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मनमोहन सिंह फिर बने बलि का बकरा: कॉन्ग्रेसी युवा सांसदों ने UPA सरकार पर फोड़ा ठिकड़ा, सोनिया की बैठक में हंगामा

कॉन्ग्रेस पार्टी की आंतरिक कलह की वजह से बुरी स्थिति है। गुरुवार (जुलाई 30, 2020) को पार्टी के राज्यसभा सांसदों की बैठक बुलाई गई थी, जिसके बाद से ही कलह और तेज़ हो गई है। जहाँ कई युवा नेता 10 साल की यूपीए सरकार के मत्थे सारा दोष मढ़ रहे हैं वहीं वरिष्ठ नेता पूर्व पीएम डॉक्टर मनमोहन सिंह के पक्ष में गोलबंदी कर रहे हैं। ताज़ा राजनीतिक स्थित पर रणनीति बनाने के लिए कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने 34 सांसदों के साथ बैठक की थी।

लेकिन, एक वरिष्ठ सांसद ने सोनिया गाँधी के सामने ही पार्टी में महत्वपूर्ण मुद्दों को लेकर सहमति न होने की बात कह कर हंगामा मचा दिया। वर्चुअल बैठक में उक्त नेता ने कहा कि पार्टी को आत्ममंथन की ज़रूरत है। वहीं बैठक में मौजूद युवा सांसदों ने मनमोहन सिंह की सरकार पर सारा ठिकड़ा फोड़ दिया। उनका कहना है कि पार्टी की मौजूदा स्थिति के लिए यूपीए सरकार ही दोषी है।

मनमोहन सिंह सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे दो नेताओं के बीच भी झगड़ा हुआ, जो बताता है कि 2014 में सत्ता जाने के बाद से ही पार्टी में बड़ी फूट पड़ी हुई है। मनीष तिवारी ने आरोप लगाया कि यूपीए को उसके अंदर के लोगों ने ही जानबूझ कर नुकसान पहुँचाया, जिससे उसे 2019 के लोकसभा चुनावों में बुरी हार मिली। शनिवार को मनीष तिवारी ने बयान दिया कि 10 वर्षों तक सत्ता से बाहर रहने के बावजूद एक भी भाजपा नेता ने अटल बिहार वाजपेयी की सरकार की आलोचना नहीं की।

उन्होंने मनमोहन सिंह पर आरोप लगाने वाले कॉन्ग्रेस नेताओं को अज्ञानी करार दिया। सबसे बड़ी बात ये कि उन्होंने ट्विटर पर ये बयान दिया, कॉन्ग्रेस की बैठक में नहीं। कॉन्ग्रेस नेताओं मिलिंद देवड़ा, शशि थरूर और आनंद शर्मा ने मनीष तिवारी का समर्थन किया। देवड़ा ने कहा कि डॉक्टर मनमोहन सिंह ने पद छोड़ते समय कहा था कि इतिहास उनके साथ न्याय करेगा लेकिन किसने सोचा था कि उनकी उपस्थिति में उनकी अपनी ही पार्टी के नेता उन पर निशाना साधेंगे।

वहीं शशि थरूर ने कहा कि यूपीए सरकार का एक दशक बदलाव का वाहक था लेकिन अलग नैरेटिव बना कर उसे तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया। उन्होंने हार से सीख लेकर कॉन्ग्रेस के पुनरुत्थान की बात कही। उन्होंने सलाह दी कि कॉन्ग्रेस वैचारिक दुश्मनों के हाथों में न खेलें। वहीं आनंद शर्मा ने तो सोनिया-मनमोहन की तारीफों के पुल ही बाँध दिए। उन्होंने विकास के लिए उन्हें ही श्रेय दिया।

उन्होंने कहा कि भाजपा अब यूपीए को श्रेय दे, ऐसा किसी की आकंक्षा नहीं है लेकिन पार्टी के नेताओं को अपनी ही सरकार की आलोचना से बचना चाहिए। वहीं सातव ने कहा कि सोशल मीडिया पर पार्टी के कुछ नेता इन मुद्दों पर बात कर रहे हैं, जो सही नहीं है। उन्होंने बैठक में टकराव की बात को नकारते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस ने समय-समय पर पार्टी नेताओं को बोलने के लिए मंच मुहैया कराया है।

बैठक में शामिल होने वाले एक और नेता का कहना था कि राहुल गाँधी पूरा प्रयास कर रहे हैं। इसके बावजूद हालात वैसे के वैसे ही बने हुए हैं। कॉन्ग्रेस सरकार में पूर्व मंत्री पी चिदंबरम ने कहा “पार्टी का संगठन ज़िला और मंडल स्तर पर कमज़ोर है।” वहीं दूसरी तरफ कपिल सिब्बल ने कहा कि पार्टी को इसकी अंतिम पंक्ति तक निरीक्षण की ज़रूरत है। उनके मुताबिक़ संगठन के हर व्यक्ति को सिरे से सोचना चाहिए कि ऐसा क्यों हो रहा है।  

27 साल से कर रही थीं अपने राम को छत मिलने का इन्तजार, भूमिपूजन के बाद अब अन्न ग्रहण करेंगी 81 वर्षीय उर्मिला

भगवान राम पूरे देश की आस्था के केंद्र हैं और उनके मंदिर को लेकर आम जनमानस की भावनाएँ किसी से छिपी नहीं है। अब जब बुधवार (अगस्त 5, 2020) राम मंदिर के भूमिपूजन के साथ ही इसकी नींव डाल दी जाएगी और इसके निर्माण की शुरुआत हो जाएगी, मध्य प्रदेश स्थित जबलपुर की एक ऐसी महिला हैं, जो उस दिन अन्न ग्रहण करेंगी। 81 साल की उर्मिला चतुर्वेदी ने 27 साल पहले शपथ ली थी कि वो तब तक अन्न ग्रहण नहीं करेंगी, जब तक अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की शुरुआत नहीं हो जाती।

अब वो घड़ी आ गई है। राम मंदिर के लिए सदियों से संघर्ष चल रहा था और इस यज्ञ में आहुति देने वालों में जहाँ कइयों के नाम लोगों को मालूम हैं, वहीं उर्मिला चतुर्वेदी जैसे भक्त भी हैं, जो अपनी अलग ही लड़ाई लड़ रहे थे और उन्हें अपनी आस्था पर पूरा भरोसा था। नवंबर 2019 में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उन्हें राहत मिली और अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राम मंदिर भूमिपूजन के बाद उनके स्वप्न पूरे होंगे।

उर्मिला चतुर्वेदी का कहना है कि उनका शरीर भले ही कमजोर हो गया हो लेकिन उनका संकल्प अभी भी चट्टान की तरह मजबूत है। शायद तभी उम्र के इस पड़ाव तक वो अपने राम को छत मिलने का इन्तजार करती रहीं। जब 1992 में बाबरी ढाँचे को कारसेवकों द्वारा ध्वस्त किया गया था, तभी उन्होंने भीष्म प्रतिज्ञा कर ली थी कि जब तक वहाँ भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर के निर्माण की शुरुआत नहीं हो जाती, वो अन्न नहीं खाएँगी।

उर्मिला चतुर्वेदी इतनी उत्साहित हैं कि वो अपने परिजनों को अयोध्या चल कर इस ऐतिहासिक पल का भागी बनने के लिए राजी करने पर तुली हैं। लेकिन कोरोना संक्रमण आपदा और लॉकडाउन का हवाला देकर परिजन किसी तरह उन्हें मना रहे हैं और बाद में अयोध्या ले जा कर रामलला के दर्शन कराने का आश्वासन दे रहे हैं। दरअसल, राम मंदिर को लेकर हुए हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष से उर्मिला चतुर्वेदी काफी दुःखी रहती थीं।

उर्मिला चतुर्वेदी का कहना है कि भले ही वो शारीरिक रूप भूमिपूजन में नहीं जा पा रही हैं लेकिन मन से तो वो वहाँ पर मौजद रहेंगी ही। वो चाहती हैं कि अयोध्या में उन्हें भी कोई जगह मिल जाए, जहाँ रह कर वो अपने राम की शरण में जाकर उनकी आराधना करती रहें। वो अपना बाकी जीवन राम की शरण में बिताना चाहती हैं और अयोध्या मंदिर से अच्छी जगह उनके लिए दुनिया में कहीं भी नहीं है।

उर्मिला चतुर्वेदी की इस तपस्या में उनके परिजन भी उनके साथ थे, जिन्होंने उनका पूरा सहयोग किया। उनके परिजन भी चाहते हैं कि अब जब राम जन्मभूमि में मंदिर का स्वप्न साकार हो रहा है तो वो जल्दी ही अन्न ग्रहण करना शुरू कर दें। उर्मिला कहती हैं कि इन 27 सालों में वो समाज और लोगों से भी दूर चली गई थीं, कई लोग उन पर दबाव बना रहे थे कि वो अपना उपवास ख़त्म कर दें लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

कई बार मंचों पर भी सम्मानित किया जा चुका है उर्मिला चतुर्वेदी को। हालाँकि, उनके रिश्तेदारों और समाज के लोगों में कई लोग ऐसे भी थे, जिन्होंने उनकी रामभक्ति को देख कर उनके उपवास का समर्थन किया। आजकल वो पूरा दिन राम मंदिर से जुडी ख़बरें ही देखती रहती हैं। वो दिन भर पूजा-पाठ में व्यस्त रहती हैं और टीवी पर राम मंदिर से जुड़ी ख़बरें देखती हैं। उनके परिजनों की योजना है कि उन्हें अयोध्या ले जाकर सरयू किनारे संकल्प तुड़वाया जाए।

इसी तरह बिहार के किशनगंज में ऐसे ही एक राम भक्त हैं, जिन्होंने 18 साल पहले यह प्रण लिया था कि जब तक अयोध्या में राम मंदिर नहीं बन जाता तब तक वो नंगे पाँव रहेंगे। दास किशनगंज में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के ज़िला कार्यकारी होने के साथ ही एक किराने की दुकान भी चलाते हैं। देव दास अब तक 1800 से अधिक लोगों के दाह-संस्कार में शामिल हो कर ख़ुद काम करते हैं।

पहले शिव भक्त, फिर राम भक्त और अब हनुमान भक्त बने कमलनाथ: MP में हनुमान चालीसा पढ़ेगी कॉन्ग्रेस

मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कॉन्ग्रेस नेता कमलनाथ 4 अगस्त के दिन एक बड़े आयोजन की योजना बना चुके हैं। 5 अगस्त के दिन होने वाले राम मंदिर के भूमि पूजन से एक दिन पहले वह भोपाल स्थित अपने आवास पर हनुमान चालीसा का पाठ कराएँगे। 

इतना ही नहीं इस दिन मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस के तमाम नेता अपने घरों या स्थानीय मंदिरों में हनुमान चालीसा का पाठ करेंगे। इस दौरान वह सामाजिक दूरी से संबंधित अहम दिशा निर्देशों का भी ध्यान रखेंगे। 

साल 2018 के विधानसभा चुनावों के बाद कॉन्ग्रेस पार्टी ने “सॉफ्ट हिंदुत्व” के एजेंडे पर चलने का पूरा प्रयास किया है। ऐसा मध्य प्रदेश में काफी हद तक नज़र आता है। विधानसभा चुनावों के मतदान के दौरान मुख्यमंत्री पद के दावेदार कमलनाथ को संगठन ने “हनुमान भक्त” के तौर पर ही दर्शाया था। इसके बाद वह “राम वन गमन पथ योजना” जैसी नीति लेकर आए। सत्ता में आने के बाद राज्य में गौशालाएँ बनवाई और मंदिरों का नवीनीकरण तक कराया। 

कुछ ही दिनों पहले कमलनाथ ने राम मंदिर के भव्य निर्माण का स्वागत किया था। उन्होंने शुक्रवार (जुलाई 31, 2020) के दिन एक वीडियो संदेश जारी किया था। उसमें उन्होंने कहा कि देशवासियों को लम्बे समय से इसकी अपेक्षा और आकांक्षा थी। मंदिर निर्माण हर भारतीय की सहमति से हो रहा है और यह केवल भारत में ही संभव है। 

इस वीडियो में कमलनाथ के पीछे भगवान हनुमान की तस्वीर भी नजर आ रही थी। कभी अपने को हनुमान भक्त और कभी शिवभक्त दिखाने वाले कमलनाथ अब राम भक्त के रूप में नज़र आ रहे थे। लेकिन कमलनाथ द्वारा श्रीराम मंदिर के समर्थन में दिया गया बयान एक विशेष समुदाय के लोगों को रास नहीं आई। ट्विटर पर ही कमलनाथ के इस वीडियो में कुछ लोगों ने कमेंट में लिखा है कि यह सभी भारतीयों की सहमति से नहीं बना है।

एक ट्विटर यूजर फ़राज़ ने कमलनाथ के इस वीडियो के जवाब में लिखा है कि राम मंदिर पर आपके इस नजरिए का अंजाम आपको अगले चुनाव में भुगतना पड़ेगा। वहीं, आफताब अहमद मलिक ने इस वीडियो के जवाब में बेहद निराशाजनक भाव में लिखा है कि वो MP कॉन्ग्रेस से नफरत करते हैं और अब तक वो कमलनाथ के समर्थक थे, लेकिन अब से नहीं हैं।

‘काकावाणी’ ट्विटर हैंडल से पोस्ट करने वाले अली सोहराब ने कमलनाथ का यह वीडियो शेयर करते हुए लिखा है – “सेक्युलरिज्म”। अली सोहराब के इस ट्वीट के जवाब में शेख अजहरुद्दीन ने कमलनाथ पर अपना आक्रोश व्यक्त करते हुए लिखा है कि अच्छा हुआ मध्य प्रदेश में इनकी सरकार गिर गई और अब राजस्थान के साथ ही बाकी राज्यों में भी गिर जानी चाहिए।

हाल ही में कमलनाथ ने भोपाल में बड़े पैमाने पर सार्वजनिक रूप से हनुमान चालीसा का पाठ कराया था। वहीं दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी ने कॉन्ग्रेस के इस कदम को दिखावा बताया था। भाजपा प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल ने आज तक से इस बारे में बातचीत की थी। उनका कहना था कि “कॉन्ग्रेस ने हमेशा राम के अस्तित्व को खारिज है। राम सेतु को काल्पनिक बताया है अब राम का नाम जप रही है। कॉन्ग्रेस के लिए यह बहुत अच्छा होगा अगर वह “श्रीराम” को सिर्फ चुनाव और और उपचुनाव के दौरान न याद करें।”  

‘मैं 2 बार दिल्ली गया, बहन से मिला, मेडिकल चेकअप कराया…’ फिर भी NDTV और राहुल गाँधी फैला रहे झूठ

शुक्रवार के दिन जम्मू कश्मीर प्रशासन ने कॉन्ग्रेस पार्टी द्वारा फैलाए जा रहे झूठ का खंडन किया है। ख़ास कर राहुल गाँधी ने जिस तरह कॉन्ग्रेस के पूर्व सांसद सैफुद्दीन सोज़ को घर में नज़रबंद किए जाने पर झूठ और भ्रम फैलाया था। यह विवाद बुधवार के दिन शुरू हुआ, जब कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता सैफुद्दीन सोज़ ने आरोप लगाया।  

उन्होंने आरोप लगाया था कि पिछले साल 5 अगस्त के बाद से वह अपने घर में नज़रबंद किए गए हैं। जब केंद्र सरकार ने जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाया था। जिसके तहत जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा मिला हुआ था। इसके बाद सैफुद्दीन सोज़ की पत्नी मुमताज़निसा बुधवार के दिन सर्वोच्च न्यायालय में हेबस कॉर्पस पेटीशन (बन्दी प्रत्यक्षीकरण याचिका) दायर की थीं। याचिका में यह कहा गया था कि उन्हें 5 अगस्त 2019 को गिरफ्तार किया गया था लेकिन गिरफ्तारी का आधार स्पष्ट नहीं किया गया था।  

इस पर जम्मू कश्मीर प्रशासन ने सर्वोच्च न्यायालय के सामने अपना पक्ष रखा। उसमें जम्मू कश्मीर प्रशासन ने कहा कि सैफुद्दीन सोज़ न तो गिरफ्तार किए गए हैं और न ही नज़रबंद किए गए हैं।  इसके अलावा जम्मू कश्मीर के गृह विभाग ने यह भी कहा कि उन पर किसी भी तरह की पाबंदी नहीं लगाई गई है। उन्हें कहीं भी जाने और घूमने की पूरी आज़ादी मिली हुई है। इस जानकारी के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने उस याचिका को खारिज कर दिया गया, जिसमें सैफुद्दीन की ग़ैरक़ानूनी तरीके से गिरफ्तारी की बात लिखी हुई थी।  

इस घटना के एक दिन बाद सैफुद्दीन सोज़ श्रीनगर स्थित फ्रेंड्स कॉलोनी में अपने घर की दीवार के पीछे नज़र आए। इसके बाद उन्होंने कहा पिछले साल 5 अगस्त के दिन जम्मू कश्मीर से विशेष राज्य का दर्जा हटाया गया। जिसके बाद आधिकारिक रूप से आदेश आया, जिसके आधार पर उनकी गिरफ्तारी हुई।

सैफुद्दीन सोज़ ने कहा:

“सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय से झूठ कहा है। अगर मैं आज़ाद हूँ और मुझ पर कोई पाबंदी नहीं है तो मुझे बाहर निकलने दिया जाए, असल में मैं आज़ाद नहीं हूँ। मेरे पास पास पुलिसकर्मी मौजूद हैं और उनका कहना है कि उन्हें ऊपर से आदेश मिले हुए हैं।”

इस नाटकीय घटना के बाद कॉन्ग्रेस पार्टी इस मामले में कूद पड़ी। उन्होंने सैफुद्दीन मामले को मोदी सरकार पर हमला करने का ज़रिया बना लिया। समाचार चैनल एनडीटीवी ने इस मामले से जुड़ा एक एडिटेड वीडियो तक साझा कर दिया। जिसमें वह ऐसा दिखा रहे थे कि जम्मू कश्मीर प्रशासन ने सैफुद्दीन को गिरफ्तार या नज़रबंद किया है। जबकि एनडीटीवी पर इस तरह फ़र्ज़ी ख़बरें फैलाने का आरोप लगता रहा है। एनडीटीवी द्वारा साझा किए गए वीडियो में ऐसा दिखाया गया था कि सैफुद्दीन को उनके घर से निकलने नहीं दिया गया था। वीडियो में वह जम्मू कश्मीर प्रशासन पर चिल्लाते हुए नज़र आ रहे थे।

इसके बाद और कोई नहीं बल्कि कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी खुद जनता के बीच झूठ फैलाने में लग गए। उन्होंने एनडीटीवी का यह वीडियो साझा करते हुए कॉन्ग्रेस नेता सैफुद्दीन सोज़ को रिहा करने की माँग की। वीडियो को ट्वीट करते हुए राहुल गाँधी ने लिखा, “गैर-कानूनी तरीके से हुई कश्मीर नेताओं की गिरफ्तारी का कोई आधार नहीं है। इससे सिर्फ और सिर्फ देश की छवि खराब होती है, उन्हें जल्द से जल्द रिहा किया जाए।” लेकिन इस वीडियो को भी जम्मू कश्मीर प्रशासन ने सिरे से खारिज कर दिया था।  

कॉन्ग्रेस नेता सैफुद्दीन सोज़ की तरफ से किए गए दावे के बाद जम्मू कश्मीर प्रशासन ने यह स्पष्ट किया। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में एक भी गलत तथ्य नहीं पेश किए। विचित्र बात यह थी कि खुद की गिरफ्तारी का दावा करने वाले सैफुद्दीन सोज़ इस दौरान दो बार दिल्ली गए थे। पहली बार अक्टूबर महीने में और दूसरी बार दिसंबर महीने में।

जम्मू कश्मीर सूचना विभाग के प्रधान सचिव रोहित कंसल ने इस बारे ट्वीट करके जानकारी भी साझा की थी। उन्होंने अपने ट्वीट में स्पष्ट किया कि सैफुद्दीन सोज़ दिल्ली गए थे। इसके अलावा उन्हें किसी भी समय, कहीं भी आने और जाने की आज़ादी थी। इस दौरान उनकी सुरक्षा का ध्यान हमेशा रखा जाता है।  

उल्लेखनीय बात यह है कि सैफुद्दीन को आधिकारिक तौर पर सुरक्षा मिली हुई है। उनके साथ हर समय गार्ड्स और सुरक्षाकर्मी मौजूद रहते हैं। सुरक्षा प्रोटोकोल को मद्देनज़र रखते हुए वह हमेशा उनके साथ रहते हैं। जबकि उन्होंने खुद इस बात की पुष्टि की थी कि वह दो बार दिल्ली जा चुके हैं।

समाचार समूह द हिन्दू से बात करते हुए उन्होंने कहा,

“5 अगस्त 2019 के बाद मैं दो बार दिल्ली गया था। इस दौरान मैं अपनी बहन से मिला था और अपना स्वास्थ्य परीक्षण भी कराया था। लेकिन इसके पहले मैं पुलिस से आधिकारिक तौर पर इजाज़त ली थी वह भी दिसंबर और अक्टूबर में। कई मौक़ों पर मेरी इजाज़त रद्द भी की गई थी।” 

सिर्फ इतना ही नहीं सोशल मीडिया पर एक वीडियो भी सामने आया। जिसमें सैफुद्दीन श्रीनगर की सड़कों पर आज़ाद घूमते हुए नज़र आ रहे थे। यह वीडियो गुरूवार का बताया जा रहा है। इसके कुछ ही समय बाद वह कहने लगे कि उन्हें अपने घर में नज़रबंद किया गया है। इस तरह के तमाम सबूतों के बावजूद पहले एनडीटीवी और उसके बाद राहुल गाँधी ने इस मुद्दे पर झूठ फैलाया। वह ऐसे मुद्दे पर झूठा दावा कर रहे हैं, जिस पर हर तरह की जानकारी पहले से ही मौजूद है।  

बिहार में बाढ़… लेकिन कॉन्ग्रेस ने शेयर की बंगाल की तस्वीर: लोगों ने कहा- वोट ना मिले तो EVM का रोना मत रोना

कॉन्ग्रेस पार्टी की स्थिति अब ये हो गई है कि वास्तविक समस्याओं के बारे में आवाज़ उठाने के लिए भी अब उसे पुरानी या फेक तस्वीरों का सहारा लेना पड़ रहा है। अबकी उसने बिहार में बाढ़ की समस्या को दिखाने के लिए किसी अन्य राज्य की पुरानी तस्वीर शेयर की। ये कारनामा बिहार कॉन्ग्रेस के आधिकारिक ट्विटर हैंडल द्वारा किया गया। पार्टी ने नीतीश कुमार की सरकार की आलोचना के लिए ऐसा किया।

बिहार कॉन्ग्रेस ने बाढ़ में सड़क पर फँसी गाड़ियों और एक महिला की तस्वीर शेयर करते हुए लिखा, “नीतीश कुमार का सुशासन पानी में तैर रहा है। मुजफ्फरपुर, भागलपुर, बिहार शरीफ और पटना को स्मार्ट सिटी बनाने की लिए चुना गया था, जो आज भी बरसात के पानी और जलभराव से परेशान है। बिहार का संकल्प, बदलाव ही विकल्प।” ध्यान से देखने पर पता चलता है कि तस्वीर में दिख रही गाड़ी का नंबर प्लेट पश्चिम बंगाल का है।

ट्विटर पर अंकुर सिंह ने कॉन्ग्रेस के इस झूठ का पर्दाफाश किया। उन्होंने स्टॉक फोटोग्राफी एजेंसी Alamy की वेबसाइट पर इस तस्वीर को खोज निकाला। दरअसल, ये तस्वीर बिहार की है ही नहीं। ये पश्चिम बंगाल की है। इसे वेबसाइट पर ‘बंगाल बाढ़’ की कैटेगरी में रखा गया है। जानकारी दी गई है कि ये हाल ही में आए ‘अम्फान’ तूफ़ान की फोटो है, जिसके कारण पश्चिम बंगाल में लोग सड़क पर फँसे हुए हैं।

ट्विटर यूजरों ने भी बिहार कॉन्ग्रेस को इस तस्वीर के लिए जम कर धोया। एक यूजर ने लिखा कि ये लोग पुरानी तस्वीरें शेयर करते हैं और जब जनता इन कारनामों के कारण इन्हें वोट नहीं देती तो ये ईवीएम हैक होने का रोना रोते हैं। बिहार कॉन्ग्रेस ने पश्चिम बंगाल और बिहार के बीच का अंतर ही नहीं समझा, जिससे लोग उससे नाराज़ दिखे। कॉन्ग्रेस के झूठ का पर्दाफाश होने के बाद उसकी जम कर आलोचना हुई।

जहाँ तक बिहार में बाढ़ की बात है, इसने सच में विकराल रूप ले लिया है और सरकार पूरी तरह विफल नज़र आ रही है। कुल 45 लाख लोग प्रभावित हैं। दरभंगा स्थित कुशेश्वर स्थान का पूरा थाना ही बाढ़ में डूबा हुआ है और एक पेड़ के नीचे से पुलिस का कामकाज चल रहा है। गोपालगंज और पूर्वी चम्पारण में बाँधों के टूटने के बाद लाखों लोग बेघर हो गए हैं। राहत कार्य न के बराबर हो रहे हैं और जनप्रतिनिधि जनता की सुध नहीं ले रहे।

इससे पहले मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेस के नेता जीतू पटवारी ने आरोप लगाया था कि देश की जनता के रुपयों से पीएम मोदी अपनी सुविधाएँ बढ़ा रहे हैं और वो भोग-विलास की वस्तुओं से लैस विमान में ही यात्रा करते हैं। जीतू पटवारी ने जिस 787 जेट की तस्वीर शेयर की थी, वो प्राइवेट है, पीएम मोदी की नहीं है। उसे दुनिया का पहला ‘787 ड्रीम जेट’ बताया गया है, जिसका प्रबंधन सितम्बर 2016 से ही डियर जेट नामक कम्पनी करती आ रही है। 

अयोध्या का वह जिला मजिस्ट्रेट, जिसने PM नेहरू के आदेश को दिखाया ठेंगा, इंदिरा ने जिन्हें डाला जेल में

सदियों के इंतजार के बाद अब अयोध्या 5 अगस्त को राम मंदिर भूमि पूजन के लिए तैयार हो गया है। रामजन्मभूमि के लिए कुछ कारसेवकों ने अपने प्राणों को भी रामलला के लिए दाँव पर लगा दिया था। उस वक़्त आंदोलन का नेतृत्व करने वाले और प्राण न्योछावर करने वाले लोगों की बस एक ही चाहत थी कि राम लला मंदिर में विराजमान हों।

अपने ही देश में भगवान राम को न्याय दिलाने के लिए हिंदुओं की पीढ़ियों द्वारा लंबे समय से चले आ रहे संघर्ष का समापन होने जा रहा है। उनका संकल्प अब पूरा होने जा रहा है। उसी आंदोलन के दौरान के ऐसे व्यक्ति ने इसमें हिस्सा लिया, जिन्होंने राजनीतिक दबावों के बीच अपने करियर को दाँव पर लगा कर राम मंदिर बनवाने का सपना देखा और प्रयास किया।

वह शख्स थे कंडांगलथिल करुणाकरण नायर, जिसे केके नायर के नाम से जाना जाता है। केके नायर का जन्म 11 सितंबर, 1907 को केरल में हुआ था। वह भारतीय सिविल सेवा अधिकारी थे और भारत के गणतंत्र बनने से पहले ही हिंदुओं की पूजा के मौलिक अधिकार की रक्षा करने में सबसे आगे थे।

उनका जीवन केरल के अलप्पुझा के कुट्टनाड गाँव से शुरू हुआ। केरल में अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद, नायर उच्च अध्ययन के लिए इंग्लैंड गए और 21 वर्ष की आयु में भारतीय सिविल सेवा (ICS) की परीक्षा उत्तीर्ण की। परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्हें 1 जून, 1949 को अयोध्या (फैजाबाद) के उपायुक्त सह जिला मजिस्ट्रेट के रूप में नियुक्त किया गया था।

अयोध्या का वह दौर उनकी जिंदगी का अहम हिस्सा बन गया था। नायर को राम जन्मभूमि मुद्दे पर एक रिपोर्ट करने के लिए उत्तर प्रदेश की राज्य सरकार की तरफ से एक पत्र मिला था। उस मुद्दे पर रिपोर्ट को प्रस्तुत करने के लिए उन्होंने अपने सहायक गुरु दत्त सिंह को भेजा। जिसके बाद 10 अक्टूबर, 1949 को सिंह ने अपनी रिपोर्ट में, उस स्थान पर एक राजसी राम मंदिर के निर्माण की सिफारिश की। सिंह ने स्थल का दौरा कर यह देखा कि उस स्थल के लिए हिंदू और मुस्लिम आपस में लड़ रहे थे।

उन्होंने लिखा, “हिंदू समुदाय ने इस आवेदन में एक छोटे के बजाय एक विशाल मंदिर के निर्माण का सपना देखा है। इसमें किसी तरह की परेशानी नहीं है। उन्हें अनुमति दी जा सकती है। हिंदू समुदाय उस स्थान पर एक अच्छा मंदिर बनाने के लिए उत्सुक है, जहाँ भगवान रामचंद्र जी का जन्म हुआ था। जिस भूमि पर मंदिर बनाया जाना है, वह नजूल (सरकारी भूमि) है।”

नेहरू का निर्देश, फिर भी नहीं झुके केके नायर

प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के निर्देश पर, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत ने राम मंदिर से हिंदुओं को बेदखल करने की कोशिश की। हालाँकि, केके नायर ने उन्हें वहाँ से भेजने से इनकार कर दिया और आदेश को लागू नहीं करने का फैसला किया। उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि हिंदू उस स्थल पर पूजा कर रहे हैं। उन्होंने मूर्तियों को साइट से हटाने से भी इनकार कर दिया। जिसके बाद नायर को गोविंद वल्लभ पंत ने जिला मजिस्ट्रेट के पद से निलंबित कर दिया।

इन सब के बाद केके नायर ने तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार के खिलाफ अदालत का रुख किया। अदालत ने मामले पर उनके पक्ष में फैसला सुनाया। नायर को वापस अपना आईसीएस अधिकारी का पद मिल गया। लेकिन उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया। यह फैसला उन्होंने नेहरू के खिलाफ बढ़ती नाराजगी को मद्देनजर रखते हुए लिया।

नायर ने नेहरू के सामने झुकने से इनकार कर दिया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री की खुली अवहेलना और लाखों हिंदुओं को न्याय दिलाने के उनके दृढ़ संकल्प की वजह से लाखों लोग उन्हें पसंद करने लगे थे। उनके व्यवहार की वजह से लोग उन्हें ‘नायर साहब’ कहते थे।

आईसीएस से इस्तीफा देने के बाद, उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक वकील के रूप में अभ्यास करना शुरू कर दिया। केके नायर और उनका परिवार अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए जनसंघ में शामिल हो गए। उनकी पत्नी शकुंतला नायर चुनाव लड़ीं और 1952 में उत्तर प्रदेश विधान सभा की सदस्य बनीं।

नायर और उनकी पत्नी दोनों 1962 में लोकसभा के सदस्य बने। दिलचस्प बात यह है कि उनके ड्राइवर को भी उत्तर प्रदेश की विधान सभा के सदस्य के रूप में चुना गया था। वहीं प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के कहने पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद द्वारा घोषित राष्ट्रीय आपातकाल के काले दिनों के दौरान नायर और उनकी पत्नी को गिरफ्तार भी किया गया था।

7 सितंबर 1977 को केके नायर का निधन हो गया। उन्होंने अपना जीवन जनसंघ और राम मंदिर के लिए समर्पित कर दिया। उत्तर प्रदेश राज्य में एक प्रतिष्ठित व्यक्ति होने के बावजूद उन्हें अपने गृह राज्य केरल में भी बहुत सम्मान और पहचान मिली।

केरल में राष्ट्रवादियों ने अपने गाँव में विश्व हिंदू परिषद द्वारा दान की गई भूमि पर उनका स्मारक बनाने का फैसला भी किया है। इसके अलावा केके नायर मेमोरियल चैरिटेबल ट्रस्ट के नाम से एक ट्रस्ट भी स्थापित किया गया है। कल्याणकारी गतिविधियों के अलावा, ट्रस्ट छात्रों के लिए सिविल सेवा उम्मीदवारों और छात्रवृत्ति के लिए प्रशिक्षण प्रदान करता है।

केके नायर द्वारा चलाए गए राम जन्मभूमि आंदोलन को लालकृष्ण आडवाणी, अशोक कुमार, कल्याण सिंह, विनय कटियार और उमा भारती जैसे बड़े नेताओं ने बाद में जारी रखा। 2019 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ऐतिहासिक फैसले के बाद, उसी स्थल पर राजसी राम मंदिर बनाने के लिए एक ट्रस्ट का गठन किया गया है, जिसके लिए नायर ने अपने करियर को भी समर्पित कर दिया था। यद्यपि केके नायर इस दुनिया में नहीं हैं, फिर भी आने वाले वर्षों में आंदोलन में किए गए उनके योगदान को याद रखा जाएगा।

जेल से अस्पताल, फिर स्पेशल वार्ड और अब बंगला… सजायाफ्ता लालू यादव के लिए RIMS में नई व्यवस्था

अरबों रुपए के बहुचर्चित चारा घोटाले के सजायाफ्ता आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव को राँची के रिम्स स्थित पेइंग वार्ड से शिफ्ट करने की तैयारी शुरू हो चुकी है। कोरोना संक्रमण और सुरक्षा के मद्देनजर लालू प्रसाद को पेइंग वार्ड से अस्पताल परिसर में ही स्थित रिम्स निदेशक के बंगले में शिफ्ट किया जाएगा।

लालू प्रसाद यादव को रिम्स निदेशक के बंगले में शिफ्ट करने की तैयारियों को लेकर शुक्रवार को राँची सिटी एसपी सौरव कुमार ने बंगले का निरीक्षण किया और वहाँ सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लिया। इस दौरान पत्रकारों से बातचीत करते हुए सिटी एसपी ने बताया कि रिम्स प्रबंधन द्वारा कोरोना संक्रमण के बढ़ते मामले और सुरक्षा कारणों से लालू प्रसाद को शिफ्ट करने का प्रस्ताव जिला प्रशासन को दिया गया था।

पिछले दिनों लालू प्रसाद के तीन सेवादारों की कोरोना टेस्ट की रिपोर्ट पॉजिटिव आई थी, जिसकी वजह उन्हें संक्रमण का खतरा और बढ़ गया है। लालू प्रसाद यादव को शिफ्ट करने को लेकर जिला प्रशासन और रिम्स प्रबंधन इसकी तैयारियों में जुटा है। बंगले की साफ-सफाई तेजी से की जा रही है। इसके मद्देनजर सुरक्षा के सभी बिंदुओं की जाँच की जा रही है।

आपको बता दें कि कोरोना के खतरे को देखते हुए लालू प्रसाद यादव को डायरेक्टर के बंगले में शिफ्ट करने की सिफारिश डॉक्टर उमेश द्वारा की गई थी। जिसके बाद रिम्स निदेशक और अधीक्षक की ओर से लालू यादव की शिफ्टिंग को लेकर रांची के होटवार जेल प्रशासन, जेल आईजी, रांची एसएसपी को इस संबंध में पत्र लिखा था।

वहीं मीडिया रिपोर्ट के अनुसार लालू प्रसाद यादव को शिफ्ट करने के लिए प्रशासनिक अनुमति मिल गई है। अब बस थोड़ी बहुत प्रशासनिक प्रक्रिया बाकी है, जिसे जल्द ही पूरा कर लालू प्रसाद यादव को शिफ्ट कर दिया जाएगा।

लालू यादव वर्तमान में रिम्स के पेइंग वार्ड के पहले तल्ले में भर्ती हैं। जबकि पेइंग वार्ड के चौथे तल्ले में कोविड वार्ड है। वहीं, बीते दिनों लालू प्रसाद यादव की कोविड जाँच की गई थी, जिसमें रिपोर्ट नेगेटिव आई थी।

पंजाब में जहरीली शराब से 86 की मौत: 100 जगह छापेमारी, CM अमरिंदर ने 13 अधिकारियों को किया सस्पेंड

पंजाब में ज़हरीली शराब की वजह से 86 लोगों की मौत हो गई है। पंजाब सरकार ने इस मामले में एक्शन लेते हुए 6 एक्साइज अधिकारियों और 4 अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया है। इनमें से 2 डीएसपी लेवल के अधिकारी हैं और 2 SHO हैं। 86 लोगों की मौत के बाद इन अधिकारियों के खिलाफ जाँच के भी आदेश दे दिए गए हैं। मृतकों में 3 जिलों के लोग शामिल हैं। विपक्ष ने सरकार की आलोचना की है।

पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह ने सभी मृतकों के पीड़ित परिवारों को दो-दो लाख मुआवजा देने का भी ऐलान किया है। मरने वालों में सबसे ज्यादा तरण तारन के हैं, जहाँ के 63 लोगों की मौत हुई है। इसे बाद अमृतसर ग्रामीण क्षेत्र के 12 और गुरदासपुर के 1 व्यक्ति की मौत हुई है। सीएम ने कहा कि इन मौतों के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त एक्शन लिया जाएगा। उन्होंने कहा कि एक्साइज और पुलिस विभाग की लापरवाही से ज़हरीली शराब की बिक्री हुई, जो बेशर्मी वाली हरकत है।

पंजाब पुलिस का कहना है कि नकली शराब से मौत के पहले 5 मामले बुधवार (जुलाई 29, 2020) की रात अमृतसर के तारसिक्का के तांगड़ा और मुच्छल गाँव से सामने आए थे। इसके बाद लगातार मरने वालों की संख्या बढ़ती ही रही है। अभी आँकड़ों के और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है, जो कहीं से भी ठीक नहीं है। कई कई पीड़ितों के परिवार तो अपने बयान दर्ज करने के लिए भी आगे नहीं आ रहे थे।

हालाँकि, पुलिस का कहना है कि उन परिवार वालों को ऐसा करने के लिए मना लिया गया है। कइयों का तो पोस्टमॉर्टम तक नहीं हो पाया है। पीड़ित परिवारों का कहना है कि वो इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं चाहते हैं, जो अजीब है। डिप्टी कमिश्नर मोहम्मद इश्फाक का कहना है कि कई परिवारों ने तो इस बात को स्वीकार करने से भी इनकार कर दिया है कि उनके परिजनों की मौत ज़हरीली शराब से हुई है।

परिवार वाले कह रहे हैं कि उनके परिजनों की मौत हार्ट अटैक से हुई है, इसका ज़हरीली शराब से कोई लेनादेना नहीं है। ‘नवभारत टाइम्स’ की ख़बर के अनुसार, अमृतसर के एसएसपी (ग्रामीण) विक्रमजीत सिंह दुग्गल ने बताया कि तारसिक्का थाना के प्रभारी विक्रमजीत सिंह को निलंबित कर दिया गया है। विपक्षी आम आदमी पार्टी का कहना है कि मजिस्ट्रेट जाँच से कुछ नहीं होने वाला है। साथ ही मुख्यमंत्री के इस्तीफे की माँग की।

विपक्षी पार्टी शिरोमणि अकाली दल ने माँग की है कि इस मामले की जाँच पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की निगरानी में कराई जाए, ताकि सच्चाई समाने आ सके और दोषियों को सज़ा मिले। कुछ परिवारों ने तो पुलिस को सूचना दिए बिना ही शवों का अंतिम संस्कार तक कर दिया है। पुलिस ने अब तक इस मामले में कुल 17 लोग को गिरफ्तार करने में सफलता पाई है। अन्य आरोपितों की तलाश जारी है। 100 से भी अधिक जगह छापेमारी हुई है।

‘मेरे घर के पास विदेशी हथियार से चलाई गोली, फिर भी नहीं डरूँगी’ – आदित्य ठाकरे पर कॉमेंट के बाद कंगना

बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत की टीम ने शुक्रवार (जुलाई 31, 2020) देर रात पुलिस में शिकायत दर्ज की है कि उनके मनाली स्थिति घर के पास फायरिंग की आवाज सुनी गई। कंगना रनौत इन दिनों मनाली में अपने परिवार के साथ घर पर हैं और अभिनता सुशांत सिंह राजपूत डेथ केस में मुखर होकर अपनी आवाज उठा रही हैं।

कंगना की टीम ने बताया है कि फायरिंग की आवाज के बाद कुल्लू पुलिस कंगना के घर पहुँच गई है। हालाँकि शुरुआती जाँच में पुलिस को कोई भी सबूत नहीं मिले हैं। लेकिन कंगना का कहना है कि यह उन्हें डराने की कोशिश के तहत किया गया है। इसके बाद पुलिस ने एक टीम कंगना के घर पर सुरक्षा के लिए लगा दी है।

कंगना रनौत ने इस मामले में बात करते हुए कहा, “मैं अपने बेडरूम में थी और रात लगभग 11.30 बजे मुझे पटाखों जैसी अवाज सुनाई दी। पहले मुझे लगा कि किसी ने पटाखा चलाया है लेकिन जब दूसरी बार अवाज आई तो मैं सचेत हो गई क्योंकि यह गोली चलने की आवाज थी। इस समय मनाली में टूरिस्ट भी नहीं आते हैं तो कोई पटाखा भी नहीं चलाएगा। इसलिए मैंने तुरंत सिक्यॉरिटी को बुलाया।”

वो आगे कहती हैं, “मैंने जब उनसे पूछा तो उन्होंने बताया कि हो सकता है कि कुछ बच्चे हों। हम जाकर देखेंगे कि यह पटाखों की आवाज है या किसी और चीज की। हो सकता है कि उन्होंने कभी बुलेट (गोली) की आवाज ना सुनी हो लेकिन मैंने सुनी है। वो देखने के लिए गए लेकिन कोई मिला नहीं। हम यहाँ पांँच लोग थे। जो लोग मेरे साथ थे, सबको यही लगता है कि यह गोली की आवाज थी। यह पटाखों की आवाज नहीं थी और इसलिए हमने पुलिस को बुलाया।”

कंगना ने आगे कहा, “पुलिस ने कहा कि शायद कोई चमगादड़ को मारने की कोशिश कर रहा हो क्योंकि चमगादड़ सेब की खेती को नुकसान पहुँचाते हैं। शनिवार सुबह हमने सेब के बगीचे के मालिक को बुलाया लेकिन उनका कहना था कि उन्होंने कोई गोली नहीं चलाई। इसलिए हमें लगता है कि यह हमें डराने के लिए किया गया था।”

कंगना ने ये भी आरोप लगाया है कि उनके पॉलिटिकल कॉमेंट के कारण यह सब हो रहा है। कंगना ने यह भी दावा किया कि यह किसी विदेशी हथियार से चलाई गई गोली थी। कंगना का यह भी कहना है कि इसके बाद भी वह डरेंगी नहीं।

अभिनेत्री ने आरोप लगाया कि उनको डराने के लिए उन लोगों के द्वारा गोलियाँ चलाई गईं, जिन्हें उनके ‘गुंडागर्दी’ के लिए जाना जाता है। उन्होंने दावा किया कि एक मुख्यमंत्री के बेटे के खिलाफ उनकी टिप्पणी ने राजनीतिक समूह को परेशान कर दिया होगा। कंगना रनौत ने आरोप लगाया कि उनके घर के पास आने के लिए किसी को 7000-8000 देकर ये काम सौंपा गया होगा।

वो कहती हैं कि मुख्यमंत्री के बेटे के खिलाफ बोलने के बाद ये होगा, यह कोई संयोग नहीं है। उनसे अब लोग कह रहे हैं कि अब वो लोग उनका मुंबई में रहना मुश्किल कर देंगे।

उन्होंने दावा किया कि सुशांत सिंह राजपूत को भी इसी तरह से डराया गया होगा। कंगना ने कहा कि वह उनकी रहस्यमयी मौत के बारे में सवाल पूछती रहेंगी। उन्होंने कहा कि पिछले काफी दिनों से मिल रही धमकियों से डरे उनके बूढ़े माता-पिता अब उन पर इस मामले में न बोलने के लिए दबाव डाल रहे हैं।

मनाली पुलिस स्टेशन के एसएचओ, संदीप पठानिया ने कहा, “रात में पुलिस की तैनाती हुई थी। लेकिन अब, शुरुआती जाँच के बाद, उस क्षेत्र में गश्त करने वाले कर्मचारियों को सतर्क रहने का निर्देश दिया गया है। क्षेत्र के बीट कर्मचारी नियमित रूप से स्थिति का जायजा लेंगे। वे नियमित अंतराल पर कंगना के कर्मचारियों के साथ समन्वय करेंगे।”

गौरतलब है कि अभिनेत्री कंगना रनौत ने उद्धव ठाकरे की शिवसेना-एनसीपी-कॉन्ग्रेस सरकार पर बड़ा आरोप लगाते हुए कहा था कि सुशांत सिंह राजपूत आत्महत्या मामले में मुंबई पुलिस फिल्म निर्देशक करण जौहर को कभी पूछताछ के लिए नहीं बुलाएगी, क्योंकि वे आदित्य ठाकरे के बेस्ट फ्रेंड हैं।

टीम कंगना ने कहा था, “वे उन्हें कभी नहीं बुलाएँगे, क्योंकि वे आदित्य ठाकरे के बेस्ट फ्रेंड हैं। यह उनकी सरकार है और उन्होंने कंगना के इंटरव्यू से पहले ही यह केस बंद कर दिया। यह इस बात का सबूत है कि वे अपने दोस्तों को बचा रहे हैं।”

सुशांत की मौत पर बहस को नसीरुद्दीन शाह ने बताया बचकाना, कहा- हम अपने गंदे अंडरवियर सार्वजनिक रूप से क्यों धो रहे हैं?

अभिनेता नसीरुद्दीन शाह का कहना है कि सुशांत सिंह राजपूत की मौत को लेकर उग्र हो रही बहस हर दिन प्रतिदिन और अधिक बचकाना हो रहा है। उन्होंने यह बातें फिल्म कम्पैनियन के अनुपम चोपड़ा के साथ हुई बाचतीत में कही।

यह पूछे जाने पर कि क्या उन्हें लगता है कि इस तरह की बहस से किसी तरह का वास्तविक बदलाव आएगा, नसीरुद्दीन शाह ने कहा, “इसके लिए कोई उम्मीद ही कर सकता है, हालाँकि बहस का स्तर हर दिन लगातार बचकाना हो रहा है और मैं इसे पूरी तरह से अनावश्यक मानता हूँ। हम अपने गंदे अंडरवियर को सार्वजनिक रूप से क्यों धो रहे हैं?”

उन्होंने आगे कहा, “जो अभिनेता अब कंटेंट बन गए हैं, वो अब क्यों शिकायत कर रहे हैं कि वो पोस्टर पर नहीं हैं? क्यों कोई अभिनेता किसी खास फिल्म के ना मिलने को लेकर शिकायत कर रहे हैं। बहुत सारे अभिनेता को नहीं मिली। अगर हम में से हर कोई शिकायतें करने लगेगा तो फिल्म इंडस्ट्री पृथ्वी पर सबसे खराब जगह की तरह मालूम पड़ेगा। और मैं इसे कहने की हिम्मत रखता हूँ कि ये किसी भी इंडस्ट्री की सच्चाई है। मुझे उम्मीद है कि लोग सुशांत को अकेला छोड़ देंगे।”

बताया जा रहा है कि नसीरुद्दीन शाह शायद अभिनेता दीपक डोबरियाल के बारे में बात कर रहे थे, जिन्होंने हाल ही में उन सभी फिल्मों के पोस्टर साझा किए, जिनमें वह नहीं थे।

बता दें कि बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत आत्महत्या मामले की जाँच सीबीआई को सौंपने का मुद्दा तूल पकड़ता जा रहा है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बाद अब बिहार के डीजीपी गुप्तेश्वर पांडे ने भी इस मसले पर अपना बयान दिया है। उन्होंने कहा कि वो सीबीआई जाँच की माँग नहीं करते हैं क्योंकि बिहार पुलिस जाँच करने में सक्षम है।

बिहार के डीजीपी गुप्तेश्वर पांडे ने कहा, “अगर सुशांत सिंह राजपूत के पिता चाहते हैं तो वह सीबीआई जाँच की माँग कर सकते हैं। हम सीबीआई जाँच की माँग नहीं कर रहे हैं क्योंकि बिहार पुलिस इस आत्महत्या मामले की जाँच करने में सक्षम है।”

उल्लेखनीय है कि सुशांत के पिता केके सिंह द्वारा पटना के राजीवनगर थाने में एक एफआईआर दर्ज कराने के बाद इस आत्महत्या मामले की जाँच के लिए बिहार पुलिस की टीम मुंबई गई हुई है।

बिहार के डीजीपी ने कहा, “हमारी टीम मुंबई में है और हमारे वरिष्ठ एसपी वहाँ अपने समकक्ष के साथ लगातार संपर्क में हैं। शुक्रवार को हमारी टीम डीसीपी क्राइम से मिली और उन्होंने आश्वासन दिया कि वे सहयोग करेंगे। वे भी सुशांत सिंह राजपूत आत्महत्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रहे हैं। फिर वे हमें सभी दस्तावेज मुहैया कराएँगे।”

गौरतलब है कि इससे पहले जब बिहार पुलिस की टीम आरएन कूपर म्यूनिसिपल हॉस्पिटल में पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर के पास पहुँची थी तो डॉक्टरों ने रिपोर्ट से संबंधित कुछ भी बताने से इनकार कर दिया था। उन्होंने कहा कि वो मुंबई पुलिस को सुशांत की पोस्टमार्टम रिपोर्ट दे चुके हैं। उन्हें इसके बारे में जो भी बात करनी है, वो मुंबई पुलिस से करें। पटना आईजी ने भी इस बात की पुष्टि की थी कि बिहार पुलिस को अब तक सुशांत की पोस्टमार्टम रिपोर्ट नहीं मिली है।