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एक नारे से क्या होता है? ‘राम लला हम आएँगे, मंदिर वहीं बनाएँगे’ भी एक नारा ही था…

कई बार कहा जाता है कि नारों से क्या होता है? हाल में जब दिल्ली के किसी विश्वविद्यालय में लगे नारों का मामला पुलिस तक पहुँचा और देशभर में उनकी फजीहत होने लगी, तो कुछ लोगों ने कहा कि भला यूनिवर्सिटी के छात्रों के नारों से क्या असर होगा?

ऐसे ही कुछ भी बोल गए होंगे, जाने देना चाहिए। ऐसा कहने या सोचने वालों की इतिहास की जानकारी या तो कम होती है, या फिर वो शुद्ध धूर्तता कर रहे होते हैं। बरसों पहले 1986 में एम कॉम की पढ़ाई कर रहे एक छात्र ने भी नारा लगाया था। करीब पैंतीस वर्ष पहले लगा ये नारा आज तक भारत में गूँज रहा है।

पक्ष के लोग या कहें कि भक्त इसे उत्साहवर्धन के लिए लगाते रहे, और विपक्ष के लोग या कहें कि कमभक्त इसे मजाक उड़ाने के लिए इस्तेमाल करते रहे। मध्यप्रदेश के राजगढ़ से एम कॉम कर रहे छात्र ने बजरंग दल के एक शिविर में जब ये नारा लगाया, तो फिर ये नारा रुका ही नहीं। नारा था – ‘राम लला हम आएँगे, मंदिर वहीं बनाएँगे!”

विपक्षी कमभक्तों ने इसमें ‘तारिख नहीं बताएँगे!’ जोड़कर इसका चुटकुला भी बनाना चाहा। ये उनके पूज्य गोएबेल्स की एक प्रचलित तकनीक है, जिसमें विपक्षी के तर्कों का जवाब देने के बदले उनका मजाक बनाया जाता है। कमभक्तों ने गोएबेल्स से अच्छी शिक्षा पाई थी, और काफी सफलतापूर्वक गोएबेल्स की तकनीक का इस्तेमाल करने की कोशिश भी की।

उस वक्त के छात्र बाबा सत्यनारायण मौर्य अब पचपन साल के हैं। उन्होंने छह दिसंबर 1992 को अयोध्या में मंच संचालन भी किया था। उस वक्त वो आन्दोलन में प्रचार प्रमुख की भूमिका में थे। अयोध्या में उस दौर में दीवारों पर लिखे नारों और श्री राम और हनुमान जी के चित्रों में भी उनका काफी योगदान था।

वो अब भी पेंटिंग करते हैं और थोड़े दिनों में शायद उनकी प्रदर्शनी अयोध्या में भी होगी। लेकिन बात तो हम नारों की कर रहे थे। इन नारों में भी विशेष तौर पर ‘जय श्री राम’ के या इससे मिलते-जुलते दूसरे नारों से कई वर्गों को खासी समस्या रही है। कुछ मक्कार तो इसे श्री राम का नाम खराब करने की साजिश तक बताते रहे हैं।

राजपुताना रायफल्स का अस्तित्व जनवरी 10, 1775 है। भारतीय सेना के इस अंग के शौर्य की गाथाएँ और पदक तो अनगिनत हैं, लेकिन देखने योग्य उनका युद्ध उद्घोष है। वो ‘राजा रामचंद्र की जय’ के उद्घोष के साथ युद्ध में उतरते हैं। तो जैसा कि कुछ लोग साबित करना चाहते हैं, वैसे श्री राम का नाम कोई 1990 के दौर में युद्ध उद्घोष भी नहीं बना।

दूसरे तरीकों से भी देखें तो ‘जय श्री राम’ के उद्घोष के साथ लंका दहन करते हनुमान जी या लंका पर आक्रमण करती वानर सेना को लोग 1990 से थोड़ा पहले ही, रामानंद सागर के रामायण में देख चुके थे। ये अलग बात है कि कुछ लोगों ने इस नारे से चिढ़ना शुरू कर दिया तो बंगाल में ये नारा कई बार सुनाई दिया।

एक कोई लल्लू-पंजू से पोस्टर बॉय भी इस नारे को नारी विरोधी सिद्ध करने के प्रयास में ‘जय सियाराम’ कहने की वकालत करते दिखे थे। वैसे तो वो खुद स्त्रियों के साथ अभद्रता करने के कारण जुर्माना भर चुके हैं लेकिन हम नारे तक ही सीमित रहेंगे।

यहाँ गौर करने लायक ये है कि आप बड़ी आसानी से श्री राम या श्री कृष्ण कह सकते हैं। क्या उतना ही सुविधाजनक श्री को शिव, शंकर, महादेव या ब्रह्मा के आगे लगाना लगता है, या शिव जी, शंकर जी, ब्रह्मा जी कहना ठीक लगता है?

इसका साधारण सा कारण ये है कि ‘श्री’ लक्ष्मी का भी एक नाम होता है। इसलिए विष्णु के अवतारों के आगे तो वो आसानी से जुड़ता है, बाकियों पर जबतक किसी विशेष गुण को ना दर्शा रहा हो, तब तक नहीं जोड़ा जाता। तो जय सिया राम कहें या जय श्री राम, स्त्री का नाम पहले आ ही जाता है।

नारों, नामों, या प्रतीकों की महत्ता भारतीय तरीके से समझनी हो तो ‘राम से बड़ा राम का नाम’ वाली उक्ति याद रखिए। अगर इससे समझ ना आए तो ‘स्वास्तिक’ के प्रतीक को देखिए। हिटलर इससे मिलते-जुलते एक इसाई प्रतीक, मुड़े हुए क्रॉस (हकेन-क्रूज़) का इस्तेमाल करता था।

धूर्ततापूर्ण तरीके से इसे जबरन हिन्दुओं का ‘स्वास्तिक’ नाम दे दिया गया। इतने वर्षों में किसी ने विरोध नहीं किया, इसलिए कमभक्त इसे ‘स्वास्तिक’ घोषित करने में कामयाब भी हो गए। आज कई देशों में हकेन-क्रूज से मिलते जुलते दिखने वाले ‘स्वास्तिक’ के प्रयोग के लिए अकारण प्रताड़ित भी किया जाता है।

कुछ ऐसी ही नीचता, भक्त शब्द के साथ करने का (गोएबेल्स के नेमकालिंग वाला) करने का प्रयास तो हम सभी ने हाल ही में देखा है। बाकी जैसे-जैसे तिथि नजदीक आती जा रही है, कई लोग अगस्त में ही दीपावली मानाने की तैयारी में भी दिखते हैं। वैसे इससे हमें दूसरा वाला नारा – काशी-मथुरा बाकी है, याद आ जाता है, मगर उससे दीयों के बजाए कुछ और ही जलने लगेगा! नहीं?

मस्जिद की जगह अस्पताल और स्कूल बनवाए मुस्लिम समाज, हम भी पैसे देंगे: अयोध्या के संतों की अपील

देश की सबसे बड़ी अदालत ने सुन्नी वक्फ़ बोर्ड को मस्जिद बनाने के लिए अलग से ज़मीन दी थी। यह ज़मीन अयोध्या के धन्नीपुर गाँव, रौनाही में स्थित है। वक्फ़ बोर्ड ने साफ कर दिया है कि वह इस ज़मीन पर मस्जिद बनाएँगे। जिस पर साधू संतों ने प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि मुस्लिम समाज के लोग चाहें तो मिली हुई ज़मीन पर अस्पताल या विद्यालय बनवा सकते हैं। संत समाज इस पहल में उनकी आर्थिक मदद भी करेगा।  

दरअसल, सुन्नी सेंट्रल वक्फ़ बोर्ड ने मिली हुई ज़मीन पर ट्रस्ट का ऐलान कर दिया है। बोर्ड के चेयरमैन ज़ुफ़र अहमद फ़ारुखी ने बताया कि इस ट्रस्ट का नाम इंडो इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन होगा। ट्रस्ट के तहत ही उस ज़मीन पर मस्जिद का निर्माण कराया जाएगा। इस पर अयोध्या के संतों ने प्रतिक्रिया दी है। संतों का कहना है कि वह इसे गलत नहीं मानते हैं, उनकी मर्ज़ी वह मिली हुई ज़मीन पर कुछ भी बनवाएँ।  

करा सकते हैं विद्यालय या अस्पताल निर्माण  

इस मुद्दे पर राम जन्मभूमि के मुख्य पुजारी आचार्य सत्येन्द्र दास ने भी अपना मत रखा है। उन्होंने कहा उनका (वक्फ़ बोर्ड) का जो मन करे वह बनवाएँ। लेकिन बाबर के नाम की मस्जिद किसी भी सूरत में नहीं बनाई जा सकती है। अगर ऐसा होता है तो संत समाज इसका पूरी ताकत से विरोध करेगा।  

आचार्य सत्येन्द्र दास (चित्र साभार – न्यूज़ 18)

इसके अलावा तपस्वी छावनी के महंत परमहंस दास ने भी इस मुद्दे पर अपनी बात रखी है। उनका कहना है कि बाबर के नाम की मस्जिद पूरे देश में नहीं है। दान की भूमि पर मस्जिद का निर्माण नहीं किया जा सकता है, ऐसा होने पर मस्जिद में की गई दुआ कबूल नहीं होती है। नतीजतन मुस्लिम समाज को उस स्थान पर अस्पताल और विद्यालय खोलना चाहिए। अगर वह ऐसा करते हैं तो सबसे पहले हमारी तरफ से सवा लाख रूपए का दान तय है।  

स्वीकार नहीं बाबर के नाम की मस्जिद 

इसके अलावा उन्होंने कहा वक्फ़ बोर्ड को यह ज़मीन न्यायालय और सरकार से दान में मिली है। इस पर मस्जिद का निर्माण किया जाना सही नहीं है। यहाँ की जाने वाली कोई भी नमाज़ कबूल नहीं होगी, यह पूरी तरह इस्लाम के खिलाफ़ है। इसलिए ट्रस्ट को इस ज़मीन पर अस्पताल या विद्यालय का निर्माण कराना चाहिए। ऐसा करने पर सबसे पहले संतों की तरफ से आर्थिक मदद की जाएगी।  

पाकिस्तान होता तो घर से उठा लेता तेरी बेटी को: किडनैपर नरूल अंसारी ने कहा- 2 लाख दो वरना बांग्लादेश बेच देंगे

बिहार के बेगूसराय में दिनेश पंडित की बेटी को चार लोगों ने पिस्तौल के दम पर रास्ते से ही गाड़ी से उतारकर अगवा कर लिया। दिनेश पंडित की 15 वर्षीय बेटी को अगवा करते हुए मोहम्मद नरूल अंसारी ने उनसे कहा कि अगर यह पाकिस्तान होता, तो वह लड़की को घर से ही अगवा कर लेता। लड़की के पिता दिनेश द्वारा दर्ज शिकायत में नरूल के अलावा अन्य का नाम इज़मुल खान उर्फ ​​नज़्मुल उर्फ ​​आर्यन, मोहम्मद मुनफ़र अंजुम अंसारी उर्फ ​​चाँद मोहम्मद और फ़रत है।

ऑपइंडिया से बातचीत में बेगूसराय, बछवाड़ा थाना स्थित गाँव भिखम चक के पीड़ित दिनेश पंडित (42) ने बताया कि उन्होंने अपनी बेटी के अपहरण के सम्बन्ध में थाने में शिकायत दर्ज कराई है। दिनेश पंडित ने बताया कि 26 जुलाई की शाम 5 बजे वो अपनी बेटी को लेकर घर लौट रहे थे, उसी समय चार लोगों ने उनका रास्ता रोककर उनकी बेटी का पिस्तौल के बल पर अपहरण कर लिया।

दिनेश ने कहा- “बाजार से खरीददारी कर जब मैं घर लौट रहा था तो एक बिना नंबर प्लेट वाली बोलेरो गाड़ी ने हमें बहरामपुर पंचायत के मोड़ पर रोक लिया। चारों ने हमें पकड़ लिया और धमकाते हुए कहा कि साले पाकिस्तान होता तो घर से ही उठा लेते। ये चारों एक ही परिवार के थे।”

दिनेश पंडित ने कहा कि इस बात की सार्वजनिक चर्चा के बजाए जब वो आरोपित नज़्मुल के घर उसकी माँ से अपनी बेटी को वापस माँगने गए तो उसकी माँ हसीना खातून और वहाँ मौजूद अन्य लोगों ने उसके साथ मारपीट और उनकी पत्नी के जेवर छीन लिए।

दिनेश के अनुसार, हसीना खातून ने उनकी पत्नी से बदसलूकी करते हुए कहा – “जाती है कुतिया यहाँ से या नहीं? तेरी बेटी को बाजार में बेच दूँगी, वैश्या बना दूँगी।”

दिनेश ने बताया कि इससे पहले भी नज़्मुल और उसकी माँ इस तरह की हरकत कर चुके हैं, इस कारण वो इस बदसलूकी के दौरान चुप रहे। इसके अगले दिन बृहस्पतिवार (जुलाई 30, 2020) को एक आदमी दिनेश पंडित को अपनी बिना नम्बर प्लेट की मोटरसाइकिल पर बिठाकर ले गया और आधे रास्ते में रुककर उनसे कहा कि अगर उन्हें अपनी बेटी वापस चाहिए तो 2 लाख रूपए देने होंगे।

उसने कहा कि ये 2 लाख रूपए नज़्मुल की माँ हसीना खातून के पास जमा कराने होंगे वरना उनकी बेटी को बांग्लादेश बेच दिया जाएगा। फिलहाल दिनेश पंडित पुलिस थाने में हैं और इस बारे में जाँच की अपील कर रहे हैं। दिनेश की तीन बेटियों में जिसका अपहरण किया गया है, वो सबसे छोटी बेटी है। वह इस साल अपनी कक्षा 10 की परीक्षा में शामिल हुई थी। उसकी दोनों बहनों की शादी हो चुकी है। उसका कोई भाई नहीं है।

बछवाड़ा पुलिस स्टेशन के एक पुलिसकर्मी ने आज सुबह (31 जुलाई) बताया कि कल देर रात (संख्या 58/2020) मामले में एफआईआर दर्ज की गई थी। नामजद आरोपितों पर अपहरण और चोट पहुँचाने का मामला दर्ज किया गया है। इस मामले में आईपीसी की धारा 366, 323, 341, 379, 384 और 504 लगाई गई हैं। उन्होंने कहा कि पुलिस ने POCSO अधिनियम लागू नहीं किया है क्योंकि अभी जाँच जारी है।

पीड़िता के पिता दिनेश पंडित द्वारा दर्ज की गई शिकायत की कॉपी –

5 अगस्त राम मंदिर भूमि पूजन-शिलान्यास का दिन ही नहीं बल्कि एक नए युग की शुरुआत है, यह युग है रामराज्य का: योगी आदित्यनाथ

अयोध्या में 5 अगस्त के आयोजन की तैयारियाँ लगातार जारी हैं। श्रीराम की जन्मभूमि में उनके मंदिर के स्थापना की नींव रखे जाने की प्रक्रिया पूरी रफ़्तार से आगे बढ़ रही है। देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मौजूदगी में भव्य राम मंदिर की आधारशिला रखी जाएगी। इस दौरान ऐसे तमाम किस्से और किरदार सामने आ रहे हैं, जिन्होंने इस अभियान को सफल बनाने में अहम भूमिका निभाई। आज़ादी के पहले से लेकर आज़ादी के बाद, उनमें से कुछ के बारे में हम जानते हैं और कुछ के बारे में नहीं या बहुत कम जानते हैं।  

राम मंदिर शिलान्यास और भूमिपूजन का समय नज़दीक होने पर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कई अहम बातें कही हैं। इस पावन घड़ी की प्रतीक्षा करते हुए पीढ़ियाँ ख़त्म हो गईं। राम के नाम में आस्था रखने वालों ने 5 शताब्दी तक इस अवसर की प्रतीक्षा की। तमाम कठिनाइयों के बावजूद राम मंदिर निर्माण के लिए संघर्ष करने वालों ने हार नहीं मानी। उसका ही परिणाम है कि राम मंदिर बहुत जल्द आकार लेने वाला है। करोड़ों लोगों की आस्था का सबसे प्रबल प्रतीक उनके सामने होगा। मर्यादा पुरुषोत्तम का एक वनवास सदियों पहले ख़त्म हुआ था और दूसरा अब ख़त्म हुआ है। इसके बाद वह अपनी जन्मभूमि स्थित सिंहासन पर विराजमान होंगे। इस पूरे अभियान और संघर्ष में कुछ नाम ऐसे थे जिनके उल्लेख के बिना पूरा विषय अधूरा है।  

किन संतों को भूलना मुश्किल 

इसमें सबसे पहला नाम है दादागुरु ब्रह्मलीन गोरक्षपीठाधीश्वर महंत श्री दिग्विजय नाथ जी महाराज। उनके अलावा परमपूज्य ब्रह्मलीन गोरक्षपीठाधीश्वर महंत श्री अवेद्यनाथ जी महाराज। इन दोनों विभूतियों ने राम मंदिर निर्माण अभियान में अकल्पनीय संघर्ष किया। इसलिए राम मंदिर की आधारशिला रखने के दौरान इन्हें विस्मृत करना असंभव है।  

फिरंगी हुक़ूमत के दौरान राम मंदिर निर्माण के अभियान को बढ़ावा दिया महंत दिग्विजय नाथ जी महाराज ने। साल 1934 से लेकर 1949 तक उन्होंने इसके लिए लगातार संघर्ष किया। ऐसा बताया जाता है कि जब 22-23 दिसंबर 1949 के दौरान जब विवादित ढाँचे में श्रीराम प्रकट हुए। ठीक उस वक्त तत्कालीन गोरक्षपीठाधीश्वर महंत दिग्विजय नाथ जी महाराज साधू संतों के साथ बैठ वहीं पर कीर्तन कर रहे थे।  

मृत्यु के बाद भी जारी रखा गया संघर्ष 

28 सितंबर साल 1969 को उनकी मृत्यु हुई लेकिन राम मंदिर निर्माण के लिए उनके हिस्से का संघर्ष ख़त्म नहीं हुआ। महंत दिग्विजय नाथ की इस पहल को आगे बढ़ाया उनके शिष्य महंत श्री अवेद्यनाथ ने। उनके साथ साधू संतों के एक बड़े समूह ने राम मंदिर निर्माण अभियान में आगे आया।  

1989 में जब राम मंदिर निर्माण के लिए प्रतीकात्मक तौर पर भूमि पूजन हुआ। तब पहला फावड़ा किसी और ने नहीं बल्कि खुद महंत श्री अवेद्यनाथ ने चलाया था। पहला फावड़ा चलाने में परमहंस रामचंद्र दास भी शामिल थे। इन प्रयासों का यह नतीजा निकला कि पहली आधार शिला रखने का अधिकार कामेश्वर चौपाल जी को मिला। अशोक सिंहल ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई थी।  

देश ही नहीं दुनिया की आस्था का विषय

पिछले तीन वर्षों के दौरान राम जन्मभूमि अयोध्या ने दीपावली देखी है। इस बार के आयोजन का दृश्य सभी की तुलना में कहीं अधिक विस्तृत और विशाल होगा। राम मंदिर केवल देश की नहीं बल्कि दुनिया की आस्था का विषय है। श्रीराम मंदिर निर्माण के बाद अयोध्या वैश्विक स्तर धार्मिक और संस्कृति नगरी के रूप में उभर कर आएगी।  

महामारी के चलते श्रीराम में आस्था रखने वाले उनके अटूट भक्त इस आयोजन में शामिल नहीं हो पाएँगे। लेकिन फिलहाल इसे प्रभु की इच्छा मान कर सभी को स्वीकार करना चाहिए। अंततः यह हमारे लिए गर्व का अवसर है। 5 अगस्त का दिन राम मंदिर भूमि पूजन और शिलान्यास का दिन नहीं है बल्कि एक नए युग की शुरुआत का दिन है। यह युग रामराज्य का है।     

‘जस्टिस लोया की मौत पर राजदीप और उसकी बीवी बने थे ‘जज’, सुशांत की मौत को बताया सर्कस’: लोगों ने याद दिलाए ‘वो दिन’

बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत को लेकर बॉलीवुड के बाद अब मीडिया के लोगों की दिलचस्पी भी देखी जा रही है। इसमें जो एक नया नाम जुड़ा है वो है प्रोपेगेंडा पत्रकार राजदीप सरदेसाई! राजदीप सरदेसाई का दावा है कि सुशांत सिंह राजपूत के CA ने सुशांत सिंह के परिवार द्वारा लगाए गए पैसों के हेरफेर और पैसे ऐंठने के दावे गलत और झूठे हैं।

राजदीप सरदेसाई ने बृहस्पतिवार (जुलाई 30, 2020) को देर रात एक ट्वीट में लिखा – “सुशांत सिंह राजपूत के CA ने उनके परिवार द्वारा कथित रूप से किसी वित्तीय दुर्व्यवहार के आरोपों का खंडन किया है। उसने सभी अकाउंट डिटेल्स जारी किए हैं। यह सिलसिला कब तक चलता रहेगा! बिहार पुलिस के पास निश्चित रूप से करने के लिए बेहतर चीजें हैं! एक त्रासदी को सर्कस में मत बदलो!”

रिपोर्ट्स के अनुसार, सुशांत के पिता ने आरोप लगाया था कि सुशांत के अकाउंट से करीब 15 करोड़ रुपए का ट्रांजैक्शन हुआ है। जबकि, सुशांत के सीए का कहना है कि ज्यादा ट्रांजैक्शन नहीं हुआ बल्कि सुशांत के खाते में ज्यादा पैसे थे ही नहीं।

राजदीप सरदेसाई के इस ट्वीट के बाद लोगों ने उन्हें याद दिलाया कि यही राजदीप जस्टिस लोया की मौत पर लगातार भ्रामक दावे और झूठ परोसता रहा, वो भी तब जबकि जस्टिस लोया का परिवार तक उनकी मृत्यु को स्वाभाविक मृत्यु बताता रहा, लेकिन जब सुशांत सिंह राजपूत का परिवार उनकी मौत की जाँच चाह रहा है तो यही राजदीप सरदेसाई इसे सर्कस बता रहा है। एक ट्विटर यूजर ने उन्हें अपशब्द कहते हुए राजदीप को ‘दोगला’ तक कह दिया।

ज्ञात हो कि जस्टिस लोया की मौत को लेकर सिर्फ राजदीप सरदेसाई ही नहीं बल्कि उन्हीं की जमात के अन्य पत्रकार भी हमेशा जाँच कर रही संस्था और यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भी संदेह जताते रहे हैं।

एक अन्य ट्विटर यूजर ने लिखा है – “जज लोया की प्राकृतिक मौत को तो खुद उनके परिवार वालों तक ने स्वीकार कर लिया था पर तुम और तुम्हारी बीबी खुद जज बनकर इस मौत को हत्या साबित करने में जुटे हुए थे। रही बात सर्कस की तो गौरी लंकेश की हत्या को, जिसमें एक कॉन्ग्रेसी ही दोषी पाया गया तुम दोनों ने ही खूब सर्कस किया था। याद है न?”

मौत की पहली रात बंद थे CCTV

सुशांत राजपूत की मौत के बाद हर दिन कई बड़े रहस्यों से पर्दा उठ रहा है। इस मामले में सुशांत सिंह राजपूत के पिता केके सिंह द्वारा एफआईआर दर्ज कराए जाने के बाद बिहार पुलिस ने मामले की जाँच तेज कर दी हैं।

सुशांत की पूर्व प्रेमिका अंकिता लोखंडे और सुशांत सिंह राजपूत से पूछताछ करने के बाद जल्द ही बिहार पुलिस सुशांत के नजदीकी दोस्त और फ्लैटमेट सिद्धार्थ पिठानी से पूछताछ कर सकती है। माना जा रहा है इसके बाद ही रिया चक्रवर्ती और उनके भाई से पूछताछ की जाएगी। दरअसल, सुशांत का कोई करीबी उनकी मौत से पहले पार्टी में उनके साथ मौजूद था और उस पार्टी में CCTV कैमरा भी काम नहीं कर रहे थे।

रिया करती थी काला जादू

न्यूज़ चैनल ‘टाइम्स नाउ’ की रिपोर्ट के अनुसार, सुशांत की बहन मीतू सिंह ने बुधवार (जुलाई 29, 2020) को पूछताछ के दौरान बताया कि सुशांत की गर्लफ्रेंड रिया चक्रवर्ती उन पर किसी तरह का ‘ब्लैक मैजिक’ करती थी। यह बात उन्हें सुशांत के हाउस हेल्प ने बताई थी।

बताया जा रहा है कि रिया चक्रवर्ती अब पूछताछ व गिरफ्तारी से बचने के लिए लगातार अपना ठिकाना बदल रही है। बिहार पुलिस रिया के खिलाफ ठोस सबूत इकट्ठा कर कोर्ट से गिरफ्तारी वारंट लेने के मूड में है। रिपोर्ट के अनुसार, रिया पूछताछ के भय से अपने परिवार के साथ भूमिगत हो गई हैं।

भारत विरोधी गतिविधियों का नया गढ़ बना ‘तुर्की’, भारत के समुदाय विशेष को रेडिकल बनाने के लिए कर रहा फंडिंग: रिपोर्ट

पाकिस्तान के अलावा एक और ऐसे देश का नाम सामने आ रहा है। जो पिछले काफी समय से भारत विरोधी गतिविधियों को बढ़ावा दे रहा है। अनुच्छेद 370 के मुद्दे पर तुर्की ने पाकिस्तान की बातों का समर्थन किया था। लेकिन इसके बाद वह भारत विरोधी गतिविधियों का गढ़ बन चुका है। तुर्की में पनप रहे इस नए तरह के आतंकवाद को कोई और नहीं बल्कि वहाँ की एर्दोगन सरकार खुद बढ़ावा दे रही है।  

हैरानी की बात यह है कि केरल और कश्मीर में मौजूद इन इस्लामी कट्टरपंथियों को हर तरह की मदद मिल रही है। एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने इस बारे में हिन्दुस्तान टाइम्स से बात करते हुए कई अहम बातें बताई। उन्होंने कहा तुर्की की तरफ से भारत के लोगों को कट्टर बनाने की भरपूर कोशिश जारी है। इतना ही नहीं तुर्की भारत के मजहब विशेष वाले कट्टर लोगों को और कट्टर बना कर उन्हें भारत विरोधी गतिविधियों में इस्तेमाल करना चाहता है।  

तुर्की दक्षिण एशियाई देशों में अपना विस्तार करना चाहता है। लेकिन दूसरी तरफ इस इलाके में सऊदी अरब का प्रभाव किसी से छुपा नहीं है। इसके लिए तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन और उनकी सरकार की तरफ से तमाम प्रयास जारी हैं। उसका नतीजा है कि तुर्की ने अपनी छवि बतौर एक रेडिकल इस्लामिक देश स्थापित कर ली है।  

इसी कड़ी में पिछले ही हफ्ते तुर्की की सरकार ने बाईज़ानटाईन कैथेद्रल हगिया सोफिया संग्रहालय को मस्जिद में तब्दील कर दिया था। एर्दोगन के इन कदमों से इतना साफ़ है कि वह वैश्विक स्तर पर खुद को मजहब विशेष के रखवाले की तरह दिखाना चाहते हैं। पिछले साल एर्दोगन ने उन मलेशिया के महातिर मोहम्मद और पाकिस्तान के इमरान खान समेत कुछ मजहबी देशों के साथ एक गैर-अरब इस्लामी देशों का संगठन बनाने की कोशिश की थी। इसमें ईरान और क़तर ने भी तुर्की की सरकार का साथ दिया था।  

सऊदी अरब और यूएई से भारत के समझौते बढ़ने के बाद तुर्की ने पाकिस्तान की और निहारना शुरू कर दिया था। रियाध के दबाव की वजह से तुर्की के साथ होने वाली बैठक में इमरान खान अंतिम वक्त में पीछे हट गए थे। जबकि तुर्की की तरफ से इमरान खान को मनाने की कोशिशें जारी थीं। अधिकारियों का मानना है कि तुर्की की सरकार ने एजेंडा तैयार किया है। जिसके तहत वह दक्षिण एशियाई देशों के मजहबी लोगों में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहते हैं। इस एजेंडे में भारत के समुदाय विशेष को प्राथमिकता में रखा गया है।  

भारतीय खुफ़िया अधिकारियों के मुताबिक़ तुर्की ने कश्मीर के कट्टर अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी को सालों आर्थिक मदद की थी। बीते कुछ समय में तुर्की ने अलग तरीकों से भारत विरोधी गतिविधियों को बढ़ावा दिया है। एर्दोगन सरकार ने पिछले कुछ सालों के दौरान भारत में कई मज़हबी आयोजनों को बढ़ावा दिया। जिसमें वह समुदाय के युवाओं को अपने मन मुताबिक़ मज़हबी प्रशिक्षण दे रहे हैं। इसी कड़ी में उस कट्टरपंथी समूह का नाम सामने आया है जो केरल में आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा दे रहा है।  

कुछ अधिकारियों का कहना है, “हम अच्छी तरह जानते हैं कि यह समूह तुर्की के लोगों से मिलने के लिए क़तर जाता है। जिससे इन्हें आर्थिक मदद मिलती रहे। उन्हें केरल में इस तरह की गतिविधियों को अंजाम देने के लिए 40 लाख रूपए तक मिलते हैं। इसके अलावा तुर्की पाकिस्तान और इस्लामी कट्टरपंथी जाकिर नाइक की फंडिंग भी करता है। तुर्की फ़िलहाल पाकिस्तान के लिए ‘नया दुबई’ बन चुका है। साल 2000 से लेकर 2010 के बीच दुबई आईएसआई का गढ़ बना हुआ था। जहाँ से पाकिस्तान भारत विरोधी गतिविधियों को बढ़ावा देता था।”  

इस दशक के दौरान पाकिस्तान की आईएसआई ने भारत के मजहब विशेष वालों को उनके ही देश के खिलाफ़ कट्टर बनाने का काम किया था। यहीं से इंडियन मुजाहिद्दीन ही शुरुआत हुई थी। इसके बाद यूएई और भारत ने आपस में संधि कर ली थी। जिसके बाद यूएई ने खुद भारत विरोधी गतिविधियों को ख़त्म करना शुरू कर दिया था। इसके अलावा भारत में नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ़ हो रहे विरोध में भी तुर्की ने अपनी भूमिका निभाई थी। भारत में हो रहे विरोध प्रदर्शन जारी रखने के लिए तुर्की ने आर्थिक मदद तक की थी।  

कश्मीर मुद्दे पर भी संयुक्त राष्ट्र असेम्बली में भी सिर्फ एर्दोगन ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने भारत के खिलाफ़ बोला था। भारत के खिलाफ़ साज़िश में पाकिस्तान तुर्की का पूरा साथ देता है। इस साल हुए पाकिस्तान के दौरे में एर्दोगन ने कश्मीर पर कई हैरान कर देने वाली बातें कही थीं। उनका कहना था “कश्मीर हमारे लिए पहले जैसा ही है। कश्मीर जितना अहम पाकिस्तान के लिए उतना ही अहम हमारे लिए भी है।”      

कोरोना को लेकर अयोध्या में लगातार हो रहे परीक्षण, NDTV जैसे चैनल और वामपंथी फैला रहे प्रपंच

अयोध्या में, श्रीराम जन्मभूमि स्थल पर तीन दिवसीय वैदिक अनुष्ठानों के लिए विस्तृत तैयारी की जा रही है। अनुष्ठान 3 अगस्त को शुरू होगा और बहुप्रतीक्षित मंदिर के निर्माण से पहले 5 अगस्त को भूमि पूजन के साथ समाप्त होगा।

इस बीच वामपंथी मीडिया तंत्र अपनी तमाम ताकत यह साबित करने में लगा रहा है कि 5 अगस्त को होने वाले भूमि पूजन में कोरोना को लेकर सतर्कता नहीं बरती जा रही है। अयोध्या के डीएम अनुज कुमार झा का कहना है कि भूमिपूजन को लेकर हर प्रकार की एहतियात बरती जा रही हैं और व्यापक स्तर पर COVID-19 टेस्ट भी किए जा रहे हैं।

डीएम अनुज कुमार झा ने कहा – “COVID परीक्षण पूरे अयोध्या जिला और श्रीराम जन्मभूमि में बार-बार किए जा रहे हैं। एक व्यक्ति छुट्टी के बाद महाराजगंज से लौटा था और उसकी रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। इसलिए, उनके सभी सहयोगियों का 7 जुलाई को परीक्षण किया गया और उनमें से एक सकारात्मक निकला।”

अयोध्या के डीएम के अनुसार – “13 जुलाई को, 98 परीक्षण किए गए, एक और व्यक्ति पॉजिटिव निकला था। कल 100 लोगों का एंटीजन टेस्ट किया गया और 4 पुलिसकर्मी और एक सहायक पुजारी पॉजिटिव पाए गए। वह आइसोलेशन में है। यह सुनिश्चित करना हमारी ज़िम्मेदारी है कि आगामी कार्यक्रम COVID मुक्त रहे।”

लेकिन प्रोपेगेंडा समाचार चैनल NDTV और द वायर जैसे ही मीडिया गैंग अयोध्या में जारी व्यवस्थाओं को लेकर लगातार ही भ्रामक खबरें दे रहे हैं। NDTV का अपनी रिपोर्ट में कहना है कि वहाँ पर आने वाले दिनों में बहुत सरे लोग जमा होने जा रहे हैं लेकिन इंतजाम ठीक नहीं किए जा रहे हैं। NDTV का कहना है कि मंदिर को सेनिटाइज नहीं किया जा रहा है और कोरोना को लेकर इंतजाम नहीं किए गए हैं।

जबकि, ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास के उत्तराधिकारी महंत कमल नयन दास ने स्पष्ट किया है कि चिंता करने की कोई बात नहीं है, एक पुजारी जो मंदिर स्थल पर दैनिक अनुष्ठान करता है, पॉजिटिव निकला है। पूरे परिसर को नियमित तौर पर सैनिटाइज किया जा रहा है।”

5 अगस्त को होने वाले समारोह के लिए वाराणसी और अयोध्या के 11 पुजारी पूजा करेंगे। जबकि, कोरोना पॉजिटिव पाए गए सहायक पुजारी प्रदीप दास 11 पुजारियों के इस समूह का हिस्सा नहीं हैं। ट्रस्ट ने दैनिक आधार पर संपूर्ण राम जन्मभूमि परिसर को सैनिटाइज करने का निर्णय लिया है।

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 5 अगस्त को समारोह में शामिल होने वाले हैं, जिसके लिए दिवाली जैसी तैयारियाँ जोरों पर हैं। श्री राम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट ने देश भर के सभी संतों से अपील की है कि वे अपने संबंधित मंदिरों और मठों में ही 5 अगस्त को सुबह 11.30 बजे से दोपहर 12.30 बजे तक पूजा करें। ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय से अनुरोध किया गया है कि लोगों से निवेदन करें कि वे इसे शाम को अपने घर पर ही टेलीविजन पर भूमि पूजन का सीधा प्रसारण देखें और घरों में दिया जलाएँ।

झारखंड तक पहुँची एमपी, राजस्थान की आग: कॉन्ग्रेस के 9 MLA नाराज, सोरेन सरकार की बढ़ सकती हैं मुश्किलें

राजस्थान और मध्य प्रदेश के बाद अब झारखंड में कॉन्ग्रेस विधायक उपेक्षा से नाराज बताए जा रहे हैं। यहॉं हेमंत सोरेन के नेतृत्व में झामुमो-कॉन्ग्रेस गठबंधन की सरकार चल रही है। नाराज कॉन्ग्रेस विधायक अपनी शिकायत लेकर दिल्ली पहुॅंचे हैं।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इन विधायकों के नाम इरफान अंसारी, राजेश कच्छप और उमाशंकर अकेला है। इनके साथ राज्यसभा सदस्य धीरज प्रसाद साहू भी आए। सबने यहाँ सोनिया गाँधी के सलाहकार अहमद पटेल और गुलाब नबी आजाद से मुलाकात की। फिर झारखंड दोबारा लौट गए।

दिल्ली आए विधायकों ने सार्वजनिक तौर पर कुछ नहीं कहा है। लेकिन मीडिया में बताया जा रहा है कि उन्होंने कॉन्ग्रेस हाइकमान से यह गुहार लगाई है कि सोरेन सरकार में उनकी बिलकुल नहीं सुनी जाती। वहाँ कॉन्ग्रेस विधायकों के साथ सोरेन सरकार का रवैया भी ठीक नहीं है। इन्हीं हालातों के मद्देनजर सूचना है कि करीब 9 विधायक ऐसे हैं जो हेमंत सोरेन सरकार से नाराज हैं और आने वाले समय में मौजूदा सरकार की परेशानी बढ़ा सकते हैं।

दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार नई दिल्ली आकर कॉन्ग्रेस विधायकों ने हाइकमान को आगाह किया कि अगर इस मामले में कुछ एक्शन नहीं लिया जाता तो झारखंड में भी सरकारें अस्थिर हो सकती है। दिल्ली में वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेताओं की ओर से उन्हें शांत रहने की नसीहत दी गई।

विधायकों की यह भी माँग है कि राज्य में एक मंत्री पद खाली पड़ा हुआ, उसे जल्द से जल्द भरा जाए और वरिष्ठ विधायकों में से एक को मंत्री बनाया जाए। उनका कहना कि सरकार को चलाने में सबका सहयोग लिया जाना चाहिए। लेकिन सहयोगी पार्टी होने के बाद भी उन्हें तवज्जो नहीं मिल रही।

उल्लेखनीय है कि हाल ही में कॉन्ग्रेस के झारखंड प्रदेश अध्यक्ष रामेश्वर उरांव ने भाजपा पर आरोप लगाया था कि वह सरकार गिराने के लिए पार्टी के विधायकों को प्रलोभन दे रही है। बताया जाता है कि पार्टी के भीतर उनको लेकर भी नाराजगी है। वे प्रदेश अध्यक्ष होने के साथ राज्य सरकार में वित्त मंत्री भी हैं। पार्टी नेता उन्हें एक पद से मुक्त करने की माँग लंबे समय से कर रहे हैं।

गौरतलब है कि इससे पहले मध्य प्रदेश में उपेक्षा से नाराज कॉन्ग्रेस विधायकों ने ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ पार्टी छोड़ दी थी। इसकी वजह से कॉन्ग्रेस की कमलनाथ सरकार गिर गई। अब राजस्थान में उठापठक चल रहा है। वहां सचिन पायलट के समर्थक विधायक अपनी अनदेखी से नाराज हैं। पायलट को उप मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाकर कॉन्ग्रेस ने इन विधाकयों पर दबाव डालने की कोशिश की थी। लेकिन अब तक बगावत खत्म करने में उसे सफलता नहीं मिली है और गहलोत सरकार पर गिरने का खतरा मॅंडरा रहा है।

बंगाल: अब बीजेपी के बूथ सचिव का शव पेड़ से लटका मिला, 24 घंटे के भीतर दूसरी घटना

पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना के मथुरापुर में गुरुवार (30 जुलाई, 2020) को भाजपा बूथ सचिव गौतम पात्र का शव पेड़ से लटका मिला है। बीते 24 घंटे के भीतर बंगाल में दो भाजपा कार्यकर्ताओं के शव पेड़ से लटके मिले हैं। इससे पहले पूर्वी मिदनापुर जिले के कछुरी गाँव में बीजेपी कार्यकर्ता पूर्णचंद्र दास का शव पेड़ से लटका मिला था।

मृतक के परिजनों व बीजेपी पार्टी ने सत्तारूढ़ तृणमूल कॉन्ग्रेस पर हत्या का आरोप लगाया है। बंगाल बीजेपी ने ट्वीट करके ममता सरकार पर हमला बोलते हुए कहा, “24 घंटे के भीतर बंगाल में एक और बीजेपी के कार्यकर्ता की राजनीति द्वेष के कारण हत्या कर दी गई। मथुरापुर में बूथ सचिव गौतम पात्र को भी बुरी तरह हत्या कर पेड़ से लटका दिया गया था। इस तरह राजनीतिक हत्याएँ राज्य की मुख्यमंत्री जो गृहमंत्री भी है उनके कार्यालय में बहुत ही आम हो चुकी है। परन्तु वह अब इस जिम्मेदारी से नहीं बच सकती हैं।”

गौरतलब है कि पूर्णचंद्र दास के पारिवारिक सदस्यों के मुताबिक उनसे टीएमसी में शामिल होने के लिए कहा जा रहा था लेकिन उन्होंने इस प्रस्ताव से मना कर दिया। इसके बाद टीएमसी के लोग उन पर लगातार दबाव बना रहे थे।

दास के परिजनों के अलावा स्थानीय भाजपा नेता अनूप चक्रवर्ती ने भी इस मामले पर टीएमसी को जिम्मेदार बताया है। उन्होंने कहा, “हमें पूरा यकीन है कि इसमे टीएमसी का हाथ है। उनकी पहले हत्या की गई और बाद में उनका शव फंदे पर लटका दिया गया ताकि ये आत्महत्या लगे।”

वहीं, टीएमसी ने आरोपों को खारिज करते हुए निराधार और राजनीति से प्रेरित बताया था। टीएमसी के अखिल गिरी कहा कि, “हमारी पार्टी का इसमें कोई हाथ नहीं है। ऐसा लगता है अवसाद के कारण उन्होंने आत्महत्या की। दास और उनके पड़ोसी के बीच कई समय से एक कानूनी झगड़ा चल रहा था। भाजपा सिर्फ इसका राजनीतिकरण करने की कोशिश कर रही है।”

उल्लेखनीय है कि बंगाल में राजनीति से जुड़े लोगों की रहस्यमय परिस्थितियों की मौत की कई घटना पिछले कुछ समय में सामने आई है। खासकर बीजेपी से जुड़े लोगों की। अभी कुछ दिन पहले सुदर्शनपुर के रायगंज में हेमताबाद के भाजपा विधायक देबेन्द्र नाथ रॉय का मृत शरीर एक फंदे से झूलता मिला था।

रॉय के परिजनों ने पूछताछ में बताया था कि रात के 1 बजे कुछ युवक उन्हें बुलाने आए थे। इसके बाद से उनकी कोई जानकारी नहीं मिली। अगले दिन सुबह कुछ स्थानीय लोगों ने उन्हें फंदे से झूलता हुआ पाया। पुलिस ने बताया था कि विधायक का मृत शरीर बंद चाय की एक दुकान के सामने झूल रहा था।

LAC पर 35000 सैनिकों की होगी तैनाती, युद्ध स्मारक पर अंकित होंगे गलवान के 21 बलिदानियों के नाम

चीन की चालबाजियों के मद्देनजर भारत ने किसी भी स्थिति से निपटने के लिए वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर 35,000 अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती की तैयारी शुरू कर दी है। वहीं गलवान घाटी में बलिदान हुए 21 जवानों के नाम युद्ध स्मारक पर अंकित किया जाएगा।

अनाम अधिकारियों के हवाले से मीडिया रिपोर्टों में बताया गया है कि अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती से 3,488 किमी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर स्थिति बदल जाएगी।

एक अधिकारी ने बताया कि 15 जून को पूर्वी लद्दाख में भारत और चीन के सैनिकों के बीच संघर्ष के बाद दोनों देशों के बीच तनाव काफी बढ़ गया था। संघर्ष में भारत के 21 जवान और अफसर बलिदान हुए थे जबकि चीन के कम से कम 45 सैनिक मारे गए। गलवानी घाटी में हुए खूनी संघर्ष के बाद भारत ने भी सीमा पर अतिरिक्त सैनिकों, तोप और टैंकों की तैनाती की है। अधिकारियों ने बताया कि हालात को मद्देनजर रखते हुए वहाँ और भी ज्यादा सैनिकों की तैनाती की आवश्यकता है।

दिल्ली स्थित थिंक टैंक ‘द यूनाइटेड सर्विस इंस्टिट्यूशन ऑफ इंडिया’ के डायरेक्टर और रिटायर्ड मेजर जनरल बीके शर्मा ने कहा, ”लाइन ऑफ कंट्रोल की प्रकृति, कम से कम लद्दाख में हमेशा के लिए बदल गई है। किसी भी पक्ष की ओर से अतिरिक्त सैनिकों की वापसी तब तक नहीं की जाएगी जब तक सर्वोच्च राजनीतिक स्तर से पहल ना हो।”

सरकारी सूत्रों ने एएनआई को बताया, “हम पूर्वी लद्दाख सेक्टर में तैनात किए गए लगभग 35,000 सैनिकों के लिए अत्यधिक ठंडे मौसम वाले पोर्टेबल केबिन उपलब्ध कराने की तैयारी कर रहे हैं।” उन्होंने कहा, “वहाँ तैनात हमारे सैनिकों ने सियाचिन, पूर्वी लद्दाख या पूर्वोत्तर में पहले ही एक या दो कार्यकाल किए हैं और वे वहाँ लंबी तैनाती के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार हैं।”

एनएनआई ने सूत्रों के हवाले से कहा कि भारतीय मोर्चे पर तैनात चीनी सैनिकों में मुख्य रूप से ऐसे लोग शामिल हैं जो 2-3 साल की अवधि के लिए पीएलए में शामिल होते हैं और फिर अपने सामान्य जीवन में लौट जाते हैं।

वहीं पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में 15 जून की रात चीन के धोखे से किए गए वार में बलिदान हुए 21 जवानों के नाम राष्ट्रीय समर स्मारक पर अंकित किया जाएगा। इस प्रकिया में कुछ महीनों का समय लगेगा। अधिकारियों ने गुरुवार को इस बारे में जानकारी दी।

झड़प में 16 वीं बिहार रेजिमेंट के कमांडिंग अधिकारी कर्नल बी संतोष बाबू समेत अन्य सैन्यकर्मी बलिदान हो गए थे। इस घटना के बाद पूर्वी लद्दाख में सीमा पर तनाव बढ़ गया और भारत ने इसे ‘चीन द्वारा सोची-समझी और पूर्वनियोजित कार्रवाई’ बताया था।