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बकरीद पर उद्धव सरकार ने कॉन्ग्रेसी नेताओं की नहीं मानी बात, कहा- MHA की गाइडलाइन का होगा पालन

महाराष्ट्र में कॉन्ग्रेस और एनसीपी के दबदबे को देखते हुए कुछ समय पहले खबर आई कि राज्य सरकार ने बकरीद को लेकर नई गाइडलाइन जारी करने का फैसला किया है। हालाँकि,अब इस बात पर स्थिति स्पष्ट करते हुए महाराष्ट्र सरकार में मंत्री नवाब मलिक ने कहा कि बकरीद के लिए राज्य सरकार कोई नई गाइडलाइन नहीं जारी करेगी। त्यौहार के लिए उन्हीं दिशा निर्देशों का पालन किया जाएगा जो केंद्रीय गृह मंत्रालय ने जारी किए हैं। मलिक ने बताया कि उद्धव ठाकरे ताजा दिशा-निर्देश जारी करने को तैयार नहीं हुई हुई।

यहाँ बता दें कि इससे पहले महाराष्ट्र सरकार ने एक हफ्ते पहले ईद को लेकर गाइडनाइन जारी की थी जिसमें सुरक्षा लिहाज से प्रतीकात्मक कुर्बानी के लिए दिशा-निर्देश दिए गए थे और घर पर रहकर नमाज पढ़ने की सलाह दी गई थी। लेकिन, महाअघाड़ी सरकार के अन्य दल व उनके नेताओं को यह बात संतोषजनक नहीं लगी और उन्होंने इस पर आपत्ति भी जताई।

इसके बाद इस मामले के मद्देनजर कई मजहबी नेता एनसीपी प्रमुख शरद पवार से मिले। उनके समक्ष मामला रखकर फिर गृहमंत्री अनिल देशमुख और कॉन्ग्रेस अध्यक्ष बालासाहेब थोराट ने सीएम ठाकरे से मुलाकात की।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस बैठक में एनसीपी प्रमुख शरद पवार, मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे, महाअघाड़ी सरकार के मंत्री अनिल देशमुख के साथ कई नेता शामिल हुए। इस बैठक में गाइडलाइन एक बार निकाले जाने के बाद अनुरोध किया गया कि ईद के लिए छूट दी जाए। नेताओं ने कहा कि लोग सोशल डिस्टेंसिंग आदि को मेंटेन करके इस त्योहार के रिवाजों को मनाएँगे।

यहाँ गौरतलब है कि पिछले दिनों कोरोना के बढ़ते संकट के बीच महाराष्ट्र सरकार ने बकरीद के मौके पर प्रतीकात्मक कुर्बानी का सुझाव दिया था। मगर, प्रतीकात्मक बकरीद मनाने के फ़रमान पर उन्हीं की पार्टी के समुदाय विशेष के नेता नाराज हो गए। कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्य के पूर्व कैबिनेट मंत्री आरिफ़ नसीम खान ने सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई थी।

खान ने कहा था, “हमारी मुख्य आपत्ति दो मुद्दों पर है। सबसे पहले, क़ुर्बानी प्रतीकात्मक रूप से नहीं की जा सकती है और अधिकांश लोगों को बकरियों को ऑनलाइन खरीदने के बारे में पता ही नहीं है। वहीं इस्लाम भी प्रतीकात्मक क़ुर्बानी देने की मंज़ूरी नहीं देता। फिर बकरा ख़रीदने से पहले उसकी सेहत, वजन सब कुछ देखना पड़ता है उसके बाद ही क़ुर्बानी दी जाती है। जोकि ऑनलाइन संभव नहीं है। सरकार को नए दिशानिर्देश जारी करने चाहिए क्योंकि वर्तमान दिशानिर्देश समुदाय के मजहबी मामलों में हस्तक्षेप करते हैं।”

वहीं कॉन्ग्रेस के विधायक अमीन पटेल ने भी इस मामले का विरोध किया था। उन्होंने कहा था, “मैं सोशल डिस्टेंसिंग की निगरानी के लिए हूँ। न कि मैं इस बात को ख्याल रखने के लिए हूँ कि लोग महामारी के दौरान बकरीद के मौके पर घर में नमाज पढ़ रहे या नहीं, भीड़ जुटा रहे या नहीं। लेकिन लोगों को प्रतीकात्मक रूप से कुर्बानी करने के लिए नहीं कहा जा सकता है।”

पूर्व में जारी हुए दिशानिर्देश को “अस्पष्ट और भ्रमित” बताते हुए कई नेताओं ने महाराष्ट्र सरकार पर निशाना साधा था। इसके साथ उन्होंने एनसीपी प्रमुख शरद पवार से भी मामले में हस्तक्षेप की माँग की थी। प्रतीकात्मक कुर्बानी और ऑनलाइन बकरों की खरीदारी पर समाजवादी पार्टी के विधायक रईस शेख ने भी अपना विरोध दर्ज किया था। उन्होंने कहा था कि वो इस मामले को लेकर शरद पवार से बात करेंगे। उन्होंने आगे कहा था कि अगर गणपति पूजन प्रतीकात्मक नहीं हो सकता, तो खास समुदाय को क्यों जानवरों की बलि प्रतीकात्मक करने के लिए कहा जाता है?

कहीं पूजन, कहीं सूजन: संबित पात्रा ने कहा- ‘राम मंदिर विरोधियों के दिल जल रहे, सूँघें और एन्जॉय करें’

जहाँ एक तरफ 5 अगस्त को अयोध्या में राम मंदिर का भूमि-पूजन होने वाला है, वहीं दूसरी तरफ सोशल मीडिया में लिबरलों का क्रंदन भी जोर-शोर से जारी है। ऐसे में ट्विटर पर लोगों ने ‘कहीं पूजन, कहीं सूजन’ ट्रेंड कराया। लोगों का कहना था कि अयोध्या में राम मंदिर के भव्य भूमि-पूजन के कारण सेक्युलर व लिबरल गैंग को सूजन हो रहा है। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने भी इस ट्रेंड को आगे बढ़ाया।

एक टीवी न्यूज़ डिबेट में कॉन्ग्रेस समर्थक वकील तहसीन पूनावाला भी राम मंदिर पर अजीबोगरीब बातें करते दिखे, जिसके बाद लोगों ने उन्हें भी ‘कहीं पूजन, कहीं सूजन’ ट्रेंड के अंतर्गत डाला। लोगों ने इस दौरान समाजवादी पार्टी से लेकर असदुद्दीन ओवैसी के नेताओं तक के बयानों का मजाक बनाया, जिसमें उन्होंने ‘बाबरी मस्जिद के इंसाफ’ की बातें की थीं। लोगों ने पूछा कि सुप्रीम कोर्ट के बाद अब किसका इंसाफ चाहिए?

दरअसल, ये सब शुरू हुआ ‘टाइम्स नाउ’ की एक डिबेट से, जिसका हैशटैग था- ‘राम मंदिर ब्लॉकेड’। इस शो में राम मंदिर के भूमिपूजन में अड़चन लगा रहे लोगों की बात की जा रही थी। इसी में हिस्सा लेते हुए संबित पात्रा ने ‘कहीं पूजन, कहीं सूजन’ हैशटैग का आइडिया दिया। संबित पात्रा ने राम मंदिर का विरोध करने वालों को ‘दिलजले’ करार देते हुए ‘कहीं दीप जले, कहीं दिल’ वाले लता मंगेशकर के गाने को याद किया।

पात्रा ने कहा कि वो डिबेट में इस मुद्दे पर बहस करने नहीं आए हैं बल्कि ‘दिलजले’ लोगों की बातों को एन्जॉय करने आए हैं। उन्होंने कहा कि जब ऐसे लोगों का दिल जलेगा तो उसे सूँघ कर उन्हें परम सुख की अनुभूति होगी, इसीलिए वो यहाँ आए हैं। संबित पात्रा ने कहा कि पिछले 500 वर्षों का ये सबसे ऐतिहासिक कार्यक्रम है और सबसे सुंदर मौकों में से एक है, ऐसे में लोग इसका विरोध कैसे कर सकते हैं?

एक ट्विटर यूजर ने तो हाथ में बरनोल लिए तस्वीर को कॉन्ग्रेस का चुनाव चिह्न घोषित करने की माँग की और साथ ही ‘कहीं पूजन, कहीं सूजन’ का हैशटैग लगाया। बता दें कि दूरदर्शन ने भी इस ऐतिहासिक कार्यक्रम का सीधा प्रसारण करने का फैसला लिया है, जिससे वामपंथी पार्टियाँ नाराज़ हैं। संबित पात्रा ने सलाह दी है कि ऐसे लोगों का विरोध करने की बजाए उनके जलते हुए दलों की सुगंध को महसूस किया जाए।

राम मंदिर भूमि-पूजन और अनुच्छेद 370 हटने की बरसी पर पाकिस्तानी सेना ने भी एक लंबा-चौड़ा प्लान बनाया है। 5 अगस्त को कई चरणों में इसे अंजाम दिए जाने का प्लान है। सबका मकसद एक ही है भारत के खिलाफ अशांति भड़काना।

इस पाकिस्तानी प्लान के तहत कश्मीरियों के साथ एकजुटता का ढोंग रचा जाएगा। भारत के कदम के खिलाफ विरोध के प्रतीक के रूप में सभी चैनल का लोगो काला कर दिया जाएगा। इसके अलावा हिलाल का एक विशेष संस्करण और कश्मीरियों के लिए एक विशेष गीत भी कमीशन किया गया है।

कुरैशी ने किया 20 साल की लड़की का रेप: शहजादी, फिरोज के साथ मिल कर वेश्यावृत्ति में धकेला

अहमदाबाद में सेक्स रैकेट का भंडाफोड़ होने के बाद पुलिस ने 2 आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है। इन पर आरोप है कि इन्होंने पहले असम की 20 साल की एक युवती का बलात्कार किया। फिर उसे अहमदाबाद के वातवा GIDC इलाके में वेश्यावृत्ति में ढकेल दिया। इन दोनों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस अब उस तीसरे आरोपित की तलाश कर रही है, जिसे इन्होंने महिला को सौंपा। इन दोनों की पहचान मसूक अय्यूब कुरैशी और महमद फिरोज अंसारी के रूप में हुई है।

पुलिस के अनुसार, 20 साल की युवती को 27 वर्षीय अय्यूब शादी का झाँसा देकर कुछ महीने पहले ही हैदराबाद से अहमदाबाद लाया था। उससे पहले लड़की हैदराबाद में अपनी बड़ी बहन के साथ रहती थी। 6 महीने पहले एक दिन अय्यूब उनके घर गया और उन्हें किसी तरह से मनाया कि वो लड़की को अहमदाबाद ले जाने के बाद शादी कर लेगा। लेकिन, अहमदाबाद लाए जाने के बाद उसका युवक ने रेप किया और उसे वातवा GIDC इलाके में बंदी बनाकर रखा। बाद में उसे एक अन्य महिला की मदद से वेश्यावृत्ति में ढकेला गया।

हालाँकि, इस दौरान लड़की ने किसी तरह पुलिस को 100 नंबर पर कॉल किया और अपने लिए मदद माँगी। बाद में पुलिस उसे 24 जुलाई को ढूँढ निकाल पाने में सफल हुई। दोनों आरोपित भी गिरफ्तार किए गए। पुलिस ने बताया कि 27 वर्षीय अय्यूब कुरैशी अहमदाबाद के चंदखेड़ा में रहता है। लेकिन मूल निवासी उत्तर प्रदेश के जौनपुर का है। इसी प्रकार 41 वर्षीय फिरोज अंसारी भी रामोल का रहने वाला है। जबकि मामले में फरार चल रही सुमाबेन उर्फ शहजादी कुरैशी खोखारा की रहने वाली है।

पुलिस ने इन तीनों के ख़िलाफ़ रेप के लिए आईपीसी की धारा 376 (2)(n); किडनैपिंग के लिए धारा 365; शादी के लिए मजबूर करके अपहरण करने के लिए धारा 366; आपराधिक धमकी के लिए 506 व अन्य उपयुक्त धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है। पुलिस अपनी पड़ताल में ये भी पता लगाने की कोशिश कर रही है कि कहीं इन लोगों ने पहले भी ऐसे किसी लड़की को वेश्यावृत्ति भी तो नहीं भेजा।

द न्यूज इंडिया एक्सप्रेस के अनुसार, वातवा GIDC के थाना प्रभारी डीआर गोहिल ने बताया, “आरोपित पहले युवती को हैदराबाद से अहमदाबाद लाया। उसे धमकाया और अहमदाबाद के अलग-अलग होटलों में अपने क्लाइंट्स के पास भेजकर उसे वेश्यावृत्ति में धकेला। आरोपित महिला जो फिलहाल फरार है, उसने पीड़िता पर ये सब करने के लिए दबाव बनाया और अपने क्लाइंट्स के पास भेज कर पैसे लिए। इस मामले में दो लोगों को गिरफ्तार किया है। तीसरी फरार है। उसे पकड़ने की कोशिश की जा रही है।”

10 महिलाएँ, 9 पुरुष, 4 बच्चे: जला डाला था मंदिर, मार कर टुकड़ों में काट डाले गए थे 23 हिन्दू – वंधामा नरसंहार

भारत के उत्तरी छोर पर स्थित जम्मू-कश्मीर। श्रीनगर से उत्तर में मात्र 28 किलोमीटर की दूरी पर स्थित गाँव वंधामा (Wandhama)। जनवरी 25, 1998 की रात। किसे पता था कि ये रात अचानक से हिन्दुओं के लिए काल बन जाएगी, पूरा गाँव ही साफ़ कर दिया जाएगा! इसी गाँव में कश्मीरी हिन्दू सो रहे थे। अचानक से इस्लामी आतंकियों ने धावा बोला और हिन्दुओं का ऐसा कत्लेआम (Wandhama Massacre) मचाया गया कि अमेरिका तक इसकी गूँज सुनाई दी।

कश्मीर का वंधामा (Wandhama Massacre): क्या हुआ था उस रात?

इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, वंधामा (Wandhama Massacre) के 23 हिन्दू क़त्ल किए जा चुके थे। उन्हें बेरहमी से मारा गया था। कइयों के तो शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए थे। लाशों को देख कर स्पष्ट पता चलता था कि ये कोई आम कत्लेआम नहीं है क्योंकि कातिलों के मन में हिन्दुओं के प्रति इतनी घृणा थी, जो क्षत-विक्षत लाशों को देख कर ही पता चल रहा था। लेकिन, हमेशा की तरह हिन्दुओं के लिए किसी ने आवाज़ नहीं उठाई।

हिन्दुओं के नरसंहार (Wandhama Massacre) की ये दास्तान इतिहास में छिप कर इसलिए रह गई क्योंकि न तो सरकारों ने इस मामले में दोषियों पर कार्रवाई करने का प्रयास किया और न ही मीडिया ने इसे उठाया। आज इस घटना को 22 वर्ष से भी अधिक बीत गए, मीडिया में अब भी इसके बारे में कुछ नहीं आता। 23 मृतकों में कई महिलाएँ और बच्चे भी शामिल थे। पुलिस ने भी स्वीकारा था कि ये इस्लामी कट्टरपंथियों का कृत्य है।

तब घाटी में नेशनल कॉन्फ्रेंस की सरकार थी। फ़ारूक़ अब्दुल्ला राज्य के मुख्यमंत्री थे। तब राज्य के गृह मंत्री रहे अली मोहम्मद सागर ने कबूल किया था कि हमलावर 50 से भी अधिक की संख्या में थे, जिन्होंने बेरहमी से हिन्दुओं को टुकड़ों में काट डाला था। उन्होंने कहा था कि वंधामा में जो भी हुआ वो अत्यंत निंदनीय है, एक बेशर्मी भरी हरकत है। हिन्दुओं के घरों को भी आग के हवाले कर दिया गया था।

सन्देश साफ़ था, वो जम्मू कश्मीर ही नहीं बल्कि पूरे भारत के हिन्दुओं को डराना चाहते थे। यहाँ तक कि गाँव में स्थित एक मंदिर को भी फूँक दिया गया था। इस नरसंहार की टाइमिंग ऐसी थी, जिससे स्पष्ट पता चलता था कि ये सन्देश पूरे भारतीय गणराज्य को दिया गया है। वो भारत के 48वें गणतंत्र दिवस से मात्र 1 दिन पहले की रात थी। बीबीसी में इस घटना को लेकर प्रकाशित हुई ख़बर में कहा गया था कि ये इस्लामी आतंकी जम्मू कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा बनाना चाहते हैं।

1989 से उस नरसंहार (Wandhama Massacre) तक एक दशक से भी कम में जम्मू कश्मीर में आतंकियों के कारण 20,000 जानें गई थीं लेकिन उनके लिए न तो कभी न्याय की माँग उठी और न ही उन्हें मीडिया में तवज्जो मिली। आतंकियों और अलगाववादियों ने गणतंत्र दिवस के विरोध-स्वरूप बंद बुलाया हुआ था, ऐसे में वंधामा नरसंहार (Wandhama Massacre) जैसी किसी वारदात को अंजाम देने की वो फ़िराक़ में ही बैठे हुए थे। अब देखिए वहाँ के नेताओं ने कैसे इस नरसंहार का भी अपने पक्ष में इस्तेमाल कर लिया।

कश्मीर के नेताओं ने वंधामा नरसंहार (Wandhama Massacre) की आड़ में खेला था विक्टिम कार्ड

‘जम्मू कश्मीर डेमोक्रेटिक फ्रीडम पार्टी’ के संस्थापक शाबिर शाह ने इसे कायराना हरकत बताते हुए ‘अपराधियों’ को दोषी ठहराया लेकिन इस्लामी आतंकियों का नाम तक नहीं लिया। उन्होंने इसकी निंदा करते हुए कहा था कि ये हिन्दुओं को ख़ास समुदाय से अलग करने की साजिश है। यहाँ सवाल उठता है कि अगर इसे साधारण अपराधियों ने किया था तो सिर्फ हिन्दुओं को ही क्यों निशाना बनाया गया?

इसी तरह अलगाववादी संगठन ‘फ्रीडम कॉन्फ्रेंस’ के मुख्य प्रवक्ता रहे अब्दुल गनी लोन ने इस नरसंहार के सहारे ख़ुद को और समुदाय विशेष के कश्मीरी को पीड़ित साबित करने की कोशिश की। दुर्भाग्य से पूरी दुनिया में यही सन्देश गया। उन्होंने बयान दिया था कि कश्मीरी किसी भी जाति, मजहब या रंग के हों, वो गोली से ही मरते हैं। पीड़ितों में समुदाय विशेष और आतंकियों को भी शुमार कर उन्होंने अपना प्रोपेगंडा रच दिया।

यहाँ तक कि संयुक्त राष्ट्र अमेरिका ने भी अपने बयान में इसे ‘कश्मीरी पंडितों की हत्या’ बताया था लेकिन कश्मीरी नेता इसे हिन्दुओं का नरसंहार कहने से बचते रहे। अमेरिका के बयान के अनुसार, इस पूरे घटना में गाँव में एक ही हिन्दू लड़का बचा था, जो 12 वर्ष का था। नाबालिग ने अपने बयान में बताया था कि हथियारों से लैस कुछ लोग उसके घर में आए और चाय की माँग की। इसके बाद पूरे परिवार और पड़ोसियों पर अचानक से गोलीबारी शुरू कर दी।

मारे गए 23 लोगों में 10 महिलाएँ थीं, 9 पुरुष थे और 4 बच्चे भी थे। सारे मृतक कश्मीरी पंडित समुदाय से आते थे। अमेरिका ने तब जम्मू कश्मीर के सभी आतंकी संगठनों को आतंकवाद का रास्ता छोड़ने की अपील की थी। 2008 में यूपीए काल में केंद्र सरकार ने कह दिया था कि उसे इस मामले की कोई जानकारी ही नहीं है। राज्य सरकार ने तो इस मामले की फाइल ही बंद कर दी थी। केंद्र सरकार इससे अनभिज्ञ बनी रही।

फाइल बंद करने का बचाव करते हुए गंडरबल के सब डिवीजनल पुलिस आफिसर शौकत अहमद ने कश्मीरी टाइम्स को दिए एक साक्षात्कार में कहा था कि कश्मीरी पंडितों की हत्या करने वालों की पहचान नहीं होने की वजह से वंधामा हत्याकांड की फाइल बंद कर दी गई है। बाद में इस सम्बन्ध में एक कश्मीरी पंडित ने RTI दायर की, जिसके जवाब में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कहा था कि उसे वंधामा नरसंहार में शामिल आतंकियों या संगठनों के बारे में कोई जानकारी ही नहीं है।

आखिर इतने बड़े मामले की जाँच सीबीआई को क्यों नहीं सौंपी गई? क्या कॉन्ग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस की नजदीकियों के कारण ऐसा नहीं किया गया? महिलाओं व बच्चों सहित 23 लोगों की बेरहमी से हत्या कर दी गई लेकिन किसी स्वतंत्र सरकारी एजेंसी को जाँच नहीं सौंपी गई, क्यों? यूपीए के पूरे 10 वर्षों के दौरान सरकार इस पर उदासीन बनी रही। इक्का-दुक्का कश्मीरी पंडितों के अलावा किसी और ने इस मामले को उठाया तक नहीं।

कश्मीर के Wandhama Massacre से प्रेरित 2 फ़िल्में

कश्मीरी भाषा में एक फिल्म आई थी- बब। ये एक ऐसे लड़के की कहानी थी, जिसने आतंकियों के नरसंहार में अपने माँ-बाप को खो दिया था। दिसम्बर 2001 में रिलीज हुई इस फिल्म को नेशनल अवॉर्ड तक मिला। इसे लोकप्रिय टीवी सीरीज ‘बुनियाद’ की निर्देशक ज्योति सरूप ने लिखा व निर्देशित किया था। अनुपम खेर के भाई राजू खेर ने इसमें ऐक्टिंग की थी। या फिल्म उसी वंधामा नरसंहार पर आधारित थी।

लेकिन, जब विधु विनोद चोपड़ा ने ‘मिशन कश्मीर’ बनाया तो इसमें अल्ताफ को पीड़ित दिखा दिया, जिसके परिवार की हत्या हो जाती है। जबकि एकलौता लड़का जो इस नरसंहार में बच गया था और जिसके परिवार को मार डाला गया था, उसका नाम विनोद था। विनोद ने बताया था कि उस रात क्या हुआ था। जैसे ही उसे फायरिंग की आवाज़ सुनाई दी, वो गोबर के एक ढेर के नीचे छिप गया था, जिसे जलावन के लिए रखा गया था।

वहीं से उसने अपने माता-पिता सहित पूरे परिवार को गोली लग कर मरते देखा, यहाँ तक कि 3 साल के एक मासूम बच्चे को भी। अपने बड़े भाई की मौत के लिए विनोद आज भी खुद को जिम्मेदार मानता है। उसका कहना है कि उसने अपने बड़े भाई को उठा दिया था, जिसके बाद वो नीचे गए और आतंकियों ने उन्हें मार डाला। वो कहते हैं कि काश मैंने उन्हें सोते से नहीं जगाया होता। विनोद कहता है कि वो किस दर्द के साथ जी रहा है, इसे सिर्फ वही समझ सकता है।

वरिष्ठ पत्रकार मुकुल शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘Human Rights in a Globalised World: An Indian Diary‘ में लिखा है कि ऐसे मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों में सरकार की जिम्मेदारी होती है कि वो सच्चाई का पता लगाए, पीड़ितों को न्याय दे और उन्हें हुए नुकसान की भरपाई करे (जो हो सके)। वो लिखते हैं कि वंधामा मामले (Wandhama Massacre) में सरकार इन तीनों की पूर्ति करने में बुरी तरह से विफल रही है।

खुद को पाक-साफ़ बता कर निकल जाते हैं उमर अब्दुल्ला

हालाँकि, जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री रहे उमर अब्दुल्ला ने जनवरी 2014 में इस मामले में खुद को पाक-साफ़ बताते हुए पल्ला झाड़ लिया था। दरअसल, तब ये मामला फिर से उछला था। अभिनेता अनुपम खेर ने उन्हें विनोद शरणार्थी कैम्प जाकर विनोद से मुलाक़ात करने कहा था, जिसके पूरे परिवार की हत्या कर दी गई थी। अब्दुल्ला ने दावा किया था कि इस मामले में हरकत-उल-अंसार के आतंकी शामिल थे और सभी मारे जा चुके हैं।

अब्दुल्ला ने कहा कहा था कि वंधामा नरसंहार (Wandhama Massacre) मामले में उन पर निष्क्रियता के लगे आरोप गलत हैं। उन्होंने दावा किया कि फ़रवरी 1998 और इसके अगले साल हुए ऑपरेशन में सारे आतंकी मारे गए। हालाँकि, कश्मीरी पंडितों ने आरोप लगाया था कि न तो अलगाववादी और न ही किसी मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टी ने कश्मीर में वंधामा नरसंहार के मामले में न्याय के लिए कुछ किया। आज इस घटना को 22 साल हो गए, हालात जस के तस है।

मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से कश्मीरी पंडितों को खुल कर अपनी बात रखने का मौक़ा मिला है और उनके पुनर्वास के लिए प्रयास हो रहे हैं। जम्मू कश्मीर में त्राल, डोडा और श्रीनगर के लगभग सारे आतंकियों को मार गिराया गया है। लेकिन, विधु विनोद चोपड़ा जैसे फिल्मकारों ने कश्मीरी पंडितों की व्यथा पर फिल्म बनाने का दावा करने के बावजूद ‘शिकारा’ में इस नरसंहार को स्थान नहीं दिया।

पूर्व-मुस्लिम जहाँ करते थे अपने अनुभव शेयर, फेसबुक ने किया उस पेज को बैन: ‘कम्युनिटी स्टैण्डर्ड’ के नाम पर खेल

सोशल मीडिया कंपनी फेसबुक ने एक बार फिर से अपना हिन्दू विरोधी रवैया दिखाया है। यूँ तो इस्लाम की आलोचना वाले कंटेंट्स को हाईड करना उसका पुराना पेशा रहा है लेकिन इस बार फेसबुक ने एक बड़े पेज ‘Ex Muslim Tv’ को सिर्फ इसलिए प्रतिबंधित कर दिया क्योंकि वो पूर्व-मुस्लिमों (ऐसे लोग जो इस्लाम धर्म को छोड़ चुके हैं) के अनुभवों को शेयर करता था। फेसबुक ने इसे इस्लाम-विरोधी मानते हुए बैन कर दिया। उस पेज पर कुछ भी आपत्तिजनक या अश्लील शेयर नहीं किया गया था।

फेसबुक द्वारा बैन किए गए इस पेज का नाम ‘Ex Muslim Tv’ था, जिस पर कई पूर्व-मुस्लिमों के वीडियो अपलोड किए जाते थे। उन वीडियोज में वो लोग मुस्लिम रहने के दौरान अपने ऊपर हुए अत्याचारों की बात करते थे। लेकिन, फेसबुक का मानना है कि ये सब इस्लाम विरोधी है और उसके मंच पर ऐसा नहीं किया जा सकता। इन वीडियोज में लोग मजहब के कारण आई दिक्कतों की भी बात करते थे।

फेसबुक ने ‘Ex Muslim Tv’ के पेज को बताया कि उसके दो वीडियो हिंसक और भड़काऊ कंटेंट्स संबंधी मामले में उसके नियम-कायदे का उल्लंघन करते हैं। यानी, पूर्व-मुस्लिमों द्वारा शेयर किए गए अनुभव को फेसबुक ने हिंसक और भड़काऊ की कैटेगिरी में डाल दिया। फेसबुक ने लिखा कि वो ऐसे किसी भी कंटेंट की अनुमति नहीं दे सकता, जिससे शारीरिक हानि होने या फिर सार्वजनिक सुरक्षा को ख़तरा पैदा होने की सम्भावना हो।

फेसबुक ने ‘Ex Muslim Tv’ पर आरोप लगाया है कि उसके कंटेंट्स से लोगों को शारीरिक और आर्थिक नुकसान पहुँचने की आशंका है। साथ ही इसे अपने ‘कम्युनिटी स्टैण्डर्ड’ के विरुद्ध बताते हुए फेसबुक ने न सिर्फ उन वीडियोज को हटा दिया बल्कि पेज को ही बैन कर डाला। फेसबुक ने अपने इस फैसले की समीक्षा की भी बात कही है लेकिन साथ ही चेताया है कि कोरोना वायरस आपदा के कारण वो ऐसा करने में अक्षम भी रह सकता है।

‘Ex Muslim Tv’ ट्विटर हैंडल पर इस सूचना को साझा करते हुए फेसबुक के व्यवहार से नाराजगी जताई। उसने आरोप लगाया कि बिना किसी अपील का मौका दिए बिना ही फेसबुक ने उसे बैन कर दिया। फेसबुक को क्रूर बताते हुए पेज ने कहा कि वो मानवता को प्राथमिकता देता है। पेज ने बताया कि अधिकतर पूर्व-मुस्लिम सिर्फ अपना दर्द बयाँ करते हैं, वो खतरे में हैं और उन्हें मदद की ज़रूरत है। आखिर इसमें गलत क्या है?

इससे पहले ऑपइंडिया के साथ भी ऐसी हरकतें की जा चुकी हैं, जब फेसबुक ने इस्लाम सम्बन्धी किसी कंटेंट को लेकर आपत्ति जताई थी। इसके अलावा इस्लाम-समर्थक लोगों की लॉबी कितनी तगड़ी हो सकती है, इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि ऑपइंडिया ने हलाल के विरोध में जब कई विचार प्रकाशित किए थे, तो इन लोगों ने विज्ञापन और फंडिंग रोकने के लिए स्पेशल कैंपेन चलाए थे। तब कई लोगों ने हमारे पेज को बैन करवाने के लिए बहुत सारे पोस्ट्स की जम कर रिपोर्टिंग की और फेसबुक के इस तथाकथित नियम-क़ानून का फायदा उठा कर हमें नुकसान पहुँचाना चाहा था।

बांग्लादेश में 300 साल पुराने जयकाली मंदिर का पुननिर्माण शुरू, भारत सरकार ने की पहल

बांग्लादेश के नटोर जिले में 300 वर्ष पुराने काली मंदिर के पुननिर्माण का कार्य एक बार फिर सोमवार (जुलाई 27, 2020) को शुरू हो गया। भारतीय उच्चायुक्त रीवा गांगुली और आईसीटी डिवीजन के राज्य मंत्री जुनैद अहमद ने खुद सोमवार को उत्तरी बांग्लादेश के इस जिले में काली मंदिर के पुनर्निर्माण का उद्घाटन किया

बांग्लादेश में भारतीय उच्चायोग ने ट्वीट करते हुए लिखा कि भारतीय उच्चायुक्त रीवा दास और राज्य मंत्री जुनैद ने सोमवार को नटौर में श्री श्री जय काली माता मंदिर के पुनर्निर्माण का उद्घाटन किया। इस अवसर पर सांसद शफीकुल इस्लाम और महापौर उमा चौधरी जॉली मौजूद थे।

बता दें कि ये पुननिर्माण भारत सरकार द्वारा विकास परियोजना स्कीम के अंतर्गत करवाया जा रहा है। मौजूदा सूचना के अनुसार, इसमें 97 लाख बांग्लादेशी टका का खर्चा आएगा।

एक वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए गांगुली ने कहा कि वे बांग्लादेश के सबसे पुराने मंदिरों में से एक के पुनर्निर्माण करवाने के कदम का समर्थन करती हैं। यूनाइटेड न्यूज ऑफ बांग्लादेश के अनुसार, लालबाजार में स्थित श्री श्री जय काली माता मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए एक ज्ञापन (एमओयू) पर 23 अक्तूबर, 2016 को हस्ताक्षर किए गए थे।

बांग्लादेशी मंत्री ने भी इस मौके पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा, “हम नटोर को विकास रोल मॉडल के रूप में बनाएँगे। इस प्रयास में हमारा पड़ोसी भारत आने वाले दिनों में हमारा साथ होगा।”

बता दें कि श्री श्री जयकाली माता मंदिर बांग्लादेश के नटोर में स्थित पौराणिक मंदिरों में से एक है। इसका निर्माण सर्वप्रथम 18वीं शताब्दी में नटोर में बहानी की रानी के दीवान व दीघापटिया राजशागी परिवार के संस्थापक दाताराम रॉय ने किया था। इस मंदिर के परिसर में भगवान शिव का मंदिर भी स्थापित है। इसके अलावा इस मंदिर में हर वर्ष दुर्गा व काली पूजा को बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

गौरतलब है कि बांग्लादेश में केवल मंदिर के पुननिर्माण का जिम्मा भारत ने नहीं उठाया है। कुछ खबरों के अनुसार रामाकृष्ण मंदिर का निर्माण व श्री श्री अन्नमयीजी काली माता मंदिर को भी पहले जैसा बनाने के लिए प्रयास किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त माहिगंज गर्ल्स हाई स्कूल और कुछ कॉलेजों के ग्राउंड फ्लोर व फर्स्ट फ्लोर को बनाना भी भारत सरकार की योजना में है।

ऐतिहासिक गुरुद्वारे पर कब्जा कर लाहौर में मस्जिद बनाने की कोशिश, भारत ने कहा- ‘जल्द उठाए जाएँ सख्त कदम’

लाहौर में सिखों के ऐतिहासिक गुरुद्वारे को मस्जिद में बदलने की कोशिश सामने आने के बाद भारत ने इस पर अपना कड़ा विरोध दर्ज करवाया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने जानकारी दी है कि भारत ने इस मामले पर पाकिस्तान से शिकायत की है और कड़ा विरोध दर्ज कराया है। साथ ही जल्द से जल्द सख्त कदम उठाने की माँग की गई है।

श्रीवास्तव ने बताया, “लाहौर के नौलखा बाजार में भाई तारू सिंह जी की शहीदी स्थल पर मस्जिद शहीद गंज के नाम दावा किए जाने की घटना पर पाकिस्तान के उच्चायोग में सोमवार को कड़ा विरोध दर्ज कराया गया है। इसे मस्जिद बनाए जाने की कोशिश की जा रही है।”

श्रीवास्तव ने इस दौरान एक सवाल के जवाब में कहा, “पाकिस्तान से यह भी कहा गया है कि वह अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों की सुरक्षा, हितों के साथ ही उनके धार्मिक अधिकारों और सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण करे।”

उन्होंने कहा कि गुरुद्वारा शहीदी स्थान भाई तारु जी एक ऐतिहासिक गुरुद्वारा है, जहाँ भाई तारु जी ने 1745 में सर्वोच्च बलिदान दिया था। उन्होंने कहा, “गुरुद्वारा श्रद्धा का स्थान है और इसे सिख समुदाय द्वारा पवित्र माना जाता है। इस घटना को भारत में गंभीर चिंता के साथ देखा गया है। पाकिस्तान में अल्पसंख्यक सिख समुदाय के लिए न्याय की माँग की जा रही है।”

गौरतलब है कि कल ही पाकिस्तान के लाहौर से ये खबर आई थी कि एक मौलवी ने गुरुद्वारे की जमीन पर कब्जा कर लिया है। उसने एक वीडियो जारी करके सिखों को धमकी दी थी। इसमें कहा गया था कि पाकिस्तान इस्लामी देश है और यहाँ सिर्फ़ मजहब के लोग ही रह सकते हैं।

इस घटना के बाद पाकिस्तान का एवेक्यू ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड, ने पुलिस में अपनी शिकायत भी करवाई थी और मौलवी के ख़िलाफ़ सख्त कार्रवाई की माँग की गई थी।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मौलवी का नाम सोहेल बट्‌ट है। वह दावत-ए-इस्लामी (बरेलवी) से जुड़ा है। वह लाहौर में पैगम्बर हजरत शाह काकु चिश्ती दरगाह का केयरटेकर भी है। उसने स्थानीय लोगों के साथ मिलकर गुरुद्वारा शहीद भाई तारु सिंह की जमीन पर कब्जा किया।

जमीन कब्जाने के बाद उसने जो वीडियो जारी किया है, उसमें उसने पाकिस्तान गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के पूर्व अध्यक्ष गोपाल सिंह चावला को धमकी दी। गोपाल चावला ने गुरुद्वारा में पिछले साल सिखों के प्रतीक श्री निसाल साहिब को फहराया था। सोहेल ने दावा किया कि गुरुद्वारा और उसके आसपास की 4 से 5 कनाल जमीन हजरत शाह काकु चिश्ती दरगाह और शहीदगंज मस्जिद की है।

कहा जा रहा है कि सोहेल ने ये कदम भू-माफियों के इशारे पर उठाया है। इसमें से एक तो ISI का ऑफिसर जेन साब भी है। मौलवी को वीडियो में कहते सुना जा सकता है, “एक मुस्लिम राष्ट्र होने के नाते पाकिस्तान केवल मुस्लिमों का है। 1947 में पाकिस्तान के बनने के समय करीब 20 लाख मुस्लिमों ने जिंदगी गँवाई थी। ये सिख गुंडागर्दी दिखा रहे हैं। यह एक इस्लामी राष्ट्र है, वे कैसे गुंडागर्दी दिखा सकते हैं? ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताते हैं कि यह साइट हमारी है।”

पाकिस्तान में बिल्ली की बच्ची के साथ 1 सप्ताह तक गैंगरेप: शरीर के भीतर से निकले स्पर्म, खून और प्लास्टिक

पाकिस्तान में एक जानवर के साथ हैवानियत का मामला सामने आया है। पंजाब प्रान्त के लाहौर में एक बिल्ली की बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। मुख्य आरोपित 15 साल का एक नाबालिग है, जिसने अपने साथियों के संग मिल कर करीब एक सप्ताह तक बिल्ली की बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार किया। एक फेसबुक पेज पर शेयर किए गए पोस्ट से गैंगरेप की इस वारदात का खुलासा हुआ है। सोशल मीडिया में लोग इस घटना की कड़ी निंदा कर रहे हैं।

बताया गया है कि बिल्ली के साथ सामूहिक बलात्कार के दौरान उसे घायल कर दिया गया और ऐसी-ऐसी जगह चोट पहुँचाई गई कि उसके शरीर के अंगों ने काम करना ही बंद कर दिया। बिल्ली इस हैवानियत को सह नहीं सकी और चल बसी। जब बिल्ली के बच्चे को जानवरों के डॉक्टर के पास ले जाया गया तो उसके शरीर के भीतर से बड़ी मात्रा में स्पर्म और खून के साथ-साथ प्लास्टिक भी निकला, जिसका हैवानों ने गैंगरेप के दौरान इस्तेमाल किया था।

खुद डॉक्टर ये सब देख कर हैरान रह गए। डॉक्टरों का कहना है कि उक्त बिल्ली के साथ कितनी बार बलात्कार किया गया होगा, ये सोच पाना भी मुश्किल है क्योंकि बिल्ली की बच्ची का गुदाद्वार और योनि दोनों फट कर एक हो गया था। खुद पाकिस्तान के ही लोग कह रहे हैं कि उनके पास इस घटना की आलोचना के लिए शब्दों की कमी है। डॉक्टर ने बिल्ली के साथ हुई हैवानियत को लिखित रूप में देने से भी इनकार कर दिया क्योंकि वो इस घटना में किसी भी प्रकार से अपना नाम नहीं आने देना चाहते थे।

पाकिस्तान से हैवानियत की ऐसे खबरें आती रहती हैं। कुछ दिन पहले कराची में अज्ञात लोगों ने एक महिला की लाश के साथ बलात्कार किया था। आरोपितों ने कब्र में दफनाई हुई महिला की लाश निकालने के लिए पहले तो कब्र को खोदा और फिर उसके साथ बलात्कार किया। ये घटना कराची के लाँधि क्षेत्र की है। महिला के परिजनों को भी इस घटना के बारे में पता चला लेकिन वो इतने व्यथित थे कि उन्होंने इस सम्बन्ध में पुलिस में शिकायत दर्ज कराने से इनकार कर दिया। इस्लामिल गोठ कब्रगाह के पास ये घटना हुई। वहाँ भारी संख्या में मृत महिला के रिश्तेदार व पड़ोसी जमा हो गए।

‘उन्हें लगता है हम बेकार हैं’: राहुल गाँधी के वीडियो पॉलिटिक्स से सोनिया के कॉन्ग्रेसी नाराज

बीते साल लोकसभा चुनावों में कॉन्ग्रेस की करारी ​शिकस्त के बाद से ही राहुल गॉंधी और सोनिया गॉंधी की टीम के बीच टकराव की खबरें लगातार आती रही हैं। सोनिया के पार्टी के अंतरिम अध्यक्ष बनने के बाद यह संघर्ष और तेज हो गया था। अब सोनिया की टीम के मेंबर राहुल गॉंधी के वीडियो पॉलिटिक्स से खफा बताए जा रहे हैं।

उनका कहना है कि पूर्व अध्यक्ष उन्हें बेकार समझा जाता है। दरअसल सोनिया टीम के मेंबर राहुल गाँधी के हालिया वीडियो ट्वीट से नाराज हैं।

बता दें कि राहुल गाँधी ने एक बार फिर से कहा है कि चीनी हमारे इलाके में घुस आए हैं। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि यह उन्हें परेशान करता है और खून खौल रहा है। राहुल गाँधी ने सरकार पर झूठ बोलने का आरोप लगते हुए कहा कि वह सच बोलते रहेंगे, भले ही इसकी वजह से उनका राजनीतिक करियर बर्बाद हो जाए। 

सोमवार (जुलाई 27, 2020) को ट्वीटर पर एक वीडियो संदेश जारी करते हुए राहुल गाँधी ने यह बातें कहीं। इसमें उनसे सवाल किया जाता है कि उन लोगों के बारे में आपका क्या ख्याल है जो कहते हैं कि प्रधानमंत्री से चीन पर आपके सवाल, भारत को कमजोर कर रहे हैं?

राहुल गाँधी कहते हैं कि उनकी पहली प्राथमिकता यह देश और जनता है। राहुल ने कहा, ”यह बात एकदम साफ है कि चीनी हमारे इलाके में घुस आए हैं। यह बात मुझे परेशान करती है। इससे मेरा खून खौलने लगता है कि कैसे एक दूसरा देश हमारे इलाके में घुस आया?”

राहुल आगे कहते हैं, ”आप एक राजनीतिज्ञ के तौर पर चाहते हैं कि मैं चुप रहूँ और अपने लोगों से झूठ बोलूँ, जबकि मैं निश्चित रूप से जान गया हूँ, मैंने सैटेलाइट की तस्वीरें देखी हैं, मैंने पूर्व सैन्यकर्मियों से बात की है, अगर आप चाहते हैं कि मैं झूठ बोलूँ कि चीनी इस देश में नहीं घुसे हैं, मैं झूठ नहीं बोलने वाला। स्पष्ट कर दूँ मैं ऐसा नहीं करने वाला। मैं चिंता नहीं करता। चाहे मेरा करियर डूब जाए। लेकिन मैं झूठ नहीं बोल सकता।”

राहुल गाँधी ने सरकार पर झूठ बोलने का आरोप लगाते हुए कहा, ”मैं सोचता हूँ कि वे लोग जो चीनियों के हमारे देश में घुसने के बारे में झूठ बोल रहे हैं, वे ही लोग राष्ट्रवादी नहीं हैं। मेरे ख्याल में, जो लोग झूठ बोल रहे हैं और कह रहे हैं कि चीनी भारत में नहीं घुसे हैं। वे ऐसे लोग हैं, जो देशभक्त नहीं हैं।”

वीडियो के बाद राहुल गाँधी के इस ‘रुख’ को लेकर उनकी अपनी पार्टी के ही एक ग्रुप में सवाल उठने शुरू हो गए हैं। आलोचकों के इस ग्रुप के एक मेंबर ने NDTV से कहा, “वह हमसे बात नहीं करते हैं और हमें नहीं पता कि कौन उन्‍हें सलाह दे रहा है।” बताया जा रहा है कि यह सदस्‍य अपनी यह राय गाँधी परिवार और पार्टी के प्रति निष्‍ठा की वजह से सार्वजनिक तौर पर जाहिर नहीं कर सकते।

वहीं पार्टी की प्रेस कॉन्फ्रेंस में पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम से पूछा गया कि क्या उन्‍होंने राहुल गाँधी को विदेश नीति के परिप्रेक्ष्य में मशविरा दिया है, तो इस पर चिदंबरम ने स्पष्ट रूप से जवाब दिया कि उन्होंने रक्षा या विदेश मंत्री के रूप में कार्य नहीं किया है। राहुल गाँधी कभी-कभी उनकी राय लेते हैं, लेकिन इन वीडियो के लिए नहीं।

बता दें कि इससे पहले भाजपा नेता जीवीएल नरसिम्हा राव ने राहुल गाँधी के इस बयान को हास्यास्पद बताते हुए कहा था, ”उनका करियर बहुत पहले ही खत्म हो चुका है। 2019 में ही आपका राजनीतिक सनसेट (सूर्यास्त) हो गया है। आप केवल कॉन्ग्रेस पार्टी के भविष्य को खत्म करने का लक्ष्य लेकर आगे चल रहे हैं और इसके अलावा राहुल गाँधी को हम बहुत गंभीरता से नहीं लेने वाले हैं। देश की जनता राहुल गाँधी का कोई राजनीतिक भविष्य नहीं देखती है।”

राव ने कहा कि राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस पार्टी हर बार भारतीय सेना का मनोबल गिराने के लिए सेना का अपमान करने का दुस्साहस करते हैं। उन्होंने कहा, ”फिर एक बार हमारे 20 जवानों ने भारत की सीमाओं की सुरक्षा के लिए अपनी जान दे दी। इन कुर्बानियों का राहुल गाँधी बार-बार अपमान करने का साहस कर रहे हैं।”

इन परिस्थितियों के देखकर ऐसा लगता है कि पार्टी में वरिष्ठ बनाम युवा के बीच गतिरोध जारी है। बीते दिनों रजस्थान और उससे पहले मध्य प्रदेश की घटना ने सालों पुरानी पार्टी के अंदर वरिष्ठ बनाम युवा के बीच की लड़ाई सामने ला दी है। और अब राहुल गाँधी के रुख से ही सोनिया टीम के नेता नाराज हैं।

गहलोत के 15 MLA हमारे साथ, आजाद होते ही आ जाएँगे: पायलट गुट के विधायक ने कॉन्ग्रेस की मुसीबत​ बढ़ाई

राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार पर मंडरा रहा खतरा टलता नहीं दिख रहा। सचिन पायलट गुट के एक विधायक के दावे ने पार्टी की मुसीबत और बढ़ा दी है। विधायक हेमाराम चौधरी का दावा है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के गुट के 10 से 15 विधायक उनके संपर्क में हैं।

हेमाराम ने यह बात ऐसे वक्त में कही है जब गहलोत विधानसभा में विश्वास प्रस्ताव लेकर आने की बात कह रहे हैं।हेमाराम चौधरी ने कहा, “अशोक गहलोत गुट के 10 से 15 विधायक हमारे सीधे संपर्क में हैं। वे कह रहे हैं कि जैसे ही उन्हें छोड़ा जाएगा वे हमारे साथ आ जाएँगे। अगर गहलोत प्रतिबंध हटाते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि कितने विधायक उनके पक्ष में हैं।”

इधर विधानसभा सत्र बुलाने को लेकर अशोक गहलोत राज्यपाल पर लगातार हमलावर हैं। रिपोर्ट के मुताबिक़ अशोक गहलोत ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से इस मुद्दे पर फोन से बात भी की थी। दोनों के बीच बातचीत रविवार को हुई। गहलोत ने बातचीत के दौरान यह आरोप लगाया कि उनकी सरकार गिराने की कोशिश की जा रही है। इसके अलावा उन्होंने राज्यपाल द्वारा विधानसभा सत्र न बुलाए जानी की बात भी कही। साथ ही इस मामले में दखल देने का अनुरोध भी किया।       

वहीं दूसरी तरफ आज राजस्थान के राज्यपाल कलराज मिश्र ने भी इस मामले पर अपना नज़रिया रखा था। उन्होंने राज्य सरकार से कुल 3 पहलुओं पर विचार-विमर्श करने के लिए कहा। सत्र बुलाने से पहले 21 दिन का नोटिस पीरियड। इसके अलावा अगर फ्लोर टेस्ट कराया जाए तो उसमें हर सामाजिक दूसरी के हर नियमों का पालन किया जाए। उनके मुताबिक़ विधानसभा सत्र संवैधानिक तरीके से ही बुलाया जाना चाहिए।    

वहीं कॉन्ग्रेस के विधायक दल ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में विधानसभा सत्र बुलाने को लेकर दखल देने का निवेदन किया गया था।