कोरोना वायरस संक्रमण पर काबू पाने के लिए जारी लॉकडाउन को दो सप्ताह के लिए बढ़ा दिया गया है। यानी, Lockdown3 17 मई तक रहेगा। देशभर को तीन हिस्सों में बॉंटा जा रहा है। ग्रीन जोन में कई ढील मिलेंगी। साथ ही दूसरे राज्यों में फॅंसे लोगों के लिए स्पेशल ट्रेनें भी चलाई जाएँगी।
इस बाबत केंद्रीय गृहमंत्रालय ने गाइडलाइन जारी की है। स्पेशल ट्रेनों को छोड़कर सार्वजनिक परिवहन जैसे रेलवे और विमान सेवाएँ पूरी तरह से स्थगित रहेंगी।
In red zones, outside containment zones, certain activities are prohibited in addition to those prohibited throughout India. These are: plying of cycle rickshaws&auto rickshaws; taxis&cab aggregators; intra-district&inter-district plying of buses&barber shops,spas&saloons: MHA https://t.co/LCSEKe416U
इस बार लॉकडाउन में छूट के तहत ग्रीन और ऑरेंज जोन में ई-कॉमर्स को भी छूट का ऐलान किया गया है। वहीं रेड जोन और कंटेनमेंट जोन के बाहर देश भर में अभी भी साइकिल रिक्शा, ऑटो रिक्शा, टैक्सी, कैब और जिले के अंदर या बाहर बसों की आवा जाही, नाई की दुकान, स्पॉ और सैलून पर प्रतिबंध रहेगा।
ग्रीन जोन में गृह मंत्रालय द्वारा दी गई छूट जारी रहेगी। स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, देश में रेड जोन के तहत 130 जिले, ऑरेंज जोन के तहत 284 जिले और ग्रीन जोन के तहत 319 जिलों को रखा गया है। हर सप्ताह इसका आकलन किया जाएगा और संक्रमित मामलों के अनुसार जोन में बदलाव होगा।
आपको बता दें कि गृह मंत्रालय ने आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 के तहत एक आदेश जारी करते हुए लॉकडाउन की अवधि को 4 मई से दो सप्ताह के लिए और बढ़ा दिया है। वहीं गृह मंत्रालय की ओर से जारी की गई प्रेस रिलीज के मुताबिक देश के अलग-अलग हिस्सों में फँसे प्रवासी मजदूर, श्रद्धालु, पर्यटक, विद्यार्थी और अन्य लोगों को रेल मंत्रालय द्वारा द्वारा चलाई जाने वाली विशेष ट्रेनों से दूसरे स्थानों पर जाने की छूट होगी।
साथ ही इनके जाने के हेतु राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों के साथ समन्वय बनाने के लिए रेल मंत्रालय नोडल ऑफिसरों को जिम्मेदारी सौंपेगा। जारी विज्ञप्ति के अनुसार रेल मंत्रालय टिकटों की बिक्री, सोशल डिस्टेंसिंग, रेलवे स्टेशनों, प्लेटफार्म और रेल के अंदर सुरक्षा मानकों के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी करेगा।
गौरतलब है कि कोरोना की रोकथाम के लिए देश में 3 मई तक लॉकडाउन घोषित था, लेकिन लगातार बढ़ते कोरोना के मामलों को ध्यान में रखते हुए सरकार ने एक बार फिर लॉकडाउन की अवधि को तीसरी बार बढ़ा दिया है।
आपको बता दें कि स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक देश में कोरोना से अब तक 1153 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि इससे संक्रमित लोगों की संख्या 35 हजार को पार कर चुकी है। राहत की बात यह है कि अब तक संक्रमित लोगों में से 9064 लोग ठीक होकर अपने घरों को जा चुके हैं।
कोरोना वायरस के फैलते संक्रमण के बीच चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल बिपिन रावत समेत तीनों सेनाओं के प्रमुखों ने आज (मई 1, 2020) प्रेस कॉन्फ्रेंस की। सीडीएस बिपिन रावत ने कॉन्फ्रेंस की शुरुआत में सेना की तरफ से कोरोना के खिलाफ़ लड़ाई लड़ रहे योद्धाओं को सलाम किया। उन्होंने बताया कि 3 मई (रविवार) को तीनों सेनाओं की तरफ से विशेष गतिविधियाँ होंगी। एयरफोर्स श्रीनगर से तिरुअनंतपुरम और डिब्रूगढ़ से कच्छ तक फ्लाइपास्ट करेगी।
On behalf of armed forces, we want to thank all COVID-19 warriors. Doctors, nurses, sanitation workers, police, home guards, delivery boys & media which has been reaching out with the message of government on how to carry on with lives in difficult times: CDS General Bipin Rawat https://t.co/PorqNow6P0
उन्होंने कहा, “कोरोना वॉरियर्स के समर्थन में नेवी समुद्र किनारों को रोशनी से जगमगा देगी। 3 मई की शाम नेवी तटीय क्षेत्रों में अपने युद्धक जहाज तैनात करेगी। ये वॉरशिप्स रोशनी से जगमगाएँगे और नेवी के हेलिकॉप्टर्स कुछ अस्पतालों और खासकर कोविड स्पेशल अस्पतालों पर फूल बरसाएँगे।”
The Army on its part will conduct mountain band displays along some of the COVID hospitals in almost every district of our country. The armed forces will also lay wreathe at the police memorial on May 3 in support of our police forces: Chief of Defence Staff General Bipin Rawat pic.twitter.com/xdzjNk4rvd
आर्मी अपनी तरफ से देशभर के करीब-करीब सभी जिलों के कुछ कोविड अस्पतालों के पास माउंटेन बैंड परफॉर्मेंस देगी। पुलिस बलों के समर्थन में सशस्र बल 3 मई को पुलिस मेमोरियल पर माल्यार्पण भी करेंगे।
During the India Air Force’s flypast, the aircraft will also be showering flower petals at some places: Chief of Defence Staff General Bipin Rawat https://t.co/ulPkqueQPU
उल्लेखनीय है कि देश की सेना इस समय कोरोना वायरस से देश को उभारने के लिए अपना योगदान स्वास्थ्यकर्मियों की तरह ही दे रही है। उन्होंने इस बीच कई क्वारंटाइन सेटर बनाए हैं। साथ ही पड़ोसी देशों में कोरोना वायरस के संक्रमण से निपटने में अपनी टीमें भेजने की योजना बना रही है।
आज की कॉन्फ्रेंस में उन्होंने स्पष्ट कहा है कि देश की सेना सरकार के हर कॉल के साथ है। इसके अलावा आर्मी चीफ जनरल ने ये बताया है कि कोरोना से लड़ने में कोई परेशानी नहीं हैं। आर्मी का पहला मरीज अब ठीक हो चुका है और अपनी ड्यूटी पर भी तैनात है। अब तक आर्मी में कोरोना के 14 मामले आए हैं। इनमें से 5 ठीक होकर अपने काम पर लौट गए हैं।
No problems in dealing with the issue of Coronavirus. The first patient in the Army is cured and the jawan is back on duty. Army so far has had only 14 cases of which 5 have been cured and they have returned to work: Army Chief General Manoj M Naravane (file pic) pic.twitter.com/PXnMjy3MQB
बता दें कि इससे पहले रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कोरोना वायरस महामारी से निपटने के लिए सशस्त्रबलों की संपूर्ण तैयारी का जायजा लेने के उद्देश्य से गुरुवार को देश के शीर्ष सैन्य अधिकारियों के साथ एक बैठक की थी। इस बैठक में प्रमुख रक्षा अध्यक्ष जनरल बिपिन रावत, नौसेना प्रमुख एडमिरल करमबीर सिंह, वायुसेना प्रमुख एयरचीफ मार्शल आर के एस भदौरिया और सेना प्रमुख जनरल एम एम नरवणे उपस्थित थे।
कानपुर में मेडिकल और पुलिस टीम पर हमले के सिलसिले में अब तक 20 गिरफ्तारियॉं हुई है। 200 लोगों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। हमला 29 अप्रैल को तब किया गया जब एक कोरोना पॉजिटिव के परिजनों को क्वारंटाइन कराने के लिए पुलिस और मेडिकल टीम उनके घर पहुॅंची थी।
डीएम ब्रह्मदेव तिवारी ने बताया कि हमले में शामिल 10 लोगों की तत्काल पहचान करते हुए गिरफ्तारी की गई। 10 और लोगों को आज गिरफ्तार किया गया है। सभी के खिलाफ में आपदा प्रबंधन एक्ट, महामारी अधिनियम, IPC की संगत धाराओं और NSA के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।
न्यूज 18 हिंदी की खबर के मुताबिक हमलावरों ने पुलिस पर तेजाब से भरी काँच की बोतलें फेंकी थीं। हमले में कई पुलिसकर्मियों के कपड़े तेजाब से जल गए। उपद्रवियों ने मौके का फायदा उठाते हुए पुलिसकर्मियों पर बम और गोली भी चलाई थीं। इलाके में तनावपूर्ण माहौल को देखते हुए फिलहाल पुलिस फोर्स तैनात है।
अमर उजाला की खबर के मुताबिक घटना के तुरंत बाद पुलिस ने मोहम्मद गुफरान, अशरफ अली, मोहम्मद आरिफ, साहिब, एहसान, इरशाद, मोहम्मद अकबर, अनीश बेग, शाहिद और ताहिर को गिरफ्तार कर नामजद किया था। एसपी पश्चिम डॉ. अनिल कुमार ने बताया कि गुरुवार को आरोपियों को कोर्ट में पेश करने के बाद चौबेपुर में बनी अस्थायी जेल भेज दिया गया है। सभी का सैंपल भी लिया गया है। 14 दिन बाद दोबारा जाँच होगी। इसके बाद इन्हें जेल भेजा जाएगा।
आपको बता दें कि बुधवार को कानपुर में कोरोना संक्रमण के हॉटस्पॉट चमनगंज में एक कोरोना संक्रमित मरीज के परिवार के सदस्यों को क्वारंटाइन कराने के लिए लेने पहुँची पुलिस और मेडिकल की टीम पर स्थानीय लोगों ने हमला कर दिया था। गुलाब घोषी मस्जिद के पास स्वास्थ्य विभाग और पुलिस की टीम जैसे ही कोरोना पॉजिटिव मरीज के संपर्क में आए लोगों को वहाँ से लेकर चली, ऐसे ही 50-60 लोग इसका विरोध करते हुए अपने घरों से बाहर निकल आए थे।
जब पुलिस ने उन्हें रोकने का प्रयास किया तो पथराव शुरू कर दिया। पुलिस ने किसी तरह से स्वास्थ्य विभाग की टीम को मौके से निकाल दिया। इसके बाद कई थानों के फोर्स को बुलाकर पत्थरबाजों को खदेड़ गया था। इसके बाद घटना स्थल पर भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया। इस हमले में दो पुलिसकर्मियों को चोटें भी आईं थी।
इस घटना पर तुरंत सज्ञान लेते हुए सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि पुलिस और स्वास्थ्यकर्मियों पर हमला करने वालों की जल्द पहचान की जाए। ऐसे लोगों के खिलाफ महामारी अधिनियम और आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया जाए। इसके साथ ही सीएम योगी ने कहा था कि आरोपितों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) और गैंगस्टर एक्ट के तहत भी सख्त कार्रवाई की जाए। कोरोना योद्धाओं पर हमले बर्दाश्त नहीं किए जाएँगे।
मुंबई के एक अस्पताल में कॉन्ग्रेस की निगम पार्षद मेहर हैदर ने डॉक्टरों के साथ बदसलूकी की। रिपब्लिक टीवी के मुताबिक, ये वाकया 24 अप्रैल देर रात का है। इस पर संज्ञान आज यानी शुक्रवार (1 मई) को लिया गया। सीसीटीवी फुटेज में हैदर की हरकतें दर्ज हैं।
फुटेज पर ध्यान जाने के बाद ग्लोबल हॉस्पिटल ऐंड रिसर्च सेंटर ने कॉन्ग्रेस नेत्री के खिलाफ पुलिस का रुख किया। लेकिन मामले के एक सप्ताह बीत जाने के बाद भी मुंबई पुलिस ने अस्पताल की बात सुनकर हैदर के ख़िलाफ़ केवल शिकायत दर्ज की, FIR नहीं।
अपनी शिकायत में अस्पताल ने मेहर हैदर पर अवैध तरीके से अस्पताल में घुसने का आरोप लगाया है। अस्पताल ने कहा है कि हैदर 24 अप्रैल को बिना किसी जानकारी और पॉइंटमेंट के अस्पताल में आईं और नियम-कानून तोड़ते हुए ज़बरदस्ती मरीजों के वार्ड में घुस गईं।
अस्पताल का ये भी आरोप है कि वे इस दौरान परिसर में 45 मिनट तक रहीं। साथ ही डॉक्टरों को ‘शराबी’ कह कहकर उनपर चिल्लाती रहीं व धमकी देती रहीं कि वे अस्पताल को क्वारंटाइन सेन्टर में बदल देंगी।
सीसीटीवी फुटेज में साफ देख सकते हैं कि मेहर हैदर 4-5 लोगों के साथ अस्पताल में जबरदस्ती घुसती चली आईं। वहीं रिपब्लिक टीवी से बात करते हुए उन्होंने दावा किया कि अस्पताल में घुसते हुए उनकी स्क्रीनिंग हुई थी और उनके साथ मौजूद सभी लोगों की भी स्क्रिनिंग की गई थी।
इसके अलावा उन्होंने ऑन टीवी अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को खारिज किया और खुद को बेगुनाह बताने के लिए अस्पताल पर वीडियो से छेड़छाड़ का आरोप लगाया। वे ये कहती रहीं कि वीडियो तो अस्पताल के हाथ में हैं।
बता दें कि महाराष्ट्र में अब तक कोरोना के 9 हजार 915 मामलों की पुष्टि हो चुकी है। 432 लोगों की संक्रमण के कारण राज्य में अब तक मौत हो चुकी है।
उत्तराखंड के पौड़ी जिले में सरकारी राजस्व पुलिस की एक महिला आंगनबाड़ी सेविका से अभद्रता पर पुलिस ने संज्ञान लिया है। सोशल मीडिया पर भी यह वीडियो खूब वायरल हुआ। वीडियो में देखा जा सकता है कि महिला द्वारा दिलशाद खान नाम के पटवारी (राजस्व पुलिस) को लॉकडाउन के नियमों की अवहेलना करने पर सवाल पूछने वाली महिला के साथ दिलशाद खान ने न सिर्फ दबंगई दिखाई बल्कि अपने मुस्लिम होने के कारण विक्टिम कार्ड खेलने का प्रयास भी किया। दिलशाद खान ने महिला से उनका मोबाइल भी छीन लिया और उनके साथ अभद्रता भी की। दिलशाद खान राजस्व उप निरिक्षक क्षेत्र के गौलीखाल चौकी में तैनात हैं।
आँगनबाड़ी सेविकाओं को मिली है कोरोना वायरस पर जागरूकता की जिम्मेदारी
दरअसल, उत्तराखंड सरकार के आदेश पर आँगनबाड़ी सेविकाएँ कोरोना वायरस से बचाव के लिए लोगों को जागरूक कर रही हैं। इसी दौरान अपनी ड्यूटी पर तैनात एक आंगनबाड़ी सेविका ने बिना मास्क पहने और ‘पुलिस’ नेम प्लेट वाली बाईक पर घूमते पटवारी को देखा तो उसे रोककर मास्क लगाने की सलाह दी।
साथ ही उन्होंने उनसे यह भी सवाल किए कि वह लॉकडाउन के बावजूद रोज अपने घर बाइक पर क्यों निकल जाते हैं? यह सब सवाल दिलशाद खान को अपनी शान में दखलंदाजी महसूस हुई और पटवारी का मिजाज गर्म हो गया।
Absolutely shocking. The Anganwadi karyakartas are our frontline Corona warriors & she is being vigilant in her duty. The hill districts of Uttarakhand need to be protected. Such movement should not be allowed.@tsrawatbjp Ji plz initiate appropriate action against this officer.
जब आँगनबाड़ी सेविका पूरे घटनाक्रम का वीडियो बनाने लगी, तो दिलशाद पटवारी ने विक्टिम कार्ड खेलने की कोशिश की और अपने मजहब को बीच में लाने का प्रयास किया। इसके अलावा दिलशाद खान आँगनबाड़ी सेविका को अपने पद की धौंस भी दिखाने लगा। इस सबके बावजूद महिला भी लगातार पटवारी से मास्क न पहनने का कारण पूछती रही। इसी दौरान वीडियो बनाने से बौखलाए पटवारी ने महिला आँगनबाड़ी सेविका का हाथ पकड़कर उनसे मोबाईल छीन लिया।
सोशल मीडिया पर आँगनबाड़ी सेविका और दिलशाद खान की झड़प का वीडियो खूब वायरल हुआ। वीडियो में देखा जा सकता है जब आँगनबाड़ी सेविका ने राजस्व अधिकारी दिलशाद खान से पूछा कि आप रोज घर से आना जाना करते हो, क्या आपको संक्रमण नही हो सकता? तो इस बात पर दिलशाद खान ने महिला के साथ अभद्रता की। रिपोर्ट्स के अनुसार, ग्रामवासियों का भी कहना है कि दिलशाद खान नियमों की अवहेलना करते हुए रोजाना काशीपुर से पौड़ी आवागमन करते हैं जिस कारण महिला ने उनसे सवाल करना जरूरी समझा।
पटवारी दिलशाद का घर उधमसिंहनगर जिले में है और वह हर दिन घर से पौड़ी अपनी बाइक, जिसके आगे ‘पुलिस’ लिखा हुआ है, से बिना किसी भय के आने-जाने के साथ ही बिना मास्क पहने घूमता रहता है। उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड का उधमसिंह नगर जिला भी कोरोना वायरस संक्रमण के हॉटस्पॉट बने जिलों मे से एक है।
दिलशाद खान मामले को जाँच के लिए जिलाधिकारी को सौंपा गया
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे इस वीडियो पर संज्ञान लेते हुए एसएसपी जिला पौड़ी गढ़वाल द्वारा कार्रवाई हेतु यह मामला जिलाधिकारी को भेजा गया है।
— Uttarakhand Police (@uttarakhandcops) May 1, 2020
वास्तव में दिलशाद खान इस वजह से भी चिंता का विषय हैं क्योंकि सरकारी पदों पर रहने के बावजूद भी उनका व्यवहार अन्य मुस्लिमों की तरह ही देखा गया है जो कि देशभर में कोरोना वायरस के बीच जारी लॉकडाउन के दौरान उपद्रव मचा रहे हैं। यदि प्रशासन का हिस्सा होने के बावजूद और उत्तराखंड जैसे राज्य में भी एक मुस्लिम अपने नाम के कारण विक्टिम कार्ड खेलते हुए देखा जाता है तो यह वास्तव में एक चिंता का विषय है।
महाराष्ट्र राज्य का गठन 1 मई 1960 को हुआ था। तब से अब तक हर साल इस दिन को ‘महाराष्ट्र दिवस’ के रूप में मनाते हैं। इसी दिन ‘बॉम्बे रीऑर्गेनाईजेशन एक्ट’ पास हुआ था। इससे पहले अलग राज्य की माँग को लेकर प्रदर्शनों की झड़ी लग गई थी। ये एक्ट उसका ही परिणाम था।
यहाँ हम नेहरू के जिद्दी रुख की बात करेंगे। लेकिन पहले कुछ और बातें समझनी पड़ेंगी। पहले ‘स्टेट ऑफ बॉम्बे’ के अंतर्गत मराठा, गुजराती, कच्छी और कोंकणी बोलने वाले लोगों के क्षेत्र आते थे लेकिन ‘संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन’ के कारण तस्वीर बदल गई। उक्त एक्ट ने बॉम्बे को गुजरात और महाराष्ट्र के रूप में पुनर्गठित किया।
कैसे गठन हुआ महाराष्ट्र और गुजरात का?
मराठी और कोंकणी भाषी क्षेत्र महाराष्ट्र का हिस्स्सा बने, जबकि गुजराती और कच्छी गुजरात का हिस्सा बने। मुंबई के दादर स्थित शिवाजी पार्क में हर वर्ष इसके आलोक में भव्य आयोजन होता है। राज्यपाल, मुंबई पुलिस और महाराष्ट्र सरकार के साथ-साथ अधिकारीगण इस कार्यक्रम का हिस्सा बनते हैं।
इस बार कोरोना वायरस के कारण परेड और कार्यक्रम वगैरह संभव नहीं हो सका। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे सहित कई बड़े नेताओं ने ‘महाराष्ट्र दिवस’ पर शुभकामनाएँ प्रेषित कीं। ‘बॉम्बे पुनर्गठन अधिनियम 1960’ जब पास हुआ, तब केंद्र में जवाहरलाल नेहरू की सरकार थी। असल में गुजरातियों ने भी अपने अलग राज्य के लिए आंदोलन तेज़ किया हुआ था।
1956 में आए राज्यों के पुनर्गठन अधिनियम के तहत भाषा के आधार पर राज्यों का बँटवारा हुआ लेकिन मराठियों को अलग राज्य नहीं मिला। उस समय कन्नड़ भाषी क्षेत्रों को कर्नाटक, तमिल को तमिलनाडु, तेलुगु को आंध्र और मलयालम को केरल के रूप में पुनर्गठित किया गया था। इसके बाद ही ‘संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन’ शुरू हुआ, जिसमें 105 से भी अधिक लोगों को अपनी जान गँवानी पड़ी। ये सामान्य मराठियों का आंदोलन था, जो अपने लिए अलग राज्य की माँग कर रहे थे। ब्रिटिश के समय से ये माँग चल रही थी और पहली कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा छले जाने के बाद ये घाव और गहरे हो गए थे।
बेलगाम में 1946 में हुए मराठी साहित्य सम्मलेन में ही ज्वाइंट महाराष्ट्र के गठन के लिए प्रस्ताव पारित किया गया था और वहीं ज्वाइंट महाराष्ट्र काउंसिल (संयुक्त महाराष्ट्र परिषद् समिति) का गठन हुआ। इतिहास में आगे बढ़ने से पहले उस समय का भूगोल समझाना ज़रूरी है। विदर्भ के 6 जिले उस समय मध्य प्रदेश का हिस्सा थे। इसी तरह लगभग सारा मराठवाड़ा हैदराबाद का भाग था। मुंबई का कुछ हिस्सा पूर्वी गुजरात का भाग था, जबकि महानगर का कुछ हिस्सा कर्नाटक स्टेट का भाग था। इसी कारण महाराष्ट्र की माँग तेज़ हुई।
यशवंतराव चव्हाण सहित दक्षिण महाराष्ट्र और विदर्भ के कई बड़े नेताओं के साथ सलाह कर 1953 में नेहरू सरकार ने एक एग्रीमेंट बनाया। इसके अनुसार महाराष्ट्र को अलग राज्य और मुंबई को राजधानी बनाने का निर्णय लिया गया। लेकिन, केंद्र सरकार ने बाद में मुंबई को केंद्रशासित प्रदेश बनाने का फ़ैसला कर मराठियों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। उस समय मोरारजी देसाई, मुंबई स्टेट के मुख्यमंत्री थे जो आगे जाकर भारत के प्रधानमंत्री भी बने। मराठियों के गुस्से का परिणाम कॉन्ग्रेस को 1957 के विधानसभा चुनाव में झेलना पड़ा। कॉन्ग्रेस को गुजरात वाले भाग से वोट तो मिले लेकिन मराठा क्षेत्रों में उसे निराशा हाथ लगी।
महाराष्ट्र के राजनीतिक इतिहास के इस अहम चुनाव में 339 सीटों के लिए चुनाव हुआ था। इनमें से 57 सीटों पर दो-दो प्रतिनिधियों के लोए मतदान हुए। इस तरह 396 सीटों में से कॉन्ग्रेस को 234 मिली और उसकी 35 सीटें कम हो गईं। ‘स्टेट्स रीऑर्गेनाईजेशन एक्ट, 1956’ के बाद यशवंतराव चव्हाण बॉम्बे के मुख्यमंत्री बने थे, उन्हें 1957 में कुर्सी दोबारा मिली। फिर महाराष्ट्र के गठन के बाद भी वे पहले मुख्यमंत्री बने। इस तरह बॉम्बे के अंतिम और महाराष्ट्र के प्रथम मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने कार्यभार सँभाला था। कॉन्ग्रेस द्वारा महाराष्ट्र का गठन करना भी वहाँ के लोगों की विश्वसनीयता जीतने का प्रयास ज्यादा था।
जवाहरलाल नेहरू को इस समस्या का भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, क्योंकि उनके इस एक्सपेरिमेंट्स की वजह से खून बहे। 16 जनवरी 1956 को उन्होंने विदर्भ और मराठियों के लिए महाराष्ट्र और कच्छ और सौराष्ट्र को गुजरात के रूप में पुनर्गठन की घोषणा करते हुए मुंबई को केंद्रशासित प्रदेश बना डाला। अगले 5 दिनों तक भारी विरोध-प्रदर्शन हुआ और पुलिस फायरिंग में 67 लोगों की मौत हुई। जनता नेहरू की इस घोषणा से ख़ुश नहीं थी। जयप्रकाश नारायण और हैदराबाद कॉन्ग्रेस का भी ये विचार था कि मुंबई को महाराष्ट्र का हिस्सा होना चाहिए। फ़िरोज़ गाँधी ने भी संसद में यही कहा। केंद्रीय मंत्री सीडी देशमुख ने इस मुद्दे पर अपना इस्तीफा ही सौंप दिया।
मराठा नेतागण केंद्र को अलग राज्य का गठन करने की सलाह देकर फायदे में रहे और पार्टी को भी लोगों ने हाथोंहाथ लिया। 1962 का चुनाव इसका प्रत्यक्ष गवाह बना। उस चुनाव में कॉन्ग्रेस ने 264 में से 215 सीटें जीत कर भारी कामयाबी हासिल की। कई राजनीतिक पुस्तकें लिख चुके वीएम सिरसिकर बताते हैं कि कॉन्ग्रेस केवल महाराष्ट्र में संसदीय और विधानसभा चुनावों में ही सफल नहीं रही थी, बल्कि लोगों की सामाजिक ज़िंदगी को प्रभावित करने वाले हर एक क्षेत्र में कॉन्ग्रेस का बोलबाला था। वो लिखते हैं कि सुदूर गाँव के प्रधान से लेकर विधानसभा के सदस्य तक और डिस्ट्रिक्ट काउंसिल के अध्यक्ष तक, सब कॉन्ग्रेसी थे। यानी, हर जगह एक ही पार्टी की सत्ता थी।
यशवंतराव चव्हाण को आधुनिक महाराष्ट्र का शिल्पी भी कहा जाता है। आज़ादी के आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने वाले यशवंतराव चव्हाण पेशे से वकील थे। वे जवाहरलाल नेहरू के क़रीबी थे और नेहरू की विचारधारा से ही इत्तेफाक रखते थे। नेहरू ने अपनी ‘इन्क्लूसिव और प्लुरलिस्टिक’ एक्सपेरिमेंट्स के चक्कर में मराठियों और गुजरातियों को उनका अलग राज्य नहीं दिया था। नेहरू भारत में सभी प्रकार के लोगों के साथ रहने’ की बातें करते हुए अपने इस निर्णय को सही ठहराते थे और चव्हाण ने भी ‘पहले भारतीय, फिर महाराष्ट्रियन’ जैसी बातें कर नेहरू की विचारधारा का समर्थन तो ज़रूर किया लेकिन कॉन्ग्रेस के ये एक्सपेरिमेंट फेल रहा।
जब आलाकमान ने यशवंतराव चव्हाण से महाराष्ट्र की स्थिति के बारे में पूछा तो उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि यहाँ तो कुछ भी सही नहीं है, सब गड़बड़ और एक नहीं बल्कि कई सारी समस्याएँ हैं। इस तरह ‘महा गुजरात समिति’, ‘संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन’ के भारी दबाव और यशवंतराव चव्हाण का मज़बूरी में कॉन्ग्रेस आलाकमान को सच्चाई से अवगत कराने से महाराष्ट्र के गठन का रास्ता साफ़ हुआ, जिसने नेहरू को एहसास दिला दिया कि ‘द्विभाषीय राज्य’ वाले एक्सपेरिमेंट एकदम फेल हो गया है। चव्हाण को बाद में केंद्र में बुला लिया गया, जहाँ उन्होंने जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गाँधी की कैबिनेट में गृह, विदेश, रक्षा और वित्त जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों के कार्यभार सँभाले।
महाराष्ट्र की राजनीति की तीन धुरी: बाल ठाकरे, शरद पवार और जॉर्ज फर्नांडिस
जब बात महाराष्ट्र की हो रही हो तो राजधानी मुंबई की बात ज़रूर होगी, क्योंकि राज्य के गठन के बाद से सभी गतिविधियों का यही केंद्र रहा। इसने बाल ठाकरे और जॉर्ज फर्नांडिस के इशारे पर चलना और रुकना सीखा। इसने शरद पवार को उभरते हुए देखा और 90 के दशक में अंडरवर्ल्ड के उभार के बाद यही मुंबई ख़ून-ख़राबे का गढ़ भी बना। देश की आर्थिक राजधानी, जिसे मायानगरी भी कहते हैं, आज भी रोज तमाम तरह की उठापटक के बीच चमचमाती रहती है। अगर मुकेश अम्बानी का एंटीलिया यहाँ है तो दुनिया की सबसे बड़ी झुग्गी धारावी भी यहीं है। आज भी गुजरती समुदाय यहाँ सुख-चैन से रहता है, जो साबित करता है कि नेहरू का ये सोचना कि अलग राज्य न देने से ही सब साथ रहेंगे, ग़लत था।
शिवसेना: बाल ठाकरे का प्रादुर्भाव
अब बात महाराष्ट्र के राजनीति की कर लेते हैं। 60 के दशक का अंत होते-होते बाल ठाकरे का प्रभाव दिनोंदिन बढ़ने लगा था। मुंबई महानगरपालिका के अपने पहले ही चुनाव में शिवसेना ने 42 सीटें जीत कर दमदार एंट्री की। मध्यम वर्ग के बीच शिवसेना की लोकप्रियता की कोई सीमा न थी, उस क्षेत्रों में उसे भारी वोट मिले थे। शिवसेना के मजबूत होते ही वामपंथियों का प्रभाव घटने लगा। ‘सामना’ के पूर्ववर्ती ‘मार्मिक’ में तो स्पष्ट कहा गया था कि वामपंथ का अंडकोष निकाल कर उन्हें नपुंसक बनाने के लिए ही शिवसेना का जन्म हुआ है। दिसंबर 27, 1967 को शिवसैनिकों ने कम्युनिस्ट पार्टी के दफ्तर पर हमला कर दलवी बिल्डिंग को जला डाला।
इसके कुछ ही दिनों बाद शिवसैनिकों ने सीपीआई की रैली पर हमला किया। कुछ दिनों बाद सीपीआई के कुछ लोगों पर फिर से हमला किया गया। सेना के शाखा से लोगों को ज़रूरी सामानों की सप्लाई मिलती, पानी की व्यवस्था ठीक की गई और सड़कों की मरम्मत कराई गई। इससे मजदूरों का एक बड़ा तबका कम्युनिस्टों की जगह शिवसेना की तरफ आया। दिवंगत लेखक वीएस नायपॉल ने भी अपनी पुस्तक में मुंबई के एक झुग्गी के दौरे के बारे में लिखा है। उन्होंने पाया कि किस तरह चमचमाती दुनिया से दूर रहने वाले मजदूरों के लिए भोजन-पानी, घर और शौचालय की व्यवस्था में शिवसेना ने जान लगा दी थी।
बाल ठाकरे के प्रभाव का असली अंदाज़ा दुनिया को तब लगा, जब 9 फ़रवरी 1969 को उन्हें गिरफ्तार किया गया। उसके बाद शिवसैनिकों ने मुंबई में जो तांडव मचाया, वैसा वहाँ शायद ही अब तक देखा-सुना गया हो, ख़ासकर किसी नेता के लिए। कई होटलों को जला दिया गया। पुलिस चौकियों और कमर्शियल इमारतों को निशाना बनाया गया। सेना को अलर्ट पर रहने बोल दिया गया। कर्फ्यू कई हफ़्तों तक यूँ ही चलता रहा। सरकार फेल हो गई और अंत में बाल ठाकरे से शांति के लिए एक लिखित अपील जारी करवाई गई। लेखक वैभव पुरंदर बताते हैं कि स्वतंत्र भारत में शायद ही कभी ऐसा हुआ हो जब ‘प्रिवेंटिव डिटेंशन एक्ट’ के तहत जेल में बंद व्यक्ति से अपील लिखवा कर उसकी प्रतियाँ लोगों में बाँटी गईं, ताकि शांति बहाल हो।
इसेक बाद शिवसेना कार्यकर्ता समाजसेवा में जुट गए। ठाकरे की अपील का असर इतना था कि शिवसैनिक झाड़ू लेकर अपनी ही फैलाई गंदगी को साफ़ करने निकल पड़े। हिंसा का ये दौर यूँ ही चलता रहा और सीपीआई से लड़ते-लड़ते 80 के दशक में कब शिवसेना कॉन्ग्रेस के लिए ख़तरा बन गई, पता ही नहीं चला। 1989 में ‘सामना’ लॉन्च किया गया। एक कार्टूनिस्ट मजदूरों से लेकर मध्यम वर्ग के लोगों का नेता बन चुका था। शहरी मराठियों में उसकी तूती बोलती थी। फिल्म इंडस्ट्री के लोग चक्कर काटते थे। 1995 में शिवसेना ने भाजपा के साथ मिलकर राज्य में सरकार बनाई। मनोहर जोशी और उसके बाद नारायण राणे मुख्यमंत्री बने। बाल ठाकरे मातोश्री से सरकार चलाते रहे।
इस दौरान भाजपा के दो दिग्गज नेता गोपीनाथ मुंडे और प्रमोद महाजन की बात न हो तो 90 के दशक और अटल युग की चर्चा भी अधूरी रह जाती है। शिवसेना को साध कर रखने में इन दोनों नेताओं की अहम भूमिका थी, जो महाराष्ट्र में अटल बिहारी वाजपेयी के सबसे प्रमुख सिपहसालार थे। देश को इन दोनों नेताओं से काफी कुछ मिलता लेकिन दोनों ही असमय चल बसे। प्रमोद महाजन की हत्या एक पारिवारिक विवाद में हुई, वहीं केंद्रीय मंत्री बनने के कुछ ही दिन बाद एक कार एक्सीडेंट में मुंडे भी चल बसे। प्रमोद महाजन भाजपा के प्रचार तंत्र के शिल्पी हुआ करते थे। दोनों कई गुटों को एक साथ लेकर चलने में सक्षम थे।
इंदिरा गाँधी के साथ यशवंत राव चव्हाण: वो नेहरू, शास्त्री और इंदिरा कैबिनेट में अहम पदों पर रहे
धीरे-धीरे बाल ठाकरे की पकड़ कमजोर होने लगी और 1999 से लेकर 2014 तक राजग गठबंधन महाराष्ट्र में विपक्ष में ही बैठा रहा और कॉन्ग्रेस लगातार राज करती रही। एनसीपी का प्रभाव बढ़ा। उद्धव ठाकरे में अपने पिता जैसी क्षमता नहीं थी। लिहाजा शिवसेना में परिवारवाद के चलते दूसरी पंक्ति से कोई ओजस्वी नेता नहीं उभर पाया। राज ठाकरे ज़रूर भाषण और चाल-ढाल में अपने चाचा की तरह थे, लेकिन 2006 आते-आते उन्होंने शिवसेना छोड़ ‘महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना’ का गठन किया। मनसे के गठन के बाद शिवसैनिकों से उसकी कई बार झड़प भी हुई लेकिन इससे शिवसेना का आधार सिकुड़ता गया।
वामपंथी आज भी कहते हैं कि शिवसेना का जन्म कॉन्ग्रेस के आशीर्वाद से हुआ था। सीपीआई के संथापक और वयोवृद्ध वामपंथी नेता श्रीपद अमृत डांगे की बेटी रोजा देशपांडे का मानना है कि शिवसेना के उद्भव से लेकर उसके पूरे सेटअप के लिए कॉन्ग्रेस ही जिम्मेदार है। वह अपने इस बयान के पीछे तर्क देते हुए याद दिलाती हैं कि जब शिवसेना की स्थापना की घोषणा हुई थी, तब कॉन्ग्रेस नेता रामराव आदिक मंच पर मौजूद थे। शिवसेना की स्थापना 1966 में हुई थी। प्रसिद्ध वकील रामराव आदिक आगे जाकर महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री भी बने।
जेल जाने से बचने के लिए बाल ठाकरे ने आपातकाल और इंदिरा गाँधी का समर्थन किया, ऐसा कहा जाता है। इसके बाद न सिर्फ़ 1977 लोकसभा और 1978 के बीएमसी चुनाव बल्कि 1980 के लोकसभा चुनाव में भी बाल ठाकरे ने कॉन्ग्रेस का समर्थन किया था। उन्होंने कॉन्ग्रेस के ख़िलाफ़ प्रत्याशी ही नहीं उतारे। शिवसेना ने बहाना बनाया कि बाल ठाकरे के साथ तत्कालीन मुख्यमंत्री एआर अंतुले के साथ निजी रिश्ते हैं, इसलिए शिवसेना समर्थन कर रही है।
महाराष्ट्र और मोदी युग
2014 में देश की राजनीति बदल गई क्योंकि नरेंद्र मोदी का राष्ट्रीय पटल पर उदय हुआ और महाराष्ट्र ही नहीं, पूरे देश की राजनीति इसी एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमने लगी। उधर देवेंद्र फडणवीस की मेहनत के कारण ‘दिल्ली में नरेंद्र, महाराष्ट्र में देवेंद्र’ का नारा उछला। मोदी करिश्मे ने काम किया और शिवसेना भी इस लहर के सहारे खड़ी हुई। 5 साल सत्ता की मलाई चाभने के बाद उद्धव ठाकरे ने गठबंधन धर्म को धता बताते हुए बहुमत के बावजूद मुख्यमंत्री पद की लालच में भाजपा को धोखा दे दिया। बाल ठाकरे जिस कॉन्ग्रेस-एनसीपी का ताउम्र विरोध करते रहे, उद्धव उन्हीं की गोद में बैठ कर सत्ता के सिरमौर बने।
इससे पहले देवेंद्र फडणवीस ने एक सफल सरकार चलाई थी। मुख्यमंत्री फडणवीस ने व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप कर अन्ना हजारे के अनशन पर पानी फेर दिया था। अन्ना को झुकना पड़ा और अपने अनशन की योजना को त्यागना पड़ा था। जुलाई 2018 में जब मराठा आंदोलन ने ज़ोर पकड़ा तब महाराष्ट्र के कई इलाक़ों में जबरदस्त हिंसा भड़क गई। फडणवीस ने इसे नियंत्रित किया। शिवसेना राष्ट्रीय स्तर पर तो मोदी के ख़िलाफ़ ख़ूब बोलती थी, लेकिन महाराष्ट्र में फडणवीस पर सीधे हमले नहीं करती थी। उन्होंने बाल ठाकरे की प्रतिमा का अनावरण कर उद्धव को साधा था। जब 35,000 गुस्साए किसान 200 किलोमीटर की पदयात्रा के बाद झंडा लेकर प्रदर्शन करते हुए मुंबई के आज़ाद मैदान पहुँचे थे, तब फडणवीस ने बिना बल प्रयोग आंदोलन को काबू किया।
इन सबके बीच एक व्यक्ति की चर्चा न की जाए तो शायद महाराष्ट्र की राजनीति की बात ही अधूरी रह जाएगी। वो एक ऐसे शख्स हैं, जिन्हें कभी जनता ने बहुमत नहीं दिया लेकिन तब भी वो चार बार सरकार बनाने में कामयाब रहे। कभी कॉन्ग्रेस को धोखा दिया, फिर उसके साथ ही सरकार बनाई। कभी शिवसेना से लड़ते रहे, फिर उसे ही समर्थन दिया। कभी अपने ही राजनीतिक गुरु को धोखा देकर सरकार बनाई तो कभी चुनाव बाद मौकापरस्त गठबंधन कर सरकार चलाई। कभी केंद्र में मंत्री बन कर राजनीति तो कभी भी राज्य में अपनी धमक बनाने के लिए मेहनत नहीं छोड़ी। कभी प्रधानमंत्री बनने का सपना देखा तो कभी चीनी मिलों पर प्रभुत्व कायम किया। मुलायम की तरह अपने परिवार के दर्जनों लोगों को किसी न किसी पद पर बिठाया।
मराठा क्षेत्र के पवार-प्ले: राजनीतिक उठापटक के दक्ष
यहाँ हम शरद पवार की बात कर रहे हैं। बाल ठाकरे क़रीबी सम्बन्ध होने के बावजूद राजनीतिक रूप से पवार से दूरी बनाकर ही चलते थे। उन्होंने साफ़-साफ़ कहा था कि शरद पवार जैसे ‘लुच्चे’ के साथ तो वो कभी नहीं जा सकते। बाल ठाकरे के भाषण सुन कर राजनीतिक में आए छगन भुजबल ने 1990 में शिवसेना तोड़ दी थी। मनोहर जोशी को नेता प्रतिपक्ष बनाए जाने के बाद कॉन्ग्रेस में आए भुजबल को मंत्री बनाया गया था। ठाकरे को लगा कि पवार व्यक्तिगत संबंधों के कारण इस टूट के ख़िलाफ़ होंगे लेकिन पवार ने चुप्पी साध ली। बाल ठाकरे ने इस धोखे को याद रखा। ये वही शरद पवार हैं, जिन्होंने 1978 में वसंतदादा पाटिल की सरकार तोड़ दी और राज्य के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने थे। ठाकरे मानते थे कि शरद पवार ने अपने मेंटर यशवंतराव चव्हाण को भी धोखा दिया है।
पवार ने मुंबई बम ब्लास्ट के दौरान धमाकों की संख्या को 12 से 13 कर दिया था। उन्होंने 1 अतिरिक्त बम धमाका अपने मन से गढ़ा। उन धमाकों में केवल हिन्दू बहुल इलक़ों को निशाना बनाया गया था। पवार ने एक मस्जिद में विस्फोट होने की बात कह यह दिखाया कि यह ‘सेक्युलर’ धमाका था। ये वही शरद पवार हैं, जिन्होंने सोनिया गाँधी के विदेशी मूल के होने की बात को लेकर कॉन्ग्रेस तोड़ दी थी, लेकिन बाद में उसी कॉन्ग्रेस के साथ सत्ता का सुख भोगा। 80 के दशक से लेकर अब तक वो महाराष्ट्र की राजनीति में प्रभावी बने हुए हैं और राज्य की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के लिए किसी तरह उन्होंने तीन पार्टियों के बेमेल गठबंधन की सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाई।
महाराष्ट्र दिवस पर हमने यहाँ राज्य के गठन के इतिहास और राजनितिक द्वंद्व की बातें की है। अगर हम और पीछे जाएँ तो हमें माधवराव पेशवा पुणे में बैठ कर दिल्ली को नचाते हुए दिखेंगे। थोड़ा और पीछे जाएँ तो छत्रपति शिवाजी हिंदुत्व और स्वदेश के लिए शक्तिशाली औरंगज़ेब से पंगा लेते दिखेंगे। और पीछे जाएँ तो महाभारतकाल में यहाँ भोज यादवों का साम्राज्य दिखेगा। और पीछे जाएँ तो नासिक की पंचवटी में माँ सीता के कहने पर श्रीराम मायामृग के पीछे भागते दिखेंगे।
(सोर्स 1: he Journey of Maharashtra congress (1947-2000) By Dr. Dinakar Vishnu Patil) (सोर्स 2: Bal Thackeray and the rise of Shiv Sena By Vaibhav Purandare) (सोर्स 3: History of Maharashtra: History of Maharashtra By Abhishek Thamke)
दिल्ली पुलिस ने उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगों में पुलिसकर्मी पर बंदूक तानने वाले मोहम्मद शाहरूख पठान के खिलाफ कड़कड़डूमा कोर्ट में चार्जशीट दायर की है। शाहरुख के अलावा दिल्ली पुलिस ने कलीम अहमद और इश्तियाक मलिक के खिलाफ भी चार्जशीट दायर की है। इनमें से कलीम अहमद कैराना का रहने वाला है।
इसी शाहरूख पठान ने हेड कॉन्स्टेबल दीपक दहिया और अन्य लोगों पर गोली चलाई थी। पुलिस ने हिंसा के दौरान हेड कांस्टेबल दीपक दहिया पर गोली चलाने वाले शाहरुख पठान के खिलाफ कड़कड़डूमा कोर्ट में 350 पृष्ठों से अधिक का आरोप पत्र दाखिल किया है।
उल्लेखनीय है कि नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और एनआरसी (NRC) के विरोध में 23 और 24 फरवरी को अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के भारत दौरे से ठीक पहले उत्तर पूर्वी दिल्ली में हिंसा हुई थी। इस दौरान जाफराबाद-मौजपुर इलाके में लोगों को भड़काने और हलवदार पर पिस्तौल तानने के आरोपित शाहरुख को यूपी के शामली से 3 मार्च को गिरफ्तार किया गया था।
यह वही शाहरूख पठान है जिसे NDTV के प्रोपेगैंडा पत्रकार रवीश कुमार ने अनुराग मिश्रा साबित करने की कोशिश की थी। हालाँकि यह उसी समय स्पष्ट हो चुका था कि बंदूक से आठ राउंड फायरिंग करने वाला व्यक्ति मोहम्मद शाहरुख पठान था ना कि अनुराग मिश्रा। इस मामले में शाहरुख के पास से 7.65 की एक पिस्तौल तथा दो कारतूस जब्त किए गए थे। रवीश कुमार ने विस्तृत रूप से बताया कि उसे मॉडलिंग का शौक है, वह टिक टॉक पर वीडियो बनाता था और उसने एक म्यूजिक एलबम भी बनाई है।
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में कोरोना सर्वे टीम के साथ बदसलूकी की खबर सामने आई है। लोगों ने दस्तावेज फाड़ने के बाद हाथों में पत्थर लेकर टीम का पीछा किया। पुलिस के कहने पर मस्जिद से की गई अपील के बाद लोग शांत हुए और टीम ने सर्वे का काम पूरा किया।
गुरुवार को भोपाल में कोरोना सर्वे करने गई टीम पर हमला:- *छोला स्थित कल्याण नगर में हमला *सर्वे के दौरान भीड़ ने घरों से निकलकर पत्थर बरसाए *महिला कर्मचारी से अभद्र व्यवहार *उस्मानिया मस्जिद के ‘हाफ़िज़’ ने मस्जिद से समझाया फिर मामला शांत@AskAnshul@sambitswaraj@KapilMishra_IND
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक भोपाल के छोला स्थित कल्याण नगर में गुरुवार दोपहर को आँगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की एक टीम कोरोना का सर्वे करने के लिए पहुँची। 9 सदस्यों की टीम ने दो घरों में सर्वे किया ही था कि कुछ लोग शोर मचाते हुए घरों से बाहर आ गए। इन लोगों ने दस्तावेजों को फाड़ा फिर टीम के साथ बदसलूकी की।
टीम के सदस्यों ने वहाँ से निकलने का प्रयास किया तो कुछ लोग हाथों में ईंट-पत्थर लेकर उनका पीछा करने लगे। आशा कार्यकर्ता परवीन और उसके साथी छीनाझपटी की गई। टीम ने किसी तरह कंट्रोल रूम को घटना से अवगत कराया।
सूचना मिलते ही सीएसपी और एसडीएम पुलिस फोर्स के साथ मौके पर पहुँचे। पुलिस फोर्स को आते देख टीम का विरोध कर रहे लोग दरवाजे बंद कर अपने घरों में कैद हो गए। इसके बाद पुलिस के आग्रह पर नगर सुरक्षा समिति के सदस्य रमेश साहू ने उस्मानिया मस्जिद के हाफिज को बुलाया। हाफिज ने मस्जिद से आवाज लगाते हुए इलाके को लोगों को सर्वे की जरूरत समझाई।
करीब तीन घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद इलाके के लोग सर्वे कराने के लिए तैयार हुए। तब कहीं जाकर 900 घरों का सर्वे हो सका। सर्वे को दौरान टीम के साथ पुलिस भी मौजूद रही। सर्वे कार्य पूरा होने के बाद टीम ने राहत की साँस ली। कंटेमेंट प्रभारी डॉ. कमलेश अहिरवार के मुताबिक, इस घटना के बाद से टीम दहशत में है।
इससे पहले बुधवार को राजस्थान के धौलपुर में लॉकडाउन का पालन कराने पर पुलिसकर्मी पर गोली चलाने की घटना सामने आई थी। पीड़ित कॉन्स्टेबल शिव चरण मीणा के मुताबिक वह धौलपुर में लॉकडाउन के दौरान ड्यूटी पर तैनात थे। इस बीच एक स्थान पर खड़े 4-5 लोगों से जब उन्होंने लॉकडाउन के नियमों का हवाला देते हुए वहाँ से हट जाने के लिए कहा तो उन्होंने गोली चला दी। इसमें शिवचरण मीणा घायल हो गए थे।
वहीं पश्चिम बंगाल के हावड़ा में भी लॉकडाउन लागू करा रहे पुलिसकर्मियों पर लोगों ने हमला कर दिया था। यह घटना बेलिलियस रोड इलाके में मंगलवार (अप्रैल 28, 2020) दोपहर बाद घटी। 27 अप्रैल को महाराष्ट्र के औरंगाबाद में मस्जिद में नमाज पढ़ने को रोकने गई पुलिस पर लोगों ने पथराव कर दिया था। इस घटना में 1 पुलिसकर्मी घायल हो गए थे। पथराव करने वाली भीड़ में महिलाएँ भी शामिल थीं।
आपको बता दें कि सरकार ने कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई में शामिल स्वास्थ्यकर्मियों और पुलिसकर्मियों के साथ हिंसा को गैर जमानती अपराध बनाया है। साथ ही ऐसा करने वाले को सात साल की सजा हो सकती है। लेकिन इसके बाद भी पुलिसकर्मियों पर हमले रूक नहीं रहे हैं। देश के कई हिस्सों से चिकित्साकर्मियों और पुलिस बल पर हमले की खबरें सामने आ रही हैं।
तहजीब टीवी के रिपोर्टर राशिद ने मेरठ में भगवा झंडा लगाकर सब्जी बेचने वाले की गई शिकायत सोशल मीडिया के जरिए की। शुरुआत में उत्तर प्रदेश पुलिस ने कार्रवाई की बात कही। बाद में जाँच में मेरठ पुलिस ने पाया कि उस सब्जी बेचने वाले के पास देशव्यापी बंद के दौरान सब्जी बेचने का पास मौजूद था।
दरअसल ट्विटर पर तहजीब टीवी के रिपोर्टर राशिद ने एक ऐसे व्यक्ति की शिकायत कर कार्रवाई की माँग की जिसने अपने सब्जी के ठेले पर भगवा झंडा लगा रखा था। तहजीब रिपोर्टर ने यह वीडियो ट्विटर पर पोस्ट करते हुए तमाम पुलिस अकाउंट को टैग करते हुए लिखा- “कंकरखेड़ा क्षेत्र के गुरु नानक बाजार में ठेले पर सब्जी विक्रेता भगवा रंग का ध्वज लगाकर सब्जी बेच रहे है!”
UP पुलिस ने इस पर जवाब देते हुए मेरठ पुलिस को टैग कर इसकी जाँच करने के निर्देश दिए। इस पर सोशल मीडिया यूजर्स ने आपत्ति जताते हुए उत्तर प्रदेश के CM योगी आदित्यनाथ की एक तस्वीर पोस्ट करते हुए लिखा कि इन पर भी कार्रवाई करें।
इसके कुछ देर बाद ही मेरठ पुलिस ने ट्वीट करते हुए स्पष्ट किया कि सब्जी बेचने वाले के पास लॉकडाउन के दौरान सब्जी बेचने के लिए आवश्यक पास मौजूद हैं। मेरठ पुलिस ने लिखा, “उक्त व्यक्ति को लॉकडाउन में सामान बेचने की अनुमति प्रदान है। सोशल डिस्टेंसिंग व लॉकडाउन का पालन करने हेतु निर्देशित किया गया है।”
उक्त व्यक्ति को लॉकडाउन मे सामान बेचने की अनुमति प्रदान है, सोशल डिस्टेंसिंसग व लॉकडाउन का पालन करने हेतु निर्देशित किया गया है।
उल्लेखनीय है कि हाल में मुस्लिमों ने सोशल मीडिया के जरिए झारखंड जैसे राज्य में हिन्दू प्रतीक और भगवा झंडा देखकर उन पर कार्रवाई करने की माँग की। झारखंड में पुलिस ने कई दुकानों से हिन्दू संगठनों के पोस्टर्स हटा दिए।
सोशल मीडिया पर झारखंड में फल बेचने वाले दुकानदारों की तस्वीरों पर झारखंड पुलिस को टैग करते हुए ‘शिकायत‘ दर्ज की गईं। हालाँकि, पुलिस ने भी यह पूछने के बजाए कि दुकान पर हिन्दू संगठन के नाम से किसी की धार्मिक भावनाएँ कैसे आहत हो सकती हैं? सीधे यह सूचना दी कि दुकानों से ऐसे बैनर हटवा दिए गए हैं।
इसी क्रम में तहजीब रिपोर्टर ने भी आज यह पहल की थी। हालाँकि, पुलिस ने जाँच के बाद स्पष्ट किया कि सब्जी बेच रहे व्यक्ति को सब्जियाँ बेचते टाइम लॉकडाउन के नियमों का पालन करने सम्बन्धी निर्देश दे दिए गए हैं ।
देश में बड़े स्तर पर कोरोना वायरस को फैलाने के जिम्मेदार माने जा रहे तबलीगी जमातियों पर अब लगभग हर राज्य में एक्शन लिया जा रहा है। इस क्रम में आज यूपी पुलिस ने शाहजहाँपुर में थाईलैंड से आए 9 विदेशियों समेत 11 जमातियों को गिरफ्तार किया गया। विदेशी जमातियों पर विदेशी अधिनियम के तहत कार्रवाई हुई। दूसरी ओर दिल्ली पुलिस ने भी तबलीगी जमात पर अपना शिकंजा कस लिया है। खबर है कि इस समय मौलाना साद से जुड़े एक ऐसे बैंक अकाउंट के बारे में पता लगाने की कोशिश की जा रही है, जिसमें करोड़ों रुपए की ट्रांसैक्शन होती थी। लेकिन ये करोड़ों रुपए मात्र 48 घंटे में गायब हो जाते थे।
लोकमत की खबर के अनुसार, पुलिस अधीक्षक दिनेश त्रिपाठी ने बताया कि 2 अप्रैल को शहर के ही मोहल्ला खलील सरकी में जमात से लौटे थाईलैंड के 9 लोगों और तमिलनाडु के 2 लोगों को तथा इन्हें मस्जिद में ठहराने वाले एक व्यक्ति को पकड़ा गया था।
इसके बाद इन सभी का कोरोना टेस्ट कराया गया था। टेस्ट के परिणामों में थाईलैंड से आए एक जमाती को कोरोना से संक्रमित पाया गया था। जिसे पुलिस ने इलाज के लिए अस्पताल भेज दिया था और बाकियों को क्वारंटाइन सेंटर भेजा गया था।
क्वारंटाइन की अवधि पूरी हो जाने और पॉजिटिव पाए गए मरीज के पूरी तरह ठीक हो जाने के बाद सभी का मेडिकल कराया गया और रिपोर्ट आते ही सभी को जेल भेज दिया गया। बता दें जिस अस्थाई जेल में जमातियों को रखा गया है, उसके बाहर पुलिस का कड़ा पहरा लगाया गया है।
एक ओर राज्य सरकारों के आदेश के बाद से तबलीगी जमातियों की धर पकड़ जारी है। वहीं, दूसरी ओर दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच तबलीगी मकरज जमात के बैंक ऑफ इंडिया के उस खाते के बारे में जानकारी हासिल करना चाह रही है, जिसमें पैसे आने के 24-28 घंटे के भीतर करोड़ों रुपए गायब कर दिए जाते थे। ये पैसे ज्यादा से ज्यादा 48 घंटे के भीतर अन्य खातों में ट्रांसफर कर दिए जाते थे।
दिलचस्प बात ये है कि मरकज के लिए होने वाली फंडिंग की कमान मौलाना साद, उसके दो बेटे व भांजे के हाथ में थी। ये चारों ही सारे लेनदेन की देख-रेख करते थे।
यहाँ बता दें तबलीग़ी मरकज के मुखिया मौलाना मुहम्मद साद को क्राइम ब्रांच लगातार नोटिस भेज रही है। लेकिन, वह न तो पुलिस को इन नोटिसों का ठीक से जवाब दे रहा है और न ही जाँच में सहयोग करने के लिए तैयार है। हालत यह है कि क्राइम ब्रांच ने चौथा नोटिस तीन दिन पहले भेजा है। जिसका ठीक से जवाब नहीं मिलने पर अब 5वाँ नोटिस भेजने की तैयारी चल रही है। दूसरी ओर जगह-जगह से तबलीगी जमातियों के पकड़े जाने का उनपर उपयुक्त कार्रवाई का सिलसिला जारी है।