Home Blog Page 4718

करिश्मा भोंसले को मुंबई पुलिस का नोटिस: मस्जिद के लाउडस्पीकर की आवाज कम करने को कहा था

मस्जिद के लाउडस्पीकर की आवाज कम करने का अनुरोध करने पर महाराष्ट्र की महाविकास अघाड़ी सरकार के अंतर्गत आने वाली मुंबई पुलिस ने करिश्मा भोंसले और उनकी माँ के खिलाफ नोटिस जारी किया है।

यह नोटिस करिश्मा की माँ वर्षा गणेश भोंसले के नाम है। इसमें कहा गया है कि करिश्मा का मानखुर्द इलाके में नूरी इलाही सुन्नी वेलफेयर एसोसिएशन की मस्जिद में जाकर वहाँ के अधिकारियों से लाउडस्पीकर की आवाज कम करने के लिए कहना ‘अनुचित’ था, जिससे अजान पढ़ा जा रहा था।

नोटिस में कहा गया है, “24 जून, 2020 को आपने नूरी इलाही सुन्नी वेलफेयर एसोसिएशन की मस्जिद का दौरा किया, जिसमें अजान की आवाज को कम करने की दलील दी गई थी, जो पड़ोस की लाउडस्पीकरों के माध्यम से होती है। अजान की आवाज कम करने के लिए उनसे अनुरोध करने के लिए मस्जिद का दौरा करना आपके लिए अनुचित था। मस्जिद में प्रवेश करने के बजाय, शिकायतकर्ता को नियत कानून का पालन करना चाहिए और शिकायत करने के लिए नजदीकी पुलिस स्टेशन से संपर्क करना चाहिए था।”

नोटिस में कहा गया है कि इस तरह की हरकतें क्षेत्र में “कानून और व्यवस्था की स्थिति” के लिए खतरा पैदा करती हैं और करिश्मा और उसकी माँ को नियमों का पालन करने का निर्देश दिया। करिश्मा और उनकी माँ के खिलाफ धारा 188 और धारा 149 के तहत मामला दर्ज किया जाएगा और फिर उसके अनुसार आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।

गौरतलब है कि मानखुर्द इलाके में रहने वाली करिश्मा भोंसले के अनुसार उनके घर के पास ही मस्जिद की लाउडस्पीकर लगी है, इसलिए वे आवाज काम करने का अनुरोध लेकर मस्जिद गईं। लेकिन, मस्जिद के पास के मुस्लिम समुदाय के लोग करिश्मा और उनकी माँ से बहस कर उन्हें धमकाने और उनके साथ झड़प करने लगे। यही नहीं, जब करिश्मा ने स्थानीय विधायक से इस सम्बन्ध में मदद माँगी तो उन्होंने सलाह दी कि यदि उन्हें लाउडस्पीकर की आवज से परेशानी है तो उन्हें अपना घर बदल लेना चाहिए।

करिश्मा भोसले ने इस घटना का वीडियो अपने ट्विटर अकाउंट पर शेयर किया था।

इस वीडियो में हिजाब पहने एक महिला करिश्मा से बहस करते हुए कह रही है कि तुम्हारे मंदिर में भी तो घंटा बजता है और क्या हम स्पीकर किसी के घर में लगा रहे हैं? इस पर युवती ने जवाब दिया कि अगर मंदिर में घंटी बजती है तो उहें वहाँ जाकर अपनी बात रखनी चाहिए। लेकिन बुर्का पहने महिला युवती की बात अनसुनी कर उसे वहाँ से जाने को कहते हुए देखी जा सकती है। अगले वीडियो में देखा जा सकता है कि एक और महिला इस युवती और उनकी माँ के साथ बदसलूकी और हाथापाई कर रही है।

उल्लेखनीय है कि देशभर में पहले भी ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जब लोगों ने मुस्लिम समुदाय द्वारा लाउडस्पीकर पर बजाई जाने वाली अजान की आवाज से होने वाली परेशानी को जाहिर किया है। पिछले दिनों इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक फैसले में कहा था कि लाउडस्पीकर से अजान देना इस्लाम का हिस्सा नहीं है।

ISI एजेंट राशिद के घर NIA ने मारा छापा, मोबाइल के साथ मिले कई अहम दस्तावेज

NIA की एक टीम ने रविवार (28 जून, 2020) को उत्तर प्रदेश के चंदौली और वाराणसी में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी के एजेंट मोहम्मद राशिद के घर पर छापेमारी की। छापेमारी के दौरान NIA की टीम ने मोबाइल और कई अहम दस्तावेज बरामद किए।

उत्तर प्रदेश के चंदौली और वाराणसी स्थित आवास पर रविवार को राशिद को लेकर पहुँची NIA की टीम ने करीब दो घंटे तक घर को खँगाला और राशिद की माँ सहित अन्य कई परिजनों से पूछताछ की। इसके बाद NIA की टीम राशिद को अपने साथ लेकर चली गई। खबरों के मुताबिक राशिद के घर पहुँचने से पहले ही पूरे इलाके को सील कर दिया गया था।

राशिद के आवास से NIA की टीम को मिले दस्तावेजों और मोबाइल के आधार पर टीम यह जानने की कोशिश में जुटी है कि उसकी तरह और लोग भी ISI के लिए जासूसी में तो शामिल नहीं हैं। NIA की टीम राशिद से लगातार पूछताछ कर रही है।

NIA ने प्रेस को दिए अपने बयान में कहा कि राशिद के खिलाफ में 6 अप्रैल को आईपीसी की धारा 123 और धारा 13, 17 और 18 के यूए (पी) अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया था।

अधिकारियों ने बताया कि राशिद पाकिस्‍तान में बैठे अपने हैंडलर्स के सीधे संपर्क में था। राशिद भारत में रहकर पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI के लिए जासूसी करता था। इतना ही नहीं जासूसी की ट्रेनिंग लेने के लिए राशिद दो बार पाकिस्‍तान भी जा चुका है।

भारत की महत्वपूर्ण जानकारी पाकिस्तान को साझा करने के लिए राशिद को 2019 में पाकिस्तान के राष्ट्रीय रंग हरे कलर की टी-शर्ट इनाम में दी गई थी। कुछ दिन बाद जुलाई 2019 में राशिद को पेटीएम के जरिए 5 हजार रुपए पाकिस्तान से भेजे गए थे।

उसकी ओर से दिए गए भारत के नंबर से दरअसल ISI WhatsApp अकाउंट चला रही थी। राशिद उन्हें भारत के संवेदनशील और रणनीतिक महत्व की जानकारी और फोटो भेजता था। यूपी ATS ने उसे ऐसा करते हुए धर दबोचा था।

मोहम्मद राशिद को यूपी एटीएस ने 19 जनवरी 2020 में गिरफ्तार किया था। मोहम्मद राशिद पर देश में सीआरपीएफ के ठिकानों की जासूसी और सामरिक तौर पर अहम जानकारी को पाकिस्तान में बैठे हैंडलर्स को भेजने का आरोप है। उस पर भारतीय दंड संह‍िता तथा गैर कानूनी गतिविधि रोकथाम कानून के तहत मामला दर्ज किया गया था।

चीन के साथ विवाद में केंद्र सरकार का दिया साथ तो मायावती पर टूट पड़े कॉन्ग्रेसी और इस्लामवादी

भारत-चीन विवाद पर केंद्र में भाजपा की अगुवाई वाली एनडीए सरकार को समर्थन देने के बाद दलित नेता और बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती पर सोमवार (जून 29, 2020) को कॉन्ग्रेस और इस्लामवादियों हमला बोला।

बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने सोमवार को कहा कि उनकी पार्टी भारत-चीन मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी के साथ खड़ी है। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस और भाजपा एक-दूसरे पर आरोप लगाकर राजनीति कर रहे हैं, जो कि देश के हित में नहीं है।

देश की सुरक्षा मामले पर प्रधानमंत्री के साथ खड़े होने पर कॉन्ग्रेस और अन्य इस्लामियों ने उन पर जमकर हमला बोला। उत्तर प्रदेश कॉन्ग्रेस के आधिकारिक ट्विटर अकाउंट ने भारत-चीन विवाद पर बीजेपी के साथ खड़े होने पर सवाल उठाते हुए कहा, “जब देश के साथ खड़े होना है तो मायावती भाजपा के साथ खड़ी हैं। भाजपा तो खुद कहीं नहीं खड़ी है। बिल में दुबकी बैठी है।”

आम आदमी पार्टी (AAP) प्रोपेगेंडा ब्लॉग के फाउंडर रिफत जावेद ने राष्ट्रीय सुरक्षा मुद्दे पर बीजेपी के साथ खड़े होने पर उत्तर प्रदेश के मुस्लिमों पर पिछले साल मायावती को वोट देने को लेकर मजाक उड़ाया।

कॉन्ग्रेस नेता उदित राज ने लिखा, “मायावती जी ने कहा कि भाजपा के साथ खड़ी हैं चीन के मुद्दे पर। झूठ! कब नहीं खड़ी थीं और हमला कॉन्ग्रेस पर बोला। मज़दूरों के मामले में भी यही किया था। कोई भाजपा में शामिल करा दे उपकार होगा। बेचारी जाने के लिए उतावली हैं।”

यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ के ऊपर आपत्तिजनक टिप्पणी करके चर्चा में आए ‘पत्रकार’ प्रशांत कनौजिया, जिसने दलितों की तुलना जानवरों से की थी, ने दावा किया कि दलित समुदाय को अब दलित नेता का ‘असली चेहरा’ पता चलेगा।

प्रशांत कनौजिया ने ट्विटर पर लिखा, “बहन मायावती जी पार्टी को भाजपा में विलय क्यों नहीं कर देती? आज कांशीराम जीवित होते है आपको तुरंत बाहर करते। देश के दलितों को अब इनका असली चेहरा पहचान लेना चाहिए।”

सीमा पर जारी तनाव के बीच कई इस्लामवादियों ने मायावती पर सरकार के साथ खड़े होने पर निराशा व्यक्त की।

कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता सदाफ जाफ़र, जिन्होंने सीएए के विरोध प्रदर्शनों में भी हिस्सा लिया था और उनका आयोजन किया था, ने भी निराशा व्यक्त की।

बता दें कि मायावती पूर्व में बीजेपी के खिलाफ खड़ी हुई थीं और कई मौकों पर सरकार के कार्यों की आलोचना की थी। हालाँकि, उन्होंने भारत-चीन मुद्दे पर केंद्र सरकार के साथ समर्थन किया है। साथ ही उन्होंने कॉन्ग्रेस की क्षुद्र राजनीति पर भी खुलकर बोला।

पूर्व पीएम मनमोहन सिंह की सलाह के बाद मायावती ने उन्हें याद दिलाते हुए कहा था कि विघटन की कूटनीति या निर्णायक नेतृत्व का कोई विकल्प नहीं है। मायावती ने कहा था, “ऐसे कठिन व चुनौती भरे समय में भारत सरकार की अगली कार्रवाई के सम्बंध में लोगों व विशषज्ञों की राय अलग-अलग हो सकती है, लेकिन मूल रूप से यह सरकार पर छोड़ देना बेहतर है कि वह देशहित व सीमा की रक्षा हर हाल में करे, जो कि हर सरकार का दायित्व भी है।”

102 हिंदुओं का जबरन धर्म परिवर्तन, मंदिर को मस्जिद में बदला, मूर्तियाँ तोड़ डाली: तबलीगी जमात सिंध में कर रहा प्रताड़ित

पाकिस्तान के सिंध प्रांत में एक बार फिर से बड़ी संख्या में हिंदुओं के जबरन धर्मांतरण का मामला सामने आया है। जानकारी के मुताबिक सिंध प्रांत के बाडिन जिले के अंतर्गत आने वाले गोलेरची में 102 हिंदुओं को जबरन इस्लाम में परिवर्तित किया गया है।

टाइम्स नाउ के अनुसार, इन 102 हिंदुओं में पुरुष, महिलाएँ और बच्चे भी शामिल हैं। इतना ही नहीं यहाँ के स्थानीय मंदिर में रखी गई हिंदू देवताओं की सभी मूर्तियों को नष्ट कर दिया गया और उसे मस्जिद में बदल दिया गया।

17 मई को सिंध प्रांत में हिंदुओं ने दावा किया था कि तबलीगी जमात के लोगों ने उन्हें प्रताड़ित किया, उनके घरों में तोड़फोड़ की और इस्लाम कबूल नहीं करने पर एक हिंदू लड़के का अपहरण भी कर लिया।

तबलीगी जमात के अपहरणकर्ता उक्त लड़के को छोड़ने के लिए रुपए-पैसे की माँग नहीं कर रहे थे। उनका कहना था कि अगर अपहृत लड़के का परिवार इस्लाम अपना लेता है तो उसे छोड़ दिया जाएगा। लेकिन, परिवार इसके लिए तैयार नहीं था।

पाकिस्तान की हिन्दू महिला को जमीन पर गिर कर रोते हुए देखा जा सकता है, जहाँ वो अपने बेटे की रिहाई के लिए गुहार लगा रही हैं। महिला के आसपास हिन्दू समाज के अन्य लोग खड़े हैं, जो हाथों में पोस्टर लेकर वहाँ के लोगों द्वारा किए जा रहे अत्याचार के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं।

एक अन्य वायरल वीडियो में वही महिला कहती दिख रही है कि वो मृत्यु को अंगीकार करेंगी लेकिन कभी इस्लाम नहीं अपनाएगी। महिलाओं और बच्चों ने हाथ में पोस्टर रखा था, जिसमें लिखा था, “हम मरना पसंद करेंगे लेकिन कभी भी इस्लाम में परिवर्तित नहीं होंगे।”

प्रदर्शनकारियों की ओर से बोलते हुए, एक महिला ने कहा कि उनकी पिटाई की गई, उनकी संपत्तियों को जबरन ले लिया गया और घरों को नष्ट कर दिया गया। उन्होंने कहा कि अगर वे अपने घरों को वापस लेना चाहते हैं तो उन्हें इस्लाम में परिवर्तित होने के लिए कहा जा रहा है। पाकिस्तान के सिंध और पंजाब प्रांतों से हिंदुओं और ईसाइयों के उत्पीड़न की खबरें लगभग नियमित रूप से आती रहती हैं।

फ्रांस से आ रहे हैं 6 राफेल लड़ाकू विमान, 27 जुलाई तक अंबाला एयरबेस में तैनाती के आसार

LAC पर चीन के साथ उपजे विवाद के बीच फ्रांस से 6 राफेल लड़ाकू विमानों के 27 जुलाई को भारत पहुँचने की संभावना है। ये विमान पहले मई में भारत पहुँचने वाले थे, लेकिन कोरोना वायरस के कारण ऐसा मुमकिन नहीं हो पाया। पर, अब अंबाला के एयरबेस पर एक साथ 6 लड़ाकू विमान आएँगे।

गौरतलब है कि बीते दिनों चीन के रवैये को देखते हुए IAF को हाई अलर्ट पर रखा गया है। 2 जून को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी टेलीफोन पर अपने फ्रांसीसी समकक्ष फ्लोरेंस पारले से बातचीत की थी।

फ्रांस की रक्षा मंत्री ने उन्हें आश्वासन दिया था कि कोरोना वायरस महामारी के बावजूद राफेल विमान तय समय के अनुसार भारत पहुँचाए जाएँगे। अब खबर है कि इन लड़ाकू विमानों को फ्रांस से भारतीय पायलट लेकर आएँगे।

हिंदुस्तान टाइम्स की खबर के अनुसार, राफेल आने की सूचना पर सैन्य अधिकारियों (नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर) ने बताया कि राफेल जेट्स से भारतीय वायुसेना की समग्र लड़ाकू क्षमता में काफी वृद्धि होगी और यह भारत के विरोधियों को भी स्पष्ट संदेश देगा।

राफेल की खासियत होगी कि इसमें 150 किमी तक की रेंच के लिए मेट्योर मिसाइल लगी होगी। यानी चीन से मिलने वाली हर चुनौती का भारत करारा जवाब दे पाएगा। भारतीय वायुसेना के पायलट ने इन विमानों की ट्रेनिंग ले ली है, ऐसे में जैसे ये भारत पहुँचेंगे तो काम करने के लिए पूरी तरह से तैयार होंगे।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, राफेल विमानों को भारत लाने के लिए वन स्टॉप का इस्तेमाल किया जा रहा है। यानी फ्रांस से उड़ान भरने के बाद वे UAE के अल डाफरा एयरबेस पर उतरेंगे। यहाँ पर फ्यूल से लेकर बाकी सभी टेक्निकल चेकअप के बाद राफेल विमान सीधे भारत के लिए उड़ान भरेंगे और सीधे अंबाला एयरबेस पर आएँगे।

भारत ने सितंबर 2016 में फ्रांस के साथ लगभग 53,000 करोड़ रुपए की लागत से 36 राफेल लड़ाकू जेट की खरीद के लिए एक अंतर-सरकारी समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसके बाद राजनाथ सिंह ने पहला राफेल विमान फ्रांस के एक एयरबेस पर 8 अक्टूबर को प्राप्त किया था।

बता दें राफेल विमान का पहला स्क्वाड्रन अंबाला में तैनात होगा, जबकि दूसरा स्क्वाड्रन पश्चिम बंगाल के हसीमारा में तैनात किया जाएगा। IAF की ओर से इसके रखरखाव की सुविधाओं को विकसित करने के लिए 400 करोड़ रुपए का खर्चा किया गया है। इन 36 राफेल विमानों में से 30 फाइटर जेट होंगे और 6 को ट्रेनिंग के लिए रखा जाएगा। ट्रेनर जेट ट्वीन सीटर होंगे, जिनके पास फाइटर जेट जैसे सभी विशेषताएँ होंगी।

सबरीमाला पर पुनर्विचार छोड़ मीडिया को नियंत्रित करने पर ध्यान दे सुप्रीम कोर्ट: कॉन्ग्रेस नेता कपिल सिब्बल

कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने शनिवार को एक ऑनलाइन सेमिनार के दौरान न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर अपनी चिंता जताई। सिब्बल ने आरोप लगाया कि अदालतें सरकार का एक टूल बन गई हैं और राष्ट्रहित का मुद्दा नहीं उठातीं। उसकी जगह अन्य मामलों को प्राथमिकता देती हैं।

अपनी बात रखते हुए कपिल सिब्बल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को मीडिया, सोशल मीडिया को नियंत्रित करना चाहिए और सबरीमाला के फैसलों पर पुनर्विचार करने में समय नहीं खर्च करना चाहिए। गौरतलब हो कि यहाँ कॉन्ग्रेस नेता और वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल के लिए मीडिया पर शिकंजा कसना एक बड़ा मुद्दा है। लेकिन हिंदुओं की भावनाएँ उनके लिए कोई मायने नहीं रखती।

कपिल सिब्बल के अनुसार, प्रेस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का दावा नहीं कर सकता है, क्योंकि उनकी अभिव्यक्ति, जाहिर तौर पर कमर्शियल स्पीच होती है।

सिब्बल कहते हैं, “मुख्यधारा के मीडिया को राजनीति द्वारा वित्त पोषित किया जाता है और यह उन प्रमुख लोगों का समर्थन करता है जो सत्ता में हैं। यह मीडिया की जिम्मेदारी की अवधारणा के पूरी तरह से विपरीत है। आपको समाचारों को विचारों से अलग करना चाहिए।”

उल्लेखनीय है कि भारत में प्रेस की स्वतंत्रता भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) में निहित है जो प्रत्येक नागरिक को बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है। कॉन्ग्रेस नेता के अनुसार, प्रेस के पास यह अधिकार नहीं होना चाहिए।

कॉन्ग्रेस नेता इतने पर ही नहीं रुके। वे यह भी कहते हैं कि मीडिया और सोशल मीडिया ने निष्पक्ष संचार की अवधारणा को नष्ट कर दिया है। उनका मानना है कि सुप्रीम कोर्ट को अपने सबरीमाला फैसले की समीक्षा करने के बजाय प्रेस की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सोशल मीडिया पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

कपिल सिब्बल के यह दावे प्रेस स्वतंत्रता के लिए बेहद खतरनाक हैं। ऐसा लगता है कॉन्ग्रेस पार्टी मान चुकी है कि मीडिया को अभिव्यक्ति की आजादी होनी ही नहीं चाहिए। इस तरह के मत अभी तक किसी भी राजनीतिक दल द्वारा लिए गए किसी भी कदम से कहीं अधिक तानाशाही है। लगता है कि साल 2020 की कॉन्ग्रेस पार्टी आपातकाल के काले दिनों को लागू करने का सपना देख रही है।

रिपब्लिक टीवी से कॉन्ग्रेस का विवाद इसका स्पष्ट उदहारण है। रिपब्लिक टीवी के एडिटर इन चीफ अर्नब गोस्वामी को महाराष्ट्र सरकार से सवाल पूछने पर और कॉन्ग्रेस अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी का नाम लेने पर कई प्रताड़नाएँ झेलनी पड़ी और अब सिब्बल खुलेआम ये दावा कर रहे हैं कि प्रेस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की हकदार नहीं है।

यहाँ एक बात और ध्यान में रखना जरूरी है कि प्रेस पर वार कॉन्ग्रेस ने अचानक नहीं किया है। साल 2019 में कॉन्ग्रेस पार्टी ने आम चुनावों के अपने मेनिफेस्टों में सोशल मीडिया को रेगुलेट करने का वादा किया था। लेकिन, चूँकि, कॉन्ग्रेस पिछले साल चुनाव हार गई और सोशल मीडिया पर नियंत्रण कसने वाली स्थिति में नहीं है, इसलिए लगता है वह न्यायपालिका के जरिए अपने चुनावी वादे को पूरा करना चाहती है।

प्रदर्शन की अनुमति नहीं ली, संपत्ति को पहुँचाया नुकसान: NHRC की रिपोर्ट ने जामिया के उपद्रवी छात्रों की खोली पोल

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने अपनी रिपोर्ट में साफ़ कर दिया है कि जामिया मिल्लिया इस्लामिया के छात्रों ने न सिर्फ़ बिना अनुमति के विरोध-प्रदर्शन किया, बल्कि सार्वजनिक संपत्ति को भी जम कर नुकसान पहुँचाया। साथ ही आयोग ने दिल्ली पुलिस को एक स्पेशल जाँच टीम बना कर इस उपद्रव के पीछे काम कर रहे असली तत्वों की पहचान कर के उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने का निर्देश दिया है।

बता दें कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के समक्ष दिल्ली पुलिस के खिलाफ कई शिकायतें और अर्जियाँ भेज कर कहा गया था कि जामिया मिल्लिया इस्लामिया में ‘शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन’ कर रहे छात्रों पर अत्याचार किया गया है। आयोग ने उनकी शिकायतों का निपटारा करते हुए उक्त आदेश जारी किया।

बता दें कि जामिया में सीएए विरोधी प्रदर्शन आगजनी और दंगों में बदल गया था और पुलिस पर पत्थरबाजी भी हुई थी।

NHRC ने जोर दिया कि इस विरोध-प्रदर्शन के बीच काम कर रहे असली गुनहगारों को पकड़ कर उनके इरादे पता करने की ज़रूरत है। आयोग का कहना है कि छात्रों के भेष में असली गुनहगारों ने संगठित तरीके से इस विरोध-प्रदर्शन को अंजाम दिया। भारत सरकार को कहा गया कि वो दिल्ली पुलिस को निर्देश दे कि एक SIT बना कर इसकी जाँच की जाए। साथ ही इसके लिए समय-सीमा तय करने को भी कहा गया।

साथ ही NHRC ने ये भी कहा कि दोषियों के ख़िलाफ़ संस्थाएँ अपने नियम-क़ानून के अंतर्गत कड़ी कार्रवाई करे। साथ ही घायल छात्रों को मानवीय आधार पर उचित मुआवजा देने को भी निर्देशित किया गया है। आयोग ने पुलिस को सीसीटीवी फुटेज को नुकसान पहुँचाने वाले उन लोगों की पहचान करने को भी कहा है, जो लाइब्रेरी के अंदर घुस गए और सीसीटीवी कैमरे तोड़े। साथ ही उन्हें भी चिह्नित करने को कहा गया है, जिन्होंने आँसू गैस के गोले का प्रयोग किया।

NHRC से कथित पुलिस की क्रूरता की शिकायत करने वाले तत्वों ने एक रिटायर्ड न्यायाधीशों की निगरानी में एक स्वतंत्र एजेंसी द्वारा कथित पुलिस ज्यादतियों की जाँच कराने की माँग की थी। आयोग ने इस पर कहा है कि सरकार द्वारा पुलिस बल को संवेदनशील बनाने के लिए प्रयास किए जाएँ और इस तरह के कानून-व्यवस्था की समस्याओं से निपटने के लिए विशेष प्रशिक्षण मॉड्यूल अपनाए जाने की ज़रूरत पर बल दिया जाए।

NHRC ने ये साफ़ कर दिया है कि जामिया के छात्रों का विरोध-प्रदर्शन शांतिपूर्ण तो नहीं ही था। ये मामला 15 दिसंबर 2019 और उसके बाद हुए विरोध-प्रदर्शनों से जुड़ा हुआ है। साथ ही आयोग द्वारा कमिश्नर एसएन श्रीवास्तव को जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी के अंदर पुलिस की कथित कार्रवाई की प्रशासनिक जाँच तेज़ी से करने को कहा गया है।

बता दें कि 15 की ही रात पुलिस असामाजिक तत्वों से निपटने के लिए जामिया कैम्पस में घुसी थी। इस मामले में चीफ जस्टिस एसए बोबडे की अगुवाई वाली पीठ ने भी 16 दिसंबर 2019 को कहा था कि सुप्रीम कोर्ट शांतिपूर्ण प्रदर्शन के खिलाफ नहीं हैं। लेकिन, हिंसा के माहौल में कोई बात नहीं सुनी जा सकती।

वकील इंदिरा जयसिंह ने मानवाधिकारों के हनन का रोना रोते हुए अदालत से इस मामले में स्वत: संज्ञान लेने की अपील की थी। जामिया में प्रदर्शनों के दौरान एबीवीपी छात्रा और महिला मीडियाकर्मियों के साथ बदसलूकी भी की गई थी।

‘तिब्बत में चीन कर रहा सांस्कृतिक नरसंहार’: UNHRC से मानवाधिकार उल्लंघन पर विशेष सत्र बुलाने की माँग

चीन को उसकी ‘विस्तारवादी नीति’ के लिए लताड़ लगाने के बाद अब केंद्रीय तिब्बत प्रशासन (CTA) ने रविवार (जून 28, 2020) को उस पर तिब्बत में ‘सांस्कृतिक नरसंहार’ का आरोप लगाते हुए संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) से अनुरोध किया कि वह चीन द्वारा तिब्बत और उसके तहत आने वाले अन्य क्षेत्रों में किए जा रहे ‘मानवाधिकार उल्लंघनों’ (Human rights violations) पर एक विशेष सत्र बुलाए।

धर्मशाला स्थित केंद्रीय तिब्बत प्रशासन को तिब्बत की निर्वासित सरकार के तौर पर भी जाना जाता है। सीटीए ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से भी “एकजुट होने और बहुत देर हो जाने से पहले यह सुनिश्चित करने का आह्वान किया कि चीन मानवाधिकार संबंधी जवाबदेहियों समेत अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत आने वाले दायित्वों का निर्वहन करे।”

सीटीए के अध्यक्ष लोबसांग सांगय ने एक बयान में कहा, “हम यूएनएचआरसी और सदस्य राष्ट्रों से चीन द्वारा किए जा रहे मानवाधिकार उल्लंघनों के आकलन के लिए विशेष सत्र बुलाने का अनुरोध करते हैं।”

तिब्बत की निर्वासित सरकार के प्रधानमंत्री सांगेय ने कहा, “सीटीओ और तिब्बत के अंदर और बाहर रहने वाले तिब्बती यूएनएचआरसी के तहत संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों का आह्वान करते हैं कि वे चीन द्वारा किए जा रहे मानवाधिकार उल्लंघनों के खिलाफ तत्काल कदम उठाएँ।”

सांगेय ने चीन पर तिब्बत और उसके तहत आने वाले अन्य क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर मानवाधिकार उल्लंघन का भी आरोप लगाया।

तिब्बत के लोगों को मानव होने की अंतर्निहित गरिमा से भी कर दिया वंचित

उन्होंने कहा, “बीते छह दशक और उससे भी ज्यादा समय से तिब्बत के अंदर तिब्बती लोग चीन की सरकार के सत्तावादी शासन के तहत पीड़ा का सामना कर रहे हैं। चीनी सरकार ने तिब्बतियों से उनके मौलिक मानवाधिकार भी छीन लिए हैं। जिनकी गारंटी मानवाधिकार के वैश्विक घोषणा-पत्र के तहत भी मिलती है, तिब्बत के लोगों की विशिष्ट पहचान को खत्म कर दिया और उन्हें मानव होने की अंतर्निहित गरिमा से भी वंचित कर दिया।”

उन्होंने कहा, “चीन की सरकार द्वारा तिब्बतियों को दी जाने वाली यातनाएँ, लोगों को गायब कर देना, मठों में तोड़फोड़ मानवता के खिलाफ अपराध है और इसे ‘सांस्कृतिक नरसंहार’ से कम नहीं ठहराया जा सकता।”

आरफा उकसाती रही कि कुछ हिन्दू-मुस्लिम हो जाए, मनोज वाजपेयी ने कहा, दिक्कत है तो चुनाव लड़ो

एक पत्रकार हैं। नाम है – आरफा खानम शेरवानी। TheWire नाम के संस्थान के लिए काम करती हैं। पत्रकार हैं तो इंटरव्यू वगैरह भी लेती हैं। एक दिन मनोज वाजपेयी का इंटरव्यू लेने गईं। मनोज वाजपेयी फिल्मी कलाकार हैं। लेकिन इंटरव्यू में सिनेमा के अलावा सब कुछ है। और खत्म होते-होते तो यह मानो एक कॉमेडी फिल्म बन गई।

आरफा ने TheWire की पत्रकारिता की राह पर चलते हुए मनोज वाजपेयी पर ‘खतरे में लोकतंत्र’ और ‘लोकतंत्र भारत में बचेगा या नहीं’ जैसे भयंकर शब्द जाल फेंके। लेकिन मनोज उसमें फँसे नहीं। मुस्कुराते हुए कह कर निकल गए कि देश में लोकतंत्र सुरक्षित है। और आश्चर्य जताते हुए यह भी कहा कि पता नहीं क्यों लोगों को खतरा महसूस होता है!

अपनी बात को घुमाते हुए, शब्दों को लपेटते हुए आरफा खानम शेरवानी ने कुछ अपने ‘ढंग’ का मनोज वाजपेयी से कहलवाना चाहा। लेकिन मनोज कहाँ फँसने वाले। वो तो जिस राज्य से आते हैं, वहाँ लोग चाय की दुकान पर गपियाते हुए सरकार बना देते हैं, कुर्सी गिरा देते हैं। उल्टे मनोज ने आरफा की बोलती बंद कर दी, यह कहकर कि हर 4-5 साल पर चुनाव होता है, जिसे सरकार से दिक्कत है, वो उसके खिलाफ चुनाव लड़ ले।

TheWire में काम करने वाली आरफा को इंटरव्यू पूरा करना था, वो भी अपने चुने गए शब्दों के अनुसार। क्योंकि यह काम है और काम पूरा होने पर ही पैसे मिलते हैं। किसी भी तरह से लगी रहीं। जावेद जाफरी का उदाहरण (फेक भी हो सकता है, उबर-ओला ड्राइवर जैसे उदाहरण देना इनका अब आम हो चुका है) तक दे दिया। बताया कि जावेद ने कभी उनसे कहा था कि कलाकार राजनीति पर इसलिए मुँह नहीं खोलते क्योंकि फिर उन्हें काम नहीं मिलता। लेकिन मनोज वाजपेयी ने गैंग्स ऑफ वासेपुर स्टाइल में जवाब दिया – “मुझे ऐसा नहीं लगता।”

राजनीति के सवालों में हार देखती आरफा ने इसके बाद फिल्मों का रुख किया। लेकिन जोड़ा उसमें भी राजनीति ही। ‘पद्मावत’ का नाम लेकर TheWire में काम करने वाली आरफा ने पूछ डाला कि क्या सिनेमा के जरिए किसी खास वर्ग की छवि को बर्बाद किया जा रहा है? इस पर मनोज वाजपेयी ने इतिहासकार की तरह जवाब दिया। मुगले-आजम सिनेमा का उदाहरण देते हुए मनोज ने कहा कि क्या वो सत्य या इतिहास के आस-पास था? नहीं था तो फिर ‘पद्मावत’ को लेकर इतना बवाल क्यों? मनोज ने बताया कि उन्होंने ‘पद्मावत’ एक सिनेमा के तौर पर देखी है और उन्हें अच्छी लगी।

अंत में मनोज वाजपेयी ने आरफा को बिना सवाल पूछे उरी फिल्म के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि उस सिनेमा में विक्की कौशल के बहनोई की मौत वाली सीन पर उन्हें रोना आ गया क्योंकि वो सिनेमा में डूब कर कहानी और किरदार को जीते भी हैं, देखते भी हैं। यह उदाहरण देकर जाने-अनजाने मनोज वाजपेयी ने आरफा की दुखती रग पर नमक रगड़ दिया। वो इसलिए क्योंकि TheWire ने उरी फिल्म को जहरीले स्तर की अति-देशभक्ति (toxic, hyper-nationalism) बताया था।

‘आखिर हिंदुओं को कब तक ये सब झेलना पड़ेगा’: नेटफ्लिक्स पर अब राधा-कृष्ण का अपमान

ऑनलाइन सीरीज के जरिए हिन्दू देवी-देवताओं पर घृणित सामग्री प्रसारित करने का कारोबार धड़ल्ले से जारी है। ताजा कारनामा नेटफ्लिक्स (Netflix) ने अपनी नई सीरीज कृष्णा एंड हिज लीला (Krishna & His Leela) में दर्शाया है।

इस सीरीज में एक कृष्णा नाम के लड़के के कई लड़कियों से शारीरिक संबंध होते है। इनमें से एक लडक़ी का नाम राधा भी होता है। 

अब इसी प्लॉट को आधार बनाकर सोशल मीडिया पर इस सीरिज की आलोचना हो रही है। इसे बॉयकॉट करने की माँग की जा रही है। लोगो का पूछना है कि आखिर क्यों हिंदू देवी-देवताओं को लेकर अभद्रता के मामले बढ़ते जा रहे हैं? क्यों हमारे देवी-देवताओं का अपमान किया जा रहा है? क्या इसका कारण नेटफ्लिक्स का हिंदूफोबिक होना है?

गौरतलब है कि हिंदू मान्यताओं के मुताबिक, राधा-कृष्ण को हमारे समाज में प्रेम का प्रतीक माना जाता है और भगवान कृष्ण की प्रत्येक लीला भी कोई न कोई जीवन संदेश देती है है। बावजूद इन सभी पहलुओं के जानबूझकर ऐसी सामग्री दर्शकों के बीच लाना इस सीरीज के निर्माताओं की मंशा पर स्वत: ही सवाल उठाता है।

बता दें, इस सीरीज के अलावा इस समय सोशल मीडिया पर नेटफ्लिक्स और अनुष्का शर्मा दोनों को हिंदूफोबिक सामग्री दर्शाने के लिए नपसंद किया जा रहा है। एक यूजर इन सीरीज के पोस्टर और कुछ क्लिप शेयर करते हुए पूछती हैं कि आखिर हिंदुओं को कब तक ये सब झेलना पड़ेगा? अगर ये सब किसी और मजहब में हुआ होता तो अब तक मूवी को बैन कराने के लिए हल्ला मच गया होता।

पाताल लोक सीरीज को लेकर बढ़ा था विवाद

याद दिला दें, अभी इससे पहले अमेज़न प्राइम पर रिलीज हुई वेब सीरीज पाताल लोक भी हिंदू घृणित सामग्री दर्शाने के कारण काफी विवादों का हिस्सा बनी थी।

इस सीरीज के आने के बाद न केवल हिंदूवादी संगठनों ने इसपर अपना आक्रोश दिखाया था, बल्कि सिखों व भाजपा नेता ने भी आरोप लगाया था कि इस सीरीज में उनकी छवि को बिगाड़ने का प्रयास हुआ है। इस फिल्म को लेकर अभिनेत्री अनुष्का शर्मा इतना ज्यादा फँस गईं थी कि कोर्ट ने भी उनसे पिछले दिनों नोटिस भेजकर जवाब माँगा था।