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DU में इंग्लिश के प्रोफेसर हनी बाबू गिरफ्तार, नक्सली गतिविधियों और साजिश रचने का है आरोप

भीमा कोरेगाँव यलगार परिषद मामले में राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने मंगलवार (जुलाई 28, 2020) को दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर हनी बाबू एमटी पुत्र कुन्हु मोहम्मद को गिरफ्तार किया। NIA ने प्रोफेसर पर माओवादी विचारधारा फैलाने का आरोप लगाया है।

दिल्ली यूनिवर्सिटी के अंग्रेजी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हनी बाबू को बुधवार को मुंबई में NIA की विशेष अदालत के समक्ष पेश किया जाएगा। NIA के प्रवक्ता ने बताया कि 54 वर्षीय प्रोफेसर हनी बाबू उत्तर प्रदेश के गौतम बुद्ध नगर के रहने वाले हैं। वह डीयू के इंग्लिश डिपार्टमेंट में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार एनआईए को जाँच के दौरान पता चला कि हनी बाबू नक्सली गतिविधियों और माओवादी विचारधारा का प्रचार कर रहे थे। साथ ही अन्य आरोपितों के साथ साजिश रचने में शामिल भी थे। हनी बाबू को मुंबई में एनआईए की विशेष कोर्ट में आज पेश किया जाएगा। एनआईए ने इस साल जनवरी में इस मामले की जाँच शुरू की थी और इसके बाद 14 अप्रैल को आनंद तेलतुंबड़े और गौतम नौलखा को गिरफ्तार किया था।

इससे पहले पिछले वर्ष भीमा कोरेगाँव हिंसा मामले में पुणे पुलिस और नोएडा पुलिस की संयुक्त टीम ने दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हनी बाबू के नोएडा स्थित आवास पर छापेमारी भी की थी। यह छापेमारी भी प्रोफेसर सिंह के नक्सलियों से सम्बन्ध को लेकर की गई थी।

हनी बाबू डीयू के प्रोफ़ेसर हैं और ‘द कमिटी ऑफ सिविल राइट्स एक्टिविस्ट्स’ के सदस्य हैं। इस कमिटी का गठन जीएन साईबाबा द्वारा किया गया था। डीयू प्रोफ़ेसर साईबाबा को 2017 में महाराष्ट्र की एक अदालत द्वारा आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई थी। साईबाबा के प्रतिबंधित माओवादी संगठन सीपीआई से सम्बन्ध सामने आए थे।

क्या है मामला

31 दिसंबर 2017 को यलगार परिषद सम्मेलन का आयोजन किया गया था। यहाँ कुछ बुद्धिजिवियों द्वारा भड़काऊ भाषणों देने के बाद अगले दिन 1 जनवरी 2018 को पुणे जिले के भीमा कोरेगाँव युद्ध स्मारक के निकट हिंसा भड़क गई थी। इसमें एक युवक की जान चली गई थी। साथ ही करोड़ों की सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान हुआ था। इस मामले में अरुण थॉमस फेरेरिया, रोना जैकब विल्सन, सुधीर प्रल्हाद धवले समेत 19 लोगों को आरोपित बनाया गया था।

टीपू सुल्तान, हैदर अली 7वीं के चैप्टर से बाहर: कर्नाटक सरकार पर शिक्षा में सांप्रदायिकता घुसाने का कॉन्ग्रेस का आरोप

कर्नाटक की येदियुरप्पा सरकार ने कक्षा 7 के छात्र-छात्राओं के इतिहास के सिलेबस में बदलाव करते हुए इसमें से वो चैप्टर हटा दिया है, जो मैसूर के शासक टीपू सुल्तान और उसके पिता हैदर अली पर आधारित था। सरकार ने बच्चों का अकादमिक सिलेब्स कम करने के मद्देनजर ये निर्णय लिया है क्योंकि कोरोना वायरस संक्रमण आपदा के बीच क्लासेज नहीं चल रही हैं। हालाँकि, कक्षा 6 और 10 में पढ़ाया जाने वाला ‘टाइगर ऑफ मैसूर’ चैप्टर फिलहाल बना रहेगा।

कर्नाटक टेक्स्ट बुक सोसाइटी के डायरेक्टर मद्दे गौड़ा ने कहा कि कोरोना वायरस के कारण स्कूलों के खुलने में देरी हो रही है और इसीलिए छात्रों का सिलेब्स 30% कम किया जा रहा है ताकि उन पर से बोझ कम हो। उन्होंने बताया कि इसी क्रम में कक्षा 7 में पढ़ाए जाने वाले टीपू सुल्तान वाले चैप्टर को निकाल बाहर किया गया है। उन्होंने कहा कि टीपू सुल्तान का चैप्टर हटाने से छात्रों को कोई हानि नहीं होगी।

इसके पीछे उन्होंने तर्क दिया कि छात्रों ने टीपू सुल्तान के बारे में कक्षा 6 में ही पढ़ रखा है और कक्षा 10 में फिर से उसके बारे में पढ़ेंगे ही, ऐसे में इसे हटाए जाने से कोई नुकसान नहीं होगा। ‘डिपार्टमेंट स्टेट एजुकेशन रिसर्च एण्ड ट्रैनिंग’ (DSERT) की वेबसाइट पर कम हुए सिलेबस को अपलोड कर दिया गया है। यहाँ से संसाधन लेकर ऑनलाइन पढ़ाई होगी। शिक्षक और छात्र इसका फायदा उठा सकेंगे।

इस फैसले ने कॉन्ग्रेस को नाराज कर दिया है और उसने इसका विरोध किया है। कॉन्ग्रेस का कहना है कि भाजपा सांप्रदायिक राजनीति खेल रही है और इसी क्रम में उसने टीपू सुल्तान पर आधारित चैप्टर को बच्चों के सिलेब्स से हटा दिया है। राज्य की विपक्षी पार्टी ने कहा कि भाजपा अब शिक्षा में सांप्रदायिकता घुसा रही है। हालाँकि, लेखक बंगारु रामचन्द्रप्पा की अध्यक्षता में गठित विशेषज्ञों की कमिटी ने नवंबर 2019 में ही कर्नाटक सरकार को टीपू सुल्तान को सिलेब्स से हटाने की सलाह दी थी।

कक्षा 7 के इतिहास की पुस्तक में टीपू सुल्तान को अँग्रेजों से लड़ने वाला बताया गया था और उस समय के बाकी स्वतंत्रता सेनानियों के साथ रखा गया था। सरकार ने बताया है कि टीपू सुल्तान और हैदर अली पर आधारित उस चैप्टर को डिलीट कर दिया गया है। कहा गया है कि विशेषज्ञों की समिति ने ही ये फैसला लिया है, जिसमें सरकार ने कोई हस्तक्षेप नहीं किया है। अकादमिक दिनों की संख्या अब 220 की जगह 120 रह गई है, इसीलिए इसे हटाया गया।

कर्नाटक के कोडागु जिले में टीपू सुल्तान का कोई नाम भी नहीं सुनना चाहता है और लोग उससे घृणा करते हैं क्योंकि कोडवा (कुर्गी) लोगों का मानना है कि टीपू सुल्तान ने उसके समुदाय के हजारों लोगों को निर्ममता से मौत के घाट उतार दिया था और कइयों को जबरन इस्लाम कबूल करने के लिए बाध्य किया था। लोगों को प्रताड़ित कर के इस्लाम कबूल करने के लिए जबरदस्ती की गई थी।

मांड्या जिले के मेलकोट में भी टीपू सुल्तान से लोग नफरत करते हैं। उसने मंदिरों के इस शहर में मांड्यम अयंगर समुदाय के कई लोगों को मार डाला था। उसने दीपावली के दिन ही वहाँ कत्लेआम मचाया था। वहाँ के लोगों का दोष बस इतना था कि उन्होंने मैसूर के महाराज का समर्थन किया था और टीपू सुल्तान इससे नाराज था। कॉन्ग्रेस सत्ता में आने पर ‘टीपू जयंती’ मनाती रही है, जिसका भाजपा विरोध करती है।

बता दें कि शाहीन बाग में सीएए विरोधी उपद्रवियों ने भी टीपू सुल्तान का नाम लेकर मोदी सरकार और हिंदुओं को धमकाया था। एक जिहादी कट्टरवादी ने कहा था – “सुन लो मोदी, हमारी माँ-बहनों ने टीपू सुल्तान को जन्म दिया है और तुम आजादी के 70 बाद हमसे नागरिकता का सबूत माँगते हो, कहते हो कि हमें नागरिकता रजिस्टर की प्रक्रिया से गुजरना होगा। ये लाल किला जहाँ से झंडा फहराते हो, ये क्या तुम्हारे पूर्वजों ने बनवाया? जहाँ ट्रम्प को लेकर गए थे वो ताजमहल क्या तुम्हारे पूर्वजों ने बनवाया था?”

माँ दुर्गा की प्रतिमा स्थापना को लेकर विवाद, हिंदूवादी नेता शंभूलाल की हत्या: सलीम फरार, UP पुलिस पड़ी है पीछे

उत्तर प्रदेश के बहराइच में मटेरा के पास एक गाँव बिबियापुर में सोमवार (जुलाई 27, 2020) को एक 60 वर्षीय हिंदूवादी नेता शंभूलाल की गोली मारकर हत्या कर दी गई। मामला दो समुदाय से जुड़ा हुआ होने के कारण गाँव में तनाव की स्थिति है।

हिंदूवादी नेता शंभूलाल की हत्या के बाद कहा जा रहा है कि पिछले साल दुर्गा पूजा के दौरान माँ दुर्गा की प्रतिमा स्थापना को लेकर विवाद हुआ था। इसके बाद ही हिंदूवादी नेता की हत्या की साजिश रची गई।

सोमवार रात वारदात को अंजाम देने के बाद सभी आरोपित मौके से फरार हो गए। बाद में एएसपी ग्रामीण व नानपारा सीओ ने घटना स्थल का निरीक्षण कर आरोपितों को पकड़ने के निर्देश दिए। साथ ही मामला 2 समुदायों से जुड़ा देखकर गाँव में भारी संख्या में फोर्स की तैनाती कर दी गई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 60 वर्षीय शंभू लाल नवदुर्गा पूजा समिति के अध्यक्ष थे। साथ ही नवरात्रों के मौके पर गाँव में मूर्ति स्थापना कराकर उसकी पूजा-पाठ कराने की जिम्मेदारी भी उन्हीं के कंधों पर थी।

उनकी पत्नी कहती हैं कि पिछले साल गाँव में जब प्रतिमा रखी गई थी, तभी से एक विशेष समुदाय से प्रतिमा न रखने को लेकर विवाद हो गया था। इसी बात को लेकर गाँव के ही मालिक शेख उर्फ सलीम से विवाद चल रहा था। लेकिन सोमवार की देर शाम यह विवाद उस समय बढ़ा, जब वह दुकान पर सिगरेट पीने गए। इस बीच दोबारा उनकी कहासुनी हो गई।

बाद में उसी रात में जब सब लोग खाना खाकर सोने चले तो अचानक रात के 12 बजे के आसपास गोली चलने की आवाज आई। सबने बाहर जाकर देखा तो शंभू खून से लथपथ पड़े थे। उन्हें देखते ही घर में कोहराम मच गया। हड़बड़ी में किसी तरह उन्हें मेडिकल कॉलेज पहुँचाया गया। जहाँ चिकित्सकों ने उन्हें लखनऊ रेफर किया। लेकिन ट्रॉमा सेंटर ले जाते हुए उनकी मौत हो गई।

शंभलालू के शव को घर लाते ही ग्रामीण इकट्ठा होना शुरू हो गए। मौके पर एसएसपी अशोक कुमार व सीओ नानपार जंग बहादुर यादव पहुँचे। उन्होंने परिजनों से बातचीच कर मामले की पूरी जानकारी ली और मालिक शेख उर्फ सलीम के ख़िलाफ़ हत्या व एससी/एसटी एक्ट का मुकदमा दर्ज किया। हालाँकि गिरफ्तारी अभी इस मामले में नहीं हो पाई है क्योंकि सलीम घटना के बाद से फरार है।

ग्रामीण बताते हैं कि पिछली बार नवरात्र में मूर्ति स्थापना को लेकर कहासुनी हुई थी। जिसके बाद से गाँव में प्रतिमा को पहली वाली जगह से हटाकर दूसरे स्थान पर स्थापित किया गया था। बावजूद इसके दूसरे समुदाय के लोग मूर्ति स्थापना को लेकर रंजिश रखते थे।

ऑपइंडिया ने इस संबंध में नानपारा थाने से संपर्क करने का प्रयास किया। लेकिन हर बार कॉल व्यस्त होने के कारण संपर्क नहीं हो सका। अन्य मीडिया रिपोर्ट्स में एसपी के बयान का हवाला देते हुए बताया गया है कि इस मामले में नामजद मुकदमा दर्ज हुआ है। पुलिस हर बिंदु पर जाँच कर रही है। आरोपित को जल्द हिरासत में लिया जाएगा।

जानकारी के अनुसार, शंभूलाल वैसे तो अपने परिवार का पालन-पोषण परचून की दुकान चलाकर करते थे। लेकिन समिति अध्यक्ष होने के कारण उनकी पहचान हिंदूवादी नेता के रूप में स्थापित हो चुकी थी। वह नवरात्रि ही नहीं, बल्कि हर पर्व में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे। उनकी इसी सक्रियता को देखकर वह कुछ लोगों की आँख में खटकते थे। अब उनकी हत्या के बाद गाँव का माहौल तनावपूर्ण है। उनके शव का पोस्टमॉर्टम करवाकर पुलिस ने घरवालों को सौंप दिया है।

शरजील इमाम की आवाज मैच, उसके भाषणों से जामिया में भड़की थी हिंसा: राष्ट्रद्रोह केस में फॉरेंसिक लैब में पुष्टि

जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी और अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में जेएनयू के छात्र नेता शरजील इमाम द्वारा दिए गए राष्ट्रविरोधी भाषण में उसकी ही आवाज़ है। ‘द सेंट्रल फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (CFSL) ने इसकी पुष्टि की है। लैब रिपोर्ट के हवाले से ऐसा दावा किया गया है।

दिल्ली पुलिस ने सिटी कोर्ट के समक्ष लैब रिपोर्ट के साथ-साथ शरजील इमाम द्वारा दिए गए भाषणों की पूरी ट्रांसक्रिप्ट भी पेश की है। बता दें कि 13-15 दिसंबर, 2020 को जामिया में हुई हिंसा से पहले शरजील इमाम ने वहाँ भड़काऊ भाषण दिया था।

‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के अनुसार, शरजील इमाम के ख़िलाफ़ ये लैब रिपोर्ट एक बड़ा सबूत हो सकती है। शरजील इमाम के भाषणों के कारण जामिया में हिंसा भड़की, ये साबित करने में अब पुलिस को आसानी होगी। पुलिस ने शरजील पर आईपीसी को धारा 124A (राष्ट्रद्रोह) लगाई है।

शरजील ने अपने भाषण में उत्तर-पूर्वी भारत और शेष भारत को जोड़ने वाले ‘चिकेन्स नेक’ को ब्लॉक कर के ज़रूरी सामग्रियों की सप्लाई रोकने की बात कही थी। इस तरह उसने भारत के टुकड़े-टुकड़े करने के देशद्रोही मंसूबे को आगे बढ़ाया था।

अप्रैल 20, 2020 को आई लैब की रिपोर्ट में कहा गया है कि ये आवाज़ शरजील इमाम की ही प्रतीत होती है। पुलिस का कहना है कि शुरू में तो शरजील इमाम ने अपने आवाज़ का सैम्पल देने से इनकार कर दिया था लेकिन फरवरी 12 को पुलिस के आदेश के बाद उसे ऐसा करने के लिए बाध्य होना पड़ा। फिर उसके जामिया वाले भाषण से इसे मैच किया गया। हालाँकि, फॉरेंसिक रिपोर्ट में ‘संभावित’ शब्द का प्रयोग किया गया है।

लेकिन, दिल्ली पुलिस ने कोर्ट को कहा है कि ये सबूत इस निष्कर्ष के लिए काफी है कि शरजील इमाम ने भड़काऊ भाषण दिए थे और इसके कारण हिंसा हुई। दिल्ली पुलिस ने कहा है कि अगर आवाज़ मैच नहीं हुई होती तो CFSL अपनी रिपोर्ट इसकी स्पष्टता से जिक्र कर देता। हालाँकि, उसके वकील अहमद इब्राहिम का कहना है ये चीजें महत्वपूर्ण नहीं हैं। इमाम ने पटियाला हाउस कोर्ट में अर्जी देकर आरोप लगाया था कि उसके भाषण के साथ छेड़छाड़ की गई है।

साथ ही उसने आरोप लगाया कि उसे उसके भाषण से कुछ पंक्तियाँ बोलने के लिए जबरदस्ती बाध्य किया गया था। वकील का कहना है कि ट्रायल के दौरान इसका भी ध्यान रखा जाएगा। पुलिस का कहना है कि शरजील इमाम ने CAA के फैक्ट्स को ग़लत तरीके से पेश कर के पैम्पलेट छपवाए थे और लोगों को भड़काने के लिए बँटवाया था। हाल ही में उसे कोरोना पॉजिटिव भी पाया गया है।

शरजील इमाम के खिलाफ दायर चार्जशीट में कहा गया है, ‘‘शरजील इमाम पर देश के खिलाफ भाषण देने और एक विशेष समुदाय को अवैध गतिविधियों में शामिल होने के लिए भड़काने का आरोप है, जो राष्ट्र की संप्रभुता और एकता के खिलाफ है। संशोधित नागरिकता कानून के विरोध की आड़ में उसने एक विशेष समुदाय के लोगों को राजमार्ग बाधित करने के लिए उकसाया और ‘चक्का जाम’ कराया जिससे सामान्य जनजीवन बाधित हुआ।’’

दिल्ली पुलिस के वकीलों पर केजरीवाल सरकार ने लगाई रोक, दिल्ली दंगों में AAP नेताओं पर लगे हैं गंभीर आरोप

दिल्ली के एलजी अनिल बैजल द्वारा समर्थित वकीलों के पैनल को खारिज करने का निर्णय दिल्ली कैबिनेट की बैठक में लिया गया। इस बैठक की अध्यक्षता मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने स्वयं की।

कई अदालतों ने दिल्ली दंगों की जाँच की ‘निष्पक्षता’ पर ‘गंभीर सवाल’ उठाए हैं – यह तर्क देते हुए आम आदमी पार्टी की सरकार ने दिल्ली पुलिस द्वारा प्रस्तावित पैनल को खारिज कर दिया। केजरीवाल सरकार ने कहा, “कैबिनेट ने पाया कि ऐसी स्थिति में इन मामलों की स्वतंत्र और निष्पक्ष सुनवाई दिल्ली पुलिस द्वारा चुने गए वकीलों के पैनल द्वारा संभव नहीं होगी।”

दिल्ली सरकार की कैबिनेट ने इस मीटिंग में गृह विभाग को निर्देश दिया कि अदालत में दिल्ली दंगों से संबंधित कानूनी लड़ाई और न्याय के लिए ‘देश के सर्वश्रेष्ठ वकीलों का निष्पक्ष पैनल’ गठित किया जाए।

दिलचस्प यह है कि केजरीवाल सरकार की यह मीटिंग एलजी अनिल बैजल के निर्देश के बाद ही की गई। एलजी अनिल बैजल ने 16 जुलाई को मुख्यमंत्री केजरीवाल को एक पत्र लिखा था। उस पत्र के अनुसार दिल्ली सरकार को एक सप्ताह का समय दिया था कि वह उन वकीलों के पैनल पर फैसला करे, जिन्हें वे दिल्ली दंगों की कानूनी लड़ाई के लिए नियुक्त करना चाहते हैं।

केजरीवाल सरकार और एलजी बैजल के बीच इस मुद्दे को लेकर पिछले कुछ महीनों से संघर्ष चल रहा था। अब दिल्ली कैबिनेट का कहना है कि ट्रायल को निष्पक्ष रखने के लिए ये ज़रूरी है कि सरकारी वकीलों को पुलिस से स्वतंत्र रखा जाए। इसी कारण को गिनाते हुए दिल्ली कैबिनेट ने पुलिस द्वारा सुझाए गए वकीलों के पैनल को नकार देने की माँग की। दिल्ली पुलिस इस मामले में 6 वकीलों का एक पैनल गठित करना चाहती है।

सीएए हिंसा की घटनाओं और सांप्रदायिक हिंसा के मामलों को मिला दें तो इस मामले में कुल 85 केस बनते हैं, जिसके लिए दिल्ली पुलिस द्वारा सुझाए गए वकीलों के पैनल में तुषार मेहता और अमन लेखी जैसे बड़े वकीलों के नाम शामिल हैं। ये सभी दिल्ली हाईकोर्ट में प्रॉसिक्यूशन की तरफ से पेश होने वाले हैं। बता दें कि दिल्ली में प्रशासनिक व्यवस्था ऐसी है कि पुलिस तो एलजी के अंतर्गत आती है लेकिन प्रॉसिक्यूशन सरकार के अंतर्गत आता है।

अस्वस्थ सत्येंद्र जैन की तरफ से गृह मंत्रालय संभाल रहे दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने पहले ही कह दिया था कि वो केंद्र सरकार द्वारा गठित किए गए वकीलों के पैनल को नहीं चाहते क्योंकि राहुल मेहरा के नेतृत्व वाली वकीलों की टीम इस मामले को संभालने में पूरी तरह सक्षम है। हालाँकि, एलजी ने इस फैसले से नाराज़गी जताते हुए केजरीवाल सरकार को 1 सप्ताह के भीतर फैसला लेने को कहा था।

अगर एलजी और दिल्ली सरकार में सहमति नहीं बनती है तो वो इस मामले को राष्ट्रपति के पास भेज सकते हैं। इससे पहले मई में भी इस तरह का टकराव सामने आया था जब दिल्ली पुलिस ने अपने वकीलों की 11 सदस्यीय टीम को हाईकोर्ट में प्रतिनिधित्व के लिए नियुक्त किया था। दिल्ली सरकार ने इसे जब दूसरी बार नकारा था तो मामला राष्ट्रपति के पास पहुँचा था। एलजी ने पुलिस को ट्रायल कोर्ट्स में इस टीम के साथ काम करने की अनुमति दे दी थी।

AAP नेताओं पर दंगे करने और दंगाइयों के बचाव का आरोप

आपको बता दें कि दिल्ली पुलिस ने मंगलवार (जून 2, 2020) को बड़ी कार्रवाई करते हुए फ़रवरी के अंतिम सप्ताह में दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों के मामले में 2 चार्जशीट दायर की है। इसमें आम आदमी पार्टी के (अब निलंबित) पार्षद ताहिर हुसैन को मुख्य आरोपित बनाया गया है।

दिल्ली हिंसा मामले में पार्षद ताहिर हुसैन को जाँच पूरी होने तक 27 फरवरी 2020 को आम आदमी पार्टी से निलंबित कर दिया गया। लेकिन थोड़ी देर बाद ही पार्टी के ‘अज़ीज़’ नेता ताहिर के बचाव में उतर आए और उसे निर्दोष घोषित करने लगे। AAP विधायक अमानतुल्लाह खान ने अपनी पार्टी के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से ट्वीट आने के करीब 16 मिनट बाद यानी 10: 21 पर ही अपने अकाउंट से ट्वीट किया। अमानतुल्लाह ने ताहिर खान को बेकसूर घोषित कर दिया। साथ ही भाजपा पर आरोप लगाया कि अपने नेताओं को बचाने के लिए और आम आदमी पार्टी को बदनाम करने के लिए ताहिर हुसैन को झूठे केस में फँसा रही है।

रिया-महेश भट्ट पर कंगना के खुलासे और सुशांत के पिता के 7 सवाल से ‘आत्महत्या’ प्रकरण में जुड़े कई नए रहस्य आए सामने

सुशांत सिंह राजपूत की प्रेमिका रिया चक्रवर्ती के खिलाफ उनके गृहनगर पटना में प्राथमिकी दर्ज की गई है। इसके बाद अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत को लेकर कई नए खुलासे सामने आए हैं। एक ओर जहाँ अभिनेता सुशांत के पिता ने रिया चक्रवर्ती पर उनसे उनके रूपए ऐंठने और उन्हें आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराधी बताया है वहीं, सुशांत की मौत के बाद से ही बॉलीवुड और इसके भीतर चलने वाले नेपोटिज्म के खिलाफ अभियान छेड़ने वाली अभिनेत्री कंगना रनौत ने भी इस बात पर ख़ुशी व्यक्त की है कि अब इस मामले की जाँच की जाएगी।

ट्विटर पर ‘टीम कंगना’ ने एक ट्वीट किया है, जिसमें टीम कंगना ने लिखा है कि रिया चक्रवर्ती पिछले 6 महीनों से सुशांत के साथ थी, उसने महेश भट्ट को अपने मनोचिकित्सक के रूप में काम पर रखा था और उसकी मृत्यु से दो दिन पहले ही रहस्यमय तरीके से सभी गायब हो गए थे। टीम कंगना ने ट्विटर पर लिखा है कि उन्हें खुशी है कि इस पूरे मामले की अब जाँच की जाएगी।

आज ही सुशांत सिंह राजपूत के पिता ने अपनी FIR में कई ऐसे सवाल उठाए हैं जो इस पूरे मामले पर एक बार फिर से सोचने को मजबूर कर देते हैं। सुशांत के पिता ने अपनी शिकायत में कहा कि रिया से मिलने से पहले सुशांत मानसिक रूप से ठीक था, लेकिन फिर ऐसा क्यों हुआ कि उसके संपर्क में आने के बाद वह मानसिक रूप से डिस्टर्ब हो गया था?

सुशांत के पिता ने FIR में 7 सवाल किए हैं, जिनमें से एक में उन्होंने उन सभी डॉक्टर्स पर भी संदेह व्यक्त किया है, जो-जो उनके बेटे सुशांत का इलाज कर रहे थे। सुशांत के पिता ने आरोप लगाया कि अगर उनके बेटे की मानसिक हालत ठीक नहीं चल रही थी तो उसके परिवार वालों को इसकी सूचना क्यों नहीं दी गई? जबकि इसकी पहली सूचना परिवार को मिलनी चाहिए थी।

सुशांत के पिता ने FIR में कहा है कि रिया ने अपना मोबाइल नंबर बदलने के लिए उनके बेटे पर दबाव बनाया था, ताकि वह अपने करीबी लोगों से बात नहीं कर सके। रिया ने सुशांत के करीबी स्टाफ को भी चेंज करवा दिया था जो उनके लिए काम किया करते थे।

एफआईआर के अनुसार, रिया चक्रवर्ती ने सुशांत के सामने ये शर्त रखी थी कि वह सिर्फ वही प्रोजेक्ट करे, जिनमें रिया उसके साथ काम करेगी। FIR में कहा गया है कि सुशांत के करोड़ों रुपए पर भी रिया की नजर थी।

FIR में सुशांत के पिता ने खुलासा किया है कि सुशांत फिल्म लाइन छोड़ कर केरल में ऑर्गेनिक खेती करना चाहता था, उसका दोस्त महेश उसके साथ कुर्ग जाने के लिए तैयार था, लेकिन रिया ने इस बात का विरोध करते हुए सुशांत से कहा था कि वो कहीं नहीं जाएगा। बॉलीवुड छोड़कर खेती करने के फैसले पर रिया ने सुशांत से कहा था कि अगर वो उसकी बातें नहीं मानेगा तो वो मीडिया में उसकी मेडिकल रिपोर्ट शेयर कर सबको बता देगी कि सुशांत पागल है।

FIR का हिस्सा

सुशांत के पिता ने अपनी शिकायत में लिखा है कि जब रिया को लगा की सुशांत सिंह उसकी बात नहीं मान रहा है और उसका बैंक बैलेंस भी बहुत कम रह गया है, तो रिया को लगा कि अब सुशांत उसके किसी काम का नहीं है।

इसके बाद रिया, जो कि तब तक सुशांत के साथ रह रही थी, उसने 08 जून 2020 को सुशांत के घर से काफी सामान कैश, जेवरात, लैपटॉप , पासवर्ड, क्रेडिट कार्ड, उनके पिन नम्बर जिसमें सुशांत के अहम दस्तावेज, और ट्रीटमेंट के सारे कागज लेकर चली गई।

सुशांत के पिता ने FIR में कहा, “जाने के बाद उसने मेरे बेटे सुशांत का फोन नम्बर अपने फोन में ब्लॉक कर दिया। फिर सुशांत ने मेरी बेटी को फोन किया, सुशांत ने कहा कि रिया मुझे कहीं फँसा देगी, वो यहाँ से काफी सामान लेकर चली गई है। मुझे धमकी देकर गई है कि अगर तुमने मेरी बात नहीं मानी तो तुम्हारे इलाज के सारे कागज मीडिया को दे दूँगी।”

प्यार में फँसाकर रूपए ऐंठे, आत्महत्या के लिए उकसाया: सुशांत सिंह राजपूत के पिता ने रिया चक्रवर्ती के खिलाफ दर्ज कराई FIR

बॉलीवुड कलाकार सुशांत सिंह राजपूत की मौत की जाँच फिलहाल मुंबई पुलिस कर रही है। नवीनतम रिपोर्ट्स के अनुसार, सुशांत के पिता ने अब उनकी प्रेमिका रिया चक्रवर्ती (Rhea Chakraborty) के खिलाफ अपने गृहनगर पटना में एफआईआर दर्ज कराई है। रिया चक्रवर्ती पर सुशांत को प्यार में फँसाकर उनके पैसे निकालने और आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप लगाया गया है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, सुशांत सिंह राजपूत के पिता संजय सिंह की शिकायत पर, अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती के खिलाफ विभिन्न धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की गई, जिसमें आत्महत्या की धमकी भी शामिल है। रिपोर्ट्स में कहा यह भी जा रहा है कि रिया ने 15 करोड़ रुपए भी ऐंठ लिए थे।

रिया पर दर्ज किया गया मुकदमा संख्या 241/20 है और इसमें आईपीसी की 406, 420, 341, 323, 342 धाराएँ लगाई हैं। पटना से चार पुलिस वालों की टीम मुंबई पहुँच गई है। सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद रिया उन लोगों में से एक हैं, जिससे मुंबई पुलिस द्वारा सबसे पहले पूछताछ की गई थी।

गौरतलब है कि बॉलीवुड कलाकार सुशांत सिंह राजपूत का गत 14 जून को निधन हो गया था, वो अपने कमरे में फाँसी से लटके हुए मिले थे और अब तक इस बारे में करीब 40 लोगों से पूछताछ की गई है।

पुलिस को सुशांत के पास से कोई सुसाइड नोट नहीं मिला था। हालाँकि, सुशांत सिंह के अंतिम पोस्टमार्टम रिपोर्ट में पता चला था कि उनके शरीर पर किसी भी तरह के चोट निशान नहीं मिले थे। इसमें बताया गया कि उनकी मौत फाँसी की वजह से दम घुटने से हुई।

सुशांत सिंह राजपूत सुसाइड केस में मुंबई पुलिस ने रिया चक्रवर्ती से करीब 11 घंटे पूछताछ की थी। वहीं, कुछ ही दिनों पहले ही रिया चक्रवर्ती ने केंद्रीय मंत्री अमित शाह से इस मामले में सीबीआई जाँच की माँग की थी।

सुशांत सिंह राजपूत की मौत के करीब एक महीने बाद रिया चक्रवर्ती ने अपनी जुबान खोलते हुए गृह मंत्री आमित शाह से सुशांत सिंह राजपूत की मौत की सीबीआई जाँच करवाने की माँग करते हुए अपने ट्विटर अकाउंट पर लिखा था –

“आदरणीय अमित शाह सर, मैं सुशांत सिंह राजपूतों की प्रेमिका रिया चक्रवर्ती हूँ। उनके (सुशांत) अचानक निधन के बाद अब एक महीने से अधिक का समय हो चुका है। मुझे सरकार पर पूरा भरोसा है, मैं आपसे हाथ जोड़कर निवेदन करती हूँ कि इस मामले की सीबीआई जाँच शुरू की जाए। मैं केवल यह समझना चाहती हूँ कि सुशांत के इस कदम को उठाने के पीछे क्या कारण थे? आपकी रिया चक्रवर्ती #सत्यमेव जयते।”

महाराष्ट्र के कल्याण के लिए शिवसेना से मिला सकते हैं हाथ, लेकिन एक शर्त पर: महाराष्ट्र BJP अध्यक्ष का बयान

NCP नेता अजीत पवार के उद्धव ठाकरे को बधाई देने के ट्वीट के एक दिन बाद ही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नेता चंद्रकांत पाटिल ने कहा है कि वे पूर्व सहयोगी शिवसेना के साथ हाथ मिलाने के लिए तैयार हैं। हालाँकि, राज्य भाजपा इकाई के प्रमुख चंद्रकांत दादा पाटिल ने इस हैरान करने वाले बयान एक साथ एक शर्त भी रखी है। इस बयान के बाद कॉन्ग्रेस जरूर सकते में आ गई होगी, लेकिन सोशल मीडिया पर भाजपा समर्थक इस बयान से नाराज नजर आ रहे हैं।

2019 का विधानसभा चुनाव शिवसेना और बीजेपी ने साथ मिलकर लड़ा था। हालाँकि, बाद में अवसर देखकर उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली पार्टी ने कॉन्ग्रेस और एनसीपी के साथ महा विकास अघाड़ी (एमवीए सरकार) बनाने के लिए हाथ ये कहते हुए मिला लिया था कि बीजेपी द्वारा कथित तौर पर सत्ता का वादा और मुख्यमंत्री पद नहीं दिया गया।

मीडिया से बात करते हुए भाजपा नेता पाटिल ने कहा कि राज्य के कल्याण के लिए आज भी वे शिवसेना के साथ हाथ मिलाने को तैयार हैं। हालाँकि, वे इसके लिए एक साथ नहीं बल्कि अलग-अलग रहते हुए चुनाव लड़ेंगे। वहीं, मुख्यमंत्री पद पर उन्होंने पहले के रुख को दोहराया और कहा कि भाजपा यह पद किसी क्षेत्रीय पार्टी के साथ साझा नहीं करेगी। 

भाजपा नेता ने कहा कि अगर केंद्रीय नेतृत्व उन्हें कुछ इनपुट देता है और मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे उस फार्मूले को स्वीकार करते हैं, तो वे शिवसेना से हाथ मिला लेंगे। इसके आगे पाटिल ने कहा कि शिवसेना क्लाउड 9 पर है, इसलिए, ऐसा नहीं लगता है कि वे एक साथ आने के लिए सहमत होंगे।

उन्होंने कहा – “अगर हम एक साथ आते हैं, तो भी मुख्यमंत्री के पद पर निर्णय केंद्र द्वारा लिया जाएगा। चुनाव एक साथ लड़ना और फिर अवसरवादी राजनीति करना सही नहीं है। कम सीटें होने के बावजूद सत्ता में समान हिस्सेदारी की माँग करने पर यह कैसे चलेगा?”

उन्होंने कहा कि अगर हम सत्ता में वापस आते हैं और शिवसेना के साथ गठबंधन करते हैं, तो इसका मतलब ये नहीं है कि हम उनके साथ चुनाव लड़ेंगे, हम महाराष्ट्र में अकेले चुनाव लड़ेंगे।

महाराष्ट्र भाजपा के प्रमुख पाटिल ने एक मराठी समाचार चैनल से कहा, “अगर भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व राज्य इकाई को शिवसेना से गठबंधन करने को कहता है… मैं एक बात स्पष्ट कर दूँ कि यदि दोनों पार्टियाँ साथ आ भी जाती हैं, तो भी हम साथ मिलकर चुनाव नहीं लड़ेंगे। हम पाँच साल शिवसेना के साथ काफी उदार रहे। 2019 विधानसभा चुनाव के बाद हम मंत्री पद साझा करने को भी तैयार थे। लेकिन राष्ट्रीय दल होने के नाते भाजपा किसी क्षेत्रीय पार्टी के साथ मुख्यमंत्री पद नहीं बाँट सकती।”

इस बीच, भाजपा अध्यक्ष जे पी नड्डा ने गत सोमवार को ही पार्टी कार्यकर्ताओं से अपील की है कि वे यह सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध रहें कि भाजपा महाराष्ट्र में अपने बल पर सत्ता में आए। नड्डा ने यह बयान प्रदेश भाजपा कार्यसमिति की बैठक में दिया।

भाजपा के एक बयान के अनुसार, बैठक में प्रदेश भाजपा अध्यक्ष चंद्रकांत दादा पाटिल, पूर्व मुख्यमंत्री और विधान सभा में विपक्ष के नेता देवेंद्र फडणवीस, केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर, राष्ट्रीय संगठनात्मक सचिव वी सतीश ने भी भाग लिया।

जब हुआ मंदिरों का ध्वंस, तब किस दोजख में था सौहार्द? – यह ‘हिंदू’ बनने का वक्त, ‘सेकुलर’ नौटंकी से बचो

दिसंबर 17, 1992 के दिन, लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौरान अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था- “जहाँ मैंने आरंभ किया था, मैं वहीं समाप्त करना चाह रहा हूँ। मैंने कहा था कि देश तिराहे पर खड़ा है। एक तरह की सांप्रदायिकता को बढ़ावा देकर, एक तरह की कट्टरता को बढ़ावा देकर, आप दूसरी तरह की कट्टरता से नहीं लड़ें, मगर आप यही कर रहे हैं और अब इस समय आइए, हम एक नई शुरुआत करें। अयोध्या, जैसा मैंने शुरू में कहा था कि अवसर में बदला जा सकता है।”

वाजपेयी करीब तीन दशक पहले जिस सांप्रदायिकता और कट्टरता को लेकर आगाह कर रहे थे, क्या वह जमशेद खान के यह कहने से, “हमने इस्लाम अपनाया और इस्लाम के अनुसार ही हम प्रार्थना करते हैं। लेकिन धर्म बदलने से हमारे पूर्वज नहीं बदल जाते। राम हमारे पूर्वज थे और हम अपने हिंदू भाइयों के साथ इसे मनाएँगे।”, खत्म हो गई है?

या सईद अहमद के यह कहने से, “हम भारतीय मुस्लिम मानते हैं कि राम इमाम-ए-हिंद थे और मैं अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के दौरान मौजूद रहूँगा।”, से वह समय आ गया है जिसका जिक्र वाजपेयी कर रहे थे?

या राशिद अंसारी जब कहते हैं, “अगर हमें गर्भगृह में जाने का मौका मिलता है, जहाँ शिलान्यास किया जाएगा, तो यह हमारे लिए आशीर्वाद की तरह होगा। अगर सुरक्षा वजहों से हमारा प्रवेश रोका जाता है तो हम बाहर से जश्न का हिस्सा बनेंगे।”, तो वह एक नई शुरुआत की बात कर रहे होते हैं? या फिर छत्तीसगढ़ से भूमि पूजन के लिए ईंट लेकर फैज खान की यात्रा को अवसर में बदला जा सकता है?

सवाल कई हैं और ‘अच्छा हिंदू’ ‘रामभक्त मजहबी’ पर लहालोट हुआ जा रहा है। 5 अगस्त को अयोध्या में भव्य श्रीराम मंदिर का भूमिपूजन होगा। देश के प्रधानमंत्री मौजूद होंगे। साधु-संत और भव्य राम मंदिर की संघर्ष यात्रा के कई पथिक भी उपस्थित रहेंगे। कितना आसान, कितना मधुर लगता है सब कुछ।

लेकिन हिंदू के सवाल यहीं से खड़े होते हैं। क्या उत्तर प्रदेश और केंद्र में आज बीजेपी की सरकार न होती, तब भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद यह सब इतना ही आसान होता है? ‘अच्छा हिंदू’ कहेगा कि क्यों नहीं?

लोकतांत्रिक व्यवस्था में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ कौन सी सरकार जाएगी। लेकिन हिंदू मन सवाल करता है कि शाहबानो के हक में भी फैसला इसी सुप्रीम कोर्ट ने दिया था, पर एक सरकार ही थी जो इसके खिलाफ अध्यादेश ले आई।

हिंदू मन कहता है कि वो भी एक यूपी की ही सरकार थी, जिसने राम भक्त कार सेवकों की लाश से अयोध्या और सरयू को पाट दिया था। फिर 1992 की वह बीजेपी सरकार भी थी, जिसने राम भक्तों पर गोली चलाने का आदेश देने की जगह, सत्ता का बलिदान कर दिया।

हिंदू मन को अचानक से राम मंदिर पर पैदा सौहार्द्र से शक होता है। लेकिन यह जान कर भी कि रामलला के पक्ष में फैसला आने पर सुप्रीम कोर्ट की नीयत पर सवाल उठाए गए थे, अच्छा हिंदू ‘मजहबी रामभक्त’ पर मर मिटेगा। उसके तर्क बड़े भोले होंगे। वह कहेगा मैं अपने घर में पूजा करूँ और मेरा कोई खास मजहब का मित्र आएगा तो मैं कैसे मना कर दूँगा।

वह भावनाओं के ज्वार में उतराता जाएगा। और यह ज्वार कौन पैदा कर रहा है। वही मीडिया, वही वामपंथी। चूँकि तमाम तीन तिकड़म के बाबवजूद जब वे भव्य राम मंदिर के निर्माण में अड़ंगा नहीं डाल पा रहे हैं तो मीठी गोली से शिकार पर उतर आए हैं और वे भी जानते हैं अच्छा हिंदू इस जाल में फँसेगा।

लेकिन हिंदू यह जानना चाहता है कि अयोध्या, मथुरा, काशी सहित देश के तमाम हिस्सों में मंदिरों का ध्वंस कर उस पर मस्जिद खड़े करने के भागीदार (जिनके नाम भी जमशेद, सईद और फैज जैसा ही कुछ रहा होगा) के पूर्वज राम नहीं थे। तब किस दोजख में दबा था यह सौहार्द्र?

1856 में मिर्जा जान ने लिखा था,

“मुगल बादशाहों ने बनारस और काशी में मंदिरों को तोड़कर उनके मलबे से मस्जिदें बनाईं। ऐसा ही अयोध्या में हुआ। अयोध्या राम के पिता की राजधानी कही जाती है। यह हिंदुओं के लिए पूजा का सबसे पवित्र स्थान है। यहाँ मंदिर की एक-एक दीवार को तोड़कर उसके मलबे और पत्थरों से ही मस्जिद बनाई गई। जहाँ विशाल मंदिर था उसे तोड़कर मैदान कर दिया गया। उसे ही मस्जिद का अहाता बनाया गया। बादशाह बाबर ने यह काम तो बहुत अच्छा किया, 1526 में मंदिर को तोड़कर शानदार मस्जिद बनवाई, लेकिन मुश्किल यह है कि अभी भी यह मस्जिद सीता की रसोई मस्जिद के तौर पर ही जानी जाती है।”

नवाबों की हुकूमत खत्म होने के बाद अंग्रेजों के जमाने में 1858 में बाबरी मस्जिद के मुअज्जीन ने जो कोर्ट में अपील की थी, उसमें भी इसे जन्मस्थान मस्जिद बताया था। उसका कहना था कि मस्जिद सैकड़ों साल से वीरान है और हिंदू ही वहाँ पूजा करते आ रहे हैं।

अंग्रेजी हुकूमत के गजेटियर से लेकर तमाम दस्तावेज यह बताते हैं कि वह जगह रामलला की थी। यह सब जानने के बाद हिंदू मन पूछना चाहता है कि फिर आजाद भारत में नेहरू ने रामलला की मूर्ति उस जगह से क्यों हटवानी चाही थी?

क्यों इतना लंबा संघर्ष हिंदुओं को करना पड़ा? क्यों इतनी लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी गई? क्या तब जमशेद और फैज के कौम को यह नहीं पता था कि उनके पूर्वज कौन थे? क्या उन्हें यह दिव्य ज्ञान अगस्त 05, 2020 की तारीख तय होने के बाद हुई?

अच्छा हिंदू कहेगा- “छोड़ो कल की बातें कल की बात पुरानी।” फिर जमशेद और फैज के पूर्वजों की बात भी तो पुरानी ही है। जमशेद और फैज की आज की पहचान तो कहती है कि बुतपरस्ती हराम है। उनके लिए हम काफिर हैं। वैसे भी धर्म आस्था का मसला है। जीवन जीने का सलीका है। जिनके लिए हिंदुत्व की जीवनशैली नापाक है, उनकी मिट्टी, उनकी आस्था का हिंदू क्यों आचार डालें। जमशेद और फैज जैसे यह भी तो कह सकते हैं कि भूमि पूजन के पवित्र मौके पर हम अपने पूर्वजों के धर्म में वापसी करेंगे।

लेकिन वे न ऐसा कुछ कहेंगे और न करेंगे। वे मोहरे हैं। उनसे आप सवाल करेंगे तो मीडिया आपको कट्टर हिंदू बताएगा। बताएगा कि ​आप सेकुलर भारत के लिए खतरनाक हैं। और आप सर्टिफिकेट पाने की लालसा में अच्छा हिंदू बनने को तैयार हो जाएँगे।

फिर भी हिंदू मन इस मीडिया से पूछता रहेगा, तुम्हारी क्यों सुने? तुमने मंदिर के पैरोकार रहे परमहंस रामचंद्र दास को कट्टर और बाबरी मस्जिद के मुद्दई हाशिम अंसारी को उदरावाद का प्रतीक बताया। ‘मुस्लिम इंडिया’ नाम से अखबार प्रकाशित करने वाला, गणतंत्र दिवस को ब्लैक डे के तौर पर मनाने का आह्वान करने वाला सैयद शहाबुद्दीन तुम्हारे लिए प्रोग्रेसिव मजहब का था।

लेकिन साध्वी ऋतंभरा, उमा भारती, विनय कटियार जैसों को उन्मादी बताया। राम सेवकों की लाश बिछाने वाला मौलाना मुलायम तुम्हारे लिए समाजवादी है और राम रथ यात्रा निकालने वाला आडवाणी सांप्रदायिक।

हम तुम्हारी इन साजिशों को अब खूब समझते हैं। हम हिंदू बनेंगे। नहीं बनना अब तुम्हारे लिए अच्छा हिंदू। हम जानते हैं कि प्रोगेसिव कट्टरपंथी, उदारवादी कट्टरपंथी तुम्हारे गढ़े वे शब्द हैं, जिससे तुम इनके जिहादी मानसिकता पर पर्दा डालते हो। जिस मौलाना आजाद को तुम उदारवादी बताते रहे, उसने आजाद भारत की शिक्षा-व्यवस्था को वह शक्ल दी, जिससे मजहब विशेष का खूनी इतिहास दब जाए और हिंदू अपनी पहचान पर शर्मिंदा हों।

वाजपेयी ने कहा था राम का मंदिर छल और छद्म से नहीं बनेगा। राम का मंदिर अगर बनेगा तो एक नैतिक विश्वास के बल पर बनेगा। वो वक्त करीब आ गया है। हिंदू अपने गौरव के प्रतीक, अपने नैतिक बल के प्रतीक को मजहबी रामभक्त की ईंट, मिट्टी और श्रद्धा से दूषित नहीं होने देगा।

केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान व बेटे चिराग को AK-47 से भून डालने की धमकी, शिकायत दर्ज

केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान और उनके बेटे व लोक जनशक्ति पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान को AK-47 से भून डालने की धमकी मिली है। यह धमकी देने वाले बिहार के शेखपुरा नगर परिषद के वार्ड संख्या 10 के वार्ड पार्षद संजय यादव हैं।

यादव ने केंद्रीय मंत्री को यह धमकी देते हुए एक वीडियो भी बनाई है जो कथिततौर पर अब वायरल हो गई है। इस वीडियो के सामने आते ही हड़कंप मच गया है। वीडियो देखने के बाद एलजेपी के जिला अध्यक्ष इमाम गजाली ने संजय यादव के ख़िलाफ़ FIR दर्ज कराते हुए पुलिस से उसकी तत्‍काल गिरफ्तारी की माँग की है। इस बीच संजय यादव भी अंडरग्राउंड हो गया है।

यहाँ बता दें, वीडियो अभी सोशल मीडिया पर देखने को नहीं मिला है। लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है कि इस वीडियो में संजय ने केंद्रीय मंत्री और उनके बेटे को गालियाँ दी हैं। साथ ही उन्हें बंदूक से भून डालने की बात भी कही है। वार्ड पार्षद की शिकायत है कि हर आदमी को राशन कार्ड दिलवाना पासवान का काम है। अगर वे ऐसा नहीं कर पाते तो वह उन्हें एके 47 से उड़ा देगा।

उल्लेखनीय है इस मामले के मद्देनजर लोक जनशक्ति पार्टी जिलाध्यक्ष इमाम गजाली ने शिकायत दर्ज करवाई है। साथ ही कहा है कि संजय यादव ने जैसी भाषा का प्रयोग किया, वह बेहद अशोभनीय और आपत्तिजवक है। वह वीडियो में एके-47 से मारने की बातें कर रहा है।

इसके अलावा गजाली के अनुसार यादव की बातों से ये भी लग रहा है कि वो आपराधिक प्रवृति का है। मुमकिन हो कि जो एके-47 गायब हुई हो, उसमें भी उसकी संलिप्ता हो। उन्होंने इस मामले में शिकायत दर्ज कराने के बाद जल्द से जल्द गिरफ्तारी की माँग की है।