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महाराष्ट्र: राज्यपाल कोश्यारी ने चुनाव आयोग को सौंपा जिम्मा, क्या लॉकडाउन में भी हो सकते है राज्य विधान परिषद के चुनाव?

महाराष्ट्र के राज्यपाल भगतसिंह कोश्यारी ने अपना पल्ला झाड़ते हुए निर्वाचन आयोग को पत्र लिखकर राज्य विधान परिषद की 24 अप्रैल को खाली हुई नौ सीटों पर शीघ्र चुनाव कराने का आग्रह किया है। राज्यपाल द्वारा आयोग को लिखे गए पत्र में आग्रह किया गया है कि लॉक डाउन की गाइडलाइन और राज्य की विषम परिस्थिति के मद्देनजर स्थिर सरकार जरूरी है। ऐसे में विधान परिषद के लिए चुनाव कराना ज्यादा उचित होगा। अब अगर चुनाव आयोग राज्यपाल कोश्यारी के अनुरोध को स्वीकार कर लेता है तो 28 मई से पहले चुनाव हो सकते हैं।

28 मई तक उद्धव अगर किसी भी सदन के सदस्य नहीं बने तो उनकी कुर्सी चली जाएगी। सीएम हटे तो सरकार का गिरना तय है। अब ये कहा जा सकता हैं कि (27 मई, 2020) महाराष्ट्र के सीएम उद्धव ठाकरे और शिवसेना की अगुवाई वाली कॉन्ग्रेस-एनसीपी-शिवसेना गठबंधन सरकार के लिए एक ऐसी डेडलाइन बन गई है जिसे कोरोना लॉकडाउन ने गले की फाँस बना दिया है। ये वो तारीख है जिससे पहले उद्धव ठाकरे को महाराष्ट्र विधानमंडल के दोनों सदन- विधानसभा या विधान परिषद – में किसी एक का सदस्य बन जाना चाहिए। ऐसा नहीं होने पर संविधान के प्रावधानों के मुताबिक उद्धव ठाकरे को इस्तीफा देना होगा।

24 अप्रैल को होने थे चुनाव

बता दें कि पहले की योजना के अनुसार नौ सीटों के लिए 24 अप्रैल को चुनाव होने थे और उद्धव ठाकरे को चुनाव लड़ना था। हालाँकि, कोरोना वायरस की वजह से आयोग ने चुनाव को स्थगित कर दिया। इसके कारण ही मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे चाहते थे कि राज्यपाल कोश्यारी अपने कोटे की खाली पड़ी दो सीटों में से एक पर उन्हें नामित कर दें। इसके लिए महाराष्ट्र कैबिनेट ने दो बार प्रस्ताव भी भेजा, लेकिन राज्यपाल कोश्यारी ने उस पर कोई फैसला नहीं किया। जिसके चलते मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने कल यानी (30.4.20) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फोन करके मामले में दखल देने की गुहार लगाई थी। उन्‍होंने पीएम मोदी से कहा था कि ऐसे समय में जब महाराष्‍ट्र कोरोना की महामारी से जूझ रहा है राजनीतिक अस्थिरता ठीक नहीं है।

28 नवंबर 2019 को सीएम बने थे उद्धव

बता दें कि उद्धव ठाकरे ने 28 नवंबर 2019 को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। संविधान के अनुच्छेद 164 (4) के मुताबिक, किसी भी मंत्री को (मुख्यमंत्री भी) पद की शपथ लेने के छह महीने के अंदर विधानसभा या विधानसपरिषद का सदस्य निर्वाचित होना अनिवार्य है। उद्धव ठाकरे बिना चुनाव लड़े ही सीधे सीएम बने हैं, ऐसे में उन पर यह नियम लागू होता है। जनवरी 2020 में विधान परिषद की दो सीटों के लिए चुनाव भी हुए लेकिन उद्धव ठाकरे ने चुनाव नहीं लड़ा। 24 मार्च को विधान परिषद की धुले नांदुरबार सीट पर उपचुनाव होना था। 24 अप्रैल को विधान परिषद की 9 और सीटें खाली हो गईं। ऐसे में उद्धव ठाकरे ने उम्मीद लगाई थी कि वह इनमें से किसी एक सीट से चुनाव जीत जाएँगे और मुख्यमंत्री बने रहेंगे। इसी बीच कोरोना वायरस ने सारी गणित बिगाड़ दी है और चुनाव टाल दिए गए।

चुनाव आयोग की बैठक

ताजा जानकारी के मुताबिक आज (1.5.20) चुनाव आयोग महाराष्ट्र में विधान परिषद की रिक्त सीटों पर चुनाव कराने को लेकर बैठक करेगा। जिसमे लॉकडाउन में चुनाव कराने की स्थिति को लेकर चर्चा की जाएगी। जहाँ सीटों को लेकर लोगों की नजरें पहले राज्यपाल पर टिकी थी। वहीं अब सब बेसब्री से निर्वाचन आयोग के फैसले का इंतजार कर रहे हैं। ऐसे में क्या लॉकडाउन के नियमों का पालन करते हुए चुनाव आयोग चुनाव करवा सकती है। या फिर कोई नया कदम भी उठाया जा सकता हैं।

हैदराबाद: AIMIM नेता मोहम्मद मुर्तजा अली ने मस्जिद के बाहर ड्यूटी कर रहे पुलिस को धमकाया, केस दर्ज, देखें वीडियो

हैदराबाद पुलिस ने AIMIM पार्टी के कॉरपोरेटर मुर्तजा अली के खिलाफ मामला दर्ज किया है। मुर्तजा अली को एक वायरल वीडियो में बृहस्पतिवार (अप्रैल 30, 2020) को हैदराबाद के चवन्नी नदी अली बेग में एक मस्जिद के पास अपनी ड्यूटी कर रहे दो कॉन्स्टेबल को धमकाने और ड्यूटी में बाधा डालते हुए देखा गया था।

हैदराबाद के मदन्नपेट एरिया में एआईएमआईएम (AIMIM) के कॉरपोरेटर मोहम्मद मुर्तजा अली खुलेआम दो पुलिस कॉन्सटेबल को धमकी देते हुए नजर आ रहे थे। इन दोनों कॉन्सेबल्स की ड्यूटी कल शाम को इफ्तार के समय लगी हुई थी।

रिपोर्ट्स के अनुसार, मदन्नपेट के SHO संतोष कुमार ने से इस खबर की पुष्टि की और कहा कि देशव्यापी लॉकडाउन के कारण सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान रखते हुए पुलिस कॉन्टेबल्स ने मस्जिद में अंदर जाने वाले लोगों से कहा था कि 5 लोगों से ज्यादा लोगों को अंदर जाने की अनुमति नहीं है। उस दौरान करीब 10 लोग अंदर थे, जिस पर कॉन्सटेबल्स ने आपत्ति जताई थी।

इसके बावजूद AIMIM के कॉरपोरेटर मोहम्मद मुर्तजा अली ने खुलेआम कॉन्सटेबल्स को धमकी दी और उन्हें वहाँ से जाने के लिए कहा। माहौल को देखते हुए दोनों कॉन्सटेबल वहाँ से लौट गए।

SHO संतोष कुमार ने कहा कि उन्होंने दोनों पुलिस वालों को सुबह बयान देने के लिए बुलाया है और FIR दर्ज की जा रही है।

एसवीएन शिवराम शर्मा, एसीपी संतोषनगर ने कहा कि पुलिस कॉन्स्टेबल द्वारा शिकायत दर्ज की गई है और मुर्तुजा अली के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। पहले भी धमकी और हमले की ऐसी कई घटनाएँ देश के कई हिस्सों में सामने आ चुकी हैं।

बता दें कि इससे पहले हैदराबाद में ही इलाज के दौरान नर्सों से दुर्व्यहार की खबर भी आई थी जहाँ तबलीगी जमाती कभी इन्हें हाथ लगाने की कोशिश करते हैं तो कभी इनको देखकर सीटी बजाते हैं, जन्नत दिखाने की बात कहते हैं। इसके अलावा भी कई अन्य तरीके से ये जमाती इनके साथ अभद्रता कर रहे थे।

महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस ने राज्यपाल कोश्यारी की टोपी से किया उत्तराखंड की संस्कृति और गढ़वाल रेजिमेंट का अपमान

महाराष्ट्र में राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी कॉन्ग्रेस और शिवसेना के निशाने पर हैं। ऐसे में महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस अब व्यक्तिगत टिप्पणियों के साथ ही उत्तराखंड की संस्कृति को भी निशाना बनाने से नहीं चूक रही है। महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस प्रवक्ता सचिन सावंत ने महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी की पारंपरिक टोपी पर कटाक्ष किया है, जो कि उत्तराखंड की संस्कृति के साथ-साथ भारतीय सेना की गढ़वाल और कुमाऊँ रेजिमेंट से भी है।

महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता सचिन सावंत ने मराठी में ट्वीट करते हुए लिखा- “महामहीम राज्यपाल भगतसिंह कोश्यारी यांनी टोपी काढून विचार केला तर निश्चितपणे त्यांना आपल्या जबाबदारीची आठवण होईल आणि ते मुख्यमंत्री @OfficeofUT यांची विधानपरिषदेचे सदस्य म्हणून नियुक्ती करतील। ही टोपीच घटनात्मक जबाबदारीच्या आड येत आहे।”

जिसका हिंदी अर्थ है- “यदि महामहिम राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी अपनी टोपी उतारने के बारे में सोचते है, तो वे निश्चित रूप से अपनी जिम्मेदारी को याद करेंगे और मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को विधान परिषद के सदस्य के रूप में नियुक्त करेंगे। यह टोपी संवैधानिक जिम्मेदारी के लिए एक बाधा है।”

सचिन सावंत द्वारा राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी द्वारा पहनी जाने वाली उत्तराखंड की पारंपरिक टोपी पर हमले का वास्ता सिर्फ उत्तराखंड की संस्कृति से ही नहीं बल्कि गढ़वाल और कुमाऊँ रेजिमेंट से भी है। भगत सिंह कोश्यारी उत्तराखंड राज्य से हैं और यह टोपी इस राज्य के पारंपरिक पहनावे का हिस्सा है।

सचिन सावंत के इस ट्वीट पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के साथ साथ उत्तराखंड के कई लोगों ने आपत्ति जताई है। CM रावत ने ट्वीट करते हुए लिखा – “महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता द्वारा महाराष्ट्र के राज्यपाल एवं हमारे आदरणीय श्री @BSKoshyari जी पर की गई अभद्र टिप्पणी देवभूमि की संस्कृति के अहम प्रतीक चिन्ह के अपमान के साथ देश की फौज का भी अपमान है; ज्ञात हो कि इस टोपी का संबंध गढ़वाल रेजिमेंट और कुमाऊँ रेजीमेंट से रहा है।”

उत्तराखंड के पूर्व CM हरीश रावत ने किया सचिन सावंत का समर्थन

कॉन्ग्रेस प्रवक्ता की बात का विरोध करने के बजाए बयान का राजनीतिक लाभ लेने के चक्कर में उत्तराखंड के पूर्व CM और 2 सीट से विधानसभा चुनाव हारने वाले कॉन्ग्रेस नेता हरीश रावत ने भी उनका समर्थन ही किया है।

अपमानजनक ट्वीट करने पर माफी माँगने के बजाए हरीश रावत के ही ट्वीट को शेयर करते हुए सचिन सावंत ने लिखा है – “मा. @tsrawatbjp जी, सिर्फ टोपी निकालकर निर्णय लीजिए ऐसा कहना अभद्र कैसे हुआ? वैसे कोश्यारीजी अपने टोपी का राजनीतिक मुद्दा राजनीतिक जीवन में पहले भी बना चुके हैं। वे जो टोपी पहनते हैं वो कुछ और ही है ऐसी उत्तराखंड में ही राय है। लोगों को गुमराह न करें।”

राज्यपाल कोश्यारी पर की गई इस अपमानजनक टिप्पणी से नाराज लोगों ने कार्रवाई की माँग की है –

धौलपुर: लॉकडाउन में जमा होने से रोका तो कॉन्स्टेबल को मारी गोली, हमलावर गिरफ्त से बाहर

राजस्थान के धौलपुर में लॉकडाउन का पालन कराने पर पुलिसकर्मी पर गोली चलाने की घटना सामने आई है।इस घटना में कॉन्स्टेबल के हाथ में चोट आई है। फायरिंग के बाद बदमाश मौके से फरार हो गए।

पीड़ित कॉन्स्टेबल शिव चरण मीणा के मुताबिक बीते दिन (बुधवार 29 अप्रैल) को वह धौलपुर में लॉकडाउन के दौरान ड्यूटी पर तैनात थे। इस बीच उन्होंने 4-5 लोगों को एक स्थान पर इकट्ठा खड़े हुए देखा। इसे देख वह मौके पर पहुँच गए और उन लोगों से लॉकडाउन के नियमों का हवाला देते हुए वहाँ से हट जाने के लिए कहा। लेकिन इस बात का विरोध करते हुए अज्ञात लोगों ने उन पर गोली चला दी और मौके से फरार हो गए।

सूचना पर पहुँची पुलिस ने घायल कॉन्स्टेबल को अस्पताल में भर्ती कराया, जहाँ उनका इलाज जारी है। कॉन्स्टेबल शिवचरण मीणा के हाथ में चोट आई है। आला अधिकारियों ने पीड़ित से बात कर घटना के विषय में जानकारी ली। हालाँकि अभी तक पुलिस को हमलावरों में के बारे में जानकारी नहीं मिल सकी है।

इससे पहले ऐसा ही एक मामला पश्चिम बंगाल के हावड़ा से सामने आया, जहाँ लॉकडाउन लागू करा रहे पुलिसकर्मियों पर लोगों ने हमला कर दिया। बताया जा रहा है कि इस हमले में दो से तीन पुलिसकर्मी घायल हो गए। दरअसल यह घटना बेलिलियस रोड इलाके में मंगलवार (अप्रैल 28, 2020) दोपहर बाद घटी। जब पुलिस सड़क पर घूम रहे लोगों को घर में जाने के लिए कह रही थी तभी लोगों ने पुलिस पर हमला कर दिया।

इतना ही नहीं अराजक तत्वों ने पुलिस की गाड़ी में भी तोड़फोड़ की। इसका वीडियो भी सामने आया था, जिसमें भीड़ को पुलिस के ऊपर हमला करते हुए देखा जा सकता है। ये भीड़ इतनी बेकाबू और आक्रामक थी कि रैपिड एक्शन फोर्स की टीम को बुलानी पड़ी थी।

वहीं सोमवार (अप्रैल 27, 2020) को महाराष्ट्र के औरंगाबाद में मस्जिद में नमाज पढ़ने को रोकने गई पुलिस पर लोगों ने पथराव किया। इस घटना में 1 पुलिसकर्मी घायल हो गए। मामले में पुलिस ने अब तक 15 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया है। पुलिस पर पथराव करने वाली भीड़ में महिलाएँ भी शामिल थीं।

आपको बता दें कि सरकार ने कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई में शामिल स्वास्थ्यकर्मियों और पुलिसकर्मियों के साथ हिंसा को गैर जमानती अपराध बनाया है। साथ ही ऐसा करने वाले को सात साल की सजा हो सकती है। लेकिन इसके बाद भी पुलिसकर्मियों पर हमले रूक नहीं रहे हैं। देश के कई हिस्सों से चिकित्साकर्मियों और पुलिस बल पर हमले की खबरें सामने आ रही हैं।

कोरोना, इस्लामोफोबिया और पश्चिमी मीडिया: कुचक्रों के बावजूद जीतेगा भारत

रामचरितमानस का एक वृतांत है। राम और रावण का युद्ध चल रहा है। मेघनाद, कुंभकरण, अहिरावण सहित रावण के सभी प्रमुख योद्धा मारे जा चुके हैं। राक्षस सेना काफी कम हो चुकी है। दशानन तकरीबन अकेला है। तुलसीदास जी लिखते हैं कि रावण उस समय सोचता है कि मैं अब अकेला पड़ गया हूँ तो मुझे कुछ कोई और खेल खेलना पड़ेगा:

रावन हृदयँ बिचारा भा निसिचर संघार। मैं अकेल कपि भालु बहु माया करौं अपार॥

यानी हार नज़दीक जानकर रावण, युद्ध में उस समय माया यानि भ्रम की स्थिति पैदा करता है। अपनी सिद्धियों के जरिए वह झूठमूठ के अनेक रावण युद्ध के मैदान में पैदा कर देता है। इससे वानर-भालू सेना में दृष्टिभ्रम पैदा हो जाता है। अनेक रावण मैदान में देखकर राम की सेना ही नहीं, आकाश स्थित देवता भी परेशान हो जाते हैं। राम को सबसे पहले इस माया को खत्म करना पड़ता है। और तभी रावण का अंत हो पाता है।

यह पौराणिक गाथा एक सांकेतिक स्थिति का वर्णन करती है। जीवन के तकरीबन हर मोर्चे की यही स्थिति है। युद्ध में भ्रम की स्थिति पैदा करना शत्रु की रणनीति का हिस्सा होता है। इसका उद्देश्य होता है विपक्षियों के मन में संदेह पैदा करके बच निकलने का रास्ता ढूँढ़ना।

आज के सन्दर्भ में देखें तो इस समय दुनिया में दो युद्ध चल रहे हैं। एक महायुद्ध है मानवता और कोरोना के बीच का। इस भयानक युद्ध में अब तक दो लाख 28 हजार से ज्यादा इंसान मारे जा चुके हैं। 32 लाख से ज्यादा मनुष्य इससे संक्रमित हो चुके हैं। ये संक्रमण देश की सीमाएँ नहीं जानता और न ही ये मजहब की दीवारों को पहचानता है। मगर इस मौके का फायदा उठाकर कुछ लोग एक और युद्ध में विजय पाना चाहते हैं और वह है भारत में चल रहा नैरेटिव का युद्ध। नैरेटिव यानी कथ्य की इस लड़ाई में अब एक भ्रम पैदा करने की कोशिश हो रही है। वह है इस्लामोफोबिया का भूत।

एक तरफ देश कोरोना के साथ युद्ध में प्राणप्रण के साथ लगा हुआ है। वहीं दूसरी तरफ कुछ लोग, जिसमें मीडिया का एक वर्ग भी शामिल है, इसे बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक की लड़ाई में परिवर्तित करना चाहता है। ऐसा भ्रम फैलाने के पीछे उसका उद्देश्य है कि कोरोना के साथ जो युद्ध चल रहा है उससे देश का ध्यान भटक जाए। अब तक जो आंशिक सफलता देश ने कोरोना महामारी के विरुद्ध हासिल की है वह तिरोहित हो जाए।

ये विश्वव्यापी महामारी है जो तथाकथित विकसित देशों में अधिक विकराल रूप में फैली है। इससे मरने वाले की तादाद अब (30 अप्रैल) तक अमेरिका में 61670, इटली में 27682, फ्रांस में 24087, ब्रिटेन में 26097 और स्पेन में 24275 हो चुकी है। भारत में अभी तक इस बीमारी से अपेक्षाकृत कम नुकसान हुआ है। इसका श्रेय भारत की आम जनता के त्याग एवं निश्चय, सरकार की तत्परता, प्रधानमंत्री मोदी का लोगों से सीधा संवाद और हमारी गहरी सामाजिक विरासत को जाता है।

संभवत: यही बात कुछ तत्वों को पच नहीं रही। खासकर, पश्चिमी मीडिया के एक बड़े वर्ग और उनके यहाँ के प्रतिनिधियों को ये शायद असहज लग रहा है। संभवतः उन्हें अपेक्षित था कि यहाँ पश्चिमी देशों से ज़्यादा कहर मचे। इस वर्ग की नीयत पर संदेह की बात अगर हम छोड़ भी दें, तो ये वर्ग एक खास रंग के चश्मे से भारत को देखता आया है। ये भारत को एक अशिक्षित, गरीब, अविकसित, पिछडे, गंदगी से भरे, अस्वस्थ, गैर-अनुशासित और विभाजित मानसिकता वाले देश के रूप देखते आए हैं। शताब्दियों से भारत का चित्रण इसी नजरिए से होता रहा है।

भारतीय समाज की आंतरिक आध्यात्मिक शक्ति, जिजीविषा और उसकी विरासत की मजबूती आज तक ये लोग देख ही नहीं पाए हैं। इसीलिए पश्चिमी मीडिया और उस जैसी सोच रखने वाले अन्य लोग ये समझ नहीं पा रहे कि इस देश में कोरोना ने अभी तक मौत का तांडव क्यों नहीं मचाया?

इसी नासमझी के कारण शायद तबलीगी जमात के मामले को लेकर अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में एक के बाद एक समाचार आए हैं कि भारत में मजहब विशेष को प्रताड़ित किया जा रहा है। कुछ लोग तो यहाँ तक कह रहे हैं कि भारत में समुदाय विशेष से होना पाप हो गया है। वे इक्का-दुक्का घटना को लेकर यह प्रचारित कर रहे है कि भारत में मजहब के आधार पर इलाज किया जा रहा है। अक्सर लिखने वाले अपने लेखों में ना तो कोई ठोस सबूत देते हैं न ही कोई सटीक उदाहरण ही प्रस्तुत करते हैं। बल्कि कुछ एकाकी घटनाओं को बेतरतीब तरीके से आपस में जोड़कर यह सिद्ध करने की कोशिश करते हैं कि भारत में अब इस्लामोफोबिया है। इन असंगत घटनाओं का उपयोग वे सिर्फ अपने पूर्व निर्धारित वैचारिक आग्रहों को सिद्ध करने के लिए ही इस्तेमाल कर रहे हैं।

कुछ रिपोर्ट्स का उल्लेख करना यहाँ ठीक रहेगा;

  • भारत में ‘मुस्लिम’ होना तो अपराध था ही, उस पर ये कोरोना आ गया (It Was Already Dangerous to Be Muslim in India. Then Came the Coronavirus) यह प्रतिष्ठित टाइम मैगज़ीन में 3 अप्रैल को छपे लेख का शीर्षक है। इस शीर्षक को पढ़ने के बाद इसकी निष्पक्षता के बारे में क्या कहा जा सकता है?
  • 13 अप्रैल के ‘द गार्डियन’ में लिखा गया कि “कोरोना वायरस के पीछे मुस्लिमो षड्यंत्र की कहानियाँ उन्हें निशाना बनाकर देश भर में फैलाई जा रही हैं” (Coronavirus conspiracy theories targeting Muslims spread in India)
  • पत्रिका ‘फॉरेन पॉलिसी‘ के 22 अप्रैल के अंक की एक रिपोर्ट कहती है- भारत कोरोना फ़ैलाने के लिए मुस्लिमों को बलि का बकरा बना रहा है (India Is Scapegoating Muslims for the Spread of the Coronavirus)
  • टेलीग्राफ नेपाल के 22 अप्रैल के ई-अंक में “भारत में मुस्लिमों का नरसंहार” शीर्षक से एक लेख छपा है।
  • अल जजीरा की 25 अप्रैल की खबर में तो भारत के पूरे लॉकडाउन को ही इस्लामोफोबिया का प्रतीक बता दिया गया। इस खबर का शीर्षक था ‘भारत का लॉकडाउन: असमानता और इस्लामोफोबिया की एक गाथा’ (India’s lockdown: Narratives of inequality and Islamophobia)

इस तरह के अनेकानेक समाचार, लेख, सम्पादकीय और टिप्पणियाँ दुनिया के कई बड़े प्रकाशनों में पिछले कोई एक महीने में लगातार आए हैं। इन्हें गढ़ने वाले कई ऐसे पत्रकार और लेखक हैं जिन्हें ख़बरों की दुनिया में ‘बड़ा’ माना जाता है। इनमें से अधिसंख्य अपनी ये रिपोर्ट लिखने से पहले ज़मीन पर नहीं उतरे। किंवदंतियों, अर्धसत्यों, व्हाट्सएप्प संदेशों (जिनमें कई फेक भी निकले), पूर्वाग्रह से ग्रसित आलेखों, एकतरफा विचारों और मान्यताओं के आधार पर इन्होंने खबरों की आड़ में बस एक नजरिया दुनिया को परोस दिया। निष्पक्षता का तकाज़ा था कि ये अपने विचारों और अभिमतों को इतना एकतरफा नहीं बनाते।

ये सही है कि मार्च और अप्रैल के महीनों में तबलीगी मरकज के कारण देश में कोरोना के मामलों में वृद्धि हुई। तबलीगी जमात के रहनुमाओं ने अपनी मूर्खता, ज़िद तथा अंधविश्वास के कारण सबसे पहले तो अपने अनुयायियों की जिंदगी को खतरे में डाला। आगे कई प्रदेशों में कोरोना का संक्रमण उनके कारण गया। इस कारण तबलीगी जमात लोगों के निशाने पर आ गई। ऐसा अस्वाभविक भी नहीं था। कई लोगों ने तबलीगियों और आम मुस्लिमों में भी घालमेल किया।

पत्रकारीय दायित्व का तकाज़ा था कि ये प्रतिष्ठित प्रकाशन बताते कि तबलीगी जमात सारे मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व नहीं करती। कट्टरता और पुरातनपंथ से ग्रसित तबलीगी जमात, इस्लाम का एक पंथ मात्र है। तबलीगियों ने सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि पाकिस्तान, मलेशिया, इंडोनेशिया तथा अन्य कई देशों में भी कोरोना को फैलाने में भूमिका निभाई। ऐसा करने वाले तबलीगी अकेले मजहबी या पंथिक लोग नहीं थे। अमेरिका में यह काम बाइबल बेल्ट के अंदर रूढ़िवादी चर्च के लोगों ने किया। दक्षिण कोरिया में यह काम चिनशियोजी चर्च के लोगों ने किया। तो फिर तबलीगी मुस्लिमों के एक प्रकरण को लेकर पूरे भारत में इस्लामोफोबिया का भूत खड़ा करना कितना सही है?

ऐसा ही नहीं हुआ, बल्कि इस्लामोफोबिया का भूत खड़ा करने के लिए भारत विरोधी निहित स्वार्थी तत्वों ने झूठ और फरेब का एक जाल भी खड़ा किया। खाड़ी के देशों से कई फेक और जाली एकाउंट से सोशल मीडिया पर एक अभियान चलाया गया। ओमान और सऊदी अरब के राजघरानों से सम्बंधित प्रतिष्ठित लोगों के नाम से भी जाली एकाउंट बनाकर भड़काऊ ट्वीट किए गए। इनमें से कई ट्विटर एकाउंट भारत के चिर-विरोधी पाकिस्तान से निकले। भारत में मजहबी फसाद फैलाना तो पाकिस्तान की नीति का अभिन्न हिस्सा है ही।

पत्रकारिता के मानदंड तो कहते हैं कि इस एकतरफा प्रचार की पड़ताल की जाती। पर ऐसा नहीं हुआ। बिना जाँच के मीडिया के इस वर्ग ने इस प्रचार को तथ्य बतलाकर दुनिया को परोस दिया। असल में दिक्कत तब होती है जब आप घटनाओं को देखने के लिए एक खास चश्मा तय कर लेते हैं। फिर आपको सत्य नजर नहीं आता। इसलिए कोरोना से संबंधित उद्धृत इन खबरों में एक खास बनावट आप देख सकते है। तकरीबन इन सबमें पहले तबलीगी जमात का उल्लेख होता है। फिर लेखक दिल्ली के दंगों को इनसे जोड़ता है।

इस तार्किक उछल-कूद में मोदी सरकार का जिक्र होना तो स्वाभाविक है ही। जब मोदी का नाम आया तो फिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कैसे छूट सकता है? आरएसएस यानी हिन्दू। और हिन्दू का तात्पर्य सीधे मुस्लिम विरोधी होना। इसे तर्क़ कहें या कुतर्क- पर यही ताना-बाना हर घटनाक्रम पर फिट कर दिया जाता है। घटनाओं के तथ्यपरक, निरपेक्ष और और समग्र विश्लेषण की बजाय वे अपने पूर्वाग्रह को साबित करने के लिए बस घटनाओं का इस्तेमाल करते हैं। वे अपने नजरिए को, जो कि भारत को हिंदू-मुस्लिम की दृष्टि से देखता है कोरोना के घटनाक्रम पर भी लागू करना चाहते हैं।

बहुत सुविधा के साथ वे कई तथ्यों को पूरी तरह अनदेखा करते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉक्टर मोहन भागवत ने 26 अप्रैल के अपने भाषण में कहा कि देश के 130 भारतीय बिना किसी भेद के अपने ही हैं। एक घटना का इस्तेमाल करके सभी मुस्लिमों को दोष देना सही नहीं है। यही बात कमोबेश पिछले अक्टूबर में सार्वजनिक भाषणों में भी उन्होंने कही थी। पर शायद यह बात इन तथाकथित निष्पक्ष पत्रकारों और बुद्धिजीवियों के कथ्य में फिट नहीं बैठती इसलिए इनकी यह अनदेखी करते हैं।

कोरोना के खिलाफ लड़ाई एक लम्बी लड़ाई है। ये तय है कि मानवता के साथ-साथ भारत भी इस लड़ाई को जीत ही लेगा। पर नैरेटिव और कथ्य की लड़ाई में, भारत को एक खास नजरिए से देखने वाले लोग, अपने को ठगा हुआ और परास्त महसूस कर रहे हैं। अपनी ही सोच के जाल में फँसा हुआ यह वर्ग इसे अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहता। दलदल में फँसा हुआ व्यक्ति जिस तरह ज़्यादा हाथ-पाँव मारकर अपने को और गहरा डूबा लेता है। ये लोग भी अपने वैचारिक आग्रह में उसी तरह डूबे हुए हैं।

जिस तरीके से राम-रावण युद्ध में माया फैलाई गई थी, ये भी संदेह पैदा करके लोगों को दिग्भ्रमित करना चाहते हैं। मगर कोरोना के साथ लड़ाई से हम लोगों का ध्यान हटना नहीं चाहिए। जैसा कि प्रधानमंत्री ने कहा था ‘सावधानी हटी तो दुर्घटना घटी’ इसलिए सभी भारत प्रेमी लोगों को इस बात का ध्यान रखना है कि कोरोना के साथ इस लड़ाई को मजहब आधारित भेदभाव में तब्दील ना होने दें।

इस लड़ाई में मजहब और पंथों से परे हटकर हर भारतवासी का महत्वपूर्ण योगदान है। ज़रूरी है कि किसी को भी इस आपदा की घड़ी में दूसरेपन का एहसास ना होने दिया जाए। यह लड़ाई हिंदू-मुस्लिम की लड़ाई नहीं, बल्कि भारत और भारत विरोधियों की लड़ाई है। और ये निश्चित है कि सारे कुचक्रों के बावजूद कोरोना हारेगा, भारत जीतेगा।

ऋषि कपूर पर अपने ही फेक न्यूज का इंडिया टुडे ने किया फैक्ट चेक, क्योंकि उनके पास है ‘इन्फ़ॉर्मेशन वार रूम’

अभिनेता इरफान खान के निधन के ठीक एक दिन बाद ऋषि कपूर ने आज यानी गुरुवार को एचएन रिलायंस अस्पताल में आखिरी सांस ली। उनकी मृत्यु की सूचना के तुरंत बाद सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुई। इस वीडियो को कई मीडिया संस्थानों और ट्विटर पर जानी-मानी हस्तियों ने शेयर किया। इस वीडियो को लेकर दावा किया गया कि ये वीडियो ऋषि कपूर के देहांत से एक दिन पहले का है।

टीआरपी, व्यूज और रीच की लालच में कई मेनस्ट्रीम मीडिया संस्थानों ने वीडियो को शेयर किया। इनमें से एक नाम इंडिया टुडे का भी है। टीआरपी के लिए मौक़े का फायदा उठाते हुए उसने पहले ये वीडियो शेयर किया और लिखा कि ऋषि के कपूर के ‘अंतिम क्षणों’ पर ‘एक नजर डालिए’।

वीडियो पुराना निकलने पर पहले अपना ट्वीट डिलीट किया और फिर अन्य संस्थानों पर झूठे दावे का ठीकरा फोड़ते हुए उसका ही फैक्ट चेक कर डाला। बाद में इस फैक्ट चेक को इंडिया टुडे के न्यूज डायरेक्टर राहुल कंवल ने भी शेयर किया।

असलियत सामने आने पर दर्शकों से माफ़ी माँगने की बजाए राहुल कंवल द्वारा शेयर फैक्ट चैक में ऐसे दर्शाया गया कि जैसे सिर्फ़ अन्य संस्थानों ने ये दावा किया है कि ये वीडियो ऋषि कपूर के आखिरी समय का है। फैक्ट ये है कि ये वीडियो वीडियो फरवरी 2020 के पहले सप्ताह का है, जब ऋषि कपूर दिल्ली के मैक्स हॉस्पिटल में भर्ती थे और वीडियो में जिसे आप गाते हुए देख रहे हैं वह वार्ड बॉय धीरज है।

ध्यान दीजिए, कि पहले तो इंडिया टुडे ने जो ट्वीट किया वो शाम के 5: 56 पर किया और राहुल कंवल ने फैक्ट चेक को 7: 27 पर पोस्ट किया। यानी एक मीडिया संस्थान जो सबसे तेज होने का दावा करता है उसे पूरे डेढ़ घंटे लगे ये समझने में कि इस वीडियो को लेकर किया जा रहा दावा झूठा है। उसके बाद, जब उन्हें ये बात समझ भी आई तो उन्होंने माफी माँगने की बजाय अपनी गलती छिपाई और दूसरों की गलती को उभारते हुए फैक्ट चेक कर दिया। हालाँकि जिन्होंने गौर दिया होगा, वो समझ गए होंगे कि शायद ये पहली बार है जब किसी मीडिया संस्थान ने शर्मसार होकर अपनी फैलाई झूठी खबर का फैक्ट चेक किया।

इंडिया टुडे
इंडिया टुडे द्वारा अपनी ही खबर का किया गया फैक्ट चेक

दरअसल, इस वीडियो में एक युवक को ऋषि कपूर की ही फ़िल्म “दीवाना” के एक गाने को गाता हुआ देखा जा सकता है। वीडियो में ऋषि कपूर अस्पताल में बेड पर लेटे हुए देखे जा रहे हैं और उनके पास खड़ा एक युवक गीत गा रहा है। यह वीडियो एक रात पहले का नहीं बल्कि इस वीडियो को पहली बार युट्यूब पर फरवरी 2020 में शेयर किया गया था।

आपको बता दें कि आज सुबह ऋषि कपूर की कैंसर की लंबी बीमारी के बाद मौत हो गई है। उनकी उम्र 67 साल थी। इसके बाद देश के बड़े-बड़े नेता और अभिनेताओं ने अपने-अपने तरीके से उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए शोक व्यक्त किया था। इससे पहले 29 अप्रैल को जाने-माने अभिनेता इरफान खान ने भी मुंबई के कोकिलाबेन अस्पताल में चल रहे इलाज के दौरान दम तोड़ दिया था।

इरफान खान भी पिछले एक वर्षों से कैंसर से पीड़ित थे। दो दिन के भीतर दो बड़े अभिनेताओं का चले जाना बॉलीवुड की एक बड़ी क्षति मानी जा रही है।

अल्पसंख्यकों के अधिकार पर नहीं बोल पाए SC के वकील जे साईं दीपक, जामिया ने आखिरी वक्त में कैंसल किया लेक्चर

जामिया मिलिया इस्लामिया में 24 अप्रैल को ऑनलाइन लेक्चर्स को लेकर एक घोषणा हुई। इस घोषणा में जामिया के छात्र समूह ने ऐलान किया कि वे विविध क्षेत्रों के नामी शख्सियतों का ऑनलाइन लेक्चर आयोजित कराने जा रहे हैं।

इस सीरीज को 25 अप्रैल से शुरू करने की बात कही। बताया कि 30 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट के वकील जे साईं दीपक अल्पसंख्यकों के अधिकार और जामिया मिलिया इस्लामिया एवं अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी जैसे विश्वविद्यालयों में अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजातियों के आरक्षण पर अपनी बात रखेंगे। मगर, जब इसका समय आया तो एक नया ऐलान हुआ कि वकील जे साईं दीपक का व्याख्यान रद्द कर दिया गया है। इस निर्णय के पीछे की वजह और भी हैरान करने वाली बताई।

जानकारी के मुताबिक, व्याख्यान के लिए साईं दीपक से संपर्क करने वाले छात्रों ने पहले उन्हें भीड़ हिंसा पर अपनी बात रखने के लिए आमंत्रण दिया था। मगर, वकील साईं दीपक ने इससे इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि वे राजनीति को तूल देने वाले मुद्दों की जगह अकादमिक विषयों पर बात करना चाहते हैं। हालाँकि, इस दौरान इसी राजनैतिक मुद्दे को डिस्कस करने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं है। मगर, इस बीच वे राजनैतिक उपक्रमों से दूर रहना चाहते हैं।

इसके बाद इस मामले पर काफी चर्चा हुई। अंत में साईं दीपक इस बात पर माने कि वे अल्पसंख्यकों के अधिकार और जामिया मिलिया इस्लामिया और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी जैसे विश्वविद्यालयों में अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजातियों के आरक्षण पर अपनी बात रखेंगे। इसके बाद जामिया छात्रों ने छात्र काउंसिल से बात की और साईं दीपक को एक मेल भेजा। इस मेल में लिखा था कि वे अपने व्याख्यान में अल्पसंख्यक अधिकार व सेकुलरिज्म पर बात रखेंगे।

इसके बाद जामिया की लॉ फैकल्टी ने उनकी तस्वीर के साथ एक पोस्टर भी जारी किया। मगर, जैसे ही ये इस आमंत्रण को जे साईं दीपक को भेजा गया, जामिया के कुछ छात्रों ने इसपर विरोध शुरू कर दिया व माँग करने लगे कि इस लेक्चर को रद्द किया जाए। लेकिन 29 अप्रैल को ट्विटर पर एक छात्र ने ये सुनिश्चित किया कि कमेटी में उसके दोस्त ने विश्वविद्यालय को इस बात के लिए राजी किया कि वे इस लेक्चर को होने दें। हालाँकि अब ये देखना है कि वे आंदोलन करने वाले छात्रों को मना पाएँगे या नहीं।

मगर, इस घटना के बाद जे साईं दीपक को कुछ मैसेज आने लगे। इन मैसेजों में उन्हें बताया जाने लगा कि जामिया में कुछ छात्र उनके लेक्चर के विरोध में आंदोलन कर रहे हैं और माँग कर रहे हैं कि इसे रद्द किया जाए। यह जान साईं दीपक ने छात्र काउंसिल को मेल किया। इस मेल में अपने लेक्चर के मद्देनजर उन्होंने कहा कि वे लेक्चर के लिए उपलब्ध तभी रहेंगे जब छात्रों में से किसी को कोई दिक्कत न हो।

बावजूद इसके कि साईं दीपक अपने लेक्चर को प्राथमिकता देने की जगह छात्रों की सुरक्षा की बात कर रहे थे, फिर भी 30 अप्रैल को बिना किसी सूचना के उनका लेक्चर कैंसिल कर दिया गया। इसके पीछे आधिकारिक तौर पर कोई उपयुक्त कारण भी नहीं बताया गया। लेकिन जिस नोटिस में लेक्चर के कैंसिल होने ऐलान हुआ उसमें ये जरूर लिखा गया कि ऑनलाइन सत्र के चौथे लेक्चर ( साईं दीपक के व्याख्यान) को रद्द कर दिया गया है।

अब हालाँकि, एक ओर छात्रों के मैसेजों से साईं दीपक को वास्तविक वजह का पता थी और जो छात्र उनके ख़िलाफ प्रदर्शन कर रहे थे, उन्होंने भी पहले ये ऐलान कर दिया था कि कुछ लोगों के दबाव में आकर प्रदर्शन कैंसिल हो गया।

मगर, जब जे साईं दीपक को इसके मद्देनजर मेल किया गया तो इसके पीछे का कारण बेहद अजीब बताया गया। मेल में लिखा गया कि लॉ फैकल्टी के एक इंप्लॉय की पत्नी का देहांत होने का कारण इसे रद्द किया गया है। सबसे हैरानी की बात ये है कि जिस दिन उनका लेक्चर होने था, उसी दिन उन्हें इसके बारे में जानकारी दी गई। इसके बाद उस छात्र ने जो उनके लेक्चर को लेकर उत्साहित था उसने भी इस सूचना को ट्विटर पर डाला और बताया कि साईं दीपक का लेक्चर कैंसिल कर दिया गया है।

इसके बाद सभी पहलुओं को देखते हुए और असहिष्णु प्रशासन व छात्रों का असली चेहरा दिखाते हुए अपवर्ड ने निर्णय लिया कि जामिया के वे छात्र जो साईं दीपक का लेक्चर चाहते हैं, उन्हें वह अपना प्लैटफॉर्म मुहैया कराएगा। लेकिन, यहाँ पर विषय अल्पसंख्यकों के अधिकार न होकर अभिव्यक्ति की आजादी होगा।

ये बात स्पष्ट है कि यूनिवर्सिटी ने उन्हीं छात्रों के दबाव में आकर लेक्चर कैंसिल किया, जो पिछले साल नवंबर में सीएए के विरुद्ध आंदोलन कर रहे थे और तब पत्थरबाजी व आगजनी जैसी घटनाएँ हुईं थी। उस समय इन लोगों ने यही दावा किया था कि वे संविधान को बचाने के लिए ऐसा कर रहे हैं।

ऑल्टन्यूज के जुबैर ने BJP प्रवक्ता गौरव भाटिया के दावे पर उठाए सवाल, फिर खुद लगाई मुहर

धुर वामपंथी प्रोपेगेंडा वेबसाइट ऑल्टन्यूज को फैक्टचेकर के तौर पर लगातार गलत चीजों का बचाव करने और फेक न्यूज फैलाने की आदत पड़ गई है। तथ्यों को भी झुठलाने की कोशिश में ये कथित फैक्टचेकर भ्रामक निष्कर्ष निकालकर पेश करते हैं। ऐसा ही कुछ तब हुआ कि जब बीजेपी प्रवक्ता गौरव भाटिया ने एक मस्जिद में लोगों के इकट्ठा होने का वीडियो अपने ट्विटर हैंडल से पोस्ट किया।

गौरव भाटिया ने वीडियो साझा करते हुए कहा, “अगर यह जाहिलियत नहीं तो क्या है? क्या ये लोग देश के कानून से भी ऊपर हैं? यदि उनकी आलोचना करो तो कहते हैं कि हमारे धर्म को निशाना बनाया जा रहा है। खतरे में आप नहीं, बल्कि आपकी वजह से यह देश है। अब देखते है कितने लोग इनके समुदाय से (उनकी निंदा करने के लिए) सामने आते हैं। जिसको बुरा लगता है लगे, गलत है तो गलत है।”

बीजेपी के प्रवक्ता गौरव भाटिया ने साफ तौर पर इस बात का जिक्र करते हुए कहा कि कुछ लोग देश भर की मस्जिदों में लॉकडाउन के नियमों की धज्जियाँ उड़ाते हुए इकट्ठा होते रहते हैं और इसी के चलते लगातार कोरोना वायरस फैल रहा है।

गौरव भाटिया द्वारा ट्विटर पर वीडियो पोस्ट करते ही जुबैर ने उछलकर ऑल्टन्यूज के कथित फैक्ट चेक का एक लिंक डाला। इस प्रोपेगेंडावादी ने बीजेपी प्रवक्ता गौरव भाटिया के लिए कहा “ऐसी क्या मजबूरी आ पड़ी थी कि आपको लॉकडाउन से एक दिन पहले का यह वीडियो पोस्ट करना पड़ा? क्या आपको आईटी सेल से आदेश मिला था?”

फिर उसने अपने ट्वीट के अंत में ऑल्टन्यूज के कथित फैक्ट-चेक का लिंक जोड़ा। हालाँकि यह बात अलग है कि उसमें बीजेपी प्रवक्ता ने जो कहा उनके एक शब्द को भी खारिज नहीं किया गया है।

ऑल्टन्यूज के सह-संस्थापक जुबैर द्वारा पोस्ट किए गए फैक्ट चेक में कहा गया है कि यह वीडियो महाराष्ट्र की एक मस्जिद के बाहर रिकॉर्ड किया गया था, जो महामारी से सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य है। ऑल्टन्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक मुंबई मिरर ने 23 मार्च को खबर दी थी कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने सोमवार को राज्यभर में कर्फ्यू लगा दिया, क्योंकि रविवार को जनता कर्फ्यू का सख्ती से पालन करने के बाद लोग लगातार धारा 144 का उल्लंघन कर रहे थे।

इसके अलावा फिर से ऑल्टन्यूज ने पीटीआई की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि सोमवार को पुलिस ने मस्जिद के ट्रस्टियों के खिलाफ एक प्राथमिकी दर्ज की था, जहाँ करीब 150 लोग कोरोना वायरस की रोकथाम के लिए लागू सरकारी नियमों का उल्लंघन कर नमाज अदा करते हुए मिले थे। इससे यह साफ है कि जो लोग मस्जिद में इकट्ठा हुए थे उन्होंने कोरोना की रोकथाम के लिए जारी किए गए सरकारी आदेशों की अवहेलना की थी।

ऑल्टन्यूज द्वारा किए गए फैक्ट चेक का स्क्रीनशॉट

आपको बता दें कि गौरव भाटिया ने अपने ट्वीट में तारीख या फिर किसी स्थान और समय का उल्लेख नहीं किया था। इस वीडियो का प्रयोग उन्होंने केवल एक उदाहरण के रूप में किया था। जो सवाल उन्होंने खड़ा किया किया था वह आज भी है। इस बात में कोई दोराय नहीं कि यह एक निर्विवाद तथ्य है कि वीडियो में दिखाई दे रहे इकट्ठा लोगों ने कोरोना वायरस से निपटने के लिए जारी सरकारी आदेशों की अवहेलना की थी और दूसरों के जीवन को खतरे में डाला था। इस तरह की कई घटनाएँ सामने आ चुकी है।

लॉकडाउन उल्लंघन की अन्य घटनाएँ

आपको बता दें कि इस हफ्ते की शुरुआत में औरंगाबाद की एक मस्जिद में चालीस के आसपास लोग जमा हो गए थे, जबकि राज्य में कोरोनो वायरस का कहर जारी है। जब पुलिस मौके पर पहुँची तो भीड़ द्वारा उन पर हमला किया गया और यहाँ तक ​​कि हमले में महिलाएँ भी शामिल थीं। इस घटना में तीन पुलिसकर्मी घायल हो गए थे।

वहीं मंगलवार को पश्चिम बंगाल के हावड़ा में लॉकडाउन का पालन कराने गए पुलिसकर्मियों पर हमला किया गया। अहमदाबाद के गोमतीपुर में तबलीगी जमात के सदस्यों की खोज करने गए पुलिसकर्मियों पर हमला किया गया। इस दौरान हुए पथराव में एक सिपाही भी घायल हो गया था। इस मामले को दो आरोपितों को हिरासत में लिया गया था।

गौरव भाटिया और जुबैर के बीच वास्तव में क्या हुआ

दरअसल बीजेपी प्रवक्ता गौरव भाटिया एक बड़े मुद्दे की ओर इशारा करने के लिए इस घटना का उपयोग कर रहे थे। उनके ट्वीट से इस बात का कोई संकेत नहीं मिलता है कि उनका मतलब कुछ और था या उनका इरादा यह बताने का था कि भीड़ एक वैकल्पिक स्थान या समय पर थी। इसके बावजूद भी जुबैर ने भ्रामक टिप्पणी करते हुए प्रतिक्रिया दी कि यह भाजपा के आईटी सेल के दबाव में किया गया है।

ऐसा कर वह यह दिखाना चाहते थे कि लॉकडाउन का उल्लंघन सिर्फ दूसरें समुदाय के लोग ही कर रहे हैं। वास्तव में ऑल्टन्यूज की रिपोर्ट भी उसकी ही पुष्टि करती है।

दुनिया में भी अब रामायण जैसा कोई नहीं, बनाए नए रिकॉर्ड, 1 ही दिन में 7.7 करोड़ लोगों ने देखा

लॉकडाउन के बीच रामानंद सागर की रामायण का दूरदर्शन पर दोबारा प्रसारण शुरू किया गया था। देखते ही देखते इसने सभी रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं। दुनिया में यह सबसे ज्यादा देखा जाने वाला शो बन गया है।

रामायण को एक ही दिन में 77 मिलियन (यानी 7.7 करोड़) दर्शक मिले। यह रिकॉर्ड 16 अप्रैल को रात 9 बजे प्रसारित शो के दौरान बना। पहली बार दूरदर्शन पर ही इसे 1987-1988 के दरम्यान पेश किया गया था।

इससे पहले दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाला ‘रामायण’ सबसे अधिक टीआरपी का रिकॉर्ड भी अपने नाम कर चुका है।

टीआरपी के मामले में इस धारावाहिक ने पिछले 5 साल के हर रिकॉर्ड को तोड़ दिया और इसे मात्र 4 दिन के भीतर 170 मिलियन व्यूज यानी 17 करोड़ दर्शक मिले।

इस पर खुशी जताते हुए प्रसार भारती के CEO ने लिखा था, “मुझे यह बताते हुए काफी ख़ुशी हो रही है कि दूरदर्शन पर प्रसारित हो रहा शो ‘रामायण’ 2015 से अब तक का सबसे अधिक टीआरपी जनरेट करने वाला हिंदी जनरल एंटरटेनमेंट शो बन गया है।”

उल्लेखनीय है कि रामानंद सागर के प्रयासों से पर्दे पर आई रामकथा ने 1988 में भी अनोखा इतिहास रचा था। उस दौरान लोगों से मिले अपार प्रेम का ही नतीजा है कि आज भी दर्शक का मोह इसके प्रति कम नहीं हुआ। 1988 में पहली बार प्रसारित हुआ ये धारावाहिक और इसका हर किरदार लोगों में इस तरह घर कर गया कि रामायण के प्रसारण से पहले लोग टीवी की आरती उतारते थे।

जानकारी के लिए ये भी बता दें कि लॉकडाउन के पहले चरण में रामायण के अलावा दूरदर्शन ने महाभारत, ब्योमकेश बक्शी, शक्तिमान, चाणक्या सहित और भी कई सीरियल्स का प्रसारण शुरू किया था और उन सीरियल्स को भी लोग पहले जितना ही प्यार दे रहे हैं।

बंगाल: बिना अनुमति कोरोना टेस्ट कर सकेंगे डॉक्टर, बैकफुट पर ममता सरकार

पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार ने वह आदेश वापस ले लिया है जिसमें कोरोना टेस्ट से पहले डॉक्टरों को अनुमति लेने को कहा गया था। अब प्रदेश के डॉक्टर सरकार की अनुमति के बिना भी कोरोना की जाँच कर सकेंगे। इस मामले में ममता सरकार लगातार बैकफुट पर नजर आ रही है। उस पर कोरोना से जुड़े आँकड़े छिपाने के भी आरोप लग रहे हैं।

पश्चिम बंगाल स्वास्थ्य विभाग की ओर से 30 अप्रैल को जारी एडवायजरी के दूसरे बिंदू में कहा गया है, “यह स्पष्ट किया जाता है कि आईसीएमआर जाँच प्रोटोकॉल के तहत अब किसी भी अस्पलात में किसी मरीज को भर्ती करने या इलाज करने या फिर व्यक्तिगत तौर पर कोरोना की जाँच के लिए सरकार से अनुमति की कोई आवश्यकता नहीं है।”

स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी एडवाइजरी

बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने ट्वीट कर कहा है कि यह भाजपा के लिए एक बड़ी जीत है। आखिरकार लॉकडाउन के 38 दिन बर्बाद करने के बाद पश्चिम बंगाल सरकार ने आधिकारिक तौर पर अपने उस आदेश को वापस ले लिया है, जिसमें डॉक्टरों के लिए कोरोना की जाँच करने से पहले सरकार की मँजूरी लेनी जरूरी थी। बंगाल ने इस फैसले के कारण कई लोगों की जिंदगियों को छीन लिया, जो कि दुखद है।

मालवीय ने दूसरे ट्वीट में लिखा कि यह एडवाइजरी पश्चिम बंगाल में डॉक्टरों की उस शिकायत के बाद जारी की गई, जिसमें किसी भी व्यक्ति के कोरोना जाँच के लिए ममता सरकार की अनुमति जरूरी थी। यह कोरोना मामलों की संख्या को कम रखने का बंगाल सरकार का एक तरीका था, जबकि यह पार्दर्शिता का समय है।

दरअसल इस महीने की शुरुआत में पश्चिम बंगाल सरकार ने मृत्यु का वास्तविक कारण तय करने के लिए पाँच डॉक्टरों की एक समिति का गठन किया था। इस कदम से संदेह पैदा हो गया था कि पश्चिम बंगाल अन्य राज्यों के विपरीत, कोरोनो वायरस रोगियों की मौतों के लिए पहले से मौजूद स्थितियों के कारण अनिच्छुक है।

ममता सरकार के आदेश में कहा गया था कि मृत्यु प्रमाण पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले डॉक्टरों को एक फॉर्म भरना होगा, जिसके बाद पाँच डॉक्टरों की एक समिति द्वारा जाँच की जाएगी। इसके अलावा, उन्हें स्क्रब टाइफस, डेंगू, मलेरिया और अन्य सहित परीक्षण रिपोर्ट संलग्न करना भी आवश्यक होगा।

इसके बाद बंगाल के नॉन रेसिडेंट मेडिकल प्रोफेशनलों ने कोलकाता के सरकारी अस्पतालों में कोरोना मरीजों का इलाज कर रहे डॉक्टरों के हवाले से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को एक खुली चिट्ठी लिखकर कहा था, सिर्फ सरकार की ओर से नियुक्त कमिटी ही इसकी घोषणा करती है कि मरीज कोरोना से मरा है।

जब कोरोना वायरस का मरीज भी साँस संबधी रुकावटों की वजह से मर गया, समिति ने कोरोना वायरस को मौत की वजह नहीं बताया। कोरोना वायरस को मौत की वजह नहीं बताना आँकडों के साथ फर्जीवाड़ा करना है, जबकि, विश्व स्वास्थ्य संगठन और इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च ने अपनी गाइडलाइंस में इसके स्पष्ट निर्देश दे रखे हैं।

गौरतलब हो कि पिछले दिनों पश्चिम बंगाल से कुछ ऐसी खबरें भी सामने आई थीं कि पुलिसकर्मी और स्वास्थ्य कर्मियों ने अपनी पहचान छिपाते हुए रात में मृतकों के संस्कार किया था, जिससे पश्चिम बंगाल में कोरोनो वायरस के केसों को लेकर संदेह और बढ़ गया था।

वहीं बंगाल के डॉक्टरों ने दावा किया था कि कोरोना वायरस को लेकर राज्य सरकार द्वारा दी जा रही जानकारियों में हेरफेर है। वास्तिवक मामलों का खुलासा करने पर डॉक्टरों ने अपनी नौकरी खोने की आशंका व्यक्त की। डॉक्टरों का कहना था कि राज्य की ओर से जारी आधिकारिक आँकड़े संक्रमित मरीजों की वास्तविक संख्या से बहुत कम है।