उत्तर प्रदेश के आगरा के जगनेर थाना इलाके में एक बेरहम पिता ने अपने बेटे को बेहद क्रूरता से पीटा। इसका वीडियो भी सोशल मीडिया में तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में गुड्डू खान अपने 11 साल के बेटे को रस्सी से बाँधकर खिड़की से उल्टा लटका कर पीट रहा है।
बेरहम गुड्डू खान अपने बच्चे को लगातार पीटे जा रहा है और बच्चा चीख रहा है, बचने के लिए चिल्ला रहा है। लेकिन वो चाहकर भी कहीं नहीं भाग सकता है, क्योंकि उसे रस्सी से बाँधकर खिड़की से उल्टा लटका रखा है। गुड्डू खान की इस बेरहमी का पड़ोस में रहने वाले लोगों ने वीडियो बना लिया और सोशल मीडिया में वायरल कर दिया। घटना शुक्रवार (अगस्त 7, 2020) की बताई जा रही है।
“The man was beating his son because he did something against the will of his father” Ravi kumar SPR West, Agra. pic.twitter.com/1OHoWPbFrl
वायरल वीडियो का संज्ञान लेते हुए पुलिस शनिवार (अगस्त 8, 2020) सुबह जगनेर थाना अंतर्गत मेवली गाँव में गुड्डू खान के घर पहुँची और उसे गिरफ्तार कर लिया।
पड़ोसियों ने खुलासा किया कि बच्चे की पिटाई इसलिए की गई थी क्योंकि उसने घर से गेहूँ चोरी करके पास की दुकान से बदले में मिठाई खरीद ली थी। उन्होंने आरोप लगाया कि गुड्डू खान ने बच्चे पर गर्म पानी भी फेंका था।
अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (आगरा पश्चिम) रवि कुमार ने कहा, “45 वर्षीय गुड्डू खान को अपने बेटे को प्रताड़ित करने के लिए गिरफ्तार किया गया है। बच्चे को मेडिकल परीक्षण के लिए भेजा गया है। आगे की कार्रवाई के लिए उसका बयान दर्ज किया जाएगा।”
एएसपी ने बताया, “पूछताछ के दौरान खान ने दावा किया कि उसने शराब नहीं पी रखी थी, उसे सिर्फ अपने बेटे के व्यवहार को लेकर गुस्सा आ गया था। उस समय, उसकी पत्नी घर पर नहीं थी। वह तीन दिन पहले ही गुड्डू खान से झगड़े के बाद बहन के घर चली गई थी। उसके तीन बच्चे हैं। ये सबसे बड़ा लड़का है।”
जगनेर के स्टेशन हाउस ऑफिसर कुशलपाल सिंह ने कहा, “वायरल वीडियो के आधार पर, गुड्डू खान के खिलाफ जुवेनाइल जस्टिस ऐक्ट, 2015 की धारा 15 और आईपीसी की धारा 323 के तहत नाबालिग बेटे की बेरहमी से पिटाई करने का मामला दर्ज किया गया है।”
सुशांत सिंह राजपूत की मौत पर जारी चर्चा में अब शिवसेना सांसद नेता संजय राउत भी कूद गए हैं। संजय राउत ने शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ के जरिए दावा किया है कि सुशांत सिंह राजपूत का उनके परिवार के साथ संबंध अच्छे नहीं थे। राउत ने बिहार पुलिस और केंद्र सरकार पर महाराष्ट्र सरकार के खिलाफ साजिश रचने का आरोप लगाते हुए यहाँ तक कहा कि बिहार के डीजीपी गुप्तेश्वर पांडे भाजपा के आदमी हैं।
शिवसेना सांसद ने आरोप लगाया कि बिहार सरकार की सिफारिश के बाद 1 ही दिन में सीबीआई जाँच के लिए स्वीकृति दे दी गई, जो बताता है कि सीबीआई और ईडी जैसी एजेंसियों का राजनीति के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है और यह झकझोर देने वाला है। राउत ने इसे राज्य सरकार की स्वायत्तता पर हमला करार दिया।
उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि अगर ये मामला मुंबई पुलिस के हाथ में रहता तो इससे आसमान नहीं टूट पड़ता। लेकिन इस मामले में राजनीतिक दबाव और रुचि के कारण इसे सीबीआई को दिया गया है। उन्होंने आरोप लगया कि इस मामले की पटकथा पहले ही लिख ली गई थी और परदे के पीछे कुछ भी हुआ हो सकता है ताकि महाराष्ट्र सरकार के खिलाफ साजिश रची जाए। उन्होंने मुंबई पुलिस को दुनिया की सर्वोच्च जाँच तंत्र बताते हुए कहा कि वो प्रोफेशनल है और दबाव में नहीं आती।
संजय राउत ने मुंबई पुलिस कि उपलब्धियाँ गिनाने के लिए शीना बोरा हत्याकांड और 26/11 मुंबई हमला का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि सीबीआई एक निष्पक्ष और स्वतंत्र जाँच एजेंसी नहीं है, इसीलिए कई राज्यों ने इस पर रोक लगा रखी है। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे ममता बनर्जी की बंगाल पुलिस ने शारदा चिट फंड घोटाले की जाँच के लिए गए सीबीआई के अधिकारियों को लॉकअप में डाल दिया था।
संजय राउत ने दावा किया कि सर्वोच्च न्यायालय से लेकर ईडी, सीबीआई जैसी संस्थाओं पर विगत कुछ वर्षों में सवालिया निशान लग चुके हैं। उन्होंने दावा किया कि गोधरा के बाद मोदी-शाह नहीं चाहते थे कि इसकी जाँच सीबीआई के पास जाए, क्योंकि वो इसे एक स्वतंत्र एजेंसी नहीं मानते थे। उन्होंने कहा कि सुशांत सिंह राजपूत ने आत्महत्या की थी ये स्पष्ट है और इसे हत्या कहने का कोई आधार नहीं है।
उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा राज्य में शिवसेना की सरकार को गिरा नहीं पा रही है, इसीलिए पार्टी ने समाचार चैनलों के साथ मिल कर ‘गॉसिपिंग’ कर इसे बड़ा मुद्दा बना दिया है ताकि सरकार को बदनाम किया जा सके। उन्होंने लिखा कि सुशांत सिंह राजपूत का बिहार से कोई संबंध नहीं था और वो पूरी तरह मुंबईकर बन गए थे। उन्होंने आरोप लगाया कि संघर्ष के दिनों में बिहार उनके साथ नहीं था, उन्हें सारा वैभव मुंबई ने दिया।
राउत ने कहा कि सुशांत का उनके पिता के साथ संबंध अच्छे नहीं थे। पिता का दूसरा विवाह उन्हें स्वीकार नहीं था। उनके उनके पिता से कोई भावनात्मक संबंध नहीं था। उन्होंने गुप्तेश्वर पांडे को एक अनुशासनहीन पुलिस अधिकारी करार देते हुए कहा कि वो चैनलों पर जाकर मुंबई पुलिस के खिलाफ बोलते हैं।
गौरतलब है कि इससे पहले सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में बिहारियों को निशाना बनाते हुए शेखर गुप्ता की वेबसाइट ‘द प्रिंट’ ने एक लेख प्रकाशित किया। इस लेख का शीर्षक और इसकी तमाम बातें ऐसी हैं जिनका न तो कोई आधार है और न अर्थ। लेख की शैली से स्पष्ट था कि इसका उद्देश्य एक क्षेत्र और समूह के लोगों को निशाना बनाना है। सुशांत के बहनोई विशाल ने इसे टॉक्सिक जर्नलिज्म (विषाक्त पत्रकारिता) करार दिया और कहा कि इस बहाने बिहार को बदनाम किया जा रहा है।
राजस्थान के जोधपुर से एक दर्दनाक घटना सामने आई है। घटना देचू थाने के लोड़ता गाँव की है। पुलिस ने बताया कि जोधपुर जिले के एक खेत में रविवार (9 अगस्त, 2020) सुबह पाकिस्तान से आए एक हिंदू परिवार के ग्यारह सदस्य मृत पाए गए। फिलहाल मौत के कारणों का पता नहीं चल पाया है।
एक अधिकारी ने कहा कि परिवार के एक व्यक्ति को देचू क्षेत्र के लोड़ता गाँव में जीवित पाया गया है। पुलिस अधीक्षक (ग्रामीण) राहुल बारहट ने कहा कि जीवित पाए गए व्यक्ति ने इस घटना के बारे में कोई अनुमान नहीं होने का दावा किया है। लेकिन माना जा रहा है कि यह घटना बीते रात की है।
#Breaking | 11 Pak refugees have been found dead in Jodhpur. The cause of death is unknown. The family had arrived from Sindh in 2012.
बारहट ने कहा, “हम अभी तक मौत के कारणों का पता नहीं लगा पाए हैं। लेकिन प्रथम दृष्टया जाहिर होता है कि सभी सदस्यों ने रात में किसी जहरीली रसायन का सेवन किया था, जिससे इन लोगों की मौत हुई है।” उन्होंने कहा कि झोंपड़ी में चारों ओर किसी रसायन की गंध थी, जिससे लगता है कि उन्होंने कुछ जहरील पदार्थ खाया होगा।
पुलिस अधीक्षक ने बताया कि परिवार के सभी सदस्य भील समुदाय से थे। ये लोग पाकिस्तान के हिंदू प्रवासी थे और गाँव में खेत में एक झोपड़ी बना कर रहते थे। इसे इन्होंने खेती के लिए किराए पर लिया था।
एसपी ने कहा, “किसी भी शव पर न तो कोई चोट का निशान था और न ही किसी तरह के मारपीट के कोई सबूत मिले हैं, लेकिन किसी भी अंतिम निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए फॉरेंसिक टीम और डॉग स्क्वाड की सहायता से जाँच कर रहे हैं।”
उन्होंने यह भी कहा कि प्रारंभिक जानकारी से संकेत मिलता है कि परिवार में किसी मुद्दे पर कुछ विवाद था। इस मामले को देखते हुए परिवार के जीवित शख्स से पूछताछ किया जाएगा।
जानकारी के अनुसार इस घटना में छह व्यस्क व पाँच बच्चों की मौत हुई है। देचू थाना अधिकारी हनुमाना राम ने बताया कि इनमें सात महिला और चार पुरुष हैं।
वहीं इस घटना पर ट्वीट करते हुए केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने लिखा है, “जोधपुर देचू में एक दर्जन पाक विस्थापित नागरिकों की मृत्यु अशोक गहलोत की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान है। मृतकों में 2 पुरुष, 4 महिलाएँ और 5 बच्चे हैं। एक के बाद एक, प्रदेश की बिगड़ी व्यवस्था की भयावह तस्वीरें सामने आ रही हैं। सरकार त्वरित कार्यवाही कर तथ्यों को सामने लाए।”
जोधपुर देचू में एक दर्जन पाक विस्थापित नागरिकों की मृत्यु @ashokgehlot51 की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान है!
मृतकों में 2 पुरुष, 4 महिलाएं और 5 बच्चे हैं। एक के बाद एक, प्रदेश की बिगड़ी व्यवस्था की भयावह तस्वीरें सामने आ रही हैं!
न्यूज़ 18 की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तानी हिंदू शरणार्थियों के परिवार की एक बहन पेशे से नर्स थी। रक्षाबंधन के मौके पर वह अपने भाई को राखी बाँधने के लिए आई थी। लेकिन त्यौहार के बाद वह वापस नहीं गई, यहीं परिवारवालों के साथ ही रहने लगी थी। आसपास रहने वाले लोगों का मानना है कि बहन ने ही परिवार को 10 लोगों को जहरीला इंजेक्शन लगाया। उसके बाद उसने खुद को इंजेक्शन लगा लिया।
पुलिस जाँच में भी परिवार के सदस्यों और बहन की मौजूदगी के बारे में पता लगा है। आपको बता दें कि पुलिस की ओर से परिवार में जिंदा बचे एकमात्र सदस्य को भी शक की निगाह से देखा जा रहा है।
दुनिया के सामने एक वायरस और उससे उपजी महामारी पहले से मौजूद है। लेकिन इसके साथ-साथ ऐसी बीमारियाँ भी सामने आ रही हैं, जो बेहद भयावह हैं। अमेरिका के कई प्रांतों में सैलमोनेला (salmonella) नाम का संक्रमण बहुत तेज़ी से फैल रहा है। यह संक्रमण बैक्टीरिया से होता है और ज़्यादातर प्याज़ खाने से होता है।
पूरे अमेरिका में अब तक लगभग 640 लोग इसकी चपेट में आ चुके हैं। इनमें से लगभग 85 लोगों को भर्ती किया जा चुका है। Centers for Disease Control and Prevention (CDC) ने इस बारे में जानकारी दी। CDC ने इस बारे में चेतावनी भी जारी की है। चेतावनी में उन्होंने कहा, “अगर आपको इस बात की जानकारी नहीं है कि आपकी प्याज़ कहाँ से आई है या कहाँ की है? तब उसे मत परोसिए, मत मत खाइए और न ही बेचिए।”
फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने भी इस बारे में चेतावनी जारी की है। उनका साफ़ तौर पर कहना है कि उपभोक्ता किसी भी सूरत में प्याज़ का सेवन न करें। विशेष तौर पर लाल, सफ़ेद, पीली और मीठी प्याज़ का तो कतई नहीं। CDC का इस मामले पर यह भी कहना था कि भारी मात्रा में प्याज़ बड़े स्टोर्स में बेची गई हैं। जैसे वालमार्ट, क्रोगर, फ्रेड मेयर, पब्लिक्स, जायंट इगल, फूड लायन और एचईबी। इतना ही नहीं इन स्टोर्स में प्याज़ ब्रांड के तहत बेची गई हैं।
कई बड़े समूहों ने प्याज वापस बुलाई है। साथ ही ऐसे खाद्य उत्पाद भी वापस बुलाए हैं, जिनमें प्याज़ का इस्तेमाल होता है। इसमें चिकन सैलेड, मैक्रोनी सैलेड, फजीता स्टिर फ़्राय, पिज्जा और कच्ची प्याज़ भी शामिल है। CDC ने यह विशेष रूप से कहा है कि लोगों को जाँच करने की ज़रूरत है कि बड़े समूहों ने जिन खाद्य उत्पादों (प्याज़) को वापस बुलाया है, वैसे खाद्य उत्पाद उनके घरों में तो नहीं मौजूद हैं? अगर ऐसा है तो वह उसे तुरंत नष्ट कर दें। CDC के मुताबिक़ प्याज़ संबंधित किसी भी तरह के खाने को अभी के लिए नज़रअंदाज़ करना है।
सैलमोनेला के मुख्य लक्षण डायरिया, बुखार और पेट में दर्द है। सैलमोनेला के बैक्टीरिया संपर्क में आने के बाद इस संक्रमण के लक्षण घंटे से लेकर 6 दिन के बीच नज़र आते हैं। इस संक्रमण का असर सबसे ज़्यादा उन पर पड़ता है, जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमज़ोर होती है। यानी 5 साल से कम उम्र के बच्चे और 65 साल से अधिक उम्र के बुजुर्गों पर इस संक्रमण का ख़तरा सबसे ज़्यादा रहता है। कुछ मामलों में संक्रमण आंतों से होते हुए शरीर के बाकी हिस्सों में भी फैल जाता है। इस तरह के मामलों में मरीज़ को भर्ती कराना पड़ता है।
CDC अमेरिका के लोगों से इस बात का निवेदन कर रहा है कि अगर उनमें इसके लक्षण नज़र आते हैं, तो वह सबसे पहले इस बात की जानकारी दें कि उन्होंने बीमारी के एक हफ्ते के पहले क्या खाया था। वह स्वास्थ्य विभाग को इस बात का संक्षिप्त ब्यौरा दें और उसके बाद स्वास्थ्य अधिकारी उनकी जाँच करेंगे।
इस संक्रमण के मामले अमेरिका के कई प्रांतों में नज़र आए हैं। इसमें एरिज़ोना, कैलिफोर्निया, कोलोराडो, फ्लोरिडा, इंडियाना, इलीनोयस, इडाहो, लोवा, कनसेस, केंटकी, माइने, मैरीलैंड, मिनेसोटा, मिसोरी, मोंटाना, नेवाडा, न्यूयॉर्क, नार्थ कैरोलाइना, नार्थ डकोटा, ओहियो, ऑरेगोन, पेन्सिल्वेनिया, साउथ कैरोलाइना, टेक्सस और वर्जीनिया जेर प्रांत मुख्य हैं।
कॉन्ग्रेस के लिए अभी तक स्थायी अध्यक्ष न चुन पाना अब उनकी पार्टी के अस्तित्व के लिए खतरा बन सकती है। संडे गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार अगर कॉन्ग्रेस, चुनाव आयोग को संतोषजनक स्पष्टीकरण देने में विफल रहती है कि वह पिछले साल राहुल गाँधी के इस्तीफे के बाद स्थायी अध्यक्ष का चुनाव क्यों नहीं कर पाई है, तो पार्टी को निलंबन या अयोग्यता का सामना करना पड़ सकता है।
बता दें कि 2019 के आम चुनावों में हार के बाद राहुल गाँधी ने अध्यक्ष के पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद कॉन्ग्रेस कार्य समिति द्वारा सोनिया गाँधी को अंतरिम अध्यक्ष बनाया गया था। सोमवार को बतौर अंतरिम अध्यक्ष उनका साल भर पूरा हो जाएगा।
पार्टी का दावा है कि कोरोना वायरस महामारी के कारण नए प्रमुख का चुनाव करने की प्रक्रिया को स्थगित कर दिया गया है और सामान्य स्थिति बहाल होते ही चुनाव आयोग के प्रावधानों का अनुपालन करने का आश्वासन दिया गया है।
चुनाव आयोग प्राय: पार्टी के आंतरिक मुद्दों में हस्तक्षेप करने से दूर रहता है। हालाँकि, अगर वह चाहे तो किसी भी राजनीतिक पार्टी के खिलाफ नियमों और विनियमों का पालन करने में विफल रहने के लिए कार्रवाई शुरू कर सकता है। चुनाव आयोग सिंबल ऑर्डर के तहत चुनाव चिह्न को भी फ्रीज कर सकता है।
राजनीतिक दल, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 29 (A), उप-खंड (V) द्वारा शासित होते हैं। इसकी शुरुआत 1989 में हुई। कॉन्ग्रेस सहित प्रत्येक राजनीतिक दल को खुद को फिर से पंजीकृत करना होगा, और भारत के संविधान के प्रति अपनी निष्ठा दिखाने और नियत समय पर होने वाले चुनावों में भाग लेने के लिए सहमत होना होगा।
हालाँकि अनिवार्य अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए कोई नियम नहीं हैं। चुनाव आयोग समय-समय पर इस मामले पर निर्देश दे सकता है। चुनाव आयोग अब जाँच कर सकता है कि क्या कॉन्ग्रेस संगठन में पद खाली होने के बाद एक निश्चित अवधि के भीतर नए अध्यक्ष के चुनाव के संबंध में कोई विशेष प्रावधान है। आयोग पार्टी को इस निर्धारित समय सीमा के भीतर आंतरिक चुनाव कराने का आदेश दे सकता है।
ग्रैंड-ओल्ड-पार्टी के लिए चिंता का विषय यह है कि पार्टी के भीतर संकट और अधिक गहरा जाने की संभावना है। अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी को हाल ही में गंगा राम अस्पताल में कुछ स्वास्थ्य जटिलताओं के कारण भर्ती कराया गया था। यदि वह अपनी वार्षिक मेडिकल चेकअप के लिए विदेश जाने का फैसला करती है, तो पार्टी को उनकी जगह किसी और को चुनने की आवश्यकता हो सकती है, खासकर अगर राहुल गाँधी कार्यभार सँभालने के लिए अनिच्छुक हैं। पार्टी का अध्यक्ष केवल ऑल इंडिया कॉन्ग्रेस कमिटी द्वारा ही चुना जा सकता है।
इस बीच, पार्टी के वरिष्ठ नेताओं सहित पार्टी कैडर की माँग है कि AICC को जल्द से जल्द संगठनात्मक पदों पर नियुक्ति की जाए। साथ ही वे कॉन्ग्रेस संसदीय बोर्ड की विधिवत निर्वाचित कार्यसमिति के साथ, व्यापक आधार रखने वाले नेताओं को प्रतिनिधित्व प्रदान करने की भी माँग कर रहे हैं।
इन दिनों चूँकि कई पावर सेंटर्स उभरे हैं, इसलिए कॉन्ग्रेस पार्टी वर्तमान में भाजपा के दाँव-पेंच को लेकर काफी अतिसंवेदनशील और सतर्क है। कॉन्ग्रेस नेताओं का मानना है कि संगठन की वर्तमान स्थिति नेतृत्वहीन और दिशाहीन है।
मध्य प्रदेश में इस साल की शुरुआत में पार्टी की सरकार गिर गई थी। वहीं राजस्थान सरकार संकट का सामना कर रही है। ऐसी भी रिपोर्टें हैं, जो बताती हैं कि छत्तीसगढ़ सरकार भी मध्यप्रदेश की तरह गिर सकती है। झारखंड में गठबंधन की सरकार को भी अपना भविष्य खतरे में नजर आ रहा है। वहीं भाजपा, कॉन्ग्रेस के भीतर चल रहे ड्रामे पर करीब से नजर रखे हुए है और बदली परिस्थितियों का लाभ उठाने का इंतजार कर रही है।
कॉन्ग्रेस पार्टी के पास प्रमुख मुद्दों में से एक राहुल गाँधी की अस्पष्टता है। एक ओर उन्होंने कथित तौर पर यह स्पष्ट कर दिया है कि वह पार्टी प्रमुख के रूप में वापस नहीं लौटना चाहते हैं, वहीं दूसरी ओर, जब उनके करीबी सहयोगी उनकी बहाली की माँग उठाते हैं, तो वह चुप रहना पसंद करते हैं।
इसके अलावा, सोनिया गाँधी का स्वास्थ्य उन्हें अध्यक्ष के रूप में सक्रिय रहने की अनुमति नहीं देता है। इसलिए, पार्टी को संगठन के हित में जल्द से जल्द उन्हें जिम्मेदारियों से मुक्त करना पड़ सकता है। हालाँकि, प्रमुख चिंताओं में से एक यह है कि उसके लंबे कार्यकाल ने निर्णय लेने की प्रक्रिया को केंद्रीकृत कर दिया है। पार्टी के ज्यादातर फैसले वे बिना किसी परामर्श प्रक्रिया के खुद ही लेती हैं।
जब से सोनिया गाँधी ने पार्टी की बागडोर सँभाली, वह सर्वोच्च नेता रही हैं। वह यूपीए शासन के दौरान राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की संयोजक भी थीं। कुछ का मानना है कि अधिकार और शक्ति का इस तरह एक हाथों में होने से पार्टी को नुकसान हुआ है। इसके अलावा, दलित-मुस्लिमों की तरफ झुकाव ने पार्टी को कमजोर कर दिया है।
पार्टी के वरिष्ठ नेता अब इस विचार में हैं कि एक बार राहुल गाँधी के निर्णय के बाद, पार्टी को संगठनात्मक चुनाव के जरिए गैर-गाँधी का चयन करना चाहिए। कुछ समय के लिए कमलनाथ या भूपिंदर सिंह हुड्डा जैसे को प्रमुख बनाया जा सकता है। युवा नेता चुनाव में भाग लेकर पार्टी के भीतर अपनी हैसियत का अंदाजा लगा सकेंगे। इन चुनावी बाधाओं को जीतने वाले नेताओं को भविष्य के नेताओं के रूप में चुना जा सकता है।
महाराष्ट्र के अकोला में माउंट कार्मेल सेकेंडरी एंड हायर सेकेंडरी स्कूल ने शनिवार (8 अगस्त, 2020) को VI (A) स्टैण्डर्ड में पढ़ाने वाली सुनीता जोसफ नाम की एक शिक्षक को निलंबित कर दिया। जोसफ ने स्कूली छात्र-छात्राओं के आधिकारिक व्हाट्सएप ग्रुप में शुक्रवार को एक अपमानजनक हिन्दुफोबिक फेसबुक पोस्ट शेयर किया था।
माउंट कार्मेल की शिक्षिका ने एक कुत्ते को भगवान गणेश की मूर्ति के पास पेशाब करते हुए एक आपत्तिजनक पोस्ट शेयर किया था। सुनीता ने इस हिंदू विरोधी पोस्ट के साथ एक बेहद ही घटिया कैप्शन भी दिया, “कुत्ते को पूरा विश्वास है कि यह पत्थर है और कुछ नहीं। लेकिन पता नहीं ये बात भारतीयों को क्यों समझ नहीं आती।”
हालाँकि, एक हिंदू देवता के प्रति घटिया मानसिकता वाली बात कहने और छोटे बच्चों के ब्रेनवॉश करने की नापाक कोशिश करने पर स्कूल अधिकारियों ने तुरंत इस मामले पर कार्रवाई की। माउंट कार्मेल हाई स्कूल के प्रिंसिपल फादर माथैव करिकाल ने शिक्षक सुनीता जोसेफ को संबोधित कर एक पत्र में बताया कि उन्हें तत्काल प्रभाव से शिक्षक पद से निलंबित कर दिया गया है।
निलंबन आदेश में लिखा गया, “यह मामला भले ही गलती से भी हुआ हो, लेकिन इसे किसी भी कीमत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। मुझे यह बताते हुए खेद है कि आपको तत्काल प्रभाव से सेवा से निलंबित कर दिया गया है।”
बंगाल के देगंगा (Deganga) में सितंबर 06, 2010 को सोमवार के दिन दंगे शुरू हो गए थे और कई दिनों तक जारी रहे थे। कोलकाता से लगभग 150 किलोमीटर दूर उत्तर 24 परगना के बशीरहाट इलाके में मजहबी उपद्रवियों द्वारा हिन्दू परिवारों को निशाना बनाया गया, जिसमें कई हिन्दू परिवार और पुलिसकर्मी तक बुरी तरह घायल हुए। हिन्दुओं के घर और संपत्तियों को तहस-नहस कर दिया गया और पूरे इलाके में मौजूद मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया।
इसका परिणाम यह हुआ कि कई लोगों की निर्मम हत्याएँ हुईं और कई लोगों को बेघर होना पड़ा। इस दंगे की वजह सिर्फ यह थी कि विवादित कब्रिस्तान के चारों ओर एक दीवार का निर्माण किया जा रहा था। मजहबी कट्टरपंथियों का मकसद हिन्दुओं को वहाँ मौजूद दुर्गा मंदिर के पूजा पंडाल में प्रवेश करने से रोकना और उस भूमि पर अपना नियंत्रण स्थापित करना था।
पीड़ित हिन्दुओं के अधिकारों और उन पर दंगों के दौरान हुए अत्याचारों का हिसाब क्या रहा होगा, इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब देगंगा में शरणार्थी हिन्दू अपनी घरों से जान बचाने के लिए यहाँ-वहाँ भाग रहे थे, उस साल 2010 में पश्चिम बंगाल में वामपंथी सरकार थी, जिसके मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य थे और केंद्र में UPA सरकार थी, जिसकी लगाम लंबे दौर से सोनिया गाँधी के हाथों में ही थी।
भारत जैसे सेक्युलर देश में हिन्दुओं के खिलाफ ‘डरे हुए शंतिप्रियों’ द्वारा एक नहीं बल्कि अनेकों बार प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस ‘मनाए’ गए हैं। देगंगा दंगा इसी का एक और उदाहरण है। TMC सांसद नुरुल इस्लाम के नेतृत्व में दंगाई भीड़ के अत्याचारों के बाद दोनों ही धर्मों- ख़ास मजहब और हिन्दू, द्वारा अपने भाग्य पर छोड़ दिए हिन्दू इस देश की धर्म निरपेक्षता के असली गवाह हैं। हिन्दुओं के घरों में तोड़फोड़ की गई, हिन्दुओं की दुकानों में आग लगा दी गई, हिंदू मंदिरों को उजाड़ दिया गया। यह सब तब हुआ, जब इस्लामिक बर्बरता के छोटे से उदाहरण के सामने मजबूर होकर जिला प्रशासन और पुलिस ने कान पकड़ लिए थे। पश्चिम बंगाल में मार्क्सवादियों को समुदाय विशेष के समर्थन की जरूरत रहती आई है। जबकि, TMC की बुनियाद ही खास समुदाय के समर्थन से ज्यादा हिन्दू-घृणा पर टिकी है।
मीडिया द्वारा विवाद का कारण दुर्गा माता के एक मंदिर का मंडप बताया गया था- इस जगह हर साल बंगालियों का सबसे बड़ा धार्मिक त्योहार दुर्गा पूजा आयोजित किया जाता था। मंडप के पीछे की जमीन एक सुनसान और विवादित कब्रिस्तान है, जिसका मालिकाना हक अदालत में काफी समय से लंबित रहा। इस स्थान को ‘चट्टलपल्ली’ कहा जाता है। कोई भी बंगाली-भाषी व्यक्ति इस नाम से ही तुरंत समझ जाएगा कि यह गाँव पूर्वी बंगाल के चटग्राम या चटगाँव जिले के विभाजन के बाद हिंदू शरणार्थियों द्वारा स्थापित किया गया था।
यहीं पर एक संकरा कच्चा रास्ता दुर्गा मंडप और चट्टलपल्ली को मुख्य सड़क से जोड़ता है। स्थानीय कट्टपंथियों ने मुख्य सड़क से दुर्गा मंडप और गाँव, दोनों को अलग करने के लिए इस रास्ते पर एक नहर खोदना और दीवार निर्माण करना शुरू कर दिया। वे पहले ही विवादित कब्रिस्तान पर अपने अधिकार का दावा कर चुके थे। वो इस मार्ग को अवरुद्ध करना चाहते थे, जिससे उन्हें मंदिर की जमीन को जल्द से जल्द हासिल करने में मदद मिलती। लेकिन, स्थानीय हिंदुओं ने समुदाय विशेष वालों की इस हरकत का विरोध किया।
मंदिर के इस संकरे मार्ग को लेकर लोगों ने विवाद किया था (चित्र साभार- हिन्दूसमहाति ब्लॉग)
वर्ष 2010 में जब हिन्दुओं को उनके अधिकारों के लिए प्रताड़ित किया गया तो बंगाली मीडिया अपनी रिपोर्ट में यह नैरेटिव चलाने का काम कर रहा था कि हिंदू समूह सांप्रदायिक आग भड़का रहे हैं और बशीरहाट के तृणमूल कॉन्ग्रेस के सांसद हाजी नुरुल इस्लाम (Haji Nurul Islam) को अपमानित कर रहे हैं। तृणमूल कॉन्ग्रेस के सासंद… जी हाँ, वही TMC, जिसकी मुखिया ममता बनर्जी आज बंगाल में हिन्दुओं को ‘जय श्री राम’ का नारा लगाने पर गिरफ्तार कर लेती हैं। दंगा पीड़ित स्थानीय लोगों ने तब कहा था कि इन दंगों का असली जिम्मेदार इसी नुरुल हाजी ही था। इस सांसद को दंडित करने की माँग को लेकर बसीरहाट से 25 किलोमीटर दूर इलाके तक पोस्टर और लोगों द्वारा प्रदर्शन किए गए।
इस हिंसक रैली में हिंदुओं के सैकड़ों घरों और दुकानों को तबाह कर दिया गया, इसके अलावा वाहनों और पुलिस की गाड़ियों में आग लगा दी गई। स्थानीय निवासियों ने कहा था कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि इन दंगों का मुख्य खलनायक नुरुल इस्लाम ही था।
सदियों पुराने दुर्गा मंदिर को कब्जाना चाहते थे दंगाई
देगंगा के स्थानीय बहुसंख्यक दुर्गा मंडप की ओर जाने वाले हिंदूओं का मार्ग बाधित करने की कोशिश कर रहे थे। ये वो जगह थी, जहाँ तब पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से आए कई पीड़ित हिन्दू शरणार्थी रहा करते थे। पास के ही दूसरे मजहब के लोग उन्हें पूजा स्थलों और उनके घरों में घुसने से रोकते थे। लोगों द्वारा मंदिर पंडाल के रास्ते को खोदने का मुख्य कारण वहाँ बनाए गए ‘मजहबी कब्रिस्तान’ के नाम पर मंदिर की भूमि को हड़पना था।
इस्लामिक आतंक के तीन दिन
6 सितम्बर की सुबह उपद्रवियों ने दुर्गा मंदिर के पंडाल का मार्ग यह कहकर खोदना शुरू कर दिया कि वह कब्रिस्तान की जमीन है। लेकिन वास्तविकता यह थी कि इस दुर्गा मंदिर में पिछले चालीस वर्षों से विशाल दुर्गा पूजा का आयोजन होता आया था और इसे लेकर किसने भी आपत्ति नहीं की थी।
काली माता के मंदिर को तोड़कर मूर्ति खंडित कर दिया गया था
जब हिंदुओं ने मंदिर के रास्ते की खुदाई करने पर आपत्ति जताई तो उन पर मजहबी भीड़ द्वारा हमला किया गया। विवाद बढ़ने पर स्थानीय हिन्दू परिवारों ने पुलिस को इसकी सूचना दी। पुलिस जब वहाँ पहुँची और उपद्रवियों को रोकने की कोशिश की तो मजहबी भीड़ ने पुलिस को ही बुरी तरह से मारा और पीटा।
इस हिंसक झड़प में थाना प्रभारी अरूप घोष को सिर में चोटें आईं और एक हाथ में फ्रैक्चर हो गया। यही नहीं, उपद्रवियों ने शाम को फिर से हिंदुओं को अच्छा सबक सिखाने की धमकी दी।
शाम को लगभग 8.30 बजे, करीब 2000 लोगों की भीड़ देगंगा, कार्तिकपुर और बेलियाघाटा के बाजार क्षेत्रों पर उतरी और बड़े स्तर पर आगजनी, तोड़फोड़ और हिंसा की। हिंदुओं की दुकानें बुरी तरह से लूटी गईं, जला दी गईं और उन्हें नष्ट कर दिया गया। हिंदू समुदाय की बस्तियों से लगी सड़कों पर आग लगा दी गई।
अगले दिन, मंगलवार की सुबह, 7 सितंबर को TMC सांसद हाजी नुरुल इस्लाम के नेतृत्व में हथियारबंद कट्टरपंथियों की बड़ी भीड़ देगंगा पुलिस स्टेशन पहुँची और पुलिस को धमकाया। इस सशस्त्र मजहबी भीड़ का नेतृत्व मकबुर रहमान और मिंटू साहजी जैसे स्थानीय लोगों ने किया।
पुलिस द्वारा लगाई गई धारा 144 को ताक पर रखते हुए सभी आदेशों को नजरअंदाज कर दिया गया। मजहबी भीड़ ने भारी गोलाबारी की और बम फेंके। इसी बीच इसी भीड़ ने वहीं फाल्टी गाँव के एक मजहब विशेष के युवक को ही बेलियाघाटा पुल पर गलती से गोली मार दी और उसकी मौत हो गई।
इसके बाद, पुलिस दल और अधिकारी रैपिड एक्शन फोर्स के एक विशाल दल के साथ दंगों को नियंत्रित करने के लिए वहाँ पहुँचे। लेकिन, दोनों डीएसपी को भीड़ ने जमकर पीटा। अशोक रे को रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) द्वारा बचाया गया और एक नर्सिंग होम में स्थानांतरित कर दिया गया।
सुबह 11 बजे, डीआईजी (प्रेसीडेंसी रेंज) सिद्धनाथ गुप्ता, उत्तर 24 परगना के डीएसपी राहुल श्रीवास्तव और डीएम विनोद कुमार ने एक आपात बैठक बुलाई और जिले के 15 पुलिस थानों के पुलिसकर्मी मजहबी
दंगाइयों को रोकने में नाकाम रहे।
दोपहर 1.30 बजे, एसडीपीओ (बारासात) महमूद अख्तर ने धारा-144 की घोषणा की। जिला पुलिस, रैपिड एक्शन फोर्स और बीएसएफ भी हालात नियंत्रित करने में असफल रहे तो राज्य सरकार ने सेना को बुलाया।
शाम तक किसी तरह सेना की दो बटालियन देगंगा इलाके में प्रवेश कर पाईं। अब तक दंगों और यातनाओं को झेल रहे तड़पते हुए ग्रामीण हिन्दू इस आशा में अपने घरों से बाहर निकले कि अब उन्हें किसी सुरक्षित जगह ले जाया जा सकेगा।
कट्टरपंथियों ने हिन्दू मंदिरों को कर दिया था बुरी तरह से तबाह
दंगाइयों की सशस्त्र भीड़ ने हिंदू मंदिरों में बुरी तरह से तोड़फोड़ की। देगंगा की ही कॉलोनी में स्थित काली मंदिर को भीड़ ने खंडित कर दिया था। ये दंगाई वहाँ बेलियाघाटा, साशन और बशीरहाट से ट्रकों में पहुँचे थे। काली मंदिर को तृणमूल कॉन्ग्रेस के सांसद हाजी नुरुल इस्लाम के नेतृत्व में तोड़ दिया गया।
जब वहाँ मौजूद हिंदुओं ने इसका विरोध किया तो उन्हें उपद्रवियों की भीड़ ने उनका पीछा तलवारों और खंजर से किया और उन पर बम फेंके गए। उन्होंने काकड़ा मिर्जा नगर काली मंदिर को भी जला दिया। कार्तिकपुर के शनि मंदिर को भी इस भीड़ द्वारा खंडित कर दिया गया था। इस पर देगंगा बाजार के पास मस्जिद का लाउडस्पीकर फहराता था, जबकि यह यह धार्मिक स्थलों पर लाउडस्पीकर के प्रयोग पर उच्च न्यायालय के आदेश के भी खिलाफ था।
दंगों में जलाए गए घर, मंदिर, और नदी में डुबोई गई पुलिस के वैन की तस्वीरें –
बुधवार की सुबह, 8 सितंबर को रामनाथपुर और खेजुरंगा में एक सशस्त्र भीड़ ने सलिमपुकुर और अस्पताल में हिंदुओं को निशाना बनाया और उन पर हमला किया। सलिमपुकुर में 23 घरों में तोड़फोड़ की गई, पीड़ितों ने पास के कार्तिकपुर इलाके में शरण ली। देगंगा थाने के प्रभारी अधिकारी अरूप घोष ने दंगाइयों के खिलाफ एक पुलिस दल का नेतृत्व किया, जिन पर दंगाइयों ने जमकर पथराव किया और उन पर ईंट-पत्थर बरसाए। पुलिसकर्मियों के सिर पर इस पथराव में गंभीर चोट आई और वो घायल हो गए।
दंगों के बाद
भारी दंगों के बाद सेना की मौजूदगी के बावजूद आखिरकार बृहस्पतिवार को हिंसा की छिटपुट घटनाएँ होती रहीं। शुक्रवार के दिन तक किसी तरह स्थिति शांत हुई, हालाँकि पूरे क्षेत्र में तनाव और भय पसरा था।
हिन्दू, विशेषकर वो महिलाओं जो मजहबी दंगाइयों के उत्पीड़न के बाद अपने घरों से भाग गईं, अभी तक भी अपने घरों को नहीं लौटीं थीं। हिन्दुओं के घरों को निशाना बनाकर उन्हें तहस-नहस कर दिया गया था और संपत्तियों को लूटा गया था। मजहबी भीड़ ने हिन्दुओं के घरों को आग लगा दी थी और मंदिरों को खंडित कर दिया था। भयभीत लोग तीन-चार दिन बाद अपने घरों को वापस लौट आए।
पोस्टर में लिखा है – “हिन्दुओं से नफरत करने वालों के नेतृत्व में हिन्दुओं पर हमला क्यों किया गया था? मिर्ज़, मक़ुलाकर, सोहराब और तालेब (स्थानीय गुंडे और घटिया नेता)? हम सरकार से जवाब माँगते हैं। हस्ताक्षर – ग्रामीण।”
करीब साठ पीड़ित हिन्दुओं ने पुलिस स्टेशन में दंगाइयों के खिलाफ FIR दर्ज कराई थीं। जाँच दल ने अपनी इन्वेस्टिगेशन में पाया था कि 6 सितम्बर को शफ़िक, अलाउद्दीन, अरब, फ़रीद, फ़ज़लू, अफ़ज़ल, मोहम्मद याकूब और हसिया और डोगाचिया गाँव के 100 से अधिक लोग घरों में बनी कुल्हाड़ी, लोहे की रॉड और हथियारों से लैस थे, जिन्होंने लोगों पर हमला किया और हिंदू व्यापारियों की दुकानों को लूटना और उन्हें आग के हवाले करना शुरू कर दिया था।
दस साल बाद हुए दिल्ली के हिन्दू-विरोधी दंगों की झलक
बंगाल के देगंगा में हुए यह दंगे 2010 की घटना है, जबकि इसके ठीक दस साल बाद दिल्ली में जो हिन्दू-विरोधी दंगे हुए, उनमें भी यही तरीके देखे गए। जो यह बताता है कि एक सम्प्रदाय विशेष अपनी निशानदेही और दंगों के तरीकों में कितनी स्पष्ट रणनीति को अपनाता है।
देगंगा में भी पुलिस पर हमला किया गया था, पथराव किया गया था, निशाना बनाया गया, हिन्दुओं के परिवारों और उनकी दुकानों को निशाना बनाया गया था। कितनी दिलचस्प बात है कि ठीक यही शैली 2020 की शुरुआत में पूर्वोत्तर दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों में भी अपनाई गई थी।
यह सभी बातें, सभी घटनाएँ और तरीके सब एक ही निष्कर्ष तक पहुँचाती हैं। ‘अच्छा मजहबी और बुरा मजहबी’ जैसे वाक्यांशों को सिर्फ मिथक और कपोल कल्पना साबित करने पर मजबूर करती हैं। एक मजहब द्वारा हिन्दुओं को उन्हीं के देश में प्रताड़ित करने के ऐसे ही कई और किस्से हैं, जिन्हें मीडिया की कारस्तानी और राजनीतिक षड्यंत्रों ने कभी सामने आने ही नहीं दिया और जिन पर बात तक नहीं की गई है।
भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने बताया कि उन्हें आम आदमी पार्टी के एक दलित कार्यकर्ता ने फोन कर के बताया है कि शनिवार (अगस्त 8, 2020) की रात AAP दलित मोर्चा के लोगों ने संजय सिंह की पिटाई कर के उनका मुँह काला किया। दिल्ली के पूर्व मंत्री कपिल मिश्रा ने पूछा कि क्या ये सही है? बकौल कपिल मिश्रा, उन्हें सूचना मिली कि दलित गुस्से में पूछे रहे थे कि दिल्ली में दलित उप-मुख्यमंत्री क्यों नहीं है?
कपिल मिश्रा ने ट्विटर पर बताया कि संजय सिंह की पिटाई कर के उनका मुँह काला करने वाले उनकी ही पार्टी के दलित कार्यकर्ता ये पूछ रहे थे कि पार्टी PAC में कोई दलित क्यों नहीं है? साथ ही वो ये भी पूछ रहे थे कि आम आदमी पार्टी ने राज्यसभा में किसी दलित को क्यों नहीं भेजा? बता दें कि कपिल मिश्रा भी AAP से ही भाजपा में आए हैं। उन्होंने दिल्ली दंगों को लेकर भी कई खुलासे किए थे।
हाल ही में आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने सोशल मीडिया पर झूठ फैलाया था। उन्होंने भाजपा को दलित विरोधी पार्टी ठहराने के लिए ट्विटर पर झूठ फैलाया। इसके बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ‘संजय सिंह झूठा है’ ट्रेंड करने लगा। AAP नेता ने दावा किया था कि उत्तर प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या को अयोध्या स्थित राम जन्मभूमि कार्यक्रम में बुधवार (अगस्त 5, 2020) को नहीं बुलाया गया, क्योंकि वो दलित हैं।
AAP के दलित कार्यकर्ता ने फोन करके बताया
कल रात AAP के SC मोर्चा के लोगों ने संजय सिंह जी की पिटाई की और मुंह काला किया
मौर्या ने उसी दिन ट्विटर पर फोटो डाल कर बताया था कि वो श्री राम जन्मभूमि परिसर में आयोजित भूमि पूजन कार्यक्रम के साक्षी बन रहे हैं। उन्होंने ट्वीट किया था, “श्री राम जन्मभूमि परिसर में आयोजित भूमि पूजन कार्यक्रम के भव्य पंडाल में ऐतिहासिक दिन का साक्षी बन रहा हूॅं। परम सौभाग्य एवं अद्भुत और अलौकिक आनंद की अनुभूति कर रहा हूॅं।”
मौर्या ने 5 अगस्त को ही यह ट्वीट किया था। बावजूद 7 अगस्त को संजय सिंह ने ट्विटर पर लिखा कि उन्हें एक दलित नेता ने बताया है कि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को राम मंदिर भूमिपूजन कार्यक्रम में इसीलिए नहीं बुलाया गया क्योंकि वो दलित हैं और केशव प्रसाद मौर्या को भी इसीलिए नहीं बुलाया गया। उन्होंने पूछा कि भाजपा ऐसा क्यों करती है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा दलितों को मंदिर के बाहर रखना चाहती है।
सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में शेखर गुप्ता की वेबसाइट ‘द प्रिंट’ ने एक लेख प्रकाशित किया। इस लेख का शीर्षक और इसकी तमाम बातें ऐसी हैं जिनका न तो कोई आधार है और न अर्थ। लेख की शैली से स्पष्ट था कि इसका उद्देश्य एक क्षेत्र और समूह के लोगों को निशाना बनाना है। सुशांत सिंह के बहनोई विशाल कीर्ति ने इसका जवाब दिया है।
विशाल ने लिखा है कि वह इस लेख का जवाब नहीं देना चाहते थे। लेकिन जब उन्हें लगा कि इसका प्रभाव उनके नज़दीकी लोगों पर पड़ रहा है तो उन्होंने जवाब देने का फैसला किया।
प्रिंट के लेख में कहा गया था कि जिस तरह सुशांत सिंह के परिवार ने प्रतिक्रिया दी है उससे यह स्पष्ट है कि बिहारी परिवार में बेटा होना किसी बोझ से कम नहीं है। लेख में यह भी आरोप लगाया गया है कि बिहारी परिवार के लोगों का रवैया अपने बेटों के लिए बुरा होता है।
विशाल कीर्ति ने लिखा है कि इस मसले पर वे पूर्व में बरखा दत्त को जवाब दे चुके हैं। सुशांत सिंह की मौत मनोवैज्ञानिक मुद्दों पर बात करने का माध्यम नहीं हैं। सुसैन जो सुशांत के बाईपोलर होने का दावा कर रही थीं, उसका आधार क्या था? जानकार मनोविज्ञान से जुड़े ऐसे दावे करने में सालों खर्च करते हैं और सुसैन तो सुशांत से कुछ महीने पहले मिली थीं। अगर अदालत में यह साबित हो जाता है कि सुशांत अवसाद से जूझ रहे थे तो मैं सम्मान के साथ इसे सबसे पहले स्वीकार करूॅंगा।
विशाल ने लिखा है कि वे खुद एक बिहारी परिवार से हैं। उनके परिवार की भावना उनकी पत्नी को लेकर बिलकुल वैसी नहीं है जिस तरह के दावे फिलहाल किए जा रहे हैं। उन्होंने लिखा है कि बिहार में ऐसे लाखों शिक्षित और मध्यम वर्गीय परिवार हैं, जिनका रवैया अपने बेटे और उनकी पत्नी या गर्लफ़्रेंड के लिए बेहद सरल और सहज है। लेकिन कुछ परिवारों को देख कर इतना बड़ा दावा कर देना टॉक्सिक जर्नलिज्म (विषाक्त पत्रकारिता) से कम नहीं है। बिहार के परिवारों को लेकर इस तरह के पूर्वाग्रह और रुढ़िवादी मानसिकता खुद में घिनौना है। ’
विशाल ने कहा है कि एफ़आईआर को महिला विरोधी पहलू देकर मुद्दे की दिशा बदली नहीं जा सकती है। मैं न तो किसी पर आपराधिक आरोप लगा रहा हूँ और न ही सुशांत के पिता की तरफ से बात कर रहा हूँ।
उन्होंने कहा है, “मैंने पिछले कुछ समय में सुशांत की मृत्यु पर हुई पत्रकारिता और विमर्श को बहुत करीब से देखा है। मेरे और सुशांत के रिश्ते बहुत अच्छे थे। हम जब भी मिलते किताबों और फिल्मों पर बात करते थे। मैं उसे और उसकी बहन को 1997 से जानता हूँ। हम एक ही स्कूल में पढ़ते थे। सुशांत उन दिनों बहुत प्यारा और शर्मीला था। उसे ज़्यादातर लोग उसकी बहन की वजह से पहचानते थे। लोग हमें ‘जीजा-साला’ कह कर चिढ़ाते थे। मैं 2006 में अमेरिका चला गया था लेकिन सुशांत का स्वभाव ऐसा था कि 2019 तक उसके संपर्क में था।”
विशाल ने लिखा है कि रिया द्वारा सुशांत को दवाओं का ओवरडोज़ देने की खबरें आ रही है। इससे पता चलता है कि उसका नुकसान ऐसे इंसान ने किया जिससे उसे बहुत ज्यादा लगाव था। जब तक यह बात साबित नहीं होती कि सुशांत ने मानसिक बीमारी के प्रभाव में आत्महत्या की है, तब तक मनोविज्ञान से जुड़े मुद्दे पर जागरूकता फैलाना किसी मूर्खता से कम नहीं है।
उत्तर प्रदेश STF की टीम ने हनुमान पांडेय उर्फ राकेश पांडेय को मार गिराया है। उस पर एक लाख रुपए का ईनाम था। वह बीजेपी के विधायक रहे कृष्णानंद राय की हत्या का आरोपित था।
लखनऊ के सरोजनी नगर में उसकी पुलिस के साथ मुठभेड़ हुई, जिसमें वो मारा गया। कोपागंज के रहने वाले हनुमान पांडेय पर कई संगीन आपराधिक मामले दर्ज थे।
हनुमान उत्तर प्रदेश के बाहुबली नेता मुख्तार अंसारी और अपराधी मुन्ना बजरंगी का करीबी था। जहाँ मुख्तार अंसारी फिलहाल जेल में है, वहीं मुन्ना बजरंगी की हत्या हो चुकी है। उसकी हत्या के बाद हनुमान पांडेय ही अंसारी गैंग का मुख्य शूटर बन गया था। उसने अंसारी के गैंग D-5 में प्रमुख भूमिका प्राप्त कर ली थी। मऊ में ठेकेदार प्रकाश सिंह सहित दो लोगों की हत्या कर दी गई थी, उस मामले में भी ये आरोपित था।
नवंबर 29, 2005 को करीमुद्दीन इलाके में स्थित सोनाड़ी गाँव में एक स्टीकेट मैच का उद्घाटन करने पहुँचे भाजपा विधायक कृष्णनंदन राय की गोलियों से भून कर हत्या कर दी गई थी। उस दिन जोरों की बारिश हो रही थी, इसीलिए वो बुलेटप्रूफ गाड़ी छोड़ कर सहयोगियों सहित सामान्य गाड़ी से ही वहाँ चले गए थे। शाम 4 बजे जब वो अपने गाँव गोडउर लौट रहे थे, तभी बसनिया चट्टी के पास उनकी गाड़ी घेर ली गई।
कृष्णानंद राय हत्याकांड में एक लाख का इनामी बदमाश हनुमान पांडेय उर्फ राकेश STF के साथ मुठभेड़ में ढेर। मुख्तार अंसारी का बेहद करीबी था हनुमान पांडेय । pic.twitter.com/MRQVbCl1Tw
इसके बाद एके-47 से फायरिंग कर के विधायक सहित 7 लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया था। हनुमान पांडेय राजधानी लखनऊ सहित रायबरेली, गाजीपुर और मऊ में 10 मुकदमे गंभीर धाराओं में पंजीकृत हैं। बनारस और लखनऊ की STF को इनपुट मिला था कि वह इनोवा कार से जा रहा है। इसके बाद लखनऊ-कानपुर हाइवे पर उसे रोकने का प्रयास किया गया, लेकिन उसने पुलिस पर फायरिंग शुरू कर दी।
जब कृष्णानंद राय व उनके सहयोगियों की हत्या हुई, उस समय कोई ऐसा भी था जो बच गया था। उस व्यक्ति का नाम था- शशिकांत राय। वह एक तरह से इस घटना के मुख्य चश्मदीद गवाह थे। थे इसलिए, क्योंकि अब वो नहीं रहे। सैंकड़ों राउंड गोलियों के बीच ज़िंदा बच जाने वाला शख्स शराब पीने के बाद संदिग्ध स्थिति में सड़क पर बेहोश पड़ा पाया गया, जिसके बाद उसकी मौत हो गई।
एक और गवाह था, उनका नाम था- मनोज गौड़। यह भी था, क्योंकि अब ये भी नहीं रहे। सितंबर 2006 को मनोज गौड़ की भी संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। इन दोनों घटनाओं के बीच मात्र डेढ़ महीने का अंतर था। उन्हें अस्पताल ले जाया गया था, जहाँ उन्हें डॉक्टरों ने ‘ब्रांको न्यूमोनिया’ की वजह से मृत करार दिया। जब वो अस्पताल में भर्ती थे, तब प्रशासन द्वारा किसी भी प्रकार की सुरक्षा मुहैया नहीं कराई गई थी।