बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में भारतीय जनता पार्टी की जीत के बाद से ही तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के कार्यकर्ता बौखलाए हुए हैं। राज्य के कई हिस्सों से भाजपा समर्थकों और कार्यकर्ताओं पर हमलों और हत्याओं की खबरें आ रही हैं। कहीं बम फेंके जा रहे हैं- कहीं गोलियाँ चल रही हैं।
इन सब खबरों के बीच एक तरफ सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि राज्य में दंगाई ये सब तब कर रहे हैं जब उन्हें पता है कि भाजपा सरकार बनने के बाद वो बख्शे नहीं जाएँगे। दूसरी तरफ ये कल्पना की जा रही है कि यदि 2026 के परिणाम 2021 जैसे होते, तो राज्य के आम नागरिकों और हिंदुओं का क्या हश्र होता।
आज जब बंगाल एक नए दौर की ओर बढ़ने को तैयार हो रहा है, तो 2021 की उन भयावह यादों को ताजा करना जरूरी है, ताकि वर्तमान परिवर्तन की अहमियत को समझा जा सके। 2021 के नतीजों के बाद बंगाल ने हिंसा का जो दौर देखा था वह पश्चिम बंगाल पर लगा कलंक है।
क्या हुआ था 2021 के चुनावी नतीजों के बाद
वो दिन 2 मई 2021 का था। टीवी पर इधर चुनावी नतीजों में इधर टीएमसी को बहुमत मिलता दिखा, उधर पूरे राज्य में चुन-चुनकर भाजपा समर्थकों को निशाना बनाए जाने की खबरें, तस्वीरें और वीडियोज आने लगीं।
उस वक्त चुन-चुनकर भाजपा समर्थकों के घरों में तोड़फोड़ की गई, कार्यकर्ताओं के परिजनों के साथ मारपीट हुई और उनपर क्रूड बमों से हमले किए गए। राजनीतिक प्रतिशोध की इंतेहा ये थी कि कई कार्यकर्ताओं की बेरहमी से हत्या कर दी गई- किसी कीलाश पेड़ से लटकी मिली, तो किसी को चाकुओं से गोद दिया गया। माता-पिता के सामने बच्ची की बलात्कार की बातें सामने आईं। बच्चे के सामने माँ का कत्ल हुआ। उस समय 40 से ज्यादा घटनाएँ थी, जिन्हें ऑपइंडिया ने भी रिपोर्ट किया था।
4. Even married Hindu women were picked up in places like Diamond Harbour and their husbands were asked to cough up INR 25000 to secure the release of their wives, failing which they would continue to be "used" by TMC cadre. I personally spoke with some of the affected families.
2021 में हुई सभी हिंसा की घटनाओं की खबरें सुन पूरा देश सन्न था और दूसरी तरफ तत्कालीन बंगाल सरकार के कान में जूँ नहीं रेंग नहीं थी। मीडिया से बात करते हुए केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने के हवा-हवाई दावे हो रहे थे, वहीं दूसरी ओर पुलिस बल मूकदर्शक बने बैठे थे। पीड़ितों से मिलने जा रहे अन्य राज्यों के लोगों को रोका जा रहा था कि कहीं असलियत बाहर न आ जाए। स्थिति इतनी विकट हो गई थी कि हजारों हिंदुओं को अपनी जान बचाने के लिए पलायन करना पड़ा था।
हिंदुओं को करना पड़ा पलायन
भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष जेपी नड्डा ने तब बताया था कि उस दौरान हुई राजनीतिक हिंसा के कारण लगभग 80000 से 100000 हिंदू परिवार विस्थापित हुए। बंगाल में सुरक्षा न मिलने के कारण बड़ी संख्या में लोगों ने पड़ोसी राज्य असम के धुबरी जिले में शरण ली।
वहीं, 14 मई 2021 को विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने दावा किया कि इस हिंसा से 3500 से अधिक गाँव और लगभग 40,000 हिंदू प्रभावित हुए। परिषद के अनुसार, इस मारकाट में सबसे अधिक अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को निशाना बनाया गया। वीएचपी ने इस संबंध में तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को पत्र लिखकर तत्काल हस्तक्षेप की माँग की थी।
फैक्ट फाइंडिंग टीम की जाँच
इसके बाद 29 जून 2021 को सिक्किम हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश प्रमोद कोहली की अगुवाई वाली फैक्ट फाइंडिंग टीम ने अपनी रिपोर्ट में चौंकाने वाले तथ्य रखे। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में बताया कि बंगाल में परिणाम घोषित होने के बाद राज्य में हिंसा की करीब 15000 घटनाएँ घटी थीं। इन वारदातों में 25 लोगों की जान गई और लगभग 7000 महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार हुआ था।
मानवाधिकार आयोग ने HC को दी रिपोर्ट
इसके बाद 14 जुलाई को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने हाईकोर्ट में अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपी थी। उनकी 7 सदस्यीय टीम ने 20 दिनों के भीतर 311 स्थानों का मुआयना किया था। आयोग ने अपनी कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा था कि राज्य में ‘कानून का शासन’ नहीं, बल्कि ‘शासक का कानून’ चल रहा है।
मानवाधिकार आयोग ने बताया था कि उन्हें 23 जिलों से कुल 1979 शिकायतें मिलीं, जिनमें से अधिकांश कूच बिहार, बीरभूम, बर्धमान, उत्तर 24 परगना और कोलकाता से थीं। इन शिकायतों में हत्या, दुष्कर्म, छेड़खानी और आगजनी जैसे जघन्य अपराध शामिल थे। आयोग ने महिलाओं पर हुए अत्याचार की उन 57 शिकायतों का भी जिक्र किया जो उन्हें राष्ट्रीय महिला आयोग से प्राप्त हुई थीं। रिपोर्ट की गंभीरता को देखते हुए आयोग ने स्पष्ट सिफारिश की थी कि इस पूरे मामले की जाँच सीबीआई (CBI) को सौंपी जाए।
अदालत का रुख
बता दें कि बंगाल में 2021 में हुई हिंसा पर कोलकाता हाई कोर्ट ने भी संज्ञान लिया था। मई में ही अदालत ने ममता सरकार को तीन सदस्यीय समिति का गठन करने का आदेश दिया था, जिसमें एनएचआरसी, राज्य मानवाधिकार आयोग और राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण के एक-एक सदस्य होने थे। कोर्ट ने समिति को स्थानीय पुलिस के साथ कॉर्डिनेट करके उन सभी लोगों की सकुशल वापसी सुनिश्चित करने का काम सौंपा था जो डर से पलायन कर गए थे।
इसके बाद अदालत ने अगस्त 2021 में भी जनहित याचिकाओं पर सुनवाई तरते हुए इस संबंध में आदेश दिया था। कोर्ट ने चुनावी नतीजों के बाद हुई हत्या, बलात्कार, हिंसा, महिलाओं के खिलाफ हुए अपराधों जैसी गंभीर घटनाओं की जाँच सीबीआई को सौंप दी थी। वहीं अन्य अपराध जैसे मारपीट, आगजनी और घर जलाना आदि के लिए लिए राज्य पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों की एक विशेष जाँच टीम (SIT) बनाई गई थी।
बाद में हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ ममता सरकार सुप्रीम कोर्ट भी गई। दलील दी कि आखिर सीबीआई क्यों उनकी मर्जी के बगैर इन केसों की जाँच कर रही है। हालाँकि अदालत ने केस की गंभीरता देखते हुए पड़ताल को जारी रखने का निर्देश दिया। बाद में CBI ने इस मामले में दर्जनों चार्जशीट दाखिल की और गिरफ्तारियाँ भी हुईं। शुरू में इस केस के कई मामलों की सुनवाई निचली अदालतों में चली। लेकिन 2024 में सीबीआई की एक याचिका पर गौर करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल की सरकार को नोटिस जारी किया, साथ ही राज्य की निचली अदालतों में चल रही कार्यवाही पर रोक लगा दी।
हाल ही में हुए स्थानीय निकाय चुनावों के बाद गुजरात की राजनीति में कई तरह के विवाद देखने को मिले हैं। खास तौर पर अहमदाबाद नगर निगम चुनाव में कॉन्ग्रेस की टिकट बांटने की रणनीति ने राजनीतिक माहौल को गरमा दिया है। चुनाव के दौरान यह चर्चा तेज रही कि कॉन्ग्रेस ने हिंदू बहुल इलाकों में मुस्लिम उम्मीदवार उतारकर एक नया और विवादित राजनीतिक प्रयोग किया है।
अगर चुनाव के आंकड़ों पर नजर डालें तो कॉन्ग्रेस की यह रणनीति ज्यादा असरदार साबित नहीं हुई। राज्यभर में कॉन्ग्रेस के 2223 उम्मीदवार अपनी जमानत तक नहीं बचा पाए। इसे इस बात के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है कि जनता ने कॉन्ग्रेस की इस राजनीति को स्वीकार नहीं किया।
हालाँकि मणिनगर और पालडी जैसे इलाकों में किए गए ये प्रयोग आगे की राजनीति को लेकर नई बहस जरूर खड़ी कर रहे हैं। कॉन्ग्रेस ने पालडी जैसे अहम इलाके से फाहेजबानो और मणिनगर वार्ड से फारूक शेख को टिकट देकर राजनीतिक हलकों में चर्चा बढ़ा दी।
आमतौर पर राजनीतिक दल किसी भी क्षेत्र में उम्मीदवार चुनते समय वहाँ की आबादी और सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखते हैं, लेकिन कॉन्ग्रेस के इस फैसले को कई लोग एक सोची-समझी रणनीति के तौर पर देख रहे हैं। इसी वजह से अब इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है।
कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस रणनीति के पीछे तथाकथित ‘ग्रीन बेल्ट’ की सोच काम कर रही है। पहले कॉन्ग्रेस का प्रभाव मुख्य रूप से जमालपुर और दानिलिम्दा जैसे मुस्लिम बहुल इलाकों तक सीमित माना जाता था, लेकिन अब पार्टी पश्चिमी अहमदाबाद के हिंदू बहुल क्षेत्रों में भी अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश करती दिख रही है।
इसे केवल चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि शहर की बदलती सामाजिक और राजनीतिक तस्वीर से जोड़कर देखा जा रहा है। अब तक यह आरोप लगाए जाते रहे हैं कि अहमदाबाद के कुछ इलाकों में एक खास पक्ष द्वारा संपत्ति खरीद के जरिए अपनी मौजूदगी बढ़ाई जा रही है।
वहीं अब विपक्षी दलों का आरोप है कि कॉन्ग्रेस इस मुद्दे को राजनीतिक समर्थन देने की कोशिश कर रही है। उनका कहना है कि अगर किसी क्षेत्र का पार्षद मुस्लिम समुदाय से होगा, तो वह अपने समुदाय के लोगों को वहाँ बसने या संपत्ति खरीदने में मदद कर सकता है। इसी आधार पर कुछ लोग भविष्य में इलाकों की जनसंख्या संरचना बदलने की आशंका भी जता रहे हैं।
एलिसब्रिज के विधायक ने चेतावनी दी
एलिसब्रिज के विधायक अमित शाह ने भी सोशल मीडिया के जरिए इस मुद्दे पर लोगों का ध्यान खींचने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस हिंदू बहुल इलाकों में एक विशेष समुदाय का राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने की दिशा में काम कर रही है।
साथ ही उन्होंने यह आशंका भी जताई कि अगर ऐसे क्षेत्रों में मुस्लिम पार्षद चुने जाते हैं, तो इसका वहाँ के सामाजिक माहौल और लंबे समय से चली आ रही सांस्कृतिक पहचान पर असर पड़ सकता है।
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, यह पूरी रणनीति ‘ब्लॉक वोटिंग’ के आधार पर काम करती है। उनका कहना है कि मुस्लिम मतदाता अक्सर संगठित तरीके से बड़ी संख्या में मतदान करते हैं, जबकि कई हिंदू बहुल इलाकों में मतदान प्रतिशत अपेक्षाकृत कम रहता है।
ऐसे में अगर मतदाता यह सोचकर मतदान से दूर रहते हैं कि उनका क्षेत्र पहले से किसी एक दल का मजबूत गढ़ है, तो चुनावी समीकरण बदल सकते हैं। इसी वजह से अब इन चुनाव नतीजों को लेकर राजनीतिक बहस और भी तेज हो गई है।
क्या कॉन्ग्रेस सिर्फ मुसलमानों के लिए है?
विपक्षी दलों और कई राजनीतिक टिप्पणीकारों का आरोप है कि कॉन्ग्रेस अब अपनी राजनीति में मुस्लिमों को ज्यादा प्राथमिकता देती नजर आ रही है। इसी बहस के बीच एक हिंदू कॉन्ग्रेस विधायक के दरगाह जाकर चुनाव जीतने की मन्नत माँगने की खबर भी चर्चा में रही।
ऐसे मामलों को लेकर विरोधी दल यह दावा कर रहे हैं कि कॉन्ग्रेस वोट बैंक की राजनीति के लिए अपनी पारंपरिक छवि और राजनीतिक संतुलन से समझौता कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर कॉन्ग्रेस की यह रणनीति आगे सफल होती है, तो भविष्य में कई हिंदू बहुल इलाके राजनीतिक रूप से अलग-थलग पड़ सकते हैं।
उनका मानना है कि इससे स्थानीय प्रतिनिधित्व और सामाजिक संतुलन को लेकर नई बहस खड़ी हो सकती है। कुछ लोग यह भी आशंका जता रहे हैं कि जनसंख्या और राजनीतिक समीकरणों में बड़े बदलाव भविष्य में सामाजिक तनाव बढ़ा सकते हैं, जिसका असर शहर के माहौल और आपसी सौहार्द पर पड़ सकता है।
राज्यभर में कॉन्ग्रेस के 2223 उम्मीदवारों की जमानत जब्त होना भी राजनीतिक चर्चा का बड़ा विषय बना हुआ है। भाजपा और उससे जुड़े संगठनों का कहना है कि यह सिर्फ चुनावी हार नहीं, बल्कि कॉन्ग्रेस की रणनीति के खिलाफ जनता की नाराजगी का संकेत है।
उनका दावा है कि लोग अब विकास के साथ-साथ सांस्कृतिक और सामाजिक मुद्दों को भी गंभीरता से देखने लगे हैं। इसी वजह से कॉन्ग्रेस की इस नई चुनावी रणनीति ने भाजपा और हिंदू संगठनों को भी अधिक सतर्क कर दिया है।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
गुजरात में स्थानीय निकाय चुनाव खत्म हो चुके हैं और नतीजे भी सामने आ गए हैं। हर बार की तरह इस बार भी भाजपा ने बड़ी और ऐतिहासिक जीत हासिल की है। लेकिन इस जीत के बीच कुछ ऐसे इलाके भी हैं जहाँ भाजपा को हार का सामना करना पड़ा।
खास तौर पर अहमदाबाद के कुछ क्षेत्रों में भाजपा पीछे रह गई, जहाँ अल्पसंख्यक, खासकर मुस्लिम मतदाताओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। भाजपा की बड़ी जीत के बीच अब हम उस दूसरे पहलू की बात कर रहे हैं, जिस पर ध्यान देना भी काफी जरूरी है।
अहमदाबाद नगर निगम यानी AMC चुनाव में भाजपा ने 160 से ज्यादा सीटें जीतकर बड़ा रिकॉर्ड बनाया है। लेकिन इन नतीजों का दूसरा पक्ष भी चर्चा में है। जिन वार्डों में कॉन्ग्रेस को जीत मिली है उनमें मक्तमपुरा, दरियापुर, जमालपुर, बहरामपुरा, दानिलिमदा, गोमतीपुर और खड़िया शामिल हैं। इन इलाकों में मुस्लिम आबादी करीब 30 से 40 प्रतिशत तक है, जबकि कुछ जगहों पर यह आँकड़ा करीब 60 प्रतिशत तक है।
सवाल ये नहीं है कि कॉन्ग्रेस ने इन क्षेत्रों में जीत हासिल की या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि इन क्षेत्रों में भाजपा के लिए रास्ता क्यों बंद कर दिया गया?
बदलते जनसंख्या संतुलन का असर
जब किसी इलाके में अल्पसंख्यक आबादी 40 प्रतिशत से ज्यादा हो जाती है, तो वहाँ चुनाव का पूरा गणित बदल जाता है। विकास, पानी, सीवर और सड़क जैसे मुद्दे धीरे-धीरे पीछे चले जाते हैं। ऐसे क्षेत्रों में सबसे ज्यादा असर ब्लॉक वोटिंग का देखने को मिलता है।
मुस्लिमों ने एकजुट होकर कॉन्ग्रेस के पक्ष में वोट किया है। चुनाव नतीजे यह दिखाते हैं कि यहाँ वोटिंग सिर्फ स्थानीय मुद्दों पर नहीं हुई, बल्कि धार्मिक पहचान और संख्या के आधार पर भी मतदान देखने को मिला। यही वजह है कि कई इलाकों में कॉन्ग्रेस को सीधा फायदा मिला और आज पार्टी काफी हद तक इसी वोट बैंक के सहारे अपनी मौजूदगी बनाए हुए है।
शहर के दो अलग-अलग चेहरे
अहमदाबाद के पश्चिम और पूर्व के हिंदू बहुल इलाकों में मतदान अलग-अलग मुद्दों पर बंटा हुआ दिखाई देता है। वहाँ लोग विकास, विचारधारा और स्थानीय कामकाज को ध्यान में रखकर वोट देते हैं। लेकिन जिन इलाकों को अब ‘ग्रीन बेल्ट’ कहा जा रहा है, वहाँ तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आती है।
पिछले दस वर्षों में इन क्षेत्रों की आबादी के संतुलन में तेजी से बदलाव हुआ है, जिसे कई लोग चिंता का विषय मान रहे हैं। राजनीतिक और सामाजिक तनाव के बीच यह जनसांख्यिकीय बदलाव भविष्य में शहर की शांति और राजनीतिक स्थिरता पर असर डाल सकता है।
कभी पूरे गुजरात पर शासन करने वाली कॉन्ग्रेस अब कुछ चुनिंदा इलाकों तक सीमित होती दिखाई दे रही है। पार्टी को लगता है कि हिंदू वोटों में पकड़ मजबूत करने से ज्यादा आसान मुस्लिम वोट बैंक को अपने साथ बनाए रखना है।
इसी कारण भाजपा के लिए उन इलाकों में पारंपरिक तरीके से चुनाव लड़ना कठिन होता जा रहा है, जहाँ आबादी का संतुलन तेजी से बदल रहा है। AMC के ये नतीजे सिर्फ सामान्य चुनाव परिणाम नहीं माने जा रहे, बल्कि इन्हें अहमदाबाद के भविष्य के संकेत के तौर पर भी देखा जा रहा है।
आँकड़े साफ बताते हैं कि अगर जनसंख्या संतुलन में यह बदलाव इसी तरह जारी रहा, तो आने वाले समय में कुछ इलाकों में चुनावी राजनीति पूरी तरह संख्या आधारित होती चली जाएगी।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
द टिमोथी इनिशिएटिव (TTI) अवैध तरीके से भारत में लाए गए फंड के जरिए मिशनरी गतिविधियों को बढ़ावा देने के आरोपों के बाद जाँच के घेरे में है। यह खुद को एक ‘ग्लोबल चर्च प्लांटिंग ऑर्गेनाइजेशन’ बताता रहा है। संगठन खुले तौर पर कहता है कि उसका मकसद दुनिया भर में चर्चों की संख्या बढ़ाना है और इस लक्ष्य में भारत उसकी प्राथमिकता में शामिल है।
TTI ने कई ऐसी किताबें और मैनुअल तैयार किए हैं जिनमें चर्च प्लांटर्स को सिखाया जाता है कि हिंदुओं और अन्य समुदायों तक कैसे पहुँचना है, गाँवों में बिना विरोध के कैसे घुसना है और कैसे लोगों को ईसाई धर्म की ओर आकर्षित करना है। OpIndia को TTI की ऐसी 10 किताबें और मैनुअल मिले हैं जो पूरे नेटवर्क और उसकी कार्यप्रणाली पर प्रकाश डालते हैं।
इस सीरीज की पिछली रिपोर्ट में बताया गया था कि Book 10 में मिशनरियों को हिंदू गाँवों में प्रवेश करने, शक से बचने, सीधे प्रचार के बजाय ‘सॉफ्ट तरीकों’ का इस्तेमाल करने और गाँवों को ‘बुरी आत्माओं’ या ‘हिंदू देवी-देवताओं की निगरानी’ वाला क्षेत्र बताकर वहाँ जाने से पहले ‘सुरक्षा की प्रार्थना’ करने तक की ट्रेनिंग दी जाती है।
रिसर्च के दौरान एक ऐसी रणनीति भी सामने आई जिसमें TTI चर्च प्लांटर्स को अलग-अलग जातियों के नेताओं का इस्तेमाल कर लोगों को ईसाई धर्म की ओर लाने की सलाह देता है। Book 1 में, जहाँ TTI ने अपने ‘कोर वैल्यूज’ लिखे हैं, वहाँ वह कहता है कि उसका उद्देश्य हर व्यक्ति तक पहुँचना है, जिसमें छोटी-बड़ी जातियाँ, जनजातियाँ, शहर, दूरदराज गाँव, अमीर और गरीब सभी शामिल हैं।
ऊपरी तौर पर यह सामान्य बात लग सकती है, लेकिन जब इसे Book 10 में दी गई रणनीतियों के साथ पढ़ा जाता है, तो साफ होता है कि TTI जाति को सिर्फ सामाजिक वास्तविकता के रूप में नहीं देखता, बल्कि हिंदुओं के बीच धर्मांतरण को आसान बनाने के एक व्यावहारिक माध्यम की तरह इस्तेमाल करता है।
मैनुअल में लिखा है कि मिशनरियों को ‘जातियों से जुड़े जटिल मुद्दों’ को ध्यान में रखना चाहिए और ‘हर जाति से नेताओं को चुनना ज्यादा प्रभावी’ हो सकता है, क्योंकि वे अपनी ही जाति के लोगों को ‘मसीह की ओर लाने में ज्यादा ताकतवर साबित’ होते हैं।
यह हिस्सा इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यहाँ जाति को किसी सामाजिक समस्या या अन्याय के रूप में नहीं दिखाया गया। इसे सीधे तौर पर मिशनरी काम को अधिक प्रभावी बनाने के साधन के रूप में पेश किया गया है।
मिशनरी रणनीति में जाति को कैसे शामिल करता है TTI
Book 10 के ‘World Religions & Cults’ नाम के अध्याय में हिंदू धर्म पर अलग से चर्चा की गई है। इसमें पहले हिंदुओं की मान्यताओं का अपना विश्लेषण दिया गया है और फिर कर्म तथा पुनर्जन्म जैसी अवधारणाओं को चुनौती देने के तरीके बताए गए हैं। इसके बाद मैनुअल सीधे फील्ड लेवल रणनीति पर पहुँच जाता है।
इसमें कहा गया है कि मिशनरियों को हिंदू गाँवों को ‘आध्यात्मिक रूप से विरोधी’ क्षेत्र मानकर चलना चाहिए। गाँवों में प्रवेश करने से पहले प्रार्थना करनी चाहिए, ऐसे तरीकों से बचना चाहिए जिनसे लोगों को शक हो और सीधे प्रचार की जगह नरम तरीके अपनाने चाहिए।
इन्हीं निर्देशों के बीच जाति को लेकर भी एक अहम बात कही गई है। मैनुअल में साफ लिखा है, “जातियों से जुड़े जटिल मुद्दों को ध्यान में रखें। कई बार हर जाति से नेताओं को चुनना ज्यादा प्रभावी होता है क्योंकि वे अपनी ही जाति के लोगों को मसीह की ओर लाने में अधिक सक्षम होते हैं।”
(साभार: TTI)
यहाँ कोई धार्मिक चर्चा नहीं है। यह सीधा ऑपरेशनल निर्देश है। यानी TTI चर्च प्लांटर्स को बता रहा है कि अगर स्थानीय जाति आधारित नेताओं को माध्यम बनाया जाए, तो धर्मांतरण का काम ज्यादा आसान हो सकता है। सरल शब्दों में कहें तो अगर ऐसे प्रभावशाली लोगों का धर्मांतरण हो जाए, तो वे अपनी जाति के बाकी लोगों को भी प्रभावित कर सकते हैं।
सामाजिक मुद्दा नहीं, धर्मांतरण का माध्यम बन गई जाति
इस मॉडल को अपनाने वाले मिशनरियों के लिए जाति अब सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि धर्मांतरण का साधन बन जाती है। आम तौर पर जाति पर चर्चा समानता, सम्मान, अधिकार और सामाजिक न्याय के संदर्भ में होती है, लेकिन TTI का मैनुअल इन पहलुओं पर बात ही नहीं करता।
मैनुअल का फोकस सिर्फ ‘प्रभावशीलता’ पर है। यहाँ चिंता जातिगत अन्याय की नहीं, बल्कि धर्मांतरण को ज्यादा सफल बनाने की दिखाई देती है। हिंदू समाज की सामाजिक संरचना को समझने के बाद यह देखा जा रहा है कि किसके जरिए किस तक पहुँचा जा सकता है और कौन किसे ज्यादा आसानी से प्रभावित कर सकता है।
मैनुअल में जाति आधारित नेता को समाज सुधारक के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे व्यक्ति के रूप में दिखाया गया है जो ‘स्थानीय लोगों को मसीह तक पहुँचाने में ज्यादा ताकतवर’ हो सकता है। सीधे शब्दों में कहें तो TTI का यह मॉडल जातीय पहचान और सामाजिक भरोसे को मिशनरी संपत्ति की तरह इस्तेमाल करने की बात करता है।
भारतीय संदर्भ में यह मामला क्यों महत्वपूर्ण?
भारत में जाति सिर्फ एक सामाजिक श्रेणी नहीं है। यह स्थानीय पहचान, भरोसे और सामाजिक व्यवहार से गहराई से जुड़ी हुई है। ऐसे में अगर कोई संगठन जाति को खत्म करने या सुधारने के बजाय उसे धार्मिक प्रभाव के लिए इस्तेमाल करने की रणनीति बनाए, तो मामला सिर्फ सामान्य प्रचार तक सीमित नहीं रह जाता।
TTI की भाषा से साफ संकेत मिलता है कि उसका उद्देश्य जाति चेतना को खत्म करना नहीं, बल्कि उसी का इस्तेमाल कर धर्मांतरण को आसान बनाना है। संगठन यह नहीं कहता कि मिशनरियों को जाति से ऊपर उठना चाहिए। वह कहता है कि जाति आधारित स्थानीय नेतृत्व का उपयोग करना ज्यादा असरदार होता है।
यह रणनीति स्थानीय विरोध को कम करने के लिए भी बनाई गई लगती है। कई जगहों पर गाँवों या समुदायों के प्रभावशाली लोग धर्मांतरण का विरोध करते हैं। लेकिन अगर वही लोग ईसाई धर्म अपना लें, तो वे अपने प्रभाव का इस्तेमाल बाकी समुदाय को प्रभावित करने में कर सकते हैं।
यही वजह है कि इस मुद्दे को सामान्य प्रचार गतिविधि कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मैनुअल साफ दिखाता है कि हिंदू समाज की सामाजिक संरचना के भीतर रहते हुए किस तरह विरोध कम करने और धर्मांतरण की संभावना बढ़ाने की रणनीति बनाई गई है।
सामान्य प्रचार से जाति आधारित टारगेटिंग तक
TTI की पूरी कार्यप्रणाली में एक बड़ा पैटर्न दिखाई देता है, जो सामान्य प्रचार से अलग है। संगठन ने मिशनरी काम करने के तरीके को बदल दिया है। शुरुआत में जाति को सिर्फ उन समुदायों के रूप में दिखाया जाता है जिन तक पहुँचना है, लेकिन फील्ड लेवल पर वही जाति धर्मांतरण का व्यावहारिक माध्यम बन जाती है।
इससे यह संकेत मिलता है कि TTI सिर्फ हिंदू समाज को समझ नहीं रहा, बल्कि उसकी सामाजिक संरचनाओं का रणनीतिक इस्तेमाल भी कर रहा है। लंबे समय तक मिशनरियों और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जाति को सामाजिक समस्या के रूप में पेश किया जाता रहा है, लेकिन इस नए मॉडल में वही जाति धर्मांतरण को आसान बनाने का जरिया बनती दिखाई देती है।
कई मामलों में यह भी देखा गया है कि धर्मांतरण के बाद भी लोग अपनी जातिगत पहचान नहीं छोड़ते। ईसाई बनने के बाद भी कुछ समूहों ने जाति आधारित आरक्षण और सुविधाओं की माँग जारी रखी है।
ऐसी संभावना जताई जा रही है कि TTI जैसे संगठन उन प्रयासों के पीछे हो सकते हैं जो धर्मांतरण के बाद भी पूर्व SC/ST समुदायों को जाति आधारित लाभ दिलाने के लिए कानून बनाने की माँग कर रहे हैं। अगर ऐसा होता है, तो धर्मांतरण की प्रक्रिया और आसान हो सकती है।
(आने वाली रिपोर्टों में OpIndia भारत में TTI की मौजूदगी और दूसरे चर्च समूहों से उसके संबंधों की पड़ताल करेगा। इस सीरीज के पहले हिस्से को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें और दूसरे हिस्से की रिपोर्ट के लिए यहाँ क्लिक कर पढ़ सकते हैं।)
उत्तर प्रदेश के बरेली में जो हुआ, वह सिर्फ एक जुर्म नहीं बल्कि भरोसे का कत्ल है। ‘अल्टीमेट फिटनेस जिम’ के मालिक अकरम बेग और उसके भाई आलम ने एक पढ़ी-लिखी हिंदू महिला डॉक्टर को अपना शिकार बनाकर जिम जाने वाली सभी महिलाओं को डर में डाल दिया है।
दो साल तक टॉर्चर और पैसों की लूट सहने के बाद, जब डॉक्टर ने हिम्मत दिखाई और पुलिस के पास गईं, तब जाकर इस घिनौनी साजिश का पर्दाफाश हुआ। अब जानते हैं कि कैसे वजन घटाने के बहाने ये दोनों भाई हिंदू महिलाओं के साथ गंदा खेल खेल रहे थे।
फिटनेस का झांसा और ‘नशीली ड्रिंक’ की साजिश
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, बरेली के नामी इलाके सिविल लाइंस में ‘अल्टीमेट फिटनेस जिम’ पिछले 10 साल से चल रहा था। यहाँ शहर की बड़ी और रसूखदार महिलाएँ कसरत के लिए आती थीं, जिनमें करीब 80 हिंदू महिलाएँ थीं। जिम का मालिक अकरम बेग खुद को एक बड़ा प्रोफेशनल ट्रेनर बताता था। उसने एक 40 साल की महिला डॉक्टर को झांसा दिया कि वह उनका वजन बहुत जल्दी घटा देगा।
एक सोची-समझी साजिश के तहत, अकरम बेग उस डॉक्टर को रोज कसरत से पहले एक खास ड्रिंक (प्री-वर्कआउट ड्रिंक) पिलाता था। वह चुपके से उस ड्रिंक में नशीली दवा मिला देता था। ड्रिंक पीते ही जब डॉक्टर बेहोश होने लगतीं, तो अकरम बेग उन्हें जिम के एक कोने में बने गुप्त कमरे में ले जाता था, जहाँ किसी और को जाने की इजाजत नहीं थी। इसी कमरे में अकरम ने डॉक्टर के साथ रेप किया। इस जुर्म में अकरम का भाई आलम भी पूरा साथ देता था। आलम ही नशीली दवाएँ लाकर देता था और कमरे के बाहर पहरा देता था ताकि कोई अंदर न आ सके।
हिडन Camera, पेन ड्राइव और 50 लाख की ब्लैकमेलिंग
इन आरोपितों का मकसद सिर्फ डॉक्टर को परेशान करना नहीं था, बल्कि वे इसे पैसा कमाने का रास्ता बना चुके थे। जिम के उस गुप्त कमरे में उन्होंने छिपे हुए कैमरे (हिडन कैमरे) लगा रखे थे। जब अकरम डॉक्टर के साथ गलत काम करता, तब उसका भाई आलम मोबाइल और CCTV की मदद से गंदी Video बना लेता था। उन्होंने ये सारी वीडियो दो अलग पेन ड्राइव और अपने मोबाइल में छिपाकर रखी थीं।
जब डॉक्टर को इस बात का पता चला और उन्होंने जिम जाना बंद कर दिया, तब अकरम अपनी असलियत पर उतर आया। उसने डॉक्टर को उनकी Nude Video दिखाईं और चुप रहने के बदले 10 लाख रुपए माँगे। डॉक्टर इतनी डर गईं कि उन्होंने 80 हजार रुपए दे भी दिए, लेकिन अकरम का लालच बढ़ता ही गया। उसने बाद में 50 लाख रुपए माँगे और धमकी दी कि अगर पैसे नहीं मिले, तो वह Video इंटरनेट पर डाल देगा और उनके पति व बच्चों को मार डालेगा। उसने यहाँ तक कह दिया कि डॉक्टर अपना 90 लाख का प्लॉट बेचकर उसे पैसे लाकर दें।
‘सिर्फ हिंदू महिलाएँ’ और मजहबी एंगल
सबसे डराने वाली बात तो यह है कि इस जिम में करीब 80 हिंदू महिलाएँ आती थीं, लेकिन वहाँ उन्हें सिखाने के लिए एक भी महिला ट्रेनर नहीं थी। अकरम और उसके भाई ने जानबूझकर ऐसा इंतजाम कर रखा था ताकि वे अकेली महिलाओं को अपना निशाना बना सकें। हिंदू महासभा के नेताओं ने इसे ‘जिम जिहाद’ कहा है और आरोप लगाया है कि जिम चलाने के नाम पर हिंदू महिलाओं को फँसाया जा रहा था।
जब पुलिस ने दोनों को पकड़ा और जिम की तलाशी ली, तो वहाँ से कई चौंकाने वाली चीजें मिलीं। वहाँ सिर्फ गंदी वीडियो ही नहीं थीं, बल्कि भारी मात्रा में नशीली और ताकत बढ़ाने वाली दवाएँ, इंजेक्शन और सुइयाँ भी बरामद हुईं। अकरम खुद को जवान और हैंडसम दिखाने के लिए नकली बाल (विग) लगाता था, ताकि महिलाएँ उस पर आसानी से भरोसा कर सकें। पुलिस को शक है कि अकरम और उसके भाई ने कई और महिलाओं को भी अपनी जाल में फँसाया होगा, जो बदनामी के डर से चुप बैठी हैं।
ऑपइंडिया ने की पुलिस से बात
ऑपइंडिया से बातचीत में सीओ सिटी-1 आशुतोष शिवम ने पूरे मामले की विस्तार से जानकारी दी। सीओ सिटी ने बताया कि पीड़िता की शिकायत के बाद दोनों आरोपितों अकरम बेग (47) और आलम बेग (35) को गिरफ्तार किया गया है। दोनों सगे भाई हैं और अब्बू का नाम यासीन बेग है। दोनों बरेली के बड़े डाकखाने के पास ‘अल्टिमेट फिटनेस जिम’ चलाते थे। मुख्य आरोपित अकरम बेग ने एक डॉक्टर को नशीला पदार्थ पिलाकर अपना शिकार बनाया। उसका भाई आलम इसमें उसका साथ देता था। दोनों ने पीड़ित महिला से ₹50 लाख की डिमांड की थी। हालाँकि शिकायत के तुरंत बाद पुलिस ने आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया।
आशुतोष शिवम ने बताया कि जिम से जुड़े हार्डडिस्ट, सीसीटीवी फुटे, फोन सबकुछ जब्त कर लिया गया है। इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स को फॉरेसिंक जाँच के लिए भेजा गया है। उन्होंने बताया कि अभी तक 2 ही लोगों के नाम सामने आए हैं, लेकिन फॉरेंसिक जाँच से निकले सबूतों के आधार पर जाँच का दायरा बढ़ाया जाएगा। इस मामले में जो भी लोग शामिल पाएँगे, उन पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
थाना कोतवाली क्षेत्रांतर्गत जिम संचालक द्वारा प्रीवर्कआउट ड्रिंक में नशीला पदार्थ पिलाकर शारीरिक शोषण व फोटो वीडियो बनाकर ब्लैकमेल कर वसूली के प्रकरण में जिम संचालक व उसके भाई की गिरफ्तारी एवं बरामदगी के संबंध में श्री आशुतोष शिवम #COCITY1 बरेली की बाइट।#UPPolicehttps://t.co/N4o2umiBkipic.twitter.com/IFy4ROpX2W
इस मामले को देखते हुए महिला आयोग ने भी माँग की है कि अब हर जिम में महिला ट्रेनर का होना जरूरी किया जाए। जिम जैसे स्थानों पर जहाँ लोग हेल्थ बनाने जाते हैं, वहाँ सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम होने चाहिए। CCTV कैमरों की निगरानी और महिला ट्रेनर्स की मौजूदगी अनिवार्य करना अब समय की माँग है, ताकि अकरम जैसे अपराधी फिर कभी किसी की अस्मत और भरोसे के साथ खिलवाड़ न कर सकें। इससे पहले भी अलग-अलग राज्यों से जिम जिहाद में हिंदू महिलाओं को मुस्लिमों द्वारा अपना शिकार बनाया गया, उनका धर्मांतरण और रेप किया गया।
पश्चिम बंगाल में एक ओर भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने पहली बार प्रचंड जीत हासिल कर इतिहास रच दिया है। पार्टी ने अभी सरकार बनाई भी नहीं है कि प्रदेश में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) सरकार से चल रहा हिंसा का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है। बुधवार (06 मई 2026) देर रात सामने आई खबर ने बंगाल में हिंसा की सारी हदें पार कर दीं। यहाँ उत्तर 24 परगना जिले के मध्यग्राम इलाके में BJP नेता शुभेंदु अधिकारी के निजी सहायक (PA) चंद्रनाथ रथ पर गोलियाँ बरसाई गईं।
गोली लगने के बाद उन्हें विवासिटी अस्पताल ले जाया गया, लेकिन रथ ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया। चंद्रनाथ रथ की हत्या में TMC को जिम्मेदार ठहराया गया है। हालाँकि, TMC ने इसे खारिज कर दिया है और घटना की निंदा करते हुए CBI जाँच की माँग की है। पुलिस ने भी घटनास्थल के CCTV खंगालने शुरू कर दिए हैं और हमलावरों की तलाश जारी है।
वहीं शुभेंदु अधिकारी ने इसे सुनियोजित हत्या बताया है। शुभेंदु अधिकारी का कहना है कि हत्या का प्लान पहले ही बन गया था, हमलावरों ने 2-3 दिन तक रेकी भी की थी। साथ ही उन्होंने इसे TMC के 15 साल के महा-जंगलराज का नतीजा बताया और कहा कि अब BJP यहाँ से गुंडों को हटाने का काम शुरू करेगी।
#WATCH | North 24 Parganas | On his PA, Chandra shot dead in Madhyamgram, BJP leader Suvendu Adhikari says, "This is a pre-planned murder, and this is what DGP said. A recce was done for 2-3 days and a murdered was fully planned. The police initiated investigation… We are… pic.twitter.com/XqcQR8Vz8D
घर लौटते वक्त चंद्रनाथ रथ को बनाया निशाना, विदेशी हथियारों से 10 राउंड फायरिंग
पुलिस की शुरुआती जाँच के मुताबिक, हमलावरों ने बकायदा पूरी योजना बनाकर अटैक किया था। शुभेंदु अधिकारी के PA चंद्रनाथ रथ को रात 10.15 बजे के करीब गोली मारी गई। उन्हें तब निशाना बनाया गया, जब वह अपनी स्कॉर्पियो कार से घर लौट रहे थे। वह अपने घर से महज 200 मीटर की दूरी पर थे, तभी हमलावरों ने उन पर 10 राउंड फायरिंग की। शुरुआती जाँच में यह भी सामने आया कि हमलावरों ने हमले में विदेशी हथियारों का इस्तेमाल किया था।
रिपोर्ट्स में पता लगा कि हमलावरों ने 9 मिमी बोर की ग्लॉक पिस्टल का इस्तेमाल किया था। ये 9 मिमी बोर की ग्लॉक पिस्टल भारत में प्रतिबंधित हैं। लेकिन कोलकाता में ऐसी बोर पिस्टल समेत अवैध हथियारों का काला बाजार है। इससे स्पष्ट रूप से समझ आता है कि यह एक सुनियोजित हत्या थी।
कैसे मारा: फर्जी नंबर प्लेट और सिल्वर रंग की कार
चंद्रनाथ रथ की हत्या के लिए पूरी प्लानिंग की गई थी। यह ऐसा समझा जा सकता है कि हमलावरों ने उन्हें निशाना बनाने से पहले उनकी कार को ओवरटेक किया था। देर रात जब चंद्रनाथ अपनी घर लौट रहे थे और वह कार की आगे वाली सीट पर बैठे थे। तब एक सिल्वर रंग की कार उन्हें ओवरटेक करती है, ऐसे में चंद्रनाथ की कार की गति धीमी हो जाती है। तब बाइक सवार हमलावर आते हैं और 5 गोली चंद्रनाथ के सीने से निकाल दी जाती हैं।
पुलिस महानिदेशक सिद्धार्थ गुप्ता ने कहा कि उन्हें शक है कि जिस सिल्वर रंग की गाड़ी ने चंद्रनाथ रथ की स्कॉर्पियो कार को रोका था, उस गाड़ी के चेसिस नंबर मिटा दिए गए थे। इस गाड़ी की नंबर प्लेट भी फर्जी है। यह गाड़ी घटनास्थल पर ही मिली, लेकिन ड्राइवर मौके से फरार हो चुका था। गाड़ी की ड्राइविंग सीट पर लगी सीट बेल्ट भी गाड़ी के दरवाजे में फँसी है, जोकि दिखाता है कि वह भी हमलावर के साथ जल्दबाजी में बाइक पर फरार हो गया था।
हत्या के लिए चुना तिराहा, ताकि आसानी से भाग सकें
इतना ही नहीं जिस जगह तिराहे पर घटना को अंजाम दिया गया है। यह जगह बहुत सोच समझकर चुनी गई थी, जिससे हमलावरों के पास भागने के लिए सिर्फ गली का ही रास्ता न हो बल्कि एक तीसरा रास्ता भी हो जो सुनसान इलाके से होते हुए मेन सड़क पर जाए।
यह इलाका भी अधिक आबादी वाला है। साथ ही खंभे पर सीसीटीवी कैमरा भी लगा है, जो इस घटना की जाँच में बेहद महत्वपूर्ण होने वाला है। पुलिस सीसीटीवी खंगालकर हमलावरों का रुट मैप जानने की कोशिश कर रही है कि वे किस रास्ते से आए, किस रास्ते से भागे और उन्होंने चंद्रनाथ रथ की गाड़ी का पीछा करना कहाँ से शुरू किया।
चश्मदीद: ड्राइवर रो रहा था, हमने पुलिस को फोन किया
चंद्रनाथ रथ की हत्या की पूरी कहानी एक चश्मदीद ने News18 को अपनी जुबानी सुनाई। उसने बताया कि जब वह घर से बाहर निकला तो स्कॉर्पियो गाड़ी खड़ी थी और उसके अंदर बैठा ड्राइवर रो रहा था और कह रहा था- “सर, यह क्या हो गया!”
चश्मदीद ने आगे बताया, “जब हम वहाँ पहुँचे तो ड्राइवर ने बताया कि कुछ लोग गोली मार कर भाग गए हैं। हमने देखा कि दूसरी सीट पर एक व्यक्ति लहूलुहान अवस्था में था और उसके मुँह से बस हल्की आवाज निकल रही थी। उस वक्त वह जीवित थे, लेकिन कुछ बोल पाने की स्थिति में नहीं थे।”
इसके बाद चश्मदीद ने ड्राइवर से चंद्रनाथ रथ को अस्पताल ले जाने के लिए कहा और खुद पुलिस को फोन कर घटना की सारी जानकारी दी। चश्मदीद का कहना है कि दो लोगों को गोली लगी थी।
वायुसेना से राजनीति तक: कौन थे चंद्रनाथ रथ?
चंद्रनाथ रथ बंगाल की राजनीति में कोई चर्चित नाम नहीं थे, लेकिन BJP के भीतर उन्हें शुभेंदु अधिकारी के सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में गिना जाता था। 41 वर्षीय चंद्रनाथ रथ पू्र्व मेदिनीपुर के चांदीपुर के रहने वाले थे, जिनका शुभेंदु अधिकारी से पुराना संबंध था।
चंद्रनाथ रथ एक शांत स्वभाव, अनुशासित और आध्यात्मिक सोच वाले व्यक्ति थे। शुरुआती पढ़ाई उन्होंने रामकृष्ण मिशन में की थी और बताया जाता है कि एक समय वह संन्यासी जैसा जीवन अपनाने के बारे में भी सोचते थे। बाद में उन्होंने भारतीय वायुसेना (IAF) ज्वाइन की और लगभग 20 साल तक सेवा दी।
बाद में VRS लेने के बाद उन्होंने कुछ समय कॉरपोरेट में काम किया और फिर धीरे-धीरे राजनीति से जुड़ गए। उनका परिवार पहले TMC से जुड़ा हुआ था। उनकी माँ हासी रथ पूर्व मेदिनीपुर के एक स्थानीय पंचायत संस्था में पद पर रह चुकी थीं। बाद में शुभेंदु अधिकारी की तरह उनका परिवार भी 2020 में BJP में शामिल हो गया।
चंद्रनाथ के दोस्त: हमें सिर्फ एनकाउंटर चाहिए
चंद्रनाथ रथ की हत्या के बाद पूरे BJP में शोक की लहर है। उधर चंद्रनाथ के दोस्त कासिम अली ने रोते हुए मीडिया से बातचीत की। उन्होंने कहा कि घटना वाले दिन शाम 6 बजे चंद्रनाथ रथ से आखिरी बातचीत हुई थी, तब चंद्रनाथ ने उनसे कहा था- आओ निजाम पैलेस में बैठते हैं। गप्पे मारें, चाय पियेंगे। बीजेपी की जीत को लेकर जश्न मनाएँगे।”
कासिम अली ने रोते हुए यह भी दावा किया कि टारगेट शुभेंदु अधिकारी थे, क्योंकि चंद्रनाथ उनके सबसे करीबी थे इसीलिए उन पर हमला हुआ, जिनकी बहुत दिनों से रेकी हो रही थी। उन्होंने ममता बनर्जी की सरकार पर गुस्सा करते हुए कहा, “9 मई की सुबह को हमारा सीएम शपथ लेगा और शाम तक हमें बदला चाहिए। हमें सिर्फ एनकाउंटर चाहिए।”
यूँ तो इस लेख में बात हम पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा की करेंगे लेकिन इसकी शुरुआत एक बयान से करते हैं। बुधवार (6 मई 2026) को BJP बंगाल के मुख्य प्रवक्ता देबजीत सरकार ने कहा कि कोई भी व्यक्ति स्वयं घोषणा करके भारतीय जनता पार्टी का सदस्य नहीं बन सकता है। उन्होंने कहा कि जब तक पार्टी आपको आधिकारिक रूप से ना स्वीकार कर ले तब तक आप भाजपा के कार्यकर्ता नहीं माने जाएँगे।
अब जाहिर है कि कई लोगों को यह बात बहुत अचरज भरी लगेगी कि ऐसा क्यों? राजनीतिक दल तो चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा लोग उनके साथ जुड़े और उनकी विचारधारा का विस्तार हो। तो बंगाल में हवा उल्टी क्यों बह रही है। दरअसल, इस उल्टी हवा बहने के पीछे जो कहानी छिपी है वो बंगाल हिंसा से जुड़ी ही है।
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𝐍𝐎𝐓𝐄
No individual can become a member of the Bharatiya Janata Party through self-declaration. Those associated with the TMC who have been involved in atrocities, unlawful activities, or intimidation cannot seek refuge in @BJP4Bengal to escape accountability. https://t.co/kXNEPkeMobpic.twitter.com/WD3UUEZmXR
बंगाल में BJP को मिली बंपर जीत के बाद राजनीतिक हिंसा की कई घटनाएँ सामने आईं। बीरभूम, दक्षिण 24 परगना, हावड़ा, नदिया और बाँकुड़ा समेत कई जिलों से झड़पों, तोड़फोड़ और हत्याओं की खबरें आईं। इनके बीच ममता बनर्जी और TMC का गैंग खुद को इस राजनीतिक हिंसा का विक्टिम दिखाने की कोशिश में जुट गया है। हालाँकि, सच इसके विपरित है बेशक राज्य में BJP पूरी ताकत से लौटी हो लेकिन अब भी निशाना बीजेपी के कार्यकर्ता ही बन रहे हैं।
TMC के गुंडे बीजेपी के लोगों को मारपीट रहे हैं और पार्टी की महिला सांसद इस पर झूठ फैला रही हैं। TMC की राज्यसभा सांसद सागरिका घोष ने बीजेपी के एक कार्यकर्ता की हत्या पर कहा कि TMC के कार्यकर्ता की हत्या कर दी गई। जबकि सच्चाई यह है कि उस बीजेपी कार्यकर्ता को TMC के गुंडों ने मारा था।
कोलकाता के न्यू टाउन इलाके में चुनाव नतीजों के तुरंत बाद एक BJP विधायक के ‘भाई’ की हत्या कर दी गई। हुई। नवनिर्वाचित BJP विधायक पीयूष कनोडिया ने इस पर गहरा दुख जताया। पीयूष कनोडिया ने कहा कि उन्हें विधायक बने अभी 4 घंटे भी नहीं हुए थे कि उन्हें अपने साथी का शव देखना पड़ा। इसके बाद पुलिस ने TMC नेता कमल मंडल समेत 5 लोगों को गिरफ्तार किया है।
कैनिंग विधानसभा क्षेत्र के गोलोकपाड़ा इलाके स्थित बूथ नंबर 240 में जय श्रीराम के नारे लगाने वाले BJP के तीन कार्यकर्ताओं को TMC के गुंडों ने बेरहमी से पीटा। यह दिखाता है कि किस तरह चुनाव में हार को TMC के गुंडे नहीं पचा पा रहा है और हिंसा पर उतारू हैं।
ये तो हुई एक बात… अब समझते हैं कि देबजीत का बयान क्यों महत्वपूर्ण है। इसे भी एक उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं। कोलकाता में भगवा तिलक लगाए और झंडा पकड़े 30-40 गुंडे शालिनी सेन के पेट्रोल पंप पर घुस आए और वहाँ आकर मैनेजर को धमकाने लगे। आपको ये पढ़कर लगेगा की BJP के लोगों ने जीत के बाद उत्पात मचाना शुरू कर दिया है लेकिन यहीं कहानी में ट्विस्ट है।
दरअसल, ये गुंडे बीेजपी के नहीं थे, ये TMC के थे जिन्होंने अब अपनी पहचान बदल ली थी। ऐसे दावा हम नहीं कर रहे बल्कि खुद शालिनी का ये कहना है। शालिनी की मदद के लिए बाद में पुलिस भेजी गई।
Kolkata, West Bengal: HPCL Petrol Pump Owner, Tollygunge, Shalini Sen says, "Yesterday evening, when I had gone home, around 30–40 miscreants from the previous regime came to the petrol pump in an intoxicated state. They threatened my manager regarding the parking of a large fuel… pic.twitter.com/QVEq2L2lFR
अब ऐसा ही एक और उदाहरण देखते हैं, इन विधानसभा चुनावों में जीत दर्ज करने वाले भाजपा नेता दिलीप घोष से जुड़ा भी एक ऐसा ही किस्सा है। देर रात को दिलीप घोष के पास उनके खिलाफ चुनाव लड़ने वाले TMC के उम्मीदवार का फोन पहुँचा।
फोन करने वाले ने कहा- ‘कुछ करो।’ दिलीप घोष ने पूछा- ‘मैं क्या कर सकता हूँ?’ तो उसने कहा- ‘मेरे दफ्तर पर हमला हो रहा है। दरवाजे बंद कर दिए गए हैं। हम मर जाएँगे।’ इस पर दिलीप घोष ने पूछा- ‘कौन हमला कर रहा है?’ तो एक नाम लिया गया। दिलीप घोष ने कहा कि लेकिन वो तो TMC का आदमी था, तुम्हारे साथ था। इस पर दूसरी तरफ से आवाज आई- ‘हाँ था तो TMC के ही साथ।’ यह पूरा वाक्या बताया है, BJP बंगाल के अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने।
सिर्फ इतना ही नहीं, उन्होंने एक और घटना का जिक्र करते हुए कहा कि बारासात से बीजेपी के नवनिर्वाचित विधायक उनके पास आए और बताया कि 28 तारीख की रात को फेसबुक लाइव में जो उनका चरित्र पर सवाल उठा रहे थे, आज वो भगवा झंडा लेकर घूम रहे हैं। वो TMC के लोग BJP के बन गए हैं।
Kolkata, West Bengal: BJP State President Samik Bhattacharya says, "The Barasat candidate came to me… What is even more interesting is that our former president, former MP Dilip Ghosh, against whom the TMC candidate was contesting elections… Two hours later, at night, he… pic.twitter.com/Lp7vzjHo5t
बंगाल बीजेपी ने भी इससे जुड़ा एक पोस्ट किया है। बीजेपी ने X पर लिखा, “हमारे ध्यान में आया है कि तृणमूल की तथाकथित ‘गुंडा वाहिनी’ के कुछ लोग बीजेपी कार्यकर्ताओं के रूप में खुद को पेश करने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि लोगों को गुमराह किया जा सके और अव्यवस्था फैलाई जा सके।”
पार्टी ने आगे लिखा, “यह बात साफ और स्पष्ट तौर पर बताई जा रही है कि बीजेपी इस तरह की धोखाधड़ी बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करेगी। जो भी व्यक्ति खुद को किसी और के रूप में पेश करेगा, डराने-धमकाने की कोशिश करेगा या कानून को अपने हाथ में लेगा, उसके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। ऐसे अपराधियों पर कानून की पूरी ताकत के साथ कार्रवाई होगी।”
पश्चिम बंगाल की राजनीति में अगर एक चीज कॉमन रही है तो वो है राजनीतिक हिंसा। वर्षों से यही पैटर्न चलता आया है बस चेहरे बदलते रहे हैं, झंडे बदलते रहे हैं, लेकिन तरीका वही रहा है। बंगाल में अब तक सत्ता का मतलब सिर्फ सरकार चलाना नहीं रहा है बल्कि इलाके पर पकड़, डर का माहौल और विरोध को दबाना भी रहा है।
बंगाल में वामपंथी शासन के दौरान गुंडे का एक संगठित ‘कैडर सिस्टम’ तैयार हो गया था। ये कैडर के लोग चुनाव जिताने से लेकर विरोधियों को खत्म करने तक हर काम करते थे। बंगाल में इन्हें खूब राजनीतिक संरक्षण मिला और हिंसा को राजनीतिक औजार की तरह इस्तेमाल किया जाने लगा। बूथ पर कब्जा, विरोधियों को डराना-धमकाना, इलाके में दहशत फैलाना- यही सब वामपंथियों के इस ‘कैडर’ की कार्यशैली थी।
फिर 2011 आया। ममता बनर्जी ने ‘पोरिबोर्तोन’ यानी बदलाव का नारा दिया और 34 साल के वामपंथी शासन को खत्म कर दिया। जनता ने हिंसा से बचने की चाह में सत्ता पलट दी। लेकिन कुछ बदला नहीं। जो कल तक CPM का झंडा लेकर भीड़ को नियंत्रित करते थे, वे अगले दिन TMC का झंडा थामे खड़े थे। हथियार और हाथ वही था, बस मालिक बदल गया था। पोरिबोर्तोन तो हुआ लेकिन सिर्फ सत्ता का हिंसा की संस्कृति यूँ ही चलती रही।
TMC के शासन में यही होता रहा। TMC के गुंडे बूथों को नियंत्रित करते, लोगों को धमकाते, कटी मनी वसूलते और पारा मॉडल चलाकर उगाही करते। 2021 के चुनाव नतीजे घोषित होने के बाद इन गुंडों का आतंक खूब दिखा, TMC के इन गुंडों ने BJP समर्थकों पर हमले किए, उनके घरों में आग लगाई गई और राजनीतिक हत्याएँ और बलात्कार तक किए गए।
इस बार भी इन गुंडों की कोशिश यही है। हालाँकि, इस बार उनकी दाल नहीं गल रही है। 2011 में जब TMC आई तो उसने CPM के गुंडों को खुले हाथों अपनाया क्योंकि उसे ‘मसल पावर’ चाहिए थी। परिणाम यह हुआ कि पार्टी बदली, हिंसा की संस्कृति नहीं। लेकिन BJP ने तय कर दिया है कि TMC के गुंडे अगर सोच रहे हैं कि वो BJP में शामिल होकर बच जाएँगे या कार्रवाई नहीं होगी तो ये वो भूल जाएँ।
इस बार हिंसा की शिकायतों पर कार्रवाई हो रही है, हिंसा से निपटने के लिए चुनावों के बाद भी केंद्रीय बलों को पश्चिम बंगाल में तैनात किया गया है और जिस तरह 2021 में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई थी उसे इस बार काबू पाने की पूरी कोशिशें की जा रही हैं।
बंगाल में पहली बार बीजेपी का पताका आसमान की बुलंदियों को छू रहा है। विधानसभा चुनाव 2026 के ऐतिहासिक नतीजों ने न सिर्फ भारत के विपक्ष को सकते में ला दिया है, बल्कि दुनियाभर के इस्लामी वामपंथी ग्रुप को परेशान कर दिया है।
इससे पहले बंगाल में मुस्लिम तुष्टिकरण का दाँव चलता था और 15 साल ममता बनर्जी से पहले करीब 35 साल लेफ्ट और उससे पहले कॉन्ग्रेस का शासन था। पहली बार हिन्दू एकजुट हुए और बीजेपी को वोट किया। यही वजह है कि बीजेपी को 294 में से 205 सीटों की प्रचंड जीत मिली।
लेकिन विदेशी मीडिया इस जीत को अलग चश्मे से देख रही है। कई विदेशी मीडिया ने BJP की जबरदस्त जीत को कवर किया, लेकिन इसे ‘हिंदू राष्ट्रवादी’ सोच, ‘मुस्लिम अल्पसंख्यक को खतरा’ के तौर पर पेश करने में जुट गई। इतना ही नहीं, चुनाव से पहले SIR के माध्यम से की गई वोटर वैरिफिकेशन को लेकर भी झूठ फैलाया गया।
बंगाल का इतिहास हिन्दुओं के साथ अत्याचार से पटा हुआ है। बंगाल विभाजन और 1946 में हिन्दुओं का नरसंहार हुआ। आज तक उन्हें न्याय नहीं मिला। बांग्लादेशी घुसपैठियों के लिए बंगाल सबसे सुलभ रहा। बांग्लादेश से सटे जिलों में तो हाल बुरा है।
ऐसे हालात में 2014 में नरेन्द् मोदी के नेतृत्व में बनी केन्द्र की एनडीए सरकार ने हालात पर नजर रखी। बीजेपी धीरे-धीरे लोगों को गोलबंद करने लगी। ममता बनर्जी के मुस्लिम तुष्टिकरण के खिलाफ हिन्दुओं को जागरूक किया। संदेशखाली और आरजीके केस ने महिला सुरक्षा की कलई खोलकर रख दी।
सुनियोजित तरीके से हिन्दुओं के साथ होने वाले अत्याचार ने सबका ध्यान खींचा। सबसे बड़ी बात है कि दबले कुचले बहुसंख्यक आबादी के मन से उस खौफ को हटाया, कि अगर ममता नहीं जीतीं, तो उनका कत्लेआम निश्चित है। बीजेपी को फर्श से अर्श तक पहुँचने में 12 साल लगे।
भाजपा की जीत के बाद न्यूयॉर्क टाइम्स यानी NYT, अल जजीरा, और द गार्डियन जैसे विदेशी मीडिया आउटलेट्स ने कवरेज के दौरान झूठ फैलाने की कोशिश की। जीत को हिन्दू राष्ट्रवाद का विस्तार बताया और अल्पसंख्यकों में भय फैलने जैसी बातें कही गई।
NYT ने बंगाल की जीत को मोदी के ‘हिन्दू राष्ट्रवाद’ का विस्तार कहा
बंगाल के चुनावी जीत को ‘लोकतांत्रिक जनादेश’ के रूप में दिखाने के बजाय इसे अमेरिका के न्यूयॉर्क टाइम्स ने ‘हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा की जीत’ कहा।
एंटी इंडिया और एंटी हिन्दू विचारधारा को आगे बढ़ाते हुए लेख में लिखा गया है कि यह प्रधानमंत्री मोदी के हिन्दू फर्स्ट राजनीति का विस्तार है। लेख का शीर्षक है – ‘मोदी के हिंदू राष्ट्रवादियों ने भारत के विपक्ष के गढ़ पर कब्जा किया’। इतना ही नहीं NYT ने SIR पर सवाल उठाते हुए यह भी कह दिया कि चुनाव आयोग और बीजेपी में साँठ-गाँठ है। दरअसल विपक्ष के आधारहीन बयानों और तर्कों को सही मानते हुए भारतीय लोकतंत्र पर सवाल खड़े करने की कोशिश की।
अखबार ने पश्चिम बंगाल में SIR को लेकर झूठ परोसा और दावा किया कि 90 लाख वोटरों के नाम हटा दिए। इनमें कई मुस्लिम थे। NYT ने न सिर्फ SIR को BJP के पक्ष में किया गया चुनावी इंजीनियरिंग कहा, बल्कि चीफ इलेक्शन कमिश्नर ज्ञानेश कुमार की ईमानदारी पर भी सवाल उठाए और ‘मुस्लिम विरोधी’ करार दिया।
जबकि SIR में सबसे ज्यादा जिन जिलों में सबसे ज्यादा वोटरों के नाम हटे, उनमें मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर 24 परगना शामिल हैं। जिन 20 विधानसभा सीटों पर जाँच के बाद सबसे ज्यादा वोटर्स के नाम काटे गए थे, उनमें से 13 सीटों पर ममता बनर्जी की पार्टी ने ही जीत हासिल की है। वहीं, BJP को इनमें से 6 और कॉन्ग्रेस को सिर्फ 1 सीट मिली है। इसके बावजूद एसआईआर को ‘विलेन’ बताकर चुनावी हार को उसके मत्थे डालने की कोशिश NYT समेत तमाम विदेशी मीडिया आउटलेट्स ने की है।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि NYT, अलजजीरा जैसे अखबार ने दावा किया है कि चुनाव आयोग ने बंगाल में SIR करने का मकसद अल्पसंख्यक वोटरों को हटाना था। जबकि सच्चाई यह है कि आयोग ने दिसंबर 2025 में 58.25 लाख वोटर्स के नाम हटा दिए थे। यह वे वोटर्स थे जो मर गए थे, अपने घरों में मौजूद नहीं थे या शिफ्ट हो गए थे अथवा जिनका नाम दो जगहों पर था। चुनाव आयोग की इस कवायद की वजह से वोटरों की कुल संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 7.04 करोड़ हो गई थी। फाइनल लिस्ट में फरवरी 2026 में 5 लाख और नाम हटा दिए गए।
शुरू में जिन 60.06 लाख वोटर्स के नाम तय किए गए थे, उनमें से लगभग आधे अयोग्य पाए गए। सबसे ज़्यादा नाम मुस्लिम-बहुल मुर्शिदाबाद में हटाए गए। मुर्शिदाबाद, मालदा जैसे जिलों की सीमा बांग्लादेश से मिलती है। यहाँ घुसपैठ बड़े पैमाने पर हुए हैं। घुसपैठ और क्राइम यहाँ चुनावी मुद्दे रहे।
इस पर NYT ने लिखा, करीब 90 लाख वोटरों का नाम हटा, जिसमें कई मुस्लिम थे। चुनाव आयोग ने ऐसी शिकायतों को खारिज कर दिया।
पीएम मोदी की विचारधारा पर सवाल उठाए गए
NYT में दावा किया गया है कि पीएम मोदी उस स्कूल में पढ़कर निकले हैं, जहाँ भारत को हिन्दू राष्ट्र कहा जाता है। हालाँकि यहाँ हजारों साल तक मुस्लिम शासन रहा। इसमें कहा गया है कि बंगाल में 19वीं सदी से कभी भी किसी धर्म का राज्य नहीं रहा। ‘धर्मनिरपेक्षता’ पर बंगालियों को नाज रहा है। अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष में भी इनका अहम योगदान रहा। बंगाल में कम्यूनिस्ट पार्टी का शासन 34 साल था और फिर ममता सरकार 15 साल तक रही।
लेकिन NYT, अल जजीरा जैसे अखबार जब इतिहास की बात करते हैं तो उन्हें अच्छे से पता है कि भारत का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ था, न कि किसी ओर आधार पर। बंग-भंग के दौरान हिन्दू मुस्लिम दंगे और हजारों हिन्दू महिलाओं के साथ रेप, उन्हें जिंदा जला दिया जाना इतिहास में दर्ज है। इस खूनी संघर्ष को कभी नहीं भूलाया जा सकता। ऐसे में धर्मनिरपेक्षता की बात कहते हुए बीजेपी को हिन्दू राष्ट्रवादी कहना काफी हास्यास्पद लगता है।
न्यूयॉर्क टाइम्स ने बड़ी आसानी से पीएम नरेंद्र मोदी को ‘एंटी-सेक्युलरिस्ट’ दिखाया। भारत एक हिंदू बहुल राष्ट्र है। यहाँ की धर्मनिरपेक्षता हिन्दुओं को हाशिए पर रख कर नहीं हो सकती। भारतीय सभ्यता में सनातन जन्मी है। यही सच्चाई है। बीजेपी या उसकी ‘राष्ट्रवादी विचारधारा’ में दूसरे धर्मों के लिए वैमन्ष्यता नहीं है। यहाँ तक कि हजारों सालों तक शासन करने वाले इस्लाम से भी नफरत नहीं है। हालाँकि ये लोग बाहर से आए और हिंदुओं और गैर-मुसलमानों पर ज़ुल्म ढाया। उन्हें मारा-पीटा और धर्मांतरण के लिए मजबूर किया। हिन्दुओं के मंदिरों को लूटा, उन्हें तोड़ा और मस्जिद में तब्दील कर दिया। इस्लाम कबूल करने के लिए अत्याचार किए गए। इसके बावजूद हिन्दू आस्था टिकी रही, तो ये गर्व की बात है।
लेकिन इस्लामी वामपंथी प्रोपेगैंडा फैलाने वाले इसे ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ बताते हैं। इतिहास में इस्लामी शासकों के अत्याचार की जगह उनके गुणगान किए जाते हैं। हिन्दुओं के प्रति उनके नफरत की चर्चा नहीं की जाती।
ममता बनर्जी को गरीबों का मसीहा दिखा रहे प्रोपेगेंडा बाज
NYT ने ममता बनर्जी को गरीबों और दबे-कुचले के मसीहा के तौर पर दिखा रही है। ममता बनर्जी ने लेफ्ट को हरा कर सत्ता संभाली थी।
NYT ने लिखा है कि कॉर्पोरेट हितों का विरोध कर, वेलफेयर स्कीमों का प्रचार किया और एक धर्मनिरपेक्ष के तौर पर अपनी पहचान बनाई, जिससे वह मुसलमानों और लिबरल लोगों के बीच खास तौर पर पॉपुलर हो गईं।
लेकिन ममता बनर्जी के राज में सोशल वेलफेयर स्कीम घटे। घोटालों का जोर बढ़ा। नौकरी पाने के लिए बंगाल में टीएमसी से जुड़ना जरूरी बन गया था। पुलिस का काम ममता के कैडर कर रहे थे। उन्हें नजरअंदाज कर न तो कोई राज्य में टिक सकता था और न ही नौकरी कर सकता था। राज्य का इकोनॉमिक ग्रोथ गिर गया। राज्य में इतनी अराजकता थी कि कंपनियाँ बंगाल छोड़ कर भाग गईं।
बंगाल जो कभी बौद्धिक राज्य माना जाता था। उसकी हालत दूसरे राज्यों में मजदूरी करने वालों की हो गई। न सड़कें, न काम और गरीबी में जीने के लिए मजबूर जनता का आखिरकार ममता बनर्जी से विश्वास डगमगाया और उन्हें उखाड़ फेंका। 15 साल का शासन राज्य को विकसित करने और कानून व्यवस्था को दुरुस्त कर पटरी पर लाने के लिए कम नहीं थे। लेकिन ममता बनर्जी ने सिर्फ वोटबैंक की चिंता की और उसके लिए घुसपैठियों को शरण दी। बंगाल को कर्ज के जाल में धकेल दिया। नेशनल GDP में पश्चिम बंगाल का हिस्सा कम हो गया, प्रति व्यक्ति आय कम हो गई।
ममता बनर्जी ने कई वेलफेयर स्कीम चलाईं। इससे बंगाल की माली हालत और खराब हुई। ममता सरकार ने बंगाल के इंडस्ट्रियल माहौल को इस हद तक बर्बाद कर दिया कि 2011 से अब तक 110 लिस्टेड फर्मों समेत 6,600 से ज़्यादा कंपनियों ने अपना ऑफिस कोलकाता में बंद कर दूसरे राज्यों की ओर रुख किया।
हिन्दुओं के प्रति ममता बनर्जी का रवैया दमनकारी रहा। 2023 में पश्चिम बंगाल के मालदा के कालियाचक में दुर्गा मंदिर को ब्लॉक और बैरिकेड किया गया था, क्योंकि उस रास्ते से मुहर्रम का जुलूस जाने वाला था। इतना ही नहीं ममता बनर्जी ने 2016 और 2017 में मुहर्रम के जुलूसों के लिए दुर्गा मूर्ति विसर्जन पर रोक लगा दी थी। इसकी प्रतिक्रिया बंगाल में दिखी भी थी।
असल में ममता बनर्जी ने मुसलमानों को खुश कर उन्हें वोटबैंक बनाया और हिंदुओं को दबाया। इसलिए वह और उनकी पार्टी लिबरल लोगों की नजर में ‘सेक्युलर’ और ‘लिबरल’ बनी रहीं।
बंगाल जीत को हिन्दू बहुसंख्यक की जीत कहा
ब्रिटेन की समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने बंगाल और असम में BJP की चुनावी सफलता को हिंदू बहुसंख्यक की जीत कहा। उसके मुताबिक बीजेपी हिन्दू बहुमत को लुभाने की रणनीति में सफल रही। वहीं आगे कहा गया है कि बीजेपी के पास विपक्ष के मुकाबले ज्यादा धन-संसाधन हैं। एजेंसी ने कहा है कि एसआईआर जैसे कारण है, जिसके चलते लाखों लोग, खास कर मुस्लिम बड़ी संख्या में वोट नहीं डाल पाए। ये लोग टीएमसी के समर्थक थे। लेकिन चुनाव आयोग ने पूरी प्रक्रिया को संविधानसम्मत बताया है।
दिल्ली स्थित थिंकटैंक सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के फेलो राहुल वर्मा के हवाले से एजेंसी ने लिखा, ‘बीजेपी के पास एक करिश्माई राष्ट्रीय नेता है, पार्टी बेहद संगठित है, उसके पास संसाधनों काफी ज्यादा हैं, जो कई दलों के पास नहीं है। एक स्पष्ट वैचारिक नैरेटिव है- ये सभी मिलकर हिंदुओं को एकजुट करने में मदद करते हैं। ‘
विदेशी मीडिया की आदत है कि वे BJP को ‘हिंदू नेशनलिस्ट’ पार्टी, ‘हिंदू हार्डलाइनर’, ‘हिंदुत्व संगठन’ बताते हैं। ये चाहते हैं कि पाठक इसे कट्टरपंथी पार्टी मान ले। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि देश की हिंदू बहुसंख्यक को अपील करने की PM मोदी की रणनीति जीत की वजह बनी।
BJP के यूनिफॉर्म सिविल कोड का विरोध करने वालों का साथ देने वाले इस्लामी वामपंथी मीडिया प्लेटफॉर्म ‘सेक्युलरिज़्म’ का राग अलापते हुए बीजेपी को हिन्दू राष्ट्रवादी पार्टी कहती है।
हिन्दू राष्ट्रवादी एजेंडे को मिलेगी गति-बीबीसी
ब्रिटिश ब्रॉडकास्टर के अनुसार, 10 करोड़ से ज्यादा आबादी वाले बंगाल की जीत पीएम मोदी के हिंदू राष्ट्रवादी एजेंडे को नई गति देगी और पूर्वी भारत में BJP का विस्तार पूरा करेगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि कई सालों तक पश्चिम बंगाल राज्य केन्द्र में नरेंद्र मोदी की राजनीतिक बढ़त के बावजूद एक बड़ा अपवाद बना रहा। 2026 में बीजेपी की बंगाल फतह मोदी के 12 साल के शासन के सबसे अहम राजनीतिक सफलताओं में एक गिनी जाएगी।
द गार्डियन ने उठाए सवाल
UK के अखबार ‘द गार्डियन’ ने बंगाल और असम में बीजेपी की जीत को ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ की जीत बताया। हिन्दू विरोधी रूख के लिए मशहूर द गार्डियन ने अल्पसंख्यकों पर अत्याचार की बात कही और ‘सेक्युलरिज्म खतरे में’ वाला नैरेटिव सेट करने की कोशिश की। इससे पहले भी उसने 2014 में बीजेपी के नेतृत्व में बनी एनडीए सरकार को भारतीय लोकतंत्र के लिए एक ‘सिम्बोलिक खतरे’ के तौर पर पेश किया था।
बंगाल और असम विजय पर इस बार भी उसने वही राग अलापा। 2014 में मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से भारत की राजनीति BJP के इर्द-गिर्द घूम रही है। पीएम मोदी की व्यापक लोकप्रियता का प्रमाण है कि केन्द्र में लगातार तीसरी बार और 20 से ज्यादा राज्यों में बीजेपी गठबंधन सत्तासीन है। इसको नकारते हुए वामपंथी लिबरल ग्रुप धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देते हुए आरोप लगाता रहा है कि बीजेपी भारत को सेक्युलर देश के बजाय हिंदू देश बनाना चाहती है।
भारतीय गणतंत्र पर गंभीर खतरा- प्रथम आलो
बांग्लादेश का अखबार प्रथम आलो ने बंगाल में जीत पर शीर्षक दिया- पश्चिम बंगाल चुनाव, सिर्फ राज्य का नहीं बल्कि भारतीय गणतंत्र का भविष्य खतरे में।
इसमें कहा गया है कि बंगाल चुनाव भारत के चुनावी इतिहास में याद रखा जाएगा क्योंकि एसआईआर के माध्यम से बड़े पैमाने पर लोगों के नाम काटे गए और केन्द्रीय अर्धसैनिक बलों की अभूतपूर्व तैनाती रही। हालाँकि अखबार मान रहा है कि बंगाल में इस बार हिंसा कम हुई। अखबार के मुताबिक बंगाल में बीजेपी ध्रुवीकरण की वजह से जीती। बंगालियों के अंदर भी हिन्दुत्व पैर जमा चुका है। अखबार लिखता है कि बंगाली लंबे समय से समन्वयवादी हिन्दू परंपरा के लिए जाने जाते हैं।
जबकि पाकिस्तानी दैनिक डॉन ने एएफपी की एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें बताया गया कि मोदी ने पश्चिम बंगाल में ‘रिकॉर्ड’ जीत का दावा किया।
इसमें कहा गया है कि ये परिणाम मोदी को 2029 में होने वाले आम चुनाव से पहले उच्च बेरोजगारी दर और लंबित अमेरिकी व्यापार समझौते सहित कई आर्थिक और विदेश नीति संबंधी चुनौतियों से निपटने में मजबूती प्रदान करेंगे।
विदेशी मीडिया ने भारत में हो रहे सकारात्मक सामाजिक-राजनीतिक बदलावों की बातें नहीं की, बल्कि एक नकारात्मक और एकतरफा नैरेटिव पेश किया है। यह वास्तविक पत्रकारिता नहीं है, बल्कि इस्लामी-वामपंथी प्रोपेगेंडा है।
इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी की डीपफेक और अश्लील तस्वीरें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए बनाकर शेयर की जा रही हैं। उन्होंने खुद सोशल मीडिया पर अपनी एक ऐसी ही तस्वीर शेयर कर ना सिर्फ नाराजगी जताई बल्कि इसे समाज के लिए एक खतरनाक संकेत भी बताया है। उन्होंने डीपफेक को लेकर कहा कि वह तो सक्षम हैं लेकिन बहुत से लोग इससे अपना बचाव नहीं कर सकते हैं। इससे AI के गलत इस्तेमाल को लेकर चल रही बहस एक बार फिर तेज हो गई है।
जॉर्जिया मेलोनी ने क्या कहा?
मेलोनी ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स पर अपनी एक डीपफेक फोटो शेयर कर एक लंबा संदेश लिखा है। इस तस्वीर में वह लॉन्जरी पहने हुए बेड पर बैठी दिख रही हैं। उन्होंने लिखा, “पिछले कुछ दिनों से मेरी कई फर्जी तस्वीरें फैलाई जा रही हैं। ये AI से बनाई गई हैं लेकिन असली बताकर शेयर किया जा रहा है।” मेलोनी ने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि जिसने भी उनकी ये तस्वीरें बनाई हैं, उसने उनके लुक को निखार दिया है लेकिन उन्होंने इस पर चिंता भी जताई है।
मेलोनी ने इससे जुड़ा एक गंभीर मुद्दा उठाया है। उन्होंने कहा कि वह खुद तो अपनी रक्षा करने की स्थिति में हैं लेकिन बहुत से लोग ऐसे नहीं हैं। उन्होंने लोगों से अपील की कि किसी भी चीज को सच मानने या आगे शेयर करने से पहले उसकी सच्चाई जरूर जाँच लें। मेलोनी ने कहा, “यह मुद्दा सिर्फ मुझ तक सीमित नहीं है। डीपफेक एक खतरनाक हथियार है। क्योंकि यह किसी को भी धोखा दे सकता है, उसे गुमराह कर सकता है और नुकसान पहुँचा सकता है। मैं अपनी रक्षा कर सकती हूँ लेकिन बहुत से लोग ऐसा नहीं कर सकते।”
Girano in questi giorni diverse mie foto false, generate con l’intelligenza artificiale e spacciate per vere da qualche solerte oppositore.
Devo riconoscere che chi le ha realizzate, almeno nel caso in allegato, mi ha anche migliorata parecchio. Ma resta il fatto che, pur di… pic.twitter.com/or44qru2qj
मेलोनी ने जो कहा है वो वाकई गंभीर है और उस पर अधिक चर्चा किए जाने की जरूरत है। मेलोनी प्रधानमंत्री है, मानसिक रूप से ऐसे हमलों के लिए तैयार होती हैं लेकिन आम लोगों के लिए यह खतरा बहुत गंभीर है। यह खतरा किसी एक देश तक सीमित नहीं है, दुनियाभर में डीपफेक का खतरा लोगों के लिए जानलेवा तक बन जाता है। आम लोग मानसिक रूप से ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए तैयार नहीं हो पाते हैं और कई बार अपना जीवन तक ले लेते हैं। इसे कुछ उदाहरणों से समझने की कोशिश करते हैं।
अप्रैल 2025 में महाराष्ट्र के नागपुर में एक 28 वर्षीय महिला ने ऐसे ही एक फर्जी वीडियो के चलते आत्महत्या कर ली थी। महिला ने अपने सुसाइड नोट में लिखा कि उसे एक फर्जी वीडियो के जरिए फँसाया जा रहा था जिसमें उसकी कोई हमशक्ल थी। उसकी कथित धार्मिक टिप्पणी की वीडियो बनाकर उसे धमकाया जाने लगा और डर से महिला ने अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली।
अक्टूबर 2025 में हरियाणा के फरीदाबाद से भी एक ऐसा ही मामला सामने आया। फरीदाबाद में एक 19 साल के लड़के ने आत्महत्या कर ली क्योंकि आरोपितों ने AI से उसकी व उसकी बहन की फेक तस्वीरें बन ली थीं और उससे पैसों की माँग कर रहे थे। वो युवक दबाव को नहीं सह पाया और उसने अपनी जान दे दी। ये केवल भारत की बात नहीं है, दुनियाभर में ऐसा हो रहा है।
ब्रिटेन में जनवरी 2024 में 14 साल की स्कूली छात्रा मिया जानिन ने स्नैपचेट पर उसकी नकली न्यूड तस्वीरें पोस्ट किए जाने के बाद आत्महत्या कर ली थी। लड़कों ने लड़कियों के चेहरों को पोर्नोग्राफी कलाकारों के शरीर पर फोटोशॉप किया और उन्हें शेयर कर दिया। उन छात्रों को शायद से छोटी शरारत लगी होगी लेकिन यह मिया के लिए जानलेवा साबित हुई, वो इस दबाव को नहीं झेल पाई और आत्महत्या कर ली।
अमेरिका में फरवरी 2025 में 16 साल के एलिजा हीकॉक ने आत्महत्या कर ली थी। उसे AI से बनी अपनी ही एक न्यूड तस्वीर मिली थी, जिसके साथ एक धमकी भरा मैसेज था जिसमें 2.5 लाख रुपए ($3,000) की माँग की गई थी। कहा गया कि अगर वो पैसे नहीं दे पाएगा तो यह तस्वीर दोस्तों रिश्तेदारों को भेज दी जाएगी। बच्चा दबाव नहीं झेल सका और उसने आत्महत्या कर ली।
AI के या डीपफेक के या मार्फ्ड तस्वीरों के जरिए किए ब्लैकमेल के ऐसे मामलों में पीड़ित व्यक्ति, खासकर किशोर और महिलाएँ समाज में बदनामी के डर से टूट जाते हैं। उन्हें लगता है कि उनकी सामाजिक पहचान खत्म हो जाएगी, परिवार और समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा। यही डर कई बार उन्हें एक ऐसे अंधेरे रास्ते पर धकेल देता है। जहाँ वे आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं।
डीपफेक के निशाने पर महिलाएँ: 98% पोर्नोग्राफी, 99% में महिलाएँ
डीपफेक के निशाने पर सबसे अधिक महिलाएँ हैं और इसके केस तेजी से बढ़ रहे हैं। UN Women ने 2023 की एक रिपोर्ट के हवाले से बताया है कि ऑनलाइन मौजूद सभी डीपफेक वीडियो में से 98% डीपफेक पोर्नोग्राफी थी और 99% में महिलाओं को दिखाया गया था। अनुमान लगाया गया है कि 2023 में डीपफेक वीडियो 2019 के मुकाबले 550% ज्यादा थे। कई बड़ी हस्तियों को AI का शिकार बनाया गया है।
क्या होता है डीपफेक और कैसे करता है काम?
डीपफेक वह वीडियो, फोटो या ऑडियो होता है जो असली जैसा दिखता या सुनाई देता है लेकिन उसे AI की मदद से बदला गया होता है। इस तकनीक के जरिए किसी का चेहरा बदलना, चेहरे के हाव-भाव बदलना, नया चेहरा बनाना या आवाज तैयार करना संभव होता है। ‘द गार्जियन’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, डीपफेक सबसे पहले सोशल मीडिया एप रेडिट (Reddit) पर सामने आया था। तब एक Deepfake नाम के यूजर ने टेलर स्विफ्ट जैसी कई अभिनेत्रियों के फर्जी पोर्न क्लिप डाल दिए। इसके बाद से ऐसे वीडियो की बाढ़ आ गई।
डीपफेक तकनीक दो प्रोग्राम जनरेटर (Generator) और डिस्क्रिमिनेटर (Discriminator) पर काम करती है। जहाँ जनरेटर असली फोटो, वीडियो और आवाज से सीखकर नकली कंटेंट बनाता है जबकि डिस्क्रिमिनेटर यह जाँचता है कि वह कितना असली लग रहा है और अपनी फीडबैक देकर जनरेटर को सुधारने में मदद करता है इसी आपसी ‘मुकाबले’ को Generative Adversarial Networks (GANs) कहा जाता है।
इसमें दोनों बार-बार सीखते हैं और धीरे-धीरे इतना रियलिस्टिक कंटेंट तैयार कर देते हैं कि असली और नकली में फर्क करना मुश्किल हो जाता है। इसके लिए बहुत ज्यादा डेटा (तस्वीरें, वीडियो, ऑडियो) जरूरी होता है यानी जितना ज्यादा डेटा, उतना बेहतर डीपफेक और जहाँ पहले इसे बनाने के लिए महँगे सॉफ्टवेयर, ताकतवर कंप्यूटर और एक्सपर्ट स्किल्स की जरूरत होती थी तो वहीं आज यह तकनीक काफी आसान हो गई है और कई टूल्स फ्री में साधारण डिवाइस या क्लाउड प्लेटफॉर्म पर भी उपलब्ध हैं।
सजा से क्यों बच जाते हैं डीपफेक बनाने वाले
UN की एक रिपोर्ट बताती है कि डीपफेक से नुकसान बहुत बड़ा होता है लेकिन ऐसे मामलों में सजा कम मिलती है। सबसे बड़ी वजह यह है कि कानून अभी इस तकनीक के हिसाब से अपडेट नहीं हुए हैं। कई देशों में डीपफेक से जुड़ा कोई साफ कानून ही नहीं है और पुराने ‘रिवेंज पोर्न’ कानून भी इसमें पूरी तरह लागू नहीं होते। इससे पीड़ित लोग समझ नहीं पाते कि उनके साथ हुआ गलत काम अपराध है या नहीं।
दूसरी समस्या है जाँच में कमी एजेंसियों के पास डिजिटल सबूत जुटाने, दूसरे देशों से सहयोग लेने और प्लेटफॉर्म से डेटा हासिल करने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं होते। इस दौरान सबूत जल्दी गायब हो जाते हैं और कंटेंट तेजी से फैलता रहता है। अपराधी अक्सर अपनी पहचान छिपा लेते हैं या दूसरे देशों में रहकर बच जाते हैं। वहीं, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म भी जिम्मेदारी से बचते हैं, कंटेंट हटाने में देर करते हैं और पीड़ितों को बार-बार शिकायत करने के लिए मजबूर करते हैं, जिससे उन्हें और परेशानी होती है।
क्या हो आगे की राह
डीपफेक के दुरुपयोग को रोकने के लिए सरकार, संस्थान और टेक कंपनियों को मिलकर तुरंत कदम उठाने होंगे। सबसे पहले ऐसे साफ और मजबूत कानून बनने चाहिए जो AI से बने कंटेंट और सहमति (consent) को स्पष्ट करें, अपराधियों को जिम्मेदार ठहराएँ और प्लेटफॉर्म को तय समय में कंटेंट हटाने के लिए मजबूर करें।
साथ ही अलग-अलग देशों के बीच कार्रवाई आसान होनी चाहिए। न्याय व्यवस्था को भी मजबूत करना जरूरी है ताकि पुलिस और जाँच एजेंसियों को सही ट्रेनिंग, तकनीक और संसाधन मिल सकें और वे डिजिटल सबूत ठीक से इकट्ठा कर सकें।
टेक कंपनियों को भी जिम्मेदारी लेनी होगी कि उन्हें खुद ऐसे कंटेंट पहचानकर जल्दी हटाना चाहिए और कानून एजेंसियों के साथ सहयोग करना चाहिए, वरना उन पर जुर्माना लगे। पीड़ितों को भी सही मदद मिलनी चाहिए जैसे कानूनी सहायता और संवेदनशील व्यवहार। इसके अलावा लोगों को डिजिटल सुरक्षा और सहमति के बारे में जागरूक करना भी बहुत जरूरी है।
नासिक की एक अदालत ने 2 मई को TCS धर्मांतरण मामले की आरोपित निदा एजाज खान को अग्रिम जमानत देने से मना कर दिया है। कोर्ट का कहना है कि अब तक की जाँच से साफ है कि निदा एक सोची-समझी साजिश में शामिल थी, जिसका मकसद पीड़िता को बहला-फुसलाकर उसका धर्म बदलवाना था।
जज केजी जोशी ने अपने आदेश में कहा कि यह मामला काफी गंभीर है, इसलिए सच्चाई का पता लगाने के लिए निदा को पुलिस हिरासत में लेकर पूछताछ करना बहुत जरूरी है। निदा के खिलाफ देवलाली पुलिस स्टेशन में अलग-अलग धाराओं और SC/ST एक्ट के तहत केस दर्ज है।
कोर्ट में निदा खान की सफाई: क्या थीं बचाव पक्ष की दलीलें?
निदा खान के वकील ने कोर्ट में सफाई देते हुए कहा कि निदा और पीड़िता बस साथ में काम करने वाले सहकर्मी थे और एक-दूसरे को जानते थे। उन्होंने निदा पर लगे सभी आरोपों को गलत बताते हुए कहा कि उन्हें जानबूझकर फँसाया गया है, जबकि मुख्य आरोप तो दानिश और तौसीफ पर हैं। वकील का यह भी कहना था कि ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि निदा ने सबके सामने जाति को लेकर पीड़िता का अपमान किया हो।
आगे दलील दी गई कि महाराष्ट्र में धर्म बदलने को लेकर कोई अलग कानून नहीं है और जिस धारा (BNS 299) का जिक्र हो रहा है, वह धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के लिए है, न कि धर्म परिवर्तन के लिए। वकील के मुताबिक, धर्म पर सामान्य चर्चा करना कोई अपराध नहीं है और इसमें केवल जमानत मिलने वाली धाराएँ ही लगनी चाहिए। साथ ही, निदा के गर्भवती होने का हवाला देते हुए कहा गया कि इस हालत में गिरफ्तारी उनके होने वाले बच्चे की सेहत के लिए बहुत खतरनाक हो सकती है।
अभियोजन पक्ष का कड़ा रुख: ‘निदा खान सिर्फ मूकदर्शक नहीं, बल्कि मुख्य साजिशकर्ता’
अभियोजन पक्ष ने निदा खान की अग्रिम जमानत का पुरजोर विरोध किया। कोर्ट को बताया गया कि जुलाई 2023 से 2026 के बीच निदा खान और अन्य आरोपितों ने मिलकर पीड़िता पर धर्मांतरण के लिए दबाव बनाया। सरकारी वकील ने दलील दी कि निदा ने न केवल पीड़िता की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाई, बल्कि FIR में भी उसके नाम और भूमिका का स्पष्ट जिक्र है। जाँच से यह संकेत मिले हैं कि सभी आरोपितों ने आपस में संपर्क कर इस पूरी साजिश को अंजाम दिया है।
कोर्ट को सूचित किया गया कि निदा खान इस मामले में कोई मामूली भूमिका में नहीं थी। वह ऑफिस में ब्रेक के दौरान पीड़िता से बात करती थी और इस्लाम कबूलने के लिए उसका ब्रेनवॉश करती थी। आरोप है कि उसने पीड़िता को खास मजहबी प्रथाओं का पालन करने के लिए मजबूर करने में अहम भूमिका निभाई। अभियोजन पक्ष ने अपनी दलीलों के समर्थन में पीड़िता, उसकी माँ और भाई के बयानों को आधार बनाया।
जाँच अधिकारी ने कोर्ट को बताया कि निदा खान ने ही पीड़िता को बुर्का और इस्लाम से जुड़ी किताबें मुहैया कराई थीं। पीड़िता के फोन में एक ऐसा ऐप भी मिला, जिसे धर्मांतरण के इरादे से इंस्टॉल करवाया गया था। इसके अलावा, निदा उसे यूट्यूब और इंस्टाग्राम के ऐसे लिंक भेजती थी जिनमें मजहबी उपदेश होते थे। पुलिस का कहना है कि इन सामग्रियों के सोर्स (Source) और निदा के बाहरी संपर्कों की गहराई से जाँच करना जरूरी है।
सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह था कि निदा खान पीड़िता के घर भी जाती थी। वहाँ उसने पीड़िता को नमाज पढ़ने की ट्रेनिंग दी और उसे हिजाब व बुर्का पहनने के निर्देश दिए। अभियोजन पक्ष के अनुसार, पीड़िता का नाम बदलकर ‘हानिया’ रखने की योजना थी। यही नहीं, उसे मलेशिया भेजने की भी तैयारी थी और इसके लिए ‘मालेगाँव पार्टी’ की मदद से दस्तावेज बनवाए जाने थे। इन तमाम विदेशी कड़ियों और बड़े नेटवर्क का पर्दाफाश करने के लिए कोर्ट से आरोपित की कस्टडी (हिरासत) की माँग की गई।
पीड़िता के वकील का दावा: पद का फायदा उठाकर बनाया धर्मांतरण का दबाव
सुनवाई के दौरान पीड़िता के वकील ने विस्तार से बताया कि कैसे निदा खान और अन्य आरोपितों ने मिलकर पीड़िता का ब्रेनवॉश किया। वकील ने आरोप लगाया कि निदा और बाकी आरोपितों ने कंपनी में अपने ऊँचे पदों का गलत इस्तेमाल किया ताकि पीड़िता पर दबाव बनाया जा सके। उन्हें न केवल इस्लाम का पालन करने के लिए मजबूर किया गया, बल्कि उनकी मर्जी के खिलाफ उन्हें मांसाहारी (Non-veg) खाना खाने के लिए भी विवश किया गया। इसके अलावा, कोर्ट को बताया गया कि आरोपित हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ अश्लील टिप्पणियाँ करते थे और ऑफिस में पीड़िता को उनकी जाति को लेकर अपमानित किया जाता था।
पीड़िता के पक्ष ने एक और गंभीर बात कोर्ट के सामने रखी। उन्होंने कहा कि निदा खान सिर्फ पीड़िता तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि उसने उसके परिवार को भी धर्मांतरण के लिए मजबूर करने की कोशिश की। इसके लिए बाकायदा धमकी भरे और डराने वाले तरीके अपनाए गए ताकि पूरे परिवार पर दबाव बनाया जा सके। इन दलीलों के जरिए कोर्ट को यह समझाने की कोशिश की गई कि यह मामला केवल आपसी बातचीत का नहीं, बल्कि एक गहरी और डरावनी साजिश का हिस्सा है।
कोर्ट का फैसला: ‘पहली नजर में आरोपित की भूमिका साफ दिखती है’
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, कोर्ट ने सह-आरोपितों और निदा खान की भूमिकाओं के बीच एक स्पष्ट अंतर बताया। जज ने गौर किया कि जहाँ अन्य दो आरोपित पहली नजर में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 और 75 के तहत अपराधों में शामिल थे, वहीं निदा खान की भूमिका धारा 299 और SC/ST एक्ट के प्रावधानों के तहत दिखाई दे रही है।
जज ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि FIR में न केवल निदा खान का नाम शामिल है, बल्कि उसकी भूमिका का भी साफ जिक्र है। कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध सबूतों से पता चलता है कि आरोपितों ने हिंदू देवी-देवताओं के बारे में ‘आपत्तिजनक कहानियाँ’ सुनाईं और पीड़िता की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाई। कोर्ट के आदेश में यह भी दर्ज किया गया है कि निदा खान ने पीड़िता को बुर्का दिया था। इसके अलावा, आरोपितों ने उसे पैगंबर मोहम्मद के जीवन पर आधारित एक किताब दी और निदा खान खुद पीड़िता के घर जाकर उसे मजहबी ट्रेनिंग देती थी।
कोर्ट की टिप्पणी: ‘यह कोई साधारण बातचीत नहीं, बल्कि सुनियोजित साजिश’
कोर्ट ने अपनी बातों को और स्पष्ट करते हुए कहा कि पीड़िता और निदा खान के बीच धर्म पर हुई बातचीत कोई इत्तेफाक या साधारण चर्चा नहीं थी। रिकॉर्ड में मौजूद सबूत साफ दिखाते हैं कि पीड़िता को फँसाने के लिए बहुत ही सलीके से और योजना बनाकर काम किया गया था। जज ने इस बात को गंभीरता से रखा कि यह अपराध कोई छोटा-मोटा मामला नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई गहरी परतें और एक बहुत बड़ी साजिश छिपी हुई है।
अदालत ने उन सबूतों पर भी कड़ी चिंता जताई, जिनसे पता चला कि आरोपित पीड़िता का नाम बदलना चाहते थे और उसे मलेशिया भेजने की तैयारी में थे। जज ने साफ कहा कि हमारा संविधान हर किसी को अपनी पसंद का धर्म और नाम चुनने की आजादी देता है, लेकिन किसी का ब्रेनवॉश करके या साजिश रचकर उसे ऐसा करने के लिए मजबूर करना बिल्कुल गलत है। कोर्ट ने माना कि व्यक्ति के अधिकार अपनी जगह हैं, लेकिन किसी को धोखे का शिकार बनाकर उसका धर्म बदलवाना कानूनी रूप से अपराध है।
कोर्ट का फैसला: ‘सच उगलवाने के लिए पुलिस कस्टडी है जरूरी’
कोर्ट ने साफ कहा कि इस केस की पूरी सच्चाई सामने लाने के लिए आरोपित को पुलिस की गिरफ्त में रखना जरूरी है। कोर्ट का मानना है कि यह मामला काफी पेचीदा है, क्योंकि जाँच में ‘मालेगाँव पार्टी’ के साथ-साथ कई अन्य शहरों और विदेशों के नाम भी जुड़े मिले हैं। खासकर मलेशिया में बैठे ‘इमरान’ जैसे लोगों और इस अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का पर्दाफाश करने के लिए हिरासत में पूछताछ करना बेहद आवश्यक है, ताकि इस पूरी साजिश की हर कड़ी को जोड़ा जा सके।
प्रे प्रेग्नेंसी की दलील भी नहीं आई काम, कोर्ट ने ठुकराई राहत
निदा खान के वकील ने दलील दी कि वह गर्भवती है और गिरफ्तारी का उसके होने वाले बच्चे पर बुरा असर पड़ सकता है। लेकिन सरकारी वकील ने इसका विरोध करते हुए कहा कि इतने गंभीर मामले में सिर्फ प्रेग्नेंसी के आधार पर कानून में कोई अलग छूट नहीं मिलती। कोर्त ने इस बात को सही माना और कहा कि अग्रिम जमानत जैसी बड़ी राहत केवल बहुत ही खास और मजबूरी वाले हालात में दी जाती है, जो इस केस में कहीं नहीं दिखते। इन्हीं वजहों से जज ने निदा खान की याचिका में कोई दम न पाते हुए उसकी जमानत की अर्जी को पूरी तरह खारिज कर दिया।
(यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है। अंग्रेजी की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)