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दिल्ली दंगे: हर्ष मंदर वापस लेंगे कपिल मिश्रा और अनुराग ठाकुर के खिलाफ दायर याचिका, कोर्ट ने उनके वकील सिब्बल को दी अनुमति

दिल्ली हाईकोर्ट ने तथाकथित समाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर द्वारा दिल्ली दंगों के मामले में भाजपा नेताओं कपिल मिश्रा, अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा के खिलाफ दायर याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी है। हर्ष मंदर के वकील कपिल सिब्बल ने हाईकोर्ट को बताया कि अब वो न्यायिक मजिस्ट्रेट से संपर्क करना चाहते हैं। इस याचिका में दिल्ली दंगों के मामले में तीनों भाजपा नेताओं पर एफआईआर दर्ज करने की माँग की गई थी।

मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल और जस्टिस प्रतीक जालान की खंडपीठ ने कपिल सिब्बल को ये अनुमति दे दी कि वो वैकल्पिक उपायों का फायदा लेने के लिए अपनी याचिका वापस लेने की प्रक्रिया शुरू करें। इस मामले में जमीयत उलेमा-ए-हिन्द भी एक याचिकाकर्ता था, जिसने दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग की रिपोर्ट के आधार पर दावा किया कि दिल्ली दंगों में समुदाय विशेष के घरों और मस्जिदों को नुकसान पहुँचाया गया।

जमीयत का आरोप था कि इन दंगों में समुदाय विशेष को ही निशाना बनाया गया। साथ ही दिल्ली पुलिस पर भी निष्क्रियता के आरोप लगाते हुए कहा गया था कि वो समुदाय विशेष पर हो रहे हमले को सिर्फ देखती रही। जमीयत का तर्क था कि पीड़ितों में अधिकतर मजहब के लोग हैं और आरोपितों में भी अधिकतर वहीहैं, जो गलत है। उसका दावा है कि 53 में से 40 मरने वाले मजहब विशेष वाले ही हैं।

जहाँ तक हर्ष मंदर का सवाल है, उनके द्वारा दायर की गई याचिका के बाद कोर्ट में कपिल मिश्रा और अनुराग ठाकुर के वीडियोज चलाए भी गए थे, जिन्हें जजों ने देखा था। बाद में हर्ष मंदर की शिकायत के बाद दिल्ली हाईकोर्ट की पीठ ने दिल्ली पुलिस को तलब किया था और एफआईआर दर्ज किए जाने के सम्बन्ध में निर्णय लेने के लिए 1 दिन का समय दिया था। हालाँकि, एफआईआर नहीं दर्ज की गई थी।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को जानकारी दी थी कि चूँकि परिस्थितियाँ ठीक नहीं हैं, इसीलिए एफआईआर दर्ज करने के लिए ये सही समय नहीं है। 26 फ़रवरी को कोर्ट ने इन वीडियोज को देखा था। इसके बाद हर्ष मंदर सुप्रीम कोर्ट पहुँच गए थे और वहाँ शिकायत की थी कि दिल्ली हाईकोर्ट ने उनकी याचिका पर सुनवाई को लम्बे समय तक टाल कर गलत किया है। इसी बीच हाईकोर्ट में अन्य याचिकाएँ भी आईं।

बता दें कि जामिया हिंसा पर दायर दिल्ली पुलिस की चार्जशीट में जेएनयू छात्र शारजील इमाम और हर्ष मंदर की दिल्ली हिंसा में भूमिका बताई गई है। पुलिस ने चार्जशीट में कहा कि समिति ने जेएनयू छात्र शरजील इमाम को विरोध के लिए बुलाया था। जहाँ शरजील ने 14 दिसंबर को भड़काऊ भाषण दिया। जहाँ उसने उत्तर भारत के सभी शहरों को तब तक के लिए बंद करने का आह्वान किया जब तक सरकार सीएए / एनआरसी को वापस नहीं ले लेती।

16 दिसंबर 2019 को हर्ष मंदर विरोध स्थल पहुँचे और प्रदर्शनकारियों से कहा कि वे भारत के सर्वोच्च न्यायालय में विश्वास न करें। यहाँ पर न्याय पाने का एकमात्र तरीका सड़कों पर लड़ाई लड़ना है। बता दें हर्ष मंदर को भारत विरोधी गतिविधियों के लिए जाना जाता है। साथ ही जॉर्ज सोरोस और कॉन्ग्रेस पार्टी अध्यक्ष सोनिया गाँधी के साथ उनका लगाव जगजाहिर है। वो ऐसी ही याचिकाएँ दायर करते रहते हैं।

‘पाकिस्तान जैसा बनो…हम आपको कोरोना वैक्सीन भी देंगे’: नेपाल और अफगानिस्तान से बोला चीन

सीमा पर भारत से तनाव के बीच चीन अपनी नई चाल चल रहा है। चीन की कोशिश है कि वो भारत के पड़ोसी देशों को अपने साथ करके भारत को चारों तरफ से कमजोर कर दे। इस मकसद को अंजाम देने के लिए उसने पाकिस्तान, अफगानिस्तान, नेपाल के विदेश मंत्रियों के साथ वर्चुअल बैठक भी की है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इस बैठक में कोरोना महामारी, आर्थिक मदद और चीन की महत्वकांक्षी परियोजना बेल्ट एंड रोड को लेकर चर्चा हुई। जहाँ चीन ने पाकिस्तान की मिसाल देने से गुरेज नहीं किया।

चीन के विदेश मंत्री ने कोरोना महामारी पर नियंत्रण को लेकर पाकिस्तान व चीन की साझा पहल की मिसाल दी। साथ ही एक दूसरे को आयरन ब्रदर्स बताया। चीन ने बाकी बाकी देशों को भी पाकिस्तान की राह पर चलने की सलाह दी।

वांग ने पाकिस्तान को अपना अच्छा पड़ोसी देश बताते हुए कहा कि अच्छा पड़ोसी मिलना खुशनसीबी होती है। दोनों देशों के सहयोग से सीखते हुए अफगानिस्तान और नेपाल को भी कोरोना, आर्थिक गतिविधियों और आपसी संवाद को लेकर चीन के साथ ऐसी ही पहल करनी चाहिए और चारों देशों को एक दूसरे का सहयोग करते हुए एक दूसरे के लिए सहायता के रास्ते खोलने चाहिए।

चीन के विदेश मंत्रालय द्वारा जारी प्रेस रिलीज के मुताबिक, अफगानिस्तान के कार्यवाहक विदेश मंत्री मुहम्मद हनीफ आत्मार और नेपाल के विदेश मंत्री प्रदीप ग्यावली ने भी हिस्सा लिया।

इस बैठक में पाकिस्तान के विदेश मंत्री शामिल नहीं हो पाए। मगर, उनके प्रतिनिधि के रूप में आर्थिक मामलों के मंत्री मकसूद खुसरो बख्तियार ने कुरैशी के संदेश के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई।

गौरतलब है कि कोरोना महामारी के बाद से जो स्थिति चाइना की हुई है उसके कारण वह दक्षिण एशियाई देशों में अपने लिए सहयोग की तलाश कर रहा है। अपनी इसी रणनीति के तहत उसने चारों देशों को एक साथ आने को कहा है। साथ ही राजनीतिकरण से बचने व WHO को समर्थन देने की बात भी कही है।

वांग ने कॉन्फ्रेंस में महामारी का राजनीतिकरण करने वाले देशों पर निशाना साधा और ये समझाया कि ऐसे देशों ने इस समय में भी अपनी राजनीतिक जरूरतों के लिए सहयोग की आवश्यकता को नजरअंदाज किया है। आने वाले समय में इतिहास उनपर शर्मसार होगा। वांग ने तीनों देशों से वैक्सीन को बाँटने का भी भरोसा दिलाया। साथ ही कहा कि जब भी कोरोना के लिए वह वैक्सीन को तैयार कर लेंगे तो तीनों देशों को उपलब्ध करवाएँगे और स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत बनाने में भी मदद करेंगे।

वांग ने कहा, “हम चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) और हिमालय पार कनेक्टिविटी नेटवर्क (THCN) के निर्माण को सक्रियता से बढ़ावा देंगे। हम इस गलियारे का अफगानिस्तान तक विस्तार करने और क्षेत्रीय संपर्क के लाभ के और भी द्वार खोलने का समर्थन करेंगे।”

यहाँ बता दें कि पाकिस्तान, नेपाल और अफगानिस्तान ने चीन के एक साथ आने वाली बात को अपना समर्थन दिया है। इसके अलावा चीन के ऑफर जैसे मेडिकल सुविधाएँ, खाद्य सामग्री और महामारी नियंत्रण के संबंध में दिए सुझावों के लिए आभार व्यक्त किया है। वहीं पाकिस्तान ने भी कोरोना वायरस महामारी के ख़िलाफ़ एक राजनीतिक राय बनाने के लिए बोला है।

ज्ञात रहे कि दक्षिण एशिया के देशों के साथ चीन की इस तरह की बैठक कोई साधारण बात नहीं मानी जा रही। इसे चीन का एक दाव समझा जा रहा है। जिसमें उसने ये साफ संकेत दिए कि दक्षिण एशिया महामारी में सहयोग के बहाने आगे की रणनीति तय कर रहा है क्योंकि इस समय नेपाल के साथ भारत का तनाव हैं।

राम मंदिर की तुलना में दूसरे पक्ष को आवंटित 5 एकड़ भूमि पर कोई उत्साह नहीं, अभी तक नहीं हुआ बोर्ड के सदस्यों का भी गठन

अयोध्या में 5 अगस्त को श्रीराम मंदिर निर्माण के भूमि पूजन को लेकर पूरे देशभर के हिन्दुओं में उत्साह देखा जा रहा है वहीं, भगवान राम की नगरी अयोध्या में मस्जिद के निर्माण को लेकर किसी प्रकार की चहल-पहल नजर नहीं आ रही हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले तक जहाँ दूसरे पक्ष वालों द्वारा बेहद तत्परता से बाबरी के विषय को रखा गया था, वह उत्साह अब कहीं नजर नहीं आ रहा है।

हालाँकि, कई वर्षों से लंबित पड़े श्रीराम जन्मभूमि पर मालिकाना हक से जुड़े मुकदमे में दूसरे मजहब के प्रमुख पक्षकार रहे उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर सरकार द्वारा पाँच एकड़ जमीन जरूर आवंटित कर दी गई है, फिर भी इससे जुड़ी औपचारिकताओं को पूरा होने में समय लग रहा है।

इसके अलावा आवंटित जमीन पर मस्जिद, रिसर्च सेंटर एवं अन्य निर्माण से संबंधित फैसले लेने के लिए गठित होने वाला ट्रस्ट भी अभी तक नहीं बन पाया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस विषय में सुन्नी सेंट्रल वक्फ़ बोर्ड के अध्यक्ष जुफर अहमद फारुकी ने कहा कि सरकार ने उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर अयोध्या जिले में सोहावल तहसील के धुन्नीपुर गाँव में पाँच एकड़ जमीन आवंटित तो कर दी है, लेकिन लॉकडाउन की वजह से औपचारिकताएँ पूरी होने में कुछ कसर बाकी रह गई है।

फारुकी ने बताया कि बोर्ड को मिली जमीन पर मस्जिद, इंडो-इस्लामिक रिसर्च सेंटर, अस्पताल तथा लाइब्रेरी के निर्माण के सिलसिले में गठित होने वाला ट्रस्ट अभी बन नहीं पाया है। इसमें 15 सदस्य होंगे, जिनमें से अभी तक मुश्किल से 8 सदस्यों के नाम ही तय हो पाए हैं।

फारुकी ने उन आठ सदस्यों के नाम भी बताने से इनकार कर दिया। उनका कहना है कि वो बोर्ड में सिर्फ प्रगतिशील विचारधारा के लोगों को जोड़ना चाहते हैं।

फारुकी ने यह भी कहा कि उन्हें नहीं लगता है कि मस्जिद, इस्लामिक रिसर्च सेंटर, अस्पताल और लाइब्रेरी के निर्माण के लिए संसाधन जुटाने के मामले पर उन्हें ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड या अन्य किसी प्रमुख मजहबी संगठन का सहयोग मिलेगा। उनका कहना है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, जिसमें जमीयत उलेमा ए हिंद तथा अन्य प्रमुख मुस्लिम संगठन भी शामिल हैं, ने पहले ही एलान कर दिया था कि वह बाबरी मस्जिद की कीमत पर किसी और जगह पर जमीन नहीं लेगा, जिस कारण उन्हें उम्मीद नहीं है कि उस पाँच एकड़ जमीन पर होने वाले निर्माण में इन संगठनों से कोई मदद मिल पाएगी।

गौरतलब है कि अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ही मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सचिव एवं वकील जफरयाब जिलानी ने कहा था कि फैसले के कुछ बिंदुओं, खासकर जमीन देने की बात से वो अंसतुष्ट हैं और मस्जिद के लिए पाँच एकड़ की वैकल्पिक जमीन देने को लेकर कहा कि मस्जिद की कोई कीमत नहीं हो सकती।

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल 9 नवंबर को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए अयोध्या के विवादित स्थल पर हिन्दू आस्था के प्रतीक श्रीराम मंदिर का निर्माण करने और दूसरे मजहब को अयोध्या में ही किसी प्रमुख स्थान पर मस्जिद के निर्माण के लिए 5 एकड़ जमीन देने के आदेश दिए थे। इसके अनुपालन में सुन्नी वक्फ बोर्ड को पिछली फरवरी में अयोध्या की सोहावल तहसील स्थित धुन्नीपुर गाँव में जमीन आवंटित की गई थी।

दिल्ली दंगों पर आ गई ऑपइंडिया की विस्तृत रिपोर्ट: हिन्दुओं को दोषी साबित करने के प्रयासों की पोल-खोल

दिल्ली में फ़रवरी 2020 के अंतिम हफ़्तों में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों पर ऑपइंडिया की रिपोर्ट अब खरीदने के लिए उपलब्ध है। इसे अमेज़न के किंडल पर उपलब्ध कराया गया है, जहाँ आप इसे मात्र 101 रुपए में खरीद कर पढ़ सकते हैं। दिल्ली में हुए जिन दंगों में जानमाल की भारी क्षति हुई और हिन्दुओं को निशाना बनाया गया, ऑपइंडिया की इस रिपोर्ट में उस समय हुए पूरे घटनाक्रम का विस्तृत विवरण है।

हालाँकि, लिबरल गैंग द्वारा पूरा प्रयास किया गया कि इन दंगों के लिए हिन्दुओं को अपराधी दिखा कर पेश किया जाए, असली इस्लामी कट्टरवादी दंगाइयों को बचाया जाए और मजहब के लोगों को पीड़ित घोषित किया जाए। लेकिन, पुलिस की चार्जशीट और हमारे ग्राउंड रिपोर्ट्स ने सच्चाई को सामने ला दिया। हालाँकि, मेनस्ट्रीम मीडिया इसे केंद्र सरकार द्वारा ‘समुदाय विशेष के माँगों की अनदेखी’ का परिणाम बता कर पेश करता रहा है।

ऑपइंडिया ने इन दंगों की ग्राउंड रिपोर्टिंग की थी, इसीलिए हमें इसका भान था कि मेनस्ट्रीम मीडिया और लिबरल गैंग इसे जिस तरीके से पेश कर रहा है, उसमें तनिक भी सच्चाई नहीं है। साथ ही हम ज्यादा से ज्यादा लोगों तक सच्चाई लेकर जाने के लिए भी बेचैन थे। फ़रवरी में क्या हुआ था और इन दंगों की साजिश कैसे काफी व्यवस्थित तरीके से रची गई, हमने अपनी रिपोर्ट में इसे पूरे विवरण के साथ बताया है।

असल में हमारा ये मानना है कि दिसंबर 2019 से ही इन दंगों की तैयारी शुरू हो गई थी और सीएए विरोध के नाम पर हिंसा का दौर प्रारम्भ कर दिया गया था। सच्चाई भी यही सामने आई है कि फ़रवरी के अंतिम हफ्ते में जो भी हुआ, वो उससे पहले के 4 महीनों में हुई घटनाओं का ही प्रतिफल था। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के दौरे के समय अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान खींचने और भारत को बदनाम करने के लिए ये सब किया गया।

इस रिपोर्ट को पढ़ने के बाद आपको पता चलेगा कि दिल्ली में हुए दंगों में हिन्दू दोषी नहीं थे जैसा कि प्रचारित करने का प्रयास किया गया, बल्कि, दंगाइयों के मन में हिन्दूघृणा किस कदर समाई हुई थी, इसके कई उदाहरण आपको मिल जाएँगे। सीएए विरोधी किस कदर हिन्दूफोबिया से ग्रसित थे, जो बाद में इन हिंसा का कारण बनी, उसकी सच्चाई ही आपको ऑपइंडिया की दिल्ली दंगों की रिपोर्ट में मिलेगी।

दंगे भले ही दिल्ली में हुए लेकिन सीएए विरोध के नाम पर हिन्दूघृणा और हिंसा का खेल तो पूरे देश में कई इलाक़ों में कई महीनों से चल रहा था और हमारी रिपोर्ट के अंत में आपको उन सभी घटनाओं का विवरण मिलेगा कि कैसे विरोध प्रदर्शन के नाम पर हिन्दूघृणा को अंजाम दिया गया। दिसम्बर 2019 और जनवरी 2020 में हुए प्रदर्शनों और हिंसा की घटनाओं का विवरण भी आपको इसमें मिलेगा।

हालाँकि, हमारी रिपोर्ट में हम ऐसा दावा नहीं कर रहे कि हमने इन महीनों में ऐसी एक-एक घटनाओं का विवरण इसमें डाला है लेकिन हाँ, हम ये ज़रूर कह सकते हैं कि हमने दिल्ली दंगों को प्रभावित करने वाली ऐसी कई घटनाओं को समेटने का प्रयास किया है और आप तक उसे पहुँचाने में पूरी मेहनत की है। इन 3-4 महीनों में क्या कुछ हुआ, उसे आप इस रिपोर्ट को पढ़ने के बाद आसानी से समझ पाएँगे।

हमारा जोर इस बात पर भी है किस-किस तरह राजनेताओं, गैर-सरकारी संगठनों, और सिविल सोसाइटी के लोगों ने इस्लामी कट्टरवादियों के साथ मिल कर देश में आतंक फैलाने की साजिश रची और दिल्ली में उसे अंजाम दिया। शाहीन बाग के उपद्रवियों को महान बनाने की कोशिश हो या वामपंथी संगठनों द्वारा इन दंगों को भड़काने के लिए कट्टरवादियों के साथ हाथ मिलाना, हमने इन सभी की पोल खोलने की कोशिश की है।

सबसे ज्यादा जरूरी चीज आपको ये जानने के लिए मिलेगी कि पूरे देश भर में किस तरह हिन्दू-विरोधी इस्लामी कट्टरपंथियों ने आतंक फैलाने की साजिश रची, प्रयास किया और दिल्ली में उसका दुष्परिणाम हमें देखने को मिला। हमारा प्रयास ये है कि प्रोपेगंडा की आड़ मे सच्चाई न छिपे और इसीलिए ये रिपोर्ट हम आपके सामने लेकर आए हैं। हमें आशा है कि आपको हमारी ये रिपोर्ट पसंद आएगी।

अंत में एक और जरूरी बात बतानी जरूरी है। हमें दिल्ली दंगों पर ऑपइंडिया की रिपोर्ट से जितने भी रुपए आएँगे, उसका 20% हिस्सा Nimittekam नामक संस्था को जाएगा। ये संस्था पाकिस्तान के पीड़ित हिंदुओं और सिखों की मदद करती है। आप इस लिंक पर क्लिक कर के हमारी इस रिपोर्ट का किन्डल वर्जन खरीद कर उसे पढ़ सकते हैं। हाँ, आप अपनी समीक्षा से हमें जरूर अवगत कराएँ।

बाबरी था और बाबरी रहेगा, ज्ञानवापी मस्जिद मामले को कोर्ट से बाहर फेंको: ओवैसी ने राम मंदिर भूमिपूजन में PM के जाने का किया विरोध

एआईएमआईएम के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी ने राम मंदिर भूमि पूजन को लेकर फिर ज़हर उगला है। हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अयोध्या दौरे का भी विरोध किया है। उन्होंने भूमि पूजन में पीएम मोदी के शामिल होने का विरोध करते हुए कहा कि उनका ऐसा करना उनकी उस शपथ का उल्लंघन होगा, जो उन्होंने प्रधानमंत्री पद ग्रहण करते हुए ली थी।

बकौल असदुद्दीन ओवैसी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अयोध्या राम मंदिर भूमि पूजन में हिस्सा लेना उनके द्वारा ली गई संवैधानिक शपथ का उल्लंघन है। साथ ही उन्होंने दावा किया कि सेकुलरिज्म हमारे संविधान की सबसे मूल संरचना है। उन्होंने कहा कि वो कभी नहीं भूलेंगे कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद 400 वर्षों तक खड़ा रहा था। उन्होंने 1992 बाबरी मस्जिद ध्वस्त करने वालों को भी ‘आपराधिक भीड़’ करार दिया।

ओवैसी ने कहा कि बाबरी मस्जिद एक मस्जिद था और हमेशा मस्जिद ही रहेगा। उन्होंने ‘आउटलुक’ को दिए गए इंटरव्यू में कहा कि ये उनकी आस्था है और कोई उनसे उनकी आस्था को नहीं छीन सकता। उन्होंने कहा कि अगर बाबरी को ध्वस्त नहीं किया जाता तो शायद राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय भी नहीं आता। उन्होंने इसके लिए दिसम्बर 1949 में मस्जिद में चोरी-चुपके मूर्ति रखने का भी आरोप लगाया।

उन्होंने दावा किया कि मजहब के लोग अपनी अगली जनरेशन को ये बताते रहेंगे कि मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया था। उन्होंने समुदाय की आवाजों को दबाने का भी आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि बतौर पीएम, मोदी हर धर्म के लोगों के लिए जिम्मेदार हैं और उनके लिए भी, जो किसी धर्म को नहीं मानते। उन्होंने कहा कि 1992 में तत्कालीन यूपी के सीएम और देश के पीएम बाबरी को बचाने में अक्षम रहे।

असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि समुदाय का पक्ष ये मानता है कि अयोध्या जजमेंट फैक्ट पर कम और आस्था पर ज्यादा निर्भर है। उन्होंने पूछा कि अगर ‘1991 प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट’ मौजूद है, फिर भी ज्ञानवापी मस्जिद और काशी विश्वनाथ का मामला कोर्ट में क्यों पेंडिंग पड़ा हुआ है? उन्होंने इस केस को तुरंत अदालत से बाहर फेंकने की माँग की। साथ ही उन्होंने डर जताया कि भाजपा सरकार इस एक्ट को हटा सकती है।

बता दें कि संबित पात्रा ने राम मंदिर भूमि पूजन का विरोध कर रहे लोगों के लिए ‘कहीं पूजन, कहीं सूजन’ हैशटैग का आइडिया दिया है। संबित पात्रा ने राम मंदिर का विरोध करने वालों को ‘दिलजले’ करार देते हुए ‘कहीं दीप जले, कहीं दिल’ वाले लता मंगेशकर के गाने को याद किया। उन्होंने कहा कि जब ऐसे लोगों का दिल जलेगा तो उसे सूँघ कर उन्हें परम सुख की अनुभूति होगी, जिसे एन्जॉय करना चाहिए।

पाकिस्तानी हिंदू रिफ्यूजी महिलाएँ बना रही हैं भारतीय सेना के लिए ‘आत्मनिर्भर राखियाँ’

इस साल रक्षाबंधन का त्योहार 03 अगस्त को मनाया जाएगा। इसके लिए सभी लोग अपने-अपने सुविधानुसार तैयारियों में लगे हैं। इन्हीं में से दिल्ली स्थित मजनू-का-टीला में रहने वाली पाकिस्तानी हिन्दू शरणार्थी भी हैं, जो सीमा पर तैनात सेना के जवानों के लिए राखियाँ बना रही हैं। ज्ञात हो कि पाकिस्तान के सिंध प्रांत के लगभग 120 हिंदू शरणार्थी परिवार मजनू का टीला गुरुद्वारे के पास बाढ़ के मैदान में रह रहे हैं।

इन राखियों की पैकेजिंग पर सबसे ख़ास बात ‘आत्मनिर्भर भारत’ का स्टीकर है। इन राखियों के जरिए एक ओर जहाँ ये पाकिस्तानी शरणार्थी भारतीय सेना को अपना आभार प्रकट कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर ये उन्हें आजीविका का साधन भी उपलब्ध करा रहा है।

RSS की ‘सेवा भारती संस्था’ ने दिल्ली स्थित मजनू-का-टीला में रहने वाली पाकिस्तान की महिला शरणार्थियों की सहायता की, ताकि वे राखी बनाकर अपनी आजीविका कमा सकें। इन्हीं शरणार्थियों में से एक, रानी ने कहा, “हम अपने भाइयों के लिए राखी बना रहे हैं, जो सीमाओं पर हमारे लिए लड़ रहे हैं। हम उन्हें धन्यवाद देना चाहते हैं, हमारा आशीर्वाद उनके साथ है।”

इंडिया टीवी की एक रिपोर्ट में इन्हीं में से एक महिला का कहना है कि सीमा पर हम लोगों के लिए जो अपनी जान दे रहे हैं और हमारी रक्षा कर रहे हैं हम उनके लिए ये राखियाँ बना रहे हैं। उनका कहना है कि ये अपने वतन के लिए लड़ने वाले फौजियों के लिए हमारी दुआएँ हैं।

गौरतलब है कि मजनू का टीला में रह रहीं महिलाओं को RSS की ‘सेवा भारती संस्था’ ने राखी बनाने का काम दिया है, जिसके बदले इन्हें मेहनताना भी दिया जायेगा। गलवान घाटी में तैनात जवानों को ये राखियाँ सेवा भारती संस्था के द्वारा पहुँचाई जाएँगी।

ज्ञात हो कि आरएसएस की इसी सेवा भारती संस्था ने देशभर में कोरोना वायरस के दौरान जारी लॉकडाउन के के बीच गरीब और बेसहारा लोगों को राशन-पानी और तमाम जरूरतों के लिए व्यापक प्रबंध और प्रयास किए हैं।

राम मंदिर के नीचे ‘टाइम कैप्सूल’ मनगढ़ंत कहानी, खुद राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव ने बताया फर्जी

अयोध्या श्रीराम मंदिर भूमि पूजन की तारीख नजदीक आते-आते अफवाहों का बाजार भी गर्म होता जा रहा है। इनमें से एक अफवाह किसी ‘टाइम कैप्सूल’ को दबाने को लेकर भी खूब जोर पकड़ रही है। राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव, चंपत राय ने जमीन के नीचे एक ‘टाइम कैप्सूल‘ दबाने की रिपोर्टों का खंडन करते हुए कहा कि टाइम कैप्सूल रखने के संबंध में सभी रिपोर्टें फर्जी और बेबुनियाद हैं। उन्होंने कहा कि उन ख़बरों पर विश्वास नहीं किया जाना चाहिए।

समाचार एजेंसी ANI के अनुसार, राम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने कहा है कि 5 अगस्त को राम मंदिर निर्माण स्थल पर जमीन के नीचे टाइम कैप्सूल रखने की सभी खबरें झूठी हैं, ऐसी किसी भी अफवाह पर विश्वास न करें।

टाइम कैप्सूल मामला

कुछ ही दिनों से ऐसी खबरों को लगभग सभी समाचार चैनल और मीडिया द्वारा प्रकाशित किया जा रहा है। इनमें दावा किया गया कि भविष्य में कभी मंदिर निर्माण को लेकर किसी विवादित परिस्थितियों को सामना न करना पड़े, इसके लिए श्रीराम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट राम मंदिर निर्माण स्थल पर जमीन में लगभग 200 फीट नीचे एक टाइम कैप्सूल रखेगा।

इन अफवाहों में यह भी दावा किया गया है कि इसका मकसद यह है कि सालों बाद भी यदि कोई श्रीराम जन्मभूमि के बारे में जानना चाहे तो वो इससे जान सकता है। कई मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया कि राम जन्मभूमि के इतिहास को सिद्ध करने के लिए जितनी लंबी लड़ाई कोर्ट में लड़नी पड़ी है, उससे यह बात सामने आई है कि अब जो मंदिर बनवाएँगे, उसमें एक ‘टाइम कैप्सूल’ बनाकर दो हजार फीट नीचे डाला जाएगा।

इसके पीछे जो तर्क रखे जा रहे थे उनके अनुसार, भविष्य में जब कोई भी इतिहास देखना चाहेगा तो श्रीराम जन्मभूमि के संघर्ष के इतिहास के साथ यह तथ्य भी निकल कर आएगा, जिससे कोई भी विवाद जन्म ही नहीं लेगा।

फिलहाल, राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय, ने ऐसी सभी खबरों पर विराम लगते हुए कहा है कि 5 अगस्त को राम मंदिर कंस्ट्रक्शन साइट की जमीन के नीचे टाइम कैप्सूल रखे जाने की खबर गलत एवं मनगढ़ंत है। उन्होंने कहा – “मैं सबसे आग्रह करूँगा कि जब राम जन्मभूमि ट्रस्ट की तरफ से कोई अधिकृत वक्तव्य जाए, उसे ही आप सही मानें।

कश्मीरी अलगाववादी सैयद अली शाह गिलानी को Pak का सर्वोच्च सम्मान, उसके नाम पर यूनिवर्सिटी भी

पाकिस्तान ने जम्मू कश्मीर के अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी को अपने मुल्क के सर्वोच्च सम्मान निशान-ए-पाक से नवाजा है। साथ ही उसके नाम पर विश्वविद्यालय बनाने का भी निर्णय लिया गया है। 90 साल के सैयद अली शाह गिलानी ने हाल ही में अलगाववादी संगठनों से खुद को अलग करते हुए रिटायरमेंट की घोषणा कर दी थी। अब पाकिस्तान ने अपने प्यादे को सम्मानित किया है।

भारत-विरोधी बयानों के लिए कुख्यात हुर्रियत नेता सैयद आली शाह गिनानी इससे पहले भी पाकिस्तान के पक्ष में बयान देता रहा है। पाकिस्तानी सीनेटर मुस्तक अहमद ने गिलानी को निशान-ए-पाकिस्तान देने का प्रस्ताव लाया, जिसे पाकिस्तान की संसद ने ध्वनिमत से पारित कर दिया। ये पाकिस्तान का सबसे बड़ा सिविलियन अवॉर्ड है। जम्मू कश्मीर में अलगाववादी गतिविधियों के लिए उसे ये अवॉर्ड दिया गया है।

हाल ही में सैयद अली शाह गिलानी ने अलगाववादी संगठनों के फोरम हुर्रियत कॉन्फ्रेंस को अलविदा कह दिया था। अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के साथ ही हाउस अरेस्ट किए गए गिलानी ने हुर्रियत कॉन्फ्रेंस से इस्तीफा दे दिया था। हालाँकि, गिलानी ने इस्तीफे के कारणों का जिक्र नहीं किया था और कहा था कि कुछ ऐसे मुद्दे थे, जिनके कारण उन्हें इस्तीफा देने के लिए बाध्य होना पड़ा

पिछले साल अप्रैल में सैयद अली शाह गिलानी पर आयकर विभाग ने बड़ी कार्रवाई करते हुए दिल्ली की संपत्ति को सीज कर दिया था। आयकर विभाग के अधिकारियों ने दिल्ली के मालवीय नगर के खिड़की एक्सटेंशन स्थित प्रॉपर्टी को सीज कर दिया था। विभाग के कर वसूली अधिकारी (टीआरओ) ने 1996-97 से लेकर 2001-02 के बीच गिलानी द्वारा ₹3.62 करोड़ आयकर का भुगतान करने में विफल रहने पर इस घर को सील किया था।

ISI एजेंटों के साथ दिखे कई बॉलीवुड कलाकार, भारतीय खुफिया एजेंसियों की चेतावनी के बाद भी हुई संदेहपूर्ण डीलें: रिपोर्ट्स

बॉलीवुड के कई कलाकारों के बारे में पिछले दिनों खुलासा हुआ था कि उनके संबंध ISI समर्थित पाकिस्तानी एजेंटों से हैं। अब टाइम्स नाऊ की खबर है कि कई बेनाम सितारों ने भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसियों के चेताने के बाद भी ऐसे एजेंटों के साथ कई गुप्त डीलें की जो कथिततौर पर ‘संदेहपूर्ण और अस्पष्ट’ (shady and unclean) है।

रिपोर्ट बताती है कि कई बॉलीवुड एक्टर्स ऐसे हैं जो पाकिस्तानी कलाकरों समेत ISI समर्थित एजेंटों के साथ जुड़े हुए हैं और जिन्होंने उनके साथ मिलकर कनाडा व अमेरिका जैसे देशों में प्रदर्शन भी किया। इसलिए, इन्ही चीजों को देखते हुए अब कनाडा और यूएस के अधिकारी ऐसे एजेंटों की सूची को एकत्रित कर रहे हैं जिनके संबंध ISI से हैं और वह दोनों देशों में एक्टिव भी हैं।

इस मामले में जाँच के बाद पूरी सूची प्रवासी नेताओं को सौंपी जाने की बात कही जा रही है। साथ ही ये भी बताया जा रहा है कि इन्हें ये जिम्मेदारी दी जाएगी कि वे इन एजेंटों के बारे में उनके बॉलीवुड कलाकारों व आमजनता को जागरूक करें।

गौरतलब है कि अभी कुछ दिन पहले ही इस मामले ने तूल पकड़ा था जब पाकिस्तान मूल के अमेरिका निवासी रेहान सिद्दकी को भारत ने ब्लैकलिस्ट किया और बॉलीवुड व ISI के नेक्सस का खुलासा हुआ।

रेहान पर आरोप लगा था कि वह बॉलीवुड से जुड़े इवेंट के आयोजन की आड़ में भारत विरोधी और खासकर कश्मीर प्रोपेगेंडा को फंडिंग करता था। उसकी संदिग्ध गतिविधियों पर प्रवासी भारतीयों की नजर इस साल की शुरुआत में पड़ी थी।

यहाँ बता दें कि पिछले बुधवार को कई बड़े कलाकारों की पाकिस्तानियों के साथ तस्वीरें इंटरनेट पर वायरल हुई थी। इसके बाद से इन कलाकारों की भूमिका और नज़रिए पर सवाल उठने लगे कि आखिर बॉलीवुड के लोगों का ऐसे “भारत विरोधी” लोगों से इतना सीधा संपर्क कैसे है?

एक तस्वीर में शाहरुख खान और उनकी पत्नी एक अलगाववादी नेता के साथ नज़र आ रहे थे। कैलिफोर्निया के रहने वाले अलगाववादी नेता टोनी अशाई पर कश्मीर के युवकों को भारत के विरुद्ध भड़काने का आरोप है। शाहरुख के टोनी के साथ बहुत अच्छे संबंध बताए जाते हैं।

यह भी बताया जा रहा है कि टोनी की दुबई, अबू धाबी और लॉस एंजिलिस में अच्छी-खासी सम्पत्ति है। उसके बेटे बिलाल अशाई ने कश्मीर के युवकों से हथियार उठाने की अपील की थी। 

इसके अलावा श्रीनगर के सामाजिक कार्यकर्ता अल सिकंदर ने अपने आधिकारिक ट्विटर एकाउंट से सिलसिलेवार ट्वीट किया था। जिसमें उन्होंने टोनी/अज़ीज़ पर कई गंभीर आरोप लगाए थे। ट्वीट में उन्होंने लिखा कि टोनी आईएसआई द्वारा प्रायोजित आतंकवादी संगठन जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट का सदस्य रह चुका है। वहीं शाहरुख खान का कहना है कि उन्होंने टोनी से बतौर आर्किटेक्ट मदद ली थी। 

J&K में सुरक्षा बलों को भूमि अधिग्रहण के लिए अब NOC की ज़रूरत नहीं, केंद्र ने वापस लिया 1971 का आदेश

जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए लगभग 1 वर्ष पूरे हो गए हैं और इसके साथ ही भारतीय सुरक्षा बलों के लिए सरकार नई सौगात भी लेकर आई है। अब सुरक्षा बलों के जवानों को राज्य में भूमि के अर्जन/अधिग्रहण के लिए ‘नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट’ (NOC) लेने की कोई ज़रूरत नहीं है। इससे भारतीय सेना, बीएसएफ, सीआरपीएफ व गृह मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले अन्य सशस्त्र बलों को फायदा मिलेगा।

इससे पहले के आदेश के हिसाब से सुरक्षा बलों के जवानों को जमीन अधिग्रहण के लिए NOC सर्टिफिकेट लेने लेने की आवश्यकता पड़ती थी, जिसके लिए उन्हें काफी जद्दोजहद करनी होती थी। अब जब ये आदेश वापस हो गया है, भूमि अधिग्रहण के लिए सेना के लिए रास्ते खुल गए हैं। राजस्व विभाग के प्रमुख सचिव पवन कोतवाल ने सम्बन्ध में शुक्रवार (जुलाई 24, 2020) को एक आदेश जारी किया।

इससे पहले सुरक्षा बलों के जवानों को गृह मंत्रालय के पास NOC के लिए आवेदन करना होता था। अब इससे राहत मिल गई है। असल मे सुरक्षा बलों को कई क्षेत्रों में कन्स्ट्रक्शन कार्य करने होते हैं। अब कुछ क्षेत्रों को चुन कर उसे ‘रणनीतिक क्षेत्र’ घोषित करने में भी आसानी होगी, जहाँ सुरक्षा बलों के जवान आसानी से निर्माण-कार्य कर सकें और जरूरत पड़ने पर उस क्षेत्र का इस्तेमाल कर सकें।

जम्मू कश्मीर चूँकि अब केंद्र शासित प्रदेश है, इसीलिए अब यहाँ केंद्र सरकार के नियम-कानून लागू हो रहे हैं। केंद्र के नियम लागू होने के बाद जम्मू कश्मीर में अब राइट टू फेयर कंपनसेशन एंड ट्रांसपरेंसी इन लैंड इक्वीजिशन, रिहैबिलिशन एंड रिसेटलमेंट एक्ट, 2013 के तहत भूमि अधिग्रहण का रास्ता भी साफ हो गया है। जिस सर्कुलर को वापस लेने के बाद ये संभव हो सका है, वो 1971 में आया था।

अब जिले में ही सारा कार्य हो जाएगा क्योंकि सभी जिलों के डीएम को भूमि अधिग्रहण संबंधी कार्रवाई आगे बढ़ाने के लिए अनुमति और निर्देश दे दिए गए हैं। रणनीतिक कार्यों के लिए नेवी, एयरफोर्स और सशस्त्र बलों को अन्य राज्यों में पहले से ही ये सुविधाएँ हासिल हैं लेकिन जम्मू कश्मीर में ऐसा नहीं हो पाता था। राज्यों में पुलिस को भी ये अधिकार मिले हुए हैं। लोगों ने केंद्र सरकार के इस फैसले का स्वागत किया है।