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प्रशांत भूषण को SC ने फटकारा, कहा- टीवी पर कोई कुछ भी देख सकता है: रामायण-महाभारत को बताया था ‘अफीम’

रामायण-महाभारत को अफीम बताने वाले वकील प्रशांत भूषण को सुप्रीम कोर्ट ने फटकार लगाई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है, “जिसको टीवी पर जो देखना है, देख सकता है।” प्रशांत भूषण गुजरात में दर्ज एफआईआर के खिलाफ SC पहुँचे थे। कोर्ट ने फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है।

न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना की खंडपीठ ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए मामले की सुनवाई की। न्यायमूर्ति अशोक भूषण ने प्रशांत भूषण की ओर से पेश वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे से कहा, “कोई भी व्यक्ति टीवी पर कुछ भी देख सकता है। आप कैसे कह सकते हैं कि लोग इसे और उसे नहीं देख सकते हैं?” जवाब में दवे ने कहा कि हम टीवी पर कुछ देखने वाले लोगों पर नहीं हैं, बल्कि हम एफआईआर पर हैं।

कोर्ट ने दलीलें सुनने के बाद गुजरात पुलिस को दो सप्ताह के भीतर जवाब देने का निर्देश दिया है। खंडपीठ ने भूषण के खिलाफ किसी भी प्रकार की कार्रवाई और गिरफ़्तारी पर रोक लगा दी है।

इस मामले पर ट्वीट करते हुए पत्रकार दीपक चौरसिया ने लिखा, “प्रशांत भूषण जी, आपको देश से जुड़ी विरासत और संस्कृति से इतनी दिक़्क़त क्यों होती है। आज फिर कोर्ट ने आपकी बचकानी हरकतों के चलते फटकार लगाई है। रामायण और महाभारत हमारी संस्कृति का आधार है।”

दरअसल पिछले महीने गुजरात की राजकोट पुलिस ने वकील और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण द्वारा रामायण-महाभारत को लेकर किए गए विवादास्पद ट्वीट मामले में मुकदमा दर्ज किया था। साथ ही प्रशांत भूषण के ट्वीट का समर्थन करने और लोगों को भड़काने के आरोप में पुलिस ने एश्लीन मैथ्यू और कन्नन गोपीनाथन के खिलाफ भी मामला दर्ज किया था।

भारतीय सेना में पूर्व सेनाधिकारी कैप्टन जयदेव जोशी की ओर से की गई शिकायत में कहा गया था कि अदालतों में गवाही से पहले धार्मिक ग्रन्थों की शपथ दिलाई जाती है। अगर इन ग्रन्थों को अफीम का नशा माना जाएगा तो इस गवाही का अर्थ ही खत्म हो जाएगा। शिकायत के आधार पर 13 अप्रैल को राजकोट शहर के भक्तिनगर पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट दर्ज की गई थी। एफआईआर के बाद प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

प्रशांत भूषण ने 28 मार्च को ट्वीट करते हुए लिखा था, “लॉकडाउन के कारण करोड़ों भूखे और सैकड़ों घर जाने के लिए मीलों चल रहे हैं, हमारे हृदयहीन मंत्री लोगों को रामायण और महाभारत की अफीम का सेवन करने और खिलाने के लिए मना रहे हैं!”

गौरतलब है कि देश में जारी लॉकडाउन के बीच केन्द्र सरकार द्वारा दूरदर्शन पर प्रसारित किए गए रामायण और महाभारत ने टीआरपी में टीवी के इतिहास में पिछले पाँच साल के सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। पिछले दिनों प्रसार भारती के CEO ने लिखा था, “मुझे यह बताते हुए काफी ख़ुशी हो रही है कि दूरदर्शन पर प्रसारित हो रहा शो ‘रामायण’ 2015 से अब तक का सबसे अधिक टीआरपी जनरेट करने वाला हिंदी जनरल एंटरटेनमेंट शो बन गया है।”

महाराष्ट्र: उद्धव सरकार ने प्लाज्मा थेरेपी से जिस कोरोना संक्रमित के ठीक होने का किया था ऐलान, उसकी मौत

प्लाज्मा थेरेपी से जिस कोरोना संक्रमित के ठीक होने का ऐलान महाराष्ट्र में स्वास्थ्य मंत्री राजेश तोपे ने किया था उसकी मौत हो गई है। गुरुवार को इस संक्रमित व्यक्ति ने अस्पताल में आखिरी सॉंसें ली। इसने प्लाज्मा थेरेपी से संक्रमितों के उपचार को लेकर किए जा रहे दावों को कठघरे में खड़ा कर दिया है।

बुधवार को तोपे ने ऐलान किया था कि प्रदेश में प्लाज्मा थेरेपी का पहला प्रयोग सफल हो गया है। उन्होंने बताया था कि लीलावती अस्पताल में भर्ती एक 53 वर्षीय मरीज पर यह इलाज सफल रहा है। लिहाजा NYL नय्यर अस्पताल में भर्ती दूसरे मरीज को भी यह उपचार दिया जा रहा है।

जानकारी के मुताबिक, 53 वर्षीय व्यक्ति की 19 अप्रैल को रिपोर्ट कोरोना पॉजिटिव आई थी। इसके बाद उसे 20 अप्रैल को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। डॉक्टरों की मानें तो गले में खरास, सूखी खाँसी और बुखार जैसे लक्षण होने के बावजूद मरीज ने अपना टेस्ट कराने में देरी की। इसके कारण उसमें कोरोना संक्रसंक्रमण होने की पहचान बहुत देर से हुई। इसी वजह से उन्हें पहले ही साँस की परेशानी हो गई थी और अस्पताल पहुँचते ही उन्हें आईसीयू में भर्ती कर दिया गया था।

25 अप्रैल को इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) से हरी झंडी मिलने के बाद राज्य में पहली प्लाज्मा थेरेपी की गई। इस तरह से यह मरीज राज्य के लिए उम्मीद की किरण जैसा था क्योंकि राज्य में प्लाज्मा थेरेपी का क्लीनिकल ट्रायल किया गया था। पहले दिन उसे 200 एमएल प्लाज्मा चढ़ाया गया था। इसके बाद थोड़ा सुधार हुआ। लेकिन 27 अप्रैल की सुबह मरीज की सेहत फिर से बिगड़ने लगी। इसके बाद उसको एंटीबॉयोटिक दवाओं की डोज भी दी गई। साथ ही मरीज की बिगड़ती हालत को देखते हुए अगले दो ट्रायल को स्थगित करना पड़ा। बाद में यानी कल खबर आई कि वे कोरोना से जंग हार गए हैं।

प्रयोग की इस विफलता को देखसोशल मीडिया पर सवाल उठे हैं। अंकुर सिंह नाम के यूजर ने पूछा है कि आखिर उद्धव ठाकरे सरकार मीडिया प्रचार के लिए इतनी उतावली क्यों रहती है? वह परिणामों का इंतजार क्यों नहीं करती? वह कहते हैं कि मीडिया ने एक ऐसी थेरेपी के लिए तबलीगी जमातियों को हीरो बना दिया है जिसे अभी अप्रूव भी नहीं किया गया।

गौरतलब है कि इससे पहले केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल ने कहा था कि प्लाज्मा थेरेपी अभी कारगर साबित नहीं हुई है। यह अभी सिर्फ प्रायोगिक चरण में ही है। साथ ही उन्होंने कहा था कि कोरोना वायरस के उपचार में यदि प्लाज्मा थेरेपी का प्रयोग दिशा-निर्देशों के अनुसार नहीं हुआ तो यह जान के लिए भी नुकसानदायक हो सकता है।

बावजूद प्लाज़्मा थेरेपी के चर्चा में आते ही अचानक से ‘सेक्युलर’ राजनेता और ‘वाम-उदारवादी’ लिबरल गिरोह सक्रिय हो उठे। प्लाज्मा डोनेट करते हुए एक तबलीगी की तस्वीर को आधार बनाकर बहस का मुद्दा यह बना दिया गया कि मुस्लिम भी कोरोना वायरस के इलाज के लिए आगे आ रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि जो लोग आज तक यह स्वीकार करने में कतराते रहे कि देश में कोरोना वायरस के संक्रमण का सबसे बड़ा स्रोत तबलीगी जमात रहा है, वह भी इस बात पर गद्य लिखते नजर आने लगे।

बता दें, महाराष्ट्र में संक्रमितों की संख्या 10 हजार पार कर गई है। बीते 24 घंटे में 583 नए केस सामने आए हैं। राज्य में बीते 24 घंटे के 27 लोगों की मौत हो चुकी है। अब तक कुल 459 लोगों की कोविड-19 महामारी से मौत हो चुकी है। राज्य में कुल संक्रमित मरीजों की संख्या 10498 तक पहुँच गई है।

पुलिस में है योगी को गोली मारने की बात कहने वाला तनवीर खान, अकाउंट किया डिएक्टिवेट

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को गोली मारने की बात सोशल मीडिया में लिखने वाले तनवीर खान को लेकर उत्तर प्रदेश पुलिस ने आवश्यक कार्रवाई करने की बात कही है। तनवीर खान को लेकर मामला इस कारण भी जोर पकड़ रहा है, क्योंकि वह खुद उत्तर प्रदेश पुलिस में कार्यरत है।

बृहस्पतिवार (अप्रैल 30, 2020) को तनवीर खान का एक पोस्ट सोशल मीडिया पर सामने आया था। इसमें उसने लिखा था कि रमजान में अजान नहीं हो रही है, इसलिए योगी को गोली मार देनी चाहिए। सोशल मीडिया पर विवेक भारद्वाज ने ऐसी मानसिकता के लोगों का पुलिस विभाग में होना दुर्भाग्य बताते हुए लिखा है, “इंदिरा गाँधी के साथ क्या हुआ था, यह जानने के बावजूद इस प्रकार की मानसिकता के लोगों का पुलिस और भारतीय सेना में होना आश्चर्यजनक है। ऐसे लोग सलाखों के भीतर होने चाहिए, ना कि वर्दी में।”

कई अन्य लोगों ने भी पूछा है कि इस प्रकार की कुत्सित विचारधारा के लोग उत्तर प्रदेश पुलिस में कैसे रह सकते हैं?

इस ट्वीट के जवाब में गाजीपुर पुलिस ने आवश्यक कार्रवाई के लिए साइबर सेल को सूचना दी जाने की बात कही है।

तनवीर खान ने लिखा- अजान नहीं हो रही, योगी को गोली मार दो

कोरोना वायरस के खतरे को देखते हुए देशभर में जारी लॉकडाउन के बीच मुसलमानों का पवित्र रमजान का महीना शुरू हो चुका है। विभिन्न राज्यों की सरकारें नमाजियों से घर पर ही नमाज पढ़ने और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने की अपील कर रही हैं। नमाज और अजान पर निर्देशों से गुस्साए तनवीर खान नाम के एक व्यक्ति ने सोशल मीडिया पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को गोली मारने की बात कही।

तनवीर खान ने अपने फेसबुक एकाउंट से पोस्ट किया, “दिलदार नगर और पूरे कामसरोवर (कामसर) में अजान नहीं हो रही है। योगी को गोली मार दो*** को।” पोस्ट वायरल होते ही तनवीर खान ने अपना एकाउंट डिएक्टिवेट कर लिया है। लेकिन कुछ लोगों ने ट्विटर पर उसके पोस्ट के स्क्रीनशॉट लेते हुए उत्तर प्रदेश पुलिस से इस पर संज्ञान लेने की अपील की।

प्रयागराज: पत्रकार यूसुफ अंसारी ने फैलाई झूठी खबर कि प्रशासन सिर्फ दूसरे मजहब वालों के घरों में लगा रही क्वारंटाइन पोस्टर्स, FIR दर्ज

कोरोना वायरस के तेजी से फैलते संक्रमण के बीच लोगों में डर का माहौल बना हुआ है। ऐसे में इससे जुड़ी निराधार व झूठी खबरें सोशल मीडिया पर तेजी से फैल रही हैं। इसी कड़ी में सोशल मीडिया पर फर्जी खबर फैलाने के आरोप में प्रयागराज पुलिस ने कल (30.4.20) एक शिकायत दर्ज की जिसमे यूसुफ अंसारी नामक पत्रकार पर जिला प्रशासन ने कोरोना वायरस महामारी को लेकर सोशल मीडिया पर झूठ खबर फैलाने का आरोप हैं। जिसके चलते पुलिस ने उसपर कार्रवाई शुरू कर दी है।

यूसुफ अंसारी ने salaamindianews.com नामक वेबसाइट में एक ‘रिपोर्ट‘ प्रकाशित किया था। जिसमें दावा किया गया था कि जिला प्रशासन कुछ घरों के बाहर पोस्टर लगा रहा है, जो उस घर में सदस्य (सदस्यों) की क्वारंटाइन स्थिति घोषित कर रहे हैं, साथ ही परिवार के सदस्यों के पास आने, बाहरी लोगों को घर में आने से बचने और उनसे किसी भी तरह से संपर्क बनाने की चेतावनी दे रहे हैं।

हालाँकि, यूसुफ अंसारी की रिपोर्ट में दावा किया गया कि प्रशासन का दूसरे मजहब वालों को पीड़ित करने के उद्देश्य से यह एक दुर्भावनापूर्ण प्रयास है, क्योंकि ऐसे पोस्टर केवल मजहब विशेष के घरों के बाहर लगाए गए हैं।

रिपोर्ट में, यूसुफ अंसारी ने आगे यह भी दावा किया कि जिला प्रशासन ऐसे घरों पर पोस्टर लगा रहा है, जहाँ संबंधित व्यक्तियों ने पहले ही अपने क़्वारन्टाइन पीरियड को पूरा कर लिया है। उन्होंने लिखा कि यह सरकार द्वारा समुदाय विशेष को अलग-थलग करने और बदनाम करने की कोशिश है। साथ ही एक वकील के नाम का भी हवाला दिया गया और लिखा कि इस तरह के पोस्टर ‘मानव अधिकारों का उल्लंघन’ हैं। यहाँ तक ​​कि उन्होंने सरकार द्वारा दूसरे मजहब के क्वारंटाइन पोस्टरों को ‘उत्पीड़न’ भी कहा।

इन सभी दावों पर तेजी से कार्रवाई करते हुए, एसएसपी प्रयागराज ने सोशल मीडिया पर बताया कि यह दावे पूरी तरह से झूठे हैं और प्रयागराज पुलिस ने तथाकथित पत्रकार के खिलाफ झूठ फैलाने और सांप्रदायिक कलह को बढ़ावा देने की कोशिश करने के लिए कार्रवाई शुरू कर दी है।

प्रयागराज के एसएसपी ने आगे बताया कि उक्त ’पत्रकार’ युसुफ अंसारी से अधिकारियों द्वारा उनके दावों के आधार के बारे में पूछताछ करने के लिए संपर्क किया गया था, जिसके बाद उन्होंने अपना फोन स्विच ऑफ कर दिया और कोई जवाब नहीं दिया। पुलिस अधिकारी ने आगे कहा कि पुलिस ऐसे गैर-जिम्मेदार ‘पत्रकार’ को गिरफ्तार करने की कोशिश कर रही है।

उल्लेखनीय है कि इस तरह के पोस्टर सभी राज्यों में एक सामान्य घटना है, जहाँ स्थानीय प्रशासन ऐसे पोस्टर्स उन सभी के घरों के बाहर लगाता है। जिन्हें विदेश यात्रा के बाद या किसी संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने के बाद घर में ही क्वारंटाइन किया जाता है। क्वारंटाइन पोस्टर्स के तहत व्यक्तियों और क्वारंटाइन अवधि के विवरण को सूचित किया जाता हैं। क्योंकि आपस में दूरी बनाए रखने पर ही इस महामारी के संक्रमित होने से बचा जा सकता है।

इससे पहले भी TOI, NDTV के कई पत्रकारों ने झूठी खबर चला कर जनता में दर और सनसनी परोसनी चाही जिसे थोड़े ही देर में बेनकाब कर दिया गया है।

शराब से गले का कोरोना साफ होगा, खोल दें दुकानें: राजस्थान के कॉन्ग्रेस MLA ने CM गहलोत को लिखी चिट्ठी

कॉन्ग्रेस विधायक भरत सिंह कुंदनपुर ने राजस्थान में शराब की दुकानें खोलने की मॉंग की है। इस बाबत उन्होंने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को चिट्ठी लिखी है। उनका कहना है कि शराब पीने से गले का कोरोना वायरस साफ होगा। साथ ही सरकार को राजस्व भी मिलेगा।

सीएम अशोक गहलोत को लिखे पत्र में सांगोद से विधायक भरत सिंह ने तर्क दिया है कि अगर शराब से हाथ धोने पर कोरोना वायरस को नष्ट किया जा सकता है तो शराब पीने से निश्चित रूप से गले से वायरस को भी समाप्त किया जा सकता है।

विधायक ने पत्र में लिखा है कि कोरोना वायरस के चलते देश में जारी लॉकडाउन के कारण देश भर में शराब की दुकानें बंद हैं। इससे एक तरफ तो प्रदेश के सभी जिलों में अपराध में भारी कमी आई है, लेकिन शराब की बिक्री नहीं होने से लगातार शराब की कालाबाजारी बढ़ रही है। अवैध शराब का धंधा पनप रहा है, इसका धंधा करने वालों के लिए यह स्वरोजगार योजना बन गई है।

शराब माफियाओं के लिए यह पैसा कमाने का सुनहरा अवसर भी है, क्योंकि बाजारों में शराब की माँग है। इसके बाद भी शराब बेचने के लिए केंद्र सरकार कभी अनुमति नहीं देगी, क्योंकि यह एक बदनाम चीज है। इसके कारण सरकार को राजस्व की हानि हो रही है।

भरत सिंह ने पत्र में लिखा है कि राजस्थान सरकार ने वर्ष 2020-21 में शराब की बिक्री से 12,500 करोड़ रुपए का लक्ष्य रखा था। लेकिन लॉकडाउन के चलते यह पूरा होता नहीं दिख रहा है। इसलिए सरकार ने एक्साइज ड्यूटी बढ़ाई है, जबकि अच्छा तो यह है कि सरकार शराब की दुकानों को ही खोल दे। इससे शराब पीने वालों को समय से शराब मिलेगी और सरकार को राजस्व भी मिलेगा।

विधायक ने एक का जिक्र घटना करते हुए बताया कि देशी शराब का सेवन करने से दो लोगों की मौत हो गई। उन्होंने कहा कि हथकड़ शराब पीकर लोग अपनी जान गँवा रहे हैं इससे अच्छा है कि सरकार राज्य में शराब की दुकानों को खोल दे।

आपको बता दें कि केंद्र सरकार ने लॉकडाउन के दौरान कुछ शर्तों के साथ दुकानें खोलने की इजाजत दी थी। इसे लेकर गृह मंत्रालय ने शनिवार (अप्रैल 25, 2020) को स्पष्टीकरण जारी किया था। इसके मुताबिक आदेश में कहा गया था कि बाजार में स्थित दुकानों, मार्केट कॉम्प्लेक्स और शॉपिंग मॉल को खोलने की इजाजत नहीं है। शराब, सिगरेट, तंबाकू समेत सभी नशीली चीजों की बिक्री पर रोक पहले की तरह जारी रहेगी। इसके अलावा ई-कॉमर्स कंपनियाँ अभी गैरजरूरी सामानों की डिलिवरी नहीं कर सकेंगी। वह सिर्फ जरूरी सामानों की ही डिलीवरी जारी रखेंगी।

केजरीवाल सरकार की लापरवाही के चलते आजादपुर मंडी से अब अन्य राज्यों में हो रही कोरोना की सप्लाई

राजधानी दिल्ली में लगातार कोरोना के बढ़ते मामले सामने आ रहे हैं। वहीं केजरीवाल सरकार की लापरवाही के चलते दिल्ली के आजादपुर मंडी में लगातार बढ़ रहे कोरोना संक्रमण से हड़कंप मच गया है। एशिया की इस सबसे बड़ी मंडी पर वैश्विक महामारी कोरोना वायरस (कोविड-19) का खतरा तेजी से बढ़ता जा रहा है। अब आजादपुर मंडी से निकली कोरोना की बीमारी से सिर्फ दिल्लीवासी ही नही बल्कि अन्य राज्य के लोगो को भी अपने शिकंजे में ले रही हैं। जिसमें अलवर, झज्जर और बहादुरगढ़ मुख्य रुप से शामिल हैं।

पिछले दिनों मंडी की 13 दुकानें कोरोना के चलते सील कर दी गयी थी। साथ ही 43 लोगों को प्रशासन द्वारा क्वारनटीन भी किया गया। जिनके खाने का इंतजाम मंडी की तरफ से किया जा रहा है।

लॉकडाउन के वक़्त केजरीवाल सरकार द्वारा 24 घण्टे मंडी को खोले रखने के फैसले ने हालात को बद से बदतर बना दिया। कहा जा रहा था कि हालात और जरूरत को देखते हुए मंडी के कामकाज को हरी झंडी दी गई थी। मगर इस दौरान लोगो की आवाजाही बढ़ गई, और लोगों ने सोशल डिस्टेंसिंग को बिल्कुल नज़रंदाज कर दिया। सैनिटाइजेशन और साफ़ सफाई तो ज़मीनी स्तर पर ही धराशाही हो गए। अब बढ़ते संक्रमण को देखते हुए व्यापारियों और मजदूरों में दहशत का माहौल है।

मंडी से पहुँचा अलवर कोरोना वायरस

बहरहाल, आजादपुर मंडी का कोरोना कनेक्शन राजस्थान के अलवर तक पहुँचा गया है। अलवर में सब्जी की खेती करने वाला एक शख्स कोरोना पॉजिटिव पाया गया है। कोरोना संक्रमित शख्स बानसूर सब्जी मंडी और दिल्ली की आजादपुर सब्जी मंडी में सब्जियाँ बेचने पर पेमेंट लेने के लिए आता-जाता था। फिलहाल जिला प्रशासन, मेडिकल टीम बनाकर युवक की ट्रैवल हिस्ट्री खंगाल रहा है। उसके संपर्क में सब्जी की गाड़ी ले जाने वाले ड्राइवर और उसके परिवार को क्वारनटीन किया गया है। तीन किलोमीटर के इलाके में कर्फ्यू लगा दिया गया है। सब्जियों की खेती करने वाले यूपी से 700 से अधिक लोगों और उनके परिवार की भी स्क्रीनिंग की जा रही है।

बहादुरगढ़ और झज्जर में भी बढ़े आँकड़े

आज़ादपुर मंडी के चलते बहादुरगढ़ और झज्जर में कोरोना बम फूटे है। जानकारी के मुताबिक दिल्ली से सब्जियाँ लाने और बेचने के दौरान ही संक्रमण 1 जगह से दूसरी जगह फैला है। 10 नए मामलों में 7 का सीधा संबंध सब्जी मंडी से देखते हुए जिला प्रसाशन ने मंडी को अगले आदेशों तक बंद कर दिया है। सड़क के दोनों किनारों पर बैरिकेडिंग भी कर दी गई है। नगर परिषद की टीमों ने सैनेटाइजेशन का काम शुरू कर दिया है। दिल्ली सीमा पर भी सख्ती बढ़ाते हुए स्वास्थ्य विभाग की टीमों ने कोरोना संक्रमति लोगों के परिजनों, संपर्क में आए लोगों की पहचान का काम शुरू कर दिया है। सब्जी मंडी और अनाज मंडी से जुड़े लोगों की सैम्पलिंग की जा रही है।

दिल्ली मे आँकड़े की बात करे तो अबतक कुल 3,515 लोग कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं। जबकि 59 लोगों की इस जानलेवा वायरस से मौत हो चुकी हैं और 1094 मरीज उपचार के बाद स्वस्थ होकर घर जा चुके हैं।

दिल्ली बढ़ते मामलों को देखते हुए ये कहा जा सकता है की लॉकडाउन का उल्लंघन और कोरोना को लेकर लापरवाही ही दिल्ली में तेजी से फैलते संक्रमण का कारण हैं। जिसके चलते आज आजादपुर मंडी सब्जी और फलों की सप्लाई की जगह कोरोना वायरस की सप्लाई के लिए जाना जा रहा हैं।

डोडा नरसंहार: गाँव में घुसे 10-12 आतंकी, हिंदुओं को लाइन में खड़ा किया, 3 साल की बच्ची समेत 22 को मारी गोली

जम्मू-कश्मीर में इस्लामिक आतंकवादियों ने समय-समय पर हिन्दुओं का नृशंस नरसंहार किया है। अप्रैल 30, 2006 को जम्मू स्थित डोडा में अंजाम दिया गया नरसंहार एक ऐसी घटना है जिस पर भारतीय मीडिया और लिबरल गिरोह बात करना पसंद नहीं करता है। डोडा और उधमपुर जिलों में दो अलग-अलग आतंकवादी हमलों में कम से कम 35 हिंदू ग्रामीण मार दिए गए थे।

कुल्हड़ और थरवा के पहाड़ पर रहने वाले हिन्दुओं को रात में उनके घरों के बाहर गोली मारकर हत्या कर दी गई, जिनमें एक तीन साल की बच्ची भी शामिल थी। इसके अलावा तेरह हिन्दू चरवाहों की हत्या ललन गल्ला के उत्तरी इलाके में की गई थी, यह बसंतगढ़ शहर के ऊपर एक ऊँची घास का मैदान है।

अप्रैल 30, 2020 को इस घटना को चौदह साल पूरे हो चुके हैं।

क्या हुआ था 2006 के डोडा नरसंहार में

अप्रैल 30, 2006 के दिन डोडा ज़िले के थावा गाँव में 10-12 इस्लामिक आतंकवादियों ने निहत्थे गाँव वालों पर हमला कर दिया। रात के अँधेरे में आए आतंकवादी सेना की वर्दी पहने हुए थे। रात के 2:30 बजे आतंकवादी गाँव में घुसे तो सबका धर्म पूछकर उन्हें घर से बाहर निकाला। जो हिन्दू थे उनको बाहर निकालकर लाइन में खड़ा कर दिया गया और फिर इस्लामिक आतंकवादियों ने 22 हिन्दुओ को गोलियों से भून दिया। इसमें एक 3 साल की बच्ची भी थी।

आतंकियों ने तीन साल की बच्ची तक को नहीं छोड़ा

इस घटना के बाद ग्रामीण हिन्दू मदद के लिए पास के एक सेना शिविर में गए। अगली सुबह जब सैनिक वापस आए आतंकी वहाँ से भाग चुके थे।

इसी हमले के साथ उधमपुर ज़िले के बसंतगढ़ क्षेत्र में लालों गाँव में भी आतंकवादियों ने 13 हिन्दू चरवाहों का अपहरण किया और उन्हें गोलियों से छलनी कर दिया। दोनों ही नरसंहारों के लिए पाकिस्तान समर्थित लश्कर-ए-तय्यबा (Lashkar-e-Taiba) ज़िम्मेदार था। माना जाता है कि इस नरसंहार का ध्येय भारत सरकार और हुर्रियत कॉफ्रेंस के बीच होने वाली वार्ता को रोकना था।

दरअसल, उस दौरान कश्मीर घाटी में अलगाववादियों ने चुनाव बहिष्कार का ऐलान किया था। इसके बावजूद जम्मू क्षेत्र के हिन्दुओं ने चुनाव में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था, जिसका खामियाजा उन्हें इस नरसंहार के रूप में भुगतना पड़ा।

केंद्र में उस दौरान कॉन्ग्रेस की सरकार हुआ करती थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन मुख्यमंत्री गुलाम नबी आज़ाद, दोनों ने इन सामूहिक हत्याओं की निंदा की थी। 1989 में कश्मीर में सशस्त्र अलगाववादी विद्रोह शुरू होने के बाद से 2006 के नरसंहार की घटना तक वहाँ पर 60,000 से अधिक लोग मारे जा चुके थे।

1989 से हुई थी कश्मीर में हिन्दुओं पर अत्याचार की शुरुआत

कश्मीर में हिंदुओं पर अत्याचारों का सिलसिला वर्ष 1989 में जिहाद के लिए गठित जमात-ए-इस्लामी ने शुरू किया था। इस संगठन ने कश्मीर में इस्लामिक ड्रेस कोड लागू कर दिया और नारा दिया – “हम सब एक, तुम भागो या मरो।”

इसके बाद कश्मीरी पंडितों ने बड़ी संख्या में घाटी छोड़ दी, उन्हें अपने पुश्तैनी जमीन-मकान और परिवार को मजबूरन छोड़ना पड़ा। बड़ी सम्पत्ति के मालिक कश्मीरी पंडित अपनी पुश्तैनी जमीन-जायदाद छोड़कर रिफ्यूजी कैंपों में रहने को मजबूर हो गए।

इस दौरान इस्लामिक आतंकियों ने 300 से अधिक हिंदू महिला और पुरुषों की हत्या की। घाटी में कश्मीरी पंडितों के बुरे दिनों की शुरुआत 14 सितंबर 1989 से हुई जब भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य और वकील कश्मीरी पंडित, तिलक लाल टपलू की जेकेएलएफ (JKLF) ने हत्या कर दी।

मस्जिदों से घाटी छोड़ने के ऐलान

एक स्थानीय उर्दू अखबार ‘हिज्ब-उल-मुजाहिदीन’ की तरफ से ऐसी प्रेस विज्ञप्ति प्रकाशित की गईं जिसमें लिखा था कि सभी हिंदू अपना सामान बाँधें और कश्मीर छोड़ कर चले जाएँ। इसी के साथ कई अन्य स्थानीय समाचार-पत्र इस निष्कासन के आदेश को दोहराने लगे।

इस्लामिक आतंकवाद की पराकाष्ठा यह थी कि मस्जिदों में भारत एवं हिंदू विरोधी भाषण दिए जाने लगे। सभी कश्मीरियों को इस्लामिक ड्रेस कोड अपनाने की सलाह दी जाने लगीं ताकि हिन्दुओं को पहचानना आसान रहे। इसके बाद जस्टिस नीलकंठ गंजू की भी गोली मारकर हत्या कर दी गई। उस दौर के अधिकतर हिंदू नेताओं की हत्या एक के बाद एक सिलसिलेवार तरीके से कर दी गई। घाटी में हिन्दू महिलाओं के साथ सरेआम बलात्कार किए जाने लगे।

एक कश्मीरी पंडित नर्स के साथ आतंकियों ने सामूहिक बलात्कार किया और उसके बाद पीट-पीटकर उसकी हत्या कर दी। घाटी में मौजूद कई कश्मीरी पंडितों की बस्तियों में सामूहिक बलात्कार और लड़कियों के अपहरण की घटनाएँ होती रहीं और हिन्दुओं के हालात बदतर होते गए।

घाटी में अब जाकर केंद्र सरकार ने इस्लामिक आतंक पर काबू पाने की दिशा में गंभीरता से प्रयास किए हैं। जम्मू-कश्मीर में वर्षों से चले आ रहे अनुच्छेद 370 के कुछ प्रावधानों को निरस्त करना केंद्र सरकार की प्रबल इच्छाशक्ति का ही उदाहरण है। हालाँकि, इस पर आज तक भी देशभर में कम्युनिस्ट और वाम-उदारवादियों का विरोध देखने को मिल रहा है। इसके पीछे एक प्रमुख वजह कम्युनिस्टों की आतंकवादियों के लिए दबी हुई निष्ठा और हिन्दुओं से घृणा भी है।

महाराष्ट्र: मालेगाँव में 40 पुलिसकर्मी कोरोना पॉजिटिव, ठाणे में 20 दिन का बच्चा भी संक्रमित, बना नया हॉटस्पॉट

महाराष्ट्र में आए दिन संक्रमितों का आँकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा हैं। उसी क्रम में महाराष्ट्र का मालेगाँव कोरोना वायरस का नया हॉट स्पॉट के रूप में उभर कर सामने आया है। जानकारी के मुताबिक यहाँ के कंटेनमेंट जोन में ड्यूटी कर रहे 40 पुलिसकर्मी कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं। पुलिसकर्मियों एवं एसआरपीएफ जवानों के कोरोना प्रभावित होने से वहाँ स्थिति और भयावह होती जा रही है। बता दें कि पिछले 24 घंटों में यहाँ 82 नए मामले सामने आए हैं। जिसके चलते अब मरीजों की कुल संख्या 258 पहुँच गई है।

यहाँ बिगड़ती स्थिति को देखते हुए स्वास्थ्यमंत्री राजेश टोपे, गृहमंत्री अनिल देशमुख एवं नासिक के प्रभारी मंत्री छगन भुजबल को एक समीक्षा बैठक करनी पड़ी। मालेगाँव धुले संसदीय क्षेत्र का हिस्सा है। यहाँ के सांसद डॉ. सुभाष भामरे ने कुछ दिनों पहले ही मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे एवं गृहमंत्री अनिल देशमुख को पत्र लिखकर मालेगाँव की कानून-व्यवस्था के प्रति चिंता जताई थी और इसके नया हॉट स्पॉट बनने की आशंका व्यक्त की थी।

गौरतलब है कि यह वहीं मालेगाँव हैं जहाँ कुछ दिन पहले 100-150 लोगों की भीड़ ने पुलिसकर्मियों पर हमला किया था।

वहीं मालेगाँव के ही आज़ादपुर क्षेत्र में लॉकडाउन के बावजूद एक जनाजे में 500 से 600 की तादाद में लोग मातम मनाने जा रहे थे। फिर पुलिस के समझाने के बाद भीड़ वापस लौटी थी। लगभग छह लाख की आबादी वाले इस कस्बे में 75 फीसद आबादी मुस्लिम समुदाय की है। कस्बे के बिगड़ते हालात को देखते हुए अतिरिक्त सुरक्षा बल एवं स्वास्थ्यकर्मियों की टीम वहाँ भेजी जा रही है। कोरोना पीड़ितों के संपर्क में आए लोगों को डॉक्टरों की देखरेख में हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन के डोज भी देने की तैयारी की जा रही है।

धारावी में नही रुक रहा संक्रमण

वहीं दूसरी ओर मुम्बई के धारावी में अब तक कोरोना वायरस की वजह से 18 लोगों की मौत हो चुकी हैं। बीते दिनों वहाँ कोरोना के 25 नए मामले सामने आए हैं। जिसके चलते अब कुल 369 लोगों के संक्रमित होने की पुष्टि हुई है। महाराष्ट्र के ठाणे जिले के कल्याण में भी अब तक तीन मरीजों की मौत हो चुकी है। 162 लोग कोरोना से संक्रमित हैं, जिसमें 20 दिन का एक बच्चा भी कोरोना से संक्रमित पाया गया है। केडीएमसी के चिकित्सा अधिकारी डॉ राजू लवांगरे ने बताया कि कल्याण डोम्बिवली नगर निगम क्षेत्र में इस शिशु समेत कम से कम छह लोग संक्रमित पाए गए हैं।

महाराष्ट्र में कुल मामले

महाराष्ट्र में कोरोना पॉजिटिव मरीजों की संख्या 10 हजार के पार पहुँच गई है। पूरे महाराष्ट्र में कुल 733 इलाकों को प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित किया गया है। जबकि अब तक करीब डेढ़ लाख लोगों का कोरोना टेस्ट कराया जा चुका है। इसी बीच उप मुख्यमंत्री अजीत पवार ने ट्वीट कर एक राहत भरी खबर भी दी है कि महाराष्ट्र का बारामती जिला कोरोना मुक्त हो गया है। यहाँ अब कोरोना का एक भी संक्रमित मरीज नहीं है।

भगवा झंडे से समुदाय विशेष को परेशानी क्यों? वो ध्वजा है, मिर्ची नहीं!

हैदराबाद में फलों के ठेले वाले ने भगवा ध्वज लगाया, समुदाय विशेष को दिक्कत हुई, पुलिस को ट्विटर पर बुला लिया, पुलिस भी आई और कहा कार्रवाई होगी। नालंदा में भगवा ध्वज लगाने वाले पाँच लोगों पर पुलिसिया केस बनाया गया कि साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की कोशिश हो रही है। जमशेदपुर में दुकान के आगे भगवा पोस्टर पर राम-शिव के चित्रों समेत ‘हिन्दू फल की दुकान’ लिखने पर केस दर्ज हुआ क्योंकि किसी मजहब को दिक्कत हो गई।

ये चंद उदाहरण हैं, जो अब बढ़ते ही जा रहे हैं। एक पूरा गिरोह व्यवस्थित तरीके से हिन्दुओं के प्रतीकों पर उनके सिर्फ हिन्दू होने के कारण आक्रमण कर रहा है। क्योंकि इस देश में बलात्कारी और फसादी मुग़ल शासकों के समय से ले कर गाँधी के दौर तक में जजिया कर देने और ‘अब्दुल भाई को छोड़ दो‘ के नाम पर हत्यारे को बचाने की कोशिशें हुई हैं।

इसलिए, हिन्दुओं में हमेशा अपनी ही श्रद्धा प्रदर्शित करने में एक हीनभावना का दिखना आम है। आप अपने कार्यालय ललाट पर तिलक लगा कर जाइए तो आपको ‘मिलिटेंट हिन्दू’ कहा जा सकता है। जबकि तिलक से किसी का कुछ नहीं बिगड़ता, अपनी आत्मशांति के लिए लगाया जाता है। आपके हाथ के कलावे से दिक्कत हो जाती है, और आपको शायद मैनेजमेंट कह देगा कि ‘ये सब डेकोरम के खिलाफ है’।

आपको भी लगेगा नौकरी करना है, ये सब छोड़ा जा सकता है। आप अपने दस भाई-बिरादर को नहीं लाते कि हमारे मजहब पर हमला हो गया। ये विक्टिम कार्ड खेलना हिन्दुओं में न के बराबर दिखता है। जब तक वाकई परेशान ही न कर दिया जाए, हिन्दू बोलता तक नहीं। जब तक दो साधु और एक ड्राइवर भीड़ हत्या का शिकार नहीं हुए, हिन्दू मुखर नहीं हुआ। समुदाय विशेष का चोर भी मरता है तो वो अंतरराष्ट्रीय खबर बनती है।

गूगल पर ‘मौलवी रेप‘ टाइप कर लीजिए आपको दिख जाएगा कि कितनी खबरें हैं, कहाँ-कहाँ से हैं, लेकिन न्याय सिर्फ कठुआ की बच्ची के लिए माँगा जाता है, और उसके दरिंदे बलात्कारियों के हिन्दू होने मात्र से वो एक धार्मिक अपराध बना दिया जाता है। पूरे हिन्दू धर्म पर पाप का बोझ डालने के लिए अपराध में एक हिन्दू का होना मात्र काफी होता है, उसकी मंशा नहीं देखी जाती कि क्या अपराध धर्म के कारण हुआ है, या मर्द होने के कारण।

ख़ैर, ऐसे गिनाता रहूँ तो बहुत समय व्यर्थ होगा। पिछले साल जून-जुलाई में समुदाय विशेष से ‘जय श्री राम’ कहलवा कर मारने-पीटने की सारी घटनाएँ झूठी निकलीं, लेकिन कवरेज याद कीजिए कि कैसा था। जुलाई के बाद आए अगस्त में काँवड़ यात्रा पर ‘मजहबी’ इलाके में कितना पथराव हुआ, उसकी खबरें भी सर्च कर लीजिए, और उसकी कवरेज याद कीजिए। बहाने बनाए गए कि वो तो डीजे बजा रहे थे जैसे कि डीजे बजाने पर समुदाय विशेष द्वारा पत्थर मारना जायज हो जाता है!

आज कल नई नौटंकी चली है: भगवा झंडा लगा रहे हैं हिन्दू, ये गुंडागर्दी है,समुदाय विशेष को चिह्नित करना चाह रहे हैं, उनका व्यवसाय बर्बाद करना चाह रहे हैं। आप सोचिए कि किसी मुस्लिम को आप टोपी लगाने पर ‘गुंडा’ कह सकते हैं क्या? सोचिए कि जब कोई नमाज पढ़ कर आ रहा हो, आपने फोटो खींची और लिख दिया कि कट्टरपंथी गुंडा हिन्दुओं को डरा रहा है!

भगवा झंडे को ले कर बिलकुल वही हो रहा है। बेगूसराय को दलित सब्जीवाले ने अपने ठेले पर लगाया झंडा। उसने बोला कि ‘हिन्दू हूँ, लगाऊँगा’। थूकने वाले कांड के कारण समाज के कई हिस्से में लोग सब्जीवालों को शक की निगाह से देखने लगे हैं। अतः, वो नाम आदि पूछते हैं। इस कारण उस लड़के ने भगवा झंडा लगाया ताकि उसे बार-बार बताना न पड़े।

इस पर समुदाय विशेष की गली में उसे भला-बुरा कहा गया। आप इस बात को पलट दीजिए। समुदाय विशेष का सब्जी वाला टोपी लगाए सामान बेच रहा है, उसे हिन्दुओं को मुहल्ले में उसकी टोपी के कारण लोग गाली देने लगें, धमकाने लगें और उसका वीडियो सामने आ जाए। एक मानव के तौर पर आपको निराशा होगी कि हमारा समाज कहाँ आ गया है। लेकिन क्या बेगूसराय के उस लड़के के लिए वो निराशा आपको मीडिया में दिखी?

इन सारी बातों से साबित यही होता है कि दूसरा विशेष मजहब बस उँगली कर दे कि उसे दिक्कत है इस बात से, और जहाँ उसके तुष्टीकरण में लगी सरकार है, वो हिन्दू पर कार्रवाई करेगी। और, समुदाय विशेष इस बात का फायदा खूब ले रहा है। राँची में रहने वाले एक पत्रकार मित्र बताते हैं कि झारखंड में समुदाय विशेष ने इस बात का खूब फायदा उठाया है। वो किसी भी बात की तस्वीर ले कर पुलिस को टैग कर देते हैं, और पुलिस को आदेश आता है कि इस पर कार्रवाई करो। जमशेदपुर फल वाला उसी कारण से केस का हिस्सा बना था।

भगवा झंडे से परेशानी: अल्पसंख्यक कौन है?

लम्बे समय तक जमे रहने वाले सत्ताधीशों को जब यह समझ में आ गया कि एकमुश्त वोट पाने के लिए इस्लामी उम्मा की बातों पर ध्यान देना आवश्यक है, तो उन्होंने न सिर्फ समुदाय विशेष का तुष्टीकरण किया, बल्कि ये भी सुनिश्चित किया कि समुदाय विशेष को ‘मोर इक्वल’ ट्रीटमेंट मिले। कहने का तात्पर्य यह है कि ‘अल्पसंख्यक’ शब्द सुनते ही हमेशा एक ही मजहब के लोगों की ही बात होती दिखती है।

‘अल्पसंख्यकों पर हमला’, ‘अल्पसंख्यकों के लिए योजनाएँ’ आदि आप जब सुनेंगे तो आपको विशेष मजहब वाला ही दिखेगा। जबकि, यह मजहब इस देश की दूसरी सबसे बड़ी आबादी है। हिन्दू इस देश के करीब आठ राज्यों में अल्पसंख्यक हैं, लेकिन उस पर सुप्रीम कोर्ट में कभी-कभी केस पहुँचता है, जिसे नकार दिया जाता है। जैन, बौद्ध, पारसी, सिख आदि असली अल्पसंख्यक समुदाय को आप शायद ही कभी अपने अल्पसंख्यक होने का विक्टिम कार्ड फेंकते देखेंगे।

सबसे पहले लोकतंत्र की स्थापना करने वाले जनपद-महाजनपद वाले इस राष्ट्र में दोबारा लोकतंत्र बहाल हुआ तो, पश्चिमी देशों से आयातित विचाराधारा के नेताओं के कारण ये भी मान लिया गया कि क्रूसेड लड़ने वाले ईसाई मुल्कों की तरह भारत में भी ‘मुस्लिम अल्पसंख्यकों पर अत्याचार होगा’। जबकि, उन्होंने न तो निकट का इतिहास देखा, न पुरातन क्योंकि हिन्दू न कभी आक्रांता बना है, न ही अपने ऊपर आक्रमण करने वाले को भी भगाया।

मुस्लिमों और अंग्रेजों को ने इस देश पर हमला बोला, तबाही मचाई, अर्थव्यवस्था बर्बाद की, लेकिन हिन्दू आज भी उनके साथ रह रहा है। इसके उलट, बाकी मुस्लि राष्ट्रों में हिन्दुओं की गिरती जनसंख्या इस बात का सबूत है कि इस्लामी मुल्क इस्लाम के अलावा और कुछ देखना ही नहीं चाहते। अगर संयुक्त राष्ट्र या मानवाधिकारों जैसी हास्यास्पद चुटकुलेबाज संस्थाएँ हट जाएँ, तो दस दिन नहीं लगेंगे इस्लामी मुल्कों को अपने देशों से वहाँ के अल्पसंख्यकों के सामूहिक नरसंहार करने में।

हिन्दुओं ने कभी भी किसी भी तरह का धार्मिक अत्याचार किसी भी दूसरे मजहब पर कभी नहीं किया। उसके उलट, मध्ययुगीन इस्लामी बलात्कारी लुटेरों ने मजहबी अत्याचार के अलावा कभी कुछ किया ही नहीं। फिर भी आज तक हिन्दू जबरन पाँच बार अजान सुनता ही है, सड़कों पर होते नमाज को देख कर गाड़ी रोकता ही है, दुर्गा के विसर्जन की तारीख बदलता ही है।

इन सबके बावजूद, हमारे संविधान निर्माताओं को ये लगा कि हिन्दू सर्वसमावेशी नहीं है, वो दुसरे मजहब के आदमी को मार-काट देगा, अत्याचार करेगा, और अल्पसंख्यक आयोग की नौटंकी कर दी। नौटंकी इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि ऐसे आयोग की स्थापना में ही एक अनकही अवधारणा होती है कि बहुसंख्यक हमेशा अल्पसंख्यकों पर अत्याचार ही करेगा।

हिन्दू ने कहाँ अत्याचार किया, किसी इस्लामी राष्ट्र को तो छोड़िए, टोले-मुहल्ले से विशेष मजहब को भागने पर मजबूर किया, ये बात दे कोई। उसके उलट इसी देश में कट्टरपंथियों ने कश्मीर की 100% हिन्दू जनसंख्या को कुछ सौ सालों में चार प्रतिशत में समेट दिया। आपको क्या लगता है कि हिन्दुओं ने बच्चे पैदा करना बंद कर दिए कश्मीर में या वहाँ से वो भाग गए? जी नहीं, सामूहिक नरसंहार हुए हिन्दुओं के और 1989-90 वाला तो अंतिम था…

कैराना, मेरठ आदि के गाँवों से हिन्दू पलायन कर रहे हैं, ‘ये घर बिकाऊ है’ लिख कर। यहाँ मुस्लिम रहते हैं और उन्होंने हिन्दुओं का जीना हराम कर रखा है। उनकी बहू-बेटियों पर फब्तियाँ कसते हैं। ऐसी ही खबर दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों में आई थी कि हिन्दुओं की बच्चियों के सामने मजहब विशेष के लड़के न सिर्फ नंगे हो कर इशारे से उन्हें बुलाते हैं, बल्कि उन्होंने उनके कपड़े तक उतार लिए थे।

और आपने बनाया अल्पसंख्यक आयोग… पहले ही ये सोच लिया कि बहुसंख्यक है तो अत्याचार करेगा ही क्योंकि अमेरिका में श्वेत बहुसंख्यक वही कर रहा था और पूरे यूरोप में ईसाई लोग यहूदी और मजहब विशेष से सदियों से सतत युद्ध की स्थिति में थे ही। उन्हें लगा कि सभ्य समाज में ‘सेकुलर होने की जरूरत है’। हिन्दू को कभी सेकुलर होने की आवश्यकता नहीं पड़ी क्योंकि उसने कभी ‘नॉन-सेकुलर’ दुष्कृत्य किए ही नहीं। ये काम इस्लामी और ईसाई आक्रांताओं का विशेषाधिकार रहा है।

अल्पसंख्यकों का प्रपंची विलाप: भगवा झंडे से हमें परेशानी है

कायदे से देश को हिन्दुओं को सुरक्षित करने के लिए ‘बहुसंख्यक आयोग’ की स्थापना करनी चाहिए थी ताकि उसकी पीड़ा को विशेष ध्यान दे कर समझा जा सके। ये मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि कोई भी राजनैतिक नीति बनाने से पहले आपके समक्ष ऐसे उदाहरण होने चाहिए जिससे साबित हो कि उस नीति की आवश्यकता है। विभाजन के समय की मार-काट में तो दोनों ही तरफ के लोग थे, फिर ये क्यों मान लिया गया कि हिन्दू ही अत्याचार करेगा?

उससे पहले जब अंग्रेजों ने दंगे करवाए, तब भी दोनों तरफ के लोग अपराधी थे, फिर ये क्यों माना गया कि हिन्दू ही अत्याचार करेगा? क्या कहीं पर भी हिन्दुओं ने किसी ट्रेन की बॉगी में जा रहे 59 मौलवियों को आग से जलाया? क्या किसी हिन्दू ने किसी मस्जिद को तोड़ कर मंदिर खड़ी की? क्या किसी हिन्दू ने भारत से बाहर आक्रमण करके, देश पर कब्जा करने के बाद पूरी आबादी को जबरन हिन्दू बनाया?

जब इतिहास में ऐसा एक भी उदाहरण नहीं था तो फिर स्वतः संज्ञान लेने की ऐसी जल्दी क्या थी कि मजहब विशेष के लिए एक आयोग बनाना पड़ा। मजाक की सीमा तो यह है कि कश्मीर में भी चार प्रतिशत में सिमटा हिन्दू अल्पसंख्यक नहीं माना जाता, क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर वो बहुसंख्यक है।

कॉन्ग्रेस ने राजनैतिक दूरदर्शिता दिखाते हुए एक आबादी को अपने वोटों के लिए न सिर्फ इस्तेमाल किया बल्कि ‘मोर इक्वल’ ट्रीटमेंट देते हुए उन्हें इस स्तर पर पहुँचा दिया कि इस राष्ट्र में हिन्दू दूसरे दर्जे का नागरिक है। सत्तर साल के इसी स्पेशल ट्रीटमेंट ने उन्हें इतना बलशाली बना दिया है कि उनके पास राजनैतिक प्रतिनिधित्व हो या न हो, वो सड़कों पर अपना प्रतिनिधित्व स्वयं करने लगते हैं और उसका जोड़ किसी के पास नहीं।

इनके नेता सौ करोड़ हिन्दुओं को पंद्रह मिनट में निपटाने की बात कर देते हैं और उस पर कुछ नहीं होती। ऐसे बयान बार-बार आते रहते हैं, लेकिन मीडिया को ऐसा नहीं लगता कि ये धमकी है, उकसाना है। शायद मीडिया भी समझती है कि उकसना भी समुदाय विशेष का ही विशेषाधिकार है, हिन्दू को तो कुछ भी कर लो, सड़क पर वो आने से रहा। आहत होना भी समुदाय विशेष का ही विशेषाधिकार है, और वो दोनों ही सूरतों में इसका प्रयोग कर लेता है: उसके मजहब पर टिप्पणी करो तब भी, अपने धर्म के प्रतीकों का इस्तेमाल करो तब भी।

समुदाय विशेष के आहत होने का कोई ओर-अंत नहीं। दिल्ली के दंगे भी वही करता है, तैयारी के साथ करता है, और फिर विचित्र तरीके से रोता भी है कि समुदाय विशेष के सफाए की बात हो रही थी, नरसंहार हो गया! फैसल फारूख के स्कूल की छत हो, या आम आदमी पार्टी के पार्षद ताहिर हुसैन के घर की छत… हर पंद्रह घर की छत पर गुलेल, पेट्रोल बम, एसिड की बोतलें… मस्जिद की छत पर पत्थरों का ढेर… फिर भी, समुदाय विशेष रो रहा है कि हिन्दुओं ने दंगा किया! सोशल मीडिया का दौर न होता तो ये भी गोधरा की तरह हिन्दुओं के सर पर डाल दिया जाता भले ही 59 कारसेवकों को जलाने का घिनौना काम समुदाय विशेष ने किया।

समुदाय विशेष की यही दिल को दीवाना बना देने वाली अदा आज हमें जमशेदपुर, नालंदा, बेगूसराय से ले कर हैदराबाद तक दिख रही है कि वो भगवा झंडा देखते ही परेशान हो जाते हैं। आप भला सोचिए कि झंडे से किसी को परेशानी क्यों होगी? चूँकि उम्माह की भाषा और राह पर चलने वाले समुदाय विशेष की अधिकता है दुनिया में, जो खुल कर कहते हैं कि राष्ट्र और इस्लाम में चुनना पड़ा तो इस्लाम चुनूँगा, वैसे में हिन्दू इनके गजवा-ए-हिन्द की राह में तो मोहम्मद बिन कासिम के समय से बैठा हुआ है, तो समस्या तो होगी ही।

इसलिए, भगवान हनुमान का स्टिकर ‘मिलिटेंट हिन्दुइज्म’ हो जाता है। राम के हाथ का धनुष कभी इन्हें हिंसा को बढ़ावा देने वाला लगेगा। फिर कहेंगे कि दुर्गा के हाथों से शस्त्रास्त्रों को हटा कर फूल-पत्तियाँ दे दो, चाँद-तारा दे दो तो और भी अच्छा, हिजाब पहना दो तो और बेहतर… बुर्के में दिखा दो तो गाल पर गीली पप्पियाँ ही ले लेगा कट्टरपंथी!

कमाल की बात देखिए कि यहाँ मूर्तियों के हाथों में अस्त्र है, चित्रों को चेहरे पर के रौद्र भाव से वो ‘मिलिटेंट’ प्रवृत्ति का हो जाता है, लेकिन इन्हीं कट्टरपंथियों को दुनिया के हर शहर में पूरे देह पर बम बाँध कर फटने वाले कट्टरपंथियों को आतंकी कहने में अभी तक दर्द होता है। चित्र में चेहरे के भाव और जमीन पर लाशों के ढेर पर टुकड़ों में बिखरा कट्टरपंथी… ज्ञानी लोगों के लिए चेहरे का भाव ज्यादा खतरनाक है।

ये मजाक नहीं है। इन्होंने अंग्रेज़ी के हिन्दुइज्म को सही माना है और उसके हिन्दी अनुवाद ‘हिन्दुत्व’ को आतंकी कह दिया है। ये मूर्खता है या धूर्तता, ये समझनें में समय लग जाएगा। ईद में सेवई की खीर माँगता हिन्दू असली हिन्दू है, उसने घर पर भगवा झंडा लगा लिया तो वो मिलिटेंट माना जाएगा। दीवाली पर पटाखे से होने वाली आवाज से जानवरों को हो रही परेशानी पर यही समुदाय विशेष और उसके हिमायती लम्बे ज्ञानवर्धक पोस्ट लिखते हैं, बकरीद पर कटते जानवरों सो कोई समस्या नहीं। अरे! वो तो मर ही गया, अब कष्ट कैसा! असली कष्ट तो जिंदा हो कर पटाखे सुनने में है!

भगवा झंडा: हिन्दुओं की गरिमा, सम्मान और परिभाषा का अंश

बात भगवा झंडे या रंग की नहीं, बात यह है कि सामाजिक बहुसंख्यक होने की परिणति जब दो बार राजनैतिक बहुसंख्यक होने में दिखी है, और कुछ लोगों को लग रहा है कि उनके ‘साड़कीय शक्ति प्रदर्शन’ का युग हाथों से चला जाएगा कुछ सालों में, तो कम होते तेल वाले दीये की फड़फड़ाती लौ की तरह वो अब और मुखर हो चले हैं। अब लक्ष्य स्वयं की शक्ति को दिखाने भर का नहीं, अब हिन्दुओं पर वैचारिक धावा बोलने का है कि तुम्हारा अस्तित्व मात्र ही इस दुनिया के लिए हानिकारक है।

वैसे, हम सब जानते हैं कि वो मजहब कौन सा है जिसके आतंक का ताप हर देश का हर शहर झेल चुका है जहाँ ये हैं, या नहीं हैं। यही कारण है कि इनकी मुखरता अपनी टोपी कस कर पहनने और सड़कों के नमाज से आगे, लॉकडाउन में भी मस्जिदों को आबाद करने से ले कर, अब हिन्दुओं के दुकानों के नाम, उनके ठेले के झंडे तक पहुँच चुकी है। ये अभी कुछ दिन चलेगा क्योंकि दुर्भाग्य से तुष्टीकरण कुछ जगहों पर चल ही रहा है, वहाँ के हिन्दू अभी भी राजनैतिक रूप से सो ही रहे हैं।

बात भगवा झंडे की नहीं, बात अनुच्छेद 370 से शुरु हो कर, अयोध्या विवाद और चोर-लुक्कर घुसपैठिया समुदाय विशेष को यहाँ से निकालने वाले NRC और CAA तक पहुँच चुकी है। यही तो कारण है कि कानूनी रूप से जितने कट्टरपंथी यहाँ हैं, उससे कहीं ज्यादा होने का क्लेम इनके नेता कर देते हैं। दो करोड़ बांग्लादेशी मुस्लिम हैं इस देश में, और वो दीमक हैं, उनको कीटनाशक जाल कर बाहर निकालना चाहिए और फिर अपने देश वापस भेदने की तैयारी होनी चाहिए।

इसलिए, पाकिस्तानियों के लिए जासूसी करने से ले कर, भारत में बम फोड़ने वालों को बाहर निकालने के लिए कानून आया, तो आतंक के हिमायतियों की सुलगने लगी है। वो परेशान हैं कि गजवा-ए-हिन्द की राह में ये लोकतंत्र कैसे आ गया, अभी तक तो बलात्कारियों और लुटेरों को ताजमहल निर्माता बता कर भारत की रक्षा करने वाला बता कर, मुग़ल सल्तनत पढ़ाते रहे, कुछ दिनों में कश्मीर से संस्कृत को गायब कर उर्दू पहुँचाने की तरह भारत में भी वही होने वाला था, लेकिन ये CAA से तो गड़बड़ हो गई!

इसीलिए, दोनों तरफ से संवैधानिक तरीके से चुनी हुई सरकार और उसके समर्थकों पर नाजायज हमले हो रहे हैं। भगवा रंग से आपत्ति हो रही है, ट्विटर पर पुलिस संज्ञान ले रही है और कोई भी वीडियो बना कर बता रहा है कि उस हिन्दू ठेले वाले के हिन्दू प्रतीक ध्वज के इस्तेमाल से उसकी भावनाएँ आहत हो रही हैं। हिन्दू इस तरह से हीनभाव में जीता रहा है कि एक बार उसे भी लगने लगता है कि ‘यार! क्यों लगा दिया भगवा झंडा?’

हिन्दू स्वतः बैकफुट पर आ जाता है कि जरूर हमने ही गलती की होगी। चार-पाँच सौ सालों का आतंकी सेकुलरिज्म यही तो है कि जिस धरती के लोगों ने लुटेरों, समुदाय विशेष के आतंकियों, अंग्रेज चोरों को बसने दिया, वो अब हिन्दुओं को इसलिए सजा दे रहा है कि तुम्हारे पास मौका था तो तुमने समुदाय विशेष के आक्रांताओं की तरह सत्ता हासिल करते ही कत्लेआम क्यों नहीं मचाया!

अरे भाई! हिन्दू गाय पालने और मंदिर में पूजा की घंटी बजाने से आगे गया ही कब? हमारे अखाड़ों की शस्त्र परंपरा को पानी कर ही दिया गया, गुरुकुल तबाह कर दिए, संस्कृति पर सतत हमले किए, विश्वविद्यालयों को आग लगाया ही… हिन्दू तो बाबर का बेटा हुमायूँ और हुमायूँ का अकबर रटने में व्यस्त रहा और अपने आराध्य को टेंट से निकालने में उसे सात दशक लग गए। हम कहाँ जा कर हमला करते? कभी किया ही नहीं।

जबकि ईसाइयों और मुगलों का पूरा इतिहास रक्तरंजित रहा है, मजहब की आड़ में एक प्रसारवादी, साम्राज्यवादी सोच के साथ इनके लुटेरों की फौजें हजार सालों से योजनाबद्ध तरीके से उपनिवेश बनाने से लेकर पूरे राष्ट्रों को मजहब बदलने पर मजबूर किया है। हिन्दू प्राचीन भारत की सीमाओं से बाहर गया ही नहीं। कहीं भी धर्म-परिवर्तन का जिक्र नहीं, किसी राजा ने जीते हुए साम्राज्य के पवित्र स्थलों को तोड़ा हो, ऐसी भी नहीं दिखता। राजाओं ने जीते हुए क्षेत्रों पर राज किया, प्रजा के इतिहास को मिटाने की कोशिश नहीं की, उनकी बच्चियों का बलात्कार नहीं किया।

इसलिए, वो अपने ही धर्म का अनुयायी होने पर, उसी के प्रतीकों के इस्तेमाल पर स्वयं पर संदेह करने लगता है कि पूजा करना गलत तो नहीं, कलावा लगाना गलत तो नहीं, रोली-चंदन और अक्षत को ललाट पर धारण करना गलत तो नहीं?

भगवा झंडा और हिन्दू

यज्ञ की अग्नि की ऊपरी लौ का रंग भगवा होता है, बीच का पीला, नीचे लाल। यज्ञ में आहुतियाँ दी जाती हैं, त्याग किया जाता है। अग्नि स्वयं तो पवित्र है ही, बल्कि अपने संपर्क में आने वाली वस्तुओं को भी पवित्र करती है। अग्नि ऊर्जा है। हर पवित्र, मंगलकारी कार्य की जड़ में अग्नि किसी न किसी रूप में स्थित होती है।

भगवा रंग उसी अग्नि के रूप का परिचायक है। भगवा उसी त्याग का प्रतीक है जो यज्ञ कुंड की आहुति होती है। भगवा वस्त्र वहीं धारण करता है जिसने सब कुछ त्याग दिया हो। कुछ साधु जो शिष्यादि हैं, वो पीला वस्त्र पहनते हैं। भगवा वही धारण करते हैं जिन्होंने सांसारिकता का त्याग कर दिया है, और सिर्फ समाज-राष्ट्र कल्याण के लिए समर्पित हैं।

भगवा झंडा उसी पवित्रता का प्रतीक है। भगवा रंग अग्नि के उसी भाव का प्रतीक है, इसलिए सनातन आस्था से जुड़े हर धर्म में (सिक्ख, बौद्ध, जैन आदि) में इस रंग का स्थान सर्वोच्च है। ध्वज का होना हिन्दुओं को अपने संतों की याद दिलाता है, जिन्होंने सहस्त्रों वर्षों से इस भारतभूमि और सनातन परंपरा को बताए रखा। जो हमारे आज के लिए पूर्व में स्वयं को बलिदान कर गए।

इसलिए, यह रंग किसी की आँखों को चुभता है तो समस्या उसकी है। ये उसकी दुष्टता और नीचता है कि उसे हमारे धर्म के प्रतीक चिह्नों से घृणा है। वो अत्यंत ही अधम श्रेणी का जीव है जिसे दूसरे मानव की आस्था से समस्या है। इन्हें आम जनता ही जवाब देगी, वही प्रतिकार भी करेगी, वही इन्हें इनके अपराधों की याद भी दिलाएगी।

हिन्दू हमेशा थोड़ा लम्बा रास्ता लेता है। कुछ लोग दंगों के छोटे रास्ते से चलते हैं। वो भले ही बाबरी मस्जिद में कुछ साल नमाज पढ़ लें, लेकिन रामलला तो अपने ही जन्मस्थान में जाएँगे। लोकतंत्र का ही प्रयोग कर अगर पुलिस आज भगवा झंडे लगाने पर केस दर्ज कर रही है, तो यही पुलिस उसे वापस भी लेगी क्योंकि उसके हाथों को बाँधने वाले नेता अनंतकाल के लिए नहीं आते। यही भ्रम चोरों के एक खानदान को भी था, वो आज कल क्षेत्रीय पार्टियों के साथ किसी भी तरह गठबंधन कर के केन्द्रीय सत्ता में आने का स्वप्न कुछ ऐसे ही देख रही है जैसे गीदड़-गीदड़ी का जोड़ा पंचतंत्र की एक कहानी में एक साँड़ के पीछे इस लालच में चल रहा था कि उसके मांसल अंडकोश कभी तो जमीन पर गिरेंगे और वो कभी तो उन्हें खा पाएँगे। गीदड़-गीदड़ी भूख से मर गए।

उदयपुर का वो महादेव मंदिर, जहाँ हर दिन जल चढ़ाते थे इरफ़ान खान, गायों को खुद खिलाते थे चारा

बॉलीवुड अभिनेता इरफान खान के निधन के बाद वह लगातार इस्लामिक कट्टरपंथियों के निशाने पर हैं। लम्बी बिमारी के बाद आखिरी सॉंस लेने के बाद से ही इरफ़ान खान के बाद उनके द्वारा मजहब की कट्टरताओं पर उनके बयान चर्चा का विषय हैं। इसके साथ ही इरफ़ान खान की कुछ पुरानी ऐसी ख़बरें भी फिरसे शेयर की जा रही हैं जिनमें देखा जा रहा है कि वो मंदिर भी जाया करते थे और गाय से भी प्रेम करते थे।

महादेव मंदिर जाते थे इरफ़ान

आज से ठीक एक साल पहले इरफ़ान खान उदयपुर में अपनी फिल्म इंग्लिश मीडियम की शूटिंग के लिए गए थे। यह अनुभव उदयपुर में इरफान के ड्राइवर रहे नरपत सिंह आसिया ने शेयर किए हैं। उन्होंने बताया कि वो करीब 45 दिन तक इरफ़ान के साथ रहे। दैनिक भास्कर के रिपोर्टर सर्वेश शर्मा की यह स्टोरी सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही है।

इरफान के ड्राइवर रहे नरपत सिंह ने भावुक होकर बताया कि इरफान उनके गाँव कड़िया भी आए थे। वहाँ वो खेत में घूमे, बाड़े में गाय-बछड़ों को दुलारते। यही नहीं जब नरपत सिंह की माँ ने इरफान को आराध्य श्रीनाथजी की तस्वीर दी तो उन्होंने उसे सर से भी लगाया। इरफ़ान की मृत्यु से दुखी नरपत सिंह ने कहा कि इरफ़ान उनकी माँ द्वारा बनाई हुई चाय के लिए कहते थे कि यह एकदम उनकी अम्मी की बनाई हुई चाय जैसी है।

नरपत सिंह के परिवार के साथ इरफ़ान खान

ड्राइवर नरपत सिंह ने बताया कि जैसे ही वो लोग होटल से निकलते तो इरफ़ान खान सबसे पहले महादेव के मंदिर जाते वहाँ जल चढ़ाते और गाय को चारा और कुत्तों को रोटी भी खिलाते थे, ये उनका रुटीन था। इसके बाद ही इरफ़ान फिल्म की शूटिंग पर जाते थे।

भारत लौटकर त्र्यंबकेश्वर मंदिर में किया था हवन

वर्ष 2018 में इरफान जब लंदन में अपनी बीमारी न्यूरो एंडोक्राइन ट्यूमर का इलाज करा रहे थे तो उनके दिवाली के समय चुपके से 2 दिन के लिए भारत आने की बात सामने आई थी। रिपोर्ट्स में बताया गया कि इरफान भारत आने के बाद सीधे नासिक के त्र्यंबकेश्वर शिव मंदिर में गए और वहाँ पर उन्होंने पूजा और हवन भी किया था।

वेबसाइट स्पॉटबॉय के अनुसार इरफान 2 दिन के निजी काम के लिए भारत आए थे। उन्होंने इसकी भनक किसी को लगने नहीं दी। इरफान नासिक के पास त्र्यंबकेश्वर मंदिर गए, जहाँ उन्होंने भगवान शिव की पूजा की। इरफान भारत में केवल 2 दिन रहे और वापस लंदन लौट गए।

इरफ़ान खान को वर्ष 2018 में पता चला था कि वह न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर से पीड़ित हैं। इस बीमारी के इलाज के लिए इरफान खान लंदन भी गए थे और करीब साल भर इलाज कराने के बाद वह वापस भारत लौटे। इरफान खान अपने इलाज के कारण काफी दिनों तक बॉलीवुड से भी दूर रहे थे।

हालाँकि, लंदन से स्वस्थ होकर लौटने के बाद उन्होंने बॉलीवुड में वापसी की और अंग्रेजी मीडियम की शूटिंग भी की थी। इरफान खान को बीते दिन वर्सोवा के कब्रिस्तान में दफनाया गया। देशव्यापी लॉकडाउन के कारण उनकी अंतिम विदाई में केवल 20 लोग ही शामिल हो पाए। उनकी मौत के बाद इस्लामिक कट्टरपंथी उनकी आस्था और विश्वास के कारण उनके खिलाफ लगातार घृणा से भरे हुए बयान देते हुए देखे जा रहे हैं।