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प्रोपोजल ठुकराने पर दलित TikTok स्टार शिवानी की हत्या: मोहम्मद आरिफ ने कबूला जुर्म, लगा SC/ST एक्ट

हरियाणा के सोनीपत स्थित कुंडली में शिवानी नामक एक TikTok स्टार की हत्या का मामला सामने आया थाा। शिवानी की लाश उसके ही सैलून में मिली थी। पुलिस ने इस मामले में उसके दोस्त आरिफ को गिरफ़्तार किया है। आरिफ ने पूछताछ के दौरान अपना जुर्म भी कबूल कर लिया है। शिवानी दलित समुदाय से आती थी, इसीलिए पुलिस ने ऐसी-एसटी एक्ट की धाराओं के तहत मामला दर्ज कर कार्रवाई शुरू कर दी है।

शिवानी का शव बेड के बॉक्स में मिला था। शिवानी TikTok अकाउंट पर 1.34 लाख से भी अधिक फॉलोवर्स हैं। पुलिस ने सोमवार (जून 28, 2020) को आरोपित को गिरफ्तार किया। आरिफ मोहम्मद पर हत्या के साथ-साथ सबूतों के छेड़छाड़ का भी मामला दर्ज किया गया है क्योंकि उसने न सिर्फ शिवानी की हत्या करने के बाद उसके फोन से मैसेज भेजा बल्कि उसके TikTok अकाउंट पर वीडियो भी अपलोड किया था।

डीएसपी वीरेंदर सिंह ने आरोपित आरिफ मोहम्मद को गिरफ्तार किए जाने की पुष्टि करते हुए कहा कि उसका कोरोना टेस्ट कराने के बाद उसे कोर्ट में पेश किया जाएगा। आरिफ ने दुपट्टे से शिवानी खोबियान का गला घोंट कर उसे मार डाला। परिवार का आरोप है कि आरिफ उसे आए दिन परेशान करता था। हाल ही शिवानी ने उससे बातचीत बंद कर के उसके प्रोपोजल को ठुकरा दिया था, जिसके बाद समझाने के बहाने से सैलून आकर उसने शिवानी की हत्या कर दी।

पुलिस के अनुसार, आरिफ शिवानी को मनाने के बहाने सैलून आया था लेकिन डोरबेल बजा कर दरवाजा खुलवाया। हालाँकि, शिवानी ने उसे देखते ही दरवाजा बंद कर दिया था, जिसके बाद वो धक्का देकर जबरदस्ती अंदर घुसने में कामयाब रहा। ब्यूटीशियन शिवानी अपने परिवार से संपर्क करना चाहती थी लेकिन मोहम्मद आरिफ हाथापाई पर उतर आया और उसने फोन छीन कर जोर-जबरदस्ती शुरू कर दी। फिर मार डाला।

ज्ञात हो कि रविवार (जून 28, 2020) को TikTok स्टार शिवानी के एक अन्य दोस्त ने सैलून खोला तो उसे किसी चीज की बदबू आई। बाद में उसने कमरा खोल कर देखा तो उसमें शिवानी की लाश पड़ी हुई थी। उनकी हत्या हो चुकी थी। जिस दिन हत्या हुई, उस दिन देर रात तक घर न पहुँचने पर शिवानी की बहन भारती ने उनके व्हाट्सप्प नंबर पर मैसेज कर पूछा तो जवाब आया, “मैं हरिद्वार में हूँ, मंगलवार को आऊँगी।” दरअसल, ये मैसेज हत्या आरोपित आरिफ ने ही किया था।

शिवानी और आरिफ एक-दूसरे को अच्छे से जानते थे। उन्होंने बताया कि शिवानी द्वारा उससे बात न करने पर वह शिवानी को परेशान करने लगा। इसको लेकर दोनों के बीच लड़ाई-झगड़ा भी हुआ था। परिजनों ने बताया कि 15 दिन से दोनों में काफी झगड़ा चल रहा था। आरिफ ने शुक्रवार को ही शिवानी की हत्या कर दी थी। वह उसी दिन से गायब थी। सैलून में उसकी बहन का दोस्त नीरज उसी बेड पर सोया करता था, जिसके नीचे शिवानी का शव पड़ा था।

सड़क खोलने की माँग कर रहे लोगों पर हजारों मुस्लिम की भीड़ ने किया पथराव: दिल्ली दंगों की चार्जशीट से नया खुलासा

उत्तर पूर्वी दिल्ली में 24 फरवरी 2020 को शुरू हुआ हिंदू विरोधी दंगा पूर्व नियोजित था। इसको अंजाम देने वाले भी पहले से ही तैयार थे। बता दें कि दंगे की नींव जनवरी में ही पड़नी शुरू हो गई थी। दंगे की लगभग सारी योजना जनवरी में ही बन गई थी।

23 फरवरी को दिल्ली के जाफराबाद में हुई एक घटना को हिंसा की पहली घटना माना जा सकता है, जिससे दिल्ली दंगों की शुरुआत हुई थी।

23 फरवरी को PTI की रिपोर्ट में कहा गया था कि नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे लोगों की बड़ी भीड़ ने जब जाफराबाद रोड ब्लॉक कर दिया तो सीएए समर्थकों ने भी वहाँ पर प्रदर्शन शुरू किया। इस दौरान दोनों पक्षों में झड़प शुरू हो गई।

मौजपुर में दोनों पक्षों के लोगों ने एक दूसरे पर पथराव करना शुरू कर दिया, जिसके बाद पुलिस को आँसू गैस के गोले दागने पड़े। तभी बीजेपी नेता के बुलाने पर बड़ी संख्या में भीड़ वहाँ आई, जिनकी माँग थी कि पुलिस तीन दिन के अंदर सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों को वहाँ से हटाकर रास्ता खाली करवाए।

ऑपइंडिया ने विशेष रूप से उन चार्जशीट को एक्सेस किया है, जो 23 फरवरी की घटनाओं की एक बहुत अलग तस्वीर पेश करती है।

चार्जशीट में स्पष्ट रूप से यह उल्लेख है कि एंटी-सीएए विरोध प्रदशनों में शामिल मुस्लिमों ने उन लोगों पर पथराव और हिंसा करना शुरू कर दिया था, जो एंटी-सीएए प्रदर्शनकारियों द्वारा ब्लॉक किए गए सड़कों को फिर से खोलने की माँग कर रहे थे।

चार्जशीट में कहा गया है कि जाफराबाद के पास 66 फुट की सड़क को खोलने की माँग कर रहे व्यक्तियों का एक समूह 23 फरवरी को दोपहर करीब 3:00 बजे मौजपुर चौक पर इकट्ठा हुआ था। जहाँ वे इकट्ठे हुए थे, वह जाफराबाद मेट्रो स्टेशन से लगभग 750 मीटर दूर था।

आगे चार्जशीट में खुलासा किया गया है कि जाफराबाद और कदमपुरी के निवासी, जो जाफराबाद मेट्रो स्टेशन को ब्लॉक करने का समर्थन कर रहे थे, हजारों की संख्या में एकत्र हुए और सड़कों को खोलने की माँग कर रहे समूह के ऊपर पथराव करना शुरू कर दिया।

हालाँकि पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए आँसू-गैस के गोले दागे, लेकिन स्थिति तनावपूर्ण बनी रही।

बहरहाल, चार्जशीट का यह हिस्सा साबित करता है कि हिंसा की घटनाएँ वास्तव में एंटी-सीएए प्रदर्शनकारियों द्वारा शुरू की गई थीं और दोनों समूहों के बीच कोई ‘झड़प’ नहीं हुई थी, जैसा कि पहले रिपोर्ट किया गया था।

स्वदेशी आन्दोलन के बीच मोतीलाल ने खरीदी विदेशी कार, जवाहर को लिखा – ‘भारत में गाड़ी बनने तक इन्तजार करूँ?’

टिकटॉक के साथ ही 59 चायनीज मोबाइल एप्लीकेशन को प्रतिबंधित कर एक बार फिर भारत में स्वदेशी और आत्मनिर्भरता की माँग जोरों पर है। भारतीय जनमानस के वैचारिक जागरण के लिए ‘स्वदेशी’ शब्द बिलकुल भी नया नहीं है। इस एक शब्द ने ही औपनिवेशिक ब्रिटिश साम्राज्य की नींव खोखली करने में अहम भूमिका निभाई थी। लेकिन इससे भी पहले स्वदेशी शब्द को आन्दोलन की शक्ल जिस व्यक्ति ने दी थी, उनका नाम था स्वामी दयानंद सरस्वती!

स्वदेशी की भावना को जगाने के लिए स्वामी दयानंद सरस्वती ने इतना तक कहा था कि अंग्रेज अपने देश के जूते का भी जितना मान करते हैं, उतना भी अन्य देश के मनुष्यों का नहीं करते। उन्होंने कहा था- “जब विदेशी हमारे देश में व्यापार करेंगे तो दारिद्रय और दुःख के सिवाय यहाँ दूसरा कुछ भी नहीं हो सकता।”

कालांतर में जितने भी स्वदेशी आन्दोलन हुए या स्वदेशी की भावना पर जितने भी बड़े आन्दोलन हुए, वह दयानंद सरस्वती के ही स्वदेशी के मूल मन्त्र की परिणति थे। इसी मन्त्र का परिणाम था कि भारत में सबसे पहले वर्ष 1879 में आर्य समाज लाहौर के सदस्यों ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का सामूहिक संकल्प लिया था।

आजादी से पहले ‘आत्मनिर्भर भारत’

इस तरह से देखें तो ‘आत्मनिर्भर भारत‘ का विचार इस देश में कई चरण से होकर गुजरा है। इसका दूसरा चरण था बंगाल के विभाजन के बाद हुआ स्वदेशी आन्दोलन! दिसम्बर, 1903 में बंगाल विभाजन के प्रस्ताव की ख़बर फैलने पर चारों ओर विरोधस्वरूप अनेक बैठकें हुईं। स्वदेशी आन्दोलन की औपचारिक शुरुआत अगस्त 07, 1905 में कलकत्ता के टाउन हॉल में 7 अगस्त ,1905 को एक बैठक में की गई थी।

आन्दोलन के फलस्वरूप स्वतंत्रता सेनानियों ने भारत की जनता से अपील की कि वे सरकारी सेवाओं, स्कूलों, न्यायालयों और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करें और स्वदेशी वस्तुओं को प्रोत्साहित करें। इसके साथ ही राष्ट्रीय कॉलेज और स्कूलों की स्थापना के माध्यम से राष्ट्रीय शिक्षा को प्रोत्साहित करने के विचार ने भी तेजी पकड़ी।

इसका उद्देश्य था ब्रिटेन में बने माल का बहिष्कार करना और भारत में बने सामान का अधिकाधिक प्रयोग करके ब्रिटेन को आर्थिक हानि पहुँचाना और भारत की जनता के लिए रोज़गार सृजन करना। इस आन्दोलन को ‘स्वराज्य’ की आत्मा भी कहा गया था।

यह समय था, जब भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान गरम दल और नरम दल के बीच वैचारिक टकराव भी पनपने लगे थे। तब बाल गंगाधर तिलक ने उदारवादियों द्वारा ब्रिटिश साम्राज्य से स्वतंत्रता की माँग को राजनीतिक भिक्षावृत्ति बताते हुए कहा था कि हमारा उद्देश्य आत्म-निर्भरता है, भिक्षावृत्ति नहीं।

तब इन नेताओं ने विदेशी माल का बहिष्कार, स्वदेशी माल को अंगीकार कर राष्ट्रीय शिक्षा एवं सत्याग्रह के महत्व पर बल दिया। वहीं, उदारवादी नेता स्वदेशी एवं बहिष्कार आन्दोलन को मात्र बंगाल तक ही सीमित रखना चाहते लेकिन उग्रवादी दल के नेता चाहते थे कि इसे एक राष्ट्रव्यापी आन्दोलन बनाया जाए। बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चन्द्र पाल, लाला लाजपत राय, अरविन्द घोष और बाबा गेनू इस आन्दोलन के प्रमुख सूत्रधार थे।

इस आन्दोलन का परिणाम यह हुआ कि लोगों ने न सिर्फ विदेशी कपड़ों का ही बहिष्कार किया बल्कि सरकारी स्कूलों, अदालतों, उपाधियों, सरकारी नौकरियों का भी बहिष्कार इसमें शामिल किया। इसके बदले भारत के लोगों को अपने देश में बने हुए सामान का प्रयोग करना था।

स्वदेशी आन्दोलन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता पर बल देना था। बंगाल केमिकल स्वदेशी स्टोर्स, लक्ष्मी कॉटन मिल, मोहिनी मिल और नेशनल टैनरी जैसे अनेक भारतीय उद्योगों को इसी समय खोला गया था।

हालाँकि, इस देशव्यापी आन्दोलन का एक परिणाम यह भी हुआ कि अनेक भारतीयों ने अपनी नौकरी खो दी और जिन छात्रों ने आन्दोलन में भाग लिया था, उन्हें स्कूलों व कालेजों में प्रवेश करने से रोक दिया गया। आन्दोलन के दौरान वन्दे मातरम को गाने का मतलब देशद्रोह हो गया था।

स्वदेशी आन्दोलन के बीच नेहरू परिवार में आया विदेशी वाहन

ऐसे में, जब पूरा देश ‘स्वदेशी’ की लहर में डूबा था, देश में कई समानांतर आन्दोलन और क्रांतियाँ जन्म लेने लगीं, और ब्रिटिश साम्राज्य इस आन्दोलन से घबराकर इसके नेताओं को जेल में बंद करने लगा था, नेहरू परिवार में एक विदेशी वाहन पहुँचा।

मोतीलाल नेहरू इसी आन्दोलन के समय अखिल भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस का एक प्रमुख चेहरा थे। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के पिता मोतीलाल नेहरू के दादाजी लक्ष्मी नारायण मुगल कोर्ट में ईस्ट इंडिया कंपनी के पहले वकील थे। मोतीलाल अपने वकील भाई से प्रेरित थे। इसी कारण उन्होंने भी वकालक का ही पेशा अपनाया था। वे दो बार कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे।

कॉलेज के दिनों में मोतीलाल नेहरू पश्चिमी सभ्यता से बहुत प्रभावित थे। भारत में जब पहली बार बाइसिकल आई, तो मोतीलाल नेहरू पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने इसे खरीदा था। वर्ष 1907 में पूरा भारत जब स्वदेशी आन्दोलन का हिस्सा बना था, ठीक उसी समय मोतीलाल नेहरू इलाहाबाद में विदेशी गाड़ी खरीदने वाले पहले भारतीय थे।

मोतीलाल नेहरू अपनी कार में (चित्र साभार- इंडिया टुडे)

मोतीलाल नेहरू के इस फैसले पर जब लोगों ने नाराजगी जताई तब मोतीलाल नेहरू ने अपने प्रिय पुत्र जवाहरलाल नेहरू को एक पत्र में लिखा- “क्या तुम मुझे तब तक इन्तजार करने की सलाह दोगे, जब तक मोटर कार भारत में बननी शुरू नहीं हो जाती?”

स्रोत – डेविड अर्नाल्ड द्वारा लिखी गई पुस्तक – Everyday Technology: Machines and the Making of India’s Modernity

हालाँकि, मोतीलाल नेहरू ने 1918 में महात्मा गाँधी के नेतृत्व में विदेशी कपड़ों का त्याग करके देसी कपड़े पहनने शुरू कर दिए थे।

मास्क के लिए टोकने पर दिव्यांग महिला कर्मचारी पर अधिकारी ने किया हमला, वीडियो वायरल होने पर FIR दर्ज

कोरोना महामारी के बीच देश के हर नागरिक से उम्मीद की जा रही है कि वह सरकार के बनाए नियमों का सख्ती से पालन करे। लेकिन इसी बीच कुछ ऐसी खबरें भी आ रही हैं जहाँ लोग न केवल अपनी मनमानी करते दिख रहे हैं। बल्कि अगर कोई अन्य व्यक्ति उनसे नियम पालन करने के लिए अपील कर रहा है या उसका अनुसरण न करने पर टोक रहा है, तो वह उससे हाथापाई भी कर रहे हैं।

ताजा मामला आंध्र प्रदेश के नेल्लोर जिले का है। जहाँ सरकारी दफ्तर में एक दिव्यांग महिला को अपने अधिकारी को मास्क के लिए टोकना भारी पड़ गया। दरअसल, महिला कर्मचारी की बात सुनकर भास्कर नाम का अधिकारी इतना गुस्सा हुआ कि वो महिला पर जानलेवा हमला कर बैठा और पूरा वाकया सीसीटीवी में कैद हो गया।

अब इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से शेयर किया जा रहा है। लोग महिला के लिए इंसाफ की गुहार और अधिकारी के खिलाफ़ कड़ी कार्रवाई की माँग कर रहे हैं।

वीडियो में हम देख सकते हैं कि अधिकारी बहुत गुस्से में महिला के पास आता है और उसे खींचकर मारने लगता है। तभी आस-पास के कर्मचारी ये सब देख हक्का-बक्का हो जाते हैं।

एक बुजुर्ग व्यक्ति उसे रोकने का प्रयास भी करते हैं, पर अधिकारी उनकी सुनने की बजाय उन्हें भी धक्का दे देता है। इसके बाद वह महिला को मारना जारी रखता है। तभी, उसी समय कुछ अन्य कर्मचारी वहाँ आते हैं और अधिकारी को महिला से दूर करते हैं। बाद में उसे लेकर कैबिन से बाहर चले जाते हैं।

इस घटना पर आंध्र प्रदेश सरकार के सलाहकार और YSRC पार्टी के महासचिव एस राजीव कृष्णा ने टिप्पणी करते हुए सख्त लहजे में कहा कि इस तरह का बर्ताव बिल्कुल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

उन्होंने आश्वासन दिया है कि वीडियो में हमला करते हुए नजर आ रहे शख्स को बर्खास्त किया जाएगा। उन्होंने ट्विटर के जरिए पुलिस को निर्देश दिए हैं कि वह इस मामले में हस्तक्षेप करें और शख्स के लिए उचित धाराओं के तहत कार्रवाई करें।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस मामले के संबंध में आरोपित अधिकारी को गिरफ्तार कर लिया गया है। महिला की शिकायत के आधार पर उसके ख़िलाफ़ आईपीसी की धारा 324 और 325 के तहत मामला दर्ज किया गया है।

‘टिकटॉक के 30 करोड़ लौटा दो’: चीन के लिए नमकहलाली करने वाले और क्या बोलेंगे!

सोशल मीडिया पर गिरोह को सदस्यों ने ‘टिकटॉक ने जो 30 करोड़ दिए, वो लौटा दो’ से ले कर ‘मोदी ने भी तो चीनी कम्पनियों से पैसे लिए’ की बातें कर रहे हैं। ये दोनों ही बातें कई स्तर पर असमान और अतार्किक हैं।

पहली बात जो लोगों को समझनी चाहिए वो यह है कि सरकार ने इन एप्स को चीन का होने के कारण ब्लॉक नहीं किया है, बल्कि ये वो एप्स हैं जो नागरिकों को फोन से उनकी निजी सूचनाएँ (चैट, फोटो, वीडियो, मैप डेटा, कीबोर्ड पर जो भी टाइप किया गया आदि) चुराते हैं, और चीनी सरकार को या बड़ी कम्पनियों को बेचते हैं।

तो, यहाँ पर ‘बॉर्डर पर हुई झड़प’ के बदले में यह किया गया ऐसा नहीं है। एक खबर के अनुसार टिकटॉक के उपभोक्ताओं में 5 जून के बाद लगभग आधी कमी आई थी क्योंकि लोगों ने खुद ही उसे अनइन्स्टॉल करना शुरू कर दिया था। बात यह है कि इन चोर कम्पनियों को बहुत पहले ब्लॉक करना चाहिए था, जो कि देर से हुआ है। चूँकि इसके होने की टायमिंग अभी की है, तो इसे किसी ‘बदले की भावना’ से जोड़ कर देखा जा रहा है।

जहाँ तक पीएम केयर्स में दान देने की बात है, तो टिकटॉक से सरकार ने पैसा माँगा नहीं था। हो सकता है कि भारतीय लोगों के डेटा चुराने के अपराध से ग्रस्त कम्पनी ने अपराधबोध के कारण ऐसा किया हो, या उन्हें लगा हो कि ऐसा करने से भारत में उनकी छवि सुधरेगी। दान देने में जब सरकार ने किसी को मजबूर नहीं किया तो ये पैसा सरकार क्यों लौटाएगी?

इस कुतर्क के हिसाब से जो भी कम्पनियाँ भविष्य में किसी अपराध का हिस्सा बनी पाई जाएँगी, उन सबके द्वारा किए गए सहयोग/दान को सरकार लौटाती रहे?

दूसरी बात, जो लोग यह कह रहे हैं कि इसे लौटा देना चाहिए, वो वस्तुतः यह मान रहे हैं कि ऐसे दान का स्वभाव ‘वापसी में कुछ मिलने की आशा’ लिए होता है। अंग्रेजी में जिसे ‘क्विड प्रो क्वो’ कहा जाता है। दान का मतलब ही है कि दे कर भूल जाओ।

तीसरी बात, क्या टिकटॉक ने खुद माँगा है कि उसके पैसे वापस कर दिए जाएँ? फिर ये बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना क्यों बना जा रहा है? इन चेहरों को आप देखेंगे तो पाएँगे कि ये वही हैं जो कॉन्ग्रेस इकोसिस्टम में पूरा जीवन निकाल चुके हैं।

इसलिए, ये एक समानांतर तर्क यह रख रहे हैं कि राजीव गाँधी फाउंडेशन को चीनी सरकार ने दान दिया था तो भाजपा वाले पागल हो रहे थे, अभी चीनी कम्पनी के पैसे लेने में बड़ी दिलचस्पी दिखा रहे हैं। इनकी मूर्खता इस स्तर की है कि कुछ कहना ही बेकार है। फिर भी, जनसामान्य की बेहतर समझ के लिए इसे सरल तरीके से समझाना आवश्यक है।

राजीव गाँधी फाउंडेशन ‘मिनि कॉन्ग्रेस’ ही है। यहाँ उस पार्टी की अध्यक्षा के ही परिवार के फाउंडेशन ने, सरकार को नियंत्रण में रखते वक्त (मनमोहन को चलाते वक्त), चीनी सरकार और दूतावास से पैसे लिए। उसके बाद, इन्होंने चीन को व्यापारिक लाभ पहुँचाने की कोशिश की जब ये ‘फ्री ट्रेड अग्रीमेंट’ लाना चाह रहे थे और RCEP में चीनियों की बात मानना चाह रहे थे।

दूसरी तरफ, एक सरकारी आपदा फंड है जिसमें किसी प्राइवेट चीनी कम्पनी ने स्वतः दान किया है। अगर यह भाजपा के किसी कर्मचारी के NGO में जाता, और वो भारत का प्रधानमंत्री या कैबिनेट का सदस्य होता तो हम इसे उसी आलोक में देखते। लेकिन यहाँ ऐसा नहीं है। किसी व्यक्ति से जुड़ी संस्था को विदेशी सरकार द्वारा पैसा देने, और किसी सरकारी संस्था को किसी प्राइवेट कम्पनी द्वारा दान देने में जमीन-आसमान का अंतर है। लेकिन कहते हैं न कि चोर की दाढ़ी में तिनका!

एक बेहूदगी, ’20 सैनिक मारे गए और इन्होंने एप्प बैन किया है’ वालों की भी है। ये समझते हैं कि सैनिकों के बलिदान का बदला सरकार एप्प ब्लॉक करवा कर ही लेगी, बाकी तरीके नहीं है। एप्प ब्लॉक करवाना कई कदमों में से एक है। इससे चीनी अर्थव्यवस्था को तो नुकसान होगा ही, साथ ही भारतीय नागरिकों का डेटा सुरक्षित रहेगा (जो कि सरकार के लिए मुख्य वजह है)। लेकिन ऐसे महामूर्खों को ये बातें समझ में न तो आती हैं, न ये समझना चाहते हैं।

ये वही बेवकूफाना बात हुई कि देश में गरीब मर रहे हैं और भारत मंगलयान छोड़ रहा है। दोनों बातों का आपस में कोई लेना-देना नहीं। चीनी कम्पनियाँ डेटा चुरा रही हैं, और उन्हें ब्लॉक किया गया है। गौर करने वाली बात तो यह है कि पाकिस्तान पर जब एयर स्ट्राइक होता है तो ये ‘अमन की आशा’ करने लगते हैं, और ‘इन मुद्दों को बैठ कर बातचीत से सुलझाना चाहिए’ के मोड में चले जाते हैं, लेकिन चीन वाली बात पर सरकार को बम फोड़ने के लिए उकसा रहे हैं।

कुल मिला कर इन चेहरों को याद रखने की जरूरत है कि ये लोग हमेशा ऐसे समय में देश के दुश्मनों के साथ क्यों और किस तरह से खड़े दिखते हैं। आखिर, सब कुछ जानने के बाद, और बॉर्डर की परिस्थिति समझने के बाद भी, कोई अभी चीनी कम्पनियों या सरकार का समर्थन कैसे कर रहा है, यह समझना कठिन नहीं है। इनके आकाओं को चीन ने काफी पैसे खिलाए हैं, और अभी नमकहलाली का समय आया है

मंदिर में दंडवत करते दिखे CJI बोबडे तो कट्टरपंथियों को लगी मिर्ची, बाइक को लेकर भी फैलाया गया झूठ

भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एसए बोबडे का एक फोटो सोमवार (जून 28, 2020) को पूरे दिन ट्विटर पर वायरल होता रहा, जिसमें वो एक हार्ले डेविडसन बाइक पर बैठे दिख रहे हैं। हालाँकि, वो बाइक चलाते हुए नहीं दिखे। तस्वीर में बाइक का स्टैंड लगा हुआ है, जिससे पता चलता है कि वो बस उसकी फील ले रहे थे। बाइक पर सीजेआई एसए बोबडे की तस्वीर उनके गृह क्षेत्र नागपुर की थी। वहीं उनकी एक मंदिर में भी तस्वीर वायरल हुई।

इसके बाद सोशल मीडिया पर प्रपंचों का दौर शुरू हो गया। प्रशांत भूषण ने कहा कि सीजेआई एसए बोबडे 50 लाख की बाइक ‘चला रहे हैं’, जो एक भाजपा नेता की है। उन्होंने दावा किया कि सीजेआई ने बिना मास्क, सैनिटाइजर या हेलमेट के राजभवन परिसर में बाइक चलाया। साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि सीजेआई एसए बोबडे ने सुप्रीम कोर्ट को लॉकडाउन पर रख कर जनता को उनके मूलभूत अधिकारों से वंचित कर रखा है।

‘द न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ के अनुसार, लोगों का कहना है कि जस्टिस बोबडे को तो उस बाइक के मालिक तक के बारे में कुछ पता नहीं था, जो प्रशांत भूषण के दावों की पोल खोलता है। वहाँ मौजूद लोगों ने बताया कि एक जस्टिस बोबडे एक पौधरोपण कार्यक्रम में गए थे, जहाँ एक ऑटोमोबाइल डीलर ने वो बाइक भेजी थी। उन्होंने बाइक चलाई भी नहीं। बताया गया है कि वो रिटायरमेंट के बाद हार्ले डेविडसन की बाइक ख़रीदने की योजना बना रहे हैं।

वहीं अब सीजेआई बोबडे का एक मंदिर में दण्डवत प्रणाम करते हुए वीडियो वायरल हुआ है, जिसके बाद प्रपंची कह रहे हैं कि क्या एक लोकतांत्रिक देश के मुख्य न्यायाधीश का इस तरह से अपनी आस्था प्रकट करना उचित है? सैयद उस्मान नामक ट्विटर यूजर ने उनकी वीडियो शेयर कर के पूछा कि पहचानिए कौन? इशिता यादव ने उन्हें जवाब देते हुए कहा कि ये देश के मुख्य न्यायाधीश हैं, जो एक मंदिर में सम्मानपूर्वक प्रार्थना कर रहे हैं। इसमें दिक्कत क्या है?

कई अन्य लोगों ने भी इस वीडियो को लेकर प्रपंच फैलाने वालों को जवाब दिया। एक अव्यक्ति ने ध्यान दिलाया कि जब कोई खास मजहब वाला ऐसा करता है तो उसका महिमामंडन किया जाता है क्यों हाल ही में एक ट्रैफिक पुलिसकर्मी का बीच सड़क पर नमाज पढ़ते हुए तस्वीर को सुखद बताते हुए खूब शेयर किया गया था। फिर ये भेदभाव क्यों? एक यूजर ने पूछा कि एक हिन्दू मंदिर में पूजा कर रहा है जो कि सामान्य बात है, इसमें किसी को क्या समस्या हो सकती है और क्यों?

एक दक्षिण भारतीय ट्विटर हैंडल ने लिखा कि अगर किसी खास मजहब के जज ने मस्जिद में नमाज पढ़ी होती और उस तस्वीर को सर्कुलेट कर-कर के हिन्दू सवाल उठाने लगते तो इस देश का सेकुलरिज्म खतरे में आ जाता। उसने कहा कि तब उन आलोचकों को इस्लामॉफ़ोबिक ठहराते हुए लिबरल्स पागल हो जाते। कई यूजरों ने उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी व अन्य नेताओं की इफ्तार पार्टी करते हुए फोटो शेयर कर के दिखाया कि इन सब पर तो हंगामा नहीं होता।

दरअसल, जस्टिस एसए बोबडे राम मंदिर की सुनवाई वाली पीठ में भी शामिल थे, तभी से लिबरल समूह उनसे नाराज़ है। उन्होंने जामिया के उपद्रवी छात्रों को हिंसा रोकने की सलाह दी थी, जो वामपंथी गिरोह को नागवार गुजरा। इससे पहले वो जनेऊ पहन कर तिरुपति मंदिर में दर्शन के लिए पहुँचे थे, जिससे इस्लामी कट्टरवादी उन पर आक्षेप लगाते रहते हैं। जगन्नाथ रथयात्रा को मंजूरी दिए जाने से भी कई प्रपंची सुप्रीम कोर्ट पर निशाना साध रहे हैं।

पाकिस्तानी कर्मचारियों के नमाज पर चीनी कंपनियों ने लगाई ‘पाबन्दी’, समुदाय विशेष को सता रहा नौकरी जाने का भय

पाकिस्तान भले ही चीन के समक्ष समर्पण कर के बैठा हो लेकिन अब चीन के ही लोग पाकिस्तानियों को प्रताड़ित करने पर उतर आए हैं। नमाज को इस्लाम के 5 मूलभूत सिद्धांतों में से एक माना जाता है लेकिन पाकिस्तान में चीन की कुछ कंपनियों ने वर्कर्स द्वारा ऑफिस की अवधि में नमाज पढ़ने पर पाबंदी लगा दी है। सोशल मीडिया पर जुमे के दिन शुक्रवार (जून 26, 2020) का एक मौलवी का वीडियो वायरल हो रहा है, जिससे इस खुलासे को बल मिला है।

उक्त मौलवी ने वीडियो में पाकिस्तान के लोगों को इन मामलों में कड़ा रुख अख्तियार करने की सलाह दी है। पाकिस्तानी मौलवी ने कहा कि पाकिस्तान के लोग चीन को ये बता दें कि वहाँ के लोगों को अगर पाकिस्तान में रहना है तो यहाँ के स्थानीय नियम-क़ायदों के हिसाब से चलना पड़ेगा क्योंकि ये मुल्क उनकी जागीर नहीं है। मौलवी ने कहा कि चीन की कंपनियों में काम कर रहे लोग नमाज नहीं पढ़ पा रहे हैं। उन्हें अपनी नौकरी जाने का भय सता रहा है।

चीन द्वारा नमाज न पढ़ने देने पर पाकिस्तानी मौलवी का फरमान

पाकिस्तान के मौलवी ने कहा कि चीन की कंपनियों द्वारा अपने पाकिस्तानी कर्मचारियों को नमाज न पढ़ने देना अब पाकिस्तान के सेल्फ-रेस्पेक्ट का मुद्दा बन गया है। मौलवी ने पाकिस्तानियों को मजबूती से खड़ा होने की अपील की। बता दें कि चीन सैन्य मामलों में पाकिस्तान का सबसे विश्वस्त मित्र है और उसने पाकिस्तान में भारी निवेश भी कर रखा है। वो समय-समय पर अंतररष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान के पक्ष भी लेता रहा है।

बदले में पाकिस्तान भी चीन के शिनजियांग में उइगरों पर हो रहे अत्याचार पर चुप रहता है। आए दिन इस्लाम और पैगम्बर मुहम्मद की बात करने वाले इमरान खान शिनजियांग में चीन द्वारा 20 लाख उइगरों को प्रताड़ना कैम्प में डाले जाने, वहाँ की महिलाओं के साथ चीनी अधिकारियों के सोने और उनका गर्भपात कराने वाली ख़बरों पर चुप्पी साधे रखते हैं। लेकिन, अब चीन के कारण पाकिस्तान में ही समस्याएँ खड़ी हो रही हैं।

इसके अलावा चीन में उइगरों के दाढ़ी रखने पर भी पाबन्दी लगी हुई है, जिससे कई मजहबी मुल्क और संगठन कम्युनिस्ट पार्टी से नाराज़ हैं लेकिन पाकिस्तान इसे नज़रअंदाज़ करता आया है।

चीन से आयात पर गिर सकती है गाज, तैयारी में जुटी मोदी सरकार: 5G तकनीक व उपकरण पर भी चर्चा

टिकटॉक समेत 59 चीनी एप को बैन करने के बाद अब भारत सरकार चीन को आर्थिक रूप से तोड़ने की तैयारियों में जुटा है। खबर है कि चीनी सामान के आयात पर प्रतिबंध लगाने के लिए सोच-विचार शुरू हो गया है।

इसके लिए औद्योगिक संगठनों व अन्य मैन्यूफैक्चरिंग एसोसिएशन व निर्यातकों से भी उनकी राय माँगी गई है। इन सबसे पूछा गया है कि चीन से आयात पर प्रतिबंध लगने की स्थिति में उन पर क्या फर्क पड़ेगा या वह इससे कितने सहज होंगे।

आयात के अलावा 5G तकनीक के इस्तेमाल पर भी निर्णय लेने के लिए परामर्श लिया जा रहा है। कहा जा रहा है कि शीर्ष मंत्रियों की बैठक में यह बात हुई है कि HUAWEI जैसी कंपनी को सरकार 5जी तकनीक के उपकरणों के मामले में दूर रखना चाहती है।

हालाँकि, शीर्ष नेताओं की बैठक में 5जी को लेकर हुई चर्चा के बारे में मीडिया में कोई विस्तृत जानकारी नहीं है। लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, इस दौरान Huawei और कई अन्य चीनी कंपनियों के 5जी तकनीक में हिस्सेदारी लेने को लेकर बात हुई।

उल्लेखनीय है कि सरकार औद्योगिक संगठनों एवं एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल से चीन से आयात होने वाले सामान की सूची की माँग पहले ही कर चुकी है। जिसका उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि आखिर किन-किन आइटम का निर्माण हम आसानी से तत्काल रूप में भारत में कर सकते हैं, जिनसे भारतीय उत्पादकों को कोई नुकसान नहीं हो।

इसके अतिरिक्त विकल्प के तौर पर इस बात पर भी गौर किया जा रहा है कि यदि चीन से आयात पर प्रतिबंध लगाया जाता है तो कच्चा माल या फिर अन्य जरूरी सामान कहाँ से मँगवाए जा सकते हैं।

यहाँ बता दें कि भारत इस समय दवा, ऑटो पार्ट्स, मोबाइल एवं अन्य इलेक्ट्रॉनिक्स, रसायन जैसे कई क्षेत्रों में कच्चे माल की सप्लाई के लिए अभी चीन पर निर्भर करता है। आटो पार्ट्स को तो तैयार करने के लिए चीन से कई ऐसे कच्चे माल आयात किए जाते हैं, जिनके बगैर पार्ट्स को तैयार नहीं किया जा सकता है।

कॉस्मेटिक और दवा निर्माण भी अभी चीन के आयात पर निर्भर है। ऐसे में सरकार के सामने इनके विकल्प ढूँढना एक बड़ी चुनौती है। निर्यातकों के अनुसार, चीन से सस्ते दाम पर कच्चे माल मिलने की वजह से पार्ट्स की लागत कम होती है और वे अंतरराष्ट्रीय बाजार में मुकाबला करने में सक्षम होते हैं।

मगर, बावजूद इन सभी बातों के और चीन का रवैया देखते हुए पीएचडी चैंबर के टेलीकॉम कमेटी के चेयरमैन संदीप अग्रवाल का कहना है कि सरकार को साहसिक फैसला करना ही होगा। भले ही कुछ समय हमें महँगे सामान खरीदने पड़े।

वे कहते हैं कि सभी क्षेत्रों में भारतीय कंपनियों को ट्रायल ऑर्डर देने की शुरुआत होनी चाहिए और उसमें कमी या देरी पर भारतीय कंपनियों पर जुर्माने की शर्त होनी चाहिए। उनका मानना है कि इस तरीके से भारतीय कंपनियों को टेलीकॉम क्षेत्र में चीन का मुकाबला करने में मदद मिलेगी।

चीन में सूअर से फैलने वाला नया फ्लू वायरस: ‘पर्सन टू पर्सन ट्रांसमिशन’ की क्षमता, पूरे विश्व में फैलने का खतरा

अभी चीन के वुहान से निकले कोरोना वायरस से दुनिया उबरा भी नहीं है कि एक ऐसी ही नई समस्या ने सिर उठाना शुरू कर दिया है। चीन में वैज्ञानिकों ने एक नए फ्लू का पता लगाया है, जिसके वैश्विक आपदा में बदलने की आशंका जताई गई है। ये फ्लू सूअरों में फैल रहा है लेकिन इससे मनुष्यों को भी संक्रमित होने की आशंका है। विशेषज्ञों का कहना है कि ‘पर्सन टू पर्सन ट्रांसमिशन’ की क्षमता वाला ये वायरस पूरे विश्व में फ़ैल सकता है।

हालाँकि, अभी इसके तत्काल में इतनी बड़ी समस्या बनने की आशंका नहीं है लेकिन वैज्ञानिक कह रहे हैं कि इसके पास हर वो क्षमता है, जिससे ये पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले सके और एक बड़ी जनसंख्या को संक्रमित कर सके, इसीलिए इस पर काफ़ी क़रीब से नज़र रखने की ज़रूरत है। ये एकदम से नया है, इसीलिए लोगों के पास इससे लड़ने लायक इम्युनिटी नहीं है और इससे निपटने के लिए कोई योजना भी नहीं है।

सूअर के माँस का विश्व में बहुत बड़ा बाजार है, ऐसे में स्वाइन इंडस्ट्री वर्कर्स में इसके सबसे पहले फैलने की आशंका है, जिसके बाद ये अन्य लोगों को अपनी चपेट में ले सकता है। ‘प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल अकादमी ऑफ साइंसेज’ जर्नल में सूअरों में फ़ैल रहे इस वायरस पर नज़र रखने की चेतावनी दी गई है। इससे पहले 2009 में स्वाइन फ्लू फैला था, जिसने पूरी दुनिया को तबाह किया था।

हाल ही में चीन के युन्नान प्रांत में एक व्‍यक्ति की को हंता वायरस से मौत हो गई थी। पीड़‍ित व्‍यक्ति काम करने के लिए बस से शाडोंग प्रांत लौट रहा था। उसे हंता वायरस से पॉजिटिव पाया गया था। बस में सवार 32 अन्‍य लोगों की भी जाँच की गई थी। हंता वायरस चूहे या गिलहरी के संपर्क में इंसान के आने से फैलता है। सेंटर फॉर डिजिज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के मुताबिक, चूहों के घर के अंदर और बाहर करने से हंता वायरस के संक्रमण का खतरा रहता है।

वैज्ञानिकों ने जानकारी दी कि सूअर के अंदर ही इस वायरस को रोकने के लिए कदम उठाना होगा। इसके अलावा वहाँ काम करने वाले लोगों पर भी इसे लागू करना पड़ेगा। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अभी आगे और ज्‍यादा वायरस के आने का खतरा लगातार बना हुआ है।

CAA दंगों में लिप्त कॉन्ग्रेसी नेता शाहनवाज आलम गिरफ्तार: प्रियंका गाँधी का करीबी, UP अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ का है अध्यक्ष

उत्तर प्रदेश में कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने सोमवार (जून 29, 2020) की रात हजरतगंज थाने के सामने जा कर जम कर हंगामा किया। दरअसल, ये कॉन्ग्रेसी यूपी कॉन्ग्रेस के अल्पसंख्यक सेल के अध्यक्ष शाहनवाज आलम को गिरफ्तारी से भड़के हुए थे।

शाहनवाज आलम को रात में गिरफ्तार किया गया। इससे कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता भड़क गए और उन्होंने थाने का घेराव कर के बवाल काटना शुरू कर दिया। पुलिस द्वारा लाख समझाने के बावजूद वो हंगामे पर उतारू रहे, जिसके बाद अंत में यूपी पुलिस को लाठियाँ चटका कर उन्हें खदेड़ना पड़ा।

बता दें कि यूपी कॉन्ग्रेस के माइनॉरिटी सेल के अध्यक्ष शाहनवाज आलम को सोमवार की रात 8 बजे तब गिरफ्तार किया गया, जब वो कॉन्ग्रेस मुख्यालय से अपने घर पहुँचे ही थे।

हज़रतगंज पुलिस ने दिसंबर 19, 2019 को लखनऊ में सीएए के विरोध में हुई हिंसा और आगजनी के मामले में शाहनवाज आलम को गिरफ्तार किया है। उन पर हिंसा में लिप्त होने और लोगों को भड़काने का आरोप है। डीसीपी सेंट्रल दिनेश सिंह ने शाहनवाज आलम की गिरफ्तारी की पुष्टि की है।

पुलिस ने कहा है कि दिसम्बर 2019 में सीएए विरोधी हिंसा के बाद से ही वो रडार पर था लेकिन उसके ख़िलाफ़ सबूत नहीं मिल रहे थे। जब-जब पुलिस को साक्ष्य मिले हैं, उसे धर-दबोच गया है। शाहनवाज से हजरतगंज के एसपी के नेतृत्व में पुलिस टीम पूछताछ में लगी है।

कॉन्ग्रेस का कहना है कि ये गिरफ्तारी का सही तरीका नहीं है और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार बदले की राजनीति पर उतर आई है। इसीलिए शाहनवाज आलम की गिरफ्तारी के 1 घण्टे बाद से ही उबले कॉन्ग्रेसियों ने बवाल काटना शुरू कर दिया।

बाद में पुलिस की लाठी खा कर वो तितर-बितर हुए। उत्तर प्रदेश कॉन्ग्रेस कमिटी के अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू और सीएलपी नेता आराधन मिश्रा सहित कॉन्ग्रेस के कई नेतागण हज़रतगंज कोतवाली आया धमके। वहाँ पुलिस और इन कॉन्ग्रेस नेताओं के बीच काफी देर तक जोरदार बहस चलती रही।

हंगामे पर उतारू कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं को पुलिस ने पहले समझाया, लेकिन जब वे नहीं माने तब नारेबाजी कर रहे कार्यकर्ताओं हल्का लाठीचार्ज करना पड़ा। कोतवाली परिसर को खाली कराने में पुलिस को खासी मशक्कत करनी पड़ी।

इसी क्रम में उत्तर प्रदेश कॉन्ग्रेस ने एक सीसीटीवी फुटेज भी जारी किया है। इस वीडियो क्लिप में यूपी के पुलिसकर्मी सादे कपड़ों में दिख रहे हैं। पुलिस शाहनवाज आलम को बोलेरो गाड़ी से थाने ले जाती हुई दिख रही है।

आलम को कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा का करीबी नेता माना जाता है। यूपी में उसे प्रियंका गाँधी की कोर टीम का हिस्सा माना जाता है। ऐसे में उसे बचाने के लिए कॉन्ग्रेस नेताओं का सड़क पर आना लाजिमी है।

कॉन्ग्रेस पार्टी शाहनवाज के मुस्लिम होने के कारण इसे ‘मुस्लिमों पर अत्याचार’ को मुद्दा बना कर उछाल रही है। हालाँकि, सीएए विरोधी दंगों को लेकर सरकार सख्त है और कड़ी कार्रवाई कर रही है।

प्रियंका गाँधी ने विरोध जताते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस के नेता और कार्यकर्ता जनता के मुद्दों पर आवाज उठाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने दावा किया कि भाजपा सरकार यूपी पुलिस को दमन का औज़ार बनाकर दूसरी पार्टियों को आवाज उठाने से रोक सकती है, हमारी पार्टी को नहीं।

प्रियंका गाँधी ने वीडियो ट्वीट करते हुए लिखा कि देखिए किस तरह यूपी पुलिस ने हमारे अल्पसंख्यक विभाग के अध्यक्ष को रात के अंधेरे में उठाया गया। उनका आरोप है कि फर्जी आरोपों को लेकर कॉन्ग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू को भी को चार हफ़्तों के लिए जेल में रखा गया था। प्रियंका गाँधी ने आरोप लगाया कि ये पुलिसिया कार्रवाई दमनकारी और आलोकतांत्रिक है। हालाँकि, पुलिस ने कहा कि वो तय प्रक्रिया के तहत कार्रवाई कर रही है।