया अखिलेश यादव भी शामिल हो चुके हैं। अखिलेश यादव ने गुरुवार (26 मार्च 2026) को एक वीडियो शेयर किया और लिखा, “भाजपा राज में लाइन के सिवा जनता को मिला क्या?”

हालाँकि कुछ लोग ऐसे भी दिखे, तो इस पूरी साजिश की पोल खोलते नजर आए। मुजी सिंह राँगी नाम के एक्स हैंडल ने दावा किया कि एआई जेनरेटेड फोटो और वीडियो से ग्रामीण इलाकों में पैनिक फैलाने की कोशिश हो रही है। उन्होंने एक सैंपल भी पोस्ट किया।

सख्त हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ

इस पूरे मामले पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सख्त और साफ-साफ बयान दिया है। उन्होंने कहा कि कुछ लोग जानबूझकर अफवाहें फैलाकर माहौल खराब करने की कोशिश कर रहे हैं। आमजन को सतर्क रहना चाहिए और जरूरत पड़ने पर ही पेट्रोल-डीजल खरीदना चाहिए। अनावश्यक खरीदारी से बचें। सीएम योगी ने स्पष्ट किया कि अगर ईरान-इजराइल युद्ध लंबा खिंचता है तो इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा। ऐसे में हमें मानसिक रूप से तैयार रहना होगा और अफवाहों से पूरी तरह दूर रहना होगा।

मुख्यमंत्री ने रसोई गैस को लेकर भी महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने बताया कि पहले एक सिलेंडर पूरे महीने चलता था, लेकिन अब लोग कुछ ही दिनों में नया सिलिंडर लेने पहुँच रहे हैं, जो बिल्कुल उचित नहीं है। उन्होंने घर-घर गैस की होम डिलीवरी की सुविधा अपनाने की सलाह दी ताकि लोगों को लंबी लाइनों में खड़े होने की जरूरत न पड़े। योगी आदित्यनाथ ने कहा कि देश के हित में सरकार ने जो भी कदम उठाया है, उसके लिए हमें खुद को तैयार करना चाहिए।

बता दें कि सरकार और तेल कंपनियाँ लगातार पर्याप्त स्टॉक की बात कर रही हैं, फिर भी समाजवादी पार्टी, कॉन्ग्रेस और वामपंथी इकोसिस्टम की साजिश जारी है। AI इमेज, पुरानी वीडियो और Epstein files वाली बेतुकी थ्योरी से पैनिक फैलाकर योगी सरकार को बदनाम करने का खेल चल रहा है। लेकिन जनता अब जागरूक हो चुकी है। अफवाहों पर भरोसा नहीं कर रही।

गौरतलब है कि एलपीजी सिलेंडर को लेकर फैले पैनिक के बीच यूपी सरकार ने सख्त कदम उठाए थे। इस दौरान कालाबाजारी और जमाखोरी करने वाले कई लोगों में कार्रवाई हुई थी, जिसमें हापुड़ से लेकर लखनऊ तक समाजवादी पार्टी के नेता शामिल पाए गए। यूपी सरकार ने उन्हें जेल भी भेजा। सबकुछ जनता के सामने होते हुए भी समाजवादी पार्टी और उसके आईटी से जुड़े लोग अब भी जनता को भ्रमित कर रहे हैं, ताकि राज्य में अव्यवस्था फैले और लोग पैनिक के चक्कर में बवाल करने सड़कों पर उतर आए। फिलहाल तो सपा मुखिया के भी ट्वीट्स से यही सामने आ रहा है।

पाकिस्तान में सिखों की पगड़ी उछलने पर सिल लेते हैं मुँह, ‘धुरंधर-2’ की कामयाबी से पेट में उठ रहीं मरोड़: जानें कैसे AI से ईशनिंदा का प्रोपेगेंडा फैला रहा वामपंथी गिरोह

फिल्म ‘धुरंधर-2: द रिवेंज’ ने पर्दे पर आते ही कमाई के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं और ₹1000 करोड़ का जादुई आँकड़ा पार कर लिया है। एक तरफ दुनिया भर के लोग इस फिल्म को सिर आँखों पर बैठा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ वामपंथी और कट्टरपंथी लोग इस कामयाबी को हजम नहीं कर पा रहे हैं। इस फिल्म को नीचा दिखाने और बदनाम करने के लिए अब गंदी चालें चली जा रही हैं।

फिल्म के खिलाफ माहौल बनाने के लिए AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) का सहारा लेकर झूठे वीडियो और फोटो फैलाए जा रहे हैं। साजिश यह है कि किसी तरह सिखों की धार्मिक भावनाओं को भड़काया जाए और भाईचारे में जहर घोला जाए। यह सिर्फ एक फिल्म का विरोध नहीं है, बल्कि सच्चाई को दबाने की एक बड़ी कोशिश है, ताकि लोग फिल्म के जरिए दिखाए गए असल मुद्दों से भटक जाएँ। वहीं, असल में जो जुल्म और हमले सिखों पर होते है उन पर चुप्पी साध लेते है और उन खबरों को दबा दिया जाता है।

‘फेक’ सिगरेट वाली तस्वीर और ईशनिंदा के नाम पर उत्पीड़न

फिल्म में रणवीर सिंह ने ‘हमजा’ उर्फ ‘जसकिरत सिंह’ का किरदार निभाया है। हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो और तस्वीरें वायरल हुईं, जिसमें रणवीर सिंह को पगड़ी पहने हुए सिगरेट पीते दिखाया गया है। हालाँकि, फिल्म के डायरेक्टर आदित्य धर ने तुरंत मोर्चा संभालते हुए स्पष्ट किया कि यह पूरी तरह से AI द्वारा निर्मित फेक कंटेंट है।

आदित्य धर ने चेतावनी देते हुए कहा, “एक झूठी तस्वीर में गलत तरीके से दिखाया गया है कि जसकिरत पगड़ी पहनकर सिगरेट पी रहा है। यह हमारे फिल्म या किसी आधिकारिक प्रचार सामग्री का हिस्सा नहीं है। यह जानबूझकर बनाया गया झूठ है, जिसे फसाद फैलाने के लिए फैलाया जा रहा है।”

आदित्य धर ने साफ किया कि फिल्म में सिख समुदाय का सर्वोच्च सम्मान किया गया है और प्रोपेगेंडा फैलाने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

फिल्म ‘धुरंधर-2’ ने उस सच पर से पर्दा उठाया है जिस पर अक्सर वामपंथी और कट्टरपंथी चुप्पी साधे रहते हैं। फिल्म के एक सीन में दिखाया गया है कि कैसे एक सिख व्यक्ति पर कुरान जलाने का झूठा आरोप लगाकर उसे ‘ईशनिंदा’ (Blasphemy) के जाल में फँसा दिया जाता है। यह कोई फिल्मी कल्पना नहीं, बल्कि पाकिस्तान की कड़वी सच्चाई है। पाकिस्तान में ईशनिंदा कानूनों का इस्तेमाल अक्सर हिंदू और सिख अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने, उनकी जमीनें हड़पने या उन्हें मौत के घाट उतारने के लिए किया जाता है।

पगड़ी उछालना और जबरन धर्मांतरण: गायब है ‘लिबरल’ गिरोह

फिल्म ‘धुरंधर’ को बदनाम करने के वाले यह तत्व पाकिस्तान में सिखों पर हो रहे असली जुल्मों पर एक शब्द नहीं बोलते हैं। पाकिस्तान के फैसलाबाद में एक सिख छात्रा के साथ स्कूल में मारपीट की गई और उसकी पगड़ी जबरन उतार दी गई। छात्रा को पेट में लात मारी गई, जबकि वह अस्थमा की मरीज थी।

इसी तरह, खैबर पख्तूनख्वा और नानकाना साहिब में सिख लड़कियों और महिलाओं का अपहरण कर जबरन इस्लाम में धर्मांतरण कराना एक धंधा बन गया है। आँकड़े बताते हैं कि बँटवारे के वक्त पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की आबादी 14-15 प्रतिशत थी, जो आज घटकर महज 2-3 प्रतिशत रह गई है।

हर साल लगभग 1000 हिंदू, सिख और ईसाई लड़कियों का अपहरण कर जबरन निकाह कराया जाता है। अमेरिका तक ने पाकिस्तान को ‘विशेष चिंता वाला देश’ घोषित किया है, लेकिन ‘धुरंधर’ फिल्म को बदनाम करने वाले लोग इन असली ‘नरसंहारों’ पर मौन साधे रहते हैं।

FAKE न्यूज के पीछे का असली एजेंडा

‘धुरंधर-2’ जैसी फिल्में जब सच को बड़े पर्दे पर लाती हैं, तो फेक क्लिप और फेक न्यूज का बाजार गर्म होना तय है। जो लोग फिल्म में एक काल्पनिक सीन को ‘मजहबी अपमान’ बताने के लिए फेक AI वीडियो बना रहे हैं, क्या उनके पास उन सिख लड़कियों के आंसू पोंछने के लिए वक्त है जिनकी पगड़ी पाकिस्तान के फैसलाबाद में उछाली जा रही है?

वामपंथी और कट्टरपंथी संगठनों का यह गठबंधन असल में ‘विचारधारा’ की लड़ाई नहीं, बल्कि ‘सच को दबाने’ की साजिश है। उन्हें रणवीर सिंह के पगड़ी पहनने से दिक्कत नहीं है, उन्हें दिक्कत इस बात से है कि फिल्म ने पाकिस्तान के उस खौफनाक चेहरे को बेनकाब कर दिया है, जिसे वे सालों से ‘भाईचारे’ की चादर में लपेटकर छिपाते आए हैं।

सिखों की धार्मिक भावनाओं का इस्तेमाल कर फिल्म को बैन कराने की कोशिश करना इन कट्टरपंथियों का नया हथियार है। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि सिख धर्म और उसके प्रतीकों का सम्मान जितना भारतीय सिनेमा और समाज करता है, उतना पाकिस्तान जैसे मुल्कों में कभी नहीं हुआ। फिल्म ‘धुरंधर-2’ ने केवल मनोरंजन नहीं किया, बल्कि उन हजारों मूक चीखों को आवाज दी है जिन्हें पाकिस्तान की बंद कोठरियों में जबरन धर्मांतरण और ईशनिंदा के नाम पर दबा दिया गया।

हमें समझना होगा कि जब भी कोई फिल्म ‘असुविधाजनक सच’ दिखाएगी, तो उसे बदनाम करने के लिए ‘फेक नैरेटिव’ का सहारा लिया जाएगा। दर्शक अब जागरूक हैं, वे जानते हैं कि असली अपमान पगड़ी पहनने वाले किरदार का नहीं, बल्कि उन लोगों का है जो सिखों के अधिकारों पर पाकिस्तान में खामोश रहकर भारत में हिंसा भड़काने की साजिश रचते हैं।

सुहेल ने कलावा बाँध छिपाई पहचान, ईरम ने ‘महक’ नाम रखकर किया आकाओं के लिए काम: समझिए भारत में ISI कैसे खेल रहा जासूसी वाला खेल, वामपंथी सिर्फ हिंदुओं को बदनाम करने में जुटे

गाजियाबाद से सामने आया जासूसी नेटवर्क सिर्फ सुरक्षा एजेंसियों की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि उस नैरेटिव पर भी सीधा निशाना है जो एक खास दिशा में गढ़ा जाता रहा है। यह मामला बताता है कि सच्चाई कितनी परतों में छिपी होती है और कैसे उसे चुन-चुनकर तोड़ा-मरोड़ा जाता है।

कौशांबी और साहिबाबाद से पकड़े गए इस गिरोह के तार सीधे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI से जुड़े मिले। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह नहीं थी कि ये लोग जासूसी कर रहे थे, बल्कि यह थी कि ये सब हिंदू नाम और पहचान की आड़ लेकर भारत के खिलाफ काम कर रहे थे। सरफराज ने खुद को जोरा सिंह बना लिया, शहजाद ने भट्टी और वकार ने विक्की जट नाम रख लिया। कौशांबी से पकड़े गए सुहेल ने खुद का नाम रोमियो, नौशाद ने लालू, समीर ने शूटर और एक औरत साने इरम बन गई महक।

यह सिर्फ नाम बदलने तक सीमित नहीं था। सुहेल कलावा बाँधता था, गले में रुद्राक्ष पहनता था, माथे पर टीका लगाता था। नौशाद और समीर भी इसी तरह की हिंदू पहचान लेकर घूमते थे। यानी साजिश यह थी कि हिंदू बनकर जासूसी करो और हिंदुओं का भरोसा जीतो और फिर उनसे भी जासूसी करवाओ। क्योंकि इस गिरोह में युवक गणेश और महिला मीरा का भी नाम सामने आया।

अब जब गाजियाबाद का पूरा नेटवर्क खुलकर सामने आ चुका है और साफ दिख रहा है कि किस तरह हिंदू नाम और पहचान को ढाल बनाकर जासूसी की जा रही थी, तब वे लोग कहाँ चले गए जो हर बार हिंदू नाम देखते ही उछल पड़ते हैं? वही लोग जो किसी एक नाम के आधार पर पूरी चर्चा का रुख मोड़ देते हैं, इस संगठित साजिश पर चुप रहे। न तो मजहब के आधार पर हेडलाइन बनी, न कोई किसी मजगब को निशाना बनाया गया और यहाँ तक कि देश हित में भी सवाल नहीं पूछे गए। यही बताता है कि समस्या नजरिए की है।

राजस्थान का ही मामला सामने रखिए। एयरफोर्स में काम करने वाला प्राइवेट कर्मचारी सुमित कुमार जासूसी के आरोप में पकड़ा गया। रिपोर्ट्स में साफ बताया गया कि उसका ब्रेनवॉश पाकिस्तानी हैंडलर्स ने किया था और उसे इसलिए चुना गया क्योंकि वह हिंदू था। उससे सत्संग और धार्मिक कार्यक्रमों के जरिए दूसरे हिंदुओं को ब्रेनवॉश करवाने की योजना बनाई गई। यानी यहाँ भी एक बड़ी साजिश थी, जिसमें हिंदू पहचान का इस्तेमाल एक औजार की तरह किया जा रहा था।

लेकिन जैसे ही सुमित कुमार का नाम सामने आया, मीडिया और सोशल मीडिया पर वामपंथी अकाउंट्स ने बिना देर किए हेडलाइन बना दी- हिंदू निकला पाकिस्तानी जासूस। न कोई गहराई देखी गई, न कोई सोर्स जाँचा गया, न यह सवाल कि उसके पीछे कौन है? बस नाम देखा और हिंदुओं को बदनाम करने का पूरा नैरेटिव सेट कर दिया।

ये दो मामले सामने रखकर देखा जाए तो यही दोहरा रवैया सामने आ जाता है। जब गाजियाबाद में पूरा जासूसी नेटवर्क हिंदू नाम की आड़ में काम करता पकड़ा गया, तब यह बात नहीं उठती कि यह हिंदुओं को बदनाम करने की साजिश है। तब यह नहीं कहा जाता कि देखो कैसे हिंदू पहचान का इस्तेमाल ढाल की तरह किया जा रहा है। लेकिन जैसे ही ऐसे मामलों में एक व्यक्ति का नाम हिंदू निकलता है, पूरी कहानी उसी पर टिक जाती है।

क्या कभी यह सवाल उठाया जाएगा कि जिन पाकिस्तानी आकाओं के इशारों पर ये सारे लोग काम कर रहे थे, उनकी मजहबी पहचान क्या है? क्या तब भी उतनी ही तेजी से हेडलाइन बनेगी? या फिर वहाँ चुप्पी ही साध ली जाएगी?

समस्या यह है कि कुछ लोगों के लिए सच्चाई मायने नहीं रखती, उन्हें सिर्फ मौका चाहिए। मौका हिंदुओं को घेरने का, उन्हें कटघरे में खड़ा करने का। और जैसे ही ऐसा कोई मौका दिखता है, पूरा इकोसिस्टम एक्टिव हो जाता है। तथ्यों की जाँच बाद में होती है, पहले फैसला सुना दिया जाता है।

गाजियाबाद का मामला इस पूरे खेल को उजागर करता है। यह दिखाता है कि कैसे दुश्मन ताकतें सिर्फ सीमापार पर ही नहीं, बल्कि भारत की धार्मिक समाज के भीतर घुसकर भी काम कर रही हैं। और उससे भी ज्यादा खतरनाक यह है कि उनके इस खेल में देश की गिनी-चुनी मीडिया और वामपंथी लोग अपने नैरेटिव को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

गाजियाबाद की घटना एक चेतावनी है, हिंदुओं के लिए। यह उस सोच के लिए भी जो हर बार एक ही दिशा में देखने की आदत डाल चुकी है। अग अब भी यह नहीं समझा गया, तो अगली बार कोई और ‘हिंदू नाम’ फिर से इस्तेमाल होगा और कहानी फिर से उसी तरह मोड़ी जाएगी।

ईरान के इकलौते एक्टिव न्यूक्लियर प्लांट पर US-इजरायल का हमला, 240KM दूर बैठा कुवैत भी अलर्ट: जानें आखिर ‘बुशहर’ पर हमला क्यों रूस से दुश्मनी लेने के बराबर?

ईरान और इजरायल-अमेरिका के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के बीच फारस की खाड़ी किनारे स्थित बुशहर न्यूक्लियर पावर प्लांट एक बार फिर वैश्विक चिंता का केंद्र बन गया है। ईरान के परमाणु ऊर्जा संगठन ने दावा किया कि अमेरिका और इजरायल ने मंगलवार (24 मार्च 2026) की शाम बुशहर प्लांट के आसपास हमला किया।

अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) ने पुष्टि की है कि हाल ही में एक प्रोजेक्टाइल प्लांट परिसर के भीतर आकर गिरा है, हालाँकि ईरान का कहना है कि इससे न तो रिएक्टर को कोई नुकसान हुआ और न ही किसी कर्मचारी को चोट लगी। हालाँकि विशेषज्ञ इसे बेहद संवेदनशील स्थिति मान रहे हैं, क्योंकि किसी भी चूक का असर पूरे खाड़ी क्षेत्र पर पड़ सकता है।

IAEA के महानिदेशक राफेल मारियानो ग्रोसी ने इस घटना पर चिंता जताते हुए सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की है। इससे पहले 17 मार्च 2026 को भी इसी इलाके के पास एक और प्रोजेक्टाइल गिरा था। हालाँकि दोनों ही घटनाओं में कोई भौतिक नुकसान नहीं हुआ, लेकिन IAEA ने चेतावनी दी है कि ‘करीबी हमले’ बड़े परमाणु हादसे का कारण बन सकते हैं।

रूस की सरकारी परमाणु एजेंसी Rosatom ने भी स्थिति को ‘नकारात्मक दिशा’ में जाता हुआ बताया है और अपने विशेषज्ञों को चरणबद्ध तरीके से हटाने की तैयारी शुरू कर दी है।

कुवैत की चेतावनी और क्षेत्रीय खतरा

बुशहर प्लांट पर हमले की खबरों के बाद खाड़ी देशों में चिंता बढ़ गई है। कुवैत ने अपने नागरिकों को संभावित रेडिएशन खतरे को लेकर अलर्ट जारी किया है। कुवैत के अधिकारियों ने लोगों को घरों के अंदर रहने, खिड़कियाँ-दरवाजे बंद रखने और बाहरी संपर्क कम करने की सलाह दी है।

हालाँकि उन्होंने यह भी कहा कि प्लांट लगभग 240 किलोमीटर दूर है, जिससे बड़े स्तर पर असर की संभावना कम है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यहाँ रेडिएशन लीक होता है, तो फारस की खाड़ी के पानी पर असर पड़ेगा, जिससे खाड़ी देशों के डीसैलिनेशन प्लांट और पीने के पानी की आपूर्ति पर गंभीर संकट आ सकता है।

बुशहर न्यूक्लियर प्लांट क्यों है इतना अहम?

बुशहर ईरान का एकमात्र सक्रिय परमाणु ऊर्जा संयंत्र है, जो करीब 1000 मेगावाट बिजली उत्पादन करता है। यह प्लांट 1970 के दशक में शाह मोहम्मद रजा पहलवी के दौर में शुरू हुआ था, लेकिन 1979 की इस्लामिक क्रांति और बाद में ईरान-ईराक युद्ध के दौरान इराकी हमलों के कारण इसका निर्माण रुक गया।

बाद में रूस की मदद से इसे पूरा किया गया और 2011 में यह राष्ट्रीय ग्रिड से जुड़ा। यह एक प्रेसराइज्ड वॉटर रिएक्टर है, जो कम-स्तर (लगभग 4.5%) समृद्ध यूरेनियम से चलता है और मुख्य रूप से नागरिक उपयोग के लिए बिजली पैदा करता है। हालाँकि इसकी उत्पादन क्षमता बड़ी है, लेकिन यह ईरान की कुल बिजली का सिर्फ 1-2% ही देता है।

इसके बावजूद यह देश के परमाणु कार्यक्रम और अंतरराष्ट्रीय निगरानी के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। बुशहर प्लांट सिर्फ ऊर्जा परियोजना नहीं रूस और ईरान के बीच गहरे रणनीतिक संबंधों का प्रतीक भी है। 1990 के दशक में दोनों देशों के बीच परमाणु सहयोग समझौता हुआ, जिसके तहत रूस ने न सिर्फ प्लांट पूरा किया बल्कि ईंधन और तकनीकी सहायता भी दी।

हाल के वर्षों में पश्चिम के साथ तनाव बढ़ने के बाद रूस और ईरान की नजदीकियाँ और बढ़ी हैं। ईरान ने रूस को ड्रोन और हथियार तकनीक दी, जबकि रूस ने लड़ाकू विमान और सैन्य सहयोग बढ़ाया। ऐसे में बुशहर पर खतरा सीधे रूस की चिंता भी बढ़ा रहा है।

मिसाइल-ड्रोन ताकत और युद्ध का खतरा

युद्ध से पहले ईरान के पास मध्य पूर्व का सबसे बड़ा बैलिस्टिक मिसाइल भंडार माना जाता था, जिसकी संख्या 2500 से 6000 के बीच आँकी जाती है। इनकी मारक क्षमता 2000 किमी तक है, जिससे इजरायल तक पहुँच संभव है। ईरान ने सस्ते लेकिन प्रभावी ड्रोन जैसे सीरीज विकसित किए हैं, जिन्हें रूस ने यूक्रेन युद्ध में भी इस्तेमाल किया।

ईरान हर महीने हजारों ड्रोन बनाने की क्षमता रखता है, जो उसे एक बड़ी सैन्य ताकत बनाता है। बुशहर जैसे सक्रिय परमाणु संयंत्र के पास हमले की घटनाएँ वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ा रही हैं। इससे पहले रुस-यूक्रेन युद्ध में भी परमाणु संयंत्रों पर खतरे ने दुनिया को सतर्क किया था।

अब ईरान में ऐसी घटनाएँ यह संकेत देती हैं कि अगर तनाव और बढ़ा, तो परमाणु सुरक्षा एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय संकट बन सकती है।

मर्दाना जिस्म में छिपी ‘औरतों’ को नहीं मिलेगी पहचान, असली किन्नरों के पास ही होंगे सारे अधिकार: ‘ट्रांसजेंडर पर्सन्स संशोधन बिल 2026’ पास, जानिए हर डिटेल

केंद्र की मोदी सरकार ने एक ठोस कदम उठाते हुए ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) संशोधन बिल 2026 पास कर दिया है। इस कानून के जरिए देश में जेंडर पहचान को लेकर नियमों और अधिकारों को और साफ और मजबूत बनाने की कोशिश की गई है। सरकार का कहना है कि इस बिल का मकसद उन लोगों तक सुरक्षा और अधिकार पहुँचाना है, जो अपनी बॉयोलॉजिकल या सामाजिक पहचान के कारण भेदभाव का सामना करते हैं। साथ ही इससे प्रशासनिक प्रक्रियाएँ भी आसान और स्पष्ट होंगी।

इस नए कानून में नुकसान या अपराध की गंभीरता के हिसाब से अलग-अलग सजा (ग्रेडेड पनिशमेंट) का प्रावधान भी रखा गया है, ताकि न्याय ज्यादा संतुलित तरीके से दिया जा सके। कुल मिलाकर, सरकार इसे एक ऐसे कदम के रूप में पेश कर रही है, जो हाशिए पर खड़े समुदायों को मुख्यधारा में लाने और उनके अधिकारों की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में मदद करेगा।

अब जब दुनिया के कई देशों में जेंडर पहचान को लेकर बहस और उलझन बढ़ती जा रही है, भारत ने एक अलग रास्ता चुना है। सरकार ने साफतौर पर नियम तय करने और भ्रम खत्म करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) संशोधन बिल, 2026 के जरिए मोदी सरकार ने जेंडर पहचान से जुड़े कानूनों में स्पष्टता लाने की कोशिश की है। इसे सिर्फ बदलाव नहीं, बल्कि व्यवस्था को ठीक करने वाला कदम माना जा रहा है।

साल 2019 के पुराने ट्रांसजेंडर पर्सन्स एक्ट में ‘खुद की महसूस की गई जेंडर पहचान’ को मान्यता दी गई थी। सुनने में यह अच्छा लगा, लेकिन इससे कई जगहों पर भ्रम और प्रशासनिक दिक्कतें पैदा हुईं। 2026 के नए संशोधन का मकसद इन्हीं समस्याओं को दूर करना है। आसान शब्दों में कहें तो अब जेंडर पहचान को लेकर मनमाने तरीके से अपनी पसंद बताने की छूट को सीमित किया गया है और इसे तय करने के लिए ज्यादा स्पष्ट और ठोस नियम बनाए गए हैं।

‘कुछ भी जायज है’ से लकर स्पष्ट परिभाषा तक

इस बिल में सबसे सीधे तरीके से साफ किया गया है कि ट्रांसजेंड व्यक्ति किसे माना जाएगा। पहले यह बात खुली हुई थी। लेकिन अब कानून इसे साफ तरीके से तय करता है। इसमें उन लोगों को शामिल किया गया है जिन्हें सामाजिक या बॉयोलॉजिकल आधार पर पहचाना जा सकता है। पारंपरिक ट्रांसजेंडर समुदाय जैसे हिजड़ा, किन्नर, अरावनी और जोगता, साथ ही वे लोग जिनके जन्म से ही शरीर में लिंग से जुड़ी अलग विशेषताएँ होती हैं। इसमें वे लोग भी शामिल हैं जिन्हें जबरदस्ती किसी पहचान में धकेला गया है।

साथ ही बिल यह भी बिल्कुल साफ करता है कि यह कानून हर तरह की खुद से घोषित की गई या बदलती रहने वाली पहचान को कवर करने के लिए नहीं है। यानी यह स्पष्टता जानबूझकर रखी गई है, ताकि कानून का दायरा साफ और समझने में आसान रहे।

सरकार ने परिभाषा को सख्त क्यों किया?

इस बदलाव के पीछे का कारण भी बिल में साफ बताया गया है। सरकार कहती है कि पहले जो परिभाषा थी, वह बहुत ज्यादा अस्पष्ट और व्यापक थी। इसकी वजह से यह तय करना मुश्किल हो जाता था कि असल में किसे सुरक्षा की जरूरत है और कानून को लागू करना भी कठिन हो जाता था।

सबसे जरूरी बात यह है कि कानून का मकसद हमेशा उन लोगों की मदद करना था जो सच में सामाजिक और व्यवस्था से जुड़ी भेदभाव (डिस्क्रिमिनेशन) का सामना करते हैं, न कि हर नई या बढ़ती हुई पहचान के दावों को शामिल करना।

यह अंतर बहुत जरूरी है। कल्याण से जुड़े कानून सिर्फ आदर्श बातें नहीं होते, बल्कि वे खास जरूरतमंद लोगों की मदद के लिए बनाए जाते हैं। अगर परिभाषा बहुत ज्यादा बड़ी कर दी जाए, तो जो फायदे सबसे ज्यादा जरूरतमंद लोगों के लिए हैं, वे कमजोर पड़ जाते हैं और सही लोगों तक पूरी तरह नहीं पहुँच पाते। सरकार इसी बात को रोकना चाहती है।

बिल में सबसे जरूरी बात: सर्वनाम गिरोह की पहचान राजनीति पर लगाम

इस संशोधन (अमेंडमेंट) का सबसे अहम हिस्सा उसके उद्देश्य और कारण में दिखाई देता है। इसमें कहा गाय है कि एक साफ और सटीक परिभाषा देना जरूरी है और किसी व्यक्ति की पहचान सिर्फ उसकी अपनी पसंद, बदलने वाली विशेषताओं या खुद की घोषित पहचान के आधार पर तय नहीं की जा सकती।

यही इस सुधार की सबसे जरूरी बात है। इसका मतलब है कि अब पहले जैसी ढील नहीं रहेगी, जिससे नीतियों और कानून को लागू करने में उलझन पैदा होती थी। सीधी भाषा में कहें तो, सरकार ने व्यक्तिगत पहचान और कानूनी पहचान के बीच एक साफ लाइन खींच दी है। आप अपनी पहचान जैसे चाहें वैसे रख सकते हैं, लेकिन जब बात कानूनी, सरकारी लाभ और मान्यता की आएगी तो उसके लिए स्पष्ट और जाँचे जा सकने वाले नियम होंगे।

2019 के कानून में क्या गलती हुई?

साल 2019 में जो कानून बना था, वह लोगों की खुद की पहचान पर आधारित था। इसकी वजह से ट्रांसजेंडर की श्रेणी लगातार बढ़ती जा रही थी। सुनने में यह ठीक लगता है, लेकिन असल में इससे कई गंभीर समस्याएँ पैदा होती हैं। जैसे कि सरकारी योजनाएँ कैसे लागू की जाएँ? आधिकारिक दस्तावेज कैसे बनाए जाएँ? जब पहचान बदलती रहे और उसे जाँचना मुश्किल हो, तो कानून कैसे लागू किया जाए?

नए संशोधित बिल में यह भी माना गया है कि ऐसी अस्पष्टता की वजह से कई कानूनों को लागू करना कठिन हो गया था और अलग-अलग कानूनी व्यवस्थाओं में टकराव भी पैदा हो रहा था। सबसे बड़ी बात यह है कि इससे गलत इस्तेमाल और असली हकदारों के नुकसान का खतरा बढ़ गया था। जब किसी खास और पहले से वंचित (पीड़ित) समूह के लिए बनाई गई श्रेणी बहुत ज्यादा बड़ी हो जाती है, तो जिन लोगों को सच में मदद की जरूरत है वे पीछे रह जाते हैं। यह संशोधन उसी समस्या को ठीक करने की कोशिश है।

असल जरूरतमंद को दी गई सुरक्षा

कुछ लोग इस बिल को सीमित बताते हैं, लेकिन असल में यह कई मायनों में सुरक्षा को और मजबूत करता है। संशोधित कानून में अब सख्त सजा का प्रावधान है। जैसे किसी का जबरन अंग-भंग करना, किसी को जबरदस्ती ट्रांसजेंडर पहचान अपनाने पर मजबूर करना, मानव तस्करी और शोषण। इन गंभीर मामलों में, खासकर जब बच्चे शामिल हों, तो सजा उम्रकैद तक हो सकती है।

इससे ध्यान केवल पहचान की बहस से हटकर उन असली समस्याओं पर जाता है, जहाँ कानून की सबसे ज्यादा जरूरत होती है।

निष्कर्ष

ट्रांसजेंडर बिल 2026 का मकसद अधिकारों को कम करना नहीं है। इसका उद्देश्य कानून को साफ़, लागू करने लायक और निष्पक्ष बनाना है। साल 2019 का कानून एक शुरुआत था, लेकिन उसमें कई बातें साफ नहीं थीं। साल 2026 का यह संशोधन उन कमियों को दूर करता है। इससे यह सुनिश्चित किया गया है कि सुरक्षा और लाभ सही लोगों तक पहुँचें, गलत इस्तेमाल रुके और कानून में स्पष्टता आए।

इस बिल का सबसे मूल विचार यह है कि बिना साफ परिभाषा के कोई भी कानून ठीक से काम नहीं कर सकता। दुनिया के कई देशों में इस बात को नजरअंदाज करने के कारण समस्याएँ सामने आ रही हैं, लेकिन भारत ने समय रहते इस पर कदम उठाया है।

भारत ने भ्रम की जगह स्पष्टता, अस्पष्टता की जगह ठोस व्यवस्था, और सिर्फ विचारों की जगह सही शासन को चुना है। हो सकता है कि कुछ लोगों को यह पसंद न आए, लेकिन एक सही तरीके से चलने वाले कानून की यही बुनियाद होती है।

इस तरह ट्रांसजेंडर बिल 2026 सिर्फ एक बदलाव नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि भारत पहचान से जुड़े मुद्दों पर क्या रुख अपनाना चाहता है। और शायद यह दुनिया के लिए भी एक दिशा दिखाता है।

(मूलरूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़नें के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

क्या है असम की सत्ता का गणित, कैसे मनोवैज्ञानिक लड़ाई में भारी पड़ रहे CM हिमंता बिस्वा सरमा, क्यों BJP के नेतृत्व वाले NDA के लिए जीत की हैट्रिक आसान?

असम में 9 अप्रैल 2026 को विधानसभा चुनाव  होने जा रहा है। पत्रकार का काम भविष्यवाणी करना नहीं बल्कि परिस्थितियों का विश्लेषण करना होता है। यूँ भी चुनाव अनिश्चितताओं से भरा होता है। फिर भी ऐसे पैटर्न बन जाते हैं, जिससे बदलाव कई बार स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगते हैं। ऐसी ही परिस्थिति असम चुनाव में दिख रही है।

असम की राजनीति पर दो दशकों से अधिक समय तक करीब से नजर रखने और पिछले कुछ महीनों से किए गए व्यापक जमीनी अवलोकन के आधार पर कहा जा सकता है कि 4 मई को जब चुनाव परिणाम घोषित होंगे, तो बीजेपी के नेतृत्व में एनडीए कम्फर्टेबल बहुमत के साथ सत्ता में वापसी करती दिखेगी।

यह कोई दूरदर्शिता भी नहीं है। यह संरचनात्मक मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक कारकों को जोड़कर देखने का नजरिया है। ये सत्ता पर काबिज एनडीए सरकार की तरफ झुक रहा है।

एजीपी प्रमुख अतुल बोरा और बीपीएफ प्रमुख हाग्रामा मोहिलरी के साथ हिमंता बिस्वा सरमा

एनडीए में भाजपा, असम गण परिषद (एजीपी) और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) शामिल हैं, जो सामूहिक रूप से असम की लगभग सभी 126 सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं। भाजपा स्वयं सबसे अधिक सीटों पर उम्मीदवार उतार रही है, जो गठबंधन के भीतर उसके प्रभुत्व को रेखांकित करता है।

लेकिन इस स्पष्ट एकजुटता के पीछे लेन-देन की राजनीति की कहानी छिपी हुई है। बीजेपी का बीपीएस और उसके प्रतिद्वंदी यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल के साथ संबंध असम में गठबंधनों की अस्थिरता की कहानी कह रहा है। 2016 में बीपीएफ का समर्थन करने से लेकर 2020 के बोडोलैंड प्रादेशिक परिषद चुनावों में यूपीपीएल का समर्थन करने और फिर 2025 में वापस बीपीएफ का समर्थन करने तक, भाजपा ने गठबंधन निर्माण के प्रति एक व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाई है।

परिसीमन से राजनीतिक बदलाव तक

असम के चुनावी परिदृश्य में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव 2023 के परिसीमन के दौरान आया। निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से निर्धारित किया गया है, नई सीटें बनीं और जनसांख्यिकीय संतुलन को पुनर्निर्धारित किया गया। हालाँकि ये प्रैक्टिस ऊपरी तौर पर प्रशासनिक प्रतीत होते हैं, लेकिन इनके राजनीतिक परिणाम गहरे हैं।

जिन निर्वाचन क्षेत्रों में मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं, उनकी संख्या लगभग 35 से घटकर 24 रह गई है। चूँकि मुस्लिम मतदाता परंपरागत रूप से कॉन्ग्रेस और एआईयूडीएफ के प्रति एकजुट रहे हैं, इसलिए यह कमी विपक्ष की चुनावी क्षमता को सीधे तौर पर कमजोर करती है।

असम की मुस्लिम आबादी 40 प्रतिशत से अधिक है। हालाँकि अधिक संख्या में मुस्लिम आबादी होने के बावजूद अब सीटों के मामले में इसका लाभ कम होता जा रहा है। 2021 में कॉन्ग्रेस करीब 30 फीसदी वोट हासिल किए थे, लेकिन केवल 29 सीटें जीती थीं। 2026 में इससे भी बदतर हालत हो सकते हैं।

कॉन्ग्रेस और एआईयूडीएफ के बीच गठबंधन के अभाव में, यह वोट बैंक बंट सकता है। अल्पसंख्यक बहुल निर्वाचन क्षेत्रों में बहुकोणीय मुकाबले में थोड़े के अंदर से हार-जीत होती है, ऐसे में अनिश्चितता की स्थिति हो सकती है, लेकिन ये जरूरी नहीं है कि ऐसी सीटें विपक्ष ही जीत जाएगी। इसके बजाय एनडीए के लिए मामूली अंतर से जीत हासिल करना ज्यादा आसान होगा।

सीएम सरमा के नेतृत्व का असर

यदि परिसीमन एनडीए की बढ़त के लिए संरचनात्मक आधार प्रदान करता है, तो नेतृत्व इसकी भावनात्मक और राजनीतिक ऊर्जा प्रदान करता है। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा अभी भारत में सबसे प्रभावशाली राजनीतिक हस्तियों में से एक बनकर उभरे हैं।

सीएम सरमा की लोकप्रियता पारंपरिक पार्टी विचारधाराओं से परे है। उनका शासन मॉडल राज्य में बुनियादी ढाँचे के विकास, कल्याणकारी योजनाओं को लागू करने की सशक्त प्रशासनिक शैली मतदाताओं के एक बड़े वर्ग को आकर्षित कर रहा है। सड़कें, पुल, स्वास्थ्य सुविधाएँ और डिजिटल सेवा वितरण ने कार्यकुशलता को और बढ़ाया है।

सीएम सरमा की राजनीतिक पकड़ भी उतना ही महत्वपूर्ण है। आशीर्वाद यात्रा जैसे व्यापक जनसंपर्क अभियानों के माध्यम से उन्होंने मतदाताओं के साथ सीधा संबंध स्थापित किया है। ये महज राजनीतिक रैलियां नहीं हैं, बल्कि ये जनता से अपील हैं, जो एक ऐसे नेता के रूप में उनकी छवि को मजबूत करते हैं, जो वादे को पूरे करता है।

इसके विपरीत, असम में गौरव गोगोई के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार को इस तरह की रणनीति अपनाने में कठिनाई हो रही है। बूथ स्तर पर संगठनात्मक कमजोरियाँ इस नुकसान को और बढ़ा देती हैं। भारत में चुनाव अब केवल संदेशों के माध्यम से ही नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर सुनियोजित लामबंदी के माध्यम से भी जीते जाते हैं। एक ऐसा क्षेत्र जहाँ भाजपा और उसका वैचारिक तंत्र निर्णायक बढ़त बनाए हुए है।

ध्रुवीकरण और पहचान का मुद्दा

बांग्लादेश से अवैध घुसपैठियों के मुद्दे पर चर्चा किए बिना असम की राजनीति का कोई भी विश्लेषण अधूरा है । यह राज्य में सबसे अधिक भावनात्मक रूप से संवेदनशील और राजनीतिक मुद्दों में से एक है।

भाजपा हिन्दू मतदाताओं को एकजुट करने के लिए लगातार इस मुद्दे को उठाती रही है। डेमोग्राफी बदलाव और सांस्कृतिक संरक्षण को लेकर सरमा की बयानबाजी लोगों को जागरूक कर रही है। आलोचक इसे ध्रुवीकरण बताते हैं, लेकिन इसकी चुनावी प्रभावशीलता निर्विवाद है।

पिछले चुनावों में, भाजपा को एआईयूडीएफ प्रमुख बदरुद्दीन अजमल के रूप में एक सुविधाजनक प्रतिद्वंद्वी मिल गया था, जिनकी छवि का इस्तेमाल जनसांख्यिकीय असंतुलन के खतरे के प्रतीक के रूप में किया गया था। एआईयूडीएफ के कॉन्ग्रेस से गठबंधन तोड़ने और उसके प्रभाव में कमी आने के बाद भाजपा ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है।

रकीबुल हुसैन जैसे व्यक्तियों को राजनीतिक हमलों के नए केंद्र के रूप में स्थापित किया है। कॉन्ग्रेस के भीतर आंतरिक मतभेदों के उजागर होने के बाद इसकी प्रासांगिकता और बढ़ गई है। भाजपा ने इन विभाजनों का प्रभावी ढंग से हथियार के रूप में उपयोग करते हुए कॉन्ग्रेस को परस्पर विरोधी हितों में सामंजस्य स्थापित करने में असमर्थ दल के रूप में चित्रित किया है।

विडंबना यह है कि कॉन्ग्रेस अक्सर अपनी ही गलतियों के प्रतिद्वंदियों को बल देती है। चुनाव प्रचार के अहम मौकों पर विवादित हस्तियों की मौजूदगी और उम्मीदवारों के चयन को लेकर सार्वजनिक असहमति भाजपा को बने बनाए मुद्दे मुहैया करा देती है, जिन पर वह खुल कर अपनी राय रख सकती है।

दलबदल एक अहम वजह

चुनाव सिर्फ संख्या के बारे में ही नहीं, बल्कि धारणा के बारे में भी होते हैं। कॉन्ग्रेस से हुए दलबदल का भाजपा में बड़ा प्रभाव पड़ा है।

भूपेन कुमार बोराह और प्रद्युत बोरदोलोई जैसे नेता व्यक्तिगत रूप से चुनावी समीकरण को भले ही न बदल पाएँ, लेकिन उनके जाने से कॉन्ग्रेस के भीतर अस्थिरता को ओर मजबूती मिली है।

कॉन्ग्रेस नेताओं ने दलबदलुओं को रोकने के लिए सार्वजनिक रूप से प्रयास किए। अक्सर निर्णय अंतिम रूप दिए जाने के बाद भी विरोधाभाषी बयान आते रहे। इससे कॉन्ग्रेस में हताशा का दौर हैं। इसके विपरीत, भाजपा आत्मविश्वास से भरी, यहाँ तक कि हावी भी दिखाई देती है, जिससे उसकी मनोवैज्ञानिक बढ़त और भी मजबूत होती है।

सीएम सरमा ने कॉन्ग्रेस के भीतर अपने प्रभाव का दावा करके इस धारणा को और भी पुख्ता कर दिया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि वे दलबदल का अनुमान लगा सकते हैं या यहां तक ​​कि उसे अंजाम भी दे सकते हैं। चाहे ये दावे अतिशयोक्तिपूर्ण हों या नहीं, वे विपक्षी खेमे में अविश्वास पैदा करते हैं और मतदाताओं के भरोसे को कम करते हैं।

जमीन के बजाए कागजों में सिमटी कॉन्ग्रेस

कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन के सामने एक मूलभूत समस्या है यह है कि पार्टी जमीनी हकीकत से दूर कागजों तक सिमट कर रह गई है। हालाँकि कॉन्ग्रेस गठबंधन में कई पार्टियाँ शामिल हैं, लेकिन उनकी संयुक्त शक्ति सीमित ही है।

अखिल गोगोई और लुरिंज्योति गोगोई जैसे नेताओं के नेतृत्व वाली आर.डी. और ए.जे.पी. का प्रभाव कुछ क्षेत्रों में तो है, लेकिन राज्यव्यापी संगठनात्मक क्षमता उनमें नहीं है। जिन निर्वाचन क्षेत्रों में वे चुनाव लड़ रहे हैं, उनमें से कई या तो नव-परिसीमित हैं या संरचनात्मक रूप से उनके लिए प्रतिकूल हैं। वर्तमान विधानसभा में दोनों पार्टियों के पास कुल मिलाकर केवल एक-एक सीट है, क्योंकि केवल अखिल गोगोई ही विधायक हैं। उनके लगातार हंगामे के कारण सत्ता-विरोधी लहर के बावजूद शिवसागर सीट पर उनका कब्जा बरकरार रहने की उम्मीद है, लेकिन लुरिंज्योति गोगोई की जीत अभी भी अनिश्चित है।

अति चर्चित 3G गठबंधन: गौरव गोगोई, अखिल गोगोई और लुरिंज्योति गोगोई

चुनावी गणित में भले की प्रतिस्पर्धा दिख रही हो, लेकिन वोट का पूरी तरह ट्रांसफर करने की क्षमता का अभाव गठबंधन की संभावनाओं को कमजोर करता है। चुनावों के लिए न केवल साझा लक्ष्य बल्कि जमीनी स्तर पर समन्वय भी आवश्यक है।

मतदाताओं के एक वर्ग में यह उम्मीद है कि गौरव गोगोई, अखिल गोगोई और लुरिंज्योति गोगोई जैसे नेताओं के समर्थन में अहोम समुदाय एकजुट दिख रहा है। ये भाजपा को चुनौती दे सकता है। हालाँकि, परिसीमन ने इस समुदाय के प्रभाव को कम किया है जिससे विपक्ष को ज्यादा फायदा दिखता हुआ नजर नहीं आ रहा है।

गायक जुबीन गर्ग की मौत का मुद्दा

सांस्कृतिक हस्ती जुबीन गर्ग के निधन ने असम की जन चेतना को झकझोर दिया है। बहुत कम ही ऐसे व्यक्तित्व हैं जिन्हें विभिन्न समुदायों में इतना व्यापक लोकप्रियता हासिल हो।

इतिहास बताता है कि भावनात्मक मुद्दे हमेशा चुनावी नतीजों में तब्दील नहीं होते। नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ 2019-20 में हुए विरोध प्रदर्शन तीव्र और व्यापक थे, फिर भी वे भाजपा को 2021 में सत्ता में लौटने से नहीं रोक पाए।

ज़ुबीन गर्ग की विरासत, सीएए विरोधी भावना की तरह है। इसके वोट में तब्दील होने की संभावना कम है। वोट अक्सर शासन, पहचान और दूसरे राजनीतिक मुद्दों को लेकर असम में दिए जाते रहे हैं।

भाजपा को कमियों को करना होगा दुरुस्त

अपनी कई खूबियों के बावजूद, भाजपा कमजोरियों से मुक्त नहीं है। बीजेपी की निर्भरता इनदिनों कॉन्ग्रेस, एजीपी और अन्य पार्टियों से आए ‘बाहरी’ उम्मीदवारों पर काफी बढ़ गई है।

इसके घोषित उम्मीदवारों में नए चेहरे काफी हैं। इससे पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं में असंतोष की भावना पनप रही है, जो खुद को हाशिए पर महसूस कर रहे हैं। यदि आंतरिक असहमति को प्रभावी ढंग से नियंत्रित नहीं किया गया, तो इससे स्थानीय स्तर पर दिक्कतें आ सकती हैं।

असम में भाजपा का पिछला रिकॉर्ड हाई संगठनात्मक अनुशासन का रहा है। सरमा और सोनोवाल जैसे नेताओं के नेतृत्व में, पार्टी ने आंतरिक विरोधों पर विजय पाई है।

असम में एनडीए की संभावित जीत किसी एक कारण की वजह से नहीं, बल्कि कई वजहों से होता हुआ दिख रहा है। परिसीमन ने चुनावी मानचित्र को भाजपा के पक्ष में बदल दिया है। विपक्ष अभी भी बिखरा हुआ है और संगठनात्मक रूप से कमजोर है। नेतृत्व, शासन और राजनीतिक संचार भाजपा को एक मजबूत आधार प्रदान करते हैं। ध्रुवीकरण मतदाताओं के व्यवहार को लगातार प्रभावित कर रहा है और मनोवैज्ञानिक तौर पर सत्ताधारी गठबंधन के पक्ष में है।

चुनाव, बेशक, अब भी चौंकाने वाले हो सकते हैं। स्थानीय कारक, उम्मीदवारों से जुड़ी परिस्थितियाँ और मतदाताओं की भावनाओं में अंतिम समय में होने वाले बदलाव पूर्वानुमानों को प्रभावित कर सकते हैं। लेकिन अप्रत्याशित उथल-पुथल को छोड़कर, भविष्य की दिशा स्पष्ट दिख रही है।

जब असम के मतदाता 4 मई को अपना फैसला सुनाएँगे, तो यह न केवल एक सरकार बल्कि एक राजनीतिक व्यवस्था को फिर से समर्थन होगा, बल्कि यह भाजपा की संरचनात्मक लाभ को रणनीतिक क्रियान्वयन के साथ संयोजित करने की क्षमता की भी जीत होगी।

(मूलरूप से ये लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

बहुविवाह पर प्रतिबंध, हलाला के खिलाफ प्रावधान और वसीयत ट्रांसफर के नए नियम: गुजरात विधानसभा में UCC पास, जानिए बिल में क्या-क्या है प्रावधान

गुजरात में यूनिफॉर्म सिविल कोड विधानसभा में पास हो गया है। उत्तराखंड के बाद गुजरात दूसरा ऐसा राज्य है, जहाँ यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू होने जा रहा है। विधानसभा ने इसे आसानी से पास कर दिया।

उत्तराखंड की तरह ही गुजरात के यूसीसी बिल में शादी, तलाक, विरासत, लिव-इन रिलेशनशिप जैसे मामलों में सभी धर्मों, पंथों, आस्थाओं, समुदायों के लिए एक जैसे कानून लागू किये जा सकेंगे।

फिलहाल गुजरात, उत्तराखंड और गोवा को छोड़कर बाकी राज्यों में और केंद्र स्तर पर इन मामलों के लिए समुदायों के हिसाब से अलग-अलग कानून लागू हैं। इस कानून के बाद सभी समुदाय एक ही छत के नीचे आ जाएँगे।

यूसीसी बिल का कोई भी नियम अनुसूचित जनजाति (ST) और दूसरे ग्रुप पर लागू नहीं होगा, जिनके पारंपरिक अधिकार संविधान के तहत सुरक्षित हैं।

गुजरात विधानसभा में 24 मार्च 2026 को बिल पेश करते हुए मुख्यमंत्री भूपेन्द्र पटेल ने कहा कि यूसीसी उन अहम सुधारों में से एक है, जिसे पीएम मोदी लागू करने के लिए दृढ़ हैं। सामाजिक सौहार्द को बढ़ाना इसका मकसद है।

कमेटी का गठन

सरकार ने गुजरात में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने की जरूरत का पता लगाने और एक कानूनी सुझाव देने के लिए रिटायर्ड जज रंजना प्रकाश देसाई की अगुवाई में एक कमेटी बनाई गई थी। कमेटी ने पिछले हफ्ते मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल को अपनी फाइनल रिपोर्ट सौंपी।

इसमें उसने शादी, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने और उससे जुड़े सिविल मामलों में बराबरी, न्याय, सामंजस्य के लिए यूनिफॉर्म सिविल कोड अपनाने की सिफारिश की।

इसी रिपोर्ट के आधार पर सरकार ने बाद में बिल तैयार किया। राज्य सरकार ने कहा है कि यह बिल राज्य के सभी नागरिकों के लिए, चाहे उनका धर्म, जाति, पंथ या जेंडर कुछ भी हो, सिविल मामलों को चलाने के लिए एक जैसा कानूनी ढाँचा देकर इन सिफारिशों को लागू करेगा।

इसका मकसद धर्मनिरपेक्ष, लिंग, न्याय और सामाजिक सुधार के सिद्धांतों को बनाए रखना है, ताकि सामाजिक एकता और अखंडता को मजबूत किया जा सके।

आइए जानते हैं कि इस बिल में क्या-क्या नियम हैं।

शादी और तलाक के नियम

UCC एक से अधिक शादी पर रोक लगाता है। बिल में कहा गया है कि शादी के समय पहली शर्त यह होनी चाहिए कि दोनों (पति और पत्नी) में से किसी का भी कोई जीवनसाथी न हो। अगर पहले से कोई जीवनसाथी है, तो उनकी शादी को मान्यता नहीं दी जा सकती। शादी की उम्र पुरुषों के लिए 21 और महिलाओं के लिए 18 रखी गई है, जो भारत में पहले से लागू कानून के मुताबिक है। इसके अलावा, यह शादी किसी भी मौजूदा कानून के तहत गैर-कानूनी नहीं होनी चाहिए।

अभी तक शादी को लेकर हिंदू, मुस्लिम समेत तमाम समुदायों के लिए अलग-अलग नियम और कानून थे। अब सभी को एक ही नियम के तहत लाया गया है, हालाँकि इसमें कुछ छूट दी गई है। UCC में शादी की रस्म को पूरी तरह से मान्यता दी गई है। यानी सप्तपदी, निकाह, आर्य समाज वैदिक रस्म, मंगल फेरे सभी को मान्यता दी गई है यानी कोई भी व्यक्ति अपनी परंपरा और मान्यताओं के अनुसार शादी कर सकता है, लेकिन कानूनी शर्तें भी पूरी करनी होंगी।

शादी के रजिस्ट्रेशन के लिए कहा गया है कि हर शादी का रजिस्ट्रेशन जरूरी है। भले ही वह गुजरात में हुई हो या न हुई हो। अगर दोनों में से कोई एक गुजरात का रहने वाला हो। रजिस्ट्रेशन तभी होगा जब शादी की शर्तें पूरी होंगी और शादी रस्म के अनुसार हुई हो।

7 साल की सजा का प्रावधान

कानून के अनुसार, विवाह का रजिस्‍ट्रेशन 60 दिनों के भीतर करना जरूरी होगा। ऐसा न करने पर 10 हजार रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। जबरन शादी करने या धोखा देकर शादी करने अथवा दबाव बना कर शादी करने के मामलों में 7 साल तक की सजा का प्रावधान रखा गया है। बहुविवाह या एक से अधिक विवाह करने पर भी 7 साल की सजा का प्रावधान है।

तलाक के मामलों में भी नया प्रावधान किया गया है. इसके अनुसार अदालत की मंजूरी के बाद ही तलाक को वैध माना जाएगा और बिना ज्‍यूडिशियल प्रोसेस के किया गया तलाक अमान्य होगा। ऐसे मामलों में तीन साल तक की सजा का प्रावधान है। इसके साथ ही महिलाओं को बिना शर्त दोबारा विवाह करने का अधिकार भी सुनिश्चित किया गया है।

तलाक के लिए भी डिक्री रजिस्ट्रेशन जरूरी है। यह गुजरात कोर्ट और बाहर के कोर्ट (अगर पति-पत्नी में से कोई एक गुजराती है) के ऑर्डर पर भी लागू होता है।

तलाक के नए मामलों के लिए, आखिरी फैसले की तारीख से 60 दिनों के अंदर डिक्री रजिस्टर करानी होगी। पुराने केस के लिए, कोड लागू होने के 1 साल के अंदर रजिस्ट्रेशन किया जा सकता है। अगर देरी होती है और रजिस्ट्रार को लगता है कि वजह सही है, तो रजिस्ट्रेशन बाद में भी किया जा सकता है।

अगर दोनों में से कोई एक बिना किसी सही वजह के छोड़ता है, तो कोर्ट जा सकते हैं, ज्यूडिशियल अलगाव को भी मान्यता दी गई है। अगर पति-पत्नी में से कोई एक बिना किसी सही वजह के दूसरे को छोड़ता है, तो दूसरा व्यक्ति कोर्ट जाकर वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए आवेदन कर सकता है। कोर्ट, ऐसी एप्लीकेशन में दी गई बातों की सच्चाई का पता लगाने के बाद और अगर रिजेक्ट करने का कोई कानूनी कारण नहीं है, तो वैवाहिक अधिकारों की बहाली का आदेश दे सकता है।

लेकिन ऐसे मामले में, अगर यह सवाल उठता है कि क्या अलग होने का कोई सही कारण है, तो उस कारण को साबित करने की जिम्मेदारी अलग होने वाले व्यक्ति की होगी। अगर कोर्ट का आदेश नहीं माना जाता है, तो यह तलाक का आधार बन जाएगा।

UCC में ज्यूडिशियल सेपरेशन का भी एक प्रोविजन है। इसके तहत पति-पत्नी कोर्ट की इजाजत से बिना तलाक के अलग रह सकते हैं। जहाँ शादी को मान्यता दी जाएगी, लेकिन दोनों साथ रहने के लिए मजबूर नहीं होंगे।

किस तरह की शादी रद्द की जा सकती है?

अगर शादी की मूलभूत शर्तों को तोड़ा गया है, तो ऐसी शादी को कोर्ट में अर्जी देकर रद्द किया जा सकता है। यह तलाक से अलग है, क्योंकि तलाक में यह माना जाता है कि शादी हो चुकी है, यहाँ यह कहकर ऑर्डर दिया जाता है कि शादी शुरू से ही लीगल नहीं थी।

जब शादी लीगल हो, लेकिन बाद में उसे रद्द करने के लिए अर्जी देनी पड़े। इसके कारण यह हैं कि दोनों में से किसी एक की सही सहमति नहीं ली गई हो या शादी जबरदस्ती की गई हो। इसके अलावा, अगर शादी के समय पत्नी पति के अलावा किसी और आदमी से प्रेग्नेंट हो या पति ने शादी के समय पत्नी के अलावा किसी और औरत को प्रेग्नेंट किया हो, तब भी शादी रद्द करने के लिए अर्जी दी जा सकती है।

इसके अलावा, अगर पति-पत्नी में से किसी एक ने शादी के समय अपनी पहचान छिपाई हो, तब भी शादी रद्द की जा सकती है। इससे ‘लव जिहाद’ जैसे मामलों पर रोक लगेगी, जिसमें मुस्लिम लड़के अपनी पहचान छिपाकर हिंदू लड़कियों से शादी कर लेते हैं। हालाँकि, इस शादी को रद्द करने के आवेदन के लिए एक टाइम लिमिट भी दी गई है।

हलाला और बहुविवाह पर लगी रोक

शादी के एक साल से पहले तलाक की अर्जी नहीं दी जा सकती। खास मामलों में इसकी इजाजत है। अगर कोर्ट को लगता है कि जिसने एप्लीकेशन फाइल की है (पति-पत्नी में से) उसे बहुत ज्यादा परेशानी हो रही है या दूसरा व्यक्ति बहुत ज्यादा परेशानी खड़ी कर रहा है, तो वह एक साल से पहले भी इजाजत दे सकता है।

अगर बाद में पता चलता है कि एक साल पहले ली गई इजाजत गलत जानकारी के आधार पर या कुछ बातें छिपाकर ली गई थी, तो कोर्ट उसे कैंसल कर सकता है। हालाँकि, एक साल पूरा होने के बाद, व्यक्ति दोबारा तलाक के लिए अप्लाई करने के लिए स्वतंत्र है।

UCC इस्लामी प्रैक्टिस ‘हलाला’ पर भी रोक लगाता है, हालाँकि कुछ सरकारी पाबंदियों की वजह से इस शब्द का जिक्र नहीं है। लेकिन यहाँ साफ लिखा है कि एक बार तलाक या शादी रद्द करने का ऑर्डर पास हो जाने के बाद, पति-पत्नी कानूनी तौर पर दोबारा शादी कर सकते हैं यानी हलाला की जरूरत नहीं है।

अगर तलाकशुदा पति/पत्नी को दोबारा शादी करनी है, तो बिना किसी शर्त के दोबारा शादी की जा सकती है, जैसे कि दोबारा शादी से पहले किसी तीसरे व्यक्ति से शादी करना, वगैरह।

साथ ही, अगर शादी रद्द भी हो गई है, तो ऐसी शादी से होने वाले किसी भी बच्चे को जायज बच्चा माना जाएगा। कोर्ट ने बहुविवाह पर भी रोक लगा दी है।

वारिसों के लिए नियम

UCC में वारिसों के लिए भी विस्तार से नियम बताए गए हैं। इसमें बताया गया है कि किसी व्यक्ति की मौत के बाद उसकी प्रॉपर्टी किसे और कैसे मिलेगी। इसमें दो स्थितियां शामिल हैं – एक व्यक्ति की बिना वसीयत के मौत हो जाना और एक व्यक्ति की वसीयत लिखने के बाद मौत होना।

वसीयत के मामले में कोड एक तय ऑर्डर देता है कि प्रॉपर्टी पहले खून के रिश्तेदारों को मिलेगी और फिर बाकी रिश्तेदारों को। पहले अलग-अलग ग्रुप के लिए अलग-अलग नियम थे, जिन्हें अब एक कॉमन अरेंजमेंट से बदल दिया गया है। यह भी साफ किया गया है कि अगर कोई व्यक्ति मर्डर का दोषी है, तो उसे प्रॉपर्टी नहीं मिलेगी। दूसरी ओर, अगर बच्चा गर्भ में है, तब भी उसे हक मिलेगा।

वसीयत के मामले में, कोड यह भी बताता है कि इसे कैसे मान्यता दी जाएगी और इसे कैसे लागू किया जाएगा। व्यक्ति को अपनी इच्छा के अनुसार प्रॉपर्टी बांटने का अधिकार दिया गया है, लेकिन यह भी पक्का किया गया है कि वसीयत धोखाधड़ी, दबाव या किसी और गैर-कानूनी तरीके से न बनाई गई हो। अगर वसीयत में कुछ साफ नहीं है, तो उसे ठीक से समझने और लागू करने के लिए भी नियम बनाए गए हैं।

इसके अलावा, यह भी बताया गया है कि किसी व्यक्ति की मौत के बाद प्रॉपर्टी का मैनेजमेंट कैसे किया जाएगा। इसमें कहा गया है कि पहले कर्ज और दूसरी देनदारियाँ चुकाई जाएँगी। फिर प्रॉपर्टी बाँटी जाएगी। एग्जीक्यूटर या एडमिनिस्ट्रेटर वगैरह का रोल तय किया गया है, जो इस प्रोसेस को देखेंगे। इसके साथ ही बैंक अकाउंट और प्रॉपर्टी ट्रांसफर के कानूनी प्रोसेस के बारे में भी डिटेल में बताया गया है। उत्तराधिकार के मामले में एक साफ एक जैसा और कानूनी तौर पर मजबूत सिस्टम बनाने की कोशिश की गई है।

लिव-इन रिलेशनशिप को मान्यता दी गई

कोड ने लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी मान्यता दी है। कोड इस तरह के रिलेशनशिप को इस तरह बताया है कि एक आदमी और एक औरत एक शादीशुदा जोड़े की तरह एक ही घर में साथ रहते हैं।

इसके लिए जोड़े को रजिस्ट्रार के सामने एक स्टेटमेंट देना होगा। जो सिर्फ रिकॉर्ड के लिए होगा, इससे वह स्टेटस नहीं मिलेगा जो एक शादीशुदा जोड़े को मिलता है। शर्तें ये हैं कि दोनों बालिग होने चाहिए और वे किसी मना किए गए रिश्ते में नहीं होने चाहिए। हालाँकि यहाँ यह भी कहा गया है कि अगर रीति-रिवाज रिश्ते की इजाजत देते हैं, तो यह मनाही लागू नहीं होगी।

अगर कपल में से कोई एक शादीशुदा है या पहले से ही किसी दूसरे लिव-इन रिलेशनशिप में है या अगर दोनों में से कोई एक नाबालिग है, तो रजिस्ट्रेशन नहीं हो पाएगा। साथ ही, इस मामले में उसके माता-पिता को बताना होगा। यहाँ भी शादी की तरह यह व्यवस्था की गई है कि अगर दोनों में से किसी एक पर दबाव डाला गया हो, उसे मजबूर किया गया हो या धोखा दिया गया हो, तो भी रजिस्ट्रेशन नहीं हो पाएगा।

एक जरूरी प्रावधान यह है कि लिव-इन रिलेशनशिप से पैदा हुए किसी भी बच्चे को कपल का जायज बच्चा माना जाएगा और उसके अधिकारों की रक्षा की जाएगी।

लिव-इन खत्म करने के लिए, कोई भी पार्टनर टर्मिनेशन का स्टेटमेंट जमा करके औपचारिक रूप से रिश्ता खत्म कर सकता है, ऐसे में दूसरे को एक कॉपी दी जाएगी।

अगर लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही महिला को उसका पार्टनर छोड़ देता है, तो वह मेंटेनेंस का दावा करने की हकदार होगी और कोर्ट जा सकती है।

शादी से लेकर तलाक और विरासत तक की जानकारी गुजरात यूसीसी में विस्तार से दी गई है। यहाँ तक कि लिव इन रिलेशनशिप में शामिल महिलाओं को भी कानूनी सुरक्षा दी गई है। उनके बच्चों को कानूनी मान्यता दी गई है। इसके बावजूद कॉन्ग्रेस ने इसका विरोध किया है।

कॉन्ग्रेस इस कानून को धार्मिक परंपराओं में हस्तक्षेप मान रही है। दरअसल कॉन्ग्रेस किसी समान नागरिक संहिता के पक्ष में नहीं है, जबकि इसे संविधान के नीति निदेशक तत्व में शामिल किया गया था।

मिडिल ईस्ट संकट पर पाकिस्तान की मुरीद हुई कॉन्ग्रेस, भारत सरकार की कोशिशों पर मूँद ली आँखें: जानें- क्यों ईरान युद्ध में घुसना PAK के लिए मजबूरी?

फिलहाल दुनिया भर में जिस मामले पर प्राथमिकता से बात हो रही है, वह अमेरिका, इजरायल और ईरान का युद्ध है। भारत में भी आपको सड़क-मोहल्ले तक में इस युद्ध के बारे में चर्चा सुनाई देती है। युद्ध के प्रभाव से निजात के लिए भी सरकार आए दिन बयान जारी कर रही है कि भारत अलग-अलग देशों से बातचीत भी कर रहा है। यानी भारत की भूमिका तो है। लेकिन कॉन्ग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत को शायद आँखें मूँद ली हैं, लेकिन हैरानी की बात यह है कि उन्हें पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान की भागीदारी दिखाई दे रही है, जिसे कोई नहीं पूछ रहा।

यह हम नहीं वह खुद कह रही हैं। सुप्रिया श्रीनेत कहती हैं कि ईरान और अमेरिका के युद्ध के समय पाकिस्तान एक अहम देश बनकर सामने आ रहा है, लेकिन इस सब में भारत कहाँ है? यह कहते हुए कॉन्ग्रेस नेता सरकार से सवाल करती हैं, इतने बड़े और अहम फैसलों में हमारी भागीदारी क्यों नहीं दिख रही? अगर यह हमारी विदेश नीति की बड़ी नाकामी नहीं है, तो फिर क्या है?

पाकिस्तान के हित में सुप्रिया श्रीनेत का बयान

दरअसल, सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म ‘एक्स’ पर सुप्रिया श्रीनेत ने ईरान युद्ध को लेकर सरकार से सवाल करते हुए एक वीडियो जारी किया। वीडियो में सरकार से सवाल करने तक तो ठीक था, लेकिन पाकिस्तान के हित में बोलते हुए सुप्रिया श्रीनेत ने कॉन्ग्रेस की राजनीति की पोल खोलकर रख दी।

सुप्रिया श्रीनेत ने भारत सरकार पर सवाल उठाते हुए और पाकिस्तान के हित में बोलते हुए कहा, “मिस्र, तुर्की और पाकिस्तान जैसे देश अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने में मदद कर रहे हैं। सोचिए, पाकिस्तान जैसा देश इस समय ईरान से जुड़े ट्रंप के संकट में अहम देश बनकर सामने आ रहा है। लेकिन इस सब में भारत कहाँ है? इतने बड़े और अहम फैसलों में हमारी भागीदारी क्यों नहीं दिख रही?”

इतना ही नहीं वह भारत को पाकिस्तान से कमतर आँकते हुए यह तक कहती हैं, “यह समझना मुश्किल है कि पाकिस्तान जैसा देश, जिसे अक्सर आतंकवाद से जोड़ा जाता है, इन अहम बातचीतों का हिस्सा है, जबकि भारत नहीं। यह स्थिति बिल्कुल भी सही नहीं लगती।”

मिडिल ईस्ट तनाव पर भारत की भूमिका

जैसा कि सुप्रिया श्रीनेत कहती हैं कि ईरान युद्ध में भारत की कोई भूमिका नहीं दिखाई दे रही है। तो या तो वे भारतीय मीडिया की खबरों को फॉलो नहीं करती हैं, या वो लोगों को सच्चाई दिखाने के बजाए अपना नैरेटिव को आगे लाने की कोशिश कर ही हैं। क्योंकि सच्चाई ये नहीं है।

सच्चाई है कि 28 फरवरी 2026 से शुरू हुए ईरान युद्ध के बाद से ही भारत लगातार मिडिल ईस्ट के देशों से संपर्क बनाए हुए है। 03 मार्च 2026 को ही मिडिल ईस्ट के ओमान, कुवैत और कतर के प्रमुखों से फोन पर बात की। इसी दिन प्रधानमंत्री ने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से भी फोन पर बात की, जिसे लेकर नेतन्याहू ने भी खुशी जाहिर की थी।

यहाँ तक ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान से भी प्रधानमंत्री मोदी की फोन पर बातचीत हुई। इस बातचीत में ईरानी राष्ट्रपति ने भारत की भूमिका को सराहा भी है और कहा कि भारत की कोशिशें जंग खत्म करने की दिशा में बहुत प्रभावी रही हैं। और दोनों नेताओं के बीच ये बातचीत ईद के मौके पर भी हुई, तब भी पीएम मोदी ने जल्द से जल्द मिडिल ईस्ट में तनाव खत्म होने के प्रयास जाहिर किए। युद्ध में अहम भूमिका निभा रहे अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तक खुद प्रधानमंत्री मोदी को फोन कर संकट पर चर्चा कर रहे हैं।

24 मार्च 2026 को राज्यसभा में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि दक्षिण एशिया के ज्यादातर देशों के राष्ट्रध्यक्षों के साथ दो राउंड फोन पर बातचीत हो चुकी है और भारत गल्फ के सभी देशों के साथ संपर्क में है। इसी के साथ भारत ईरान, इजरायल और अमेरिका के भी संपर्क में है। पीएम मोदी ने यह भी दोहराया कि भारत का लक्ष्य संवाद और कूटनीति के माध्यम से क्षेत्र में शांति की बहाली करना है।

इतना ही नहीं युद्ध से भारत पर कोई बड़ा प्रभाव न पड़े, इसकी भी सरकार पूरी तैयारी कर रही है। विदेश मंत्री एस जयशंकर लगातार ईरान और खाड़ी देशों से बात कर रहे हैं। जिस तेल मार्ग ‘स्ट्रेट ऑफ हार्मुज’ को युद्ध के चलते बंद कर दिया गया है, भारत के अच्छे रिश्ते ही हैं जो वहाँ से दो भारतीय टैंकर मार्ग बंद होने के बावजूद गुजर चुके हैं। संकट की शुरुआत में ही मिडिल ईस्ट में रहने वाले भारतीय नागरिकों को सुरक्षित भारत वापस लाया गया।

ये सरकार के प्रयास ही हैं, जो वे जनता पर युद्ध का असर पढ़ने नहीं दे रहे हैं। बावजूद सरकार के प्रयासों का आभार जताने की जगह उल्टा धनुष और तीर लेकर निशाना बनाने में लगे हुए है। तर्क यही है कि भारत मिडिल ईस्ट से लेकर इजरायल और अमेरिका तक के संपर्क में है और आगे भी रहेगा। यहाँ भारत का रुख भी साफ होता है कि वह युद्ध नहीं चाहता, और शांति की बहली चाहता है। और इस युद्ध में भारत की भूमिका पर सवाल करने वालों को भी प्रधानमंत्री मोदी जवाब दे चुके हैं- हम सिर्फ भारत और उसके हितों के साथ हैं। तो सवाल तो बनता ही नहीं है कि भारत की इस युद्ध में कोई भूमिका नहीं दिखाई देती।

ईरान युद्ध में पाकिस्तान की भागीदारी कितनी और क्यों है?

रही पाकिस्तान की बात, तो ईरान युद्ध में पाकिस्तान क्यों घुसा पड़ा है? ये उसकी मजबूरी है। क्योंकि ईरान से जुड़ा कोई भी तनाव हो, पाकिस्तान उससे दूर रह ही नहीं सकता। क्योंकि मामला यहाँ सिर्फ वैश्विक राजनीतिक का नहीं, बल्कि उसकी खुद की सुरक्षा का भी है। वह खुद पर होने वाले हमले से डरा बैठा है।

वजह साफ है कि पाकिस्तान की सीधी सीमा ईरान से लगती है और अगर वहाँ हालात बिगड़ते हैं तो उसका असर सीधे पाकिस्तान पर पड़ता है। इसीलिए पाकिस्तान चाहे जितना तटस्थ दिखने की कोशिश करे, उसे हर समयय सतर्क रहना पड़ता है और मौके पर एक्टिव होना ही पड़ता है।

इस ईरान युद्ध में पाकिस्तान की भूमिका को और तेज बनाते हैं उसके रिश्ते, खासकर सऊदी अरब के साथ। सऊदी और ईरान की दुश्मनी किसी से छिपी नहीं है और पाकिस्तान अक्सर सऊदी के करीब नजर आता है। ऐसे में जब भी ईरान के खिलाफ माहौल बनता है, पाकिस्तान पर दबाव अपने आप बढ़ जाता है कि वह किस तरफ खड़ा है। वह चाहकर भी खुद को इससे अलग नहीं कर सकता।

मुल्क के अंदर के हालात भी उसे मजबूर करते हैं। पाकिस्तान में शिया और सु्न्नी दोनों समुदाय रहते हैं और ईरान शिया देश है। अगर ईरान से जुड़ा बड़ा टकराव होता है, तो पाकिस्तान के अंदर भी माहौल भड़कता है। यही डर उसे हर कदम सोच-समझकर चलने पर मजबूर करता है, लेकिन चुप बैठना उसके लिए ऑप्शन ही नहीं है।

लेकिन सच्चाई ये है कि बड़े फैसले लेने वाली ताकतें जैसे अमेरिका, ईरान या खाड़ी के बड़े देश पाकिस्तान को इस मुद्दे में कोई खास अहमियत नहीं देते। पाकिस्तान न तो इतना ताकतवर है कि वह खेल पलट दे और न ही उसके पास ऐसा प्रभाव है कि कोई उसे निर्णायक भूमिका दे। इसलिए उसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है, चाहे वह कितना भी एक्टिव क्यों न दिखे।

इसके बावजूद पाकिस्तान खुद को इस मामले में दिखाने की कोशिश करता है, क्योंकि उसे अपनी इंटरनेशनल इमेज मजबूत करनी होती है और सऊदी अरब जैसे देशों के साथ अपने रिश्ते भी निभाने होते हैं। लेकिन असलियत यही है कि वह साइडलाइन पर खड़ा खिलाड़ी है, जिसे मैदान में जगह खुद बनानी पड़ती है।

सीधी बात ये है कि पाकिस्तान इस पूरे मामले में घुसा जरूर पड़ा है, लेकिन उसे कोई खास पूछ नहीं रहा। उसकी भागीदारी ज्यादा मजबूरी और दिखावे की है, जबकि असली खेल बड़े देश अपने हिसाब से खेल रहे हैं।

निष्कर्ष: फिर भी कॉन्ग्रेसी पाकिस्तान के मुरीद बन सरकार से कर रहे सवाल

वैश्विक राजनीति में पाकिस्तान की अहमियत कितनी है यह पूरी दुनिया जानती है। पाकिस्तान डर के मारे इधर-उधर फोन घुमा रहा है, लेकिन उखाड़ फिर भी कुछ नहीं पा रहा है। जबकि भारत की भूमिका पर दुनियाभर के नेता आभार जता रहे हैं। बावजूद भारत में कॉन्ग्रेसी पाकिस्तान के मुरीदन बन सरकार पर सवाल उठा रहे हैं।

चलो एक बार को सोचते हैं कि देश में विरोधी पार्टी होने के नाते कॉन्ग्रेस का सरकार से हर वो सवाल करना बनता है, जो वो चाहे। लेकिन सवालों में पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान का प्रोपेगेंडा और उसके हित में बातें करना कहाँ तक ठीक है। या तो कॉन्ग्रेस धुरंधर 2 जैसी काल्पनिक फिल्म के दावों को सही मानकर बैठ गई है, जिसमें दावा किया गया है कि कॉन्ग्रेस पाकिस्तान से चलती है, क्योंकि सुप्रिया श्रीनेत और कॉन्ग्रेस के आए दिन पाकिस्तान के प्रति प्रेम से तो यही झलकता है।

सुप्रिया श्रीनेत को समझना होगा कि भारत की पाकिस्तान से कभी तुलना नहीं की जा सकती है। कहाँ एक वो देश, जिसका दुनियाभर में आतंकवाद गतिविधियों में नाम सामने आ रहा है। और कहाँ भारत, जो युद्ध जैसे संकट में भी स्थिर है और आगे भी हर संकट से लड़ने का जज्बा रखता है।