मुंबई के चेम्बूर में फेस मास्क को लेकर विवाद इतना बढ़ गया कि दो व्यक्तियों को गंभीर रूप से घायल कर दिया गया। कीर्तिसिंह राणा और उनके भाई इन्दर सिंह अपने घर की ओर जा रहे थे, तभी 5 लोगों ने उन्हें टोका और उनके साथ मारपीट की। उन पर चाकू, तलवार और बाँस के डंडों से हमला बोल दिया गया। गंभीर रूप से घायल हुए दोनों भाइयों को अस्पताल ले जाया गया। पुलिस ने एक आरोपित 38 वर्षीय सलीम सिद्दीकी को गिरफ़्तार किया है।
ये घटना तिलक नगर थाना क्षेत्र की है। नागेवड़ी के लोखंडे रोड में दोनों भाइयों पर रविवार (अप्रैल 3, 2020) की रात सवा 8 बजे हमला किया गया। वहाँ के एक पब्लिक टॉयलेट में जब ये विवाद हुआ, तब कई लोग वहाँ मौजूद थे, जिन्होंने दोनों घायलों को अस्पताल पहुँचाया। ये विवाद मास्क पहनने को लेकर हुआ, जिसने बाद में तूल पकड़ लिया। उन दोनों की हत्या का प्रयास किया गया। 4 आरोपित अभी भी फरार हैं। पुलिस उनकी तलाश कर रही है।
दोनों घायलों का घाटकोपर स्थित राजावाड़ी हॉस्पिटल में इलाज चल रहा है। पुलिस ने बताया है कि इंदरसिंह की हालत ज्यादा गंभीर है। उन्हें सिर और पीठ पर गहरी चोटें आई हैं। पीड़ित कीर्तिसिंह के बयान के आधार पर पुलिस ने इंडियन पैनल कोड के तहत हत्या के प्रयास का मामला दर्ज किया। पुलिस ने पाया है कि रविवार की सुबह आरोपितों के साथ दोनों भाइयों की कहासुनी हो गई थी, जो शाम को मारपीट में बदल गया। नीचे ट्वीट में आप घायल को देख सकते हैं (चेतावनी: ये वीडियो खौफनाक है):
In Chembur, Mumbai, a Sikh man named Inder Singh was attacked by Salim Siddique & his aggressive friends just because Inder Singh asked them to wear a Mask in a public place This is highly condemnable! Inder Singh was right in telling him to wear a mask for everyone’s safety@ANIpic.twitter.com/RQ5PlEs608
सलीम अपने साथियों के साथ बिना फेस मास्क के खुला घूम रहा था। कोरोना वायरस संक्रमण के बीच सरकार ने फेस मास्क को अनिवार्य कर दिया है। पीड़ित दोनों भाइयों ने उन लोगों को मास्क पहनने को कहा, इससे सलीम और उसके दोस्त नाराज़ हो गए। शाम को उन्होंने दोनों भाइयों पर हमला बोल दिया। दिल्ली सिख गुरुद्वारा कमिटी के अध्यक्ष मनजिंदर सिंह सिरसा ने घायल का वीडियो शेयर कर सिखों पर हुए हमले की निंदा की है।
जम्मू-कश्मीर में पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती समेत 3 नेताओं की सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम (PSA) के तहत डिटेंशन अवधि 3 महीने बढ़ने के बाद मुफ्ती की बेटी इल्तिजा मुफ्ती तथा एक और पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह खासे परेशान दिखे। दोनों ने खुलकर सरकार के इस फैसले का सोशल मीडिया पर विरोध किया। हालाँकि, इस पहले कश्मीर के हंदवाड़ा में दो आतंकी हमले भी हुए लेकिन दोनों नेताओं ने इस पर चुप्पी साधे रखी और जिस सक्रियता से पूर्व मुख्यमंत्री के लिए संवेदना व्यक्त की, उस सक्रियता से वीरगति प्राप्त हुए जवानों को श्रद्धांजलि देना भूल गए। उमर अब्दुल्ला ने तो इस संबंध में 3 मई को एक ट्वीट किया भी, लेकिन महबूबा मुफ्ती के ट्विटर अकॉउंट, जिसे उनकी बेटी इल्तिजा चलाती हैं, वो बिलकुल शांत रहा।
हंदवाड़ा में आतंकियों ने 3 मई (रविवार) को पहला हमला किया। उस दिन देश के 5 जवान वीरगति को प्राप्त हुए। मगर, महबूबा के ट्विटर अकाउंट से उनकी बेटी इल्तिजा भारत में समुदाय विशेषपर हो रहे कथित अत्याचार पर यूएई का एक बयान शेयर करती रहीं। इसके अलावा उन्होंने लॉकडाउन के बीच कश्मीर में इंटरनेट की माँग और एक शव को स्ट्रेचर पर ले जाते बेबस परिवार का वीडियो शेयर किया। उन्होंने शाम तक लद्दाख बीजेपी अध्यक्ष के इस्तीफे की खबर पर भी अपनी टिप्पणी की। पर हंदवाड़ा पर बिलकुल चुप रहीं।
दूसरी ओर, उमर अब्दुल्ला ने मुफ्ती के डिटेंशन अवधि 3 महीने बढ़ने की खबर सुनने के बाद लगातार 3 ट्वीट किए। जिसमें उन्होंने इस फैसलों को क्रूर बताया और नरेंद्र मोदी पर आरोप लगाया कि उन्होंने जम्मू-कश्मीर को दशकों पीछे कर दिया है। मगर, उन्होंने भी इस बीच हंदवाड़ा घटना में आतंकवाद के ऊपर कुछ टिप्पणी करना जरूरी नहीं समझा।
हाँ, उमर अब्दुल्ला ने 3 मई को एक ट्वीट करके बलिदान हुए जवानों के घरवालों को सांत्वना जरूर दी। लेकिन आतंकियों और आतंकवाद पर उनकी शांति लोगों को उनके ख़िलाफ़ बोलने का मौक़ा देती रही। बता दें कि 3 मई से लेकर अब तक उमर अब्दुल्लाह लॉकडाउन, लॉकडाउन में शराब बिक्री, पीएम केयर फंड पर सवाल, महबूबा मुफ्ती से जुड़े कुछ ट्वीट कर चुके हैं। लेकिन किसी में भी कश्मीर में पसरे आंतकवाद पर कोई बात नहीं की है।
Sorry to hear about the army & police officers & the jawan who laid down their lives in the line of duty in Handwara this morning. May their souls rest in peace & may their families & colleagues find strength at this difficult time.
गौरतलब है कि हंदवाड़ा में बीते दिनों 48 घंटों में 2 बार हमले हुए थे। पहला हमला रविवार 3 मई को हुआ था। जिसमें कर्नल-मेजर समेत 5 जवान वीरगति को प्राप्त हुए थे और 2 आतंकी मार गिराए गए थे। इसके बाद सोमवार को फिर हमला हुआ था। इसमें सीआरपीएफ के 3 जवान बलिदान हो गए थे जबकि 1 आतंकी मार गिराया गया था। दूसरा हमला सोमवार को उस समय हुआ था जब 4 मई की शाम काजियाबाद में सीआरपीएफ जवान पट्रोलिंग ड्यूटी पर जा रहे थे, तभी उन पर आतंकियों ने फायरिंग की थी।
योगेंद्र यादव ने दावा किया है कि सरकार ने ‘चुपचाप’ सांसदों के निर्वाचन क्षेत्र भत्ते (Salary Allowance) में बढ़ोतरी कर दी है। ‘स्वराज इंडिया’ के संस्थापक ने आदेश की प्रति शेयर करते हुए ऐसा दावा किया। उन्होंने लिखा कि जब सरकार को मजदूरों के लिए मुफ्त में ट्रेनें चलानी चाहिए थी, उसने ‘चुपके से’ सांसदों को मिलने वाले निर्वाचन क्षेत्र भत्ते को बढ़ा कर 49,000 रुपए कर दिया है। ये आदेश अप्रैल 7, 2020 को आया।
हालाँकि, इस दौरान योगेंद्र यादव ये बताना भूल गए कि सांसदों के भत्ते को कितने रुपए से बढ़ा कर 49,000 रुपए किया गया है। अगर वो ये बात बता देते तो उनकी पोल खुल जाती। इसीलिए, उन्होंने आदेश की एक कॉपी शेयर कर दी और लोगों को भ्रम की स्थिति में डालने के उद्देश्य से झूठ फैलाया। योगेंद्र यादव इससे पहले भी सीएए और एनआरसी को लेकर ऐसी हरकतें कर चुके हैं। अजीबोगरीब पोल प्रेडिक्शन तो उनका पेशा ही है, जो सच ही नहीं होता।
अब आते है सच्चाई पर। दरअसल, सांसदों को पहले निर्वाचन क्षेत्र भत्ता (Salary Allowance) के रूप में 70,000 रुपए मिलते थे, जिसमें 30% की कटौती की गई। कटौती के बाद उनका भत्ता 21,000 रुपए कम हो गया और अब ये 49,000 रुपए प्रति महीने आएगा। संसद की जॉइंट कमिटी ने ये सिफारिश की थी, जिसे राज्यसभा अध्यक्ष वेंकैया नायडू और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने स्वीकार कर लिया था।
इस आदेश को ‘Members of Parliament (Constituency Allowance) Amendment Rules, 2020’ नाम दिया गया है। अब आते हैं इससे पहले के भी एक फ़ैसले पर। कंस्टिटूएंसी अलाउंस से पहले MPLADS फण्ड (सांसद निधि) को भी सस्पेंड कर दिया गया था। अगले दो साल तक ये सस्पेंड रहेगा। यानी 2020-21 और 2021-22 में सांसदों को सांसद निधि की रकम नहीं दी जाएगी। ये रकम कोविड-19 से लड़ने में ख़र्च होगी। कई लोगों द्वारा ध्यान दिलाए जाने के बावजूद योगेंद्र यादव ने अपना ट्वीट डिलीट नहीं किया।
In the meanwhile, instead of #FreeTrains4Workers the government has quietly increased the constituency allowance for each MP to ₹ 49,000 Order issued on 7th April pic.twitter.com/PJ9ogU71ow
इससे सरकार के पास 7900 करोड़ रुपए बचेंगे, जिसे कंसोलिडेटेड फंड ऑफ इंडिया में डाला जाएगा। ये रकम कोरोना आपदा के बीच जनता की भलाई के लिए ख़र्च होगी। राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और सभी राज्यों के राज्यपालों से स्वेच्छा से ‘पे कट’ का फ़ैसला लिया और इसे सामाजिक दायित्व बताया। एक ख़बर के अनुसार, सरकार हर महीने एक सांसद पर औसतन 2.7 लाख रुपए ख़र्च करती है। संसद में फिलहाल कुल 795 सदस्य हैं, जिनमें से 545 लोकसभा में हैं और 250 राज्यसभा में।
फ़रवरी 2020 में बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ एक इवेंट में मंच साझा करते हुए मंच से ही योगेंद्र यादव ने यह कह सनसनी फैला दी थी कि, “भारत हिंदी, हिन्दू , हिन्दुस्तान से नहीं बनेगा, हिंदी हिन्दू हिन्दुस्तान देश को तोड़ देगा… आज यह करने की कोशिश हो रही है।” राम मंदिर पर फ़ैसले को लेकर उन्होंने कहा था कि राम मंदिर कुछ अन्य महत्वपूर्ण प्रस्तावों के साथ भारत में सेक्युलर पॉलिटिक्स की परीक्षा होगा।
गुरुग्राम की DLF फेज 5 के कार्ल्ट्न एस्टेट (DLF Carlton Estate) सोसायटी में 17 साल के एक नाबालिग ने 11वीं मंजिल से कूदकर कल आत्महत्या कर ली। ये मामला सेक्टर 53 थाना क्षेत्र का है। मृतक शहर के नामी स्कूल में 12वीं कक्षा का छात्र था। पुलिस संदिग्ध परिस्थितियों को देखते हुए इस मामले में जाँच कर रही है। पुलिस इस बात का भी पता लगा रही है कि कहीं बच्चे का कनेक्शन बॉयज लॉकर रूम (Boys Locker Room/Bois Locker Room) नाम के इंस्टाग्राम ग्रुप से तो नहीं था, जिसका अभी हाल में खुलासा हुआ।
जानकारी के मुताबिक दिल्ली की साइबर सेल इस मामले की पड़ताल में लड़के का फोन जब्त कर लिया है और उसे फॉरेंसिक जाँच के लिए लैब भी भेज दिया है। साइबर सेल लड़के के सभी सोशल मीडिया अकॉउंट की भी छानबीन कर रही है।
बताया जा रहा है कि लड़के ने आत्महत्या करने से पहले कोई सुसाइड नोट भी नहीं छोड़ा और लड़के के माता-पिता ने भी कहा कि इसमें किसी का कोई दोष नहीं है। मगर, फिर भी मामले की सच्चाई जानने के लिए पुलिस हर एंगल से जाँच कर रही है। फिलहाल पुलिस ने प्राथमिक कार्रवाई के बाद लड़के के शव को परिजनों को भी सौंप दिया है।
Bois Locker Room: Class 12 boy in Gurugram commits suicide, police probe his alleged connection to controversial Instagram group https://t.co/uyEdf3zQSI
गौरतलब है कि कल दिल्ली पुलिस की साइबर सेल ने इंस्टाग्राम ग्रुप बॉयज लॉकर रूम (Boys Locker Room/Bois Locker Room) पर अश्लील चैट करने के मामले में 15 साल के नाबालिग लड़के को पकड़ा था। नाबालिग के अलावा इस ग्रुप केस में 20 लड़कों के और शामिल होने का मालूम चला था। पुलिस ने पहले सोशल मीडिया पर रजिस्टर फोन नंबर से लड़के के घर का पता लगाया था। फिर उसे उसके घर जाकर पकड़ा था। इस पूरे मामले में पुलिस को साउथ दिल्ली के चार स्कूल और नोएडा के एक स्कूल के बारे में पता लगा था।
बता दें अभी हाल ही में इस ग्रुप का खुलासा एक लड़की की मदद से हाल में हुआ था, जिसने सोशल मीडिया पर इस ग्रुप के कुछ स्क्रीनशॉट्स को शेयर करते हुए लिखा, “दक्षिण दिल्ली के 17-18 साल की उम्र के लड़कों का एक ग्रुप है, जिसका नाम ‘ब्वॉयज लॉकर रूम’ (Boys Locker Room/Bois Locker Room) है, जहाँ कम उम्र की लड़कियों की तस्वीरों के साथ छेड़छाड़ कर आपत्तिजनक बनाया जा रहा था। मेरे स्कूल के दो लड़के इसका हिस्सा हैं।” लड़की ने इस दौरान जिन तस्वीरों को शेयर किया था, उन पर लिखे कमेंट देखकर ये अंदाजा लगाया जा सकता था कि ग्रुप के सदस्य गैंगरेप की योजना बना रहे थे और उस पर चर्चा कर रहे थे।
ओडिशा के सुंदरगढ़ जिले के नाला रोड में सोमवार (अप्रैल 4, 2020) को स्वास्थ्यकर्मियों के साथ दुर्व्यवहार किया गया। वहाँ कोरोना पॉजिटिव के कांटेक्ट में आए लोगों को लेने जैसे ही स्वास्थ्य विभाग की गाड़ी पहुँची, पत्थरबाजी शुरू हो गई।
नाला रोड में एक 29 वर्षीय महिला को कोरोना पॉजिटिव पाया गया था। उसे राउरकेला स्थित हाइटेक कोविड हॉस्पिटल में भर्ती करने के बाद स्वास्थ्यकर्मी उसके सम्पर्क में आने वालों को क्वारंटाइन करने के लिए पहुँचे थे।
टीम के पहुँचते ही स्थानीय लोगों ने एंट्री और एग्जिट गेट बंद कर पत्थरबाजी शुरू कर दी। इसके बाद पुलिस को एरिया के प्रबुद्धजनों के साथ बैठक करनी पड़ी, तब जाकर मामला शांत हुआ। कहा जा रहा है कि नाला रोड दूसरे समुदाय के प्रभाव वाला इलाक़ा है। इससे पहले इंदौर और भोपाल सहित कई स्थानों से पुलिस और स्वाथ्यकर्मियों पर हमले की ख़बर आ चुकी है। अधिकतर समुदाय विशेष के प्रभाव वाले इलाक़ों में ऐसा हुआ।
केंद्र सरकार द्वारा कड़े नियम बनाए जाने के बावजूद स्वास्थ्यकर्मियों पर हमले रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं। राउरकेला के कन्टेनमेंट एरिया में 50 आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को ब्लड सैम्पल इकठ्ठा करने के लिए लगाया गया था। उन्होंने म्युनिसिपल कमिश्नर के सामने धरना दिया है। उनकी माँग है कि उन्हें उचित सुरक्षा-व्यवस्था मुहैया कराया जाए। सैम्पल कलेक्शन के दौरान उन पर थूक फेंके जा रहे हैं और केरोसिन डाल कर जलाने की कोशिश भी हो रही है।
जब पुलिस और म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन ने उन्हें आश्वासन दिया कि उन्हें उचित सुरक्षा-व्यवस्था दी जाएगी, तब जाकर उन्होंने अपना धरना ख़त्म किया। सैम्पल कलेक्शन के दौरान इन महिला स्वास्थ्यकर्मियों के साथ गाली-गलौज करने और भद्दी भाषा का प्रयोग करने की भी ख़बर है। ओडिशा सरकार के प्रधान सचिव ने सभी जिलों के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को लिखे पत्र में अंदेशा जताया है कि महिला स्वास्थ्यकर्मी हमलों, गालियों और दुर्व्यवहार का शिकार हो सकती हैं।
उन्होंने आशंका जताई है कि अगर ऐसी स्थिति आती है तो राज्य में बड़े स्तर पर धरना-प्रदर्शन चालू हो जाएगा, जिससे क़ानून-व्यवस्था की समस्याएँ उपज सकती हैं। ओडिशा सरकार ने सभी जिलों की पुलिस को इस आलोक में अलर्ट रहने की सलाह दी है। ऐसी घटनाओं को लेकर सूचना इकट्ठी की जा रही है। अधिकारियों से कहा गया है कि वो सतर्क रहें, ताकि आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं पर हमले रोके जा सकें, जिससे वो नाराज़ न हों।
प्रधान सचिव ने सभी जिलों की पुलिस को लिखा पत्र
दरअसल, राउरकेला के आशियाँ कॉलनी में मजहब विशेष के दो लोग कोरोना पॉजिटिव पाए गए थे। प्रधान सच्ची ने कहा है कि इसके बाद से ही सुदूर आदिवासियों, ईसाइयों और मजहब वालों की बहुलता और प्रभाव वाले इलाक़ों में अफवाहों का बाजार गर्म हो गया है। ट्राइबल समुदायों के बीच ये बात फ़ैल गई है कि लोग अपनी ट्रैवल हिस्ट्री छिपा रहे हैं और मरकज़ के दौरे को लेकर सरकार को सही जानकारी नहीं दे रहे।
अप्रैल 13, 2020 की रात ईसाई और आदिवासी समुदाय के लोग मशाल और टॉर्च लेकर निकले थे, ताकि गाँव में छिपे लोगों को ढूँढ़ा जा सके। उनका कहना था कि दिल्ली स्थित निजामुद्दीन के मरकज से आए तबलीगी जमात के लोग गाँव में छिपे हुए हैं, जिससे कोरोना फैलने का डर है। प्रधान सचिव का कहना है कि उन इलाक़ों में मजहब विशेष के लोगों के भीतर डर बैठ गया है, इसलिए उन्होंने पुलिस गश्ती बढ़ाने की माँग की है।
ओडिशा सरकार की ओर से पुलिस को भेजे गए पत्र में कहा गया है कि ईसाई और हिन्दू समुदाय दूसरे खास मजहब का पूर्ण बहिष्कार कर रहे हैं। वे न तो उनसे कुछ ख़रीद रहे हैं और न ही उन्हें कुछ बेच रहे हैं। ये बात भी फैली हुई है कि कुछ लोग सब्जियों और फलों पर जान-बूझकर थूक रहे हैं और फिर बेच रहे हैं। उनके बीच ये बात भी फ़ैल गई है कि गाँव के कुओं और लोगों के घर के सामने भी लोग थूक कर भाग जा रहे हैं।
मजहब विशेष के बहिष्कार पर उतरे आदिवासी और ईसाई
ये घटनाएँ राउरकेला और सुंदरगढ़ के इलाक़ों में हो रही है। कहा गया है कि स्थानीय पुलिस इन गतिविधियों से वाकिफ है और इलाक़े में पुलिस पेट्रोलिंग बढ़ा दी गई है। इस पत्र में कहा गया है कि ख़ास मजहब वालों के मन में ये डर बैठ गया है कि कोरोना के प्रसार के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराया जा रहा है और इसलिए क़ानून-व्यवस्था मुस्तैद रखने के लिए पुलिस को सतर्क रहना होगा।
आज हम बात करेंगे कि मुगलों पर हिंदुओं ने किस-किस तरह के अत्याचार किए। जैसे कि आपको शायद ही पता हो कि रामचरितमानस के असली लेखक कौन हैं। गंगा का बाबर से क्या कनेक्शन है? या फिर गाय भारत में कैसे आई? जानिए महान मुग़लों के बारे में।
1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भारतीय सेना के 4 जाबाँज सैनिकों को सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से नवाजा गया। जिनमें थे अल्बर्ट एक्का (Albert Ekka), निर्मल जीत सिंह सेखों (Nirmal Jit Singh Sekhon), पूना हॉर्स के सेकेण्ड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल (Arun Khetarpal), जिन्होंने अपने प्राण गँवा कर सबसे कम उम्र के परमवीर चक्र विजेता का सम्मान प्राप्त किया, और चौथे थे मेजर होशियार सिंह दहिया (Hoshiar Singh Dahiya)
1971 की भारत-पाकिस्तान की जंग भारतीय सैनिकों की वीरता और पराक्रम का एक शानदार उदाहरण है। इस जंग से जुड़े जवानों के बहादुरी के कई किस्से हैं। मेजर होशियार सिंह की वीरता की कहानी इन्हीं में से एक है। बसंतर की लड़ाई में घायल होने के बाद भी उन्होंने अपनी टुकड़ी का नेतृत्व किया और पाकिस्तानी सेना को वापस भागने पर मजबूर कर दिया था।
बसंतर की लड़ाई
भारत-पाकिस्तान युद्ध सन 1971 के दौरान 15 दिसम्बर को गोलन्दाज फौज की तीसरी बटालियन, जिसका नेतृत्व मेजर होशियार सिंह दहिया कर रहे थे, को आदेश दिया गया कि वह शकरगढ़ सेक्टर में बसन्तार नदी के पार अपनी पोजीशन जमा लें। वह पाकिस्तान का अति सुरक्षित सैनिक ठिकाना था और उसमें पाकिस्तानी सैनिकों की संख्या भी अधिक थी। यानी, दुश्मन यहाँ अधिक मजबूत स्थिति में था।
फिर भी आदेश मिलते ही मेजर होशियार सिंह की बटालियन दुश्मनों की सेना पर टूट पड़ी। लेकिन मीडियम मशीनगन की ताबड़तोड़ गोलीबारी और क्रॉस फायरिंग के कारण इनकी बटालियन बीच में ही फँस गई। फिर भी मेजर होशियार सिंह दहिया विचलित नहीं हुए। उन्होंने बटालियन का नेतृत्व किया और संघर्ष करते हुए आगे बढ़ते ही गए। आख़िरकार उन्होंने उस स्थान पर कब्जा कर लिया, जिसके लिए उन्हें आदेश मिला था।
लेकिन दूसरे ही दिन, यानी 16 दिसम्बर को अधिक संख्या में पाकिस्तानी सैनिक आ धमके और लगातार तीन भीषण आक्रमण किए। मेजर होशियार सिंह दहिया और उनके सैनिकों को फिर कठोर अग्नि परीक्षा देनी पड़ी। मेजर होशियार सिंह एक खाई से दूसरी खाई में बराबर जाते रहे और सैनिकों का हौसला बढ़ाते रहे।
इस तरह उन्होंने पाकिस्तान के सभी आक्रमण विफल कर दिए। अगले दिन, यानी 17 दिसम्बर को पाकिस्तान ने संख्या में अधिक टैंकों की सहायता से फिर से धावा बोल दिया, फिर भी होशियार सिंह मजबूती के साथ डटे रहे। हालाँकि, वे घायल हो चुके थे फिर भी अपने सैनिकों के बीच जाकर उन्हें प्रोत्साहित करते रहे।
इस दौड़-भाग में दुश्मनों की गोलियों की बौछार से वह और अधिक घायल हो गए। फिर भी उन्होंने अपनी जान की चिन्ता नहीं की और अपने साथियों का मनोबल बढ़ाते रहे। घमासान युद्ध चल ही रहा था कि अचानक एक पाकिस्तानी गोला उनकी मीडियम मशीनगन की एक चौकी के समीप आ गिरा।
इस बीच अनेक सैनिक घायल हो गए, मशीनगन बन्द हो गई। जब एक भारतीय मशीनगन का गनर वीरगति को प्राप्त हुआ तो उन्होंने खुद ही उसे सँभाल लिया। उस दिन दुश्मन के 89 जवान मारे गए, जिनमें उनका कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल मोहम्मद अकरम राजा भी शामिल था। मशीनगन चलाना बहुत ही आवश्यक था, इस बात को समझकर मेजर होशियार सिंह ने अपने घावों और दर्द की चिन्ता नहीं की और तुरन्त उस चौकी पर पहुँचे और स्वयं मशीनगन चलानी शुरू कर दी।
सैन्य नायक फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ के साथ मेजर होशियार सिंह दहिया
उन्होंने कई दुश्मन मार गिराए। इसी पराक्रम के कारण उस दिन भारत को विजय मिली। इसी युद्ध विराम के बाद बांग्लादेश के उदय पर बातचीत शुरू हुई। मेजर होशियार सिंह दर्द से कराह रहे थे, उनका काफी रक्त बह चुका था, फिर भी वे मोर्चा छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे। वे वहाँ तब तक डटे रहे जब तक कि युद्धविराम की घोषणा नहीं कर दी गई।
इस लड़ाई के दौरान सेना की समृद्ध परम्पराओं के अनुकूल उत्कृष्ट वीरता, असाधारण युद्ध कौशल और कुशल नेतृत्व का प्रदर्शन करने वाले इस वीर योद्धा का जन्म मई 05, 1936 को हरियाणा के रोहतक जिले के सिसान गाँव में हुआ था।
मेजर होशियार सिंह दहिया वर्ष 1957 में 2 जाट रेजीमेन्ट में भर्ती हुए थे। इन्हें जून 1963 में 3 ग्रेनेडियर्स में कमीशन प्राप्त हुआ। होशियार सिंह लद्दाख तथा राष्ट्रपति भवन में भी सेवारत रहे। मेजर होशियार सिंह ने पूरे समर्पण के साथ देश की सेवा की और ‘ब्रिगेडियर’ के रूप में सेना से रिटायर हुए। 1969 में संयुक्त राष्ट्र मिशन में भाग लेने के लिए ये अपनी यूनिट के साथ कांगो देश गए। मेजर होशियार सिंह दहिया का देहावसान दिसंबर 06, 1998 को हुआ।
खाड़ी देशों (Gulf Countries) में अब तक 10 हजार से ज्यादा भारतीय कोरोना वायरस से संक्रमित पाए गए हैं। जबकि अब तक 84 भारतीयों की मौत हो चुकी है। इसी के साथ अब दुनियाभर में कोरोना वायरस से संक्रमितों की कुल संख्या बढ़कर 36,75,800 हो चुकी है।
मंगलवार (मई 05, 2020) को भारतीय गृह मंत्रालय ने कहा कि विदेशों में फँसे हुए भारतियों को लाने की प्रक्रिया 7 मई से शुरू की जाएगी। रिपोर्ट्स के अनुसार, पहले सप्ताह 7 मई से 13 मई तक विभिन्न देशों में फँसे हुए भारतियों को लाने के लिए इस ऑपरेशन में 64 उड़ानों का संचालन किया जाएगा। सरकार की प्रथम प्राथमिकता खाड़ी देशों में फँसे लोगों को वापस लाने की है।
अभी तक 3 लाख से अधिक लोग सिर्फ गल्फ देशों से ही वापस आने के फॉर्म भर चुके हैं।
भारत कोरोनो वायरस महामारी से फँसे हजारों प्रवासी मजदूरों को वापस लाने के लिए खाड़ी देशों के साथ काम कर रहा है। इसी के साथ यह आपातकाल के दौरान लोगों को स्वदेश लाने का सबसे बड़ा अभियान बन सकता है।
विदेशों में फँसे अपने नागरिकों को भारत लाने के लिए कुछ ही दिनों में, भारत ने सैन्य जहाजों और अपनी राष्ट्रीय एयरलाइन की तैनाती शुरू करने की योजना बनाई है। घर वापसी के पहले चरण में भारत जून के मध्य तक 1,92,000 भारतियों को घर ला सकती है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, एक भारतीय अधिकारी का कहना है कि लोगों को नौकरी छूटने, काम की वीज़ा अवधि समाप्त होने, मेडिकल की आपात स्थिति, फँसे हुए छात्रों और पर्यटकों को उनकी परिस्थितियों के अनुसार प्राथमिकता दी जाएगी।
भारत लौटने पर यात्रियों को आरोग्य सेतु ऐप पर रजिस्टर भी करना होगा। लौटने के बाद सभी की मेडिकल जाँच की जाएगी और जाँच के बाद संबंधित राज्य सरकार उन्हें अस्पताल में या क्वारंटाइन में दो हफ्ते के लिए रखेगी।
उड़ान भरने से पहले विदेशों में फँसे हुए भारतीयों की मेडिकल स्क्रीनिंग की जाएगी और उन्हीं लोगों को यात्रा की अनुमति दी जाएगी, जिनकी जाँच निगेटिव आएगी। यात्रा के दौरान इन सभी यात्रियों को स्वास्थ्य मंत्रालय और नागरिक उड्डयन मंत्रालय द्वारा जारी किए गए सभी प्रोटोकॉल का पालन करना होगा।
जम्मू-कश्मीर को निशाना बनाने वाले आतंकी समूह जैश-ए-मोहम्मद ने अफगानिस्तान में अपने प्रशिक्षण शिविरों में 400 आतंकवादियों को तैयार किया है, जिन्हें कश्मीर घाटी में भेजे जाने से पहले तालिबान यूनिट्स के साथ तैनात किया गया है।
हिन्दुस्तान टाइम्स ने बताया कि पिछले महीने 12 अप्रैल को जब अफगानिस्तान फोर्स आतंक रोधी मिशन पर थी, तो गिरफ्तार किए गए आतंकियों से प्रारंभिक पूछताछ में उन्हें एक आतंकी कैंप के बारे में पता चला था। हालाँकि, भारतीय सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि वहाँ पर आधा दर्जन से अधिक आतंकी कैंप थे।
दिल्ली और काबुल में आतंकवाद विरोधी अधिकारियों ने बताया कि तालिबान के अफ़गानिस्तान सुलह ज़ाल्मे ख़ालिज़ाद के लिए अमेरिकी विशेष प्रतिनिधि के साथ 29 फरवरी के समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद जैश-ए-मोहम्मद ने इन शिविरों में 400 लड़ाकों को तैयार किया था।
काबुल में एक आतंक रोधी अधिकारी ने इस बात की पुष्टि करते हुए कहा, “पूर्वी अफगानिस्तान में खोस्त से जलालाबाद के बीच और कंधार प्रांत में पाकिस्तान की सीमा से सटे इलाकों में भी जैश कैडर को तालिबान इकाइयों के साथ तैनात किया गया है।”
अधिकारियों ने कहा कि तालिबान और जैश-ए-मोहम्मद के बीच आपसी तालमेल है। कुछ खुफिया रिपोर्टों में कहा गया है कि लश्कर-ए-तैयबा ने जैश शिविरों में प्रशिक्षण के लिए अपने कैडर भी भेजे हैं। जिन्हें पाकिस्तान की इंटर सर्विसेज इंटेलिजेंस द्वारा सहायता दिया जा रहा है।
अफगान फोर्स द्वारा गिरफ्तार किए गए जैश के एक ऑपरेटिव्स में से एक जरार ने पूछताछ के दौरान बताया कि फोर्स द्वारा तहस-नहस किए गए ट्रेनिंग बेस को ‘पाकिस्तान के सैन्य कर्मियों द्वारा प्रशिक्षित, सुसज्जित और समर्थित बनाया जा रहा था।’ उनमें से कई ने बताया कि पाकिस्तानी सेना की तरफ से उन्हें हर तरह की मदद की जाती है, ताकि वो बच सके। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद के निवासी के रूप में पहचाने जाने वाले ज़ेरार उनमें से एक था। उसे 15 अप्रैल को गिरफ्तार किया गया था।
मौलाना मसूद अजहर द्वारा स्थापित आतंकवादी समूह को उसके छोटे भाई मुफ्ती अब्दुल रऊफ असगर द्वारा चलाया जा रहा है। काबुल में राजनयिकों का कहना है कि मसूद अजहर के बड़े भाई, इब्राहिम अजहर को मध्य अफगानिस्तान में गजनी शहर में देखा गया है, संभवत: तालिबान के साथ संबंधों को गहरा करने के प्रयास के संदर्भ में वो वहाँ गए हों।
गौरतलब है कि पिछले दिनों NIA ने आतंकी और जैश-ए-मोहम्मद के ओवर ग्राउंड वर्कर शाकिर बशीर मागरे को कश्मीर से गिरफ्तार किया था। शाकिर ने पुलवामा के आत्मघाती हमलावर आदिल अहमद डार को शरण और हमले के लिए अन्य सहायता उपलब्ध कराई थी।
आदिल अहमद डार ही वो आतंकी था जो कार में सवार होकर सुरक्षाबल के काफिले में जा घुसा था। शाकिर ने खुलासा किया कि उसने आदिल अहमद डार और एक और अन्य सहयोगी मोहम्मद उमर फारूक को साल 2018 के आखिरी से फरवरी में किए हमले तक अपने घर में शरण दी थी। शाकिर ने कार में रखे विस्फोटक को तैयार किया। लेथपोरा स्थित दुकान से वह सीआरपीएफ काफिले की मूवमेंट पर नजर रखता था।
कोरोना वायरस महामारी के बीच भारत में इन दिनों राजस्थान पश्चिम बंगाल महाराष्ट्र जैसे विभिन्न राज्यों में फँसे श्रमिकों को घर पहुँचाए जाने को लेकर राजनीति गर्माई हुई है। बता दें कि कोरोना के मद्देनजर देश में लॉकडाउन जारी है। जिसकी वजह से आवागमन के सारे साधन बंद हैं और इसीलिए प्रवासी मजदूर अन्य राज्यों में फँस गए हैं। फँसे हुए इन प्रवासी कामगारों ने कई बार, कई राज्यों में सड़कों पर उतरकर यह माँग की थी कि सरकार उनके घर वापस भेजने की सुविधा प्रदान करे। इसके बाद गंभीर स्थिति को देखते हुए, केंद्र सरकार ने ’श्रमिक’ ट्रेनें शुरू कीं। ये विशेष ट्रेनें हैं, जो कोरोना वायरस लॉकडाउन के दौरान प्रवासी श्रमिकों को उनके गृह राज्यों में वापस पहुँचा रही है।
श्रमिक ट्रेन की शुरुआत की घोषणा के साथ ही विवाद शुरू हो गया और इस विवाद को शुरू किया कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने। सोनिया गाँधी ने दावा किया कि केंद्र सरकार प्रवासियों को घर पहुँचाने के लिए पैसे ले रही है। कई मीडिया हाउस ने भी इस भी इस झूठी और गलत खबर को खूब भुनाया।
दरअसल, मजदूरों को घर भेजने के लिए खर्च होने वाले लागत का 85% केंद्र सरकार (रेलवे) द्वारा वहन किया जा रहा है और 15% राज्य सरकार द्वारा वहन किया जाता है। ये राज्य सरकार पर निर्भर करता है कि वो ये पैसे अपने सरकारी फंड से दे या फिर किसी NGO या किसी अन्य माध्यम से एकत्र कर करती है। केंद्र सरकार और रेलवे यात्रियों से सीधा शुल्क नहीं ले रही है और उस 15% का भुगतान राज्य सरकार पर छोड़ दिया गया है।
फँसे हुए प्रवासी कामगारों से वसूले जा रहे धन की खबर (हालाँकि, यह उनका खुद का ही मनगढ़ंच झूठ था) की वजह से कॉन्ग्रेस काफी नाराज थी। किसी ने उम्मीद की होगी कि कॉन्ग्रेस शासित राज्य यह सुनिश्चित करेंगे कि 15% राज्य के खजाने से लिया गया है न कि प्रवासी कामगारों से।
हालाँकि, ऐसा नहीं हुआ।
कई मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि अधिकांश राज्यों से राज्य सरकारों ने सरकारी फंड से प्रवासी मजदूरों के किराए का भुगतान किया है, जबकि महाराष्ट्र, केरल और राजस्थान की सरकार ने प्रवासी मजदूरों को उनके पैतृक राज्य पहुँचाने के लिए उनसे किराया वसूला है।
पीटीआई ने बताया कि महाराष्ट्र के राज्य मंत्री नितिन राउत ने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को पत्र लिखकर राज्य से जाने वाले प्रवासियों की यात्रा लागत वहन करने का आग्रह किया है। उन्होंने रविवार (मई 3, 2020) को रेल मंत्री पीयूष गोयल को पत्र लिखकर अनुरोध किया था कि प्रवासियों के परिवहन का खर्च रेलवे वहन करे। इसके अलावा, टाइम्स नाउ की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि महाराष्ट्र के साथ ही केरल और राजस्थान ने भी प्रवासियों को रेलवे टिकट के लिए भुगतान करने के लिए कहा है।
पिछली घटनाओं को याद करें तो महाराष्ट्र और राजस्थान नें प्रवासी मजदूरों ने घर वापसी की माँग करते हुए विरोध प्रदर्शन किया था। महाराष्ट्र और राजस्थान के साथ ही कई अन्य राज्यों में भी कई विरोध प्रदर्शन हुए। जिसमें प्रवासी मजदूरों ने घरवापसी की माँग की थी।
न्यू इंडियन एक्सप्रेस ने आज खबर प्रकाशित की
आईआईटी-हैदराबाद में प्रवासी मजदूरों के घर वापस जाने के लिए विरोध करने के कुछ दिनों बाद ही कई प्रवासी मजदूरों ने शनिवार को टेलापुर में एक प्रसिद्ध रियल एस्टेट डेवलपर के निर्माण स्थल पर विरोध प्रदर्शन किया। इनकी भी घर वापस भेजने की ही माँग थी। वे सभी बस या ट्रेन से अपने घर वापस जाना चाहते थे। इनकी संख्या तकरीबन 3,000 थी। पुलिस अधिकारियों ने इन्हें शांत करवाने के लिए कार्रवाई की। इनमें पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, राजस्थान, मध्य प्रदेश और ओडिशा के प्रवासी शामिल थे।
पिछले तीन दिनों में, गुजरात सरकार ने 4,600 से अधिक प्रवासी श्रमिकों को उनके मूल राज्यों मध्य प्रदेश और राजस्थान में वापस जाने की सुविधा प्रदान की।
टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2.84 लाख प्रवासी श्रमिकों ने विभिन्न राज्यों से वापस अपने घर राजस्थान जाने के लिए रजिस्ट्रेशन करवाया है। बंगाल के भी हजारों मजदूर देश के विभिन्न हिस्सों में फँसे हुए हैं, वो अपने घर वापस जाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। श्रमिक ट्रेन के चलने से उनके अंदर उम्मीद की एक किरण जगी है।
लेकिन, हजारों और लाखों श्रमिकों के अपने गृह राज्यों और केंद्र सरकार द्वारा श्रमजीवी ट्रेनों को चलाने के लिए इंतजार करने के साथ, केंद्रीय रेलवे से सामने आने वाली संख्या में विरोधाभास प्रतीत होता है।
Number of Shramik Trains that have run so far from and to various states (A list of destination states)
Number of Shramik Trains that have run so far from and to various states (A list of originating states)
आज सुबह 9 बजे तक केंद्र सरकार और रेलवे द्वारा 69 ट्रेनों का संचालन किया गया है। हालाँकि, पाया गया कि राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे राज्यों से जाने वाली ट्रेनों की संख्या इन राज्यों में आने वाली ट्रेनों की संख्या से कहीं अधिक है (जो दूसरे राज्यों से अपने प्रवासी मजदूरों को ले गए)। पश्चिम बंगाल के लिए, केवल दो ट्रेनों का संचालन किया गया है, जो राजस्थान जैसे अन्य राज्यों से अपने प्रवासी मजदूरों को वापस अपने राज्य में ले गए हैं।
इससे स्पष्ट निष्कर्ष यह निकला है कि महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे राज्य दूसरे राज्यों में फँसे अपने प्रवासी मजदूरों को स्वीकार करने की तुलना में अपने राज्य में फँसे अन्य राज्य के प्रवासी कामगारों को उनके गृह राज्य भेज रहा है।
रेलवे मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, पश्चिम बंगाल, राजस्थान और महाराष्ट्र विभिन्न राज्यों से अपने प्रवासियों को वापस ले जाने वाली ट्रेनों की अनुमति नहीं दे रहे हैं।
आइए हम विश्लेषण करें कि क्या हो रहा है विभिन्न राज्यों में…
राजस्थान और प्रवासी श्रमिक
26 अप्रैल को, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा कि राजस्थान में फँसे अन्य राज्यों के प्रवासी श्रमिकों को उनके गृह राज्यों में वापस जाने की अनुमति दी जाएगी। हालाँकि राजस्थान के प्रवासी मजदूरों के अन्य राज्यों से वापस आने की बात करते हुए उन्होंने कहा था कि उन्हें ‘चरणबद्ध तरीके’ से वापस आने की अनुमति दी जाएगी। उसी हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया था कि “उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और हरियाणा ने पहले ही अन्य राज्यों में फँसे प्रवासी मजदूरों को वापस लाने के लिए प्रक्रिया शुरू कर दी है, क्योंकि कोरोना वायरस महामारी के प्रसार को रोकने के लिए 14 अप्रैल तक लागू किए गए लॉकडाउन को 3 मई तक बढ़ा दिया गया था।”
इस तरह से, जब उत्तर प्रदेश, हरियाणा और बिहार अपने प्रवासियों को वापस लेने के लिए तैयार हैं, राजस्थान इस बात पर जोर दे रहा है कि वे अपने राज्य के मजदूरों को “चरणबद्ध” तरीके से स्वीकार करेंगे। दिलचस्प बाय यह है कि अभी सिर्फ 3 ट्रेनें ही राजस्थान के मजदूरों को उनके राज्य पहुँचाने के लिए चल रही है। दूसरी ओर, प्रवासी मजदूरों को अन्य घरेलू राज्यों में ले जाने वाली 10 ट्रेनें पहले ही जा चुकी हैं और 4 लाइन में हैं।
दरअसल 2.84 लाख प्रवासी श्रमिक अपने दूसरे राज्यों से अपने गृह राज्य राजस्थान वापस जाने का इंतजार कर रहे हैं, मगर राजस्थान सरकार पूरी तरह से अन्य राज्यों के मजदूरों को राजस्थान से वापस भेजने पर ध्यान केंद्रित कर रही है, और अन्य राज्यों के अपने मजदूरों को स्वीकार नहीं कर रही है। जबकि राजस्थान सरकार यह समझ रही है कि राज्य छोड़ने वाले प्रवासी कामगारों की लागत वह वहन करेगी, उसने अपने ही मजदूरों को वापस लेने के बारे में कुछ नहीं कहा है, जो विभिन्न राज्यों में फँसे हुए हैं।
इससे संभावित रूप से अन्य राज्यों में संकट पैदा हो सकता है जो अपने स्वयं के प्रवासियों को स्वीकार कर रहे हैं और राजस्थान जैसे राज्यों के प्रवासियों को भी भेज रहे हैं जो अपने ही राज्य के लोगों को राज्य में वापस लाने पर ध्यान केंद्रित नहीं कर रहे हैं।
महाराष्ट्र और प्रवासी श्रमिक
महाराष्ट्र में भी संख्या कुछ ज्यादा अलग नहीं है। अन्य राज्यों से महाराष्ट्र के श्रमिकों की केवल एक ट्रेन गई है, जबकि महाराष्ट्र से विभिन्न राज्यों की श्रमिकों की 8 ट्रेनें गई हैं।
उदाहरण के लिए, हाल ही में 30 अप्रैल को महाराष्ट्र के मजदूर मध्य प्रदेश में विरोध प्रदर्शन कर रहे थे कि उनको घर वापस भेजा जाए। हैदराबाद में भी, महाराष्ट्र के प्रवासी मजदूरों ने घर वापस जाने की माँग को लेकर धरना दिया था।
महाराष्ट्र सरकार का संचालन और प्रबंधन अब तक सबसे खराब रहा है। उद्धव ठाकरे ने केंद्र सरकार से प्रवासियों से शुल्क नहीं लेने की अपील की थी, जबकि खबरें सामने आईं कि वे खुद प्रवासी मजदूरों से मेडिकल टेस्ट के लिए पैसे ले रहे हैं और उसके बाद ही उसे घर जाने की अनुमति दे रहे हैं।
महाराष्ट्र खुद ही अपने राज्य के मजदूरों को वापस लाने में काफी पीछे है। इसके बावजूद NCP नेता नवाब मलिक आगे बढ़कर आरोप लगाते हैं कि उत्तर प्रदेश सरकार जानबूझकर महाराष्ट्र में रह रहे प्रवासियों की वापसी के लिए कठोर शर्तें लगा रही है ताकि उन्हें स्वीकार करने से बच सकें। बता दें कि 16 ट्रेनें प्रवासियों को यूपी वापस लाने के लिए निर्धारित हैं।
पश्चिम बंगाल और प्रवासी श्रमिक
पश्चिम बंगाल सरकार ने खुद कहा है कि वे अपने राज्य के प्रवासी मजदूरों को वापस लेने में धीमी गति से चल रही हैं।
राज्य का मानना है कि इतने सारे लोगों का बिना कोरोना वायरस टेस्ट के राज्य में लाना खतरनाक है। इससे संक्रमण फैल सकता है। इसके लिए एक योजना बनाने की जरूरत है, ताकि संक्रमण न फैले। पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव राजीव सिन्हा ने कहा कि अन्य राज्यों से आने वाले किसी को भी कंटेनमेंट जोन में प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। सिन्हा ने कहा, इसलिए, यदि कोई बंगाल के लिए एक ट्रेन ले रहा है, तो वह एक कंटेनमेंट जोन से आता है, तो उसे घर नहीं भेजा जा सकता है। कुछ अन्य व्यवस्था करने की आवश्यकता है और इसके लिए समय की आवश्यकता है।”
सिन्ही ने आगे कहा, “लाखों फँसे हुए प्रवासियों मजदूरों को एक बार में ही अनुमति देना उचित नहीं होगा। उन्हें चरणों में वापस लाने की आवश्यकता है। इसके लिए विस्तृत योजना बनाई जानी है। वरना अब तक किए गए हर प्रयास बेकार चले जाएँगे।”
राज्य सरकार के इस रुख के बाद यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि केवल दो ट्रेनों ने बंगाल के मजदूरों को दूसरे राज्यों से वापस अपने राज्य में पहुँचाया है।
मध्य प्रदेश और प्रवासी श्रमिक
हालाँकि, मध्य प्रदेश में वापस आने वाली प्रवासी मजदूरों की गाड़ियाँ केवल एक हैं, लेकिन शिवराज सिंह चौहान ने स्पष्ट रूप से कहा है कि सभी प्रवासी श्रमिक जो मध्य प्रदेश के हैं, उन्हें वापस लाया जाएगा। दरअसल, दूरी अधिक नहीं होने के कारण, राज्य सरकार ने प्रवासियों के लिए कई बसों की व्यवस्था की, जो अन्य राज्यों, विशेषकर महाराष्ट्र, राजस्थान और गुजरात से मध्य प्रदेश के मजदूरों को वापस ला रही है।
शनिवार को, शिवराज सिंह चौहान ने घोषणा की थी कि राज्य सरकार बसों में विभिन्न राज्यों में फँसे अपने मजदूरों को वापस लाने की व्यवस्था कर रही है।
उन्होंने कहा, “हम उन्हें पैदल नहीं चलने देंगे। हमने उन्हें गर्मी में सड़कों और रेल की पटरियों पर घर वापस जाते देखा है। वो काफी चिंतित हैं। इसलिए, हम उनकी यात्रा की पूरी व्यवस्था करेंगे, उन्हें बसों में उनके गाँव वापस भेजेंगे।”
बसों में सवार होने से पहले, मजदूरों की बीमारियों की जाँच की जाएगी। उन्होंने कहा, “मैं सभी ग्रामीणों से अनुरोध करता हूंँ कि वापस लौटने वालों के साथ वो मानवीय व्यवहार करें।”
शिवराज सिंह ने कहा, “मुझे अलग-अलग राज्यों के व्यक्तियों से कई फोन कॉल प्राप्त हुए हैं जो वापस आना चाहते हैं। हमने उनके लिए ई-पास की व्यवस्था की है ताकि वे अपने परिवहन का उपयोग करके लौट सकें।” इस प्रकार मध्य प्रदेश सरकार अपने निवासियों को स्वीकार करने की जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट रही है।
जबकि राजस्थान, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल जैसे कॉन्ग्रेस शासित राज्यों और विपक्ष शासित राज्यों में विभिन्न राज्यों में फँसे अपने ही मजदूरों के लिए अनभिज्ञ जान पड़ते हैं। वे अपने राज्य में बिहार, यूपी, मध्य प्रदेश, झारखंड आदिर राज्यों के फँसे मजदूरों को वापस भेजने के लिए ज्यादा उत्सुक दिख रहे हैं।