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70% टैक्स को मदिरा-प्रेमियों ने बताया देशसेवा में योगदान, दिल्ली के बाद UP, आंध्र प्रदेश में भी बढ़ी कीमतें

देशव्यापी बंद के बीच शराब एक बड़ा विषय बनकर उभरा है। शराब की दुकानों के खोलने पर लगने वाली भीड़ के कारण कल ही दिल्‍ली की अरविंद केजरीवाल सरकार ने शराब पर 70% अतिरिक्‍त कोरोना टैक्‍स लगाने की घोषणा की, जिसे अब उत्तर प्रदेश और आन्ध्र प्रदेश सहित कई अन्य राज्य भी लागू करने पर विचार कर रहे हैं।

दिल्ली के बाद अब UP और आंध्र प्रदेश में भी बढ़ीं शराब की कीमत

दिल्‍ली के बाद अब उत्‍तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार ने भी दिल्ली सरकार की तरह ही शराब पर कोरोना टैक्‍स (Corona Tax) लगाने पर विचार कर रही है। हालाँकि, इसे अभी दिल्ली की ही तरह कोरोना टैक्‍स नाम नहीं दिया गया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, आबकारी विभाग की सिफारिश पर योगी सरकार जल्‍द ही शराब की बढ़ी हुई कीमतों का ऐलान कर सकती है।

दिल्ली में यह कोरोना टैक्स MRP पर लागू होगा। यानी जो शराब अभी तक 1000 रुपए में मिला करती थी वही कोरोना टैक्स के बाद अब सीधे 1700 रुपए में मिलेगी।

दिल्ली की ही तर्ज पर आंध्र प्रदेश सरकार ने भी शराब के दामों में आज 50% की वृद्धि की है। इस तरह से अब तक आंध्र प्रदेश सरकार ने शराब पर कुल 75% शुल्क की बढ़ोतरी की है। रविवार (मई 03, 2020) को आंध्र प्रदेश सरकार ने शराब को 25% महँगा किया था, इसके बाद आज, मंगलवार को शराब की कीमतों में 50% की वृद्धि की है। इस तरह से अब आंध्र प्रदेश में शराब MRP से 75% अधिक के दाम पर बिकेगी।

छत्तीसगढ़ में होम डिलीवरी

छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार ने शराब प्रेमियों की सहूलियत को ध्यान में रखते हुए शराब की होम डिलीवरी सेवा शुरू की है। यानी अब शराब के शौकीन मोबाइल ऐप और वेब पोर्टल के माध्यम से शराब घर पर मँगवा सकते हैं। राज्य शासन ने सोशल डिस्टेंसिंग और कोरोना के संक्रमण को नियंत्रित करने के उद्देश्य से घर पर शराब आपूर्ति की अनुमति प्रदान की है।

शराब प्रेमियों ने Corona टैक्स को बताया देश सेवा

दिल्ली के लक्ष्मीनगर इलाके में शराब के लिए सुबह से लाइन में खड़े एक व्यक्ति ने वहाँ पर हो रही परेशानियों पर आपत्ति व्यक्त करते हुए कहा कि वो वहाँ सुबह छह बजे से खड़े हैं।

ANI के अनुसार, उन्होंने कहा- “दुकान सुबह नौ बजे खुलने वाली थी, लेकिन सुबह 8:55 बजे पुलिस पहुँची। अगर कुछ अनहोनी हुई तो कौन जिम्मेदार होगा? कौन यहाँ पर व्यवस्थित करेगा लोगों को? ये पुलिस वालों की ड्यूटी नहीं है। आप एक-दूसरे पर दोषारोपण कर रहे हैं कि पब्लिक पागल हो रही है? पब्लिक को समझाएगा कौन? हमें 70% टैक्स लगने से कोई समस्या नहीं है, यह हमारे तरफ से देश के लिए दान की तरह है।”

J&K: हिजबुल मुजाहिदीन का फरार आतंकी तनवीर अहमद मलिक डोडा से गिरफ्तार, सुरक्षाबल कर रहे पूछताछ

जम्मू कश्मीर के डोडा में सुरक्षाबलों को एक आतंकी को पकड़ने में कामयाबी मिली। मंगलवार (मई 5, 2020) को यहाँ सुबह करीब पाँच बजे सर्च ऑपरेशन चलाया गया। जिस दौरान सुरक्षाबल को यह सफलता मिली है। सुरक्षाबलों ने हिजबुल मुजाहिदीन के एक फरार आतंकी को गिरफ्तार किया है। आतंकी की पहचान तनवीर अहमद मलिक के तौर पर हुई है और सुरक्षाबल के जवान को इसकी तलाश फरवरी से थी।

तनतना गुंदना डोडा के रहने वाले आतंकी तनवीर से पूछताछ की जा रही है। वह संगठन के लिए क्या काम कर रहा था और डोडा में जैश सहित अन्य आतंकी संगठनों का नेटवर्क कहाँ-कहाँ फैला है, इस बारे में पूछा जा रहा है। पूछताछ पूरी होने के बाद तनवीर को पुलिस के हवाले कर दिया जाएगा। तनवीर के साथ ही उसके बहनोई और तीन अन्य लोगों को भी गिरफ्तार किया गया है।

जानकारी के मुताबिक पुलिस को आज सुबह 6 बजे के करीब विश्वसनीय सूत्रों से यह जानकारी मिली कि तनवीर को तनतना गाँव में देखा गया है। सूचना के आधार पर पुलिस और सेना की संयुक्त टीम तनतना पहुँची और गाँव की घेराबंदी कर उसकी तलाश शुरू कर दी। करीब एक घंटे तक चले सर्च ऑपरेशन के दौरान सुरक्षाबलों ने सात बजे के करीब उसे ढूँढ निकाला और गिरफ्तार कर लिया।

उसके कब्जे से एक चाइनीज पिस्तौल, 10 राउंड भी बरामद हुए हैं। पुलिस का कहना है कि तनवीर फरवरी से फरार है। वे पहले आतंकवादियों के लिए काम करता था परंतु जब सुरक्षाबलों को इस बारे में पता चला और उसकी तलाश शुरू की तो वह घर से फरार हो गया।

पुलिस का कहना है कि उन्हें पहले ही इस बात की जानकारी मिल गई थी कि तनतना में रहने वाला तनवीर पिछले कई महीनों से जैश के लिए ओवरग्राउंड वर्कर (OGW) के तौर पर काम कर रहा है। इससे पहले कि पुलिस उस तक पहुँचती वह घर से फरार हो गया। बाद में पता चला कि वह हिजबुल मुजाहिदीन के साथ जा मिला है और संगठन के साथ मिलकर आतंकी वारदातों को अंजाम दे रहा है। उन्होंने कहा कि तनवीर का पकड़ा जाना बहुत बड़ी सफलता है। उससे पूछताछ की जा रही है। 

बताया जा रहा है कि तनवीर से डोडा, किश्तवाड़ व उसके साथ लगते इलाकों में सक्रिय आतंकी नेटवर्क के बारे में पता चल सकता है। इन जिलों में कौन-कौन सा आतंकवादी संगठन सक्रिय है, कौन लोग ओवरग्राउंड वर्कर के तौर पर उनके लिए काम कर रहे हैं, यह जानकारी हासिल की जा रही है।

गौरतलब है कि 5 मार्च 2020 को जम्मू कश्मीर में किश्तवाड़ जिले के मारवा इलाके से हिजबुल मुजाहिदीन के पाँच ओवर ग्राउंड वर्करों (OGW) को गिरफ्तार किया गया था। किश्तवाड़ पुलिस को सूचना मिली थी कि मारवा इलाके के रहने वाले गुलाम हुसैन, मोहम्मद यासीन, जाकिर हुसैन, मोहम्मद इकबाल और बशीर अहमद हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकियों को पनाह देने के साथ उनकी मदद करते थे।

जम्मू-कश्मीर के शोपियाँ जिले में 9 मार्च, 2020 को सुरक्षाबलों ने आतंकियों के साथ हुई मुठभेड़ में 2 आतंकवादियों को मार गिराया था। इस मुठभेड़ में मरने वाले दोनों आतंकियों के संबंध हिजबुल मुजाहिद्दीन से थे। इनमें से एक पाकिस्तानी था और दूसरे की पहचान इशफाक अहमद के रूप में हुई थी।

‘कोरोना मुस्लिमों को नपुंसक बनाने की चाल, नर्स अगर हिंदू हो तो उसे लगा दो इंजेक्शन’- AIMIM नेता अबु फैजल

कोरोना महामारी के बीच असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM के नेता अबु फैजल का एक वीडियो सामने आया है। वीडियो में पार्टी नेता संक्रमण के बारे में बात करते हुए समुदाय विशेष अर्थात मुस्लिमों को इसका इलाज कराने से मना कर रहे हैं। वीडियो में फैजल दावा कर रहे हैं कि उनके पास पर्याप्त सबूत हैं कि कोरोना का तो केवल बहाना है, वास्तव में सरकार और डॉक्टर मिलकर समुदाय विशेष की महिलाओं को ऐसा इंजेक्शन दे रहे हैं, जिनसे उनके बच्चे न हों और मुस्लिम आबादी न बढ़े।

अपनी वीडियो में फैजल अभद्र भाषा का प्रयोग करते हुए समुदाय विशेष के लोगों को सख्त तौर पर हिदायत दे रहे हैं कि वे किसी तरह का इंजेक्शन न लें और अगर कोई बार-बार बोले तो उसका हाथ तोड़ दें या फिर वो इंजेक्शन पहले उसके लगा दें।

वीडियो में फैजल समुदाय विशेष की महिलाओं को बोलते हैं कि अगर नर्स इंजेक्शन लगाने पास आए तो उसका नाम पूछो अगर वे मुस्लिम नहीं है, और कोई ‘लिंडी’ यानी हिंदू है, तो आधा इंजेक्शन उसे दे दो।

अपनी बात को साबित करने के लिए अबु इस दौरान एक ऑडियो भी चलाते हैं। हालाँकि, ये ऑडियो किसकी होती है, इस पर वह कुछ नहीं कहते, लेकिन इस ऑडियो में एक व्यक्ति ये कहता सुनाई पड़ता है कि पहले मुस्लिमों को पकड़ा जाता है, फिर मारा जाता है और बाद में बच्चों-बुजुर्गों को छोड़ दिया जाता है। इसके बाद जवानों को अपने साथ ले जाकर ऐसी दवा देते हैं, जिससे मुस्लिम या तो नपुंसक हो जाता है या फिर धीरे-धीरे बीमार होकर मर जाता है।

अबु फैजल की वीडियो इतने के बाद भी नहीं खत्म होती। आगे की वीडियो में फैजल विश्व भर में हाहाकार मचा रही बीमारी को ही खारिज कर देता है। फैजल कहते हैं कि कोरोना-शोरोना कुछ नहीं है। ये आरएसएस वायरस चल रहा है। सारी मीडिया को एक काम पर लगा दिया गया है कि समुदाय विशेष और इस्लाम को टारगेट करते रहो, ताकि देश का माहौल खराब हो सके और जो लोग गौ मूत्र पर अमल करते हैं, उनके जेहन में गौ-मूत्र चलता रहे।

उनका कहना है कि इन्हीं सबके कारण समुदाय विशेष को कारोबार करने नहीं दिया जा रहा है। समुदाय विशेष को कुछ बेचने नहीं दिया जा रहा है और उन्हें कहीं आने-जाने पर भी रोक है। वे इन हालातों को सरकार की साजिश बताते हैं।

https://www.youtube.com/watch?v=9ZG0iXFcsHU

अपनी वीडियो में वे सभी मुस्लिमों से एकत्रित होने की बात करते हैं और गौ मूत्र पीने वालों को सबक सिखाने की बात करते हैं। वे कहते हैं, “सभी कलमा पढ़ने वाले एक हो जाओ, ये वक्त बहुत खतरनाक है। रही बात उनकी जो तलवार दिखा रहे हैं, तो बता दें इससे हमारी औरतें सब्जी काटती हैं। जब वक्त आएगा तो इनके ***में घुसा देगें।” आगे फैजल धमकी देते हैं कि रमजान हैं इसलिए वे शांत हैं और तमीज से बात कर रहे हैं। वरना पूरे भगवा को फाड़कर रख दें।

इसके बाद आरएसएएस का नाम लेते हुए उनके समर्थकों गाली देते हैं। वे कहते हैं, “पापियों, दरिंदो, आरएसएस के चट्टुओं, चोरों, फ्रॉडियों, मूत्र पीने वालों तुम्हारे शरीर में अगर खून होता, तो तुम इंसानियत की सोचते, इंसानों की सोचते। लेकिन तुम तो सुअर की औलाद हो, तुम्हारे अंदर मूत्र दौड़ता है। तुम तो टट्टी खाते हो, टट्टी से नहाते हो.. तो इंसानियत कहाँ से होगी तुम्हारे पास?”

वो कहते हैं कि तुम्हें पहले मुस्लिमों से इज्जत मिलती थी। लेकिन अब नहीं मिलेगी। तुम जानवर की औलाद हो। तुम्हारी असलियत दुनिया जान चुकी है। तुम आतंकी हो। याद रखो जब हम मारना शुरू करेंगे तो कहीं जगह नहीं मिलेगी और न कोई भगवा में छिप सकोगे।

अब यहाँ बता दें, पिछले काफी समय से हम लोग इस बात को लेकर आश्चर्य जताते रहे है कि कि राजस्थान से लेकर कर्नाटक तक आखिर किस मानसिकता के लोग हैं, जो कोरोना योद्धाओं का सहयोग करने की बजाय उनपर हमला कर रहे हैं। तो शायद अब ये ऑडियो सुनकर और इसमें कही बातों के मुख्य बिंदु पढ़कर हमें समझ आए कि आखिर किस तरह की अफवाहें और नेतृत्व के कारण पूरे देश में स्वास्थकर्मियों पर हमला हुआ और अधिकतर आरोपित समुदाय विशेष के लोग रहे। जो समय-समय पर नर्सो, आशाकर्मियों और डॉक्टरों को देखकर इल्जाम लगाते रहे कि वे उनकी जानकारी एनआरसी आदि के लिए इकट्ठा कर रहे हैं।

राजस्थान सरकार ने स्वीकारा, कॉन्ग्रेस के नहीं बल्कि अपने खर्चे पर रेल यात्रा कर रहे हैं मजदूर

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी के प्रवासी श्रमिकों को घर भेजने के लिए आवश्यक किराया वहन करने की बात की सच्चाई से खुद कॉन्ग्रेस शासित राज्य राजस्थान ने पर्दा उठाने का काम किया है। राजस्थान सरकार ने स्वीकार किया है कि उन्होंने जयपुर-पटना श्रमिक स्पेशल ट्रेन से सफर कर रहे मजदूर-श्रमिकों से रेल का किराया लिया है।

राजस्थान सरकार ने खुद स्वीकारी बात

कॉन्ग्रेस ने एक दिन पहले ही यह दावा किया है कि राजस्थान सरकार ने प्रदेश में फँसे बिहार के श्रमिकों को अपने खर्चे पर उनकी गृह राज्य में वापसी करवाई है। राजस्थान सरकार ने दावा किया था कि जयपुर से स्पेशल ट्रेन में भेजे गए 1200 मजदूर-श्रमिकों के किराए का भुगतान राज्य सरकार ने उत्तर पश्चिम रेलवे को कर दिया है।

वहीं, इसके बाद सीएम अशोक गहलोत ने भी सोमवार (मई 04, 2020) को इस बात की घोषणा भी कर दी थी कि लॉकडाउन में फँसे सभी श्रमिकों से घर वापसी राज्य सरकार अपने खर्च पर करवाएगी।

कॉन्ग्रेस पार्टी ने ऐसा करके एक ओर जहाँ अपने खर्चे पर श्रमिकों को घर भेजने का झूठा दावा किया वहीं, राजस्थान सरकार ने भी अपने राजस्व के जरिए अपनी पार्टी के अरमानों को पूरा करने की बात मीडिया के सामने रखी।

लेकिन यदि राजस्थान सरकार और कॉन्ग्रेस, दोनों में से ही किसी एक ने भी इन श्रमिकों का खर्चा वहन नहीं किया है तो ऐसे में इन दोनों की ही मंशा पर प्रश्नचिन्ह लगाया जा रहा है।

वास्तव में, लॉकडाउन में लोगों को घर भेजने जैसी बड़ी बड़ी बातें तो कॉन्ग्रेस ने जोश में आकर खूब की हैं, लेकिन वास्तविकता यही है कि खुद कॉन्ग्रेस शासित राज्य ही अभी तक अपनी पार्टी अध्यक्ष सोनिया गाँधी के फैसले पर सहमत और एकजुट नजर नहीं आ रहे हैं।

सोनिया गाँधी की बात पर एकमत नहीं है कॉन्ग्रेस

मीडिया की अटेंशन में जुटी कॉन्ग्रेस में मजदूरों के किराए के सवाल पर अभी तक भी स्पष्ट नहीं है क्योंकि उन्होंने सरकार के निर्देशों को समझा ही नहीं है। एक तरफ सोनिया गाँधी कहती हैं कि मजदूरों का किराया कॉन्ग्रेस देगी। भूपेश बघेल पूछते हैं राज्य क्यों दे किराया? अशोक गहलोत कहते हैं राज्य ही देगा। जबकि अंत में श्रमिक खुद अपना किराया देकर रेल से यात्रा करते हैं।

तीन बड़े नेताओं के तीन अलग-अलग किस्म के बयान ये बताते हैं कि पार्टी श्रमिक एक्सप्रेस मामले पर राजनीति करना चाह रही है और जबरदस्ती का मुद्दा बना कर भाजपा को मजदूर-विरोधी दिखाना चाहती है।

झूठ फैलाने का काम तो पत्रकारों द्वारा शुरू ही करवा दिया गया था। रोहिणी सिंह, अजीत अंजुम और रवीश कुमार ने पहले ही माहौल बना दिया था। सोनिया गाँधी का बयान आते ही सागरिका घोष जैसों ने कॉन्ग्रेस की पीठ थपथपा कर इसे आगे बढ़ाया। ‘द हिन्दू’ की ख़बर के माध्यम से भ्रम का माहौल पैदा किया गया। जबकि बाद में सामने आया कि कॉन्ग्रेस शासित राज्य महाराष्ट्र और राजस्थान ही किराया देने में आनाकानी कर रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की कॉन्ग्रेस नेता जयराम रमेश की याचिका, कहा- पहले सरकार से करें बात

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (मई 5, 2020) को वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता जयराम रमेश की जरूरतमंदों को सरकारी राशन देने की माँग वाली याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने जयराम रमेश से कहा कि वह सरकार को ज्ञापन दें। कोर्ट ने यह भी कहा है कि लोगों को पहले सरकार के पास जाना चाहिए, उसके बाद कोर्ट के पास आना चाहिए।

बता दें कि जयराम रमेश ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर प्रवासी मजदूरों की परेशानी बताते हुए फूड सिक्यॉरिटी कानून के तहत कहीं के भी राशन कार्ड पर राशन उपलब्ध कराने का आदेश माँगा था। उन्होंने कहा था कि बड़ी तादाद में लोगों की आर्थिक स्थिति खराब है। देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान भोजन की भारी कमी है, ऐसे में जरूरतमंदों को मुफ्त राशन देना चाहिए। इस याचिका में उन्होंने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून, 2013 और ऐसे ही अन्य उपायों को लागू करने की बात कही थी। जयराम रमेश की तरफ से वरिष्ठ वकील सलमान खुर्शीद ने कोर्ट में दलील पेश की थी।

शीर्ष अदालत ने टिप्पणी की कि लोग सरकारी प्राधिकारियों को कोई प्रतिवेदन दिए बगैर ही संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सीधे उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर रहे हैं। न्यायमूर्ति अशोक भूषण, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति बीआर गवई की पीठ ने वीडियो कॉन्फ्रेन्सिंग के माध्यम से जयराम रमेश की याचिका पर विचार किया। 

पीठ ने पाया कि याचिका में उठाई गई समस्या पहले सरकार के संज्ञान में नहीं लाई गई है, इसलिए इसे वापस लेने की अनुमति दी जाती है। पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता को इस बारे में विस्तार से केंद्र को प्रतिवेदन देना चाहिए जिस पर सरकार गौर करेगी।

पीठ ने सलमान खुर्शीद से सवाल किया कि क्या इस संबंध में सरकार को कोई प्रतिवदेन दिया गया है। खुर्शीद ने कहा कि सरकार को इस बारे में कोई प्रतिवेदन नहीं दिया गया है। पीठ ने कहा कि समस्या यह है कि लोग सरकार को प्रतिवेदन देने की बजाए सीधे अनुच्छेद 32 के तहत शीर्ष अदालत में याचिका दायर कर रहे हैं। पीठ ने कहा कि इस तरह की याचिका से पहले कहीं कोई कवायद तो की जानी चाहिए।

वहीं सुप्रीम कोर्ट ने तृणमूल कॉन्ग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा की वह याचिका भी खारिज कर दी है, जिसमें उन्होंने मुख्यमंत्री राहत कोष में कंपनियों के सीएसआर फंड का दान भी स्वीकार करने की इजाजत माँगी थी।

गौरतलब है कि पिछले दिनों राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल के बेटे विवेक डोभाल ने कारवाँ पत्रिका और जयराम रमेश के ख़िलाफ़ पटियाला हाईकोर्ट में आपराधिक मानहानि की शिकायत दर्ज़ कराई थी। विवेक डोभाल ने यह कहते हुए मानहानि का मुकदमा दायर करवाया था कि सभी आरोप झूठे हैं और उनका व्यवसाय वैध है, न कि ब्लैकमनी से जुड़ा हुआ।

वहीं कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता वीरप्पा मोइली ने जयराम को पॉलिसी पैरालिसिस के लिए जिम्मेदार बताते हुए कहा था कि उनके कारण ही यूपीए-2 डूबी थी। रमेश ने कुछ दिनों पहले ही विपक्षी नेताओं को सलाह देते हुए कहा था कि हमेशा मोदी को विलेन बनाना काम नहीं आने वाला और सरकार के अच्छे क़दमों की तारीफ़ की जानी चाहिए। इसके बाद कॉन्ग्रेस के लोग ही उनके विरोध में उतर आए थे। मोइली ने कहा कि रमेश ने सत्ता में रहते हुए यूपीए-2 सरकार के सिद्धांतों से कई बार समझौता किया था।

इसके साथ ही देश के अलग-अलग हिस्सों में CAA-NRC-NPR के विरोध के बीच जयराम रमेश ने कहा था कि विपक्षी राजनीतिक दलों को इन विरोध प्रदर्शनों से एक हाथ की दूरी बनाए रखनी चाहिए और जन आंदोलनों को जबरन अपना बनाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।

कई दलितों ने अपनाया ईसाई धर्म: अब गटर और नाली साफ करवा रहा पाकिस्तान, छुआछूत और भेदभाव के शिकार

पाकिस्तान में धार्मिक स्वतंत्रता तो वैसे भी नहीं है लेकिन अब इसके और भी रूप सामने आ रहे हैं। वहाँ ईसाईयों से नाले और सीवर की साफ़-सफाई कराई जा रही है। असल में पाकिस्तान में कई दलितों ने ईसाई धर्म को अपना लिया था लेकिन दलित तब भी उनके अत्याचार से नहीं बच सके और उनसे नाले की साफ़-सफाई ही कराई जाती है। उन्हें मास्क और ग्लव्स तक भी नहीं दिए जाते हैं। पिछले दिनों पाकिस्तान में कई ईसाई सफाईकर्मियों की मौत हुई है।

‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ में प्रकाशित एक ख़बर में ऐसे ही एक ईसाई सफाईकर्मी एरिक जमशेद के बारे में बताया गया है, जिनके पूर्वजों ने हिन्दू धर्म छोड़ कर ईसाई मजहब अपना लिया था। उनके साथ वहाँ के बहुसंख्यक छुआछूत करते हैं। जुलाई 2019 में पाकिस्तान में फ़ौज ने समाचारपत्रों में एक एडवर्टाइजमेंट दी थी, जिसमें नाले की सफाई के लिए सफाईकर्मियों की बहाली की बात कही गई थी। इसमें केवल ईसाईयों को ही अप्लाई करने को कहा गया था। बाद में कुछ संस्थाओं द्वारा प्रदर्शन के बाद इसे हटा लिया गया।

पाकिस्तान के कराची जैसे बड़े शहरों की नगरपालिका में भी ईसाईयों से ही साफ़-सफाई के काम कराए जाते हैं। उन्हें गन्दी नालियों में उतरने होते हैं और नंगे हाथ से ही कचरे को उठाना होता है। इसमें मल-मूत्र से लेकर प्लास्टिक बैग्स और अन्य कचरे शामिल होते हैं। 2 करोड़ लोगों के इस महानगर में रोज 17500 लाख लिटर लिक्विड कचरा जमा होता है और अधिकतर इसे ही इसकी सफाई करते हैं। एक ईसाई सफाईकर्मी को तीन नाला साफ़ करने के बाद 500 रुपए से भी कम दिए जाते हैं।

एरिक अपने बेटे को बाहर एक स्कूल में भेजते हैं, ताकि वो सफाईकर्मियों वाले माहौल में न रहे। ये लोग जिस इलाक़े में रहते हैं, वहाँ मच्छरों से लेकर कॉकरोच तक बड़ी संख्या में रहते हैं और वहाँ साफ़-सफाई नहीं कराई जाती। कई भरे हुए गटर उस क्षेत्र में हैं। यहाँ तक कि उनके बच्चों को भी मजबूर किया जाता है कि वो अपने पिता का ही प्रोफेशन अपनाएँ और नालों की ही साफ-सफाई करें। जेम्स गिल नामक एक समाजिक कार्यकर्ता सरकार पर सफाईकर्मियों के भले के लिए दबाव डाल रहे हैं लेकिन अधिकतर सफाईकर्मी अशिक्षित और निरक्षर हैं, वो अपने लिए आवाज़ उठाना ही नहीं जानते।

प्रशासन इन सफाईकर्मियों को थोड़ा सा लालच भी देता है तो ये गटर में घुस कर साफ-सफाई करने को तैयार हो जाते हैं, क्योंकि ये उनकी ज़िंदगी चलाने का सवाल है। उन्हें खाने को नहीं मिलेगा तो वो ज़िंदा कैसे रहेंगे? इसीलिए सामाजिक कार्यकर्ताओं की गोलबंदी की सारी तरकीबें फेल हो जाती हैं। कई ईसाई सफाईकर्मी कहते हैं कि उनके पूर्वजों ने हिन्दू धर्म में भेदभाव से बचने के लिए ईसाई मजहब अपनाया लेकिन अब स्थिति और भी बदतर हो चली है।

उन्हें घंटों तक नालों और गटरों में घुस कर रहना पड़ता है। ऐसा नहीं है कि समुदाय विशेष के लोगों को नालियों की साफ़-सफाई के लिए हायर नहीं किया गया। ऐसी कोशिशें भी हो चुकी हैं। लेकिन, वो सफाईकर्मी सड़कों पर झाड़ू लगाने के अलावा कुछ नहीं करते। वो नालियों में उतरने और गटर साफ़ करने को तैयार ही नहीं होते। घंटों नाले में रहने के कारण ईसाई सफाईकर्मियों का शरीर भी तमाम रोगों से घिर जाता है।

पाकिस्तान में हिन्दुओं और सिखों के साथ अक्सर बुरा व्यवहार होता है। हिन्दू शरणार्थियों के साथ जानवरों जैसा व्यवहार किया जाता है। यूएन ने भी अपनी रिपोर्ट में पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर चिंता जताई थी। हालाँकि, वहाँ के प्रधानमंत्री इन बातों से इनकार करते हैं।

हथियार इकट्ठा कर देश के खिलाफ छेड़ो जिहाद: अलकायदा की भारतीय समुदाय विशेष से अपील

आतंकियों को कश्मीर में भारत के खिलाफ आतंक फैलाने के लिए उकसाने वाला अलकायदा सरगना अयमान अल जवाहिरी ने अब भारत में मौजूद समुदाय विशेष के लोगों से इस्लामी जिहाद से जुड़ने की अपील की है। अरब प्रायद्वीप (AQAP) में यमन का अल कायदा विश्व स्तर पर प्रतिबंधित आतंकवादी समूह है जिसने इस संबंध में सोमवार को अपना बयान जारी किया।

इस बयान में आतंकी समूह अलकायदा ने भारत पर इल्जाम लगाया कि वे मुस्लिमों पर जारी वैश्विक युद्ध का हिस्सा हैं और भारत सरकार ने समुदाय विशेष के खिलाफ कई कदम उठाए हैं। इसलिए अब भारतीय मुस्लिमों को इकट्ठा होना चाहिए और हथियार इकट्ठा करके जिहाद करना चाहिए।

अलकायदा का ये बयान उस समय आया है, जब कुवैत सरकार के इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) और कई अरब कार्यकर्ताओं ने भारत को इस्लामोफोबिक बोला। तथा भारत में भी कट्टरपंथियों ने व मीडिया गिरोह ने देश में इस्लामोफोबिया पर लगातार ट्वीट किए।

बता दें, अरब देशों की ओर से भारत को लेकर ये बयान उस पाकिस्तानी प्रोपगेंडे के बाद आए था। जिसे पाक ने नागरिकता संशोधन कानून और कश्मीर के ख़िलाफ़ फैलाया था। साथ ही तबलीगी जमातियों की आलोचना पर भी विरोध जताया था।

गौरतलब है कि इससे पहले जवाहिरी की पिछले साल कश्मीर को लेकर एक वीडियो सामने आई थी। वीडियो में अयमान अल-जवाहिरी भारत के खिलाफ जहर उगलते देखा गया था और अपने संदेश में उसने घाटी के आतंकियों का गुणगान भी किया था।

अपने वीडियो में जवाहिरी ने कश्मीर को लेकर भारत को गीदड़ भभकी दी थी। जवाहिरी ने डोन्ट फॉरगेट कश्मीर नाम से एक संदेश जारी कर घाटी के आतंकियों का गुणगान किया। 

उस वीडियो में आतंकी ओसामा बिन लादेन, जिसे अमेरिका ने अपनी कार्रवाई में मारा था, उसके संगठन के प्रमुख ने कश्मीर के मुजाहिद्दिनों से कहा था कि वे भारतीय सेना और सरकार पर निरंतर हमला करते रहें। ताकि भारत की अर्थव्यवस्था कमजोर हो सके।

इसके अलावा 2017 में अल कायदा ने ‘उपमहाद्वीप के मुजाहिदीनों के लिए आचार संहिता’ नाम से एक विस्तृत दस्तावेज जारी किया था, जिसमें यह बताया गया था कि आतंकी संगठन किन-किन लोगों को निशाना बनाएगा?

इस दस्तावेज में लक्ष्य से लेकर प्रक्रिया तक, सबकुछ समझाया गया था। अलकायदा ने सेना के अधिकारियों पर जानलेवा हमले करने की बात कही थी। आतंकी संगठन ने कहा था कि सेना में जिस अधिकारी का रैंक जितना ऊपर होगा, वो उनके उतने ही ज्यादा निशाने पर होगा।

केरल से झारखण्ड गए 1129 मजदूरों से वसूला गया किराया: श्रमिक एक्सप्रेस पर कॉन्ग्रेस, CPM ने साधी चुप्पी

केंद्र सरकार ने मजदूरों को वापस घर ले जाने के लिए स्पेशल ट्रेनों की व्यवस्था की है। भाजपा ने स्पष्ट किया है कि केंद्र सरकार उनके किराए का 85% वहन करेगी और बाकी राज्य सरकार को वहन करना है। श्रमिक एक्सप्रेस से केरल से झारखण्ड लौटे मजदूरों ने बताया कि उनसे 875 रुपए बतौर किराया वसूले गए। मजदूरों ने बताया कि उनके रूम पर जाकर किराया वसूला गया। ये मजदूर केरल से गिरिडीह पहुँचे थे।

भारतीय रेलवे ने अपनी नोटिस में स्पष्ट कहा है कि रेलवे टिकट नहीं बेच रही है और कोई भी आकर टिकट ख़रीद नहीं सकता। हर राज्य द्वारा दूसरे राज्य में तैनात नोडल अधिकारी की ये जिम्मेदारी है कि वो तय करे कि किन यात्रियों को लेकर जाना है और फिर अधिकारी ही उन्हें स्टेशन तक लाने की व्यवस्था करेंगे। मजदूरों ने कहा कि उनके कमरे पर जाकर किराया वसूला गया। जब रेलवे टिकट ही नहीं काट रही तो उसके अधिकारी मजदूरों के कमरे पर तो जाएँगे ही नहीं। तो फिर गया कौन? किसने लिया किराया?

केरल से झारखण्ड गए यात्रियों के मामले में भी वहाँ झारखण्ड के नोडल अधिकारी ने उन 1129 मजदूरों की सूची बनाई होगी, जो झारखण्ड के 22 जिलों के थे। फिर उन्हें दोनों राज्यों के अधिकारियों की मदद से स्टेशन लाया गया होगा। रेलवे को तो सिर्फ़ इससे मतलब है कि आने वाले यात्री राज्य सरकारों द्वारा लाए गए हैं या नहीं, फिर केंद्र सरकार के स्पष्टीकरण के बावजूद किराए के रूप में इतने रकम किस ने वसूल लिए? जाहिर है, राज्य सरकार के अधिकारियों या स्थानीय लालची नेताओं ने ही ऐसा किया होगा। इसकी जाँच होनी चाहिए।

केंद्रीय गृह मंत्रालय के दिशा-निर्देशों में भी स्पष्ट लिखा हुआ है कि किसी भी रेलवे स्टेशन पर किसी प्रकार का टिकट नहीं बेचा जाएगा। नियमानुसार, रेलवे टिकट प्रिंट करेगा और इसके लिए वो राज्य उसे बताएगा, जहाँ से ट्रेन चालू हो रही है। उस राज्य को ये सूची वो राज्य देगा, जहाँ ये मजदूर जाने वाले हैं। इसके बाद स्थानीय राज्य सरकार ही टिकट को मजदूरों में बाँटेगी। स्पष्ट है कि जो भी हुआ है, वो राज्य सरकार के अधिकारियों या स्थानीय नेताओं की मिलीभगत से हुआ है।

कॉन्ग्रेस पार्टी इस मामले में केंद्र सरकार पर हमलावर है और मीडिया में कहा जा रहा है कि ये ‘कॉन्ग्रेस का हाथ, आम आदमी के साथ’ 2.0 है, जिसके तहत सोनिया गाँधी ने इस मामले को उठाया है। लेकिन झारखण्ड में हेमंत सोरेन के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस भी गठबंधन सरकार का हिस्सा है, केरल में वामपंथियों की सरकार है। ऐसे में पार्टी को इन दोनों सरकारों से पूछ कर स्पष्ट करना चाहिए कि मजदूरों से किराया किसने वसूला?

केंद्र सरकार ने कहा है कि हर एक श्रमिक एक्सप्रेस ट्रेन के लिए रेलवे द्वारा राज्य सरकारों को 1200 टिकट दिए जा रहे हैं, इसके बाद ये उनकी जिम्मेदारी है कि वो अपने हिस्से की रकम का भुगतान करें और यात्रियों को चिह्नित कर उन्हें स्टेशन तक लेकर आएँ।

गृह मंत्रालय का नोटिफिकेशन: रेलवे किसी आम आदमी को टिकट बेच ही नहीं रही, केवल राज्य सरकारों को दिए जा रहे टिकट

केरल के मुख्यमंत्री पिनराई वियजन प्रेस कॉन्फ्रेंस कर के स्पष्ट कह चुके हैं कि उनकी सरकार मजदूरों का किराया वहन नहीं कर रही है। महाराष्ट्र, राजस्थान और केरल की सरकारें इन मजदूरों का किराया नहीं दे रही है। एक जगह कॉन्ग्रेस की सरकार है तो एक जगह सीपीआई-सीपीएम की। राजस्थान में तो कॉन्ग्रेस की पूर्ण बहुमत की सरकार है। ऐसे में कॉन्ग्रेस केंद्र को जिस काम के लिए कह रही है (और जो हो चुका है), वही बात अपनी ही सरकारों से क्यों नहीं मनवा पा रही है? क्या नियम अलग-अलग हैं?

ममता बनर्जी सरकार ने गुल कर दिया 72 मौतों का आँकड़ा: पश्चिम बंगाल में कोरोना के आँकड़ों में बड़ी हेराफेरी

कोरोना वायरस के आँकड़ों को लेकर केंद्र और पश्चिम बंगाल सरकार में काफ़ी खींचतान चल रही है। तीन दिन तक तो ममता बनर्जी सरकार ने आँकड़े ही नहीं जारी किए। अब तृणमूल कॉन्ग्रेस सरकार मान रही है कि कोरोना का डेटा इकठ्ठा करने में ग़लती हुई है। सरकार ने माना है कि कई मामले रिपोर्ट नहीं हुए हैं। 72 ऐसी संदिग्ध मौतें हैं, जिन्हें कोरोना डेटा में जोड़ने से इनकार किया जा रहा है। कहा गया है कि ये लोग दूसरी बीमारियों से मरे।

पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव राजीव सिन्हा ने मीडिया से बातचीत करते हुए 3 दिन बाद राज्य में कोरोना वायरस के आँकड़े जारी किए। पश्चिम बंगाल ऑडिट कमिटी ने इन 72 लोगों की मौत को कोरोना वायरस से जोड़ा है। कहा गया है कि पिछले 24 घंटे में राज्य में कोरोना से 11 मरीजों की मृत्यु हुई है। पश्चिम बंगाल में कुल मौत का आँकड़ा 61 बताया जा रहा है। अगर इन 72 लोगों को जोड़ दिया जाए तो ये संख्या 133 हो जाती है। मुख्य सचिव ने कहा:

“पश्चिम बंगाल सरकार आपको सही आँकड़े दे रही है। दूसरी बीमारियों (अन्य कोरोना संदिग्ध) से हुई 72 मौतों की बात हमारे पास नहीं आई है क्योंकि अस्पतालों को इसके बारे में जानकारी नहीं देने के लिए कहा गया है। सिर्फ़ कोरोना के मामलों से हुई मौतों का आँकड़ा इकठ्ठा किया जा रहा है। इसलिए, वे हमें कोरोना से मौतों की संख्या बता रहे हैं और हम आप तक सही आँकड़े पहुँचा रहे हैं। इसमें कोई मुद्दा नहीं है।”

डेटा में गड़बड़ी के लिए मुख्य सचिव ने प्राइवेट अस्पतालों को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि निजी अस्पताल गड़बड़ियाँ कर रहे हैं, जिससे सरकार को आँकड़े पेश करने में देरी हो रही है। उन्होंने रिपोर्टिंग की प्रक्रिया को जटिल करार दिया। सिन्हा ने दावा किया कि इसी प्रक्रिया की वजह से डेटा मिलने में देरी हो रही है। बता दें कि राज्य में केंद्र सरकार ने एक अन्तर मिनिस्टीरियल टीम को दौरे पर भेजा था।

टीम ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि पश्चिम बंगाल में कोरोना के कारण मृत्यु दर देश में सबसे अधिक है। वहाँ के आँकड़ा 12.8% है। टीम के सदस्य अपूर्व चंद्रा ने राजीव सिन्हा को लिखे पत्र में इस बात को उठाया था। आधिकारिक आँकड़ों की बात करें तो पश्चिम बंगाल में कोरोना वायरस के अब तक 1259 मरीज सामने आए हैं, जिनमें से 2018 लोग अब तक ठीक हुए हैं। फ़िलहाल 463 सक्रिय मामला होने की बात कही गई है। जहाँ केंद्र सरकार 133 मौतें बता रही हैं, राज्य सरकार कह रही है 61 की मौत हुई है।

भाजपा नेता कैलाश विजयवर्गीय ने सीएम ममता को लिखा था कि जहाँ एक तरह पश्चिम बंगाल की जनता कोरोना नामक आपदा को झेल रही है, ममता बनर्जी गन्दी राजनीति खेलने में व्यस्त हैं। उन्होंने सलाह दी थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राज्यपाल जगदीप धनखड़ से झगड़ने की बजाए वो राज्य पर ध्यान दें। उन्होंने लिखा कि ये भाजपा नेताओं से बदला लेने का समय नहीं है। ये समय है अपनी प्रशासनिक क्षमता दिखाने का।

हंदवाड़ा के बलिदानियों को कहा ‘युद्ध अपराधी’, जामिया की महूर परवेज ने एनकाउंटर को बताया- ‘मानवाधिकार उल्लंघन’

जामिया मिलिया इस्लामिया में पढ़ने वाली लॉ की छात्रा महूर परवेज (Mahoor Parvez) ने सोशल मीडिया पर हंदवाड़ा में बलिदान हुए 5 भारतीय सैनिकों को ‘वार क्रिमिनल’ यानी ‘युद्ध के अपराधी’ बताया है। परवेज ने अपने सोशल मीडिया पर देश की सुरक्षा में तैनात वीरकर्मियों के वीरगति प्राप्त होने पर उन्हें श्रद्धांजलि मिलता देख रविवार को आश्चर्य जताया और पूछा कि लोग युद्ध अपराधियों का महिमामंडन क्यों कर रहे हैं।

महूर परवेज (Mahoor Parvez) ने लिखा, “आप सभी युद्ध अपराधियों का महिमामंडन क्यों कर रहे हैं? इन ताकतों ने कश्मीर में 70+ वर्षों से अवैध रूप से घोर मानव अधिकारों का उल्लंघन किया है। और फिर भी कश्मीर को आज़ाद कराने के लिए बंदूक उठाने वाला आप ही के लिए आतंकवादी है और ये शहीद हैं? ये कैसी बात है।”

बता दें कि परवेज ने ये पोस्ट अपने इंस्टाग्राम और अन्य सोशल मीडिया साइटों पर शेयर किया। लेकिन जैसे ही ये पोस्ट वायरल होना शुरू हुआ, उसने इसे डिलीट कर दिया। मगर, लोग इसका स्क्रीनशॉट लेकर इस पर टिप्पणी करने लगे।

इस बीच परवेज की इस हरकत की जानकारी मिलते ही Khaitan & Co नाम की कंपनी, जहाँ वो बतौर इंटर्न काम करती थी, उसने उससे दूरी बना ली और स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणी का उनसे कोई लेना-देना नहीं है। वह केवल उनकी लॉ फर्म में बतौर इंटर्न काम कर रही थी, और अब वहाँ नहीं है।

लेकिन, यहाँ इस्लामिक कट्टरपंथी फौरन महूर परवेज (Mahoor Parvez) के सपोर्ट में आ गए। इन लोगों ने अभिव्यक्ति की आजादी का हवाला देकर उसका समर्थन किया। जब किसी ने परवेज को उसके विचारों के लिए आतंकी बताया तो अरशद नाम के यूजर ने उस शख्स को ‘गोबर’ कह दिया।

2 दिन पहले हंदवाड़ा में 5 सुरक्षाकर्मियों ने आतंकियों की कैद में फँसे नागरिकों की जान बचाने के लिए खुद को बलिदान कर दिया था। मगर, फिर भी इस्लामिक कट्टरपंथियों ने उनको श्रद्धांजलि देने के बजाय अपनी मानसिकता प्रदर्शित करते हुए उनसे संबंधित खबरों पर हाहा रिएक्ट किया। और परवेज के पोस्ट पर तो कट्टरपंथियों ने आतंकियों की मौत को मानवाधिकारों का उल्लंघन बताया और लिखा कि क्या सरकार से मानवाधिकार उल्लंघन पर बात पूछना गलत है?