Home Blog Page 462

SC/ST का केस दर्ज करने में सतर्कता बरतें, झूठे मामले रद्द करने में संकोच ना करें: केरल हाई कोर्ट का निर्देश, जानिए क्यों कहा ‘दबाव’ बनाने को गढ़े जाते हैं मामले

केरल हाई कोर्ट ने SC/ST एक्ट को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। हाई कोर्ट ने कहा कि पुलिस में की गई शिकायतों से अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते या जब पक्षकारों के बीच मुकदमे असफल हो जाते हैं या मुकदमे लंबित होते हैं तो एससी/एसटी अधिनियम के तहत आरोप लगाना इस बात का मजबूत संकेत देता है कि ऐसे आरोप झूठे हो सकते हैं। ऐसे मामलों को बिना हिचकिचाहट के रद्द कर देना चाहिए।

मामले की सुनवाई करते हुए केरल हाई कोर्ट के न्यायाधीश ए. बदरुद्दीन ने आगाह किया कि एससी/एसटी एक्ट के दुरुपयोग को रोकने के लिए झूठे आरोपों की जाँच में एजेंसियों और अदालतों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। हालाँकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि इस अधिनियम को लागू करने के पीछे SC/ST को शोषण से बचाना है और वास्तविक मामलों में आरोपित के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने कहा कि SC/ST एक्ट में अपराध दर्ज करते समय जाँच अधिकारियों को गंभीर अपराधों में निर्दोष पीड़ितों को झूठा फँसाने से बचने के लिए अपना दिमाग लगाना चाहिए, ताकि निर्दोष व्यक्ति को झूठे मामले में फँसाने से बचाया जा सके। इसके बाद कोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज मामले में सारी प्रोसीडिंग को रद्द कर दिया।

दरअसल, गैर-SC/ST समुदाय से ताल्लुक रखने वाले याचिकाकर्ता पर आरोप है कि उसने अनुसूचित जाति से ताल्लुक रखने वाले शिकायतकर्ता को सार्वजनिक रूप से उसकी जाति का नाम लेकर अपमानित किया और धमकाया। याचिकाकर्ता के साथ आई एक अन्य महिला को भी दूसरे आरोपित के रूप में शामिल किया गया है। इस मामले में दोनों के खिलाफ सा 2015 में SC/ST एक्ट में मुकदमा दर्ज हो गया।

मामले की जाँच के बाद पुलिस ने अपनी फाइनल रिपोर्ट में कहा कि आरोप झूठे हैं। इसलिए मामले को बंद किया जाए। इसके बाद शिकायतकर्ता ने डीजीपी को शिकायत दी और आगे जाँच का आदेश दिया गया। आगे की जाँच के बाद याचिकाकर्ता को एकमात्र आरोपित बनाते हुए अंतिम रिपोर्ट दाखिल की गई। इससे दुखी होकर याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता की अनुपस्थिति में उचित जाँच के बिना फाइनल रिपोर्ट पेश की गई है। इसमें कोई नया गवाह और सबूत भी पेश नहीं किया गया है। वकील ने कहा कि याचिकाकर्ता और महिला के खिलाफ दायर केस पूरी तरह झूठ पर आधारित है। कोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता ने याचिकाकर्ता पर इसलिए SC/ST एक्ट का मुकदमा दर्ज कराया, क्योंकि वह याचिकर्ता को दिए गए 6 लाख रुपए को वापस पाने में नाकाम थी।

कोर्ट ने कहा, “इस समय एससी/एसटी अधिनियम के प्रावधानों का दुरुपयोग वादियों द्वारा बुरे या दुष्ट विचार रखने या द्वेषपूर्ण होने के कारण हो रहा है। एससी/एसटी अधिनियम में गरीब व्यक्ति को झूठे तरीके से फँसाना, उन्हें गिरफ़्तार कराने, हिरासत में लेने और कड़ी सज़ा देने की धमकी देकर दबाव डालना या शिकायतकर्ता की अवैध और अतार्किक माँगों पर ध्यान देने के लिए मजबूर करना दुखद है।”

इस प्रकार कोर्ट ने चेतावनी दी कि एससी/एसटी अधिनियम के प्रावधानों के दुरुपयोग पर ध्यान दिया जाना चाहिए। न्यायालय ने यह भी कहा कि जाँच अधिकारियों को एससी/एसटी अधिनियम के तहत मामले दर्ज करने से पहले अपने विवेक का प्रयोग करना चाहिए, ताकि निर्दोष व्यक्तियों को झूठे मामलों में फँसाने से बचाया जा सके। इसके बाद कोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज मामले एवं कार्रवाई को रद्द कर दिया।

कवि ‘ईशनिंदा’ में गिरफ्तार, फुटबॉल मैदान से लेकर पुस्तक मेला तक मदरसा छापों का उत्पात… शेख हसीना के जाते ही बांग्लादेश में ‘कठमुल्लों’ का राज, हिंदुओं का दमन भी जारी

बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना के तख्तापलट के बाद इस्लामी कट्टरपंथ जोरों पर है। मोहम्मद यूनुस की सरकार में कठमुल्लों को देश भर खुली छूट मिल गई है। बांग्लादेश में अब महिलाओं का निकलना दूभर हो रहा है, उन्हें खेलों में आने से रोका जा रहा है। उनके खेलों पर हमले हो रहे हैं।

ईशनिंदा क़ानून को कोर्ट के सहारे और धार दी जा रही है। इसके तहत साहित्य लिखने वालों को उठाया जा रहा है। बांग्लादेश में कट्टरपंथ का प्रभाव सिर्फ सड़कों पर ही नहीं बल्कि सत्ता में बैठने वालों पर भी है। देश के संविधान को भी बदला जाने वाला है।

कट्टरपंथ का पहला शिकार महिलाएँ

बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथ का सबसे पहला शिकार महिलाएँ बनी हैं। हाल ही में बांग्लादेश में दिनाजपुर और और जॉयपुरहाट में महिलाओं के फुटबॉल मैच पर कट्टरपंथियों ने हमला कर दिया। इस हमले में मदरसे के छात्र शामिल थे।

इनके हमले के चलते फुटबॉल खेलने वाली लडकियाँ भाग कर दूसरी जगह शरण लेने को मजबूर हो गईं। इन हमलावरों ने स्टेडियम में तोड़फोड़ भी की थी। मदरसे के छात्रों और बाकी मुस्लिमों का कहना था कि फुटबॉल समेत बाकी खेलों से महिलाएँ बेपर्दा होती हैं। ऐसे में उन्हें खेलने से रोका जाना चाहिए।

बेपर्दा वाली दलील कुछ-कुछ तालिबान जैसी है, तालिबान ने भी अफगानिस्तान में महिलाओं के खेलने-पढ़ने समेत बाहर निकलने पर भी प्रतिबन्ध लगा रखा है। आशंका है कि बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथी तालिबान का अनुसरण करेंगे।

साहित्य पर भी बंदिशें

बांग्लादेश में यह बढ़ता कट्टरपंथ सिर्फ खेलों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह साहित्य तक भी जा पहुँचा है। 13 फरवरी, 2025 को बांग्लादेश में एक कवि सोहेल हसन ग़ालिब को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। ग़ालिब ने इस्लामी कट्टरपंथी संगठन ‘तौहीदी जनता’ के विरुद्ध एक कविता लिखी थी।

सोहेल हसन ग़ालिब पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने इस्लाम की ईशनिंदा की है। उनसे पुलिस ने घटों तक पूछताछ की और फिर कोर्ट ने भी उन्हें जमानत देने से इनकार कर दिया। कट्टरपंथ का ही शिकार ढाका में आयोजित होने वाला एक पुस्तक मेला हुआ जहाँ मदरसे के छात्रों ने एक किताब स्टाल पर हमला बोल दिया और तोड़फोड़ कर दी।

इसी पुस्तक मेले में महिलाओं के सेनेटरी पैड बेच रहे एक स्टाल को बंद करवा दिया गया। यहाँ तक कि प्रेम का त्यौहार भी वैलेंटाइन डे इस्लामी कट्टरपंथियों की वक्रदृष्टि से नहीं बचा। अपनी आलोचना से क्रुद्ध होकर कवि को गिरफ्तार करवाने वाली तौहीदी जनता के लोगों ने वैलेंटाइन डे पर फूल, गिफ्ट समेत तमाम ऐसी ही दुकानों पर हमला किया।

यह कुछ-कुछ 2008 में इस्लामाबाद के लाल मस्जिद कांड जैसा है। इस्लामाबाद की लाल मस्जिद से निकल कर कट्टरपंथी बुरका न पहनने वाली महिलाओं और दाढ़ी ना रखने वाले पुरुषों पर हमला बोलते थे। इसमें महिलाएँ तक शामिल थीं। लगता है, बांग्लादेश ही इसी राह पर चल पड़ा है।

अल्पसंख्यकों का बुरा हाल

बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथ का सबसे बड़ा शिकार अल्पसंख्यक हिन्दू और बाकी समुदाय हैं। हिन्दू सबसे ज्यादा निशाने पर हैं। कई परिवार बांग्लादेश छोड़ कर भारत आ चुके हैं। बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार के पतन के तीन दिन के भीतर ही 200 से अधिक हमले हिन्दू मंदिरों और दुकानों पर हमला हो गया था।

भारतीय विदेश मंत्रालय ने 7 फरवरी, 2025 को संसद में एक जवाब में बताया था कि अगस्त, 2024 के बाद से बांग्लादेश में 1200 से अधिक घटनाएँ अल्पसंख्यकों पर हमले की सामने आ चुकी हैं। इनमें 150 से अधिक मंदिरों पर हमले की घटनाएँ शामिल हैं।

बांग्लादेश में कई शहरों में हिन्दू बस्तियों में आग लगाने तक की घटनाएँ सामने आ चुकी हैं। मामला सिर्फ हिन्दुओं पर हमले तक सीमित नहीं है। बांग्लादेश में जबरदस्ती हिन्दू शिक्षकों और सरकारी कर्मचारियों को उनके पदों से इस्तीफ़ा देने को इस्लामी कट्टरपंथी मजबूर कर रहे हैं।

कई जगह रेस्टोरेंट और ढाबों पर दबाव बनाया जा रहा है कि वह गोमांस बेचें। आवामी लीग की सरकार में सांसद और मंत्री रहे हिन्दू नेता भी इस प्रताड़ना के दायरे में हैं। बांग्लादेश की यूनुस सरकार इन सब पर चुप है। वह ऐसे तत्वों पर कार्रवाई करने से लगातार बचती रही है।

संविधान बदलने की तैयारी

बांग्लादेश में इस इस्लामी कट्टरपंथ को कानूनी अमलीजामा पहनाने की तैयारी है। बांग्लादेश के अटॉर्नी जनरल असदुज्ज्माँ ने बीते कुछ महीनों पहले एक सुनवाई में कोर्ट के सामने कहा था कि संविधान से सेक्युलर शब्द हटाया जाना चाहिए।

असदुज्ज्माँ ने कहा, “हम चाहते हैं कि संविधान से ‘सेक्युलर’ और ‘समाजवादी’ शब्द हटा दिए जाएँ… ‘समाजवाद’ नहीं, बल्कि ‘लोकतंत्र’ राज्य की नीति का मूल सिद्धांत हो सकता है।” बांग्लादेश में सेक्युलर शब्द शेख हसीना ने संविधान में 2011 में जोड़ा था।

शेख हसीना की सत्ता हटाने में भी इस्लामी कट्टरपंथियों का बड़ा हाथ था, ऐसे में वह यूनुस के दौर में खुली छूट पा चुके हैं। बांग्लादेश में दशकों से जिस कट्टरपंथ का विरोध हो रहा था, अब वह मदरसों से बाहर आ चुका है और उसका असर सड़कों पर भी दिखने लगा है। हो सकता है आने वाले सालों में बांग्लादेश की पहचान भी बदल जाए।

जान-बूझकर गढ़ा नैरेटिव, लोगों को भड़काया, यति नरसिंहानंद के खिलाफ फैलाई नफरत: मोहम्मद जुबैर की पूरी कारस्तानी हाई कोर्ट को UP सरकार ने बताई

उत्तर प्रदेश सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में यति नरसिंहानंद के खिलाफ ऑल्ट न्यूज़ के सह-संस्थापक मोहम्मद जुबैर की याचिका का विरोध किया है। राज्य सरकार ने कहा कि यूपी पुलिस ने नरसिंहानंद के खिलाफ़ कार्रवाई की थी और अदालतों ने ही उन्हें ज़मानत दी है। जुबैर ने नरसिंहानंद के कथित ‘अपमानजनक’ बयान पर उसके ‘X’ पोस्ट को लेकर यूपी पुलिस की FIR के खिलाफ़ याचिका दायर की है।

उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) मनीष गोयल ने कहा कि जुबैर ने अपने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पोस्ट के माध्यम से एक नैरेटिव बनाया और जनता को भड़काने का प्रयास किया। उन्होंने जुबैर के ‘एक्स’ पोस्ट के समय पर भी सवाल उठाया और कहा कि कथित फैक्ट चैकर जुबैर ने आग में घी डालने का काम किया है।

AAG गोयल ने न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और न्यायमूर्ति योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव की पीठ के समक्ष कहा, “उनका (जुबैर का) कहना है कि कोई गिरफ्तारी नहीं हुई और यति नरसिंहानंद के खिलाफ कमजोर धाराएँ लगाई गईं, लेकिन ऐसा नहीं है… यह कहना कि पुलिस अपना काम नहीं कर रही है गलत है… पुलिस अपना काम कर रही थी और अदालत ने उन्हें (यति को) जमानत दी है।”

गोयल ने आगे कहा कि भले ही मोहम्मद जुबैर ने ‘ग्लोबल भारत’ की एक खबर पर भरोसा करने का दावा किया हो, लेकिन उसके ट्वीट और लेख में काफी अंतर है। उन्होंने कहा, “भाषण में दूसरी बातें भी हैं। इसमें अवैध अप्रवासियों और अन्य मुद्दों पर भी बात की गई है, लेकिन याचिकाकर्ता (जुबैर) ने 4-5 लाइनें उठाकर वीडियो दिखाया है।” उन्होंने कहा कि नैरेटिव बनाने का इरादा जानबूझकर किया गया है।

गोयल ने कहा, “जुबैर के पोस्ट को 29,000 बार रीपोस्ट किया गया है। जुबैर ने एक पोस्ट को रीपोस्ट किया। ऐसा करके वे आग में घी डालने का काम कर रहे हैं। वह खुलेआम घूम रहे हैं और यति नरसिंहानंद के बारे में नफ़रत फैला रहे हैं।” उन्होंने कहा कि यह सब कुछ एक थ्रेड में पोस्ट किया गया और किरेन रिजिजू को टैग किया गया। यह कानून को अपने हाथ में लेने, नैरेटिव बनाने और लोगों को भड़काने जैसा है।

उन्होंने पूछा, “कमज़ोर धाराएँ लगाना सिर्फ़ याचिकाकर्ता द्वारा बनाई गई धारणा है, जिसे एक नैरेटिव में तब्दील किया जा रहा है। वह कहता है कि जब उन्होंने (यति नरसिंहानंद) भाषण दिया था, तब वह ज़मानत पर थे। आपने अपनी पोस्ट में इसका ज़िक्र नहीं किया।” उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जुबैर के पास ऑल्ट न्यूज़ से ज़्यादा एक्स फ़ॉलोअर्स हैं और उनके चैनल से ज़्यादा उनके अकाउंट का प्रभाव है।

AAG ने कहा, “लोग आपको फ़ॉलो करते हैं और उन्हें लगता है कि आप जो कह रहे हैं वो सच है। अगर वो झूठ भी है तो भी वो उसे सच ही मानते हैं। ये अभिव्यक्ति की आज़ादी का विचार नहीं है। इसे अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए आवाज़ उठाने वाले व्यक्ति की स्वायत्तता में कमी का सिद्धांत कहा जाता है क्योंकि उसके पास आपकी आवाज़ जैसी आवाज़ नहीं है।”

बता दें कि गाजियाबाद पुलिस ने अक्टूबर 2024 में मोहम्मद जुबैर के खिलाफ मामला दर्ज किया था। इसमें आरोप लगाया गया था कि यति नरसिंहानंद के एक सहयोगी द्वारा शिकायत दर्ज किए जाने के बाद उन्होंने धार्मिक समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा दिया। जुबैर ने एफआईआर के खिलाफ हाई कोर्ट में चुनौती दी।

बोतल में थूक कर दिया पानी, बेल्ट-बाँस से पीट कदमों में झुकाया: रैगिंग की शिकायत पर केरल के कॉलेज में SFI के गुंडों ने मचाया आतंक, दफ्तर में ले जाकर जूनियर को किया टॉर्चर

केरल में छात्रों को प्रताड़ना दिए जाने और उनकी रैगिंग के मामले रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं। एक कॉलेज में वामपंथी छात्र संगठन SFI के 7 गुंडों को सस्पेंड किया गया है। इन्होंने एक जूनियर छात्र को प्रताड़ित किया था। उसे मारा-पीटा था। इस मामले में FIR भी दर्ज की गई है। यह केरल में रैगिंग का एक सप्ताह के भीतर दूसरा भयावह मामला है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, केरल के करियावत्तोम में एक सरकारी कॉलेज के 7 छात्रों को प्रबन्धन ने निलंबित कर दिया। यह सीनियर छात्र थे और अपने पाठ्यक्रम के तीसरे वर्ष में थे। अब इनके खिलाफ पुलिस ने मारपीट, दंगा, बंधक बनाने समेत कई धाराओं में मामला दर्ज कर लिया है।

इन सभी के खिलाफ एक जूनियर छात्र ने शिकायत दर्ज करवाई थी। उसने बताया था कि 11 फरवरी, 2025 को उसके साथ के छात्रों के साथ इन आरोपितों का विवाद हुआ था। तब भी इन सीनियर छात्रों ने जूनियर छात्रों की पिटाई की थी। इसके बाद एक जूनियर छात्र ने इन आरोपितों की शिकायत कर दी थी।

इससे गुस्साए SFI के गुंडे छात्रों ने हॉस्टल में शिकायत करने वाले छात्र को ढूंढा और प्रताड़ित करने की योजना बनाई। हालाँकि, उसके वहाँ नहीं मिलने पर वह एक छात्र को उठा ले गए। उसे यह सभी SFI के दफ्तर पर ले आए और प्रताड़ना देना चालू किया।

इस छात्र को SFI वालों ने पीटना चालू किया और उसको अपने क़दमों में घंटे भर अपने सामने झुकने को कहा। उसने जब पीने के लिए पानी माँगा तो बोतल में थूक कर दिया गया। पीड़ित छात्र ने जब यह पानी पीने से मना किया तो उसे बेल्ट और बंद से मारा पीटा गया।

SFI के गुंडों ने उसे धमकाया। इसके बाद इस मामले में हुई शिकायत पर कॉलेज के प्रशासन ने जाँच की आरोप सही पाए। कॉलेज ने एक्शन लेते हुए आरोपितों को निलंबित कर दिया गया है। उनके खिलाफ अब पुलिस जाँच कर रही है। पीड़ित ने भी अपना बयान पुलिस के पास दर्ज करवा दिया है।

यह एक सप्ताह के भीतर केरल में रैगिंग और छात्र प्रताड़ना का दूसरा मामला है। इससे पहले केरल के कोट्टायम में जूनियर छात्रों को नंगा कर पीटा गया था, उनके निजी अंगों पर डम्बल रख दिए गए थे। उनको परकार से घायल भी किया गया था। इसके बाद उनके घावों पर एक लोशन डाला गया ताकि इनमें जलन मचे।

सीनियर छात्रों ने पीड़ितों से ₹800 शराब पीने के लिए भी वसूल लिए। उनको जबरदस्ती शराब भी पिलाई गई और इसके फोटो वीडियो भी बनाए गए। उनको लगातार डराया धमकाया गया। यह प्रताड़ना तीन महीने तक चलती रहीं। एक दिन एक छात्र की पैसे ना देने पर पिटाई की गई। इस मामले में 5 छात्र गिरफ्तार हुए थे।

केरल में रैगिंग के यह कोई नए मामले नहीं हैं। 2024 में एक छात्र सिद्धार्थन ने रैगिंग से परेशान होकर आत्महत्या कर ली थी। कई बार मामलों में SFI के गुंडे ही शामिल पाए गए थे। कई ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जिनमें पीड़ितों ने राजनीतिक संरक्षण के भी आरोप लगाए हैं।

UCC में उत्तराखंड सरकार ने किया लिव-इन के रजिस्ट्रेशन का प्रावधान, विरोध में युवक पहुँच गया हाई कोर्ट: जज ने पूछा- बिना शादी बेशर्मी से साथ रह रहे हैं, फिर छुपा हुआ क्या है?

उत्तराखंड सरकार द्वारा लागू की गई समान नागरिक संहिता (UCC) में लिव-इन रिलेशन के प्रावधानों को कोर्ट में चुनौती दी गई है। याचिका में कहा गया है कि इन प्रावधानों से उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता का उल्लंघन होता है। इस पर सुनवाई करते हुए उत्तराखंड हाई कोर्ट ने कहा, “आप बिना शादी के ही बेशर्मी से साथ रह रहे हैं। इसमें गोपनीयता क्या है? आपकी किस निजता पर आक्रमण हो रहा है?”

मौखिक रूप से टिप्पणी करते हुए उत्तराखंड के हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जी नरेन्द्र ने कहा कि लिव-इन के लिए पंजीकरण के प्रावधान से निजता का हनन नहीं होता। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार लिव-इन रिलेशनशिप पर प्रतिबंध नहीं लगा रही, बल्कि केवल उन्हें पंजीकृत करने का प्रावधान कर रही है। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश जी नरेंद्र और न्यायाधीश आलोक माहरा की पीठ ने की।

दरअसल, 23 साल के याचिकाकर्ता जय त्रिपाठी ने तर्क दिया कि लिव-इन रिलेशनशिप के पंजीकरण के बाद उसकी जाँच की जाएगी इसको लेकर गपशप संस्थागत हो जाएगी। इस पर इस पर पीठ ने मौखिक रूप से टिप्पणी करते हुए कहा, “क्या छुपा हुआ है? आप दोनों एक साथ रह रहे हैं। आपके पड़ोसी को पता है, समाज को पता है और दुनिया को पता है। फिर आप किस निजता की बात कर रहे हैं?…क्या गपशप?”

पीठ ने कहा, “क्या आप छिपकर किसी एकांत गुफा में रह रहे हैं? आप सभ्य समाज के बीच रह रहे हैं। आप बिना शादी के बेशर्मी से एक साथ रह रहे हैं। फिर छुपा हुआ क्या है? वह कौन सी गोपनीयता है, जिसका उल्लंघन किया जा रहा है?” इस पर याचिकाकर्ता ने कहा कि समाचार पत्र लिव-इन रिलेशनशिप के बारे में रिपोर्ट प्रकाशित कर रहे हैं। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यदि मीडिया ने कोई नाम प्रकाशित किया है तो उसका कंटेंट कोर्ट में पेश की जाए।

बहस के दौरान याचिकाकर्ता जय त्रिपाठी के वकील अभिजय नेगी ने जिला अल्मोड़ा की एक घटना का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि वहाँ एक युवा लड़के की हत्या सिर्फ इसलिए कर दी गई, क्योंकि वह एक दूसरे धर्म की लड़की के साथ लीव-इन रिलेशनशिप में रह रहा था। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने मौखिक रूप से कहा कि ऐसे लोगों को जागरूक करने के लिए काम किया जाना चाहिए।

जब याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने कोर्ट में दलील दी कि उसके मुवक्किल की निजता खतरे में है तो मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यदि इसको लेकर उन पर कोई कार्रवाई होती है तो वे कोर्ट आएँ। अदालत ने UCC को चुनौती देने वाली अन्य याचिकाओं के साथ इस याचिका को भी जोड़ दिया। कोर्ट ने राज्य सरकार से इन याचिकाओं पर जवाब देने के लिए कहा है। इसकी अगली सुनवाई 1 अप्रैल को होगी।

गौरतलब है कि UCC के खिलाफ भीमताल निवासी और पूर्व छात्र नेता सुरेश सिंह नेगी ने जनहित याचिका दायर करके इसके कई प्रावधानों को चुनौती दी है, जिसमें लिव-इन संबंधों के प्रावधान भी शामिल हैं। वहीं, आरुषि गुप्ता ने एक अन्य जनहित याचिका में विवाह, तलाक और लिव-इन संबंधों से संबंधित प्रावधानों को चुनौती दी। गुप्ता ने तर्क दिया है कि ये प्रावधान नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं।

बता दें कि उत्तराखंड सरकार ने इस साल 27 जनवरी को राज्य में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू की है। इसके साथ ही उत्तराखंड देश का पहला राज्य बन गया है, जिसने UCC लागू किया है। इसमें लिव-रिलेशनशिप का अनिवार्य पंजीकरण कराने का प्रावधान किया गया है। जो अपने रिलेशनशिप का पंजीकरण नहीं कराते हैं, उनके लिए जेल की सजा का प्रावधान किया गया है।

लिव इन में रहने वाले जोड़े अगर एक महीने के भीतर अपना रजिस्ट्रेशन नहीं करवाते हैं तो उन्हें ₹10,000 का जुर्माना या तीन महीने की जेल हो सकती है। इसके अलावा अगर वह तीन महीने तक ऐसा करने में विफल रहते हैं तो उन्हें ₹25,000 का जुर्माना या 6 महीने की जेल हो सकती है। UCC के अंतर्गत उत्तराखंड में लिव-इन रिलेशनशिप में पार्टनर के रूप में रहने के इच्छुक लोगों को पंजीकरण के लिए रजिस्ट्रार के समक्ष बयान देना।

यूसीसी में सूचीबद्ध किसी भी शर्त का उल्लंघन होने पर रजिस्ट्रार पंजीकरण करने से इनकार भी कर सकता है। यदि पार्टनर ‘निषिद्ध संबंध’ श्रेणी में आते हैं तो लिव-इन रिलेशनशिप पंजीकृत नहीं किया जाएगा।निषिद्ध रिश्तों में बहन-भाई, भांजी-भांजा, भतीजी-भतीजा, मौसी-चाचा/ताऊ, चचेरा/फुफेरा/मौसेरा/ममेरा भाई-बहन, सास-दामाद, ससुर-बहू, माँ-पिता, सौतेला माता-पिता, नानी-दादा जैसे 74 नजदीकी रिश्ते शामिल हैं।

उत्तराखंड में लिव-इन रिलेशनशिप को एक ऐसे संबंध के रूप में परिभाषित किया गया है जिसमें एक पुरुष और एक महिला एक साझा घर में रहते हैं, जो विवाह के समान होता है। लिव-इन रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन एक महीने के भीतर करना होगा। इसके लिए लोगों को 16 पन्नों का फॉर्म भरना होगा। इसके बाद लिव-इन में रहने वाले जोड़ों के माता-पिता को इसकी भी जानकारी दी जाएगी।

लिव-इन रिलेशन के प्रावधान

उत्तराखंड सरकार ने लिव-इन रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य कर दिया है। इसके लिए दोनों (पुरुष और महिला) को अपना स्टेटमेंट जमा कराना होगा। इसमें दो बिंदु हैं।

I – उत्तराखंड में लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वालों के लिए रजिस्ट्रेशन जरूरी है, भले ही वो बाहर के रहने वाले हों। इसके लिए जिले के रजिस्ट्रार से संपर्क करना होगा।

II – अन्य राज्यों में रहने वाले उत्तराखंड के निवासी उस रजिस्ट्रार के यहाँ संपर्क कर सकता है, जिसके अधिकार क्षेत्र में वह राज्य में आमतौर पर निवास करता है।

बच्चे को कानूनी वैधता: लिव-इन रिलेशनशिप के दौरान यदि बच्चा पैदा होता है तो उस बच्चे को अवैध नहीं कहा जाएगा। उस बच्चे को कानूनी संरक्षण मिलेगा। वो उस कपल का कानूनी बच्चा रहेगा।

किन परिस्थितियों में लिव-इन रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन नहीं होगा?: लिव-इन रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन नहीं किया जा सकता, अगर…

I- जिन रिश्तों को कानूनी रूप से लिव-इन रिलेशिनशिप धारा 3 के उपधारा (1) के खंड डी के तहत प्रतिबंधित किया गया हो। इनमें 74 नजदीकी रिश्तों की सूची है।

हालाँकि जिन लोगों की स्थानीय प्रथाएँ या मान्यताएँ इसका (लिव-इन रिलेशनशिप) का विरोध नहीं करते, वैसे लोगों को अनुमति दी जाएगी। बस, ये लोकनीति और नैतिकता के खिलाफ न हो।

II- ऐसे लोग लिव-इन रिलेशनशिप में नहीं जा सकते, जिनमें से एक-से-कम एक व्यक्ति शादीशुदा है या पहले से किसी के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहा है, लेकिन उससे अलग नहीं हुआ है।

III- लिव-इन रिलेशनशिप के लिए पहुँचे जोड़ों में कोई नाबालिग होगा तो इसका रजिस्ट्रेशन नहीं हो पाएगा।

IV- जोड़ों में से कोई एक भी व्यक्ति किसी भी तरह से दबाव में हो या उससे झूठ बोला गया हो या किसी तरह के पहचान की समस्या हो (पहचान छिपाने का मामला), वह लिव-इन रिलेशन के योग्य नहीं है।

कानूनी सुरक्षा- रजिस्ट्रेशन अनिवार्य

लिव-इन रजिस्ट्रेशन को कैसे रजिस्टर्ड कराएँ, इसके लिए चार महत्वपूर्ण बिंदुओं में बताया गया है कि किस तरह से इसका रजिस्ट्रेशन होगा।

1-लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे, या लिव-इन रिलेशनशिप शुरू करना चाहते हैं, तो आपको रजिस्ट्रार ऑफिस में स्टेटमेंट जमा कराना होगा। यानी इसका रजिस्ट्रेशन कराना होगा।

2- रजिस्ट्रार स्टेटमेंट की जाँच करेगा और उसके सही पाए जाने पर आगे की प्रक्रिया को बढ़ाएगा। इसमें सेक्शन 380 (प्रतिबंधित रिश्तों) के तहत बताए रिश्तों को मान्यता नहीं मिलेगी।

3- रजिस्ट्रार दावों की पुष्टि के लिए आवेदक को बुला सकता है। सभी कागजातों की जाँच करने और संतुष्ट नहीं होने पर अधिकारी अन्य साक्ष्य या कागजात की माँग कर सकता है।

रजिस्ट्रार को मेनटेन करना होगा रजिस्टर : लिव-इन रिलेशनशिप के रजिस्ट्रेशन से लेकर संबंध विच्छेद तक की पूरी जानकारी रजिस्ट्रार को रखनी पड़ेगी। इसके लिए कानूनी व्यावधान किए गए हैं।

लिव-इन रिलेशनशिप का रिश्ता खत्म करने का फैसला: लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे युगल, या उनमें से कोई भी एक रजिस्ट्रा ऑफिस में स्टेटमेंट जमा करके इस रिस्थे को खत्म करने की अपील कर सकता है। अगर एक व्यक्ति ऐसा कर रहा है, तो उसे रजिस्ट्रार के साथ ही दूसरे साथी को भी इसकी एक प्रति देगा, यानी लिखित में उसे लिव-इन रिलेशनशिप से बाहर निकलने की जानकारी देनी होगी।

लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़ी रजिस्ट्रार की जिम्मेदारियाँ

1-इस कानून के लागू हो जाने के बाद रजिस्ट्रार की जिम्मेदारियाँ बढ़ जाएँगी, क्योंकि उसे स्थानीय पुलिस थाने में इसकी सूचना देनी पड़ेगी। अगर युगल की उम्र 21 वर्ष से कम होगी, तो उनके माता-पिता को भी सूचना देनी पड़ेगी।

2- अगर लिव-इन पार्टनर द्वारा रजिस्ट्रार को दी गई जानकारी गलत पाई जाती है या कोई शक होता है तो रजिस्ट्रार तुरंत इसकी सूचना स्थानीय थाना अधिकारी को देंगे।

3-अगर लिव-इन रिलेशनशिप का रिश्ता तोड़ने के लिए एक पक्ष आगे बढ़ता है तो रजिस्ट्रार के सामने अपना स्टेटमेंट दर्ज कराएगा। रजिस्ट्रार इसकी सूचना दूसरे पक्ष को देगा। अगर जोड़े में से एक कोई 21 वर्ष से कम उम्र का/की है तो उनके माता-पिता को भी इस बारे में सूचना दी जाएगी।

लिव-इन रिलेशनशिप की सूचना न देने पर रजिस्ट्रा को इस बारे में जानकारी मिलती है तो वो एक नोटिस जारी करेगा। इस नोटिस के जारी करने के 30 दिन के भीतर जोड़े को अपना स्टेटमेंट जमा कराना होगा और रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया को पूरा करना होगा। अगर ऐसा नहीं किया तो कानूनी कदम उठाए जा सकते हैं।

कानूनी कार्रवाई और दंड प्रक्रिया

1- लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़े अगर एक माह के अंदर रजिस्ट्रेशन नहीं कराते हैं और ये दोष साबित हो जाता है तो उन्हें तीन माह की जेल और 10 हजार रुपए तक जुर्माना लगाया जा सकता है।

2- लिव-इन रिलेशनशिप के रजिस्ट्रेशन के दौरान जानकारी छिपाने जैसे मामलों में रजिस्ट्रार उनका रजिस्ट्रेशन भी रद्द कर सकता है। इसके लिए उसे तीन माह तक की जेल और 25 हजार रुपए तक का जुर्माना या दोनों दंड साथ दिए जा सकते हैं।

3-लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़े अगर स्टेटमेंट दर्ज नहीं कराते हैं और नोटिस का भी जवाब नहीं देते हैं तो ऐसे लोगों को 6 माह की सजा और 25 हजार रुपए का जुर्माना या दोनों दंड लगाए जा सकते हैं।

लिव-इन रिलेशनशिप के बाद भरण-पोषण की जिम्मेदारी: अगर एक महिला को उसका लिव-इन पार्टनर छोड़ता है तो वो भरण-पोषण के खर्चे को क्लेम कर सकती है। इसके लिए वो तय नियमों के तहत कोर्ट का सहारा ले सकती है।

बता दें कि समान नागरिक संहिता विधेयक के ड्राफ्ट को पाँच सदस्यीय पैनल ने 2 फरवरी 2024 को उत्तराखंड सरकार को सौंपा था। इस पैनल की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज रंजना देसाई कर रही थीं। इस विधेयक को पेश करने के साथ ही उत्तराखंड देश का पहला ऐसा राज्य बन गया है, जहाँ UCC कानून लाने की प्रक्रिया शुरू की गई है।

‘ब्राह्मण छोरी ₹20 लाख में, दलित ₹10 लाख में बेचेंगे’: हिंदू बच्चियों का सौदा करना चाहता था ब्यावर का ‘मुस्लिम गैंग’, रोजा-कलमा-नमाज की देते थे ट्रेनिंग

राजस्थान के ब्यावर में मुस्लिम लड़कों के गैंग ने हिन्दू बच्चियों को फंसा कर उन्हें नमाज, रोजा और कलमा के बारे में बताया। उन पर बुरका पहनने का दबाव डाला। धर्मांतरण के लिए उनका ब्रेनवाश किया। एक बच्ची ने बताया कि रोजा ना करने पर उसका ब्लेड से हाथ काटा गया। बच्चियों का लगातार यौन शोषण किया गया। अब ‘मुस्लिम गैंग’ के यह सब लड़के पुलिस की गिरफ्त में हैं। शुरूआती पूछताछ और पीड़िताओं के बयानों से भयावह जानकारियाँ सामने आई हैं। पुलिस आरोपितों को रिमांड पर लेकर पूछताछ कर रही है।

सारे आरोपित अनपढ़, पर्ची से फंसाया

हिन्दू बच्चियों का यौन शोषण वाले रिहान मोहम्मद (20 वर्ष), सोहेल अंसारी (19 वर्ष), लुकमान (20 वर्ष), अरमान पठान (19 वर्ष), साहिल कुरैशी (19 वर्ष) और 2 नाबालिग अनपढ़ हैं। इनमें से कोई स्कूल नहीं जाता है। इनमें से कोई वेल्डर की दुकान पर काम करता है तो कोई फर्नीचर की दुकान पर मजदूरी करता है। हालाँकि, इनके निशाने पर एक स्कूल में पढ़ने वाली 10वीं की हिन्दू छात्राएँ आईं। यह बच्चियाँ भी आसपास की रहने वाली हैं और इन मुस्लिम लड़कों के इलाकों से होकर स्कूल जाती थीं।

इसी के बाद इन्होंने उन बच्चियों को निशाने पर लिया। एक पीड़िता ने बताया कि सोहेल मंसूरी ने स्कूल से घर तक उसका 15 दिन तक पीछा किया। सोहेल ने उसके सामने नम्बर लिखी पर्चियां फेंकी। बच्ची ने एक दिन उसको फोन किया तो उसने कैफे में मिलने बुलाया और वहाँ शारीरिक शोषण किया। पीड़िता ने बताया कि इसकी फोटो भी निकाल ली। इस काम में सोहेल मंसूरी के साथ बाकी मुस्लिम लड़के भी शामिल थे। हिन्दू बच्ची ने बताया कि इसके बाद सोहेल उसे अपनी दोस्त से बात करने को टॉर्चर करने लगा।

मोबाइल दिया, रोजा-कलमा का दबाव डाला

NDTV राजस्थान की एक रिपोर्ट के अनुसार, सोहेल मंसूरी का शिकार बनी पीड़िता ने बताया कि उसे एक छोटा फोन भी दिया गया था, इसी से बातचीत होती थी। सोहेल पीड़िता को लगातार धमकाता भी था। पीड़िता ने अपनी सहेलियों से रियान, जावेद और अरमान की बात करवाई। सोहेल ने हिन्दू बच्ची को बुरका पहनने के लिए प्रताड़ित किया। उसे रमजान और रोजे के बारे में बताया, रोजा कैसे रखना है इसके लिए भी ब्रेनवाश किया। पीड़िता के हाथ पर कट भी मारे गए। उस पर कलमा पढ़ने का दबाव डाला।

बच्चियों के धर्मांतरण की भी तैयारी के लिए उनको नई-नई गाड़ियाँ दिखाई जाती। बच्चियों को ले जाने के लिए यह मुस्लिम लड़के कभी बुलेट लाते तो कभी बाकी गाड़ियाँ। एक पीड़िता ने बताया, “उन लोगों ने एक बार बोला था कि ब्राह्मण की छोरी को बेचेंगे तो 20 लाख रुपये मिलेंगे और तुझे (दलित) बेचेंगे तो 10 लाख रुपये मिलेंगे।” बच्चियों ने बताया कि उनकी अश्लील फोटो-वीडियो के सहारे उन्हें लगातार ब्लैकमेल किया जाता था। उन्हें दूसरी लडकियाँ लाने को कहा जाता था।

एक मोबाइल से हुआ खुलासा

इस पूरे कांड का खुलासा एक बच्ची के पास से मिले मोबाइल से हुआ। बच्ची के घरवालों ने उससे मोबाइल लेकर एक मुस्लिम लड़के के पास फोन किया। फोन करने पर वह गालियाँ बकने लगा और धमकियाँ देने लगा। इसके बाद पीड़िता के परिजन थाने पहुँचे। इसके बाद मामले की परतें खुलना चालू हुईं। पता चला कि एक ही नहीं बल्कि कई लडकियाँ इस गैंग का शिकार हुई हैं। एक-एक बच्ची को एक साथ कई मुस्लिम लड़के धमकाते थे। यह सभी इनसे पैसे भी वसूलते थे। बच्चियाँ इसके लिए घर से पैसे चुराती थीं।

पुलिस ने बयान दर्ज करवाए, रिमांड पर लिया

ब्यावर पुलिस ने इस मामले में गिरफ्तार आरोपितों को मंगलवार (19 फरवरी, 2025) को कोर्ट में पेश किया। कोर्ट ने 5 बालिग़ आरोपितों को 4 दिन की पुलिस रिमांड पर भेजा है। कोर्ट में पेश करने के दौरान इस ‘मुस्लिम गैंग’ को वकीलों ने पीट दिया। इन पर वकीलों ने जूते-चप्पल चलाए। इस मामले में ब्यावर के हिन्दू समाज ने प्रदर्शन भी किया है। पुलिस ने पीड़िताओं के बयान भी कोर्ट में दर्ज करवा दिए हैं। पुलिस ने पीड़िताओं का मेडिकल भी करवाया है। मामले में गिरफ्तार 2 नाबालिगों को किशोर बोर्ड के पास भेजा गया है।

जमुई में हनुमान चालीसा पाठ से लौट रहे लोगों का सिर ‘मुस्लिम भीड़’ ने फोड़ा, फिर बिहार पुलिस ने खुशबू पाण्डेय को क्यों कर लिया गिरफ्तार? ‘हिंदू शेरनी’ के खिलाफ ट्रेंड चला रहे थे इस्लामी कट्टरपंथी

बिहार के जमुई में हिन्दू संगठन की एक महिला कार्यकर्ता को पुलिस ने गिरफ्तार किया है। पुलिस ने यह एक्शन जमुई में हिन्दुओं पर इस्लामी भीड़ के हमले के बाद लिया है। हिन्दू कार्यकर्ताओं पर हनुमान चालीसा पाठ करके लौटते समय इस्लामी भीड़ ने घेर कर ईंट-पत्थर और लाठियाँ चलाई थीं।

जमुई में पुलिस ने सोमवार (17 फरवरी, 2025) को ‘हिन्दू शेरनी’ के नाम से विख्यात खुशबू पांडेय को गिरफ्तार किया है। खुशबू पांडेय को उनके पिता के साथ हिरासत में लिया गया था लेकिन उनके पिता को बाद में छोड़ दिया गया था। खुशबू पांडेय भी उसी समूह का हिस्सा थीं, जिस पर इस्लामी भीड़ ने हमला किया था।

खुशबू पांडेय ने इस हमले के बारे में एक वीडियो भी जारी किया था। इसमें खुशबू पांडेय ने बताया, “बलियाडीह गाँव में भालेश्वर नाथ मंदिर में हनुमान चालीसा का कार्यक्रम था। प्रसाद ग्रहण करके वापस लौटने के दौरान मस्जिद से कुछ दूरी पहले ही अचानक से पथराव होना चालू हो गया। गाड़ी तोड़ी गई। वहाँ अल्लाह हू अकबर के नारे लग रहे थे।”

खुशबू पांडेय ने दावा किया था कि हमला करने वाली इस्लामी भीड़ उन्हें ढूंढ रही थी और उनको जला देना चाहती थी। उन्होंने बताया था कि वह काफी देर तक इसी के चलते गाड़ी में फंसी रही थीं। उन्होंने बताया था कि लाठी डंडे लेकर आई भीड़ ने गाड़ियों को भी तोड़ दिया था। खुशबू पांडेय ने बताया था कि इस्लामी भीड़ पुलिस वालों पर हमला करने की बात भी कह रहे थे।

दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि बलियाडीह गाँव में हुए इस हमले के दौरान पुलिस की मौजूदगी में इस्लामी भीड़ ने कट्टे और तलवार चलाए। पुलिस ने बल प्रयोग करके बलियाडीह में शांति कायम की और उपद्रवियों पर कार्रवाई चालू की।

गौरतलब है कि जमुई के बलियाडीह गाँव में रविवार (16 फरवरी, 2025) को हिन्दू स्वाभिमान संगठन के कार्यकर्ता हनुमान चालीसा पाठ के लिए गए थे। हनुमान चालीसा पाठ करने के बाद यह कार्यकर्ता जब वापस निकले तो मस्जिद के पास एक भीड़ ने इनकी गाड़ियों पर हमला कर दिया। इस हमले में कई हिन्दू कार्यकर्ता घायल हुए।

कई घंटे तक पत्थरबाजी चलती रही। हिन्दुओं की गाड़ियाँ भी तोड़ी गईं। इस घटना के कई वीडियो भी वायरल हुए थे। घटना के बाद पुलिस ने इस मामले में FIR दर्ज की थी और कुछ पत्थरबाजों को गिरफ्तार किया था। इसके बाद सोशल मीडिया पर इस्लामी कट्टरपंथियों ने खुशबू पांडेय के खिलाफ गिरफ्तारी को लेकर ट्रेंड चलाया था। घटना के बाद मुस्लिमों पुलिस ने जमुई में इन्टरनेट भी बंद करवा दिया था।

प्रयागराज महाकुंभ पर एक-एक कर विपक्षी नेताओं की सामने आ रही ‘घृणा’, अब ममता बनर्जी ने बताया ‘मृत्यु कुंभ’: जया बच्चन से लेकर लालू यादव तक उगल चुके हैं जहर

प्रयागराज महाकुंभ को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ‘मृत्युकुंभ’ करार दिया है। प्रयागराज महाकुंभ में मची भगदड़ पर तंज कसते हुए ममता बनर्जी ने महाकुंभ को मृत्यु कुंभ करार देते हुए कहा कि महाकुंभ में VIPs को खास सुविधाएँ दी जा रही हैं, लेकिन गरीबों को इससे वंचित रखा जा रहा है।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा, ‘महाकुंभ अब मृत्यु कुंभ में बदल चुका है। यहाँ वीआईपी लोगों को ही खास सुविधाएँ मिल रही हैं।

महाकुंभ को लेकर योगी सरकार पर हमला बोलते हुए ममता बनर्जी ने आगे कहा, आपको इस तरह के बड़े आयोजन की योजना बनानी चाहिए थी। भगदड़ की घटना के बाद कितने आयोग कुंभ भेजे गए। बिना पोस्टमार्टम के ही शवों को बंगाल भेज दिया गया। ममता बनर्जी ने आगे कहा, आप देश को बाँटने के लिए धर्म बेचते हैं। हमने यहाँ पोस्टमॉर्टम किया क्योंकि आपने बिना डेथ सर्टिफिकेट के शव भेज दिए। इन लोगों को मुआवजा कैसे मिलेगा?

ममता बनर्जी पहली विपक्षी नेता नहीं हैं, जिन्होंने ऐसी बात बोली हो। इससे पहले, अफजाल अंसारी, लालू यादव, जया बच्चन और कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे जैसे नेता भी ऐसी टिप्पणियाँ कर चुके हैं।

गाजीपुर से सपा सांसद अफजाल अंसारी ने कहा था- ‘महाकुंभ में नहाने से पाप धुलता तो नरक में कोई रहेगा ही नहीं’। उनके इस बयान के बाद काफी बवाल हुआ था, जिसके बाद उनके खिलाफ एफआईआर भी दर्ज भी कराई गई थी।

यही नहीं, सपा की राज्यसभा सांसद जया बच्चन भी महाकुंभ और प्रयागराज को लेकर आग उगल चुकी हैं। उन्होंने कहा था कि संगम सबसे अधिक गंदा है। उन्होंने दावा किया था कि भगदड़ में मारे गए लोगों के शवों को उठाकर पानी (नदी) में डाल दिया गया। यही नहीं, उन्होंने प्रयागराज पहुँचे श्रद्धालुओं की संख्या पर भी सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा था कि सरकार और लोग झूठ बोल रहे हैं कि प्रयागराज में इतने लोग आए। इतने लोग तो आ ही नहीं सकते।

वहीं, कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने महाकुंभ और प्रयागराज पर सवाल उठाते हुए उसे लोगों की गरीबी से जोड़ दिया था। उन्होंने मंच से पूछा था ‘गंगा में डुबकी लगाने से गरीबी दूर होगी क्या?’ बीजेपी ने उनके भाषण को हिंदू विरोधी करार दिया था।

इन सबके बीच, आरजेडी के अध्यक्ष और सजायाफ्ता नेता लालू यादव ने भी कुंभ को लेकर अनर्गल टिप्पणी की थी। लालू यादव ने कहा था, ‘कुंभ का कोई मतलब नहीं, फालतू का कुंभ’। लालू यादव ने मौनी अमावस्या के मौके पर हुए भगदड़ को लेकर अपनी हिंदुओं से घृणा का सार्वजनिक प्रदर्शन किया था।

विकिपीडिया का भारत के खिलाफ षड्यंत्र: क्या है कार्यशैली, किसके साथ वित्तीय लेन-देन, कैसे करता है सूचनाओं पर कंट्रोल – पढ़िए विस्तृत दस्तावेज

यह डोज़ियर (दस्तावेज) यह प्रदर्शित करने और निर्णायक रूप से स्थापित करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है कि विकिपीडिया, एक स्वतंत्र, संपादकीय हस्तक्षेप से मुक्त विश्वकोश नहीं है, जैसा कि विकिमीडिया फाउंडेशन दावा करता है। विकिमीडिया फाउंडेशन दावा करता है कि विकिपीडिया दुनिया भर के हजारों अवैतनिक, उत्साही स्वयंसेवकों के स्वैच्छिक कार्य पर निर्भर करता है।

यह डोज़ियर विशेष रूप से भारत, भारतीय कानूनों और भारत से संबंधित सामग्री पर केंद्रित है, ताकि विकिपीडिया को एक ‘प्रकाशक’ के रूप में मानने के बारे में सिफारिशें तैयार की जा सकें, जो अपने प्लेटफ़ॉर्म पर प्रकाशित सामग्री के लिए सीधे जिम्मेदार है। ‘प्रकाशक’ शब्द से यहाँ मतलब है भारत सरकार के सूचना प्रौद्योगिकी नियम 2021 में तय किए गए दिशा-निर्देश। इसके तहत वेबसाइट को दो कैटेगिरी में रखा गया है – इंटरमीडियरी और प्रकाशक।

फोटो साभार: MIB + सर्वे ऑफ इंडिया

यह डोज़ियर विकिपीडिया और इसकी मूल कंपनी, विकिमीडिया फाउंडेशन के विभिन्न पहलुओं का संक्षेप में विश्लेषण करता है, ताकि विकिपीडिया को “सभी के लिए स्वतंत्र रूप से संपादन योग्य विश्वकोश” के रूप में प्रस्तुत करने के फाउंडेशन के दावों, विश्वसनीय स्रोतों का उपयोग करने, तटस्थ दृष्टिकोण बनाए रखने, और दान पर निर्भर रहने जैसे दावों को समझा जा सके।

डोज़ियर यह भी जाँच करता है कि विकिमीडिया फाउंडेशन को मिलने वाले अनुदान, इन्हें देने वाली संस्थाएं, और एनजीओ व अन्य इकाइयों को दिए गए अनुदानों का विवरण क्या है। इसके अलावा, यह समझने का प्रयास करता है कि भारत में अपनी भौतिक उपस्थिति बनाए बिना, विकिमीडिया फाउंडेशन कैसे भारत में कार्यरत है और अपने व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए विभिन्न संस्थाओं को वित्तपोषण कर रहा है।

यह डोज़ियर सबसे पहले विकिपीडिया के स्पष्ट वामपंथी झुकाव पर मौजूदा शोधों की जाँच करता है और उन तत्वों का विश्लेषण करता है जो इस झुकाव में योगदान देते हैं। उद्धृत किए गए सभी चार शोध-पत्रों में स्पष्ट निष्कर्ष है कि विकिपीडिया में एक अंतर्निहित वामपंथी झुकाव है। विकिपीडिया के “NPOV” (तटस्थ दृष्टिकोण) दिशा-निर्देश का अर्थ यह नहीं है कि विचारों के पूरे स्पेक्ट्रम को समान या उचित प्रतिनिधित्व मिलेगा। “NPOV” का परिणाम केवल इतना है कि “विश्वसनीय स्रोत” में उल्लेखित विवरणों को शामिल किया जाएगा। लेकिन “विश्वसनीय स्रोत” का चयन ही पक्षपातपूर्ण है, क्योंकि विकिपीडिया में अत्यधिक शक्तिशाली संपादक और प्रशासक “दक्षिणपंथी” (गैर-वामपंथी) स्रोतों को हतोत्साहित या ब्लैकलिस्ट कर देते हैं, जिससे वे स्रोत विकिपीडिया लेखों में संदर्भ सामग्री के रूप में शामिल नहीं किए जा सकते।

विकिपीडिया के सह-संस्थापक लैरी सैंगर ने स्पष्ट रूप से कहा है कि विकिपीडिया में एक स्पष्ट वामपंथी झुकाव है। कई साक्षात्कारों और वार्ताओं में उन्होंने यह बताया है कि विकिपीडिया कैसे संतुलन के पैमाने को विकृत करता है, जिससे जानकारी वास्तविकता का सटीक प्रतिनिधित्व नहीं करती और वामपंथी पक्षपात से ग्रस्त होती है।

यह डोज़ियर और शोध-पत्र यह पाता है कि विकिपीडिया की संरचना ही कुछ व्यक्तियों, जिन्हें ‘प्रशासक’ कहा जाता है, को अनियंत्रित शक्ति देती है। पूरी दुनिया में केवल 435 सक्रिय प्रशासक हैं, जिनके पास संपादकों को प्रतिबंधित करने, स्रोतों को ब्लैकलिस्ट करने, योगदानकर्ताओं पर प्रतिबंध लगाने और लेखों पर किए गए संपादन को स्वीकृत या अस्वीकार करने की शक्ति है। ये प्रशासक विकिपीडिया पर सामग्री के संबंध में असीमित शक्ति रखते हैं।

इस शोध में यह भी पाया गया है कि इनमें से कई संपादक और प्रशासक विकिमीडिया फाउंडेशन द्वारा विकिमीडिया से संबंधित परियोजनाओं के लिए अनुदानों के रूप में भुगतान प्राप्त करते हैं। इस प्रकार यह निर्णायक रूप से सिद्ध होता है कि विकिपीडिया वह “सभी के लिए स्वतंत्र रूप से संपादन योग्य मॉडल” नहीं है, जैसा कि यह दावा करता है। स्वयं जिमी वेल्स ने भी स्वीकार किया है कि वह विकिपीडिया पर सामग्री का अंतिम मध्यस्थ है।

यह शोध विकिमीडिया फाउंडेशन को मिलने वाले धन और उसके व्यय के विश्लेषण पर केंद्रित है, विशेष रूप से भारत के संदर्भ में। यह पाया गया कि विकिमीडिया फाउंडेशन को ओपन सोसाइटी फाउंडेशन, रॉकफेलर फाउंडेशन, टाइड्स फाउंडेशन और इनके ही जैसे अन्य प्रेरित-निर्देशित फंडों से करोड़ों डॉलर प्राप्त होते हैं। गूगल भी विकिमीडिया फाउंडेशन को लाखों डॉलर दान करता है और विकिपीडिया सामग्री को बढ़ावा देता है, जिसमें “एब्सट्रैक्ट विकिपीडिया” जैसी परियोजनाओं का वित्तपोषण शामिल है, जिसका उद्देश्य इंटरनेट पर वर्चस्व स्थापित करना है।

विकिमीडिया फाउंडेशन के वित्तीय संबंध टाइड्स फाउंडेशन के साथ गहरे हैं, जिस पर जॉर्ज सोरोस के साथ मिलकर अमेरिकी विश्वविद्यालयों में हमास के समर्थन में विरोध-प्रदर्शन का वित्तपोषण करने का आरोप है।

विकिमीडिया और टाइड्स फाउंडेशन कई ऐसी संस्थाओं को भी फंड करते हैं, जो विशेष रूप से भारत के हितों के खिलाफ कार्य करती हैं और विभिन्न स्तरों पर इसकी संप्रभुता को कमजोर करती हैं।

विकिमीडिया फाउंडेशन और टाइड्स फाउंडेशन के संबंध संदिग्ध संगठनों जैसे हिंदूज़ फॉर ह्यूमन राइट्स, इक्वालिटी लैब्स, आर्ट+फेमिनिज्म, एक्सेस नाउ और भारतीय उद्योगपतियों के खिलाफ ‘हिंडनबर्ग हिट जॉब’ जैसे मामलों के साथ जुड़े पाए गए हैं।

भारत में, विकिमीडिया फाउंडेशन की कोई भौतिक उपस्थिति नहीं है। इसकी पंजीकृत सोसायटी, जो पहले भारत में थी, 2019 में बंद हो गई थी। भारत में उपस्थित न होते हुए भी विकिमीडिया फाउंडेशन दान के रूप में लाखों रुपये एकत्र करता है और भारत में एनजीओ को फंड करता है, जो विकिमीडिया फाउंडेशन के व्यावसायिक हितों को आगे बढ़ाते हैं। इन संगठनों में सभी वामपंथी झुकाव वाले हैं।

विकिपीडिया पर सामग्री के संदर्भ में, यह पाया गया कि संपादकों और प्रशासकों का एक छोटा समूह भारत में सामग्री को विकृत करता है। इसमें एक वो संपादक भी शामिल है, जिस पर मणिपुर राज्य में असंतोष फैलाने और कलह उत्पन्न करने के लिए केस दर्ज किया गया है। ये संपादक अक्सर विकिपीडिया लेखों में तथ्यों (जिनसे उन्हें असुविधा हो) और वैकल्पिक दृष्टिकोण जोड़ने के प्रयासों को बाधित करते हैं। इसके अलावा, गूगल और विकिमीडिया फाउंडेशन की साझेदारी के कारण सामग्री में विशिष्ट हिंदू-विरोधी और भारत-विरोधी पक्षपात देखा गया है।

यह डोज़ियर शोधकर्ता द्वारा सुझाई गई सिफारिशों की सूची के साथ समाप्त होता है। इन सिफारिशों का उद्देश्य विकिमीडिया फाउंडेशन को जवाबदेह बनाना है, जो भारतीय कानूनों का पालन किए बिना एक संपादकीय दिशा निर्धारित करता है। जबकि विकिमीडिया फाउंडेशन का दावा है कि विकिपीडिया केवल एक मध्यस्थ है, यह पाया गया कि विकिपीडिया “प्रकाशकों” के लिए निर्धारित सभी मानकों को पूरा करता है, जैसा कि आईटी दिशा-निर्देशों में परिभाषित है। इसका अर्थ यह होगा कि विकिमीडिया फाउंडेशन को विकिपीडिया पर सभी सामग्री के लिए उत्तरदायी ठहराया जाना चाहिए और भारतीय कानूनों के अधीन रहने के लिए भारत में अपनी उपस्थिति स्थापित करनी चाहिए, जिसमें एफसीआरए, एनजीओ, आईटी दिशा-निर्देश, वित्तीय प्रकटीकरण मानक और अन्य कानून शामिल हैं।

रिसर्च पेपर में सिफारिशें

विकिमीडिया फाउंडेशन और विकिपीडिया पर किए गए शोध के आधार पर निम्नलिखित सिफारिशें दी गई हैं:

विकिपीडिया को एक प्रकाशक घोषित करना

विकिपीडिया ने खुद को एक मध्यस्थ (intermediary) के रूप में दावा किया है, जो ‘विश्वसनीय स्रोतों’ पर आधारित किसी सामग्री या संपादकीय नीति के हस्तक्षेप के बिना एक समुदाय की बुद्धिमत्ता पर निर्भर करता है तथा तटस्थ दृष्टिकोण बनाए रखता है। हालाँकि, जैसा कि शोध में प्रमाणित हुआ है, यह सच नहीं है। विकिपीडिया प्रकाशकों के मानकों को पूरा करता है। वे वर्तमान घटनाओं और ऐतिहासिक घटनाओं पर जानकारी संकलित करते हैं, वे अपने संपादकों और व्यवस्थापकों को भुगतान करते हैं और वे इंटरनेट पर आम लोगों द्वारा आसानी से उपलब्ध हैं। चूँकि विकिपीडिया का एक संपादकीय दृष्टिकोण है, जो संपादकों और व्यवस्थापकों पर आधारित है, इससे यह प्रमाणित होता है कि वे अब एक मध्यस्थ माने जाने के योग्य नहीं हैं। एक प्रकाशक के रूप में घोषित होने के बाद, विकिमीडिया को भारत में अपने कार्यालय स्थापित करने होंगे, एक शिकायत निवारण प्रणाली स्थापित करनी होगी और भारतीय कानूनों के तहत अवैध सामग्री जो भारत की संप्रभुता को कमजोर करती है या असंतोष उत्पन्न करती है, के लिए जिम्मेदार ठहराया जाएगा।

वित्तीय लेन-देन की जाँच

विकिमीडिया फाउंडेशन भारत में कई वित्तीय लेन-देन करता है ताकि अपने व्यापारिक हितों को बढ़ावा दे सके और उन वामपंथी संगठनों और व्यक्तियों को वित्तीय सहायता दे सके जो अंततः भारत की संप्रभुता को कमजोर करते हैं और असंतोष उत्पन्न करते हैं। भारत में किसी भी वित्तीय लेन-देन, भुगतान और भारत से धन संग्रह भारतीय कानूनों के अंतर्गत आता है, जिनमें आईटी कानून, एफसीआरए, एनजीओ को नियंत्रित करने वाले कानून और आईटी दिशा-निर्देश आदि शामिल हैं। सरकार को विकिमीडिया फाउंडेशन पर यह दबाव डालना चाहिए कि उन्हें कानूनी रूप से भारत में अपनी आधिकारिक उपस्थिति स्थापित करनी चाहिए और भारतीय कानूनों के अनुसार वित्तीय जाँच के अधीन होना चाहिए।

विकिपीडिया लेखों में पक्षपात चिह्नित करने के लिए ब्राउज़र एक्सटेंशन

इस शोध में जैसी चर्चा की गई है, विकिमीडिया फाउंडेशन ने विकिपीडिया के व्यवस्थापक ‘न्यूज़लिंगर’ को हजारों डॉलर का भुगतान किया है, ताकि एक ऐप और ब्राउज़र एक्सटेंशन तैयार किया जा सके, जो विकिपीडिया के पक्षपाती स्रोतों को टेम्पलेटाइज कर सके – इसका मतलब है कि जब भी कोई व्यक्ति इंटरनेट पर किसी वेबसाइट को पढ़ेगा, तो विकिपीडिया संपादकों के पक्षपाती विचार सामने आएँगे, जो यह तय करेंगे कि कौन सा स्रोत विश्वसनीय है और कौन सा नहीं। विकिमीडिया फाउंडेशन और गूगल के सहयोग से, इसमें कोई संदेह नहीं कि इस परियोजना को लागू किया जा सकता है। भारत सरकार को एक ब्राउज़र एक्सटेंशन पर काम करना चाहिए जो विकिपीडिया लेखों में, कम से कम भारत से संबंधित, पक्षपाती विचारों, गलत जानकारी, फर्जी खबरों और मिथ्या सूचना को चिन्हित कर सके।

विकिपीडिया को प्रतिस्पर्धा अधिनियम 2002 के तहत जाँचना

प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002, भारत में एंटीट्रस्ट समस्याओं से निपटने के लिए मुख्य कानून है। यह कानून बाजारों में प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने, गलत प्रतिस्पर्धात्मक प्रथाओं को रोकने और उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करने के लिए लागू किया गया था। गूगल और विकिमीडिया फाउंडेशन के सहयोग से विकिपीडिया सामग्री और जानकारी के पक्ष में लाभ उठाते जा रहा है, जिससे भारतीय मीडिया और सामग्री स्रोतों को नुकसान हो रहा है। स्रोतों की उपेक्षा और गूगल तथा विकिमीडिया फाउंडेशन द्वारा पक्षपाती जानकारी को प्रमाणित करने से भारतीय वेबसाइटों की राजस्व और रैंकिंग पर गंभीर प्रभाव पड़ता है, जिनसे वे संपादकीय रूप से सहमत नहीं होते हैं। गूगल और विकिमीडिया फाउंडेशन की प्रतिस्पर्धा-विरोधी प्रथाओं की जाँच की जानी चाहिए।

रेप कर नाबालिग लड़कों को ‘जिन्न’ दिखलाता था कश्मीर का ‘पीर बाबा’ एजाज अहमद, कोर्ट में बोला पीड़ित- साल भर में 500+ बार किया मेरा यौन शोषण: बीमारी ठीक करने का करता था दावा

जम्मू-कश्मीर में एक ‘पीर बाबा’ ने बीमारी ठीक करने के नाम पर दशक से ज्यादा समय तक छोटे बच्चों का यौन शोषण किया। उसने दर्जन भर बच्चों को अपना शिकार बनाया। उसने अपनी कारस्तानी खोलने वाले बच्चों को धमकाया भी। अब उसे कोर्ट ने दोषी करार दिया है।

जम्मू कश्मीर के सोपोर की एक अदालत ने सोमवार (17 फरवरी, 2025) को इस ‘पीर बाबा’ को दोषी ठहराया है। इस पीर बाबा का असली नाम एजाज अहमद शेख है। उसे इस मामले में 10 वर्ष तक की सजा हो सकती है। उसकी इस कारस्तानी का खुलासा 2016 में हुआ था।

एजाज अहमद की यौन प्रताड़ना का शिकार एक बच्चे ने अपने पिता को उसकी कारस्तानियों के विषय में बताया था। बच्चे ने बताया कि उसके साथ एजाज अहमद लगातार दीनी मार्गदर्शन देने के नाम पर लगातार उसके साथ अप्राकृतिक यौन शोषण करता था। यदि बच्चा इससे इनकार करता तो वह उन्हें डराया करता।

इसके बाद एजाज अहमद के खिलाफ पुलिस में मामला दर्ज करवाया गया। इसके बाद ‘पीर बाबा’ एजाज का भंडा फूट गया। उसके खिलाफ लगभग एक दर्जन और बच्चों ने ऐसे ही आरोप लगाए। सामने आया कि एजाज अहमद बच्चों को जिन्न से मिलवाने जैसे झाँसे दिए और उन्हें अपनी अपनी हवस का शिकार बनाया।

एक पीड़ित ने बताया कि एक वर्ष के भीतर उसका 500 से अधिक बार यौन उत्पीड़न किया गया। वहीं एक पीड़ित ने बताया कि एजाज अहमद बच्चों को एक दूसरे के साथ यौन संबंध बनाने को कहता था। यहाँ तक कि 10 साल के बच्चों को भी यौन शोषण का शिकार बनाया गया।

इनमें से कई बच्चे तो अब बालिग़ हो चुके हैं। एजाज शेख लगातार इन बच्चों को धमकाता था कि अगर इन बच्चों ने किसी से यौन शोषण का खुलासा किया तो उनकी जिन्दगी खराब हो जाएगी। वह उन्हें मजहब का खौफ भी दिखाता था।

एजाज अहमद ने मामला दर्ज होने के बाद भी पीड़ितों के परिवार को धमकाया। उसने कहा कि उन सभी परिवारों का नुकसान होगा जिन्होंने उस पर आरोप लगाए हैं। हालाँकि, पीड़ितों के परिवार लगातार उसके खिलाफ मुकदमा लड़ते रहे। इस दौरान कोर्ट ने उन पीड़ित बच्चों से कहानी भी सुनी।

कोर्ट में एजाज अहमद ने दावा किया कि उसे पैसों के विवाद के चलते फँसाया गया है। एजाज अहमद ने इस बात का भी सहारा लिया कि FIR देरी से दर्ज करवाई ही थी। हालाँकि, कोर्ट ने उसकी यह दलीलें मानने से इनकार कर दिया।

कोर्ट ने कहा, “उसने पीड़ितों को उनके नाबालिग होने के दौरान अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर किया, आशीर्वाद देने की आड़ में उनकी कमज़ोरी का फायदा उठाया।” कोर्ट ने कहा कि एजाज अहमद ने इन बच्चों के आठ यौन उत्पीड़न करके इन्हें शर्मिन्दा कर दिया। कोर्ट ने उसे अब बच्चों के यौन शोषण के मामले में दोषी ठहरा दिया है।