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डॉक्टर पर मरीज को बेहोश कर के मारपीट करने का आरोप: 2 बच्चों की डिलीवरी का मामला, एक की मौत

उत्तर प्रदेश के जौनपुर से एक गर्भवती महिला से डॉक्टर द्वारा मारपीट की ख़बर आई है। हालाँकि, डॉक्टर ने इस ख़बर का खंडन किया है। पीड़िता शिवानी सोनकर की डिलीवरी होनी थी। उन्हें डॉक्टर संजीव कुमार मौर्या के लक्ष्मी हॉस्पिटल में भर्ती किया गया था। वहाँ उनकी सर्जरी हुई और डिलीवरी के बाद दो बच्चे भी हुए, जिनमें से एक की मृत्यु हो गई है। सर्जरी के बाद परिजनों ने पाया कि पीड़िता के गाल पर मारे-पीटे जाने के लाल निशान थे, जिसके बाद उन्होंने डॉक्टर के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कराई।

परिजनों का क्या कहना है?

पीड़िता के चाचा ने ऑपइंडिया से बात करते हुए बताया कि उन्होंने अपनी भतीजी को अप्रैल 26, 2020 को हॉस्पिटल में भर्ती कराया था। डिलीवरी होने के बाद दोनों बच्चों को एक दूसरे डॉक्टर (शिशु रोग विशेषज्ञ) के पास भर्ती कराया गया था। परिजनों ने बताया कि डॉक्टर बार-बार बोल रहे थे कि मरीज को दिल का दौरा पड़ा है, इसे लेकर जाओ। बाद में जब उन्होंने गाल पर निशान देखा तो उन्होंने डॉक्टर से इस सम्बन्ध में सवाल पूछे।

चूँकि, उस समय पीड़िता बेहोश थी, इसलिए उसने कहा उसे कुछ नहीं नहीं पता। परिजनों का आरोप है कि डॉक्टर और नर्स ने मिल कर उसकी पिटाई की है। परिजनों कहना है कि डॉक्टरों ने इस सम्बन्ध में अलग-अलग बातें कही। पहले उन्होंने कहा कि वो मरीज को होश में लाने के लिए बस थपथपा रहे थे, बाद में उन्होंने कहा कि वो बाथरूम में गिरने से जख्मी हुई है। इस सम्बन्ध में परिजनों ने सराय ख्वाजा थाना क्षेत्र में शिकायत दर्ज कराई है।

परिजनों का आरोप है कि थाना प्रभारी डॉक्टर पर कार्रवाई करने से हिचक रहे थे। पीड़िता के चाचा ने पुलिस पर सहयोग न करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि नेताओं और पत्रकारों के फोन आए हैं लेकिन अब तक किसी ने मदद नहीं की है। स्थानीय सपा-बसपा नेताओं ने भी उनसे संपर्क किया है लेकिन अभी तक किसी ने पीड़ित परिवार की मदद करने के लिए कुछ नहीं किया है। हालाँकि, डॉक्टर ने परिजनों के पास जाकर माफ़ी माँगी।

उनका कहना है कि डॉक्टर इस मामले में समझौता करने के लिए परिजनों के पास आए थे और जितना ख़र्च हुआ, वो सब वापस देने की पेशकश कर रहे थे। डॉक्टर ने माफ़ी भी माँगी। परिजनों का आरोप है कि डॉक्टर ने मरीज को हॉस्पिटल से निकाल दिया। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने हॉस्पिटल से मरीज को निकाला तो कम से कम एम्बुलेंस तो मुहैया कराया जाना चाहिए था, जो उन्होंने नहीं किया। डॉक्टर के पास दो एम्बुलेंस हैं।

डॉक्टर मौर्या की क्लिनिक में पीड़िता का रिपोर्ट

पीड़िता को उसके चाचा बाइक से लेकर आए। उन्होंने कहा कि सर्जरी के बाद एक महिला मरीज को इस तरह बाइक पर लाने को उन्हें विवश होना पड़ा। अभी भी वो लोग मदद की आस में हैं क्योंकि परिवार ग़रीब है और एक बच्चा अभी भी हॉस्पिटल में भर्ती है। ऊपर से पीड़िता का इलाज चल रहा है सो अलग।

हालाँकि, डॉक्टर मौर्या ने इन आरोपों से साफ़ इनकार कर दिया है। ऑपइंडिया से बात करते हुए डॉक्टर ने बताया कि मरीज शिवानी बाथरूम में गिरने की वजह से जख्मी हुईं। उन्होंने कहा कि ये काफी संवेदनशील केस था और डिलीवरी में रिस्क होने के कारण वो मरीज को भर्ती नहीं करना चाह रहे थे लेकिन परिजनों ने हाथ-पाँव जोड़े तो उन्होंने मरीज को भर्ती किया। उनके बार-बार निवेदन करने पर सर्जरी किया गया।

डॉक्टर ने ख़बर का किया खंडन

डॉक्टर का कहना है कि दोनों बच्चों की डिलीवरी में दिक्कत आई क्योंकि एक बच्चा उलटा था और एक टेढ़ा था। उन्होंने बताया कि ये मात्र 7 महीने (30 हफ्ते) की प्रेग्नेंसी थी और परिजनों ने कहा था कि बच्चों को किसी तरह निकाल दिया जाए ताकि मरीज ज़िंदा बच जाए। हालाँकि, डॉक्टर का कहना है कि उन्होंने ‘बच्चों को किसी तरह निकाल’ लेने वाली बात स्वीकार नहीं कि क्योंकि ये मेडिकल के नियमों के ख़िलाफ़ था।

उन्होंने बताया कि मरीज की हालत जब अचानक से बहुत ज्यादा ख़राब हो गई, तब उनके पास लाया गया। पादरी रामाकांत दुबे के कहने पर डॉक्टर ने मरीज को यहाँ भर्ती किया। पादरी ने डॉक्टर से निवेदन किया था कि लॉकडाउन में परिवार को दिक्कत न हो, इसीलिए वो भर्ती कर लें। मरीज को खून की भी कमी थी। डॉक्टर चाहते थे कि 9 महीना पूरा होने के बाद डिलीवरी की प्रक्रिया की जाए। हॉस्पिटल में ‘कंसल्ट फॉर्म’ पर परिजनों से पहले ही हस्ताक्षर करा लिया गया था, जिसमें कहा गया था कि ऑपरेशन होने के बाद बच्चों को बचाने की गारंटी वो नहीं दे सकते।

डॉक्टर ने बताया कि उन्होंने जाँच के बाद जब देखा कि मरीज को ‘सिबियर अबडॊमीनल पेन-7 ग्राम हीमोग्लोबिन’ था और प्रेग्नेंसी के अल्ट्रासाउंड में पाया गया कि गर्भ में दो जुड़वा बच्चे हैं। उन्होंने कहा कि लोगों ने आधी-अधूरी ख़बर पढ़ कर उन पर अभद्र कमेंट्स किया है।

डॉक्टर मौर्या ने बताया कि उन्होंने ही बच्चों को शिशु रोग विशेषज्ञ के सिंह के पास आईसीयू में भर्ती कराने की सलाह दी थी। मरीज को दो बार दौरा आया था, जिसके बाद डॉक्टर को शक हुआ कि कहीं पहले से तो कोई समस्या नहीं है। बाद में परिजनों ने कहा कि उन पर भूत वगैरह आता है, जिसके किसी पादरी से इलाज चल रहा है। बाद में परिजनों ने पादरी के पास कॉल कर के मरीज के कान में ले जाकर दो बार प्रार्थना भी पढ़वाया।

इस मामले में यूपी के डीजीपी ओपी सिंह ने भी हस्तक्षेप किया है। उन्होंने डॉक्टर से बात कर के कहा कि परिवार ग़रीब है, इसीलिए वो उसकी मदद करें। डीजीपी ने पीड़ित परिवार से भी बात कर के उनकी सारी बातें सुनी। इसके बाद मरीज को डॉक्टर बीएस उपाध्याय के पास भर्ती कराया गया था। वहीं ऑपइंडिया द्वारा सम्पर्क किए जाने पर जौनपुर पुलिस ने बताया कि दोनों पक्षों की बात सुन कर उचित कार्रवाई की जा रही है। पुलिस ने कोई पक्षपात नहीं किया है।

डॉक्टर ने जानकारी दी कि बीएस उपाध्याय के हॉस्पिटल में हुए सी.टी स्कैन में पीड़िता को दो जगह ब्रेन में कैल्सीफाइड सिस्ट पाया गया है। डॉक्टर ने कहा कि वो इस अफवाह से दुःखी हैं और साथ ही पूछा कि क्या किसी मरते हुए व्यक्ति की जान बचाना गुनाह है? उन्होंने कहा कि परिजनों ने कहा था कि बिना माँ की बच्ची मर जाएगी और चारों तरफ से दबाव के बाद उन्होंने मरीज को भर्ती किया।

श्रमिक स्पेशल ट्रेन: केरल में अपने गाँव लौटने की माँग को लेकर प्रवासी मजदूरों ने किया हंगामा

देश भर में जारी लॉकडाउन के बीच केरल के कोझीकोड जिले के पय्योली शहर में प्रवासी मजदूरों ने श्रमिक स्पेशल ट्रेन से अपने मूल राज्यों में वापस भेजने की माँग को लेकर एक विरोध प्रदर्शन किया। घटना सोमवार (मई 4, 2020) की है। 4 मई को हुई इस घटना में, कुछ मजदूरों को हिरासत में ले लिया गया और फिर बाद में रिहा कर दिया गया।

गृह मंत्रालय ने जिन लोगों के आवागमन की अनुमति दी है। जिसमें प्रवासी मजदूर, श्रमिक, छात्र, पर्यटक और अन्य शामिल हैं। गृह मंत्रालय ने इन्हें अपने घर भेजने के लिए श्रमिक स्पेशल ट्रेन की सुविधा भी उपलब्ध करवाई है। जिसे लेकर केरल में हंगामा हो रहा है।

इसके बाद केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने सोमवार को केंद्र को पत्र लिखकर कोविड-19 लॉकडाउन के चलते विभिन्न राज्यों में फँसे केरलवासियों को वापस लाने के लिए बिना कहीं रूके चलने वाली विशेष ट्रेनों की माँग की।

विजयन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर कहा कि प्रवासी श्रमिकों को लेकर केरल से जाने वाली ट्रेनों का वापसी यात्रा के दौरान इस उद्देश्य के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। पिछले दो दिनों से विशेष ट्रेनों से केरल से बिहार, ओडिशा और झारखंड के प्रवासी श्रमिकों को उनके संबंधित राज्यों में पहुँचाया गया है।

मुख्यमंत्री विजयन ने कहा, “पूरे केरल में 20,826 शिविरों में 3.6 लाख प्रवासी कामगार रहते हैं। उनमें से अधिकांश अपने मूल स्थानों पर वापस जाना चाहते हैं। केरल में प्रवासी श्रमिकों का एक बड़ा प्रतिशत पश्चिम बंगाल, असम, ओडिशा, बिहार और उत्तर प्रदेश से है।”

भाजपा ने स्पष्ट किया है कि केंद्र सरकार उनके किराए का 85% वहन करेगी और बाकी राज्य सरकार को वहन करना है। इसके बावजूद कई मीडिया रिपोर्टों में बताया गया कि केरल, महाराष्ट्र और राजस्थान की सरकार प्रवासी मजदूरों से किराया वसूल रही है। श्रमिक एक्सप्रेस से केरल से झारखण्ड लौटे मजदूरों ने बताया कि उनसे 875 रुपए बतौर किराया वसूले गए। मजदूरों ने बताया कि उनके रूम पर जाकर किराया वसूला गया। ये मजदूर केरल से गिरिडीह पहुँचे थे।

केंद्रीय गृह मंत्रालय के दिशा-निर्देशों में भी स्पष्ट लिखा हुआ है कि किसी भी रेलवे स्टेशन पर किसी प्रकार का टिकट नहीं बेचा जाएगा। नियमानुसार, रेलवे टिकट प्रिंट करेगा और इसके लिए वो राज्य उसे बताएगा, जहाँ से ट्रेन चालू हो रही है। उस राज्य को ये सूची वो राज्य देगा, जहाँ ये मजदूर जाने वाले हैं। इसके बाद स्थानीय राज्य सरकार ही टिकट को मजदूरों में बाँटेगी। स्पष्ट है कि जो भी हुआ है, वो राज्य सरकार के अधिकारियों या स्थानीय नेताओं की मिलीभगत से हुआ है।

माँ सीता ‘वेश्या’ और रावण से थी रेप के लिए ‘इच्छुक’ – हिन्दूफोबिया से ग्रसित वामपंथी कवियों की कविता

पत्रकार सास्वत पाणग्रही ने वामपंथी उड़िया कवियों के बीच चल रहे उस ट्रेंड की तरफ ध्यान दिलाया, जो कि काफी तकलीफदेह और विचलित करने वाली है। इन कवियों में से कई कवि तो राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कार विजेता हैं। ये तथाकथित ‘बुद्धिजीवी’ कई कविताओं और बयानों में खुलेआम हिन्दूफोबिया का प्रचार कर रहे हैं साथ ही हिंदू देवी-देवताओं के अपमान का अभियान भी चला रहे हैं।

राम नवमी पर अपने एक फेसबुक पोस्ट में, हिन्दूफोबिया से ग्रसित साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता उड़िया वामपंथी कवि राजेंद्र किशोर पांडा ने माँ सीता पर लिखा था, “अशोक वाटिका में, आप रावण द्वारा बलात्कार किए जाने की इच्छुक थीं, और फिर भी आपने अग्नि परीक्षा को आसानी से पूरा कर लिया। आप पर भरोसा नहीं किया जा सकता है।”

एक अन्य कवि प्रदीप कुमार पांडा ने ‘रामनवमी’ नामक एक कविता लिखी। इसमें बड़ी ही धूर्तता से पोर्न, अस्पृश्यता और शिक्षा की कमी का उपयोग करते हुए कविता में हिंदू देवी के नाम में महिलाओं के यौन शोषण और वस्तुकरण को दर्शाया गया है। बता दें कि ये एक ऐसा विषय है, जो अक्सर वामपंथियों द्वारा अपनी रचनाओं को ‘बौद्धिक’ रूप में प्रस्तुत करने के लिए प्रयोग किया जाता है।

प्रदीप कुमार पांडा की कविता का अनुवाद इस प्रकार किया जा सकता है, “सीता, तुम स्कूल में मेरी सहपाठी हो सकती थी, लेकिन अफसोस, ऐसा कभी नहीं हुआ। इसलिए नहीं कि आप तीन स्वस्थ बेटों और चार सुंदर बेटियों की माँ थीं, बल्कि इसलिए क्योंकि पुराणों में स्कूल जाने की अनुमति नहीं थी। और इस सत्य की वजह से गाँव में बचे हुए भोजन, मृत पिल्लों और गंदे लंगोटों को इकट्ठा करना तुम्हारा (सीता का) काम था।”

कविता में आगे कहा गया है, “गाँव के कुछ कुत्ते हमेशा गाँव के बाहर सीता की कुटिया के बाहर उसको फॉलो करते हैं। वो सीता के पीछे वासना के लिए नहीं जाते थे। वो तो सीता के पीछे इसलिए जाते थे, क्योंकि वो अपने सिर पर बचे हुए भोजन का बर्तन अपने सिर पर रखी होती थी।”

ऐसी ही एक अन्य ‘बुद्धिजीवी’ कवि सुभाश्री सुभाष्मिता मिश्रा अपनी कविता में लिखती हैं, “वह एक वेश्या का जीवन जीती है। राम जैसे स्वार्थी पति के लिए, जो अपने अच्छे चरित्र के प्रमाण के रूप में उससे अग्नि परीक्ष की माँग करता है। वह चिता पर चढ़ जाती है और मुस्कुराते हुए दुनिया की ओर देखती है, उसका मजाक उड़ाती है। वह एक वेश्या का जीवन जीती है, अपने पति की सेवा करती है, उसके लिए बच्चों को पालती है, उनका पालन-पोषण करती है और आधी रात में कविताएँ लिखती है। हाँ, वह वास्तव में एक वेश्या का जीवन जीती है।”

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि कवि प्रदीप पांडा की तथाकथित कविता के बाद सोशल मीडिया पर कुछ प्रतिक्रियाएँ भी मिलीं। एक अन्य कवि केदार मिश्रा ने इसका समर्थन किया और आलोचकों से पूछा, “क्या कवि आपकी राजनीतिक भावनाओं के ठेकेदार हैं?” उन्होंने आगे कहा, “आपकी राजनीतिक भावनाएँ वाल्मीकि या व्यास पर आधारित नहीं हैं। आपके राम और सीता राजनीति और टीवी धारावाहिकों के पात्र हैं। रामायण के विभिन्न रुपांतरणों में राम और सीता के पात्रों में कई विविधताएँ हैं।”

इसके बाद फिर केदार मिश्रा ‘बौद्धिक’ दलील देते हैं। उनका दावा है कि वाल्मीकि की सीता और बलराम दास, भानजा की सीता अलग-अलग हैं। हालाँकि, मिश्रा यह साबित करने में विफल रहे कि न तो बलराम दास और न ही उपेंद्र भानजा ने कभी सीता के चरित्र का हनन या अनादर करने की कोशिश की है। उनकी साहित्यिक कृतियाँ उड़िया घरों में प्रतिष्ठित हैं और रामायण की कहानियों के सरल, काव्यात्मक और भावनात्मक चित्रण के कारण उड़िया जीवन शैली का हिस्सा हैं। उन्होंने दावा किया कि कविताएँ रूपक हैं और चित्रण महाकाव्यों की विभिन्न व्याख्याओं पर आधारित हैं।

सास्वत पाणिग्रही ने बताया कि उन्होंने इन कवियों को इसी तरह अन्य धर्मों के रुपकों पर इसी तरह की व्याख्या करने की चुनौती दी थी। जिसके बाद उन्हें ब्लॉक कर दिया गया। उन्होंने आगे बताया है कि हिन्दूफोबिया से ग्रसित धार्मिक भावनाओं को आहत करने के लिए कवियों राजेंद्र किशोर पांडा और सुभाश्री सुभाष्मिता मिश्रा के खिलाफ पुलिस शिकायतें दर्ज की गई हैं।

उल्लेखनीय है कि रक्षा विश्लेषक अभिजीत अय्यर मित्रा को नवीन पटनायक सरकार द्वारा 2018 में धार्मिक भावनाओं को आहत करने के लिए 40 दिनों के लिए जेल में रखा गया था, जब उन्होंने कोणार्क सूर्य मंदिर में कामुक पोज में मूर्तियों का मजाक उड़ाया था।

26/11 में कसाब की गोली खाकर भी जिंदा रह गए थे हरिश्चंद्र, उसे सजा दिलाने वाले चश्मदीद अब भूखे तड़पने को मजबूर

26/11 हमले में आतंकी अजमल कसाब की शिनाख्त करने वाले और पूरे मुंबई हमले में कामा अस्पताल के बाहर आतंकियों की दो गोलियाँ पीठ पर खाने वाले हरिश्चंद्र श्रीवर्धनकर को मुंबई के एक इलाके में फुटपाथ पर पड़ा पाया गया। लगभग 60 साल के हरिश्चंद्र, डेन डिसूजा नाम के एक व्यक्ति की ‘साथ रास्ता दुकान’ के पास पड़े मिले। बाद में उनकी जानकारी मिलने पर डिसूजा और उनके दोस्तों ने हरिश्चंद्र को उनके घर पहुँचाने का जिम्मा उठाया।

बताया जा रहा है कि हरिश्चंद्र को उनके घरवालों ने उनके घर से निकाल दिया था और वे कई दिनों से सड़क पर पड़े थे। ऐसे में जब डिसूजा ने उन्हें अपनी दुकान के बाहर देखा तो उनसे बात करने की कोशिश की। लेकिन यहाँ वो कुछ शब्द जैसे ‘हरिश्चंद्र’, ‘बीएमसी’ और ‘महालक्ष्मी’ बोल सके। जब दुकान मालिक ने उन्हें कुछ खाने को दिया, वो उसे खा भी नहीं पाए। ऐसे में जो शब्द उन्होंने मुँह से निकाले उन्होंने उसी के आधार पर उनके परिवार की खोज करनी शुरू की। अंत में जाकर महालक्ष्मी में रहने वाले उनके भाई के बारे में खबर मिली।

आईएमसी केयर नाम की संस्था चलाने वाले डिसूजा के दोस्त टिमोथी गायकवाड़ ने इस संबंध में बताया कि काफी मेहनत के बाद डिसूजा ने हरिश्चंद्र के भाई को खोजा, जो महालक्ष्मी में रहते हैं।

गायकवाड ने कहा कि उन लोगों ने पूरा एक दिन बीएमसी कॉलोनी में उनके भाई को खोजने में लगाया और जब वे मिले तो उन्होंने ही हरिश्चंद्र के बारे में सूचना दी कि वे कल्याण में रहते हैं और ये भी बताया कि उनका 26/11 से क्या संबंध था और किस तरह से उन्होंने कसाब को सजा दिलाने में मदद की

बता दें, हरिश्चंद्र ने स्पेशल कोर्ट के सामने अजमल कसाब को पहचाना था और उसके खिलाफ गवाही दी थी। वे कसाब और उसके साथी अबू इस्माइल की गोलियों से घायल भी हुए थे। उन्होंने इस्माइल को अपने ऑफिस बैग से मारा भी था।

भाई से सूचना एकत्रित करते गायकवाड ने बुजुर्ग के बारे में पता लगाने और उनकी मदद करने के लिए पुलिस की सहायता ली। बाद में अग्रिपाड़ा पुलिस ने महामारी के समय में बुजुर्ग की मदद करने के लिए उनके बेटे को पास जारी किया और 1 मई को वे उन्हें कल्याण लेकर गए।

एनजीओ चलाने वाले गायकवाड कहते हैं कि सबसे दुखद बात ये हैं कि उनका परिवार उनका ख्याल नहीं रखना चाहता। वे हमसे उन्हें आश्रम में भर्ती कराने को बोल रहा था। हम चाहेंगे कि लोग आगे आएँ और इस असाधारण व्यक्ति की मदद करें। उन्होंने एक आतंकवादी को सजा दिलाने में मदद की। उनके सिर पर चोट लगने के बाद से उन्हें बोलने में समस्या है।

कॉन्ग्रेस की कारस्तानी से अमेठी हुआ ग्रीन से रेड जोन: फोटो खिंचाने के लिए रात को लाए गए 28 लोगों में से 1 महिला निकली संक्रमित

कोरोना वायरस की महामारी के बीच कॉन्ग्रेस के वाहवाही लूटने और मीडिया मैनेजमेंट की कारस्तानियों ने अमेठी के एक ग्रीन जोन एरिया को रेड जोन में बदलने का काम किया है। ग्रीन जोन में शामिल अमेठी में मंगलवार (मई 05, 2020) को कोरोना वायरस का पहला मरीज सामने आया है। अमेठी के जिलाधिकारी अरुण कुमार ने इस मामले में खुलासा करते हुए बताया कि पाँच दिन पहले एक महिला अजमेर से जनपद लौटी थी, जिसे मुसाफिरखाना में बने क्वारंटाइन सेंटर में रखा गया था।

इस सम्बन्ध में DM अमेठी ने आधिकारिक पत्र भी जारी किया था। महिला की रिपोर्ट पॉजिटिव आई है, जिसे सुल्तानपुर के कुड़वार में बने आइसोलेशन सेंटर में शिफ्ट किया गया है। दरअसल, गत 01 मई की रात अपने 28 साथियों के साथ अजमेर से लौटी महिला कोरोना वायरस टेस्ट में पॉजिटिव पाई गई हैं।

हालाँकि, अमेठी जिला प्रशासन ने पहले से ही सबको अलग-अलग क्वारंटाइन कर रखा था। यही वो जगह है जहाँ कॉन्ग्रेस के मीडियाकर्मी कुछ दिन पहले तस्वीरें खिंचवाने के लिए भी पहुँचे थे। और इन्हीं तस्वीरों को लेकर ‘अमेठी लाइव’ ने एक ट्वीट करते हुए बताया था कि इन्हें प्रियंका गाँधी के नेतृत्व में भोजन-पानी दिया जा रहा है।

इस ट्वीट में लिखा गया था – “#अमेठी: राजस्थान के भरतपुर व गुजरात की सीमा में फँसे 72 मजदूरों को अपने निजी संसाधन से कॉन्ग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा ने अमेठी पहुँचाया, सभी को मेडिकल चेकअप के बाद उनके घर तक पहुँचाने का प्रबंध जिला अध्यक्ष प्रदीप सिंघल ने किया।”

लेकिन महिला के कोरोना वायरस से संक्रमित पाए जाने के बाद कॉन्ग्रेस की यह हरकत अब महँगी पड़ती नजर आ रही है। कॉन्ग्रेस इस ट्वीट में जिन लोगों के बारे में यह दावा करती नजर आ रही हैं कि उनको कॉन्ग्रेस नेता प्रियंका गाँधी ने अमेठी पहुँचाया, उस सम्बन्ध में अमेठी जिलाधिकारी ने मई 02, 2020 को ही बता दिया था कि उनके पास अवैध तरीकों से जारी किए गए हैं।

DM अमेठी के इस पत्राचार में स्पष्ट लिखा गया कि अन्य राज्यों (अजमेर, राजस्थान) से 28 लोगों को बिना किसी पूर्व जानकारी के लाया गया और इस सम्बन्ध में उनके गंतव्य स्थल के राज्यों और जिला प्रशासन को भी कोई सूचना नहीं दी गई थी।

डीएम अमेठी के आदेश की प्रति –

इस बस में ड्राइवर और क्लीनर समेत कुल 30 सवारियाँ मौजूद थीं जिनमें से 11 महिलाएँ थीं। डीएम की ओर से जारी नोटिस में स्पष्ट लिखा गया है कि बस में मौजूद क्लीनर की कोरोना जाँच के बारे में कोई भी सूचना नहीं उपलब्ध करवाई गई थी। इन लोगों के कोरोना वायरस संक्रमण के लिए सेम्पल लेकर इन्हें क्वारंटाइन सेंटर में रखा गया था।

डीएम अमेठी ने इस बात का भी जिक्र किया है कि डीएम अजमेर ने अंतरराज्यीय वाहन पास गृह मंत्रालय के आदेश और दिशानिर्देशों का उलंघन कर जारी किया था। सभी 28 लोगों के सैंपल लेकर जाँच के लिए भेजा गया था। आज सुबह 8 बजे इसकी रिपोर्ट प्राप्त हुई, जिसमें 7 लोगों की कोरोना वायरस संक्रमण रिपोर्ट नेगेटिव प्राप्त हुई, जबकि कमरौली निवासी 45 वर्षीय महिला शाहबानो की रिपोर्ट पॉजिटिव प्राप्त हुई है।

डीएम अरुण कुमार ने मामले की पुष्टि करते हुए बताया कि एहतियात के तौर पर 1 तारीख को ही सभी लोगों को मुसाफिरखाना के एएच इंटर कॉलेज में अलग-अलग क्वारंटीन किया गया था। जहाँ से एक महिला की रिपोर्ट पॉजिटिव प्राप्त हुई है। संक्रमित महिला के उपचार के लिए आवश्यक प्रबन्ध कराए जा रहे हैं।

कॉन्ग्रेस का कारनामा

दरअसल, कोरोना वायरस की महामारी का राजनीतिक लाभ लेने के लिए कॉन्ग्रेस हर प्रकार की मेहनत कर रही है लेकिन उसका नतीजा देश पर भारी पड़ रहा है। कुछ दिन पहले ही कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने श्रमिकों को अपने खर्चे पर उनके घर भेजने की बात भी मीडिया के सामने रखी, जबकि वास्तविकता यह है कि कॉन्ग्रेस शासित राजस्थान ने श्रमिकों से उनके घर जाने का किराया वसूल करने के बाद यह दावा किया कि राज्य सरकार अपनी जेब से उनका खर्च वहन कर रही है।

आज ही कॉन्ग्रेस द्वारा अजमेर से बुलाई गई महिला के कोरोना वायरस से संक्रमित निकलते ही एक ग्रीन जोन घोषित इलाके को रेड जोन में तब्दील करने और क्वारंटाइन सेंटर में कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं का प्रियंका गाँधी की छवि चमकाने के लिए किया गया कार्य कॉन्ग्रेस और राजस्थान सरकार की बेवजह दखलअन्दाजी का ही नतीजा है।

बेशुमार दौलत, रहस्यमयी सेक्सुअल लाइफ, तानाशाही और हिंसा: मार्क्स और उसके चेलों के स्थापित किए आदर्श

कार्ल मार्क्स का जन्म मई 5, 1818 को हुआ था। इस हिसाब से 2018 में उसके जन्म के 200 वर्ष पूरे हुए थे। मार्क्स को वामपंथ का मसीह माना जाता है। वही वामपंथ, जिसने दुनिया में सिर्फ़ ख़ून बहाया। मार्क्स को कई जगह लाखों लोगों की मौत का जिम्मेदार माना जाता है। एक आँकड़े के अनुसार, वामपंथ ने पिछले 100 सालों में 10 करोड़ लोगों को मौत के घाट उतार दिया। एक उदाहरण से शुरू करते हैं। इससे आपको समझने में मदद मिलेगी कि वामपंथ कैसे ख़ूनी और विभाजनकारी है।

जर्मनी की दीवार: विभाजनकारी वामपंथ का नमूना

जर्मनी में हिटलर के शासन का अंत हुआ तो रूस सहित कई देशों ने उस पर कब्जा कर लिया। जहाँ ईस्ट जर्मनी पर रूस का कब्ज़ा हुआ, वेस्ट जर्मनी पर यूनाइटेड स्टेट्स, यूनाइटेड किंगडम और फ्रांस ने शासन किया। ईस्ट जर्मनी में रूस की वामपंथी सोशलिस्ट सरकार चली। हिटलर के राज को झेल चुके लोग कम्युनिस्ट शासन से इतने ही दिन में इतने ज्यादा तंग आ गए कि वो वेस्ट जर्मनी भागने लगे। 10 सालों में लगभग 26 लाख लोगों ने पलायन किया।

वामपंथ ने अपनी विभाजनकारी बुद्धि लगाई और बर्लिन को विभाजित करते हुए दीवार खड़ी कर दी। वेस्ट जर्मनी प्रगति के पथ पर बढ़ने लगा, ईस्ट जर्मनी पीछे छूट गया। आज भी सरकार से लेकर उद्योग धंधों तक में ईस्ट जर्मनी के इलाक़े तुलनात्मक रूप से पिछड़े हुए हैं। दोनों जर्मनी के बीच वामपंथियों ने दीवार बना दी। उस दीवार को फाँद-फाँद कर लोग भागने लगे। इसमें ईस्ट जर्मनी की वामपंथी सरकार के सैनिकों के हाथों सबसे ज्यादा यहीं के लोग मारे गए।

अंत में जब जर्मनी का एकीकरण हुआ तो दीवार तोड़ दी गई। ये काफ़ी ख़ुशी का माहौल था। दोनों तरफ के रिश्तेदार कई सालों से एक-दूसरे से नहीं मिले थे, उन सबको मिलने-जुलने का मौक़ा मिला। आज यही वामपंथ जब दूसरों को विभाजनकारी बताता है तो उसे जर्मनी की दीवार याद दिलाया जाना चाहिए, जिसने एक ही देश को दो हिस्सों में बाँट दिया था। कैपिटलिज्म तो गया लेकिन उसकी जगह सोशलिज्म और कम्युनिज्म कैसे अच्छा करेगा, इस बारे में मार्क्स ख़ुद कन्फ्यूज्ड थे।

मार्क्स और उसके चेले कास्त्रो और माओ

मार्क्स सालों तक लंदन में रहे थे, जहाँ उन्होंने जर्मन दार्शनिक फ्रेडरिक एंगेल्स के साथ मिल कर अपनी बातों को प्रकाशित करना शुरू कर दिया। सोवियत रूस के वामपंथ की बात करते हुए अनंत विजय अपनी पुस्तक ‘मार्क्सवाद का अर्धसत्य‘ में एक बहुत ही रोचक बात कहते हैं। उन्होंने बताया है कि रूस में जब 1917 में क्रांति हुई तो वहाँ ‘एक ग्लास पानी’ मुहावरा काफी प्रचलित हुआ। इसका मतलब ये था कि जब प्यास लगे तो पानी पी लो और जब शरीर की माँग हो तो किसी के साथ भी बुझा लो। मार्क्सवाद शादी-विवाह, परिवार और सभी समाजिक दायित्वों को नकार देता है। धर्म को अफीम तो इनका पसंदीदा वाक्य है।

अगर हम मार्क्सवाद के दो बड़े चेहरों की बात करें तो क्यूबा के फिदेल कास्त्रो और चीन का माओत्से तुंग, इन दोनों के ही राज में लोकतंत्र नाम की कोई चीज कभी रही ही नहीं। अनंत विजय मार्क्सवाद के इन दोनों बड़े चेहरों की तुलना करने पर अपनी पुस्तक में पाते हैं कि इन दोनों का ही सेक्सुअल लाइफ काफ़ी रहस्यमयी था। इन दोनों तानाशाहों ने विरोधियों को बर्दाश्त नहीं किया और हिंसात्मक तरीके अपना कर उन्हें शांत कराया। एक और बात, ये दोनों ही अपने लिए बेशुमार धन इकट्ठा करने की फिराक में लगे रहे। ये वही मार्क्सवाद है, जो कैपिटलिज्म को गाली देता है और बराबरी की बातें करता है।

पति-पत्नी के रिश्तों तक को मार्क्स ने एकदम पूँजीवादी वाले चश्मे से देखा। उनके मित्र एंगेल्स ने तो यहाँ तक लिखा था कि विवाह का उदय ही इसीलिए हुआ ताकि पुरुषों के हाथ में सत्ता और संपत्ति का केन्द्रीकरण हो और स्त्री से इसीलिए संतान पैदा किया जा सके। यही कारण रहा कि मार्क्सवादियों ने दासता को मुक्त करने के लिए परिवार नामक संस्था को ही नकार दिया। इसे भी दास्ता के भीतर घसीट लिया। मार्क्स समझ नहीं पाए एक स्त्री संपत्ति के लालच से परिवार का हिस्सा नहीं बनती है।

निजी जीवन में भी नहीं निभाया अपना ही सिद्धांत

मार्क्स के निजी जीवन की बात करें तो उनके घर में लम्बे समय तक काम करने वाली हेलेन देमुथ से उसका अवैध सम्बन्ध था और दोनों को एक बेटा भी हुआ था, जिसका नाम था- फ्रेड्रिक देमुथ। अपनी सार्वजनिक छवि को बिगड़ने और शादी को टूटने से बचाने के लिए मार्क्स ने बड़ी चालाकी से अपने इस कृत्य को छिपाने के लिए एक योजना तैयार की थी। मार्क्स ने इसके लिए अपने दोस्त फ्रेड्रिक एंजेल्स की मदद ली थी, जिसने उस बच्चे के पिता होने का दावा किया और हेलेन देमुथ ने इस बात की सार्वजनिक पुष्टि की

इस तरह से मार्क्स और हेलन का बेटा अब एंजेल्स और हेलेन का बेटा हो गया। 40 वर्षों तक इस राज़ को कोई और नहीं जान पाया। 1895 में जब एंजेल्स मृत्युशैया पर थे, तब उन्होंने मार्क्स की बेटी इलिनर मार्क्स को यह बात बताई। इलिनर यह बात सुन कर सन्न रह गई। हालाँकि, मार्क्स की संतानों में तब तक 2 ही बचे थे, और 3 वर्षों बाद इलिनर ने भी आत्महत्या कर ली। इसी तरह 1911 में मार्क्स की एक अन्य बेटी लौरा ने भी आत्महत्या कर ली।

इतिहासकार पॉल जॉनसन अपनी पुस्तक ‘इंटेलेक्टुअल्स’ में लिखते हैं कि कार्ल मार्क्स ने मजदूरों के लिए आवाज़ उठाने का दावा किया, उनके लिए लड़ने का दावा किया, जिन्हें काम के बदले उचित रुपए नहीं मिलते थे लेकिन वो अपने घर काम करने वाली नौकरानी को क्या देते थे? कुछ नहीं। मार्क्स ने अपनी फैमिली मेड हेलेन डेमुथ को एक कौड़ी तक नहीं दी। वो उनके घर का सारा काम करती थी, उनका बजट भी मैनेज करती थी लेकिन उसे उसके काम के एवज में कभी रुपए नहीं मिले। मार्क्स उसके साथ सेक्स भी करते थे।

इस तरह से दुनिया भर के मजदूरों के लिए आवाज़ उठाने और स्त्रियों को संपत्ति का मालिक बनाने का दावा करने वाले ने अपने ही घर में एक महिला को उसके काम के बदले वेतन नहीं दिया और उससे हुए बेटे को उचित सम्मान देना तो दूर, उसे एक राज बना दिया ताकि उसके क्रान्तिकारी छवि को चोट न पहुँचे। मार्क्स के दोनों चेले माओ और कास्त्रो के साथ भी ये चीजें कॉमन थीं। उन्होंने भी स्त्रियों को ‘सेक्स ऑब्जेक्ट’ समझा और कभी सम्मान नहीं दिया। आज भी मार्क्सवादी यही करते हैं।

पूर्व DGP की लॉकडाउन के उल्लंघन में दायर 75,000 FIR रद्द करने की माँग पर SC ने कहा- आप लोग यहाँ आ कैसे जाते हैं?

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (मई 05 2020) को उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP) विक्रम सिंह की उस जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने कोरोना वायरस के कारण देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान अलग-अलग अपराधों और नियमों के उल्लंघन में आईपीसी की धारा 188 के तहत दर्ज 75000 से अधिक एफआईआर (FIR) को रद्द करने की माँग की थी।

न्यायमूर्ति अशोक भूषण की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने सिंह की जनहित याचिका को खारिज करते हुए कहा – “आप चाहते हैं कि कोई एफआईआर न हो और यह (धारा 188 आईपीसी) लागू न हो, तो फिर लॉकडाउन कैसे लागू किया जा सकता है? मुझे आश्चर्य है कि इस तरह की याचिकाएँ आखिर इस अदालत में क्यों आ रही हैं?”

जस्टिस अशोक भूषण, संजय किशन कौल और बी आर गवई की पीठ ने सिंह के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायण से पूछा कि धारा 188 (आईपीसी के एक लोक सेवक द्वारा घोषित आदेश की अवज्ञा) को आखिर क्यों लागू नहीं किया जाना चाहिए?

DGP विक्रम सिंह की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि यदि कानून ने एफआईआर के पंजीकरण की अनुमति नहीं दी है तो NDMA कानून (आपदा प्रबंधन एक्ट) को एफआईआर के पंजीकरण की अनुमति नहीं दी जा सकती है। उन्होंने कहा कि प्रवासियों और एटीएम से पैसे निकालने वालों के खिलाफ मामले दर्ज किए गए थे।

सुप्रीम कोर्ट के सवाल पर DGP विक्रम सिंह ने स्पष्ट करने की कोशिश की कि वह किसी भी तरह से लॉकडाउन के उल्लंघन को बढ़ावा नहीं दे रहे हैं। उन्होंने सिर्फ लॉकडाउन के उल्लंघन में दायर 75000 से अधिक एफआईआर (FIR) को रद्द करने की माँग PIL के माध्यम से की थी।

उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी ने कहा कि एक ओर सुप्रीम कोर्ट ने जेलों में कैदियों को भीड़भाड़ को कम करने के लिए रिहा करने का निर्देश दिया और दूसरी ओर, पुलिस ने गैरकानूनी तरीके से छोटे अपराधों में एफआईआर के माध्यम से आपराधिक न्याय प्रणाली को बोझ बनाना जारी रखा हुआ है, जिस पर कि कम से कम छह महीने की जेल की सजा का प्रावधान है।

ज्ञात हो कि देशभर में कोरोना के कारण जारी लॉकडाउन के उलंघन के मामलों में कई लोगों पर एफआईआर दायर की गई हैं। इनमें वो लोग भी शामिल हैं, जिन्होंने पुलिसकर्मियों के साथ अभद्रता करने के साथ-साथ पथराव और जाँच में व्यवधान उत्पन्न करने की कोशिशें की हैं।

क्या है धारा-188

आईपीसी की धारा 188 में उन लोगों पर एफआईआर दर्ज की जाती है, जिनके द्वारा नियमों का पालन न करने से मानव जीवन, स्वास्थ्य और सुरक्षा को खतरा पैदा होता है। इसके तहत दोषी को छह महीने तक जेल व एक हजार जुर्माने का प्रावधान है।

AltNews मतलब मजहबी प्रोपेगेंडा: फैक्ट चेक की आड़ में इस फैक्ट्री में गढ़े जाते हैं झूठ

फैक्ट चेक के नाम पर प्रोपेगेंडा चलाने वाली ऑल्ट न्यूज वेबसाइट को लेफ्ट गिरोह के सदस्य सत्य की पड़ताल के लिए एक मात्र विश्वसनीय स्रोत मानते हैं। इस वेबसाइट में लेख लिखने वाले लोग सरकार विरोधी और हिंदू विरोधी होते हैं, जिनसे इस वेबसाइट के अजेंडे का पूरा माहौल तैयार होता है। फिर भी ये वेबसाइट अक्सर दावा करती है कि सत्य की जाँच में इनके द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया बेहद विस्तृत और प्रमाणिक होती है।

यह बात और है कि इस पोर्टल के लिए अरुंधती रॉय जैसे लोग योगदान देते हैं, जो केवल नक्सलियों की भाषा बोलते हैं। समय दर समय भारत को अलग-अलग करने की इच्छा जाहिर करते हैं और जिनके कारण आज ऑल्ट न्यूज दक्षिणपंथियों की नजर में इस्लामी कट्टरपंथियों का मुखपत्र दिखने के अतिरिक्त और कुछ नहीं रह गया है। आज स्थिति ये है कि ये वेबसाइट लगातार फर्जी न्यूज फैलाती है, सच के साथ खिलवाड़ करती है, इस्लामी कट्टरपंथियों के जुर्मों को ढकने की योजना तैयार करती है और कई बार तो खुद ही फेक न्यूज बनाकर उसका फैक्ट चेक भी कर देती है।

आज मजहबी अपराधियों को बचाने के इनके तरीके इतने आम हो गए हैं कि जो शख्स भी इस वेबसाइट की प्रवृत्ति को अच्छे से समझता है, वो इनके फैक्ट चेक के लिए उपयोग में लाए जाने वाले तरीकों से वाकिफ हो गया होगा। जी हाँ। इनके तरीके और कट्टरपंथी आरोपितों को बचाने की दिशा में किए जाने वाला प्रयास अब लगभग अनुमानित और मानकीकृत हो गए हैं। इसलिए, आज अपने इस लेख में हम उन्हीं पद्धतियों पर चर्चा करने जा रहे हैं, जिन्हें ऑल्ट न्यूज अक्सर समुदाय विशेष के पक्ष में खबर मोड़ने के लिए इस्तेमाल करता है।

तरीका नंबर 1: सर्वथा झूठ पर कायम

एक फैक्ट चेकिंग वेबसाइट का काम जहाँ हर मामले के पहलु को परखते हुए सच्चाई सामने लाने का होता है। वहीं ऑल्टन्यूज का काम फैक्ट चेक करते समय होता है कि किस तरह वे ऐसा झूठ बोलें कि उनके पाठक को उन पर यकीन हो जाए और जिस दिशा में वे अपना अजेंडा चलाना चाहते हैं, वो चलता रहे।

अभी ज्यादा समय नहीं बीता, जब कोरोना की शुरुआत में एक ट्विटर हैंडल से पीपीई की कमियों को उजागर करते एक ट्वीट आया था और बाद में इस ट्वीट को प्रतीक सिन्हा और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के बॉस शेखर गुप्ता समेत कई वामपंथियों ने शेयर करके ट्विटर पर सरकार के ख़़िलाफ़ प्रोपेगेंडा तैयार किया था। हालाँकि बाद में इस ट्वीट को डिलीट कर दिया गया था और पता चला था कि वो अकॉउंट फेक था, जिसे गिरोह विशेष के लोगों ने अपने झूठ को चलाने के लिए इस्तेमाल किया। 

इससे पहले साल 2017 में इस वेबसाइट का सह-संस्थापक फेसबुक पर ‘Unofficial: Subramanian Swamy नाम का एक पेज बनाकर झूठ फैलाते पकड़ा गया था। इस पेज के जरिए उसने दावा किया था कि कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदिुरप्पा ‘टीपू जयन्ती’ मनाते थे। हालाँकि बाद में ये दावा भी झूठा निकला था और पता चला था कि झूठ फैलाने के लिए जो फोटो डाली गई, उस समय तो वे भाजपा में शामिल ही नहीं थे।

इसके बाद इस वेबसाइट का सह-संस्थापक जुबेर को भी एक बार एक क्रॉप्ड वीडियो शेयर करते पकड़ा गया था। इसमें पुलवामा के मद्देनजर वो दावा कर रहा था कि विहिप के सदस्यों ने यूपी के गोंडा में राष्ट्र विरोधी नारे लगाए। इतना ही नहीं, अपने फॉलोवर्स से उसने यही झूठी वीडियो रीट्वीट करने को भी कही, ताकि उसका प्रोपेगेंडा पूर्णत: फैल सके। बाद में मालूम हुआ कि गोंडा पुलिस ने जुबेर के दावों को झूठा कहते हुए बयान जारी किया और स्पष्ट किया कि विहिप के सदस्यों ने देश विरोधी नारे नहीं लगाए।

इस प्रकार 2018 में एक वीडियो आई। वीडियो में पाक समर्थित नारे लग रहे थे। जाहिर है लगाने वाले कौन थे। लेकिन ऑल्ट न्यूज इस मामले में कूदा और उसने फौरन इसकी प्रमाणिकता पर सवाल उठाए। साथ ही इस वीडियो को संदिग्ध बताया। मगर, बाद में बिहार डीजीपी केएस द्विवेदी ने स्पष्ट कहा कि वीडियो अररिया की है और इससे कोई छेड़खानी नहीं की गई। नारे लगाने वालों का नाम सुलतान आजमी और शहजाद था।

तरीका नंबर 2: पाठक को बरगलाने के लिए अनगिनत प्रयास

ऑल्ट न्यूज के अस्तित्व में आने के बाद कई ऐसे मौके आए जब उसने अपने पाठकों को केवल और केवल बरगलाया। कठुआ रेप केस में जब मुख्य आरोपित के घटनास्थल पर मौजूद होने को लेकर सवाल उठे, तो ऑपइंडिया ने खबर की कि ताजा रिपोर्ट्स बताती हैं कि आरोपित का बेटा घटना वाले दिन मुजफ्फरनगर में था, जबकि पुलिस ने उसके ख़िलाफ़ ये शिकायत दर्ज की है कि वो कठुआ में था। अब ऑल्ट न्यूज ने इसी को लेकर ऑपइंडिया पर हमला बोला और कहा कि ऑपइंडिया वेबसाइट बलात्कारी के नाबालिग बेटे को डिफेंड करने की कोशिश कर रही है।

इसी प्रकार कोलकाता में इश्वर चंद्र विद्यासागर की मूर्ति को जब लोकसभा चुनावों के दौरान क्षतिग्रस्त किया गया, तब कहीं भी इस बात के सबूत नहीं मिले थे कि ये करने वाले भाजपा से जुड़े कोई लोग हैं। लेकिन फैक्टचेकर वेबसाइट ने इन खबरों को फैक्ट चेक करते हुए भगवा संगठन को जिम्मेदार ठहरा दिया। मगर सच ये है कि जाँच अधिकारियों को अब तक ये नहीं पता चला कि उस समय मूर्ति को किसने तोड़ा।

भाजपा प्रवक्ता गौरव भाटिया ने कुछ दिनों पहले एक वीडियो शेयर की। वीडियो में मजहबी भीड़ मस्जिद में इकट्ठा दिखाई दे रही थी। इस वीडियो को शेयर करते हुए उन्होंने उन लोगों पर सवाल उठाए थे, जो मजहब का नाम आते ही हमलावर हो जाते हैं, लेकिन समुदाय के लोगों की हरकतों को नहीं देखते। अब इसी वीडियो पर जुबेर फौरन सक्रिय हुआ और वीडियो का फैक्ट चेक करते हुए दावा कर कहा कि भाजपा के आईटी सेल के दबाव में गौरव ने वीडियो शेयर किया है।

तरीका नंबर 3: समुदाय विशेष के अपराधों का खबर से सफाया

ऑल्ट न्यूज अपने फैक्ट चेक को करते हुए ये चीज ध्यान में रखता है कि वो किस तरह से कट्टरपंथियों के अपराधों से लोगों का ध्यान भटकाकर उन्हें निर्दोष साबित करे। दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों के दौरान फैक्ट चेकर ने AAP के निलंबित नेता ताहिर हुसैन को बचाने के लिए बकायदा निरंतर प्रयास किए। 

उन्होंने अपनी रिपोर्ट्स के जरिए AAP के निलंबित नेता को क्लिन चिट दे दिया और उसकी वीडियो शेयर करके जाहिर करने की कोशिश की कि ताहिर हुसैन तो वास्तविकता में मदद की गुहार लगा रहा था। लिखा कि उसके वीडियो के साथ छेड़छाड़ नहीं की गई है।

जामिया मिलिया इस्लामिया में नागरिकता संशोशन कानून के ख़िलाफ़ हुए प्रदर्शनों में भी ऑल्ट न्यूज का यही रवैया था। इसी ऑल्ट न्यूज वेबसाइट ने पुलिस पर हमला करने वाले छात्रों को लेकर बोला था कि उनके हाथ में पत्थर नहीं बल्कि वॉलेट था। जबकि वास्तविकता में वीडियो में साफ दिख रहा था कि छात्र के हाथ में पत्थर था।

इसके बाद ऑल्ट न्यूज ने यही घटिया कोशिश कोरोना काल में भी जारी रखी। सोशल मीडिया पर जिस समय अनेकों तस्वीरें और वीडियो सैलाब की तरह तैर रही थीं कि कहीं कोई मजहबी फल विक्रेता फलों पर थूक लगाकर बेच रहा है, कहीं पर पेशाब छिड़क रहा है। तो ऑल्ट न्यूज ने इन घटनाओं को भी जस्टिफाई करने का प्रयास किया और अपराधों को इस तरह दर्शाया कि ये सब काम कोरोना महामारी के बीच में नहीं हुए। सवाल ये है कि क्या थूक लगाकर फल बेचना किसी भी समय में स्वीकारा जा सकता है?

हाल का एक और उदहारण है, जब शेख नाम के एक व्यक्ति ने पेट्रोल पंप पर 20 रुपए का नोट गिरा दिया था और पेट्रोल पंप वालों ने सीसीटीवी देखकर इसकी शिकायत पुलिस में की। तब भी ऑल्ट न्यूज ने उसे पाठकों की नजरों में निर्दोष दिखाने के लिए मार्मिक स्टोरी की थी और लिखा था कि एक्सिडेंट के कारण उसका सीधा हाथ काम नहीं करता। इसलिए उसके हाथ से नोट गिरा।

तरीका नंबर 4: डॉक्सिंग कर सोशल मीडिया पर लोगों की जानकारी सार्वजनिक करना

ऑल्ट न्यूज से संबंधित ऐसे कई मामले सामने आए, जब इस वेबसाइट ने सोशल मीडिया पर वैचारिक मतभेद देखते हुए लोगों की निजी जानकारियों को सार्वजनिक किया और जिसके कारण यूजर्स को धमकियाँ मिलनी शुरू हो गईं। साल 2019 में प्रतीक सिन्हा ने ऐसा ही कारनामा करके बवाल खड़ा दिया था। उस समय @SquintNeon नाम के यूजर को जिहादी तरह-तरह की धमकियाँ देने लगे थे। बाद में ट्विटर ने भी उस लड़के का अकॉउंट सस्पेंड कर दिया था।

इसी प्रकार प्रतीक सिन्हा ने कई लोगों की डॉक्सिंग की। उसने कई यूजर की जानकारी को सार्वजनिक तौर पर पोस्ट करके उनकी जान को खतरे मे डलवाया। यहाँ तक इस प्रक्रिया के बीच में महिलाओं को भी नहीं छोड़ गया। बाद में कई लोगों ने इस बात का खुलासा किया कि प्रतीक सिन्हा की हरकतों के कारण उन्हें ये धमकियाँ मिलीं।

इसलिए, ये कहना गलत नहीं है कि ऑल्ट न्यूज द्वारा अपनाई जाने वाली ये पद्धति निजता के अधिकार को तार-तार करते हुए न केवल कट्टरपंथियों के अपराध को छिपाने के लिए इस्तेमाल की जाती है, बल्कि उन लोगों को डराने के लिए भी इस्तेमाल की जाती है, जो उनके ख़िलाफ़ बोलने का प्रयास करते हैं।

तरीका नंबर 5: वैश्विक स्तर पर विदेशी मीडिया और वामपंथियों का सहयोग

यहाँ बता दें कि ऑल्ट न्यूज अपने प्रोपेगेंडा को चलाने के लिए केवल उक्त प्रणाली को नहीं अपनाता। बल्कि इसके लिए वो माध्यम भी खोजता है। जैसे विदेशी मीडिया के जरिए वे अपने फैक्ट चेक को व्यापक स्तर पर प्रमाणित करता है और उनके अजेंडे को व्यापक स्तर पर फैलाने में उनकी मदद भी करता है।

ताजा उदाहरण देखिए, कोरोना वायरस के कहर के बीच तबलीगी जमातियों के मामले में प्रतीक सिन्हा ने अमेरिकन मीडिया संगठन को ये बताया कि भारत में दक्षिणपंथियों द्वारा इन वीडियोज को इस मंशा से फैलाया जा रहा है कि वे भारतीय समुदाय विशेष को बदनाम कर सकें और साथ ही कोरोना वायरस के बीच उनकी गतिविधि को आतंकी गतिविधि करार दे सकें।

ध्यान देने वाली बात यह है कि ये बयान उस समय प्रतीक सिन्हा ने दिया, जब सोशल मीडिया पर अनेकों वीडियो मौजूद थी, जिसमें लोग कोरोना को अल्लाह का कहर बोलकर लोगों में डर व्याप्त कर रहे थे। साथ ही 500 के नोट में थूक लगाकार कोरोना फैलाने की बात कर रहे थे।

प्रतीक सिन्हा ने वाइस (Vice) से बातचीत में वैश्विक स्तर पर भारत की छवि को भी खराब करने का प्रयास किया। उन्होंने उस लेवल पर जहाँ उन्हें एक्सपर्ट के तौर पर बताया गया, वहाँ उन्होंने कहा कि जब भी वह फैक्ट चेकर की इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस को अटेंड करते हैं, तो उन्हें महसूस होता है कि कहीं भी गलत जानकारियों का इस्तेमाल इस कदर नहीं किया जाता है, जैसे कि भारत करता है।

गौरतलब हो कि प्रतीक सिन्हा विदेशी मीडिया के समक्ष ये सब तब कहते नजर आते हैं जब ऑल्ट न्यूज के सभी सह-संस्थापकों की विचारधारा और विचारों को देखकर ऐसा लगता है जैसे उन्होंने गलत जानकारी फैलाने में स्नातक की डिग्री हासिल की हो। और आज वे उसी का इस्तेमाल करके वे अपना प्रोपेगेंडा चला रहे हैं। 

आज बात चाहे विदेशी मीडिया के सामने भारत की छवि बिगाड़ने की हो, हिंदुओं को कट्टर बताने की हो, सरकार की नीतियों का विरोध करने की हो, तबलीगी जमातियों को निर्दोष बताने की हो, बालाकोट में एयरफोर्स के साहस पर संदेह करने की हो…ऑल्ट न्यूज इन सभी कार्यों को अपनी रिपोर्ट्स के माध्यम से बखूबी कर रहा है।

ऑल्ट न्यूज मतलब इस्लामी प्रोपेगेंडा

अपने आप को फैक्ट चेकिंग वेबसाइट बताने वाला ये पोर्टल विशुद्ध रूप से केवल और केवल प्रोपेगेंडा चला रहा है। जिसे वास्तविकता में कोई मतलब नहीं है कि देश की अल्पसंख्यक आबादी के निराधार माँगों के कारण वे केवल और केवल बहुसंख्यक आबादी के धार्मिक चिह्नों का अपमान कर रहे हैं। साथ ही ऐसे लोगों को भी बचा रहे हैं, जिन्होंने 3 साल की बच्ची की पिछले साल अलीगढ़ में बेरहमी से हत्या कर दी और श्रीलंका में हुए हमलों को अंजाम दिया।

ऑल्ट न्यूज की रिपोर्ट आज देख लीजिए या कल… उनकी प्रतिबद्धता केवल इस्लामी कट्टरपंथियों के प्रति ही दिखाई देगी। उन्होंने फैक्ट चेक के नाम पर जो फैक्ट्री खोल रखी है, उससे आज सिर्फ़ झूठ ही निर्मित होता है, जिसके चरणबद्ध तरीकों का उल्लेख हमने इस लेख में ऊपर कर ही दिया है।

मंदिरों से ₹10 करोड़ वसूलने का फरमान: विरोध के बाद तमिलनाडु सरकार ने वापस लिया फैसला, VHP ने दी थी चेतावनी

तनिलनाडु सरकार ने अपने उस आदेश को वापस ले लिया है, जिसके तहत हिन्दू मंदिरों से 10 करोड़ रुपए की रकम मुख्यमंत्री कोविड-19 रिलीफ फण्ड में ट्रांसफर करने की बात कही गई थी। ‘द तमिलनाडु हिन्दू रिलीजियस एंड चैरिटेबल एंडोमेंट्स’ ने ऐसा आदेश दिया था, जिसे अब हिन्दू संगठनों और लोगों के विरोध के बाद वापस ले लिया गया है। मद्रास हाईकोर्ट ने कहा है कि ये क़ानूनी रूप से तर्कसंगत नहीं है। अब इस फ़ैसले पर रोक लग गई है।

मद्रास हाईकोर्ट की एक पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (PIL) बेंच ने अप्रैल 22, 2020 को आए इस आदेश को अमान्य करार दिया। इस बेंच में जस्टिस विनोद कोठरी और पुष्प सत्यनारायण शामिल थीं। ‘हिन्दू टेम्पल वॉरशिपर्स सोसाइटी’ के अध्यक्ष टीआर रमेश ने इस आदेश पर रोक लगाने की माँग की थी। तमिल अख़बार दिनमालारी के डिटोर आरआर गोपालजी ने भी याचिका दायर की थी। इसके बाद विभाग ने एक नया सर्कुलर जारी कर के इस आदेश को वापस ले लिया

याचिका में कहा गया था कि कमिश्नर के पास ऐसा कोई आदेश जारी करने का कोई अधिकार नहीं है, वो भी तब जब सरकार के आदेश के कारण सारे मंदिर पिछले दो महीने से बंद हैं। उन्होंने दलील दी कि रेवेन्यू न होने के कारण मंदिरों के पास कोई सरप्लस नहीं है और ऐसे में रुपए लेना सही नहीं है। विहिप के प्रवक्ता विनोद बंसल ने इस फ़ैसले का स्वागत किया और हिंदूवादी संगठनों को बधाई दी। विश्व हिन्दू परिषद ने इस आदेश के बाद कहा:

तमिलनाडु व आंध्र प्रदेश सरकारों के हिन्दू द्रोही चेहरे जग जाहिर हैं। दोनों ही सरकारों द्वारा मंदिरों की पवित्रता व भगवान के धन पर कुदृष्टि के साथ हिंदुओं के धर्मांतरण को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। ये असंवैधानिक, निंदनीय व हिन्दू समाज पर गहरी चोट है। हिन्दू समाज के तुरंत कानूनी व अन्य दबावों के चलते तमिलनाडु सरकार ने सिर्फ हिन्दू मंदिरों से जबरन 10 करोड़ रुपए वसूलने के अपने तुगलकी फ़रमान को वापस लिया। भविष्य में भी सरकारें इस प्रकार के हिन्दू द्रोही कदमों से बाज आएँ।

विनोद बंसल ने पूछा कि हिन्दू श्रद्धालुओं के दान व मंदिरों की सम्पत्ति को मंदिरों, हिन्दू धर्म कार्यों या हिंदू समाज के कल्याण में लगाने के बजाए ईसाइयों व दूसरे मजहब वालों द्वारा हिंदुओं के धर्मांतरण में खर्च करना कौन सा सेक्यूलरिज्म है? उन्होंने सरकारों को सलाह दी कि वो हिन्दू द्रोह से बाहर निकलें।

बता दें कि तमिलनाडु सरकार ने 47 मंदिरों को CM राहत कोष में ₹10 करोड़ रुपए देने का आदेश दिया था। इसके विपरीत राज्य सरकार ने 16 अप्रैल को रमजान के महीने में प्रदेश की 2,895 मस्जिदों को 5,450 टन मुफ्त चावल वितर‌ित करने आदेश दिया था, ताकि रोजेदारों को परेशानी ना हो। वास्तव में मदिरों को ऐसा आदेश देने के पीछे तमिलनाडु सरकार की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति जिम्मेदार है।

बॉयज लॉकर रूम मामले में दिल्ली पुलिस ने 15 साल के नाबालिग को पकड़ा, 20 अन्य छात्र भी शामिल

दिल्ली पुलिस की साइबर सेल ने इंस्टाग्राम ग्रुप बॉयज लॉकर रूम (Boys Locker Room/Bois Locker Room) पर अश्लील चैट करने के मामले में 15 साल के नाबालिग लड़के को पकड़ा है। नाबालिग के अलावा इस ग्रुप केस में 20 लड़के और शामिल हैं। पुलिस ने सोशल मीडिया पर रजिस्टर फोन नंबर से लड़के के घर का पता लगाया। नाबालिग पर आरोप है कि उसने भी इंस्टाग्राम ग्रुप में तस्वीर शेयर की, जिसे देखते हुए पुलिस ने उसके घर जाकर पकड़ा। इस पूरे मामले में पुलिस को साउथ दिल्ली के चार स्कूल और नोएडा के एक स्कूल के बारे में पता लगा है। अब कहा जा रहा है कि सभी 21 छात्रों से पूछताछ की जाएगी।

मामला उजागर होने के बाद दिल्ली के चार स्कूलों में से एक स्कूल की प्रिंसिपल ने कहा, “यह हमारे लिए हैरानी की बात है क्योंकि हमारे स्कूल में लिंग और सम्मान के अलावा साइबर अपराध जैसे मुद्दों पर खुलकर चर्चा करने वाले वातावरण को बढ़ावा दिया जाता है। मेरा यह भी मानना ​​है कि जब बात ऐसी आती है तो बच्चों की ज़िंदगी में माता-पिता की भागीदारी भी बेहद अहम होती है।”

बता दें कि इस मामले के संबंध में पुलिस ने नाबालिग का फोन बरामद कर लिया है। साथ ही ग्रुप सदस्यों के एक ख़िलाफ़ एफआईआर आईपीसी की धारा 465, 469, 509 के तहत व आईटी एक्ट 2000, की धारा 67 और 67ए के तहत दर्ज हुई है।

जानकारी के अनुसार, सोशल नेटवर्किंग साइट इंस्टाग्राम पर एक चैट ग्रुप में नाबालिग लड़कियों की फोटो का गलत इस्तेमाल करने के मामले ने सोमवार को तूल पकड़ा था। इस संबंध में दिल्ली महिला आयोग ने सोमवार को दिल्ली पुलिस और इंस्टाग्राम को इस संबंध में नोटिस जारी किया था।

वहीं, दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी ने जानकारी देते हुए कहा था कि वे इस मामले में जाँच शुरू कर चुके हैं और उन्होंने इंस्टाग्रााम में इस चैट ग्रुप से संबंधित जानकारी माँगी है। अब ग्रुप के एक सदस्य के पकड़े जाने के बाद इस पर आगे की पूछताछ जारी है।

बता दें कि इस ग्रुप का खुलासा एक लड़की की मदद से हाल में हुआ था, जिसने सोशल मीडिया पर इस ग्रुप के कुछ स्क्रीनशॉट्स को शेयर करते हुए लिखा, “दक्षिण दिल्ली के 17-18 साल की उम्र के लड़कों का एक ग्रुप है, जिसका नाम ‘ब्वॉयज लॉकर रूम’ (Boys Locker Room/Bois Locker Room) है, जहाँ कम उम्र की लड़कियों की तस्वीरों के साथ छेड़छाड़ कर आपत्तिजनक बनाया जा रहा था। मेरे स्कूल के दो लड़के इसका हिस्सा हैं।” लड़की ने इस दौरान जिन तस्वीरों को शेयर किया था, उन पर लिखे कमेंट देखकर ये अंदाजा लगाया जा सकता था कि ग्रुप के सदस्य गैंगरेप की योजना बना रहे थे और उस पर चर्चा कर रहे थे।